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9.
मास्टर माइंड
विचार चूंकि एक द्रव्य है, अतः वे सब घटनायें,
जो द्रव्य
के
अन्दर होती है, विचार के अन्दर भी होती है । द्रव्य (Matter) के अन्दर जिस
प्रकार
रसायनिक परिवर्त्तन होता है, उसी प्रकार जब दो व्यक्ति आपस में बात करते
है, तो उनके विचारों के मध्य भी रशायनिक परिवर्त्तन होता है ।
हर विचार तीन क्रियाओं को करता है:-
- जो कुछ भी हम सोचते है, कहते है, उसका असर
हमारे ऊपर
सबसे पहले पड़ता है
।
- जिसके बारे में सोचते है उसके ऊपर पड़ता है ।
- अगर उस व्यक्ति ने उस विचार को स्वीकार नहीं किया तो वो दुगनी
ताकत से हमारे पास लौट आता है ।
- वो विचार ब्रह्माम्ड में फ़ैल जाता है और जहाँ-२ भी लोग उस तरह
के विचार रखते है वो उससे प्रभावित होते है ।
चितम् मन्त्रः : जो चीज आप बार-२ कहते है तो
उसका ही आपके
चित-रूप में निर्माण हो जाता है ।
अगर कोई आपसे कहता है कि वो शराबी है तो या तो
सबसे पहले आप पूछेगें कि ये
क्या होता है ? या अगर आप जानते है कि शराब या शराबी क्या होता है तो इसका
मतलब ये हुआ कि आपके अन्दर अचेतन मन में कहीं किसी कोने में शराब पीने की
इच्छा दबी हुई है । इसलिए न तो किसी की बुराई करो और ना ही बुरा सोचो । आप
अच्छा सोचेगें तो आप दुगने अच्छे होगें । जिसके बारे में सोचेगें वो और
अच्छा हो जायेगा ।
जो कोई दो या दो से अधिक व्यक्ति कोई भी बातचीत
करते है तो एक नये, नवीन
व्यक्ति का जन्म होता है, जिसकी शक्ल-सूरत बात करने वालों से मिलती-जुलती
है और जिस तरह की बातें होती है उसी तरह का ये व्यक्ति, जिसे हम Master
Mind कहते है, उन बात करने वालों को सुझाव देता है और ये Master Mind उतने
दिनों तक जिन्दा रहेगा जितने दिनों तक वो लोग जिन्होंने इसे जन्म दिया है,
आपस में एक-दूसरे का ध्यान रखेगें । ज्यों-२ ये ध्यान कम होगा त्यों-२ ये
Master Mind कमजोर होता जायेगा और अन्त में मर जायेगा ।
अगर ये Master Mind, स्त्रियों के साथ मिलकर बना
है तो ये और अधिक
शक्तिशाली होगा क्योंकि ये positive व negative दोनों प्रकार की विचार
ऊर्जा से मिलकर बना होगा ।
हर बुरा Master Mind जलन वाला, लड़ाई वाला
और अन्य ऐसी बातों से सत्यानाश
कर देगा ।
अशांत मन ही सारे पाप की जड़ है । हमारा हरेक के
साथ प्यार का
रिश्ता हों ।
- जानबूझकर व हिम्मत करके दूसरों को प्यार करने
की कोशिश करें । इसका एक ही
तरीका है कि हरेक के अन्दर कोई न कोई अच्छाई ढ़ूंढ़ निकालें । कुछ भी घट
जाएँ पर आपके भीतर मिठास बनी रहनी चाहिए ।
- कोई न कोई बात ढ़ूंढ़ कर प्रशंसा करें तभी आप
व्यक्तियों के साथ हिल-मिल
सकेगें ।
- हमेशा आदमी के ऊपर विश्वास करना सीखें तथा
उसे जतायें कि आप उस पर विश्वास
कर रहे है । कभी भी Bad Master Mind न बनायें ।
- एक लिस्ट बनायें जो तुम्हें पसंद नहीं है और
एक-२ के लिए प्रार्थना करते
जायें और अपने प्यार से उन्हें घेर दें । हो सकता है कि इसमें आपको समय
लगें । जब आपके मन में प्यार की भावना जग जायें तो उसका नाम काट दें ।
जैसे एक बर्फ़ के टुकड़े को पिघलने में समय लगता है उसी प्रकार से आपको भी
समय लग सकता है ।
- जब भी कोई मौका मिल जायें तो उन्हें
Greetings भेजें । उनके सुख-दुख
में शरीक होयें । ये उम्मीद न रखें कि आपको कोई जवाब मिलेगा ।
- हमेसा खुशमिजाज रहें । मन के किसी कोने में
किसी प्रकार का घमंद न रखें ।
स्वाभाविक रूप में सबको प्यार करें और अपने अन्दर से ईश्वर के स्वरूप का
प्रगटीकरण करें । धीरे-२ सभी लोग तुम्हें प्यार करने लगेगें । चाहे कुछ भी
हो जायें, आपका प्रेम दूसरे के प्रति प्रेम कभी भी कम नहीं होना चाहिए ।
जब तक आपके मन की गति सूक्ष्म नहीं हो जाती तब
तक आपका ईश्वर से एकीकार
नहीं हो सकता है ।
You have to give-to the suffering human. ये न सोचें कि मै कुछ हूँं । आप
कुछ नहीं हैं बल्कि महान है । "मै कुछ हूँ ।", यह भावना उनके अन्दर आती है
जिनके अन्दर हीनता की भावना होती है ।
राम, लक्ष्मण, कृष्ण को जानें ।
- राम - सबके मन में रमने वाले
- लक्ष्मण - किस प्रकार लक्ष्य की ओर बढ़ते है
- कृष्ण - किस प्रकार कर्म को करते है
- योग - किस प्रकार आप सबके साथ एक हैं
जब आप अपने अन्दर के ईश्वर को जगायेगें तभी आप दूसरे के अन्दर स्थित ईश्वर
को जानेगें ।
- जब हमारे अन्दर ईश्वरीय-भाषा और गुण होते है
या जब हम स्वंय ईश्वर का
प्रगटीकरण करते है तभी हमें दूसरे के अन्दर के ईश्वर के दर्शन होने लगते
है ।
- जब हम संवेदनशील होगें तभी हमें ईश्वर के
दर्शन होगें । जब हम छोटे से
छोटी वस्तु में महानता देखने लगेगें, तभी हमारा कल्याण होगा ।
- ईश्वर कोई बाहर से नहीं आता है, वो तो संसार
के कण-२ में व्याप्त है इसलिए
जब हम ऊँच-नीच से परे हो जाते है, पाप-पुण्य से परे हो जाते है और केवल
सौन्दर्य देखने के आदि हो जाते है तभी हमें ईश्वर की मौजूदगी का अनुभव हो
सकता है ।
- अगर हमारी आँखे जरा सी ख्शी में भर आती है और
जरा से दुःख में भर आती है
और अगर ये आँसू हमारी वासना और चाहना के है तो अभी हम इस योग्य नहीं हुए
है कि ईश्वर की मौजूदगी को देख सकें इसीलिए संसार के व्यक्ति और प्रकृति,
ईश्वर में नहीं दिखाई पड़ती ।
- अगर हमारे कान निन्दा सुनने के आदी है और
शोर-गुल में दिलचस्पी लेते है तो
हम ईश्वर की मौजूदगी की मधुर आवाज कैसे सुन पायेगें । इसीलिए संसार के लोग
जहाँ लड़ाई-झगड़ा हो रहा हो, वहाँ सुनने के लिए फ़ौरन पहुँच जाते है, लेकिन
प्यार के व हँसी-खुशी के कहकहे सुनने के लिए कोई नहीं जाता ।
- अगर हमारे हाथों को मार-काट करने की आदत है,
गन्दे खत लिखने की आदत है,
नुकसान पहुँचाने वाले कागजात लिखने की आदत है तो क्या ये हाथ इस काबिल है
कि ईश्वरीय मौजूदगी के चरण छू सकें या भगवान को कुछ भेंट दे सकें । अगर
आपकी वाणी को गाली-गलौज करने की आदत है, चीखने की आदत है, दूसरों की
निन्दा करने की आदत है, तो क्या ईश्वर की मौजूदगी में ये वाणी प्यार के ही
शब्द बोल पायेगी । अगर आपके पैरों को गुमराही के रास्ते पर जाने की आदत
है, जैसे शराबघर, जूआखाना, गन्दे क्लब, तो क्या आपसे यह उम्मीद की जा सकती
है कि आप वहाँ पहुँचेगें जहाँ पर ईश्वर की मौजूदगी है ।
- अगर आपके ह्रदय में दाह है, जलन है, क्रोध
है, तीव्र काम-भावना है,
वासनामय विचार है, तो क्या आप अपने इस ह्रदय की वेदी पर आये हुए ईश्वर को
प्यार से बिठा सकेगें । उस ईश्वर को, जिसने सिवाय ह्रदय के प्रेम के और
कुछ चाहा नहीं है । इसलिए हम कभी ईश्वर की मौजूदगी का ह्रदय में अनुभव ही
नहीं कर सकते है । जब तक संसार के किसी भी व्यक्ति के प्रति चाहे वो
कीड़ा-मकोड़ा क्यों न हो, हमारे मन में घृणा, कुंठा या बदला लेने की भावना
है, तब ईश्वर से एकीकार नहीं हो पायेगा । इसीलिए कृष्ण भगवान ने कहा कि
"सब धर्मों को त्याग कर मेरी शरण में आओ । अपनी सब धारणायें और मान्यतायें
समाप्त करके कृष्ण के समान प्रेम की वर्षा करें ।
- यह सब विचार करने के बाद और जितना कुछ आपने
इस विषय-वस्तु में पढ़ा है,
उसके बाद आप यह निर्णय लें कि आपको एक नये जीवन की शुरूवात करनी है तथा आप
एक बार फ़िर से एक नया जन्म लें ।
शुरू-२ में यह कठिन लगेगा, फ़िर बाद में रोज
सकारात्मक विचार और
विश्व-प्रेम के विचार, दूसरों के साथ प्रत्येक परिस्थितियों में प्यार से
रहने के विचार जब हम अपने मन में बोयेगें और जो नकारात्मक विचारों की
घास-फ़ूस उग आई है, उसको काट डालेगें । जब धीरे-२ ये पौधे बढ़ेगें और सुन्दर
फ़ूल खिलेगें, तब इस नयी वाटिका में आपका नया जन्म होगा ।
हम अपने अन्दर शान्ति और सुख का अनुभव
कैसे करें :-
- जो हमको मिला है बाहर से, वो एक दिन चला
जायेगा, इसलिए जब तक वो हमारे पास
है, हम उसको पूरी तौर पर प्यार दें और आदर दें और जब वो जायें तो उसको
खुशी-२ विदा करें । जैसे यह शरीर है, बाल-बच्चे है, मकान, जायदाद है,
रूपया-पैसा है, इत्यादि । हम योग-वियोग दोनों को प्यार दें । जब तक आपके
पास है उसे गहराई से प्यार करें ।
- जो कुछ आपको मिला है उसे दूसरों को बाँट कर
उसका आनन्द लें । किसी को दया
दिखा कर के, दान-दक्षिणा देकर, हीन या गरीब समझ कर उसके अन्दर के ईश्वर का
अपमान न करें ।
- थोड़ा सा समय निकाल कर प्रकृति में बैठें ।
प्रकृति के साथ अपनी एकता का
अनुभव करें ।
- अपने ईश्वरत्व पर विश्वास रखें ।
- हमेशा ध्यान रखें कि बाहर से मिला हुआ आनन्द
क्षणिक होता है । स्थायी सुख
नहीं होता है । इसलिए आनन्द का स्रोत और सुख का स्रोत मनुष्य के अन्दर है,
बाहर नहीं ।
Lord,
In the quiet of this morning
ho
ur, I come to the for peace
for wisdom, p
ower, to view the world
to-day through love filled
eyes, be patient,
understanding gentle-wise.
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