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||  भविष्य-सर्जन की कला व विज्ञान ||
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वर्त्तमान युग के परिवर्तनशील संसार में भविष्य-सर्जन की कला व विज्ञान

 
"परिवर्तन ही जीवन है ।"

यदि परिवर्तन ना हो, तो विकास भी नहीं होयेगा । भले चाहे होने वाले परिवर्तनों से प्रत्यक्ष रूप में कोई लाभ ना होता हुआ दिखाई दें, फ़िर भी प्रत्येक परिवर्तन लाभकारी ही होता है । उससे होने वाला लाभ तत्कालिक या दूरगामी हो सकता है । आज के युग में परिवर्तनों में होने वाली क्रियाओं में बहुत तेजी आयी है । साथ ही, ये परिवर्तन आज विश्वव्यापी तौर पर हो रहे है और मनुष्य को इनकी क्षण-प्रति-क्षण जानकारी मिलती रहती है । यह एक अनिश्चिंता को जन्म देती है । इस कारण-वश, यह एक विचारणीय विषय है ।
 
परिवर्तनों के प्रभाव से अछूते रहना भी असम्भव है । परिवर्तनों को निर्विकार-रूप से भी देखा नहीं जा सकता है । हम परिवर्तनों से या तो क्रिया या प्रतिक्रिया कर सकते है । परन्तु उनसे सिर्फ़ प्रतिक्रिया करना, अपनी ऊर्जा का अव्यय होगा । परिवर्तनों पर क्रिया करना, उनसे लाभ उठाने का एक सफ़ल उपाय है अन्यथा परिवर्तन, आप पर क्रिया करना शुरू कर देगें ।

साथ ही, चुंकि, जीवन हमेशा बहता रहता है, इसलिए जो आज, "आज है", वो कल "बीता हूआ कल" हो जायेगा और जो आज, "आने वाला कल" है, वो "आज" हो जायेगा । कहने का अर्थ है कि हम भविष्य से नहीं बच सकते है । ये लगातार होने वाले परिवर्तन, हमें हर क्षण एक नये भविष्य की ओर ले जा रहे है । यह भविष्य हमारा चाहा या अनचाहा हो सकता है । पर ये भविष्य, हमारे लिए आनंदमय हो, शांतमय हो और ऐश्वर्यमय हो, इसके लिए हमें कुछ करना पड़ेगा । सिर्फ़ इच्छा-मात्र से कुछ नहीं होता है । इच्छा के साथ जिम्मेदारियों को भी निभाना पड़ता है । इच्छा को यथार्थ में बदलने के लिए, जिम्मेदारियों को निभाना आवश्यक है । यहीं एक यात्रा है, वर्त्तमान से भविष्य की और की ।
 
हम भूत-काल से सीखते है, अपने वर्त्तमान में इस प्रकार कार्य करना कि हमारा भविष्य बेहतर हो । यह हम कर पाते है क्योंकि हम भूतकाल और वर्त्तमान में विभेद करने की क्षमता रखते है । यदि हम ऐसा नहीं करेगें या हम ऐसा नहीं कर पाते है तो हम जहाँ-के-तहाँ रह जायेगें । हमारे जीवन में, एक ठहराव आ जायेगा और क्योंकि परिवर्तन ही जीवन है अतैव जीवन ही नष्ट हो जायेगा । भूतकाल को हमें एक बोझ की भांति लेने से उन्नति संभव नहीं है बल्कि भूतकाल के अनुभवों का उपयोग करके अपनी क्षमताओं को बढ़ा कर जीवन की नई उचाईयों तक पहुँचा जा सकता है ।
 
हम अपने व्यक्तित्व को दो प्रकार से ढ़ाल सकते है:- पहला प्रतिक्रियावादी और दूसरा सर्जनवादी । हमारे बस में यह नहीं है कि मेरे माता-पिता कैसे हो ? हमें उनकी जीवन-शैली की वजह से यदि कुछ हासिल ना हुआ हो, तो हम प्रतिक्रिया जरूर कर सकते है । परन्तु, यह प्रतिक्रिया मात्र हमारी ऊर्जा का नाश करेगी क्योंकि हम चाह कर भी, अपने माता-पिता को नहीं बदल सकते है । हाँ, मै स्वंय कैसा पिता बन सकता हूँ ? मै स्वंय कैसी माता बन सकती हूँ?, इस सर्जनात्मक रूझान की ओर हम अवश्य जा सकते है । यह रूझान आरम्भ होते ही, हमारी निष्क्रियता, सक्रियता में बदलना शुरू हो जायेगी क्योंकि तब हम एक भविष्य के सर्जन में कार्यरत होगें ।
 
  • इच्छा + जिम्मेदारी = आशा, सफ़लता 
इच्छा - जिम्मेदारी = निराशा, असफ़लता
 
प्रतिक्रिया में आप सिर्फ़ हारने के लिए जीते है । सर्जनात्मक विधा में, आप जीतने के लिए जीते है । आप अपनी क्षमताओं का पूर्ण उपयोग करते है । प्रतिक्रिया करते समय, हमारा सारा ध्यान मात्र बचाव करने में लगा होता है । वहीं सर्जनात्मक विधा में, हम अपने को बचाव की विधि से बाहर निकाल कर, अपनी क्षमताओं को भली-भांति पहचान कर, उनको बढ़ाने का प्रयास हुए, अपने भविष्य के निर्माता बनते है ।
 
अपने भविष्य के निर्माता बनने के लिए, हमें मात्र तीन चरणों की प्रक्रिया से गुजरने की आवश्यकता है:-
 
1. अभिलाषा
2. स्वंय से सहकायता 
3. जटिलताओं तथा परिवर्तनों को समझना

सबसे पहला चरण है, अभिलाषा । जिस क्षण आप अभिलाषा करना आरम्भ करते है, उसी क्षण से चिंतन शुरू हो जाता है और यह चिंतन चिंता का नाश करना आरम्भ कर देता है । सफ़लता की दिशा में सही कदम उठाने के लिए, चिंतन, मनन और कार्याव्यन, इन तीनों के सम्मिश्रण की आवश्यकता है । यह करते ही, हमारा जीवन उद्धेश्यों से परिपूर्ण हो जाता है और हम एक नदी के समान हो जाते है, जो कि अपने राह में आने वाली किसी रूकावट पर ना ध्यान देते हुए, बल्कि उनको अपने साथ लेते हुए, अपने सागर में मिलने और राह में आने वाली सभी भूमि को हरा-भरा करने के उद्धेश्य को पूरा करने के लिए बहती जाती है ।  
 
दूसरा चरण है, स्वंय से सहकायता । यहाँ सहकायता का अर्थ आपके आस-पास के व्यक्तियों, परिस्थितियों, समाज से समन्वय नहीं है बल्कि स्वंय से सहकायता से है । यह सहकायता आपके तन-मन की, आपके ज्ञान-अनुभवों की, आपकी क्षमताओं-कमजोरियों की है । एक बार, जब आप इस सहकायता को करना सीख जाते है, तब आप अपने भविष्य के निर्माता बनने के लिए, एक ठोस प्रक्रिया को करने में सक्षम हो जाते है ।
 
तीसरा चरण है, जटिलताओं और परिवर्तनों को समझने की क्षमता । ये क्षमताऐं भी, आज के मनुष्य में, पहिले की अपेक्षा और अधिक विकसित है । पहले जहाँ, मनुष्य सिर्फ़ सीधे-तौर पर (Linear) सोच सकता था, और बाद में, जहाँ उसने चौ-तरफ़ा (Lateral) सोचना आरम्भ किया, वहाँ, आज का मनुष्य की सोच एक प्रणाली-सोच, व्यवस्था-सोच (System-Thinking) है । आज, हम ना केवल किसी एक क्रिया से होने वाले प्रभाव के बारे में सोच सकते है, बल्कि इस क्रिया पर चारों तरफ़ पड़ने वाले बलों के प्रभावों के फ़लस्वरूप परिणामों में होने वाले परिवर्तन का आकंलन भी कर सकते है । किसी प्रणाली से प्राप्त होने वाले परिणाम उस प्रणाली की स्थिर व गतिशील अवस्था द्वारा किस प्रकार परिवर्तित होते है, यह भी आज जान और सोच सकते है । किस-प्रकार से, एक प्रणाली, दूसरी प्रणाली पर प्रभाव डालती है, यह आकंलन भी सम्भव है । इस कारण, आज का मनुष्य भविष्य-निर्माण को एक प्रक्रिया के रूप में लेने में सम्भव है ।

इस प्रक्रिया के दो सतत पहलू है । पहला "कल्पना करना" और दूसरा "उसका प्रत्यक्षीकरण" । जिस प्रकार से, एक कुम्हार अपने मन-मष्तिक में एक बर्तन  की कल्पना करता है, उसके बाद मिट्टी को चाक पर चढ़ा कर उस मिट्टी को एक रूप देना शुरू करता है । बीच-बीच में, वह इस बर्तन के भौतिक रूप को अपनी कल्पना से मिलता जाता है । जब उसको उसकी इच्छित कल्पना के अनुसार बर्तन का आकार प्राप्त हो जाता है, तब वह इस प्रक्रिया को रोक देता है । यहीं प्रक्रिया, एक चित्रकार भी करता है । आप भी अपने भविष्य के चित्रकार है । अपने मन-मष्तिक के कैनवास पर, अपने भविष्य का चित्र बनायें और फ़िर पूरे तन-मन से जुट जायें इस कल्पना को एक रूप देने में ।
 
प्रत्येक मनुष्य, अपना एक भविष्य बनाना चाहता है । परन्तु कभी-कभी, हम दूसरों के बनाये हुए भविष्य में ना चाहते हुए भी, परिस्थितियोंवश जीते है । पर आपके अंतर्मन में, इस आपके द्वारा चाहे हुए भविष्य की संकल्पना सदैव विद्यमान रहती है । परन्तु, हम चाहे तो अपने आज के वर्तमान को, अपने इच्छित भविष्य में बदल सकते है । उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यक्ति शिक्षक बनना चाहता था, परन्तु किन्हीं कारणवश उसे डाक्टर बनना पड़ा । अब आज वह व्यक्ति चाहे तो निराश होते हुए, मात्र उन परिस्थितियों, व्यक्तियों के प्रति प्रतिक्रिया करने में अपनी ऊर्जा का अव्यय कर सकता है या फ़िर आज ही अपने उस शिक्षक बनने की दिशा की ओर कदम उठाना आरम्भ कर सकता है ।
 
इस Vision को जानने के लिए अपने अंतर्मन में झांके । साथ ही अपनी क्षमताओं का आकलन करें । 
चूंकि भविष्य का सर्जन एक प्रक्रिया है और किसी भी प्रक्रिया को करने के लिए गति की आवश्यकता होती है । तो इस भविष्य-सर्जन की प्रक्रिया को गतिशील बनाने के लिए, हमें जानना होगा कि १। हम क्या चाहते है ? और २। हमारे पास क्या है ? इन दोनों का अन्तर, हमारे अन्दर एक तनाव पैदा करेगा । यह तनाव हमें आगे खिचेगा और हमारी आज की परिस्थितियां हमें पीछे खीचेगी । इसप्रकार से, एक गतिशीलता की स्थिति उत्पन्न होगी । 
 
आज हमारे पास पूर्व के मनुष्य की अपेक्षा में बहुत अधिक विकल्प मौजूद है । विश्वव्यापी परिवर्तनों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है परन्तु इन परिवर्तनों का उपयोग करते हुए, सतत प्रयासों द्वारा और सधे हुए रहते हुए (focused) , हमें अपने इच्छित भविष्य का सर्जन करना है । 
 
अपने इच्छित भविष्य में जाना, इस लिए भी आवश्यक है क्योंकि यदि आपने ऐसा नहीं किया तो आपके द्वारा प्राप्त की गयी सफ़लता का आकार तो बहुत बड़ा होगा, परन्तु इसमें ठोसता का अभाव होगा । आप अति सफ़ल होने के बावजूद भी, एक रिक्तता का अनुभव करेगें । अतैव अपने इच्छित भविष्य का सर्जन करें, इसके लिए निर्णय लें । यदि आपके निर्णय मूल्यवान है, तो आप महान विकल्पों का चयन करेगें । 
 
अंत में, एक प्रश्न यह भी आता है कि एक मनुष्य की भांति तो हम एक है, परन्तु इस संसार में, हमारे अनेक रूप है । कोई भी पुरूष स्वंय में एक रूप है, वह एक पिता भी है, बह एक पुत्र भी है, वह एक पति भी है, एक भाई भी है, एक कर्मचारी भी है, एक देशवासी भी है  और उसके यह सभी रूप अपना-अपना एक इच्छित भविष्य रखते है । यदि कोई अपने इन सभी रूपों के प्रति ईमानदार है तो वह अपनी विभिन्न पहचानों के इच्छित भविष्यों का एक-साथ सर्जन कर सकता है । बल्कि यह स्थिति और भी शोभनीय है, क्योंकि इस अवस्था में, यह सभी भविष्य, उस व्यक्ति के जीवन में एक हीरे के फ़लकों की भांति दिखेगें और चूंकि अतंतः इस सभी रूपों के पीछे एक ही अंतर्मन है, अतः इन सभी भविष्यों की सर्जन क्रिया में बिना किसी विरोधाभासपन को लायें हुए, इनका निर्माण होता जायेगा । 
 

इसप्रकार से, अपने ज्ञान का, अपने अनुभवों का, अपनी क्षमताओं का उपयोग करते हुए, भविष्य की चिंता करने की बजाय, इस वर्तमान के बहुत तेजी से बदलने वाले युग में, उपरोक्त कला व विज्ञान का उपयोग करके, हम अपने इच्छित भविष्य का सर्जन कर सकते है ।


उपरोक्त लेख को आपके साथ साझा करने के लिए, मै आभारी डा० आई०जी०कानन जी का हूँ | जिन्होंने हाल ही में, इस विषय पर एक लेक्चर दिया था । लेक्चर मूल रूप में अंग्रेजी में था । जिसे आत्मसात करने के साथ-साथ, मुझसे जितना हुआ, उतने का मैने हाल में बैठे-बैठे तत्कालिक हिन्दी अनुवाद करके नोट्स बनाने की चेष्टा की । आशा करता हूँ कि उनके मूल विचार आप तक पहुँचे ।

धन्यवाद ।
धनञ्जय शर्मा
30.11.2004


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