कैसी होती है सच्ची भक्ति?

कैसी होती है सच्ची भक्ति?

परमवन्दनीया माताजी, जिनकी जन्म शताब्दी को हम लोग इस वर्ष मना रहे हैं, वे करुणा, ममता एवं वात्सल्य की प्रतिमूर्ति तो हैं ही, साथ ही पूज्य गुरुदेव की प्रखर वाणी भी उनके माध्यम से मुखरित होती रही है। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी गायत्री परिवार के सभी साधकों को एवं उन सभी साधना-पथ के पथिकों को सम्बोधित करते हुए कहती हैं कि सच्ची भक्ति, भगवद्भक्ति का आधार जानना हर साधक के लिए अनिवार्य है। वन्दनीया माताजी सभी को समझाते हुए कहती हैं कि भक्ति बाह्य आडम्बर से नहीं, वरन आन्तरिक परिष्कार से सुनिश्चित होती है। जिसका हृदय निर्मल होता है, जिसकी भावनाएँ उदार होती हैं एवं जिसका व्यक्तित्व ईश्वर एवं गुरुप्रदत्त पथ के लिए समर्पित होता है—वही सच्चा भक्त है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.....

जीवन में भगवद्भक्ति

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

बेटियों एवं प्रज्ञा परिजनो! जीवन में जब भगवद्भक्ति आ जाती है, तो वह एकांगी नहीं होती, सर्वांगपूर्ण होती है। सर्वांगपूर्ण का मतलब है कि वो अपने तक सीमित न होकर के सारे विश्व में, सारे समाज में और सारे राष्ट्र में फैल जाती है और जो अपने तक सीमित होती है तो उसको संकीर्णता कहते हैं।

जो अपने तक ही सीमित रहते हैं, अपनी ही मुक्ति और अपना ही स्वर्ग चाहते रहते हैं, मान लीजिए उस एकांगी भक्ति से किसी व्यक्ति को स्वर्ग मिल भी जाए तो आखिर उससे बनेगा क्या? जब उस भक्ति का लाभ सारे समाज को नहीं मिल पाया, कुटुम्ब को नहीं मिल पाया, राष्ट्र को नहीं मिल पाया और विश्व को नहीं मिल पाया तो एकांगी मुक्ति मिल भी जाए तो आप उसका क्या करेंगे।

श्रीरामकृष्ण परमहंस के पास एक अँगरेज पादरी गया और उनकी भक्ति की खिल्ली उड़ाने लगा। उसने कहा—"हमने सुना है कि भगवान आपके समीप रहता है और काली माँ आपके साथ रहती हैं, तो क्या आप हमें भी दिखाएँगे?"

उन्होंने कहा—"हाँ, मैं दिखा सकता हूँ। मेरी काली माँ हर समय मेरे साथ रहती हैं और वो परमब्रह्म हर समय मेरे रोम-रोम में समाया रहता है।"

उस पादरी को लेकर के वे एक कोढ़ी की कुटिया में पहुँचे और कुटिया में जा करके उन्होंने रूई के फाये से पहले उसको पोंछा, धोया और उसकी मरहम-पट्टी लगाई। किस आस्था के साथ, जैसे कि मान लीजिए साक्षात् भगवान कोढ़ी के रूप में हों और वो भक्त के रूप में उनकी मरहम-पट्टी लगा रहे हों।

साक्षात् भगवान के दर्शन

अँगरेज नतमस्तक हो गया और उसने कहा कि बस, भगवान को पा लिया, भगवान को मैंने देख लिया। अब आपके कहने की आवश्यकता नहीं है, मैंने तो साक्षात् आपको ही भगवान के रूप में देख लिया। जो करना चाहिए था भगवान के भक्तों को, वो आप कर रहे हैं और मैं तो देखने के लिए आया था; क्योंकि मुझे तो आपकी भक्ति पर विश्वास नहीं था, लेकिन मैंने पाया कि आपकी भक्ति सार्थक है।

भक्ति तभी सार्थक होती है, जब उसका परिणाम दूरगामी हो और हमारे समाज को और विश्व को उसका लाभ मिले। तपस्वी तिल-तिल अपने को गलाते आए हैं। आप गुरुजी को ही देख लीजिए। आप उनको गुरुजी कहते हैं, मैं अधिकतर आचार्य जी कहती रही हूँ।

उन्होंने अपना सारा जीवन तप में ही लगा दिया। अपने लिए? नहीं अपने लिए नहीं, अपने लिए स्वर्ग-मुक्ति चाहिए होती या भौतिक साधन चाहते होते तो हम भी सेठ-साहूकारों की तरह से रहे होते और राजनीतिक क्षेत्र में गए होते तो कोई बड़े नेता हुए होते, लेकिन नहीं हम तो उस भगवान के नेता हैं। हम तो उस भगवान के बेटे हैं, जिसने हमको जन्म दिया है और आशा की है कि आगे चल करके विश्व मानव को जो पीड़ा और पतन से कराह रहा है, राहत पहुँचाएँगे।

बेटे! गुरुजी ने सारी जिन्दगी तिल-तिल करके अपने को गला दिया। इस उम्र में भी, पचहत्तर वर्ष की आयु में भी इतना कठोर तप उन्होंने किया और कर रहे हैं। कब तक पूर्ण होगा? संकल्प की दृष्टि से तो यह वसन्त पंचमी तक पूर्ण हो जाता है, पर अभी और भी कुछ आगे चलेगा, ऐसा मेरा अनुमान है।

भक्ति का सही स्वरूप

बेटे! भक्ति का सही स्वरूप अभी आप समझ नहीं पाए। भक्ति का सही स्वरूप समझ जाएँगे तो समझ में आ जाएगा कि भक्ति किसे कहते हैं। भक्ति बनावटी आडम्बर को नहीं कहते, भगवान परखता है कि मेरा सच्चा भक्त कहाँ है? चलिए इस सन्दर्भ में मैं आपको एक उदाहरण सुनाना चाहूँगी कि ईश्वरदर्शन किसे कहते हैं? मैंने अभी आपको एक उदाहरण सुनाया रामकृष्ण परमहंस का। दूसरा मैं सुनाना चाहूँगी रैदास का। सोमवती अमावस्या थी और लोग गंगास्नान करने जा रहे थे। रैदास से कहा कि चलो आप भी गंगास्नान के लिए चलो।

उन्होंने कहा—"लो मेरे फूल और माँ गंगा को अर्पण कर देना तथा कहना कि रैदास आज व्यस्त है, वो आ नहीं पाया। लोग गए और सबने भेंट चढ़ाई, किसी ने दूध चढ़ाया, किसी ने फूल चढ़ाए, किसी ने दीपक चढ़ाया। सब अपने आनन्द में थे, लेकिन अन्त में जो फूल रैदास ने दिए थे, उन्होंने जब अर्पण किए और कहा—"माँ रैदास ने कहा है कि मेरी माँ को मेरे फूल अर्पण करना और मेरी माँ हाथों में लेगी। यही हुआ। जैसे ही रैदास का नाम आया कि गंगा ने दोनों हाथ बाहर निकाल दिए और वो फूल उन्होंने अपनी अंजलि में ले लिए।

उपासना और भक्ति

बेटे! ये होती है उपासना और ये होती है भक्ति। भक्ति जो होती है, अपनी अन्तरात्मा को धोने के लिए होती है। मैल की जो परत जीवात्मा पर चढ़ी हुई होती है, उस आवरण को हटाना पड़ता है। अँगारे के ऊपर यदि मैल जमा हो जाए, गरदा जमा हो जाए तो अग्नि का जो वास्तविक स्वरूप है, वो दिखाई नहीं पड़ेगा। जब उसको हटा देंगे, फिर वो वास्तविक अग्नि के रूप में लाल-लाल अँगारा जैसा दिखाई पड़ेगा। क्यों? अँगारा तो वही है, जो अभी तक राख की परत में छिपा हुआ था, लेकिन जब वो परत हटा दी गई तो अग्नि का रूप प्रकट हो गया।

इसी तरीके से जब हम भगवान को अपने में मिला लेते हैं तो हम भगवान के भक्त जैसा ही आचरण करने लगते हैं। भगवान ने जो उम्मीद की है, उसी के अनुसार भक्त चलता है और इसके विपरीत चला तो केवल आत्मतुष्टि हो सकती है, केवल अपने दिमाग की तुष्टि हो सकती है, पर जीवात्मा की नहीं।

उसमें कहाँ तक सफलता मिलेगी, हम नहीं समझते कि सफलता मिलेगी; क्योंकि इस रास्ते से हट करके हमने देखा है कि भक्ति से कितना लाभ होता है। अनायास इतना लाभ मिलता है कि शायद ही किसी को दुर्लभ हो, क्योंकि भक्ति उसके जीवन में समायी हुई है।

मन चंगा तो कठौती में गंगा

रैदास का एक उदाहरण मैं अभी सुना चुकी हूँ। रैदास का एक और सन्दर्भ है कि वे बैठे थे और अपना वही काम जो चमड़े का था, बड़ी लगन और आस्था के साथ कर रहे थे कि जो ग्राहक आया है, ये मेरा भगवान है और भगवान की सेवा करना मानवता का धर्म है। तभी एक व्यक्ति आया और उसने कहा कि तुम्हारी माँ गंगा कहाँ है? आज मेरी औरत के कंगन खो गए हैं, वो मिल जाएँ तो मैं जानूँ कि तुम्हारी गंगा माँ ऐसी है।

उनने कहा कि देखो भक्ति यह नहीं होती है, वो आस्था और विश्वास है तो उसने कहा कि तुम्हें अपने भगवान के ऊपर विश्वास है। उन्होंने कहा कि हाँ! हमें अपने भगवान के ऊपर विश्वास है। हमें अपनी गंगा माँ पर विश्वास है। उसने कहा कि अच्छा दिखाओ तो जानें। उन्होंने कहा—"मन चंगा तो कठौती में गंगा" और उनकी कठौती में गंगा आ गई और जैसे ही उन्होंने हाथ डाला तो कंगन हाथ में आ गए। सम्भव है यह किम्वदन्ती भी हो, लेकिन इसके पीछे जो छिपा रहस्य है, वो भक्ति का है।

भक्ति जब होगी तो पूर्ण आस्था के साथ होगी। जब हम भगवान की उपासना करेंगे और भगवान के समीप बैठेंगे तो भक्त का स्वरूप भगवान जैसा हो जाएगा अन्यथा माला घुमाते रहिए और गिनते रहिए उसकी गिनती। कितनी मालाएँ होंगी? इतनी माला कीं तो इतने में हमें कितना मिला? और जो भक्ति का असली सही स्वरूप है, उसको नहीं समझ रहा। इससे क्या मिलने वाला है, परोक्ष रूप से वो नहीं समझता।

यह स्वार्थ है। बेटे! मैं कहती हूँ कि क्या आप भगवान से मुआवजा चाहते हो या ये चाहते हो कि हमने जो जप किया, हमको उसका मुआवजा मिलना चाहिए? मैं तो कई बार कह भी देती हूँ कि बेटे ढाई घंटा रोज आपने उपासना की है तो ले जाइए साढ़े बाईस रुपये।

चलिए इतना ही नहीं, अगर साढ़े बाईस रुपये कम हैं तो चल और दिलवा देंगे। तू तीन रुपया रोज के हिसाब से ले जा। 27 माला में भगवान को बहकाना चाहते हैं? भगवान बहुत बड़ी शक्ति है और भगवान जब देता है तो क्या-क्या देता है, जरा अपनी संकीर्णता को हटा करके तो देखिए। यदि संकीर्णता जीवन में से हट जाती है, तो हमको वो नियामतें मिलती हैं, जो हमारी झोली में समाती ही नहीं हैं।

संकीर्णता दूर करें

रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक कविता है और उसमें बताया गया है कि एक भिखारी था। उसने किसान के सामने हाथ फैलाया। किसान के पास गेहूँ की एक गठरी थी और उसने उसमें से एक दाना भिखारी के हाथ में रख दिया। जब भिखारी चला गया तो उसने देखा कि उसकी गठरी में जो अनाज भर रहा था, उसमें से एक दाना सोने का हो गया। तो उसने सिर पर हाथ रख करके कहा कि भगवान! मुझमें यह बुद्धि पहले क्यों नहीं आई कि मैं सारे-के-सारे दाने दे देता और ये सोने के हो जाते। मैं कितना संकीर्ण निकला।

भगवान का भक्त कभी संकीर्ण नहीं होता, वो उदार होता है। उदारता उसके जीवन में होती है, दूसरों की मदद करने के लिए तत्पर रहता है, खुद घाटे में रहता है और दूसरों को रास्ता बताता है। खुद रूखी-सूखी खाता है, लेकिन दूसरों को खिलाने में आनन्द उठाता है। अहा! खिलाने में जो आनन्द आता है, वो खाने में नहीं आता। जब मेरे सामने मेरे बच्चे बैठे होते हैं तो कोई जरा-सी भी चीज होती है और जब मैं उनको देती हूँ, खिलाती हूँ तो मेरे आनन्द का पारावार नहीं रहता। क्योंकि वो मेरे हैं न, मेरापन है और उसमें भक्ति छिपी हुई है। तो ये जो बच्चा है वो मेरा बच्चा ही नहीं, वो मेरा भगवान भी है। इस तरीके से अपने जीवन में भगवान को स्थान देना चाहिए, लेकिन भगवान को हम स्थान नहीं देते। वो अपना ही स्थान रह जाता है।

अपना स्थान किस तरीके से रह जाता है, वह उदाहरण मैं आपको अभी सुनाती हूँ। एक बार लोग गंगास्नान करने के लिए जा रहे थे। उस दिन सोमवती अमावस्या का स्नान था।

शंकर जी और पार्वती जी उधर से गुजरे। पार्वती बोलीं कि महाराज! यह बताइए कि ये जो भीड़ है, ये किसलिए जा रही है। उन्होंने कहा कि गंगास्नान करने के लिए जा रही है। तो फिर गंगास्नान से क्या होगा? पार्वती! जो व्यक्ति गंगास्नान करने जाता है, वह स्वर्ग में जाता है। स्वर्ग में जाता है? आप मजाक मत करिए। कैसा मजाक? आप कह रहे हैं कि गंगास्नान करने वाले सब स्वर्ग में जाते हैं; जबकि सारे-के-सारे, इतनी भीड़-की-भीड़ स्वर्ग में जाएगी तो फिर इतना स्थान कहाँ से आएगा?

उन्होंने कहा—पार्वती क्या बात है? मेरे कहने पर कोई शक है तो चलो मैं अभी तुम्हें दिखाता हूँ। तो उन्होंने कोढ़ी का रूप बनाया और पार्वती का रूप किशोरावस्था का कोई सोलह-अठारह साल की युवती का बनाया और सजी-धजी महिला के रूप में शृंगार और आभूषण पहनाए और वो जो पार्वती जी थीं, अपने पति शंकर जी को पीठ पर बैठा करके गंगास्नान के लिए ले जा रही थीं।

उनमें से कोई गंगास्नान के लिए नहीं जा रहा था, केवल उनको दिखाना था कि भगवद्भक्ति दिखावटी होती है अथवा उसमें कोई वास्तविकता भी होती है।

तो जैसे ही पार्वती जी आगे बढ़ती जाती थीं, लोगों की आवाज कैसी होती थी? कोई कहता था कि तुम हमारे साथ चलो। हमारे यहाँ तो भैंस बँधी है, खूब दूध पिलाएँगे और घी खिलाएँगे।

कोई कहता था कि चलो हमारे साथ चलो, हमारे यहाँ तो मोटरगाड़ी है, अरे! इस कोढ़ी के साथ तुम्हें क्या मिलेगा? वो सिर नीचे झुकाए हुए बड़े दुःखी मन से कहती थीं कि शंकर जी! यह बताइए कि क्या आप मुझे इस स्थिति में डालने के लिए लाए थे? मुझसे सब माँ कहते हैं, आपको पिता कहते हैं और आज मेरी यह दुर्गति हो रही है कि मैं निगाह नहीं उठा पा रही हूँ। लोग वासना की दृष्टि से भेड़िओं के तरीके से मुझे देख रहे हैं।

धर्मात्माओं पर टिका है संसार

बहन और माँ को छोड़ दिया और वासना की दृष्टि से जैसे एक वेश्या के पीछे भड़ुए लगे रहते हैं, इस तरीके से ये मुझे देख रहे हैं और मुझे शर्म आ रही है। अब बहुत हो गया। उन्होंने कहा कि पार्वती! अभी नहीं हुआ, अभी विलम्ब है, अभी देखती जाओ। संसार यों ही नहीं टिका है, कोई पुण्यात्मा और धर्मात्मा भी होता है। मैं अभी तुम्हें दिखाता हूँ।

इस तरीके से सूर्यास्त होने को आ गया और पार्वती का धैर्य चुकने लगा। उन्होंने कहा—बस, बहुत हो गई आप की लीला अब चलिए। उधर से कोई एक गरीब ब्राह्मण गुजर रहा था। वह किसान भी था। पार्वती जी के पास आ करके उसने प्रणाम किया और कहा माँ! आपको लाख-लाख प्रणाम, ऐसी देवियों की बदौलत ही यह पृथ्वी टिकी हुई है, धन्य हैं आप। आप कहाँ जा रही हैं?

उन्होंने कहा—"भैया! मैं अपने पति को गंगा स्नान कराने के लिए लाई हूँ, क्योंकि यह चल नहीं सकते। कोढ़ी हैं तो इनको मैं पीठ पर रखकर लाई हूँ। अब मैं थक गई हूँ, बेटे मुझसे चला नहीं जाता।" उसने कहा कि माँ! सारा पुण्य आप ही ले लेंगी क्या?

जरा सेवा का लाभ हमें भी लेने दो और वह आगे बढ़ा और उनके शरीर से जो मवाद निकल रहा था, पीप टपक रही थी, मक्खियाँ भिनक रही थीं, उन शंकर जी को पीठ पर रख करके वो आगे बढ़ने लगा और पीछे-पीछे पार्वती जा रही थीं।

शंकर जी ने कहा कि पार्वती! यह जाएगा स्वर्ग में। असली जो भक्त है, वो ये है। इसमें भक्ति परिपूर्ण तरीके से समायी हुई है। सेवा और उदारता जैसी सारी-की-सारी शक्तियाँ इसके अन्दर विद्यमान हैं। स्वर्ग को कौन जाएगा? स्वर्ग को यह जाएगा और ये जो भी है। महाराज! आप कह रहे थे कि जो ये गंगास्नान करने वाले हैं, ये जाएँगे।

उन्होंने कहा कि ये नहीं जाएँगे। तो ये सब कहाँ जाएँगे? ये तो नरक में जाएँगे, क्योंकि जैसी इनकी विचारधारा है, वो जिसमें पले हैं, जिसमें रह रहे हैं, जो इनके संस्कार बन चुके हैं, वो इसी में रहेंगे और जहाँ कहीं भी कोई स्वर्ग में भी जाएँगे तो स्वर्ग की जितनी भी ब्रह्मा, विष्णु, महेश की जो पत्नियाँ हैं, जैसे कीचड़ में यहाँ फँसे हैं, वहाँ भी गन्दगी फैलाएँगे। वहाँ भी ये वासना की दृष्टि से उन देवियों को देखेंगे, जिनके अन्दर शक्ति समायी है या दुनिया को शक्ति देती हैं, रास्ता बताती हैं, उनके प्रति भी ये गन्दे ही विचार रखेंगे। पार्वती! इसलिए ये नहीं जाएँगे, यह ब्राह्मण जाएगा।

भगवान किसको याद करते हैं

खलीफा उमर खड़े थे और आकाश मार्ग से एक फरिश्ता निकल रहा था। फरिश्ता निकल रहा था तो उन्होंने कहा कि भाई! आपके हाथ में यह क्या है? उन्होंने कहा कि मेरे हाथ में वो डायरी है, जिसमें भगवान के उन भक्तों के नाम हैं, जिन्होंने कि भगवान की भक्ति की है। उन्होंने कहा कि आप जरा पन्ना पलट करके देखना कि इसमें कहीं मेरा नाम है क्या?

उसमें कहीं भी खलीफ़ा का नाम नहीं था, तो वे बहुत दुःखी हुए कि मैंने सारा जीवन सेवा में लगा दिया और सारा जीवन मैंने भक्ति में लगा दिया। भगवान की भक्ति के अलावा मैंने जिन्दगी भर कुछ नहीं किया और आज जब मैंने भगवान की उस डायरी में देखा तो मेरा नाम ही नहीं है। सारी रात निकल गई। दिन निकल गया। इस तरीके से कई दिन निकल गए।

एक बार फिर वो फरिश्ता दूसरी पुस्तक को लेकर के आया तो खलीफा ने फिर वही शब्द दोहराए। उन्होंने कहा कि यह बताइए कि आज कौन सी पुस्तक ले करके आए हैं? उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में उनके नाम हैं, जिनको कि भगवान स्मरण करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान स्मरण करते हैं? हम तो समझते थे कि भगवान को भक्त स्मरण करता है, भगवान नहीं। नहीं, भगवान भी करता है। तो उन्होंने कहा कि देखिए कहीं मेरा नाम भी हो सकता है क्या? खलीफा ने यह बात फिर दोहराई।

उन्होंने कहा कि मेरा कहाँ हो सकता है; जबकि भगवान की भक्ति मुझसे हुई ही नहीं, तो भगवान मेरी भक्ति कैसे करेगा। ऐसा कैसे हो सकता है? जब फरिश्ते ने किताब खोली तो पहला नम्बर खलीफा का आया। कैसे आया? उन्होंने कहा कि खलीफा! अल्लाह ने तेरे लिए भक्ति की है और तेरा स्मरण किया है; क्योंकि तू बड़ा है। तूने सारा जीवन लोक-कल्याण के लिए जिया है, समाज के लिए जिया है। तूने अपने को भुला दिया, अपने को विश्व मानव के कल्याण में समा दिया, तो भगवान तेरा स्मरण कर रहा है।

भक्ति का सही रूप

बेटे! ये होती है भगवान की भक्ति, लेकिन हम भगवान की भक्ति को भूल चुके हैं। भगवान की भक्ति को हमने याद रखा है तो केवल भौतिकता को पाने के लिए, सिर्फ वरदान पाने के लिए और किसी के लिए, आत्मकल्याण के लिए पाया है क्या? नहीं और किसी के लिए नहीं पाया और समाज के लिए, राष्ट्र के लिए यदि हमने भक्ति को पाया होता तो जहाँ छप्पन लाख सन्त हों तो उनकी संख्या और भी ज्यादा बढ़नी चाहिए। यदि यह भक्ति इनके जीवन में आई होती तो हमारी निरक्षरता रही होती क्या?

जहाँ डकैती, अपराध, भ्रष्टाचार जैसे न मालूम कितने अपराध हमारे समाज में फैले हुए हैं, ये अपराध कहीं रुकते नहीं क्या? अपराध एक तरफ हो जाते और अपराधी कहीं दिखाई नहीं पड़ते, उनका सुधार हो गया होता। अंगुलिमाल डाकू की तरह से जब उनमें संस्कार दिए जाते तो भगवान बुद्ध के चरणों पर जिस तरह से अंगुलिमाल गिर पड़ा था और उसने कहा था कि भगवान अब मैं तुम्हारा हूँ, मैं अब आपका हो चुका।

अरे! तू तो डकैत है। हाँ, मैं डकैत जरूर हूँ, लेकिन मेरे ऊपर आपकी, सन्त की जो छाया पड़ी और भगवान की जो छाया पड़ी, अब मैं बदल गया, अब मैं डाकू नहीं हूँ और अंगुलिमाल ऋषि हो गया और उसने बौद्ध धर्म का कितना काम किया, यह भगवान की भक्ति का सही स्वरूप है।

बेटे! हमने अपनी जिन्दगी में से उसे भुला दिया। न मालूम कैसा अल्लम-गल्लम करते रहते हैं। कभी इस देवी के पास गए, कभी उस देवता के पास गए, कभी मनसा देवी के पास गए, कभी चण्डी देवी के पास गए, कभी सन्तोषी माता के पास गए और कभी हनुमान जी के पास गए। कभी राम के पास गए, कभी कृष्ण जी के पास गए। कहीं ऐसी कोई जगह नहीं, जहाँ न गए हों।

एकै साधे सब सधे

"एक ही साधे सब सधे और सब साधे सब जाय"। डाल-डाल और पात-पात पर हम घूमते रहे, लेकिन भगवान कहीं नहीं मिला; क्योंकि भगवान को हमने प्यार ही नहीं किया। भगवान का सही स्वरूप ईसा ने समझा था। ईसा से किसी ने कहा कि भगवान कहाँ है? उन्होंने एक बच्चे को गोद में उठा करके दिखाया कि यह है भगवान। तो उसने कहा कि इसमें भगवान कहाँ है?

ईसा ने कहा कि हाँ! इसमें भगवान है। क्यों भगवान है? क्योंकि इसके अन्दर न कोई विकृति है, न कोई छल है, न कपट है। जितनी विकृतियाँ आती हैं, बड़े हो करके आती हैं। ईर्ष्या, डाह, जो कुछ भी पनपते हैं, वो बड़े होने पर पनपते हैं। ईसा ने कहा कि यह है वो भगवान। भगवान बुद्ध ने कहा हैं कि हम क्या करेंगे, स्वर्ग में जा करके?

जब तक हमारा एक भी प्राणी नरक में रहेगा, तब तक हमको आवश्यकता नहीं है कि हम स्वर्ग में जाएँ। हमारे लिए जो नरक है, यही हमारे लिए स्वर्ग है, जहाँ हम रहेंगे, वहीं हम स्वर्ग बना लेंगे। भगवान की भक्ति का यह सही मूल्यांकन है। यही भगवान की भक्ति का सच्चा स्वरूप है। भक्ति के इस स्वरूप को समझ लें तो हम सच्चे भक्तों में गिने जाएँगे और उन भक्तों में आ जाएँगे, जिन्हें मूसा ने जन्नत कहा था।

उन्होंने कहा कि यह बताइए कि स्वर्ग में ये खाली फ्लैट क्यों पड़े हैं? कहा गया कि इसमें भक्त आएँगे। कौन-से भक्त आएँगे? भक्तों की कोई कमी है क्या, फिर स्वर्ग खाली क्यों पड़ा है? लोग सारे दिन माला सटकाते रहते हैं। क्या इनको मुक्ति नहीं मिलेगी?

उन्होंने कहा कि उनको नहीं मिलेगी, जिनको हम लाना चाहते हैं, जिनके लिए हमने फ्लैट खाली छोड़े हैं, उसमें वो आना नहीं चाहते।

क्या करते हैं सच्चे भक्त?

जो वास्तविक भक्त हैं वो कहते हैं कि यदि हम भक्त हैं तो हमारी भक्ति का लाभ सारे समाज को मिलना चाहिए, सारे राष्ट्र को मिलना चाहिए और सारे विश्व को मिलना चाहिए। हम स्वर्ग में क्यों रहेंगे? हमको स्वर्ग की आवश्यकता नहीं है। हमारा स्वर्ग तो यहीं है। भगवान ने हमको भेजा है तो मानवता की सेवा के लिए भेजा है। यदि भगवान ने इतनी प्रेरणा और इतनी विचारणा हमारे अन्दर में दी है, इतनी सम्वेदना दी है तो हम मानवता की सेवा करेंगे, उसको मार्गदर्शन देंगे।

भगवान यह कहता है कि ये स्वर्ग में आएँ तो मुबारक है, स्वर्ग उन्हीं के लिए है, लेकिन भक्त कहता है कि इसी नरक में हम स्वर्ग बना लेंगे, ताकि सारे संसार में जो कुविचार फैला हुआ है, उसको सद्विचार से भर देंगे। जहाँ अशान्ति फैली हुई है, वहाँ हम शान्ति देंगे।

भगवान की भक्ति का जो सही स्वरूप है, वही आज मैंने बताया है, दरसाया है कि आपको भक्ति का सही स्वरूप समझना चाहिए और जैसी भक्ति ऋषियों ने की है, आचार्य जी ने की है और जिनके पदचिह्नों पर हम और आप चल रहे हैं, उसका अनुकरण करें तो मैं समझती हूँ कि आप भगवान के सच्चे भक्त कहलाने योग्य हो जाएँगे।

आज की बात समाप्त
॥ॐ शान्तिः॥

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