मीराबाई

 

 घर आवो जी सजन मिठ बोला।
 तेरे खातर सब कुछ छोड्या, काजर, तेल तमोला॥
 जो नहिं आवै रैन बिहावै, छिन माशा छिन तोला।
 'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर, कर धर रही कपोला॥
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   मीराबाई

 


 तोसों लाग्यो नेह रे प्यारे, नागर नंद कुमार।
 मुरली तेरी मन हर्यो, बिसर्यो घर-व्यौहार॥
 जब तें सवननि धुनि परि, घर आँगण न सुहाइ।
 पारधि ज्यूँ चूकै नहीं, मृगी बेधी दइ आइ॥
 पानी पीर न जानई ज्यों मीन तड़फि मरि जाइ।
 रसिक मधुप के मरम को नहिं समुझत कमल सुभाइ॥
 दीपक को जो दया नहिं, उड़ि-उड़ि मरत पतंग।
 'मीरा' प्रभु गिरिधर मिले, जैसे पाणी मिलि गयो रंग॥
 

-   मीराबाई


 पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे।
 मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे।
 लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे॥
 विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे।
 'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे॥
 

-   मीराबाई

 पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।
 वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥
 जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
 खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
 सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
 'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥
 

  - मीराब𹱺ई

 

 

 मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई।
 जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।
 तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥।
 छाँड़ि दी कुल की कानि कहा करिहै कोई।
 संतन ढिंग बैठि-बैठि लोक लाज खोई॥
 चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई।
 मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥
 अँसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।
 अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥
 दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोई।
 माखन जब काढ़ि लियो छाछा पिये कोई॥
 भगत देख राजी हुई जगत देखि रोई।
 दासी "मीरा" लाल गिरिधर तारो अब मोही॥
 

-  मीराबाई

 


 श्याम मोसूँ ऐंडो डोलै हो।
 औरन सूँ खेलै धमार, म्हासूँ मुखहुँ न बोले हो॥
 म्हारी गलियाँ ना फिरे वाके, आँगन डोलै हो।
 म्हारी अँगुली ना छुए वाकी, बहियाँ मरोरै हो॥
 म्हारो अँचरा ना छुए वाको, घूँघट खोलै हो।
 ' मीरा' को प्रभु साँवरो, रंग रसिया डोलै हो॥

-  मीराबाई

 

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