महाराष्ट्र
में महिला
विरोधी अपराध
: बलात्कार
लीना
मेहेंदले,
भाप्रसे
किसी
समाज की
अच्छाई की माप
क्या हो सकती
है? यही
कि उसके
विभिन्न
वर्गों के साथ
कैसा बर्ताव
किया जाता है
। इसलिए यह
जानना जरूरी
है कि किसी भी
समाज में
गुनहगारी
कितनी है,
खासकर महिलाओं
के प्रति घटने
वाले अपराध
किस तरह के और
कितने हैं ।
इसमें भी
बलात्कार के
अपराधों का
विश्लेषण
अधिक
महत्वपूर्ण
है क्योंकि
औरत जात के
विरूद्ध यह
सबसे अधिक
घृणित अपराध
है ।
भारत
सरकार के
नेशनल क्राइम
रिपोर्ट
ब्यूरो की
मारफत यह
लेखा-जोखा रखा
जाता है कि
प्रतिवर्ष देश
में कहां-कहां
कितने अपराध
घट रहे हैं ।
पिछले तीन
वर्षों के
आँकड़े बताते
हैं कि अन्य
राज्यों की
तुलना में
महाराष्ट्र
में अधिक अपराध
घटते हैं ।
मसलन १९९८ में
देश की
जनसंख्या ९७
करोड़ ९ लाख थी
जबकि भारतीय
दंड संहिता के
अंतर्गत दर्ज
कराये
अपराधों की
संख्या थी १७
लाख ८० हजार ।
अर्थात्
प्रति लाख
जनसंख्या में
१८३ अपराध घटे
थे। लेकिन
महाराष्ट्र
के लिए यही
औसत प्रति लाख
२०२ था ।
बलात्कार
के आंकडें
जाँचने पर पता
चलता है कि १९९८
में १५०३१
बलात्कार
दर्ज हुए जो
औसतन प्रति
करोड़ १५५ थे,
लेकिन
महाराष्ट्र
के लिए यही
औसत १२४ था ।
अर्थात् देश
के अन्य भागों
की तुलना में
महाराष्ट्र की
छवि कुछ अच्छी
रही । यहां यह
भी ध्यान रखना
पड़ेगा कि असली
औसत दर १५५ या
१२४ के दुगुनी
माननी पड़ेगी
क्योंकि यह
अपराध केवल
स्त्र्िायों
के विरूद्ध
होता है ।
इस
संबंध में एक
विस्तृत पढ़ाई
का संकल्प
बनाकर सबसे
पहले मैंने
पिछले दशक में
महाराष्ट्र के
विभिन्न
जिलों में
घटित
बलात्कार के
अपराधों का
ब्योरा लिया ।
इसके लिए १९९६
की जनसंख्या
के आंकड़ों को
आधारभूत माना
जो कि समूचे
महाराष्ट्र
के लिए ९.२७
करोड़ थी ।
जनसंख्या के
आंकड़े मैंने
जनगणना
कार्यालय से
प्राप्त किए
जबकि जिलावार
अपराधों के
आंकड़े ब्यूरो
से प्राप्त
हुए ।
कुल
अपराधों का
ब्योराः-
सबसे
पहले
महाराष्ट्र
के विभिन्न
प्रमंडलों और
उनके जिलों
में पिछले दस
वर्षों में
घटित
बलात्कार के
अपराधों का
ब्योरा लें ।
प्रत्येक
प्रमंडल के
लिए वहां के
डिवि.जनल
कमिशनर तथा
डी.आई.जी.
पुलिस की
जिम्मेदारी
होती है, इसी
प्रकार
प्रत्येक
जिले में वहां
के कलेक्टर
तथा एस.पी. की
जिम्मेदारी
होती है कि वे
अपराधों की रोकथाम
करें । अतएव
इस ब्योरे से
उम्मीद की जा सकती
है कि संबंधित
जिले और
प्रमंडल के
अधिकारी
अपने-अपने
आंकड़ों से कुछ
सीख लेंगे और
अपराधों को कम
करने का
प्रयत्न
करेंगे । साथ
ही यह आशा भी
की जा सकती है
कि उक्त जिले
या प्रमंडल के
विधायक,
लोकसभा सदस्य
और सामाजिक संस्थाएं
भी अपने-अपने
कार्यक्षेत्र
में इन अपराधों
के विरूद्ध
आवाज
उठायेंगे या
नीति-निर्धारण
के लिए उपाय
सुझायेंगे ।
इस
ब्योरे से कुछ
महत्वपूर्ण
निष्कर्ष
निकलते हैं जैसेः-
(देखें
चित्र 1 का
ग्राफ)
गुनाह
की दर एवं
आदिवासी
क्षेत्र :-
गुनाह
की संख्या के
साथ-साथ गुनाह
की दर देखना
भी आवश्यक है
। संख्या का
महत्व पुलिस
की दृष्टि से
है क्योंकि
इन्हें हर
गुनाह की जांच
करनी है और
उसे अंतिम
उद्देश्य तक
पहुंचाना है, जबकि
सामाजिक
संस्थाओं या
महाविद्यालयीन
अध्ययन के लिए
गुनाह की दर
का महत्व अधिक
है क्योंकि इससे
सामाजिक
ढांचे के
सुधार के
विकल्प समझ में
आते हैं ।
शहरीकरण
और बलात्कारः-
साक्षरता
विचार :-
इस
सारे विवेचन
से जो प्रमुख
निष्कर्ष
गिनाये जा
सकते हैं:-
1.
महाराष्ट्र
प्रशासन को
नागपूर तथा
अमरावती प्रमंडलों
में बलात्कार
के अपराधों की
छानबीन तथा
रोकथाम के लिए
अधिक ध्यान
देना होगा ।
इसके लिए यदि
समुचित
मात्रा में
पुलिस फोर्स
उपलब्ध नहीं
है तो उपलब्ध
कराना एवं
उसकी कार्यक्षमता
बढ़ाना आवश्यक
है ।
2.
बलात्कार
की शिकार
महिलाओं के
बाबत अधिक गहराई
से अध्ययन
होना आवश्यक
है, खासकर यह
कि इसमें
आदिवासी
स्त्र्िायों
का प्रतिशत
कितना है और
आरोपी
व्यक्ति किस
श्रेणी अथवा
व्यवसाय से
संबंधित हैं ।
3.
एक
अन्य अध्ययन
में मैंने
पाया है
(मेहेंदले २००१)
कि अन्य
राज्यों की
तुलना में
महाराष्ट्र
में अपराधी पर
अपराध साबित
होने की दर कम
है ।
महाराष्ट्र
में यह बात
केवल
बलात्कार के
लिए नहीं
बल्कि सभी तरह
के अपराधों पर
लागू है । इस
बात का भी
अध्ययन विधि
महाविद्यालयों
द्वारा
करवाना
आवश्यक है ।
4.
रत्नागिरी,
नांदेड,
उस्मानाबाद
जैसे कम अपराध
वाले जिलों
में १९९ में
अचानक
बलात्कार में वृद्धि
क्यों हुई ?
अन्य सभी
जिलों में
१९९६ में यह
वृद्धि क्यों
हुई, इसकी
जांच होनी
आवश्यक है ।
उपरोक्त
तमाम
विश्लेषण के
बावजूद यह
मानना पड़ेगा
कि
महाराष्ट्र
में पिछले दशक
में कुछ ऐसी
भी घटनाएं हुई
हैं जो महज
सांख्यिकी या
आंकड़ों से
कहीं अधिक
महत्वपूर्ण
है । इनके लिए
एन.सी.आर.बी. के
मौजूदा ढर्रे
से हटकर एक
नये सिरे से
रिपोर्टिंग
आवश्यक है ।
यह मामले हैं
सुनियोजित
बलात्कार
कांडों के ।
जलगांव तथा
सातारा जिले
में घटित दो
कांडों में यह
हुआ कि नौकरी
का लालच देकर
मध्य और निम्न
वर्ग की थोड़ा
पढ़ी-लिखी
औरतों को
वासना का
शिकार बनाया
गया और फिर
उनकी विडियों
के जरिये
उन्हें ब्लैकमेल
करके बार-बार
उन्हें
यौनाचार के
शोषण का शिकार
बनाया गया ।
परभणी जिले
में अगले दिन की
परीक्षा के
प्रश्न-पत्र
देने का लालच
दिखाकर कुछ
शिक्षकों ने
ही एक
विद्यार्थिनी
का सामूहिक
बलात्कार
किया । ऐसे
सारे
सुनियोजित
अपराधों के
लिए अधिक
प्रभावी
जांच-पड़ताल और
अधिक कड़ी
शिक्षा
अत्यावश्यक
है । लेकिन यह
तभी होगा जब
इसकी
रिपोर्टिंग
अधिक गंभीरता
से दर्ज कराई
जाए ।
एक
बार ग्रामीण
महिलाओं के एक
कार्यक्रम
में मैं इन
निष्कर्षों
की चर्चा कर
रही थी कि एक प्रौढ़
महिला ने मुझे
ग्रामीण जीवन
की एक
वास्तविकता
से परिचय
कराया । उसने
कहा कि
महिलाओं से
बचपन से यही
सुनना पड़ता है
कि उसकी
जिंदगी तो
चूल्हे में है
। गाँव की लड़कियां
भी देखती हैं
कि उनके
अगल-बगल की
तमाम प्रौढ़
महिलाएं केवल
रसोईघर में
मेहनत का जीवन
जीती हैं -
चाहे वह माँ
हो या सास हो
या बड़ी बहन हो
या भाभी हो ।
फिर लड़कियाँ
सोचती हैं कि
यदि वे पढ़कर
कोई नौकरी
ढूँढ लेती हैं
तो इस रसोईघर
की कैद से
उनका छुटकारा
हो सकता है ।
इसीलिए वे उन
तमाम लोगों की
शिकार बन जाती
हैं जो उन्हें
थोड़ा बहुत
फुसला सकें ।
यदि जलगांव और
सतारा जैसे
कांड रोकने
हैं तो
स्त्र्िायों
के लिए
व्यवसाय
शिक्षा का प्रबंध
आवश्यक है ।
उस अनपढ़
ग्रामीण
किन्तु भुक्तभोगी
औरत ने मुझे
वह
वास्तविकता
बताई जो मेरे
विचारों से
कहीं छूट गई
थी ।
लेकिन
इससे भी भयावह
वह घटना है जो
पिछले वर्ष
अहमदनगर जिले
के कोठेवाडी
गांव में घटी
। सारणी से देखा
जा सकता है कि
सामान्यतः
अहमदनगर में
बलात्कार के
मामले कम थे ।
फिर भी इतने
बड़े पैमाने पर
इतनी जघन्यता
के साथ
महाराष्ट्र
में कभी अपराध
नहीं हुए थे
जैसे
कोठेवाडी में
हुआ । इस घटना
में किसी भी
पारंपरिक
पद्धति से
अपराध का
विश्लेषण
नहीं किया जा
सकता है । इस घटना
में गांव में
सामूहिक
डकैती करने के
लिए गए युवक
डकैती के
पश्चात्
गांव में
अकेली रहने
वाली महिलाओं
पर झुंड में
टूट पड़े और
सामूहिक
बलात्कार
किया । इससे
पहले
उन्होंने
अलावा जलाया,
खाया, शराब पी
और गांव वालों
को रस्सियों
से बांधकर
मारा-पीटा भी ।
यह पूरी घटना
एक संकेत है
कि आने वाले
दिनों में
सिनेमा तथा
अन्य प्रसार
माध्यमों में
दिखाये जाने वाली
घटनाएं समाज
के अपराधों को
कितना भयावह रूप
दे सकती है ।
इस घटना से यह
भी आभास मिलता
है कि
महाराष्ट्र
के ग्रामीण
इलाके में
बढ़ती हुई
बेकारी और
निराशा समाज
को कहां ले जा
रही है ।
मुंबई जैसे
कार्यक्षम
पुलिस के दबाव
में यह बेकारी
आर.डी.एक्स,
गैंगवार और
शार्प शूटर्स
के रूप में
प्रगट होती
हैं लेकिन
ग्रामीण
इलाके में यह
अवश्यमेव
स्त्री-विरोधी
अपराधों के
रूप में प्रगट
होगी जो कि
महिलाओं के लिए
चिंता का विषय
है । यह जरूरी
है कि कोठेवाड़ी
की घटना से
कुछ सीख लेकर
हम अपनी रोजगार
की नीतियों को
अधिक प्रभावी
बनायें ।
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