पचास साल बाद हिंदी

 

.......लीना मेहेंदळे

 

    देश को स्वतंत्र हुए पचास वर्ष से अधिक और संविधान लागू हुए पचास वर्ष हो गए  हैं।  हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया, लेकिन उसे राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के प्रयास नहीं के बराबर हुए।  जो हुए भी, वे करीब-करीब विफल हो गए।  अब हमारे देश की आबादी सौ करोड़ है।  और चीन की आबादी १२० करोड़   यानी चीन और भारत की मिलाकर आबादी २२० करोड़ है जबकि विश्र्व के बारी सारे देशों की मिली-जुली आबादी ८० करोड़ है।  संयुक्त राष्ट्र संघ में जो छह भाषाएं मान्यता प्राप्त हैं वे हैं : चीनी, अरबी, अंग्रेजी, फ्रांसीसी, रूसी और स्पानी।  यानी विश्र्व की आबादी का छठा हिस्सा होते हुए भी हमारे देश की भाषा संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में नहीं है।

 

    इसका मूल कारण यह है कि जब भी हम विश्र्व के अन्य देशों के साथ कोई बात करना चाहते हैं तो मान कर चलते हैं कि यह काम हमें अंग्रेजी भाषा में ही करना है। पिछले पचास वर्षों में हमने एक बार भी नहीं माना कि विश्र्व के अन्य देशों के साथ हम राजकीय और शासकीय व्यवहार हिंदी में चला सकते हैं।  हम प्रतीक के रूप में भी अपने देश की भाषा विश्र्व और खासकर विभिन्न वैश्र्िवक शासकीय संगठनों के सामने नहीं लाते।  यहां तक कि हमारी रिपोर्टों के मुखपृष्ठ पर भी हमारे देश का नाम राष्ट्रभाषा में नहीं लिखा होता।

 

    संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे वैश्र्िवक संगठनों में भारत सरकार की और गैरसरकारी संगठनों की जो रिपोर्टें जाती हैं, उन्हें देखने का अवसर मुझे मिलता रहता है।  सारी रिपोर्टें विद्वतापूर्ण अंग्रेजी में बनाई जाती हैं।  यह भी तो किया जा सकता है कि हम अपनी रिपोर्ट हिंदी में बनाकर संयुक्त राष्ट्र को दें और फिर उनके नियमों का पालन करते हुए उसका अंग्रेजी अनुवाद उन्हें मुहैया कराएं।  हालांकि इससे थोड़ा खर्च अवश्य बढ़ेगा, लेकिन हिंदी भाषा के अस्तित्व की जानकारी और एहसास करने के लिए यह खर्च भी उचित होगा।  आज तो हम उनहें अपनी भाषा का एहसास कराने में भी झिझक रहे हैं।  क्या हम शर्मिंदा हैं कि हमारा राष्ट्रभाषा अंग्रेजी होकर हिंदी है? 

 

    मुझे पता है कि संविधान हिंदी को राष्ट्रभाषा कहने, के साथ-साथ यह भी कहा गया है कि अंग्रेजी का उपयोग पंद्रह साल तक थोड़ी सुविधा के लिए देश के अंतर्गत प्रशासन में स्वीकृत होगा।  बाद में यह प्रावधान सदा के लिए बना दिया गया।  आज सरकर में हिंदी का पक्षधर कोई नहीं है।  विदेशों के साथ तो केवल अंग्रेजी का ही उपयोग किया जाता है।  हर मूल टिप्पणी अंग्रेजी में होती है।  हिंदी अनुवाद बाद में कभी उपलब्ध कराए जाते हैं।  ऐसी अनूदित हिंदी टिप्पणियों को बाद में पढ़ा जाता है या नहीं, इसमें भी संदेह है।  अंग्रेजी या

विश्र्व की अन्य कोई भी भाषा सीखने में हमें गर्व महसूस होना चाहिए क्योंकि  इससे हम अपनी योग्यता बढ़ाते हैं।  लेकिन अपनी भाषा को ताक पर रख कर यदि हम चलते हैं तो इससे आत्म-उन्नति या देश की उन्नति नहीं हो सकती।

 

    हमारे यहां एक राजभाषा संबंधी आयोग भी है लेकिन आज तक यह पता नहीं चल पया कि विश्र्व के सम्मुख विभिन्न शासकीय प्रयासों के दौरान हिंदी के अस्तित्व का भान कराने या संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं में हिंदी को स्थान दिलाने के लिए आयोग ने या भारत सरकार ने क्या किया है।  देश की जनता भी यह पूछना भूल गई।  शायद यह कहा जा सकता है कि देश की १०० करोड़ आबादी में से सारे के सारे १०० करोड़ लोगों की मातृभाषा हिंदी नहीं है।  करीब ५० करोड़ लोग अन्य भारतीय भाषाएं बोलते हैं।  जैसे बंगाली, मराठी, पंजाबी, तमिल, कन्नड इत्यादि।  लेकिन इस संबंध में दो बातें कही जा सकती हैं।  एक यह कि अन्य भारतीय भाषाएं बोलने वाले भारतीय नागरिकों की राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही है।  खासकर जब हम विश्र्व के अय देशों के समक्ष अपनी भाषाओं की बात करते हैं तो सारी ही भारतीय भाषाओं की एकात्मकता का लाभ उठा सकते हैं।  हिंदी बढ़ी तो उसके साथ-साथ विश्स स्तर पर अन्य  भारतीय भाषाएं भी जानकारी में आएंगी और उनका सम्मान भी बढेगा। कम से कम सरकारी स्तर पर तो यह प्रयास अवश्य होना चाहिए।

 

 

................. फरवरी २०००,

 

 

 

 

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