सुयोग्य प्रशासन की पहचान

 

    हवाई अड्डे के एस्केलेटर में ज्योत्सना जेठानी की दुखद मृत्यु के कुछ ही दिन बाद मुझे हवाई जहाज से यात्रा करने का अवसर मिला।  देखा कि सेक्यूरिटी चेक-इन वाले गेट पर लंबी लाइन थी।  हरेक यात्री को लंबी जांच-पड़ताल के बाद ही अंदर छोड़ा जा रहा था और इस कार्यक्रम में यात्रियों  और कर्मचारियों  को भी बहुत समय लग रहा था।  और फिर विमान अपहरण के बाद से तो यह प्रक्रिया और भी समय खाने वाली हो गई।  लगा जैसे सबने यह तय कर लिया हो कि अधिक से अधिक समय लगाकर कड़ी से कड़ी जांच करना ही सुयोग्य प्रशासन की निशानी है।  लेकिन मैं सोचती हूं कि सुयोग्य प्रशासन में सुलभता और समय की बचत बहुत महत्वपूर्ण है।  सत्रहवीं सदी में शिवाजी महाराज के गुरु रामदास ने सुयोग्य प्रशासन की पहचान बताते हुए लिखा थाः  'जनांचा प्रवाहो चालला' (यानी जन-प्रवाह सुचारु रूप से चल रहा हो), 'म्हणिजे कार्यभाग झाला' (तब समझना कि तुम्हारा प्रशासन ठीक चल रहा है),  'जन ठाई ठाई तुंबला' (जन-प्रवाह को जगह-जगह रुकावटें हों)  'म्हणिजे खोटे'  ( तो जानना  कि तुम्हारे प्रशासन में कुछ खोट है)

 

    ज्योत्सना की मौत और फिर तत्काल काठमांडो से आने वाले विमान के अपहरण में प्रशासन की जो कमी साफ झलकती है वह है सामंजस्य  या कोऑर्डिनेशन का अभाव।  एस्केलेटर को चलाने और रोकने का तरीका यदि वहां उपस्थित सभी विभागों के कर्मचारियों को सिखाया गया होता तो कोई कोई उसे बंद कर देता।  उसके कुछ घंटे पहले जब उसी एस्केलेटर को चलाने और रोकने का तरीका यदि वहां उपस्थित सभी विभागों के कर्मचारियों को सिखाया गया होता तो कोई कोई उसे बंद कर देता।  उसके कुछ घंटे पहले जब उसी एस्केलेटर में किसी अन्य प्रवासी के बैग का फीता फंस गया था तब देखने वालों में से किसी भी कर्मचारी ने अगर इस घटना की रिपोर्टिंग को अपनी जिम्मेदारी माना होता तो शायद दुर्घटना नहीं होती।  लेकिन प्रशासन का काम निहायत टुकड़े-टुकड़े बंटा हुआ है।  इसलिए एक विभाग का कर्मचारी दूसरे किसी विभाग को सुझाव देने की गुस्ताखी नहीं कर सकता।  अव्वल तो कोई उसकी बात सुनेगा नहीं और इतने वर्षों में उसने खुद जो 'छोड़ो, मुझे क्या' वाला रुख अपनाया है, उसे भी निकट भविष्य में नहीं बदला जा सकता।

 

    जहां तक 'उसी विभाग' के कर्मचारियों का प्रश्न है, वे उकताए रहते हैं, क्योंकि 'अधिक समय लगाकर कड़ाई से किए जाने वाले इंस्पेक्शन ' से आगे कुछ नहीं होता है, यह बात वे जानते हैं।  सभी सोचते हैं कि रोज-रोज व्यर्थ समय गंवाया जाता है है इसलिए कुछ ही दिनों में फिर इंस्पेक्शन ढीला पड़ जाता रहा है।  इंस्पेक्शन और मुस्तैदी को बनाए रखना हो तो उसका रुटीन भी कुछ इस प्रकार सरल  और सुगम हो कि उसे कम समय में पूरा किया जा सके।  लेकिन प्रशासन में समय की बचत और सुगमता के  बावजूद अच्छे नतीजे चाहिए हों तो इसके लिए नए तरीके ढूंढने पड़ते हैं, और कर्मचारियों को उन तरीकों का प्रशिक्षण देना पड़ता है।  यह एक गतिशील प्रक्रिया है - स्थिर प्रक्रिया नहीं।  लेकिन इसकी बजाय देखा गया है कि कोई दुर्घटना हो तो फिर से आदेश निकाले जाते हैं कि नियमों का पालन कड़ाई से हो।  इतना आदेश निकालकर वरिष्ठ अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं।  पुराने नियमों को, जो समय की बर्बादी वाले हैं, कोई नहीं  बदलता और सामंजस्य को बढ़ाने वाली कार्रवाई कोई शुरू करता है।  फिर प्रशासन अपने पुराने ढर्रे पर वापस जाता है।  कोई दूसरी दुर्धटना होने तक।

 

    जब कंधार ये यात्रीगण हवाई जहाज से वापस आने को रवाना हो चुके थे तो जी-टीवी पर उनके रिश्तेदारों से बार-बार यह सवाल पूछा जा रहा था कि अब जब एक भारी कीमत चुकाकर देश ने आतंकवादियों से बंधकों को रिहा करवा लिया है, तो इससे आगे देश के नागरिकों का क्या कर्त्तव्य है।  बेचारे रिश्तेदारों को इसका कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था।  और पता नहीं प्रश्न पूछने वालों के मन में भी क्या उत्तर था, क्या सवाल था, क्योंकि उनका उत्तर भी खुलकर सामने नहीं आयो।

 

    लेकिन मेरे दिमाग में इसका उत्तर आया कि देश के नागरिक सरकार से पूछें कि सुयोग्य प्रशासन लाने के लिए वह क्या कर रही है।  बार-बार पूछें। नियमित रूप से पूछें।  और लीपापोती वाले उत्तरों को स्वीकार करें।  लोकतंत्र में सुयोग्य प्रशासन का आग्रह रखने की जिम्मेदारी भी लोगों की ही है।

जनसत्ता ०८.०१.२०००

 

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