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एक गांव का नाम जो कि सिन्ध ¼पाकिस्तान½ में हैदराबाद शहर से 32-33 मीला दूर सिन्धु नदी के तट पर बसा हुआ है। यह तहसील है। यहां के जागीरदार को पीर के नाम से पुकारा जाता है] वे मुसलमान समुदाय के धार्मिक गुरू भी है और उनके करीब दस लाख अनुयायी थे। यहां का मुख्य व्यवसाय खेती] लकडी आदि के खिलौने व ईंट पर रंगाई व नक्काशी का काम था। उस समय वहां की आबादी तीस हजार के करीब थी।

हाला में ओसवाल समाज की उत्तपति-

पीर सा. के बहुत से अनुयायी जैसलमेर में भी रहते थे। पीर सा. वर्ष में एक बार वहां का दौरा करते थे तथा वहां के राजा के अतिथी बनकर ठहरते थे। उनसे उनकी अच्छी मित्रता थी।करीब 400 वर्ष पूर्व की घटना है कि उस समय के पीर साहब ने जैसलमेर के महाराजा से विनती करते हुए यह मांग की कि] मेरे गांव मे सब कौमे ¼समुदाय½ है। परन्तु हमारे यहां ओसवाल समाज नहीं है।

 इस समाज से मैं बहुत प्रभावित हूँ और चाहता हूँ कि आप इनमें से पांच घरों को मेरे यहां भिजवाये] उनको जो भी सुविधाएं चाहिये वे मैं जी जान से दूंगा। जैसलमेर के महाराज ने यह प्रस्ताव ओसवाल समुदाय के सामने रखा परंतु सिंध देश में जाने के लिए कोई तैयार नहीं था] तब 6 महीने के लिए मेहमान के रूप में पीर साहब ने कुछ ओसवालों को ले जाने की विनती की कुछ उत्साही लोग तैयार हुए और इस शर्त पर माहराज ने पीर सा. को मंजूरी दी कि इनकी हर तरह की सुरक्षा की जिम्मेदारी आप पर होगी और यह जब भी वापस आना चाहेंगे] उन्हें सुरक्षित पहुंचाया जायेगा। पीर साहब ने यह वचन व आवासन दिया कि मैं इनको अपनी छाती के बाल की तरह सिर ताज करके रखूँगा इस आवासन पर पांच गोत्रों मे जैसे कि छाजेड] चौपडा] भंसाली] पारख व गोलेच्छा आदि वहां गए। जाकर यह ओसवाल परिवार इतने संतुष्ट हुए की धीरे-धीरे उनके रितेदार भी वहां आकर बसने लगे। कुछ परिवार पाली, राधनपुर आदि स्थानों से भी वहां पर आए। ओसवालों के 150 परिवार की बस्ती हो गई। एक समय वहां सिंधु नदी में प्रलयकारी बाढ आई। बीमारी प्लैग आदि फैले। उससे कुछ परिवार मारवाड प्रदेश  ¼राजस्थान½ वापिस चले गए। कुछ को पीर साहब ने हर तरह की सुविधाओं का आवासन देकर नई हाला नगरी को बसाया। जिसमें इन परिवारों के कहने पर दो मोहल्लों का निर्माण किया गया जो कि अन्य मोहल्लों से अलग व चारदिवारी के अन्दर फाटक बन्द थे। जिसमें करीब 40 परिवार बसे। इन परिवारों में मुख्यत: बुर्ड ¼राधनपुर½] बोहरा ¼पाली½] भंसाली] पारख] चौपडा] छाजेड] गोलेच्छा] मुन्निबोहरा] नाहटा] श्रीश्रीमाल] मालू] गणधर चौपडा] रतनपुरा आदि जैसलमेर के थे और भाभडा के नाम से प्रसिद्ध थे। पीर साहब अपने शब्दों में उसे सेठ कहा करते थे।

सभी हाला परिवार द्धारा वहां जिन मंदिर] उपाश्रय] पाठ-शाला प्याऊ आदि का निर्माण किया गया। संघ का पंचायत के रूप में संगठन था जिसका संचालन मुखिया द्धारा किया जाता था। सामाजिक रीति-रिवाज बहुत सरल व सबको मान्य हुआ करते थे। किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत हाला संघ द्धारा प्रमुख तीर्थ स्थानों पर हर वर्ष यात्राएं करना] पयूर्षण पर्व में अठाई] मासखमण, आयंबिल] ओलीजी आदि तपस्याएं करना] साधु सन्तों का सम्मान करना था। हाला संघ का प्रत्येक सदस्य दादा गुरूदेव का अन्नय भक्त था। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हाला संघ द्धारा अम्बिका देवी की अष्ठधातु की मूर्ति की प्रतिष्ठा दादा कुशल सूरि गुरूदेव के कर कमलों द्धारा करवाना है। गुरूदेव की हाला संघ पर बडी कृपा थी। हर मुसीबत] संकट के समय सहायता करते हुए कई चमत्कार जो आज भी हर सदस्य की निष्ठा व भक्ति भाव को प्रेरित करता है।

 

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