या तो अभी या कभी नहीं
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जर्जर मकान आये दिन गिरते रहते हैं पर भवन कितने ही विशालकाय हों यदि आधार स्तम्भ सुदृढ़ हों तो वे भयंकर भूचालों में भी अविचलित खड़े रहते हैं। तूफान हों, झंझावात हों, समुद्र गहरा हो तो भी कुशल माँझी नाव किनारे पहुँचा देते हैं। युद्ध कितना ही भीषण हो, अनेक मोर्चों पर लड़ा जा रहा हो तो भी साहसी और सूझबूझ वाले सेनापति विजयी होते हैं, यश प्राप्त करते हैं। कुल चौदह किन्तु मूर्धन्य व्यक्तियों से बनी निहत्थी कांग्रेस ने ब्रिटिश हुकूमत से सत्ता छीन ली थी। अपने शान्तिकुञ्ज को इन दिनों एक सौ वैसे ही सुदृढ़ आधार स्तम्भों की, कुशल नाविकों की, साहसी सेनापतियों और मूर्धन्यों की आवश्यकता है। जागृत आत्मायें इस पुकार को सुनें, समझें और युग धर्म निर्वाह के लिए आगे आयें। माँ की कोख कलंकित करने वाली कायरता यों न दिखायें।
जिनके मन में राष्ट्रीय हित, सेवा भावना और जातीय स्वाभिमान हो, शिक्षित हों, किन्तु जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व बहुत बड़े न हों वे शान्तिकुञ्ज से पत्र व्यवहार करें, यहीं निवास की बात सोचें। लिप्सायें तो न रावण की पूरी हुई, न सिकंदर की, पर औसत भारतीय नागरिक की ब्राह्मणोचित आजीविका में कोई दिक्कत किसी को नहीं आने पायेगी, इसे हमारा आश्वासन मानें।
—भगवती देवी शर्मा
अखण्ड ज्योति— अप्रैल, १९९३