इक्कीसवीं सदी का संविधान — हमारा युग निर्माण सत्संकल्प

अनुक्रमणिका

१. युग निर्माण मिशन का घोषणा-पत्र
२. हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर .......
३. शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर ............
४. मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से .......
५. इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम
६. अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग .......
७. मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे .........
८. समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और .......
९. चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी .......
१०. अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा ........
११. मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी ........
१२. दूसरों के साथ वह व्यवहार नहीं करेंगे ........
१३. नर-नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे
१४. संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार ......
१५. परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे
१६. सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा ........
१७. राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति ......
१८. मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप हैं......
१९. हम बदलेंगे, युग बदलेगा, हम सुधरेंगे ......
२०. अपना मूल्यांकन भी करते रहें
२१. तो फिर हमें क्या करना चाहिए


युग निर्माण मिशन का घोषणा-पत्र

युग निर्माण जिसे लेकर गायत्री परिवार अपनी निष्ठा और तत्परतापूर्वक अग्रसर हो रहा है, उसका बीज सत्संकल्प है। उसी आधार पर हमारी सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ एवं कार्यक्रम संचालित होते हैं, इसे अपना घोषणा-पत्र भी कहा जा सकता है। हम में से प्रत्येक को एक दैनिक धार्मिक कृत्य की तरह इसे नित्य प्रातःकाल पढ़ना चाहिए और सामूहिक शुभ अवसरों पर एक व्यक्ति उच्चारण करें और शेष लोगों को उसे दुहराने की शैली से पढ़ा जाना चाहिए।

संकल्प की शक्ति अपार है। यह विशाल ब्रह्माण्ड परमात्मा के एक छोटे संकल्प का ही प्रतिफल है। परमात्मा में इच्छा उठी ‘एकोऽहं बहुस्याम’ मैं अकेला हूँ-बहुत हो जाऊँ, उस संकल्प के फलस्वरूप तीन गुण, पंचतत्त्व उपजे और सारा संसार बनकर तैयार हो गया। मनुष्य के संकल्प द्वारा इस ऊबड़-खाबड़ दुनियाँ को ऐसा सुव्यवस्थित रूप मिला है। यदि ऐसी आकांक्षा न जगी होती, आवश्यकता अनुभव न होती तो कदाचित् मानव प्राणी भी अन्य वन्य पशुओं की भाँति अपनी मौत के दिन पूरे कर रहा होता।

इच्छा जब बुद्धि द्वारा परिष्कृत होकर दृढ़ निश्चय का रूप धारण कर लेती है, तब वह संकल्प कहलाती है। मन का केन्द्रीकरण जब किसी संकल्प पर हो जाता है, तो उसकी पूर्ति में विशेष कठिनाई नहीं रहती। मन की सामर्थ्य अपार है, तो सफलता के उपकरण अनायास ही जुटते चले जाते हैं। बुरे संकल्पों की पूर्ति के लिए भी जब साधन बन जाते हैं, तो सत्संकल्पों के बारे में तो कहना ही क्या है? धर्म और संस्कृति को जो विशाल भवन मानव जाति के सिर पर छत्रछाया की तरह मौजूद है, उसका कारण ऋषियों का सत्संकल्प ही है। संकल्प इस विश्व की सबसे प्रचंड शक्ति है। विज्ञान की शोध द्वारा अगणित प्राकृतिक शक्तियों पर विजय प्राप्त करके वशवर्ती बना लेने का श्रेय मानव की संकल्प शक्ति को ही है। शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, उद्योग, साहित्य, कला, संगीत आदि विविध दिशाओं में जो प्रगति हुई आज दिखाई पड़ती है, उसके मूल में मानव का संकल्प ही सन्निहित है, इसे प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष कह सकते हैं। आकांक्षा को मूर्त रूप देने के लिए जब मनुष्य किसी दिशा विशेष में अग्रसर होने के लिए दृढ़ निश्चय कर लेता है तो उसकी सफलता में संदेह नहीं रह जाता।

आज प्रत्येक विचारशील व्यक्ति यह अनुभव करता है कि मानवीय चेतना में वे दुर्गुण पर्याप्त मात्रा में बढ़ चले हैं, जिनके कारण अशान्ति और अव्यवस्था छाई रहती है। इस स्थिति में परिवर्तन की आवश्यकता अनिवार्य रूप से प्रतीत होती है, पर यह कार्य केवल आकांक्षा मात्र से पूर्ण न हो सकेगा, इसके लिए एक सुनिश्चित दिशा निर्धारित करनी होगी और उसके लिए सक्रिय रूप से संगठित कदम बढ़ाने होंगे। इसके बिना हमारी चाहना एक कल्पना मात्र बनी रहेगी। युग निर्माण सत्संकल्प उसी दिशा में एक सुनिश्चित कदम है। इस घोषणापत्र में सभी भावनाएँ धर्म और शास्त्र की आदर्श परंपरा के अनुरूप एक व्यवस्थित ढंग से सरल भाषा में संक्षिप्त शब्दों में रख दी गई और चिंतन करें तथा यह निश्चय करें कि हमें अपना जीवन इसी ढाँचे में ढालना है। दूसरों को उपदेश करने की अपेक्षा इस संकल्प पत्र में आत्म-निर्माण पर सारा ध्यान केंद्रित किया गया है। दूसरों को कुछ करने के लिए कहने का सबसे प्रभावशाली तरीका एक ही है कि हम वैसा करने लगें। अपना निर्माण ही युग निर्माण का अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है। बूँद-बूँद जल के मिलने से ही समुद्र बना है। एक-एक अच्छा मनुष्य मिलकर ही अच्छा समाज बनेगा। व्यक्ति निर्माण का व्यापक स्वरूप ही युग निर्माण के रूप में परिलक्षित होगा।

प्रस्तुत युग निर्माण सत्संकल्प की भावनाओं का स्पष्टीकरण और विवेचन पाठक इसी पुस्तक के अगले लेखों में पढ़ेंगे। इस भावनाओं को गहराई से अपने अंतःकरणों में जब हम जान लेंगे, तो उसका सामूहिक स्वरूप एक युग आकांक्षा के रूप में प्रस्तुत होगा और उसकी पूर्ति के लिए अनेक देवता, अनेक महामानव, नर तन में नारायण रूप धारण करके प्रगट हो पड़ेंगे। युग परिवर्तन के लिए जिस अवतार की आवश्यकता है, वह पहले आकांक्षा के रूप में ही अवतरित होगा। इसी अवतार का सूक्ष्म स्वरूप यह युग निर्माण सत्संकल्प है, इसके महत्त्व का मूल्यांकन हमें गंभीरतापूर्वक ही करना चाहिए। युग निर्माण सत्संकल्प का प्रारूप निम्न प्रकार है—

हमारा युग निर्माण सत्संकल्प

1—हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे।

2—शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्म-संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

3—मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाए रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रख रहेंगे।

4—इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।

5—अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

6—मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

7—समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

8—चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।

9—अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।

10—मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।

11—दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं।

12—नर-नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे।

13—संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।

14—परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे।

15—सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नव-सृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

16—राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे।

17—मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगे, तो युग अवश्य बदलेगा।

18—‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।

इस युग निर्माण सत्संकल्प का पाठ नियमित दैनिक उपासना के पहले नित्य प्रति किया जाना चाहिए। पाठ धीमी गति से समझते हुए, विचार करते हुए किया जाना चाहिए। इसके प्रत्येक सूत्र पर युग चेतना साहित्य की पुस्तक संख्या ५२ से ६९ तक में विस्तृत विवेचना दी गई है। पूरे सत्संकल्प का एक पाठ कर लेने के बाद मन चाहे सूत्र की विस्तृत विवेचना का स्वाध्याय अपने दैनिक स्वाध्याय का अंग बना लेना चाहिए। इसी सीरीज की पुस्तक संख्या ७० ‘‘अपना मूल्यांकन भी करते रहें’’ का स्वाध्याय कभी-कभी करते रहना चाहिए ताकि आत्म-निर्माण की दिशा में हम कितना आगे बढ़ें, इसका मूल्यांकन होता रहता है। यह २० पुस्तिकाओं (५१ से ७०) का सैट मनुष्य को देव मानव बनाने में सक्षम है, आवश्यकता है श्रद्धापूर्वक स्वाध्याय, चिंतन, मनन एवं अनुशासन की।

एक बच्चे को देश का नेता बनने की बड़ी भारी इच्छा थी, पर कैसे बना जाए? यह बात समझ में नहीं आती थी। एक दिन फ्रैंकलिन की जीवनी पढ़ते समय उसने ज्ञानार्जन की महत्ता समझी। बच्चा उस दिन से स्वाध्याय में एक मन से जुट गया और अपने मस्तिष्क में ज्ञान का विशाल भण्डार एकत्र कर लिया। यही लड़का एक दिन अर्जेंटाइना का राष्ट्रपति बना, नाम था- डोमिंगो फास्टिनो सारमिंटो।


1—हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे।

जीव को परमेश्वर का अंश कहा गया है। जिस प्रकार जल के प्रपात में से पानी के अनेक छोटे-छोटे झरने उत्पन्न होते और विलय होते हैं, उसी प्रकार विभिन्न जीवधारी परमात्मा में से उत्पन्न होकर उसी में लय होते रहते हैं। आस्तिकता वह शुद्ध दृष्टि है जिसके आधार पर मनुष्य अपने जीवन की रीति-नीति का क्रम ठीक प्रकार बना सकने में समर्थ होता हैं। ‘‘हम ईश्वर के पुत्र हैं, महान् महत्ता, शक्ति एवं सामर्थ्य के पुंज हैं। अपने पिता के उत्तराधिकार में हमें वह प्रतिभा उपलब्ध है, जिससे अपने संबंधित जगत का, समाज एवं परिवार का सुव्यवस्थित संचालन कर सकें। ईश्वर की विशेष प्रसन्नता, अनुकंपा एवं सहायता प्राप्त करने के लिए हमें परमेश्वर का आज्ञानुवर्ती धर्म परायण होना चाहिए। प्रत्येक प्राणी में भगवान् व्याप्त है, इसलिए हमें हर किसी के साथ सज्जनता का व्यवहार करना चाहिए। संसार के पदार्थों का निर्माण सभी के लिए है, इसलिए अनावश्यक उपयोग न करें। पाप से बचें, क्योंकि पाप करना अपने ईश्वर के साथ ही दुर्व्यवहार करना है। कर्म का फल ईश्वरीय विधान का अविच्छिन्न अंग है। इसलिए सत्कर्म करें और सुखी रहें, दुष्कर्मों से बचें ताकि दुःख न सहन पड़ें। ये भावनाएँ एवं मान्यताएँ जिसके मन में जितनी ही गहरी होंगी, जो इन्हीं मान्यताओं के अनुरूप अपनी रीति-नीति बना रहा होगा, वह उसी अनुपात में आस्तिक कहलाएगा। ’’

मनुष्य को अनंत प्रतिभा प्रदान करने के उपरांत परमात्मा ने उसकी बुद्धिमत्ता परखने का भी एक विधान बनाया है। उपलब्ध प्रतिभा का वह सदुपयोग कर सकता है या नहीं, यही उसकी परीक्षा है। जो इस परीक्षा में उत्तीर्ण होता है, उसे वे उपहार मिलते हैं, जिन्हें जीवन मुक्ति, परमपद, अनंत ऐश्वर्य, सिद्धावस्था, ऋषित्व एवं देवत्व आदि नामों से पुकारते हैं, जो असफल होता है, उसे कक्षा में अनुत्तीर्ण विद्यार्थी की तरह एक वर्ष और पढ़ने के लिए चौरासी लाख योनियों का एक चक्कर पूरा करने के लिए रोक लिया जाता है। यह बुद्धिमत्ता की परीक्षा इस प्रकार होती है कि चारों ओर पाप, प्रलोभन, स्वार्थ, लोभ, अहंकार एवं वासना, तृष्णा के शस्त्रों से सज्जित शैतान खड़ा रहता है और दूसरी ओर धर्म, कर्तव्य, स्नेह, संयम की मधुर मुस्कान के साथ विहँसता हुआ भगवान्। इन दोनों में से जीव किसे अपनाता है, यही उसकी बुद्धि की परीक्षा है, यह परीक्षा ही ईश्वरीय लीला है। इसी प्रयोजन के लिए संसार की ऐसी विलक्षणता द्विविधापूर्ण स्थिति बनी है। हम में से अनेक दुर्बल व्यक्ति शैतान के प्रलोभन में फँसते और गला कटाते हैं। विवेक कुंठित हो जाता है। भगवान् पहचानने में नहीं आता, सन्मार्ग पर चलना नहीं बन पड़ता और हम चौकड़ी चूक कर मानव जीवन में उपलब्ध हो सकने वाले स्वर्णिम सौभाग्य से वंचित रह जाते हैं। ईश्वर पर अटूट विश्वास और उसकी अविच्छिन्न समीपता का अनुभव, इसी स्थिति को आस्तिकता कहते हैं। उसका नाम ‘उपासना’ है। परमेश्वर सर्वत्र व्याप्त है, कोई गुप्त, प्रकट स्थान उसकी उपस्थिति से रहित नहीं, वह सर्वांतर्यामी घट-घट की जानता है। सत्कर्म ही उसे प्रिय है। धर्म मार्ग पर चलने वाले को ही वह प्यार करता है। इतना ही मान्यता तो ईश्वर भक्त में विकसित होनी ही चाहिए। इस प्रकार की निष्ठा जिसमें होगी वह न शरीर से दुष्कर्म करेगा और न मान में दुर्भावों को स्थान देगा। इसी प्रकार जिसको ईश्वर के सर्वव्यापक और न्यायकारी होने का विश्वास है, वह कुमार्ग पर पैर कैसे रखेगा? आस्तिक कुकर्मी नहीं हो सकता। जो कुकर्मी है उसकी आस्तिकता को एक विडंबना या प्रवंचना ही कहना चाहिए।

ईश्वर का दंड एवं उपहार ही असाधारण हैं। इसलिए आस्तिक को इस बात का सदा ध्यान रहेगा कि दंड से बचा जाए और उपहार प्राप्त किया जाए। यह प्रयोजन छुट-पुट पूजा-अर्चना जप-ध्यान से पूरा नहीं हो सकता। भावनाओं और क्रियाओं को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने से ही यह प्रयोजन पूरा होता है। न्यायनिष्ठ जज की तरह ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। स्तन, अर्चन करके उसे उसके नियम विधान से विचलित नहीं किया जा सकता है। अपना पूजन स्मरण या गुणगान करने वाले के साथ यदि वह पक्षपात करने लगे, तब उसकी न्याय-व्यवस्था का कोई मूल्य न रहेगा, सृष्टि की सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाएगी। सबको अनुशासन में रखने वाला परमेश्वर स्वयं भी नियम व्यवस्था में बँधा है। यदि कुछ उच्छृंखलता एवं अव्यवस्था बरतेगा तो फिर उसकी सृष्टि में पूरी तरह अंधेर खाता फैल जाएगा। फिर कोई उसे न तो न्यायकारी कहेगा और न समदर्शी। तब उसे खुशामदी या रिश्वतखोर नाम से पुकारा जाने लगेगा, जो चापलूस स्तुति कर दे, उससे प्रसन्न, जो पुष्प-नैवेद्य भेंट करें, उससे प्रसन्न।

भगवान् को हम सर्वव्यापक एवं न्यायकारी समझकर गुप्त या प्रकट रूप से अनीति अपनाने का कभी भी, कहीं भी साहस न करें। ईश्वर के दंड से डरें। उसका भक्तवत्सल ही नहीं भयानक रौद्र रूप भी है। उसका रौद्र रूप ईश्वरीय दंड से दंडित असंख्यों रुग्ण, अशक्त, मूक, बधिर, अंध, अपंग, कारावास एवं अस्पतालों में पड़े हुए कष्टों से कराहते हुए लोगों की दयनीय दशा को देखकर सहज ही समझा जा सकता है। केवल वंशी बजाने वाले और रास रचाने वाले ईश्वर का ही ध्यान न रखें, उसका त्रिशूलधारी भी एक रूप है, जो असुरता और निमग्न दुरात्माओं का नृशंस दमन, मर्दन भी करता है। न्यायनिष्ठ जज को जिस प्रकार अपने सगे संबंधियों, प्रशंसक मित्रों तक को कठोर दंड देना पड़ता है, फाँसी एवं कोड़े लगाने की सजा देने को विवश होना पड़ता है, वैसे ही ईश्वर को भी अपने भक्त-अभक्त का, प्रशंसक-निंदक का भेद किए बिना उसके शुभ-अशुभ कर्मों का दंड पुरस्कार देना होता है। ईश्वर हमारे साथ पक्षपात करेगा। सत्कर्म न करते हुए भी विविध-विध सफलताएँ देगा या दुष्कर्मों के करते रहने पर भी दंड से बचे रहने की व्यवस्था कर देगा, ऐसा सोचना नितांत भूल है। उपासना का उद्देश्य इस प्रकार ईश्वर से अनुचित पक्षपात कराना नहीं होना चाहिए, वरन, यह होना चाहिए कि वह हमें अपनी प्रसन्नता के प्रमाणस्वरूप सद्भावनाओं से ओत-प्रोत रहने, सत्प्रवृत्तियों में संलग्न रहने की प्रेरणा, क्षमता एवं हिम्मत प्रदान करें, भय एवं प्रलोभन के अवसर आने पर वे भी सत्पथ से विचलित न होने की दृढ़ता प्रदान करें यही ईश्वर की कृपा का सर्वश्रेष्ठ चिह्न है। पापों से डर और पुण्य से प्रेम, यही तो भगवद्-भक्त के प्रधान चिह्न हैं। कोई व्यक्ति आस्तिक है या नास्तिक, इसकी पहचान किसी तिलक, जनेऊ, कंठी, माला, पूजा-पाठ स्नान, दर्शन आदि के आधार पर नहीं वरन् भावनात्मक एवं क्रियात्मक गतिविधियों को देखकर ही की जा सकती है। आस्तिक की मान्यता प्राणिमात्र में ईश्वर की उपस्थिति देखती है। इसलिए उसे हर प्राणी के साथ उदारता, आत्मीयता एवं सेवा सहायता से भरा मधुर व्यवहार करना पड़ता है। भक्ति का अर्थ है-प्रेम जो प्रेमी है, वह भक्त है। भक्ति भावना का उदय जिसके अंतःकरण में होगा, उसके व्यवहार में प्रेम की अजस्र निर्झरिणी बहने लगेगी। वह अपने प्रियतम को सर्वव्यापक देखेगा और सभी से अत्यंत सौम्यता पूर्ण व्यवहार करके अपनी भक्ति भावना का परिचय देगा। ईश्वर दर्शन का यही रूप है। हर चर-अचर में छिपे हुए परमात्मा को जो अपनी ज्ञान दृष्टि से देख सका और तदनुरूप अपने कर्तव्य का निर्धारण कर सका, मानना चाहिए कि उसे ईश्वर दर्शन का लाभ मिल गया। अपने में परमेश्वर को और परमेश्वर में अपने को देखने की दिव्य दृष्टि जिसे प्राप्त हो गई, समझना चाहिए कि उसने पूर्णता का जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लिया।


2—शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

आस्तिकता और कर्तव्य परायणता की सत्प्रवृत्ति का प्रभाव पहले अपने सबसे समीपवर्ती स्वजन पर पड़ना चाहिए। हमारा सबसे निकटवर्ती संबंधी हमारा शरीर है। उसके साथ सद्व्यवहार करना, उसे स्वस्थ और सुरक्षित रखना अत्यावश्यक है। शरीर को नश्वर कहकर उसकी उपेक्षा करना अथवा उसे ही संजोने-सँवारने में सारी शक्ति खर्च कर देना, दोनों ही ढंग अकल्याणकारी हैं। हमें संतुलन का मार्ग अपनाना चाहिए।

हमारा सदा सहायक सेवक शरीर है। वह चौबीसों घंटे सोते-जागते हमारे लिए काम करता रहता है। वह जिस भी स्थिति में हो, अपनी सामर्थ्य भर आज्ञा पालन के लिए तत्पर रहता है। सुविधा-साधनों के उपार्जन में उसी का पुरुषार्थ काम देता है। इतना ही नहीं, वरन् समय-समय पर अपने-अपने ढंग से अनेक प्रकार के रसास्वादन भी कराती रहती हैं। नेत्र, कान, नाक, जिह्वा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ज्ञान तंतु अपने-अपने ढंग के रसास्वादन कराते रहते हैं। इन विशेषताओं के कारण ही आत्मा उसकी सेवा-साधना का मुग्ध हो जाती है और अपने सुख ही नहीं अस्तित्व तक को भूल कर उसी में पूरी तरह रम जाती है। उसका सुख-दुःख मानापमान आदि अपनी निज की भाव-संवेदना में सम्मिलित कर लेती है। यह घनिष्ठता इतनी अधिक सघन हो जाती है कि व्यक्ति, आत्मा की सत्ता, आवश्यकता तक को भूल जाता है और शरीर को अपना ही आपा मानने लगता है। उसका अंत हो जाने पर तो जीवन की इतिश्री ही मान ली जाती है।

ऐसे वफादार सेवक को समर्थ, निरोग एवं दीर्घजीवी बनाए रखना प्रत्येक विचारशील का कर्तव्य है। चाहते तो सभी ऐसा ही हैं, पर जो रहन-सहन आहार-विहार अपनाते हैं, वह विधा ऐसी उल्टी पड़ जाती है कि उसके कारण अपने प्रिय पात्र को अपार हानि उठानी पड़ती है, इतना अत्याचार सहना पड़ता है कि उसका कचूमर तक निकल जाता है और रोता-कलपता दुर्बलता और रुग्णता से ग्रसित होकर व्यक्ति असमय में ही दम तोड़ देता है।

यह सब अज्ञान के कारण होता है, जो होश सँभालने से पूर्व ही अभिभावकों के अनाड़ीपन के कारण वह अपने ऊपर लाद लेता है। स्वस्थ-समर्थ रहना कुछ भी कठिन नहीं है। प्रकृति के संकेतों का अनुसरण करने भर से यह प्रयोजन सिद्ध हो सकता है। प्रकृति के सभी जीवधारी यही करते और दुर्घटना जैसी आकस्मिक परिस्थितियों को छोड़कर साधारणतया निरोग रहते और समयानुसार अपनी मौत मरते हैं। प्रकृति के संदेश-संकेतों को जब सृष्टि के सभी जीवधारी मोटी बुद्धि होने पर भी समझ लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य जैसा बुद्धिजीवी उन्हें न अपना सके। प्रकृति के स्वास्थ्य रक्षा के नियम व्यवहार में अति सरल हैं। उचित और अनुचित का निर्णय करने वाले यंत्र इसी शरीर में लगे हैं, जो तत्काल यह बता देते हैं कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं? मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं का अनुशासन मानने भर से उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है।

आहार-विहार का ध्यान रखने के स्वास्थ्य रक्षा की समस्या हल हो जाती है। आहार प्रमुख पक्ष है, जिसे स्वास्थ्य, अनुशासन का पूर्वार्द्ध कहा जा सकता है। उत्तरार्द्ध में विहार आता है, जिसका तात्पर्य होता है नित्य कर्म, शौच, स्नान, शयन, परिश्रम, संतोष आदि। इन्हीं के संबंध में समुचित जानकारी प्राप्त कर लेने और उनका परिपालन करते रहने से एक प्रकार से आरोग्य का बीमा जैसा हो जाता है।

शरीर को ईश्वर के पवित्र निवास के रूप में मान्यता देना उचित है। यह तथ्य ध्यान में बना रहे तो शरीर के प्रति निरर्थक मोहग्रस्तता से बचकर, उसके प्रति कर्तव्यों का संतुलित निर्वाह संभव है। मंदिर को सजाने, सँवारने में भगवान् को भुला देना निरी मूर्खता है, किंतु देवालयों को गंदा, तिरस्कृत, भ्रष्ट, जीर्ण-शीर्ण रखना भी पाप माना जाता है। शरीर रूपी मंदिर को मनमानी बुरी आदतों के कारण रुग्ण बनाना प्रकृति की दृष्टि में बड़ा अपराध है। उसके फलस्वरूप पीड़ा, बेचैनी, अल्पायु, आर्थिक हानि, तिरस्कार जैसे दंड भोगने पड़ते हैं।

रुग्णता या बीमारी कहीं बाहर से नहीं आती। विकार तो बाहर से भी प्रविष्ट हो सकते हैं तथा शरीर के अंदर भी पैदा होते हैं, किंतु शरीर संस्थान में उन्हें बाहर निकाल फेंकने की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। मनुष्य अपने इंद्रिय असंयम द्वारा जीवनी शक्ति को बुरी तरह नष्ट कर देता है। आहार-विहार के असंयम से शरीर के पाचन तंत्र, रक्त संचार, मस्तिष्क, स्नायु संस्थान आदि पर भारी आघात पड़ता है। बार-बार के आघात से वे दुर्बल एवं रोगग्रस्त होने लग जाते हैं। निर्बल संस्थान अंदर के विकारों को स्वाभाविक ढंग से बाहर नहीं निकाल पाते। फलस्वरूप वे शरीर में एकत्रित होने लगते हैं तथा अस्वाभाविक ढंग से बाहर निकलने लगते हैं। यही स्थिति बीमारी कहलाती है।

स्वस्थ रहने पर ही कोई अपना और दूसरों का भला कर सकता है। जिसे दुर्बलता और रुग्णता घेरे हुए होगी, वह निर्वाह के योग्य भी उत्पादन न कर सकेगा। दूसरों पर आश्रित रहेगा। परावलम्बन एक प्रकार से अपमानजनक स्थिति है। भारभूत होकर जीने वाले न कहीं सम्मान पाते हैं और न किसी की सहायता कर सकने में समर्थ होते हैं। जिससे अपना बोझ ही सही प्रकार उठ नहीं पाता, वह दूसरों के लिए किस प्रकार कितना उपयोगी हो सकता है?

मनुष्य जन्म अगणित विशेषताओं और विभूतियों से भरा पूरा है। किसी को भी यह छूट है कि उतना ऊँचा उठे जितना अब तक कोई महामानव उत्कर्ष कर सका है, पर यह संभव तभी है, जब कि शरीर और मन पूर्णतया स्वस्थ हो। जो जितनों के लिए, जितना उपयोगी और सहायक सिद्ध होता हैं, उसे उसी अनुपात में सम्मान और सहयोग मिलता है। अपने और दूसरों के अभ्युदय में योगदान करते उसी में बन पड़ता है, जो स्वस्थ, समर्थ रहने की स्थिति बनाए रहता है। इसलिए अनेक दुःखद दुर्भाग्यों और अभिशापों में प्रथम अस्वस्थता को ही माना गया है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि वैसी स्थिति उत्पन्न न होने पाए। सच्चे अर्थों में जीवन उतने ही समय का माना जाता है, जितना कि स्वस्थतापूूर्वक जिया जा सके।

कुछ अपवादों को छोड़कर अस्वस्थता अपना निज का उपार्जन है। भले ही वह अनजाने में, भ्रमवश या दूसरों की देखा-देखी उसे न्यौत बुलाया गया हो। सृष्टि के सभी प्राणी जीवन भर निरोग रहते हैं। मरणकाल आने पर जाना तो सभी को पड़ता है। मनुष्य की उच्छृंखल आदत ही उसे बीमार बनाती है। जीभ का चटोरापन अतिशय मात्रा में अखाद्य खाने के लिए बाधित करता रहता है। जितना भार उठ नहीं सकता उतना लादने पर किसी का भी कचूमर निकल सकता है। पेट पर अपच भी इसी कारण चढ़ दौड़ती है। बिना पचा सड़ता है और सड़न रक्त प्रवाह में मिल जाने से जहाँ भी अवसर मिलता है, रोग का लक्षण उभर पड़ता है। कामुकता की कुटेब जीवनी शक्ति का बुरी तरह क्षरण करती है और मस्तिष्क की तीक्ष्णता का हरण कर लेती है। अस्वच्छता, पूरी नींद न लेना, कड़े परिश्रम से जी चुराना, नशेबाजी जैसे कुटेब भी स्वास्थ्य को जर्जर बनाने का कारण बनते हैं। खुली हवा और रोशनी से बचना, घुटन भरे वातावरण में रहना भी रुग्णता का एक बड़ा कारण है। भय का आक्रोश जैसे उतार-चढ़ाव भरे ज्वार-भाटे भी मनोविकार बनते और व्यक्ति को सनकी, कमजोर एवं बीमार बनाकर रहते हैं।

शरीर को निरोग बनाकर रखना कठिन नहीं है। आहार, श्रम एवं विश्राम का संतुलन बिठा कर हर व्यक्ति आरोग्य एवं दीर्घजीवी पा सकता है। आलस्य रहित, श्रमयुक्त, व्यवस्थित दिनचर्या का निर्धारण कठिन नहीं है। स्वाद को नहीं स्वास्थ्य को लक्ष्य करके उपयुक्त भोजन की व्यवस्था हर स्थिति में बनाई जानी संभव है। सुपाच्य आहार समुचित मात्रा में लेना जरा भी कठिन नहीं है। शरीर को उचित विश्राम देकर हर बार तरोताजा बना लेने के लिए कहीं से कुछ लेने नहीं जाना पड़ता। यह सब हमारी असंयम एवं असंतुलन की वृत्ति के कारण ही नहीं सध पाता और हम इस सुर दुर्लभ देह को पाकर भी नर्क जैसी हीन और यातना ग्रस्त स्थिति में पड़े रहते हैं।

शारीरिक आरोग्य के मुख्य आधार आत्म संयम एवं नियमितता ही हैं। इनकी उपेक्षा करके मात्र औषधियों के सहारे आरोग्य लाभ का प्रयास मृग मरीचिका के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर औषधियों का सहारा लाठी की तरह लिया तो जा सकता है, किंतु चलना तो पैरों से ही पड़ता है। शारीरिक आरोग्य एवं सशक्तता जिस जीवनी शक्ति के ऊपर आधारित है, उसे बनाए रखना इन्हीं माध्यमों से संभव है। शरीर को प्रभु मंदिर की तरह ही महत्त्व दें। बचकाने, छिछोरे बनाव शृंगार से उसे दूर रखें। उसे स्वच्छ, स्वस्थ एवं सक्षम बनाना अपना पुण्य कर्तव्य मानें। उपवास द्वारा स्वाद एवं अति आहार की दुष्प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाने का प्रयास करें। मौन एवं ब्रह्मचर्य साधना द्वारा जीवनी शक्ति क्षीण न होने दें। उसे अंतर्मुखी होने का अभ्यास करें। श्रमशीलता को दिनचर्या में स्थान मिले। जीवन के महत्त्वपूर्ण क्रमों को नियमितता के शिकंजे में ऐसा कद दिया जाए कि कहीं विशृंखलता न आने पाए। थोड़ी-सी तत्परता बरत कर यह साधा जाना संभव है। ऐसा करके इस शरीर से वे लाभ पाए जा सकते हैं, जिनकी संभावना शास्त्रकारों से लेकर वैज्ञानिकों तक ने स्वीकार की है।

तक बीमारियाँ एक पहाड़ पर रहा करती थीं। उन दिनों की बात है, एक किसान को जमीन की कमी महसूस हुई, अतएव उसने पहाड़ काटना शुरू कर दिया। पहाड़ बड़ा घबराया। उसने बीमारियों को आज्ञा दी-बेटियों टूट पड़ो इस किसान पर और इसे नष्ट-भ्रष्ट कर डालो। बीमारियाँ दंड-बैठक लगाकर आगे बढ़ी और किसान पर चढ़ बैठीं। किसान ने किसी की परवाह नहीं की, डटा रहा अपने काम में। शरीर से पसीने की धार निकली और उसी में लिपटी हुई बीमारियाँ भी बह गईं। पहाड़ ने क्रुद्ध होकर शाप दे दिया-मेरी बेटी होकर तुमने हमारा इतना काम नहीं किया, अब जहाँ हो वहीं पड़ी रहो। तब से बीमारियाँ परिश्रमी लोगों पर असर नहीं कर पातीं, आलसी लोग ही उनके शिकार होते हैं।

3—मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाए रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।

शरीर की तरह मन के संबंध में भी लोग प्रायः भूल करते हैं। शरीर को सजाने-सँवारने को महत्त्व देकर लोग उसे स्वस्थ, निरोगी एवं सशक्त बनाने की बात भूल जाते हैं। मन के बारे में भी ऐसा ही होता है। लोग मन को महत्त्व देकर मनमानी करने में लग जाते हैं, मनोबल बढ़ाने और मन को स्वच्छ एवं सुसंस्कृत बनाने की बात पर ध्यान नहीं दिया जाता। इस भूल के कारण जीवन में कदम-कदम पर विडम्बनाओं में फँसना पड़ता है। तंदुरुस्ती के साथ मन की दुरुस्ती का भी ध्यान रखना अनिवार्य है। स्वस्थ शरीर में मन विकृत हो तो उद्दंडता, अहंकार प्रदर्शन, परपीड़ा जैसे निकृष्ट कार्य होने लगते हैं। गुंडे-बदमाशों से लेकर राक्षसों तक के अपराध जगत में जो कुछ हो रहा है, उसे अस्वस्थ मन का उपद्रव कहा जा सकता है। मन यदि अच्छी दिशा में मुड़ जाए, आत्मसुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास में रुचि लेने लगे तो जीवन में एक चमत्कार ही प्रस्तुत हो सकता है।

शरीर के प्रति कर्तव्य पालन करने की तरह मन के प्रति भी हमें अपने उत्तरदायित्वों को पूर्ण करना चाहिए। कुविचारों और दुर्भावनाओं से मन गंदा, मलिन और पतित होता है, अपनी सभी विशेषताओं और श्रेष्ठताओं को खो देता है। इस स्थिति से सतर्क रहने और बचने की आवश्यकता को अनुभव करना हमारा पवित्र कर्तव्य है। मन को सही दिशा देते रहने के लिए स्वाध्याय की वैसी ही आवश्यकता है, जैसे शरीर को भोजन देने की। आत्म-निर्माण करने वाली, जीवन की समस्याओं को सही ढंग से सुलझाने वाली उत्कृष्ट विचारधारा की पुस्तकें पूरे ध्यान, मनन और चिंतन के साथ पढ़ते रहना ही स्वाध्याय है। यदि सुलझे हुए विचारों के, जीवन विद्या के ज्ञाता कोई संभ्रांत सज्जन उपलब्ध हो सकते हों तो उनका सत्संग भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

मानव जीवन की महत्ता को हम समझें। इस स्वर्ण अवसर के सदुपयोग की बात सोच, अपनी गुत्थियों में से अधिकांश की जिम्मेदारी अपनी समझें और उन्हें सुलझाने के लिए अपने गुण, कर्म व स्वभाव में आवश्यक हेर-फेरा करने के लिए सदा कटिबद्ध रहें। इस प्रकार की उपलब्धि आत्म निर्माण की प्रेरणा देने वाले सत्साहित्य से, प्रबुद्ध मस्तिष्क के सत्पुरुषों की संगति से एवं आत्म निरीक्षण एवं आत्म-चिंतन से किसी भी व्यक्ति को सहज ही हो सकती है।

मन का स्वभाव बालक जैसा होता है, उमंग से भरकर वह कुछ न कुछ कराना एवं बोलना चाहता है। यदि दिशा दी जाए और उसकी क्रियाशीलता के अनुसार कार्य मिलता रहे, तो वह स्वयं भी संतोष पाता है तथा दूसरों को भी सुख देता है। मन के लिए उसकी कल्पना-शक्ति के अनुसार सद्विचारों एवं सद्भावनाओं का क्षेत्र खोल दिया जाए, तो वह संतुष्ट भी रहता है तथा हितकारी भी सिद्ध होता है। स्नेह, कृतज्ञता, सौहार्द्र सहयोग आदि के विचारों को बार-बार दुहराया जाए, तो मन में कुविचारों और दुर्भावनाओं को जगह न मिलेगी।

परिस्थिति एवं वातावरण के प्रभाव से बहुत बार मन पर उनका असर होने लगता है। उस स्थिति में कुविचारों के विपरीत, सशक्त सद्विचारों से उन्हें काटना चाहिए। जैसे स्वार्थपरता, धोखेबाजी, कामचोरी के विचार आएँ तो श्रमशीलता और प्रमाणिकता से लोगों की अद्भुत प्रगति के तथ्यपूर्ण चिंतन से उन्हें हटाया जा सकता है। यदि किसी के विपरीत आचरण पर क्रोध आए या द्वेष उभरे तो उसकी मजबूरी समझकर उसके प्रति करुणा, आत्मीयता से उसे धोया जा सकता है। यह विद्या सत्साहित्य के स्वाध्याय, सत्पुरुषों की संगति एवं ईमानदारी से किए गए आत्म-चिंतन से ही पाई जा सकती है। लोहा, लोहे कोक काटता है। गरम लोहे को ठंडा लोहे की छैनी काटती है। चुभे हुए काँटे को निकालने के लिए काँटे का ही प्रयोग करना पड़ता है। विष को विष मारता है। हथियार से हथियार को मुकाबला किया जाता है। किसी गिलास में भरी हुई हवा को हटाना हो तो उसमें पानी भर देना चाहिए। पानी का प्रवेश होने से हवा अपने आप निकल जाएगी। बिल्ली पाल लेने से चूहे घर में कहाँ ठहरते हैं? कुविचारों को मार भगाने का एक तरीका है कि उनके स्थान पर सद्विचारों की स्थापना की जाए। मन में जब सद्विचार भरे रहेंगे, तो उसे भीड़ से भरी धर्मशाला को देखकर अपने आप लौट जाने वाले मुसाफिर की तरह कुविचार भी कोई दूसरा रास्ता खोज लेंगे। स्वाध्याय और सत्संग में जितना अधिक समय लगाया जाता है, उतनी ही कुविचारों से सुरक्षा बन पड़ती है। रोटी और पानी जिस प्रकार शरीर की सुरक्षा और परिपुष्टि के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मिक स्थिरता और प्रगति के लिए सद्विचारों, सद्भावों की प्रचुर मात्रा हमें उपलब्ध होनी ही चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति स्वाध्याय और सत्संग से, मनन और चिंतन से पूरी होती है। युग निर्माण के लिए, आत्म-निर्माण के यह प्रधान साधन है। मन की शुद्धि के लिए इसे ही रामबाण दवा माना गया है।

व्यक्ति के मन मस्तिष्क में इस जन्म की ही नहीं जन्म-जन्मान्तरों की विकृतियाँ भरी रहती हैं। न जाने कितने कुविचार, कुवृत्तियाँ एवं मूढ़-मान्यताएँ हमारे मन-मस्तिष्क को घेरे रहती हैं। ज्ञान पाने अथवा विवेक जागृत करने के लिए आवश्यक है कि पहले हम अपने विचारों एवं संस्कारों को परिष्कृत करें। विचार एवं संस्कार परिष्कार के अभाव में ज्ञान के लिए की गई साधना निष्फल ही चली जाएगी। उन्नति एवं प्रगति की आधारशिला मनुष्य के अपनी विचार ही हैं। विचारों के अनुरूप ही उसका जीवन बनता-बिगड़ता है। विचार साँचे की तरह हैं, जो मनुष्य जीवन को अपने अनुरूप ढाल लिया करते हैं। मनुष्य का जो भी रूप सामने आता है, वह विचारों का प्रतिबिंब हुआ करता है। अपने आंतरिक एवं बाह्य जीवन को तेजस्वी, प्रखरतापूर्ण तथा पुरोगामी बनाने के लिए अपनी विचार शक्ति को विकसित, परिमार्जित करना होगा। यह कार्य उन्नत विचारों के संपर्क में आने से ही पूरा हो सकता है।

ऊर्ध्वगामी विचारधारा स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है। आत्मिक विकास एवं आत्म शिक्षण के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग दो ही मार्ग हैं। आज की परिस्थितियों में स्वाध्याय ही सबसे बड़ा सरल मार्ग है। उसी के द्वारा दूरस्थ, स्वर्गवासी या दुर्लभ महापुरुषों का सत्संग किसी भी स्थान, किसी भी समय, कितनी देर तक अपनी सुविधानुसार प्राप्त किया जा सकता है। उच्चकोटि के विचारों की पूँजी अधिकाधिक मात्रा में जमा किए बिना हम न तो अंतःकरण को शुद्ध कर सकते हैं और न उच्च मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। अतः स्वाध्याय को साधना का एक अंग समझकर अपने नित्य कर्मों में स्थान देना आवश्यक है। मन-मस्तिष्क से अवांछनीयताओं को बुहारने का कार्य नित्य स्वाध्याय और सत्संग से होते रहना चाहिए।

शिक्षित व्यक्ति को स्वाध्याय कर ही सकते हैं। अशिक्षित तथा जिनका मन स्वाध्याय में नहीं लगता, उन लोगों के लिए सत्संग ही एक उपाय है। विचारणा पलटते ही जीवन दिशा ही पलट जाती है। स्वाध्याय एवं सत्संग विचारों को स्थापित करते हैं, परंतु आज सत्संग की समस्या विकट हो गई है। अतः जिन महान् आत्माओं का सत्संग लाभ लेना चाहें, उनके द्वारा लिखे विचारों का स्वाध्याय तो किया ही जा सकता है। स्वाध्याय एक प्रकार का सत्संग ही है। इसके लिए वे ही चुनी हुई पुस्तकें होनी चाहिए, जो जीवन की विविध समस्याओं को आध्यात्मिक दृष्टि से सुलझाने में व्यावहारिक मार्गदर्शन करें और हमारी सर्वांगीण प्रगति को उचित प्रेरणा देकर अग्रगामी बनाएँ।

स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन एवं मनन इन चारों आधारों पर मानसिक दुर्बलता को हटाना और आत्मबल बढ़ाना निर्भर करता है। स्वाध्याय के अभाव में मन की न जड़ता जाती है न संकीर्णता, गन्दगी, मूढ़ता एवं विषयासक्ति से छुटकारा मिलता है। स्वाध्याय के लिए समय निकालना ही पड़ेगा। इसके लिए छोटा-सा आध्यात्मिक पुस्तकालय अपने-अपने घरों में शिक्षित लोग बना सकते हैं। पुस्तकें तो माँगकर भी पढ़ी जा सकती हैं। ज्ञान लेना और देना दोनों ही पुण्य कार्य समझकर किए जा सकते हैं। अपने परिवार में साप्ताहिक सत्संग किया जा सकता है। इसके लिए अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना अथवा प्रज्ञापुराण के प्रेरणाप्रद अंश पढ़कर सुनाए जा सकता हैं। साप्ताहिक गोष्ठियाँ एवं सत्संग विचारधारा को परिष्कृत करने के लिए महत्त्वपूर्ण समझना चाहिए।

सद्ग्रंथ जीते-जागते देवता होते हैं। उनका स्वाध्याय करना, उनकी उपासना करने के समान ही है। भोजन से पूर्व साधना वे शयन से पूर्व स्वाध्याय का क्रम सुनिश्चित रूप से चलना चाहिए। सत्कर्मों को प्रेरणा देने वाले दो ही अवलंबन हैं-सद्विचार और सद्भाव। सद्विचार स्वाध्याय से और सद्भाव उपासना से विकसित व परिपुष्ट होते हैं। यह आत्मिक अन्न-जल हमारी आत्मा को नित्य नियमित रूप से मिलता रहना चाहिए। इसे आत्मा और परमात्मा की जीवन और आदर्श के मिलन-समन्वय की पोषण साधना कहा जा सकता है। स्वाध्याय के बिना विचार परिष्कार नहीं, जहाँ ज्ञान नहीं वहाँ अंधकार होना स्वाभाविक है और अज्ञानी न केवल इस जन्म में ही वरन् जन्म-जन्मान्तरों तक, जब तक ज्ञान का आलोक नहीं पा लेता, त्रिविध तापों की यातना सहता रहेगा। आत्मवान् व्यक्ति स्वाध्याय के सरल उपाय से ही भौतिक ज्ञान की यातना से मुक्त हो सकता है।


4—इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।

पुराने कुसंस्कारी अभ्यासों को निरस्त करने के लिए नए उत्साह से, साहसपूर्वक सत्प्रयोजनों को दैनिक क्रियाकलाप में सम्मिलित करना पड़ता है और बार-बार उभरने वाली पशु-प्रवृत्तियों को निरस्त करने के लिए कड़ा रुख अपनाना पड़ता है। इस प्रकार अपने आप से जूझने को ही संयम समझना चाहिए। अर्जुन की भूमिका, इस अपने से संघर्ष करने (महाभारत) में प्रत्येक कर्मयोगी को निभानी पड़ती है।

जीवन एक युद्धस्थली है, जिसमें मनुष्य को सतत कामुक प्रतिकूल विचारों से लेकर चिर संचित प्रवृत्तियों तक एवं ऋतुकाल की बदलती परिस्थितियों से लेकर वातावरण में अस्वाभाविक परिवर्तन से जूझना पड़ता है। जीवनी शक्ति, जो उसे मानसिक रूप से लड़ सकने योग्य साहसी एवं उसके शरीर संस्थान को रोगी होने से बचाती है, एक ही अनुदान की परिणति हे-संयम जो इसे अपनाता है, वह न रोगी होता है न दुःखी। वह जीवन संग्राम में कभी दुःखी नहीं होता तथा विशृंखलित अस्त-व्यस्त विचार उसे प्रभावित नहीं कर पाते। संयम एवं संघर्ष एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं तथा असंयम की परिणति ही दीन-हीन दरिद्रता, रोग-शोक के रूप में होती है। जीवन देवता की उपासना तब ही भली प्रकार संभव है, जब अपने जीवन रसों को व्यर्थ बहाना छोड़कर मनुष्य उन्हें सृजनात्मक चिंतन व कर्तव्य में नियोजित करें। यदि व्यक्ति असंयम के दुष्परिणामों को समझ जाए, तो भूतल पर स्वर्ग आ जाए तथा दुःख दारिद्रय सर्वथा समाप्त हो जाए।

जीवन सम्पदा के चार क्षेत्र हैं-इंद्रिय शक्ति, समय शक्ति, विचार शक्ति, धन (साधन) शक्ति। आरंभ की तीन तो ईश्वर प्रदत्त हैं। चौथी इन तीनों के संयुक्त प्रयत्न से भौतिक क्षेत्र में पुरुषार्थ द्वारा अर्जित की जाती हैं। जो व्यक्ति इन्हें दैवी विभूतियाँ मानकर इनका सुनियोजन करता है, अभाव से भरे संसार में रहते हुए भी साधन एकत्र कर लेता है। शारीरिक सामर्थ्य, वाणी का सही उपयोग एवं समय सम्पदा का सही सुनियोजन करने के लिए ये विभूतियाँ भगवान् ने बहुत सोच-समझकर मानव को विरासत में दी हैं।

दस इंद्रियों में दो प्रमुख हैं, जिनमें से एक जिह्वा तथा दूसरी जननेन्द्रिय है। जिसने इनको वश में कर लिया, समझो उसने शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को प्राप्त कर लिया है। जिह्वा संयम से शारीरिक स्वास्थ्य तथा जननेन्द्रिय के संयम से मनोबल अक्षुण्ण रहता है। जिह्वा का शरीरगत स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। जिह्वा स्वाद को प्रधानता देकर ऐसे पदार्थों को खाती रहती है, जो अनावश्यक ही नहीं, हानिकारक भी होते हैं। स्वाद-स्वाद में भोजन की मात्रा बढ़ने से पेट खराब तथा असंख्य रोग हो जाते हैं।

समय संयम में शिथिलता रहने से मनुष्य निश्चित रूप से आलसी और प्रमादी बनता है। नियमितता न रहने से जो किया जाता है, वह आधा-अधूरा रहता है। समय का सदुपयोग, सुनियोजित श्रम से ही किया जा सकता है। आलस्य का अर्थ है-शारीरिक श्रम से बचना तथा प्रमाद, मानसिक जड़ता का नाम हे। शरीर बलवान होते हुए भी व्यक्ति श्रम से जी चुराए, तो उसे प्रमाद कहा जाता है। हमारे सबसे समीपवर्ती शत्रु आलस्य और प्रमाद ही हैं। जो समय देवता की अवहेलना करते हैं, वे जीवन को निरर्थक बिता कर चलते बनते हैं। समय के असंयमी ही अल्पजीवी कहलाते हैं, भले ही उनकी आयु कुछ भी हो। समय ईश्वर प्रदत्त सम्पदा है। उसे श्रम में मनोयोगपूर्वक नियोजित करके विभिन्न प्रकार की संपदाएँ, विभूतियाँ अर्जित की जा सकती हैं। जो समय गँवाता है, उसे जीवन गँवाने वाला ही समझा जाता है।

समय की तरह ही विचार प्रवार को भी सत्प्रयोजनों में निरत रखा जाए। उत्कृष्ट उपयोगी विचारों को मर्यादा में सीमाबद्ध रखने से वे सृजनात्मक प्रयोजनों में लगते हैं और महत्त्वपूर्ण प्रतिफल उत्पन्न करते हैं। मनोनिग्रह के अभ्यास से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त करते हैं। नित्य विचारों की अनगढ़ता अस्त-व्यस्तता से बचना चाहिए। विचारों को सुनियोजित कर लक्ष्य विशेष से जोड़कर लौकिक व आत्मिक जगत में लाभान्वित होना चाहिए। व्यक्ति जो भी कार्य करता है, वह विचारों की परिणति है। ‘‘जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही करता है।’’ इस उक्ति को सदैव स्मरण रखना चाहिए। विचारों को आवारा कुत्तों की तरह अचिंत्य चिंतन में भटकने न देने का नित्य अभ्यास करना चाहिए। विचारों को हर समय उपयोगी दिशाधारा के साथ नियोजित करके रखना चाहिए। अनगढ़, अनुपयुक्त, निरर्थक विचारों से जूझने के लिए सद्विचारों की सेना को पहले से ही तैयार रखना चाहिए। अचिंत्य चिंतन उठते ही जूझ पड़ें और उन्हें निरस्त करके भगा दें। चिड़िया घर में बड़ा होता है, उसमें पशु-पक्षियों का घूमने-फिरने की आजादी होती है, पर बाहर जाने नहीं दिया जाता, ठीक यही नीति विचार वैभव के बारे में भी बरती जाए, उन्हें जहाँ-तहाँ बिखरने न दिया जाए।

परिश्रम एवं मनोयोग का प्रत्यक्ष फल धन है। भौतिक एवं आत्मिक दोनों क्षेत्रों में व्यक्ति को अपव्यय की छूट नहीं है। पैसा चाहे अपना हो या पराया, मेहनत से कमाया गया हो या मुफ्त में मिला हो, उसे हर हालत में जीवनोपयोगी, समाजोपयोगी सामर्थ्य मानना चाहिए। श्रम, समय एवं मनोयोग मात्र सत्प्रयोजनों हेतु ही व्यय करना चाहिए। श्रम, समय एवं मनोयोग तीन संपदाएँ भगवत् प्रदत्त हैं। अतः धन को काल देवता एवं श्रम देवता का सम्मिलित अनुदान मानना चाहिए। जैसी दूरदर्शिता समय और विचार के अपव्यय के लिए बरतने की है, वैसी ही धन पर भी लागू होती है। बचाया धन परमार्थ में ही लगाना ठीक रहता है। बुद्धिमानी इसी में है कि जितना भी कमाया जाए, उसका अनावश्यक संचय अथवा अपव्यय न हो। जो कमाए हुए धन का सदाशयता में उपयोग नहीं करता, वह घर में दुष्प्रवृत्तियों को आमंत्रित करता है। लक्ष्मी उसी घर में फलती-फूलती है, जहाँ उसका सदुपयोग होता है। आडम्बरयुक्त विवाह, प्रदर्शन, फैशन परस्ती में अनावश्यक खर्च करने से उपार्जन का सही उपयोग नहीं होता। यहीं से सामाजिक अपराधों को बढ़ावा मिलता है। पारिवारिक कलह, मुकदमेबाजी आदि भी इन्हीं कारणों से उपजती है। समुद्र संचय नहीं करता, मेघ बनकर बरस जाता है, तो बदले में नदियाँ दूना जल लेकर लौटती हैं। यदि वह भी कृपण हो, संचय करने लगता, तो नदियाँ सूख जातीं, अकाल छा जाता और यदि अत्यधिक उदार हो घनघोर बरसने लगता तो अतिवृष्टि की विभीषिका आ जाती। अतः समन्वित नीति ही ठीक है। ध्यान रखना चाहिए कि जो उपार्जन से बचाया जाए, उसे उचित प्रयोजन में नियोजित कर दें। कमाने में न अनीति बरती जाए और न उपेक्षा। खर्च करने में सज्जनता एवं सत्परिणामों की जाँच पड़ताल रखी जाए अन्यथा संपन्नता, दरिद्रता से भी अधिक घातक सिद्ध होती है। इससे समाज में दूषित परंपराएँ पनपती है। धन के लक्ष्मी कहते हैं। सत्प्रयोजन में लगे तो लक्ष्मी, अपव्यय किया जाए, अनीति से कमाया या खर्च किया जाए तो वह माया है। माया का नाश सदैव हुआ है।

संयम पर न टिक पाने का कारण उसका स्वरूप न समझ पाना है। स्वरूप न समझ पाने से व्यक्ति उसी तरह फँस जाते हैं, जैसे अंधेरी रात में मार्ग में भरे पानी को सूखी जमीन समझकर व्यक्ति उसमें पैर फँसा देता है। स्वरूप एवं महत्त्व समझना कठिन नहीं है, परंतु उसके लिए मनुष्य को पूरा प्रयास तथा नित्य प्रति अभ्यास करना होगा। स्वरूप और महत्त्व समझने के लिए आवश्यक उद्योग न कर पाना भी असंयम की वृत्ति की ही प्रतिक्रिया है। अतः जो संयम का लाभ लेना चाहें वे उसका स्वरूप और महत्त्व समझें। संयम काँप एक पक्ष जहाँ अनावश्यक अपव्यय को रोकना है, वहाँ दूसरी हो उसे सृजनात्मक कार्यों हेतु नियोजित करना भी है। सामर्थ्य तभी श्रेयस्कर परिणाम उत्पन्न करती है, जब उसे अस्त-व्यस्तता एवं अनुपयुक्तता से बचाकर सृजनात्मक सत्प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाए।

सप्तर्षियों की बैठक होने वाली थी। उससे पूर्व ही वेदव्यास को महाभारत लिखकर देना था। समय कम था, तो भी उन्होंने गणेश जी की मदद ली और महाभारत लिखना प्रारंभ कर दिया। महाभारत समय से पूर्व ही लिख गया। अंतिम श्लोक लिखाते व्यास जी ने कहा-गणेश आश्चर्य है कि पूरा महाभारत लिख गया और इस बीच आप एक शब्द भी नहीं बोले। गणेश जी ने कहा-भगवन् इस संयम के कारण ही हम लोग वर्षों का कार्य कुछ ही दिन में संपन्न करने में समर्थ हुए हैं। बातों में समय नष्ट करने से काम में विलंब होता है। अपने काम में दत्तचित्त एवं शांत होकर लगे रहना चाहिए।

5—अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

सामाजिक न्याय का सिद्धांत ऐसा अकाट्य तथ्य है कि इसकी एक क्षण के लिए भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। एक वर्ग के साथ अन्याय होगा तो दूसरा वर्ग कभी भी शांतिपूर्वक जीवनयापन न कर सकेगा। सामाजिक न्याय, अधिकारों का उपयोग दूसरों की भाँति ही कर सकें, ऐसी स्थिति पैदा किए बिना हमारा समाज शोषण-मुक्त नहीं हो सकता। सौ हाथों से कमाओ भले ही, पर उसे हजार हाथों से दान अवश्य कर दो अर्थात् अगणित बुराइयों को जन्म देने वाली संग्रह-वृत्ति को पनपने न दो।

कोई व्यक्ति अपने पास सामान्य लोगों की अपेक्षा अत्यधिक धन तभी संग्रह कर सकता है जब उसमें कंजूसी, खुदगर्जी, अनुदारता और निष्ठुरता की भावना आवश्यकता से अधिक मात्रा में भरी हुई हो। जबकि दूसरे लोग भारी कठिनाइयों के बीच अत्यंत कुत्सित और अभावग्रस्तता जीवनयापन कर रहे हैं, उनके बच्चे शिक्षा और चिकित्सा तक से वंचित हो रहे हों, जब उनकी आवश्यकताओं की ओर से जो आँखें बंद किए रहेगा, किसी को कुछ भी न देना चाहेगा, देगा तो राई-रत्ती को देकर पहाड़-सा यश लूटने को ही अवसर मिलेगा तो कुछ देगा, ऐसा व्यक्ति ही धनी बन सकता है। सामाजिक न्याय का तकाजा यह है कि हर व्यक्ति उत्पादन तो भरपूर करे, पर उस उपार्जन के लाभ में दूसरों को भी सम्मिलित रखे। सब लोग मिल-जुलकर खाएँ, जिएँ और जीन दें। दुःख और सुख सब लोग मिल-बाँट कर भोगे। यह दोनों ही भार यदि एक के कंधे पर आ पड़ते हैं, तो वह दब कर चकनाचूर हो जाता है, पर यदि सब लोग इन्हें आपस में बाँट लेते हैं तो किसी पर भार नहीं पड़ता, सबका चित्त हलका रहता है और समाज में विषमता का विष भी उत्पन्न नहीं हो पाते।

जिस प्रकार आर्थिक समता का सिद्धांत सनातन और शाश्वत है उसी प्रकार सामाजिक समता का मानवीय अधिकारों की समता का आदर्श भी अपरिहार्य है। इसको चुनौती नहीं दे सकते। किसी जाति, वंश या कुल में जन्म लेने के कारण किसी मनुष्य के अधिकार कम नहीं हो सकते और न ऊँचे माने जा सकते हैं। छोटे या बड़े होने की, नीच या ऊँच होने की कसौटी गुण, कर्म, स्वभाव ही हो सकते हैं। अपनी व्यक्तिगत विशेषताओं के कारण किसी का न्यूनाधिक मान हो सकता है, पर इसलिए कोई कदापि बड़ा या छोटा नहीं माना जा सकता कि उसने अमुक कुल में जन्म लिया है। इस प्रकार की अविवेकपूर्ण मान्यताएँ जहाँ भी चल रही हैं, वहाँ कुछ लोगों का अहंकार और कुछ लोगों का दैन्य भाव ही कारण हो सकता है। अब उठती हुई दुनियाँ इस प्रकार के कूड़े-कबाड़ा जैसे विचारों को तेजी से हटाती चली जा रही है।

स्त्रियों के बारे में पुरुषों ने जो ऐसी मान्यता बना रखी है कि शरीर में भिन्नता रहने मात्र से नर और नारी में से किसी की हीनता या महत्ता मानी जाए, वह ठीक नहीं। यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि हम समाज के अभिन्न अंग हैं। जिस प्रकार एक शरीर से संबंधित सभी अवयवों का स्वार्थ परस्पर संबद्ध है, उसी प्रकार सारी मानव जाति एक ही नाव में बैठी हुई है। पृथकता की भावना रखने वालो, भिन्न स्वार्थों, भिन्न आदर्शों और भिन्न मान्यताओं वाले लोग कहीं बहुत बड़ी संख्या में अधिक इकट्ठे हो जाएँ तो वे एक राष्ट्र, एक समाज, एक जाति नहीं बन सकते। एकता के आदर्शों में जुड़े हुए और उस आदर्श के लिए सब कुछ निछावर कर देने की भावना वाले व्यक्तियों का समूह ही समाज या राष्ट्र है। शक्ति को स्रोत इसी एकानुभूति में है। यह शक्ति बनाए रखने के लिए हर व्यक्ति स्वयं को विराट् पुरुष का एक अंग, राष्ट्रीय मशीन का एक प्रामाणिक पुर्जा मानकर चले, सबके संयुक्त हित पर आस्था रखे, यह आवश्यक है। हमारी सर्वांगीण प्रगति का आधार यही भावना बन सकती है।

सबके हित में अपना हित सन्निहित होने की बात जब कही जाती है तो लोग यह भी तर्क देते हैं कि अपने व्यक्तिगत हित में भी सबका हित साधना चाहिए। यदि यह सच है तो हम अपने हित की बात ही क्यों न सोचें? यहाँ हमें सुख और हित का अंतर समझना होगा। सुख केवल हमारी मान्यता और अभ्यास के अनुसार अनुभव होता है, जबकि हित शाश्वत सिद्धांतों से जुड़ा होता है। हम देर तक सोते रहने में, कुछ भी खाते रहने में सुख का अनुभव तो कर सकते हैं, किंतु हित तो जल्दी उठने, परिश्रमी एवं संयमी बनने से ही सधेगा। अस्तु व्यक्तिगत सुख को गौण तथा सार्वजनिक हित को प्रधान मानने का निर्देश सत्संकल्प में रखा गया है।

व्यक्तिगत स्वार्थ को सामूहिक स्वार्थ के लिए उत्सर्ग कर देने का नाम ही पुण्य, परमार्थ है, इसी को देशभक्ति, त्याग, बलिदान, महानता आदि नामों से पुकारते हैं। इसी नीति को अपनाकर मनुष्य महापुरुष बनता है, लोकहित की भूमिका संपादन करता है और अपने देश, समाज का मुख उज्ज्वल करता है। मुक्ति और स्वर्ग का रास्ता भी यही है। आत्मा की शांति और सद्गति भी उसी पर निर्भर है। इसके विपरीत दूसरा रास्ता यह है जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए, सारे समाज का अहित करने के लिए मनुष्य कटिबद्ध हो जाता है। दूसरे चाहे जितनी आपत्ति में फँस जाएँ, चाहे जितनी हानि और पीड़ा उठाएँ, पर अपने लिए किसी की कुछ परवाह न की जाए। अपराधी मनोवृत्ति इसी को कहते हैं। आत्म-हनन का, आत्म-पतन का मार्ग यही है। इसी पर चाहते हुए व्यक्ति नारकीय यंत्रणा से भरे हुए सर्वनाश के गर्त में गिरता है।

इसलिए अपनी सद्गति एवं समाज की प्रगति का मार्ग समझकर, व्यक्तिगत सुख-स्वार्थ की अंधी दौड़ बंद करके व्यापक हितों की साधना प्रारंभ करनी चाहिए। अपनी श्रेयानुभूति को क्रमशः सुखों, स्वार्थों से हटाकर व्यापक हितों की ओर मोड़ना ही हमारे लिए श्रेयस्कर है।

भगवान ने मनुष्य को इतनी सारी सुविधाएँ, विशेषताएँ, इसलिए नहीं दी हैं कि वह उनसे स्वयं ही मौज-मजा करे और अपनी काम-वासनाओं की आग को भड़काने और उसे बुझाने के गोरखधंधे में लगा रहे। यदि मौज-मजा करने के लिए ही ईश्वर ने मनुष्य को इतनी सुविधाएँ दी होतीं और अन्य प्राणियों को अकारण इससे वंचित रखा होता तो निश्चय ही वह पक्षपाती ठहरता। अन्य जीवों के साथ अनुदारता और मनुष्य के साथ उदारता बरतने का अन्याय भला वह परमात्मा क्यों करेगा, जो निष्पक्ष, जगत पिता, समदर्शी और न्यायकारी के नाम से प्रसिद्ध है।

युग निर्माण सत्संकल्प में इस अत्यंत आवश्यक कर्तव्य की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है कि मनुष्य का जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए है। शास्त्रों में अपनी कमाई को आप ही खा जाने वाले को चोर माना गया है।

जो मिला है उसे बाँटकर खाना चाहिए। मनुष्य को जो कुछ अन्य प्राणियों के अतिरिक्त मिला हुआ है वह उसका अपना निज का उपार्जन नहीं, वरन् सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के श्रेष्ठ सत्पुरुषों के श्रम एवं त्याग का फल है। यदि ऐसा न हुआ होता तो मनुष्य भी एक दुर्बल वन्य पशु की तरह रीछ-वानरों की तरह अपने दिन काट रहा होता। इस त्याग और उपकार की पुण्य प्रक्रिया का नाम ही धर्म, संस्कृति एवं मानवता है। उसी के आधार पर, प्रगति पथ पर इतना आगे बढ़ जाना संभव हुआ। यदि इस पुण्य प्रक्रिया को तोड़ दिया जाए, मनुष्य केवल अपने मतलब की बात सोचने और उसी में लग रहने की नीति अपनाने लगे, तो निश्चय ही मानवीय संस्कृति नष्ट हो जाएगी और ईश्वरीय आदेश के उल्लंघन के फलस्वरूप जो विकृति उत्पन्न होगी, उससे समस्त विश्व को भारी त्रास सहन करना पड़ेगा। परमार्थ की आधारशिला के रूप में जो परमार्थ मानव जाति की अंतरात्मा बना चला आ रहा है, उसे नष्ट-भ्रष्ट कर डालना, स्वार्थी बनकर जीना निश्चय ही सबसे बड़ी मूर्खता है। इस मूर्खता को अपनाकर हम सर्वतोमुखी आपत्तियों को ही निमंत्रण देते हैं और उलझनों के दलदल में आज की तरह ही दिन-दिन गहरे धँसते चले जाते हैं।

श्रावस्ती में भयंकर अकाल पड़ा। निर्धन लोग भूख मरने लगे। भगवान् बुद्ध ने संपन्न लोगों को बुलाकर कहा-भूख से पीड़ितों को बचाने के लिए कुछ उपाय करना चाहिये। संपन्न व्यक्तियों की कमी नहीं थी, पर कोई कह रहा था-मुझे तो घाटा हो गया, फसल पैदा ही नहीं हुई आदि। उस समय सुप्रिया नामक लड़की खड़ी हुई और बोली-मैं दूँगी, सबको अन्न। लोगों ने कहा-लड़की तू! तू तो भीख माँगकर खाती है, दूसरों को क्या खिलाएगी? सुप्रिया ने कहा-हाँ मैं आज से इन पीड़ितों के लिए घर-घर जाकर भीख माँगकर लाऊँगी, पर किसी को मरने नहीं दूँगी। उसकी बात सुनकर दर्शक स्तब्ध रह गए और सबने उसे धन एवं अन्न देना प्रारंभ कर दिया।


6—मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

परमात्मा ने मनुष्य को अन्य प्राणियों की अपेक्षा विशेष बुद्धि और शक्ति दी है। इस संसार में जितनी भी महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ हैं, उनमें बुद्धि शक्ति ही सर्वोपरि है। मानव जाति की अब तक की इतनी उन्नति के पीछे उसकी बौद्धिक विशेषता का चमत्कार ही सन्निहित है। इतनी बड़ी शक्ति देकर मनुष्य को परमात्मा ने कुछ उत्तरदायित्वों में भी बाँधा है, ताकि दी हुई शक्ति का दुरुपयोग न हो। उत्तरदायित्वों का नाम है-कर्तव्य धर्म।

रेलगाड़ी इंजन में विशेष शक्ति होती है, यह अपने मार्ग से भटक पड़े तो अनर्थ उत्पन्न कर सकता है। इसलिए जमीन पर दो पटरी बिछा दी गई हैं और इंजन को उसी पर चलते रहने की व्यवस्था बनाई गई है। बिजली में बहुत शक्ति रहती है। वह शक्ति इधर-उधर न बिखरे पड़े इसलिए उसका नियंत्रण रखना आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह प्रबंध किया गया है कि बिजली तार में ही होकर प्रवाहित हो और वह तार भी ऊपर से ढका रहे। हर शक्तिशाली तत्त्व पर नियंत्रण आवश्यक होता है। नियंत्रित न रहने देने पर जो शक्तिशाली वस्तुएँ अनर्थ पैदा कर सकती हैं। मनुष्य को यदि परमात्मा ने नियंत्रित न रखा होता, उस पर धर्म कर्तव्यों का उत्तरदायित्व न रखा होता तो निश्चय ही मानव प्राणी इस सृष्टि का सबसे भयंकर सबसे अनर्थकारी प्राणी सिद्ध हुआ होता।

अशक्त या स्वल्प शक्ति वाले पदार्थ या जीव नियंत्रित रह सकते हैं क्योंकि उनके द्वारा बहुत थोड़ी हानि की संभावना रहती है। कीड़े-मकोड़े मक्खी-मच्छर कुत्ता-बिल्ली प्रभृति छोटे जीवों पर कोई बंधन नहीं रहते, पर बैल, घोड़ा, ऊँट, हाथी आदि जानवरों पर नाक की रस्सी (नाथ) लगाम, नकेल अंकुश आदि के द्वारा नियंत्रण रखा जाता है। यदि ऐसा प्रतिबंध न हो तो वह शक्तिशाली जानवर लाभकारी सिद्ध होने की अपेक्षा हानि ही उत्पन्न करेंगे।

अनियंत्रित मनुष्य कितना घातक हो सकता है, इसकी कल्पना मात्र से सिहरन होती है। जिन असुरों, दानवों, दस्युओं, दुरात्माओं के कुकृत्यों से मानव सभ्यता कलंकित होती रहे है, वे शक्ल-सूरत से तो मनुष्य ही थे, पर उन्होंने स्वेच्छाचार अपनाया, मर्यादाओं को तोड़ा, न धर्म का विचार किया, न कर्तव्य का। शक्तियों के मद में जो कुछ उन्हें सूझा, जिसमें लाभ दिखाई दिया, वही करते रहे, फलस्वरूप उनका जीवन सब प्रकार घृणित और निकृष्ट बना रहा। उनके द्वारा असंख्यों का उत्पीड़न होता रहा। असुरता का अर्थ ही उच्छृंखलता है।

मर्यादाओं का उल्लंघन करने की घटनाएँ, दुर्घटनाएँ कहलाती हैं और उनके फलस्वरूप सर्वत्र विक्षोभ भी उत्पन्न होता है। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी सभी अपनी नियत कक्षा और धुरी पर घूमते हैं, एक दूसरे के साथ आकर्षण शक्ति में बँधे रहते हैं और एक नियत व्यवस्था के अनुरूप अपना कार्यक्रम जारी रखते हैं। यदि वे नियत व्यवस्था के अनुरूप अपना कार्यक्रम जारी रखें, तो उसका परिणाम प्रलय ही हो सकता है। यदि ग्रह मार्ग में भटक जाएँगे तो एक दूसरे से टकराकर विनाश की प्रक्रिया उत्पन्न कर देंगे। मनुष्य भी जब अपने कर्तव्य मार्ग से भटकता है तो अपना ही नहीं, दूसरे अनेकों का नाश भी करता है।

परमात्मा ने हर मनुष्य की अंतरात्मा में एक मार्गदर्शन चेतना की प्रतिष्ठा की है, जो उसे हर उचित कर्म करने की प्रेरणा एवं अनुचित करने पर भर्त्सना करती रहती हैं। सदाचरण कर्तव्यपालन के कार्य, धर्म या पुण्य कहलाते हैं, उनके करते ही तत्क्षण करने वाले को प्रसन्नता एवं शांति का अनुभव होता है। इसके विपरीत यदि स्वेच्छाचार बरता गया है, धर्म मर्यादाओं को तोड़ा गया है, स्वार्थ के लिए अनीति का आचरण किया गया है, तो अंतरात्मा में लज्जा, संकोच, पश्चाताप, भय और ग्लानि का भाव उत्पन्न होगा। भीतर ही भीतर अशान्ति रहेगी और ऐसा लगेगा मानो अपना अंतरात्मा ही अपने को धिक्कार रहा है। इस आत्म प्रताडऩा की पीड़ा को भुलाने के लिए अपराधी प्रवृत्ति के लोग नशेबाजी का सहारा लेते हैं। फिर भी चैन कहाँ, पाप वृत्तियाँ जलती हुई अग्नि की तरह हैं। जो पहले वहीं जलन पैदा करती है जहाँ उसे स्थान मिलता है।

आत्म प्रताडऩा सबसे बड़ी मानसिक व्याधि है। जिसका मन अपने दुष्कर्मों के लिए अपने आपको धिक्कारता रहेगा, वह कभी आंतरिक दृष्टि से सशक्त न रह सकेगा। उसे अनेक मानसिक दोष दुर्गुण घेरेंगे और धीरे-धीरे अनेक मनोविकारों से ग्रस्त हो जाएगा।

मर्यादाओं का उल्लंघन करके लोग तात्कालिक थोड़ा लाभ उठाते देखे जाते हैं। दूरगामी परिणामों को न सोचकर लोग तुरंत के लाभ को देखते हैं। बेईमानी से धन कमाने, दंभ से अहंकार बढ़ाने और अनुपयुक्त भोगों के भोगने से जो क्षणिक सुख मिलता है, वह परिणाम में भारी विपत्ति बनकर सामने आता है। मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर डालने और आध्यात्मिक महत्ता एवं विशेषताओं को समाप्त करने में सबसे बड़ा कारण आत्म प्रताडऩा है। ओले पड़ने से जिस प्रकार फसल नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार आत्म प्रताडऩा की चोटें पड़ते रहने से मन और अंतःकरण के सभी श्रेष्ठ तत्त्व नष्ट हो जाते हैं और ऐसा मनुष्य प्रेत-पिशाचों जैसी श्मशान मनोभूमि लेकर निरंतर विक्षुब्ध विचरता रहता है।

धर्म कर्तव्यों की मर्यादा को तोड़ने वाले उच्छृंखल, कुमार्गगामी मनुष्यों को गतिविधियों को रोकने के लिए, उन्हें दंड देने के लिए समाज और शासन की ओर से जो प्रतिरोधात्मक व्यवस्था हुई है, उससे सर्वथा बचे रहना संभव नहीं। धूर्तता के बल पर आज कितने ही अपराधी प्रवृत्ति के लोग सामाजिक भर्त्सना से और कानून दंड से बच निकलने में सफल होते रहते हैं, पर यही चाल सदा सफल होती रहेगी, ऐसी बात नहीं है। असत्य का आवरण अंततः छँटना ही है। जन-मानस में व्याप्त घृणा का सूक्ष्म प्रभाव उस मनुष्य पर अदृश्य रूप से पड़ता है। जिसके अहित परिणाम ही सामने आते हैं। राजदंड से बचे रहने के लिए ऐसे लोग रिश्वत में बहुत खर्च करते हैं, निरंतर डरे और दबे रहते हैं, उनका कोई सच्चा मित्र नहीं रहता। जो लोग उनसे लाभ उठाते हैं, वे भी भीतर ही भीतर घृणा करते हैं और समय आने पर शत्रु बन जाते हैं। जिनकी आत्मा धिक्कारेगी उनके लिए देर-सबेर में सभी कोई धिक्कारने वाले बन जाएँगे। ऐसी धिक्कार एकत्रित करके यदि मनुष्य जीवित रहा हो उसका जीवन न जीने के बराबर है।

नियंत्रण में रहना आवश्यक है। मनुष्य के लिए यही उचित है कि वह ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करे। अपने उत्तरदायित्वों को समझे और कर्तव्यों को निबाहें। नीति, सदाचार और धन का पालन करते हुए सीमित लाभ में संतोष करना पड़ सकता है। गरीबी और सादगी का जीवन बिताना पड़ सकता है, पर उसमें चैन अधिक है। अनीति अपनाकर अधिक धन एकत्रित कर लेना संभव है, पर ऐसा धन अपने साथ इतने उपद्रव लेकर आता है कि उनसे निपटना भारी त्रासदायक सिद्ध होता है। दंभ और अहंकार का प्रदर्शन करके लोगों के ऊपर जो रौब जमाया जाता है, उससे आतंक और कौतूहल हो सकता है, पर श्रद्धा और प्रतिष्ठा का दर्शन भी दुर्लभ रहेगा। विलासिता और वासना का अनुपयुक्त भोग भोगने वाला अपना शारीरिक, मानसिक और सामाजिक संतुलन नष्ट करके खोखला ही बनता जाता है। परलोक और पुनर्जन्म को अंधकारमय बनाकर आत्मा को असंतुष्ट और परमात्मा को अप्रसन्न रखकर क्षणिक सूखों के लिए अनीति का मार्ग अपनाना, किसी भी दृष्टि से दूरदर्शिता पूर्ण नहीं कहा जा सकता।

बुद्धिमत्ता इसी में है कि हम धर्म, कर्तव्य पालन का महत्त्व समझें, सदाचार की मर्यादाओं का उल्लंघन न करें। स्वयं शांतिपूर्वक जिएँ और दूसरों को सुखपूर्वक जीने दें। यह सब नियंत्रण की नीति अपनाने से ही संभव हो सकता है। कर्तव्य और धर्म का अंकुश परमात्मा ने हमारे ऊपर इसीलिए रखा है कि सन्मार्ग में भटकें नहीं। इन नियंत्रणों को तोड़ने की चेष्टा करना अपने और दूसरों के लिए महती विपत्तियों को आमंत्रित करने की मूर्खता करना ही गिना जाएगा।

समाज में स्वस्थ परम्परा कायम रहें, उसी से अपनी और सबकी सुविधा बनी रहेगी। यह ध्यान में रखते हुए हम में से प्रत्येक को अपने नागरिक कर्तव्यों का पालन करने में भावनापूर्वक दत्तचित्त होना चाहिए। समाज सबका है। सब लोग थोड़ा-थोड़ा बिगाड़ करें तो सब मिलाकर बिगाड़ की मात्रा बहुत बड़ी हो जाएगी, किंतु यदि थोड़े-थोड़े प्रयत्न सुधार भी बहुत हो सकता है। उचित यही है कि हम सब मिलकर अपने समाज को सुधारने, संचालित करने और स्वस्थ परम्पराएँ प्रचलित करने का प्रयत्न करें और सभ्य, सुविकसित लोगों की तरह भौतिक एवं आत्मिक प्रगति कर सुख-संतोष प्राप्त कर सकें।

दूसरों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी सुविधा और स्वतंत्रता को स्वेच्छापूर्वक सीमित करना, सभ्य देश के सभ्य नागरिकों का कर्तव्य है। स्वच्छता को ही लीजिए, कहीं भी नाक, थूक साफ करना, पान-तम्बाकू की पीक डाल देना, अपने लिए कुछ दूर जाने का कष्ट भले ही बचाए, पर दूसरों को घृणा, असुविधा होगी और यदि अपने को कोई रोग है तो उसका आक्रमण उस गंदगी में आने-जाने वाले पर होगा। भले ही कोई रोके नहीं, पर हमारा नागरिक कर्तव्य है कि दूसरों की असुविधा को ध्यान में रखते हुए स्वयं उस गंदगी को डालने के योग्य उपयुक्त स्थान तक जाकर उसे साफ करें। बीड़ी-सिगरेट हम पीते हैं तो ध्यान रखें कि अस्वच्छ धुँआ छोड़ने से पास में बैठे हुए दूसरे लोगों की तबियत खराब तो नहीं होती, स्वयं ही पता लगाएँ कि किसी को असुविधा तो नहीं होती। यदि हमारी उस क्रिया से दूसरों को तकलीफ होती है, तो सभ्यता का तकाजा यही है कि कहीं अन्यत्र जाकर बीड़ी पिए और धुँआ छोड़ें। सबसे आग्रह यह है कि इस बुरी आदत को छोड़ ही दें।

घरों की गन्दगी लोग अक्सर गली या सड़क पर डाल देते हैं, उससे रास्ता निकलने वालों को असुविधा है और सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता अस्त-व्यस्त होती है। उचित यही है कि घरों में कूड़ेदान रखें और जब सफाई कर्मचारी आए, तब उसे उठवा दें। अशोभनीय अस्वच्छता से उस गली में रहने वाले तथा निकलने वालों को कष्ट न पहुँचाएँ। सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता और व्यवस्था नष्ट करना यह बताता है कि इन घिनौने व्यक्तियों को मनुष्यता के आरंभिक कर्तव्य नागरिकता तक का ही ज्ञान नहीं है।

मुसाफिरखाने, धर्मशाला, पाक्र, नदी-किनारे सिनेमाघर आदि सबके काम में आने वाले स्थानों में लोग जहाँ-तहाँ रद्दी कागज, दोने, पत्ते, सिगरेट के खोखे, मूँगफली के छिलके आदि पटकते रहते हैं और देखते-देखते ये स्थान गंदगी से भर जाते हैं। रेलगाड़ियों के डिब्बे में जहाँ हर आदमी को घिचपिच बैठना पड़ता है, ऐसी गंदगी बहुत अखरती है। संडासों में मलमूत्र का विसर्जन गलत स्थानों पर करने से वहाँ की स्थिति ऐसी हो जाती है कि दूसरों को उसका उपयोग करना कठिन पड़ता है। जबकि कितने ही मुसाफिर खड़े चल रहे हैं, तब कुछ लोग बिस्तर बिछाए, टाँग लम्बी किए लेटे रहते हैं और उठाने पर झगड़ते हैं। इन लोगों को मनुष्यता की आरंभिक शिक्षा सीखनी ही चाहिए कि सार्वजनिक उपयोग के स्थान या वस्तुओं का उतना ही उपयोग करें जितना कि अपना हक है। सामान्य डिब्बे बैठने भर के लिए हैं। खाली हो तो कोई लेट भी सकता है, पर जबकि अनेक मुसाफिर खड़े या लटकते चल रहे हैं और चंद लोग लेटने को ऐसा आनंद उठाएँ, जिसे प्राप्त करने का हक उन्हें नहीं है तो उसे ढीठता या पशुता ही कहा जाएगा।

केले, नारंगी आदि के छिलके लोग यों ही फेंकते रहते हैं और आए दिन दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। कितने ही लोग गाय पालते हैं और दूध दुहकर उन्हें आवारा यह समझकर छोड़ देते हैं कि किसी की चीज खाकर अपना पेट भर लाएगी और हमें दूध देगी। गौ माता के प्रति प्रचलित श्रद्धा के आधार पर कोई उसे मारेगा नहीं और अपना काम बन जाएगा। इस तरह वह गाय लोगों की वस्तुएँ खाकर, बिखेर कर, दूसरों का रोज नुकसान करती और पिटती, कुटती रहती है। इस तरह दूसरों को कष्ट देने तथा स्वयं लाभ उठाने को क्या कहा जाए? स्वयं कीर्तन करने का मन है तो अपने घर में पूजा के उपयुक्त मंद स्वर में प्रसन्नतापूर्वक करें, पर लाउडस्पीकर लगाकर रात भर धमाल मचाने और पड़ोस के बीमारों, परीक्षार्थियों तथा अन्य लोगों की नींद नष्ट करने वाली ईश्वरभक्ति से भी पहिले हमें अपनी नागरिक मर्यादाओं और जिम्मेदारियों को समझना चाहिए। जिसका अर्थ है कि दूसरों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी इच्छा को स्वेच्छापूर्वक सीमाबद्ध करना।

वचन का पालन और ईमानदारी का व्यवहार मनुष्य का प्राथमिक एवं नैतिक कर्तव्य है। जिस समय पर जिससे मिलने का, कोई वस्तु देने, काम पूरा करने का वचन दिया है, उस सच को ठीक समय पर पूरा करने का ध्यान रखना चाहिए ताकि दूसरों को असुविधा का सामना न करना पड़े। यदि हम दर्जी या मोची हैं तो उचित हे कि वायदे के समय पर उसे देने का शक्ति भर प्रयत्न करें। बार-बार तकाजे करने और निराश वापिस लौटने में जो समय खर्च होता है और असुविधा होती है उसे देखते हुए ऐसे दर्जी, धोबी अपनी प्राप्त मजदूरी से ग्राहक का चौगुना-दस गुना नुकसान कर देते हैं। भाषण करना है तो हमें ठीक समय पर पहुँचना और नियमित समय में ही पूरा करना चाहिए। समय का ध्यान न रखना, सुनने वालों के साथ बेइन्साफी है। दावत जिस समय की रखी है, उसी समय आरंभ कर देनी चाहिए। मेहमानों को घंटों प्रतीक्षा में बिठाए रहना, एक प्रकार से उनका समय बर्बाद करना है। जिसे धन की बर्बादी के समान ही हानिकारक समझा जाना चाहिए।

वस्तु का मूल्य और स्वरूप जो बताया गया है वही वस्तुतः होना चाहिए। असली में नकली की मिलावट कर देना, दामों में घिसा-पिटी करके कमीवेशी करना, व्यापार करने वालों के लिए सर्वथा अशोभनीय है। घिस-घिस कर कमी करना लिए सर्वथा अशोभनीय है। घिस-घिस कर कमी करना अपनी विश्वसनीयता तथा प्रामाणिकता पर कलंक लगाना है। असली और नकली वस्तुएँ अलग-अलग बेची जाएँ और उनके दाम वैसे ही महँगे, सस्ते स्पष्ट किए जाएँ तो व्यापारी की साख बढ़ेगी और ग्राहकों का समय बचेगा तथा संतोष होगा। ईमानदारी घाटे का सौदा नहीं है। वह प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता की परीक्षा भर चाहती है। इस कसौटी पर सही होना हर व्यवसायी का नागरिक कर्तव्य है। यह कर्तव्य पालन व्यक्ति का सम्मान भी बढ़ाता है और व्यवसाय भी।

दूसरों की असुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी सुविधा को सीमाबद्ध रखना, शिष्टता और सभ्यता भरा मधुर व्यवहार करना, मीठे वचन बोलना, वचन का पालन करना, प्रामाणिकता और विश्वस्तता की रीति-नीति अपनाना, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को हम में से प्रत्येक को सीखना और पूरा करना ही चाहिए। चाहिए ताकि समाज में शिष्ट नागरिकों की तरह हम ठीक तरह से जी सकें और दूसरों को जीने दे सकें।


7—समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

सुसंस्कारिता के लिए चार आधारों को प्रमुख माना गया है—(1) समझदारी, (२) ईमानदारी, (३) जिम्मेदारी, (४) बहादुरी। इन्हें आध्यात्मिक-आंतरिक वरिष्ठता की दृष्टि में उतना ही महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए जितना कि शरीर के लिए अन्न, जल, वस्त्र और निवास को अनिवार्य समझा जाता है।

समझदारी का तात्पर्य है-दूरदर्शी विवेकशीलता का अपनाया जाना। आमतौर से लोग तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मानते हैं और उसके लिए अनाचार भी अपना लेते हैं। इससे भविष्य अंधकारमय बनता है और व्यक्तित्व का स्तर एक प्रकार से हेय ही बन जाता है। अदूरदर्शिता तुर्त-फुर्त अधिक सुविधा सम्पादन के लिए लालायित रहती है और इस उतावली में ऐसे काम करने में भी नहीं झिझकती, जिनकी भावी परिणति बुरे किस्म की हो सकती है। मूर्ख चिड़ियाँ और मछलियाँ इसी दुर्बुद्धि के कारण तनिक से प्रलोभन में अपनी जिंदगी देती देखी गई हैं। चटोरे व्यक्ति इसी ललक में अपनी स्वास्थ्य संपदा को तहस-नहस कर लेते हैं। यौनाचार में अतिवाद बरतने वाले लोग, जवानी में ही बूढ़े खोखले होकर अकाल मृत्यु के मुँह में चले जाते हैं। अपराधी तत्त्वों में से अधिकांश लोग इसी मनोवृत्ति के होते हैं। पढ़ने का समय आवारागर्दी में गुजार देने वाले व्यक्ति जवानी में ही दर-दर की ठोकरें खाते हैं। नशेबाजी भी इसी मूर्खता को अपना कर धीमी आत्म हत्या करने में बेधड़क लगे रहते हैं। ऐसी नासमझी के रहते आज का, अभी का लाभ ही सब कुछ दीख पड़ता है और भविष्य की संभावनाओं की संदर्भ में सोचने तक की फुर्सत नहीं मिलती।

दूरदर्शिता, विवेकशीलता, उस अनुभवी किसान की गतिविधियों जैसी हैं, जिनके अनुसार खेत जोतने, बीज बोने खाद-पानी देने, रखवाली करने में आरंभिक हानि उठाने और कष्ट सहने को शिरोधार्य किया जाता है। दूरदर्शिता उसे बताती है कि इसका प्रतिफल उसे समयानुसार मिलने ही वाला है। एक बीज के दाने के बदले सौ दाने उगने ही वाले हैं और समय पर उस प्रयास के प्रतिफल कोठे भरे धन धान्य के रूप में मिलने ही वाले हैं। संयम और सत्कार्य ऐसे ही बुद्धिमत्ता है। पुण्य परमार्थ में भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाली संभावनाएँ सन्निहित है। संयम का प्रतिफल वैभव और पौरुष के रूप में दृष्टिगत होने वाली है। दूरबीन के सहारे दूर तक की वस्तुओं को देखा जा सकता है। और उस जानकारी के आधार पर अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णय लिया जा सकता है। अध्यात्म की भाषा में इसी को तृतीय नेत्र खुलना भी कहते हैं, जिसके आधार पर विपत्तियों से बचना और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं का सृजन संभव हो सकता है।

सुसंस्कारिता का दूसरा चिह्न है-ईमानदारी कथनी और करनी को एक-सा रखना ईमानदारी है। आदान-प्रदान में प्रामाणिकता को इसी सिद्धांत के सहारे अक्षुण्ण रखा जाता है। विश्वसनीयता इसी आधार पर बनती है। सहयोग और सद्भाव अर्जित करने के लिए ईमानदारी ही प्रमुख आधार है। इसे अपने व्यवसाय में अपनाकर कितनों ने छोटी स्थिति से उठकर बड़े बनने में सफलता पाई है। बड़े उत्तरदायित्वों को उपलब्ध करने और उसका निर्वाह करने में ईमानदार ही सफल होते हैं। इस सद्गुण को सुसंस्कारिता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष माना गया है। उसे अपनाने वाले ईमानदारी और परिश्रम की कमाई से ही अपना काम चला लेते हैं। उनकी गरीबी भी ऐसी शानदार होती है, जिस पर अमीरी के भंडार को निछावर किया जा सके।

सुसंस्कारिता का तीसरा पक्ष है-जिम्मेदारी मनुष्य अनेकानेक जिम्मेदारियों से बँधा हुआ है। यों गैर जिम्मेदार लोग कुछ भी कर गुजरते हैं, किसी भी दिशा में चल पड़ते हैं। अपने किन्हीं भी उत्तरदायित्वों से निर्लज्जतापूर्वक इंकार कर सकते हैं, पर जिम्मेदार लोगों को ही अपने अनेक उत्तरदायित्वों का सही रीति से, सही समय पर निर्वाह करना पड़ता है। स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की, जीवन सम्पदा का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की, लोक परलोक को उत्कृष्ट बनाने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी जो निभाना चाहते हैं, वे ही संतोष, यश और आरोग्य का लाभ प्राप्त कर सकते हैं। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ समझने वाले आश्रितों को स्वावलम्बी, सद्गुणी बनाने में निरत रहते हैं और संतान बढ़ाने के अवसर आने पर फूँक-फूँ क कर कदम रखते हैं। हजार बार सोचते-समझते हैं और विचार करते हैं कि अभ्यागत को बुलाने के लिए उपयुक्त सामग्री, आश्रितों और असमर्थों के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने में संकीर्ण स्वार्थपरता उन्हें बाधा नहीं डालती।

पेट और प्रजनन तक ही मनुष्य की सीमा नहीं है। धर्म और संस्कृति के प्रति, विश्व मानवता के प्रति, मनुष्य के सामाजिक एवं सार्वभौम उत्तरदायित्व जुड़े हैं, यहाँ तक कि अन्य प्राणियों एवं वनस्पतियों के प्रति भी। उन सभी के संबंध में दायित्वों एवं कर्तव्यों के निर्वाह की चिंता हर किसी को रहनी चाहिए। यह कार्य तभी संभव है, जब अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता पर अंकुश लगाया जाए। औसत व्यावहारिक स्तर का निर्वाह स्वेच्छापूर्वक स्वीकार किया जाए। यह लोभ, मोह, अहंकार का, वासना, तृष्णा और संकीर्ण स्वार्थपरता का घटाटोप ऊपर छाया होगा, तो फिर नासमझ बच्चों का मन, न तो उस स्तर का सोचेगा और न सयानों से लोकमंगल के लिए कुछ निकालते बन पड़ेगा। आवश्यकताएँ तो कोई थोड़े श्रम, समय में पूरी कर सकता है, पर वैभव जन्य भौतिक महत्त्वाकाँक्षाएँ तो ऐसी हैं जिन्हें पूरी कर सकना रावण, हिरण्यकश्यपु, सिकंदर आदि तक के लिए संभव नहीं हुआ, फिर सामान्य स्तर के लोगों की तो बात ही क्या है? वे हविश की जलती चिताओं वाली कशमकश में आजीवन विचरण करते रहते हैं। भूत-पलीत की तरह डरते-डराते समय गुजारते और अन्ततः असंतोष तथा पाप की चट्टानों ही सिर पसर लादकर विदा होते हैं। जिन्हें मानव जन्म के साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारियाँ निबाहनी हों, उनके लिए करने को तो बहुत कुछ पड़ा है, पर वह सब बन तभी पड़ेगा जब निजी जीवन में संतोष और सत्प्रवृत्ति संवर्धन जैसे लोकमंगल के कार्यों के लिए समुचित उत्साह अंतःकरण में उमंगता हो। जिम्मेदारियाँ निबाहने का, सुसंस्कारिता के लक्ष्य तक पहुँचने वाला यही राजमार्ग है।

सुसंस्कारिता का चौथा चरण है-बहादुरी दैनिक जीवन में अनेकानेक उलझनें आती रहती हैं। उन सबसे निपटने के लिए आवश्यक साहस होना आवश्यक है, अन्यथा हड़बड़ी में समाधान का कोई सही उपाय तक नहीं सूझ पड़ेगा। आगे बढ़ने और ऊँचा उठने की प्रतिस्पर्द्धाओं में सम्मिलित होना पड़ता है। गुण, कर्म, स्वभाव की गहराई तक घुसे, जन्म जन्मान्तरों के कुसंस्कारों से भी, निरंतर वह महाभारत लड़ने का कृत्य करना पड़ता है, जिसमें गीताकार ने अर्जुन को प्रशंसा एवं भर्त्सना की नीति अपनाते हुए प्रवृत्त होने के लिए उद्धत किया है। अपने को निखारने, उबारने और उछालने के लिए अदम्य साहस का सहारा लिए बिना कोई मार्ग नहीं। समाज में अवांछनीय तत्त्वों की, अंधविश्वासों, कुप्रचलनों और अनाचारों की कमी नहीं है।

उनके साथ समझौता संभव नहीं, जो चल रहा है, उसे चलने देना सहन नहीं हो सकता। उसके विरुद्ध असहयोग, विरोध की नीति अपनाए बिना और कोई चारा नहीं। इसके लिए सज्जन प्रकृति के लोगों को संगठित भी तो करना होता है। यह सभी बहादुरी के चिह्न है, इन्हें भी सुसंस्कारिता का महत्त्वपूर्ण अंग माना गया है।

सभ्यता के सर्वतोमुखी क्षेत्र को प्रकाशित करने के लिए जागरूकता, पराक्रम, प्रयत्न अपनाए जाने की आवश्यकता है, वहीं सुसंस्कारिता को भी बढ़ाने और अपनाने के लिए, भरपूर प्रयत्न करते रहने की भी अनिवार्य आवश्यकता है।

श्री चिमनलाल शीतलवाड़ बंबई की किसी फर्म में काम करते थे। एक मामले में बचने के लिए एक आदमी उनके पास आया और एक लाख रुपए की रिश्वत देने लगा, पर श्री शीतलवाड़ ने उसे अस्वीकार कर दिया। उस व्यक्ति ने कहा-समझ लीजिए, इतनी बड़ी रकम कोई देगा नहीं। श्री शीतलवाड़ हँसे और बोले-देने वाले तो बहुत होंगे, पर इंकार करने वाला मुझ जैसा ही मिलेगा। यही शीतलवाड़ एक दिन बंबई विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए।


8—चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।

किसके भीतर क्या है, इसका परिचय उसके व्यवहार से जाना जा सकता है। जो शराब पीकर और लहसुन खाकर आया होगा, उसके मुख से बदबू आ रही होगी। इसी प्रकार जिसके भीतर दुर्भावनाएँ, अहंकार और दुष्टता का ओछापन भरा होगा, वह दूसरों के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार करेगा। उसकी वाणी से कर्कशता और असभ्यता टपकेगी। दूसरे से इस तरह बोलेगा जिससे उसे नीचा दिखाने, चिढ़ाने, तिरस्कृत करने और मूर्ख सिद्ध करने का भाव टपके। ऐसे लोग किसी पर अपने बड़प्पन की छाप छोड़ सकते, उलटे घृणास्पद और द्वेषभाजन बनते चले जाते हैं। कटुवचन मर्मभेदी होते हैं, वे जिस पद छोड़ें जाते हैं, उसे तिलमिला देते हैं और सदा के लिए शत्रु बना लेते हैं। कटुभाषी निरंतर अपने शत्रुओं की संख्या बढ़ाता और मित्रों की घटाता चला जाता है।

दूसरों के साथ असज्जनता और अशिष्टता का बरताव करके कई लोग सोचते हैं, इससे उनके बड़प्पन की छाप पड़ेगी, पर होता बिलकुल उल्टा है। तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करने वाला व्यक्ति घमंडी और ओछा समझा जाता है। किसी के मन में उसके प्रति आदर नहीं रह जाता। उद्धत स्वभाव के व्यक्ति अपना दोष आप भले ही न समझें, दूसरे लोग उन्हें उथला, हल्का मानते हैं और उदासीनता, उपेक्षा का व्यवहार करते हैं। समय पड़ने पर ऐसा व्यक्ति किसी को अपना सच्चा मित्र नहीं बना पाता और आड़े वक्त कोई उसके काम नहीं आता। सच तो यह है कि मुसीबत के वक्त वे सब लोग प्रसन्न होते हैं, जिनको कभी तिरस्कार सहना पड़ा था। ऐसे अवसर पर वे बदला लेने और कठिनाई बढ़ाने की ही बात सोचते हैं।

हमें संसार में रहना है तो सही व्यवहार करना भी सीखना चाहिए। सेवा-सहायता करना तो आगे की बात है, पर इतनी सज्जनता तो हर व्यक्ति में होनी चाहिए कि जिससे वास्ता पड़े उससे नम्रता, सद्भावना के साथ मीठे वचन बोलें, थोड़ी-सी देर तक कभी किसी से मिलने का अवसर आए, तब शिष्टाचार बरतें। इसमें न तो पैसा व्यय होता है, न समय। जितने समय में कटुवचन बोले जाते हैं, अभद्र व्यवहार किया जाता है, उससे कम समय में मीठे वचन और शिष्ट तरीके से भी व्यवहार किया जा सकता है। उद्धत स्वभाव दूसरों पर बुरी छाप छोड़ता है और उसका परिणाम कभी-कभी बुरा ही निकलता है। अकारण अपने शत्रु बढ़ाने चलना, बुद्धिमानी की बात नहीं। इस प्रकार के स्वभाव का व्यक्ति अंततः घाटे में रहता है।

जब हम किसी से मिलें या हमसे कोई मिले, तो प्रसन्नता व्यक्त की जानी चाहिए। मुस्कराते हुए अभिवादन करना चाहिए और बिठाने-बैठने कुशल समाचार पूछने और साधारण शिष्टाचार बरतने के बाद आने का कारण पूछना, बताना चाहिए । यदि सहयोग किया जा सकता हो तो वैसा करना चाहिए अन्यथा अपने परिस्थितियाँ स्पष्ट करते हुए सहयोग न कर सकने का दुःख व्यक्त करना चाहिए। इसी प्रकार यदि दूसरा कोई सहयोग नहीं कर सका है तो भी उसका समय लेने और सहानुभूतिपूर्ण शब्दों में ही देना चाहिए। रूखा, कर्कश, उपेक्षापूर्ण अथवा झल्लाहट, तिरस्कार भरा उत्तर देना ढीठ और गँवार को भी शोभा देता है। हमें अपने को इस पंक्ति में खड़ा नहीं करना चाहिए।

बड़े जो व्यवहार करेंगे, बच्चे वैसा ही अनुकरण सीखेंगे। यदि हमें अपने बच्चों को अशिष्ट, उद्दंड बनाना हो तो ही हमें असभ्य व्यवहार की आदत बनाए रहनी चाहिए अन्यथा औचित्य इसी में है कि आवेश, उत्तेजना, उबल पड़ना, क्रोध में तमतमा जाना, अशिष्ट वचन बोलना और असत्य व्यवहार करने का दोष अपने अंदर यदि स्वल्प मात्रा में हो तो भी उसे हटाने के लिए सख्ती के साथ अपने स्वभाव के साथ संघर्ष करें और तभी चैन लें, जब अपने में सज्जनता की प्रवृत्ति का समुचित समावेश हो जाए।

हम अपनी और दूसरों की दृष्टि में सज्जनता और शालीनता से परिपूर्ण एक श्रेष्ठ मनुष्य की तरह अपना आचरण और व्यक्तित्व बना सकें तो समझना चाहिए कि मनुष्यता की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए। उसके आगे के कदम नैतिकता, सेवा, उदारता, संयम, सदाचार, पुण्य, परमार्थ के हैं। इसमें भी पहली एक अति आवश्यक शर्त यह है कि हम सज्जनता की सामान्य परिभाषा समझें और अपनाएँ, जिसके अंतर्गत मधुर भाषण और विनम्र, शिष्ट एवं मृदु व्यवहार अनिवार्य हो जाता है। अस्वच्छता मनुष्य की आंतरिक और गई-गुजरी स्थिति का परिचय देती है। गंदा आदमी यह प्रकट करता है कि उसे अवांछनीयता हटाने और उत्कृष्टता बनाए रखने में कोई रुचि नहीं है। लापरवाह, आलसी और प्रमादी ही गंदे देखे गए हैं जो अवांछनीयता से समझौता करके उसे गले से लगाए रह सकता है, वही गंदा भी रह सकता है। गंदगी देखने में सबको बुरी लगती है और उस व्यक्ति के प्रति सहज ही घृणा भाव उत्पन्न करती है। गंदे को कौन अपने समीप बिठाना चाहेगा? दुर्गंध से किसे अपनी नाक, मलीनता से किसे अपनी आँखें और हेय प्रवृत्ति को देखकर कौन मनोदशा क्षुब्ध करना चाहेगा।

गंदगी स्वास्थ्य की दृष्टि से अतीव हानिकारक है। उसे बीमारी का संदेशवाहक कह सकते हैं। जहाँ गंदगी रहेगी वहाँ बीमारी जरूर पहुँचेगी। गंदगी से बीमारी को बहुत प्यार है। फूलों को तलाश करती हुई तितली जिस प्रकार फूल पर जा पहुँचती है, उसी तरह जहाँ गंदगी फल-फूल रही होगी वहाँ बीमारी भी खोज, तलाश करती हुई जरूर पहुँच जाएगी। बीमारी भी गंदगी पैदा करती है यह ठीक है, पर यह निश्चित है कि जो गंदे हैं वे स्वस्थ न रह सकेंगे। मनुष्य की मूल प्रकृति गंदगी के विरुद्ध है, इसलिए किसी व्यक्ति या पदार्थ को गंदा देखते हैं तो अनायास ही घृणा उत्पन्न होती है, वहाँ से दूर हटने का जी करता है। अस्तु जिन्हें मनुष्यता का ज्ञान है, उन्हें गंदगी हटाने का स्वभाव अपनी प्रकृति में अनिवार्यतः जोड़ देना चाहिए।

हर हालत में हर व्यक्ति को स्वच्छता के लिए स्नान आवश्यक मानना चाहिए। चेचक जैसे रोगों में मजबूरी उत्पन्न हो जाए तो बात दूसरी है, नहीं तो बीमारों को भी चिकित्सक के परामर्श से स्वच्छता का कोई न कोई रास्ता जरूर निकालते रहना चाहिए।

मुँह की सफाई बहुत ध्यान देने योग्य है। जीभ पर मैल की एक पर्त जमने लगती है और दाँतों की झिरी में अन्न के कण छिपे रहकर सड़न पैदा करते हैं। सबेरे कुल्ला करते समय दाँतों को भली प्रकार साफ करना चाहिए। जितने बार कुछ खाया जाए उतने ही बार कुल्ला करना चाहिए और रात को सोते समय तो जरूर ही मुँह की सफाई कर लेनी चाहिए। इससे दाँत अधिक दिन टिकेंगे, मुँह में बदबू न आएगी और लोगों को पास बैठने पर दूर हटने की आवश्यकता न पड़ेगी।

कपड़े जो शरीर को छूते हैं, उन्हें विशेष ध्यान देकर साबुन से रोज धोना चाहिए। बनियान, अंडरवियर, धोती, पायजामा आदि पसीना सोखते रहते हैं और रोज साबुन तथा धूप की अपेक्षा करते हैं। कोट जैसे कपड़े जिनका पसीने से सम्पर्क नहीं होता, नित्य धोने से छूट पा सकते हैं। भारी बिस्तरों को धोना तो कठिन पड़ेगा, पर शरीर छूने वाली चादरें जल्दी-जल्दी बदलते रहना चाहिए और बिस्तर को कड़ी धूप में हर रोज सुखाना चाहिए।

घर के बर्तन इस तरह नहीं रहने चाहिए जिन पर चूहे और छिपकली पेशाब करें और उस जहर से अप्रत्यक्ष बीमारियाँ शरीरों में घुस पड़ें। खुले हुए वाद्य पदार्थों में कीड़े-मकोड़े घुसते हैं। इसलिए हर खाने में काम आने वाली वस्तु दबी-ढकी रहनी चाहिए। कपड़े, बर्तन, फर्नीचर, किताबें, जूते तथा अन्य सामान यथास्थान रखा हो तो ही सुंदर लगेगा अन्यथा बिखरी हुई अस्त-व्यस्त चीजें कूड़े और गंदगी की ही शक्ल धारण कर लेती हैं, भले ही वे कितनी ही मूल्यवान क्यों न हों। जिस वस्तु को झाड़ते-पोंछते न रहा जाएगा, वह धूल की पर्त जमा होने तथा लगातार ऋतु प्रभाव सहते रहने से मैली, पुरानी हो जाएगी। हर चीज सफाई, मरम्मत और व्यवस्था चाहती है। घर का हर पदार्थ हम से यही आशा करता है कि उसे स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखा जाए। जिन्हें स्वच्छता से सच्चा प्रेम है, वे शरीर का शृंगार करके ही न बैठ जाएँगे वरन् जहाँ रहेंगे वहाँ हर पदार्थ की शोभा, स्वच्छता एवं सुसज्जा का ध्यान रखेंगे। मकान की टूट-फूट और लिपाई-पुताई का, किवाड़ों की रंगाई का ध्यान रखा जाएगा तो उसमें बहुत पैसा खर्च नहीं होता। थोड़ा-थोड़ा समय बचाकर घर के लोग मिल-जुलकर यह सब सहज ही एक मनोरंजन की तरह करते रह सकते हैं और घर परिवार में शरीर और बच्चों में मानवोचित स्वच्छता का दर्शन हो सकता है। कलाकारिता, स्वच्छता से आरंभ होती है। अवांछनीयता को अस्वीकार करने की प्रवृत्ति का अभिवर्धन शरीर से आरंभ होकर वस्त्रों तक और मन से लेकर व्यवहार तक की स्वच्छता तक विकसित होता चला जाता है और इस अच्छी आदत के सहारे परम सौंदर्य से भरे हुए इस विश्व में भगवान की प्रकाशवान कलाकारिता को देखकर आनंद विभोर रहता हुआ पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।

अपने यहाँ मल-मूत्र संबंधी गंदगी के लोग बुरी तरह अभ्यस्त हो गए हैं। पुराने ढंग के पाखानों में फिनायल, चूना आदि न पड़ने से उनमें भारी दुर्गंध आती है। बच्चों को नालियों पर, गलियों में टट्टी कराके रास्ते दुर्गंध पूर्ण एवं जी मिचलाने वाले बना दिए जाते हैं। घरों के आगे लोग कूड़े का ढेर लगा देते हैं। पेशाब ऐसे स्थानों पर करते रहते हैं, जहाँ सार्वजनिक आवागमन रहता है। सफाई कर्मी के भरोसे सब कुछ निर्भर रहता है। यह नहीं सोचते कि मल-मूत्र आखिर है तो हमारे ही शरीर का, उसकी स्वच्छता के लिए कुछ काम स्वयं भी करें और सफाई कर्मी के काम में सहयोग देकर स्वच्छता बनाए रखने का अपना कर्तव्य निबाहें। देहातों में तो और भी बुरी दशा का वातावरण, गंदगी, दुर्गंध और अस्वास्थ्यकर, घृणास्पद दृश्यों से भरा रहता है। कूड़े और गोबर के ढेर जहाँ-तहाँ लगे रहते हैं और उसकी सड़न सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न करती रहती है। इस दिशा में विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। सोखता पेशाब घर, सोखता नालियाँ तथा गड्ढे खोद कर लकड़ी के शौचालय बहुत सस्ते में तथा बड़ी आसानी से बनाए जा सकते हैं। गाँव में पानी का लोटा साथ ले जाने की तरह यदि खुरपी भी लोग साथ ले जाया करें और छोटा गड्ढा खोदकर उसमें शौच जाने के उपरांत गड्ढे को ढक दिया करें, तो जमीन को खाद भी मिले और गंदगी के कारण उत्पन्न होने वाली शारीरिक, मानसिक और सामाजिक अवांछनीयता भी उत्पन्न न हो।

स्वच्छता मानव जीवन की सुरुचि का प्रथम गुण है। हमें अपने शरीर, वस्त्र, उपकरण एवं निवास की स्वच्छता को ऐसा प्रबंध करना चाहिए जिससे अपने को संतोष और दूसरों को आनंद मिले। निर्मलता, निरोगिता, निश्चिंतता और निर्लिप्तता के आधार पर उत्पन्न की गई आत्मा की पवित्रता हमें ईश्वर से मिलाने का पथ प्रशस्त करती है। स्वच्छता को हम अनिवार्य मानें और अस्वच्छता का निष्कासन निरंतर करते रहें, यही हमारे लिए उचित है।

अच्छा हो हम समझदारी और सज्जनता से भरा हुआ, सादगी का जीवन जिएँ। अपनी बाह्य सुसज्जा वाले परिवार की तथा समाज की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करने में लगाने लगें। सादगी सज्जनता का प्रतिनिधित्व करती है। जिसका वेश-विन्यास सादगीपूर्ण है, उसे अधिक प्रामाणिक एवं विश्वस्त माना जा सकता है। जो जितना ही उद्धतपन दिखाएगा, समझदारों की दृष्टि में उतनी ही इज्जत गिरा लेगा। इसलिए उचित यही है कि हम अपने वस्त्र सादा रखें, उनकी सिलाई भले-मानसों जैसी कराएँ, जेवर न लटकाए नाखून और होठ न रंगे, बालों को इस तरह से न सजाए जिससे दूसरों को दिखाने का उपक्रम करना पड़े। नर-नारी के बीच मानसिक व्यभिचार का बहुत कुछ सृजन इस फैशन-परस्ती में होता है।

सादगी, शालीनता और सज्जनता का सृजन करती है। उसके पीछे गंभीरता और प्रामाणिकता, विवेकशीलता और बौद्धिक परिपक्वता झाँकती है। वस्तुतः इसी में इज्जत के सूत्र सन्निहित हैं। सादगी घोषणा करती है कि यह व्यक्ति दूसरों को आकर्षित या प्रभावित करने की चालबाजी नहीं, अपनी वास्तविकता विदित कराने में संतुष्ट है। यही ईमानदारी और सच्चाई की राह है। यह आमदनी बढ़ाने का भी एक तरीका है। फिजूलखर्ची रोकना अर्थात् आमदनी बढ़ाना। समय आ गया है कि इस बाल बुद्धि को छोड़कर प्रौढ़ता का दृष्टिकोण अपनाया जाए। हम गरीब देश की निवासी हैं। सर्वसाधारण को सामान्य सुसज्जा और परिमित खर्च में काम चलाना पड़ता है। अपनी वस्तु स्थिति यही है कि अपने करोड़ों भाई-बहनों की पंक्ति में ही हमें खड़े होना चाहिए और उन्हीं की तरह रहन-सहन का तरीका अपनाना चाहिए। इस समझदारी में ही इज्जत पाने के सूत्र सन्निहित हैं। फैशन परस्ती और अपव्यय की राह अपनाकर हम आर्थिक संकट को ही निमंत्रित करते हैं।

स्वच्छता के साथ जुड़ी हुई सादगी अपने आप में एक उत्कृष्ट स्तर का फैशन है। उसमें गरीबी का नहीं महानता का पुट है। सादा वेशभूषा और सुसज्जा वाला व्यक्ति अपनी स्वतंत्र प्रतिभा और स्वतंत्र चिंतन का परिचय देता है। भेड़-चाल को छोड़कर जो विवेकशीलता का रास्ता अपनाता है, वह बहादुर है। सादगी हमें फिजूलखर्ची से बचाकर आर्थिक स्थिरता में ही समर्थ नहीं करती वरन् हमारी चारित्रिक दृढ़ता भी प्रमाणित करती है। अकारण उत्पन्न होने वाले ईर्ष्या और लांछन से बचने का भी यही सरल मार्ग है।

डॉ० महेन्द्रनाथ सरकार अपनी कार से कहीं जा रहे थे। मार्ग में परमहंस स्वामी श्री रामकृष्ण का आश्रम पड़ता था। जब वे पास से निकले तो एक व्यक्ति को शांत चित्त बैठे देखा। उन्होंने समझा कि माली है, सो उससे फूल तोड़कर लाने को कहा। उस व्यक्ति ने बड़ी प्रसन्नता के साथ फूल तोड़कर दे दिए। डॉ० महेन्द्रनाथ चले गए। दूसरे दिन वे परमहंस से मिलने गए, तो देखकर अवाक् रह गए कि जिस व्यक्ति ने उन्हें बिना किसी अभिमान के आदरपूर्वक फूल दिए थे, वह माली नहीं, स्वयं रामकृष्ण परमहंस ही थे।

9—अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।

लोगों की दृष्टि में सफलता का ही मूल्य है। जो सफल हों गया, उसी की प्रशंसा की जाती है। देखने वाले यह नहीं देखते कि सफलता नीतिपूर्वक प्राप्त की हो या अनीतिपूर्वक। झूठे, बेईमान, दगाबाज, चोर, लुटेरे भी बहुत धन कमा सकते हैं। किसी चालाकी से कोई बड़ा पद या गौरव भी प्राप्त कर सकते हैं। आप लोग तो केवल उस कमाई और विभूति मात्र को ही देखकर उसकी प्रशंसा करने लगते हैं और समर्थन भी, पर सोचना चाहिए कि क्या यह तरीका उचित है? सफलता की अपेक्षा नीति श्रेष्ठ है। यदि नीति पर चलते हुए परिस्थितिवश असफलता मिली है तो वह भी कम गौरव की बात नहीं है। नीति का स्थायी महत्त्व है, सफलता का अस्थाई। सफलता न मिलने से भौतिक जीवन के उत्कर्ष में थोड़ी असुविधा रह सकती है, पर नीति त्याग देने पर तो लोक, परलोक, आत्म-संतोष चरित्र, धर्म, कर्तव्य और लोकहित सभी कुछ नष्ट हो जाता है। ईसामसीह ने क्रूस पर चढ़कर पराजय स्वीकार की, पर नीति का परित्याग नहीं किया। शिवाजी, राणा प्रताप, बंदा वैरागी, गुरु गोविन्द सिंह, लक्ष्मीबाई, सुभाषचंद्र बोस आदि को पराजय का ही मुँह देखना पड़ा, पर उनकी वह पराजय भी विजय से अधिक महत्त्वपूर्ण थी। धर्म और सदाचार पर दृढ़ रहने वाले सफलता में नहीं कर्तव्य पालन में प्रसन्नता अनुभव करते हैं और इसी दृढ़ता को स्थिर रख सकने को एक बड़ी भारी सफलता मानते हैं। अनीति और असफलता में से यदि एक को चुनना पड़े तो असफलता को ही पसंद करना चाहिए, अनीति को नहीं। जल्दी सफलता प्राप्त करने के लोभ में अनीति के मार्ग पर चल पड़ना ऐसी बड़ी भूल है जिसके लिए सदा पश्चाताप ही करना पड़ता है।

वास्तव में नीतिमार्ग छोड़कर किसी मानवोचित सदुद्देश्य की पूर्ति की नहीं जा सकती। मनुष्यता खोकर पाई सफलता कम से कम मनुष्य कहलाने में गौरव अनुभव करने वाले के लिए प्रसन्नता की बात नहीं है। यदि कोई व्यक्ति ऊपर से नीचे जल्दी पहुँचने की उतावली में सीधा कूदकर हाथ-पैर तोड़ ले तो कोई उसे जल्दी पहुँचने में सफल हुआ नहीं कहना चाहेगा। इससे तो थोड़ा देर में पहुँचना अच्छा। मानवोचित नैतिक स्तर गँवाकर किसी एक विषय में सफलता की लालसा उपरोक्त प्रसंग जैसी विडम्बना ही है। हर विचारशील को इससे सावधान रहकर, नीतिमार्ग को अपनाए रहकर मनुष्यता के अनुरूप वास्तविक सफलता अर्जित करने का प्रयास करना चाहिए।

पौधे की जड़ में पानी मिलता जाएगा तो वह बढ़ता ही चलेगा। अनीति का पोषण होता रहा तो वह दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती रहेगी। अन्याययुक्त आचरण करने वालों को प्रोत्साहन उनसे मिलता है, जो इसे सहन करते हैं। उत्पीड़ित चुपचाप सब कुछ सह लेता है, यह समझकर अत्याचारी की हिम्मत दूनी-चौगुनी हो जाती है और वह अपना मार्ग निष्कंटक समझकर और भी अधिक उत्साह से अनाचरण करने पर उतारू हो जाता है। अन्याय सहना-अपने जैसे अन्य, असंख्य को उसी तरह का उत्पीड़न सहने के लिए परिस्थितियाँ पैदा करना है। अनीति सहना प्रत्यक्षतः आततायी को प्रोत्साहन देना है

दूसरों को अनीति से पीड़ित होते देखकर कितने ही लोग सोचते हैं कि जिस पर बीतेगी वह भुगतेगा। हम क्यों व्यर्थ का झंझट मोल लें। एक सताया जाता रहता है-पड़ोसी चुपचाप देखता रहता है। दुष्ट लोग हमें भी न सताने लगें, यह सोचकर वे आँखें फेर लेते हैं और उद्दंडों को उद्दंडता बरतते रहने का निर्बाध अवसर मिलता रहता है। चार गुंडे सौ आदमियों की भीड़ में घुसकर सरे बाजार एक-दो को चाकुओं से गोद सकते हैं। सारी भीड़ तमाशा देखेगी, आँखें फेरेगी या भाग खड़ी होगी। कहीं हम भी चपेट में न आ जाएँ, इस भय से कोई उन चार दुष्टों को रोकने या पकड़ने का साहस न करेगा। इस जातीय दुर्बलता को समझते हुए ही आए दिन दुस्साहसिक अपराधों की, चोरी, हत्या, लूट, कत्ल, बलात्कार आदि की घटनाएँ घटित होती रहती हैं। जानकार, संबंधित और जिन्हें सब कुछ मालूम है, वे गवाही तक देने नहीं जाते और आतंकवादी अदालतों से भी छूट जाते हैं और दूने-चौगुने जोश से फिर जन-साधारण को आतंकित करते हैं। एक-एक करके विशाल जन-समूह थोड़े से उद्दंडों द्वारा सताया जाता रहता है। लोग भयभीत, आतंकित, पीड़ित रहते हैं, पर कुछ कर नहीं पाते। मन ही मन कुड़कुड़ाते रहते हैं। विशाल जन-समूह ‘निरीह’ कहलाए और थोड़े से दुष्ट-दुराचारी निर्भय होकर संत्रस्त, आतंकित करते रहें, यह किसी देश की जनता के लिए सामाजिकता के लिए भारी कलंक-कालिमा है। इससे उस वर्ग की कायरता, नपुंसकता, भीरुता, निर्जीवता ही सिद्ध होती है। ऐसा वर्ग पुरुष कहलाने का अधिकारी नहीं। पुरुषार्थ करने वाले को, साहस और शौर्य रखने वाले को पुरुष कहते हैं। जो अनीति का प्रतिरोध नहीं कर सकता, उसे नपुंसक, निर्जीव और अर्द्धमृत भी कहना चाहिए। यह स्थिति हमारे लिए अतीव लज्जाप्रद है।

हम एक-एक करके सताए जाते हैं, इसका एक ही कारण है कि सामूहिक प्रतिरोध की क्षमता खो गई। उसे जगाया जाना चाहिए। आज जो एक पर बीत रही है, वह कल अपने पर भी बीत सकती है। दूसरे पर होने वाले अत्याचार का प्रतिरोध हम न करेंगे तो हमारी सहायता के लिए क्यों आएगा? यह सोचकर व्यक्तिगत सुरक्षा की इस चपेट में अपने को भी चोट लगे, आर्थिक तथा दूसरे प्रकार की क्षति उठानी पड़े तो भी इसे मनुष्यता के उत्तरदायित्व का मूल्य समझकर चुकाना चाहिए। इसे सहन करना ही चाहिए। शूरवीरों को आघात सहने का ही पुरस्कार मिलता है और वे इसी आधार पर लोक-श्रद्धा के अधिकारी बनते हैं।

लोक-श्रद्धा के अधिकारी तीन ही हैं-१ संत, (२) सुधारक, (३) शहीद। जिन्होंने अपने आचरणों, विचारों और भावनाओं में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता का समावेश कर रखा है, वे संत हैं। विपन्न परिस्थितियों को बदलकर जो सुव्यवस्था उत्पन्न करने में संलग्न हैं-अनौचित्य के स्थान पर औचित्य की प्रतिष्ठापना कर रहे हैं, वे सुधारक हैं। अन्याय से जूझने में जिन्होंने आघात सहे और बर्बादी हो हँसते हुए शिरोधार्य किया है, वे शहीद हैं। ऐसे महामानवों के प्रति मनुष्यता सदा कृतज्ञ रही है और इतिहास उनका सदा अभिनंदन करता रहा है। भले ही आपत्ति सहनी पड़े, पर इस गौरव से गौरवान्वित हो सकता हो, उसे अपने को धन्य ही मानना चाहिए। अनीति का सामूहिक प्रतिरोध करने की प्रवृत्ति हमें जन-मानस में जाग्रत करनी चाहिए और जिन्होंने इस संदर्भ में कुछ कष्ट सहा हो, शौर्य दिखाया हो, त्याग किया हो, उनका भाव भरा सार्वजनिक अभिनंदन किया जाना चाहिए, ताकि वैसा प्रोत्साहन दूसरों को भी मिले और जन-जीवन में अनीति से लड़ने की उमंग उठ पड़े।

हमें कई बार ऐसी बात मानने और ऐसे काम करने के लिए विवश किया जाता है, जिन्हें स्वीकार करने को अपनी आत्मा नहीं कहती, फिर भी हम दबाव में आ जाते हैं और इंकार नहीं कर पाते। इच्छा न होते हुए भी उस दबाव में आकर वह करने लगते हैं, जो न करना चाहिए। ऐसे दबावों में मित्रों या बुजुर्गों का निर्देश इतने आग्रहपूर्वक सामने आता है कि गुण-दोष का ध्यान रखने वाला असमंजस में पड़ जाता है। क्या करें, क्या न करें? कुछ सूझ नहीं पड़ता। कमजोर प्रकृति के मनुष्य प्रायः ऐसे अवसरों पर ‘ना’ नहीं कह पाते और इच्छा न रहते हुए भी वैसा करने लगते हैं। इस बुरी स्थिति में साहसपूर्वक इनकार कर देना चाहिए। जिसे हम बुरा समझते हैं, उसे स्वीकार न करना सत्याग्रह है और यह किसी भी प्रियजन, संबंधी या बुजुर्ग के साथ किया जा सकता है। इसमें अनुचित या अधर्म रत्तीभर नहीं है। इतिहास में ऐसे उदाहरण पग-पग पर भरे पड़े हैं। प्रह्लाद, भरत, विभीषण, बलि आदि की अवज्ञा प्रख्यात है। अर्जुन को गुरुजनों से लड़ना पड़ा था। मीरा ने पति का कहना नहीं माना था। मोहग्रस्त अभिभावक अपने बच्चों को अनेक तरह के कुकृत्य करने के लिए विवश करते हैं। बेईमानी का धंधा करने वाले बुजुर्ग अपने बच्चों से भी वही कराते हैं। अपनी मूढ़ता और रूढ़िवादिता की रीति-नीति अपनाने के लिए भी दबाते हैं, न मानने पर नाराज होते हैं, अवज्ञा का आरोप लगाते हैं, ऐसी दशा में किंकर्तव्यविमूढ़ होने की जरूरत नहीं है। आदर्श यही रहना चाहिए कि केवल औचित्य को ही स्वीकार किया जाएगा, चाहे वह किसी के पक्ष में जाता हो। अनौचित्य करे ही हालत में अस्वीकार किया जाएगा, चाहे किसी ने भी उसके लिए कितना ही दबाव क्यों न डाला हो। आज की सामाजिक कुरीतियों के अंधानुकरण में पुरानी पीढ़ी ही अग्रणी है। बच्चों का जल्दी विवाह कर उन्हें स्वास्थ्य तथा शिक्षा से वंचित करना, उनका मिथ्या मोह मात्र है। नम्रतापूर्वक ऐसे अवसरों पर अपनी हठ, असहमति व्यक्त की जा सकती है। दृढ़तापूर्वक स्पष्ट शब्दों में यह कह दिया जाए कि हमें किसी भी शर्त पर खर्चीला विवाहोन्माद स्वीकार नहीं। जब करना होगा तो बिना दहेज, जेवर तथा बिना धूमधाम का विवाह ही करेंगे। देखने भर में यह अवज्ञा है, पर वस्तुतः इसमें हर किसी का केवल हित साधन ही सन्निहित है। इसलिए बुरा लगने पर भी कड़वी दवा की तरह यह अवज्ञा सबके लिए श्रेयस्कर है। अतएव उसे किसी प्रकार अनुचित अथवा अधर्म नहीं कहा जा सकता।

दोस्ती के नाम पर लोग सिगरेट, शराब, जुआ, सिनेमा आदि के कुमार्ग पर घसीटना चाहते हैं। ऐसे अवसरों पर भी अपनी सहमति को स्पष्ट और कड़े शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं। दोस्ती का मतलब मित्र को कुमार्ग से छुड़ाना है। पथ-भ्रष्ट करने के लिए घसीट ले जाना नहीं। इसी प्रकार कर्ज माँगने वाले, भीख के लिए अड़ने वाले, अनीति का विरोध न करके चुप रहने का आग्रह करने वाले लोग आए दिन सामने आते रहते हैं और चतुरतापूर्वक अपने तर्क तथा प्रतिभा का ऐसा प्रयोग करते हैं कि अनिच्छा होने पर भी उनके प्रभाव में आकर वैसा ही करने को विवश होते हैं। ऐसे अवसरों पर हमारा साहस इतना प्रखर होना चाहिए कि नम्र किंतु स्पष्ट शब्दों में इनकार कर सकें। इनकार, असहयोग, विरोध और संघर्ष इन चार शस्त्रों से हम अनीति और विवेक का सामना कर सकते हैं। सत्य और न्याय के लिए इन शस्त्रों का प्रयोग हमें साहसी शूरवीर योद्धा की तरह करते भी रहना चाहिए।

अकबर ने राणा प्रताप को संदेश भेजा कि यदि आप हमसे शत्रुता छोड़ दें और संधि कर लें, तो आपको जंगल-जंगल भटकना न पड़े। आप जो भी राज्य चाहें, हम दे सकते हैं।

अकबर के प्रलोभन को ठुकराते हुए महाराणा प्रताप ने लिखा-अपने धर्म और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए जंगल-जंगल भटकना तो क्या प्राण भी देना पड़े तो भी स्वीकार है, पर किसी प्रलोभन के आगे झुकना स्वीकार नहीं।

10—मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी, उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।

मनुष्य की श्रेष्ठता की कसौटी यह होना चाहिए कि उसके द्वारा मानवीय उच्च मूल्यों का निर्वाह कितना हो सका, उनको कितना प्रोत्साहन दे सका। योग्यताएँ, विभूतियाँ तो साधन मात्र हैं। लाठी एवं चाकू स्वयं न तो प्रशंसनीय हैं, न निंदनीय। उनका प्रयोग पीड़ा पहुँचाने के लिए हुआ या प्राण रक्षा के लिए? इसी आधार पर उनकी भर्त्सना या प्रशंसा की जा सकती है। मनुष्य की विभूतियाँ एवं योग्यताएँ भी ऐसे ही साधन हैं। उनका उपयोग कहाँ होता है, इसका पता उसके विचारों एवं कार्यों से लगता है। वे यदि सद् हैं तो वह साधन भी सद् हैं, पर यदि वे असद् हैं तो वह साधन भी असद् कहे जाएँगे। मनुष्यता का गौरव एवं सम्मान इन जड़-साधनों से नहीं, उसके प्राणरूप सद्विचारों एवं सत्प्रवृत्तियों से जोड़ा जाना चाहिए। उसी आधार पर सम्मान देने, प्राप्त करने की परम्परा बनाई जानी चाहिए।

जिस कार्य से प्रतिष्ठा बढ़ती है, प्रशंसा होती है, उसी काम को करने के लिए, उसी मार्ग पर चलने के लिए लोगों को प्रोत्साहन मिलता है। हम प्रशंसा और निंदा करने में, सम्मान और तिरस्कार करने में थोड़ी सावधानी बरतें, तो लोगों को कुमार्ग पर न चलने और सत्पथ अपनाने में बहुत हद तक प्रेरणा दे सकते हैं। आमतौर से उनकी प्रशंसा की जाती है, जिन्होंने सफलता, योग्यता, सम्पदा एवं विभूति एकत्रित कर ली है। चमत्कार को नमस्कार किया जाता है। यह तरीका गलत है। विभूतियों को लोग केवल अपनी सुख-सुविधा के लिए ही एकत्रित नहीं करते वरन् प्रतिष्ठा प्राप्त करना भी उद्देश्य होता है। जब धन-वैभव वालों को ही समाज में प्रतिष्ठा मिलती है, तो मान का भूखा मनुष्य किसी भी कीमत पर उसे प्राप्त करने के लिए आतुर हो उठता है। अनीति और अपराधों की बढ़ोत्तरी का एक प्रमुख कारण यह है कि अंधी जनता सफलता की प्रशंसा करती है और हर असफलता को तिरस्कार की दृष्टि से देखती है। धन के प्रति, धनी के प्रति आदर बुद्धि तभी रहनी चाहिए जब वह नीति और सदाचारपूर्वक कमाया गया हो, यदि अधर्म और अनीति से उपार्जित धन द्वारा धनी बने हुए व्यक्ति के प्रति हम आदर दृष्टि रखते हैं तो इससे उस प्रकार के अपराध करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन ही मिलता है और इस दृष्टि से अपराध वृद्धि को प्रोत्साहन ही मिलता है और इस दृष्टि से अपराध वृद्धि में हम स्वयं भी भागीदार बनते हैं।

दूसरों को सन्मार्ग पर चलाने का, कुमार्ग की ओर प्रोत्साहित करने का एक बहुत बड़ा साधन हमारे पास मौजूद है, वह है आदर और अनादर। जिस प्रकार वोट देना एक छोटी घटना मात्र है, पर उसका परिणाम दूरगामी होता है उसी प्रकार आदर के प्रकटीकरण का भी दूरगामी परिणाम संभव है। थोड़े से वोट चुनाव संतुलन को इधर से उधर कर सकते हैं और उस चुने हुए व्यक्ति का व्यक्तित्व किसी महत्त्वपूर्ण स्थान पर पहुँचकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में अप्रत्याशित भूमिका संपन्न कर सकता है। थोड़े से वोट व्यापक क्षेत्र में अपना प्रभाव दिखा सकते हैं और अनहोनी संभावनाएँ साकार बना सकते हैं, उसी प्रकार हमारी आदर बुद्धि यदि विवेकपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करे तो कितने ही कुमार्ग पर बढ़ते हुए कदम रुक सकते हैं और कितने ही सन्मार्ग की ओर चलते हुए झिझकने वाले पथिक प्रेरणा और प्रोत्साहन पाकर उस दिशा में तत्परतापूर्वक अग्रसर हो सकते हैं।

जिन लोगों ने बाधाओं को सहते हुए भी अपने जीवन में कुछ आदर्श उपस्थित किए हैं, उनका सार्वजनिक सम्मान होना चाहिए, उनकी प्रशंसा मुक्तकंठ से की जानी चाहिए और जो लोग निंदनीय मार्गों द्वारा उन्नति कर रहे हैं, उनकी प्रशंसा एवं सहायता किसी भी रूप में नहीं करनी चाहिए। अवांछनीय कार्यों में सम्मिलित होना भी एक प्रकार से उन्हें प्रोत्साहन देना ही है क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषों की उपस्थिति मात्र से लोग कार्य में उनका समर्थन मान लेते हैं और फिर स्वयं भी उनका सहयोग करने लगते हैं। इस प्रकार अनुचित कार्यों में हमारा प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन अंततः उन्हें बढ़ाने वाला ही सिद्ध होता है।

हमें मनुष्य का मूल्यांकन उसकी सफलताओं एवं विभूतियों से नहीं वरन् उस नीति और गतिविधि के आधार पर करना चाहिए, जिसके आधार पर वह सफलता प्राप्त की गई। बेईमानी से करोड़पति बना व्यक्ति भी हमारी दृष्टि में तिरस्कृत होना चाहिए और वह असफल और गरीब व्यक्ति जिसने विपन्न परिस्थितियों में भी जीवन के उच्च आदर्शों की रक्षा की, उसे प्रशंसा, प्रतिष्ठा, सम्मान और सहयोग सभी कुछ प्रदान किया जाना चाहिए। यह याद रखने की बात है कि जब तक जनता का, निंदा-प्रशंसा का, आदर-तिरस्कार का मापदण्ड न बदलेगा, तब तक अपराधी मूँछों पर ताव देकर अपनी सफलता पर गर्व करते हुए दिन-दिन अधिक उच्छृंखलता होते चलेंगे और सदाचार के कारण सीमित सफलता या असफलता प्राप्त करने वाले खिन्न और निराश रहकर सत्पथ से विचलित होने लगेंगे। युग-निर्माण सत्संकल्प में यह प्रबल प्रेरणा प्रस्तुत की गई है कि हम मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं एवं विभूतियों को नहीं सज्जनता और आदर्शवादिता को ही रखें। पात्रता का विकास ही अनेकानेक विभूतियों और संपदाओं की उपलब्धि का एक मात्र मार्ग है।


11—दूसरों के साथ वह व्यवहार नहीं करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं।

हम चाहते हैं कि दूसरे लोग हमारे साथ सज्जनता का उदार और मधुर व्यवहार करें, जो हमारी प्रगति में सहायक हो और ऐसा कार्य न करें, जिससे प्रसन्नता और सुविधा में किसी प्रकार विघ्न उत्पन्न हो। ठीक ऐसी ही आशा दूसरे लोग भी हम से करते हैं। जब हम ऐसा सोचते हैं कि अपने स्वार्थ की पूर्ति में कोई आँच न आने दी जाए और दूसरों से अनुचित लाभ उठा लें, तो वैसी ही आकांक्षा दूसरे भी हम से क्यों न करेंगे? लेने और देने के दो बाट रखने में ही सारी गड़बड़ी पैदा होती है। यदि यही ठीक है कि हम किसी के सहायक न बनें, किसी के काम न आएँ, किसी से उदारता, नम्रता और क्षमा की रीति-नीति न बरतें तो इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए कि दूसरे लोग हमारे साथ वैसी ही धृष्टता बरतेंगे तो हम अपने मन में कुछ बुरा न मानेंगे।

जब हम रेल में चढ़ते हैं और दूसरे लोग पैर फैलाए बिस्तर जमाए बैठे होते हैं, तो हमें खड़ा रहना पड़ता है। उन लोगों से पैर समेट लेने और हमें भी बैठ जाने देने के लिए कहते हैं तो वे लड़ने लगते हैं। झंझट से बचने के लिए हम खड़े-खड़े अपनी यात्रा पूरी करते हैं और मन ही मन उन जगह घेरे बैठे लोगों की स्वार्थपरता और अनुदारता को कोसते हैं, पर जब हमें जगह मिल जाती हैं और नए यात्रियों के प्रति ठीक वैसे ही निष्ठुर बन जाते हैं, क्या यह दुहरा दृष्टिकोण उचित है? हमारी कन्या विवाह योग्य हो जाती है तो हम चाहते हैं कि लड़के वाले बिना दहेज के सज्जनोचित व्यवहार करते हुए विवाह संबंध स्वीकार करें, दहेज माँगने वालों को बहुत कोसते हैं, पर जब अपना लड़का विवाह योग्य हो जाता है तो हम भी ठीक वैसी ही अनुदारता दिखाते हैं जैसी अपनी लड़की के विवाह-अवसर पर दूसरों ने दिखाई थी। कोई हमारी चोरी, बेईमानी कर लेता है, ठग लेता है तो बुरा लगता है, पर प्रकारांतर से वैसी ही नीति अपने कारोबार में हम भी बरतते हैं और तब उस चतुरता पर प्रसन्न होते और गर्व अनुभव करते हैं। यह दुमुँही नीति बरती जाती रही तो मानव-समाज में सुख-शांति कैसे कायम रह सकेगी?

कोई व्यक्ति अपनी जरूरत के वक्त कुछ उधार हमसे ले जाता है तो हम यही आशा करते हैं कि आड़े वक्त की इस सहायता को सामने वाला व्यक्ति कृतज्ञतापूर्वक याद रखेगा और जल्दी से जल्दी इस उधार को लौटा देगा। यदि वह वापस देते वक्त आँखें बदलता है तो हमें कितना बुरा लगता है। यदि इसी बात को ध्यान में रखा जाए और किसी के उधार को लौटाने की अपनी आकांक्षा के अनुरूप ही ध्यान रखा जाए तो कितना अच्छा हो। हम किसी का उधार आवश्यकता से अधिक एक क्षण भी क्यों रोक कर रखें? हम दूसरों से यह आशा करते हैं कि वे जब भी कुछ कहें या उत्तर दें, नम्र, शिष्ट, मधुर और प्रेम भरी बातों से सहानुभूतिपूर्ण रुख के साथ बोलें। कोई कटुता, रुखाई, निष्ठुरता, उपेक्षा और अशिष्टता के साथ जबाब देता है तो अपने को बहुत दुःख होता है। यदि यह बात मन में समा जाए, तो फिर हमारी वाणी में सदा शिष्टता और मधुरता ही क्यों न घुली रहेगी? अपने कष्ट के समय हमें दूसरों की सहायता विशेष रूप से अपेक्षित होती है। इस बात को ध्यान में जाए, तो फिर हमारी वाणी में सदा शिष्टता और मधुरता ही क्यों न घुली रहेगी? अपने कष्ट के समय हमें दूसरों की सहायता विशेष रूप से अपेक्षित होती है। इस बात को ध्यान में रखा जाए तो जब दूसरे लोग कष्ट में पड़े हों, उन्हें हमारी सहायता की अपेक्षा हो, तब क्या यही उचित है कि हम निष्ठुरता धारण कर लें? अपने बच्चों से हम यह आशा करते हैं कि बुढ़ापे में हमारी सेवा करेंगे, हमारे किए उपकारों का प्रतिफल कृतज्ञतापूर्वक चुकाएँगे, पर अपने बूढ़े माँ-बाप के प्रति हमारा व्यवहार बहुत ही उपेक्षापूर्ण रहता है। इस दुहरी नीति का क्या कभी कोई सत्परिणाम निकल सकता है?

हम चाहते हैं कि हमारी बहू-बेटियों की दूसरे लोग इज्जत करें, उन्हें अपनी बहन-बेटी की निगाह से देखें, फिर यह क्यों कर उचित होगा कि हम दूसरों की बहिन-बेटियों को दुष्टता भरी दृष्टि से देखें? अपने दुःख के समान ही दूसरों का जो दुःख समझेगा वह माँस कैसे ख सकेगा? दूसरों पर अन्याय और अत्याचार कैसे कर सकेगा? किसी की बेईमानी करने, किसी को तिरस्कृत, लांछित और जलील करने की बात कैसे सोचेगा? अपनी छोटी-मोटी भूलों के बारे में हम यही आशा करते हैं कि लोग उन पर बहुत ध्यान न देंगे, ‘क्षमा करो और भूल जाओ’ की नीति अपनाएँगे तो फिर हमें भी उतनी ही उदारता मन में क्यों नहीं रखनी चाहिए और कभी किसी से कोई दुर्व्यवहार अपने साथ बन पड़ा है तो उसे क्यों न भुला देना चाहिए?

अपने साथ हम दूसरों से जिस सज्जनतापूर्ण व्यवहार की आशा करते हैं, उसी प्रकार की नीति हमें दूसरों के साथ अपनानी चाहिए। हो सकता है कि कुछ दुष्ट लोग हमारी सज्जनता के बदले में उसके अनुसार व्यवहार न करें। उदारता का लाभ उठाने वाले और स्वयं निष्ठुरता धारण किए रहने वाले नर-पशुओं की इस दुनिया में कमी नहीं है। उदार और उपकारी पर ही घात चलाने वाले हर जगह भरे हैं। उनकी दुर्गति का अपने को शिकार न बनना पड़े, इसकी सावधानी तो रखनी चाहिए, पर अपने कर्तव्य और सौजन्य को इसलिए नहीं छोड़ देना चाहिए कि उसके लिए सत्पात्र नहीं मिलते। बादल हर जगह वर्षा करते हैं, सूर्य और चंद्रमा हर जगह अपना प्रकाश फैलाते हैं, पृथ्वी हर किसी का भार और मल-मूत्र उठाती है, फिर हमें भी वैसी ही महानता और उदारता का परिचय क्यों नहीं देना चाहिए?

उदारता प्रकृति के लोग कई बार चालाक लोगों द्वारा ठगे जाते हैं और उससे उन्हें घाटा ही रहता है, पर उनकी सज्जनता से प्रभावित होकर दूसरे लोग जितनी उनकी सहायता करते हैं, उस लाभ के बदले में ठगे जाने का घाटा कम ही रहता है। सब मिलाकर वे लाभ में ही रहते हैं। इसी प्रकार स्वार्थी लोग किसी के काम नहीं आने से अपना कुछ हर्ज या हानि होने का अवसर नहीं आने देते, पर उनकी सहायता नहीं करता तो वे उस लाभ से वंचित भी रहते हैं। ऐसी दशा में वह अनुदार चालाक व्यक्ति, उस उदार और भोले व्यक्ति की अपेक्षा घाटे में ही रहता है। दुहरे बाट रखने वाले बेईमान दुकानदारों को कभी फलते-फूलते नहीं देखा गया। स्वयं खुदगर्जी और अशिष्टता बरतने वाले लोग जब दूसरों से सज्जनता और सहायता की आशा करते हैं तो ठीक दुहरे बाट वाले बेईमान दुकानदार का अनुकरण करते हैं। ऐसा व्यवहार कभी किसी के लिए उन्नति और प्रसन्नता का कारण नहीं बन सकता।

दुकानदार अपने पैसे गिनने लगा, तो देखा उसमें कई खोटे सिक्के भी लोग धोखे में दे गए। वह सिक्के नाली में फेंकने लगा, तो पड़ोसी ने कहा-मूर्ख जैसे किसी ने तुझे धोखे में दिए हैं, तू भी ऐसे ही किसी को भेड़ दे। दुकानदार ने कहा-थोड़े से सिक्के कई लोगों को बेईमानी और धूर्तता सिखाएँ, उससे अच्छा तो खोटे सिक्कों को फेंक देना है। यह कहकर उसने सिक्के पानी में फेंक दिए।


12—नर-नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे।

नर का नारी के प्रति तथा नारी का नर के प्रति पवित्र दृष्टिकोण होना, आत्मोन्नति सामाजिक प्रगति एवं सुख-शांति के लिए आवश्यक है। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले, अविवाहित नर-नारियों के लिए व्यवहार एवं चिंतन में एक-दूसरे के प्रति पवित्रता का समावेश अनिवार्य है ही, किन्तु अन्यों को भी उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अपवित्र पाशविक दृष्टि रखकर कोई भी वर्ग, दूसरे वर्ग की श्रेष्ठता का न तो मूल्यांकन कर सकता है और न उनका लाभ उठा सकता है। इस हानि से बचने की अत्यधिक उपयोगी प्रेरणा इस वाक्य में दी गई है।

‘नारी इस संसार की सर्वोत्कृष्टता पवित्रता है।’ जननी के रूप में वह अगाध वात्सल्य लेकर इस धरती पर अवतीर्ण होती है। पत्नी के रूप में त्याग और बलिदान की, प्रेम और आत्मदान की सजीव प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठित होती है। बहन के रूप में स्नेह, उदारता और ममता की देवी जैसी परिलक्षित होती है। पुत्री के रूप में वह कोमलता, मृदुलता, निश्छलता की प्रतिकृति के रूप में इस नीरस संसार को सरस बनाती रहती है। परमात्मा ने नारी में सत्य, शिव और सुंदर का अनंत भंडार भरा है। उसके नेत्रों में एक अलौकिक ज्योति रहती है, जिसकी कुछ किरणें पड़ने मात्र से निष्ठुर हृदयों की भी मुरझाई हुई कली खिल सकती है। दुर्बल, अपंग मानव को शक्तिमान और सत्ता सम्पन्न बनाने का सबसे बड़ा श्रेय यदि किसी को हो सकता है तो वह नारी का ही है। वह मूर्तिमान् प्रेरणा, भावना और स्फूर्ति के रूप में अचेतन को चेतन बनाती है। उसके सान्निध्य में अकिंचन व्यक्ति का भाग्य मुखरित हो उठता है। वह अपने को कृत-कृत्य हुआ अनुभव करता है।

नारी की महत्ता अग्नि के समान है। अग्नि हमारे जीवन का स्रोत है, उसके अभाव में हम निर्जीव और निष्प्राण बनकर ही रह सकते हैं। उसका उपयोगिता की जितनी महिमा गाई जाए, उतनी ही कम है, पर इस अग्नि का दूसरा पहलू भी है, वह स्पर्श करते ही काली नागिन की तरह लपलपाती हुई उठती है और छूते ही छटपटा देने वाली, भारी पीड़ा देने वाली परिस्थिति उत्पन्न कर देती है। नारी में जहाँ अनंत गुण हैं, वहाँ एक दोष ऐसा भी है जिसके स्पर्श करते ही असीम वेदना से छटपटाना पड़ता है। वह रूप है-नारी का रमणी रूप। रमण की आकांक्षा से जब भी उसे देखा, सोचा और छुआ जाएगा तभी वह काली नागिन की तरह अपने विष भरे दंत चुभो देगी। बिच्छू की बनावट कैसी अच्छी है, पर उसके डंक को छूते ही विपत्ति खड़ी हो जाती है। मधुमक्खी कितनी उपकारी है। भौंरा कितना मधुर गूँजता है, काँतर कैसे रंग-बिरंगे पैरों से चलती है, बर्र और ततैया अपने छत्तों में बैठे हुए कैसे सुंदर गुलदस्ते से सजे दीखते हैं, पर इनमें से किसी का भी स्पर्श हमारे लिये विपत्ति का कारण बन जाता है। नारी के कामिनी और रमणी के रूप में जो एक विष की छोटी-सी पोटली छिपी हुई है, उस सुनहरी कटार से हमें बचना ही चाहिए।

अपने से बड़ी आयु की नारी को माता के रूप में, समान आयु वाली को बहन के रूप में, छोटी को पुत्री के रूप में देखकर, उन्हीं भावनाओं का अधिकाधिक अभिवर्द्धन करके हम उतने ही आह्लादित और प्रमुदित हो सकते हैं, जैसे माता सरस्वती, माता लक्ष्मी, माता दुर्गा के चरणों में बैठकर उनके अनंत-वात्सल्य का अनुभव करते हैं। हम गायत्री उपासक भगवान् की सर्वश्रेष्ठ सजीव रचना को नारी रूप में ही मानते हैं। नारी में भगवान् की करुणा, पवित्रता और सदाशयता का दर्शन करना हमारी भक्तिभावना का दार्शनिक आधार है। उपासना में ही नहीं, व्यावहारिक जीवन में भी हमारा दृष्टिकोण यही रहना चाहिए। नारी मात्र को हम पवित्र दृष्टि से देखें। वासना की दृष्टि से न सोंचे, न उसे देखें, न उसे छुए।

दाम्पत्य जीवन में संतानोत्पादन का विशेष प्रयोजन या अवसर आवश्यक हो तो पति-पत्नी कुछ क्षण के लिए वासना की एक हल्की धूप-छाँह अनुभव कर सकते हैं। शास्त्रों में तो इतनी भी छूट नहीं है, उन्होंने तो गर्भदान संस्कार को भी यज्ञोपवीत या मुण्डन-संस्कार की भाँति एक पवित्र धर्मकृत्य माना है और इसी दृष्टि से उस क्रिया को सम्पन्न करने की आज्ञा दी है, पर मानवीय दुर्बलता को देखते हुए दाम्पत्य जीवन में एक सीमित मर्यादा के अंतर्गत वासना को छूट मिल सकती है। इसके अतिरिक्त दाम्पत्य जीवन भी ऐसा ही पवित्र होना चाहिए जैसा कि दो सहोदर भाइयों का या दो सगी बहनों का होता है। विवाह का उद्देश्य दो शरीरों को एक आत्मा बनाकर जीवन की गाड़ी का भार दो कंधों पर ढोते चलना है, दुष्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करना नहीं। यह तो सिनेमा का, गंदे चित्रों का, अश्लील साहित्य का और दुर्बुद्धि का प्रसाद है, जो हमने नारी की परम पुनीत प्रतिमा को ऐसे अश्लील, गंदे और गर्हित रूप में गिरा रखा है। नारी को वासना के उद्देश्य से सोचना या देखना, उसकी महानता का वैसा ही तिरस्कार करना है, जैसे किसी आवश्यकता को पूर्ण करने के उद्देश्य से देखना। यह दृष्टि जितनी निंदनीय और घृणित है, उतनी ही हानिकर और विग्रह उत्पन्न करने वाली भी है। हमें उस स्थिति को अपने भीतर से और सारे समाज से हटाना होगा और नारी को उस स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित करना होगा, जिसकी एक दृष्टि मात्र से मानव प्राणी धन्य होता रहा है।

उपरोक्त पंक्तियों में नारी का जैसा चित्रण नर की दृष्टि से किया गया है, ठीक वैसा ही चित्रण कुछ शब्दों के हेर-फेर के साथ नारी की दृष्टि से नर के सम्बन्ध में किया जा सकता है। जननेन्द्रिय की बनावट में राई-रत्ती अंतर होते हुए भी मनुष्य की दृष्टि से दोनों ही लगभग समान क्षमता, बुद्धि, भावना एवं स्थिति के बने हुए हैं। यह ठीक है कि दोनों में अपनी-अपनी विशेषताएँ और अपनी-अपनी न्यूनताएँ हैं, उनकी पूर्ति के लिए दोनों एक-दूसरे का आश्रय लेते हैं। यह आश्रय पति-पत्नी के रूप में केवल काम प्रयोजन के रूप में हो, ऐसा किसी भी प्रकार आवश्यक नहीं। नारी के प्रति नर और नर के प्रति नारी पवित्र, पुनीत, कर्तव्य और स्नेह का सात्विक एवं स्वर्गीय संबंध रखते हुए भी माता, पुत्री या बहन के रूप में सखा, सहोदर, स्वजन और आत्मीय के रूप में श्रेष्ठ संबंध रख सकते हैं, वैसा ही रखना भी चाहिए। पवित्रता में जो अजस्र बल है, वह वासना के नारकीय कीचड़ में कभी भी दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। वासना और प्रेम दोनों दृष्टिकोण एक-दूसरे से उतने ही भिन्न हैं, जितनी स्वर्ग से नरक में भिन्नता है। व्याभिचार में द्वेष, ईर्ष्या, आधिपत्य, संकीर्णता, कामुकता, रूप-सौंदर्य शृंगार, कलह, निराशा, कुढ़न, पतन, ह्रास, निंदा आदि अगणित यंत्रणाएँ भरी पड़ी हैं, पर प्रेम इन सबसे सर्वथा मुक्त है। पवित्रता में त्याग, उदारता, शुभकामना, सहृदयता और शांति के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता।

युुग निर्माण सत्संकल्प में, आत्मवत् सर्वभूतेषु की, परद्रव्येषु लोष्ठवत्, परदारेषु मातृवत् की पवित्र भावनाएँ भरी पड़ी हैं, इन्हीं के आधार पर नवयुग का सृजन हो सकता है। इन्हीं का अवलंबन लेकर इस दुनिया को स्वर्ग के रूप में परिणत करने का स्वप्न साकार हो सकता है। जो प्रस्तुत सौभाग्य का सदुपयोग करते हैं, वे क्रमशः अधिक ऊँचे उठते और पूर्णता के लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं।

13—संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य-प्रसार के लिए, अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।

परमार्थ परायण जीवन जीना है तो उसके नाम पर कुछ भी करने लगना उचित नहीं। परमार्थ के नाम पर अपनी शक्ति ऐसे कार्यों में लगानी चाहिए जिनमें उसकी सर्वाधिक सार्थकता हो। स्वयं अपने अंदर से लेकर बाहर समाज में सत्प्रवृत्तियाँ पैदा करना, बढ़ाना इस दृष्टि से सबसे अधिक उपयुक्त है। संसार में जितना कुछ सत्कार्य बन पड़ रहा है, उन सबके मूल में सत्प्रवृत्तियाँ ही काम करती हैं। लहलहाती हुई खेती तभी हो सकती है, जब बीज का अस्तित्व मौजूद हो। बीज के बिना पौधा कहाँ से उगेगा? भले या बुरे कार्य अनायास ही नहीं उपज पड़ते, उनके मूल में सद्विचारों और कुविचारों की जड़ जमी होती है। समय पाकर बीज जिस प्रकार अंकुरित होता और फलता-फूलता है, उसी प्रकार सत्प्रवृत्तियाँ भी अगणित प्रकार के पुण्य-परमार्थों के रूप में विकसित एवं परिलक्षित होती हैं। जिस शुष्क हृदय में सद्भावनाओं के लिए, सद्विचारों के लिए कोई स्थान नहीं मिला, उसके द्वारा जीवन में कोई श्रेष्ठ कार्य बन पड़े, यह लगभग असंभव ही मानना चाहिए। जिन लोगों ने कोई सत्कर्म किए हैं, आदर्श का अनुकरण किया है, उनमें से प्रत्येक को उससे पूर्व अपनी पाशविक वृत्तियों पर नियंत्रण कर सकने योग्य सद्विचारों का लाभ किसी न किसी प्रकार मिल चुका होता है। कुकर्मी और दुर्बुद्धिग्रस्त मनुष्यों के इस घृणित स्थिति में पड़े रहने की जिम्मेदारी उनकी उस भूल पर है, जिसके कारण वे सद्विचारों की आवश्यकता और उपयोगिता को समझने से वंचित रहे, जीवन के इस सर्वोपरि लाभ की उपेक्षा करते रहे, उसे व्यर्थ मानकर उससे बचते और कतराते रहे। मूलतः मनुष्य एक प्रकार का काला कुरूप लोहा मात्र है। सद्विचारों का पारस छूकर ही वह सोना बनता है। एक नगण्य तुच्छ प्राणी को मानवता का महान् गौरव दिला सकने की क्षमता केवल मात्र सद्विचारों में है। जिसे यह सौभाग्य नहीं मिल सका, वह बेचारा क्यों कर अपने जीवन-लक्ष्य को समझ सकेगा और क्यों कर उसके लिए कुछ प्रयत्न-पुरुषार्थ कर सकेगा?

इस संसार में अनेक परमार्थ और उपकार के कार्य हैं, वे सब आवरण मात्र हैं, उनकी आत्मा में, सद्भावनाएँ सन्निहित हैं। सद्भावना सहित सत्कर्म भी केवल ढोंग मात्र बनकर रह जाते हैं। अनेक संस्थाएँ आज परमार्थ का आडम्बर करके सिंह की खाल ओढ़े फिरने वाले शृंगाल का उपहासास्पद उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। उनसे लाभ किसी का कुछ नहीं होता, विडम्बना बढ़ती है और पुरुषार्थ को भी लोग आशंका एवं संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं। प्राण रहित शरीर कितने ही सुंदर वस्त्र धारण किए हुए क्यों न हो, उसे कोई पसंद न करेगा, न उससे किसी का कोई भला होगा। इसी प्रकार सद्भावना रहित जो कुछ भी लोकहित, जनसेवा के प्रयास किए जाएँगे, वे भलाई नहीं, बुराई ही उत्पन्न करेंगे।

बुराइयाँ आज संसार में इसलिए बढ़ और फल-फूल रही हैं कि उनका अपने आचरण द्वारा प्रचार करने वाले पक्के प्रचारक, पूरी तरह मन, कर्म, वचन से बुराई फैलाने वाले लोग बहुसंख्या में मौजूद हैं। अच्छाइयों के प्रचारक आज निष्ठावान् नहीं, बातूनी लोग ही दिखाई पड़ते हैं, फलस्वरूप बुराइयों की तरह अच्छाइयों का प्रसार नहीं हो पाता और वे पोथी के वचनों की तरह केवल कहने-सुनने भर की बातें रह जाती हैं। कथा-वार्ताओं को लोग व्यवहार की नहीं कहने-सुनने की बात मानते हैं और इतने मात्र से ही पुण्य लाभ की संभावना मान लेते हैं।

सत्प्रवृत्तियों को मनुष्य के हृदय में उतार देने से बढ़कर और कोई महत्त्वपूर्ण सेवा कार्य इस संसार में नहीं हो सकता। वस्तुओं की सहायता भी आवश्यकता के समय उपयोगी सिद्ध हो सकती है, पर उसका स्थाई महत्त्व नहीं है। आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य लोग ऐसी सेवा कर भी नहीं सकते। हर आदमी स्थायी रूप से अपनी समस्या, अपने पुरुषार्थ और विवेक से ही हल कर सकता है। दूसरों की सहायता पर जीवित रहना न तो किसी मनुष्य के गौरव के अनुकूल हे और न उससे स्थायी हल ही निकलता है। जितनी भी कठिनाइयाँ व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन में दिखाई पड़ती हैं, उनका एकमात्र कारण कुबुद्धि है। यदि मनुष्य अपनी आदतों को सुधार ले, स्वभाव को सही बना ले और विचारों तथा कार्यों का ठीक तारतम्य बिठा ले तो बाहर से उत्पन्न होती दीखने वाली सभी कठिनाइयाँ बात की बात में हल हो सकती हैं। व्यक्ति और समाज का कल्याण इसी में है कि सत्प्रवृत्तियों को अधिकाधिक पनपने का अवसर मिले। इसी प्रयास में प्राचीनकाल में कुछ लोग अपने जीवन के उत्सर्ग करते थे, उन्हें बड़ा माना जाता था और ब्राह्मण के सम्मानसूचक पद पर प्रतिष्ठित किया जाता था। चूँकि सत्प्रवृत्तियों को पनपना संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है इसलिए उसमें लगे हुए व्यक्तियों को सम्मान भी मिलना चाहिए।

दानों में सर्वोत्तम दान ब्रह्मदान कहा जाता है। ब्रह्मदान का अर्थ है-ज्ञान दान। ज्ञान का अर्थ है-वह भावना और निष्ठा जो मनुष्य के नैतिक स्तर को सुस्थिर बनाए रहती है। युग निर्माण सत्संकल्प में जिन सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार की प्रेरणा की गई है, वह यही ब्रह्मदान है। इस अमृत जल से सींचा जाने पर मुरझाता हुआ युग-मानस पुनः हरा-भरा पुष्प-पल्लवों से परिपूर्ण बन सकता है। इसी महान् कार्य को परमार्थ कहा जा सकता है, जिसको पूरा करने के लिए परमात्मा ने मनुष्य को विशेष क्षमता, सत्ता और महत्ता प्रदान की है।

समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ और धन की पाँचों विभूतियों का अधिकाधिक भाग हमें परमार्थ के लिए लगाना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन की आवश्यकता पूर्ति में दिव्य-विभूतियों को पूरी तरह नष्ट न कर देना चाहिए, वरन् न्यूनाधिक मात्रा में कुछ न कुछ इनका अंश परमार्थ के लिए सत्प्रवृत्तियों के विकास के लिए सुरक्षित रख लेना चाहिए। दैनिक जीवन में जिस प्रकार अन्य अनेक आवश्यक कार्य नियत रहते हैं और उन्हें किसी न किसी प्रकार पूरा करते हैं, उसी प्रकार इस परमार्थ कार्य को भी एक नितांत आवश्यक और लोक-परलोक के लिए श्रेयस्कर महत्त्वपूर्ण कार्य मानना चाहिए। जिस कार्य को हम महत्त्वपूर्ण मान लेंगे, उसके लिए समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक नियमित अंश निरंतर लगाते रहना भार स्वरूप प्रतीत न होगा, वरन् उस मार्ग में किया हुआ प्रयत्न जीवन को धन्य बनाने वाला सर्वोत्तम सार्थक कार्य प्रतीत होने लगेगा।

सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन के लिए युग निर्माण अभियान के अंतर्गत अनेक कार्यक्रम सुझाए गए हैं। झोला पुस्तकालय हर एक के लिए सुलभ हैं। जिसके पास जो विभूति हो वह उसे उसके लिए नियोजित करते रहने का क्रम बना लें। समय और श्रम पुरुषार्थ तो हर व्यक्ति लगा ही सकता है। उसका सुनिश्चित अंश लगाने का नियम बना लेना चाहिए। प्रभावशाली व्यक्ति उसका समर्थन खुले रूप में करें, लोगों पर उसके लिए दबाव डालें तो काफी प्रगति हो सकती है। ज्ञानवान अपनी सूझबूझ एवं मार्गदर्शन से लेकर प्रेरणा देने तक का कार्य कर सकते हैं। धनवान उनके लिए आवश्यक साधन जुटाए रह सकते हैं। न्यूनतम एक घंटा समय एवं एक दिन की आय सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन के लिए लगाने का क्रम हर व्यक्ति बना ले तो इतना बड़ा कार्य हो सकता है कि इतिहास में उसे स्वर्णाक्षरों में लिखा जाए।

14—परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे।

उचित-अनुचित का, लाभ-हानि का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना, किधर नहीं चलना इसका निर्णय करने के लिए उपयुक्त बुद्धि भगवान् ने मनुष्य को दी है। उसी के आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं, पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण बातों में जो विवेक ठीक काम करता है, वही महत्त्वपूर्ण समस्या सामने आने पर कुंठित हो जाता है। परम्पराओं की तुलना में तो किसी विरले का ही विवेक जाग्रत रहता है, अन्यथा आंतरिक विरोध रहते हुए भी लोग पानी में बहुत हुए तिनके की तरह अनिच्छित दिशा में बहने लगते हैं। भेड़ों को झुण्ड जिधर भी चल पड़े, उसी ओर सब भेड़ें बढ़ती जाती हैं। एक भेड़ कुँए में गिर पड़े तो पीछे की सब भेड़ें उसी कुँए में गिरती हुई अपने प्राण गँवाने लगती हैं। देखा-देखी की, नकल करने की प्रवृत्ति बंदर में पाई जाती है। वह दूसरों को जैसा करते देखता है, वैसा ही खुद भी करने लगता है। इस अंधानुकरण की आदत को जब मनुष्य का मन भी, इसी तरह मान लेने के लिए करता है, तो वह यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि आदमी बंदर की औलाद है।

समाज में प्रचलित कितनी ही प्रथाएँ ऐसी हैं, जिनमें लाभ रत्ती भर भी नहीं, हानि अनेक प्रकार से हैं, पर एक की देखा-देखी दूसरा उसे करने लगता है। बीड़ी और चाय का प्रचार दिन-दिन बढ़ रहा है। छोटे-छोटे बच्चे बड़े शौक से इन्हें पीते हैं। सोचा यह जाता है कि यह चीजें बड़प्पन अथवा सभ्यता की निशानी हैं। इन्हीं पीना एक फैशन की पूर्ति करना है और अपने को अमीर, धनवान साबित करना है। ऐसी ही कुछ भ्रांतियों से प्रेरित होकर शौक, मजे, फैशन जैसी दिखावे की भावना से एक की देखा-देखी दूसरा इन नशीली वस्तुओं को अपनाता है और अंत में एक कुटेब के रूप में वह लत ऐसी बुरी तरह लग जाती है कि छुड़ाए नहीं छूटती।

चाय, बीड़ी, भाँग, गाँजा, शराब, अफीम आदि सभी नशीली चीजें भयंकर दुर्व्यसन हैं, इनके द्वारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होता है और आर्थिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। हर नशेबाज स्वभाव की दृष्टि से दिन-दिन घटिया आदमी बनता जाता है। क्रोध, आवेश, चिंता, निराशा, आलस्य, निर्दयता, अविश्वास आदि कितने ही मानसिक दुर्गुण उपज पड़ते हैं। समझाने पर या स्वयं विचार करने पर हर नशेबाज इस लत की बुराई को स्वीकार करता है, पर विवेक की प्रखरता और साहस की सजीवता न होने से कुछ कर नहीं पाता। एक अंध परम्परा में भेड़ की तरह चलता चला जाता है। क्या यही मनुष्य की बुद्धिमत्ता है?

सामाजिक कुरीतियों से हिंदू समाज इतना जर्जर हो रहा है कि इन विकृतियों के कारण जीवनयापन कर सकना भी मध्यम वर्ग के लोगों के लिए कठिन होता चला जा रहा है। बच्चों का विवाह एक नरभक्षी पिशाच की तरह हर अभिभावक के सिर पर नंगी तलवार लिए नाचता रहता है। विवाह के दिन जीवन भर के गाढ़ी कमाई के पैसों को होली की तरह फूँक देने के लिए हर किसी को विवश होना पड़ता है। हत्यारा दहेज छुरी लेकर हमारी बच्चियों का खून पी जाने के लिए निर्भय होकर विचरण करता रहता है। मृत्युभोज, औसर-मोसर नेगचार, मुंडन, दस्टौन, जनेऊ और भी न जाने क्या-क्या ऊट-पटांग काम करने के लिए लोग विवश होते रहते हैं और जो कुछ कमाते हैं, उसका अधिकांश भाग इन्हीं फिजूलखर्चियों में स्वाहा करते रहते हैं। जेवर बनवाने में रुपए में से आठ आने हाथ रहते हैं, जान-जोखिम ईर्ष्या, अहंकार, सुरक्षा की चिंता, ब्याज की हानि आदि अनेक आपत्तियाँ उत्पन्न होती रहती हैं, फिर भी परम्परा जो है। सब लोग जैसा करते हैं, वैसा ही हम क्यों न करें? विवेक का परम्पराओं की तुलना में परास्त हो जाना, वैसा ही आश्चर्यजनक है जैसा कि बकरे का शेर की गरदन मरोड़ देना। आश्चर्य की बात तो अवश्य है, पर हो यही रहा है।

शरीर के रोगी, मन के मलीन और समाज के कुसंस्कारी होने का एक ही कारण है-अविवेक यों हम स्कूली शिक्षा ऊँचे दर्जे तक प्राप्त किए रहते हैं और अपने ढंग की चतुरता भी खूब होती है, पर जीवन की मूलभूत समस्याओं को गहराई तक समझने में प्रायः असमर्थ ही रहते हैं। बाहरी बातों पर खूब बहस करते और सोचते-समझते हैं, पर जिस आधार पर हमारा जीवनोद्देश्य निर्भर है, उसकी ओर थोड़ा भी ध्यान नहीं देते। इसी का नाम है-अविवेक विचारशीलता का यदि अभाव न हो और गुण-दोष की दृष्टि से अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक समस्याओं पर सोचना समझना आरंभ करें, तो प्रतीत होगा कि बुद्धिमत्ता का दावा करते हुए भी हम कितनी अधिक मूर्खता से ग्रसित हो रहे हैं। सीधी-सादी विचारधारा को अपनाकर मनुष्य अपनी सर्वतोमुखी सुख-शांति को सुरक्षित रख सकता था और इस पृथ्वी पर स्वर्ग का आनंद प्राप्त कर सकता था, पर आँधी, टेढ़ी, अनुचित, अनुपयुक्त इच्छा, आकांक्षाएँ वह तो रखता ही है, उसके समीपवर्ती लोग भी चंदन के वृक्ष के समीप रहने वालों की तरह सुवासित होते रहते हैं। अपने मन का, अपने दृष्टिकोण का परिवर्तन भी क्या हमारे लिए कठिन है? दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपने को क्यों नहीं सुधारा जा सकेगा? विचारों की पूँजी का अभाव ही सारी मानसिक कठिनाइयों का कारण है। विवेक का अंतःकरण में प्रादुर्भाव होते ही कुविचार कहाँ टिकेंगे और कुविचारों के हटते ही अपना पशु जीवन, देव जीवन में परिवर्तित क्यों न हो जाएगा?

कुछ मूढ़ताएँ, अंध परम्पराएँ, अनैतिकताएँ, संकीर्णताएँ हमारे सामूहिक जीवन में प्रवेश पा गई हैं। दुर्बल मन से सोचने पर वे बड़ी कठिन, बड़ी दुष्कर, बड़ी गहरी जमी हुई दीखती हैं, पर वस्तुतः वे कागज के बने रावण की तरह डरावनी होते हुए भी भीतर से खोखली हैं। हर विचारशील उनसे घृणा करता है, पर अपने को एकाकी अनुभव करके आस-पास घिरे लोगों की भावुकता को डरकर कुछ कर नहीं पाता। कठिनाई इतनी सी है। कुछ ही थोड़े से विवेकशील लोग यदि संगठित होकर उठ खड़े हों और जमकर विरोध करने लगें, तो इन कुरीतियों को मामूली से संघर्ष के बाद चकनाचूर कर सकते हैं। गोवा की जनता ने जिस प्रकार भारतीय फौजों का स्वागत किया, वैसा ही स्वागत इन कुरीतियों से सताई हुई जनता उनका करेगी, जो इन अंध-परम्पराओं को तोड़-मरोड़ कर रख देने के लिए कटिबद्ध सैनिकों की तरह मार्च करते हुए आगे बढ़ेंगे।

हत्यारा दहेज कागज के रावण की तरह बड़ा वीभत्स, नृशंस एवं डरावना लगता है। हर कोई भीतर ही भीतर उससे घृणा करता है, पर पास जाने से डरता है। कुछ साहसी लोग उसमें पलीता लगाने को दौड़ पड़ें तो उसका जड़ मूल से उन्मूलन होने में देर न लगेगी। दास-प्रथा देव-दासी प्रथा, बहु-विवाह जन्मते ही कन्या-वध भूत-पूजा पशु बलि आदि अनेक सामाजिक कुरीतियाँ किसी समय बड़ी प्रबल लगती थीं, अब देखते ही कुरीतियाँ, अनैतिकताएँ एवं संकीर्णताएँ मजबूती से जड़ जमाए दीखती हैं, विवेकशीलों के संगठित प्रतिरोध के सामने देर तक न ठहर सकेंगी। बालू की दीवार की तरह वे एक ही धक्के में भरभराकर गिर पड़ेंगी। विचारों की क्रांति का एक ही तूफान इस तिनकों के ढेर को उड़ाकर बात की बात में छितरा देगा। जिस नए समाज की रचना आज स्वप्न सी लगती है, विचारशीलता के जाग्रत होते ही यह मूर्तिमान् होकर सामने खड़ी दीखेगी।

पूज्य गुरुदेव का सारा जीवन ही धर्म और अध्यात्म की विचारधारा प्रवाहित करने में व्यतीत हुआ है। युग निर्माण के लिए हमें पहले जन-मानस को बदलना होगा, कार्यों में परिवर्तन तो उसके बाद ही संभव होगा। जैसे-जैसे हमारी विचारधारा प्रबुद्ध होगी, विवेकशीलता जगेगी वैसे ही वैसे अनुपयुक्त को त्यागने और उपयुक्त को ग्रहण करने की प्रवृत्ति सक्रिय होती जाएगी।

स्वामी विवेकानंद ने अपनी साधना उपासना छोड़ दी और कलकत्ता में फैले प्लेग के प्रकोप से लोगों को बचाने में जुए गए। एक भाई ने पूछा-महाराज आपकी उपासना साधना का क्या हुआ? स्वामीजी ने कहा-भगवान् के पुत्र दुःखी हों और मैं उनका नाम जप रहा होऊँ, क्या तुम इसे ही उपासना समझते हो?

पैसे की कमी के कारण जब वे रामकृष्ण आश्रम की जमीन बेचने को तैयार हो गए तो एक शिष्य ने पूछा-महाराज आप गुरु स्मारक बेचेंगे क्या? विवेकानंद ने उत्तर दिया-मठ-मंदिरों की स्थापना संसार की भलाई के लिए होती है। यदि उसका उपयोग भले काम में होता है, तो इसमें हानि क्या है?

15—सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

कोमल और सौम्य तत्त्वों को इशारे में समझाकर विवेक एवं तर्क द्वारा औचित्य सुझाकर सन्मार्गगामी बनाया जा सकता है, पर कठोर और दुष्ट तत्त्वों को बदलने के लिए, लोहे को आग में तपाकर पिटाई करने वाली लुहार की नीति ही अपनानी पड़ती है। दुर्योधन को समझाने-बुझाने में जब श्रीकृष्ण सफल न हो सके, तब उसे अर्जुन के बाणों द्वारा सीधे रास्ते पर लाने का प्रबंध करना पड़ा। हिंसक पशु नम्रता और औचित्य की भाषा नहीं समझते, उन्हें तो शस्त्र ही काबू में ला सकते हैं। भगवान् को बार-बार धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेना पड़ता है, साथ ही वे असुरता के उन्मूलन का रुद्र कृत्य भी करते हैं।

व्यक्तिगत जीवन में देव शक्ति का अवतरण निस्संदेह एक सृजनात्मक कृत्य है। उसके लिए सद्गुणों के अभिवर्द्धन की साधना निरंतर करनी पड़ती है, पर साथ ही अंतरंग में छिपे हुए दोष-दुर्गुणों से जूझना भी पड़ता है। यदि कुसंस्कारों का उन्मूलन न किया जाए, तो सद्गुण पनप ही न सकेंगे और सारी शक्ति इन कषाय-कल्मषों में ही नष्ट होती रहेगी। आलस्य, प्रमाद, आवेश, असंयम आदि दुर्गुणों के विरुद्ध कड़ा मोर्चा खड़ा करना पड़ता है और पग-पग पर उनसे जूझने के लिए तत्पर रहना पड़ता है। गीता का रहस्यवाद अंतरंग के इन्हीं शत्रुओं को कौरव मानकर अर्जुन रूपी जीव को इनसे लड़ मरने के लिए प्रोत्साहित करता है। जिसने अपने से लड़कर विजय पाई, वस्तुतः उसे ही सच्चा विजेता कहा जाएगा।

सामूहिक जीवन में समय-समय पर अनेक अनाचार उत्पन्न होते रहते हैं और उन्हें रोकने के लिए सरकारी तथा गैर सरकारी स्तर पर प्रबल प्रयत्न करने पड़ते हैं। पुलिस, जेल, अदालत, कानून, सेना आदि के माध्यम से सरकारी दंड संहिता अनाचार को रोकने का यथासंभव प्रयत्न करती है। जन स्तर पर भी अवांछनीय और असामाजिक तत्त्वों का प्रतिरोध अवश्य होता है। यदि वह रोकथाम न हो, उद्दंडता और दुष्टता का प्रतिरोध न किया जाए तो वह देखते-देखते आकाश-पाताल तक चढ़ दौड़े और अपने सर्वभक्षी मुख में शालीनता और शांति को देखते-देखते निगल जाए।

इन दिनों नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र में अवांछनीय तत्त्वों का इतना अधिक बाहुल्य हो गया है कि शांति और सुव्यवस्था के लिए एक प्रकार से संकट ही उत्पन्न हो गया है। छल, असत्य, बनावट और विश्वासघात का ऐसा प्रचलन हो गया है कि किसी व्यक्ति पर सहज ही विश्वास करना खतरे से खाली नहीं रहा। विचारों की दृष्टि से मनुष्य बहुत ही संकीर्ण, स्वार्थी, ओछा और कमीना होता चला जा रहा है। पेट और प्रजनन के अतिरिक्त कोई लक्ष्य नहीं, आदर्शवादिता और उत्कृष्टता अब कहने-सुनने भर की बात रह गई है। व्यवहार में कोई बिरला ही उसे काम में लाता हो। सामाजिक कुरीतियों का तो कहना ही क्या? विवाहोन्माद, मृत्यु-भोज ऊँच-नीच नारी तिरस्कार, बाल-विवाह वृद्ध-विवाह आदि न जाने कितनी प्रकार की कुरीतियाँ अपने समाज में घुसी बैठी हैं। यदि उन्हें ज्यों का त्यों ही बना रहने दिया गया, तो हम संसार के सभ्य देशों में पिछड़े हुए और उपहासास्पद ही न माने जाएँगे, वरन् अपनी दुर्बलताओं के शिकार होकर अपना अस्तित्व ही खो बैठेंगे।

अगले दिनों इस बात की आवश्यकता पड़ेगी कि व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में संव्याप्त अगणित दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक परिमाण में संघर्ष आरंभ किया जाए। इसलिए हर नागरिक को अनाचार के विरुद्ध आरंभ किए गए धर्म-युद्ध में भाग लेने के लिए आह्वान करना होगा। किसी समय तलवार चलाने वाले और सिर काटने में अग्रणी लोगों को योद्धा कहा जाता था, अब मापदण्ड बदल गया। चारों ओर संव्याप्त आतंक और अनाचार के विरुद्ध संघर्ष में जो जितना साहस दिखा सके और चोट खा सके, उसे उतना ही बड़ा बहादुर माना जाएगा। उस बहादुरी के ऊपर शोषण-विहीन समाज की स्थापना संभव हो सकेगी। दुर्बुद्धि और कुत्सा से लड़ सकने में जो लोग समर्थ होंगे, उन्हीं का पुरुषार्थ पीड़ित मानवता को त्राण दे सकने का यश संचित कर सकेगा।

भारतीय समाज को बेईमान और गरीब बनने के लिए विवश करने वाले सत्यानाशी विवाहोन्माद नामक असुर से पूरी शक्ति के साथ जूझना पड़ेगा। अभी प्रचार, विरोध, प्रतिज्ञापत्र आदि के हल्के कदम उठाए गए हैं, आगे चलकर असहयोग, सत्याग्रह और घिराव जैसे बड़े कदम उठाकर इस कुप्रथा को गर्हित और वर्जित बनने के लिए घृणित और दुष्ट समझे जाने के लिए विवश करेंगे। अगले दिनों ऐसा प्रबल लोकमत तैयार करेंगे, जिसमें विवाहों के नाम पर प्रचलित उद्धतपन को जीवित रह सकना असंभव हो जाए। पूर्ण सादगी और स्वल्प खर्च के विवाहों का प्रचलन होने तक अपना संघर्ष चलता रहेगा। हम तब तक न चैन लेंगे और न लेने देंगे, जब तक कि इस अनैतिक एवं अवांछनीय प्रथा का देश से काला मुँह न हो जाए।

मृतक भोज के नाम पर घृणित दावतें खाने की निष्ठुरता, पशुबलि की नृशंसता, ऊँच-नीच के नाम पर मानवीय अधिकारों का अपहरण, नारी को पद-दलित और उत्पीड़न करने की क्रूरता हमारे समाज पर लगे हुए ऐसे कलंक हैं, जिनका समर्थन कोई भी विवेकशील और सहृदय व्यक्ति कर ही नहीं सकता। मूढ़ परम्पराओं ने इन कुरीतियों को धार्मिकता के साथ जोड़ दिया है, इस स्थिति को कब तक सहन किया जाता रहेगा? इस मूढ़ता के विरुद्ध प्रचार मोर्चे से आगे बढ़कर हमें कई और ऐसे सक्रिय कदम उठाने पड़ेंगे, जिन्हें भले ही अशान्ति उत्पन्न करने वाले कहा जाए, परंतु रुकेंगे तभी, जब मानवता के मूलभूत आधारों को स्वीकार करने वाले और झगड़े का खतरा मोल लेकर भी अनीति से हर मोर्चे पर जूझने के लिए कमर कस लें, भले ही इस संदर्भ में हमें कोई भी खतरा क्यों न उठाना पड़े।

वैयक्तिक दोष-दुर्गुणों से लड़ने और जीवन को स्वच्छ, पवित्र निर्मल बनाने के लिए अगर कुसंस्कारों से लड़ना पड़ता है, तो वह लड़ाई लड़ी ही जानी चाहिए। परिवार में कुछ सदस्यों को दास-दासी की तरह और कुछ को राजा-रानी की तरह रहने को यदि परम्परा का पालन माना जाता है, तो उसे बदल कर ऐसी परम्पराएँ स्थापित करनी पड़ेंगी, जिनमें सबको न्यायानुकूल अधिकार, लाभ, श्रम तथा सहयोग करने की व्यवस्था करे। आर्थिक क्षेत्र में बेईमानी को प्रश्रय न मिले। व्यक्तिगत व्यवहार में छल करने और धोखेबाजी की गुंजाइश न रहे। ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए प्रबल लोकमत तैयार करना पड़ेगा और अवांछनीय तत्त्वों के उस प्रतिरोध को इतना सक्रिय बनाना पड़ेगा कि अपराध, उद्दंडता और गुंडागर्दी करने की हिम्मत करना किसी के लिए भी संभव न रहे। हराम की कमाई खाने वाले, भ्रष्टाचारी, बेईमान लोगों के विरुद्ध इतनी तीव्र प्रतिक्रिया उठानी होगी, जिसके कारण उन्हें सड़क पर चलना और मुँह दिखाना कठिन हो जाए। जिधर से वे निकलें उधर से ही धिक्कार की आवाजें ही उन्हें सुननी पड़ें। समाज में उनका उठना-बैठना बंद हो जाए और नाई, धोबी, दर्जी कोई उनके साथ किसी प्रकार का सहयोग करने के लिए तैयार न हों।

सार्वजनिक संस्थाओं में स्वार्थपरता और नेतागिरी लूटने के लिए जिन दुरात्माओं ने अड्डा जमा लिया है, उन्हें दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया जाए। धर्म और अध्यात्म का लबादा ओढ़कर जो रंगे सियार अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, उनकी असलियत चौराहे पर नंगी खड़ी कर दी जाए, ताकि लोग उन्हें भरपूर धिक्कारे। भोले लोगों को अनेक हाथों से लूटने से बचाना, एक ऊँची और श्रेष्ठ सेवा होती है। ८० लाख भिखमंगे नाना प्रकार के ढोंग बनाकर जिस तरह ठगी और हरामखोरी करने में जुटे हुए हैं, आखिर उसे कब तक सहन किया जाता रहेगा। स्वच्छ शासन प्रदान करने के लिए राजनैतिक नेता और विधायकों, शासकों और अफसरों को यह सोचने के लिए बाध्य किया जाएगा कि वे अपने निजी लाभ के लिए नहीं, लोकमंगल के लिए ही शासन-तंत्र का उपयोग करें।

इस प्रकार संघर्ष की बहुमुखी प्रचंड प्रक्रिया अगले दिनों युग निर्माण योजना आरंभ करेगी। उसके साधन जैसे-जैसे विकसित होते जाएँगे, संघ शक्ति जितनी मात्रा में उसके हाथ लगेगी, उसी अनुपात में वह शांत, अहिंसक, सज्जनोचित, सांस्कृतिक कार्य के अथक सम्पादन में जुटेगी। पग-पग पर अनौचित्य के, अन्याय के साथ लड़ा जाने वाला यह धर्म-युद्ध तभी समाप्त होगा, जब मानवता के आदर्श की विजय पताका सारे विश्व में फहराने लगेगी।

आजाद हिंद सेना के लिए धन की आवश्यकता थी। उसके लिए सुभाष बाबू की माला नीलाम की जाने लगी। तीसरी बोली में एक व्यक्ति ने अपने घर का सारा सोना देते हुए कहा-नेताजी क्या हमारी पात्रता की परीक्षा धन से ही होगी? नेताजी चौंके और बोले-तुम सच कहते हो, सबसे बड़ी शक्ति मनुष्य है, इसलिए उन्होंने धन माँगने की अपेक्षा जवान माँगे। वह व्यक्ति पहला था, जिसने आजाद हिंद सेना में अपना नाम लिखाया।

16—राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे।

अगली शताब्दी की संभावनाएँ अद्भुत, अनुपम और अभूतपूर्व हैं। वैज्ञानिक, बौद्धिक और औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ ही उदार चेतना का अवमूल्यन भी इन्हीं दिनों हुआ है। जिसके कारण प्रगति के नाम पर जो कुछ हस्तगत हुआ है, उसका दुरुपयोग होने का परिणाम उलटे रूप में ही सामने आए हैं। सुविधा साधन अवश्य ही बढ़े हैं, पर उलझे मानस ने न केवल व्यक्तित्व का स्तर गिराया है, वरन् साधनों को इस बुरी तरह प्रयुक्त किया है कि पिछले पूर्वजों की सामान्य स्थिति की तुलना में हम कहीं अधिक समस्याओं में फँस जाने जैसी स्थिति अवश्य है, पर ऐसा नहीं हो सकता कि देवत्व से एक सीढ़ी नीचे ही समझा जाने वाला मनुष्य असहाय बनकर अपना सर्वनाश ही देखता रहे, समय रहते न चेतें।

मानस बदलने से प्रचलन गड़बड़ाते हैं और व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है। बिखराव और विषमता दो बड़े संकट हैं, जो असंख्यों प्रकार के संकटों को जन्म देते हैं। इन्हें निरस्त करने के लिए एकता और समता की सर्वतोमुखी प्रतिष्ठा करनी पड़ती है। इतना बन पड़ने पर वे सभी अवरोध अनायास ही समाप्त हो जाते हैं, जो तिल से ताड़ बनकर, राई का पर्वत बन कर महाविनाश को चुनौती देते हुए गर्ज-तर्जन कर रहे थे। नवयुग में एकता और समता के दोनों सिद्धांत हर व्यक्ति को इच्छा या अनिच्छा और अंगीकार करने पड़ेंगे, ऐसा मनीषियों, भविष्यद्रष्टाओं का अभिमत है। शासन और समाज को भी अपनी मान्यताएँ व्यवस्थाएँ इसी प्रकार की बनानी पड़ेंगी। प्रवाह और प्रचलन के अनुरूप अपने स्वभाव में आवश्यक परिवर्तन करने होंगे। अडंगेबाजी तो भली-बुरी व्यवस्था में अपनी उद्दंडता का परिचय देने के लिए कहीं न कहीं से आ टपकती है। जलते दीपक की लौ बुझाने के लिए पतंगों के दल उस पर टूट पड़ने से बाज़ नहीं आते, भले ही इस दुरभिसंधि में उन्हें अपने पंख जलाने और प्राण गँवाने पड़ें। तूफान का मार्ग रोकने वाले वृक्षों को उखड़ते और झोंपड़ों को आसमान में उड़ते हुए आए दिन देखा जाता है। महाकाल के निर्धारण एवं अनुशासन के सामने कोई उद्दंडता अवरोध बन कर अड़ेगी और व्यवधान बनकर कारगर रोकथाम करेगी, इसी आशंका न की जाए तो ही ठीक है।

इक्कीसवीं सदी की सम्पूर्ण व्यवस्था एकता और समता के सिद्धांतों पर निर्धारित होगी। हर क्षेत्र में, हर प्रसंग में, उन्हीं का बोलबाला दृष्टिगोचर होगा। इस भवितव्यता के अनुरूप हम अभी से धीमी-धीमी तैयारियाँ शुरू कर दें तो यह अपने हित में होगा। ब्रह्म मुहूर्त्त में जागकर नित्यकर्म से निपट लेने वाले व्यक्ति सूर्योदय होते ही अपने क्रियाकलापों में जुट जाते हैं, जबकि दिन चढ़े तक सोते रहने वाले कितने ही कामों में पिछड़ जाते हैं।

मूर्धन्य मनीषियों का कहना है कि अगले दिनों एकता, एक सर्वमान्य व्यवस्था होगी। सभी लोग मिलजुल कर रहने के लिए विवश होंगे। डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाने, ढाई ईंट की मस्जिद खड़ी करने का कोई उपहासास्पद खिलवाड़ नहीं करेगा। सभ्यता के बढ़ते चरणों में एकता ही सबकी आराध्य होगी। बिलगाव का प्रदर्शन करने वाली बाल-खिलवाड़ देर तक अपनी अलग पहचान न रह सकेगी। बिखराव सहन न होगा। बिलगाव को कहीं से भी समर्थन नहीं मिलेगा। संकीर्ण स्वार्थपरता और अपने मतलब से मतलब रखने वाली क्षुद्रता किसी भी क्षेत्र में व्यावहारिक न होगी। मिलजुल कर रहने पर ही शांति, सुविधा और प्रगति की दिशा में बढ़ा जा सकेगा। वसुधैव कुटुंबकम् का आदर्श अब समाजवाद, समूहवाद, संगठन, एकीकरण का विधान बन कर समय के अनुरूप कार्यान्वित होगा। उसे सभी विज्ञजनों का समान समर्थन भी मिलेगा।

अगली दुनिया एकता का लक्ष्य स्वीकारने के लिए निश्चय कर चुकी है। अड़ंगेबाजी से निबटना ही शेष है। वे प्रवाह में बहने वाले पत्तों की तरह लहरों पर उछलते कूदते कहीं से कहीं जा पहुँचेंगे। चक्रवात से टकराने की मूर्खता करने वाले तिनकों के अस्तित्व उस वायु भँवर में फँस कर अपना अस्तित्व तक गँवा बैठते हैं। एकता अब अपरिहार्य होकर रहेगी। जाति-पाँति के नाम पर रंग, वर्ण और लिंग के आधार पर अलग-अलग कबीले बसा कर रहना आदिम काम में ही संभव था, आज के औचित्य को समर्थन देने वाले युग में नहीं।

संसार भर में एक ही जाति का अस्तित्व रहेगा और वह है सुसंस्कृत, सभ्य मनुष्य जाति का। काले, पीले, सफेद, गेहुँआ आदि रंगों की चमड़ी होने से किसी को भी अपनी अलग बिरादरी बनाए रह सकना अब संभव न होगा। समझदारी के माहौल में मात्र न्याय ही जीवित रहेगा और औचित्य ही सराहा, अपनाया जाएगा, तूती उसी की ही बोलेगी।

धर्म सम्प्रदायों के नाम पर, भाषा, जाति, प्रथा, क्षेत्र आदि के नाम पर जो कृत्रिम विभेद की दीवारें बन गई हैं, वे लहरों की तरह अपना-अपना अलग प्रदर्शन भले ही करती रहें, पर वे सभी एक ही जलाशय की सामयिक हलचल भर मानी जाएँगी। पानी में उठने वाले बबूले थोड़ी देर उछलने-मचलने का कौतूहल दिखाते हैं, इसके बाद त्वरित ही उनका अथाह जलराशि में विलय, समापन हो जाता है। मनुष्य को अलगाव और बिखराव में बाँधने वाले प्रचलन इन दिनों कितने ही पुरातन, शास्त्र-सम्मत अथवा संकीर्णता पर आधारित होने के कारण कितने ही प्रबल प्रतीत क्यों न होते हों, पर अगले तूफान में इन बालुई घर-घरोंदों में से एक का भी पता न चलेगा। मनुष्य जाति अभी इन दिनों भले ही एक न हो, पर अगले ही दिनों वह सुनिश्चित रूप से एक बन कर रहेगी।

धरातल एक देश बन कर रहेगा। देशों की कृत्रिम दीवारें खींचकर उसके टुकड़े बने रहना न तो व्यावहारिक रहेगा, न सुविधाजनक। इनके रहते शोषण, आक्रामकता, आपाधापी का माहौल बना ही रहेगा। देश भक्ति के नाम पर युद्ध छिड़ते रहेंगे और समर्थ दुर्बलों को पीसते रहेंगे। ‘‘जंगल का कानून-मत्स्य न्याय’’ इस अप्राकृतिक विभाजन की व्यवस्था ने ही उत्पन्न किया है। हर क्षेत्र का नागरिक अपनी ही छोटी कोठरियों में रहने के लिए बाधित है। वहाँ यह सुविधा नहीं कि अपनी अनुकूलता वाले किसी भी क्षेत्र में बस सकें।

कुछ देशों के पास अपार भूमि है, कुछ को बेतुकी घिचपिच में रहना पड़ता है। कुछ देशों ने अपने क्षेत्र की खनिज एवं प्राकृतिक सम्पदाओं पर अधिकार घोषित करके धन कुबेर जैसी स्थिति प्राप्त कर ली है और कुछ को असीम श्रम करने पर भी प्राकृतिक सम्पदा का लाभ न मिलने पर असहायों की तरह तरसते रहना पड़ता है। भगवान ने धरती को अपने सभी पुत्रों के लिए समान सुविधा देने के लिए सृजा है। प्राकृतिक सम्पदा पर सभी का समान हक है। फिर कुछ देश अनुचित अधिकार को अपनी पिटारी में बंद कर शेष को दाने-दाने के लिए तरसावें, यह विभाजन अन्यायपूर्ण होने के कारण देर तक टिकेगा नहीं। आज की दादागीरी आगे भी इसी प्रकार अपनी लाठी बजाती रहेगी, यह हो नहीं सकेगा। विश्व एक देश होगा और उस पर रहने वाले सभी मनुष्य ईश्वर प्रदत्त सभी साधनों का उपयोग एक पिता की संतान होने के नाते कर सकेंगे। परिश्रम और कौशल के आधार पर किसी को कुछ अधिक मिले, यह दूसरी बात है, पर पैतृक सम्पदा पर तो सभी संतानों का समान अधिकार होना ही चाहिए। औचित्य होना चाहिए, ऐसा मनीषा ने घोषित किया है। न्याय युग में उसे ‘‘हो रहा है’’ या ‘‘हो गया’’ कहा जाएगा।

बूँदें अगल-अलग रह कर अपनी श्री गरिमा का परिचय नहीं दे सकतीं। उन्हें हवा का एक झोंका भर सुखा देने में समर्थ होता है, पर जब वे मिलकर एक विशाल जलाशय का रूप धारण करती हैं, तो फिर उनकी समर्थता और व्यापकता देखते ही बनती है। इस तथ्य को हमें समूची मानव जाति को एकता के केन्द्र पर केंद्रित करने के लिए साहसिक तत्परता अपनाते हुए संभव कर दिखाना होगा।

धर्म सम्प्रदायों की विभाजन रेखा भी ऐसी ही है, जो अपनी मान्यताओं को सच और दूसरों के प्रतिपादनों को झूठा सिद्ध करने में अपने बुद्धि-वैभव से शास्त्रार्थों, टकरावों के आ पड़ने पर उभरती रही है। अस्त्र-शस्त्रों वाले युद्धों ने कितना विनाश किया है, उसका प्रत्यक्ष होने के नाते लेखा-जोखा लिया जा सकता है, पर अपनी धर्म मान्यता दूसरों पर थोपने के लिए कितना दबाव और कितना प्रलोभन, कितना पक्षपात और कितना अन्याय इन कामों में लगाया गया है, इसकी परोक्ष विवेचना किया जाना संभव हो तो प्रतीत होगा कि इस क्षेत्र के आक्रमण भी कम दुःखदायी नहीं रहे हैं। आगे भी इसका इसी प्रकार परिपोषण और प्रचलन होता रहा तो विवाद, विनाश और विषाद घटेंगे नहीं बढ़ते ही रहेंगे। अनेकता में एकता खोज निकालने वाली दूरदर्शिता को सम्प्रदायवाद के क्षेत्र में भी प्रवेश करना चाहिए।

आरंभिक दिनों में सर्व-धर्म-समभाव सहिष्णुता, बिना टकराए अपनी-अपनी मर्जी पर चलने की स्वतंत्रता अपनाए रहना ठीक है, काम चलाऊ नीति है। अंततः विश्व मानव का एक ही मानव धर्म होगा। उसके सिद्धांत चिंतन, चरित्र और व्यवहार के साथ जुड़ने वाली आदर्शवादिता पर अवलंबित होंगे। मान्यताओं और परम्पराओं में से प्रत्येक को तर्क, तथ्य, प्रमाण, परीक्षण एवं अनुभव की कसौटियों पर कसने के उपरांत ही विश्व धर्म की मान्यता मिलेगी। संक्षेप में उसे आदर्शवादी व्यक्तित्व और न्यायोचित निष्ठा पर अवलंबित माना जाएगा। विश्व धर्म की बात आज भले ही सघन तमिस्रा में कठिन मालूम पड़ती हो, पर वह समय दूर नहीं जब एकता का सूर्य उगेगा और इस समय जो अदृश्य है, असंभव प्रतीत होता है, वह उस वेला में प्रत्यक्ष एवं प्रकाशवान होकर रहेगा। यही हैं आने वाली सतयुगी समाज व्यवस्था की कुछ झलकियाँ, जो हर आस्तिक को भविष्य के प्रति आशावान् बनाती हैं।

* पेशवा की सेना की ओर धुँआ उड़ता देखकर तैमूर लंग ने पूछा-यह क्या हो रहा है? खुफिया अफसरों ने बताया-हिन्दू एक दूसरे का छुआ भोजन नहीं खाते, इसीलिए सब अपना-अपना अलग-अलग भोजन पका रहे हैं, उसी का धुँआ है। तैमूर ने कहा-जो जाति इस तरह विभक्त हो, उसे जीतना क्या कठिन है? उसी समय हमला बोल दिया और पेशवा की सेना जीत ली गई।

* किसी ने बिनोवा जी से पूछा-आप महाराष्ट्रीय ब्राह्मण हैं- कोंकणस्थ या देशस्थ? उन्होंने कहा-मैं देश में रहता हैं, इसलिए देशरथ हूँ, काया में रहता हूँ इसलिए कायस्थ हूँ और सबसे अधिक तो मैं स्वस्थ हूँ जो कि किसी धर्म, जाति और देश से संबंध नहीं रखता। वे सज्जन अपनी जाति-पाँति मूलक संकीर्णता पर बहुत लज्जित हुए।

17—मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगे, तो युग अवश्य बदलेगा।

परिस्थितियों का हमारे ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। आस-पास का जैसा वातावरण होता है, वैसा बनने और करने के लिए मनोभूमि का रुझान होता है और साधारण स्थिति के लोग उन परिस्थितियों के साँचे में ढल जाते हैं। घटनाएँ हमें प्रभावित करती हैं, व्यक्ति का प्रभाव अपने ऊपर पड़ता है। इतना होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि सबसे अधिक प्रभाव अपने विश्वासों का ही अपने ऊपर पड़ता है। परिस्थितियाँ किसी को तभी प्रभावित कर सकती हैं, जब मनुष्य उनके आगे सिर झुका दे। यदि उनके दबाव को अस्वीकार कर दिया जाए तो फिर कोई परिस्थिति किसी मनुष्य को अपने दबाव में देर तक नहीं रख सकती। विश्वासों की तुलना में परिस्थितियों को प्रभाव निश्चय ही नगण्य है।

कहते हैं कि भाग्य की रचना ब्रह्मा जी करते हैं। सुना जाता है कि कर्म-रेखाएँ जन्म से पहले ही लिख दी जाती हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि तकदीर के आगे तदवीर की नहीं चलती। ये किंवदंतियाँ एक सीमा तक ही सच हो सकती हैं। जन्म से अंधा, अपंग उत्पन्न हुआ या अशक्त, अविकसित व्यक्ति ऐसी विपत्ति सामने आ खड़ी होती है, जिससे बच सकना या रोका जा सकना अपने वश में नहीं होता। अग्निकाण्ड, भूकम्प, युद्ध, महामारी, अकाल-मृत्यु दुर्भिक्ष, रेल, मोटर आदि का पलट जाना, चोरी, डकैती आदि के कई अवसर ऐसे आ जाते हैं और ऐसी विपत्ति सामने आ खड़ी होती है, जिससे बच सकना या रोका जा सकना अपने वश में नहीं होता। ऐसी कुछ घटनाओं के बारे में भाग्य या होतव्यता की बात मानकर संतोष किया जाता है। पीड़ित मनुष्य के आंतरिक विक्षोभ को शांत करने के लिए भाग्यवाद की तड़पन दूर करने के लिए डॉक्टर लोग नींद की गोली खिला देते हैं , मर्फिया का इंजेक्शन लगा देते हैं, कोकीन आदि की फुरहरी लगाकर पीड़ित स्थान को सुन्न कर देते हैं। ये विशेष परिस्थितियों के विशेष उपचार हैं। यदा-कदा ही ऐसी बात होती है, इसलिए इन्हें अपवाद ही कहा जाएगा।

पुरुषार्थ का नियम है और भाग्य उसका अपवाद। अपवादों को भी अस्तित्व तो मानना पड़ता है, पर उनके आधार पर कोई नीति नहीं अपनाई जा सकती, कोई कार्यक्रम नहीं बनाया जा सकता। कभी-कभी स्त्रियों के पेट से मनुष्याकृति से भिन्न आकृति के बच्चे जन्म लेते देखे गए हैं। कभी-कभी कोई पेड़ असमय में ही फल-फूल देने लगता है, कभी-कभी ग्रीष्म ऋतु में ओले बरस जाते हैं, यह अपवाद है। इन्हें कौतूहल की दृष्टि से देखा जा सकता है, पर इनको नियम नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार भाग्य की गणना अपवादों में तो हो सकती है, पर यह नहीं माना जा सकता कि मानव जीवन की सारी गतिविधियाँ ही पूर्व निश्चित भाग्य-विधान के अनुसार होती हैं। यदि ऐसा होता तो पुरुषार्थ और प्रयत्न की कोई आवश्यकता ही न रह जाती। जिसके भाग्य में जैसा होता है, वैसा यदि अमिट ही है, तो फिर पुरुषार्थ करने से भी अधिक क्या मिलता और पुरुषार्थ न करने पर भी भाग्य में लिखी सफलता अनायास ही क्यों न मिल जाती?

हर व्यक्ति अपने-अपने अभीष्ट उद्देश्यों के लिए पुरुषार्थ करने में संलग्न रहता है, इससे प्रकट है कि आत्मा का सुनिश्चित विश्वास पुरुषार्थ के ऊपर है और वह उसी का प्रेरणा निरंतर प्रस्तुत करती रहती है। हमें समझ लेना चाहिए कि ब्रह्मा जी किसी का भाग्य नहीं लिखते, हर मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। जिस प्रकार कल का जमाया हुआ दूध आज दी बन जाता है, उसी प्रकार कल का पुरुषार्थ आज भाग्य बनकर प्रस्तुत होता है। आज के कर्मों का फल आज ही नहीं मिल जाता। उसका परिपाक होने में, परिणाम प्राप्त होने में, परिणाम निकलने में कुछ देर लगती है। यह देरी ही भाग्य कही जा सकती है। परमात्मा समदर्शी और न्यायकारी है, उसे अपने सब पुत्र समान रूप से प्रिय हैं, फिर वह किसी का भाग्य अच्छा, किसी का बुरा लिखने का अन्याय या पक्षपात क्यों करेगा? उसने अपने हर बालक को भले या बुरे कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है, पर साथ ही यह भी बता दिया है कि उनके भले या बुरे परिणाम भी अवश्य प्राप्त होंगे। इस प्रकार कर्म को ही यदि भाग्य कहें तो अत्युक्ति न होगी।

हमारे जीवन में अगणित समस्याएँ उलझी हुई गुत्थियों के रूप में विकसित वेष धारण किए सामने खड़ी हैं। इस कटु सत्य को मानना ही चाहिए। उनके उत्पादक हम स्वयं हैं और यदि इस तथ्य को स्वीकार करके अपनी आदतों, विचारधाराओं, मान्यताओं और गतिविधियों को सुधारने के लिए तैयार हों, तो इन उलझनों को हम स्वयं ही सुलझा सकते हैं। बेचारे ग्रह-नक्षत्रों पर दोष थोपना बेकार है। लाखों-करोड़ों मील दूर दिन-रात चक्कर काटते हुए अपनी मौत के दिन पूरे करने वाले ग्रह-नक्षत्र भला हमें क्या सुख-सुविधा प्रदान करेंगे? उनको छोड़कर सच्चे ग्रहों का पूजन आरंभ करें, जिनकी थोड़ी-सी कृपा-कोर से ही हमारा सारा प्रयोजन सिद्ध हो सकता है, सारी आकांक्षाएँ देखते-देखते पूर्ण हो सकती हैं।

नव-रात्रियों में हम हर साल नव दुर्गाओं की पूजा करते हैं, मानते हैं कि अनेक ऋद्धि-सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। सुख-सुविधाओं की उपलब्धि के लिए उनकी कृपा और सहायता पाने के लिए विविध साधना व पूजन किए जाते हैं। जिस प्रकार देवलोकवासिनी नव दुर्गाएँ हैं, उसी प्रकार भू-लोक में निवास करने वाली, हमारे अत्यंत समीप, शरीर और मस्तिष्क में ही रहने वाली नौ प्रत्यक्ष देवियाँ भी हैं और उनकी साधना का प्रत्यक्ष परिणाम भी मिलता है। देवलोकवासिनी देवियों के प्रसन्न होने और न होने की बात तो संदिग्ध हो सकती है, पर शरीर-लोक में रहने वाली नौ देवियों की साधना का श्रम कभी भी व्यर्थ नहीं जा सकता। यदि थोड़ा भी प्रयत्न इनकी साधना के लिए किया जाए, उसका भी समुचित लाभ मिल जाता है। हमारे मनःक्षेत्र में विचरण करने वाली इन नौ देवियों के नाम हैं

(१) आकांक्षा, (२) विचारणा, (३) भावना, (४) श्रद्धा, (५) प्रवृत्ति, (६) निष्ठा, (७) क्षमता, (८) क्रिया, (९) मर्यादा। इनको संतुलित करके मनुष्य अष्ट सिद्धियों और नव निद्धियों को स्वामी बन सकता है। संसार के प्रत्येक प्रगतिशील मनुष्य को जाने या अनजाने में इनकी साधना करनी ही पड़ी है और इन्हीं के अनुग्रह से उन्हें उन्नति के उच्चशिखर पर चढ़ने का अवसर मिला है।

अपने को उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न किया जाए, तो हमारे संपर्क में आने वाले दूसरे लोग भी श्रेष्ठ बन सकते हैं। आदर्श सदा कुछ ऊँचा रहता है और उसकी प्रतिक्रिया कुछ नीची रह जाती है। आदर्श का प्रतिष्ठापन करने वालों को सामान्य जनता के स्तर से सदा ऊँचा रहना पड़ा है। संसार को हम जितना अच्छा बनाना और देखना चाहते हैं, उसकी अपेक्षा स्वयं को कहीं ऊँचा बनाने का आदर्श उपस्थित करना पड़ेगा। उत्कृष्टता ही श्रेष्ठता उत्पन्न कर सकती है। परिपक्व शरीर की माता ही स्वस्थ बच्चे का प्रसव करती है। आदर्श पिता बनें, तब ही सुसंतति का सौभाग्य प्राप्त कर सकेंगे। आदर्श पिता बनें, तब ही सुसंतति का सौभाग्य प्राप्त कर सकेंगे। यदि आदर्श पति हों, तो ही पतिव्रता पत्नी की सेवा प्राप्त कर सकेंगे। शरीर की अपेक्षा छाया कुछ कुरूप ही रह जाती है। चेहरे की अपेक्षा फोटो में कुछ न्यूनतम ही रहती है। हम अपने आपको जिस स्तर तक विकसित कर सके होंगे, हमारे समीपवर्ती लोग उससे प्रभावित होकर कुछ ऊपर तो उठेंगे, तो भी हमारी अपेक्षा कुछ नीच रह जाएँगे। इसलिए हम दूसरे से जितनी सज्जनता और श्रेष्ठता की आशा करते हों, उसकी तुलना में अपने को कुछ अधिक ही ऊँचा प्रमाणित करना होगा। हमें निश्चित रूप से यह याद रखे रहना होगा कि उत्कृष्टता के बिना श्रेष्ठता उत्पन्न नहीं हो सकती।

लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर, लंबी-चौड़ी डींग हाँककर या बड़े-बड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आशा करना व्यर्थ है। इन साधनों से थोड़ी मदद मिल सकती है, पर उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। युग निर्माण जैसे महान् कार्य के लिए तो यह साधन सर्वथा अपर्याप्त और अपूर्ण हैं। इसका प्रधान साधन यही हो सकता है कि हम अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठाएँ, चारित्रिक दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्कृष्ट बनें। अपने आचरण से ही दूसरों को प्रभावशाली शिक्षा दी जा सकती है। गणित, भूगोल, इतिहास आदि की शिक्षा में कहने-सुनने की प्रक्रिया से काम चल सकता है, पर व्यक्ति निर्माण के लिए तो निखरे हुए व्यक्तित्वों की ही आवश्यकता पड़ेगी। उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सबसे पहले हमें स्वयं ही आगे आना पड़ेगा। हमारी उत्कृष्टता के साथ-साथ संसार की श्रेष्ठता अपने आप बढ़ने लगेगी। हम बदलेंगे, तो युग भी जरूर बदलेगा और हमारा युग निर्माण संकल्प भी अवश्य पूर्ण होगा।

आज वे ऋषि-मुनि नहीं रहे, जो अपने आदर्श चरित्र द्वारा लोक शिक्षण करके, जन साधारण के स्तर को ऊँचा उठाते थे। आज वे ब्राह्मण भी नहीं रहे, जो अपने अगाध ज्ञान, वंदनीय त्याग और प्रबल-पुरुषार्थ से जन-मानस की पतनोन्मुख पशु-प्रवृत्तियों को मोड़कर देवत्व की दिशा में पलट डालने का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाते थे। वृक्षों के अभाव में एरंड का पेड़ ही वृक्ष कहलाता है। इस विचारधारा से जुड़े विशाल देव परिवार के परिजन अपने छोटे-छोटे व्यक्तित्वों को ही आदर्शवाद की दिशा में अग्रसर करें, तो भी कुछ न कुछ प्रयोजन सिद्ध होगा, कम से कम एक अवरुद्ध द्वार तो खुलेगा ही। यदि हम मार्ग बनाने में अपनी छोटी-छोटी हस्तियों को लगा दें, तो कल आने वाले युग प्रवर्तकों की मंजिल आसान हो जाएगी। युग निर्माण सत्संकल्प का शंखनाद करते हुए छोटे-शक्तियों के जागरण की चेतना को यदि चारित्रिक संधान के लिए जम जाग्रत कर सकें, तो आज न सही तो कल, हमारा युग निर्माण संकल्प पूर्ण होकर रहेगा।

युग परिवर्तन की सुनिश्चितता पर विश्वास करना हवाई महल नहीं बल्कि तथ्यों पर आधारित एक सत्य है। परिस्थितियाँ कितनी ही विकट हों, जब सदाशयता सम्पन्न संकल्पशील व्यक्ति एक जुट होकर कार्य करते हैं तो स्थिति बदले बिना नहीं रहती। असुरता के आतंक से मुक्ति का पौराणिक आख्यान हो या जिनके शासन में सूर्य नहीं डूबता था, उनके चंगुल से मुक्त होने का स्वतंत्रता अभियान, नगण्य शक्ति से ही सही, पर संकल्पशील व्यक्तियों का समुदाय उसके लिए युग-शक्ति के अवतरण का माध्यम बन ही जाता है। युग निर्माण अभियान से परिचित व्यक्ति यह भली प्रकार समझने लगे हैं कि यह ईश्वर प्रेरित प्रक्रिया है। इस संकल्प को अपनाने वाला ईश्वरीय संकल्प का भागीदार कहला सकता है। अस्तु, उसकी सफलता पर पूरी आस्था रखकर उसको जीवन में चरितार्थ करने-कराने के लिए पूरी शक्ति झोंक देना, सबसे बड़ी समझदारी सिद्ध होगी।

18—‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।

युग निर्माण की योजना का श्री गणेश हमें अपने आप से आरंभ करना चाहिए। वर्तमान नारकीय परिस्थितियों को भावी सुख-शान्तिमयी स्वर्गीय वातावरण में बदलने के लिए चिंतन ही एकमात्र वह केन्द्र बिन्दु है, जिसके आधार पर व्यक्ति की दिशा, प्रतिभा, क्रिया, स्थिति एवं प्रगति पूर्णतया निर्भर है। चिंतन की उत्कृष्टता, निकृष्टता के आधार पर व्यक्ति, देव और असुर बनता है। स्वर्ग और नरक का सृजन पूर्णतया मनुष्य के अपने हाथ में है। अपने भाग्य और भविष्य का निर्माण हर कोई स्वयं ही करता है। उत्थान एवं पतन की कुँजी चिंतन की दिशा को ही माना गया ह। हमें अपनी परिस्थितियाँ यदि उत्कृष्ट स्तर की अभीष्ट हों तो इसके लिए एक अनिवार्य शर्त यह है कि अपने चिंतन की धारा निकृष्टता की दिशा में प्रवाहित होने से रोककर उसे उत्कृष्टता की ओर मोड़ दें। यह मोड़ ही हमारे स्तर, स्वरूप और परिस्थितियों को बदलने में समर्थ हो सकता है। चिंतन निकृष्ट स्तर का हो और हम महानता वरण कर सकें, यह संभव नहीं। संकीर्ण और स्वार्थी लोग अनीति से कुछ पैसे भले ही इकट्ठे कर लें, पर उन विभूतियों से सर्वथा वंचित ही बने रहेंगे, जो व्यक्तित्व को प्रखर और परिस्थितियों को सुख-शांति से भरी संतोषजनक बना सकती है।

समाज व्यक्तियों के समूह का नाम है। व्यक्ति जैसे होंगे समाज वैसा ही बन जाएगा। लोग जैसे होंगे वैसा ही समाज एवं राष्ट्र बनेगा। दीन दुर्बल स्तर की जनता कभी समर्थ और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकती। धर्म, शासन, व्यवसाय, उद्योग, चिकित्सा, शिक्षा, कला आदि सभी क्षेत्रों का नेतृत्व जनता के ही आदमी करते हैं। जन-मानस का उत्तर गिरा हुआ हो तो ऊँचे, अच्छे, समर्थ और सजीव व्यक्तित्व नेतृत्व के लिए कहाँ से आएँगे?

व्यक्ति और समाज की समग्र प्रगति के लिए चिंतन की स्वस्थ दिशा एवं उत्कृष्टता दृष्टिकोण का होना अनिवार्य एवं आवश्यक है। इसकी पूर्ति चाहे आज की जाए चाहे से हजार वर्ष बाद। प्रगति का प्रभाव उसी दिन उदय होगा, जिस दिन यह भली-भाँति अनुभव कर लिया जाएगा कि दुर्दशा से छुटकारा पाने के लिए दुर्बुद्धि का परित्याग आवश्यक है। आज की स्थिति में सबसे बड़ा शौर्य, साहस, पराक्रम और पुरुषार्थ यह है कि हम पूरा मनोबल इकट्ठा करके अपनी और अपने सवे संबंधित व्यक्तियों की विचार शैली में ऐसा प्रखर परिवर्तन प्रस्तुत करें, जिसमें विवेक की प्रतिष्ठापना हो और अविवेकपूर्ण दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों को पैरों तले कुचल कर रख दिया जाए।

मूढ़ता और दुष्टता के प्रति व्यामोह ने हमें असहाय और कायर बना दिया है। जिसे अनुचित अवांछनीय समझते हैं, उसे बदलने सुधारने का साहस कर नहीं पाते। न तो सत्य को अपनाने का साहस है और न असत्य को त्यागने का। कुड़-कुड़ाते भर जरूर हैं कि हम अनुपयुक्त विचारणा एवं परिस्थितियों से ग्रस्त हैं, पर जब सुधार और बदलाव का प्रश्न आता है, तो पैर थर-थर कर काँपने लगते हैं और जी काँपने लगता है। कायरता नस-नस में रम कर बैठ गई है। अपनी अवांछनीय मान्यताओं से जो नहीं लड़ सकता, वह आक्रमणकारियों से क्या लड़ेगा? जो अपनी विचारणा को नहीं सुधार सकता, वह परिस्थितियों को क्या सुधारेगा?

युग परिवर्तन का शुभारंभ अपनी मनोभूमि के परिवर्तन के साथ आरंभ करना होगा। हम लोग नव निर्माण के संदेशवाहक एवं अग्रदूत हैं। परिवर्तन की प्रक्रिया हमें अपनी चिंतन दिशा अविवेक से विलग कर विवेक के आधार पर विनिर्मित करनी चाहिए। जो असत्य है, अवांछनीय है, अनुपयोगी है, उसे छोड़कर हम साहस दिखाएँ। अब बहादुरी का मुकुट उनके सिर बाँधा जाएगा, जो अपनी दुर्बलताओं से लड़ सकें और अवांछनीयता को स्वीकार करने से इंकार कर सकें। नव निर्माण के अग्रदूतों की साहसिकता इसी स्तर की होनी चाहिए। उनका प्रथम चरण अपनी अवांछनीय मान्यताओं को बदल डालने और अपने क्रिया-कलाप में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए एक बार पूरा मनोबल इकट्ठा कर लेना चाहिए और बिना दूसरों की निंदा-स्तुति की, विरोध-समर्थन की चिंता किए निर्दिष्ट पथ पर एकाकी चल देना चाहिए। ऐसे बड़े कदम जो उठा सकते हों, उन्हीं से यह आशा की जाएगी कि युग परिवर्तन के महान् अभियान में वास्तविकता योगदान दे सकेंगे।

जानकारियाँ देने और ग्रहण करने भर की आवश्यकता वाणी और लेखनी द्वारा सम्पन्न की जा सकती है। तर्क और प्रमाण प्रस्तुत करके विचार बदले जा सकते हैं, पर अंतराल में जमी हुई आस्थाओं तथा चिर अभ्यस्त गतिविधियों को बदलने के लिए समझाने-बुझाने से भी बड़ा आधार प्रस्तुत करना पड़ेगा और यह है-अपना आदर्श एवं उदाहरण प्रस्तुत करना।’’ अनुकरण की प्रेरणा इसी से उत्पन्न होती है। दूसरों को इस सीमा तक प्रभावित करना कि वे भी अवांछनीयता को छोड़ने का साहस दिखा सकें, तभी संभव है, जब वैसे ही साहसी लोगों के अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किए जा सकें। आज आदर्शवादिता की बढ़-चढ़कर अपना उदाहरण प्रस्तुत कर सकें, ऐसे निष्ठावान् देखने को नहीं मिलते। यही कारण है कि उपदेशों पर किया श्रम व्यर्थ सिद्ध होता चला जा रहा है और सुधार की अभीष्ट आवश्यकता पूरी हो सकने का सुयोग नहीं बन पा रहा है।

जन-मानस के परिवर्तन की महती आवश्यकता को यदि सचमुच पूरा किया जाना है, तो उसका रास्ता एक ही है कि आदर्शों को जीवन में उतार सकने वाले साहसी लोगों का एक ऐसा दल प्रकट हो, जो अपने आचरणों द्वारा यह सिद्ध करे कि आदर्शवादिता केवल एक-दूसरे को उपदेश करने भर की विडंबना नहीं है वरन् उसे कार्य रूप में परिणत भी किया जा सकता है। इस प्रतिपादन का प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए हमें अपने को ही आगे करना होगा। दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर गोली नहीं चलाई जा सकती। आदर्श कोई और प्रस्तुत करे और नेतृत्व हम करें, अब यह बात नहीं चलेगी। हमें अपनी आस्था की प्रामाणिकता अपने आचरण द्वारा सिद्ध करनी होगी। आचरण ही सदा से प्रामाणिक रहा है, उसी से लोगों को अनुकरण की प्रेरणा मिलती है।

आज जन मानस में यह भय और गहराई तक घुस गया है कि आदर्शवादी जीवन में कष्ट और कठिनाइयाँ भरी पड़ी हैं। उत्कृष्ट विचारणा केवल कहने-सुनने भर का मनोरभ करने के लिए है। उसे व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित नहीं किया जा सकता। प्राचीनकाल के महापुरुषों के उदाहरण प्रस्तुत करना काफी नहीं, उत्साह तो प्रत्यक्ष से ही उत्पन्न होता है। जो सामने है, उसी से अनुकरण की प्रेरणा उपज सकती है। जो इस अभाव एवं आवश्यकता की पूर्ति किसी न किसी को तो पूरी करनी हो होगी। इसके बिना विकृतियों और विपत्तियों के वर्तमान संकट से छुटकारा पाया न जा सकेगा।

यह आवश्यकता हम लोगों को ही पूरी करनी होगी। दूसरों लोग इस मोर्चे से पीछे हट रहे हैं। उन्हें नेतागिरी यश, प्रशंसा और मान प्राप्त करने की ललक तो है, पर अपने को आदर्शवाद की प्रतीक प्रतिमा के रूप में प्रस्तुत करने का साहस नहीं हो रहा है। आज के अगणित तथाकथित लोकसेवी अवांछनीय लोकमान्यताओं के ही अनुगामी बने हुए हैं। धार्मिक क्षेत्र के अधिकांश नेता, संत-महंत जनता की रूढ़ियों, मूढ़ताओं और अंध-परम्पराओं का पोषण उनकी अवांछनीयताओं को समझते हुए भी करते रहते हैं। राजनैतिक नेता अपना चुनाव जीतने के लिए वोटरों की अनुचित माँगें पूरी करने के लिए भी सिर झुकाए रहते हैं।

इस स्थिति में पड़े हुए लोग जनमानस के परिष्कार जैसी लोकमंगल की मूलभूत आवश्यकता पूर्ण कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते। इस प्रयोजन की पूर्ति वे करेंगे, जिनमें लोकरंजन की अपेक्षा लोकमंगल के लिए आगे बढ़ने का, निंदा, अपयश और विरोध सहने का साहस हो। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने बंदूक की गोलियाँ खाई थीं। बौद्धिक पराधीनता के विरुद्ध छेड़े हुए अपने विचार क्रांति संग्राम में भाग लेने वाले सेनानियों को कम से कम गाली खाने के लिए तैयार रहना ही होगा, जो गाली खाने से डरेगा, वह अवांछनीयता के विरुद्ध आवाज कैसे उठा सकेगा? अनुचित से लड़ कैसे सकेगा? इसलिए युग परिवर्तन के महान् अभियान का नेतृत्व कर सकने की आवश्यकता शर्त यह है कि इस क्षेत्र में कोई यश और मान पाने के लिए नहीं विरोध, निंदा और तिरस्कार पाने की हिम्मत लेकर आगे आए। नव निर्माण का सुधारात्मक अभियान गतिशील बनाने में मिलने वाले विरोध और तिरस्कार को सहने के लिए आगे कौन आए? इसके लिए प्रखर मनोबल और प्रचंड साहस की आवश्यकता होती है। इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मूर्धन्य स्तर के लोग भी साहस विहीन लुंज-पुंज दिखाई दे रहे हैं और शौर्य पराक्रम के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों से डरकर आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

आज सच्चे अध्यात्म को कल्पना लोक से उतार कर व्यावहारिक जीवन में उतारे जाने की नितांत आवश्यकता है। इसके बिना हम आत्मिक प्रगति न कर सकेंगे। अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित न कर सकेंगे और यदि यह न किया जा सका, तो समाज के नव निर्माण का, धरती पर स्वर्ग के अवतरण का प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपना समस्त साहस बटोर कर अपनी वासनाओं, तृष्णाओं, संकीर्णताओं और स्वार्थपरताओं से लड़ पड़ें। इन भव बंधनों को काट डालें और जीवन को ऐसा प्रकाशवान् बनाएँ, जिसकी आभा से वर्तमान युग का सारा अंधकार तिरोहित हो सके और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ आलोकित हो उठें।

आचार्य रामानुज उपदेश दे रहे थे-भगवान् प्राणिमात्र में समाए हुए हैं, सब में अपनी ही आत्मा देखनी चाहिए। उपदेश एक चाण्डाल भी सुन रहा था। जैसे ही प्रवचन समाप्त हुआ, वह आचार्य प्रवर के पैर छूने को बढ़ा। आचार्य ने उसे देखा, तो क्रुद्ध हो उठे और डाँटा-मुझे छुएगा क्या? चाण्डाल ठिठक गया और बोला-महाराज तो फिर आप बतलाइए कि मैं अपने भगवान् को कहाँ ले जाऊँ? आचार्य की आँखें खुल गईं। चाण्डाल को अंक में भरते हुए उन्होंने कहा-तात क्षमा करो। आज तुमने मेरी आँखें खोल दीं।

अपना मूल्यांकन भी करते रहें

यह निर्विवाद सत्य है कि धर्म और सदाचार के आदर्शवादी सिद्धांतों का प्रशिक्षण भाषणों और लेखों से पूरा नहीं हो सकता। ये दोनों माध्यम महत्त्वपूर्ण तो हैं, पर इनका उपयोग इतना ही है कि वातावरण तैयार कर सकें। वास्तविक प्रभाव तो तभी पड़ता है, जब अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करके किसी को प्रभावित किया जाए। चूँकि हमें नए समाज की, नए आदर्शों, जनमानस में प्रतिष्ठापना करनी है, इसलिए यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है कि युग निर्माण परिवार के सदस्य दूसरों के सामने अपना अनुकरणीय आदर्श रखें। प्रचार का यही श्रेष्ठ तरीका है। इस पद्धति को अपनाए बिना जनमानस को उत्कृष्टता की दिशा में प्रभावित एवं प्रेरित किया जाना संभव नहीं। इसलिए सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य इस बात की चेष्टा करे कि उसके जीवन में आलस्य, प्रमाद, अव्यवस्था एवं अनैतिकता की जो दुर्बलताएँ समाई हुई हों, उनका गंभीरतापूर्वक निरीक्षण करे और इस आत्म-चिंतन में जो-जो दोष दृष्टिगोचर हों, उन्हें सुधारने के लिए एक क्रमबद्ध योजना बनाकर आगे बढ़ चले।

आत्म चिंतन के लिए हम में से हर एक हो अपने से निम्न प्रश्न पूछने चाहिए और उनके उत्तरों को नोट करना चाहिए।

(१) समय जैसी जीवन की बहुमूल्य निधि का हम ठीक प्रकार सदुपयोग करते हैं या नहीं? आलस्य और प्रमाद में उसकी बरबादी तो नहीं होती?

(२) जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का हमें ध्यान है या नहीं? शरीर सज्जा में ही इस अमूल्य अवसर को नष्ट तो नहीं कर रहे? देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के पुनीत कर्तव्य की उपेक्षा तो नहीं करते?

(३) अपने विचारधारा एवं गतिविधियों को हमने अंधानुकरण के आधार पर बनाया है या विवेक, दूरदर्शिता एवं आदर्शवादिता के अनुसार उनका निर्धारण किया है?

(४) मनोविकारों और कुसंस्कारों के शमन करने के लिए हम संघर्षशील रहते हैं या नहीं? छोटे-छोटे कारणों को लेकर हम अपनी मानसिक शांति से हाथ धो बैठने और प्रगति के सारे मार्ग अवरुद्ध करने की भूल तो नहीं करते।

(५) कटु भाषण, छिद्रान्वेषण एवं अशुभ कल्पनाएँ करते रहने की आदतें छोड़कर सदा संतुष्ट, प्रयत्नशील एवं हँसमुख रहने की आदत हम डाल रहे हैं या नहीं?

(६) शरीर, वस्त्र, घर तथा वस्तुओं को स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित रखने का अभ्यास आरंभ किया या नहीं? श्रम से घृणा तो नहीं करते?

(७) परिवार को सुसंस्कारी बनाने के लिए आवश्यक ध्यान एवं समय लगाते हैं या नहीं?

(८) आहार सात्विकता प्रधान होता है न? चटोरपन की आदत छोड़ी जा रही है न? सप्ताह में एक समय उपवास, जल्दी सोना, जल्दी उठना, आवश्यक ब्रह्मचर्य का नियम पालते हैं या नहीं?

(९) ईश्वर उपासना, आत्मचिंतन एवं स्वाध्याय को अपने नित्य-नियम में स्थान दे रखा है या नहीं?

(१०) आमदनी से अधिक खर्च तो नहीं करते? कोई दुर्व्यसन तो नहीं? बचत करते हैं न?

उपरोक्त दस प्रश्न नित्य अपने आपसे पूछते रहने वाले को जो उत्तर आत्मा दे, उन पर विचार करना चाहिए और जो त्रुटियाँ दृष्टिगोचर हों, उन्हें सुधारने का नित्य ही प्रयत्न करना चाहिए।

आत्म सुधार के लिए क्रमिक परिष्कार की पद्धति को अपनाने से भी काम चल सकता है। अपने सारे दोष-दुर्गुणों को एक ही दिन में त्याग देने का उत्साह तो लोगों में आता है, पर संकल्प शक्ति के अभाव में बहुधा वह प्रतिज्ञा निभ नहीं पाती, थोड़े समय में वही पुराना कुसंस्कारी ढर्रा आरंभ हो जाता है। प्रतिज्ञाएँ करने और उन्हें न निभा सकने से अपना संकल्प बल घटता है और फिर छोटी-छोटी प्रतिज्ञाओं को निभाना भी कठिन हो जाता है। यह क्रम कई बार चलाने पर तो मनुष्य का आत्मविश्वास ही हिल उठता है और वह सोचता है कि हमारे कुसंस्कार इतने प्रबल हैं कि जीवनोत्कर्ष की दिशा में बदल सकना अपने लिए संभव ही न होगा। यह निराशाजनक स्थिति तभी आती है जब कोई व्यक्ति आवेश और उत्साह में अपने समस्त दोष-दुर्गुणों को तुरंत त्याग देने की प्रतिज्ञा करता है और मनोबल की न्यूनता के कारण चिर-संचित कुसंस्कारों से लड़ नहीं सकता।

आत्मशोधन का कार्य एक प्रकार का देवासुर संग्राम है। कुसंस्कारों की आसुरी वृत्तियाँ अपना मोर्चा जमाए बैठी रहती हैं और वे सुसंस्कार धारण के प्रयत्नों को निष्फल बनाने के लिए अनेकों छल-बल करती रहती हैं। इसलिए क्रमशः आगे बढ़ने और मंथर किंतु सुव्यवस्थित रीति से अपने दोष-दुर्गुणों को परास्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। सही तरीका यह है कि अपनी सभी बुराइयों एवं दुर्बलताओं को एक कागज पर नोट कर लेना चाहिए और प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर उसी दिन का ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए कि आज अपनी अमुक दुर्बलता को इतने अंशों में तो घटा ही देना है। उस दिन को जो कार्यक्रम बनाया जाए, उसके संबंध में विचार कर लेना चाहिए कि इनमें कब, कहाँ, कितने, किन कुसंस्कारों के प्रबल होने की संभावना है। उन संभावनाओं के सामने आने पर हमें कम से कम कितनी आदर्शवादिता दिखानी चाहिए, यह निर्णय पहले ही कर लेना चाहिए और फिर सारे दिन प्रातःकाल की हुई प्रतिज्ञा के निबाहने का दृढ़तापूर्वक प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी सफलता भी आत्म-सुधार की दिशा में प्राप्त होती चले तो अपना साहस बढ़ेगा और धीरे-धीरे सभी दोष-दुर्गुणों को छोड़ सकना संभव हो जाएगा।

छोटे संकल्प-बड़ी सफलताएँ

आज इतनी मात्रा में ही भोजन करेंगे, इतनी दूर टहलने जाएँगे, इतना व्यायाम करेंगे, आज तो ब्रह्मचर्य रखेंगे ही, बीड़ी पीने आदि का कोई व्यसन हो तो रोज जितना बीड़ी पीते थे, उसमें एक कम कर देंगे, इतने समय तो भजन या स्वाध्याय करेंगे ही, सफर एवं व्यवस्था में आज इतनी देर का अमुक समय तो लगाएँगे ही, इस प्रकार की छोटी-छोटी प्रतिज्ञाएँ नित्य लेनी चाहिए और उन्हें अत्यंत कड़ाई के साथ उस दिन तो पालन कर ही लेना चाहिए। दूसरे दिन की स्थिति समझते हुए फिर दूसरे दिन की सुधरी दिनचर्या बनाई जाए। इसमें शारीरिक क्रियाओं का ही नहीं, मानसिक गतिविधियों का सुधार करने का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। प्रतिदिन छोटी-छोटी सफलताएँ प्राप्त करते चलने से अपना मनोबल निरंतर बढ़ता है और फिर एक दिन साहस एवं संकल्प बल इतना प्रबल हो जाता है कि आत्मशोधन की किसी कठोर प्रतिज्ञा को कुछ दिन ही नहीं वरन् आजीवन निबाहते रहना सरल हो जाता है।

दैनिक आत्मचिंतन एवं दिनचर्या निर्धारण के लिए एक समय निर्धारित किया जाए। दिनचर्या निर्धारण के लिए, प्रातः सोकर उठते ही जब तक शैय्या त्याग न किया जाए, वह समय सर्वोत्तम है। आमतौर से नींद खुलने के कुछ देर बाद ही लोग शैय्या त्यागते हैं, कुछ समय तो ऐसे ही आलस में पड़े रहते हैं। यह समय दैनिक कार्यक्रम बनाने के लिए सर्वोत्तम है। शैय्या पर जाते समय ही किसी को नींद नहीं आ जाती, इसमें कुछ देर लगती है। इस अवसर को आत्म-चिंतन में, अपने आपसे १० प्रश्न पूछने और उनके उत्तर प्राप्त करने में लगाया जा सकता है। जिनके पास अन्य सुविधा के समय मौजूद हैं, पर उपरोक्त दो समय व्यस्त से व्यस्त सज्जनों के लिए भी सुविधाजनक रह सकते हैं। इन दोनों प्रक्रियाओं को अपनाकर हम आसानी से आत्मिक प्रगति के पथ पर बहुत आगे बढ़ सकते हैं।

तो फिर हमें क्या करना चाहिए?

इस पुस्तक को पढ़कर आपके मन एवं अंतःकरण में स्वयं के लिए, देश, धर्म और संस्कृति के लिए कुछ करने की उत्कंठा अवश्य जाग्रत हुई होगी। आप सोच रहे होंगे, आखिर हम क्या करें? घबराइए नहीं, श्रेष्ठ जीवन के लिए दैनिक जीवन में बहुत जटिलता की आवश्यकता नहीं होती। सरल सहज जीवन जीते हुए भी आप सुख-शांति अनुभव कर सकते हैं। व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास के लिए तीन उपक्रम अपनाने होंगे-उपासना साधना, आराधना। उपासना के लिए नित्य १५ मिनट अथवा ३० मिनट का समय प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर निकालें। देव मंदिर में ईश्वर के सान्निध्य में बैठें और देव शक्तियों के आशीर्वाद एवं कृपा की वर्षा का भाव रखते हुए अपने अंदर देवत्व की वृद्धि कर अनुभव करें। आपकी श्रद्धा जिस देवता, जिस मंत्र, जिस उपासना में अपने इष्ट के दैवीय गुणों के अपने अंदर वृद्धि का भाव अवश्य रखें। साधना प्रतिपल करनी होती है। ज्ञान और विवेक का दीपक निरंतर अपने अंतर में प्रज्ज्वलित रखें। निकृष्टता से बचने एवं उत्कृष्टता की ओर बढ़ने हेतु मनोबल रहें। दुर्गुणों से बचने एवं उत्कृष्टता की ओर बढ़ने हेतु मनोबल बढ़ाते रहें। दुर्गुणों से बचने एवं सद्गुणों को धारण करने में समर्थ बनें। यही साधना का स्वरूप है। इसके लिए प्रतिपल सतर्कता एवं जागृति आवश्यक है। देश, समाज, धर्म और संस्कृति के उत्थान के हेतु किए गए सेवा कार्य आराधना कहलाते हैं।

पतन का निराकरण ही सर्वोत्कृष्ट सेवा है। सेवा साधना से पतन का निराकरण तब ही संभव है, जब व्यक्ति के चिंतन में आई आकृतियों और अवांछनीयताओं का उन्मूलन हो जाए। सेवा की उमंग है और सर्वोत्कृष्ट रूप की सेवा करने के लिए लगन है, तो इसी स्तर का सेवा कार्य आरंभ करना और चलाना चाहिए।

प्रश्न यह उठता है कि इस स्तर की सेवा साधना किस प्रकार की जाए? मनुष्य के स्तर में आए हुए पतन को किस प्रकार मिटाया जाए और उसे उत्थान की ओर अग्रसर किया जाए। स्पष्ट है कि यह कार्य विचारों और भावनाओं के परिष्कार द्वारा ही किया जा सकता है। इसके लिए विचार परिष्कार की प्रक्रिया चलानी चाहिए तथा उत्कृष्ट और प्रगतिशील सद्विचारों को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए। यह सच है कि समाज में जो कुछ भी अशुभ और अवांछनीय दिखाई देता है, उसका कारण लोगों के व्यक्तिगत दोष ही हैं। उन दोषों की उत्पत्ति व्यक्ति की दूषित विचारणाओं तथा विकृत दृष्टिकोणों से होती है। भोग प्रधान आकांक्षाएँ रखने से मनुष्यों की अतृप्ति बढ़ जाती है और वे अधिक सुख सामग्री की माँग करते हैं। स्वार्थ के कारण ही छीना झपटी और चालाकी बेईमानी बढ़ती है। श्रम से बचने और मौज करने की इच्छाएँ जब तीव्र हो जाती है, तो उचित-अनुचित का विचार छोड़कर लोग कुमार्ग पर चलने लगते हैं, जिसका परिणाम उनके स्वयं के लिए ही नहीं सारे समाज के लिए भी घातक होता है। इस अदूरदर्शितापूर्ण प्रक्रिया को अपनाने से ही संसार में सर्वत्र दुःख-दैन्य का विस्तार हुआ है।

पतन का निवारण करने के लिए मानवीय दृष्टिकोण में परिवर्तन करना आवश्यक है और उस परिवर्तन के लिए मनुष्य का जीवन-दर्शन भी ऊँचा बनाया जाना चाहिए। पतित भावनाओं वाले व्यक्ति के लिए लाँछना एवं आत्म-ग्लानि की व्यथा कष्टदायक नहीं होती, वह निर्लज्ज बना कुकर्म करता रहता है। जब लोक मानस का स्तर भावनात्मक दृष्टि से ऊँचा उठेगा तब ही जीवन में श्रेष्ठता आएगी और उसी के आधार पर विश्व शांति की मंगलमय परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी।

आज का मनुष्य सभ्यता के क्षेत्र में विकास करने के साथ-साथ इतना विचारशील भी बना है कि यदि उसे तथ्य समझाए जाएँ, तो वह उन्हें समझने और मानने के लिए तैयार हो जाता है। लोकसेवियों को इस प्रयोजन के लिए घर-घर जाना चाहिए और लोगों की आस्थाएँ, मान्यताएँ तथा विचारणाएँ परिष्कृत करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

प्रत्येक व्यक्ति इतना बुद्धिमान और प्रतिभाशाली नहीं होता कि वह तथ्यों को सही-सही समझा सके और किस परिस्थितियों में क्या किया जाना चाहिए, इसका मार्गदर्शन कर सके। इसके लिए सुलझी विचारधारा का साहित्य लेकर निकलना चाहिए तथा लोगों को उसे पढ़ने तथा विचार करने की प्रेरणा देनी चाहिए, उसके साथ अशिक्षित व्यक्तियों के लिए पढ़कर सुनाने या परामर्श द्वारा प्रेरणा देने की प्रक्रिया चलाई जानी चाहिए। आरंभ में सभी लोगों की रुचि इस ओर नहीं हो सकती। अतः जो लोग ज्ञानयज्ञ की आवश्यकता समझते हैं, उन्हें चाहिए कि वे ऐसा विचार-साहित्य लोगों तक स्वयं लेकर पहुँचें। यह ठीक है कि कुआँ प्यासे के पास नहीं जाता, प्यासे को ही कुआँ के पास जाकर पानी पीना पड़ता है। गर्मियों में जब व्यापक जल संकट उत्पन्न हो जाता है, तो बादलों को ही जगह-जगह जाकर बरसना पड़ता है। लोक-सेवियों को भी सद्विचारों और सद्प्रेरणाओं की शीतल सुखद जलवृष्टि के लिए जन-जन तक पहुँचना चाहिए। उसके लिए उन व्यक्तियों में पहल सद्विचारों के प्रति भूख जगाना आवश्यक है। भूख उत्पन्न करने का यह कार्य सम्पर्क द्वारा ही संभव होता है। उसके बाद सद्विचारों और सत्प्रेरणाओं को उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। यह आवश्यकता साहित्य और निम्न सेवा कार्यों द्वारा पूरी की जा सकती है।