युगशोधन हेतु मनीषा को आमंत्रण
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
देवियो! भाइयो!!
मनुष्यों को भगवान् के अनुदान अन्यान्य प्राणियों से भिन्न मिले हैं। सामान्य प्राणी दो काम कर पाते हैं। एक ओर तो अपना पेट भर पाते हैं, दूसरा सन्तान पैदा कर पाते हैं। दो के अलावा और कोई पुरुषार्थ अन्य प्राणियों के जिम्मे नहीं है किन्तु, दूसरी ओर मनुष्यों के जिम्मे कैसे-कैसे शानदार अनुदान मिले हैं? अन्य प्राणी तो एक छोटी-सी कल्पना रखते हैं, जो ख्वाब के रूप में दिमाग में केवल एक सीमा तक ही काम आती है, जो शरीर की जरूरतों को पूरा करती है। उससे आगे उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती। चिन्तन की परिधि इन प्राणियों में उतनी ही है जिससे कि शरीर की जरूरतें पूरी कर सकें, चारा इकट्ठा कर सकें, घास खा सकें, दौड़ सकें, बच्चे पैदा कर सकें। बस इससे ज्यादा चेतना नहीं है।
आदमी को अन्य प्राणियों की तुलना में क्या-क्या मिला? शरीर ऐसा शानदार मिला कि कलाकार ने अपनी सारी की सारी कला एक ही केन्द्र पर खत्म कर दी, ऐसा मालूम पड़ता है। हाथ हमारा इतना शानदार है कि मालूम पड़ता है कि प्रकृति ने इसे बहुत सोच-समझदार मन लगाकर बनाया है। इतनी जगह से मुड़ने वाला, इतनी जगह से घूमने वाला, इतने तरह के काम करने वाला हाथ किसी अन्य प्राणी के हिस्से में नहीं आया। दिमाग के बारे में हम क्या कहें? आँखों के लिए क्या कहें? हर इन्द्रिय के लिए क्या कहें? अनोखा प्राणी है मनुष्य। भगवान् ने इस हाड़-मास के जखीरे में एक ऐसी चेतना भर दी है जो अनोखी मालूम पड़ती है? बड़े सौभाग्यशाली हैं हम व आप, जो ऐसा शरीर धारण करने में समर्थ हो सके, सौभाग्यशाली सिद्ध हो सके। भगवान् का अनुग्रह हम सब पर कि हम मनुष्य शरीर प्राप्त कर सकें।
अगली वाली बात और थोड़ी सुरक्षित रखी है, जिसे पात्रता के अनुरूप भगवान् दिया करते हैं। सब प्राणियों को नहीं किसी-किसी को देते हैं, जिसे सुपात्र पाते हैं। पात्रता आपकी बढ़ेगी तो भगवान् की चार नियामतें, चार विभूतियाँ आपको मिलती चली जाएँगी। एक विभूति का नाम ऋत है। ऋत क्या है? ऋत उसे कहते हैं, जिसमें कीमती चीजें जुड़ी हुई हैं, साजो—सुरक्षा-शाली-अन्तःप्रेरणा। ऋत जिस किसी के हिस्से में आता है, वह अपना कल्याण करता है और अपना कल्याण करके वह सीमित नहीं रह जाता, समाज का उत्तरदायित्व सँभालता है, सारी मनुष्य जाति का मार्गदर्शन करता है और इस पृथ्वी पर खुशहाली लाता है। ऋत उस वर्ग के हिस्से में आता है, जिसको हम सभी ब्राह्मण कहते हैं। ऋत उसे कहते हैं, जिसमें आदमी का चिन्तन और जीवन देवोपम बन जाता है। वह अपने लिए कर्तव्यों का निर्धारण करता है। क्या निर्धारण करता है? ‘‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः।’’ हम पुरोहित अर्थात् हम ब्राह्मण, हम सन्त, हम ऋषि यह उत्तरदायित्व ग्रहण करते हैं और यह घोषणा करते हैं कि ‘वयं’ अर्थात् हम सब, ‘राष्ट्रे’ सारे राष्ट्र को, नागरिकों को, विश्व मानवता को ‘जागृयाम्’ जीवन्त और जाग्रत रखे रहेंगे। जीवन्त और जाग्रत रखने की जिम्मेदारी केवल एक ही वर्ग के लोगों की है, जिनका नाम है—ब्राह्मण। देवता और ब्राह्मण एक ही बात है। देवता आसमान में रहते हैं। देवता वे भी हैं जिनके दिमाग आसमान में हैं। बाकी लोगों के दिमाग जमीन पर गड्ढे में, खड्डे-खंदक में रहते हैं। ब्राह्मण का दिमाग आसमान में रहता है। वह ऊँचा सोचता और ऊँचा ही चिन्तन करता है, ऊँचा ही उसका लक्ष्य होता है। ऊँची ही उसकी विचारणा होती है। वैसे ही देव होते हैं। देव ऋत को पा करके, भगवान् का अनुग्रह पा करके अपना कल्याण करते हैं और समाज का हित भी साधते हैं।
‘ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत’ ऋत से सत्य की, सत्य से तप की उत्पत्ति होती है और तप से गर्मी की उत्पत्ति होती है, जिससे दिन और रात पैदा होते हैं, जिससे संसार की व्यवस्था पैदा होती है। यह भगवान् का अनुग्रह आपमें से किन-किन के हिस्से में आया, पता नहीं। पर यह जिस किसी के हिस्से में आया होगा, उसे ही बुद्धिजीवी कहेंगे। जो भी सुरक्षित हैं, बुद्धिजीवी हैं, उनको अगर भगवान् का प्यार मिल जाता है तो पहले मिलता है ऋत। ऋत से वे पहले अपना उद्धार करते हैं और फिर सारे विश्व का उद्धार करते हैं।
दूसरा वाला अनुदान दूसरी श्रेणी के लोगों को मिलता है। उसका नाम है—शौर्य और साहस। तीसरा अनुदान है—साधन और चौथे का नाम है—श्रम। वर्णाश्रम व्यवस्था के हिसाब से यही चार प्रकार के वर्गीकरण हैं। भगवान् के अनुदान एक के बाद एक मिलते हैं, जिनके हिस्से में पराक्रम है, शौर्य है, साहस है, हिम्मत है, वे दुनिया में अपने तरीके से काम करते हैं। कोलम्बस के तरीके से, नैपोलियन के तरीके से भौतिक दुनिया में बहुत काम कर जाते हैं और आध्यात्मिक जगत में फरहाद से लेकर मीरा तक व विवेकानन्द से लेकर दयानन्द तक जाने क्या से क्या कर डालते हैं। ये गजब कर देने वाले प्राणी साहसी कहलाते हैं। साहसी को क्षत्रिय कहते हैं। तीसरे वर्ग के पास सम्पदाएँ रहती हैं और चौथा वर्ग श्रमिक जो अपने पसीने से, अपनी मेहनत-मशक्कत से दुनिया को खुशहाल बना देते हैं।
आदिकाल में दुनिया कैसी रही होगी? आरम्भ में शायद वह ऊबड़-खाबड़ रही होगी, जैसी कि चन्द्रमा की खबर लेकर वैज्ञानिक आए हैं। एक इनसान ही रहा होगा, जिसने अपनी मशक्कत से, अपनी मेहनत से इस जमीन को समतल किया होगा। इसी तरह से जानवरों को जो उच्छृंखलों के तरीके से, अस्त-व्यस्तों के तरीकों से हानि पहुँचाते हैं—प्यार से, सहकारिता से डरा-धमका करके मनुष्य का सहयोगी बनाया होगा। उसकी मशक्कत ने ही दुनिया में तरह-तरह की नई चीजें लगाकर खड़ी कर दीं। इमारतें बनाने से लेकर घर, कपड़ा बनाने से लेकर अन्न उपजाने तक यह आदमी का श्रम है। श्रम का अनुदान मिलने से आदमी निहाल हो गया।
ताकत दूसरे प्राणियों में भी है, पर वे श्रम नहीं कर सकते। नियोजित श्रम उनके पास नहीं है। हाथी के पास, घोड़े के पास ताकत है, पर वह उस ताकत का उपयोग नहीं कर पाता। पर इनसान अपनी ताकत का जानकार है, उसका उपयोग कर सकता है और यह भगवान् का अनुदान है और इसी से यह साधन पाता है।
आदमी की बुद्धि का श्रेष्ठतम भाग है ऋत। यह ऋत यदि आदमी को मिल जाए तो बुद्धि सार्थक हो जाती है, विद्या सार्थक हो जाती है, प्रज्ञा सार्थक हो जाती है और मनुष्य की जिन्दगी सार्थक हो जाती है। जिसमें से कुछ को भगवान् ने शिक्षा दी है, वे आप मेरे समक्ष बैठे हैं। अब कमी एक ही रह जाती है कि इस सीप में कहीं से स्वाति की बूँदें टपक जाएँ, जिनके पास दिमाग है, शिक्षा है, उनके अन्दर श्रद्धा की, स्वाति की बूँदें गिर जाएँ तो आप ऋषि हो सकते हैं, महामानव हो सकते हैं। यह अकल का दुर्भाग्य है कि वह पेट भरने के काम आज आती है। उससे भी अधिक दुर्भाग्य आदमी का यह है कि अकल जाल बुनने के काम आती है, वाक्पटुता के काम आती है व दूसरों को धोखा देने का कुचक्र रचने के काम आती है। अकल से जो हम कमाते हैं तो क्या बताएँ आपको कि हम उसे कहाँ खर्च करते हैं? अकल की कीमत बाजार में ज्यादा मिलनी चाहिए। मिलती भी है। लेकिन उस मिलने के बाद हम करते क्या हैं? न जाने कहाँ उसे खर्च कर देते हैं। ऐसे में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर हमारे सामने आकर खड़े हो जाते हैं और बताते हैं कि अकल की कमाई कहाँ खर्च होनी चाहिए।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर को उन दिनों जो वेतन मिलता था, उन्होंने कहा उसमें से हमें औसत नागरिक के गुजारे की हैसियत से पचास रुपये से अधिक नहीं चाहिए। उन्होंने अपने खानदान वालों को बुलाया और यह कहा कि हिन्दुस्तान में जिस मुल्क में हम पैदा हुए हैं उस स्तर के मुताबिक़ हमें अपने पर व कुटुम्ब पर इससे अधिक खर्च नहीं करना चाहिए। बाकी जो वेतन बचेगा उसे हम अन्य कामों में खर्च करेंगे जैसा कि भावनाशीलों-विचारशीलों को करना चाहिए। आपकी अकल भी उसी तरह खर्च होनी चाहिए जिस तरह से ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की हुई। उनके दिल में दर्द था। उनके भीतर था ऋत। ऋत उसे कहते हैं जिसमें शिक्षा की सार्थकता छिपी होती है। आप कौन हैं? आप वकील हैं तो अच्छा, करते क्या हैं? सबेरे से शाम तक झूठ बोलते हैं व बुलवाते हैं। फरेब करते हैं व करवाते हैं। इसी अकल से पेट भरते हैं। ऐसे पेट के ऊपर लानत है। ऐसे पेट को फट जाना चाहिए। जो पेट आदमी की अकल की कमाई से देश के लिए, धर्म के लिए, इनसानियत के लिए, भगवान् के लिए गुनाह करता हो ऐसे पेट को आग लग जानी चाहिए।
मित्रो! यह ब्राह्मण के लिए लानत की बात है, शर्म की बात है। भगवान् के दिए अनुदानों का सबको इस्तेमाल करना चाहिए। दूसरे लोग यदि अपनी अकल का इस्तेमाल कर सकें तो कम से कम ब्राह्मण को तो करना ही चाहिए। दिमाग अगर खराब हो जाएगा, अकल अगर खराब हो जाएगी तो शरीर का क्या होगा? जिस समाज में, जिस देश मेंं, जिस युग में, दिमाग-ब्राह्मण अस्त-व्यस्त हो जाता है, तब उस देश की मुसीबत आती है। दूसरे लोग जब गड़बड़ा जाते हैं तो डाकू या उठाईगीर बन जाते हैं और क्या करेंगे? गुण्डे की सामर्थ्य बस सामान उठाने, मारपीट करने, हत्या करने तक की है किन्तु जब ब्राह्मण बागी हो जाता है तो वह ब्रह्मराक्षस बन जाता है॥ अतः ब्रह्मराक्षस होने की लानत अपने सिर पर ओढ़ने से हमें इनकार करना आना चाहिए और समय रहते चेत जाना चाहिए।
युग की पुकार है कि ब्राह्मण जागे। आप कौन हैं? हम तो कायस्थ हैं। भई यहाँ वंश परम्परा का जिक्र नहीं हो रहा, विचार परम्परा की दृष्टि से आप जहाँ बुद्धिजीवी हैं, वहाँ आप एक ऐसी परम्परा अनुयायी भी हैं, जो आदमी को उसके कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों की जानकारी कराती है। यदि ऐसा न होता तो आप हमसे क्यों जुड़ते? मैं सोचता हूँ कि आपके भीतर कहीं न कहीं ऋत है। ऋत जो भगवान् का सबसे बड़ा अनुदान है। हमारे व आपके लिए एक बहुत बड़ा काम करने को पड़ा है। काम यह है कि जो कुछ भी विचार का क्षेत्र हमारे सामने फैला पड़ा है, इसके भीतर से इसके अध्यात्म को हम निचोड़ें। हमको साइंस की साइंस ढूँढ़नी है। वह मूल ढूँढ़ना है, जिन सिद्धान्तों को लेकर के आदमी ने साइंस बनाने व बढ़ाने के लिए कदम बढ़ाया। यह दोनों काम किए बिना इतने बड़े बुद्धि के जंजाल को काट सकना हमारे लिए सम्भव न हो सकेगा। बुद्धि का जंजाल, बुद्धि का भ्रम इतना बढ़ गया है कि क्या कहूँ मैं आपसे। बुद्धि के ऊपर से पड़े आवरण इतने ज्यादा कँटीले, इतने ज्यादा गहरे, इतने ज्यादा विषैले हैं कि इनकी काट-छाँट करने के लिए हमको बड़े ऑपरेशन की जरूरत पड़ेगी। कैंसर का ऑपरेशन करने के लिए मामूली चाकू काम नहीं आते। अन्दर लेसर किरणों से लेकर रेडियो आयसोटोप तक का इस्तेमाल करना पड़ता है और फूँक-फूँककर कदम रखना होता है। फिलॉसफी, नीतिशास्त्र का नीतिशास्त्र, मनोविज्ञान का विज्ञान हम गढ़ना चाहते हैं, पर यह कठिन काम है, ऑपरेशन जितना कठिन।
अगला हमारा काम है धर्मों का धर्म ढूँढ़ना। वह जो चार सौ करोड़ मनुष्य में से अधिकांश के सिर पर हावी है। मैं सोचता हूँ कि तीन सौ करोड़ के ऊपर धार्मिक हैं। सौ करोड़ मनुष्य ऐसे हो सकते हैं, जो धर्म की लापरवाही करते हैं और बाद में परवाह नहीं करते। जो धर्म से नाखुशी जाहिर नहीं करते उनको मैं मानता हूँ कि उन्हें धर्म की अहमियत समझ में आ गई है। वे धर्म को समझते हैं। धर्म हेतु, विश्व धर्म की व्याख्या हेतु हमें आस्तिकता का, ईमान का प्रतिपादन करना होगा। धार्मिकता का, धर्मनिष्ठा, कर्तव्य-परायणता का प्रतिपादन करना होगा। इसके लिए बुद्धिवाद का सहारा लेना होगा। तर्क और दलीलों को हम रोक नहीं सकते। बुद्धिवाद को हम सीमित नहीं कर सकते। आदमी के भीतर से जब तर्क का माद्दा उत्पन्न होता है तो अंकुश लगाना कठिन हो जाता है।
तर्क-दलील आज के जमाने की सबसे अच्छी व सबसे वाहियात चीज है। अच्छी क्यों? क्योंकि उसमें सत्य को ढूँढ़ निकालने की सामर्थ्य है, सम्भावना है। वाहियात क्यों? क्योंकि दलील के पीछे अगर अंकुश न हो, नियन्त्रण न हो तो यह सब कुछ कर सकती है। दलील आप किसी भी पक्ष में दे सकते हैं। संस्कृत की एक पुस्तक है जो एम.ए. में पढ़ाई जाती है ‘न्यायकुसुमांजलि’। उसमें यह बताया गया है कि दलील कैसे दी जाती है, बहस कैसे की जाती है? बहस में यह भी किया जा सकता है और यह भी। उन्होंने दो टॉपिक लिए हैं—एक ईश्वर है, दूसरा ईश्वर नहीं है। दोनों पक्षों में जोरदार बहस होती है अन्त में दलील देने के बाद यह लिखा है कि हमने तो बहस करने का तरीका सिखाया है। आप यह विचार मत करना कि पुस्तक का लेखक नास्तिक है या आस्तिक।
दलील कुछ भी दी जा सकती है। उल्टी भी हो सकती है, सीधी भी हो सकती है, निकम्मी से निकम्मी, बेहूदी से बेहूदी, पाजी से पाजी बातों के पक्ष में दलील पेश की जा सकती है। दलील ने ही स्वच्छन्द यौनाचार का पक्ष लिया है। दलील इतनी स्वेच्छाचारी है कि वह कभी फ्रायड का समर्थन करती है, तो कभी अस्तित्ववाद के लिए कामूँ का और नीत्से के तरीके से नास्तिकवाद का। यह अकल, यह दलील निरंकुश होने पर न जाने क्या कर सकती है? मित्रो ! हमें यदि चार सौ करोड़ व्यक्तियों का भाग्य बनाना है, नया युग गढ़ना है तो हमें दलील की माँ को पकड़ना होगा। अकेले दलील से काम नहीं चलेगा। चोर की मौसी को गिरफ्तार करना होगा। अकल का, दिमाग का बहुरूपिया न जाने कैसे-कैसे वेश बदलकर हमें परेशान कर रहा है। हमें इस बहुरूपिये की जन्मदात्री को पकड़ना होगा। तभी यह ठीक हो सकती है।
शोध प्रसंग में दो बातों के बारे में हमें गम्भीर होना पड़ेगा। आए दिन हमें जहाँ कहीं बोर्ड दिखाई देते हैं। एक बोर्ड है ‘योगा’ एवं दूसरा है—‘शोध-रिसर्च’। ‘योगा’ सबसे बेहूदा मखौल है अध्यात्म का। गली-गली में योगा के नाम पर आश्रम खुले हुए हैं। इनसे पूछो कि योग का क्या मतलब है तो दाँत निकाल देंगे। क्या योग मात्र सर्वांगासन होता है, डीप ब्रीदिंग होता है, हाथ-पैर चला लेना होता है, मेडीटेशन होता है? बन्दूक चलाने वाले, मेस्मेरिज्म करने वाले, चिड़िया मारने वालों में, सबमें मेडीटैशन होता है। मेडीटेशन अकल इकट्ठी करने का नाम है। खबरदार ! योगा अलग है और मेडीटेशन अलग है। योगा-योगा जहाँ देखो मखौल के लिए उन्हें और चीज नहीं मिली जो योग को बना दिया। दूसरे हर किसी को रिसर्च करते देख सकते हैं, शोध करते देख सकते हैं आप। गली-गली में रिसर्च करने वाले, गली-गली में शोध-संस्थान। शोध से कम में कोई बात ही नहीं करता चाहता। भाईसाहब, हमारे दिमाग में बड़ी चीजें हैं। हम शोध का मजाक नहीं बनाना चाहते। बड़ी चीज के लिए बड़ा सामान इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे हैं।
फिलहाल आपको एक छोटा-सा काम सुपुर्द करते हैं। इन्टेलिजेंशिया जिस काम के लिए अभी बदनाम हैं, आप उस बदनामी को मिटाएँ। हर व्यक्ति जो इंटेलिजेंशिया से जुड़ा है, कहता है हम तो व्यस्त हैं। कुल दो घण्टे स्कूल या कॉलेज में पढ़ाकर आते हैं व कहते हैं कि हम बिजी हैं? गप्पें हाँकते रहते हैं, और कहते हैं कि हम व्यस्त हैं। यह झूठी बहानेबाज़ी की बातें हैं।
आप यह देखें कि ऋत के धारणकर्ता होने के नाते प्रज्ञा के विस्तार की आप पर जो जिम्मेदारी है, उसको निभाकर ही आप समाज के आप पर चढ़े ऋण को उतार सकते हैं। भगवान् का, विश्व मानव का आप पर ऋण है। इसके लिए पहली बात समय से चलती है। समय के साथ काम में तन्मय होने की कला। व्यस्तता इसे कहते हैं कि आदमी इस कदर लक्ष्य में तन्मय हो जाता है कि उसे समय का कोई ख्याल नहीं रहता। आप युगअनुसन्धान, मानव धर्म की खोज, विज्ञान-अध्यात्म की शोध के विषय में गम्भीर हैं तो आप बात वहाँ से शुरू कीजिए जहाँ से आपको टाइम देना पड़ेगा। यदि दे सकें तो समुद्र-मन्थन कीजिए। कभी देवता व असुरों ने मन्थन किया था। देवता कौन? विचारणा, श्रद्धा, सद्भावना, आदर्श तथा दैत्य कौन? दैत्य कहते हैं ‘जाइंट’ को, शक्तियों को। दोनों ने परस्पर लड़ाई-झगड़ा करने की अपेक्षा समुद्र मथना आरम्भ किया। भगवान् मदद के लिए आ गए व कच्छपावतार के रूप में मंदराचल के नीचे उन्होंने स्वयं को लगा दिया। मथने के लिए शेषनाग आ गए व फिर विष निकला, जिसे नीलकण्ठ प्रलयंकर महादेव ने धारण किया। तत्पश्चात् चौदह रत्न निकालते चले हैं, उसकी उपमा समुद्र मन्थन से दें तो कोई गजब की बात नहीं।
समुद्र बहुत विशाल है। हमारा विचार-परिकर बहुत विस्तृत है, समुद्र के तरीके से। यदि हम इसमें गोते लगा सकें तो बहुमूल्य मणि-माणिक्य इसमें से निकल सकेंगे। आप अपनी बुद्धि का सही उपयोग करके, समय देकर अपने सही अर्थों में बुद्धिजीवी होने का प्रमाण दीजिए। आप पर सारे समाज का, युग का एक ऋण चढ़ा है, महती दायित्व है। उसे निभाइए। बताइए विज्ञान का विज्ञान, अध्यात्म का अध्यात्म। तभी तो दोनों मिल सकेंगे। अगली पीढ़ी को महामानव बनाने के लिए इससे कम स्तर के पुरुषार्थ से काम नहीं चलने वाला। हम बड़ा काम ही सोचते हैं व करते हैं। क्या करना है हमें? हमें सूरज को, चन्द्रमा को धरती पर लाना है, जिससे इनसान निहाल हो जाए। आपने वैभव-विलास की जेल में बहुत जीवन बिता लिया। आप समय दीजिए व अपनी अकलमन्दी का सही प्रमाण देकर युगशोधन में खपिए, अपने को पूरी तरह लगा दीजिए। ज्ञान की जो धारा है, उसे अपने साथ ले जाइए व पूरे समाज में प्रवाहित कीजिए। बस यही करना है आप सबको। आज की बात समाप्त।
॥ॐ शान्तिः॥