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गृह-उद्योग तो असंख्य हैं, पर देखना यह होगा कि उनके लिए सस्ते कच्चे माल की सुविधा है या नहीं और खपत के लिए मण्डी है या नहीं?...मात्र उत्साह भर होने से अथवा कोई शिल्प सीख लेने तक से काम नहीं चलता। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ...
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यह प्रश्न उठ सकता है कि जन-साधारण की सामर्थ्य कम होती है, उतने से क्या हो सकता है?...किन्तु यह न भूलें कि लोकमानस एक अति विशालकाय और अति समर्थ महादैत्य है। इसकी तुलना पौराणिक कुम्भकरण से...
- अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा, अपने अकेले हैं और कौन साथ देगा?... आदि-आदि निषेधात्मक चिन्तन करते रहा जाय तो प्रतीत होगा कि काम बहुत ही कठिन है और उसकी पूर्ति अपने जैस...
- अरब के रेगिस्तान में उड़ने वाले सूखे रेत से आँखों की रक्षा करने के लिए बुर्का ओढ़ने का औचित्य हो सकता है, पर अपने यहाँ वैसी कोई कठिनाई नहीं, फिर मुँह पर नकाब ओढ़ने की जरूरत किसलिए मानी जाय?... भारतीय समाज में नारी के प्रति उच्च भावना और उच्च मान्यताएँ सदा से रही है। यहाँ नारी मात्र को अभी भी ...
- अशिक्षित-नारी को शिक्षित कैसे बनाया जाय?... इस प्रश्न पर सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में अपने-अपने उत्तरदायित्व पूरा करने के लिए साहसिक तैयार...
- इस बात का प्रशिक्षण दिया जाय कि वह आज की स्थिति में ही अपने और परिवार के विकास के लिए क्या कर सकती है?... अयोग्यता की भर्त्सना तो होती है, पर यह नहीं बताया, दिखाया जाता कि उसे किस प्रकार, क्या करना चाहिए। अ...
- इससे आगे भी कुछ है क्या?... प्रस्तुत परिस्थितियों के अतिरिक्त भी कोई विकल्प है क्या, यह सोचना उसके लिए कठिन पड़ता है। कूप मण्डूक...
- उन्हें दबाये, रहने के लिए वे लोग स्त्रियों पर कैदियों जैसे प्रतिबन्ध लगाते रहे होंगे?... पर आज तो वैसी अनीति का अस्तित्व नहीं रह गया है फिर उन घृणास्पद बन्धनों में नारी को जकड़े रहने की आवश...
- उसे समानता का स्तर देना किसे अच्छा लगेगा?... यह दोनों ही प्रकार की झिझक बिलकुल भ्रान्तिपूर्ण है। हर नारी को और उसका हित चाहने वालों को, इन्हें अप...
- एक बनाएँ और दस तोड़ें तो ऐसा कोई सृजन किस प्रकार हो सकेगा?... उच्च स्तरीय सद्गुणों में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि आते हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण ...
- ऐसे वातावरण में भूखे भेड़ियों से उनके शील की रक्षा के लिए पर्दा ओढ़ने की आवश्यकता किस आधार पर अनुभव की जानी चाहिए?... यह प्रथा भारतीय पुरुष समाज पर गहरा लांछन है कि उनकी बहिनों और बेटियों को ओढ़ कर किसी तरह अपना शील बच...
- ऐसे ही छापने-बेचने के लिए कुछ रच लिया जाय तो उससे नारी को सुविकसित बनाने वाली शिक्षा की आवश्यक पूर्ति कहाँ हुई?... महिला जागृति अभियान के अन्तर्गत इस प्रकार का लेखन आरम्भ हो गया है। उसका प्रकाशन भी अगले ही दिनों होन...
- किसी भी पुस्तकालय अधिकारी से पूछा जा सकता है कि आप के पाठक क्या पढ़ते और क्या माँगते हैं?... वे लज्जा से अपना सिर झुकाये हुए निरुत्तर मिलेंगे। ऐसे पुस्तकालय कम हैं जिनमें प्रेरणाप्रद, आदर्शवादी...
- किसी समय सामन्तों-नवाबों में बड़ी संख्या में औरतें रखैलें रखने की होड़ चल पड़ी थी?... स्त्रियों से अन्तःपुर भरे रहते थे। उनमें असन्तोष और विद्रोह के भाव उठते थे।...
- क्या इतनी सुविधा स्त्रियों को नहीं मिल सकती?... प्राणी को पिंजड़े में कैद करने पर उसकी प्रकृति प्रदत्त स्फूर्ति क्रमशः नष्ट होती चली जाती है। इसका प...
- घर को गन्दी सराय न रहने देकर यदि हर्षोल्लास का केन्द्र बनाना है तो क्या करना और क्या सोचना होगा?... दाम्पत्य जीवन की मधुरिमा किस प्रकार बनी और बढ़ती रह सकती है, इसके कुछ विशेष सिद्धान्त हैं। छोटे-से घ...
- जमीन से लेकर साधन जुटाने तक के अनेकों झंझट कैसे उठाये जा सकेंगे?... अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा, अपने अकेले हैं और कौन साथ देगा? आदि-आदि निषेधात्मक चिन्तन करते रहा जाय ...
- जितने लोगों का भोजन घर में बनता है, उतना बाजार से खरीदकर या नौकर से बनवाकर देखा जाय और फिर घर पर बनने में आने वाली लागत को तोला जाय तो पता चलेगा कि नारी के भोजन बनाने मात्र के श्रम से परिवार की कितनी आर्थिक बचत होती है?... बर्तनों से लेकर कपड़ों तक को साफ करने के लिए उसके श्रम का मूल्यांकन तब ही हो सकता है, जब बर्तन साफ क...
- जिन गुणों और क्षमताओं के द्वारा वह भार उठा सकती है, हाथ बँटा सकती है उन्हें कौन जगाये, कौन बढ़ाये?... वह स्वयं उन्हें भूल चुकी है और समाज उसके विकास को अधर्म एवं अनावश्यक माने बैठा है। यदि उस पर प्रतिबन...
- ध्यान दीजिए, यह दृश्य कहीं अपने यहाँ का ही तो नहीं है?... ? यदि ऐसा ही है तो हमें मानना चाहिए कि हम घर में नहीं, नरक में रह रहे हैं।
हम घर की थोड़ी बहुत सफ...
- नयी सुविधाजनक वस्तुओं का विरोध कोई इसलिये नहीं करता है कि उन्हें पूर्वज प्रयोग नहीं करते थे, तो अब हम क्यों करें?... ठण्डक के दिनों में जो कपड़े पहने जाते हैं उन्हें गर्मी के दिनों में कोई नहीं पहनता—इसी प्रकार गर्मी ...
- नारी के अधिकारों को कौन स्वीकार करेगा?... उसे समानता का स्तर देना किसे अच्छा लगेगा?
यह दोनों ही प्रकार की झिझक बिलकुल भ्रान्तिपूर्ण है। हर ...
- नारी के अविकसित होने से अपनी उचित-अनुचित मनमानी चलाने का अवसर वह क्यों खोये?... नारी वर्ग इसलिए सन्तुष्ट है, कि उसे पिंजड़े में पाले पक्षी की तरह निश्चिन्त रहने का ठिकाना मिल जाता ...
- नारी शिक्षा जैसे कार्यों को जन स्तर पर क्यों पूरा नहीं किया जा सकता है?... कठिनाई यह कि हम जनशक्ति की सामर्थ्य का कभी मूल्यांकन ही नहीं करते। यह महाकाली समस्त सम्पत्तियों, विभ...
- निस्सन्देह उस समय यह आरम्भ बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का प्रतीक था, पर आज तो वैसी विपत्ति नहीं फिर हम क्यों उसी लकीर के फकीर बने रहें और क्यों नुकसान उठाते रहें?... किसी समय सामन्तों-नवाबों में बड़ी संख्या में औरतें रखैलें रखने की होड़ चल पड़ी थी? स्त्रियों से अन्त...
- पर आज तो वैसी अनीति का अस्तित्व नहीं रह गया है फिर उन घृणास्पद बन्धनों में नारी को जकड़े रहने की आवश्यकता क्यों समझा जाय?... अरब के रेगिस्तान में उड़ने वाले सूखे रेत से आँखों की रक्षा करने के लिए बुर्का ओढ़ने का औचित्य हो सकत...
- पिंजड़े में पलने वाले और उन्मुक्त आकाश में उड़ने वाले समान आयु और स्वास्थ्य के तोतों को, किन्हीं पक्षी विशेषज्ञों के सुपुर्द करके पूछा जाय कि इनके शारीरिक, मानसिक स्थिति में क्या कुछ अन्तर है?... वे बतायेंगे कि पालतू का शरीर जीर्ण हो गया और मन टूट गया है। वह हारा थका और निराश दिखाई पड़ता है। व्य...
- पुरुष यदि इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते तो अकेली स्त्री को ही उस सीमा बन्धन में बाँधना किस तर्क एवं न्याय के आधार पर उचित ठहराया जा सकता है?... विशेष कार्य तो हर किसी के जिम्मे होता है पर वह उतने तक ही सीमित रहने के लिए विवश नहीं किया जाता। पण्...
- प्रात: काल से ही जहाँ भोजनालय का कार्य आरम्भ होता है, प्रश्न खड़ा होता है कि आज क्या पकाया जाय?... बस स्वाद के ख्याल से एक पर एक वस्तुओं की होड़ लगना प्रारम्भ होता है। साग-सब्जियाँ, रोटी-पूड़ी, पराँव...
- बच्चों का निर्माण, बड़ों का सन्तोष और बराबर वालों का सहयोग किस प्रकार सम्भव हो सकता है?... इसके लिए नीति, शासन एवं मनोविज्ञान शास्त्र का समन्वय करना चाहिए। घर को गन्दी सराय न रहने देकर यदि हर...
- मधूलिका ने कहा—"को वेदानुद्धरिश्यसि" अर्थात् वेदों का उद्धार कौन करेगा?... कुमारिल का ब्रह्म तेज जाग पड़ा। उन्होंने उत्तर दिया—"मा विषीद बकारोहे भट्टाचार्योऽसि भूतले" भद्रे ! ...
- यह उन्हें क्यों अच्छा लगने लगा?... व्यापारी को विज्ञापनबाजी के लिए भी यही रास्ता पसन्द है। नारी के यौवनोन्मत्त रूप को हर वस्तु के साथ ज...
- लगता है जो विकृतियाँ समाज में इतने दिनों से घर बनाए हुए हैं, वे कैसे दूर होंगी?... नारी के अधिकारों को कौन स्वीकार करेगा? उसे समानता का स्तर देना किसे अच्छा लगेगा?
यह दोनों ही प्रक...
- लोग कहते हैं—हमारी लड़की को नौकरी नहीं करनी है, घर-गृहस्थी चलानी है, फिर उसे पढ़ाने से क्या लाभ?... छोटी उम्र में ही लड़कों को काम-धन्धे में लगा दिया जाता है, लड़कियाँ माता के घरेलू कामों में हाथ बँटा...
- सर्दी के दिनों में मोटे कपड़े पहने जाते थे और बन्द घरों में सोया जाता था, इस प्रचलन को क्यों तोड़ें?... यह तर्क देकर कोई गर्मी में भी ऊनी कपड़े पहनने और बन्द घर में सोने का आग्रह नहीं करता। बच्चे जिन कपड़...
- स्त्रियों को उपार्जन क्षमता से रहित माना जाता है, पर उनके द्वारा होने वाली बचत का मूल्यांकन किया जाय तो प्रतीत होगा कि उनके द्वारा परिवार की आर्थिक समृद्धि बढ़ने में बचत प्रक्रिया का कितना अधिक योगदान है?... घर में स्त्री न हो, तो भोजन या तो बाजार में खाना पड़ेगा या पकाने के लिए नौकर रखना पड़ेगा।...