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- कितनी बड़ी छलाँग लगा सका?...ही आपकी अग्नि परीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपने साथियों की श्रद्धा व क्ष...
- दोनों को मिलाकर संगठन की शक्ति, दुर्दान्त दिखने वाली आसुरी शक्तियों की तुलना में तगड़ी पड़ती है नहीं?...स सम्बन्ध मे फैले हुए भ्रम का अगले दिनों निराकरण हो सकेगा। सत्य जीतता है, पराक्रम जीतता है, ब्रह्मव...
- फिर उन्हें बाधित और लज्जित क्यों किया जाय?...ोगी, वृद्ध, अपंग, अविकसित भी तो ज्यों-त्यों करके अपने दिन काटते हैं। जो अपना भार स्वयं वहन नहीं कर ...
- (१०) सहकारिता और सद्भावना का क्षेत्र कैसे बढ़े?... (११) तत्त्वदर्शन-क्षेत्र में परिष्कार विरोधी मान्यताओं का समीकरण कैसे किया जाए? (१२) राजतंत्र और धर्...
- (११) तत्त्वदर्शन-क्षेत्र में परिष्कार विरोधी मान्यताओं का समीकरण कैसे किया जाए?... (१२) राजतंत्र और धर्मतंत्र की उभयपक्षीय समर्थ शक्तियों को किस प्रकार नये युग के अनुरूप साँचे में ढाल...
- (१२) राजतंत्र और धर्मतंत्र की उभयपक्षीय समर्थ शक्तियों को किस प्रकार नये युग के अनुरूप साँचे में ढाला जाए?... यह कुछ थोड़े से विषयों की ही चर्चा है। इन्हीं विषयों में से प्रत्येक की अनेक शाखाएँ-प्रशाखाएँ हैं और...
- (४) सुलभ आजीविका कैसे उपलब्ध हो?... (५) मनुष्य के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का समावेश किस प्रकार बढ़ता चले? (६) परिवारों की ...
- (५) मनुष्य के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का समावेश किस प्रकार बढ़ता चले?... (६) परिवारों की वर्तमान संरचना में क्या सुधार-परिवर्तन किया जाए? (७) शारीरिक और मानसिक रुग्णता से सु...
- (६) परिवारों की वर्तमान संरचना में क्या सुधार-परिवर्तन किया जाए?... (७) शारीरिक और मानसिक रुग्णता से सुनिश्चित छुटकारा किस प्रकार मिले? (८) अवाँछनीयता से किस प्रकार निप...
- (७) शारीरिक और मानसिक रुग्णता से सुनिश्चित छुटकारा किस प्रकार मिले?... (८) अवाँछनीयता से किस प्रकार निपटा जाए? (९) अब की अपेक्षा कहीं सुखद और सरल-परिस्थितियों का निर्धारण ...
- (८) अवाँछनीयता से किस प्रकार निपटा जाए?... (९) अब की अपेक्षा कहीं सुखद और सरल-परिस्थितियों का निर्धारण कैसे किया जाए? (१०) सहकारिता और सद्भावना...
- (९) अब की अपेक्षा कहीं सुखद और सरल-परिस्थितियों का निर्धारण कैसे किया जाए?... (१०) सहकारिता और सद्भावना का क्षेत्र कैसे बढ़े? (११) तत्त्वदर्शन-क्षेत्र में परिष्कार विरोधी मान्यता...
- अँधेरा कितना ही सघन क्यों न हो?... आत्मा के दिव्य भावों का तेज व प्रकाश उसे तहस-नहस करने में समर्थ हो सकेगा।’’‘‘भाव चेतना का जागरण होते...
- अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता, एक तिनका रस्सा नहीं बनता, एक सींक की बुहारी क्या काम करेगी?... इसलिए कहा जाता है कि एकाकी स्तर के चिन्तन तक सीमित न रहा जाए, सामूहिकता, सामाजिकता को भी उतना ही महत...
- अखाड़े में कड़ी मेहनत किए बिना कोई पहलवान कैसे बने?... सैनिकों को अनेक प्रकार के कठिन अभ्यास आए दिन करने पड़ते हैं। नदियों का प्रवाह अनेक चट्टानों को उलटता...
- अगले दिनों जनमानस यह देखकर रहेगा कि अगणित समस्याएँ उत्पन्न कहाँ से होती हैं?... उस रानी मक्खी को खोजना है, जो आए दिन असंख्यों अण्डे-बच्चे जनती है और जिनकी भरण-पोषण में छत्तों की सम...
- अगले दिनों जो इस तंत्र द्वारा किया जाना है, उसकी रूपरेखा समझने पर सहज बुद्धि को यह विश्वास दिलाना कठिन है कि विश्वव्यापी सृजन प्रयोजनों में जितनी प्रतिभाओं और जितने साधनों की आवश्यकता है, उनकी व्यवस्था भी हो सकेगी?... किन्तु वे यह सारे काम पूर्ण करने का निश्चय कर चुके हैं। समस्याएँ इतने प्रकार की, इतनी भारी और व्यापक...
- अगले दिनों देखा जा सकेगा कि इन दोनों ने हिमालय से निकलने वाली गंगा यमुना की तरह सूखी मरुभूमि को शस्य श्यामला बनाया कि नहीं?... जहाँ करो या मरो का लक्ष्य हो, जहाँ दृष्टि सदा ऊँचे आसमान पर ही जमीं रहती हो, वहाँ असफलता का कोई का...
- अगले दिनों सतयुग की वापसी के लिए नए सिरे से नया प्रयत्न क्यों न होना चाहिए?... खोज के लिए प्रयोगशाला चाहिए, साधन और उपकरण भी।...
- अग्नि में हाथ डालने पर झुलसने से कैसे बचा जाए?... इन दिनों अगणित संकटों और झंझटों का सामना करना पड़ रहा है। उनका निमित्त कारण अपना भटकाव ही है, जिसे क...
- अग्रिम पंक्ति में खड़ा कौन हो?... आवश्यक क्षमता और सम्पदा कौन जुटाए? निश्चय ही यह नियोजन असाधारण एवं अभूतपूर्व है। इसे बिना मनस्वी साथ...
- अणु उपकरणों के बदले क्या प्रकृति ही सर्वनाश, महाप्रलय सामने लाकर खड़ी कर सकती है?... यह सब सोचने की मानो किसी को फुरसत ही नहीं हैं। मनुष्य का मनुष्य के प्रति व्यवहार निराशाजनक स्तर तक न...
- अति कठिन कार्य सामने यह है कि संसार भर के मानव समुदाय पर छाई हुई विचार विकृति का परिशोधन किस प्रकार किया जाय?... यह कार्य लेखनी, वाणी एवं प्रचार माध्यमों से भी एक सीमा तक ही हो सकता है, सो भी बड़ी मन्दगति से, जबकि...
- अतिरिक्त बुद्धिमत्ता का तात्पर्य यह तो नहीं हो सकता कि इसके सहारे संसार की सुव्यवस्था को बर्बाद करके रख दें?... अनीति बरतने के लिए उसे स्वेच्छाचार का लाइसेंस मिला हुआ नहीं है।...
- अनीति का सहगामी या सहयोगी बनने से साफ इनकार कर दे, फिर भले ही इसके बदले आततायियों का कितना रोष, आक्रमण, आतंक सहन करना पड़े?... ऐसी मन:स्थिति को परिपक्व करने के लिए ही तपश्चर्या नाम से जान पड़ने वाले अनेक कर्मकाण्डों की गणना होत...
- अनुभव की दुहाई देने वाले अनगढ़ उपचारकों का तो कहना ही क्या?... सरकारी अस्पताल, प्राइवेट क्लीनिक, दवाखाने, अन्य उद्योगों की तुलना में अधिक तेजी से खुल रहे हैं। साथ ...
- अनुशासन में व्यतिरेक तो नहीं हुआ?... अपने कृत्यों को दूसरे से अधिक समझने की अहंता कहीं छद्म रूप में आप पर सवार तो नहीं हो गयी?यह विराट्...
- अनुशासन में व्यतिरेक तो नहीं हुआ?... अपने कृत्यों को दूसरे से अधिक समझने की अहंता कहीं छद्म रूप में आप पर सवार तो नहीं हो गयी?यह विराट् य...
- अनेक आकार-प्रकार और गुण-स्वभाव का उसे कैसे देखा गया?... मान्यता यदि यथार्थ है तो उसका स्वरूप सार्वभौम होना चाहिए। यदि वह मत-मतान्तरों के कारण अनेक प्रकार क...
- अन्यथा जो बादल पहले पानी बरसाते थे अब क्यों धूलि बरसाएँ और क्यों हर किसी को शिकायत का मौका दें?... यहाँ समझने योग्य बात एक ही है कि वरिष्ठ व्यक्तित्व ही सामान्यजनों को प्रभावित करते हैं। घटिया लोगों ...
- अपनत्व के अनुपान के बिना भला महत्त्वपूर्ण जीवन विद्या कब गले उतरी है?... बस फिर क्या था—आ पहुँची परिवर्तन की घड़ियाँ। नौकरी छोड़ दी, कोट-पैंट को तिलांजलि दे डाली, आलीशान फ्ल...
- अपना ऋद्धि-सिद्धियों से भरा भण्डार लोग न जाने क्यों नहीं खोजते-खोलते और न जाने क्या कारण है कि घड़े में ऊँट खोजते-फिरते हैं?... अच्छा होता आत्मविश्वास जगाया गया होता, अपने को परिष्कृत कर लेने भर से हस्तगत हो सकने वाली सम्पदाओं औ...
- अपना चरित्र स्तर कैसा रखना चाहिए?... व्यवहार में शालीनता का समुचित समावेश किस प्रकार रखना चाहिए? वह सब औचित्य वे भूल जाते हैं। उनींदों से...
- अपना देना तो मानो वज्रपात की तरह असह्य हो?... ऐसे लोग अपने परिवार में भी हो सकते हैं, पर यह विश्वास किया गया है कि पच्चीस लाख में से एक लाख ऐसे अव...
- अपनाए गए क्रिया-कलापों में कितनी जनशक्ति की, कितनी धनशक्ति की, कितने साधनों की आवश्यकता पड़ती है और वह सुदामापुरी को द्वारिका पुरी में बदल जाने का कैसे उदाहरण बनती है?... इस दृश्य को कोई एक प्रकार से सिद्ध स्तर की भी गिन सकता है।अपनी अपेक्षा पिछड़ों, दु:खियारों, आवश्यकता...
- अपनी दौलत भरी तिजोरी की चाबी खो देने पर कोई दरिद्रियों की तरह दुर्गतिग्रस्त स्थिति में फिरे, तो उसके लिए कोई क्या कुछ करे?... यदि आत्मनिर्माण में जुटा जा सके, बुरी आदतों को कूड़े-करवट की तरह बुहारा जा सके, दृष्टिकोण में मानवी ...
- अपने कृत्यों को दूसरे से अधिक समझने की अहंता कहीं छद्म रूप में आप पर सवार तो नहीं हो गयी?... यह विराट् योजना पूरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है कि इस अग्नि परीक्षा की वेला में आपका शरीर, मन और...
- अपने हाथों अपना समय और पैसा खर्च करने में इस बात की आशंका नहीं रहती कि कहीं कोई ठग तो नहीं रहा है?... सेवा साधना का यह क्रम अपनाकर, आरम्भ से ही एक लाख अध्यापक प्रति सौ के हिसाब से एक करोड़ छात्रों से सम...
- अब उन्हें प्रत्यक्षवाद ने अमान्य ठहरा दिया, तो सामर्थ्यवानों को कोई किस आधार पर मर्यादा में रहने के लिए समझाए?... किस तर्क के आधार पर शालीनता और समता की नीति अपनाने के लिए बाधित करे। पशुओं को जब नीतिवान परोपकारी बन...
- अब तक जो हानियाँ सामने आई हैं जो समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं, उन्हीं का समाधान हाथ नहीं लग रहा है, फिर इस सबका अधिकाधिक सम्वर्धन अगले ही दिनों न जाने क्या दुर्गति उत्पन्न करेगा?... इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि कुछ ही समय के वैज्ञानिक दुरुपयोग का क्या नतीजा निकला और अगले ...
- अब दास-दासियों को पकड़े और बेचे-खरीदे जाने का प्रचलन कहाँ है?... सैकड़ों रखैल कैद रखने वाले ‘हरम’ अब मुश्किल से कहीं ढूँढ़े मिलते हैं। सती-प्रथा अब कहाँ है? छूत-अछूत...
- अब वह किन पर शासन करेगा लाशों के ढेर पर?... उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सम्राट् के अन्तराल में सोई आत्म-चेतना अगड़ाइयाँ ले रही थी।वह शिविर में ...
- अभिभावकों के घर लड़की ने जितनी योग्यता और सम्मान अर्जित किया है, उससे आगे की प्रगति का क्रम जारी रखने का उत्तरदायित्व ससुराल वालों को क्यों नहीं निभाना चाहिए?... विवाहित होने के बाद प्रगति के सभी अवसर छिन जाने और मात्र क्रीतदासी की भूमिका निभाते रहने तक ही उसे क...
- अमीरी प्रदर्शन के प्रेत-पिशाच का उन्माद सिर से उतरने ही नहीं देता?... इस मूर्छना के रहते उठने, आगे बढ़ने और उपलब्ध क्षमताओं के सदुपयोग का उत्साह उभर ही नहीं पाता। इस मानस...
- अर्जुन को दिव्य गाण्डीव धनुष एवं बाण देने वालों ने अनुदान थमा देने से पहले यह भी जाँच लिया था कि उस समर्थता को किस काम में प्रयुक्त किया जाएगा?... यदि बिना जाँच-पड़ताल के किसी को कुछ भी दे दिया जाए, तो भस्मासुर द्वारा शिवजी को जिस प्रकार हैरान किय...
- असंयम से शरीर और मस्तिष्क खोखला तो नहीं हो रहा?... शारीरिक और मानसिक स्वस्थता बनाये रखने के लिये इन्द्रियनिग्रह अमोघ उपाय है।समय संयम का अर्थ है—एक-एक ...
- असह्य बेचैनी है अन्दर, पर क्या करूँ?... राह नहीं सूझ रही।’’ कहकर वह आशाभरी नजरों से देवर्षि की ओर देखने लगे।देवर्षि का सत्परामर्श‘‘समाधान है...
- अस्वस्थता, दुर्बलता, कलह, विग्रह, छल-प्रपञ्च जैसे दोष, व्यवहार तथा चिन्तन को धुआँधार विकृतियों से भरते क्यों चले जा रहे हैं?... निकट भविष्य के सम्बन्ध में मूर्द्धन्य विचारक यह भविष्यवाणी कर रहे हैं कि स्थिति यही रही, रेल इसी पटर...
- आकाश में सूर्य, चन्द्र और तारे टाँग देने वाली सत्ता अग्नि, जल, पवन जैसे तत्त्वों से इस निर्जीव धरातल को हलचलों से भरा-पूरा बना देने वाला सृजेता अपनी अत्यधिक बड़ी और कठिन दीखने वाली योजनाओं को क्यों सम्भव नहीं बना सकता?... जिसकी संरचना जल, थल, और आकाश के स्तर को अद्भुत बनाए हुए है, उसके क्रिया-कौशल द्वारा क्या कुछ सम्भव न...
- आड़ से निकलकर ईसा के सामने आ गए और आश्चर्यचकित हो बोले—‘‘प्रभु यह चमत्कार कैसे घटित हुआ?... ’’ उन्होंने मुस्कराते हुए कहा—‘‘पवित्र आत्मा के अवतरण द्वारा। यह ‘होली घोस्ट’ और कुछ नहीं जागृत भाव-...
- आत्मसन्तोष, लोकसम्मान और दैवी अनुग्रह की महान् महत्ता के सम्बन्ध में जिनने कभी सुना-समझा तक नहीं, वे भला उसे पाने के लिए ही क्यों प्रयत्न करेंगे?... इन दिनों तो पैसा ही परमेश्वर बना हुआ है। अहंकार का उन्माद इस कदर छाया हुआ है, कि उसके लिए समय, श्रम ...
- आत्महत्या तक के लिए उपाय अपना लेता है, फिर कोई कारण नहीं कि उत्थान का अभिलाषी अभीष्ट अभ्युदय के लिए सरञ्जाम न जुटा सके?... दूसरों पर विश्वास करके उन्हें मित्र-सहयोगी बनाया जा सकता है। श्रद्धा के सहारे पाषाण-प्रतिमा में देवत...
- आदमी भला ऐसी हरकतें क्यों कर सकेगा?... सम्वेदनहीनों की दशा प्रेतों जैसी और सम्वेदनशीलों की स्थिति जीते-जागते आदमियों की-सी है। इनमें से किस...
- आप इस घोर युद्ध में मुझे नियोजित क्यों कर रहें हैं?... ’’ इसके उत्तर में भगवान् ने एक ही बात कही थी कि ‘‘इन कौरवों को तो मैंने पहले ही मारकर रख दिया है। तु...
- आप तो सिर्फ एक बात सोचें कि अधिकाधिक श्रम व समर्पण करने में एक दूसरे में कौन अग्रणी रहा?... साधन, योग्यता, शिक्षा आदि की दृष्टि से हनुमान् उस समुदाय में अकिंचन थे। उनका भूतकाल भगोड़े सुग्रीव...
- आप तो सिर्फ एक बात सोचें कि अधिकाधिक श्रम व समर्पण करने में एक दूसरे में कौन अग्रणी रहा?... साधन, योग्यता, शिक्षा आदि की दृष्टि से हनुमान् उस समुदाय में अकिंचन थे। उनका भूतकाल भगोड़े सुग्रीव क...
- आलस्य-प्रमाद को कहीं चुपके से आपके क्रिया-कलापों में घुस पड़ने का अवसर तो नहीं मिल गया?... अनुशासन में व्यतिरेक तो नहीं हुआ? अपने कृत्यों को दूसरे से अधिक समझने की अहंता कहीं छद्म रूप में आ...
- आलस्य-प्रमाद को कहीं चुपके से आपके क्रिया-कलापों में घुस पड़ने का अवसर तो नहीं मिल गया?... अनुशासन में व्यतिरेक तो नहीं हुआ? अपने कृत्यों को दूसरे से अधिक समझने की अहंता कहीं छद्म रूप में आप ...
- आल्पस पर्वत जैसे दुर्गम अवरोध को उसने जब पार करने की ठानी, तो प्रश्न सामने आया कि अब तक कोई उसे पार नहीं कर सका, सभी महत्त्वाकाँक्षी उसी अवरोध में उलझकर अपनी हस्ती गँवा बैठे, तो उसके लिए ही कैसे सम्भव हो सकता था कि दूसरे छोर तक पहुँच सके?... उसके संकल्प ने आश्वासन दिया कि आल्पस को नेपोलियन के लिए मार्ग देना ही पड़ेगा। हुआ भी ऐसा ही।चाणक्य ए...
- आल्पस पहाड़ को लाँघने की योजना बनाने वाले नेपोलियन से हर किसी ने यह कहा था कि जो कार्य सृष्टि में आदि से लेकर अब तक कोई नहीं कर सका, उसे आप कैसे कर लेंगे?... उत्तर बड़ा शानदार था। असम्भव शब्द मूर्खों के कोश में लिखा मिलता है। यदि आल्पस ने राह न दी, तो उसे इन...
- आवश्यक क्षमता और सम्पदा कौन जुटाए?... निश्चय ही यह नियोजन असाधारण एवं अभूतपूर्व है। इसे बिना मनस्वी साथी-सहयोगियों के सम्पन्न नहीं किया जा...
- आशंका है कि वह दुर्दिन कल-परसों ही कहीं सामने आ खड़ा न हो?... विकास के नाम पर हम विनाश की दिशा में चले हैं। आज ही सब कुछ पा लेने की सोच में हम विनाश को बुरी तरह द...
- आश्चर्य इस बात का है कि अवांछनीय जाल-जंजालों से अपने को उबारने के लिए कुछ करना तो दूर, सोचने तक का मनुष्य प्रयास नहीं कर पाता, उलटे अनाचारों पर उतारू होकर दूसरों को भी वैसा ही करते रहने के लिए उकसाता रहता है, भले ही वह अनर्थ स्तर का ही घृणित क्यों न हो?... यही है अपने समय के मनुष्य का तात्त्विक पर्यवेक्षण। मूर्खता को कहने-सुनने में तो उपहासास्पद बताया जात...
- आश्चर्य है कि हम उसी की गर्दन घोंट डालने के लिए उतारू हो गये?... जहाँ से हम अन्न-जल और वनस्पति प्राप्त करके जीवन धारण किये रहा करते थे, वह सम्पदा जिसके साथ हमारा सम्...
- आहार, जल और निवास तक की सुविधा न थी, फिर अन्य साधनों का उत्पादन और उपयोग बन पड़ने की बात ही कहाँ बन पाती होगी?... आज का हाट-बाजारों उद्योग-व्यवसायों विज्ञान-आविष्कारों सुविधा-साधनों अस्त्र-शस्त्र सज्जा-शोभा शिक्षा ...
- इंजन कितना ही समर्थ या कीमती क्यों न हो?... उसे चलाने की क्षमता तो सजीव मनुष्य में ही होती है। रेलगाड़ी अपने बलबूते किसी निर्दिष्ट लक्ष्य तक नही...
- इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य वाले गंगावतरण की परिकल्पना और सम्भावना इसी आधार पर गले उतरती है कि उसके पीछे कोई अदृश्य सत्ता काम कर रही है, अन्यथा इस समय के असुरत्व को देवत्व में बदल देने और विश्वव्यापी कायाकल्प पर कैसे विश्वास किया जा सकेगा?... जब नदी का प्रवाह उलट देना एक प्रकार से असम्भव माना जाता है, तो परम्पराओं के रूप में जड़ जमाए बैठी अव...
- इक्कीसवीं सदी में ऐसे ही परिवर्तन होंगे, पर यह प्रतीत न होगा कि यह कैसे हो रहे हैं और कौन कर रहा है?... चूँकि पिछले दो हजार वर्षों की गड़बड़ियाँ अगले सौ वर्षों में ही ठीक होनी हैं, इसलिए सुधार की गतिविधिय...
- इतना बड़ा परिवार अनायास ही कैसे जुट गया?... सम्भवत: पूर्व जन्मों के संचित किन्हीं संस्कारों ने यह मिलन-संयोग स्तर का सुयोग बना दिया हो। महत्त्वप...
- इतने पर भी बिक्री की माँग अत्यन्त धीमी रहने से उसका प्रचार-प्रसार कैसे हो?... महँगे मूल्य की बढ़िया सजधज वाली पुस्तकें छापी जाएँ, तो उन्हें या तो सरकारी शिक्षा तंत्र के ऊपर अतिरि...
- इतने पर भी यह विवाद बना ही रहता है कि इनमें से कौन-सी लाभदायक सिद्ध हुई, और कौन-सी हानिकारक?... एक रोगी के लिए जो चिकित्सा उपयोगी हुई, वही दूसरे रोगी के उसी रोग में हानिकारक सिद्ध होती देखी जाती ह...
- इतने बड़े परिवर्तन एवं प्रयास के लिए अग्रदूत कौन बने?... अग्रिम पंक्ति में खड़ा कौन हो? आवश्यक क्षमता और सम्पदा कौन जुटाए? निश्चय ही यह नियोजन असाधारण एवं अभ...
- इतने बड़े व्यवधान से निपटना किस बलबूते पर सम्भव हो?... जिनकी दाढ़ में खून का चस्का लगा है, उन्हें किस प्रकार विरत होने के लिए सहमत किया जा सकेगा?...
- इतने साधन कहाँ से आएँगे?... इसकी चिन्ता आप न करें। जिसने करने के लिए कहा है, वही उसके साधन भी जुटायेगा। आप तो सिर्फ एक बात सोचें...
- इतने साधन कहाँ से आएँगे?... इसकी चिन्ता आप न करें। जिसने करने के लिए कहा है, वही उसके साधन भी जुटायेगा। आप तो सिर्फ एक बात सोच...
- इतिहास, भूगोल, रेखागणित आदि ऐसे ढेरों विषय हैं, जो निजी जीवन में कदाचित् ही कभी कुछ काम आते हों?... किन्तु प्रचलन यही है कि स्कूलों की कक्षा पास होने का प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लेने पर ही किसी को शिक्ष...
- इन दुराग्रहों से पीछा छुड़ाने में क्या किसी को बड़ा मोर्चा डालना पड़ेगा?... सिर पर छाई अवाँछनीयता को उतार फेंकना किसी के लिए भी कठिन क्यों होना चाहिए? ‘सादा जीवन—उच्च विचार’ वा...
- इन परिस्थितियों में आत्मोत्कर्ष और आत्मपरिष्कार कैसे बन पड़े?... लोभ, मोह और अहंकार के तीन भारी पत्थर जिन्होंने सिर पर लाद रखे हैं, उनके लिये जीवन साधना की लम्बी और ...
- इन परिस्थितियों में हर सोचने वाले का मन टूटता और सम्बन्ध होता है कि उज्ज्वल भविष्य की संरचना का उद्देश्य किस प्रकार, किस आधार पर पूरा हो सकेगा?... कठिन समस्याओं के सरल समाधान भूमि में उर्वरता की समुचित मात्रा हो, तो उस पर खेत, उद्यान आदि की विविध ...
- इन सभी सरंजामों को जुटाने पर ही विचार-क्रान्ति का गतिचक्र आगे बढ़ सकता है, भले ही वह छोटे आकार तथा धीमी गति से चलने वाला ही क्यों न हो?... युग क्रान्ति के लिए अनिवार्य है कि भ्रान्तियों के हर पक्ष पर प्रहार करने वाले प्रतिपादन प्रस्तुत किय...
- इनमें से किसका चुनाव करेंं?... यह हमारे ऊपर है।जगी सम्वेदना ने नारी-चेतना को झकझोरामीरा ने जीवन्त मनुष्य होना स्वीकारा और उसकी हर क...
- इनमें से कुछ निश्चिन्त कहलाती और नौकरी प्राप्त कर लेने, धनी घर की वधू बन जाने जैसे स्तर प्राप्त कर लेती हैं, पर उन्हें भी समग्र मनुष्य जैसा स्वावलम्बन कहाँ उपलब्ध है?... शेष तो अशिक्षा, अस्वस्थता से ग्रस्त होने के कारण पूरी तरह परावलम्बी ही बनी हुई हैं। आपत्तिकाल आ धम...
- इन्हीं के लिए उन तीन प्रश्नों का उत्तर सही रूप दे सकना सम्भव होता है कि जीवन किसलिए मिला है?... उसके साथ किन कर्तव्य-उत्तरदायित्वों का अनुबन्ध जुड़ा? और सृष्टा के दरबार में पहुँचने पर, गर्दन ऊँची ...
- इन्हीं परिस्थितियों में रहते, अगले दिनों क्या कुछ बन पड़ेगा?... इस चिन्ता से हर विचारशील का किंकर्तव्यविमूढ़ होना स्वाभाविक है। सूझ नहीं पड़ता कि भविष्य में क्या घट...
- इन्हें कठिनाई यह दीखती है कि समर्थ सेनानायक का सीधा सम्पर्क रहने पर जो प्रयास सफलतापूर्वक चल रहे थे, वे आगे किस प्रकार चल पाएँगे?... साधन कैसे जुटेंगे? प्रोत्साहन और सहयोग कहाँ से मिलेगा? ऐसे सभी लोगों तक सन्देश पहुँचा दिया गया है कि...
- इन्हें कैसे मनाया जाय?... इसका शान्तिकुञ्ज का अपना निर्धारण है। सम्पर्क में आने वाले देख लें और सुधार के लिए सुझाव दें।पिछले...
- इन्हें जीवित कर सकोगे?... ’’‘‘कैसे?’’‘‘भाव-श्रद्धा को जगाकर।’’‘‘पर जब समस्याएँ बुद्धि की हैं, तो समाधान भी बुद्धि के होने चाहि...
- इस आँख मिचौनी में धूप-छाँव में किसे पता चल रहा है कि क्या हो रहा है?... कौन जीता और हार कौन रहा है? इतने पर भी जो अदृश्य को देख सकते हैं, वे सुनिश्चित आधारों के सहारे विश्व...
- इस एक पक्ष की बढ़ोत्तरी ने अधिकांश लोगों का बड़ी मात्रा में दोहन किस प्रकार किया है, इसे देखते हुए विवेकवानों को उस असमंजस में डूबना पड़ता है कि दृष्टिगोचर होने वाली प्रगति क्या वास्तविक प्रगति है?... इसके पीछे अधिकांश को पीड़ित शोषित, अभावग्रस्त रखने वाला कुचक्र तो काम नहीं कर रहा है।नीतिरहित भौतिकव...
- इस दृष्टि से तो वह स्रष्टा का भी स्रष्टा हुआ न?... कैसा अद्भुत है यह गले न उतरने वाला सत्य और तथ्य। मनुष्य सचमुच महान् है। दार्शनिकों ने उसे भटका हुआ द...
- इस प्रयोजन के लिये अपव्यय को कठोरतापूर्वक रोकना पड़ता है और जो समय, श्रम, चिन्तन, साधन आदि बचाया जा सकता है, उसे तत्परतापूर्वक रोका जाता है और साथ ही इसका भी ध्यान रखना पड़ता है कि उसका सत्प्रयोजनों में श्रेष्ठतम सदुपयोग किस प्रकार बन पड़े?... यदि यह निभ सके तो समझना चाहिए कि वास्तविक संयम-साधना की तपश्चर्या सही दिशा में रीति से चल रही है और...
- इस मन:स्थिति में सन्तोष कहाँ?... चैन कैसा? प्रसन्नता और प्रफुल्लता का अनुभव कर सकना तो कोसों पीछे रह जाता है। बीमार का निदान बन पड़ने...
- इस मानसिकता को व्यामोह का सम्मोहन नाम देने के अतिरिक्त और क्या कहा जाए?... क्या यह दुर्गति और दुर्गन्ध से भरी दुर्दशा ही मानव जीवन की नियति है?जो हो, पर वास्तविकता यही है कि औ...
- इस विचित्र पोशाक में उनसे कैसे मिलेंगे?... ’’‘‘स्वयं सूटेड-बूटेड कुत्तों को मोटरों में घुमाने वाले और नौकरों को फटकारने वालों को आप लोग बड़ा कह...
- इस सबका समापन किस प्रकार बन पड़ेगा?... इन्हीं परिस्थितियों में रहते, अगले दिनों क्या कुछ बन पड़ेगा? इस चिन्ता से हर विचारशील का किंकर्तव्यव...
- इस स्तर की चतुरता अपना लेने का प्रतिफल यह तो नहीं होना चाहिए कि वह आत्मा और परमात्मा की आँखों में धूल झोंककर, अहंकार से उन्मत्त होकर, अपने क्रिया-कलापों से वातावरण को उद्वेगों और अनाचारों से भर दे?... दृष्टि पसार कर जिस ओर भी देखा जाये, उसी ओर समस्याओं, उलझनों, विडम्बनाओं, विपत्तियों, विग्रहों, विद्र...
- इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि कुछ ही समय के वैज्ञानिक दुरुपयोग का क्या नतीजा निकला और अगले दिनों उसकी अभिवृद्धि से और भी क्या अनर्थ हो सकने की आशंका है?... विज्ञान का दर्शन प्रत्यक्षवाद पर अवलम्बित है। उसने दर्शन को भी प्रभावित किया है और यह मान्यता विकसित...
- इसका कारण मात्र यही है कि सूत्र संचालकों की कथनी और करनी में एकता होती है, भले ही वह बुरे स्तर की ही क्यों न हो?... बिजली के दो तार मिलने पर ही करेण्ट चालू होता है। कथनी और करनी दोनों के संयोग से ही उपदेश में शक्ति उ...
- इसके फटे हुए हिस्सों को सिल क्यों नहीं लेतीं?... ’’ प्रश्न ने उसके अतीत-वर्तमान को, आर्थिक अभावों को एक साथ कुरेद दिया। गहरे घावों को छू लेने पर जैसी...
- इसके बदले उन्हें क्या मिला?... उसका विवरण तो वे स्वयं ही बता सकते हैं, पर उपर्युक्त साधनाओं को निश्चित रूप से विश्वासपूर्वक नवधा भक...
- इसके बाद इसकी परिणति क्या हो सकती है?... इसका अनुमान तक अदूरदर्शी लोग लगा नहीं पाते, आँखें रहते हुए भी यह अन्धे जैसी स्थिति है। जिनका स्वभाव ...
- इसके लिए भौतिक क्षेत्र को आदर्शों के साथ जोड़ने पर क्या परिणाम निकल सकता है, इसकी खोजबीन करने का काम दूसरों के जिम्मे छोड़कर इन पंक्तियों के लेखक ने अपनी अभिरुचि, जानकारी एवं रुझान के अनुरूप यही उपयुक्त समझा कि वह अपने छोटे-से जीवन और थोड़े-से समय, साधन का उपयोग इस प्रयोजन विशेष के लिए कर गुजरे कि जब शरीर से प्राण श्रेष्ठ है तो फिर भौतिक-सम्पदा की तुलना में प्राण चेतना को वरिष्ठता का गौरव क्यों न प्राप्त होना चाहिए?... अगले दिनों सतयुग की वापसी के लिए नए सिरे से नया प्रयत्न क्यों न होना चाहिए? खोज के लिए प्रयोगशाला चा...
- इसमें हानि ही क्या है?... अपने प्रयोग यदि खरे उतरते हैं तो उससे श्रद्धा-विश्वास की अभिवृद्धि ही होती है। यदि मिथ्या सिद्ध होते...
- इसलिये उस बेतुकी प्रक्रिया का अभीष्ट परिणाम हो भी कैसे सकता है?... एक ही देवता के दो भक्त परस्पर शत्रु भी हो सकते हैं। दोनों अपनी-अपनी मर्जी की याचना कर सकते हैं। ऐसी ...
- इससे अधिक और कुछ कोई अपने स्वजन सम्बन्धियों को दे ही क्या सकता है?... सम्राट अशोक ने जो प्रेरणा पाई थी उसी को अपनाने के लिए अपने सुपुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को प...
- इससे अधिक और कुछ कोई अपने स्वजन सम्बन्धियों को दे ही क्या सकता है?... सम्राट् अशोक ने जो प्रेरणा पाई थी, उसी को अपनाने के लिए अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को...
- इससे अधिक शर्मनाक बात क्या होगी?... उन्होंने चुपचाप झोले से धोती निकाली और उसकी ओर बढ़ाई—‘‘लो बहन अपने भाई की ओर से इसे स्वीकार करो।’’यु...
- इससे अधिक सौभाग्य क्या?... पुत्र और पुत्री में क्या भेद? भाई कर सकता है, तो बहन क्यों नहीं?भाई और बहन दोनों तैयार हुए। उन्हें स...
- इसी प्रकार नव सृजन का लक्ष्य, कल्पना करने वालों को कठिन दीखता तो है, पर उस स्रष्टा को विदित है कि उनकी नव सृजनयोजना को पूरा करने के लिए, जो अपने प्राण हथेली पर रखकर अग्रगमन का साहस दिखा रहे हैं, उन्हें सफलता का लक्ष्य प्रदान करने के लिए क्या-क्या आवश्यकताएँ जुटानी और क्या जिम्मेदारी निभानी चाहिए?... माँगने वाले भिखमंगे दरवाजे-दरवाजे पर झोली पसारते, दाँत निपोरते, गिड़गिड़ाते और दुत्कारे जाते हैं।...
- इसीलिए यह उपाय सोचा गया है कि इतने महान प्रयोजन की पूर्ति एवं विशाल आयोजन के लिए एक विश्वस्त, परिचय देने वाला मॉडल खड़ा किया जाए कि प्रज्ञा अभियान की रूप रेखा का व्यावहारिक क्रियान्वयन किस प्रकार सम्भव है?... इसी के लिए एक छोटा, किन्तु आदर्श एवं आनुपातिक मॉडल शान्तिकुञ्ज के रूप में बनाकर खड़ा कर दिया गया है।...
- इसे आश्चर्य नहीं तो और क्या कहें?... राई जितने छोटे बीज का विशाल वट-वृक्ष के रूप में सुविस्तृत हो जाना क्या कोई कम आश्चर्य की बात है? यह ...
- इसे आश्चर्य ही कहना चाहिए, कि सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में हर दृष्टि से सुसम्पन्न प्राणी, इस तरह दिन गुजारे मानों विपन्नताओं ने सभी ओर से घेर रखा हो?... तनिक गम्भीरता से विचार करने पर कारण स्पष्ट हो जाता है। वासना, तृष्णा और अहंता के निविड़ भव-बन्धनों न...
- इसे करेगा कौन?... इसका उत्तर एक ही है कि जागृत मनुष्यों में से अधिकांश की महत्त्वाकांक्षाएँ इसी दिशा में मुड़ेंगी कि व...
- इसे कौतुक-कौतूहल के अतिरिक्त और क्या कुछ कहा जाए?... ऐसों का व्यक्तित्व उपाहासास्पद बन जाता है और पता चलने पर निकटवर्तियों से लेकर सहयोगियों तक सभी पल्ला...
- इसे कौन करा रहा है?... आखिर वह चतुराई कैसे चुक गई, जो बहुत कुछ पाने का सरंजाम जुटाकर अलादीन का नया चिराग जलाने चली थी। पहुँ...
- इसे देख समझ कर सही कल्पना की जा सकती है कि भविष्य कैसे बदलेगा?... नूतन सदी कैसे आएगी।सामान्यतया अपने चारों ओर दृष्टि दौड़ाने पर पता चलता है कि जनसाधारण के लिए प्रचलनो...
- ईंधन के अभाव मेें कारखाने एवं द्रुतगामी वाहन भविष्य में कैसे चलते रहेंगे?... यह एक बड़ा प्रश्न है। फिर इसी प्रयोजन के लिए धातुएँ भी तो असाधारण मात्रा में प्रयुक्त होती हैं। उनकी...
- उज्ज्वल भविष्य की संरचना में प्रमुख भूमिका निभा सकने में समर्थ इस महान प्रचलन को अपनाने के लिए, विचारशील पीढ़ी में क्या नया उल्लास-आवेश उपजाया जा सकता है?... वस्तुत: सच्चे अर्थों में समयदान करते तभी बन पड़ता है, जब अन्तराल की गहराई से आदर्शों पर चलने के लिए ...
- उठाईगीर, लुच्चे-लफंगे छल-छद्मों के सहारे आए दिन बहुत कुछ कमाते रहते हैं, पर मुफ्त के माल का सदुपयोग कर सकना कदाचित् ही किसी से बन पड़ा हो?... भोजन तभी हजम होता है, जब पचाने के लिये कड़ी मेहनत की जाये। मेहनत की, ईमानदारी की कमाई ही फलती-फूलती ...
- उदारता के अभाव में उसे अभावग्रस्तों के लिए लगा सकने का तो साहस ही नहीं उभरता, फिर निजी आवश्यकताओं के उपरान्त जो बचे, उसका आखिर हो क्या?... मात्र एक ही मार्ग रह जाता है—दुरुपयोग इस प्रकार निकृष्ट स्तर की स्वार्थ संकीर्णता में फँसे और अधिक उ...
- उद्धत् आचरण वाला व्यक्ति कीचड़-से-कीचड़ धोने के प्रयत्न में क्या कुछ सफलता प्राप्त कर सकेगा?... शालीनता और परमार्थपरायणता मिलकर ही तपश्चर्या बनती हैं और उन्हीं के आधार पर प्रतिभा की ऊर्जा अपनी प्र...
- उनके अब तक के योगदान को, परमार्थ पुरुषार्थ को, मुक्त कण्ठ से सराहा जा सकता है, पर बड़े प्रयोजनों के लिए इतना ही तो पर्याप्त नहीं?... समय की बढ़ती माँग को देखते हुए, बड़े कदम भी तो उठाने पड़ेंगे।...
- उनके कुचक्र में फँसने और बँधे रहने के लिए तो हीन स्तर के प्राणी भी स्वतंत्र हैं, पर मनुष्य अपनी गरिमा भरे भविष्य को यदि उसी तुच्छता पर आधारित करने का हठ करे, तो उसे किस प्रकार समझदारों की पंक्ति में बिठाया जा सकेगा?... सरकार मोर्चे पर सैनिकों को लड़ने भेजती है, तो उनके लिए आवश्यक अस्त्रों-उपकरणों की, भोजन-आच्छादन की...
- उनके कुचक्र में फँसने और बँधे रहने के लिए हीन स्तर के प्राणी भी स्वतंत्र हैं, पर मनुष्य अपनी गरिमा भरे भविष्य को यदि उसी तुच्छता पर आधारित करने का हठ करे, तो उसे किस प्रकार समझदारों की पंक्ति में बिठाया जा सकेगा?... सरकार मोरचे पर सैनिकों को लड़ने भेजती है, तो उनके लिए आवश्यक अस्त्रों, उपकरणों, वाहनों की, भोजन-आच्छ...
- उनसे निपटने के लिये सतर्कता न बरती जाये तो बात कैसे बने?... चोर-उचक्कों, ठगों, उद्दण्डों की उपेक्षा न होती रहे, तो वे असाधारण क्षति पहुँचाये बिना न रहेंगे।दुष्प...
- उन्हें अनर्थ ही क्यों सूझता रहता है?... उनसे सुविधा, प्रसन्नता और प्रगति जैसा कुछ बन पड़ना तो दूर, उलटे संकटों, विपन्नताओं, विभीषिकाओं का ही...
- उन्हें उभारने, उठाने का जब भीतर या बाहर से कोई प्रयत्न ही नहीं होता, तो आगे बढ़ने, ऊँचे उठने की सम्भावना ही कैसे बने?... उस दिशा में कुछ ठोस प्रयत्न करने का प्रयास ही कैसे चले? जब उमंगें ही मर गईं तो फिर अग्रगमन का अवसर छ...
- उन्हें कहाँ से ढूँढ़ा जाए?... कौन उनमें प्राण फूँके, कौन उन्हें जुझारू संकल्पों से ओत-प्रोत करे? चारों ओर दृष्टि पसारने के उपरान्त...
- उन्हें सिखाते, देखो इस स्थिति में भी किस तरह स्वच्छ रहा जा सकता है?... सुसंस्कृत बना जा सकता है।अतिरिक्त समय में उनके बच्चों को पढ़ाते। प्रौढ़ों को पुस्तकों से पढ़कर जीवनो...
- उपचारकर्ता, अपनी पराजय की झेंप मिटाने और रोजगार चलाने के लिए बढ़-चढ़कर प्रशंसा करके उपचार-बचाव आदि का लबादा ओढ़ते रहते हैं, पर सच्चाई अपनी जगह पर अड़ी रहकर पूछती है कि चिकित्सा तंत्र जब तूफानी गति से बढ़ रहा है, तो सर्वसाधारण को आरोग्य रक्षा का आश्वासन क्यों नहीं मिलता?... इस असमंजस के निवारण के लिए तनिक अधिक गहराई में उतरने की जरूरत है। खोजों का अन्तिम निष्कर्ष आज या कल ...
- उपासना क्षेत्र में कदम बढ़े, पर यह अदम्य अभिलाषा भी बनी रही कि जैसा कहा जाता है, वैसी शक्ति भी अध्यात्म में होनी ही चाहिए, अन्यथा पटरी से उतरे इंजन को उठाकर फिर से यथास्थान रख सकने जैसा प्रयोग बन कैसे पड़ेगा?... मार्गदर्शक ने उत्सुकता के औचित्य को समझा, साथ ही अपने निजी उत्कर्ष को भी उसमें जोड़ा कि समय का प्रवा...
- उलझी हुई समस्याओं का समाधान तो उनसे बन ही कैसे पड़ेगा?... इन दिनों पतन-पराभव का संकट, विग्रह का संकट, विग्रह का वातावरण बन कर खड़े हुए अराजकता स्तर के असमंजसो...
- उल्टे प्रवाह का मोड़कर सीधी दिशा में चलने के लिए लोकमानस को नियोजित करने का तारतम्य बिठाएँ?... समय की अनिवार्य आवश्यकता को पूरा कर सकने वाले प्रकाश-कण कहीं से उभरते नहीं। नव जागरण के स्वर कहीं से...
- उस अवसर को गँवाकर वे जिस ललक लिप्सा की पूर्ति का दिवा-स्वप्न देखते रहते हैं, उसे भी कौन साकार कर पाता है?... तृष्णा मरते समय तक प्रौढ़ ही बनी रहती है। शेख-चिल्लियों का समुदाय कुबेर जैसा धनाढ्य और इन्द्र जैसा...
- उस अवसर को गँवाकर वे जिस ललक-लिप्सा की पूर्ति का दिवा-स्वप्न देखते रहते हैं, उसे भी कौन साकार कर पाता है?... तृष्णा मरते समय तक प्रौढ़ ही बनी रहती है। शेखचिल्लियों का समुदाय कुबेर जैसा धनाढ्य और इन्द्र जैसा प्...
- उस गहरी खुमारी और लड़खड़ा देने वाली बदहवासी में यह सोचते भी नहीं बन पड़ा कि इस विक्षिप्तता से उन्मत्त होकर, जो कर गुजरने का आवेश चढ़ दौड़ा है, उसका क्या परिणाम होगा?... अनाचारी इसी उन्मादग्रस्त स्थिति में कुछ भी कर गुजरते हैं और पछताते तब हैं, जब कुकृत्यों के दुष्परिणा...
- उस दिशा में कुछ ठोस प्रयत्न करने का प्रयास ही कैसे चले?... जब उमंगें ही मर गईं तो फिर अग्रगमन का अवसर छप्पर फाड़कर आकाश से आँगन में क्यों कर आ धमके?संसार में प...
- उस योजना के क्रियान्वित होने की विधि-व्यवस्था किस प्रकार बन पड़ेगी?... ऐसे अनेकों असमंजस भरे प्रश्न इन दिनों असंख्यों के मन में उठ रहे होंगे। उठने स्वाभाविक भी हैं, क्योंक...
- उस सन्दर्भ में हाथ सिकोड़ा जाए, तो उत्पन्न होते जाने वाले मनुष्य समुदाय की व्यवस्थाएँ कैसे बनें?... मनुष्यों की अभिवृद्धि अनायास ही रुकती भी तो नहीं। इन दिनों एक नया व्यवसाय जन्मा है—युद्ध। बीसवीं सदी...
- उस सफलता को क्या कहा जाये?... जो विभूतियों के रूप में जब किसी पर विषम ज्वर की तरह चढ़ दौड़ती हैं, तो उसे एक प्रकार का उन्मादी बनाए...
- उसका विवरण तो वे स्वयं ही बता सकते हैं, पर उपर्युक्त साधनाओं को निश्चित रूप से विश्वासपूर्वक नवधा भक्ति के स्थान पर प्रतिपादित किया जा सकता है और देखा जा सकता है कि उसके सहारे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही क्षेत्रों में गरिमामय उपलब्धियों को सहज-सरलतापूर्वक हस्तगत कर लिया गया या नहीं?... राजमार्ग पर चलने वाले भटकते नहीं। झाड़-झंखाड़ों में वे उलझते हैं, जिन्हें छलांग लगाकर तुर्त-फुर्त बि...
- उसका स्वागत-अर्चन करने की आवश्यकता की पूर्ति के लिए, क्या असंख्यों भावनाशील पंक्तिबद्ध होकर विशाल सेना की तरह खड़े मिलेंगे?... क्या वे इतने स्वल्प समय में जुट सकेंगे? जिन्हें महाकाल की इच्छा और योजना के सफल होने का विश्वास है, ...
- उसकी बात पर कोई क्यों और किस आधार पर, कितना विश्वास करे?... उपाय एक ही शेष रह जाता है कि ऐसी प्रतिभाएँ नये सिरे से उभरें, जो अपना निज का आदर्श प्रस्तुत करते हुए...
- उसके ऊँचे उठने, आगे बढ़ने का सुयोग कैसे बनेगा?... मनुष्य-मनुष्य के बीच छाया हुआ छद्म, अविश्वास, असहयोग, अनाचार, चित्र-विचित्र प्रकार के उद्वेग, असन्तो...
- उसके पूरी तरह छूट जाने के उपरान्त व्यक्ति क्षुद्र कृमि-कीटकों की गई−गुजरी श्रेणी में ही गिने जाने योग्य रह जाता है, भले ही वह पदाधिकारी, पदवीधारी, सम्पन्न, कुशल एवं विभूतिवान् ही क्यों न समझा जाता हो?... यह सुविधाएँ मात्र शारीरिक विलासिता, सज्जा अथवा इठलाने भर के काम आती हैं। अन्त:चेतना को इनकी बहुलता स...
- उसके संकल्प एवं नियोजन में प्रतिरोध कौन खड़ा करेगा?... महत्त्वपूर्ण कार्य भगवान् करते हैं और उसके श्रेय को शरीरधारी मुफ्त में ही प्राप्त कर लेते हैं। चेतना...
- उसके साथ किन कर्तव्य-उत्तरदायित्वों का अनुबन्ध जुड़ा?... और सृष्टा के दरबार में पहुँचने पर, गर्दन ऊँची उठाकर अपने क्रिया कलापों का सन्तोषजनक विवरण प्रस्तुत क...
- उसके साथ जुड़ी हुई मर्यादाओं का परिपूर्ण निर्वाह कैसे हो सकता है और वर्जनाओं से कैसे बचा जा सकता है?... यह समझ अन्तराल की गहराई से निरन्तर उठती रही और उसका परिपालन भी स्वभाव का अंग बन जाने पर बिना किसी कठ...
- उसने अब तक एक से एक बढ़कर उपलब्धियाँ प्रस्तुत की हैं और अपने आविष्कारों से जादू लोक जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं तो भविष्य के लिए उसकी जो योजनाएँ हैं, अवधारणाएँ हैं, वे क्यों पूर्ण न होंगी?... इस आशा की एक झलक झाँकी के उपरान्त तत्काल दूसरा पक्ष समझ में आता है कि उसने भौतिक उपलब्धियों से कुछेक...
- उसने उस पुरातन अध्यात्म को खोज निकालने के लिए अपने चिन्तन, समय, श्रम एवं पुरुषार्थ को मात्र एक केन्द्र पर केन्द्रित किया है कि यदि पुरातन काल का सतयुगी अध्यात्म सत्य है, यदि ऋषियों की उपलब्धियाँ सत्य हैं, तो उनका वास्तविक स्वरूप क्या रहा होगा और उसके प्रयोग से ऋद्धि-सिद्धि जैसे परिणामों का हस्तगत कर सकना क्यों कर सम्भव हुआ होगा?... अनुमान था कि कहीं कोई खोट घुस पड़ने पर ही शाश्वत सत्य को झुठलाये जाने का कोई अनर्थ मार्ग में न अड़ ग...
- उसने पूछा—क्या इसका उपचार नहीं हो सकता?... डॉक्टरों ने सीधा सा उत्तर दिया कि आपकी जाँच-पड़ताल कुछ महीने पहले हो सकी होती और समय रहते वस्तुस्थित...
- उससे कहा, ‘‘जरा तुम कल्पना करके देखो, यदि यही दुरावस्थाएँ तुम्हें और तुम्हारे स्वजनों को घेर लें, तो कैसी अनुभूति होगी?... ’’ईसा लगातार उसकी आँखों में देखे जा रहे थे। जेकस ने आँखें झुका लीं। कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उसने...
- उसी दिशा में क्यों न चलें?... मनीषी नीत्से ने दृढ़तापूर्वक घोषणा की है कि ‘‘तर्क के इस युग में पुरानी मान्यताओं पर आधारित ईश्वर मर...
- उसे कहने के लिए विवश होना पड़ा—‘‘आप ठीक कहते हैं; पर उपाय क्या है?... ’’‘‘मनुष्य को उसकी खोई हुई मनुष्यता ढूँढ़कर देनी होगी, उसके मर्म को स्पर्श करना पड़ेगा। भाव चेतना के...
- एक दिन राजस्थान की एक महिला केसर बाई ने उनसे पूछ ही लिया—‘‘बहन यह पुरुषों का काम क्यों कर रही हैं?... ’’‘‘यह पुरुषों का काम है?’’ ‘‘और नहीं तो क्या........?’’‘‘सही कहा जाए तो, यह महिलाओं का काम है।’’ ‘‘...
- एक दुष्कल्पना से ग्रसित अधिकांश लोग पाए जाते हैं कि अपनी निज की सामर्थ्य अकिंचन है, उसे बढ़ाने के लिए हम क्या कुछ कर सकते है?... उत्कर्ष से सुयोग मिलना अपने हाथ में नहीं है। जितना प्रयत्न अच्छे के लिए किया जा चुका है उससे अधिक और...
- एक पहिया टूटा और दूसरा साबूत हो, तो गाड़ी ठीक प्रकार चलने और लक्ष्य तक पहुँचने में कैसे समर्थ हो सकती है?... एक हाथ वाले, एक पैर वाले, निर्वाह भर कर पाते हैं।...
- एक यह कि अन्य प्राणियों के लिए सर्वथा दुर्लभ इतना कलात्मक जीवन सृष्टा ने किस प्रयोजन के लिए प्रदान किया तथा उस विशिष्ट अनुदान का अधिकारी समझा?... दूसरा यह कि जो आवश्यक साधन एवं वैभव प्राप्त है, उसका आज की परिस्थितियों में सर्वश्रेष्ठ उपयोग क्या ह...
- एक यह कि अपने देश की दो-तिहाई जनता अशिक्षित है, वह साहित्य का लाभ कैसे उठाये?... फिर इस घोर महँगाई के जमाने में आर्थिक कठिनाइयों से ग्रस्त अशिक्षित स्तर की जनता उसे किस आधार पर खरीद...
- एक से पूछा—‘‘बंगाल के निमाई यहीं ठहरे हैं?... ’’जवाब मिला—‘‘पास वाले डेरे में हैं।’’अन्दर जाने पर देखा—एक गौर वर्ण का युवक शास्त्रचर्चा कर रहा है।...
- एक सेब का फल टूटकर पृथ्वी पर गिरने की घटना ने ही उनकी अन्त:प्रज्ञा में हलचल मचा दी, यह पृथ्वी पर ही क्यों गिरा?... यह चिन्तन करते-करते वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि पृथ्वी के अन्दर प्रचुर मात्रा में गुरुत्व बल विद्यमा...
- एक ही प्रेरणा है कि अपनी सामर्थ्य के कण-कण को जनहित में लगाओ, जबकि दूसरी यही सिखाती रहती है कि किस चालाकी से दूसरों की आवश्यकताओं को भी हड़पकर अपने और लड़के-नातियों के लिए जमा किया जाए?... अशोक की जाग्रत आत्मचेतना ने महत्त्वाकांक्षा को ठोकर मारकर स्वयं के व्यक्तित्व से बाहर निकाल फेंका था...
- ऐसा लगता है मानों इन्हें कहीं से मुफ्त का खजाना मिल गया हो?... औसत भारतीय को दिनभर में कुछ घण्टे का ही काम मिलता है। शेष तो वे ज्यों-त्यों मटरगश्ती, आवारागर्दी, नि...
- ऐसी दशा में अबोध बालक कभी स्वयं हैरान हो, कभी घरवालों पर खीझे और कभी आसमान तक लातें चलाकर चन्द्रमा को धराशायी बनाने के लिए रौद्र रूप धारण करे, तो क्या किया जाये?... यह समझने-समझाने के अतिरिक्त और किसी प्रकार बात बनती ही नहीं कि अपनी सोच बदल ली जाये, तो अत्यधिक व्यथ...
- ऐसी दशा में गायत्री को सार्वभौम मान्यता मिले और उसे सार्वजनिक ठहराया जाए, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है?... यज्ञ और गायत्री एक-दूसरे के पूरक गायत्री का पूरक एक और भी तथ्य है—यज्ञ। दोनों के सम्मिश्रण से ही पूर...
- ऐसी दशा में देवता असमंजस में फँस सकता है कि किसकी मनोकामना पूरी करें?... किसकी न करें? फिर देवता पर भी रिश्वतखोर होने का चापलूसी पसन्द सामन्त जैसा स्तर होने का आरोप लगता है।...
- ऐसी दशा में यदि उलटा मार्ग अपनाने का निर्णय करते बन पड़े तो इसमें आश्चर्य ही क्या?... मानवी दिव्य चेतना के लिए इस प्रचलन को अपनाना सर्वथा अवांछनीय है। ऐसा कुछ तो कृमि-कीटक और पशु-पक्षी भ...
- ऐसी दशा में वे उपेक्षा और उपहास के निमित्त कारण बन गए तो आश्चर्य ही क्या है?... नवयुग में उस सार्वभौम, सर्वजनीन भाव उन्नयन प्रक्रिया का पुनर्जीवन सम्भव किया जा रहा है। सतयुग की व...
- ऐसी दशा में सत्य तक कैसे पहुँचा जाय?... प्रश्न का सही उत्तर यह है कि जीवन को ही जीवित जाग्रत देवता माना जाये। उसके ऊपर चढ़े कषाय-कल्मषों का ...
- ऐसी मान्यताओं को अदूरदर्शिता और घोर प्रतिगामिता के अतिरिक्त और क्या कहा जाए?... विवाह तब होना चाहिए, जब दोनों एक-दूसरे को सहमत कर सकने और आगे बढ़ाने के लिए समुचित योगदान दे सकने की...
- ऐसी स्थिति में ६०० करोड़ मनुष्यों का विचार परिष्कार (ब्रेन वाशिंग) कैसे सम्भव हो?... गलत प्रचलनों की दिशाधारा उलट देने का सुयोग किस प्रकार मिले? जब अपना छोटा सा घर-परिवार सँभाल नहीं पात...
- ऐसे दुराग्रही तो शायद बिजली का प्रयोग करने और नल का पानी पीने से भी ऐतराज कर सकते हैं?... उन्हें शायद गुफा बनाकर रहने का भी आग्रह हो, क्योंकि पूर्व पुरुषों ने निवास के लिए उसी प्रक्रिया को स...
- ऐसे महामानव जिन्होंने आदर्शों का परिपालन और लोकमंगल के लिये समर्पित होने के रूप में अपने जीवन का उत्सर्ग किया, उन्हें भी प्रतीक माना जा सकता है?... राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी आदि को भगवान् का अंशावतार कहा जा सकता है। उन्हें इष्ट मानकर उनके ढाँचे में ...
- ऐसे लोगों की शारीरिक बलिष्ठता कैसे सराही जा सकेगी?... यही बात बुद्धिबल, धनबल आदि के सम्बन्ध में है। उसका सदुपयोग करने वाले अपने लिए भर्त्सना और दूसरों के ...
- ऐसे वातावरण में अभावों की अनुभूति तो हो ही कैसे सकती है?... मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताएँ अत्यन्त स्वल्प हैं। उन्हें कुछ ही घण्टे के साधारण श्रम से सुविधापूर्वक...
- और उसका समाधान कहाँ ढूँढ़ा जाए?... इस सन्दर्भ में मोटे तौर से एक ही बात कही जा सकती है कि प्रत्यक्षवाद की पृष्ठभूमि पर जन्मे भौतिकवाद न...
- और उसका समाधान खोजने का क्या मतलब?... पर जब मानवी गरिमा की गहराई तक उतरने की स्थिति बन पड़े तो फिर माता जैसा वात्सल्य हर आत्मा में उभर सकत...
- और क्या कर सकता हूँ?... तो समझना चाहिए कि उसे क्षुद्र से महान्, नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम बनने से कोई नहीं रोक सकता।...
- और भविष्य में अपने वर्ग को उच्चाधिकार दिलाने का, स्वागत करने का मानस क्यों न बनाए?... परिवार के पुरुष भी सोचते हैं कि हमारा कोई सदस्य यदि शासन में भागीदार बनता है, तो उस आधार पर पूरे परि...
- और सृष्टा के दरबार में पहुँचने पर, गर्दन ऊँची उठाकर अपने क्रिया कलापों का सन्तोषजनक विवरण प्रस्तुत करते बन पड़ा?... पेट-प्रजनन के लिए तो कृमि-कीटक भी जी लेते हैं। दोनों प्रयोजनों को वे अधिक निश्चिन्ततापूर्वक पूरा करा...
- औसत नागरिक स्तर का निर्वाह करने में क्या किसी के बड़प्पन में कमी आएगी?... वरन् सच तो यह है कि उसे अपेक्षाकृत अधिक नीतिवान, अधिक प्रसन्न और अधिक संयमी उदारचेता कहलाने का अवसर ...
- कब्ज, जुकाम, अनिद्रा जैसे रोगों का तो कहना ही क्या?... वे तो नए फैशन के रूप में एक से अनेकों पर अपना आधिपत्य जमाते देखे जाते हैं।...
- कर्तव्यों को पीछे धकेल दिया गया और अधिकारों को चौगुना-सौगुना कहकर जताया जा रहा है और भी न जाने कहाँ-कहाँ क्या-क्या अनर्थ हो रहा है?... पर यह सूझ नहीं पड़ता कि इनका निराकरण कौन करेगा? कैसे करेगा? यह तथ्य हजार बार समझा और लाख बार समझाया ...
- कल-कारखानों का पर्वताकार उत्पादन, सर्जरी-अङ्ग प्रत्यारोपण जैसी सुविधाएँ भूतकाल में कहाँ थीं?... कहा जा सकता है कि विज्ञान ने पौराणिक विश्वकर्मा को कहीं पीछे छोड़ दिया है।बुद्धिवाद की प्रगति भी कम ...
- कल्पवृक्ष की छाया में बैठने के बाद, उससे वापस लौटने का मन भला किसका होगा और क्यों होगा?... इस सन्दर्भ में आश्चर्यचकित होने वालों ने यहाँ विशेष रूप से अपनाई गई ‘योगविद्या’ को महत्त्व दिया है औ...
- कहने वालों को तो क्या किया जाए?... जिसके मुँह में पायरिया, पेट में अल्सर और आहार में लहसुन घुसा होता है। इनकी साँस में दुर्गन्ध ही उठती...
- कहीं भावों की जगह कुत्सा न भड़का लें?... ’’‘‘आपकी आशंका निराधार नहीं है महर्षि, किन्तु इस कारण भयभीत होकर पीछे हटना आवश्यक नहीं है। आवश्यक है...
- कामुकता की प्रवृत्ति कहीं कुदृष्टि से तो नहीं उभर रही?... असंयम से शरीर और मस्तिष्क खोखला तो नहीं हो रहा? शारीरिक और मानसिक स्वस्थता बनाये रखने के लिये इन्द्र...
- काश, प्रतिभा और सदाशयता का एक ही केन्द्र पर केन्द्रीकरण बन पड़ा होता, तो यह संसार कितना सुखी और समुन्नत दृष्टिगोचर होता?... सदुपयोग न बन पड़े तो इसमें भी किसी प्रकार सन्तोष किया जाता रह सकता है कि जो कमाया गया था, वह निरर्थक...
- कितना आगे रह सकते हैं?... कितना भार उठा सकते हैं? स्वयं को अधिकाधिक विनम्र, दूसरों को बड़ा मानें। स्वयंसेवक बनने में गौरव अनुभ...
- कितना आगे रह सकते हैं?... कितना भार उठा सकते हैं? स्वयं को अधिकाधिक विनम्र, दूसरों को बड़ा मानें। स्वयंसेवक बनने में गौरव अन...
- कितना भार उठा सकते हैं?... स्वयं को अधिकाधिक विनम्र, दूसरों को बड़ा मानें। स्वयंसेवक बनने में गौरव अनुभव करें। इसी में आपका बड़...
- कितना भार उठा सकते हैं?... स्वयं को अधिकाधिक विनम्र, दूसरों को बड़ा मानें। स्वयंसेवक बनने में गौरव अनुभव करें। इसी में आपका ब...
- कितनी बड़ी छलाँग लगा सका?... यही आपकी अग्नि परीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपने साथियों की श्रद्धा व क्ष...
- कितनी बड़ी छलाँग लगा सका?... यही आपकी अग्नि परीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपने साथियों की श्रद्धा व क्ष...
- कितने लोग हैं, जो पूजाकृत्य अपनाने के साथ इस गम्भीरता में उतरते हैं और यथार्थता को समझने का प्रयत्न करते हैं?... अन्धी भेड़चाल अपनाने पर समय की बरबादी के अतिरिक्त और कुछ हस्तगत हो भी नहीं सकता।हमें यथार्थता समझनी ...
- किन्हीं सुविकसित और सुसंस्कृत बनने वालों के निजी दृष्टिकोण, स्वभाव और दिशा निर्धारण को समझते हुये यह देखा जाना चाहिए कि वैसा कुछ अपने से बन पड़ रहा है या नहीं?... यदि नहीं बन पड़ रहा है तो उनका कारण और निवारण क्या हो सकता है? इस प्रकार के निर्धारण जीवन साधना के स...
- किस कमी के लिए, किस रूप में, किस प्रकार प्रयोग किया जाना है?... उसका निर्धारण विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है।(७) प्राणवानों का सान्निध्य—शक्तिपात की तांत्रिक क्रिया...
- किस कृत्य का भविष्य मेें क्या परिणाम होगा?... इसका दूरवर्ती अनुमान न लगा पाने पर तात्कालिक लाभ ही सब कुछ हो जाता है, भले ही उसके साथ अनीति ही क्यो...
- किस दिशा में चला जाय?... क्या किया जाय? इसके निमित्त संकल्प उठना और प्रयत्न बन पड़ना भी आत्मिक क्षेत्र का निर्धारण है। इसीलिय...
- किस प्रकार की योजना और विधि व्यवस्था बनानी जुटानी पड़ेगी?... किस स्तर की समृद्धि जुटानी पड़ेगी? इसका ऊहापोह करना समय रहते उचित भी है और आवश्यक भी, किन्तु इतना तो...
- किस स्तर की समृद्धि जुटानी पड़ेगी?... इसका ऊहापोह करना समय रहते उचित भी है और आवश्यक भी, किन्तु इतना तो ध्यान रखना ही पड़ेगा कि लोगों की म...
- किसका असली पिता कौन है?... इसकी सही जानकारी अपने आप तक को नहीं होती; पर इस सम्बन्ध में माता के कथन को ही प्रामाणिक मान लिया जात...
- किसकी न करें?... फिर देवता पर भी रिश्वतखोर होने का चापलूसी पसन्द सामन्त जैसा स्तर होने का आरोप लगता है। कितने लोग हैं...
- किसी पगले की सनक भी कहा जा सकता है, पर यदि वस्तुस्थिति पर नए सिरे से विचार किया जाए और अनुमान लगाया जाए कि यदि इस योजना के पीछे दैवी शक्ति काम कर रही होगी, तो योजना असफल होकर क्यों रहेगी?... आकाश में सूर्य, चन्द्र और तारे टाँग देने वाली सत्ता अग्नि, जल, पवन जैसे तत्त्वों से इस निर्जीव धरातल...
- किसे अपने में क्या सुधार करना चाहिए और किन नई सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्द्धन गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में करना है?... यह आत्म-समीक्षा के आधार पर, सही विश्लेषण होने के उपरान्त ही सम्भव है। इसके लिये कोई एक निर्धारण नहीं...
- कुछ करने के लिए साधन कहाँ से पाऊँ?... इन जिज्ञासाओं का सामाधान आकाशवाणी ने किया और कहा—गायत्री के माध्यम से तप करें, आवश्यक मार्गदर्शन भीत...
- कुछ घण्टे ऐसे हैं उन्हें यदि प्रमाद में गँवा दिये जायें, तो अब वह गया समय लौटकर फिर किस प्रकार आ सकेगा?... युग-परिवर्तन की वेला ऐतिहासिक, असाधारण अवधि है। इसमें जिनका जितना पुरुषार्थ होगा, वह उतना ही उच्च को...
- कुछ ने कहा—‘‘ अरे यह क्या?... आपको तो बड़े-बड़े आदमियों से मिलना पड़ता है। इस विचित्र पोशाक में उनसे कैसे मिलेंगे?’’‘‘स्वयं सूटेड-...
- कुहराम और धकापेल का ऐसा माहौल है, जिसमें सूझ नहीं पड़ता कि आखिर हो क्या रहा है?... इस आँख मिचौनी में धूप-छाँव में किसे पता चल रहा है कि क्या हो रहा है? कौन जीता और हार कौन रहा है? इतन...
- कैसी विचित्र स्थिति है?... ’’ ‘‘विचित्रता नहीं, विवशता कहिए। इसे उस अन्तर्व्यथा के रूप में समझिए, जो पीड़ा-निवारक को सामने पड़े...
- कोई कदम उठाने से पहले यह सोच लिया जाता था कि उसकी आज या कल-परसों क्या परिणति हो सकती है?... औचित्य को अपनाये भर रहने से वह सुयोग बना रह सकता है जिसे पिछले दिनों सतयुग के नाम से जाना जाता था। स...
- कोई क्या कर सकता है, यदि हानि को लाभ और लाभ को हानि समझ बैठने की मान्यता बना ली जाए?... कुरूप चेहरा दर्शाने के लिए दर्पण को आक्रोश का भाजन बनाया जा सकता है, पर इससे चेहरे पर छाई कुरूपता या...
- कोरी वाणी ने कब किसका कल्याण किया है?... सम्वेदनशील की एक ही पहचान है, वह जो भी कहता है, आचरण से। यदि ऐसा नहीं है, तो समझना चाहिए कि बुद्धि न...
- कौन उनमें प्राण फूँके, कौन उन्हें जुझारू संकल्पों से ओत-प्रोत करे?... चारों ओर दृष्टि पसारने के उपरान्त एक यही उपाय सूझा कि ‘‘खोज घर से आरम्भ करनी चाहिए।’’ दशरथ ने विश्वा...
- कौन जीता और हार कौन रहा है?... इतने पर भी जो अदृश्य को देख सकते हैं, वे सुनिश्चित आधारों के सहारे विश्वास करते हैं कि सृजन ही जीतेग...
- क्या अंगीकार करें?... उसका एक ही उत्तर हो सकता है कि जिसमें औचित्य का गहरा पुट हो, जिसमें समाधान के तर्क, तथ्य, उदाहरण और ...
- क्या आगे यह प्रगति क्रम रुक जाएगा?... क्या लम्बी मंजिल पार करने का लक्ष्य बनाकर चलने वाला कारवाँ कुछ मील पर ही थक कर आगे न चल सकने की असमर...
- क्या उसकी पूर्णता शक्ति से संयुक्त होने में ही है?... जाँच-पड़ताल इसकी भी करनी चाहिए कि उसमें इतनी शक्ति है क्या? जो भौतिक विज्ञान द्वारा प्रस्तुत की जाने...
- क्या किया जाय?... इसके निमित्त संकल्प उठना और प्रयत्न बन पड़ना भी आत्मिक क्षेत्र का निर्धारण है। इसीलिये आत्मबल को जीव...
- क्या बन रहा है?... क्या बिगड़ रहा है? इसका ठीक तरह सही स्वरूप देख पाना सर्वसाधारण के लिए सम्भव नहीं। दो पहलवान जब अखाड़...
- क्या बिगड़ रहा है?... इसका ठीक तरह सही स्वरूप देख पाना सर्वसाधारण के लिए सम्भव नहीं। दो पहलवान जब अखाड़े में लड़ते हैं, तो...
- क्या यह दुर्गति और दुर्गन्ध से भरी दुर्दशा ही मानव जीवन की नियति है?... जो हो, पर वास्तविकता यही है कि औसत आदमी इन्हीं परिस्थितियों में स्वेच्छापूर्वक या बाधित होकर रहने के...
- क्या यह विडम्बना नहीं है?... ’’ सन्त के उद्गार वाणी से फूट पड़े।गौर वर्ण के युवक ने महसूस किया कि यह वाक्य-रचना सिर्फ एक साथ गुँथ...
- क्या लम्बी मंजिल पार करने का लक्ष्य बनाकर चलने वाला कारवाँ कुछ मील पर ही थक कर आगे न चल सकने की असमर्थता प्रकट करने पर पैर पसार देगा?... आशंका ऐसी ही दीखने पर भी, किसी को यह विश्वास नहीं करना चाहिए कि जिस समर्थ सत्ता ने यह सरंजाम जुटाया ...
- क्या वे इतने स्वल्प समय में जुट सकेंगे?... जिन्हें महाकाल की इच्छा और योजना के सफल होने का विश्वास है, वे इस प्रतिपादन पर श्रद्धा कर सकते हैं क...
- क्या वे हमें हस्तगत हुईं?... इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है ‘‘हाँ’’। उनमें से यहाँ कुछ ऐसे प्रसंगों की ही चर्चा की जा सकती है ...
- क्या सिर्फ पोशाक बदलने से?... नहीं, अन्तरंग की संरचना में उलट-फेर से।पास खड़े साथी यह विचित्र परिवर्तन देख रहे थे। कुछ ने कहा—‘‘ अ...
- क्या सोते से जाग पड़ने की आवश्यकता समझाए?... प्रचार माध्यम अब अपनी विश्वसनीयता खोते चले जा रहे हैं, क्योंकि उपदेष्टा ही कथन के ठीक विपरीत आचरण कर...
- क्या हम उस स्वेच्छापूर्वक अपनाई गई कृपणता को घटा या हटा नहीं सकते, जिसके कारण जीवन के अन्तरंग और बहिरंग पक्षों को आत्म-प्रताड़ना और लोक-भर्त्सना सहते रहने के अतिरिक्त और कुछ भी तो हाथ नहीं आता?... आदान-प्रदान संसार का शाश्वत नियम है। नेकी का बदला कृतज्ञता के रूप में चुकाया जाता है, पर उसके लिए सब...
- क्या हम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं?... यह प्रश्न सभी के मन में बिजली की तरह कौंध रहा है। ऐसी स्थिति में हर विचारशील ने विश्व भर में अपने-अप...
- क्या हम सब अगले ही दिनों सामूहिक आत्महत्या का यह विनाश आयोजित करके रहेंगे?... स्थिति को कैसे बदला जाये? इसके सम्बन्ध में तरह तरह के उत्पादनों, उपकरणों, निर्धारणों की बात सोची जात...
- क्या हमारा मूल्य दीपक से भी कम है?... बात ऐसी तनिक भी नहीं, मात्र कृपणता का तूफान ही है जो श्रेय पथ पर चलने देने में, पग-पग पर अड़चन उत्पन...
- क्या होने जा रहा है?... क्या बन रहा है? क्या बिगड़ रहा है? इसका ठीक तरह सही स्वरूप देख पाना सर्वसाधारण के लिए सम्भव नहीं। दो...
- क्यों उसे वासना, तृष्णा और अहंता के लौहपाशों में जकड़ जाने पर बन्दीगृह के कैदी जैसी विडम्बनाएँ सहनी पड़ें?... क्यों मरघट में रहने वाले व्यक्तियों जैसा नीरस, निष्ठुर और हेय जीवन जीना पड़े? क्यों डरती-डराती और रो...
- क्यों करना पड़ रहा है?... इसके सम्बन्ध में एक बात बहुत जोर देकर कही जाती है कि मनुष्यों की जनसंख्या बेहिसाब बढ़ रही है। उनके ल...
- क्यों डरती-डराती और रोती-रुलाती जिन्दगी जीनी पड़े?... इस संसार में अन्धकार भी है और प्रकाश भी; स्वर्ग भी है और नरक भी; पतन भी है और उत्थान भी; त्रास भी है...
- क्यों परेशान हो?... ’’ पता चला परेशानी रोटी की है।‘‘अरे बस! तुम सब लोग अपनी-अपनी रोटियाँ एक जगह जमा करो और एक साथ खाना श...
- क्यों मरघट में रहने वाले व्यक्तियों जैसा नीरस, निष्ठुर और हेय जीवन जीना पड़े?... क्यों डरती-डराती और रोती-रुलाती जिन्दगी जीनी पड़े?इस संसार में अन्धकार भी है और प्रकाश भी; स्वर्ग भी...
- खिलौना-गाय दूध कहाँ देती है?... खिलौना-हाथी की पीठ पर बैठकर लम्बा सफर कहाँ किया जा सकता है? खिलौना-मुर्गी अण्डे कहाँ देती है?यही बात...
- खिलौना-मुर्गी अण्डे कहाँ देती है?... यही बात सुखी और समुन्नत संसार में सतयुगी वातावरण बनाये रखने वाले देव-मानवों के सम्बन्ध में भी है। इन...
- खिलौना-हाथी की पीठ पर बैठकर लम्बा सफर कहाँ किया जा सकता है?... खिलौना-मुर्गी अण्डे कहाँ देती है?यही बात सुखी और समुन्नत संसार में सतयुगी वातावरण बनाये रखने वाले दे...
- खीझी हुई प्रकृति क्या बदला ले सकती है?... अणु उपकरणों के बदले क्या प्रकृति ही सर्वनाश, महाप्रलय सामने लाकर खड़ी कर सकती है? यह सब सोचने की मान...
- गया समय फिर वापस लौटता कहाँ है?... हनुमान ने, विभीषण ने, अर्जुन ने, बुद्ध ने अपने निर्णय तत्काल कर लिए थे। यदि वे बात को फिर कभी के लिए...
- गलत प्रचलनों की दिशाधारा उलट देने का सुयोग किस प्रकार मिले?... जब अपना छोटा सा घर-परिवार सँभाल नहीं पाते, तो नया इनसान बनाने, नया संसार बसाने और नया भगवान् बुलाने ...
- गलाई के बिना ढलाई किसने कर दिखाई है?... मल-मूत्र से सने बच्चे को माता तब ही गोद में उठाती है, जब उसे नहला-धुला कर साफ-सुथरा बना देती है। मैल...
- गाँवों में लगने वाली हाटें अपने थोड़े से उद्योगों को असाधारण रूप से प्रोत्साहित किया करती थीं, पर इन दिनों की परिस्थितियों को देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता है कि इन सब का भविष्य क्या है?... फिर भी यदि गतिशील प्रतिभाएँ कुछ प्रयत्न करें, तो यह भी हो सकता है कि वे माध्यम, कुछ सुधरे हुए रूप से...
- गीताकार ने अर्जुन से कहा था कि कौरव दल का मरण तो नियति ने ही करके रख दिया है, राज्य सुख और अक्षय यश का भागी बनने से कतराता क्यों है?... सुयोग का लाभ उठाने में बुद्धिमानी क्यों नहीं देखता? ऐसी ही प्रचण्ड प्रेरणाएँ असंख्यों को मिलेंगी और ...
- ग्रह-नक्षत्र अधर में टँगे है और द्रुतगति से घूमते रहते हैं, तो इसे अघटित का घटित होने के अतिरिक्त और क्या कहा जाए?... मनुष्य स्वल्प है। उसकी सामर्थ्य भी सीमित है। उसकी सूझ-बूझ प्रयत्नशीलता और सफलता भी सीमित स्तर की ही ...
- घड़ी का उपयोग करने से अब कदाचित् ही कहीं एतराज किया जाता हो?... समय हर किसी को बाधित करता है कि युग-धर्म पहचाना जाये और उसे अपनाने में आनाकानी न की जाये।...
- घुटन के बीच भला कोई कितने समय जीवित रह पाएगा?... लगता तो यही है कि व्यक्ति, समाज और संसार के सामने अगणित समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हैं और सर्वग्राही चुन...
- घुड़दौड़ में अच्छे घोड़ा वाला भी यदि अस्त-व्यस्त गति का हो, तो उसके हाथ पराजय के अतिरिक्त और क्या लगने वाला है?... नारद का परामर्श मानने में जिन्होंने आना-कानी नहीं की वे ध्रुव, प्रहलाद, उमा, सावित्री की तरह अजर-अमर...
- चेचक की फुंसियों पर पट्टी कहाँ बाँधते हैं?... स्थाई उपचार तो रक्त शोधन की प्रक्रिया से ही बन पड़ता है।प्रस्तुत चिन्तन और प्रचलन में इतनी अधिक वि...
- चेचक की फुंसियों पर पट्टी कहाँ बाँधते हैं?... स्थायी उपचार तो रक्त-शोधन की प्रक्रिया से ही बन पड़ता है।प्रस्तुत चिन्तन और प्रचलन में इतनी अधिक विक...
- जड़ को काटे बिना विषवृक्ष की कुछेक पत्तियाँ तोड़ देने भर से क्या कुछ बनने वाला है?... एक नाम रूप वाली विपत्तियाँ दूसरे नाम रूप से सामने आएँ, इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक उपचारों से और कुछ हेर...
- जन कल्याण के सरञ्जाम जुटाए?... उल्टे प्रवाह का मोड़कर सीधी दिशा में चलने के लिए लोकमानस को नियोजित करने का तारतम्य बिठाएँ? समय की अ...
- जन साधारण की समस्याओं के सामाधान में यदि अध्यात्म का प्रयोग नहीं होगा, तो श्रेष्ठता कैसे पनपेगी और दुष्टता कैसे निरस्त होगी?... फिर भगवान् का उद्यान सूखता, कुम्हलाता और नष्ट-भ्रष्ट होता ही दीख पड़ेगा। यदि मूर्धन्यजन लोक मंगल को ...
- जन-शक्ति, धन-शक्ति और साधन-शक्ति इस प्रयोजन में लगी है, उसे उलट कर नये क्रम में लगाने की विकट समस्या को असम्भव से सम्भव कैसे बनाया जाए?... ।इस सब में भयंकर है मनुष्य का उल्टा चिन्तन, संकीर्ण स्वार्थपरता से बेतरह भरा हुआ मानस, आलसी, विलासी ...
- जनता की यह दशा और जनता का सेवक कहा जाने वाला मैं धोती-कुर्ता सभी से लैस?... इतना ही नहीं एक जोड़ी झोले में भी पड़े हैं। इससे अधिक शर्मनाक बात क्या होगी? उन्होंने चुपचाप झोले से...
- जब अपना छोटा सा घर-परिवार सँभाल नहीं पाते, तो नया इनसान बनाने, नया संसार बसाने और नया भगवान् बुलाने जैसी असम्भव दीख पड़ने वाली सृजन प्रक्रिया को विजयश्री वरण करने की सफलता कैसे मिले?... नि:सन्देह कठिनाई बड़ी है और उसे पार करना भी दुरूह है। पर हमें उस परम सत्ता के सहयोग पर विश्वास करना ...
- जब आकांक्षा तक मर गई, तो उत्कर्ष की पक्षधर हलचलें भी कहाँ से, कैसे उभर सकेंगी?... मानव जीवन का परम पुरुषार्थ, सर्वोच्च स्तर का सौभाग्य एक ही है कि वह अपनी निकृष्ट मानसिकता से त्राण प...
- जब उमंगें ही मर गईं तो फिर अग्रगमन का अवसर छप्पर फाड़कर आकाश से आँगन में क्यों कर आ धमके?... संसार में पैसे की चमक-दमक बहुत जगह देखी जा सकती है और उसके आधार पर जो खरीदा जा सकता है, उसकी सज-धज भ...
- जब उसकी महत्ता, आवश्यकता तक समझी न जा सकेगी तो फिर कोई कुछ करेगा भी क्यों?... शिक्षा को लोक व्यवहार का, उपार्जन प्रक्रिया का, सुविधा संग्रह का एक प्रयोजन भर माना जा सकता है। इतने...
- जब ऐसे ही अगणित चमत्कार इस सृष्टि में आए दिन होते हम देखते हैं, तो किसी को प्रतिकूलताओं को उलट कर अनुकूलता में बदल जाने पर क्यों आश्चर्य करना चाहिए?... बाल की नोंक से भी छोटा शुक्राणु जब कुछ ही दिनों में हँसता खेलता शिशु और फिर बाद में पराक्रमी प्रौढ़ ...
- जब चोर-उचक्के नशेबाज, गुण्डे, उच्छृंखल, व्यभिचारी अपने-अपने सम्पर्क में कितनों को ही नये सिरे से प्रभावित करते और साथी-सहयोगी बनाते देखे गये हैं, तो कोई कारण नहीं कि उच्च उद्देश्यों पर सच्चे मन से निष्ठा रखने वाले, चिन्तन को क्रिया के साथ जोड़ने वाले यदि उमंगों में लहराने लगें, तो अपने जैसे अनेकों को खींच-घसीट न सकें, परिवार को बढ़ा न सकें?... प्रज्ञा-परिजनों को एक से पाँच, पाँच से पच्चीस, पच्चीस से एक सौ पच्चीस बनने के लिए प्रयत्नशील होने के...
- जब छ: महीने में मरना ही है, तो अन्य अपने जैसे निरीहों के प्राण बचाने की कोशिश क्यों न करें?... उसने टेलीविजन पर एक अपील की कि यदि तीन करोड़ रुपए का प्रबन्ध कोई उदारचेता कर सके, तो उस मशीन के द्वा...
- जब तक कमी का आभास न हो तब तक उसकी पूर्ति का तारतम्य कैसे बने?... अस्तु, आत्मविकास के मार्ग पर चलने वाले, जीवन साधना के मार्ग पर अग्रसर होने के इच्छुक प्रत्येक व्यक्त...
- जब बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है, जब बड़ी चिड़िया को छोटी चिड़ियों पर आक्रमण करने में कोई हिचक नहीं होती, जब चीते हिरन स्तर के कमजोरों को दबोच लेते हैं तो फिर समर्थ मनुष्य ही अपने असमर्थ जनों का शोषण करने में क्यों चूकें?... प्रत्यक्षवाद ने, भौतिक विज्ञान ने सुविधा-सम्वर्धन के लिए कितने ही नए-नए आधार दिए हैं, तो उसकी उपयोगि...
- जब बसाना ही है, तो इसी को क्यों न कायदे-करीने से बसाया जाए?... ’’घर वालों के पास उसका कोई उत्तर न था। उसने घोषित कर दिया—‘‘भगवान ही एकमात्र मेरे पति हैं।’’घर के सद...
- जब विश्वास ही नहीं जमता तो सहयोग किस बलबूते पर पनपे?... टूटे हुए मनोबल का व्यक्ति किस प्रकार कोई उच्चस्तरीय साहस कर सकेगा? उसके ऊँचे उठने, आगे बढ़ने का सुयो...
- जब शासन में भागीदार बनने के लिए उसे अवसर मिला है, उसे वह गँवाए क्यों?... और भविष्य में अपने वर्ग को उच्चाधिकार दिलाने का, स्वागत करने का मानस क्यों न बनाए? परिवार के पुरुष भ...
- जब सभी जीव-जन्तु क्रीड़ा-कल्लोल करते हुए जीते हैं—कुदकते, फुदकते चहचहाते दिन गुजारते हैं, तो फिर विकसित मनुष्य को ही ऐसी कठिनाइयों से घिरा क्यों पाया जाना चाहिए, जिनसे कि वह इन दिनों बुरी तरह ग्रसित देखा जाता है?... रोग, शोक, अभाव, क्लेश, विद्वेष, अशान्ति के अनेकानेक कारण गर्दन दबोचे रहते हैं। चिन्ताओं-आशंकाओं से द...
- जब समूचा प्रवाह ही स्वार्थ-साधन के लिए समर्पित है तो मनीषा और सम्पन्नता को ही क्या बन पड़ी है जो लोकहित की बात सोचें?... जन कल्याण के सरञ्जाम जुटाए? उल्टे प्रवाह का मोड़कर सीधी दिशा में चलने के लिए लोकमानस को नियोजित करने...
- जब हनुमान्, अंगद, नल-नील जैसे रीछ-वानर मिलकर राम को जिताने का श्रेय ले सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि नवसृजन के कार्यक्षेत्र में जुझारू योद्धाओं की सहायता के लिए अदृश्य सत्ता, दृश्य घटनाक्रमों के रूप में सहायता करने के लिए दौड़ती चली न आए?... विपन्नताएँ इन दिनों सुरसा जैसे मुँह बनाए खड़ी दीखती हैं। आतंक रावण स्तर का है। प्रचलनों के चक्रवात, ...
- जब होश-हवास ही दुरुस्त नहीं, तो समस्या क्या?... और उसका समाधान खोजने का क्या मतलब? पर जब मानवी गरिमा की गहराई तक उतरने की स्थिति बन पड़े तो फिर माता...
- जराजीर्ण काया को त्यागते समय जीव काे दु:ख तो हो सकता है, पर नए जन्म का आनन्द इसके बिना लिया भी तो नहीं जा सकता?... नश्तर चलाते समय सर्जन निर्दयता से फोड़े की चीर-फाड़ करते हैं, पर मवाद निकलने पर कष्ट मुक्ति का आनन्द...
- जराजीर्ण मरणासन्न में नवजात जैसा परिवर्तन-प्रत्यावर्तन करते रहना जिसका प्रिय विनोद है, उसे इस अँधेरे को उजाले में बदल देने जैसा प्रभात पर्व लाने में क्यों कुछ कठिनाई होगी?... युग परिवर्तन में दृश्यमान भूमिका तो प्रामाणिक प्रतिभाओं की ही रहेगी, पर उसके पीछे अदृश्य सत्ता का अस...
- जलाशयों की सम्पदा को मारक तत्त्वों से भरते कारखाने, पीने योग्य पानी छोड़ेंगे भी या नहीं?... आकाश-वायुमण्डल जिस प्रकार प्रदूषण से, विकिरण से, कोलाहल से निरन्तर भरता चला जा रहा है, उससे पृथ्वी क...
- जहाँ क्रमबद्ध साधनाएँ, शिक्षण, सत्संग की व्यवस्था न हो, उन देवालय क्षेत्रों में क्या किसी को कुछ लाभ मिलेगा?... गंगाजल की काँवर कन्धे पर रखकर अपने निकटवर्ती शिवालय पर चढ़ाने और रास्ते को पैदल पार करते हुए मार्ग म...
- जाँच-पड़ताल इसकी भी करनी चाहिए कि उसमें इतनी शक्ति है क्या?... जो भौतिक विज्ञान द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली उपलब्धियों की तुलना कर सके और साथ ही अब तक की विकृतियो...
- जाँचा यह भी जाना चाहिए कि उसका उपयोग लोकहित के लिए किस प्रकार और कितना बन बड़ा?... यदि इसकी कसौटी को छोड़ दिया जाए तो सर्प-बिच्छुओं की शरीर संरचना ही प्रशंसा की पात्र बनेंगी। चीते और ...
- जागते हुए को कोई क्या कहे?... क्या सोते से जाग पड़ने की आवश्यकता समझाए? प्रचार माध्यम अब अपनी विश्वसनीयता खोते चले जा रहे हैं, क्य...
- जाति-लिंग के नाम पर पनपने वाली विषमता का अनीतिमूलक और दु:खदाई प्रचलन भी क्यों रहेगा?... मनुष्य स्नेह और सहयोगपूर्वक रहने के लिए पैदा हुआ है। लड़ने, मरने और त्रास देने के लिए नहीं। यदि आपाध...
- जिन पर जीवन निर्भर रहता है, उन्हीं को बीन-बीन कर चकनाचूर करके रख देने की ‘सनक’ लोगों पर चढ़ी है, फलस्वरूप यह संकट आ खड़ा हुआ है कि अगले दिनों जीवित तक रह सकना कैसे बन पड़ेगा?... विपन्न विग्रह के घटाटोपों से कैसे निपटा जाएगा? प्रकृति के साथ क्रूर मजाक करने पर उसका प्रतिफल तो भुग...
- जिनकी दाढ़ में खून का चस्का लगा है, उन्हें किस प्रकार विरत होने के लिए सहमत किया जा सकेगा?... इसका उत्तर एक ही है, घोड़े के मुँह में लगाई जाने वाली लगाम, ऊँट की नाक में डाली जाने वाली नकेल, हाथी...
- जिनके राज्य में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था, उस ब्रिटिश साम्राज्य को अपना बिस्तर गोल करने के लिए विवश कर देना मुट्ठी भर सत्याग्रहियों के लिए कैसे सम्भव हो सका?... जबकि नादिरशाह, तैमूरलंग, चंगेजखाँ जैसे सामान्य से आक्रान्ता अपने सीमित साधनों में भारत जैसे विशाल दे...
- जिनके लिए अन्न-वस्त्र ही पर्याप्त हों, उनके लिए खर्च ही कितना चाहिए?... बच्चों की पढ़ाई के बदले मुट्ठी भर अन्न देते रहना किसी को भारी नहीं पड़ता था। छात्रों को शिक्षा और वि...
- जिनने लोभ, मोह और अहंकार की लिप्सा-लालसा को ही अपना लक्ष्य मान लिया है, वे उचित-अनुचित का अन्तर किस प्रकार कर सकेंगे?... संकीर्ण स्वार्थपरता के भव-बन्धनों से छुटकारा पा सकना उनसे कैसे बन पड़ेगा? जिन्हें सम्पन्नता की तृष्ण...
- जिन्हें सम्पन्नता की तृष्णा और बड़े कहलाने की महत्त्वाकांक्षाएँ जकड़े रहती हैं, उनके लिए विचारशीलता के स्वच्छन्द आकाश में पंख फड़फड़ाना कैसे सम्भव है?... आम आदमी साधनों और क्षमताओं की दृष्टि से कैसा ही क्यों न दीख पड़े, पर उसे आदर्शों की उमंगें प्रभावित ...
- जिसकी संरचना जल, थल, और आकाश के स्तर को अद्भुत बनाए हुए है, उसके क्रिया-कौशल द्वारा क्या कुछ सम्भव नहीं हो सकता?... युग परिवर्तन जैसे अत्यन्त दुरूह और व्यापक स्तर के निर्धारण में मनुष्य की सीमित शक्ति असमर्थ और असफल ...
- जिसकी स्मृति हर किसी को प्रेरणा दे सके, कि सोचना किस तरह चाहिए और चलना किस दिशा में, किस मार्ग पर चाहिए?... दीपक छोटा होते हुए भी अपने प्रभाव क्षेत्र में प्रकाश प्रस्तुत करने और यथार्थता से अवगत कराने से, घनघ...
- जिसके साथ धर्म-प्रचार जुड़ा हुआ न हो, उसके द्वारा किसे, किस प्रकार धर्म लाभ मिलेगा?... जहाँ क्रमबद्ध साधनाएँ, शिक्षण, सत्संग की व्यवस्था न हो, उन देवालय क्षेत्रों में क्या किसी को कुछ लाभ...
- जिसमें रुचि न हो, उसके लिए समय कौन लगाए?... माथा-पच्ची कौन करे? यही कारण है कि अखण्ड ज्योति वाले विषय की अन्य पत्रिकाएँ कुछ दिन निकलने के बाद ही...
- जीभ स्वाद के नाम पर अभक्ष्य भक्षण तो नहीं करने लगी?... वाणी से असंस्कृत वार्तालाप तो नहीं होता? कामुकता की प्रवृत्ति कहीं कुदृष्टि से तो नहीं उभर रही? असंय...
- जीव जगत में जब धर्म, कर्तव्य दायित्व जैसी कोई मान्यता नहीं, तो फिर मनुष्य ही उन जंजालों में अपने को क्यों बाँधे?... जब बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है, जब बड़ी चिड़िया को छोटी चिड़ियों पर आक्रमण करने में कोई हिचक नहीं...
- जीवितों में से भला कोई ऐसी हरकत करता है?... उन्हें तो आवश्यक प्रयासों में ही निरत देखा जाता है। इन दिनों सम्वेदनाहीनों को प्रेतों जैसी और सम्वेद...
- जो अपना भार स्वयं वहन नहीं कर सकते, वे किसी आड़े समय में कोई बड़ा काम कर दिखाने का साहस कहाँ जुटा पाते हैं?... कहने और सोचने को तो शेख चिल्ली भी लम्बी हाँकता था, पर उसका हवाई महल साकार कहाँ हो सका था।नवसृजन ...
- जो उन दिनों कृपणता धारण किए रहे वे अग्रगामियों के साथ अपनी तुलना करने पर ‘माया मिली न राम’ वाली अपनी मूर्खता पर पश्चाताप ही करते रहते हैं, पर बीता हुआ समय पुनः लौटता कहाँ है?... बुद्ध, गाँधी, दयानन्द, विवेकानन्द, बिनोवा जैसों की महान् उपलब्धियाँ स्मरण करके हर विचारशील का अन्त:क...
- जो उस हेतु हाथ बढ़ाएँगे, वे खाली क्यों रहेंगे?... भगीरथ, गाँधी, बुद्ध आदि को जो समर्थता मिली, वह इसलिए मिली कि परमार्थ प्रयोजन के काम आए।इस दुनियाँ मे...
- जो कर गुजरें, उसका अहंकार न करें, वरन् इतना ही सोचें कि हमारा चिन्तन, मनोयोग एवं श्रम कितनी अधिक ऊँची भूमिका निभा सका?... कितनी बड़ी छलाँग लगा सका? यही आपकी अग्नि परीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अ...
- जो कर गुजरें, उसका अहंकार न करें, वरन् इतना ही सोचें कि हमारा चिन्तन, मनोयोग एवं श्रम कितनी अधिक ऊँची भूमिका निभा सका?... कितनी बड़ी छलाँग लगा सका? यही आपकी अग्नि परीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपन...
- जो कर गुजरें, उसका अहंकार न करें, वरन् इतना ही सोचें कि हमारा चिन्तन, मनोयोग एवं श्रम कितनी अधिक ऊँची भूमिका निभा सका?... कितनी बड़ी छलाँग लगा सका? यही आपकी अग्नि परीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपन...
- जो दरिद्रों को सम्पन्न बना सके उसकी सम्पन्नता पर कौन सन्देह करेगा?... यही कारण है कि उसे सोने की चिड़िया और रत्नों की खदान के नाम से पहचाना जाता रहा। स्वर्ग सम्पदाओं के स...
- जो रिश्वत की उपहार की करामात जानते हैं, उनका दावा है कि बेचारा मनुष्य तो चीज ही क्या है?... देवताओं तक को भेंट उपहार के स्तवन, मनुहार के सहारे अपने पक्ष में बनाया जा सकता है। भले ही वह अनुग्रह...
- जो स्वयं दूसरों की सहायता चाहता है, जो स्वावलम्बन तक सँजो नहीं पाता, तो वह प्रगति कैसे करेगा?... यह सत्य कोई समझे या न समझे, पर जीवट की कमी एक ऐसी विडम्बना है, कि जिसके कारण मनुष्य जीवित रहते हुए भ...
- टूटे हुए मनोबल का व्यक्ति किस प्रकार कोई उच्चस्तरीय साहस कर सकेगा?... उसके ऊँचे उठने, आगे बढ़ने का सुयोग कैसे बनेगा?मनुष्य-मनुष्य के बीच छाया हुआ छद्म, अविश्वास, असहयोग, ...
- ठीक इसी कसौटी पर, हर प्रसंग में, हर क्षेत्र में कसकर यह जानना चाहिए कि अपनी ईमानदारी खरी है या खोटी?... ईमानदारी ही धर्म है। उसी को भक्ति, ज्ञान, अध्यात्म, साधना, तपश्चर्या का सार तत्त्व समझना चाहिए। इसके...
- डाकू, हत्यारे, कसाई नित्य मार-धाड़ मचाए रहते हैं और कितनों का प्राण हरण करते हैं, उन्हें बहादुर होने का श्रेय कहाँ, कब किसने दिया है?... बहादुरी का प्राचीनतम और अर्वाचीन अर्थ एक ही है—ऐसे पराक्रम कर गुजरना, जिससे अपनी महानता उभरती है, और...
- तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय जैसी महान् संस्थापना और संचालन सिद्धार्थ नाम का एक व्यक्ति ही कर सकता था?... यदि हाँ तो वैसा उदाहरण प्रस्तुत करके दिखा देने के लिए और कोई आगे क्यों नहीं आता?एक बन्दर द्वारा समुद...
- तपश्चर्या अपनाए बिना किसे विभूतियों और सिद्धियों का वरदान हस्तगत हुआ है?... पूँजी क्या इसी आधार पर जमा होती है कि लिया अधिक और दिया कम जाए? संसार से हम आए दिन कितना लेते हैं, इ...
- तब कैसा वीभत्स होगा संसार?... घर के समर्थ कमाते हैं और उसी कमाई से परिवार के सभी सदस्य गुजारा करते हैं। यह जिम्मेदारी भी है, परम्प...
- तब गरीबी-अमीरी की विषमता भी क्यों रहेगी?... जाति-लिंग के नाम पर पनपने वाली विषमता का अनीतिमूलक और दु:खदाई प्रचलन भी क्यों रहेगा? मनुष्य स्नेह और...
- तब जिस दरबार में हाजिर होना होगा, वहाँ किस प्रकार, किस रूप में अपनी जीवनचर्या का निर्धारण प्रस्तुत करना पड़ेगा?... इन तीन प्रश्नों का सही उत्तर देने के लिए, जो व्यक्ति परीक्षार्थी जैसी तैयारी करता है, जो सही उत्तर द...
- तब बूढ़ों को जीवित रहने देने की हिमायत किस तर्क के आधार पर की जा सकेगी?... तब फिर इस संसार में भेड़ियों को भेड़ियों द्वारा ही फाड़-चीर कर खा जाने जैसे दृश्य सर्वत्र उपस्थित हो...
- दिशाबोध उन्हें कहाँ होता है?... यही स्थिति लोकमानस के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। नीर-क्षीर की विवेक बुद्धि तो कम दीख पड़ने वाले ...
- दीखता है कि वह महाविनाश कहीं अगले दिनों घटित तो होने नहीं जा रहा है?... पक्ष दूसरा भी है- इक्कीसवीं सदी की ऐसी सुखद सम्भावना जिसे सतयुग की वापसी कहा जा सके। इन दोनों की प...
- दीखता है कि वह महाविनाश कहीं अगले दिनों घटित ही तो होने नहीं जा रहा है?... पक्ष दूसरा भी है—इक्कीसवीं सदी की ऐसी सुखद सम्भावना, जिसे सतयुग की वापसी कहा जा सके। इन दोनों ही प्र...
- दूसरा यह कि जो आवश्यक साधन एवं वैभव प्राप्त है, उसका आज की परिस्थितियों में सर्वश्रेष्ठ उपयोग क्या हो सकता है?... तीसरा यह कि जन्म की तरह मरण निश्चित है। वह कल भी हो सकता है और परसों भी।...
- दूसरी ओर समर्थ शासनाध्यक्ष भी रावण की समर्थता और अपनी दुर्बलता को देखते हुए डर गए हों और झंझट में पड़ने से डरकर कन्नी काट गए हों?... निष्कर्ष यही निकलता है कि परिष्कृत प्रतिभा, दुर्बल सहयोगियों की सहायता से भी बड़े-से-भी बड़े काम सम्...
- दूसरों के सहारे, पराश्रित रहकर कदाचित् ही किसी ने गौरव भरा जीवन जिया हो?... उत्तराधिकार में भी किसी को वैभव मिल तो सकता है, पर हराम का माल हजम नहीं होता। जिसने परिश्रमपूर्वक कम...
- दे सकेंगे आप?... यदि दे सकें तो विश्वास करें, स्थिति कितनी ही जटिल क्यों न हो? अँधेरा कितना ही सघन क्यों न हो? आत्मा ...
- देखना इतना भर है कि साधना किसकी की जाय?... अन्यान्य इष्टदेवों के बारे में कहा नहीं जा सकता कि उनका निर्धारित स्वरूप और स्वभाव वैसा है या नहीं, ...
- देखना चाहिए कि इन चारों में कहीं कोई व्यतिक्रम तो नहीं हो रहा है?... जीभ स्वाद के नाम पर अभक्ष्य भक्षण तो नहीं करने लगी? वाणी से असंस्कृत वार्तालाप तो नहीं होता? कामुकता...
- देखना यह भी होगा कि इनके पीछे कितनों की कल्पना ने योजना बनाकर प्रत्यक्ष ढाँचा खड़ा करने में कितनी कुशलता और एकाग्रता खपाई है?... यही सार संक्षेप में मनुष्य का वर्चस्व है जो जहाँ भी चमकता है, वहाँ आकाश की बिजली की तरह कड़कता और अप...
- देखना है कि लोक-मंगल के लिए समयदान की प्राचीन परम्परा को किसी प्रकार पुनर्जीवित कर सकना क्या सम्भव हो सकता है?... उज्ज्वल भविष्य की संरचना में प्रमुख भूमिका निभा सकने में समर्थ इस महान प्रचलन को अपनाने के लिए, विचा...
- देखा जाना है—स्वार्थ के मुकाबले में परमार्थ सुहाता किसे है?... ध्वंस करने वाले जिस प्रकार मूँछों पर ताव देेते हैं और शेखी बघारते हैं, वैसा सृजनकर्मियों को नहीं सुह...
- देवता ही स्वर्ग के अधिपति रहे हैं और रहेंगे, पर उस असंगठन-विघटन को क्या कहा जाय?... जो तार-तार बिखेर कर, पर्वतों को बालू का कण बनाकर जहाँ-तहाँ छितरा देता है। इस विपर्यय को उलटना ही ...
- दैवी अनुग्रह का तो कहना ही क्या?... कभी व्यापार-धन्धे के सहारे अकस्मात किसी बड़े लाभ का सुयोग मिल जाने में, लाटरी खुल जाने आदि के रूप मे...
- दोनों के मूल्यांकन में न्याय-तुला की डण्डी मारने की मान्यता किस लिए?... नारी की पराधीनता का एक रूप यह है कि उसे परदे में, पिंजड़े में बन्दीगृह की कोठरी में ही कैद रहना चाहि...
- ध्रुव पिघलने लगें, समुद्रों में भयंकर बाढ़ आ जाए, हिमयुग लौट पड़े, पृथ्वी के रक्षा कवच ओजोन में बढ़ते जाने वाले छेद, पृथ्वी पर घातक ब्रह्माण्डीय किरणें बरसाएँ और जो कुछ यहाँ सुन्दर दीख रहा है, वह सभी जल-भुनकर खाक हो जाए—ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाले विज्ञान-विकास को किस प्रकार सराहा जाए?... भले ही उसने थोड़े सुविधा-साधन बढ़ाएँ हों।इसे विज्ञान-विकास से उत्पन्न हुआ उन्माद ही कहना चाहिए, जिसन...
- न जाने कृपण-कंजूसों की भूमिका निभाते हुए लोग, अपने लिए, महामानवों को प्राप्त होने वाली उपलब्धियों की कल्पना क्यों करते रहते हैं?... पाँच से पच्चीस का विकास क्रम अपनाने की अनिवार्यता के लिए युग पुरुषों जैसा विस्तार क्रम अपनाने पर पूर...
- नया उदाहरण अपने समय के इस प्रयोग-परीक्षण को समझा जा सकता है कि गंगा के याचना न करने पर भी हिमालय किस प्रकार कभी न सूखने वाली जलराशि प्रदान करता रहता है?... अपनाए गए क्रिया-कलापों में कितनी जनशक्ति की, कितनी धनशक्ति की, कितने साधनों की आवश्यकता पड़ती है और ...
- नर ने अपनी कठोर, प्रकृति के आधार पर पराक्रम भले ही कितना क्यों न किया हो?... पर उसी की अहंकारी उद्दण्डता ने अनाचार का माहौल बनाया है। स्रष्टा की इच्छा है कि स्नेह, सहयोग, सृ...
- नरक को स्वर्ग में उलट देने की प्रक्रिया का आखिर माध्यम क्या होगा?... उस योजना के क्रियान्वित होने की विधि-व्यवस्था किस प्रकार बन पड़ेगी? ऐसे अनेकों असमंजस भरे प्रश्न इन ...
- नशेबाजी जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए लगता है कि स्मैक, हेरोइन, मारीजुआना जैसी घातक वस्तुएँ किशोरों युवकों व बेरोजगारों की एक बड़ी संख्या को विक्षिप्त स्तर का न बना दें?... जीवनी शक्ति घटती चली जा रही है। मौसम का जरा सा असन्तुलन मनुष्य को व्याधिग्रस्त करता देखा जाता है, अस...
- नहीं-विरत क्यों होता?... कर्तव्यनिष्ठा का ही दूसरा नाम मनुष्यता है। एक मनीषी का जो कर्तव्य है, वह अन्तिम साँस तक अनवरत करता र...
- नाजरथ वासी ईसा के पास क्या था?... पिता यूसुफ गाँव के साधारण बढ़ई। माँ अशिक्षित। पालन-पोषण गड़रियों के बीच हुआ। वह स्वयं भी पी. एच. डी,...
- नारी युग की अधिष्ठात्री, धरती की देवी अपनी गरिमा सिकोड़े-समेटे और दबाए-दबोचे बैठी रहे, यह विपन्नता क्यों, कैसे और कब तक बनी रह सकती है?... समर्थता के साथ-साथ समझदारी भी बढ़ती है और वह अदृश्य के मार्गदर्शन में अभ्युदय की दिशा में चल पड़े, त...
- नारी सोचती है, उसे हर दृष्टि से शासित ही बनी रहने की विवशता को क्यों वहन करना चाहिए?... जब शासन में भागीदार बनने के लिए उसे अवसर मिला है, उसे वह गँवाए क्यों? और भविष्य में अपने वर्ग को उच्...
- निजी आवश्यकताओं की पूर्ति तो थोड़े में ही सफलतापूर्वक सम्भव हो जाती है, फिर अतिरिक्त उत्पादन का क्या हो?... उदारता के अभाव में उसे अभावग्रस्तों के लिए लगा सकने का तो साहस ही नहीं उभरता, फिर निजी आवश्यकताओं के...
- नृशंस अथवा वह, जिसका रोम-रोम पीड़ा से चीत्कार कर रहा है?... ’’ बूढ़े ने विषैली हँसी हँसते हुए कहा—अपनी क्रूरता को जाकर युद्ध-भूमि में देखना, वहाँ हम जैसे कुछ और...
- पतन का क्रम कहाँ से कहाँ पहुँचा?... लोग गिरने और गिराने में प्रतिस्पर्धा मानने लगे। इसी प्रवाह को यदि उलट दिया जाये तो अगली शताब्दी में ...
- पदार्थों के सरंजाम जुटाने में किस प्रकार के प्रयास-परिवर्तन करने होंगे?... उत्तर उन प्रश्नों के भी हो सकते हैं और कार्यक्रम तदनुरूप भी बन सकता है। योजनाएँ बनाने वाले इन्हीं गो...
- पर अलग कहाँ?... भावों के सदृश्य सेतु से वह सघनता से जुड़े थे। ईसा पूर्व २३२ वें साल तक वह जीवित रहे। परवर्ती जीवन मे...
- पर इस बात को समझने में जरा अधिक जोर लगाना पड़ेगा कि भारत में अमीरी का प्रदर्शन क्यों होता है?... यहाँ अमीरों के साथ जुड़े हुए, प्रमुख दीख पड़ने वाले काले पक्ष को विशेष रूप से देखना होगा। यों इसके अ...
- पर उस दुुर्गुण के इस सीमा तक पहुँच जाने को क्या कहा जाए, जिसमें अपने आपके आत्मगौरव को—ओजस्, तेजस् और वर्चस् को ही भुला जाए?... आज कुछ ऐसा ही सम्मोहन-व्यामोह किसी शैतान द्वारा बिखेरा गया दीखता है, जिससे हतप्रभ होकर व्यक्ति अपने ...
- पर किया क्या जाए?... भौतिक विज्ञान जहाँ शक्ति और सुविधा प्रदान करता है, वहीं प्रत्यक्षवादी मान्यताएँ नीति, धर्म, संयम, स्...
- पर बड़े प्रयोजनों के लिए इतना ही तो पर्याप्त नहीं?... समय की बढ़ती माँग को देखते हुये, बड़े कदम भी तो उठाने पड़ेंगे। बच्चे का छोटा-सा पुरुषार्थ भी अभिभा...
- पर बीता हुआ समय पुन: लौटता कहाँ है?... बुद्ध, गाँधी, दयानन्द, विवेकानन्द, बिनोवा जैसों की महान उपलब्धियाँ स्मरण करके हर विचारशील का अन्त:...
- पर मूल कारण की ओर ध्यान न जाने से अभाव, असन्तोष एवं विग्रह किस प्रकार निरस्त होगा, इसे सोचने की न जाने क्यों किसी को फुरसत नहीं है?... चोट की मरहम पट्टी की जा सकती है, पर समस्त रक्त में फैले हुए ‘‘रक्त कैंसर’’ को मरहम पट्टी से कैसे ठीक...
- पर यह सूझ नहीं पड़ता कि इनका निराकरण कौन करेगा?... कैसे करेगा? यह तथ्य हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि मानवी चेतना के विभ्रम और व्यामोह-ग...
- पर विवेकानन्द, दयानन्द एवं केशवानन्द कहाँ से आएँ?... उस दिशा में प्राय: निराश हो चलने पर अब सोचा यह गया है कि सद्गृहस्थों के माध्यम से ही आपत्तिकालीन आवश...
- पर समर्थ हाथों से छिन कर सत्ता निर्धनों के, पिछड़ों के हाथों इतनी आसानी से चली जाएगी?... यह बात मानव गले के नीचे उतरती नहीं। फिर भी वह यदि सम्भव हो जाता है, तो उससे इंकार कैसे किया जा सकता ...
- परस्पर का विश्वास खो जाने पर आचार-विचार का स्तर कैसे बने?... जो थोड़ा-बहुत दिखाई देता है, वह अवशेषों का दिखावा भर है।‘‘और परिवार...............इतना कहकर उनके मुख...
- पराक्रम किसका है?... विभूतियाँ किसकी हैं? इन सबका उत्तर देते समय नाम भगवान् का ही लिया जा सकता है, पर भगवान् का निकटतम और...
- परिपूर्ण दिलचस्पी, एकाग्र मनोयोग, समुचित उत्साह और आगे बढ़ने का अदम्य साहस मिलकर ही ऐसी स्थिति विनिर्मित करते हैं, जिसमें बड़े काम सध सकें; भले ही प्रयत्नकर्ता साधारण साधनों, साधारण योग्यताओं वाला ही क्यों न हो?... ऐसे लोग परिस्थितियों की प्रतिकूलता से भयभीत नहीं होते। उन्हें अनुकूल बनाने में अपनी समग्र क्षमता को ...
- परिवार-परिकर के बीच नर और नारी बिना किसी भय व संकोच के जीवन-यापन करते रह सकते हैं, तो फिर बड़े परिवार-समाज में आवश्यक कामों के लिए आने-जाने में किसी संरक्षक को ही साथ लेकर जाना क्यों अनिवार्य होना चाहिए?... विवाह की बात तय करने में अभिभावकों की मरजी ही क्यों चले? यदि लड़की को भी लड़कों के समान ही सुयोग्य ब...
- पहले जाँच-पड़ताल क्यों नहीं हो सकी?... इसका कारण एक ही था कि इंग्लैण्ड में उस समय ऐसी परीक्षा मशीन जिसे ‘कैट स्कैनिंग’ नाम से जाना जाता है,...
- पाँच पाण्डवों द्वारा कौरवों की अक्षौहिणी सेना को निरस्त किया जाना क्या मनुष्य कृत रीति-नीति के आधार पर सम्भव माना जा सकता है?... वासुदेव का व्यक्तित्व और असाधारण योजना नीति महाभारत जैसी विशाल योजना पूरी करके दिखा दे, इस पर सामान्...
- पाप-पुण्य पदार्थ तो कैसे करेंगे?... उनका सदुपयोग, दुरुपयोग की पाप-पुण्य की अनुभूति गढ़ते हैं। इंजन कितना ही समर्थ या कीमती क्यों न हो? उ...
- पिछला सतयुग यदि आलसी निद्रा से विरत होकर फिर अपना कारोबार सँभाल ले, तो उसमें असम्भव-सम्भव जैसी निरर्थक ऊहापोह क्यों करनी चाहिए?... मनुष्य के लिए तो एक चींटी उत्पन्न करना तक असम्भव है, पर भगवान् इसी अपने धरातल पर क्षण-क्षण में कोटि-...
- पिछले परिवर्तनों में कितना समय लगता रहा है?... इसके सम्बन्ध में सही विवरण तो उपलब्ध नहीं, पर वर्तमान महाक्रान्ति का स्वरूप समग्र रूप से परिलक्षित ह...
- पिछले सप्ताह में किसने क्या किया और अगले सप्ताह किसकी क्या करने की योजना है?... इस प्रकार की जानकारियों का आदान-प्रदान चल पड़ने पर एक दूसरे को प्रोत्साहन भी मिलेगा। कठिनाइयों क...
- पुत्र और पुत्री में क्या भेद?... भाई कर सकता है, तो बहन क्यों नहीं?भाई और बहन दोनों तैयार हुए। उन्हें समाज-देवता की अर्चना हेतु समर्प...
- पूछा, ‘‘क्या मतलब?... ’’‘‘बुरा न मानें—मेरा मतलब यह है कि आपकी ये व्याख्याएँ बुद्धि-कौशल हैं, अथवा इनके साथ आपकी अनुभूतिया...
- पूछा, ‘‘बात क्या है?... क्यों परेशान हो?’’ पता चला परेशानी रोटी की है।‘‘अरे बस! तुम सब लोग अपनी-अपनी रोटियाँ एक जगह जमा करो ...
- पूछा—‘‘मैं और अधिक क्या करुँ?... ’’‘‘संघ के संचालन के लिए अपनी सम्पत्ति का एक अंश और समाज के जन-जन तक सद्विचारों का सरिता-प्रवाह फैला...
- पूर्ववर्ती अभिभावकों, बड़ों और आश्रितों के ऋणों को चुकाने की ही व्यवस्था नहीं बन पाती तो नये अतिथियों को क्यों न्यौत बुलाया जाय?... समय की विषमता को देखते हुए अनावश्यक बच्चे उत्पन्न कर परिवार का भार बढ़ाना परले सिरे की भूल है। समान ...
- प्रगति के दूसरे भी अनेकानेक आधार हैं, पर वे हस्तगत कैसे हों, जबकि पिछड़ापन अपने गुण, कर्म, स्वभाव का अविच्छिन्न अंग बन गया हो?... अच्छा होता, हमें ऐसे उत्साहवर्धक प्रगतिशील वातावरण में रहने का अवसर मिला होता अथवा जहाँ ऐसी प्रेरणाए...
- प्रचार माध्यम अब अपनी विश्वसनीयता खोते चले जा रहे हैं, क्योंकि उपदेष्टा ही कथन के ठीक विपरीत आचरण करें तो उसे क्या कहकर, किस प्रकार समझाया जाए?... उसकी बात पर कोई क्यों और किस आधार पर, कितना विश्वास करे? उपाय एक ही शेष रह जाता है कि ऐसी प्रतिभाएँ ...
- प्रत्यक्ष उदाहरणों के प्रेरणाप्रद माहौल सामने आए बिना समझा नहीं जा सकता कि विद्या क्या है व इसे कैसे जीवन में उतारा जाए?... विभिन्न भाषाओं, सम्प्रदायों में बँटे ६०० करोड़ मनुष्यों को कैसे इस युगचेतना के प्रवाह से जोड़ा जाए, ...
- प्रश्न के उत्तर में एक पूरक प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या नहीं हो रहा है?... और ऐसे क्या अनुपयुक्त हो रहा है, जिसे नहीं सोचा या नहीं किया जाना चाहिए था।...
- प्रश्न है—साधना किसकी की जाय?... उत्तर है—जीवन को ही देवता मानकर चला जाय। यह इस हाथ दे, उस हाथ ले का क्रम है। इसी आधार पर आत्मसन्तोष,...
- प्रोत्साहन और सहयोग कहाँ से मिलेगा?... ऐसे सभी लोगों तक सन्देश पहुँचा दिया गया है कि सूक्ष्म स्तर की गतिविधियाँ अपना लेने पर भी हम अपने प्र...
- फिर अच्छे खासे मस्तिष्क, आदर्शवादी उत्कृष्टता क्यों नहीं अपनाते?... उन्हें अनर्थ ही क्यों सूझता रहता है? उनसे सुविधा, प्रसन्नता और प्रगति जैसा कुछ बन पड़ना तो दूर, उलटे...
- फिर इतने बड़े आन्दोलन-अभियान उद्घोष-प्रतिपादन को सर्वसाधारण के सम्मुख प्रस्तुत करने का दुस्साहस किस आधार पर किया जा रहा है?......
- फिर इन दिनों भी क्या मुश्किल है, जो जन कल्याण में निरत होने की महत्त्वाकाँक्षा, अनेकानेक उदारचेताओं में उत्पन्न न की जा सके?... बुद्ध, और गाँधी के आन्दोलनों में सम्मिलित होने वालों की संख्या अनायास ही लाखों में पहुँची थी। अब फिर...
- फिर इन दिनों समस्त संसार पर छाई हुई विपन्नता की वेला में उसके परिवर्तन प्रयास गतिशील क्यों न होंगे?... जराजीर्ण मरणासन्न में नवजात जैसा परिवर्तन-प्रत्यावर्तन करते रहना जिसका प्रिय विनोद है, उसे इस अँधेरे...
- फिर इस घोर महँगाई के जमाने में आर्थिक कठिनाइयों से ग्रस्त अशिक्षित स्तर की जनता उसे किस आधार पर खरीदे?... थोड़े से जो शिक्षित बच जाते हैं, वे भी मनोरंजन के लिए चटपटा साहित्य भर खरीदते हैं। युग साहित्य में ऐ...
- फिर उसकी प्रवृत्ति स्वार्थी बनकर आनन्द का रसास्वादन करते रहने में क्यों किसी प्रकार बाधक बने?... क्यों उसे वासना, तृष्णा और अहंता के लौहपाशों में जकड़ जाने पर बन्दीगृह के कैदी जैसी विडम्बनाएँ सहनी ...
- फिर उसके अनेक रूप कैसे बने?... अनेक आकार-प्रकार और गुण-स्वभाव का उसे कैसे देखा गया? मान्यता यदि यथार्थ है तो उसका स्वरूप सार्वभौम ह...
- फिर ऋषि-परम्परा इतनी मूर्छित तो नहीं हुई है जिसके पुनरुत्थान की आशा ही छोड़नी पड़े?... लक्ष्मण की मूर्च्छा जगी थी। मानवीय गरिमा को पुनर्जीवित करने का संकल्प जगा है, तो कल-परसों यह भी तनकर...
- फिर ऐसा क्या था उनमें, जिसके कारण वे आत्मप्रकाश के महान् सन्देशवाहक बन सके?... बीतते युग उन्हें मलिन नहीं कर पाए, प्रबल से प्रबलतर होते जा रहे हैं।सारे अभावों के बावजूद उनमें थी, ...
- फिर किसी प्रयोजन में सफल हो सकना तो बन ही किस प्रकार पड़े?... जीवन एक सुव्यवस्थित तथ्य है। वह न तो अस्त-व्यस्त है और न कभी कुछ करने, कभी न करने जैसा मनमौजीपन। पशु...
- फिर क्या चुना जाए जबकि जीवन और मरण दोनों ही अनुपयुक्त अविश्वस्त दीखते हैं?... इस असमंजस के बीच एक हल उभरता है कि भौतिक विज्ञान को अध्यात्म तत्त्व ज्ञान के साथ जुड़ना चाहिए था और ...
- फिर क्या बुद्धि को कोसा जाए?... नहीं, उसका निर्धारण तो भाव-सम्वेदनाओं के आधार पर होता है। भावनाओं में नीरसता, निष्ठुरता जैसी निकृष्ट...
- फिर भी एक प्रश्न सर्वथा अनसुलझा ही रह जाता है कि यह तथाकथित प्रगति, अपने साथ दुर्गति के असंख्यों बवण्डर क्यों और कैसे घसीटती, बटोरती चली जा रही है?... प्रदूषण, युद्धोन्माद, खाद्य-संकट अपराधों की वृद्धि आदि समस्याएँ समस्त तटबन्ध तोड़ती चली जा रही हैं।...
- फिर भी भ्रान्तियों के जाल-जंजाल से निकलने के लिए आवश्यक समझा गया कि क्यों न अपनी काया की प्रयोगशाला में तथ्य का निरीक्षण-परीक्षण करके देखा जाए?... इसमें हानि ही क्या है? अपने प्रयोग यदि खरे उतरते हैं तो उससे श्रद्धा-विश्वास की अभिवृद्धि ही होती है...
- फिर भी वह यदि सम्भव हो जाता है, तो उससे इंकार कैसे किया जा सकता है?... पिछड़ों का संकल्प के स्तर तक पहुँचना असाधारण रूप से समय साध्य और कष्ट साध्य माना जाता है। फिर भी पिछ...
- फिर भेदभाव किस बात का?... लड़की और लड़के में अन्तर किसलिए? दोनों के मूल्यांकन में न्याय-तुला की डण्डी मारने की मान्यता किस लिए...
- फिर मनुष्य के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या?... थोड़े से अनाचारी गिरोह बना लेते हैं, तो सारे इलाके में अशान्ति फैला देते हैं। दुर्भाग्य इसी बात का...
- फिर युग-अवतरण के लिए सम्भावित नारी-पुनरुत्थान भी अपना उचित मूल्य माँगे तो उसमें आश्चर्य ही क्या है?... प्रत्यक्षत: तो शिक्षा-स्वावलम्बन, परिवार-पोषण व कला-कौशल जैसे क्षेत्रों में नारी का सहयोग करने भर से...
- फिर रोग का कारण और निदान जानते हुए उपचार का निर्धारण कोई अन्य किस प्रकार कर सके?... थोड़े समय तक सम्पर्क में आने वाला केवल उतनी ही बात जान सकता है, जितनी कि मिलन काल में उभरकर सामने आत...
- फिर वीरता के लिए किया गया यह सब कुछ?... प्रश्न शून्य में विलीन हो गया कोई उत्तर नहीं था।सुबह उठते ही उसने कहा—‘‘उस बूढ़े को बुलाओ।’’ सैनिक द...
- फूलों पर तितलियाँ और मधुमक्खियाँ न जाने कहाँ-कहाँ से दौड़ती चली आती है?... महामानवों के असुविधा भरे जीवन भी ऐसे आकर्षक होते हैं कि उसी कष्टसाध्य परिपाटी को अपनाने के लिए अनेका...
- बच्चे का छोटा-सा पुरुषार्थ भी अभिभावकों द्वारा भली-भाँति सराहा जाता है, पर युवा होने बचपन की पुनरावृत्तियाँ करने भर से कौन यशस्वी बनता है?... अगली चुनौती बड़ी है- यहाँ परिजनों के पिछले दिनों के योगदान का मूल्यांकन घटाकर नहीं किया जा रहा है।...
- बच्चे का छोटा-सा पुरुषार्थ भी अभिभावकों द्वारा भली-भाँति सराहा जाता है, पर युवा होने पर बचपन की पुनरावृत्तियाँ करने भर से कौन यशस्वी बनता है?... यहाँ परिजनों के पिछले दिनों के योगदान का मूल्यांकन घटाकर नहीं किया जा रहा है, पर इतने भर से बात तो न...
- बड़े काम आखिर बड़ों के बिना कर ही कौन सकेगा?... प्रश्न क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों से निपटने का नहीं है और न समुदाय विशेष से निपटने का। अभावों को ...
- बाज जिन्दगी भर पक्षियों के अण्डे-बच्चे खाता रहता है, उसे कोई शूरवीर कहाँ कहता है?... डाकू, हत्यारे, कसाई नित्य मार-धाड़ मचाए रहते हैं और कितनों का प्राण हरण करते हैं, उन्हें बहादुर होने...
- बाल की नोंक से भी छोटा शुक्राणु जब कुछ ही दिनों में हँसता खेलता शिशु और फिर बाद में पराक्रमी प्रौढ़ बन सकता है, तो उपयोगी परिवर्तन की बात पर किसी को क्यों अविश्वास करना चाहिए?... युग बदलते ही रहे हैं।...
- बाल की नोक जितना क्षुद्र शुक्राणु यदि साढ़े पाँच फीट का सर्वांग सुन्दर मनुष्य बन सकता है, तो चमत्कार के अतिरिक्त और कहा क्या जाए?... ग्रह-नक्षत्र अधर में टँगे है और द्रुतगति से घूमते रहते हैं, तो इसे अघटित का घटित होने के अतिरिक्त और...
- बाहर की वर्षा से छाता लगाकर भी बचा जा सकता है, पर जब भीतर से लानत बरसती है तो उससे कैसे बचा जाये?... धरती पर नर-कीटक, नर-पशु और नर-पिशाच भी भ्रमण करते रहते हैं। देखने में उनकी भी आकृति मनुष्य जैसी ही ह...
- बिगाड़ रचने में मनुष्य ने अपनी क्षुद्रता का परिचय कितना ही क्यों न दिया हो?... पर इस सुन्दर भूलोक के नन्दन वन का संस्थापक, उसे इस प्रकार वीरान न होने देगा जैसा कि कुचक्री उसको विस...
- बिना तपे धातु का शुद्ध स्वरूप कैसे निखरे और उससे उपयोगी औजार कैसे बने?... क्रियमाण दुष्कर्म एक ही माँग करता है कि जितनी गहरी खाई खोदी गई है, उसमें उतनी ही मिट्टी डालकर स्थिति...
- बुद्ध काल में लाखों परिव्राजकों और गाँधी काल में लाखों सत्याग्रहियों का अनायास ही उभर पडऩा यह बताता है कि समय की माँग को गूँगे-बहरे भले ही न सुनें, पर चेतन एवं सही सलामत व्यक्ति युग-धर्म के परिपालन से इनकार कैसे कर सकते हैं?... ऐसे प्राणवानों को झकझोरने और नींद से विरत होकर तन कर खड़े हो जाने की स्थिति उत्पन्न करने में शान्तिक...
- बुद्ध जैसे गृहत्यागी, वनवासी, तपस्वी विश्वव्यापी धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए आवश्यक जनशक्ति और साधन-शक्ति कैसे जुटा सकते थे?... जो उनसे बन पड़ा, उसका मानवी पुरुषार्थ द्वारा बन पड़ना सम्भव नहीं हो सकता।...
- बुद्धि का सदुपयोग कठिन है, चतुर कहे जाने वाले लोग भी उसे कहाँ कर पाते हैं?... धन कमाते तो सभी हैं, पर उसका आधा-चौथाई भाग भी सदुपयोग में नहीं लगता। उसे जिन कामों में जिस तरह खरचा ...
- बुद्धि के काम न देने पर वे उस महामत्स्य से पूछ ही बैठे कि यह सब क्या हो रहा है?... मत्स्यावतार ने कहा—मैं जीवधारी दीखता भर हूँ, वस्तुत: परब्रह्म हूँ। इस अनगढ़ संसार को जब भी सुव्यवस्थ...
- भगवान् के दरबार में जवाब देना होगा कि आज के समय का, एक दिन के जीवन का किस प्रकार सदुपयोग बन पड़ा?... इसके लिये दिनभर के समययापनपरक क्रिया-कलापों और विचारों के उतार-चढ़ावों की समीक्षा की जानी चाहिए। उस...
- भले ही उनमें से कितनी ही प्रसुप्त स्थिति में ही क्यों न बनी रहती हों?... अन्य ग्रहों की तुलना में बहुत छोटे आकार की इस पृथ्वी में इतना सौन्दर्य और इतना सौष्ठव किस प्रकार सम्...
- भले ही उन्होंने मुफ्त में तुर्त-फुर्त बहुत कुछ पाने की शेखचिल्ली जैसा सपना ही क्यों न सँजो रखा हो?... संसार में व्यवहारिकता का ही प्रचलन है। यहाँ इस बाजार में, एक से एक बढ़िया वस्तुएँ भरी और आकर्षक ढंग ...
- भले ही ऊपर से आवरण वह देवताओं का, सन्तों जैसा ही क्यों न ओढ़े फिरता हो?... स्थिति ने जनसमुदाय को शारीरिक दृष्टि से रोगी, अभावग्रस्त, चिन्तित, असहिष्णु एवं कातर-आतुर बनाकर रख दि...
- भले ही यहाँ के लोग व्यावहारिक स्तर पर औसत नागरिकों जैसा जीवनयापन ही क्यों न करते रहे हों?... भारत की अपनी सांस्कृतिक परम्पराएँ इतनी उत्कृष्ट और इतनी सशक्त रही हैं, कि नर-वानर का जीवन जीने वाले ...
- भविष्य न जाने कैसा बन कर रहेगा?... इस विषम विडम्बना से छूटने का एक ही उपाय है कि दोष-दुर्गुणों की जो भारी चट्टानें सिर पर लदी हैं, उन्ह...
- भाई कर सकता है, तो बहन क्यों नहीं?... भाई और बहन दोनों तैयार हुए। उन्हें समाज-देवता की अर्चना हेतु समर्पित करते हुए उनकी आँखों में आँसू थे...
- भारतीय संस्कृति का इतिहास खोजने से पता लग सकता है कि प्राचीनकाल में इस समुद्रमन्थन से कितने बहुमूल्य रत्न निकले थे?... भारत भूमि को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ बनाने में उस मन्थन से निकले नवनीत ने कितनी बड़ी भूमिका निबाही थी। म...
- भ्रम-जंजाल में भटकने वालों की इस दुनिया में कमी नहीं, पर वे समय गँवाते, ठोकरें खाते और निराश रहने के अतिरिक्त और कुछ पाते कहाँ देखे जाते है?... लोगों के समक्ष वे अपने सम्बन्ध में बिना सिर-पैर की शेखी भले ही बघारते रहें?...
- मनुष्य के लिए कुछ भी कितना ही कठिन हो सकता है, पर जिसने आकाश में असंख्य ग्रह-तारक झाड़-फानूस की तरह अधर में लटका रखे हैं, उसके लिए किसी सदाशयता भरे प्रयोजन को पूरा कर सकना कैसे कुछ कठिन हो सकता है?... छोटा आरम्भ उपहासास्पद तो लगता है, फिर भी इस सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता कि वह कुछ ही समय में कहीं...
- मनुष्य जैसा अद्भुत प्राणी जिसने सृजा, जिसके नायकत्व में संसार की सारी व्यवस्था चलती है; वह जो योजना बनाए, वह अधूरी कैसे रहेगी?... उसके संकल्प एवं नियोजन में प्रतिरोध कौन खड़ा करेगा?महत्त्वपूर्ण कार्य भगवान् करते हैं और उसके श्रेय ...
- महाकाल की हुँकारें जो दसों दिशाओं को प्रतिध्वनित कर रही हैं, उन्हें अनसुनी कैसे किया जाए?... युग चेतना के प्रभात पर्व पर, उदीयमान सविता के आलोक को किस प्रकार भुलाया जाए? युग अवतरण की सम्भावना ग...
- माथा-पच्ची कौन करे?... यही कारण है कि अखण्ड ज्योति वाले विषय की अन्य पत्रिकाएँ कुछ दिन निकलने के बाद ही बन्द हो जाती हैं। ज...
- मानवीय गरिमा के अनुरूप चिन्तन किस प्रकार करना चाहिए?... अपना चरित्र स्तर कैसा रखना चाहिए? व्यवहार में शालीनता का समुचित समावेश किस प्रकार रखना चाहिए? वह सब ...
- मुर्दे का क्या?... उसकी तो पहचान ही है, अकर्मण्यता और निष्ठुरता। उसे पास बैठे लोगों का करुण विलाप भी नहीं सुनाई देता। आ...
- मैं वीर बन सकता हूँ?... ’’ सम्राट् के स्वरों में पश्चात्ताप का पुट था।‘‘हाँ क्यों नहीं?’’ आचार्य की वाणी में मृदुलता थी। ‘‘प...
- मैला-गँदला पानी पीने के काम कहाँ आता है?... मैले दर्पण में छवि कहाँ दीख पड़ती है? जलते अंगारे पर यदि राख की परत जम जाए, तो न उसको गर्मी का आभास ...
- मैले कपड़े को धोया न जाए तो उस पर रंग कैसे चढ़े?... बिना तपे धातु का शुद्ध स्वरूप कैसे निखरे और उससे उपयोगी औजार कैसे बने? क्रियमाण दुष्कर्म एक ही माँग ...
- मैले दर्पण में छवि कहाँ दीख पड़ती है?... जलते अंगारे पर यदि राख की परत जम जाए, तो न उसको गर्मी का आभास होता है, न चमक का। बादलों से ढक जाने प...
- मोटे तौर पर अशिक्षा, दरिद्रता एवं अस्वस्थता को प्रमुख कारणों में गिना जाता है और इनके निवारण के लिए कुछ नए नीति निर्धारण का औचित्य भी है, पर देखना यह है कि वस्तुस्थिति समझे बिना और वास्तविक व्यवधानों की तह तक पहुँचे बिना जो प्रबल प्रयत्न किए जा रहे हैं या किए जाने वाले हैं वे कारगर हो भी सकेंगे या नहीं?... दरिद्रता को ही लें। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक समर्थता इतनी अधिक है कि उसके सहारे अपना ही नहीं, परिकर...
- मोटे तौर से इन्हें प्रकृति की देन मान लिया जाता है, पर सूक्ष्म सर्वेक्षण से प्रतीत होता है कि यह भिन्नताएँ मात्र इस कारण विनिर्मित होती हैं कि अमुक स्थानों तक सूर्य का प्रभाव किस स्तर का, किस मात्रा में, किस गति से पहुँचता है?... वहाँ किन घटकों के साथ किस प्रभाव का मिश्रण होकर क्या प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है? रसायन भी सूर्य किर...
- यदि इस भूल से बचा जा सके तो मनुष्य को ईश्वर का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ राजकुमार कहने में किसी को क्यों आपत्ति हो?... फिर उसकी प्रवृत्ति स्वार्थी बनकर आनन्द का रसास्वादन करते रहने में क्यों किसी प्रकार बाधक बने? क्यों ...
- यदि उसकी ओर से उपेक्षा बरती जाती है, तो उसके विवाह को अपहरण के अतिरिक्त और क्या कहा जाएगा?... विवाह से कामुकता की आग बुझाने का कानूनी अधिकार भले ही मिल जाता है, पर नैतिकता के कठोर अनुबन्ध इस दिश...
- यदि कृपणता उन्हें घेरे रही होती, तो प्रेत-पिशाचों की पंक्ति में ही गिने जाने योग्य बने रहते; भले ही उनकी संचित-सम्पदा कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न रही हो?... सच्चाइयाँ कितनी ही कष्ट साध्य क्यों न हों, अपने स्थान पर अकेले ही समुद्र के बीच अवस्थित प्रकाश स्तम्...
- यदि गर्हित दृष्टिकोण बदला जा सका होता और पिछड़ों को प्रमुखता देते हुये उनका हक उन्हें स्वेच्छापूर्वक लौटा दिया गया होता, तो अपनी इसी दुनियाँ में कितनी प्रसन्नता और सुसम्पन्नता बिखरी पड़ी होती?... आत्मानुशासन रखा गया होता, संयम बरता जाता और अनिवार्य आवश्यकताएँ पूरी करके काम चला लिया जाता, तो इसका...
- यदि दे सकें तो विश्वास करें, स्थिति कितनी ही जटिल क्यों न हो?... अँधेरा कितना ही सघन क्यों न हो? आत्मा के दिव्य भावों का तेज व प्रकाश उसे तहस-नहस करने में समर्थ हो स...
- यदि नहीं बन पड़ रहा है तो उनका कारण और निवारण क्या हो सकता है?... इस प्रकार के निर्धारण जीवन साधना के साधकों के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक है।...
- यदि पेट प्रजनन तक, लोभ-मोह तक उसकी गतिविधियाँ सीमित रहें तो उसे नरपशु के अतिरिक्त और क्या कहा जायेगा?... लोभ-मोह के साथ अहंकार और जुड़ जाने पर तो बात और भी अधिक बिगड़ती है। महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के ल...
- यदि मनुष्य आत्म-बोध प्राप्त कर ले और समझ ले कि मैं कौन हूँ?... क्या हूँ? और क्या कर सकता हूँ? तो समझना चाहिए कि उसे क्षुद्र से महान्, नर से नारायण, पुरुष से पुरुषो...
- यदि युद्ध नहीं होता है, तो दूसरे तरह का नया संकट खड़ा होगा, जो उत्पादन हो चुका है, उसका क्या किया जाए?... जन-शक्ति, धन-शक्ति और साधन-शक्ति इस प्रयोजन में लगी है, उसे उलट कर नये क्रम में लगाने की विकट समस्या...
- यदि लड़की को भी लड़कों के समान ही सुयोग्य बनाने के लिए अधिक समय तक शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करने का औचित्य हो, तो फिर उसे बाल-विवाह के बन्धनों में बाँधकर घसीटते हुए किसी भी दूसरे पिंजड़े में स्थानान्तरित किए जाने का क्या औचित्य हो सकता है?... विवाह के बाद योग्यता-सम्वर्द्धन के अवसर पूरी तरह समाप्त क्यों हो जाने चाहिए? अभिभावकों के घर लड़की न...
- यदि वरिष्ठता और महत्ता की जाँच-पड़ताल करनी हो तो एक ही बात खोजनी चाहिए कि व्यक्ति सामान्यजनों की अपेक्षा अपने व्यक्तित्व, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिक समावेश कर सका या नहीं?... सोने को कसौटी पर कसने के अतिरिक्त आग में भी तपाया जाता है, तब पता चलता है कि उसके खरेपन में कहीं कोई...
- यदि वह प्रतिभा भाव-श्रद्धा के साथ जुड़ जाए तो?... इस सोच ने उन्हें चल पड़ने के लिए विवश कर दिया। रास्ते भर सोचते जा रहे थे—तो वह लोगों का जीवन सँवारने...
- यदि सुविधा-साधनों का बाहुल्य रहा तो भी उससे क्या कुछ बनता है?... बाहर वालों को सुखी-सम्पन्न दीखना और बात है। कितने ही साधनों से सम्पन्न क्यों न हों, उनका अपनी दृष्टि...
- यदि हम दूसरों के स्थान पर होते तो हम किस प्रकार के बर्ताव की आशा करते?... ठीक इसी कसौटी पर, हर प्रसंग में, हर क्षेत्र में कसकर यह जानना चाहिए कि अपनी ईमानदारी खरी है या खोटी?...
- यदि हाँ तो वैसा उदाहरण प्रस्तुत करके दिखा देने के लिए और कोई आगे क्यों नहीं आता?... एक बन्दर द्वारा समुद्र छलाँग जाना, लंका जैसे सुदृढ़ दुर्ग को धराशाई बनाना, पर्वत समेत संजीवनी बूटी क...
- यह असमंजस बना ही रहता है कि उसका क्या होगा?... भविष्य न जाने कैसा बन कर रहेगा?इस विषम विडम्बना से छूटने का एक ही उपाय है कि दोष-दुर्गुणों की जो भार...
- यह इस बात पर निर्भर रहता है कि हाथ के नीचे जो काम हैं, उसके अनुकूल और प्रतिकूल पक्ष की, हर हलचल और समस्या को कितनी गम्भीरता और यथार्थता के साथ आँका गया?... समय रहते उनसे निपटने का किस प्रकार जुगाड़ बिठाया गया? सफलता ऐसे ही तेजस्वियों का वरण करती है। श्रेया...
- यह कह पाना भी सम्भव है कि आने वाला समय कैसा होगा?... वे रचनात्मक दिशा मेें सोचते हुए कहते हैं कि भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है, क्योंकि आधुनिकता की दौड़ स...
- यह कार्य लेखनी, वाणी एवं प्रचार माध्यमों से भी एक सीमा तक ही हो सकता है, सो भी बड़ी मन्दगति से, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि लोकचिन्तन में गहराई तक घुसी हुई भ्रष्टता से कैसे निपटा जाए और उसके फलस्वरूप जो दुराचरण का सिलसिला चल पड़ा है, उसके उद्गम को बन्द कैसे किया जाय?... धूर्तता इन दिनों इस कदर बढ़ी हुई है कि वह कानूनी दण्ड व्यवस्था से लेकर धर्मोपदेश स्तर की नीति मर्याद...
- यह तो हमारे अन्दर-बाहर एक होने के लिए तो आतुर है, पर घुसे कैसे?... हमने प्रवेश-निषेध की तख्ती जो लगा रखी है। प्रवेश निषेध की तख्ती और कुछ नहीं—निष्ठुरता है, जिसके हटते...
- यह देखना ही पर्याप्त नहीं?... जाँचा यह भी जाना चाहिए कि उसका उपयोग लोकहित के लिए किस प्रकार और कितना बन बड़ा? यदि इसकी कसौटी को छो...
- यह न सोचें कि तथाकथित सगे सम्बन्धी क्या परामर्श देते हैं?... प्रह्लाद, विभीषण, भरत, मीरा आदि को कुटुम्बियों का नहीं, आदर्शों का अनुशासन अपनाना पड़ा था। उच्चस्तरी...
- यह मनुहार मेघों की ही क्यों होती है?... खोजने पर पता चलता है कि वे संचित जलराशि समेट, अपने आपको अति विनम्र बनाकर उसे धरती पर बिखेर देते हैं।...
- यह योगाभ्यास आखिर है क्या?... इसकी गहराई तक उतरने वाले जानते हैं कि तितीक्षाओं के साथ जुड़ी हुई कर्मकाण्डों की प्रत्यक्ष फलश्रुति ...
- यह रंग कहाँ से आता है?... उत्तर स्पष्ट है जो वस्तु या पौधा अपने अनुरूप, किरणों में विद्यमान जिन रंगों को अवशोषित नहीं कर पाता ...
- यह सब कहाँ से उत्पन्न होते हैं और क्यों कर निपट सकते हैं?... इसकी विवेचना करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मात्र अपने आपे तक, गिने-चुने अपनों तक सीमित...
- यह सब कैसे होता है?... शक्ति कहाँ से आती है? साधन कहाँ से जुटते हैं? इन सबका उत्तर काय-कलेवर के कण-कण में संव्याप्त और गतिश...
- यह सभी अपने ही काय-कलेवर में उपलब्ध किये जाने चाहिए और देखा जाना चाहिए कि परिष्कृत अध्यात्म व्यक्ति एवं संसार के लिए उपयोगी हो सकता है क्या?... भौतिक विज्ञानियों में से अनेकों ने अपनी अभीष्ट खोज के लिए प्राय: पूरी जिन्दगी लगा दी और लक्ष्य तक पह...
- यह स्थिति सुधार और विकास दोनों में बाधक है?... जब तक कमी का आभास न हो तब तक उसकी पूर्ति का तारतम्य कैसे बने? अस्तु, आत्मविकास के मार्ग पर चलने वाले...
- यहाँ दो निष्कर्ष निकलते हैं—एक यह कि राम की प्रतिभा पर विश्वास करके वरिष्ठ वानर भी उत्साह और साहस से भर गए थे अथवा राम दल के मूर्धन्यों ने सामान्य स्तर के वानरों को भी प्राण-चेतना से ओत-प्रोत कर दिया हो और समर्थ व्यक्तियों की एक अच्छी-खासी मण्डली बन गई हो?... दूसरी ओर समर्थ शासनाध्यक्ष भी रावण की समर्थता और अपनी दुर्बलता को देखते हुए डर गए हों और झंझट में पड...
- युग अवतरण की सम्भावना गंगावतरण की तरह अद्भुत तो है, पर साथ ही इस तथ्य से भी इंकार कैसे किया जाए कि जो कभी चरितार्थ हो चुका है, वह फिर अपनी पुनरावृत्ति करने में असमर्थ ही रह जाएगा?... युग सन्धि की वर्तमान वेला ऐसी ही उथल-पुथलों से भरी हुई है।मई ८९ में, ग्राम पंचायतों को विशेष अधिकार ...
- युग चेतना के प्रभात पर्व पर, उदीयमान सविता के आलोक को किस प्रकार भुलाया जाए?... युग अवतरण की सम्भावना गंगावतरण की तरह अद्भुत तो है, पर साथ ही इस तथ्य से भी इंकार कैसे किया जाए कि ज...
- युग निर्माण परिवार से बाहर भी तो असंख्य भावनाशील प्रतिभाएँ हैं, वे भी चुप क्यों बैठेगी?... उनका प्रयास युग निर्माण परिवार से कम नहीं अधिक ही होगा और लक्ष्य तक पहुँचने की प्रक्रिया पूरी होकर ह...
- युग सन्धि की इस वेला में न्यायाधीश के फैसले की तरह हर जीवन्त को यह निश्चय करना है कि उसकी अगली भूमिका किस स्तर की हो?... विवाह-शादी के धूमधाम वाले दिनों में, घर के हर छोटे-बड़े का उनकी क्षमता के अनुरूप छोटा-बड़ा योगदान हो...
- युग साहित्य में ऐसा कुछ न रहने पर उन पर भी जबरदस्ती कैसे लादा जाए?... एक तो युग साहित्य का लेखन भी मात्र युगद्रष्टा के ही बलबूते का काम है, दूसरे उसके प्रकाशन में बड़ी पू...
- युग-ऋषियों का उत्पादन, निर्माण कहाँ होता है?... उस स्थान को ढूँढ़ पाना भी शोध का विषय बन गया है। न वैसा कुछ पढ़ने में किसी को रुचि है और न पढ़ाने मे...
- युद्धबन्दी कितने हैं?... -‘‘सिर्फ एक।’’‘‘एक! ’’ अशोक के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।‘‘बाकी कलिंग के.....किशोर और वृद्ध, उन्होंने ...
- यों घर-आँगन में बुहारी लगाकर सफाई की चिह्न पूजा तो किसी प्रकार होती ही रहती है?... भटकाव में पड़ने की अपेक्षा हमें लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और उसे प्राप्त करने के लिए अपनी समूची तन...
- राई जितने छोटे बीज का विशाल वट-वृक्ष के रूप में सुविस्तृत हो जाना क्या कोई कम आश्चर्य की बात है?... यह अपनी सृष्टि ऐसे ही आश्चर्यों का प्रदर्शन पग-पग पर करती है। सच तो यह है कि संसार में जो कुछ हो चुक...
- राजकुमारी नंगी कैसे-कहाँ जाती?... लाज बचाने के लिये वह तब से लेकर अब तक जंगलों में भटकती, किसी प्रकार कहीं लुक छिपकर जीवनयापन कर रही ह...
- राजाओं के मणि-मुक्तकों से जड़े राजमुकुट और सिंहासन, न जाने धराशायी होकर कहाँ धूल चाट रहे होंगे?... यह करतूतें उन्हीं पैशाचिक दुष्प्रवृत्तियों की हैं, जो मनुष्य पर उन्माद की तरह छाई रहती हैं और उसकी ब...
- राज्य परिवर्तन, खून-खराबे के बिना, आक्रोश-विद्रोह उभरे बिना कहाँ होते हैं?... पर समर्थ हाथों से छिन कर सत्ता निर्धनों के, पिछड़ों के हाथों इतनी आसानी से चली जाएगी? यह बात मानव गल...
- रामानन्द ने, कबीर को स्वर्ण खान कहीं नहीं सौंपी थी?... वरन् वह प्रतिभा प्रदान की थी, जिनके कारण कुलीनता और विद्वत्ता के अभाव में भी अपने समय के प्रचण्ड प...
- लगता है कि हर दिशा में उमड़ने वाले विनाश के बादल कहीं महाप्रलय तो करने नहीं जा रहे हैं?... यह भी तो हो सकता है कि उन असह्य प्रहारों से यह सुन्दर ग्रह कहीं धूल बनकर अनन्त आकाश में छितरा न जाए ...
- लड़की और लड़के में अन्तर किसलिए?... दोनों के मूल्यांकन में न्याय-तुला की डण्डी मारने की मान्यता किस लिए?नारी की पराधीनता का एक रूप यह है...
- लम्बे समय तक जीवित रहने की बात तो वहाँ बन ही कैसे पड़ेगी?... लम्बे समय तक दुर्बलता के शिकार रहने वालों को धीरे-धीरे कई प्रकार की बीमारियाँ घेरती और दबोचती रहती ह...
- लोग कैसे बने?... कैसे बदलें? इस प्रयोग को सर्वप्रथम अपने ऊपर ही किया जाना चाहिए और बताया जाना चाहिए कि कार्य उतना कठि...
- लोगों के समक्ष वे अपने सम्बन्ध में बिना सिर-पैर की शेखी भले ही बघारते रहें?......
- वक्ता जब इतने जोर-शोर से अन्यान्यों में बदलाव लेने की बात करता है और उसका महात्म्य फलितार्थ भी उच्च कोटि का बताता है, तो उसे अपने आचरण में क्यों नहीं लाता?... इस प्रश्र के उत्तर में दो ही बातें उभरकर आती हैं। एक तो यह कि कथन व्यावहारिक नहीं है; सुधार सम्भव नह...
- वरदान अनायास ही किसी को कहाँ से मिलते हैं?... देवता कुपात्रों और असमर्थों पर कृपा कहाँ से करते हैं। पात्रता की गहराई रहने पर ही वर्षा का पानी वि...
- वरदान अनायास ही किसी को कहाँ मिलते हैं?... देवता कुपात्रों और असमर्थों पर कृपा कहाँ करते हैं। पात्रता की गहराई रहने पर ही वर्षा का पानी विशाल ज...
- वसन्त का अवतरण हो और पेड़-पादपों पर रंग-बिरंगे फूल न खिलें, यह हो ही नहीं सकता, प्रभात उगे और अन्धकार एवं निस्तब्धता का माहौल बना रहे, यह अनहोनी होती दीख पड़े, इसकी आशंका किसके मन में रहेगी?... नारी युग की अधिष्ठात्री, धरती की देवी अपनी गरिमा सिकोड़े-समेटे और दबाए-दबोचे बैठी रहे, यह विपन्नता क...
- वस्तुत: सर्वथा दोषरहित व्यक्ति कदाचित् कोई भी नहीं होता, पर अपनी गलती कोई सोचे कैसे?... इससे हेठी जो होती है, नाक जो कटती है, अपनी सर्वज्ञता पर आँच जो आती है। इसलिए काम बिगड़ने पर उसका लां...
- वह जीवन्त स्तर का हो, तो उसमें वह खेत-उद्यानों की तरह अपने को निहाल करने वाली और दूसरों का मन हुलसाने वाली सम्पदाएँ प्रचुर मात्रा में उत्पन्न हो सकती हैं, पर चट्टान पर हरियाली कैसे उगे?... व्यक्तित्व अनायास ही नहीं बन जाता है। वह इर्द-गिर्द के वातावरण से अपने लिए प्राणवायु खींचता है। जहाँ...
- वह बीज कहाँ से पाया जाय, जो खेतों को सतयुगी धन-धान्य से भरा-पूरा बनाये, वह चिनगारी कहाँ से प्रकटे?... जो दावानल की तरह अनीति की झाड़ियों के जंगल को भस्मसात करके रहे। अन्यत्र कहाँ जाया जाय, अपने ही घ...
- वहाँ किन घटकों के साथ किस प्रभाव का मिश्रण होकर क्या प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है?... रसायन भी सूर्य किरणों का ही उत्पादन हैं।सृष्टि के आदि से लेकर अब तक धरती के वातावरण में प्राणियों, प...
- वाणी से असंस्कृत वार्तालाप तो नहीं होता?... कामुकता की प्रवृत्ति कहीं कुदृष्टि से तो नहीं उभर रही? असंयम से शरीर और मस्तिष्क खोखला तो नहीं हो रह...
- वासना, तृष्णा और अहंता के अतिरिक्त जब और कुछ सूझ ही न पड़े—लिप्सा, लालसा और तृष्णा की ललक जब गहरी खुमारी के रूप में चढ़ी हुई हो, तो विद्या के—ब्रह्म विद्या के—आत्म ज्ञान के स्वर्गीय दृष्टिकोण एवं जीवन-मुक्ति जैसे उच्च स्तर के सम्बन्ध में कोई सुने-समझे भी क्यों?... उस दिशा में कुछ करने एवं नियम बनाने की बात तो बहुत पीछे आती है।जो हो, आज का गुजारा भले ही इस सड़ी की...
- वासुदेव का व्यक्तित्व और असाधारण योजना नीति महाभारत जैसी विशाल योजना पूरी करके दिखा दे, इस पर सामान्य बुद्धि तो अविश्वास ही करती रहेगी?... समाधान उन्हीं का हो सकेगा, जो दैवी शक्ति की महान् महत्ता पर विश्वास कर सकें। बुद्ध जैसे गृहत्यागी, व...
- विचारणीय है कि उतनी बड़ी व्यवस्था कैसे बने?... आरम्भिक दृष्टि से यह कार्य लगभग असम्भव जैसा लगता है, पर संसार में ऐसे लोग भी हुए हैं, जिसने असम्भव क...
- विधुर प्रसन्नतापूर्वक विवाह करते हैं, पर विधवाओं को ऐसी छूट कहाँ?... नारियाँ सती होती हैं, पर नर वैसा उदाहरण प्रस्तुत नहीं करते। नारियाँ घूँघट करके रहती हैं। नाक, का...
- विपन्न विग्रह के घटाटोपों से कैसे निपटा जाएगा?... प्रकृति के साथ क्रूर मजाक करने पर उसका प्रतिफल तो भुगतना ही पड़ेगा। अग्नि में हाथ डालने पर झुलसने से...
- विभूतियाँ किसकी हैं?... इन सबका उत्तर देते समय नाम भगवान् का ही लिया जा सकता है, पर भगवान् का निकटतम और सुनिश्चित स्थान एक ह...
- विवाह के बाद योग्यता-सम्वर्द्धन के अवसर पूरी तरह समाप्त क्यों हो जाने चाहिए?... अभिभावकों के घर लड़की ने जितनी योग्यता और सम्मान अर्जित किया है, उससे आगे की प्रगति का क्रम जारी रखन...
- विवाहित होने के बाद प्रगति के सभी अवसर छिन जाने और मात्र क्रीतदासी की भूमिका निभाते रहने तक ही उसे क्यों बाध्य रखा जाना चाहिए?... ये प्रश्न ऐसे हैं, जिनका उचित उत्तर हर विचारशील को, हर न्यायनिष्ठ को व हर दूरदर्शी को छाती पर हाथ रख...
- विश्राम की बात न सोचें, अहर्निश एक ही बात मन में रहे कि हम इस प्रस्तुतीकरण में पूर्णरूपेण खपकर कितना योगदान दे सकते हैं?... कितना आगे रह सकते हैं? कितना भार उठा सकते हैं? स्वयं को अधिकाधिक विनम्र, दूसरों को बड़ा मानें। स्व...
- विश्राम की बात न सोचें, अहर्निश एक ही बात मन में रहे कि हम इस प्रस्तुतीकरण में पूर्णरूपेण खपकर कितना योगदान दे सकते हैं?... कितना आगे रह सकते हैं? कितना भार उठा सकते हैं? स्वयं को अधिकाधिक विनम्र, दूसरों को बड़ा मानें। स्वयं...
- विषवृक्ष को काटे बिना सुख-शान्ति की आशा कैसे की जा सकेगी?... आज की सबसे प्रमुख आवश्यकताइन दिनों सबसे बड़ा और सबसे आवश्यक कार्य यह है कि विचार क्रान्ति का व्यापक ...
- वे एकाकी थे, असमंजसपूर्वक अनुरोध करने लगे कि मुझे क्यों उत्पन्न किया गया है?... क्या करूँ? कुछ करने के लिए साधन कहाँ से पाऊँ? इन जिज्ञासाओं का सामाधान आकाशवाणी ने किया और कहा—गायत्...
- वैज्ञानिकों-आविष्कारों ने अपना मानस और समय, प्रमुखतापूर्वक निर्धारित लक्ष्य पर केन्द्रित न किया होता, तो सफलता की आशा कहाँ बन पड़ती?... लोक सेवियों ने अपने समयदान के सहारे एक से एक बड़े कार्य सम्पन्न कर दिखाए हैं। धन न सही, पर समय को सा...
- व्यक्ति कमाये कुछ भी, पर ध्यान इतना अवश्य रखें कि उसमें अनीति का, मुफ्तखोरी का समावेश तो नहीं हो रहा है?... उस उपार्जन को भी निजी स्वामित्व के अन्तर्गत ही समझ लिया जाये। ध्यान इस बात का भी रखा जाये कि मनुष्य ...
- व्यक्ति, समाज और सरकार ने उसे मान्यता दे दी है, फिर वह बढ़ेगी क्यों नहीं?... कुछ ही दिन में निरक्षरता की कालिख से सभी लोग अपना मुँह धोकर साफ कर लेंगे। प्रश्न विद्या का है। उसका ...
- व्यवहार में शालीनता का समुचित समावेश किस प्रकार रखना चाहिए?... वह सब औचित्य वे भूल जाते हैं। उनींदों से खुमारीग्रस्तों से जैसी भूलें होती रहती हैं वैसी ही वे आए दि...
- व्यायाम किये बिना कोई पहलवान कहाँ बन पाता है?... इसी प्रकार धर्म के तत्त्वज्ञान को व्यावहारिक जीवनचर्या में उतारने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है।...
- व्यावसायिक पूँजी के रूप में भी उसे मान्यता मिल सकती है, पर कमाऊ उत्तराधिकारियों के सिर पर पूर्वजों की कमाई को लाद दिया जाए, इसका क्या औचित्य हो सकता है?... कानून किनने बनाए और किनके लिए बनाए—यह बहुत ही विवादास्पद है, पर न्याय यही कहता है कि जमा भले ही किसी...
- शंकर दिग्विजय की गाथा बताती है कि मानवी प्रतिभा कितने साधन जुटा सकती और कितने बड़े काम करा सकती है?... परशुराम ने समूचे विश्व के आततायियों का मानस किस प्रकार उलट दिया था, यह किसी से छिपा नहीं है। कुमारजी...
- शक्ति कहाँ से आती है?... साधन कहाँ से जुटते हैं? इन सबका उत्तर काय-कलेवर के कण-कण में संव्याप्त और गतिशील विद्युत प्रवाह की ओ...
- शान्तिकुञ्ज के ब्रह्मवर्चस् शोध-संस्थान में जो शोध-कार्य उच्च वैज्ञानिक शिक्षण प्राप्त विशेषज्ञों द्वारा चल रहा है, उसमें गायत्री मंत्र के शब्दोच्चारण और यज्ञ से उत्पन्न ऊर्जा की इस प्रयोजन के लिए खोज की जा रही है कि उनका प्रभाव अध्यात्म तक ही सीमित है या भौतिक क्षेत्र पर भी पड़ता है?... पाया गया है कि गायत्री मंत्र के साथ जुड़ी हुई यज्ञ-ऊर्जा पशु-पक्षियों वृक्ष-वनस्पतियों तक के उत्कर्ष...
- शासन संचालन को देखते हुए नये सिरे से सोचना पड़ता है कि राजतंत्र, अधिनायकवाद आदि की तुलना प्रजातंत्र को मिल भी सकती है या नहीं?... प्रत्यक्षवाद ने आदर्शों पर से आस्थाएँ बुरी तरह डगमगा दी हैं। जैसे भी बने स्वार्थ साधन ही प्रमुख दृष्...
- शिवाजी, प्रताप, चन्द्रगुप्त, विवेकानन्द, विनोबा आदि से कितनी पूजा-अर्चा बन पड़ी?... इस सम्बन्ध में तो कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता, पर इतना सर्वविदित है कि उनने दिव्य चेतना के आह्वान को स...
- संकीर्ण स्वार्थपरता के भव-बन्धनों से छुटकारा पा सकना उनसे कैसे बन पड़ेगा?... जिन्हें सम्पन्नता की तृष्णा और बड़े कहलाने की महत्त्वाकांक्षाएँ जकड़े रहती हैं, उनके लिए विचारशीलता ...
- संकीर्ण स्वार्थपरता को सीमित कैसे रखा जाए?... सहकारिता, उदारता जन-जन को प्रिय लगे और उसके लिए उत्साह उभरे। तात्कालिक लाभ को इतना महत्त्व न मिले कि...
- संचित कुसंस्कारों से लेकर वर्तमान प्रचलनों के अनेक अवरोध इस मार्ग में अड़ते हैं कि फूटे खण्डहरों जैसी व्यवस्थाओं को किस प्रकार नये सिरे से भव्य भवन का विशाल रूप देने की योजना बनाई जाए तथा इसके लिये निरन्तर कार्यरत और आवश्यक साधन जुटाने की हिम्मत कैसे जुटाई जाए?... इन दिनों की सर्वोपरि आवश्यकताकरने को तो काम एक ही है, पर वह है इतना बड़ा और व्यापक, जिसकी तुलना हजार...
- संसार तब इतना सुन्दर कहाँ था?... यहाँ खाई-खन्दक टीले, ऊसर, बंजर, निविड़ वन और अनगढ़ जीव-जन्तु ही जहाँ-तहाँ दीख पड़ते थे।...
- सती-प्रथा अब कहाँ है?... छूत-अछूत के बीच जैसा भेदभाव कुछ दशाब्दी पहले चला था, अब उसमें कितना अधिक परिवर्तन हो गया है। आश्चर्य...
- सदा यही कहता रहेगा कि अपनी समस्याओं से ही घिरा हुआ हूँ, जबकि वस्तुत: वास्तविक समस्याएँ मनुष्यों के सामने होती ही कितनी है?... फिर यदि उन्हें व्यावहारिक बुद्धि द्वारा समझदारी के साथ सुलझाया जाए, तो इतनी सरलतापूर्वक सुलझ जाती है...
- सदाशयता का जोर-शोर से समर्थन करने वाले ही जब नये-नये मुखौटे बदलकर कृत्य-कुकृत्य करने की दुरभिसन्धियाँ रचते रहे हैं, तो उन्हें कौन किस प्रकार समझाए?... जागते हुए को कोई क्या कहे? क्या सोते से जाग पड़ने की आवश्यकता समझाए? प्रचार माध्यम अब अपनी विश्वसनीय...
- सद्भाव और सहयोग के अभाव में लोग प्रेत-पिशाच से अधिक कुछ रहेंगे ही नहीं, भले ही उनके पास सज्जा और सम्पदा कितनी अधिक क्यों न हो?... लक्षण आज भी सामने है। कल तो उनके घटने की नहीं, बढ़ने की ही आशंका है।सन्तुलन नियन्ता की व्यवस्था का ए...
- सन्तानोत्पादन में पुरुष भी उतना ही उत्साह दिखाता है तो फिर इस कृत्य के फलितार्थों से निपटने में क्यों अपनी जिम्मेदारी से पल्ला छुड़ाकर भागने का प्रयत्न करना चाहिए?... कानून पास हो जाने से अब उसका दबाव पुरुषों पर भी पड़ेगा। अब तक दण्ड भुगतने के लिए अकेले नारी को ही बा...
- सबकी यही उत्सुकता बनी रही कि यह व्यक्ति आखिर कहता क्या है?... उनके एक-एक शब्द को नापा तौला गया, जो परिणाम सामने आए उनसे यही निष्कर्ष निकला कि गाँधी जी पूरी तरह जी...
- सबको बड़ा आश्चर्य था, यह कैसे सम्भव हुआ?... उन्होंने बताया, व्यक्तिगत जीवन की पारिवारिक, सामाजिक जीवन की समस्याओं का एक ही कारण है—निष्ठुरता। सम...
- समझना चाहिए कि इस सन्दर्भ में किसी अग्रगामी आदर्शवादी को निराश न होना पड़ेगा, क्योंकि उसकी पीठ पर सर्वशक्तिमान सत्ता का हाथ जो रहेगा?... तेज हवा पीछे से चलती है, तो पैदल वालों से लेकर साइकिल आदि के सहारे लोग कम परिश्रम में आगे बढ़ते जाते...
- समय रहते उनसे निपटने का किस प्रकार जुगाड़ बिठाया गया?... सफलता ऐसे ही तेजस्वियों का वरण करती है। श्रेयाधिकारी वे ही बनते हैं। जो मात्र अपने जिम्मे के काम को ...
- समर्थता के साथ-साथ समझदारी भी बढ़ती है और वह अदृश्य के मार्गदर्शन में अभ्युदय की दिशा में चल पड़े, तो उसके द्वारा उत्पन्न होने वाले चमत्कारों से वंचित ही बने रहना किस कारण रुका रह सकेगा?... नारी के अनुदान कभी भी हलके स्तर के नहीं रहे। उसने धरित्री के, ऊर्जा के, वर्षा के व प्राणवायु के सदृश...
- समर्थों की तरह बड़े काम सफलतापूर्वक कर सकना उनसे कहाँ बन पड़ता है?... आधी जनसंख्या अनगढ़ स्थिति में रहे और दूसरा आधा भाग उसे गले के पत्थर की तरह लटकाए फिरे, तो ऐसी स्थि...
- समुचित मूल्य न चुकाने पर कोई कीमती वस्तु ऐसे ही तिकड़मबाज़ी के सहारे हाथ कैसे लगे?... देखा जाता है कि मनोकामनाओं का पुलिन्दा बाँधे फिरने वाले जिस-तिस देवी-देवता के पीछे गिड़गिड़ाते फिरने...
- सम्भवत: अदृश्य शक्ति का ही इसमें हाथ हो?... ऐसी शक्ति का जो समय-समय पर, आड़े समय में, बिगड़ता सन्तुलन सँभालने के लिए अपने वर्चस्व का प्रकटीकरण...
- सम्भवतः अदृश्य शक्ति का ही इसमें हाथ हो?... ऐसी शक्ति का जो समय-समय पर आड़े समय में बिगड़ता सन्तुलन सँभालने के लिए अपने वर्चस्व का प्रकटीकरण करत...
- सहयोग के आधार पर परस्पर हित साधन की प्रक्रिया चलती रह सकती है, किन्तु जहाँ व्यक्तिवाद की आपाधापी ही सब कुछ हो वहाँ यह समझ में नहीं आता कि संकीर्ण स्वार्थपरता अपना लेने पर दूसरों के अधिकारों को क्षति पहुँचती है या नहीं?... यह स्थिति ऐसी है जिसमें दूसरों के कष्ट-संकट और अहित की ओर ध्यान जाता ही नहीं, मात्र अपना ही लाभ सूझत...
- साँस लेते एवं पानी पीते यह आशंका सामने खड़ी रहती है कि उसके साथ कहीं मन्द विषों की भरमार शरीरों में न हो रही हो?... उद्योगों-वाहनों द्वारा छोड़ा गया प्रदूषण ‘‘ग्रीन हाउस इफेक्ट’’ के कारण अन्तरिक्ष में अतिरिक्त तापमान...
- साथ ही रोगियों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है, मानों अब दुनिया में सर्वथा नीरोग कहे जा सकने वाले व्यक्ति रह ही न गए हों?... इलाज सभी करते हैं, पर कुछ दिन चमत्कार दिखाने के उपरान्त सभी उपचार निरर्थक हो जाते हैं। मरीज एक से दू...
- साधन कहाँ से जुटते हैं?... इन सबका उत्तर काय-कलेवर के कण-कण में संव्याप्त और गतिशील विद्युत प्रवाह की ओर संकेत करके ही दिया जा ...
- साधन कैसे जुटेंगे?... प्रोत्साहन और सहयोग कहाँ से मिलेगा? ऐसे सभी लोगों तक सन्देश पहुँचा दिया गया है कि सूक्ष्म स्तर की गत...
- साधनहीन अखण्ड ज्योति पत्रिका बिना विज्ञापन छापी जा भी सकेगी?... यह सन्देह सभी करते थे। पूजा-पाठ के आधार पर खड़ा किया गया छोटा सा संगठन, किसी दिन जनमानस की कठिनतम सम...
- सामान्य जन तो अपनी निजी आवश्यकताओं, उलझनों तक का समाधान नहीं कर पाते, फिर व्यापक बनी-हर क्षेत्र में समाई विपन्नताओं से जूझने के लिए उनसे क्या कुछ बन पड़ेगा?... इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने के लिये विशिष्टतायुक्त प्रतिभाएँ चाहिए। बड़े युद्धों को जीतना वरिष्ठ...
- सामान्यजन तो अपनी निजी आवश्यकताओं, उलझनों तक का समाधान नहीं कर पाते, फिर व्यापक बनी-हर क्षेत्र में समाई विपन्नताओं से जूझने के लिए उनसे क्या कुछ बन पड़ेगा?... इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने के लिए विशिष्टतायुक्त प्रतिभाएँ चाहिए। बड़े युद्धों को जीतना वरिष्ठ से...
- सामूहिक गायत्री मन्त्रोच्चारण होता है, साथ ही संगीत और प्रवचन के माध्यम से वह सब बताया जाता है कि स्थानीय लोगों को किस प्रकार प्रगतिशीलता के पथ पर चलना चाहिए और वर्तमान प्रचलनों में से किसमें क्या सुधार करना चाहिए?... बाद में उपस्थित प्रतिभावानों का एक प्रज्ञा मण्डल बना दिया जाता है।प्रात:काल यज्ञ, दोपहर में विचारगोष...
- सारी रीति ही उलटी है?... उठे को गिराना, गिरे को कुचलना, कुचले को मसलना, यही रह गया है। आज मनुष्य और पशु में भेद आचार-विचार की...
- सार्वभौम सन्तुलन तो बन ही कैसे पड़े?... वायु प्रदूषण, अहंकार, अनाचार अपने-अपने ढंग से, अपने द्वारा किये जाने वाले महाविनाशों की चेतावनी दे र...
- सिर पर छाई अवाँछनीयता को उतार फेंकना किसी के लिए भी कठिन क्यों होना चाहिए?... ‘सादा जीवन—उच्च विचार’ वाला उपक्रम अपनाने से किसी पर क्या इतना बोझ लदता है, जिसे कठिन या असम्भव माना...
- सुधार के प्रसंग में लोग वक्तृता सुनने से कहीं अधिक दिलचस्पी इस बात में लेते हैं कि जो कहा जा रहा है, उसे उपदेशक ने अपने निजी जीवन में किस हद तक अपनाया?... देश, धर्म, समाज, और संस्कृति का अभ्युदय इसी पर निर्भर है कि इनसे सम्बन्धित व्यक्ति, सम्पर्क में आने ...
- सुनिश्चित है कि लोगों की आस्थाओं को, युग के अनुरूप विचार धारा को स्वीकारने हेतु उचित मोड़ दिया जा सके तो कोई कारण नहीं कि सुखद भविष्य, का उज्ज्वल परिस्थितियों का प्रादुर्भाव सम्भव न हो सके?... यह प्रवाह बदल कर उलटे को उलटकर सीधा बनाने की तरह भागीरथी कार्य है, किन्तु असम्भव नहीं, पूर्णतः सम्भव...
- सुयोग का लाभ उठाने में बुद्धिमानी क्यों नहीं देखता?... ऐसी ही प्रचण्ड प्रेरणाएँ असंख्यों को मिलेंगी और वे अन्त:स्फुरणा के आधार पर ही इतना कुछ करेंगे, जितना...
- सूझ नहीं पड़ता कि भविष्य में क्या घटित होकर रहेगा?... सदुपयोग बन पड़े, तो परिवर्तन सम्भवमनुष्य अनन्त शक्तियों का भण्डार है। उसमें से बहुत थोड़ा अंश ही शरी...
- सृष्टि को ईश्वर की संरचना माना जाता है, पर ईश्वर के वर्तमान स्वरूप को किसने जाना?... इसका उत्तर खोजते समय इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि उसे मनुष्य ने बनाया।इतिहास साक्षी है कि जब-...
- स्पष्ट है, कभी-कभार किसी की छोटी-मोटी सहायता हाथ लग भी सकती है, पर जब पूरा जगत् ही उलझन भरा है तो कौन किसकी, कब तक, कितनी सहायता कर सकता है?... विशेषतया तब जबकि हर किसी को अपनी-अपनी समस्याओं में ही इतना उलझे रहना पड़ता है, कि दूसरों की सहायता क...
- हम एक व्यक्ति हैं?... नहीं हैं। हम कोई व्यक्ति नहीं हैं। हम एक सिद्धान्त हैं, आदर्श हैं, हम एक दिशा हैं, हम एक प्रेरणा हैं...
- हमें भी ऐसा संयोग मिला होता, तो अधिक कमाने और अधिक सम्मान पाने की परिस्थिति हाथ लगी होती?... पर इस स्थिति से वञ्चित रहने का दोष परिस्थितियों या अमुक व्यक्तियों पर देना भी व्यर्थ है। यदि शिक्षा ...
- हर कोई उन्हीं को स्वीकार-अंगीकार करेगा, भले ही उन्हें समय की अनिवार्य आवश्यकता ने नये सिरे से ही प्रतिपादित क्यों न किया हो?... प्रस्तुत पुस्तक को ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने एवं पढ़ने के लिए...
- ‘सादा जीवन—उच्च विचार’ वाला उपक्रम अपनाने से किसी पर क्या इतना बोझ लदता है, जिसे कठिन या असम्भव माना जाए?... अपनी इस भूल का सुधार कर लेने भर से दुखदाई दरिद्रता से आधा निजात मिल सकता है।...
- ‘‘क्या पहचान है, इन भावों के जगने की?... ’’‘‘उदार आत्मीयता, अपनत्व का विस्तार, फिर कोई पराया नहीं रह जाता। दूसरों की तकलीफें स्वयं को निष्क्र...
- ‘‘नया इंसान बनाएँगे, नया संसार बसाएँगे, नया भगवान् उतारेंगे’’ के उद्घोष किसी आवेशग्रस्त केन्द्र से ही उभर सकते हैं, अन्यथा साधारण जनता के लिए तो ऐसी दावेदारी ‘‘सनक’’ के अतिरिक्त और कुछ क्या कही-समझी जा सकती है?... विवेचना भर पर्याप्त नहीं, सोचना उस विस्तरण के सम्बन्ध में भी पड़ेगा, जो मत्स्यावतार का, प्रज्ञावतार ...
- ‘‘पर किस तरह?... ’’ अब वाणी में उल्लास था। ‘‘अन्दर के दिव्यभावों को जगाकर। उन्हें जीवन के सक्रिय क्षेत्र अर्थात् आचरण...
- (१) लेखक पर दबाव किस बात का है?...? लेखक युगऋषि हैं। उनका अवतरण ईश्वरीय योजना ‘युग निर्माण योजना’ को मूर्त रूप देना रहा है। मनुष्य मा...
- (२) बालसंस्कार - बच्चों के नामकरण, अन्नप्राशन, विद्यारम्भ आदि संस्कारों के अवसर पर, अभिभावकों को हर परिवार वालों को यह बोध कराना कि नए अभ्यागतों को हर दृष्टि से श्रेष्ठ, समुन्नत बनाने के लिए, सम्बन्धित व्यक्तियों के क्या कत्र्तव्य हैं?...? इन्हें पूरा करने के लिए समुचित ध्यान दिलाना।...
- (३) पुंसवन संस्कार:- गर्भावस्था के आरम्भिक दिनों में ही पति-पत्नी तथा सम्बन्धित परिवार के लोगों को बोध कराना कि नवजात शिशु के लिए उसके आगमन से पूर्व किन तैयारियों में जुटना और आगन्तुक को एक श्रेष्ठ विश्व नागरिक के रूप में कैसे विकसित करना?...? (४) उपनयन- पशु प्रवृत्तियों से ऊँचे उठकर देव जीवन में प्रवेश करने का अनुबन्ध। दूसरे जन्म की अवधार...
- , कैंसर जैसे रोगों के विषाणु सम्पर्क में आने वाले पर छूत का आक्रमण करने को तैयार तो नहीं बैठे हैं?...? चालाक और उद्दण्ड व्यक्ति हर कहीं रौब गाँठते और किसी को भी डराने-दबाने में सफल होते हैं। सम्पन्नों म...
- अगली शताब्दी में उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ विनिर्मित करने के लिए क्या सम्पदा जुटानी पड़ेगी?...? किस प्रकार की योजना और विधि व्यवस्था बनानी जुटानी पड़ेगी? किस स्तर की समृद्धि जुटानी पड़ेगी? इसका ऊ...
- अच्छा होता कहीं ऐसी समझ उपज सकी होती कि आवश्यकता के अनुरूप साधन इस सुविस्तृत प्रकृति कलेवर में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं, तब उन्हें मिल बाँटकर काम चलाने की समझदारी क्यों न अपनाई जाये?...? पर दुर्बुद्धि न जाने क्यों तथाकथित समझदारों के सिर ताबड़तोड़ आक्रमण करती है, फलत: अभावग्रस्त समझे ज...
- अणु-ऊर्जा विकसित करने का जो नया उपक्रम चल पड़ा है, उसने विकिरण फैलाना तो आरम्भ किया ही है, यह समस्या भी उत्पन्न कर दी है कि उनके द्वारा उत्पन्न राख को कहाँ पटका जाएगा?...? जहाँ भी वह रखी जाएगी, वहाँ संकट खड़े करेगी।स्थिति निश्चित ही विस्फोटकयह विज्ञान के उत्कर्ष के साथ ह...
- अनाचारियों की संयुक्त शक्ति अपना लंका जैसा साम्राज्य और आतंक अभी भी दिग्दिगन्त में फैलाये हुए है, पर देवताओं को क्या कहा जाए?...? जो सज्जन रहने भर को सब कुछ मानते हैं और अपने समुदाय की संयुक्त शक्ति सँजोकर रामराज्य के अवतरण जैस...
- अपने घर-परिवार की परिधि के भीतर क्या हो सकता है?...? यह अनुमान लगाते हुए यह सब सोचा जा रहा है। पर इतना ही छोटा अनुबन्ध बँधा रहे, यह सम्भव नहीं।...
- अपने मन में भी असमंजस बना ही रहा कि भक्ति का सम्बन्ध मात्र भाव-सम्वेदनाओं तक ही सीमित तो नहीं है?...? क्या उसकी पूर्णता शक्ति से संयुक्त होने में ही है? जाँच-पड़ताल इसकी भी करनी चाहिए कि उसमें इतनी शक्...
- अपव्ययों को रोकने पर, पेंदे में छेद वाले घड़े का सूराख बन्द कर देने की तरह पानी भरा रह सकता है और प्यासे मरने की शिकायत से बचा जा सकता है, किन्तु उस दुर्भाग्य को क्या कहा जाए, जो समय के साथ श्रम को जुड़ने ही नहीं देता?...? अमीरी प्रदर्शन के प्रेत-पिशाच का उन्माद सिर से उतरने ही नहीं देता? इस मूर्छना के रहते उठने, आगे बढ़...
- अमीरी जताने का उद्धत अहंकार यदि काबू में रहे, तो धन-कुबेर बनने की हविस क्यों सभी पर बेतरह छाई रहे?...? औसत नागरिक स्तर का निर्वाह करने में क्या किसी के बड़प्पन में कमी आएगी? वरन् सच तो यह है कि उसे अपेक...
- असुरों का केन्द्र बनी लंका का पराभव और उन्हीं दिनों राम-राज्य के रूप में सतयुग की वापसी का नियोजन, क्या दो राजकुमार और मुट्ठी भर रीछ वानर सम्पन्न कर सकते थे?...? इसको व्यवहार की रीति-नीति के आधार पर नहीं समझाया जा सकता।...
- आज की परिस्थितियों में क्या ऐसा सम्भव है?...? इस पर सहज ही विश्वास नहीं होता। कारण कि इन दिनों आदर्शवादिता मात्र कहने की चीज रह गई है। वह व्यवहार...
- आरम्भ कहाँ से किया जाय?...? यह एक जटिल प्रश्न है। वह बीज कहाँ से पाया जाय, जो खेतों को सतयुगी धन-धान्य से भरा-पूरा बनाये, वह ...
- आश्चर्य इस बात का है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है एवं कैसे हो रहा है?...? इसे कौन करा रहा है? आखिर वह चतुराई कैसे चुक गई, जो बहुत कुछ पाने का सरंजाम जुटाकर अलादीन का नया चिर...
- इतना सब करने के बाद उसे हमेशा एक ही टीस बनी रहती, सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन के निमित्त अधिकतम मैं क्या करुँ?...? एक दिन वह स्वयं आचार्य उपगुप्त के पास गया। पूछा—‘‘मैं और अधिक क्या करुँ?’’‘‘संघ के संचालन के लिए अप...
- इतने कामों को करेगा कौन?...? होंगे कैसे? नरक को स्वर्ग में उलट देने की प्रक्रिया का आखिर माध्यम क्या होगा? उस योजना के क्रियान्व...
- इन दिनों एक ही बड़ा काम सामने है कि जन-जन के मन-मस्तिष्क पर छाई हुई दुर्भावना के निराकरण के लिये कितना बड़ा, कितना कठिन और कितने शौर्य-पराक्रम की अपेक्षा रखने वाला पुरुषार्थ जुटाया जाना चाहिए?...? यह कार्य मात्र उपदेशों से नहीं होगा। इसके लिए तद्नुरूप वातावरण चाहिए। फिर उपदेष्टा का व्यक्तित्व ऐस...
- इन दिनों की सबसे बड़ी तात्कालिक समस्या यह है कि समाज परिकर में छाई विपन्नताओं से किस प्रकार छुटकारा पाया जाए और उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए क्या किया जाए, जिससे निरापद और सुविकसित जीवन जी सकना सम्भव हो सके?...? समाज विज्ञानियों द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों का कारण अभावग्रस्तता को मान लिया गया है। इसी मान्यता के ...
- इन दिनों हर क्षेत्र में प्रवेश किए हुए समस्याओं, अवांछनीयताओं, विडम्बनाओं के लिए दोष किसे दिया जाए?...? और उसका समाधान कहाँ ढूँढ़ा जाए? इस सन्दर्भ में मोटे तौर से एक ही बात कही जा सकती है कि प्रत्यक्षवाद...
- इन दोनों उपक्रमों के लिए पिछले घटना क्रम-वर्तमान के स्वरूप और भावी निर्धारण के साथ ताल मेल बिठाते हुए किस प्रकार क्या किया जाना है?...? इस सम्बन्ध में किसी प्रामाणिक* एवं अनुभवी महापुरुषों से आवश्यक परामर्श कर लेना चाहिए। शान्तिकुञ्ज...
- इन प्रयासों की क्या परिणति एवं क्या प्रतिक्रिया हुई?...? इसका विवरण इतना असाधारण है कि जिनका भी इस तंत्र के साथ निकटवर्ती सम्बन्ध है, वे एक स्वर से प्रशंसा ...
- इन विभीषिकाओं से कौन जूझेगा?...? कैसे जूझेगा?
5. कठिन समस्याओं के सरल समाधान
6. नवसृजन की चेतना असमर्थ नहीं है
7. देवमानवों का...
- इस एक उफान के बाद परिवर्तन की घुड़दौड़ समाप्त हो जाएगी?...? ऐसा कुछ किसी को भी नहीं सोचना चाहिए। दूरदर्शी आँखें देख सकती हैं कि इसके बाद ही नई घटा की तरह सहकार...
- इस तथ्य पर नये सिरे से विचार करना पड़ेगा कि शिक्षा के नाम पर ऐसे ही कुछ अगड़म-बगड़म चल रहा है या उसमें व्यक्तित्व को निखारने वाले, व्यावहारिक सभ्यता के ढाँचे ढालने वाले, प्रतिभा को प्रखर बनाने वाले लक्ष्यों का किसी स्तर तक समावेश बन पड़ रहा है?...? इन्हीं के आधार पर व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र को समुन्नत बनाने का अवसर मिलता है। यदि मानवीय गरिमा के ...
- इस प्रयोजन में किस मन:स्थिति और किस परिस्थिति का व्यक्ति क्या करे?...? इसका व्यावहारिक मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए शान्तिकुञ्ज में निरन्तर चलते रहने वाले नौ दिन के साध...
- इस स्वनिर्मित दुर्गति से पार निकलना कैसे हो?...? गिरना तो किसी के लिये भी सरल हो सकता है; पर उबरने और ऊँचा उठने के लिये मात्र अपने पुरुषार्थ से भी क...
- इसके लिए शुभारम्भ कैसे और कहाँ से हो?...? यह बिल्ली के गले में घण्टी बाँधने जैसा टेढ़ा प्रश्न है। इसके लिए आत्मदानी, प्रचण्ड साहस के धनी प्रा...
- उपलब्धि क्या हस्तगत हुई?...? यह देखना ही पर्याप्त नहीं? जाँचा यह भी जाना चाहिए कि उसका उपयोग लोकहित के लिए किस प्रकार और कितना ब...
- उसका पहला प्रश्न था—‘‘वीरता और क्रूरता क्या है?...? ’’‘‘त्रास से घिरे लोगों को बचाने, उनको सुख पहुँचाने हेतु अपने जीवन तक के मोह को तिलांजलि देकर जुट प...
- उसे पास बुलाया, पूछा—‘‘क्यों बहन, तुम इस धोती को धोती क्यों नहीं?...? इसके फटे हुए हिस्सों को सिल क्यों नहीं लेतीं?’’ प्रश्न ने उसके अतीत-वर्तमान को, आर्थिक अभावों को एक...
- ऋषि ने पूछा—‘‘कस्मै देवाय हविषा विधेम्’’ अर्थात् ‘‘हम किस देवता के लिये भजन करें’’?...? उसका सुनिश्चित उत्तर है—आत्मदेव के लिये। अपने आप को चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की कसौटियों पर खरा सि...
- एक धनी युवक ने एक बार ईसा से पूछा—‘‘प्रभु स्वर्ग के राज्य की प्राप्ति के लिए क्या करुँ?...? ’’ वे बोले—‘‘तुममें पवित्र आत्मा नहीं उतरी। यहाँ से जाकर जीवनोपयोगी वस्तुओं को छोड़कर शेष सारी सम्प...
- एक बन्दर द्वारा समुद्र छलाँग जाना, लंका जैसे सुदृढ़ दुर्ग को धराशाई बनाना, पर्वत समेत संजीवनी बूटी को अपने कन्धे पर लाद लाना, क्या सामान्य शरीरधारियों के बलबूते की बात है?...? गाँधी, शंकराचार्य, विनोबा, विवेकानन्द जैसों के कर्तृत्व भी ऐसे ही मानने पड़ते हैं। जिन्हें अलौकिक म...
- ऐसा क्यों हो रहा है?...? क्यों करना पड़ रहा है? इसके सम्बन्ध में एक बात बहुत जोर देकर कही जाती है कि मनुष्यों की जनसंख्या बे...
- ऐसी दशा में यदि दान शब्द का अर्थ धनदान के साथ जुड़ गया हो और फिर मनोविनोद तक के लिए किए जाने वाले अपव्यय को भी, खर्च की मद में लिखे जाने के कारण दान समझा जाने लगा हो, इसमें आश्चर्य ही क्या है?...? पूजा-पाठ में एक विधि पशुवध की भी सम्मिलित थी और उसे बलिदान कहा जाता था। हरिजनों को कभी जूठन दान दिय...
- कई रोग असाध्य या कष्टसाध्य समझे जाते हैं, पर ऐसा नहीं है कि उनका उपाय-उपचार हो ही न सकता हो?...? मनुष्य को अपने भाग्य का विधाता इसी दृष्टि से कहा गया है कि वह जहाँ भवितव्यता से प्रेरित रहता है, वह...
- कब किस दान की महिमा अत्यधिक बढ़ी-चढ़ी मानी जाती है?...? इस प्रश्न के उत्तर में एक ही बात कही जा सकती है, कि जब जिस विपत्ति का अत्यधिक प्रकोप हो, तब उसके नि...
- कहने का सारांश इतना ही है, आप नित्य अपनी अन्तरात्मा से पूछें कि जो हम कर सकते थे, उसमें कहीं राई-रत्ती त्रुटि तो नहीं रही?...? आलस्य-प्रमाद को कहीं चुपके से आपके क्रिया-कलापों में घुस पड़ने का अवसर तो नहीं मिल गया? अनुशासन म...
- कहने का सारांश इतना ही है, आप नित्य अपनी अन्तरात्मा से पूछें कि जो हम कर सकते थे, उसमें कहीं राई-रत्ती त्रुटि तो नहीं रही?...? आलस्य-प्रमाद को कहीं चुपके से आपके क्रिया-कलापों में घुस पड़ने का अवसर तो नहीं मिल गया? अनुशासन में...
- काम क्या करना पड़ेगा?...? यह निर्देश और परामर्श आप लोगों को समय-समय पर मिलता रहेगा। काम बदलते भी रहेंगे और बनते-बिगड़ते भी रह...
- काम क्या करना पड़ेगा?...? यह निर्देश और परामर्श आप लोगों को समय-समय पर मिलता रहेगा। काम बदलते भी रहेंगे और बनते-बिगड़ते भी रह...
- काम क्या करना पड़ेगा?...? यह निर्देश और परामर्श आप लोगों को समय-समय पर मिलता रहेगा। काम बदलते भी रहेंगे और बनते-बिगड़ते भी ...
- कार्य कैसे पूरा होगा?...? इतने साधन कहाँ से आएँगे? इसकी चिन्ता आप न करें। जिसने करने के लिए कहा है, वही उसके साधन भी जुटायेगा...
- कार्य कैसे पूरा होगा?...? इतने साधन कहाँ से आएँगे? इसकी चिन्ता आप न करें। जिसने करने के लिए कहा है, वही उसके साधन भी जुटाये...
- किन्तु उन अनगढ़ों को क्या कहा जाए जो चतुरता, विडम्बना और ठाठ-बाट की सज्जा के अतिरिक्त और किसी का लोहा मानने के लिए ही तैयार नहीं होते?...? बहुमत इसी विडम्बना का होने से, लोगों का झुकाव भी उन्हीं की ओर पाया जाता है। इसलिए तथाकथित लोकमत को ...
- किस प्रयोजन के लिए, किस अवसर पर, किस प्रकार, क्या संयम बरता जाय?...? यह निर्णय-निर्धारण व्यक्ति विशेष की परिस्थिति और मन:स्थिति को देखते हुए करना पड़ता है। जिसके जीवन क...
- किसी के पास तलवार होने का तात्पर्य यह तो नहीं कि वह कहीं भी कत्लेआम कर डाले?...? अतिरिक्त बुद्धिमत्ता का तात्पर्य यह तो नहीं हो सकता कि इसके सहारे संसार की सुव्यवस्था को बर्बाद करक...
- क्या ऐसा भी सम्भव है कि बालकों को लिखने की पट्टी पर मनके सरकाकर गिनती सिखाने, अथवा तीन पहिए की गाड़ी का सहारा लेकर चलना सिखाने की तरह, किन्हीं अभ्यासों के माध्यम से जनसाधारण को भी प्रतिभा सम्पादित करने की दिशा में अग्रसर किया जा सके?...? उत्तर हाँ में भी दिया जा सकता है। जनसामान्य शारीरिक अंग-अवयवों की पुष्टाई के लिए अखाड़े जाने की विध...
- खरे सोने की ही पूरी कीमत उठती है, भले ही उसे स्वर्ण विक्रेता की दुकान पर क्यों न ले जाया जाए?...? खोटे सिक्के हर जगह दुत्कारे जाते हैं, उनकी असलियत तो अन्ध भिखारी भी अनुमान लगाने भर से जान लेता है।...
- खुशहाली के वातावरण में रहने और चैन की जिन्दगी बिताने वालों को यह पता ही नहीं कि देशवासी किस स्थिति में रह रहे हैं और पड़ोसियों के प्रति जिम्मेदारी निभाने का क्या अर्थ होता है?...? यह जानकारी देशाटन से ही प्रत्यक्ष अनुभव में आती है।‘‘पिकनिक’’ मन हल्का करने का एक अच्छा मनोरंजन मान...
- खोजने पर ऐसे अनेकों सूत्र हाथ लग सकते हैं जो ज्ञानयज्ञ की, विचारक्रान्ति की, सत्प्रवृत्ति सम्वर्द्धन की, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिये कौन, क्या किस प्रकार कुछ कर सकता है?...? इसकी खोज-बीन करते रहने पर हर जगह हर किसी को कोई न कोई मार्ग मिल सकता है। ढूँढ़ने वाले अदृश्य परमात्...
- घर के सदस्यों के मन में अभी भी एक क्षीण आशा थी, कि शायद वह घर में बैठकर कुछ पूजा-पाठ करे?...? पर क्रान्तिकारियों का हर कदम अनूठा होता है। उसने भक्ति की नयी व्याख्या की। संसार और कुछ नहीं परमात्...
- चोट की मरहम पट्टी की जा सकती है, पर समस्त रक्त में फैले हुए ‘‘रक्त कैंसर’’ को मरहम पट्टी से कैसे ठीक किया जाए?...? एक दिन तो कोई किसी को मुफ्त में भी रोटी खिला सकता है, पर आए दिन की आवश्यकताएँ तो हर किसी को अपने बल...
- छप्पर फाड़कर कदाचित ही किसी के घर में स्वर्ण वर्षा हुई हो?...? दूसरों के सहारे, पराश्रित रहकर कदाचित् ही किसी ने गौरव भरा जीवन जिया हो? उत्तराधिकार में भी किसी को...
- जब विद्यातंत्र तिरोहित हो गया और उसके हर कोने पर उदरपूर्ति से सम्बन्धित शिक्षा ही कब्जा किए हुए हो, तब सद्ज्ञान के केन्द्रों का सञ्चालन एवं निर्माण कहाँ से बन पड़े?...? धर्मशालाएँ बनवाकर नाम कमाने वाले अधिक-से-अधिक इतना कर पाते हैं कि कोई मुफ्त दवा देने वाला औषधालय, स...
- जिन्हें पेट-प्रजनन की ही गरज है, जो लोभ, मोह और अहंकार से ऊँचे उठ सकने की आवश्यकता ही नहीं समझते, उनके सम्बन्ध में तो कहा ही क्या जाए?...? किन्तु जिन्हें कोई महत्त्वपूर्ण लक्ष्य प्राप्त करना है, उनके लिए एक ही उपाय है कि प्रसुप्त शक्तियों...
- तथाकथित प्रगति का विशालकाय सरंजाम जुट जाने पर भी, भयानक स्तर की अवगति का वातावरण क्यों कर बन गया?...? इसका उत्तर यदि गम्भीरता से सोचा जाए तो तथ्य एक ही हाथ लगेगा कि बुद्धि भ्रम ने ही यह अनर्थ सँजोए हैं...
- तप का स्वरूप क्या है?...? ताप-ऊर्जा द्वारा धातुएँ भट्ठी में पिघला कर अभीष्ट औजारों के रूप में ढाली जाती है। मिट्टी के बर्तन आ...
- तूफानों, भूकम्पों, विस्फोटों, आन्दोलनों का उद्गम कहीं भी क्यों ना रहा हो?...? जब वे गति पकड़ते हैं, तो व्यापक बनते चले जाते हैं। राजक्रान्तियों का सिलसिला इसी प्रकार चला था ...
- तो क्या सचमुच ही ऐसा है कि कुछ महत्त्वपूर्ण पाने के लिए, वैसा ही कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य किए बिना काम नहीं चल सकता?...? इस प्रश्न का प्रत्युत्तर दसों दिशाओं से गूँजते सुना जा सकता है कि ‘‘दो और पाओ’’, ‘‘बोओ और काटो’’, ‘...
- तो क्या सदा यही अपराध करने और प्रताड़ना सहने की क्रिया-प्रतिक्रिया चलती रहेगी?...? बात ऐसी नहीं है। न्यायकारी की कभी ऐसी नीति नहीं रही है। वह तभी तक धमकाता है, जब तक कि उद्दण्डता से ...
- दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे?...? विभूतियों को सही गलत तरीके से अर्जित कर लेना एक बात है और उनका सदुपयोग कर सकना सर्वथा दूसरी। सम्पद...
- दुर्व्यसनों की लत में लगे लोगों के पास भला पूँजी कहाँ?...? अगर होती भी है, तो धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। अगर वह किसी गरीब आदमी को लगे, तब तो उनके परिवार का ...
- दोनों ही रास्ते अनुपयुक्त दीखने पर प्रश्न यह उठता है कि इनके अतिरिक्त कोई तीसरा विकल्प भी है क्या?...? आस्तिकता और नास्तिकता के, श्रेष्ठता और निकृष्टता के बीच क्या कोई मध्य मार्ग भी है। वहाँ भी न करने क...
- धुलाई के बिना रँगाई निखरती कहाँ है?...? गलाई के बिना ढलाई किसने कर दिखाई है? मल-मूत्र से सने बच्चे को माता तब ही गोद में उठाती है, जब उसे न...
- नए समय के नए तर्क, अपराधियों-स्वेच्छाचारियों से लेकर हवा के साथ बहने वाले मनीषियों तक को समान रूप से अनुकूल पड़ते हैं और मान्यता के रूप में अंगीकार करने में भी सुविधाजनक प्रतीत होते हैं, तो हर कोई उसी को स्वीकार क्यों न करे?...? उसी दिशा में क्यों न चलें? मनीषी नीत्से ने दृढ़तापूर्वक घोषणा की है कि ‘‘तर्क के इस युग में पुरानी ...
- नदिया वापस लौटे; उनके जीवन का कायाकल्प देखकर, सभी आश्चर्यचकित थे—अरे यह क्या?...? एक दिन रास्ते में एक कोढ़ी दिखा, उपेक्षित, तिरस्कृत सभी मुँह मोड़कर चले जा रहे थे। चैतन्य को गुरुवा...
- परिवर्तन के साथ जुड़े हुए नये आयाम विकसित करने की आवश्यकता अब इतनी अनिवार्य हो गई है कि उसे अपनाने से कदाचित् ही कोई इन्कार करता हो?...? घड़ी का उपयोग करने से अब कदाचित् ही कहीं एतराज किया जाता हो? समय हर किसी को बाधित करता है कि युग-धर...
- पशु-पक्षियों को उदरस्थ करते रहने वालों के मन में यदि ऐसा कुछ सूझ पड़ा होता कि उन निरीहों की तरह हम इतनी भयंकर पीड़ा सहते हुए जान गँवाने के लिए बाधित किए गए होते, तो कैसी बीतती?...? उस छटपटाहट को निजी अनुभूति से जोड़ सकने वाला कदाचित् ही छुरी का निर्दय प्रयोग कर पाता।नारी पर प्रजन...
- पारस को छूकर लोहा सोना बनता भी है या नहीं?...? इसमें किसी को सन्देह हो सकता है, पर यह सुनिश्चित है कि महाप्रतापी-आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति असंख्यों क...
- पारस को छूकर लोहा, सोना बनता है या नहीं?...? इसमें अभी सन्देह है, पर यह सुनिश्चित है कि प्रतापी व्यक्ति असंख्यों को अपना अनुयायी-सहयोगी बना लेते...
- पूँजी क्या इसी आधार पर जमा होती है कि लिया अधिक और दिया कम जाए?...? संसार से हम आए दिन कितना लेते हैं, इसका बही-खाता रखने की किसी को भी फुरसत नहीं है। व्यवसाय के लिए ज...
- पूछा जाता है कि उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए क्या करना होगा?...? यदि प्रश्न का सही उत्तर अपेक्षित हो, तो वह एक ही हो सकता है— ‘‘दृष्टिकोण का परिवर्तन।’’ यों मन समझा...
- प्रश्न इन दिनों सर्वथा दूसरी प्रकार का है—सृजन और उन्नयन के लिए किसकी सद्भावना किस हद तक उभरती है?...? देखा जाना है—स्वार्थ के मुकाबले में परमार्थ सुहाता किसे है? ध्वंस करने वाले जिस प्रकार मूँछों पर ता...
- प्रश्न उठता है कि ऐसी विडम्बना क्यों कर बन पड़ी?...? अमीरों में जो दुर्गुण पाए जाते हैं, वे यहाँ जन-जन में विद्यमान हैं, किन्तु प्रगतिशीलों में जो सद्गु...
- प्रश्न फिर घूमकर वहीं आ जाता है, कि जब अधिकांश लोग अभावों से ग्रसित हैं और गरीबी की रेखा से नीचे रहकर दिन काटते हैं, तब दान-पुण्य की परम्परा चरितार्थ कैसे हो?...? इस प्रश्न में बालकों जैसी भोलेपन की झलक-झाँकी मिलती है। समझा जाता है कि धनदान ही एक मात्र दान है, क...
- प्रश्न यह नहीं है कि मीरा को सफलता कितनी मिली?...? अन्दर पीड़ा-पतन के बन्धनों को तोड़ने के लिए बेचैनी उठे, पग क्रियाशीलता की ओर बढ़े—यह इतनी बड़ी सफलत...
- फिर होगा क्या?...? उत्तर एक ही है—विचार परिवर्तन। करुणा से ओत-प्रोत भावसम्वेदना, व्यक्तियों में संयम और कार्यक्रम में ...
- ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर विंस्टन चर्चिल ने द्वितीय विश्व युद्ध के दिनों में, हारते हुए ब्रिटेन वासियों का मनोबल बढ़ाने के लिए एक नारा दिया था ‘‘विक्ट्री’’ अर्थात जीतना हमें ही है, चाहे शत्रु कितना ही प्रबल क्यों न हो?...? इस संकेत सूत्र का इतना प्रचार हुआ कि यह सुनिश्चित विश्वास का, विजय का एक प्रतीक बन गया। इस हुँकार न...
- भविष्य के सम्बन्ध में विचार करने पर भी दृष्टि इसी केन्द्र पर जमती है कि सूर्य शक्ति का अगले दिनों कितना और किस प्रकार उपयोग कर सकना सम्भव होगा?...? मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता ‘ऊर्जा’ पर अवलम्बित है। भोजन बनाने, ईंट, सीमेन्ट, रसायने विनिर्मित करन...
- भूतकाल के नारीरत्नों का स्मरण करके यह आशा बलवती होती है कि समय की पुनरावृत्ति कितनी सुखद होगी?...? कुन्ती के पाँच देव-पुत्र जन्मे थे। मदालसा ने योगी पुत्रों को व गंगा ने वसुओं को जन्म दिया था। सीता ...
- मन के छुपे रुस्तम का तो कहना ही क्या?...? वह यक्ष राक्षस की तरह अदृश्य तो रहता है, पर कौतुक-कौतूहल इतने बनाता-दिखाता रहता है कि उस व्यामोह मे...
- महाक्रान्ति के वर्तमान दौर में क्या हो रहा है?...? क्या होने जा रहा है? क्या बन रहा है? क्या बिगड़ रहा है? इसका ठीक तरह सही स्वरूप देख पाना सर्वसाधारण...
- महिला ने विचार किया कि जब मात्र छ: महीने ही जीना है, तो इस समय का श्रेष्ठतम उपयोग क्यों न कर लिया जाए?...? सोचते-सोचते वह इस निष्कर्ष पर पहुँची कि मेरी हैसियत तो ऐसी नहीं है कि ऐसी अनेकों मशीनें देश में लगा...
- मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन यापन कैसे किया जा सकता है?...? उसके साथ जुड़ी हुई मर्यादाओं का परिपूर्ण निर्वाह कैसे हो सकता है और वर्जनाओं से कैसे बचा जा सकता है...
- यह कहा जाता है कि अगले बारह वर्षों तक वर्तमान प्रक्रिया का संचालन करने के लिए हम जीवित न रहेंगे, तब इतनी बड़ी योजना का कार्यान्वयन कैसे होगा?...? इस सन्दर्भ में हर प्रश्नकर्ता को ध्यान में रखना चाहिए, कि हमारे द्वारा बन पड़े परमार्थों में ९९ प्र...
- यह किनसे बन पड़ेगा?...? उसका उत्तर महाकाल के शब्दों में ही मिल जाता है ‘‘जो अपने को तपे सोना जैसा खरा सिद्ध कर सके। चिन्तन,...
- यहाँ परिजनों के पिछले दिनों के योगदान का मूल्यांकन घटाकर नहीं किया जा रहा है, पर इतने भर से बात तो नहीं बनती?...? महाकाल की अभिनव चुनौती स्वीकार करने के लिए उतने पर ही सन्तोष नहीं किया जा सकता, जो पिछले दिनों हो च...
- यही वह भूल-भुलैयों का भटकाव है, जिसे तत्त्वदर्शी प्राय: मायाजाल कहते और उससे बच निकलने की चेतावनी देते रहते हैं, पर उस दुर्भाग्य को क्या कहा जाये, जो मूर्खता छोड़ने और बुद्धिमत्ता अपनाने की समझ को उगने-उठने ही नहीं देता?...? सुर दुर्लभ मनुष्य-जीवन की दु:ख भरी बर्बादी की यह पृष्ठभूमि है। आश्चर्य यह है कि शिक्षित, अशिक्षित, ...
- युग परिवर्तन का यही समय क्यों?...?...
- यों मन समझाने के लिए ऐसा भी कुछ सोचा जा सकता है कि प्रयत्न क्या करने होंगे?...? पदार्थों के सरंजाम जुटाने में किस प्रकार के प्रयास-परिवर्तन करने होंगे? उत्तर उन प्रश्नों के भी हो ...
- रंगमंच पर किस पात्र को क्या भूमिका निभानी है?...? इसका निश्चय पहले ही हो जाना है। पर्दा खुलने पर तो अभिनय की निर्धारित प्रक्रिया ही दुहरा भर लेने का ...
- रहस्य क्या है?...? यह खोजने की बात सामने आने पर भूतकाल की साक्षी और वर्तमान की दूरदर्शी विवेचना यही बताती है कि जन कल्...
- रात बेचैनी में कटी, वीरता और क्रूरता की व्याख्या उसके अन्तर को कचोटती रही तो क्या वह वीर नहीं है?...? फिर वीरता के लिए किया गया यह सब कुछ? प्रश्न शून्य में विलीन हो गया कोई उत्तर नहीं था।सुबह उठते ही उ...
- लक्ष्य और उपक्रम निर्धारित कर लेने के उपरान्त यह निर्णय करना अति सरल पड़ता है कि कौन अपनी मन:स्थिति और परिस्थिति के अनुसार, सम्पर्क परिकर की आवश्यकताओं को देखते हुए, किन क्रियाकलापों में हाथ डाले और प्रगति का एक-एक चरण उठाते हुए, अन्तत: बड़े-से-बड़े स्तर का क्या कुछ कर गुजरे?...? यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि व्यक्ति अपने प्रभामण्डल सम्पन्न क्षेत्र के साथ जुड़कर ही पूर्ण बनता ...
- लेने के देने क्यों पड़ रहे हैं?...?
2. विभीषिकाओं के पीछे झाँकती यथार्थता
3. महान् प्रयोजन के श्रेयाधिकारी बनें
4. सम्वेदना का सरोव...
- लोकमानस का यह लौह आवरण हटे बिना नारी को नर के समतुल्य बनाने और उन्हें अपनी प्रतिभा का परिपूर्ण परिचय देकर प्रगति पथ पर कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते रहने का अवसर आखिर कैसे मिल सकता है?...? आवश्यकता इस लौह आवरण के ऊपर लाखों-करोड़ों छेनी हथौड़े चलाने की है, ताकि निविड़ बन्धनों से जकड़ी आ...
- वहाँ उपस्थित वियोगी हरि ने पूछा, ‘‘आपने देखा है नन्द कुमार को?...? ’’ वह भाव-विह्वल हो बोल पड़े, ‘‘क्यों नहीं? नन्दकुमार का दर्शन तो मैंने कितने रूपों में किया है, आद...
- वास्तविकता, जिसे कैसे नकारा जाए?...?...
- विचारक्रान्ति के लिए साहित्य-सृजन एक कार्य है, पर उतने भर से प्रयोजन की पूर्णता कहाँ बनती हैं?...? तीन चौथाई अशिक्षित जनता के लिए विचार-परिवर्तन का आधार तभी बन पड़ेगा जब दृश्य और श्रव्य के सशक्त आधा...
- विचारणीय यह है कि क्या सिद्धान्त-रहित उपहार, मनुहार का लालची और किसी भी चाटुकार की सही-गलत मनोकामनाएँ पूरी करने वाला कोई परमेश्वर हो भी सकता है क्या?...? इस सन्दर्भ में किसी भी दृष्टिकोण से विचार करने पर उत्तर नहीं में ही देना पड़ता है; क्योंकि यह सिलसि...
- विज्ञान आगे भी अनर्थ पैदा करता रह सकेगा; ऐसी आशंकाएँ किसी को भी नहीं करनी चाहिए; क्योंकि खनिज तेल, विद्युत उत्पादन जैसे स्रोत ही सूख जाएँगे, तब विज्ञान जीवित कैसे रह सकेगा?...? लोगों को लौटकर फिर प्राकृतिक जीवन अपनाना पड़ेगा, जिसमें विकृतियों के अभिवर्धन की कोई गुंजायश ही नही...
- विज्ञान और प्रत्यक्षवाद ने क्या सचमुच हमें सुखी बनाया है?...?...
- विवाह की बात तय करने में अभिभावकों की मरजी ही क्यों चले?...? यदि लड़की को भी लड़कों के समान ही सुयोग्य बनाने के लिए अधिक समय तक शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करने का औच...
- वैभव किसका है?...? पराक्रम किसका है? विभूतियाँ किसकी हैं? इन सबका उत्तर देते समय नाम भगवान् का ही लिया जा सकता है, पर ...
- संकल्पित काम से निपटने के बाद साथियों के याद दिलाए जाने पर वह फिर डॉक्टरों के पास अपनी जाँच-पड़ताल कराने गई कि अब छ: महीने शेष वाली जिन्दगी किस स्थिति में है?...? डॉक्टरों ने उसका सारा शरीर जाँच डाला, पर उसमें कहीं कैंसर का नाम-निशान न था। वह हर दृष्टि से भली-चं...
- सक्रिय समर्पण कैसा हो?...?
6. संकल्प जागा तो निष्ठुर भी बदला
7. सम्वेदना चैन से नहीं बैठने देती
8. जब अन्त: में लौ जली ...
- सत्य और तथ्य को कैसे जाना, परखा जाए?...?...
- सद्बुद्धि का उभार कैसे हो?...?
15. इन दिनों की सर्वोपरि आवश्यकता
चेतना की सत्ता एवं उसका विस्तारइस संसार में जड़ के साथ चेतन ...
- समर्पण निष्क्रिय क्यों?...? आत्मचेतना की सघन भावनाओं का प्रत्येक अंश, मन की सारी सोच, शरीर की प्रत्येक हरकत जब विश्व-उद्यान को ...
- सहायता के लिए किसी के आगे हाथ न पसारने के पीछे कोई अहंकार प्रदर्शन का भाव नहीं रहा किन्तु यह एक प्रयोग परीक्षण था कि यदि भगवत् प्रयोजन के लिए कहीं से कोई प्रामाणिकता उभरे तो उसकी शक्ति और सम्पदा कितनी बढ़ जाती है?...? इसके लिए पुरातन उदाहरण हनुमानजी का है।...
- सृजेता की सृजन-प्रेरणा किस गति से चल रही है और उज्ज्वल भविष्य की निकटता में अब कितना विलम्ब है, इसकी जाँच-पड़ताल एक ही उपाय से हो सकती है कि कितनों के अन्त:करण में उस परीक्षा की घड़ी में असाधारण कौशल दिखाने की उमंगें उठ रही हैं तथा स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ अपनाना कितना अधिक सुदृढ़ होता चला जाता है?...? समय की सबसे बड़ी आवश्यकता ‘‘नवसृजन’’ के लिये सोच तो कोई कुछ भी सकता है, पर क्रियारूप में कुछ कर पड़...
- स्थिति को कैसे बदला जाये?...? इसके सम्बन्ध में तरह तरह के उत्पादनों, उपकरणों, निर्धारणों की बात सोची जाती है। वैज्ञानिक, मनीषी, स...
- स्वर्ग-मुक्ति, दिव्य-दर्शन आदि के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है और निराश भी रहना पड़ सकता है?...? पर सत्प्रयोजनों के लिए प्रस्तुत किया गया आदर्शवादी साहस व्यक्तित्व को ऐसा प्रामाणिक, प्रखर एवं प्रत...
- हम नहीं चाहते कि कोई हमें ठगे, पीड़ा पहुँचाए, निष्ठुरता बरते, असभ्यता बरते, फिर ठीक वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ हम अपनी ओर से क्यों करें?...? यदि हम दूसरों के स्थान पर होते तो हम किस प्रकार के बर्ताव की आशा करते? ठीक इसी कसौटी पर, हर प्रसंग ...
- ‘‘और अधिक स्पष्ट करें?...? ’’‘‘आपने मानव जीवन की विकृति को पहचाना, अब प्रकृति को और गहराई से पहचानिए, निदान मिल जाएगा। ’’‘‘क्य...
- ‘‘किस तरह के प्रयास किए?...? ’’‘‘मानवीय बुद्घि के परिमार्जन हेतु प्रयास। इसके लिए वैदिक मंत्रों का पुन: वर्गीकरण किया। कर्मकाण्ड...
- ‘‘कौन चुप रहे?...? नृशंस अथवा वह, जिसका रोम-रोम पीड़ा से चीत्कार कर रहा है?’’ बूढ़े ने विषैली हँसी हँसते हुए कहा—अपनी ...
- ‘‘क्या सचमुच आप शास्त्र का अर्थ जानते हैं?...? ’’सुनने वाले का अन्तर हिल उठा। पूछा, ‘‘क्या मतलब?’’‘‘बुरा न मानें—मेरा मतलब यह है कि आपकी ये व्याख्...
- ‘‘क्या है प्रकृति?...? ’’‘‘मनुष्य के सारे क्रियाकलाप अहं-जन्य हैं और बुद्धि-मन-इंद्रियाँ सब बेचारे इसी के गुलाम हैं। मानवी...
- ‘‘गौरी, गजनी, ऐबक ने भारत-भूमि को न जाने कितना कुचला?...? बख्तियार के अत्याचारों ने बंगाल को मसल दिया। आज जबकि मनुष्य का आत्म-विश्वास खो गया है। वह भूल गया ह...
- ‘‘तब तो अब कलिंग में महिलाएँ भर रह गई?...? ’’‘‘वह भी नहीं रहीं।’’‘‘क्यों?’’‘‘अन्तिम लड़ाई हमें उन्हीं से लड़नी पड़ी।’’ओह—कहकर वह किसी चिन्तन म...
- ‘‘तो अभी कौन-सा उजड़ा है?...? ’’‘‘बात नया घर बसाने की है।’’‘‘तो विवाह का मतलब घर बसाना है?’’‘‘हाँ।’’‘‘तो जब इतने घर उजड़ रहे हैं,...
- ‘‘तो जब इतने घर उजड़ रहे हैं, स्वयं भगवान का घर टूट-फूट रहा है, ऐसे में नया बसाने की बात सोचना कितनी मूर्खता है?...? जब बसाना ही है, तो इसी को क्यों न कायदे-करीने से बसाया जाए?’’घर वालों के पास उसका कोई उत्तर न था। उ...
- ‘‘तो विवाह का मतलब घर बसाना है?...? ’’‘‘हाँ।’’‘‘तो जब इतने घर उजड़ रहे हैं, स्वयं भगवान का घर टूट-फूट रहा है, ऐसे में नया बसाने की बात ...
- ‘‘पर आप व्यथित क्यों हैं?...? ’’ उन्होंने पास पड़े आसन पर बैठते हुए कहा—पीड़ा-निवारक को पीड़ा, वैद्य को रोग? कैसी विचित्र स्थिति ...
- ‘‘पर जब समस्याएँ बुद्धि की हैं, तो समाधान भी बुद्धि के होने चाहिए?...? कहते हैं, लोहे को लोहा काटता है।’’‘‘ठीक कहते हो, पर गरम लोहे को ठण्डा लोहा काटता है। दुर्बुद्धि दाह...
- ‘‘बुरा न मानें—मेरा मतलब यह है कि आपकी ये व्याख्याएँ बुद्धि-कौशल हैं, अथवा इनके साथ आपकी अनुभूतियाँ भी जुड़ी हैं?...? ’’सुनने वाला चुप था—आज पहली बार किसी ने उसकी बुद्घि को फटकारा था।‘‘गौरी, गजनी, ऐबक ने भारत-भूमि को ...
- ‘‘भावों का स्त्रोत खुले और अविरल बहता रहे, क्या इसके लिए कोई उपाय नहीं है?...? ’’‘‘है क्यों नहीं।’’‘‘क्या?’’‘‘स्वाध्याय और सत्संग। युगावतार भगवान् तथागत के चिन्तन को पियो। जिन्हो...
- ‘‘यह पुरुषों का काम है?...? ’’ ‘‘और नहीं तो क्या........?’’‘‘सही कहा जाए तो, यह महिलाओं का काम है।’’ ‘‘कैसे.............?‘‘भाव-...
- ‘‘सचमुच यही है निष्ठा?...? ’’‘‘हाँ तो ‘महाभारत’ का समुचित प्रभाव न देखकर यह सोच उभरी कि शायद, इतने विस्तृत ग्रंथ को लोग समयाभा...
- ‘‘सम्पत्ति की बात तो ठीक है, पर मैं स्वयं बूढ़ा हो चला हूँ, यदि अपने पुत्र को जन-चेतना को जगाने हेतु समर्पित कर दूँ तो?...? ’’‘‘अत्युत्तम विचार है!’’पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा ने पिता का बदला हुआ स्वरूप देखा था। देव...
- ‘‘स्वयं के जीवन का स्तर समाज के सामान्य नागरिक जैसा हुआ कि नहीं?...? यदि मन के किसी कोने में अभी वैभव को पाने का लालच, सुविधा-सम्वर्द्धन की आतुरता है; बड़प्पन जताने, रौ...
- ‘‘स्वयं सूटेड-बूटेड कुत्तों को मोटरों में घुमाने वाले और नौकरों को फटकारने वालों को आप लोग बड़ा कहते हैं?...? मुझे तरस आता है, आपकी समझ पर।’’ गाँधी जी का स्वर तीखा था। ‘‘यह आप नहीं, आपके अन्दर की हीनता बोल रही...
- ‘‘हाँ क्यों नहीं?...? ’’ आचार्य की वाणी में मृदुलता थी। ‘‘पर किस तरह?’’ अब वाणी में उल्लास था। ‘‘अन्दर के दिव्यभावों को ज...
- ‘‘हाँ तो ‘महाभारत’ का समुचित प्रभाव न देखकर यह सोच उभरी कि शायद, इतने विस्तृत ग्रंथ को लोग समयाभाव के कारण पढ़ न सके हों?...? इस कारण ब्रह्मसूत्र की रचना की। सरल सूत्रों से जीवन-जीने के आवश्यक तत्त्वों को सँजोया। एकता-समता की...
- ’’ उन्होंने पास पड़े आसन पर बैठते हुए कहा—पीड़ा-निवारक को पीड़ा, वैद्य को रोग?...? कैसी विचित्र स्थिति है?’’ ‘‘विचित्रता नहीं, विवशता कहिए। इसे उस अन्तर्व्यथा के रूप में समझिए, जो पी...
- ’’ जैसे कुछ सोचते हुए देवर्षि ने कहा—आपने प्रयास नहीं किए?...? ’’ ‘‘प्रयास!......प्रयास किए बिना भला जीवित कैसे रहता। जो भटकी मानवता को राह सुझाने हेतु प्रयत्नरत ...
- ’’ प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या?...? विश्वास हुआ—सचमुच ये मुरदे हैं। उन्होंने कोढ़ी को उठाया, घाव धोए, औषधि लगाई। सेवा कार्य के साथ ही, ...
- ’’ वह भाव-विह्वल हो बोल पड़े, ‘‘क्यों नहीं?...? नन्दकुमार का दर्शन तो मैंने कितने रूपों में किया है, आदिवासियों एवं हरिजनों के गोकुल में।’’नन्द कुम...