स्वर्ग का जीवन कैसे जियें?

कल आपको जीवन मुक्ति के बारे में बताया था। आप जीवन मुक्त होकर जिओ, बन्धनों से मुक्त हो जाओ। बच्चा माँ के पेट में बँधा रहता है, बाहर निकलता है तो कितना खुश और कैदी जेल खाने से छूट जाता है तो कितना खुश और पक्षी पिंजरे में से छूट जाता है तो कितना खुश। मुक्ति का आनन्द ऋषियों ने बताया है आदमी की जिन्दगी में सबसे बड़ा आनन्द है, मुक्ति का। स्वछन्द जीवन जी सकता हो, स्वाधीनता का अनुभव कर सकता हो, तो क्या कहने का। कल मैंने आपको लोभ और मोह और अहंकार के बारे में ये कहा था आपके सारे दुश्मन ये हैं और जिनको आपने छाती से लगा रखा है, जिनको मित्र बना रखा है, जिनके इशारे पर आपने जिन्दगी का गुजारे का फैसला कर रखा है, आप इन तीनों का तिरस्कार कीजिए, इनके चंगुल से छूट जाइये। कल मैंने ये कहा था।

आज आपको एक नई बात बताता हूँ कि आपको स्वर्गीय जीवन जीना चाहिए। आप स्वर्ग का जीवन जी सकते हैं, निश्चित रूप से आप स्वर्ग का जीवन बनने में कोई आपको दिक्कत नहीं है। स्वर्ग आपका बनाया हुआ है, स्वर्ग आपका बिगाड़ सकते हैं, स्वर्ग आप बना सकते हैं, स्वर्ग आप बिगाड़ सकते हैं। एक हाथ में आपके (में) स्वर्ग है, एक हाथ में आपके (में) नरक है। आप चाहें तो स्वर्ग (को) को खोल लीजिए, और उसको सामने देखिए और मजा उड़ाइये। अगर आपकी इच्छा है कि हम नरक को जिएँगे, आपकी इच्छा से और बिना इच्छा से नरक का इस्तमाल कीजिए और नरक में फँस जाइये। आपकी बिल्कुल मर्जी की बात है। भगवान ने हर आदमी को स्वाधीन बनाया है, इस योग्य बनाया है कि वो नरक और स्वर्ग में से जिसको भी वरण करना चाहे खुशी से कर सके।

तब क्या करना चाहिए आपको? आपको एक काम करना पड़ेगा। इस दुनिया में (स) सबसे बड़ी दिक्कत ये पड़ती है कि आदमी अपनी बहुत सारी इच्छाएँ लिए बैठा रहता है, और इच्छाएँ अगर पूरी नहीं होती हैं तब, तब दु:खी होता है। आदमी की जिन्दगी साठ फीसदी दुख इस बात का है कि उसने तरह-तरह की कल्पनाएँ कर रखी हैं, तरह-तरह की कामनाएँ कर रखी हैं और कल्पना और कामनाओं के पूरा न होने पर वो हैरान होता है, दुखी होता है, मानसिक दुख बहुत हैं। आदमी के शारीरिक दुख तो कभी-कभी होते हैं। खाने-पीने को न मिले शारीरिक दुख, हारी बीमारी हो जाये शारीरिक दुख, बस और क्या दुख है बताइये, कोई दुख नहीं, खाने पीने की कमी है क्या? नहीं, कुछ कमी नहीं, आप सऊर से रहें भले आदमी के तरीके से तो बीमारी भी नहीं आये। बीमारी आयें भी तो ऐसी बीमारी तो कदाचित ही कभी आती हैं जिसमें की आदमी बेचैन हो जाता हो। कभी बवासीर हो गया, कोई और, चलते रहते हैं ये भी चलते रहते हैं।

आदमी का दु:ख एक है - आदमी ने बड़ी-बड़ी कल्पनाएँ, बड़ी-बड़ी मनोरथ, और बड़ी-बड़ी महत्त्वाकांक्षाएँ भौतिक बना रखी हैं, और वो पूरी नहीं हो पातीं। पूरी होना जरूरी हैं, नहीं, बिल्कुल जरूरी नहीं हैं। क्योंकि ये परिस्थितियाँ जरूरी नहीं हैं कि आपके लिए दुनिया थोड़ी बनी है। आपकी परिस्थितियों से ही तो (अपना) (ल) मनोकामना पूरी कर सकेंगे। दूसरे आदमी सहयोग देंगे, तभी तो बात बनेगी। वातावरण आपके अनुकूल होगा, तभी तो बात बनेगी। वातावरण आपके अनुकूल बने कोई गारण्टी है? परिस्थितियाँ आपके अनुकूल बन जाएँ कोई गारण्टी है? फिर, आपकी मनोकामनाएँ पूरी हो जाएँ कोई जरूरी है? मनोकामना पूरी नहीं हो पाती, इसलिए आदमी आमतौर से दुखी रहते हैं। तो क्या करना चाहिए? आपको स्वर्गीय जीवन जीने के लिए मनोकामना एक केन्द्र पर आगे कर लीजिए, पीछे हटा लीजिए - क्या परिणाम मिलेगा, इसको आप मत सोचिए। फिर - फिर आप ये सोचिए कि हमारे फर्ज़ और कर्तव्य, जो हैं, वो हम पूरा करते हैं कि नहीं करते। आप फर्ज़ और कर्तव्यों को गौर कीजिए, और (फ) फर्ज़ और कर्तव्य का पालन किया कि नहीं किया, सिर्फ इसी बात के ऊपर अपनी खुशी मयस्सर कर लीजिए। हमने अपना कर्तव्य पालन किया - खुश। हमने अपने बच्चे को शुद्ध बनाने के लिए प्रयत्न किया - खुश। हमको अपने माँ-बाप के प्रति जो करना चाहिए था वो किया खुश। आप खुशी क्यों नहीं दे सकते, अपनी मुट्ठी में क्यों खुशी नहीं रख सकते? दूसरों के हाथ में क्यों बेच देते हैं। बेटा आपका सुपात्र बनेगा, आपका आज्ञाकारी होगा, तब आप खुश होंगे। और न हुआ तब, आपने गिरवी रख दी न खुशी दूसरों के हाथ में। आपको बीवी, बीवी आपकी हँसी-खुशी से रहेगी और आपकी आज्ञा पालन करेगी और आपकी मर्जी से चलेगी और नहीं चली तब। तब आपने बेच दी न आपनी खुशी, अब नाराजी में फिर रहे हैं।

परिस्थितियों के ऊपर मत गुलाम होइए। अपनी मन:स्थिति पर केन्द्रित हो जाइए और केन्द्रित हो कर के सारे संसार भर में सिर्फ एक खुशी का अपना केन्द्र बना लीजिए, कि हमको अपने फर्ज़ और कर्तव्य पालन करने हैं। फर्ज़ और कर्तव्य का पालन करने का अगर आपका मन होगा और मर्जी होगी, तब फिर क्या हो जाएगा? फिर मजा हो जाएगा। फिर क्या हो जाएगा? फिर बहुत कुछ हो जाएगा, बहुत कुछ हो जाएगा, अपने फर्ज, फर्ज में कोई रोक नहीं सकता। आप अपने मित्रों के प्रति कर्तव्यों को निभायें इसमें कोई रोकता है क्या? मित्र आपके प्रति बदला चुकायेंगे कि नहीं ये बात सोचेंगे तब गड़बड़ हो जायेगी। आप ये उम्मीद मत कीजिए कि आपके मित्र बदला चुकायेंगे, आप ये उम्मीद मत कीजिए कि आपके बच्चे कहना मानेंगे, आप अपनी ये उम्मीद मत कीजिए कि हमारी स्त्री आज्ञानुसारिणी बनेगी, आप ये उम्मीदें मत कीजिए जैसे हमने ख्वाब सँजो रखे हैं उसी तरीके से हमारे सपने पूरे हो जाएँगे, न ऐसा मत कीजिए।

तब, क्या करें? आप सबकी ओर से समेट करके जो बात आपके हाथ में है और जो मुट्ठी में है, उस पर केन्द्रित हो जाइये। परिस्थितियाँ आपके (मन के) हाथ में नहीं हैं, दूसरे लोग आपके साथ में क्या सुलूक करेंगे इसकी कोई गारण्टी नहीं, फिर आप सिर्फ अपनी खुशी को उन बातों में मत मयस्सर करिये, नहीं तो दुखी हो जायेंगे आप। सुखी होने का एक ही तरीका है कि हम अपने कर्तव्य और फर्ज हम कहाँ तक पूरा कर सकते हैं और हमने पूरे किये कि नहीं किये, बस खतम हो गई बात। इसको कर्मयोग कहते हैं। अगर आप (कर्तव्य) कर्मयोगी बन जाएँ, और ड्यूटी और फर्ज़ को ही पर्याप्त मान लें, और अपनी ड्यूटी हमने ठीक तरीके से अंजाम दी इसीलिए हमको खुश होने का हक है, और हमको सन्तोष करने का हक है, अगर आप ये बात मान लें, तो आप देखेंगे कि आपने केन्द्र-बिन्दु बदल दिया, खुशी का केन्द्र-बिन्दु बदल दिया, और आपको चौबीसों घण्टे मुस्कुराते रहने का, और हँसते रहने का, और प्रसन्न रहने का पूरा अवसर मिल गया।

आपको कर्म योगी होना ही चाहिए। आपको अच्छी से अच्छी उम्मीदें करनी चाहिए और बुरी से बुरी बात के लिये तैयार रहना चाहिए। कोई जरूरी है क्या, जो आप चाहते हैं वो ही हो जाएगा, नहीं उलटा हो गया तब, उलटा भी होता रहता है। आपको मालूम नहीं है पंजाबियों का, पंजाब से जब बँटवारा हुआ था तब वहाँ बिचारे कितने मालदार आदमी थे और एक सप्ताह के भीतर परिस्थितियाँ उलट गईं और किसी का बच्चा मर गया, किसी का क्या हो गया, किसी का धन छिन गया, भाग करके इधर आ गये। फिर ये परिस्थितियाँ आपके लिए नहीं होंगी क्या? आपके लिए भी हो सकती हैं। इसलिए आप अच्छी से अच्छी उम्मीदें कीजिए, अपने भविष्य के लिए सुनहरे सपने देखिये, हमको अच्छा भविष्य बनाना है, अच्छा भविष्य बनाना है लेकिन आप साथ-साथ में इसके लिए भी तैयार रहिये, ठीक उलटा हो जाए तब, तब उसके लिए भी तैयार। अपनी लड़की की शादी अच्छे से घर में कीजिए, अच्छे घर में ढूँढ़ दिया अब उम्मीद कीजिए कि आपकी लड़की का गृहस्थ अच्छा व्यतीत होगा, और आप उम्मीद रहिये और आप इसके लिए भी तैयार रहिए कि जिस लड़के को आपने शादी की है लड़का नाकारा निकल गया तब, चोर निकल गया तब, दुष्ट निकल गया तब, तैयार होइये, लड़की को पहले से इस बात के लिए आगाह रखिये। ये भी हो सकता है इस घर में तुम्हारा सम्मान हो और तुम्हारी जिन्दगी आसानी से कट जाये, सपने भी दिखाइए, लेकिन ये तैयारी भी रखिये, ये हो सकता है इस घर की परिस्थितियाँ ऐसी विकट हों, और ऐसे दकियानूस लोग हों, ऐसे चोर-चाण्डाल हों कि वो सब हैरान कर डालें तब। उसके लिए भी तैयार रहिए, मुकाबला के लिए तैयार रहिये, उस स्थिति में आप क्या करेंगे? ये भी कल्पना कीजिए। यानि कल्पना में कहने का अर्थ ये है, भविष्य के बारे में न केवल सुनहरा सपना देखिये, बल्कि बुरी से बुरी बात के लिए तैयार भी रहिए। अगर ये सब आप मान लेते हैं तो मैं आपको कर्मयोगी कहूँगा, मजा आ जायेगा। एक, आपकी खुशी का अर्थ है।

एक और खुशी का दूसरा वाला प्वाइंट है, जिसको हम स्वर्ग कहते हैं। कर्मयोगी को मैं स्वर्ग में निवास करने वाला कहता हूँ। जिसको अपने फर्ज़ की बात याद रहती है, मैं स्वर्ग का निवासी देवता कहता हूँ। और, देवता का एक और लक्षण है - क्या लक्षण है? देवता अकेले नहीं खाते हैं, अकेले नहीं खाते हैं, अकेले नहीं खाते हैं, मिल-बाँट के खाते हैं। अगर आपके पास कोई चीज़ है, तो आप मिल-बाँट के खाइए। ज्ञान आपके पास है - उसका फायदा औरों को मिलने दीजिए। आपके पास पैसा है तो मिल बाँट कर खाइये, आपके पास स्वास्थ्य है तो मिल बाँट कर खाइये, हर एक को फायदा उठाने दीजिए, अपनी सम्पदा को बाँट के खाइये और दूसरों की मुसीबतों को बँटा लीजिए। देवता यही काम करते हैं। देवता देखे हैं न आपने, देवता के अन्दर ये ही गुण होता है। देवता को पुकारते हैं, हे भगवान जी हमारी सहायता कीजिए, गणेश जी हमको बुद्धि दीजिए, लक्ष्मीजी हमको पैसा दीजिए, उनका स्वभाव है, क्या स्वभाव है? देते रहते हैं। देते रहते हैं - क्या मतलब? देते रहने का मतलब ये है कि अगर उनके पास कोई चीज है, तो लोगों को बाँटते रहते हैं, और लोगों की मुसीबतों (को) में हिस्सा बँटाते रहते हैं। हमको बुखार आ गया, हम बीमार हैं, हे हनुमानजी हमारे बुखार को दूर कर दीजिए, करते हैं कि नहीं करते बात अलग है, पर आपकी मान्यता तो ये ही है न आपके दुखों में हिस्सा बटाँएगे, आपकी मुसीबत को दूर करेंगे, आपकी कठिनाइयों को ठीक कर देंगे और उनके पास (अ) कोई ज्ञान है, विद्या है, बुद्धि है, तो आपको देंगे। देवता इन्हीं दो वजह से (दे) देवता हैं। आपकी मुसीबतों में हिस्सा बँटाते हैं - एक; और, अगर उनके पास कोई (वैभ) वैभव है, तो आसानी से बाँट देते हैं। बस, उस आदमी का नाम देवता है जो दूसरों की मुसीबतें बँटाता है, उस आदमी का नाम देवता है जो अपनी सुविधाएँ और अपनी सम्पदाओं को मिल-बाँट के खाता है।

मिल-बाँट के खाने का मजा देखा है आपने। इक्कड़, इक्कड़, इक्कड़ जो अकेला ही खाता रहता है, पाप खाता रहता है, जो अकेला ही संचय करता रहता है, वो आदमी पाप संचय करता रहता है, जो अकेले की खुशी चाहता है वो आदमी पाप संचय करता है। इसीलिए हमारे यहाँ एक संयुक्त कुटुम्ब की प्रणाली है। सब मिल-बाँट के खायेंगे, मिल-जुल के रहेंगे, हिल-मिल के खायेंगे, कमाने वाला कमाने वाला स्वयं थोड़े ही खाता है सब मिल-बाँट कर खा लेते हैं। कोई बच्चा है, कोई बीमार है, कोई बुड्ढा है, बस ये जो पारिवारिक वृत्ति है, है न, इसमें, इसमें वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता जुड़ी हुई है। वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता क्या है? आत्मवत् सर्वभूतेषु। आत्मवत् सर्वभूतेषु क्या है? एक ही है - (आप) आप दूसरों की मुसीबत में हिस्सेदार हो जाइए - एक; और अपनी सुविधाओं को बाँट दीजिए - हो गया आत्मवत् सर्वभूतेषु - और हो गया वसुधैव कुटुम्बकम्। ये सारे सिद्धान्तों का निर्वाह इसी तरीके से होता है। इसीलिए आपके कार्य पद्धति में और आपके चिन्तन में ये बातें जुड़ी रहनी चाहिए कि हम किस तरीके से मिल बाँट के खायेंगे और दूसरों की मुसीबतों में किस तरीके से हाथ बँटाएँगे। इसीलिए आपको अपना स्व, संकीर्ण स्व जो आपने कूप-मण्डूक की तरीके से सीमित कर रखा है फिर आप उसको विशाल बना देंगे, आप सबके हो जायेंगे सब आपके हो जायेंगे, देवता आप हो जायेंगे, आपको स्वर्ग आ जायेगा। अगर आप ये स्वर्ग नहीं खरीद सकते, अगर आपने सीमा बन्धन- सीमा बन्धन, अपना ही खाना, अपना ही पहनना, अपना ही पैसा, अपना ही बेटा, अपना ही यश, अपना ही नाम करते रहेंगे, आप बहुत छोटे आदमी रहेंगे, जलील आदमी रहेंगे, और आपको नरक में रहने वाले को ये यातनाएँ भुगतने पड़ती हैं, मानसिक दृष्टि से वो सारी यातनाएँ भुगतनी पड़ेंगी। शारीरिक दृष्टि से ठीक है ये हो भी सकता है कि आप कुछ खाने-पीने का सामान इकट्ठा कर लें, कुछ पैसा इकट्ठा कर लें, लेकिन आप दुखी रहेंगे, आप दुखी रहेंगे। क्या करना चाहिए?

आपको एक और काम करना चाहिए - कौन (सी)? खिलाड़ी की जिन्दगी जीनी चाहिए। खिलाड़ी की जिन्दगी आप जिएँ। खिलाड़ी (न) हारते भी रहते हैं, जीतते भी रहते हैं। जीतते भी रहते हैं, टीम बना कर खेलते हैं, हार गया, ऐ हार गया तो क्या? और पत्ता खेलते रहते हैं न, ताश खेलते रहते हैं, शाह कट गया, आ, बेगम कट गई, ओहो गुलाम भी कट गया, सब कट गये, चेहरे पर कोई शिकन ही नहीं, आप चेहरे पे शिकन मत आने दीजिए। चिन्ताओं (को), और मुसीबतों की कल्पनाएँ करके, सन्देह करके, और भविष्य की आशंकाएँ करके, हर समय (आपको) दिल धड़कता रहता है। आप निश्चिन्त रहिए, निर्द्वन्द्व रहिए, हँसते रहिए, मुस्कराते रहिए - आप हँसते और मुस्कराते रहेंगे, और निश्चिन्त रहेंगे, तब, (और) खिलाड़ी की तरीके से जिन्दगी जिएँगे, तब, तब फिर आपको मैं देवता कहूँगा। ये नाटक है, आप इसके पात्र हैं, दुनिया में आपको एक नाटक अदा करना है। आप नाटक की तरीके से, एक नट की तरीके से तमाशा कीजिए, लोगों को मनोरंजन करने दीजिए। लेकिन आप एक निश्चिन्त हो करके, राजा जनक की तरीके से अपनी मनःस्थिति को बनाये रखिये। फिर में आपको स्वर्ग में निवास करने वाला कहूँगा, स्वर्ग में निवास करने वाला कहूँगा।

भूत का चिन्तन मत कीजिए, पिछला जो घटनाएँ हो गईं तो ठीक है, आपने अच्छे काम कर लिये तो बार-बार प्रशंसा करने की जरूरत क्या है? और आपने आपके साथ में किसी ने कोई बुराई कर ली या किसी ने दुख भुगत लिये बार-बार (करने की) कहने की जरूरत क्या है? भूत सो भूत, गया सो गया। आप भूत पर मत विचार कीजिए, भूत से आप अनुभव तो इकट्ठा कर सकते हैं लेकिन चिन्ता भविष्य की कीजिए, करना हमको क्या है, करना हमको क्या है, ये सोचते रहेंगे तो फिर मजा आ जाएगा। बुड्ढे आदमी भूतकाल का वर्णन करते रहते हैं, बच्चे भविष्य की बात सोचते रहते हैं, लेकिन जवान आदमी वर्तमान की बात सोचते रहते हैं। आपको वर्तमान क्या करना चाहिए? आज का दिन आप किस तरीके से बेहतरीन बना सकते हैं - अगर ये विचार आपके जी में आ जाएँ, फिर मैं आपसे ये कहूँगा कि आप स्वर्ग में (के) निवास करने वाले आदमी हैं। भविष्य की क्यों अनावश्यक कल्पना करेंगे? योजना बना लीजिए। योजना बनाना कोई नहीं है, लेकिन महत्त्वाकांक्षा बात अलग है, योजना बात अलग है। हमको एम.ए. करना है तो आप स्कीम बनाइये। एम.ए. नहीं हुए तो मर जाएँगे, एम.ए. नहीं हुए तो नाक कट जाएगी, एम.ए. नहीं हुए तो बात बिगड़ जाएगी, क्या बात बिगड़ जाएगी? दुनिया में बिना पढ़े भी तो हैं। आप मैट्रिक पास रह गये तो क्या आफत आ गई। नहीं साहब हमारा ये हो जाएगा, हमारा ये हो जाएगा, ऐसे विचार करते रहेंगे तो मैं आपको नरकगामी कहूँगा। स्वर्ग में रहने वाले, स्वर्ग में रहने वाले अपने वर्तमान का ध्यान करते हैं, भविष्य की तैयारी करते हैं, भूतकाल को भूल जाते हैं, और खिलाड़ी की तरह जिन्दगी जीते हैं। अपने जीवन के तरीके - तौर तरीकों में ऐसा मौलिक परिवर्तन आप करके जाइए यहाँ से।

और क्या काम करें, आप एक और काम कीजिए, लोगों से ये दुनिया बड़ी खराब है, बड़ी जलील है, इसमें अच्छाई भी है, भगवान का रूप भी है ये तो मैं नहीं कहता भगवान का रूप नहीं है। इसमें कमियाँ कम हैं क्या, बुराइयाँ कम हैं क्या। एक से एक दुष्ट, एक से एक बेईमान दुनिया में भरे पड़े हैं। तो क्या करें फिर? दुष्टों के प्रति द्वेष, न बेटे द्वेष करेगा तो आप ही जल जाएँगे। ईर्ष्या, ईर्ष्या से भी आप जल जाएँगे। प्रतिशोध, प्रतिशोध से भी आप जल जाएँगे। इससे आप सामने वाले का जितना नुकसान करेंगे उससे ज्यादा अपना नुकसान कर लेंगे। एक तो दूसरे आदमी ने आपको नुकसान पहुँचाया - नुकसान नम्बर एक; और एक, आपने फिर नई बीमारी शुरू (और अ अभी) और कर ली - डाह की, ईर्ष्या की, प्रतिशोध की, घृणा की - ये सारी की सारी चीज़ों को आप बनाए रखेंगे, फिर आप कैसे जिएँगे, बताइए न। - बाहर से भी पिसेंगे और भीतर से भी पिसेंगे तो आप मरेंगे नहीं? आप ऐसे मत करना। आप, आप क्या करें? फिर बुराइयों को बर्दाश्त करें। नहीं, नहीं ये तो नहीं कहता, बुराइयों को बर्दाश्त करें।

आप बुराइयों से संघर्ष जरूर कीजिए। फिर संघर्ष करने का दूसरा तरीका है। कौन सा? वो तरीका है जो कि डाक्टर अख्तियार करता है, किस के लिए मरीज के लिए। मरीज के रोगों को मार डालने के लिए हर चन्द कोशिश करता है कि रोग बचने न पाये, विषाणु बचने न पाये, रक्त की प्रदूषण बचने न पाये, लेकिन रोगी को नुकसान न होने पावे। आप रोगी को (बिना) नुकसान पहुँचाए बिना, उसकी बुराइयों को दूर करने के लिए बराबर जद्दोजहद करिए। जब आप किसी व्यक्ति विशेष को हानि पहुँचाने की बात सोचते हैं, तो वो द्वेष हो जाता है; और आप उसके दोषों को, दुर्गुणों को, कमियों को हटाने की बात सोचते हैं तब, तब फिर कोई दिक्कत नहीं पड़ती। तब कोई दिक्कत नहीं पड़ती, आप ऐसे कीजिए न। आप ऐसे करेंगे तो आप देखेंगे कि आपको स्वर्ग में रहने वाले देवताओं की बिरादरी में शामिल होएँगे।

आपको एक और काम करना चाहिए - आपको आत्मनिर्भर होना चाहिए - अपने ऊपर डिपेन्ड (depend) कीजिए। अपने ऊपर (नि) निर्भर कीजिए। क्या करें? बाहर के आदमियों से मत उम्मीदें कीजिए, मत विश्वास कीजिए, मत अविश्वास कीजिए। आप ये मान कर चलिए ये आदमी है। आदमी सो आदमी, आदमी सो आदमी। अपने ऊपर निर्भर रहिए। आप ये मान कर चलिए कि उन्नति करेंगे तो हम ही करेंगे। किसी आदमी से आप ये आशा लगाये बैठे हैं, वो आदमी आपकी सहायता करेगा। क्यों आपकी सहायता करेगा? ‘‘आस बिरानी जो करे, जीयत ही मर जाये”, ये इतिहास की कथा है। अब ठीक है वक्त मिल जायेगा तो सहायता मिल भी सकती है, नहीं भी मिल सकती है। पर जो भी आप कदम उठायें अपने पैरों पर मदद करके उठायें। उम्मीद ये करें - ये काम हमको करना है, और हम ही करेंगे। हमें ये काम करना है, और हम ही करेंगे। अगर आपका ये आत्मविश्वास है तब, तब फिर आपको आत्म-निर्भर व्यक्ति कहा जाएगा। और देवता आप से कहा जाएगा, देवता कहा जाएगा।

देवता आत्मविश्वासी होते हैं और आत्मनिर्भर होते हैं किसी पर डिपेण्ड नहीं करते। सूरज किसी पर डिपेण्ड नहीं करता, कि हमको कोई आदमी चढ़ाएगा कि नहीं चढ़ाएगा। हवा किसी पर डिपेण्ड नहीं करती, किसी की किसी की अपेक्षा नहीं करती, चन्द्रमा किसी की अपेक्षा नहीं करता, जमीन किसी की अपेक्षा नहीं करती, और आप किसी की अपेक्षा मत कीजिए। इसका अर्थ ये नहीं है कि आप सहयोगी जीवन न जीयें, परस्पर मिलना-जुलना न करें। पर आप ये उम्मीद बनाए रहेंगे, अमुक आदमी ये करेगा। जैसे आप परिस्थिति के बारे में ये अनुमान लगाते थे, परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल हो जाएँगी। नहीं हुई तब। तब आप झल्लाते हैं, रोते और खीजते हैं। और किसी व्यक्ति ने (अपने) आप के साथ में ऐसा न किया तब, बदला नहीं चुकाया तब, सहायता न की तब, तब फिर आप झल्लायेंगे कि नहीं झल्लायेंगे, मत झल्लाइए। कोशिश कीजिए शायद दूसरों का सहयोग मिल जाये, जिस सीमा तक सहयोग मिल जाये उस सीमा तक ठीक। नहीं मिल जाये तो नहीं भी सही। नहीं भी सही, ये मान कर चलेंगे तो आपकी खीज जो मनुष्य के जीवन की बहुत बड़ा दुख है, बहुत बड़ा संकट है, खीज से आप बच जायेंगे, खीज से बच जायेंगे। खीज से तो बचिए। खीज से बचने में क्या दिक्कत है। आप अपना दृष्टिकोण बदल दीजिए न।

अगर आप दृष्टिकोण बदल लेते हैं, तो मैं स्वर्ग का रहने वाला कहूँगा। विधेयात्मक चिन्तन, विधेयात्मक चिन्तन, ये क्या है? ये वो चिन्तन है जिससे की आदमी देवता बन जाते हैं। क्या बनायेंगे, क्या बिगाड़ेंगे विचार ही मत कीजिए। अमुक को क्या नुकसान पहुँचायेंगे, ये मत कीजिए। खराब आदमी है इसको हम अच्छा बनायेंगे, सज्जन बनायेंगे ये क्यों नहीं सोचते? खराब आदमी है। अमुक को मार डालेंगे, हत्या कर डालेंगे, ये क्यों सोचते हैं? ये मत सोचिये। आप दृष्टिकोण को बदलिये न। जो कुछ भी आपके पास मिला हुआ है वो कम नहीं है, बहुत मिला हुआ है। आपके प्रसन्न होने के लिए, हँसने के लिए, हँसाने के लिए ये क्या कम है? आपको इन्सानी जिन्दगी मिली हुई है। आप देखिये न जरा, दूसरे जानवरों को देखिये, कीड़े मकोड़ों को देखिये न, पशु पक्षियों को देखिये न, कैसी घिनौनी और कैसी गई बीती, और कैसी छोटी जिन्दगी व्यतीत करते हैं फिर आप, आप क्यों ऐसी जिन्दगी जीयेंगे? भगवान ने तो आपको राजकुमार बनाया है न, आपको बुद्धि दी है न, आपको वाणी दी है न, आपको हाथ-पाँव दिए हैं न, आपकी शादी हो गई है न, आप तो घर में रहते हैं न, आपको जीविका है पहली तारीख को तनख्वाह मिल जाती है, रोटी खा लेते हैं न। दूसरों को जानवरों को देखिये, उन बिचारों को न कोई तनख्वाह है, न कोई नौकरी है, न कोई कपड़ा है, न कोई बोलने का ढंग है, इन सब की तुलना में आपको कितना मिला हुआ है] आप इसकी खुशी नहीं मना सकते, आप प्रसन्न नहीं हो सकते, आपके चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं आ सकती, कि जो हमारी वर्तमान परिस्थितियाँ हैं, उसमें हमको प्रसन्न रहना का हक है।

आप तो हमेशा अभावों को सोचते रहते हैं। अभावों को, अभावों को सोचने का अर्थ होता है नरक। अभावों को ध्यान में नहीं रखना चाहिए, उसको दूर नहीं करना चाहिए ये मैं नहीं कहता। मैं तो ये कहता हूँ आप हमेशा अपने आप को अभावग्रस्त, अभावग्रस्त, अभावग्रस्त, दरिद्र और कंगाल मान कर बैठे रहेंगे तो आप दरिद्र और कंगाल ही रह जायेंगे। आप मत अपने आप को दरिद्र मानिए, मत अपने आप को कंगाल मानिए। फिर आप ये मान के चलिए कि आप देवता हैं। देवता हो गए तो देने में समर्थ हैं। आपके पास देने को बहुत है। आपको अपने लिए गुजारे के लिए भी बहुत है और आप देने के लिए भी बहुत है। नहीं साहब, पैसा हमारे पास कम है, तो पैसा कौन माँग रहा है आपसे? और पैसा दे करके आप क्या भला करेंगे आदमी का? आप दूसरों को प्यार दीजिए। लोगों की आत्माएँ किस कदर प्यार के बिना तड़पती रहती हैं। आप दूसरों को सम्मान दीजिए न, देखिये सम्मान का दुनिया कितनी प्यासी है। लोगों को प्रोत्साहन दीजिए न - देखिए, आप (आपको) प्रोत्साहन देकर के छोटे-छोटे आदमी क्या से क्या बन सकते हैं।

देने के लिए कुछ कम है क्या? अपना पसीना दे दीजिए, आप मेहनत दे दीजिए। - (आप) आप लोगों के लिए (स) सहानुभूति दे दीजिए। देने के लिए कुछ भी कम नहीं है। आपके पास देने की अगर मनोवृत्ति हो तो आप कुछ भी दे सकते हैं। पैसा है तो उसमें से भी रोटी काट करके दे सकते हैं। आप चार रोटी खाते हैं तीन रोटी खाइए, और एक रोटी बचा दीजिए गरीबों के लिए, हिस्सा बाँट कर दे दीजिए उनका। फिर देखिए (वो ए) वो एक रोटी जो आपने अपने रोटी में से बचत कर ली थी, आपके लिए कितना देवत्व ले कर के आती है, और कितनी खुशी ले के आती है, कितना शान्ति ले के आती है। आपको कटौती कर लीजिए। कटौती करके आप दूसरों को देने की तैयारी कर लीजिए। आपके पास जरूर मिल जायेगा। एक दिन उपवास कर लीजिए, और उपवास करने के बाद में जो उस दिन का अनाज बच गया, उस दिन का जो दाल बच गई, उसको आप (कैसे) ऐसे दुखियारे के घर पहुँचा दीजिए, जिसकी उसको जरूरत है। फिर आप देखेंगे किस कदर से आपको, (किस) किस तरीके से आपको शान्ति मिलती है, और किस तरीके से आप प्रसन्नता के नजदीक चले जाते हैं।

देवता के यही गुण हैं। देवता उदार होते हैं, देवता विशाल हृदय होते हैं, देवता संकीर्ण नहीं होते, देवताओं के मनों में हर समय देने की इच्छा बनी रहती है। हम किसके लिए क्या दे पाएँ? प्यार देना सिखाता है, प्यार देना सिखाता है। सेवा उसी का नाम है, उसका नाम प्यार है। भगवान का नाम प्यार है, ‘‘रसो वै सः’’, भगवान का नाम रस है। भगवान का नाम प्यार है, प्यार आप भीतर पैदा कीजिए न। जिस दिन आप प्यार पैदा करेंगे, उस दिन आपके मन में से एक ही उमंग और ऐसी हिलोर उत्पन्न करेगी कि हमको कैसे दूसरों की सहायता करनी चाहिए, कैसे हम दूसरों की मदद करें? जब दूसरों की सहायता (करने) करने के लिए आमादा होंगे, तो आपको अपने में से (क) कटौती करनी पड़ेगी, साधु और ब्राह्मण का जीवन जीना पड़ेगा।

(साधु) ब्राह्मण किफायतशार को कहते हैं, मितव्ययी को कहते हैं, अपरिग्रही को कहते हैं, स्वल्प-सन्तोषी को कहते हैं। आप ब्राह्मण बनिये और भूदेव, पृथ्वी के देवताओं में अपने नाम को लगा लीजिए। और सन्त, सन्तों को भी भगवान कहते हैं, देवता कहते हैं। सन्त किसे कहते हैं? परोपकारियों को कहते हैं, लोकहित में लगे हुए आदमियों को (व्यक्ति) कहते हैं। जन-जन को, समाज के लिए विसर्जित और समर्पित लोगों को कहते हैं, सत्प्रवृत्तियों में अपने आप को खपा देने वाले का नाम सन्त कहते हैं। आप सन्त और ब्राह्मण के रूप में, अथवा दोनों के संयुक्त जीवनयापन करने के रूप में अगर आप जीएँ, मजा आ जायेगा।

और आप कैसे देवता हो सकते हैं। इसके लिए आपको संघर्ष करना पड़ेगा। मछली उल्टी दिशा में चलती है। आप मछली की तरीके से उलटी दिशा में चलिए। जमाने का बहाव किधर है, आप मत ध्यान दीजिए। अपने संकल्प और निश्चय कीजिए। हम सिर्फ आदर्शों की तरफ चलेंगे, ऊँचाइयों की ओर चलेंगे। आप मस्ती से रहिए, दूसरों को मस्ती से रहने दीजिए। आप खुशी से रहिए, दूसरों को खुशी से रहने दीजिए। आप जीईए, दूसरों को जीने दीजिए। मिल-जुल के रहिए, मिल-बाँट के खाइए, हँसते रहिए, हँसाते रहिए, अपने (फर्ज़) फर्ज़ और कर्तव्यों के ऊपर जागरूक रहिए। अगर आप इतना कर सके हों, तो देख लेना, आप देवता हो जाएँगे, और देवत्व का सारे का सारा उदय आपके इसी जीवन में हो जाएगा, जैसे कि हम अपेक्षा करते हैं। आप इस शिविर में आये हैं बहुत मजा आएगा। आप आइये देवता बनकर जाइये, अब देवता बनना और राक्षस बनना बिल्कुल आपके हाथ की बात है, आप चाहें तो हम आपको देवता बना सकते हैं और आप देवता बन सकते हैं। उम्मीद ऐसी है। आप यही करेंगे। समाप्त॥

॥ॐ शान्तिः॥