बन्धनों से मुक्ति
मनुष्य को दो दु:ख हैं। एक दु:ख का नाम नरक, और एक दु:ख का नाम बन्धन। दो चीज़ों से आदमी निकल जाए तो सारे संसार में सुख ही सुख है। बन्धन क्या? बन्धन वो जिसमें कि हम और आप जकड़ जाते है,कल्पना कीजिए पिंजड़े में बन्द किया हुआ पक्षी आटा तो खा लेता है, दाना तो खा लेता है लेकिन बन्धन में जकड़ा हुआ होने की वजह से कुछ कर नहीं पाता। बन्धन की वजह से न कहीं हवा देख पाता है, न कहीं आकाश को देख पाता है, न कहीं बादलों को देख पाता है, कुछ देख नहीं पाता, छोटे में से दिन गुजारता रहता है।
बन्धनों से बँधा हुआ व्यक्ति, जेल खाने के कैदी के बारे में आप जानते हैं न, जकड़ा हुआ आदमी, जकड़ा हुआ आदमी, चारों ओर से जकड़ा हुआ आदमी, हाथ जिसके बँधे हुए हैं, पैर जिसके बँधे हुए, गले में तौप पड़ा हुआ है। आजकल तो इतना नहीं होता, पुराने जमाने में जेलखाने में जो आदमी रखे जाते थे, उनके हाथों में कथकड़ी पड़ी रहती थी हर समय, कुछ कर नहीं सकते थे, पैरों में बेड़ियाँ पड़ी रहती थीं कुछ कर नहीं सकते थे, गले में तौप पड़ा रहता था, रस्सा पड़ा रहता था, बिचारा कुछ कर नहीं सकता था। जैसे घोड़े को अगाड़ी-पिछाड़ी मुँह में लगाम लगा देते थे इस तरीके से कैदी को भी रहना पड़ता था, जिस जमाने में वो लोग रहते होंगे। आप उसकी दुख की कल्पना कर सकते हैं? मन को कितना मसोसना पड़ता होगा।
हमारी योग्यता, हमारी प्रतिभा और भगवान का दिया हुआ संसार और हमारी क्षमता, इसका हम कुछ भी नहीं कर पा रहे, हमारा सब गड़बड़ हो गया। तब क्या करना चाहिए? तब क्या करना चाहिए? हमारे यहाँ शास्त्रकारों ने आदमी के लिए सबसे बड़ा पुरुषार्थ ये बताया (गया) है, (और एक पुरुषार्थ बताया गया है) - बन्धनों से मुक्ति। बन्धनों से मुक्ति अगर मिल जाये तो आदमी कितना सुखी हो सकता है। मुक्ति का अर्थ लोग-बाग कुछ और तरह से समझते हैं, सायुज्य की मुक्ति, सारूप्य की मुक्ति, सालोक्य की मुक्ति, सामीप्य की मुक्ति इसकी कल्पनाएँ इस तरीके से लोगों ने अपने मन में बिठा रखी है कि भगवान नाम का कोई व्यक्ति है, उसका एक बड़ा सा कोई स्वर्ग-वैकुण्ठ नाम का गाँव है, गाँव में फालतू फण्ड के आदमी बैठे रहते हैं, बस भगवान के इसके समीप बैठे रहते हैं, बस न कुछ करते हैं, न करने देते हैं, बस उनके पास सामीप्य की मुक्ति और सालोक्य मुक्ति इसी के लोक में रहते हैं, यहाँ सब चीज खाने की, पीने की, खाने की, पीने की सब चीजें भरी पड़ी हैं उसी में बने रहते हैं, ये सालोक्य की मुक्ति है, ये सारूप्य की मुक्ति है। कौन सा? इसका रूप है, भगवान का रूप जैसा है, भगवान का बहुत सुन्दर रूप है, हमारा भी सुन्दर रूप हो गया। अच्छा, खाने पीने की बहुत सारी चीजें सालोक्य में है, हम भी लोक्य में हो गये, सामीप्य में चौबीस घण्टे बैठे रहे, आहा सुगन्धि आ रही है, पंखे झल रहे हैं, भगवान जी के समीप बैठे हैं, कुर्सियों पर बैठे हैं।
इस तरह की लोगों ने कल्पनाएँ कर रखी हैं। वास्तव में ये कल्पनाएँ बच्चों जैसी कल्पनाएँ हैं। बच्चों जैसी कल्पना में क्या लाभ हो सकता है? मुक्ति का महात्म ये आध्यात्म शास्त्र में सिखाया है, ये बताया है और ये सुनाया है कि जो आदमी, जो आदमी मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं वो आदमी वो आदमी जीवन सफल प्राप्त कर लेते हैं। जीवन मुक्त और भगवान की प्राप्ति एक ही अर्थों में ली गई है, तो फिर जीवन मुक्त क्या है?
जीवन मुक्त उसे कहते हैं जो कि बन्धनों से टूट गया है, छूट गया है। जो पिंजरे में से निकल गया, जो जेल खाने में से छूट गया। जो माँ के पेट में छोटे से दायरे में बच्चा बैठा रहता है, न हिल सकता है, न डुल सकता है, न बोल सकता है, न बात कर सकता है, न साँस ले सकता है उसमें से जब डिलेवरी हो जाती है जन्म हो जाता है तो मुक्त हो जाता है। आप संसार मुक्ति का अर्थ समझ गये न।
अच्छा चलिए अब फिर उसकी बात सोचिए, मन से मुक्ति किसे कहते हैं? मन से मुक्ति किसे कहते हैं? मन से मुक्ति कुछ और होती है, मन से मुक्ति, मन से मुक्ति कुछ और है, मन से मुक्ति क्या है?बन्धनों से मुक्ति, बन्धनों से मुक्ति क्या? बन्धनों से मुक्ति ये कि (हम) जिस तरीके से हमारी विचारणाएँ, भावनाएँ, और हमारी क्रियाशीलताएँ जिन बन्धनों से जकड़ गई है, उन बन्धनों को हम छोड़ डालें, तोड़ डालें, तो हम जीवन-मुक्त हो जाते हैं। असल में जीवन-मुक्त होता है आदमी। जो ये ख्याल है कि स्वर्ग में जा कर के मुक्ति में कहीं बैठा रहता है, माल गोदाम में जमा हो जाता है, भगवान जी के माल गोदाम में - नहीं, न कोई भगवान जी का माल गोदाम है, न कहीं आदमी बैठे रहते हैं।
मुक्ति केवल जीवन में ही होती है। जीवन-मुक्त आदमी होते हैं - जीवन मुक्त आदमी होते हैं जिनको ॠषि कहते हैं, जिनको तत्त्वदर्शी कहते हैं, जिनको मनीषी कहते हैं। वो उसके आदमी हैं, क्या करना चाहिए? ये तो मैं निवेदन कर रहा हूँ आपसे, क्या करना चाहिए?
आपको तीन बन्धनों से अपने आपको छुटकारा पा लेना चाहिए। आप यहाँ आये हुए हैं शान्तिकुञ्ज में, कल्प साधना की उपासना कर रहे हैं तब फिर क्या करना चाहिए आपको? तीन बन्धनों से मुक्ति प्राप्त कर लेनी चाहिए। कोशिश कीजिए कि तीन बन्धन तोड़ दें। और आप चाहें तो इन तीन बन्धनों को तोड़ सकते हैं। मकड़ी जाला स्वयं बनाती है, उसी में स्वयं फंस जाती है। स्वयं जाला बनाती है, स्वयं फँस जाती है, स्वयं फँसने के बाद में जब उसका मन आता है कि जाला हमारे लिए नुकसान दायक है और जाले में हमको नहीं रहना चाहिए, तब क्या करती है? तब ये करती है कि सारे के सारे जाले को अपने मुँह में समेट लेती है और निगल जाती है, सारे जाले को समेट लेती है और निगल जाती है कौन सी, और भाग खड़ी होती है, मकड़ी। ये हमारा बन्धन जो चारों ओर से हमको जकड़े हुए है, असल में किसी और बाहर के (आदमी की) शक्ति में इतनी गुंजाइश और दम नहीं है कि आदमी को जकड़ सके। भगवान के बेटे को कौन जकड़ेगा? बन्धनों में कौन जकड़ सकता है? बन्धनों में जकड़ने के लिए उसका अपना ही अज्ञान, और अपनी ही बेवकूफी, और अपने ही कुसंस्कार हैं, जिसने आपको जकड़ लिया है।
कौन-कौन से बन्धन हैं तीन? हाँ सुनिए - एक का नाम है लोभ, एक का नाम है मोह, और एक का नाम है अहंकार। ये तीन हमारे शत्रु हैं। काम ऐषा, क्रोध ऐषा, रजो गुण समुभ्दवः, महाशनो महापात्मा। ये तीन ही बन्धन हैं, तीन अपने बैरियों से रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ से अगर आप निपट लें तो मजा आ जाये, अगर आप कंस और जरासंध और दुर्योधन से निपट लें तो मजा आ जाये। तीन आपके दुश्मन हैं इन्होंने आपकी जिन्दगी को कैसा घिनौना बना दिया है, कैसा पिछड़ा हुआ बना दिया है, कितना गया बीता बना दिया है, कितना अस्त-व्यस्त बना दिया है, अस्त-व्यस्त जीवन को न बनायें, आप अपने आपको तो देख सकते हैं। आपके जीवन में कितना कायाकल्प हो सकता है और आप वर्तमान परिस्थितियों की तुलना में थोड़े दिनों में कहाँ से कहाँ पहुँच सकते हैं।
आप तीन दुश्मनों से आगाह होइए, इन्हें तोड़ने के लिए कोशिश कीजिये। लोभ एक, लोभ को किस तरीके से तोड़ा जाये, लोभ क्या है? लोभ ये है कि आदमी के गुजारे के लिए मुट्ठी भर चीजों की जरूरत है, मुट्ठी भर चीजें चाहिए। मुट्ठी भर से गुजारा हो जाता है। आदमी का पेट कितना छोटा है? भैंसे का पेट कितना बड़ा है, घोड़े का पेट कितना बड़ा है, गधे का पेट कितना बड़ा है पर आदमी का पेट बहुत छोटा है - जरा सा छोटा है, जरा सा छोटा है। उसके लिए (थोड़ी सी) चार मुट्ठी अनाज काफी होना चाहिए। लेकिन आदमी का लोभ देखा है न आपने - कितना संग्रही, कितना लालची, कितना विलासी, कितना विलासी, कितना विलासी, कितना लालची, कितना संग्रही, कितना जमा कर लूँ। चौबीसों घण्टे जमा करने के लिए एक नशे, बहुत सारे नशे हैं, इनकी हविस होती है, शराबियों को नशे की हविस हो जाती है, बार-बार शराब माँगता है, बार-बार शराब माँगता है। इसी तरीके से लालच एक शराब है।
आदमी को जरूरत है, जरूरत क्या है? कुछ भी नहीं है। बेकार का अहंकार को बढ़ाने के लिए अपनी औलाद को और घर वालों को तबाह और बर्बाद करने के लिए और और पीछे कलह उत्पन्न करने के लिए और दुर्व्यसन पैदा करने के लिए केवल धन संग्रह करता रहता है, सारी जिन्दगी का सारा का सारा हिस्सा इसी में खर्च हो जाता है। आपको अपने लोभ को छोड़ना पड़ेगा। क्या करेंगे? तब आप 'सादा जीवन उच्च विचार' के सिद्धान्तों को स्वीकार कीजिए। ऊँचे विचार सिर्फ उस आदमी के पास आ सकते हैं, जो सादा जीवन जिए। इसका मतलब ठाट-बाट से नहीं है - सादा जीवन से मतलब है - लोभ से, लालच से, आप (लाभ) लोभ और लालच निकाल दें, और निर्वाह की बात सोचें, तो आप थोड़े से घण्टे मेहनत करने के बाद में अपना पेट बड़े मजे में भर सकते हैं।
कुटुम्बियों की बात, कुटुम्बियों की बात भी ऐसी है - जिसको मोह कहते हैं, वो कुटुम्बियों के नाम पर लोभ है। लोभ का बढ़ा हुआ दायरा, जो कुटुम्ब तक फैल जाता है, उसका नाम मोह है। और जो अपने आप तक सीमित रहता है धन तक सीमित रहता है उसका नाम लोभ है और जो कुटुम्बियों तक फैल जाता है उसका नाम मोह है। कुटुम्बियों के प्रति आपकी जिम्मेदारी तो है ये तो मैं नहीं कहता कि जिम्मेदारी नहीं है। जिम्मेदारी तो आप सब के प्रति है, आपके शरीर के प्रति भी आपकी ज़िम्मेदारी है, आपके मस्तिष्क के प्रति भी आपकी ज़िम्मेदारी है, आपके भगवान के प्रति भी आपकी ज़िम्मेदारी है, जीवन के प्रति भी आपकी ज़िम्मेदारी है - आपकी बहुत ज़िम्मेदारियाँ हैं - और (उस) ज़िम्मेदारियों में से हर एक को निभाइए, जिसमें आपका कुटुम्ब भी शामिल है। कुटुम्ब के शामिल होने का मतलब ये है कोई, कैसा कुटुम्बियों का भी लालच आप पूरा करते रहेंगे? लालच मत पूरा कीजिए।
कुटुम्बियों की अनावश्यक आवश्यकताओं को - अनावश्यक माँगों को मानने से इन्कार कर दीजिए, तो क्या करें? अगर वो माँगते हैं तो भी, नहीं माँगते हैं तो भी, जरूरत जिस चीज की है उनको आप दीजिए। किसकी जरूरत है? तीन चीजों की जरूरत है आपके कुटुम्बियों को। एक आपके कुटुम्बियों को जरूरत है, एक कुटुम्बियों को जरूरत है शिक्षा। शिक्षा चाहिए, आपके कुटुम्बियों को शिक्षित होना चाहिए। स्कूली, स्कूली शिक्षा की बात तो मैं नहीं कहता पर मैं ये कहता हूँ स्कूली शिक्षा अगर आपके पास न भी हो, तो भी जिसको शालीनता कहते हैं, सभ्यता कहते हैं, सज्जनता कहते हैं - शिक्षा का मतलब सभ्यता, शालीनता और सज्जनता से है। आप अपने घर वालों को वो बनाइए, है न, उनका व्यवहार ऐसा बनाइए, उनके सोचने का तरीका ऐसा बनाइए, शिक्षक बनाइए, जानकार बनाइए। ये बना देते हैं तो हम समझते हैं आपने अपने घर वालों को, जीविका से भी ज्यादा, जेवर बनाने से भी ज्यादा, रेशम के कपड़े बनाने से भी ज्यादा, साेने चाँदी के जवाहरात बनाने से भी ज्यादा आपने उनकी मदद कर दी। इसीलिए आपको मोह की करने की अपेक्षा शिक्षा में खर्च कीजिए। शिक्षा - शिक्षा के साथ-साथ में क्या करें?
आप अपने हर कुटुम्बी को स्वावलम्बी बनाइए, किसी को परावलम्बी मत बनने दीजिए। आप अपनी स्त्री को स्वाबलम्बी बनाइए, उसको गुड़िया मत बनाइए। उसको ये मत कहिए, आपको पानी नहीं भरना है, और आपको खेती नहीं करनी है और आपकी नौकरानी रहेगी और खाना आपके लिए नौकरानी पकायेगी, कपड़े आपके नौकरानी धोयेगी और आप पंखे के नीचे बैठे रहा करिये, ऐसा मत कीजिए आप। स्वाबलम्बी बनाइए। भगवान न करे ऐसा खराब दिन आ जाये जब आप न हों, भगवान न करे ऐसा दिन आ जाये कि आपकी सम्पत्ति चली जाये और फिर आपने स्त्री अपाहिज बना दी न, आपने घूँघट में रख करके, मेहनत करने नहीं दी, परिश्रम करने नहीं दिया, उपार्जन के लिए क्षमता बनाई नहीं। हर आदमी के अन्दर उपार्जन की क्षमता उत्पन्न होनी चाहिए। आपको अपने कुटुम्बियों में से हर एक (को) में उपार्जन की क्षमता उत्पन्न होने दीजिए - बढ़ने दीजिए। बच्चे बड़े हो गये हैं, इनको हाथ बँटाने दीजिए, ताकि अनाज खाते हैं घर का, तो अपने घर की संस्था को थोड़ा सहयोग करें। मिट्टी कूटना सिखाइए, घर का पानी भरना सिखाइए, (थोड़ी सी) साग वाटिका बनाना सिखाइए, कपड़े धोना सिखाइए, ताकि अपने घर में आर्थिक स्थिति से कुछ मदद (मदद) कर सकें। आप स्वाबलम्बी नहीं बनायेंगे? परिश्रमशील नहीं बनायेंगे? अगर आप अपने घर गृहस्थी वालों को स्वाबलम्बी नहीं बनाया है तो ये आपका मोह है। अगर आप घर वालों की अनावश्यक इच्छाओं को पूरा करने के लिए, जेवर खरीदने से लेकर सिनेमा दिखाने तक वो चीजें जो उनके लिए आवश्यक नहीं है, जो उनके जीवन को विकसित करने के लिए कोई जरूरी नहीं हैं, केवल उनके मनोरंजन के लिए, और जो उनकी हविस और बुरी आदतें हैं इनको पूरा करने के लिए जो माँगते हैं आप उसको पूरा करते हैं तो ये मोह हो जाता है।
और संस्कार। संस्कारवान बनाइए, संस्कारवान बनाइए। संस्कारवान बनाइए, सभ्य बनाइए, शिक्षित बनाइए, स्वावलम्बी बनाइए। संस्कारवान बनाइए, शिक्षित बनाइए, स्वावलम्बी बनाइए - और ये तीन काम करने के लिए आप जितनी मेहनत करते हैं, ये हम समझते हैं आप (के लिए) अपने कुटुम्ब के लिए कर्तव्य पालन कर रहे हैं। कुटुम्बियों की हविस, कुटुम्बियों की इच्छा,और कुटुम्बियों के दबाव पूरा करने के लिए आप इसलिए पूरा करते हैं कि कुटुम्बी आपसे प्रसन्न रहेंगे और प्रसन्न रह करके बच्चे आपके आज्ञा मानेंगे, औरत आपको काम वासना के लिए मदद करेगी, इसीलिए आपको प्रसन्न करना चाहिए तो आप गलती करते हैं। किसी को मत प्रसन्न कीजिए। अपनी आत्मा को प्रसन्न कीजिए और अपने परमात्मा को प्रसन्न कीजिए, दूसरे के अलावा इस संसार में आप जितना ही लोगों को आप प्रसन्न करने की कोशिश करेंगे उतने ही आप हैरान होंगे, उतने ही आप खाली हाथ हो जाएँगे।
इसीलिए लोभ और मोह के दो बन्धन, लालच मत कीजिए, (समय का) अगर आप अपने दिमाग को खाली कर लें कि हमको गुजारे भर के लिए कमाना है, तो आपका दिमाग, और आपकी स्कीम, और आपकी योजनाएँ, और आपका परिश्रम, और आपका पुरुषार्थ, सब बच जाएगा। सब बच जाएगा - फिर आप उन कामों में लगा सकेंगे जिससे आपकी आत्मा की उन्नति होती है, और समाज के प्रति अपना कर्तव्य पालन होता है, और भगवान के आदेशों का निर्वाह होता है। इससे कम में बनेगा ही नहीं। आपका लालच चाहे पूरा होता हो चाहे न होता हो, ये तो मैं नहीं कहता कि आप सम्पन्न हुए कि नहीं हुए पर आप तो लालची मुझे मालूम पड़ते है। सम्पन्न कहाँ से हो जाएँगे? अकल तो है नहीं, योग्यता तो है नहीं, विद्या है नहीं, पुरुषार्थ है नहीं, परिश्रम है नहीं, चांस है नहीं, पूँजी है नहीं, तो कैसे विद्या देंगे? आप तो गरीब के गरीब ही रहने वाले थे और गरीब ही रहने वाले हैं, क्यों? क्योंकि आदमी को सम्पन्न बनने के लिए तो अनेक साधन चाहिए, साधन तो कुछ भी नहीं, फिर सम्पन्न कैसे बनेंगे? पर लालच आप अगर छोड़ दिया होता तो आप इतने ही गुजारे में, कम समय में कर सकते थे और लालच जितना आपका समय खा जाता है, शक्ति खा जाता है, बुद्धि खा जाता है उस सब को आपने बचा लिया होता। बचाने के बाद में वो काम कर लिया होता जो असंख्य लोगों ने किया है बच्चों का निर्वाह करते हुए।
कबीर की भी शादी हुई थी, जवाहर लाल नेहरू की भी शादी हुई थी, गाँधीजी की भी शादी हुई थी, शंकर भगवान की भी शादी हुई थी, रामचंद्रजी की भी शादी हुई, हमारी भी शादी हो गई है। शादी होना और पेट भरना इतना बड़ा काम नहीं है कि जिसके लिए ये कहा जा सके कि हमारी सारी शक्ति और सारी बुद्धि और सारा परिश्रम, और सारा पुरुषार्थ इसी में खर्च हो जाता है जैसे आपका हो जाता है। ये आपका लोभ और मोह - ये व्यामोह के दो बन्धन हैं, जो न आपकी अकल को चलने देते हैं, न आपके परिश्रम को चलने देते हैं। आपका परिश्रम लोभ के लिए (वि) विसर्जित हो गया, और (आपका) आपकी अकल और आपकी भावना मोह के लिए विसर्जित हो गई। मोह के लिए आपकी अकल और भावना विसर्जित हो गई, लोभ के लिए अपके शरीर का श्रम विसर्जित हो गया, फिर रह क्या गया? तोड़िये न इन बन्धनों को।
आप यहाँ रह कर के, इस कल्प साधना में अपने आप को बदल दीजिए, और लोभ और मोह से अपने आप को पीछे हटाइए। मैं ये थोड़े ही कहता हूँ आपको अपना पेट भरने के लिए गुजारा नहीं करना चाहिए। गुजारा करना बात एक है, लालच के लिए मरते-खपते रहना बात एक है। अपने कुटुम्ब को सीमित रखना है। आप क्यों बढ़ाते चले जाते हैं, किसने कहा था आपसे रोज बच्चे पैदा करने के लिए, आप बिना बच्चे के जिन्दा नहीं रह सकते? कम बच्चों से गुजारा नहीं हो सकता? कम बच्चे जो हैं उसको आप पर्याप्त नहीं मान सकते। ऐसे मानिये। अब बच्चे मत बढ़ाइए। जो बच्चे हैं उनकी क्वालिटी बढ़ाना चाहते हैं तो संख्या आपको घटानी चाहिए, इससे आगे तो किसी हालत में मत बढ़ाइए। तब, तब आपका मोह कम हो जाएगा। फिर आप एक माली की तरीके से अपने गृहस्थ का पालन कर रहे होंगे। तब आप एक सदाचारी और संयमी की तरीके से अपना गुजारा कर रहे होंगे। दोनों तरीके से आप गुजारा करें तो मजा आ जाये।
और तीसरा एक और काम करना चाहिए। अहंकार। ये काहे का अहंकार। आप अहंकार को भी हटाइए। आदमी आत्म-विज्ञापन करने के लिए, बड़ा बनने के लिए, बड़ा बनने के लिए, बड़ा बनने के लिए, बड़ा आदमी बनने के लिए जाने कितने ढोंग बनाता रहता है। लिबास, फैशन, ठाट-बाट - ये सब अहंकार, फलाना अहंकार हर जगह ऐसे ही। मेरी पगड़ी बढ़नी चाहिए, मेरे पास जेवर बढ़िया होने चाहिए, मुझको नेता बनना चाहिए, मुझको मंच बनना चाहिए, अपना अहंकार बड़प्पन के लिए। ये अहंकार बढ़ा हानिकारक है। तो आप क्या कह रहे हैं? मैं ये कह रहा हूँ क्या? कि आपकी महत्त्वकांक्षा नहीं बढ़नी चाहिए?
आपकी महत्त्वकांक्षा जरूर बढ़नी चाहिए। पर आप अहंकार के नाम पर लोगों के सामने अपना चकाचौंध कहने के नाम पर, लोगों के सामने बड़ा आदमी बनने के नाम पर अगर आप अपने अहंकार का पोषण कर रहे होंगे तो गलती कर रहे होंगे। इस अहंकार (को) की दिशा मोड़ दीजिए। फिर काहे में लगावें? आप इस अहंकार को महानता की दिशा में बढ़िए। हम महान बनेंगे। दूसरों की तुलना में हमारे गुण, हमारे कर्म और हमारे स्वभाव बनेंगे। आप ये विचार कीजिए न। क्या विचार करें? आप ये विचार कीजिए, क्या विचार करें, कि हमको महान बनना है। दूसरों के सामने अपनी निशानियाँ छोड़ कर जाना है, दूसरे आदमी, दूसरे आदमी आपके बारे में ये विचार करते रहें, सोचते रहें, ये सोचें कितना शानदार आदमी था, कितना मनस्वी आदमी था, कितना धैर्यवान आदमी था, कितना साहसवान आदमी था, आप इसको बड़प्पन पर न्यौछावर कर सकते हैं। महान आदमी, महान आदमी जिन्होंने अपनी जिन्दगियाँ श्रेष्ठ कामों में लगा दीं, लोगों के सामने उदाहरण छोड़ के चले गये, ये है विरासत। आप तो क्या विरासत छोड़ के जाएँगे, बेटे के लिए मकान बना कर छोड़ जाएँगे। बेटे के लिए मकान बनाना जरूरी नहीं है। तो क्या जरूरी है?
बेटे के लिए विरासत छोड़ कर जाइए ताकि आदमी ये कह सके कि किसका बच्चा था? जिससे आपका सम्मान बढ़े। न केवल अपने बच्चों के लिए, बल्कि सारे समाज के लिए विरासत छोड़ कर जाइए, ये छोड़ कर जाइए लोग कह सकें, हमारे पूर्वज ऐसे थे, हमारे गाँव का निवासी ऐसा था, अमुक सज्जन ऐसा था। लोक सम्मान (अ) अर्जित कीजिए न, आत्म सन्तोष अर्जित कीजिए न, भगवान का अनुग्रह (अ) अर्जित कीजिए न। इसमें क्या दिक्कत मालूम पड़ती है आपको, कोई दिक्कत नहीं है।
तीन बन्धन हैं, जिन्होंने आपके तीन चीजों को खतम कर दिया है। आत्म सन्तोष जो आप पा सकते थे वो आप उससे वंचित रह गये, और अब पा नहीं पाइएगा। क्यों, क्योंकि लोभ तो कहाँ बनने देगा न? लोभ तो आपको उचित-अनुचित काम करने के लिए लगाये रहेगा, मेहनत करने के लिए लगाये रहेगा, कर्ज लेने के लिए लगाये रहेगा। लोभ आपको रिश्वत लेने के लिए मजबूर करता रहेगा, लोभ आपको बेईमानी करने के लिए मजबूर करता रहेगा, लोभ आपको आक्रामक और अनाचारी बनने के लिए मजबूर करता रहेगा। मजबूर करता रहेगा फिर आप किस तरीके से, किस तरीके से आत्मसन्तोष पाइएगा। (आप तो) आत्मा आपकी जलती रहेगी, आत्मा आपकी निरन्तर जलती रहेगी। क्यों? क्योंकि आपका लालच इतना बड़ा दुश्मन है जिसको आप छोड़ नहीं पायेंगे, तो इसके बदले में आत्म सन्तोष गँवाना ही गँवाना है।
और एक और चीज थी - लोक-सम्मान। लोक-सम्मान आप नहीं पा सकेंगे, क्यों? क्योंकि आपकी सारी शक्ति - सारा प्यार इन थोड़े से आदमियों में ही केन्द्रित हो गया है, अपनी औरत को ही सब कुछ समझ बैठे हैं, अपने बच्चों को ही सब कुछ समझ बैठे हैं, कोई समाज भी रहता है क्या? कोई संस्कृति भी है क्या? कोई दीन-दुखियारे भी रहते हैं क्या? समाज के प्रति भी कुछ कर्तव्य फर्ज हैं क्या? नहीं साहब हमने जो कमाया था, चार बच्चों को बराबर बाँट दिया। चार बच्चों को बराबर बाँट दिया? और पड़ोसियों, और महोल्ले वालों को और उन लोगों को जिनके एहसान आपके ऊपर लदे हुए हैं, उनके लिए जिन अध्यापक ने आपको पढ़ाया था और वो आजकल बिचारा भिखारी की तरह गुजारा कर रहा है, आप उसके प्रति भी कुछ हक नहीं है क्या आपका? चार बेटों को बराबर बाँट दिया, चार बेटों को बराबर बाँट दिया, चार बेटों को बराबर बाँट दिया।
ऐसा मत कीजिए आप। चार बेटों को बराबर मत बाँटिए। बच्चों को स्वाबलम्बी बनने दीजिए, जो कुछ भी आपकी आज सम्पत्ति है समाज को लाभ उठाने दीजिए, संस्कृति को लाभ उठाने दीजिए। अपने अहंकार का परिपोषण आप इस माने में कीजिए कि हम महापुरुष बनते हैं, और महामानव बनते हैं, और अपनी चाल-ढाल और अपने चाल-चलन ऐसी शानदार बनाते हैं, जिससे कि भगवान का अनुग्रह भी हमको प्राप्त हो सके। आप महानता की दिशा में जायेंगे, बड़प्पन की दिशा में जायेंगे तो आपको लोभ, मोह और अहंकार इन तीन को पकड़ना पड़ेगा उनके सहारे आपको नरक में गिरना पड़ेगा और बन्धन में गिरना पड़ेगा। कदाचित अगर आप एक कदम आगे बढ़ा दें - महानता की ओर (चल) चल पड़ें - तब, तब फिर आपको दूसरा काम करना पड़ेगा - तब फिर आपको, तब आपको अपने आप को, औसत भारतीय की तरीके से सीमित में निर्वाह करना पड़ेगा। आपके सारे भाई जिस तरह का गुजारा करते हैं, आप क्यों नहीं कर सकते? आपको आपको सारे बच्चों को अपना क्यों नहीं मान सकते? कितने बच्चे हैं जो विद्या के अभाव में बैठे रहते हैं। आप अपने बच्चों को कीमती कपड़े पहनायें और अमुक चीज छोड़ कर मरें, और पड़ौसियों के बच्चे के लिए आप किताबें खरीद कर नहीं दे सकते? ईश्वरचंद्र विद्यासागर की तरीके से आप ऐसा नहीं कर सकते कि अपने अपने घर का पचास रुपये से भी गुजारा कर लें और बची हुई साढ़े चार सौ रुपये की नौकरी को पड़ौस के विद्यार्थियों के लिए खर्च कर दें। आप ऐसा नहीं कर पायेंगे क्या?
लोभ-मोह को छोड़ दीजिए, आप अहंकार की, बड़प्पन की, बड़प्पन की, अमीरी की, अमीरी की, बड़प्पन की और दूसरों की आँखों में चकाचौंध पैदा करने की हविस को छोड़ दीजिए। इसके स्थान पर आप दूसरी हविस पैदा कीजिए। हम महान बनेंगे, दूसरों के सामने उदाहरण पेश करेंगे, अपनी जिन्दगी का नमूना पेश करेंगे, और लोगों को अपने रास्ते पे चलने के लिए, पीछे चलने के लिए हम नया रास्ता बना के जाएँगे। ये महानता के रास्ते हैं। अगर आप महानता के रास्ते पे चल पड़ें, तो आपके जीवन की मुक्ति हो गई - मुक्ति हो गई - जीवन-मुक्त जैसे इसी जिन्दगी में आनन्द उठाते हैं, मजा उड़ाते हैं, और स्वच्छन्द सारे के सारे सारे विश्व में पंख लगा के उड़ते चले जाते हैं पखेरू, सारे विश्व में उड़ता हुआ चला जाता है कैसा सुन्दर दृश्य दिखता है, कैसी सुहावनी छवि का लाभ उठाता है। आप भी ठीक वैसी छवि का लाभ उठा सकते हैं अगर आप जीवन मुक्त होने की दिशा में कोशिश करें। ये आपकी मुट्ठी में है और आप चाहें तो ऐसा कर ही सकते हैं। आप जरा हिम्मत कीजिए - लोभ, और मोह, और अहंकार का तिरस्कार कीजिए, फिर देखिए आपकी मुक्ति आपके शरण में आती है कि नहीं। ये उम्मीद है आप यहाँ इस कल्प सत्र में आये हैं, जीवन मुक्त हो करके जायेंगे। समाप्त॥
॥ॐ शान्तिः॥