आराधना क्यों और कैसे?

त्रिवेणी जिसमें नहा करके कौए कोयल हो जाते हैं और बगुले हँस हो जाते हैं। आपने सुना है न, रामायण में त्रिवेणी का महातम बताते हुए ये लिखा गया है कि "मज्जन फल पेखिअ तत्काला, काक होहिं पिक बकउ मराला", कौए कोयल हो जाते हैं और बगुले हँस हो जाते हैं। ये हो सकता है, न, ऐसा नहीं हो सकता। आकृतियाँ नहीं बदलतीं। आकृतियाँ तो भगवान ने जैसी बना दी हैं, माँ के पेट में से जिस दिन से आदमी बना है, बनावट तो वैसी ही रहेगी, बनावट को आप कैसे बदल पाएंगे, बनावट नहीं बदल सकती। पर, प्रकृति बदल सकती है। जिस त्रिवेणी का स्नान करने के लिए गोस्वामी जी ने महातम बताया है, वास्तव में वो पानी की तीन धाराओं का संगम नहीं है, वो तो उसके प्रतीक हैं। असल में त्रिवेणी, (जिसके) महातम बताया गया है, वो वो है जिसको आप त्रिपदा गायत्री कहते हैं। ये तीन धारा वाली गायत्री है। तीन धारा वाली गायत्री—जिसको सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् भी कहते हैं। इसको सत्, चित्, आनन्द भी कहते हैं। फिर मैं आपको व्यावहारिक इसके अर्थ करके बताता हूँ। इसको उपासना, साधना और आराधना भी कहते हैं। तीन का संगम है ये। आपको तीन काम करने पड़ते हैं। तीन काम आप जब करते हैं फिर आपको पूर्णतया सिद्ध पुरुष बन जाते हैं और आध्यात्मिक उन्नति के सारे लाभ उठा लेते हैं। उपासना की बाबत कहा था न—भगवान के साथ सम्बन्ध जोड़िए, भगवान का अनुशासन स्वीकार कीजिए, भगवान की सत्ता पर विश्वास कीजिए, कर्मफल और न्यायकारी होने की बात को मान्यता दीजिए, फिर आप उसी के साथ-साथ मिल जाइए, उसी में घुल जाइए, खप जाइए, उसी के सिद्धान्त और उसकी इच्छा के अनुसार चलना शुरू कीजिए। धारा नम्बर एक, ये गंगा हो गई त्रिवेणी की और दूसरी वाली धारा यमुना। यमुना वाली क्या? कल हम आपको बता के चुके हैं। साधना वाली—साधिए, अपने आप को साधिए, अपने आप को गलाइए, अपने आप को ढालिए, अपने आप को गलाइए, अपने आप को ढालिए, अपने आप को कुसंस्कारों से मुक्ति दिलाइए, अपने आप को सज्जन और सभ्य बनाने के लिए भरपूर कोशिश कीजिए।

साधना उसकी बात थी जिसकी कह चुके थे। आज आपको एक नई बात बतानी है। एक और भी चीज है—इसी त्रिवेणी के साथ में मिलाना पड़ेगा। उसका नाम है आराधना, आराधनाआराधना किसकी? देशवासियों की, उपासना भगवान की, साधना आत्मदेव की, और आराधना, आराधना समाज की। आराधना समाज की। आपका समाज के प्रति भी कुछ कर्तव्य है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। इसकी जो उन्नति हुई है अकल से नहीं हुई है, अकल तो कितनी है, अकल तो बहुतों में ज्यादा है, आदमी की अपेक्षा बहुत से अतीन्द्रिय क्षमता वाले जानवर हैं जिनकी अकल मनुष्य से बहुत ज्यादा है, आदमी का पुरुषार्थ का शरीर, क्या पुरुषार्थ है? हाथी से बड़ा पुरुषार्थ? विवेक से बड़ा पुरुषार्थ? घोड़े से बड़ा पुरुषार्थ? ज्ञानी से बड़ा पुरुषार्थ? एक से एक बड़े पुरुषार्थी पड़े हुए हैं प्राणी, लेकिन आदमी की जो उन्नति हुई है, वास्तव में सहकारी समाज की वजह से हुई है। एक ने दूसरे को सहायता की है, दूसरे ने तीसरे को सहायता की है। अगर ये सहायता का क्रम चला न होता तो आदमी की उन्नति किसी प्रकार सम्भव न हुई होती। यहाँ तक की जिस बुद्धि के बारे में आदमी बड़ी-बड़ी डींग हाँकता है, वो बुद्धि भी उसके पल्ले न पड़ी होती। ये सहकारिता, इस सहकारिता को हमको कायम रखना है। आदमी को और हमको जो कुछ मिला है, ये दूसरों की कृपा से मिला है। माँ ने हमको दूध पिला कर बड़ा किया, जानवर का बच्चा पैदा होने के बाद में, खरगोश का बच्चा पैदा होते ही घास खाने लगता है और भाग जाता है। लेकिन मनुष्य का बच्चा, मनुष्य का बच्चा तो कितना बड़ा हो जाता है, माँ की देखभाल के बिना, संरक्षण के बिना, उसका दूध पिये बिना, उसकी सहायता पाये बिना करवट तक नहीं बदल सकता। एहसान हुआ न, बाप का एहसान न हो तब, कपड़ा बाप नहीं पहनाये तब, स्कूल के लिए फीस नहीं दे तब, एहसान है न। आपका ब्याह हो गया न, शादी हुई है न आपकी, ये शादी की बीवी कहाँ से आई आपकी। किसी और ने दी न, किसी ने पाली, पढ़ाई, इतनी बड़ी की, तब आपको दी न। आदमी एहसानों से दबा हुआ है, कपड़ा आप जो पहनते हैं, दवाएँ जो इस्तेमाल करते हैं, किताबें जो आप पढ़ते हैं या जो उद्योग-धंधा करते हैं, अपने आप में कैसे कर सकते हैं? ये समाज का ऋण है जिसकी वजह से आप इतने उन्नतिशील हुये हैं। इस ऋण को चुकाना आपका काम है अर्थात समाज सेवा करना आपका काम है। आपने असंख्यों की सहायता से जीवन का वर्तमान स्वरूप प्राप्त किया है। आपका ये फर्ज़ हो जाता है कि उसी समाज का, (जिसके कि) जिसने भिन्न-भिन्न प्रकार से आपको सहयोग दे कर के आपको पढ़ा-लिखा बनाया है, शिक्षित बनाया है, सभ्य बनाया है, उद्योग-धंधों को चला सकने वाला बनाया है, अफसर बनाया है, गृहस्थ बनाया है—उस समाज के ॠण को चुकाने के लिए आपको (आपको) उसकी सेवा करनी चाहिए। सेवा अगर इन्सान न करे तब, तब कर्जदार होकर मरेगा और कर्जदार होकर के मरेगा तब, इस जीवन में आपने जो भी पा लिया हो बात अलग लेकिन ये सारे के सारे कर्जे जो आप इस जीवन में समाज के भिन्न-भिन्न पक्षों के द्वारा मिले हैं आपको कर्ज चुकाने पड़ेंगे और चौरासी लाख योनियों में रह-रह कर के, और घूम-घूम करके जिन-जिन लोगों के एहसान अपने इन्सान की जिन्दगी में जमा कर लिये हैं, वो सब चुकाने पड़ेंगे। इसीलिए ऋण मुक्ति के हिसाब से भी, ऋण मुक्ति के हिसाब से भी आपको, आपको समाज की सेवा करनी चाहिए।

ऋण मुक्ति के अलावा एक और पक्ष है—आपको उन्नतिशील बनने के लिए, समर्थ बनने के लिए, समर्थ बनने के लिए, उन्नतिशील बनने के लिए, आपको सेवा धर्म ग्रहण करना चाहिए। और आप सेवा धर्म ग्रहण नहीं करेंगे, सेवा धर्म ग्रहण नहीं करेंगे तो आप विश्वास रखिए आपकी उन्नति के सारे के सारे रास्ते बन्द हो जाएँगे, सब रास्ते बन्द हो जाएँगे। देखा है न, आप खाते हैं, खाते तब हैं जब आप टट्टी जाते हैं और पेट को खाली कर लेते हैं। खाली न करें तब, तब आप खा नहीं सकते। सांस को पहले आप बाहर निकाल लेते हैं तब आपको प्राणवायु का नया सिलसिला मिलता है। अगर आप न निकालें तब, न छोड़ें तब, जो कुछ भी पल्ले पड़ा हुआ है उसको कृपण की तरीके से, कंजूस की तरीके से दाब के बैठ जायें तो अपने खर्चे के लिए रखें, दूसरों के लिए न बाँटें तब, मुश्किल हो जाएगी। ये आप ध्यान रखना, ध्यान रखना।

भेड़ ने अपनी ऊन दूसरों को देने का निश्चय कर लिया कि हमारी ऊन है तो हमारी, उगती तो हमारे शरीर पर है पर इस ऊन की दूसरों को भी तो जरूरत है। इसलिए खुशी से, ये मंजूर कर लिया कि (हमारी भेड़ को) हमारी ऊन को जो लोग काटें खुशी से काटें, इससे कपड़े बनाना चाहे खुशी से बना लें, भेड़ क्या नुकसान में रही? आपकी दृष्टि से तो नुकसान में रहनी चाहिए, क्योंकि उसने अपना नुकसान उठा लिया, बिना कीमत के अपनी ऊन दे दी। लेकिन भगवान की तरफ आपने देखा क्या? भगवान बराबर भेड़ को नई ऊन देते चले जाते हैं। हर साल, हर साल उसको तीन इंच ऊन मिल जाती है और अगर मान लीजिए भेड़ बारह वर्ष तक जी है तो छत्तीस इंच अर्थात तीन मीटर, करीब उसको ऊन मिल जाती है भगवान के दरबार से। अगर भेड़ देना बन्द कर दे तब, भेड़ की ऊन कटना बन्द हो जाए तब, तब फिर जितनी ऊन पहले दिन पहले समय जन्म के समय पर लाई थी भेड़, बस उतनी रहेगी, भगवान देगा ही नहीं। जब भेड़ त्याग करने को तैयार नहीं है तो नेचर क्यों त्याग करेगी।

आप इस सिद्धान्त को समझते नहीं हैं—(समझने की) न समझने की वजह से ही आदमी कंजूस बनता जाता है, कृपण बनता जाता है, लोभी बनता जाता है, संकीर्ण बनता जाता है, स्वार्थी बनता जाता है। इस बात को हटाना चाहिए। (आ) आराधना इससे कम में नहीं हो सकती है।

रीछ ने किसी को बाल नहीं दिया और रीछ जागात में रह गया, पेड़ों ने, पेड़ों ने अपने फल जमीन को दिये, नेचर ने उनको हर साल फिर नये फल दिये। अगर पेड़ ने फल देना बन्द कर दिया होता तब फिर नये फल नहीं आते, नये फल नहीं आते। बीज गलता है, गलने के बाद में फलता है, अगर बीज गलना बन्द करदे तब, तब फिर फलेगा ही नहीं, जितना है उतना ही रह जायेगा। उन्नति के लिए, विकास करने के लिए, और अपने आप को महत्त्वपूर्ण और बड़ा बनाने के लिए, बीज की तरीके से हर आदमी को गलना चाहिए। गलने का मतलब ये नहीं है कि अपने आत्महत्या कर डालें, तबाह कर डालें। इससे मतलब ये है कि समाज की सेवा के लिए अपने आपको गलाते जाइये, अपने आपको खतम करते जाइये, अपने आपको त्याग करते जाइये, फिर आप देखेंगे कि आपकी आराधना कैसा चमत्कार लाती है। प्राचीनकाल के ऋषियों में से हर आदमी ने, हर भक्तों में से हर आदमी ने समाज सेवा की है। ये ख्याल ठीक नहीं है कि भजन करने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं, भगवान के लिए, प्राप्त करने के लिए अपना मन और अपना जीवन सुधार करने के लिए साबुन की तरीके से अपने आपको धोना तो चाहिए राम के नाम से, लेकिन राम का नाम लेने भर से भगवान क्यों प्रसन्न होने लगे? भगवान कोई चापलूसी पसन्द हैं? भगवान कोई रिश्वत खोर हैं कि आपकी चापलूसी सुनते रहें और आपका अनुग्रह कर दें। नहीं, भगवान के यहाँ (की) कसौटी एक ही है। वो कसौटी एक है कि आप कितने उदार हैं। अगर आप उदार हैं तो भगवान (के) का दरवाजा आपके लिए (आपका) उदारतापूर्वक खुला हुआ है। अगर आपने (अगर) अपना दरवाजा बन्द करके रख लिया है तब, तब तो भगवान का दरवाजा भी बन्द हो जायेगा। श्रीसन्तों में से प्रत्येक को भक्तजनों में से प्रत्येक को अपने जीवन को सेवाभावी बनाना पड़ा है।

जिन ॠषियों के बारे में आपको ये मान्यता है कि ॠषि जंगलों में रहते थे, और भजन करते थे, (और) भजन करते थे, भजन करते थे - ऐसी बात नहीं है - भजन भी करते थे - तीर्थ संचालन करते थे, गुरुकुल चलाते थे, आरण्यक चलाते थे, प्रव्रज्या करते थे, (परिभ्रमण) परिभ्रमण करते थे, और गाँव-गाँव जा कर के (उसका) सन्देश सुनाते थे। नारद जी को आप नहीं जानते? नारद जी को देखा न, सेवामय जीवन था न, जहाँ-तहाँ, जहाँ-तहाँ चले गए। चरक का जीवन पढ़ा है न - चरक ने (सारी जिंदगियाँ) सारी जिन्दगी में जड़ी-बूटियों की खोज की, और (सु) सुश्रुत ने शल्य-क्रिया का आविष्कार किया। नागार्जुन ने क्या नहीं किया, व्यासजी ने महाभारत काण्ड लिखे थे न, आप प्रत्येक ऋषि के बारे में देख लीजिए। सब सेवाभावी थे। एक भी ऋषि ऐसा नहीं हुआ है जो सेवा भावना से रहित रहा हो। सेवा भावना से रहित रहेगा तो भगवान उसकी सेवा करने से इन्कार कर देगा।

भजन आवश्यक तो है, ये कोई नहीं कहता कि भजन आप ना कीजिए, जरूर कीजिए। लेकिन भजन के साथ-साथ में, भजन के साथ-साथ में सेवा को मिला लीजिए क्योंकि भज सेवायम, संस्कृत में एक धातु है जिससे कि भजन शब्द बना है वो धातु का नाम है भज, जिसका अर्थ होता है सेवा, सेवा जिस जीवन में न हो (वो) उसका भजन कैसा, जो भजन न करता हो भक्त कैसा, इसलिए सेवा को आप हटाइये मत। सेवा को अगर विहीन जीवन कर देंगे और आपकी उपासना बिल्कुल एकांगी हो जायेगी और आप उस सुख से वंचित रह जाएँगे जो आपको मिलना चाहिए। हर भगवान के भक्त को प्राचीन काल में ये ही करना पड़ा है।

आपने द्रौपदी की कथा सुनी है, साड़ी भगवान ने दी थी और वो साड़ी इस कीमत पर दी थी उन्होंने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा पहले एक सन्त को दिया था। वो ही सन्त को जब दिया हुआ टुकड़ा बढ़ता हुआ चला गया, भगवान ने गट्ठा भर कर उनको दे दिया। द्रौपदी अगर उदार न होती तब, कृपण होती तब, स्वार्थी होती तब, सन्त को नंगा होता हुआ देख करके मुंह मोड़ कर चली गई होती तब, तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि भगवान भी उससे मुँह मोड़ कर चले गये होते। कृपण आदमी के लिये रास्ता बन्द है, जाने कितनी कथा हमारी पुराणों में भरी हुई पड़ी हैं। आपने उस नेवले की कथा सुनी है जो सोने का हो गया था और आधा हिस्सा सोने का रह गया था। पाण्डवों के यज्ञ में गया था, रोने लगा था और क्या कहा आधा हिस्सा हमारा एक यज्ञ में पूरा हुआ और दूसरा यज्ञ में पूरा नहीं हुआ। लोगों ने पूछा भई तो कौन सा यज्ञ था जो इससे महाभारत के पाण्डवों से भी बड़ा यज्ञ था? उन्होंने कहा था एक ब्राह्मण ने एक सप्ताह के बाद में चार रोटियों का अनाज पाया, चार रोटियाँ बनाई, एक खुद, एक औरत को, एक बच्चे को, एक कन्या को थाली में रखी। उसको ध्यान आया अगर हमसे भी बड़ा कोई दु:खी इस संसार में है, तो पहला हक उनका है, पहले उनको देना चाहिए, (क्योंकि) सारा समाज एक है, (सा) सारी मानवता एक है, सारा विश्व एक है। उनसे भी कोई अभाव ग्रस्त जरूरतमन्द है तो पहला हिस्सा रोटी का हक उसका है। वो छत पर चढ़ के चिल्लाने लगा, हमको एक सप्ताह से अन्न नहीं मिला था और हमने थोड़ा सा अनाज पाया है और हमसे भी ज्यादा दुखी कहीं कोई हो तो उसका हक है हम उसको बुलाते हैं, वो आये और हमारी रोटी में से हिस्सा बटाये। कहते हैं, महाभारत कथा के मुताबिक एक चाण्डाल आ गया। उसने कहा एक महीने से हमको अन्न नहीं मिला है। तो उन्होंने कहा ठीक है आपको एक महीने से नहीं मिला है आप पहले से भोजन कर लीजिए, बाद में देख लेंगे। एक महीने आप जी सकते हैं तो हम भी जी सकेंगे। उन्होंने ब्राह्मण ने अपनी रोटी दे दी, उसकी धर्म पत्नी ने भी एक रोटी दे दी, बच्चे ने भी अपनी रोटी दे दी, कन्या ने भी, चार रोटियों को खा करके जहाँ चाण्डाल ने कुल्ला किया था उस स्थान पर (से) पानी में नेवला बैठ गया, नेवला का उतना अंश सोने का हो गया।

नेवले से लोगों ने पूछा वो क्या था, उन्होंने कहा वो धर्म था जो करुणा के रूप में आदमी की परीक्षा करने आता है। जिस आदमी के भीतर करुणा न हो वो कोई धर्मात्मा है?, वो कोई भक्त हो सकता है? नहीं, भक्त नहीं हो सकता। जिसके हृदय में करुणा नहीं है, दया नहीं है, सेवा की वृत्ति नहीं है, जो उदार नहीं हो सकता, जिसका मन कोमल नहीं है, जो अपने सुख को बाँट के नहीं खा सकता, जो दूसरे के दु:खों को बँटा नहीं सकता - भक्त कैसे हो जाएगा। अगर आप दूसरों के दुखों को बटाँएगे, अपने सुखों को बाँटेंगे, उसका तरीका एक ही हो सकता है कि आप जीवन में सेवा के लिए स्थान दें। आप सेवा के लिए स्थान दें, कहीं न कहीं आप कोई न कोई तरीका ऐसे निकालते रहें, जिससे कि आपका समय का एक बड़ा अंश, और आपके साधनों का एक बड़ा अंश, परोपकार के लिए, और परमार्थ के लिए खर्च होता रहे।

परोपकार और परमार्थ में दो बातें आती हैं, एक बात आती है यज्ञार्थाय, एक आती है विपद् वारणाय। विपद् वारणाय क्या? दुखियारों की सेवा करना। जो भूखे हैं, गरीब हैं, कंगाल हैं, कोढ़ी हैं, दुखी हैं, उनकी आप सहायता कर देते हैं तो ये पुण्य का, परमार्थ का एक अंश कहलाता है। इसका नाम है विपद् वारणाय। मुसीबत से आदमी को छुड़ाने के लिए। भूकम्प आते हैं, बाढ़ आती है, बीमारी फैल जाती है, लोग अनेक आदमी दानी और सेवा भावी लोग जाते हैं और सेवा करते हैं, एक अंश है ये समग्र नहीं है। आप ये मत सोचिए समग्र है। दूरदर्शियों की सेवा इससे दूर है, दूरदर्शी समाज की जो सेवा करते हैं वो यहाँ तक नहीं ले रह जाते हैं क्योंकि इसको तो कोई भी कर सकता है। इसमें प्रकृति की प्रेरणा भी है, आत्मसन्तोष भी है, समाज का सम्मान भी है, कई तरह की चीजें मिल जाती हैं इसलिए आमतौर से आदमी मुसीबतों से दूर करने वाले कामों को करने के लिए कई काम कर लेते हैं जैसे प्याऊ लगा देते हैं, धर्मशाला खोल लेते हैं, शरबत बाँट देते हैं, कम्बल बाँट देते हैं वगैरह-वगैरह। लेकिन ये लाभ तो किसी-किसी की समझ में आता है। लोगों की, लोगों की अन्तरात्मा को ऊँचा उठाने के लिए, उनके जीवन को विकसित करने के लिए, आदमी को (सं) सुसंस्कारी बनाने के लिए जो शिक्षण दिया जाता है, परामर्श दिया जाता है, जो साधन दिए जाते हैं, वो वास्तव में यज्ञार्थाय है। यज्ञाथार्य का पुण्य विपद् वारणाय की तुलना में हजार गुना ज्यादा माना गया है क्योंकि विपद् वारणाय से मनुष्य की शारीरिक मुसीबतें दूर होती हैं बस। शारीरिक मुसीबतें, आदमी भूखा है तो आप खाना खिला दीजिए, शरीर को ही तो खिला देंगे, आत्मा को क्या खिलायेंगे, आत्मा को रोटी थोड़े ही खिला सकते हैं आप। तब आत्मा को, अन्त:करण को, जिसके आधार पर हम खुराक देते हैं, साधन देते हैं, असल में उसी से आदमी का कल्याण होता है, उसी से आदमी की भलाई होती है। इसीलिए सबसे बड़ा पुण्य, सबसे बड़ा परोपकार - आराधना - ये मानी गई है कि हम दूसरों को प्रकाश दें, रोशनी दें, रास्ता बताएँ, ऐसे परामर्श दें जिससे कि वो लोग ऊँचे उठें - अपने आप का जीवन का स्वरूप ऐसा बनाएँ जिसकी नकल करने के लिए बहुत से आदमियों की इच्छा होने लगे। ये वास्तव में परोपकार का काम है। आप दुःखी को सहायता न कर सकते हैं तो न सही, आप वातावरण बनाइए। प्रवृत्तियाँ पैदा कीजिए न।

हजारी किसान का नाम आपने सुना है। हजारी किसान ने किसी भूखे को रोटी तो नहीं खिलाई और प्याऊ तो नहीं खोली पर वो जानता था कि पेड़ों से सारा वातावरण बनता है, हरियाली बनती है, स्वास्थ्य बनता है इसीलिए वो गाँव-गाँव घूमता रहा और अपनी जिन्दगी में हजार आम के बगीचे लगा दिये। हजार आम के बगीचे लगा देने से सारे का सारा वो इलाका इतना सशक्त हो गया, वहाँ के लोग के स्वास्थ्य ऐसे बढ़िया हो गये, वहाँ के लोगों की तबीयतें ऐसी बढ़िया हो गईं, वहाँ की हरियाली ऐसी पैदा हो गई कि लोगों ने एहसान माना और उसका नाम हजारी किसान के नाम पर हजारी बाग जिला रख दिया। आप ऐसा नहीं कर सकेंगे क्या? परोपकार से और आगे बढ़िये, नकल कीजिए, किसकी? जिससे हजारों का भला होता हो, एक आदमी को आप दुख को दूर कर दें वो भी है तो अच्छी बात, खराब बात तो वो भी नहीं है, उससे हजार गुनी, लाख गुनी बात ये है कि लोगों के विचारों को, लोगों की भावना को (दिशा) आप ठीक कर दें, जिन -जिन लोगों ने ऐसा किया है असल में वो पुण्य आत्मा कहलाई गई, कौन? नारद जी का मैंने जिकर किया था न, नारदजी ने उन लोगों को दिशायें दी और दिशायें देने के बाद में न जाने क्या से क्या कर दिया, आप उसी तरह से विचार कीजिए, जो पुण्य परम्पराएँ समाज में फैलानी हैं, उसके लिए आप परिश्रम कीजिए। जिन कुरीतियों की वजह से समाज का सत्यानाश हुआ जाता है, उन (कुरीतियों) कुरीतियों (के सं) संघर्ष करने के लिए आप सीना तान के खड़े हो जाइए। पुण्य, युद्ध पुण्य आप ये मत सोचिये लड़ाई झगड़े की बात कही जा रही है, लड़ाई झगड़े की बात तो भगवान भी कह रहे थे, अर्जुन को बार-बार कहा था कि आप लड़िये, तस्मात् युद्धाय युज्यस्व। लड़, लड़ने के लिए दौड़ लगा, लड़ना भी है कोई पुण्य। हाँ, ये भी पुण्य है। पुण्य को आप सीमाबद्ध मत कीजिए, केवल पानी पिलाने को पुण्य मत मानिये, रोटी खिलाने को पुण्य मत मानिये, व्यक्तित्वों को उछाल देने का नाम, सद्ज्ञान देने का नाम, सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन का नाम, ये भी पुण्य और परोपकार हैं।

मसलन जो आप लोग इस मिशन को आगे बढ़ा देते हैं, जिसमें कि असंख्य मनुष्यों के (भ) उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना (है), और, (जो) महाविनाश से रोकथाम करने के लिए जिसमें बहुत (काफी) गुंजाइश है। आप ऐसे पुनीत काम में संलग्न होते हैं, अपना श्रम देते हैं, अपना समय देते हैं, अपने प्रभाव का उपयोग करते हैं, तो आप निश्चित (स) रूप से समझिए ये किसी सोना दान करने वाले राजा कर्ण से कम महत्त्व का काम नहीं है। आपको सेवा तो करनी ही चाहिए। सेवा अगर आप नहीं करेंगे तब, तब आपकी (आपकी) अन्तरात्मा प्यासी रह जाएगी, भूखी रह जाएगी, आपकी अन्तरात्मा को आनन्द मिलेगा ही नहीं, जो किसी देने वाले को मिलता है। देवता उन्हें कहते हैं जो दिया करते हैं, आप तो देव योनि में जा रहे हैं न, आप तो नर पशु की योनि छोड़ करके मनुष्य में आ गये न, अब एक और कदम बढ़ाइए - अब आपको देवता बनना है। देवता किसे कहते हैं? जो दिया करता है। देने वाले का नाम सेवाभावी। देने वाले का नाम सेवाभावी। सेवाभावी आप बन जाइये, देने वाले बन जाइये, आप देने वाले बनेंगे तो आप देखेंगे कि आपका स्वर्ग आपके चरणों में आ गया, स्वर्ग से आप ज्यादा बेहतरीन और सुखी होंगे, स्वर्ग में जाने वालों की तुलना में ज्यादा सुखी होंगे। सेवा करने से और परोपकार करने से जो आनन्द आता है उसकी अनुभूति आपको है नहीं, जिस दिन आपको अनुभूति आयेगी आप ऋषि के स्वर में स्वर मिला करके एक शब्द कह रहे होंगे। क्या कह रहे होंगे? क्या कह रहे होंगे - न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गं नापुनर्भवम। कामये दुःख तप्तानाम, प्राणिनाम आर्तनाशनम, प्राणियों के दुख जो अभाव के कारण भी होते हैं, अज्ञान के कारण भी होते हैं, अभाव के कारण, अशक्ति के कारण, और अज्ञान के कारण - सारे के सारे संसार में दु:ख फैले हुए हैं। आप अभावों को दूर कीजिए - दान दीजिए, उपकार कीजिए, अपने हिस्से में से एक अंश (दु) दुखियारों की सेवा के लिए रखिए - ये अभावों को दूर करना हुआ। अशक्ति को - लोगों की हिम्मतें बढ़ा दीजिए, ऐसी वृत्तियों को बढ़ने दीजिए जिससे कि आदमी शक्तिवान बनते हैं। आप गृह-उद्योगों से ले कर के हरित-क्रान्ति तक के अनेक कार्य ऐसे कर सकते हैं, जिससे कि आदमी भावनात्मक दृष्टि से (स) समर्थ बनते हैं। और आप ऐसे भी काम कर सकते हैं जिससे कि अज्ञान दूर होता है। आजकल ज्ञान-यज्ञ को आगे बढ़ाने के लिए, विचार क्रान्ति के लिए, आज (आज) अपना कितना काम प्रारम्भ किया हुआ है। आपको संसार में से अज्ञान को मिटाना है। अज्ञान, अज्ञान के कारण से ही अनास्था उत्पन्न हुई, अनास्था के कारण से आदमी भटक गया है और भटका हुआ आदमी जगह-जगह ठोकर खा रहा है, जगह-जगह दुख पा रहा है। जगह-जगह ठोकर खाने वाले और दुख पाने वाले आदमी को रास्ता बताना चाहिए, आदमी न जाने क्या से क्या चीज चाहता है, इसको मालूम ही नहीं है हमारी हमारी नाभि में रखा हुआ है, कस्तूरी हिरन की तरीके से मारा-मारा फिर रहा है, मृग तृष्णा की तरीके से आदमी मारा-मारा फिरता है, थकान और निराशा में डूबा-डूबा फिरता है, आपको रास्ता बताना है। रास्ता अगर बताने लगे आप मार्गदर्शक हो जाएँगे, आप ऋषि हो जाएँगे और आपकी सेवा बहुत उच्च कोटि की मानी जायेगी। ऋषियों ने वोही उच्च कोटि की सेवा की थी, आदमियों को रास्ता बताया था, आदमी को दिशा दी थी, आदमी की धाराओं को बदल दिया था, आप उस काम को भी कीजिए, सेवा के लिए मना थोड़े ही करता हूँ कि आपको दुखियों की सेवा नहीं करनी चाहिए और प्याऊ नहीं लगानी चाहिए और भूखे को रोटी नहीं बाँटनी चाहिए, वो तो करनी चाहिए लेकिन इसको आप भूलिये मत, असली सेवा ये है, ब्रह्मदान ये ही है, असली परोपकार ये ही है, आराधना ये ही है। राजा कर्ण सवा मन सोना रोज बाँटते थे और सन्त सवा मन (सवा मन) ज्ञान रोज बाँटता है। हम सवा मन ज्ञान रोज बाँटते हैं। आपको भी सवा मन ज्ञान रोज बाँटने के लिए अपनी भावी योजना बनानी चाहिए, और जीवन को आराधना से भरा-पूरा करना चाहिए।

॥ॐ शान्तिः॥