साधना — पात्रता का विकास
कल आपको उपासना की महत्ता के बारे में बताया जा रहा था। भगवान के नजदीक आप बैठें, उपासना अगर आप करें, आप देखेंगे कि उनके सारे गुण आपमें आते हुए चले जाते हैं। बिजली को छूते हैं तो बिजली को जो छूता है, उसी में करंट आ जाता है। भगवान को जो छुवेगा भगवान, भगवान का उसमें करंट आ जाएगा। दो तालाबों को आपस में अगर जोड़ दें तो एक तालाब का ऊँचे वाले तालाब का लेवल नीचे घटता हुआ चला जाता है और दोनों का लेवल एक हो जाता है। भक्त और भगवान एक हो जाते हैं। सच तो ये है कि भक्त, भगवान से भी बड़े हो जाते हैं। क्योंकि भगवान भक्त को श्रेय देना, (देना) चाहते हैं। उसका उत्साह बढ़ाना चाहते हैं और दूसरों का मन आकर्षित करना चाहते हैं। इसलिए जो असली भक्त हैं वो भगवान से बड़े, (बड़े) माने जाते हैं।
सुदामाजी के पाँव धो करके भगवान ने पिए थे न। शबरी के जूठे बेर भगवान ने खाये थे न! गोपियों के यहाँ भगवान छाछ माँगने गए थे न! बलि के दरवाजे पर बावन अंगुल के बन करके भगवान गए थे न! कर्ण के दरवाजे पे सोना माँगने के लिए साधु और भिखारी का रूप बना के गए थे न! ये बड़प्पन है, भक्त का बड़प्पन है। भृगु ने भगवान के सीने में लात मारी थी, लात मारी थी कि आप कैसे भगवान हैं जो अपने कर्तव्य का ध्यान नहीं रखते और भगवान ने महर्षि भृगु की लात के निशान को अपनी छाती पर अभी तक सुरक्षित रखा हुआ है। विष्णु की मूर्तियों में महर्षि भृगु की लात का निशान भी अभी तक बना रहता है। महर्षि भृगु बड़े थे भगवान से। भक्त बड़ा होता है भगवान से; पर सही भक्त होना चाहिए।
सही भक्त की (कल) कल हम आपको पहचान बता (के) चुके हैं, और ये बता (के) चुके हैं कि भक्त को भगवान के अनुशासन पर निर्भर रहना चाहिए। भगवान को अपनी मर्जी पर चलाने की बात नहीं सोचनी चाहिए; अपनी मनोकामना की बाबत ध्यान नहीं रखना चाहिए कि हमारी मनोकामना तो खत्म कर दी गई। भक्त अपनी मनोकामना खत्म कर देते हैं और भगवान की मनोकामना को अपने ऊपर बनाए रहते हैं।
नारद एक बार अपनी मनोकामना माँगने के लिए भगवान के पास गए और ये कहने लगे—एक युवती का स्वयंवर होने वाला है और मुझे राजकुमार आप बना दीजिये, मुझे सुन्दर बना दीजिए, (और) ताकि मेरी अच्छी लड़की से शादी भी हो जाए और मैं सम्पन्न भी हो जाऊँ; राजा से दहेज़ भी मिलेगा, उससे मालदार भी हो जाऊँगा। मालदार बनने का और सम्पन्न बनने का दो ही तो महत्त्वाकांच्छाएँ हैं, दो ही तो मनोकामनाएँ हैं और क्या मनोकामना है? एक लोभ की मनोकामना है, एक मोह की मनोकामना है। दो के अलावा और कोई तीसरी मनोकामना दुनिया में है ही नहीं। इन दो मनोकामनाओं को लेकर जब नारद भगवान के यहाँ गए, तो भगवान के अचम्भे का ठिकाना नहीं रहा। भक्त कैसा? जिसकी मनोकामना। मनोकामना होगी तो भक्त नहीं होगा और भक्त होगा तो मनोकामना नहीं होगी। दोनों का निर्वाह एक साथ नहीं रह सकता। जहाँ अँधेरा होगा, वहाँ उजेला नहीं होगा; उजेला होगा, वहाँ अँधेरा नहीं रहेगा। दोनों एक साथ जोड़ कैसे होगा? इसीलिए भगवान सिर पर हाथ रख करके जा बैठे। अरे! तुम क्या कहते हो नारद? लेकिन नारद ने अपना आग्रह जारी रखा, नहीं मेरी मनोकामना पूरी कीजिए, मुझे मालदार बनाइये, मुझे विषय-वासना सम्पन्न बनाइए। भगवान चुप हो गए। नारद ने समझा चुप्पी इन्होंने बना ली है, शायद मेरी बात को मान लिया होगा। भगवान को माननी चाहिए भक्त की बात ऐसा ख्याल था।
नारदजी मोह में डूब गए थे। उनका भी ऐसे मन आ गया बस वो चले गए स्वयंवर में। स्वयंवर में जाकर के बैठे। राजकुमारी ने देखा कौन बैठे हुए हैं? नारद जी का और भी बुरा रूप बना दिया बन्दर जैसा। राजकुमारी देखकर के मजाक करने लगी, हँसने लगी; ये बन्दर जैसा कौन आ बैठा है? बस, उसने माला तो नहीं पहनाई और दूसरे राजकुमार को माला पहना दी। नारद जी फिर दुःखी हुए, और फिर विष्णु भगवान के पास गए; और गालियाँ बकने लगे। विष्णु ने कहा अरे नारद! एक बात तो सुन। हमने किसी (मनोकामना) भक्त की मनोकामना पूरी की है क्या आज तक। इतिहास तो ला भक्तों का उठा करके। जब से सृष्टि बनी है और जब से भक्ति का विज्ञान बना है, तब से भगवान ने एक भी (भगवान) भक्त की मनोकामना पूरी नहीं की है। हर भक्त को मनोकामनाओं का त्याग करना पड़ा है और भगवान की मनोकामना को अपनी मनोकामना बनाना पड़ा है। बस, कल हम यही बता रहे थे कि आपको अगर उपासना कर सकते हों, तो आप भी भगवान के बराबर के हो सकते हैं और उनसे बड़े भी हो सकते हैं और भगवान के गुण और आपके गुण एक बन सकते हैं; आप महापुरुष हो सकते हैं, महामानव हो सकते हैं, ऋषि हो सकते हैं, देवात्मा हो सकते हैं और अवतार हो सकते हैं, अगर आप उपासना का ठीक तरीके से अवलम्बन लें तब। बस कल का ये विषय था।
आज दूसरी बात बताते हैं आपको। (अपनी पात्रता का विकास) पात्रता का विकास आपको करना पड़ेगा, पात्र इसके लिए बनना पड़ेगा। पात्र अगर न होंगे तब? पात्र अगर न होंगे तब आपको किस तरीके से होगा। शादी कोई लड़की करना चाहे किसी अच्छे लड़के से और वह बुड्ढी हो तब? बुड्ढी हो तब? गूँगी, बहरी, अन्धी हो तब? तो कौन शादी करेगा? इसीलिए पात्रता बहुत जरूरी है। कल हमने कहा था न उस दिन आपसे कहा था कि पानी का गड्ढा होना जरूरी है, बादलों की कृपा प्राप्त करने के लिए। बादल तो बरसते ही रहते हैं। उनकी कृपा तो सबके ऊपर है। पर गड्ढा जहाँ होगा, वहीं तो जमेगा न। गड्ढा न होगा तब? सूरज की कृपा तो हरेक के ऊपर है; पर जिसकी आँखें खराब हो गई हों, उसको क्या कर लेगा सूरज! दुनिया में एक से एक सुहावने दृश्य (दिखाई) दिखाई पड़ते हैं; एक-से सुहावने दृश्यों को देख कौन सकेगा? जिसकी (आँखों का) आँखों का तिल साबुत होगा, वही तो देखेगा? जिसकी आँखों का तिल साबुत नहीं है, वो कैसे देख पायेगा! जरा आप ही तो बताइये। जिसकी कानों की झिल्ली खराब हो गई है, दुनिया में एक-से बढ़िया संगीत और आवाज निकलती हैं, पर कानों की झिल्ली खराब हो जाए तब, तो दुनिया के संगीत सब मिल कर के भी आदमी का कोई सेवा नहीं कर सकते। और आदमी का दिमाग खराब हो जाए तब? एक से एक बढ़िया परामर्श देने वाले, एक-से सहायता देने वाले क्या सहायता कर सकते हैं? कोई सहायता नहीं कर सकते। कब किसकी? जिसकी के दिमाग खराब हो गया है। दिमाग खराब हो गया है क्या करेंगे? अपना दिमाग तो सही हो, अपनी झिल्ली तो सही हो, अपना अपनी आँखों का तिल तो सही हो। ये सही होगा, तो फिर सूरज भी सहायता करेगा, वायु भी सहायता करेगा, सब करेगा। पाँच तत्त्व दुनिया में हैं, जिसमें से हवा भी है, रोशनी भी है, सूरज भी है ये सब आदमी की सहायता करते हैं न। इन्हीं की सहायता से तो आदमी जिन्दा है; लेकिन आदमी जिन्दा तो होना चाहिए। मर गया होगा तब, साँस क्या करेगी? बहुत अच्छी प्रातःकाल की हवा है; हवा से फेफड़ों को बल मिलना चाहिए; मिलेगा तब न जिन्दा हो। जिन्दा नहीं हो, तो कैसे करेगी हवा। एक से एक बढ़िया आहार है और भोजन है; लेकिन आहार और भोजन के होते हुए भी अगर कोई आदमी, कोई आदमी का पेट खराब हो जाए तब? आप क्या खिला करके रहेंगे? और उल्टा पेट में दर्द होगा। आप पौष्टिक भोजन दीजिए, मलाई-मिठाई दीजिए। लेकिन अगर पेट नहीं है, पेट पचता नहीं है तो मलाई-मिठाई क्या करेगी? और जहर पैदा कर देगी। मेरा मतलब पात्रता से है।
आप ध्यान दीजिए, गौर कीजिए। पात्रता विकास किये बिना न संसार में कोई रास्ता है और न पात्रता का विकास किए बिना आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई रास्ता है। आपको अफसर बनना है? पढ़-लिखकर सर्विस कमीशन के सामने जाइये और अपनी पात्रता साबित कीजिये; अच्छा डिवीजन लाइये और अच्छे नम्बर दीजिये। देखिये आपको अच्छा स्थान मिल सकता है। नहीं साहब! हम परीक्षा से दूर रहेंगे; और जैसे भी है हम तो भगवान की आरती करेंगे; और पब्लिक सर्विस कमीसन कि आरती गायेंगे, हमको अफसर बना दीजिए। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकेगा। पात्रता विकसित करना बहुत जरूरी होता है। पात्रता का इससे क्या मतलब है? वही मेरा आज बताने का मेरा मन है। पात्रता का अर्थ होता है—जीवन को परिष्कृत करना। जीवन को परिष्कृत करने के लिए साधना करनी पड़ती है। भगवान को प्राप्त करने के लिए उपासना, भगवान को प्राप्त करने के लिए उपासना और अपने आपको पात्र बनाने के लिए साधना। साधना किसकी? अपनी। उपासना किसकी? भगवान की। साधना किसकी? अपनी। अपनी से क्या मतलब? अपनी से मतलब ये है कि जो हमारे भीतर जन्म-जन्मान्तरों के कुसंस्कार जमे पड़े हैं, उनको परिशोधन करना पड़ेगा, बचकानापन दूर करना पड़ेगा। बच्चे को तो कोई हिसाब नहीं होता। बच्चा कहीं भी पेशाब कर देता है, कहीं भी खड़ा हो जाता है, कुछ भी करने लगता है, कुछ भी चीज फैला देता है; लेकिन बड़ा आदमी तो न केवल स्वयं सँभाल के रहता है, बल्कि दूसरों की चीजों को भी सँभाल लेता है। ये बड़प्पन की निशानियाँ हैं। ये पात्रता से मेरा मतलब उसी का है। आदमी सभ्य, व्यावहारिक जीवन से सभ्य और चिन्तन की दृष्टि से सुसंस्कृत, चिन्तन की दृष्टि से सुसंस्कृत और व्यवहार की दृष्टि से सज्जन और सभ्य—इन दो, दो विशेषताओं को अपने भीतर पैदा करे आदमी, तो ये माना जाएगा कि उसने पात्रता का विकास कर लिया। पात्रता का अगर विकास कर लिया है, तो संसार में भी इज्जत और भगवान के यहाँ भी इज्जत। पात्रता का आपने विकास नहीं किया है, तो संसार में भी उपहास और तिरस्कार और भगवान के यहाँ भी नाराजगी। आप कहीं भी, कुछ भी नहीं पा सकेंगे। पात्रता जो ध्यान एकाग्र कीजिए। पात्रता आपके हाथ की बात है। उपासना भगवान का अनुग्रह, भगवान के हाथ की बात है; पर साधना तो आपके हाथ की बात है। अपने आपको सुसंस्कारी बनाने के लिए जो भी मुमकिन हो, वो आप पूरी शक्ति से और पूरी ईमानदारी से मेहनत कीजिए। आपको अनगढ़ को सुगढ़ बनाना है। अनगढ़ हमारा जीवन; चौरासी लाख योनियों में घूमने के बाद में न जाने कितने कुसंस्कार हमारे पास जमा हैं और वो कुसंस्कार अगर इसी तरीके से जमा रहे, तो दीवार की तरीके से खड़े रहेंगे और फिर हम लोगों को आगे नहीं बढ़ने देंगे। हथकड़ी और बेड़ियों के तरीके से रास्ता रोक लेंगे; और न हमको ऊँचा उठने देंगे, न आगे बढ़ने देंगे। इसीलिए कुसंस्कारों के विरुद्ध जद्दोजहद करना ये हमारा काम है। साधना इसी का नाम है। साधना करने से आपने देखा है न, कितनी-कितनी घटिया चीजें, मामूली चीजें, क्या-से-क्या बन जाती हैं! माली पेड़ों को काटता है, छाँटता है, चार कलम लगाता है। और जंगली पेड़ और माली के बगीचे के लगाये हुए पेड़ उनको आपने देखा नहीं है क्या? कैसे बढ़िया-बढ़िया गुलाब के फूल आते हैं! रंग-बिरंगे (गुलाब) फूल आते हैं। कितने बड़े-बड़े फूल आते हैं ये माली के हाथ की करामात है। क्यों? उन्होंने उन्हीं गुलाबों को जो जंगल में रहते हैं, खुशबू भी नहीं आती, बहुत छोटे-छोटे फूल होते हैं, उन्हीं, उन्हीं गुलाबों को ऐसे बना लेता है। इसका नाम क्या है? इसका नाम कलम लगाना कहिये, सुसंस्कारिता कहिये अथवा साधना कहिये। माली की साधना, पौधे के साथ और आपकी जीवात्मा की साधना अपने जीवन के साथ। जीवात्मा की साधना जीवन के साथ। जीवन को अगर परिष्कृत बना लें, व्यक्तित्व को अगर ऊँचा आप उठा लें, तो जरा मजा देखिये न। आपकी हैसियत कितनी बड़ी हो जाती है और आपकी जितनी हैसियत है, उसी हिसाब को आपको कीमत मिलना शुरू हो जाएगी। आप एम.ए. तक पढ़े हैं, तो ज्यादा पैसा मिलेगा मैट्रिक तक पढ़े हैं, तो कम पैसा मिलेगा और बिना पढ़े आदमी हैं, तो उससे भी कम पैसा मिलेगा। पात्रता बढ़ाइये न, कीमत बढ़ाइये न अपनी और जो चाहते हैं पाइये। कीमत आप बढ़ाना नहीं चाहते, माँग करके लेना चाहते हैं। प्रार्थना करेंगे, माँगेंगे, माँगेंगे। अरे बाबा! माँगने से तो पाँच पैसे भी नहीं मिलते; उसमें भी पात्रता की जरूरत होती है। अन्धा, कोढ़ी होगा, तो फिर शाम तक उसकी भीख में दो रुपये आ जाएँगे; हट्टा-कट्टा होगा, तो कोई पैसे तो देगा नहीं, गालियाँ और सुनाता रहेगा तुझे शर्म नहीं आती बेशर्म! भीख माँगने चला है। काम, मेहनत, मजदूरी क्यों नहीं करता? पात्रता तो भिखारी को भी चाहिए, भिखारी को भी चाहिए, फिर सामान्य लोग हों तो पात्रता के बिना दुनिया में कुछ चलता ही नहीं है। इसलिए पात्रता के लिए अपने गुण, अपने कर्म और अपने स्वभाव इन तीनों चीजों को परिष्कृत करना हर आदमी के लिए बेहद जरूरी है।
आध्यात्मिकता के रास्ते पर, जहाँ भगवान का पल्ला पकड़ना पड़ता है, वहाँ दूसरा वाला कदम ये उठाना पड़ता है कि हमारी साधना जीवन की क्रमबद्ध हुयी कि नहीं, हमने अपने को साध लिया कि नहीं। नहीं साधा, साध लेने से आदमी का मूल्य बढ़ जाता है। आप जानते हैं न! साँप को मदारी लोग पाल लेते हैं और सिखा लेते हैं। वो साँप जो आमतौर से हर आदमी को काट खाता है, वही साँप मदारी के बाल-बच्चों के गुजारे का कारण बन जाता है। बन्दर के बारे में आप जानते हैं न। बन्दर कितना वाहियात! किसी के कपड़े उठा के भाग जाता है, किसी को काट खाता है, किसी को क्या करता है; लेकिन वही बन्दर अगर पाल लिया जाता है, सिखा लिया जाता है और साध लिया जाता है, तो मदारी के बाल-बच्चों का गुजारा करने के लिए वही सबसे बड़ा आदमी हो जाता है। रीछ जानते हैं, कैसा खौफनाक होता है। लेकिन रीछ जब पाल लिये जाते हैं और साध लिये जाते हैं, तब रीछ ही अपने पालने वाले के गुजारा कर देते है। सर्कस के बारे में आप जानते हैं न। शेर कितना भयंकर और दूसरे जानवर कितने भयंकर! लेकिन वो रिंगमास्टर के द्वारा जब साध लिए जाते हैं, तो अपने मालिक को, सर्कस के मालिक को एक-एक दिन में हजारों रुपये कमा के देते हैं। पहले शेर, जो किसी को भी मार डाल सकते हैं, मार डाल सकते हैं, मालिक को दो-दो हजार रुपया रोज कमा के देते हैं। ये कैसे हो सका? साध लिया, साधना के द्वारा। साधना जिस तरीके से जंगली जानवरों की जा सकती है उसी तरीके से, उसी तरीके से जीवन की भी की जा सकती है। साधना अगर न की जाए तब? आदमी प्राकृतिक रूप से बड़ा वाहियात है, वनमानुष है। डारविन ने कहा था न कि बन्दर है; बन्दर नहीं है तो बन्दर का भाई बन गया। वनमानुष होते हैं, जंगलों में रहते हैं, देखे हैं न आपने? जंगलों में न इनको कपड़ा पहनना आता है, न इनकी कोई सभ्यता है, न इनकी कोई बातचीत है। ऐसे ही किसी तरीके से जैसे, जैसे बन्दर पाल लिये लेते हैं, ऐसे ही वनमानुष की तरीके से वो लोग भी गुजारा कर लेते हैं, जिनको जंगली लोग कहते हैं।जंगली लोग कहते हैं, जंगली लोगों को ही नर पशुओं में गिना जाता है।
रामू के बारे में सुना है न आपने। एक रामू नाम का लड़का था। आगरा जिले के भेड़ियों की माँद में पाया गया। तीन साल का का बच्चा था। भेड़िये उठा तो ले गए; पर खाया नहीं, पाल लिया उन्होंने। पाल लिया, पाल लिया। शिकारियों ने भेड़िये को मार करके उस (रामू) रामू मनुष्य के बच्चे को पकड़ लिया। बस फिर क्या हुआ? बस वो जंगली जानवरों के तरीके से रहता था। बोलता भी वैसे ही था, चलता भी वैसे ही था। कच्चा माँस खाता था। कुछ भी नहीं आया। उसको लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में भर्ती कर दिया गया। चौदह वर्ष की उम्र तक जिया; लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी कुछ बन नहीं सका। क्यों? क्योंकि छोटी उम्र में संस्कार नहीं डाले गये थे। संस्कार डालना आदमी के लिए बेहद जरूरी है। संस्कार के बिना आदमी स्वभाव का तो कैसा हो सकता है? फूहड़ है, अनगढ़ है, बेसिलसिले का है। बेहूदा है। इसीलिए आपको, अपने आपको संस्कारवान स्वयं बनाना चाहिए। कौन बनाएगा? दूसरा कहाँ तक बनाएगा? बचपन में तो होता भी है। गुरुकुलों में ऋषि लोग छोटे बच्चों को महापुरुष बनाने की शिक्षा दिए देते भी हैं। आरण्यकों में वानप्रस्थों को भरती करने के बाद में शिक्षण देने की बात भी चलती है; पर सामान्य जीवन में कैसे चले? बताइए आप। सामान्य जीवन में कौन पीछे लगेगा? एक-एक गलती, एक-एक विचारधारा, एक-एक भूल के बारे में कौन सुधार करे? इसलिए ये काम आप को स्वयं ही करना पड़ेगा। आप ही अपने गुरु हैं, आप ही अपने शिक्षक हैं और आप ही अपने साधक हैं, आप ही अपने मार्गदर्शक हैं। अगर आप ये समझ लें, तो आपके प्रति एक ही काम हो जाता है कि आप अपने आपको सुधारिए, अपने आप को सँभालिए, आप अपने आप को ठीक कीजिए और अपने भगवान के नजदीक जाइए।
भगवान क्या है? भगवान क्या है बताइए आप। एक भगवान तो वह है, जो सारे विश्व में छाया हुआ है, सारे नियमन करता है व्यवस्था बनाता है। वह तो एक तरीके के नियम हैं, कायदा और कानून हैं, जिसको हम परब्रह्म कहते हैं। एक और ब्रह्म है? जिसको आपको अपने ढंग से बनाना है। वो कौन सा परब्रह्म है वो आपको अँग्रेजी में इसको सुपर चेतन कहते हैं। और वेदान्त की भाषा में, वेदान्त की भाषा में इसको ‘स्व’ कहा गया है, आत्मा कहा गया है। आत्मा वाSरे ज्ञातव्य्य, श्रोतव्यः निदिध्यासतव्यः। अरे लोगो! अपने आप को जानो, अपने आपको सुधारो, अपने आपको समझो और अपने आपको ठीक करो। ये कैसे हो सकता है? आप अपने आप। अपने आपसे क्या मतलब? सुपर चेतना, जो हमारे भीतर है, जिसके बारे में सुबह में बताया गया है। तत्वमसि विद्यानं ब्रह्म बाहर शब्दों के लिए कहा गया था। वह कहाँ भीतरवाला अन्तःकरण में व्यक्तित्व है, जिसमें कि गुण, जिसमें कर्म और जिसमें स्वभाव भरे पड़े हैं, जिसमें विश्वास और मान्यताएँ भरी पड़ी हैं; जिसमें आदतें भरी पड़ी हैं। इन आदतों को आपको ठीक करना है। अपनी मान्यताओं में, जिसमें घिनौनेपन घुसे बैठे हैं, इनको आपको सुधार करना है, शुरू से आखिर तक देख−भाल करनी है, और देखभाल करके इनको ठीक करना है। आपको आत्मदेव की उपासना करनी है। उपासना के बारे में जो हम कल कह रहे थे, वास्तव में वह आपका आत्मदेव है। अपने आपकी उपासना किया की जाती है। अपने आपकी जो उपासना कर लेते हैं, अपने आपकी, अपनी साधना से ही, अपने ही, अपने ही दबाव से भगवान भगवान बनाये जाते हैं। मीरा ने अपने ही दबाव से, अपने ही दबाव से पत्थर को गिरिधर गोपाल बना लिया था। और, और एकलव्य ने अपने दबाव से ही मिट्टी के पुतले को द्रोणाचार्य बना दिया था। और, और रामकृष्ण परमहंस ने अपने ही व्यक्तित्व के दबाव से काली को काली बना दिया था। पत्थर को काली बना दिया था। ये अपने आपका, व्यक्तित्व का उजागर होना, स्वच्छ और निर्मल होना ये बहुत बड़ी बात है। इसके लिए आपको क्या करना चाहिए? चौबीसों घण्टे आपको ध्यान रखना चाहिए। क्या ध्यान रखना चाहिए? कि हमारा जीवन किस तरीके से ठीक बन सकता है? आपको अपने कर्तव्यों पे ध्यान देना चाहिए। आपको अपने ज्ञान को परिष्कृत करना चाहिए और अपनी भक्ति-भावना का विकास करना चाहिए। तीन तो योग हैं न! एक योग का नाम है—ज्ञानयोग। इसका अर्थ है—आप वास्तविकता को समझें। अपने जीवन के मूल्य को समझें। आपने बाहर को समझा है, चीजों को समझा है, खेती-बाड़ी को समझा है, पैसे को समझा है, दुकान को समझा है, मुहल्ले वाले को समझा है, सन्तान को समझा है, तो आपने जीवन को क्यों नहीं समझा? अपने आपको को क्यों नहीं समझा? अगर आप जीवन को और अपने आपको समझ सकते हों, तो इसका नाम ‘ज्ञान योग’ होगा। और, और अगर आपने अपने फर्ज और कर्तव्यों को समझ रखा हो तब? फर्ज का ज्ञान नहीं, कर्तव्य का ज्ञान नहीं, कोल्हू के बैल के तरीके से सारे दिन मरते रहते हैं, दूसरों की देखा-देखी वासनाओं के दबाव में। मेहनत तो हम कम नहीं करते। बहुत मेहनत करते हैं; पर कर्तव्यपालन? कर्तव्यपालन अलग चीज है। हमारे फर्ज—हमारी ड्यूटियाँ कहाँ हैं? ड्यूटियाँ और जहाँ कहीं भी हमारे फर्ज हमको बुलाते हैं, वहाँ हमको अपनी मेहनत करनी चाहिए और वहाँ अपना मनोयोग लगाना चाहिए। इसका नाम कर्मयोग है और भक्ति-भावना? भक्ति-भावना मुहब्बत को कहते हैं, प्यार को कहते हैं प्यार भगवान को किया जाता है। उपासना भगवान की, की जाती है। प्यार भगवान का किया जाता है; पर भगवान तक सीमित नहीं रखा जा सकता। अखाड़े में कसरत करते तो हैं; पर अखाड़े तक, उस कसरत का जो शक्ति-संचय है, उसको खर्च थोड़े कर लेते हैं। वह तो बाजार में करना पड़ता है, अखाड़े में करना पड़ता है। कहीं करना पड़ता है। भगवान की भक्ति का अभ्यास करते हैं, भगवान से हम प्रेम करते हैं, उपासना करते हैं। उपासना के बाद में अगर हमारी भक्ति-भावना का विकास हुआ हो तब, तब फिर प्राणियों में इसका उपयोग करना पड़ेगा, मनुष्यों में उपयोग करना पड़ेगा, सबमें उपयोग करना पड़ेगा। प्यार से अपने आप को, हरेक को सराबोर कर देना पड़ेगा। प्यार अपने शरीर को कीजिए, ताकि इसको अच्छे तरीके से सुरक्षित रख सकें। प्यार अपने अन्तरात्मा से कीजिए, ताकि इसका कल्याण करने में आप समर्थ हो सकें। प्यार अपने मस्तिष्क को, चिन्तन की मशीन से कीजिए, ताकि इसके द्वारा आप सही विचार करें और अपने आप को तहस-नहस न होने दें। आप प्यार अपनी बीबी को कीजिए, ताकि उसका व्यक्तित्व आप निखार सकें। प्यार आप बच्चों से कीजिए, ताकि उनको संस्कारवान बना सकें। प्यार अपने चारों मुल्क को कीजिए, देश को कीजिए, धर्म और संस्कृति को कीजिए, ताकि उनको इस लायक बना सकें ताकि वो सम्मानास्पद हों, उनका मजाक नहीं उड़ाया जाए। हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति के बारे में लोग तरह-तरह के लांछन नहीं लगा सकें, ऐसा कीजिए न! आपको ये भक्ति है। भक्ति का अर्थ प्यार होता है। प्यार का अर्थ सेवा होता है। सेवा कीजिए, सेवा! अगर आप भक्ति को समझ सकते हों, तब फिर ये क्या हो जाएगा? फिर ये भक्तियोग हो जाएगा। फिर ये क्या हो जायेगा अपने जीवन की वास्तविकता को समझ सकें, तो ये ज्ञानयोग हो जाएगा। और जब अपने फर्ज और ड्यूटी को सब कुछ मान लें, इस बात पर ध्यान नहीं दें कि दूसरा आदमी क्या कहते है और क्या सलाह देते है, आप सिर्फ फर्ज को ध्यान रखिये। ये तीन बातों का ध्यान रखेंगे, तब आपका व्यक्तित्व निखरता हुआ चला जाएगा। जीवन की साधना के लिए इन बातों पर ध्यान रखना बहुत जरूरी है।
हमारा जीवन पारस है, हमारा जीवन कल्पवृक्ष है, हमारा जीवन अमृत है, हमारा जीवन कामधेनु है। आप जो भी चाहें, इसको जीवन को बना सकते हैं; लेकिन बनाना तो आपको ही, आपको ही पड़ेगा! आप ही बनाएँगे, तभी बनेगा। अपनी साधना आप कीजिए। अपने आपके विरुद्ध बगावत खड़ी कर दीजिए। अपने कुसंस्कार जो जन्म-जन्मान्तरों के हैं उसको तोड़-मरोड़ के फेंक दीजिए और जो अच्छाईयां आपके भीतर नहीं हैं, जो विशेषताएँ अभी तक आप पैदा नहीं कर सके हैं, जिन गुण, कर्म और स्वभाव के बारे में आप अभी तक अभावग्रस्त हैं, कृपा करके उनको ठीक कीजिए, उनको सुधारिए, उनको बढ़िये। ये पुरुषार्थ कीजिए। बुराइयों को छोड़ने का पुरुषार्थ, अच्छाइयों को बढ़ाने का पुरुषार्थ। पराक्रम अगर आप करेंगे, तो जिस तरीके से? आगे बढ़ने के लिए दो कदम बढ़ाने पड़ते हैं। एक कदम के बाद दूसरा, दूसरे के बाद एक। ऐसे कदम बढ़ा कर के मंजिल तक पहुँचते हैं। ऐसे ही आपको अपनी कमजोरियों और बुराइयों को दूर करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ेगी और अपनी अच्छाइयों को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना। दो काम करते हुए चले जाएँगे, तो आपकी जीवन-साधना पूर्ण हो जाएगी। और जीवन-साधना जिस हिसाब से आपकी पूर्ण होगी, आप देखेंगे सारा समाज आपका सहयोग करता है, अन्तरात्मा आपका सहयोग करता है; भगवान आपके ऊपर सहयोग करता हैं, पात्रता जैसी ही विकसित होती चलेगी। जैसे मैंने कल कहा था—आपके ऊपर फूल जैसे खिलना शुरू हो जाएगा, वैसे ही आपके ऊपर भौंरे आना शुरू हो जाएँगे, तितलियाँ आना शुरू हो जाएँगी, शहद कि मक्खियाँ आना शुरू हो जायेंगी; बच्चे आपको ललचाई हुयी आँखों से देखने लगेंगे। भगवान अपेक्षा करेंगे कि ये फूल हमारे गले में है, और सिर पर होता, तो कैसा अच्छा होता? कृपा करके कीजिए, साधना कीजिए। और साधना के चमत्कार देखिए। साधना से सिद्धि मिलती है—इस सिद्धान्त को आपको जीवन में प्रयोग करके दिखाना है, तभी वो लाभ उठा सकेंगे, जिसके लिए आप कल्प-साधना में यहाँ आए हुवे हैं। समाप्त।
॥ॐ शान्तिः॥