पारिवारिक जीवन में कर्मयोग
जो आपको सिद्धान्तों की बहुत सी बात बताईं, वो तो आपको अपनी विचार क्षेत्र में स्थिर रखने की हैं, और भावना क्षेत्र में समावेश करने की हैं। लेकिन विचार क्षेत्र और भावना क्षेत्र, इन दो क्षेत्रों के अलावा भी एक क्षेत्र बच जाता है, वो है — क्रिया क्षेत्र। आपको करना ही चाहिए। अब ये स्पष्ट ले के जाइए। करने को ही लोग सब कुछ समझते हैं। करने को मैं सब कुछ तो नहीं समझता - (चिन्तन को भी) चिन्तन की और भावना की भूमिका मैं बहुत अधिक समझता हूँ। लेकिन तो भी कृत्यों के बारे में लापरवाह नहीं हो सकते, कृत्यों की उपेक्षा भी नहीं कर सकते। कर्म की उपेक्षा हम कैसे करेंगे? ज्ञान का अपना स्थान हो सकता है, भक्ति का अपना स्थान है, लेकिन कर्मयोग भी तो कोई चीज़ है। गीता में तो कर्मयोग का ही उपदेश दिया है। इसलिए कर्म आपको क्या करने हैं यहाँ से जा कर के, इसके बारे में थोड़ी सी, संक्षेप में आपको जानकारी कराए देते हैं। इनको आप नोट रखिए, और यहाँ से जाने के बाद में इन क्रियाओं के बारे में बहुत सावधानी से (अप) अपना आचरण कीजिए।
यहाँ से जब आप जाएँ तब अपनी साधना को बिल्कुल नियमित करें। साधना के बारे में एक ही खराबी है — लोग उपेक्षा से करते हैं। समय का ध्यान नहीं रखते, कभी करते हैं कभी नहीं करते, अश्रद्धा पूर्वक करते हैं, इसलिए साधना अस्त-व्यस्त हो जाती है। साधना भी चिकित्सा की तरीके से है — व्यायाम की तरीके से है। आप व्यायाम समय पर करेंगे, नियमित रूप से करेंगे, तो व्यायाम का (फायदा प) फायदा मिलेगा। कभी आपने सौ बैठक कर ली, कभी दो बैठक कर ली, तीन दिन बन्द कर दी, छै दिन बहुत जोर से कर ली, व्यायाम से लाभ के स्थान पर हानि होगी। घी कभी आपने छटाँक भर खा लिया, कभी पाव भर खा लिया, कभी आधा किलो खा लिया, कभी एक बूँद पी लिया, ऐसे कोई बात बनती है क्या? दवा है, दवा की एक सीमा है, दवा की मर्यादा की खुराक होती है। च्यवनप्राश मिलेगा तो एक छटाँक खायेंगे, कल तीन छटाँक खायेंगे, कल एक रत्ती खाएँगे, कल सवेरे खायेंगे, आज दोपहर को खायेंगे, तीन दिन बिल्कुल नहीं खायेंगे, कोई ऐसे लाभ होते हैं? नियमितता का बहुत लाभ है। उपासना का, नियमितता का बहुत लाभ है।
आप यहाँ से जाने के बाद में अपनी उपासना को बिल्कुल नियमित बना लीजिए। उसमें आलस्य की वजह से, प्रमाद की वजह से, कभी कोई गलती न होने पावे। इसके लिए आप दो नियम, दो बन्धन लगा दीजिए — भोजन (से के) से पहले, अथवा सोने से पहले। आप बन्धन बाँध दीजिए। भजन नहीं हो सका तो ठीक है खाना भी नहीं खायेंगे। साहब खाना तो बहुत जरूरी है तो सोएँगे नहीं। चलिए, रात को आप एक घण्टा पीछे सोइए, आधा घण्टा पीछे सोइए। जो भी आपने उपासना का क्रम बना रखा है, आप उसको पूरा कर लीजिए। आप भोजन में डिले नहीं कर सकते तो आप सांयकाल को सोने में देर कर लीजिए, अगर आप बहुत व्यस्त हैं तो। कोई व्यस्त ऐसा नहीं है (कि) जो आधा घण्टे का समय नहीं निकाल सकता हो। न्यूनतम् उपासना आधा घण्टे की हमने बना दी है और आधा घण्टे की उपासना को प्रज्ञायोग कहा है।
प्रज्ञायोग तो आपने पढ़ लिया होगा। (प्रज्ञा) में ही सारी बातें - जप बता दिया, ध्यान, चिन्तन, मनन, और वो जीवन की साधना व समग्र साधनाएँ हैं ऐसी अच्छी। इससे अच्छा कॉम्बिनेशन (combination) साधना का (आप) कहीं नहीं मिल सकता। इसमें ब्रह्मविद्या से लेकर के, तपश्चर्या तक का, और योगाभ्यास से लेकर के संयम साधना तक का, सारा समावेश हो गया है। (आप) प्रज्ञायोग को तो मैं यहाँ नहीं बता सकता आपको, अपनी छोटी पुस्तिका में, पर्चे में छपा हुआ पड़ा है। आप उस प्रज्ञायोग (की) नियम बना लीजिए, आधा घण्टे में पूरा हो जाता है। आधा घण्टे के हिसाब से दैनिक उपासना आप करते रहिए, इतना तो आप कम से कम कर सकते हैं। मैं कम से कम की बात कहते हैं। ज्यादा से ज्यादा तो चाहे कुछ करें, (से ज्यादा) हमने कम से कम की मर्यादा बना दी है। दस पैसे कम से कम हैं। दस पैसे तो आप लोग खर्च के लिए निकालिए ही निकालिए। ज्यादा, बन्धन नहीं है आप चाहे जितना निकालिए, दस रुपये रोज़ निकालिए। कौन मना करता है आपसे। इसी तरीके से एक घण्टा समय - समय की बात कही है। वो न्यूनतम् है। इससे कम मत कीजिए, ज्यादा भले कीजिए। आपको आधा घण्टे से कम में प्रज्ञायोग के माध्यम से अपनी उपासना नहीं करनी चाहिए। इतना तो कीजिए ही कीजिए।
और एक बात फिर और ध्यान रखिए। उपासना का मतलब करके कीजिए, नहीं तो फिर मत कीजिए। उपासना का मतलब सिर्फ एक है — अपने कलुष और कषायों का परिष्कार — अपनी पात्रता का सम्वर्धन — अपने गुण, कर्म और स्वभाव में विशेषताओं का समावेश। अगर आपने अपनी उपासना को दूसरे फूहड़ लोगों के तरीके से घिनौना बना रखा होगा तो उपासना भी नहीं रह जाएगी। उपासना को आप कामनाओं के साथ मत जोड़िए। उपासना को जब आप कामनाओं के साथ जोड़ देते हैं, तो (उसको आप उ उस) उसका स्वरूप ही नष्ट हो जाता है और वो एक घिनौनी वस्तु बन जाती है। उसका महत्त्व सब चला जाता है। आपसे तो मुसलमान अच्छे हैं। मस्जिद में जाते हैं नमाज पढ़ के वापिस आ जाते हैं। कभी किसी मुस्लमान को मौलाना से ये कहते नहीं पाया होगा, हमारा मुकद्दमे में फतह करा दीजिए। ईसाई, आपसे ईसाई अच्छे हैं। जब भी जाते हैं गिरजे में जाते हैं, प्रार्थना करते हैं और प्रार्थना करने के बाद में घर वापिस चले आते हैं। कोई (मौलवी साहब से) उनके पादरी साहब से नहीं कहता बाल-बच्चे होने चाहिए। कोई नहीं कहता, कोई नहीं कहता। सिखों के यहाँ गुरुद्वारे लोग जाते हैं, भगवान की भक्ति की बात कहते हैं, ज्ञान-ध्यान की बात कहते हैं, कोई आपको ये आदमी ज्ञानीजी से ये नहीं कहता कि हमारा ये काम करा दीजिए और हमारी व्यापार में तरक्की करा दीजिए।
आप ही हैं, कैसे गन्दे आदमी, कैसे गन्दे आदमी, कैसे गन्दे आदमी। आपने भगवान की भक्ति का जाने कैसा स्वरूप बना दिया है। हिन्दू समाज के ऊपर मुझे बड़ा क्रोध आता है कि अपना सारा दर्शन — उच्चस्तरीय दर्शन को खतम कर दिया, उपासना को ही खतम कर दिया, भगवान को ही खतम कर दिया, साधना की विधि को ही खतम कर दिया। कम से कम इसे तो जिन्दा रखना चाहिए था, इसको तो केवल आत्म-कल्याण के लिए जोड़ कर रखना चाहिए था, अन्तरात्मा की शान्ति के लिए जोड़ कर रखना चाहिए था। कामनाएँ, कामनाएँ, कामनाएँ, कामनाएँ। दुष्टों कामनाएँ ही खा जाएगी तुम्हें। भगवान का जो भक्ति का आनन्द ले सकते थे, वो भी तुम कामना के नरक में ढकेल करके इसका भी महत्त्व खो बैठोगे। और तो तुम्हारे पास कुछ है नहीं। थोड़ी सी बात राम के नाम लेने की, पूजा उपासना की बात हाथ आई थी। शायद वो आपकी जीवात्मा के लिए काम आ सकती है, पर आप क्या कर सकते हो, आप तो उसको भी गिराए डाल रहे हो। ऐसा मत करना। आप तो मत करना, दूसरे लोग क्या करते हैं करने देना।
आप सिर्फ और अपनी उपासना को आत्म-परिष्कार के लिए, और, अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिए, और, अपने गुण, कर्म और स्वभाव के सम्वर्धन के लिए बस इसी के उपासना का लक्ष्य रखना। आप चमत्कारों के लिए मत रखना। तमाशा देखेंगे। उपासना में क्या तमाशा होते हैं? नहीं साहब यहाँ ये चक्र चमकेंगे और कुण्डलिनी चमकेगी, और रात को सपने दीखेंगे, और गणेशजी दीखेंगे, और आज्ञा चक्र चमकेगा और अमुक चमकेगा। तमाशा देखेंगे? आप यहाँ पर सिनेमा हो रहा है क्या? आप सिनेमा देखने के लिए, तमाशा देखने के लिए अगर आपने उपासना की है, चमत्कार देखने के लिए तो आपको धिक्कार है और आप को ये कहना पड़ेगा कि आपने अभी आध्यात्मिकता का, उपासना का आ, ई भी नहीं पढ़ा। आप इसके प्रारम्भिक सिद्धान्तों से भी जानकार नहीं हो। कैसी गन्दी हवा चल पड़ी है लोगों में, गन्दी हवा चल पड़ी है, गन्दी हवा में आप भी बहेंगे क्या?
आप मत बहिए। न चमत्कार देखिए। चमत्कार आदमी के अन्दर है। यही है कि दुनिया कैसे घिनौने रास्ते पर चलती रहती है, गए बीते रास्ते पर चलती रहती है, आप एक अच्छा रास्ता अख्तियार करते हैं, अपने पैरों पे खड़े हो जाते हैं, अपनी राह आप बना लेते हैं — ये क्या चमत्कार नहीं है? इससे बड़ा और क्या चमत्कार हो सकता है? आप (इ) इतना ही चमत्कार काफी मानिए। आप अपने भीतर से अन्त:प्रेरणा को विकसित होने दीजिए और (ये) ये अनुभव होने दीजिए कि भगवान के नज़दीक आने के बाद में, (उन) उनकी विशेषताओं का लाभ मिलेगा। उनकी सहायता का नहीं — उनकी विशेषताओं का — उनकी प्रेरणाओं का लाभ मिलेगा। उनकी दौलत का नहीं, आप उनकी प्रेरणाओं का लाभ लीजिए। इस तरीके से आप दैनिक उपासना में रोज आधा घण्टा लगाते रहें, तो मजा आ जाए।
यहाँ से जाने के बाद में आप एक काम जरूर करना कि आप आलस्य और प्रमाद से निजात पाना। दूसरी भी बहुत सारी बुराइयाँ हैं आदमी की जिन्दगी में, जिसको हम क्राइम कहते हैं, दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाली चीजें, चोरी उठाईगिरी वगैरह। लेकिन एक और भी क्राइम है, एक और भी अपराध है, वो अपने ऊपर हमला करना, आत्महत्या कर बैठना। दूसरों की हत्या करना तो बुरी बात है, दूसरों के भविष्य को अन्धकारमय बना देना तो बुरी बात है, लेकिन अपना भविष्य को अन्धकारमय में बना देना ही कौन अच्छी बात है, अपनी आत्महत्या कर डालना ही कौन अच्छी बात है। ये आलस्य और प्रमाद को मैं इसी संज्ञा में गिनता हूँ। शरीर की दृष्टि से जो आदमी निकम्मे बैठे रहते हैं, निठल्ले बैठे रहते हैं, पसीना बहाते नहीं हैं, और समय को बरबाद करते रहते हैं, इन आलसियों को मैं क्या कहूँ? और उन (प्र प्र) प्रमादियों को क्या कहूँ, जो बैल की तरीके से मेहनत तो करते रहते हैं, पर उसमें मनोयोग लगाते ही नहीं हैं, दिलचस्पी लेते ही नहीं हैं। प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते ही नहीं हैं काम को, उसकी बारीकियों में घुसते ही नहीं हैं। बाहर से सतही काम कर दिया, (मेहनत) शरीर से काम करा दिया, बेगार भुगत दी — बात कैसे बनी? आप यहाँ से जाने के बाद में अपनी कार्य पद्धति में ये बात शामिल करना। आलस्य और प्रमाद को हटा देना। आप ज़िम्मेदारी और वफादारी को शामिल करना, आप स्फूर्ति को शामिल करना।
अगर आप ऐसा करेंगे तो आप देखेंगे कि आपकी बची हुई जिन्दगी के पास जो समय आपके पास बचा है, शक्ति बची है, श्रम बचा है, उसकी आपको कितने बड़े चमत्कार मिलते हैं, कितनी सिद्धियाँ मिलती हैं। आपने ये सब कुछ गवाँ दिया और उस गवाँने में बहुत सारे सूराख थे। लेकिन सबसे बड़े सूराख दो हैं — प्रमाद और आलस्य। दिमागी, दिमागी कायरता — क्राइम और शारीरिक कायरता — क्राइम, ये आदमी के सबसे बड़े दुर्गुण हैं। और भी बहुत से दुर्गुण हैं, जिसे अभी न ले रहे। पर इन दुर्गुणों से पग-पग पर आदमी अपने आपको बर्बाद करता जाता है।
आप यहाँ से जाने के बाद में आलस्य-प्रमाद से बचने की हर चन्द कोशिश करना। आप (अपनी) टाइम-टेबल बनाना, दिनचर्या बनाना, व्यस्त रहना, खाली समय मत जाने देना। विश्राम करना हो तो टाइम से विश्राम करना, काम की (काम को) चाल को धीमी मत करना। काम को जब करना हो तो पूरी स्फूर्ति और पूरी मेहनत से करना, (जिसके) जिससे उसका आउटपुट (output) तो कुछ निकले। आपके काम का कुछ परिणाम ही नहीं निकलता। सारे दिन मेहनत करते रहते हैं। सारे दिन इधर बैठे गए, ये कर लिया, वो कर लिया, ऐसे ढीले-पोले मन से, बेगार भुगतने के तरीके से कोई काम करने के बाद में उसका कोई पूरा परिणाम निकलता है क्या? नहीं, आप यहाँ से आलस्य-प्रमाद को छोड़ जाना। आप यहाँ से मेहनतकश और परिश्रमशील और कर्मयोगी बनकर जाना। ऐसा कर पायेंगे तो बहुत अच्छा होगा, एक।
इसके सिवाय एक और आपको शिक्षण है मेरा कि आपने अपना कुटुम्ब पाल लिया है, आप कुटुम्ब में रहते होंयेगे, चाहे पुराना कुटुम्ब है तब या आपने नया बना लिया तब जैसा भी कुटुम्ब हो, आप इस कुटुम्ब के बारे में दो ख्याल हटा देना और दो ख्याल बढ़ा देना। एक ख्याल ये बढ़ा देना कि आप इस कुटुम्ब के मालिक हैं और इनकी मर्जी को पूरा करके आप इनकी प्रसन्नता को ग्रहण करें। आप ये ख्याल करते रहेंगे तो आपके कुटुम्ब में कभी शान्ति नहीं होगी। लोगों की मर्जी के ऊपर चलेंगे, कितनी तरह की मर्जियाँ हैं, औरत आप से कुछ चाहती है, बेटे आप से कुछ चाहते हैं, कोई क्या चाहता है, कोई क्या चाहता है और जो चाहना है उसमें से अधिकांश अनैतिक होती हैं। अनैतिक होती हैं, अस्वाभाविक होती हैं, ऐसी होती हैं कि वो हराम की और विलासी जिन्दगी जीना चाहते हैं। आप इसे सहायता कहते हैं, ऐसा मत करना।
आप अपने कुटुम्ब के बारे में दो, तीन बातें ख्याल रखिए। एक बात ये ख्याल रखिए कि इनमें से हर आदमी को स्वावलम्बी बनाना है, अपने पैर पे खड़ा करना है। आपकी कमाई न खाए कोई, आप अपने पैर पर खड़ा हो जाए, अपने पैर से खड़ा कर देना आपका काम है। फिर बच्चे हों, चाहे बुड्ढे हों, औरत हो चाहे जवान हो, हरेक के लिए आप ये दृष्टिकोण रखिए कि इसमें से हरेक को हम स्वावलम्बी बना देंगे। स्वावलम्बी हैं अभी तो, कल भगवान न करे आप नहीं रहे, फिर किसके सहारे खड़े होएँगे। आपकी बीवी किसके सहारे गुजारा करेगी, इसलिए आप स्वावलम्बी बनाइए एक, संस्कारवान बनाइए। संस्कारवान आप बना सकते हैं। सम्पन्न बनाना तो आपके हाथ की बात नहीं है। आप लाख-करोड़ रुपया अपनी औरत के लिए छोड़ कर मरें, ये मुमकिन नहीं है। आपकी इतनी योग्यता ही नहीं है, परिस्थिति ही नहीं है, व्यापार ही नहीं है, साधन नहीं है, लाख-करोड़ कैसे कमा पायेंगे, रोजाना तो आपको गुजारा करना तो मुश्किल पड़ता है। लोग रोज कुआँ खोदते हैं, रोज पानी पीते हैं फिर ये उम्मीद न करना कि कोई आदमी इतनी दौलत छोड़ के मरेगा जिससे गुजारा हो जाए पीछे वालों का।
आप स्वावलम्बी बनाइए, हरेक को स्वावलम्बन की शिक्षा दीजिए। बच्चे थोड़े बड़े हो जाएँ तब से वहाँ से इनको सिखाइए। पढ़ने भी दीजिए, लेकिन पढ़ने के साथ-साथ में ये बिल्कुल मुमकिन है कि इनको किसी न किसी रूप में आप घर का कोई ऐसा काम करा सकते हैं, जिससे कि पैसे (कमाने) कमाए नहीं जा सकते तो बचाए तो जा सकते हैं। कपड़ा धोने से ले करके ढेरों काम ऐसे हैं टूट-फूट की मरम्मत तक, जिससे की आप अपना कमा तो नहीं सकते जो बचा लेना ये भी एक कमाई के बराबर है। आप अपने कुटुम्ब में पंचशीलों का समावेश कीजिए। ये पंचशील पंच (र र) रत्नों के बराबर हैं। श्रमशीलता, मेहनतकश। आपके कुटुम्ब के हर आदमी को मेहनतकश होना चाहिए, परिश्रमशील होना चाहिए, परिश्रमशील होना चाहिए। आपके घर का कोई एक भी आदमी हरामखोर न हो, कोई आदमी कामचोर न हो। आप ऐसी कोशिश करें तो आप जानना चाहिए कि आप अपने घर वालों के लिए एक बड़ी बेशकीमती दौलत छोड़ कर रखी।
दूसरी, दूसरी बात है पंचशीलों में सुव्यवस्था। इसमें सफाई भी आती है, सुसज्जा भी आती है। हर चीज को यथास्थान रखा जाए। कोई यहाँ पड़ा है, कोई वहाँ पड़ा है, अस्त-व्यस्त जगह पड़ी हुई चीजें गन्दगी फैलाती हैं। चाहे भली से कूड़ा हो लेकिन अगर यथास्थान रखा गया है, तो वह सुन्दर मालूम पड़ेगा। सुव्यवस्था हर चीज की। समय की सुव्यवस्था, खान-पान की सुव्यवस्था, टाइम-टेबल की सुव्यवस्था, चीज़ें रखने की सुव्यवस्था, सफाई की सुव्यवस्था। अपने घर में हर ओर देखिए कि आपका घर स्वच्छ रहता है कि नहीं और (अ) आपके घरवालों (का) की दिनचर्या सुव्यवस्थित है कि नहीं। सुव्यवस्था, सुव्यवस्था का आप ध्यान रखें। तो ये परिवार का पंचशील है।
शालीनता, शराफ़त, भलमनसाहत — शराफत, भलमनसाहत। जो आदमी आपके विरोधी हैं या जो नुकसान पहुँचाते हैं उनसे लडि़ए तो जरूर ये मैं नहीं कहता। खराब आदमियों से आपको लड़ना नहीं चाहिए, उनकी बदमाशी बर्दाश्त करनी चाहिए। लेकिन आप ये लड़ाई लड़ते हुए भी आप अपनी शराफत जारी रखिए। शराफ़त को मत गँवाइए। शराफ़त को आप गँवा देंगे, तो बहुत बुरी बात है। शालीनता को मत गँवाइए, सज्जनता आपकी सम्पदा है, वो आपके स्वभाव का अंग है। आप शराफत और शालीनता और सज्जनता को बिल्कुल कम मत होने दीजिए।
(एक) चौथा गुण ये है कि मितव्ययिता, किफ़ायतशारी। पैसा कमाना भी एक समझदारी भी हो सकती है, लेकिन सबसे ज्यादा समझदारी (उसके) पैसे को खर्च करने में है। जो लोग बेहिसाब पैसा खर्च करते हैं, उसके बदले में बहुत चीजें बुराइयाँ खरीद लेते हैं। और उसके सामने विलासता खरीद लेते हैं, दुर्व्यसन खरीद लेते हैं। पैसा का फिजूल खर्च होना बुरी बात। कंजूसी करना, कंजूसी तो मैैं सिखााता नहीं हूँ, पर मैं ये कहता हूँ कि आप अपने पैसे को ऐसे काम में खर्च कीजिए जिससे आपका हित होता हो, आपके बच्चों का हित होता हो, समाज का हित होता हो — किसी हित के काम में खर्च कीजिए। अपव्यय में मत खर्च कीजिए, फैशन में मत खर्च कीजिए, फिजूलखर्ची में मत खर्च कीजिए। अगर आप फिजूलखर्ची की आदत डाल लेंगे, तो आपके घर वाले लोग थोड़े दिन में आप देख लेना, कर्ज़दार हो जाएँगे, ऋणी हो जाएँगे, रिश्वतखोर हो जाएँगे, बेईमान हो जाएँगेे और सारी की सारी जीवन की सुव्यवस्था गँवा देंगे। मितव्ययिता का सूत्र सादा जीवन उच्च विचार (का) का सूत्र — (जो) जिसका सादा जीवन होगा, जो किफायतशार होगा, ऊँचा जीवन उसी का रह सकता है और किसी का नहीं।
आप अपने घर में उदार सहकारिता का पाँचवा सूत्र — सहकारिता। एक-दूसरे को सहकार दें। ऐसे नहीं, खाना खाया और भागे। नहीं, (एक दूसरे के)। बड़े लड़के से कहिए छोटे भाई को पढ़ाया करे एक घण्टा। बड़ों को कहिए छोटों की सहायता करे। हर आदमी सराय के तरीके से रहता है, भटियारों की सराय में जैसे मुसाफिर आते हैं रोटी खाकर भाग खड़ेे होते हैंं, आप का परिवार वैसा नहीं होना चाहिए। इसमें सहकारिता जुड़ी रहनी चाहिए। एक-दूसरे की सेवा जुड़ी रहनी चाहिए। एक-दूसरे के प्रति मोहब्बत जुड़ी रहनी चाहिए। अगर आपने ये पाँच शील अपने कुटुम्ब में शामिल कर लिए, तो आप समझना, आप यहाँ जो (ले ले), यहाँ जो आये हैं, पंचकोषों का जागरण करके चले गए।
पंचशीलों में फिर एक बार याद रखिए — श्रमशीलता एक — सुव्यवस्था दो — सज्जनता तीन — मितव्ययिता चार और, उदार सहकारिता पाँच। आप पाँचों को हर चन्द कोशिश कीजिए, और अपने जीवन में उनको लाइए पहले। फिर आपकी देखा-देखी दूसरों में आएगी। आप अपने भीतर इनको बढ़ाइए और दूसरों को बढ़ाने के लिए दबाव डालिए। आप समझाइए भी, समझ से ना मानते हों तो दबाव भी डाल सकते हैं। प्यार करना भी एक काम नहीं है, दबाव डालना भी एक काम है। एक आँख प्यार की और एक आँख सुधार की हममें से हर एक आदमी को (रख) रखनी चाहिए। अगर (आप) किसी को सुधारना है, तो आप एक आँख टेढ़ी भी रखिए। किसी को मोहब्बत देनी है, तो एक आँख सीधी भी रखिए। दोनों तरीके से करेंगे तो ही बात बनेगी। आप हर एक के ऊपर झल्लाते रहेंगे, नाखुश होते रहेंगे तो भी बात बनने वाली नहीं है। और आप अनावश्यक रूप से किसी की प्रशंसा करते रहेंगे, और प्यार देते रहेंगे तो भी बात बनने वाली नहीं है। दोंनो को समान रूप से इस्तेमाल कीजिए।
और अपने कुटुम्बियों के आप माली बन कर रहिए, मालिक बनकर मत रहिए। मालिक बनेंगे तो बहुत हैरान होएँगे। आप सिर्फ अपना कर्तव्य ये मान के चलिए इनको पानी लगाना है, काट-छाँट करनी है, पानी लगाना है, काट-छाँट करनी है, रखवाली करनी है। आप अपने कुटुम्ब की रखवाली कीजिए, काँट-छाँट कीजिए, पानी लगाइए। मालिक बनने की कोशिश करेंगे तो आप अपना मानसिक सन्तुलन गँवा बैठेंगे। स्त्री के आप मालिक बनेंगे, और उसने कहना ना माना तब, तब आप कितने हैरान हो जाएँगे। आप अपनी धर्म पत्नी के लिए अपने कर्तव्य और फर्जों को पूरा कीजिए। ये आशा न धर्म पत्नी से कीजिए न किसी कीजिए कि दूसरे आदमी अपना कर्तव्य निभाएँगे कि नहीं निभाएँगे। हो सकता है दूसरे आदमी नहीं निभाएँ तब, तब किस तरीके से करेंगे।
आप यहाँ से जाने के बाद में एक और काम करना। एक और काम करना कि अपनी संकीर्णता को, संकीर्णता को छोड़ के चले जाइए यहाँ से। आप उदार हो के चले जाइए।आप याचक न बनिए, आप अभावग्रस्त न रहिए, आप कंगले हो करके जीवन न जीएँ, आप दरिद्र हो करके जीवन नहीं जीएँ। आप के पास क्या कमी है जरा बताना तो सही। आपने एक अभावों की फेहरिस्त बना रखी है। ये कमी, ये कमी, ये कमी। अब एक नई फेहरिस्त बनाइए। (ये) दूसरों से ये ज्यादा, (ये ज) ये ज्यादा, दूसरों से, लाखों से ये ज्यादा। अगर आप इस तरह की एक फेहरिस्त बना लें, तो आपको अपने सौभाग्य का कोई ठिकाना नहीं रहेगा। आप अपने आपको अनुभव करेंगे कि हम कहीं से कहीं चले गए।
आप क्या काम करेंगे? आप स्वाध्याय और सत्संग इन दो कामों को आवश्यक मानिए। सत्संग किस तरीके से करेें? सत्संग तो मिलना मुश्किल है, पर लोगों को अपने घरवालों को, लोगों को नसीहत देने का, शिक्षा देने का, कथा कहने की बात जारी रखिए। और स्वाध्याय को आप हर एक का नियम बना लीजिए। आपको उचित और मुनासिब शिक्षा और कहीं से नहीं मिल सकती, केवल स्वाध्याय से मिलेगी। प्राचीन काल में सत्संग भी होते थे, सन्त-महात्मा होते थे, ज्ञानी-गुणी होते थे। अब न कहीं न सन्त हैं, न महात्मा हैं, न कहीं ज्ञानी हैं, न कहीं गुणी हैं। अगर हैं, तो उनके पास टाइम नहीं है। आप किसी से दो-चार मिनट बात करेंगे, आप से लम्बे समाधान कौन करेगा, रात भर कौन बैठा रहेगा आपके पास, दो-दो घण्टे सिर कौन फोड़ेगा। एक दिन मान लीजिए फोड़ भी दे, तो रोजाना कैसे करेंगे? आप उनके पास किस तरीके से रहेंगे? वो अपना काम छोड़कर आपके पास कैसे आएँगे? इसलिए एक ही तरीका है सत्संग का, यों सत्संग बहुत ही शानदार चीज है, उसका तरीका है — स्वाध्याय। आप (कि) किसी पुस्तक को पढ़ते हैं, तो उसके जो लेखक हैं उससे आप उसी वकत मिलना शुरू कर देते हैं। आप विवेकानन्द से मिल लीजिए, आप गाँधी जी से मिल लीजिए, आप विनोबा से मिल लीजिए, आप ऋषियों से मिल लीजिए। जिससे मिलना चाहें तब, उसी वक्त मिल लीजिए। ये कैसे हो सकता है? उनको मरे तो बहुत दिन हो गए, उनको मरे हुए बहुत दिन हो गए पर साहित्य को मरे हुए बहुत दिन नहीं हुए। आप यहाँ से (जा) जाने के बाद में ऐसा ही करना। आप यहाँ से जाने के बाद में ये अनुभव करना (कि आ) कि आप शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं। आप शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं। अपनी हैसियत बदल ले जाइए।
आपने सारी जिन्दगी भर शरीर की दृष्टि से अपने आपको छोटा या बड़ा समझा है और सारी जिन्दगी भर शरीर के लिए जिए। शरीर को खिलाना, शरीर को पिलाना, शरीर को देखना, शरीर को स्वाभिमान बनाना, शरीर का ही ध्यान रखना। अब आप यहाँ से जाने के बाद में आप नया जन्म ले कर के जाना — आत्मा का जन्म। आप, आप, आपका मूल सत्ता आत्मा है। शरीर तो आपका वाहन है। इसीलिए आपको आत्मा का हित देखना पड़ेगा, आत्मा का सन्तोष देखना पड़ेगा, आत्म-कल्याण की बात सोचनी पड़ेगी, और आपका भविष्य किस तरीके से शानदार बने इस पे विचार करना पड़ेगा। इसीलिए आप अपने आत्मा को भी ध्यान रखिए।
शरीर को और (आ) आत्मा को दोनों को महत्त्व दीजिए। आप दोनों के लिए बाँट दीजिए। आपके पास समय है, दो हिस्सों में बाँट दीजिए। आपके पास साधन हैं, दो हिस्सों में बाँट दीजिए — आधा शरीर के लिए, आधा जीवात्मा के लिए। अगर ऐसा करेंगे तो आप पुण्य की बात सोच पाएँगे, परमार्थ की बात (सो) सोच पाएँगे, लोक मंगल की बात (सो) सोच पाएँगे। और न केवल सोच पाएँगे बल्कि उसके लिए व्यावहारिक कदम भी उठाएँगे। आत्मा के लिए समयदान कीजिए। आपका सारे के सारा समय शरीर के लिए खर्च किया, अब आत्मा के लिए समय निकालिए, परोपकार के लिए समय निकालिए, परमार्थ के लिए समय निकालिए। आप उनके लिए भी समय निकालिए। केवल शरीर के लिए और कुटुम्बियों के लिए सारा समय खर्च कर देंगे? आप अंशदान निकालिए, साधन जो आपके पास हैं वो सारे के सारे साधन औलाद के लिए खर्च मत कर डालिए। जो साधन आपके पास हैं, केवल शरीर के लिए मत खर्च कर डालिए। इसमें दूसरे भी हिस्सेदार हैं। आत्मा भी हिस्सेदार है। आत्मा के लिए भी अपने साधनों को निकालिए। लोकमंगल के लिए साधन, परमात्म प्रयोजनों के लिए साधन, सत्प्रवृत्तियों के लिए साधन, आज के युग को बदल डालने के लिए साधन आपके लगने चाहिए।
आपके साधन और समय, आपके साधन और समय — आपका अंशदान और समयदान — ये नियमित रूप से लगते रहना चाहिए। बात बहुत पुरानी हो गई। जब टोकन के रूप में हमने इनको प्रारम्भ कराया था, तब कहा था हमने दस पैसे डाला कीजिए। आज दस पैसे किसे कहते हैं? आज बताइए। दस पैसे पैंतीस वर्ष पुरानी बात है। आज तो पैंतीस वर्ष की महँगाई कहाँ गई? आजकल दस पैसे का क्या होता है जरा बताइए। चाय अस्सी पैसे की आती है और दस पैसे का क्या आयेगा? एक बटे आठ कप चाय आएगी अर्थात एक घूँट चाय आएगी। एक घूँट चाय से आप भगवान का, समाज का, देश का सब ऋण पूरा कर लेंगे। आप हर काम में महँगाई बर्दाश्त कर रहे हैं, खाने में महँगाई बर्दाश्त कर रहे हैं, कपड़े में महँगाई बर्दाश्त कर रहे हैं, बच्चों की शिक्षा में महँगाई बर्दाश्त कर रहे हैं, एकला ही महँगाई बर्दाश्त कर रहे हैं। समाज के लिए क्यों महँगाई बर्दाश्त नहीं करेंगे? आप कीजिए। उदार बनिए, अंशदान के बारे में उदार बनिए। एक घण्टा समय कभी हमने कहा था जब आप शुरू में थे, बच्चे थे। अब आप तो बड़े हो गए हैं। आप समय भी ज्यादा समाज के लिए निकालना और अपना अंशदान भी समाज के लिए निकालना। ये बात याद रख करके अगर आप जाएँ, तब मैं कहूँगा आपने न्यूनतम् कार्यक्रम को समझ लिया, और उसके लिए जो आपके फर्ज और कर्तव्य थे, उसके बारे में (नो) नोट कर लिया। इन्हीं आवश्यकताओं को पूरा कराने के लिए और आपको यही प्रेरणा देने के लिए इस कल्प साधना शिविर में बुलाया था। अब कल्प साधना शिविर खतम करते हैं, आप जाइए। लेकिन इन मोटी-मोटी बातों को ध्यान रखिए जिसको हमने कर्मयोग के नाम से, क्रियायोग के नाम से आपके सामने पेश किया है। समाप्त ॥
॥ॐ शान्तिः॥