तपश्चर्या कैसे करें?

भगवान बुद्ध से उनके शिष्यों ने ये पूछा — मनुष्य इतना सार्थक और समर्थ होते हुए भी आखिर गिर क्यों पड़ता है? अध:पतित क्यों हो जाता है? भगवान बुद्ध ने एक तो घटना दिखाई और एक उदाहरण दिया। उन्होंने घटना ये दिखाई कि अपने कमण्डल को पानी में फैंक दिया। कमण्डल तैरने लगा। शिष्यों से पूछा — ये कमण्डल डूबेगा तो नहीं? ये क्यों डूबेगा? ये डूबता थोड़े ही है। कमण्डल डूबने वाला नहीं है, ये तैरता रहेगा। भगवान बुद्ध ने दोबारा बुलाया, उसमें एक सुराख कर दिया पैंदे में, फिर उसको पानी में फैंक दिया। पर धीरे-धीरे पानी उस कमण्डल के भीतर भरने लगा और वो डूब गया। शिष्यों से पूछा — भई, अभी तुम कह रहे थे कि कमण्डल डूबता नहीं है। ये तो डूब गया। शिष्य कहने लगे — महाराज जी आपने सूराख कर दिया इसके भीतर। सूराख कर देंगे तो डूबेगा नहीं? ठीक बात है। भगवान बुद्ध ने जवाब देते हुए शिष्यों से कहा — इंसान के भीतर सुराख हो जाये तो उसमें पानी भरने लगेगा और वो डूब जाएगा; और सूराख न हों तब, तब न पानी भरेगा, न वो डूबेगा। एक तो ये उदाहरण भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को दिया।

एक और भी कहा उन्होंने। उन्होंने कहा अगर तुम्हारे पास गाय हो, और गाय बहुत दूध देने वाली हो। वो बहुत दूध देने वाली गाय का अगर दूध आप लोग दुहें, लेकिन जिस बर्तन में आप दुहें उसमें सूराख हों, छेद हों तब, तब फिर क्या होगा बताओ? तब शिष्यों ने कहा — महाराजजी वो दूध तब फिर छलनी में रुकेगा थोड़े ही। दुहनी में अगर सुराख हैं, नीचे (पानी में) जमीन पर टपक जायेगा, कपड़े भी मैले हो जायेंगे और उसके हाथ में, ग्वाले के हाथ में कुछ भी नहीं लगेगा सिवाय थकान के। उँगलियों को बेचारा दबोचता रहा, थनों को दबाता रहा, गाय भी परेशान, ये भी परेशान। लेकिन दूध को जब पीने का वक्त आया तब ये मालूम पड़ा कि इसमें कुछ भी नहीं है। नीचे से बर्तन भरके पानी टपक गया। ये उदाहरण यह बताता है कि आदमी के जीवन में अगर बहुत सारे सूराख हों, तो उनकी सम्पदाएँ और उनकी विभूतियाँ, उनकी विशेषताएँ — सब खतम हो जाएँगी, सब खतम हो जाएँगी, फिर कुछ बचेगा ही नहीं। इसीलिए उन्नति की बात करना तो ठीक है, आदमी को वैभव उपार्जित करना है तो ठीक है, लेकिन उसके साथ-साथ में ये भुला मत दीजिए। क्या न भुलाएँ? ये मत भुलाइए कि आपको अपने सूराखों को बन्द करना है, (अपनेआ) अपने छिद्रों को रोकथाम करनी है, अपनी मलीनताओं को और अपने असंयमों के ऊपर हावी होना है।

तो क्या करें? मैंने बताया न आपको — चार बात करनी पड़ेंगी आपको। तप, जिसका कि कल जिक्र किया गया था, चार प्रकार का होता है। एक तप - एक तप इन्द्रिय तप कहलाता है, एक एक दूसरा जो है ये ब्रह्मचर्य को भी तप कहते हैं, तीसरा समय के संयम को तप कहा जाता है। चौथा धन के संयम को तप कहा जाता है और समय के संयम को तप कहा जाता है। विचारों के संयम को। विचारों का संयम - एक — (उसका) पैसे का संयम - दो — समय का संयम - तीन और इन्द्रियों का संयम - चार। तपश्चर्या की चार धाराएँ हैं। आपको इन चारों धाराओं में से सबसे पहली धारा यहाँ बुला करके अभ्यास कराया गया है। आपको जिह्वा इन्द्रिय का अभ्यास कराया गया है - आपको आपको जिह्वा को तपस्वी बनाया जा रहा है ताकि आप स्वाद के लिये भटकने वाली जिह्वा जिसने कि आपके (स्वा) स्वास्थ्य को खराब कर दिया, आपके मन को खराब कर दिया - आप काबू में रख सकें और लगाम को लगा सकें। अगर आप घोड़े पर लगाम नहीं लगायें तब, ऊँट के अगर नकेल नहीं लगायें तब, आप बैल के नाक में रस्सी नहीं डालें तब, हाथी के ऊपर अंकुश नहीं लगायें तब, तब फिर आप समझ लेना ये जानवर आपके लिये बड़े खौफनाक साबित होंगे और आपको तहस-नहस करेंगे। इसलिये इनको नियंत्रण करने के लिये जरूरी है।

इन्द्रियाँ हमारी हैं तो बहुत अच्छी, इनसे ही सब काम चलता है। लेकिन, अगर इनको उच्छृंखल बनने दें, रोकथाम न करें, तपस्वी न बनाएँ, संयमी न बनाएँ, तो इन्द्रियाँ (आपको) मुसीबत खड़ी कर देती हैं। जैसे, जैसे आप खान-पान के बारे में असंयम बरतते रहे हैं। उसका परिणाम ये हुआ है कि पेट खराब हो गया। पेट खराब होने का परिणाम ये हो गया कि आपका स्वास्थ्य खराब हो गया। स्वास्थ्य के खराब होने के लिए दोष किसी को मत दीजिए। इस सृष्टि में जितने भी जानवर हैं, इसमें से कोई भी बीमार नहीं पड़ता। मरते तो सब हैं, पर बीमार कहाँ पड़ते हैं। कबूतर बीमार पड़ते हैं? लोमड़ी, खरगोश जो जंगल में उछलते हैं, कहीं बीमार पड़ते देखे हैं आपने? कोई नहीं पड़ता है।

एक ही बेवकूफ जानवर है जिसका नाम है — मनुष्य। यही बीमार पड़ता है। क्यों पड़ता है? सिर्फ एक वजह है इसकी बीमार पड़ने की, कि अपनी जीभ को इतना छुट्टल बना देता है, कि वो अभक्ष्य खाती रहती है, ज़रूरत से ज्यादा खाती रहती है। जो चीज़ें न खानी चाहिए वो खाती रहती है। पेट काम नहीं करता, पेट हजम नहीं कर सकता, मशीन खराब हो जाती है, और शरीर भी कमज़ोर और बीमार पड़ जाता है। अगर आप जीभ पे काबू कर लें तब — तब आप विश्वास रखिए आपका खोया हुआ स्वास्थ्य मिल जाए। अगर आप जीभ पर काबू कर लें, आप जो दिन-दिन कमजोर होते गए हैं या होते जाएँगे, उससे आप निजात पा सकते हैं। इसी प्रकार से, इसी प्रकार से ये जो अपना मन है मन भी इसी का है। अन्न से विकसित होते हुए, अन्न से माँस बनता है, रक्त बनता है, हड्डियाँ बनती हैं, पर अन्तत: (इससे) अन्न से मन बन जाता है। अन्तिम, अन्तिम चरण जो अन्न का है, वो मन है। जैसा खाएँ अन्न, वैसा बने मन — ये उक्ति सौ फीसदी सही है। आप अभक्ष्य खाते रहिए, तमोगुणी चीज़ें खाते रहिए, माँस खाते रहिए, दूसरी घिनौनी चीज़ें खाते रहिए, फिर आप देखिए आपका मन कैसा चंचल हो जाता है। आप नशेबाज होइए और फिर देखिये मन को स्थिर करना कैसा कठिन पड़ जायेगा। मन अपने आप में नहीं है, ईधन नीचे डालते हैं तो पानी भगोने में उबाल आता है। नीचे ऊपर पानी में भगोना है मन तो, नीचे आप जैसी लकड़ी डालेंगे वैसी तो उबाल आयेगा। अगर आपने बराबर अभक्ष्य खाने का कार्यक्रम जारी रखा है तो आपका मन बराबर चंचल बना रहेगा। कभी ऐसा मौका नहीं रहेगा कि आप मन की स्थिरता रख पायें। इसीलिए जीभ पर काबू पाइए, स्वाद इन्द्रियों पर काबू पाइए। स्वाद पर आपने काबू पा लिया तो (आपने) मन की सम्भालने में और शरीर की बीमारियों से मुकाबला करने में आप सफल हो जाएँगे। जीभ की बात चल पड़ी तो एक और जीभ का हिस्सा है। जीभ को दो इन्द्रियों में सुमारा गया है। एक इसको स्वाद इन्द्रिय भी कहते हैं, एक इसको वाक्-इन्द्रिय, वाणी इन्द्रिय भी कहते हैं। वाणी पर संयम — वाणी पर अगर आपका संयम नहीं है, चाहे जिससे चाहे जैसे शब्द बोलते हैं, कड़ुवे बोलते हैं, क्या बोलते हैं, क्या नहीं बोलते हैं — इसका परिणाम क्या होगा? इसका परिणाम बहुत खराब होगा।

इसका परिणाम कभी अच्छा नहीं हो सकता। वशीकरण एक मंत्र है — तज दे वचन कठोर। कौआ अपने कड़वे वचन से सबको नाखुश करता रहता है और कोयल अपने मीठे वचनों से सबकी प्यारी बनती रहती है। जीभ (को) हमको दूसरों को सम्मान देना चाहिए - दूसरों को इज़्ज़त और अपनी नम्रता का ध्यान रखना चाहिए। क्रोध और आवेश में कई आदमी ऐसे शब्द बोलते रहते हैं कि मुनासिब नहीं होते। उसका परिणाम ये होता है कितने आदमी बैरी-विरोधी हो जाते हैं। आपको मालूम है न। द्रौपदी ने व्यंग और उपहास में ऐसे शब्द कह दिये थे जिसकी वजह से कौरवों को बहुत बुरा लगा। अन्तिम उसका परिणाम महाभारत के रूप में आया। जीभ कटारी की तरीके से, जीभ में बिच्छू का डंक बताया गया है, जीभ में साँप का जहर बताया गया है। अगर आप कड़वा बोलते हैं तब।

कड़वा नहीं बोलते तब, मीठा बोलते हैं तब। यही जीभ आपके लिए न जाने कितनी काम की हो सकती है। इससे मोहब्बत कीजिए, दूसरों को इज़्ज़त दीजिए, अच्छे परामर्श दीजिए, लोगों का उत्साह बढ़ाइए, लोगों की हिम्मत को तोड़िए मत, लोगों की हिम्मतें बढ़ाने वाली बात कहिए। अगर आप ऐसा कर लेते हैं, तो फिर मैं आपको तपस्वी कहूँगा। ये वाणी का तप हुआ, जिह्वा का तप हुआ।

अब चलिए इससे फिर और आती हैं। इन्द्रियों में एक और बात आ जाती है। इन्द्रियों के तप में ब्रह्मचर्य का तप भी आता है। ऐसे तो इन्द्रियाँ हैं दस, पर आप दस के (झं) झंझट में मत पड़िए। दो को ही मान लीजिए — एक जीभ मुख्य है, और दूसरी वाली कामेन्द्रिय मुख्य है। कामेन्द्रिय का मतलब केवल मात्र यौन कर्म ही नहीं होता, यौनकर्म के अलावा है। ये (इन्द्री) इन्द्रियाँ सब मस्तिष्क से सम्बन्ध रखती हैं। काम वासना के बारे में आपके विचार आते रहते हैं। इनको और उनको देख करके आपके दिमाग खराब होते रहते हैं। आप अमुक-अमुक ........ढूँढते रहते हैं। उसका परिणाम क्या होता है। ये मानसिक दुराचार है। किसी भी औरत के बारे में आपके मन में कुसंस्कार व कुविचार आते हैं इसका अर्थ है — प्रकारान्तर से थोड़ा-बहुत आपका नुकसान हो गया। आँखें भी ब्रह्मचर्य का क्षरण होता है। आँख आप कुदृष्टि से देखते रहिए, स्त्रियों को देखते रहिए और बहन, बेटी और माँ की इज्जत मत कीजिए। अपनी धर्म पत्नी को भी रमणी और कामिनी की दृष्टि से देखिए। देखिये प्रत्येक औरत आपके लिए डाकिन और नागिन का काम करती है कि नहीं। अगर आप इन्हीं को बेटी मान पाएँ तब, बहन मान पाएँ तब, माता मान पाएँ तब, सहधर्मिणी मान पाएँ तब — तो यही महिलाएँ आपके लिए देवी की तरह से सहायता देंगी। आप चाहें स्त्रियों को देवियाँ बना लीजिए या डाकिन बना लीजिए, ये आपकी मर्जी की बात है। स्त्रियाँ भी आपकी तरीके से सामान्य मनुष्य हैं। आपने अपना दृष्टिकोण गर्हित बनाया और गर्हित दृष्टिकोण का परिणाम ये हुआ है कि स्त्रियाँ आपके लिए कितनी हानिकारक हो गयीं हैं, और आपके ब्रह्मचर्य को खण्डित करती हैं और आपको घृणा बनाती हैं, आपकी मनः स्थिति मनःशक्ति का नष्ट-भ्रष्ट करती हैं। अगर आप ये अपने मन के ऊपर देख पायें फिर आप कैसे अच्छे हो सकते हैं।

आपने गान्धारी का नाम सुना है न, आँख पर इसलिए पट्टी बाँधी थी और इन्द्रियों का संयम करना शुरू किया था, और अपने बेटे को लोहे का बना दिया था। आपने दमयन्ती का नाम सुना है, राजा नल की धर्म पत्नी का नाम दमयन्ती था। जंगल में अकेली रह रही है और बहेलिया उसे छेड़खानी करने लगा। बस छेड़खानी के समय पर दमयन्ती ने आँख उठाकर के देखा तो बहेलिया जलने लगा और खतम हो गया। आपको गाँधीजी की बाबत मालूम है? ३२ वर्ष की उम्र में उन्होंने ब्रह्मचर्य लिया था और अपनी धर्म-पत्नी को माता कहने लगे थे। ये ब्रह्मचर्य का प्रताप था कि वो दुबले और पतले, कमज़ोर होते हुए भी, मन:शक्ति के हिसाब से ऐसे थे जैसे कोई बड़ा पहलवान भी नहीं हो सकता। आपने भीष्म पितामह की बाबत मालूम है। भीष्म पितामह शव शैय्या पर पड़े रहे छह महीने बाद तक। उन्होंने कहा — छह महीने तक मुझे मरने की फुरसत नहीं है। जब इतने तीरों से घायल थे, ये कैसे हो पाया। ये ब्रह्मचारी थे, ब्रह्मचारी थे। ये ब्रह्मचर्य की, इन्द्रिय निग्रह की बात। स्वामी दयानन्द के लिए सुना है आपने। एक बार दो साँड़ झगड़ रहे थे। स्वामीजी ने उन खूनी साँड़ों को दोंनो के सींग पकड़ करके इस तरीके से दबोचा और फैंक दिया। एक इधर गिरा, एक उधर गिरा।

ये सामर्थ्य, सामर्थ्य किसकी होती है। ब्रह्मचर्य की होती है। हनुमानजी को आप नहीं जानते? हनुमानजी का ब्रह्मचर्य था। ब्रह्मचर्य था जिससे की सामान्य बन्दर से हनुमान बन सके। शंकराचार्य — शंकराचार्य के बारे में भी यही कहा जाता है। शंकराचार्य ब्रह्मचारी न होते तब, शादी ब्याह करके बहुत सारे बच्चे पैदा करते तब, काम वासना में अपने आप को उलझाये रहते तब, तब भगवान शंकर का अवतार बनने का उनको मौका नहीं मिलता। लक्ष्मणजी ने मेघनाथ को मारा था। मेघनाथ को कोई मार नहीं सकता था। मेघनाथ को ये वरदान मिला हुआ था कि उसको केवल वो ही आदमी मार सकता है जिसने चौदह वर्ष का ब्रह्मचर्य पालन किया हुआ हो। लक्ष्मणजी ने चौदह वर्ष का ब्रह्मचर्य का पालन किया था। अपनी पत्नी से भी दूर रहे और सीताजी को माता के तरीके से देखते रहे। उनके बिछुए जमीन पर पड़े मिले, रामचन्द्रजी ने पूछा — इन जेवरों में से सीताजी का कौन है? उन्होंने बिछुओं को तो पहचान लिया कि ये सीताजी का बिछुआ है, लेकिन गले के हार को नहीं पहचान सके, कानों के कुण्डलों को नहीं पहचान सके। उनने कहा — हमने कान कभी देखे नहीं उनके, यद्यपि घूँघट थोड़े ही मारती थीं। क्या है ये? लक्ष्मण जी के ब्रह्मचारी होने का सबूत है जिसकी वजह से वे इतना बड़ा काम करने में समर्थ हो सके।

ये संयम है। कौन सा वाला? ये इन्द्रिय संयम की बात मैं कह रहा था। अभी और मुझे आप से कहना है। आप समय का संयम — समय आपकी सम्पत्ति है। ये जीवन जो बना हुआ है, ये समय से गुँथा हुआ है। समय का अर्थ होता है जीवन, जीवन का अर्थ होता है समय। आप समय को, एक-एक लम्हे को, एक-एक मिनट को इस तरीके से खर्च कीजिए, इसमें एक भी लम्हा आपका बेकार और व्यर्थ न होने पाए। ये कैसे सम्भव है? ये इसी तरह सम्भव है। कैसे? जैसे, जैसे कि संसार के प्रत्येक महापुरुष ने अपने-अपने समय का ठीक तरीके से नियमन किया है। विनोबा तेईस भाषाओं के विद्वान हैं। कैसे? कैसे उन्होंने भूदान की यात्राएँ भी कर लीं। कन्याकुमारी से लेकर और वहाँ तक रामेश्वरम तक, ये कैसे हुआ? ये बराबर समय का विभाजन करते रहे। अन्य भाषाओं को सीखते-पढ़ते रहे।

अब्राहिम लिंकन जब सड़क पर निकलते थे, लोग अपनी घड़ियों को सही करते थे। उनके उठने का और सबेरे टहलने का जो समय था, उसके लम्बी टाँगों की आवाज़ से लोग समझ लेते थे, लिंकन जा रहे हैं। बिल्कुल समय पर जाते थे। क्या मजाल समय का एक लम्हा भी खराब करें। ये क्या है? श्रम, श्रम की शक्ति को, समय की शक्ति को आप समझते हों, बिल्कुल समझते हों तो आप न जाने क्या से क्या कर सकते हैं। मनोयोग, मनोयोग अगर आप लगाएँ तब। मनोयोग लगाएँ तो आपने देखा है न, मन के साथ में परिश्रम करें तब। मन लगा करके परिश्रम करना, बिना मन के परिश्रम में जमीन-आसमान का फरक है। बिना मन के परिश्रम करने वाले हर काम फूहड़, हर काम खराब, हर काम बेकार, हर काम घटिया और मन लगा के काम करने वाले का काम कैसा होता है, आप (देख) देख सकते हैं न। बया पक्षी होता है, और एक-एक तिनके को बीन के लाता है। उसकी लम्बाई-चौढ़ाई नाप के लाता है, हिसाब से लाता है, मोटाई को देख के लाता है, और जहाँ लगाता है घोंसले में, बड़ी सावधानी से और मनोयोग के साथ लगाता है। दूसरी ओर घोंसला बनाने वाला है कबूतर। उलटी-पुलटी, टेड़ी-पीछी लकड़ी ले आता है। जहाँ की तहाँ रख लेता है और अपना घोंसला बना लेता है। हवा चलते ही आमतौर से घोंसले, किसके कबूतर के जमीन पर गिरते हैं और बच्चे सब तबाह हो जाते हैं। इसीलिए अकसर देखा गया है कबूतर किसी पुराने मकान में, या कुँए में खण्डर में, कुँए में घोसला बनाते हैं ताकि हवा का झोंका उनके घोंसले बर्दाश्त कर सकें। लेकिन बया को ये परेशानी नहीं है, बया के बच्चे अपने घोंसले में बैठे रहते हैं और बड़ा मजा उड़ाते रहते हैं। क्या मजालकि कि एक बूँद पानी की चली जाए। क्यों? उसने मन लगा करके घोंसला बनाया बयापक्षी ने।

यही बात आप हर बारे में देख सकते हैं, हर बारे में देख सकते हैं। मन लगा करके काम करना — ये आदमी की सम्मान का प्रश्न होना चाहिए। ये अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न है। आदमी के बारे में अगर कोई आदमी कामचोर उसे कहे, हरामखोर कहे, तो समझिये ये बहुत बड़ी बेज्जइती है, बेज्जइती है। समय का उपयोग — समय को बर्बाद मत कीजिए। विश्राम करें भले से हर्ज नहीं है, लेकिन विश्राम भी टाइम पर होना चाहिए, समय पर होना चाहिए। आलसियों की तरीके से काम को इधर छोड़ दिया, उधर छोड़ दिया, आधा छोड़ दिया, अधूरा छोड़ दिया। आप ऐसे मत कीजिए, ऐसे मत कीजिए। समय के संयम को पालिए।

तीसरा हमारा संयम है — धन का संयम। पैसा भगवान ने आपको दिया है, (अ) इसीलिए दिया नहीं है कि आप बेसिलसिले खर्च करें। आप कमाएँ तो चाहे जितना, कमाने के ऊपर रोक नहीं है लेकिन ईमानदारी से (कमाएँ) कमाएँ, और शराफ़त की तरीके से खर्च करें। बेसिलसिले का खर्च मत कीजिए। सादा जीवन — उच्च विचार का सिद्धान्त आपने सुना है न। (ये) जो सादा जीवन जीएगा, उच्च विचार उसी के हिस्से में आएँगे। जिसका विलासी जीवन, खर्चीला जीवन, ठाट-बाट का जीवन, दिखावे का जीवन जितना ज्यादा होगा उसके खर्च — पैसे के खर्चे और समय के खर्चे इतने ज्यादा हो जाएँगे कि उससे ही कुछ न बेचारे के पास समय बच सकता है, न पैसा बच सकता है। खर्चीली जिन्दगी, विलासी जिन्दगी, फिजूल खर्चियों से भरी हुई जिन्दगी, ठाट-बाट से बनी हुई जिन्दगी, न ये नहीं। आप अपने पैसे उसमें मत खर्च कीजिए, समय को भी मत खर्च कीजिए, आप अपनी किफायतशारी का जीवन जिएँ।

सन्त का जीवन वो है जिसमें कि औसत भारतीय का स्तर को माना जाता है। औसत (भा) भारतीय का स्तर जो है, आप अपने खर्चे का हिसाब उसी हिसाब से रखिए। आप इसी मुल्क के निवासी हैं न। जो बाकी आपके तीन चौथाई आदमी जिस ढंग से गुजारा करते हैं, आप क्यों नहीं कर सकते? ईश्वरचन्द्र विद्यासागर यही करते थे। उनको पाँच सौ रूपये की आमदनी थी। पचास रूपये में अपना गुजारा करते थे और साढ़े चार सौ रूपया महीना बच्चों के लिये, विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति और दूसरे कामों के लिए खर्च करते थे। आप क्यों नहीं कर सकेंगे? किफायत से रहिए, कम खर्च में रहिए। ये मत कहिए कि जो आदमी खर्चीली जिन्दगी जीते हैं वो कोई शक्तिशाली हो जाते हैं, बुद्धिमान हो जाते हैं, मजबूत हो जाते हैं। आप बेकार की बात मत कहिये। सही बात ये है जो आदमी जितना खर्चीला होता है, उतने ही दुर्व्यसनों में उसका धन खर्च होता है। दुर्व्यसनों की कीमत पर क्या-क्या खरीदा जाता है? ईर्ष्या खरीदी जाती है, बीमारियाँ खरीदी जाती हैं, बेअकली खरीदी जाती है, अपयश खरीदा जाता है, सब चीजें तो खरीदी जाती हैं। आप नशे को नहीं समझते। आप पैसा फालतू है, खर्च करेंगे तो नशे जैसी चीजों में खर्च करेंगे। नशे जैसी चीजों में खर्च करेंगे तब, तब अपनी सेहत गवाँ देंगे, तब आप अपनी अकल गवाँ देंगे, तब अपनी औलाद गवाँ देंगे, तब आप अपनी इज्जत गवाँ देंगे और आप सब कुछ गवाँ देंगे।

ये कैसे हो सकता है? ये फिजूल खर्ची की बात है। पैसा फिजूल खर्ची में खर्च हुआ तो और कहाँ जायेगा, बताइये ना। इसलिये आप पैसे के बारे में हमेशा किफायत से काम लीजिए। आदमी होशियार है, समझदार है, कि बेअकल है — इसकी पहचान सिर्फ एक है कि वो खर्च कैसे करता है। कमाने में तो बेवकूफ भी कमा लेते हैं। सट्टा मिल जाये तब, लॉटरी खुल जाये तब, जमीन में गढ़ा हुआ धन मिल जाये तब, और कोई बाप बहुत सारा धन देकर मर जाये तब, तब बेवकूफ आदमी भी धनवान बन सकता है। लेकिन समझदारी की परख एक है कि उसने खर्च कैसे किया? खर्च करना बहुत समझदारी का काम है। आप फिजूलखर्ची करेंगे, अपने चरित्र को गवाँ बैठेंगे। फिजूलखर्ची करेंगे, अपने घर और औलाद के लिए ऐसी परम्परा छोड़ के जायेंगे जिससे कि वो तबाह हो जाए। इसीलिए आप खर्चीली जिन्दगी नहीं जिएँ। ईमानदार आदमी मितव्ययी हो सकता है। जो फिजूल खर्ची है, उसको बेईमानी करनी पड़ेगी, फालतू पैसा लाया कहाँ से। रिश्वत लेनी पड़ेगी, चोरी करनी पड़ेगी, अमुक काम करना पड़ेगा। लेकिन जो आदमी किफायतशार है वो आसानी से ईमानदारी की जिन्दगी जी पायेगा। ये तीसरा वाला तप — तीसरा वाला संयम हुआ।

चौथा वाला एक और तप है। उसको भी अगर आप करने लगें तो आपका यहाँ ब्रह्मवर्चस यहाँ कल्प साधना सत्र में आ करके उपासना करना सच्चे अर्थों में सार्थक हो जायेगा। चौथा वाला तप — विचार संयम, विचार संयम। विचारों को आप भटकने मत दीजिए। विचार की शक्ति आप समझते नहीं हैं। पैसे को शक्ति समझते हैं — श्रम को (श) शक्ति समझते हैं, पर विचारों को क्यों नहीं समझते? विचार असल में सबसे बड़ी शक्ति है। विचारों का अपव्यय मत होने दीजिये। विचारों को आवारा कुत्ते की तरीके से मत घूमने दीजिए, विचारों को एक दिशा में लगाइए। विचारों को ऐसे लगाइये जैसे बन्दूक की नली में कारतूस लगा करके एक दिशा में छोड़ते हैं तो तीर निशाने में लगता है। बारूद को फैला दें तब, तब तो सब अस्त-व्यस्त हो जायेगा।

अर्जुन का आपने सुना नहीं है। अर्जुन एक तरीके से एक ही मछली का एक हिस्सा कोई देखता था, इसलिये उससे निशाना लगाना सम्भव हो सका। अगर वो चारों ओर देखता जो और दूसरे राजकुमार थे, जो मछली का सिर-पैर वगैरह देखते थे, उनका निशाना नहीं लगा। आपको अपने विचारों को अर्जुन की तरीके से एकाग्र रखना चाहिए। एकाग्र का मतलब केवल ये नहीं है कि आप उनको रोक लें। एकाग्रता का मतलब ये है कि एक दिशा में, अच्छी दिशा में, वैज्ञानिकों की तरीके से, वैज्ञानिक विचार करते रहते हैं, पर एक दिशा में विचार करते हैं, फालतू विचार को आने नहीं देते। साहित्यकार हैं, ज्ञानी हैं, तपस्वी हैं और विचारशील लोग हैं — सिर्फ एक दिशा में अपने विचारों को लगाये रहते और एक दिशा में विचार रखने का परिणाम ये होता है, इसके कई अच्छे नतीजे निकलते हैं। सूरज की किरणें चारों ओर फैली रहती हैं, पर आतिशी शीशे के ऊपर अगर उसको इकट्ठा करके एक जगह पर केन्द्रित कर दें तो आप देखते हैं, न आग जल जाती है। इसी तरीके से आदमी के फैले हुए विचार, आवारागर्दी के विचार, अनावश्यक विचार, बेसिलसिले के विचार। आदमी की मनःशक्ति कितनी मूल्यवान है, सबको बर्बाद कर देती है। आप ऐसा मत होने दीजिए, विचारों को जहाँ-तहाँ मत घूमने दीजिए। आप अभ्यास डालिए। आप सिद्धान्तों पे विचार करें, सृजनात्मक विचार करें, आप ऐसे विचार करें जिससे कि आपका भविष्य बनता हो, अथवा कोई योजना बनती हो। आप ऐसे क्रमबद्ध विचारों का अभ्यास डालिए।

बिना क्रम के विचारों को जब भी आयें, उनको हटा दीजिए। विचारों से विचारों की लड़ाई कराइए। कुविचार जब आपके मन में आते हों, सदाचार के विचारों की एक सेना बनाकर रखिए। उनसे एक गुत्थम-गुत्था करा दीजिए। दुराचार के विचार जब आएँ तो आप सदाचार और संयम के विचारों को आगे बढ़ाइए, गुत्थम-गुत्था करा दीजिए। पाप के विचार मिलकर भाग जाएँगे। विचारों को विचारों से काटिए, विचारों को विचारों से सम्हालिए, विचारों को सम्पत्ति समझिए, विचारों (को) संयम कीजिए, विचारों को ऊँचे उठने दीजिए, विचारों को अध:पतन में गिरने से रोक दीजिए। अगर आप ऐसे करेंगे तो फिर मैं ये कहूँगा कि आप विचारों (की) के क्षेत्र में तपस्वी हैं।

आपको चार तप करने चाहिए — इन्द्रिय निग्रह का तप - एक और, (और आपको) समय निग्रह का, समय संयम का तप - दो और, धन के संयम का (औ) धन के बजट बना के खर्च करने का तप - तीन और अपने विचारों को एक दिशा विशेष में रोके रहने का (उ) उपक्रम करना चाहिए, जिसका नाम विचार संयम है, विचार तप है। आप तपस्वी जीवन जिएँ। जरूरी नहीं है कि आप धूप में खड़े हों और खाना बन्द कर दें और अमुक काम करें। ये ज़रूरी है कि अपने जीवन के जो सूराख हैं, जो आपकी गल्तियाँ और कमज़ोरियाँ हैं, उनको रोकें और जो (अच्छाइयाँ नहीं) अच्छाइयाँ आपके भीतर नहीं हैं, उनको बढ़ाने की कोशिश करें। अगर आप ऐसे कामों में (ल) लगातार लगे रहेंगे तो फिर मैं आपको तपस्वी कहूँगा। आपको तपस्वी बनाने का उद्देश्य था, यहाँ कल्प साधना शिविर में बुलाने का। आप यहाँ से जाएँ तो तपस्वी हो कर के जाएँ। यहाँ रहें तो तपस्वी होने का अभ्यास करें। तपश्चर्या में कितनी शक्ति भरी पड़ी है, इसका उदाहरण मैंने दिया आपको। आप चाहें तो इसका अनुभव कर के स्वयं भी देख सकते हैं कि आदमी तपस्वी कितने समर्थ होते हैं, कितने शानदार होते हैं। आपको वैसा ही करना चाहिए। ………...समाप्त ॥

॥ॐ शान्तिः॥