चिन्तन और मनन

भजन और पूजन की भाँति, स्वाध्याय और सत्संग की भाँति, दो और भी पूजापरक, उपासनापरक आध्यात्मिक प्रयोग हैं, जो आपको करने ही करने चाहिए - एक का नाम है चिन्तन और एक का नाम है मनन। चिन्तन और मनन के लिए किसी कर्मकाण्ड की जरूरत नहीं है, किसी पूजा विधान की जरूरत नहीं है, और किसी समय निर्धारण करने (के लिए) भी जरूरत नहीं है। अच्छा तो ये हो कि आप सवेरे का समय ही इन सब कामों के लिए रखें। अध्यात्म के लिए (ये) समय सबसे अच्छा प्रात:काल का है। दूसरे कामों के लिए भी प्रातःकाल का समय है। सबसे अच्छा समय अगर चौबीस घण्टे में कोई है तो प्रातःकाल का है और प्रातः काल के समय को आप जिस भी काम में लगा देंगे उस काम में आपको बड़ी प्रसन्नता भी मिलेगी और सफलता मिलेगी। इसलिए चिन्तन और मनन की एकान्त साधना के लिए अगर आप प्रातःकाल का समय निकाल पाएँ तो बहुत अच्छा। कदाचित प्रातःकाल का समय निकालना आपके लिए सम्भव न हो तो फिर आप ऐसे करें और कभी समय निकालिए। सुविधा के समय जब कभी भी आप देख पायें की आधा घण्टा, पंद्रह मिनट का समय कोई ऐसा निकलता है जिसमें आप शान्त रहें। शान्त चित्त होना जरूरी है चिन्तन मनन के लिए। भाग दौड़ में, रस्ता चलते, चलते-फिरते जप कर लेंगे नहीं ऐसे मत कीजिए। चिन्तन मनन के लिए ऐसा सम्भव नहीं है। ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ कि आपके बाहरी विक्षेप उत्पन्न न होते हों और आपका मन एकाग्र और शान्त हो जाता हो। इसके लिए कोई मुनासिब एकान्त का स्थान मिल जाए तो और भी अच्छा है। न मिल जाये तो आप आँखें बन्द कर के भी कहीं बैठ सकते हैं जहाँ कोलाहल रहित हो। आँखें बन्द कर देंगे तो भी गुफा हो जाती है। गुफा में चले जाना, शान्त एकान्त के स्थान में चले जाना भी एक बात है। लेकिन अगर वैसा सम्भव न हो तो आप आँखें बन्द कर लें, आँखें बन्द करना भी एक काम है। आँखें बन्द करने से भी बहुत काम हो सकते हैं। अगर आप आँखें बन्द करके अपने आप को एकान्त में समाया हुआ (सोचें)। सब दुनिया बन्द हो गई, सारी दुनिया दीखना बन्द हो गई, आपके भीतर ही भीतर का दिखता है, बाहर न कुछ है, न कोई दिखता है। इस तरीके से भी काम चल सकता है। इस चिन्तन और मनन के अभ्यास के लिए आप अभी बैठ जायें, थोड़ी देर, शान्ति चित्त से बैठ जायें। ये समझें हम अकेले हैं, कोई हमारा साथी व सहकारी नहीं है। साथी अपनी जगह पर, सहकारी अपने स्थान पर, कुटुम्ब भी अपने स्थान पर, पैसा अपने स्थान पर, व्यापार अपने स्थान पर, खेती-बाड़ी अपने स्थान पर, इन सब को अपने-अपने स्थानों पर रहने दीजिए, आप तो सिर्फ ये अनुभव कीजिए कि हम एकाकी और एकान्त में बैठे हैं। फिर क्या करें? (फिर) आप दो तरह के विचार करना शुरू कीजिए। ये विचार करने की श्रेणी है, ये ध्यान की श्रेणी नहीं है ये विचारणा है। चिन्तन और मनन में विचार करने की गुंजाइश है, मन को भागने की पूरी छूट है। ध्यान में तो एक केन्द्र पर करना पड़ता है पर इसमें केन्द्र पर नहीं करना पड़ता। इसके लिए विचार करने के लिए काफी लम्बी-चौड़ी गुंजाइश है।

चिन्तन उसे कहते हैं जिसमें कि भूतकाल के लिए विचार किया जाता है। भूतकाल हमारा किस तरीके से व्यतीत हुआ इसके बारे में समीक्षा करिए। अपनी समीक्षा नहीं करना चाहते, दूसरों की समीक्षा करना जानते हैं, पड़ोसी की समीक्षा कर सकते हैं, बीवी के नुक्ता बीवी के दोष निकाल सकते हैं, बच्चों के नुक्ता चीनी कर सकते हैं, सारी दुनिया की गलती बता सकते हैं, भगवान की गलती बता देंगे, हर एक की गलती बता देंगे, कोई भी ऐसा बचा हुआ नहीं है जिसको आप गलती न बताते हों। लेकिन अपनी गलती, अपनी गलती तो आप विचार भी नहीं करते, अपनी गल्तियों (को) हम विचार करना (हम) शुरू करें, और अपनी (चाल) की समीक्षा (लेना) शुरू करें, और अपने आप का हम परिवेक्षण शुरू करें, तो ढेरों की ढेरों चीजें ऐसी हमको मालुम पड़ेंगी जो हमको नहीं करनी चाहिए थीं। और ढेरों की ढेरों ऐसी चीजें मालुम पड़ेंगी आपको जो इस समय हमने जिन कामों को जिन बातों को अपनाया हुआ है उनको नहीं अपनाना चाहिए था। ये कभी विचार आता नहीं। मन की बनावट कुछ ऐसी विलक्षण है कि अपना सो अच्छा, अपना सो अच्छा बस अपना सो अच्छा, ये ही बात बनी रहती है। अपना स्वभाव भी अच्छा, अपनी आदतें भी अच्छी, अपना विचार भी अच्छा, अपना चिन्तन भी अच्छा, सब (अ) अपना अच्छा, बाहर वालों का गलत - आमतौर से लोगों की ये मनोवृत्ति होती है। ये मनोवृत्ति बहुत (भय) भयंकर है - आध्यात्मिक उन्नति में (पर) इसके बराबर अड़चन डालने वाला और दूसरा कोई व्यवधान है ही नहीं। इसलिए आप पहला काम वहाँ से शुरू कीजिए आत्मसमीक्षा से। एकान्त में चिन्तन के लिए जब आप बैठें, तो आप ये विचार किया कीजिए कि (हम) हम पिछले दिनों क्या भूल करते रहे हैं। रास्ता भटक तो नहीं गए? भूल तो नहीं गए? इसीलिए जन्म मिला था क्या? जिस काम के लिए जन्म मिला था वही किया क्या? पेट के लिए जितनी जरूरत थी उससे (ज) ज्यादा कमाते रहे क्या? कुटुम्ब की जितनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए थीं, उसको पूरा करने के स्थान पर अनावश्यक संख्या में लोग बढ़ाते रहे क्या? और, जिन लोगों को जिस चीज की जरूरत नहीं थी, उनको प्रसन्नता के लिए उपहार रूप में लादते रहे क्या? क्यों? वजह क्या? ये सब गलतियाँ, ये गलतियाँ हैं। इसी तरीके से अपने स्वास्थ्य के लिए जो खान-पान और आहार-विहार जैसा रखना चाहिए था, वैसे रखा क्या? चिन्तन में, चिन्तन की शैली में जिस तरह की शालीनता का समावेश होना चाहिए था, वो रखा गया क्या? न, न हमने शरीर के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन किया, न अपने मस्तिष्क के प्रति कर्तव्यों का पालन किया, न अपने कुटुम्बियों के प्रति कर्तव्यों का पालन किया, कर्तव्यों की दृष्टि से हम बराबर पिछड़े हुए चले गये। जहाँ-जहाँ पिछड़ते हुए चले गये उन सब को एक बार के लिए विचार कीजिए। क्यों, विचार करने से क्या फायदा? ये फायदा है, गलतियाँ समझ में आयेंगी तो सुधार की गुंजाइश पड़ेगी। गलतियाँ समझ में नहीं आयेंगी तो आप सुधारेंगे क्यों? बीमारी का निदान हो जाये आपको, चैकिंग करा करके पता चला लें कि आपके भीतर टी.बी. की शिकायत है तभी तो आप बुखार का इलाज करेंगे। नहीं तो आपको मालूम ही नहीं। अरे साहब ऐसे ही हम तो ऐसे ही, शरीर ढीला हो जाता है कोई बीमारी नहीं है, फिर पता कैसे चलेगा। इसीलिए समीक्षा जो है, नाड़ी परीक्षा अपने आप की कीजिए भूतकाल के सम्बन्ध में। पापों की नहीं, पाप अज्ञान को ही नहीं कहते। पाप उन्हें भी कहते हैं जो कि जीवन को ठीक तरीके से न जीने का जो जिक्र है ये भी पाप में आता है। क्राइम तो है ही, अपराध तो है ही, चौबीस प्रकार की हत्या वगैरह ये तो बुरे कर्म हैं ही, लेकिन ये भी कम बुरा कर्म नहीं है कि आप आलस्य-प्रमाद में ही समय काट डालें, ये क्या कम बुरा कर्म है। आप अपने स्वभाव को गुस्सेबाज बना कर रखें, क्रोध से भरे की भरे रहा करें, ईर्ष्या किया करें, चिन्तन और मनन को अस्त-व्यस्त बना के रखें, ये भी कोई ढंग है। ये क्या है? ये भी गलतियाँ हैं। व्यक्तिगत जीवन में आपको गुण, कर्म, स्वभाव सम्बन्धी गलतियाँ क्या हुई? और क्राइम और अपराध, जुर्म करने के सम्बन्ध में क्या भूलें हुई, इन दोनों के बारे में एक बार विचार किया कीजिए, ये विचार करना बहुत जरूरी है। इससे ये मालूम होता है कि हमारा ये गलतियाँ कहाँ हैं, हम कितना चूकते रहे और चूक रहे।

इन चूकों को (फिर) सुधारने वाला अगला कदम आता है - (आत्म) आत्म-परिष्कार। आत्म-निरीक्षण के बाद में आत्म-परिष्कार का दूसरा नम्बर आता है। सुधार कैसे करें? सुधार में क्या बात करनी होती है? सुधार में रोकथाम करनी पड़ती है। मसलन आप शराब पीते हैं तो बन्द कीजिए, साहब अब हम नहीं पीयेंगे। आप बीड़ी पीते हैं, सिगरेट पीते हैं अपना कलेजा जलाते हैं, तब विचार कीजिए अब हम कलेजा नहीं जलाएँगे। ये आत्म-परिशोधन इसी का नाम है, (कि) जो गल्तियाँ हुई हैं, उनके विरुद्ध आप बगावत खड़ी कर दें, रोकथाम के लिए आमादा हो जाएँ, संकल्पबल से ये (इस्तेमाल) करें कि जो भूल होती रही हैं, (अब हम) अब हमसे न हों। हमसे न हो इसकी स्कीम बनाइये, गलतियाँ न होने देने का तरीका क्या है? क्या हम करेंगे? और अपने आपको, अपने आप में जब कच्चाइयाँ आयेंगीं, जब आपको कच्चाइयाँ ये मजबूर करेंगी, कि जो करते रहे वही ढर्रा चलते रहने देना चाहिए, क्या हर्ज है, अपने साथ में पक्षपात और याद करने का जब आपका मन उठे तब आप उसके मन के विरोधी हो जाइए, मन को निग्रहित कीजिए, मन को तोड़िये, मन से लड़ाई कीजिए। मन भला आदमी है कोई, कहने से मानता है क्या? न किसी का मन कहने से माना नहीं है। मन नहीं लगता, मन को लगाइये, फिर मन नहीं लगता। मन ऐसा भला आदमी है, अच्छे कामों में लग जायेगा? नहीं, लगेगा ही नहीं मन। मन की कुसंस्कार उसके ऊपर जमा हुए हैं। आप ये उम्मीद करते हैं कि आपका मन अच्छे काम में लगेगा, ध्यान में लगेगा, भजन में लगेगा। नहीं, उसको लगाना पड़ता है। बैल को जिस तरीके से हल में चलना सिखाना पड़ता है, घोड़े को जिस तरीके से जबरदस्ती ताँगे में चलाना पड़ता है, जैसे सर्कस के जानवरों को मार-मार के और अपना अभ्यास कराना पड़ता है ठीक उसी तरीके से आपको अपने मन के बारे में भी यही करना पड़ेगा। मन को मारना पड़ेगा, मन को तोड़ना पड़ेगा, मन की तोहलीनता करनी पड़ेगी, मन की बगावत करनी पड़ेगी और मन फिर घूम करके उसी में आ जाए, तो उसको सजा देने की तैयारी भी करनी पड़ेगी। आप सजा भी देते रहिए, मन न माने तब, न माने तब आप खाने का उसको नियमित उपवास कर डालिए। तब आप क्या किया? मन नहीं माना और जहाँ आप नहीं सोचना चाहते थे, जो नहीं करना चाहते थे किया तो आप एक समय का खाना बन्द कर सकते हैं, पूरा खाना न बन्द करना हो तो उसमें कटौती कर सकते हैं। चार रोटी खाते हैं और आपका मन ने गड़बड़ फैला दिया है तो आप दो रोटी खाइये, आधा बन्द कर दीजिए। कहने का अर्थ ये है खाने और सोने के साथ में, सोने का सजा दीजिए, रोज आप नौ बजे सोते हैं, आज हम ग्यारह बजे सोएंगे। दो घण्टे हम इसलिए जगेंगे, टहलेंगे, जिस तरीके से मिलेट्री के सिपाही गलती करते हैं तो उनको दलील घोल दी जाती है मिट्टी ढोते हैं। आप जगने की दलील घोल दीजिए, दो घण्टे हम जगेंगे, नौ बजे सोते हैं आज नौ बजे नहीं सोयेंगे ग्यारह बजे सोयेंगे, बाहर टहलते रहेंगे, चुप-चाप बैठे रहेंगे, रामायण पढ़ते रहेंगे, पर हम नींद से लड़ेंगे, क्यों? ये दण्ड, अपने आपको दण्ड देने की पद्धति भी आवश्यक है। इसके बिना सुधार होना भी सम्भव नहीं है, दण्ड की प्रक्रिया भी जरूरी है। समझाने से कहाँ मान जाता है, खासतौर से दुराग्रही लोग। दुराग्रही जानवर, खासतौर से मन जैसा दुराग्रही - आप ये उम्मीदें मत कीजिए कि (आपको) कह देने से, और कर देने से, और सुन लेने से और समझाने से बात बन जाएगी। ऐसे नहीं बनेगी। इसके लिए आपको लड़ना पड़ेगा। बगावत तो करनी चाहिए, गीता में महाभारत का जो जिकर किया गया है वास्तव में वो कौरव-पाण्डवों की लड़ाई को गीता से जोड़ने की जरूरत नहीं थी। असल में ये भीतरी और बाहर जो होने वाले हैं द्वंद्व उनका जिकर है गीता के माध्यम से। कौरव सौ हैं, पाण्डव पाँच हैं - (हमारे) हमारे विवेक के, विवेकशीलता के आधार पाँच हैं - कोष (पंच)। और बुराइयाँ कितना (के का है) - सौ कौरवों से भी ज्यादा हैं - अक्षौहणी सेना के बराबर हैं। इनसे बगावत करने वाली बात करनी चाहिए। आत्म सुधार इसी का नाम है, आत्म-परिष्कार इसी का नाम है। आत्म-निरीक्षण और आत्म-परिष्कार अथवा परिशोधन, ये दो कामों को मिला देने से चिन्तन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है; और ये भूतकाल से ताल्लुक रखती है, और ये वर्तमान से ताल्लुक रखती है। वर्तमान से इसलिये कि उस आधार पर आपको नया निर्धारण करना पड़ेगा, नये फैसला उसी आधार पर तो करेंगे। गलतियाँ कहाँ होती हैं इसी को समझ करके तो सुधारेंगे, और जो कुछ आपने गुनाह किये हैं उनका परिष्कार के लिए आपको क्या करना है, और खाई को कैसे पाटना है? ये तभी तो करेंगे जब पिछली बातें याद आयें, पिछली बातें याद आयें। पिछली बातें याद करने का नाम है चिन्तन। चिन्तन आप जरूर किया कीजिए।

दो बात, दो हो गई न, एक हो गया आत्म निरीक्षण और एक हो गया आत्म परिष्कार, परिशोधन - ये हो गया चिन्तन। चिन्तन की दो धाराएँ हैं, चिन्तन की (दो) दो धाराएँ हैं - गल्तियों को याद करना, और गल्तियों को सुधारने के लिए हिम्मत इकट्ठी कर लेना, और (ये) कार्यपद्धति बना लेना। आधा काम समाप्त, किसका? एकान्त का, एकान्त सेवन में चिन्तन पूरा हो गया।

अब दूसरा वाला कदम उठाइये, दूसरा वाला कदम जो आपको हर दिन एकान्त में बैठ कर के उठाना पड़ेगा, उसका नाम है - मनन। मनन क्या? मनन के भी दो हिस्से हैं - चिन्तन के जैसे दो हिस्से थे, ऐसे मनन के दो हिस्से हैं - एक हिस्से का नाम है आत्म-निर्माण, (एक का) एक का नाम है आत्म-विकास। आत्म-निर्माण और आत्म विकास, ये दो हिस्से हैं। निर्माण में क्या? निर्माण उसे कहते हैं कि जो चीज़ें आपके पास नहीं हैं, या जो स्वभाव और गुण और कर्म में जो बात शामिल नहीं हैं, उसको शामिल कीजिए। मसलन - आप पढ़े नहीं हैं, विद्या नहीं है (आपके) - अब आप कोशिश कीजिए। काहे को, कि आपको विद्या पढ़नी है। हम ईमानदारी से रहते हैं, बीड़ी नहीं पीते हैं, वो तो ठीक है आपकी बात, पर ये पूछता हूँ कि विद्या की जो कमी है उसको आप क्यों पूरा नहीं करते। विद्या की कमी को आप पूरा नहीं करेंगे ये तो उन्नति कैसे हो जाएगी? आपका ज्ञान का दायरा कैसे बढ़ेगा? आपकी बुद्धि का विकास कैसे होगा? इसीलिए यहाँ आत्म निर्माण के लिए भी ढेरों काम करना है। स्वास्थ्य आपका कमजोर है, इसी से तो काम नहीं चल जाएगा न कि हम बीड़ी पीते रहें, हम बन्द कर देंगे। बन्द तो करनी चाहिए थी पर एक और बात भी करनी पड़ेगी, आपको स्वास्थ्य सम्वर्धन करने के लिए (आपके) अपने आहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन करना पड़ेगा, ब्रह्मचर्य धारण करना पड़ेगा, और, और व्यायाम का कोई नई तरीका अख्तियार करना पड़ेगा। ये जो नये तरीके अख्तियार करना है किसके लिए? प्रगति के लिए ये सब आत्म निर्माण में आते हैं। कमी को पूरा करना। कमी को सुधारना ही तक सीमित नहीं है, कमी को पूरा भी तो कीजिए। सुधार लेंगे इससे क्या बना, पूरा नहीं करेंगे? विद्या को आप नहीं पढ़ेंगे? स्वास्थ्य को सुधारेंगे नहीं, जन सम्पर्क बढ़ायेंगे नहीं, सेवा के लिए कदम बढ़ायेंगे नहीं, जो काम करने हैं नहीं साहब हमने गलती सुधार ली, गलती सुधार ने से क्या मतलब, गलती को सुधारिये और अपनी योग्यताओं को, अपनी क्षमताओं को और अपनी भावनाओं को विकसित कीजिए। ये क्या है? ये वो है जिसको हम आत्मनिर्माण कहते हैं। आत्मनिर्माण में बराबर ये देखना पड़ेगा कि हमारे जीवन में क्या-क्या कमी है और उस कमी को पूरा करें। अपने स्वभाव को और आदतों को हम ठीक बनायें। बनायें, बनायें कैसे? निर्माण मतलब बनाना होता है। अपने आप को बनाइए। अपने स्वास्थ्य को बनाइए, अपने व्यक्तित्व को बनाइए, अपने चरित्र को बनाइए, अपने स्वभाव को बनाइए, (और) अपनी कार्यशैली को बनाइए, हर चीज़ बनाइए।

इस बनाने के अलावा एक और भी ध्यान रखिये अब अपने कुटुम्ब को बनाइये। बनाना उसमें भी शुमार है। निर्माण केवल अपने आप का, अपने आप में सन्त बन जायेंगे और रामायण पढ़ेंगे, और हम मिठाई नहीं खायेंगे, आप का कहना तो ठीक है पर वो भी तो आपका अंग है। आप अकेले थोड़े ही हैं अब कोई, जो कुटुम्ब है वो भी आपके साथ जुड़ा हुआ है। इसलिए निर्माण उसका भी करना पड़ेगा। अगर आप उसका निर्माण नहीं कर सकते, सारे के सारे आपके घर वाले कमीने, उजड्ड, मूर्ख, दुष्ट बनके रह गये तो आपकी शान्ति कैसे स्थिर रहेगी? और आप भजन कैसे कर लेंगे, फिर आप अच्छी जिन्दगी कैसे जी लेंगे? फिर आप मीठे वचन का अभ्यास कैसे कर लेंगे? जब हर आदमी हैरान होगा तब आपको गुस्सा क्यों नहीं आयेगा? इसलिए क्या करना चाहिए? अपना व्यक्तिगत जीवन सुख और शान्तिमय बनाने के लिए अपने कुटुम्ब और परिवार के बारे में ठीक वो ही नीति निर्धारित कीजिए जो अपने बारे में है। वो भी तो अपने अंग हैं। जो कुटुम्बी हैं वो अंग हैं। हाथ हैं, पैर हैं। नहीं साहब हाथ को तो हम धोयेंगे, पैर को नहीं धोयेंगे, ये क्या बात? पैर को क्यों नहीं धोएँगे, पैर को भी धोना पड़ेगा, हाथ धोते हैं तो पैर को भी साफ रखना पड़ेगा। इसी तरीके से अपने व्यक्तिगत जीवन को ही अच्छा बनाना पर्याप्त नहीं है, अपने कुटुम्ब और परिवार का निर्माण करना भी उसी शृंखला में शामिल होता है, और समाज का निर्माण भी - इन सब को बनाइए।

क्या बनाएँ इनका? इनका एक ही बात बनाइए - इनके अन्दर भलमनसाहत पैदा कीजिए, चरित्र-निष्ठा पैदा कीजिए, आदर्श पैदा कीजिए, सत्प्रवृत्तियाँ पैदा कीजिए। सम्पन्न बन जाते हैं तो, न बन जाते हैं तो कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। गरीबी में भी लोगों ने शानदार जिंदगियाँ जी हैं, और अमीर रहते हुए भी आदमी ने इतने कलह उत्पन्न किये हैं कि स्वयं मर गया है दूसरों को मार डाला है। इसलिए सम्पन्नता की बात मैं नहीं कहता आपसे। निर्माण के लिए मेरा मतलब गुण, कर्म और स्वभाव से है। आप (इन) इन विशेषताओं को - आप आदमी की शालीनता को, औरआदतों को, और चिन्तन की शैली को बदलने के लिए जो कुछ कर सकते हों वो सब कीजिए। परिवार के लिए भी कीजिए, परिवार के पंचशीलों में श्रमशीलता का नाम आता है, सुव्यवस्था का नाम आता है, मितव्ययता का नाम आता है, सहकारिता (का) का नाम आता है - ये सब बातें उसमें आती हैं - आप इन गुणों को स्वयं भी धारण कीजिए, और घरवालों को भी (कीजिए)। ये व्यक्तित्व के और चरित्र के निर्माण करने का, चिन्तन के निर्माण करने का, एक शानदार तरीका है। आप उसको किस तरीके से कार्यान्वित कर सकते हैं, इसके बारे में चिन्तन और मनन के समय पे, जब आप बैठें एकान्त में, तो ये विचार किया कीजिए। ये तीसरी वाली धारा है, निर्माण वाली धारा।

चौथी वाली एक और धारा है (जो) जिसे मनन का दूसरा हिस्सा कह सकते हैं, अथवा चिन्तन-मनन की चौथी वाली कड़ी कह सकते हैं। उसका नाम है आत्म विकास, आत्म विकास। आत्म-विकास का क्या मतलब? आत्म-विकास का मतलब ये है कि अपने आप का, अपने अहम के दायरे को बढ़ा लेना। लोगों का दायरा बहुत छोटा है, कूप मण्डूक की तरीके से, अपने शरीर को ही अपना मानते हैं ये नहीं मानते कि हम समग्र समाज के एक घटक मात्र हैं। रक्त के एक कण की क्या कीमत हो सकती है आप बताइये। रक्त के सारे कणों का समूह जब मिल जाता है तो ही तो खून का संचार होता है, एक कण जरा सा निकाल लें, क्या ईकाई है बिचारों की। संयुक्त होने पर ही बात बनती है इसलिए आप अपने दायरे को सीमित मत कीजिए। आप संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँचा उठने की कोशिश कीजिए। अपने 'मैं' के स्थान पर 'हम' कहना सीखिए। हम सब - (WE) - हम सब। अगर आप ये ही करते रहेंगे मैं, मैं, तो आप बकरे की तरीके से आप सीमाबद्ध हो जाएँगे, कूप मण्डूक की तरीके से एक ऐसी छोटे दायरे में घिरे रहेंगे जिसमें कि आप और आप का कुटुम्ब बस इतने ही आदमी रह जाएँगे। आप का समाज से अर्थात् भगवान से कोई सम्बन्ध ही नहीं रह पायेगा। इसलिए अपने आप का दायरा विकसित कीजिए। हम सबके, सब हमारे - इस तरीके से विचार कीजिए। आप इस तरीके से विचार कीजिए - आत्मवत् सर्वभूतेषु - ये सारा संसार हमारे ही समान है, सबके सहयोग से हम जिन्दा हैं, (और) और (हमारे) हमारा सहयोग सबको मिलना चाहिए। ये अगर आप विचार करेंगे तो आप (तो) समाजनिष्ठ होते चले जाएँगे, चरित्रवान नागरिक होते हुए चले जाएँगे, देश, धर्म, और समाज और संस्कृति के प्रति आप अपना लगाव व्यक्त करने लगेंगे, और उनकी समस्याओं को भी अपनी समस्या मानने लगेंगे।

ये क्या हो गया? ये (आ) आत्मा का विस्तार। आत्मा का विस्तार यही है जिसको हम आध्यात्मिक उन्नति के नाम से पुकारते हैं, आत्मिक प्रगति के नाम से पुकारते हैं। यही रास्ता है जिस (पे) चलते हुए (आदमी पूर्ण लक्ष्य तक) आदमी का पूर्ण लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव है। आपके लिए भी यही रास्ता है, सबके लिए एक ही रास्ता है। अपने आपको दायरा बढ़ा लीजिए। सन्तों ने यही किया था, महापुरुषों ने यही किया था - वो अपने लिए नहीं जिए, वो समाज के लिए जिए। देश, धर्म और संस्कृति के लिए जिए, (सबको) सबके दु:खों में शामिल हुए, औरों के दु:ख (ब) बँटाते रहे, और अपने सुख बाँटते रहे। अपने सुखों को बाँट देना, और दु:खों को (दूसरों को) बँटा लेना - ये कुटुम्ब की वृत्ति है। आप अपनी वृत्तियों को कुटुम्बिक बनाइए, पारिवारिक बनाइए। अपने परिवार को जैसा अपना समझते हैं, ठीक उसी तरीके से सारे समाज को भी समझिए, सारे देश को समझिए, सारी मानव जाति को समझिए, प्राणी मात्र को समझिए - दायरा बढ़ाइए। वसुधैव कुटुम्बकम् का अपना सिद्धान्त है - हमारा कुटुम्ब बड़ा होना चाहिए, परिवार हमारा बड़ा होना चाहिए, (सारे संसार) सारे संसार तक हमारी कौटुम्बिकता विकसित होनी चाहिए। ये कौटुम्बिकता ही है (जिसकी व) जिसके आधार पर आदमी (के) सुख और शान्ति खड़ी हुई है। आदमी को कुटुम्ब में से हटा दिया जाए और कुटुम्ब से छोड़ दिया जाए तब, तब आदमी इक्कड़ हो जाएगा, और खूनी हो जायेगा, और कातिल हो जायेगा और स्वार्थी हो जायेगा। इसलिए क्या करना होता है मिल-बाँट के खाना, हिलमिल के रहना, हिलमिल के रहना और मिल-बाँट कर खाने वाली नीति आपको जीवन में उतारनी पड़ेगी। तो कैसे उतार पायें? अपना दायरा बढ़ा दीजिए, दायरा बढ़ा दीजिए, जो चीजें आपको अपनी मालूम पड़ती हैं उनमें प्रसन्नता होती है और उनको आप अपना समझते हैं। लेकिन अगर आप सबको अपना मान लें तब, तब आपको कितना गर्व और गौरव अनुभव होगा, सूरज भी आपका, चाँद भी आपका, सितारे भी आपके, नदी भी आपकी, पहाड़ भी आपके, जमीन भी आपकी, सारे इंसान भी आपके, सारा कुटुम्ब भी आपका, सारा संसार आपका - अगर ये दायरा चौड़ा कर लें तब, तब आपकी खुशी का क्या ठिकाना रह सकता है। अभी तो आपने थोड़े से लोगों को थोड़ी सी वस्तुओं को अपना माना है इससे भी कुछ न कुछ तो आपको राहत मिलती है, प्रसन्नता होती है, जिस दिन सबको अपना मानने लगेंगे और अपने को सबका मानने लगेंगे तब, तब आप जरा अपना देखना तो सही कैसा मजा आता है और कैसा आनन्द आता है। जीवन में, गतिविधियों में कैसा हेर-फेर होता है, अगर आपकी प्रसन्नता किस तरीके से जमीन से आसमान तक छूने लगती है। ऐसी स्थिति पैदा कीजिए। चिन्तन और मनन के नाम पर आत्म-समीक्षा (एक), (आत्म) आत्म-सुधार (दो) - ये चिन्तन; और, आत्म-निर्माण (एक) और आत्म-विकास (दो) - दो मनन; और दो चिन्तन - चारों को मिला दीजिए - ये चारों वेदों का सार है, ये चारों दिशाओं से भगवान के (बर) बरसने वाले अनुदानों को प्राप्त करने का सही तरीका है। आपकी उपासना में चिन्तन और मनन (की) को भी स्थान रहना चाहिए, और न केवल स्थान रहना चाहिए, बल्कि उसे मजबूती से पकड़े रहना चाहिए, छोड़ना किसी भी कीमत (पर) न हो - ऐसा अगर आपका संकल्प होगा तो आप आध्यात्मिक जीवन में तेजी से आगे बढ़ेंगे, और वो लाभ प्राप्त करेंगे जो अध्यात्मवाद के क्षेत्र में प्राप्त होते हैं। समाप्त ॥

॥ॐ शान्तिः॥