नारी दलित एवं प्रताड़ित न रहे, न रहने दी जाय
अन्धकार से मुख मोड़कर प्रकाश की ओर लौट चलने का यही समय है। जिस राह पर हम पिछले एक हजार वर्ष से चल रहे हैं उसके दुष्परिणामों को हम इस अवधि के दुःखद इतिहास पृष्ठों पर लिखा देख सकते हैं। अब भी उसी भूल को अपनाये रहने पर यही कहा जायगा कि हम कुछ अच्छा न सीखने वाले और बुरा न छोड़ने वाले वज्र मूर्खों की दुनियाँ में रह रहे हैं।
प्रत्येक विचारशील को यह अनुभव करना चाहिए कि दास प्रथा के दिन लद गये। संसार चक्र तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसमें अनीति मूलक प्रचलन देर तक मान्यता प्राप्त न किये रहेंगे। कुछ समय पूर्व संसार के अनेक क्षेत्रों में गुलाम पकड़े, बेचे जाते थे और उनसे मन चाहे काम लिये जाते थे। बेचारे गुलाम तो मालिकों से लड़कर मुक्ति न पा सके पर विश्व के जागृत विवेक ने उनका पक्ष लिया और मालिकों को अपना लाभदायक धंधा छोड़ना पड़ा। अमेरिका में समझदार-समझदार ही आपस में लड़ पड़े—उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका में गोरे लोग गुलाम प्रथा के विरोध और समर्थन में लड़ पड़े और उस भयंकर गृह युद्ध का अन्त तभी हुआ जब गुलाम प्रथा का अन्त कानूनी रूप से हो गया।
राजतंत्र दुनिया में से मिट गये या मिटने जा रहे हैं। इसमें कोई बहुत बड़ी खून-खराबी नहीं हुई है। समय की प्रबलता ने उनकी कमर में लात मारकर औंधे मुँह धकेल दिया और उनकी चमकती तलवारों से तो सरदार पटेल के अनुसार मेहतर की झाड़ू ही कारगर साबित हुई। पूँजीवाद किस बुरी तरह बर्फ की तरह गलता चला जा रहा है और उसके स्थान पर समता के प्रचलन किस तरह सिंहासनारूढ़ हो रहे हैं इस परिवर्तन चक्र को द्रुतगति से घूमते हुए कोई भी आँखों वाला देख सकता है। इन परिवर्तनों में शोषित-शोषकों के बीच मल्लयुद्ध नहीं हुआ है। अन्तः में विरोध ही उन्हें तोड़ डालने के लिए पर्याप्त रहे हैं। साम्यवाद के समर्थकों में निर्धन लोग ही आगे नहीं आये हैं। उसके प्रतिपादकों, प्रचारकों, योद्धाओं और स्थापकों में प्रमुखता उनकी थी जो दरिद्र नहीं, सम्पन्न थे। टाल्स्टाय, प्रिंस विस्मार्क, जार्ज बर्नार्डशा—बर्टेड रसेल, जवाहरलाल नेहरू दरिद्र या शोषित वर्ग के नहीं थे फिर भी उनने वकालत शोषितों की ही की।
आवश्यक नहीं कि नर के सामने नारी को विद्रोही बन कर खड़ा होना पड़े, यह कार्य उनकी वकालत पर उतारू विश्वात्मा ही कर देगी। इतनी लड़ाई तो उसके पक्ष में नवयुग का जागृत विवेक ही लड़ लेगा। विवेक का सूर्य उगेगा और तमिस्रा अपना सा मुँह लेकर स्वयं चली जाएगी। अपनी भविष्य वाणी यह है कि नर-नारी के बीच मोर्चाबन्दी नहीं होगी—सत्याग्रह, संघर्ष, घिराव, हड़ताल, अभियोग, विद्रोह आदि का अवसर नहीं आवेगा। दोनों पक्षों की जागृत अन्तरात्माएँ ही अपना-अपना करवट बदलेंगी और उस छोटे से परिवर्तन भर से आज की सारी परिस्थितियाँ कल पूरी तरह उलट जायेंगी। न तो नर प्रतिबन्धों में कोई लाभ देखेगा और न नारी उन्हें सहन करने को तैयार होगी, उस अस्वीकृति मात्र में वह बात बन जायगी जो आज की परिस्थिति में नितान्त आवश्यक है।
नर-नारी के बीच भेद-भाव जनित हृदयहीनता की प्रवंचना अब चल न सकेगी। अगले ही दिनों वे माता और पुत्र के रूप में स्नेह-दुलार के अंचल से ढँके हुए पुलकित हो रहे होंगे, बहिन-भाई की भाव भरी ममता आँख मिचौनी खेल रही होगी—पिता के कन्धे पर चढ़ी हुई पुत्री अपने घोड़े को आह्लाद पूर्वक हाँक रही होगी। पति और पत्नी एक दूसरे के लिए अपना सच्चा समर्पण प्रस्तुत कर रहे होंगे। अपनी सुविधा को दूसरे की असुविधा दूर करने में दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा ठनी होगी। कौन किस के लिए कितना त्याग कर गकता है इस होड़ में दोनों आगे निकलने की बात सोच रहे होंगे।
नीति बदलते ही परिस्थितियाँ बदल जायगीं। नारी की वरिष्ठता को स्वीकार करते ही नर द्वारा उसे गन्दी गालियाँ देना, पग-पग पर अपमान करना, कड़ुए वचन बोलते रहना, व्यंग-उपहास उड़ाना, यहाँ तक कि पशुओं जैसी मार-पीट कर बैठना आदि के उद्धत आचरण सर्वथा रुक जायेंगे। सभ्य समाज में कहीं भी ऐसा नहीं होता। पत्नी पति का सम्मान करती है वही व्यवहार पति का भी पत्नी के प्रति होना चाहिए, भूलें सभी से होती हैं पति से भी पत्नी से भी। अपने कार्य क्षेत्र में कितनी ही जगह मतभेदों का तथा प्रतिकूल व्यवहारों का सामना करना पड़ता है, वहाँ गाली-गलौज और मारपीट ही तो नहीं अपनाई जाती—दूसरे तरह की नीति अपना कर गुजारा कर लिया जाता है। फिर क्या कारण है कि नारी को ही पशुवत् प्रताड़ित किया जाय। मनुष्य पशुओं से नि:संकोच क्रूर व्यवहार इसलिए करता है कि उन्हें अपने में नीच अथवा वशवर्ती मानता है और स्वयं सर्व समर्थ होने के अहंकार में डूबा रहता है। यही वृत्ति यदि नर और नारी के बीच होगी तो उनमें भी उसी प्रकार का तिरस्कार एवं प्रताड़ना का व्यवहार बन पड़ेगा।
स्पष्ट है कि अन्य हानियाँ आसानी में सही जा सकती हैं पर अपमान का घाव देर तक नहीं भरता, विवशता में चुप हो बैठना, हुक्म मान लेना एक बात है और स्नेह सिक्त सहयोग प्रदान करना दूसरी। तिरस्कार और प्रताड़ना से तिलमिलाती हुई नारी कोई हुक्म बजाने में विवश हो सकती है पर अपमान की प्रतिक्रिया तो घृणा और द्वेष में परिणत होकर मन की परतों में गहराई तक ही जमती चली जायगी और उसगे सहज में भारी बाधा खड़ी होगी।
पर्दा नारी को पददलित स्थिति में जकड़ता है और अपमान उसे प्रताड़ित करके जो कुछ भी सृजनात्मक तत्त्व बन रहा था उसे जला कर भस्मी भूत करता है। इस दुहरी मार से तो उसका अस्तित्व ही निरर्थक हो जाता है। जिसके हाथ-पैर जकड़ कर बाँध दिये गये हैं, जिसे बाँध-बाँध कर रुई की तरह धुना और मिट्टी की तरह रोंदा गया है उसके पास हाड़-माँस का पुतला भर शेष रहेगा। आत्मचेतना के साथ जुड़ी हुई वह गौरव गरिमा नष्ट ही हो जायगी जिसके जीवन्त रहने पर मनुष्य जीवित और मूर्छित होने पर मृतक कहा जाता है।
नर-नारी की विलगता का प्रश्न वहाँ से उत्पन्न होता है जहाँ उनकी समीपता को सन्देह, आशंका और अविश्वास की दृष्टि से देखना आरम्भ किया जाता है। सोचा जाता है कि नर-नारी जब भी मिलेंगे तब वासना की उच्छृंखलता की ही बातें करेंगे। उनके मिलन से दुराचार उत्पन्न होगा। इसी अविश्वास एवं सन्देह के कारण विविध-विधि प्रतिबन्ध लगाने की आवश्यकता समझी गई है और तरह-तरह के बन्धन परक रीति रिवाज चले हैं।
इस चिन्तन में भी एक भूल रह गई है। यदि दोनों अविश्वस्त हैं तो दोनों पर समान प्रतिबन्ध लगने चाहिए। ताकि कोई किसी को पतित न कर सके। नर नारी को अलग रखने की बात में कुछ औचित्य भी हो तो भी उसका यह समाधान सर्वथा अनुचित है कि प्रतिबन्ध एक पक्ष पर ही लगे।
ऊपर की पंक्तियाँ केवल "तर्क के लिए तर्क" के आधार पर लिखी गई हैं। वस्तुतः प्रतिबन्ध किसी भी पक्ष पर नहीं लगने चाहिए। नर पर भी नहीं और नारी पर भी नहीं। यदि दोनों में से एक पक्ष में भी मनुष्यता बाकी है तो दूसरा सर्वथा भ्रष्ट होते हुए भी अवांछनीयता उत्पन्न न कर सकेगा। यदि दोनों ही भ्रष्ट हैं तो एक पर्दा तो अपर्याप्त है। पर्दे के ऊपर दूसरा—दूसरे के ऊपर तीसरा लगाते हुए सौ पर्दे लगा दिये जायँ तो भी अवांछनीयता रोकी न जा सकेगी। सच तो यह है कि पर्दे के पीछे ही पाप को पनपने का अवमर मिलता है। जिन लोगों में जितना पर्दा अधिक है उनमें उतना ही अधिक अनाचार फैला पाया जायगा।
पर्दा विवेक पूर्ण नहीं—किन्तु उस समय तो अविवेक की पराकाष्ठा हो जाती है जब वह अपने ही पितृतुत्य अभिभावकों से किया जाता हो। ससुर पति का पिता—वधू के लिए अपने निज के पिता से भी अधिक पूजा योग्य है। आयु और सहज वात्सल्य की दृष्टि से ससुर और पुत्र वधू के बीच सगे बाप-बेटी से भी अधिक पवित्र सम्बन्ध होने चाहिए। पति के बड़े भाई जेठ आदि के सम्बन्ध भी इसी स्तर के होते हैं, सास से पर्दा तो और भी विचित्र है। नारी को नारी से पर्दा किस लिये करना चाहिए? माँ-बेटी के बीच पर्दा कैसा? इससे तो उनके बीच स्नेह-सौजन्य का, आदान-प्रदान का, मन की बात कहने-सुनने का व्यवहार ही नहीं बनेगा। दोनों के बीच संकोच की ऊँची दीवार ही खड़ी रहेगी, जी खोलकर कुछ न कह सकने की स्थिति में वे एक घर में रहते हुए भी दूरवर्ती ही बनी रहेंगी।
पर्दे के पक्ष में क्या तर्क हो सकता है? उससे किसे क्या लाभ मिल सकता है? उसका प्रचलन किन कारणों को लेकर चल पड़ा? इन प्रश्नों का कोई विवेक सम्मत उत्तर नहीं मिलता। प्राचीन भारत की महान परम्पराओं का पर्यवेक्षण करने पर कहीं कोई ऐसे सूत्र नहीं मिलते जिनसे सिद्ध होता हो कि पर्दा इस देश की प्रथा परम्परा में कभी भी सम्मिलित रहा है। उसे धार्मिक और सामाजिक मान्यता किस आधार पर मिल सकती है इसका कोई उत्तर मिलता नहीं है।
नर और नारी को पृथक नहीं किया जा सकता—असम्बद्ध नहीं रखा जा सकता। उनके बीच, मात्र कामुक व्यवहार की ही कल्पना नहीं करनी चाहिए वरन् सहयोग के अनेक क्षेत्रों पर दृष्टि डालनी चाहिए जिनमें आधी-आधी आबादी में बँटे हुए इन दोनों पक्षों का कन्धे से कंधा मिला कर चलना आवश्यक है। यह दुष्ट व्याख्या मन में से निकाल ही देना चाहिए, जिसके अनुसार नर-नारी को पति-पत्नी की परिधि में सीमित कर दिया जाता है। स्मरण रखा जाय कि नारी किसी की पुत्री, किसी की बहिन और किसी की माँ भी होती है। दाम्पत्य जीवन में भी उसकी भूमिका भोग्या अथवा वेश्या की नहीं विशुद्ध रूप से धर्म पत्नी की है। धर्म पत्नी का अर्थ होता है सह धर्मिणी, सहचरी, सहेली, मित्र, स्वजन, आत्मीय और भागीदार। उसका कार्यक्षेत्र ससुराल और पितृ गृह में अत्यन्त व्यापक है। कामचेष्टा का स्थान तो सुविस्तृत जीवन में राई की बराबर ही होता है। समय, श्रम, बुद्धि, मनोयोग, प्रतिष्ठा, कुशलता के उपयोग का क्षेत्र तो अत्यन्त व्यापक है। उस सारी परिधि को इसलिए अविरुद्ध कर दिया जाय कि सहयोग में कामुक सम्भावना की आशंका है—तो यह मान्यता अत्यन्त विचित्र और नितान्त ओछी मानी जायगी। हमें इन पाशविक मान्यताओं से ऊपर उठना ही चाहिए।
नारी को मनुष्य मान लिया गया—उसको बन्धन मुक्त किया गया इसके दो ही प्रमाण हैं। शरीर पर से पद का प्रतिबन्ध हटाया जाय और मन पर से प्रताड़ना कर सकने का अधिकार समाप्त किया जाय। उसे न तो पददलित रहने दिया जाय और न प्रताड़ित, यह स्थिति जितनी नारी के लिए दयनीय है उससे अधिक नर के लिए लज्जाजनक है। अपने महान देश के निवासियों को अपनी महान संस्कृति के अनुयायियों को आज इतनी गई गुजरी स्थिति में पहुँचा हुआ सिद्ध नहीं करना चाहिए।
मनुष्य द्वारा मनुष्य की प्रताड़ना नितान्त पाशविक है। सभ्य देशों की अदालतों से कोड़े मारने का दण्ड उठा दिया गया है। छोटे बच्चों को मारना अध्यापकों के लिए अपराध है। पशुओं की प्रताड़ना भी अब दण्डनीय अपराध की धाराओं में गिन ली गई है। पशुवध अपराध नहीं है पर उनके साथ क्रूरता का व्यवहार करना कानून का उल्लंघन है। किसी जमाने में बड़े-बूढ़े लोग वयस्क लड़कों को भी मार-पीट लिया करते थे, अब अन्यान्य वृद्धियों के साथ स्वाभिमान भी बढ़ा है। जवान लड़के यह पसन्द नहीं करते कि बड़े-बूढ़े उनके साथ गाली-गलौज या मार-पीट करें। जहाँ ऐसे प्रसंग आते हैं वहाँ विद्रोह खड़ा हो जाता है और अवांछनीय घटनाएँ घटित हो जाती हैं। मानवी स्वाभिमान एक तथ्य है, उसे सुरक्षित रखा ही जाना चाहिए। मनुष्य से भूलें होती हैं-दोष भी रहते हैं-उन्हें सुधारने की प्रेरणा देने वाले दूसरे सभ्य तरीके मौजूद हैं। तर्क से उदाहरण देकर—वस्तु स्थिति गम्भीरता पूर्वक समझा कर—स्नेह-सौजन्य की रक्षा करते हुए भी हम दूसरों को उनकी भूलें बता सकते हैं और अपेक्षाकृत अधिक अच्छी तरह सुधार प्रयोजन में सफल हो सकते हैं।
नव जागरण की इस पुनीत वेला में हमें नारी को उठाना चाहिए। उसके साथ बरती जाने वाली अनीति का अन्त करना चाहिए। उसे मनुष्योचित आत्म सम्मान के साथ जीवित रहने का अधिकार दिया जाय। विश्वास और सम्मान देकर उस अनीति का परिमार्जन किया जाना चाहिए जो पिछले हजार वर्ष से नारी के साथ बरती जा रही है। न्याय और विवेक का—नव जागरण का यही सन्देश है।
इसके लिए आवश्यक नहीं कि वस्त्र, आभूषणों से स्वादिष्ट भोजन और सुविधा-साधनों से उसे लादा जाय। वाक चातुरी बरतने या लम्बी-चौड़ी शपथ खाने और प्रेमी बनने के ढोंग रचने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। नारी को नियति ने ही बहुत छला कि उस अकेली के सिर प्रजनन का उत्तरदायित्व लाद दिया। अब पुरुष उसे आडम्बरी जाल में उलझा कर स्नेह-मिलन के मिथ्या आश्वासन न दे तो ही अच्छा है। यदि वस्तुत: उसमें नारी के प्रति स्नेह-सौजन्य की तनिक सी भी मात्रा हो तो उसे विश्वास और सम्मान भरा यथार्थ व्यवहार करके ही प्रकट करना चाहिए। ऐसी दशा में पर्दे प्रतिबन्ध के पीछे छिपा अविश्वास और क्रीतदासी समझ कर प्रताड़ना के रूप में प्रस्तुत होने वाला अहंकारी आतंक तत्काल बन्द करना होगा।
'मनुष्य का लाभ, मनुष्य का सद्भाव सहयोग पाने में बलात् बन्धनों में नहीं,' यह तथ्य जितनी जल्दी और जितनी गहराई तक समझा जा सके उतना ही अच्छा है। लाभ उसी में है कि नारी को सुयोग्य और समर्थ बना कर उस स्थिति में लाया जाय कि वह अपने सम्बन्धियों की, देशवासियों की कुछ कहने योग्य सहायता कर सके।
संसार में अनेकानेक परिवर्तन हो रहे हैं। पिछले दिनों की प्रथा परम्पराओं में भारी हेर-फेर हो रहे हैं। किसी समय समुद्र यात्रा पाप गिनी जाती थी और वैसा करने पर लोकमान्य तिलक जैसों को जाति से बहिष्कृत होना पड़ता था। सती प्रथा अब उठ गई। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु बलि चढ़ाना अब पिछड़े लोगों की मूर्खता में गिना जाता है। मनुष्य-मनुष्य के बीच बरते जाने वाले भेद-भाव भी मिट रहे हैं। गोरे काले का—मालिक गुलाम का—छूत अछूत का—अन्तर निरन्तर घटता जा रहा है। नर और नारी के बीच की असमानता भी समय के धक्के खाकर हटती-मिटती जा रही है। परिवर्तन हमें बदलने के लिए विवश कर रहे हैं। यों प्रगति के नाम पर अवगति भी कम नहीं हुई है पर जो स्वागत योग्य है—औचित्य है उसे तो अपनाना ही पड़ेगा।