सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय—एक साधना
मानव जीवन में सुख की वृद्धि करने के उपायों में स्वाध्याय एक प्रमुख उपाय है। स्वाध्याय से ज्ञान की वृद्धि होती है; मन में महानता, आचरण में पवित्रता तथा आत्मा में प्रकाश आता है।
स्वाध्याय के अभाव में पढ़ी हुई विद्या भी विस्मृत हो जाती है, तब नूतन ज्ञान प्राप्त करने का प्रश्न ही नहीं उठता! कहीं भी और कभी भी देखा जा सकता है कि कक्षा पास कर लेने और उपाधि पा लेने के बाद जो विद्यार्थी, वकील अथवा डॉक्टर आदि अपना स्वाध्याय बन्द कर देते हैं, वे आगे चलकर सफल नहीं हो पाते। संसार की विचारधारा को मोड़ देने वाले लेखक अथवा पत्रकार प्रतिदिन अनेक घण्टों स्वाध्याय में लगाते हैं। जो स्वाध्यायशील रहता है उसका ज्ञान आधुनिक और विद्या जाग्रत रहती है। प्रतिदिन कुछ न कुछ पढ़ते रहने वाले अपने ज्ञान-कोष में बूँद-बूँद इकट्ठा करके उसे अक्षय बना लिया करते हैं।
जीवन को सफल, उच्च एवं पवित्र बनाने के लिए स्वाध्याय की बड़ी आवश्यकता है। किसी भी ऐसे व्यक्ति का जीवन क्यों न देख लिया जाए, जिसने उच्चता के सोपानों पर चरण रखा है। उसके जीवन में स्वाध्याय को विशेष स्थान मिला होगा। स्वाध्याय के अभाव में कोई भी व्यक्ति महान अथवा ज्ञानवान नहीं बन सकता। प्रतिदिन नियमपूर्वक सद्ग्रन्थों का अध्ययन करते रहने से बुद्धि तीव्र होती है, विवेक बढ़ता है और अन्तःकारण की शुद्धि होती है। इसका स्वस्थ एवं व्यावहारिक कारण है, वह यह कि सद्ग्रन्थों के अध्ययन करते समय मन उनमें रमा रहता है और ग्रन्थ के सद्वाक्य उस पर संस्कार डालते रहते हैं।
स्वाध्याय द्वारा अन्त:करण के निर्मल हो जाने पर मनुष्य के बाह्य-अन्तर पट खुल जाते हैं, जिससे वह आत्मा द्वारा परमात्मा को पहचानने के लिए जिज्ञासु हो उठता है। मनुष्य की यह जिज्ञासा भी स्वाध्याय से निरन्तर बढ़ती एवं बलवती होती रहती है और एक दिन ऐसा आता है कि वह उसका साक्षात्कार करने का प्रयास करता है और कर भी लेता है। परमात्मा के इस पावन साक्षात्कार का उपाय तथा मार्ग का भी स्वाध्याय से ही पता चलता है। इस प्रकार नित्य प्रति का स्वाध्याय मनुष्य को उसके चरम लक्ष्य तक पहुँचा देने में बड़ी सहायता करता है।
स्वाध्यायशील व्यक्ति का जीवन अपेक्षाकृत अधिक पवित्र हो जाता है। ग्रन्थों में सन्निहित सद्वाणी तो अपना प्रभाव एवं संस्कार डालती ही है, साथ ही अध्ययन में रुचिमान होने से व्यक्ति अपना शेष समय पढ़ने में ही लगाता है। वह या तो अपने कमरे में बैठा हुआ एकान्त अध्ययन किया करता है अथवा किसी पुस्तकालय अथवा वाचनालय में पुस्तकों के साथ संलग्न रहता है। उसके पास ऐसा कोई भी फालतू समय नहीं रहता जिसमें जाकर इधर-उधर बैठे अथवा घूमे और फिर वायुमण्डल अथवा संगति से अवांछित संस्कार ग्रहण करे। जब मनुष्य निरर्थकों की संगति में न जाकर जीवनोपयोगी सत्साहित्य के अध्ययन में ही संलग्न रहेगा तो उसका आचार आप ही शुद्ध हो जाएगा।
अध्ययनशील व्यक्ति स्वयं तो बेकार रहकर कहीं नहीं जाता, उसके पास बेकार के निठल्ले व्यक्ति भी नहीं आते और वे यदि कभी आ भी जाते हैं तो अध्ययनशील व्यक्ति के आस-पास का न्यस्त वायुमण्डल उनके अनुकूल नहीं होता और वे शीघ्र उसका अधिक समय खराब किए बिना खिसक जाते हैं। इस प्रकार फजूल के व्यक्तियों के संग से उत्पन्न होने वाली विकृतियों से अध्ययनशील व्यक्ति सहज ही बच जाता है जिससे उसके आचार-विचार पर कुसंस्कार नहीं पड़ने पाते।
निरन्तर अध्ययन करते रहने से मनुष्य का ज्ञान जाग्रत रहता है जिसका उद्रेक उसकी वाणी द्वारा हुए बिना नहीं रहता। अस्तु, अध्ययनशील व्यक्ति की वाणी सफल, सार्थक तथा प्रभावोत्पादक बन जाती है। वह जिस सभा-समाज में जाता है, उसकी ज्ञान-मुखर वाणी उसे विशेष स्थान दिलाती है। अध्ययनशील व्यक्ति का ही कथन प्रामाणिक तथा तथ्यपूर्ण माना जा सकता है। निरध्ययन वक्ताओं की वाणी बकवास से अधिक कोई महत्त्व नहीं रखती। स्वाध्याय निस्सन्देह सामाजिक प्रतिष्ठा का संवाहक होता है।
संसार के इतिहास में ऐसे असंख्यों व्यक्ति भरे पड़े हैं जिनको जीवन में विद्यालय के दर्शन न हो सके किन्तु स्वाध्याय के बल पर वे विश्व के विशेष विद्वान व्यक्ति बने हैं। साथ ही ऐसे व्यक्तियों की भी कमी नहीं है जिनकी जिन्दगी का अच्छा-खासा भाग विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में बीता किन्तु उसके बाद स्वाध्याय में प्रमाद करने के कारण उनकी एकत्रित योग्यता भी उन्हें छोड़कर चली गई और वे अपनी तपस्या का न तो कोई लाभ उठा पाए और न सुख। योग्यता को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए स्वाध्याय नितान्त आवश्यक है।
कथा-कक्ष में अथवा सार्वजनिक मंच से धाराप्रवाह बोलने वाले प्रोफेसरों तथा वक्ताओं का दैनिक जीवन देखने से पता चलता है कि अपना नित्य कर्तव्य निबटाने के बाद उनका शेष सारा समय स्वाध्याय में ही व्यतीत होता होगा। उनके मुख द्वारा धाराप्रवाह वाणी का निर्गमन और कुछ नहीं, उस तेजोपूर्ण योग्यता का ही प्रवहन होता है, जो वे अपने बहुमूल्य समय का क्षण-क्षण लगाकर स्वाध्याय द्वारा संचय किया करते हैं।
संसार ज्ञान की जन्मभूमि है। यहाँ पर नित्य-प्रति नई-नई जानकारियों, विचारणाओं, तर्कों तथा विद्याओं का जन्म होता रहता है। जो व्यक्ति अध्ययनशील होता है वह नित्य नए ज्ञानों से अवगत रहा करता है। उसे पता रहता है कि संसार में कहाँ, क्या हो रहा है? कौन सी पुरानी मान्यताएँ बदल गई हैं और उनके स्थान पर कौन सी नई प्रतिस्थापनाएँ हो रही हैं? उसे यह भी ज्ञान रहता है कि इन बदलती हुई परिस्थितियों में उसका क्या स्थान और क्या कर्तव्य है? इस प्रकार अध्ययनशील व्यक्ति, एक जागरूक नागरिक की तरह ही जीवन जीने का सुख पाता है, न कि मूढ़मति आदमी की तरह, जिसे अपने चारों ओर के तथा आस-पास के परिवर्तन का भी ज्ञान नहीं रहता।
संयम, अध्ययनशीलता की सबसे बड़ी देन है। जो स्वाध्याय में रुचिमान है, वह अपनी अभिरुचि पूरी करने के लिए अधिक से अधिक समय प्राप्त करने के लिए प्रातः काल उठेगा! अवकाश के समय में सोएगा नहीं, अपनी मेधा को बलवती बनाने के लिए आहार-विहार तथा विचार में सावधान रहेगा। वह कोई भी ऐसा अवांछनीय कार्य करने के प्रति सावधान रहेगा जो उसमें आलस्य-प्रमाद की प्रवृत्तियाँ जगाने का कारण बन सकती हैं। वह अधिक से अधिक स्वस्थ एवं प्रसन्न रहने का प्रयत्न करेगा। रोग की दशा में भी अध्ययनशील व्यक्ति रोने-चिल्लाने अथवा रोग का चिन्तन करने के बजाय धीरे-धीरे अध्ययन ही करता रहता है जिससे न तो रोग उसे अधिक पीड़ित कर पाता है और न अधिक समय ठहर ही पाता है। अध्ययनशीलता, सुख-दुःख एवं सम्पत्ति-विपत्ति दोनों स्थितियों में सहायक होती है।
विद्वानों ने स्वाध्याय की महिमा को जानते हुए उसे सन्मार्ग दर्शक सखा की संज्ञा दी है। वेदों में कहा गया है, जो मनुष्य सत्पथ दर्शक अपने सच्चे सखा स्वाध्याय का परित्याग कर देता है उसका नाड़ी आदि अनर्गल एवं अन्तः इन्द्रियाँ उच्छृंखल हो जाती हैं जिससे उसे दुःखों का भागी बनना पड़ता है। स्वाध्याय सखा से सम्बन्ध विच्छेद कर देने वाले व्यक्ति की मानसिक एकाग्रता चली जाती है।
स्वाध्यायशील व्यक्ति अपनी आत्मा का सफल चिकित्सक होता है। स्वाध्याय से उपार्जित ज्ञान द्वारा वह अपनी आत्मिक व्याधियों को जान लेता और उनका निदान निर्धारित कर लेता है। निदान खोज लेने पर व्याधियों का उपचार तो सहज ही में हो जाता है। मानसिक एकाग्रता की उपलब्धि उसे इस मार्ग में सहायक बनकर बढ़ाया करती है जिससे उसका जीवन उच्छृंखलताओं एवं अवांछनीयताओं में मुक्त होकर महान एवं सुखी बन जाता है।
स्वाध्याय से ज्ञान की, योग्यता की अपेक्षित वृद्धि होती है। इसीलिए गुरुकुल से विद्या पाकर चलते हुए शिष्य से ऋषि कहा करता था—स्वाध्यायान्मा प्रमदः अर्थात हे शिष्य तू अपने जीवन को यदि सफल एवं सार्थक बनाना चाहता है तो स्वाध्याय में प्रमाद न करना।
स्वाध्याय को मानसिक योग भी कहा गया है। जिस प्रकार प्रभु का नाम जपता हुआ योगी उस परमात्मा के प्रकाश रूप में तल्लीन हो जाता है उसी प्रकार एकाग्र होकर सद्विचारों के अध्ययन में तल्लीन हो जाने वाला अध्येता अक्षर ब्रह्म की सिद्धि से ज्ञान रूप प्रकाश का अधिकारी बनता है। केवल योग ही नहीं, अध्ययन भी प्रभु का साक्षात्कार करने के उपायों में एक प्रमुख उपाय है। स्वाध्याय जैसे सरल एवं सरस योग में प्रतिष्ठित होने वाला व्यक्ति किसी न किसी रूप में अपने परम लक्ष्य मोक्ष को पाकर शाश्वत सुख का अधिकारी बनता है।
स्वाध्याय का एक रूप सत्संग भी है। किन्हीं कारणों से जिन्हें विद्याध्ययन का अवसर नहीं मिल सका, जो स्वयं ही ग्रन्थों का पठन-पाठन नहीं कर सकते, उन्हें चाहिए कि वे अध्ययनशील व्यक्तियों का सत्संग करें, महात्माओं एवं व्याख्यानदाताओं से सम्पर्क स्थापित करें और एकाग्रतापूर्वक आँखों के स्थान पर कानों से स्वाध्याय करें। ऐसा करते रहने से उन्हें भी कालान्तर में वे सब लाभ होंगे जो एक स्वाध्यायशील को हुआ करता है। ‘मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ’ ऐसा सोचने और कहने वाले अपने प्रमाद का ही परिचय देते हैं। जो पढ़ नहीं सकता, उसे श्रवण रूपी स्वाध्याय में निरत रहना ही चाहिए।
किन्तु अध्ययनशीलता के उपर्युक्त लाभ तब ही हो सकते हैं जब वेद, शास्त्र, उपनिषद् अथवा चरित्र-निर्माण करने वाला साहित्य ही पढ़ा जाए। मनोरंजक कहानी तथा उपन्यास पढ़ने वाले अध्ययन से होने वाले लाभ से सदा वंचित ही रहेंगे और अवांछित अथवा अश्लील साहित्य पढ़ने वाले तो उन अभागों में होते हैं, जो अपनी फूली-फली जीवन वाटिका में अपने हाथ से आग लगाया करते हैं।
स्वाध्याय—आत्मा का भोजन
मानव जीवन को सुखी, समुन्नत और सुसंस्कारी बनाने के लिए सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना अत्यन्त आवश्यक है। स्वाध्याय मानव जीवन का सच्चा, सुहृद एवं आत्मा का भोजन है। स्वाध्याय से हमें जीवन को आदर्श बनाने की सत्प्रेरणा मिलती है। स्वाध्याय हमारे जीवन विषयक सारी समस्याओं की कुंजी है। स्वाध्याय हमारे चरित्र-निर्माण में सहायक बनकर हमें प्रभुप्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। स्वाध्याय स्वर्ग का द्वार और मुक्ति का सोपान है।
संसार में जितने भी महापुरुष, वैज्ञानिक, सन्त-महात्मा, ऋषि-महर्षि आदि हुए हैं, वे सभी स्वाध्यायशील थे। स्वाध्याय का अर्थ सत्साहित्य एवं वेद, उपनिषद्, गीता आदि आर्ष-ग्रन्थ तथा महापुरुषों के जीवन वृतान्तों का अध्ययन तथा मनन करना है। कुछ भी पढ़ा जाए, उसे स्वाध्याय नहीं कहा जा सकता। मनोरंजन प्रधान उपन्यास, नाटक एवं शृंगार रस पूर्ण पुस्तकों को पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। इस प्रकार का साहित्य पढ़ना तो वास्तव में समय का दुरुपयोग करना एवं अपनी आत्मा को कलुषित करना है। कुरुचिपूर्ण गन्दे साहित्य को छूना भी पाप समझना चाहिए।
सच्चा स्वाध्याय वही है, जिससे हमारी चिन्ताएँ दूर हों, हमारी शंका-कुशंकाओं का समाधान हो, मन में सद्भाव और शुभ संकल्पों का उदय हो तथा आत्मा को शान्ति का अनुभव हो। हमारे शास्त्रों में स्वाध्याय का बड़ा माहात्म्य बताया गया है। योग-शास्त्र में कहा गया है—
स्वाध्यायाद् योगमासीत् योगात् स्वाध्यायमामनेत्।
स्वाध्याय-योग-सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते॥
स्वाध्याय से योग की उपासना करें और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
त्रयो धर्म स्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति।
धर्म के तीन स्कन्ध हैं—यज्ञ, स्वाध्याय और दान।
श्रीमद्भगवद् गीता (१७/१५) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
स्वाध्याय करना ही प्राणी का तप है।
छांदोग्य उपनिषद् में ही आगे और लिखा है—
आचार्य कुलाद्वेद मघीत्य तथा विधानं गुरो कर्माति शेषेणाभि समावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान विदधात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिंसन सर्वभूतानि अन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेषं वर्त्तयन् यवादायुषं ब्रह्म लोकमभि सम्पद्यते। — ८/१५/१
ब्रह्मचारी आचार्य कुल से आर्ष-ग्रन्थों को पढ़कर यथाविधि सेवा सुश्रूषा आदि करता हुआ समावर्तन संस्कारयुक्त परिवार में रहकर पवित्र स्थान में स्वाध्याय द्वारा स्वयं अपने को, सन्तानों को एवं अन्य जनों को धार्मिक बनाता हुआ समस्त इन्द्रियों को, आत्मा के अधीन करता हुआ, तीर्थ-स्थानों के अन्यत्र भी प्राणियों की हिंसा न करता हुआ, समस्त आयु इस प्रकार बरतता हुआ मोक्ष-पद का अधिकारी बन जाता है तथा जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है।
इस प्रकार हम पवित्र ग्रन्थों एवं सुविचारपूर्ण सत्साहित्य के पठन-पाठन द्वारा सदा स्वाध्याय कर अपने मन और बुद्धि को सुसंस्कृत बनाकर अपने जीवन को पवित्र बनाने का संकल्प धारण करें। सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय से हमारे आत्मा की सुषुप्त शक्तियाँ जाग्रत होकर हमारे जीवन को सरस, समुन्नत एवं दिव्य बना देती हैं।
शरीर को स्वस्थ और सुदृढ़ बनाए रखने के लिए जिस प्रकार पौष्टिक आहार की आवश्यकता है उसी प्रकार मन और बुद्धि को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाए रखने के लिए उत्तमोत्तम ग्रन्थों का अध्ययन अनिवार्य है। अध्ययन एवं स्वाध्याय के लिए निम्न कोटि का साहित्य हानिकर होगा, उसी प्रकार जैसे अखाद्य एवं दूषित पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अतएव हमें इस सम्बन्ध में परिपूर्ण सतर्कता और सावधानी से काम लेना होगा। सच्चा स्वाध्याय वही है, जिसके द्वारा हमारा मन बाह्य विषयों से अलिप्त रहकर आत्मा के अनुसन्धानों में प्रवृत्त हो एवं हमारी मानसिक दुर्भावनाओं, दुर्बलताओं तथा दूषित मनोविकारों का दमन हो सके और हमारा मन एक अनिर्वचनीय अलौकिक आनन्द से परिप्लावित हो उठे।
मनुस्मृति में कहा गया है—
स्वाध्याये नित्य युक्तः स्यादैवं चैवेह कर्मणा।
स्वाध्याय और शुभ कर्म में मनुष्य सदा तत्पर रहे।
जिनके द्वारा ‘स्व’ आत्मा व परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किया जा सके और जिसके द्वारा अभ्युदय और निश्रेयस की प्राप्ति की जा सके वही सच्चा स्वाध्याय है। अतएव प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अच्छे ग्रन्थों, सदाचार प्रवर्तक पत्र-पत्रिकाओं एवं सत्प्रेरणादायी पुस्तकों का सदैव स्वाध्याय करता रहे। महाभारत के शान्ति पर्व में कहा गया है—‘‘नित्यं स्वाध्यायशीलश्च दुर्गान्याति तरन्ति ते’’ अर्थात नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दुःखों से पार हो जाता है।
स्वाध्याय ब्रह्मचर्य पालन में सहायक है। स्वाध्याय से चरित्र निर्माण में भी सहायता मिलती है। इसके द्वारा दुराचारी, सदाचारी और व्यभिचारी भी ब्रह्मचारी बन जाता है। अतः यदि आप समुन्नत होना चाहते हैं; अपने जीवन को पवित्र, शुद्ध और निर्मल बनाना चाहते हैं तो, आलस्य और प्रमाद को छोड़कर नित्य सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय का आज से ही संकल्प कीजिए और उसका दृढ़ता से पालन कीजिए।
उत्तम पुस्तकें जाग्रत देवता हैं
ज्ञान की वृद्धि के लिए, ज्ञानोपासना के लिए पुस्तकों का अध्ययन एक महत्त्वपूर्ण आधार है। मानव जाति द्वारा संचित समस्त ज्ञान पुस्तकों में संचित है। खासकर जब से लिखने और छापने का प्रचार हुआ, तब से तो मानव द्वारा उपलब्ध ज्ञान लिपिबद्ध करके संचित किया जाने लगा। इसलिए उत्तम पुस्तकों का अध्ययन करना ज्ञानप्राप्ति के लिए बहुत ही आवश्यक होता है। अच्छी पुस्तकें एक विकसित मस्तिष्क का ‘ग्राफ’ होती हैं। मिल्टन ने कहा है—‘‘अच्छी पुस्तक एक महान आत्मा का जीवन रक्त है।’’ क्योंकि उसमें उसके जीवन का विचारसार सन्निहित होता है। व्यक्ति मर जाते हैं लेकिन ग्रन्थों में उनकी आत्मा का निवास होता है। ग्रन्थ सजीव होते हैं। इसलिए लिंटन ने कहा है—‘‘ग्रन्थों में आत्मा होती है। सद्ग्रन्थों का कभी नाश नहीं होता।’’
विकासशील जीवन के लिए पुस्तकों का साथ होना आवश्यक है, अनिवार्य है क्योंकि पुस्तकों में उसे जीवन का मार्गदर्शक प्रकाश-स्रोत मिलता है। वस्तुतः संसार के भीषण सागर में डूबते-उतराते मनुष्य के लिए पुस्तकें उस प्रकाश स्तम्भ की तरह सहायक होती हैं जैसे समुद्र में चलने वाले जहाजों को मार्ग दिखाने वाले प्रकाशगृह।
सिसरो ने कहा है—‘‘ग्रन्थ रहित कमरा आत्मा रहित देह के समान है।’’ तात्पर्य यह है कि उत्तम पुस्तकें नहीं होने से मनुष्य ज्ञान से वंचित रह जाता है और ज्ञान रहित जीवन मुरदे के समान व्यर्थ होता है। जो व्यक्ति दिन-रात अच्छी पुस्तकों का सम्पर्क प्राप्त करते हैं उनमें मानवीय चेतना ज्ञानप्रकाश से दीप्त होकर जगमगा उठती है। ज्ञान का अभाव भी एक तरह की मृत्यु है।
उत्तम पुस्तकों में उत्तम विचार होते हैं। उत्तम विचार, उदात्त भावनाएँ, भव्य कल्पनाएँ जहाँ हैं, वहीं स्वर्ग है। लोकमान्य तिलक ने कहा है—‘‘मैं नरक में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूँगा क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि जहाँ ये रहेंगी, वहाँ अपने आप ही स्वर्ग बन जाएगा।’’ स्वर्ग का दृश्य अस्तित्व कहीं नहीं है। मनुष्य की उत्कृष्ट मनोस्थिति जो उत्तम विचारों का फल है, वही स्वर्ग है। उत्तम पुस्तकों का सान्निध्य मनुष्य की बुद्धि को जहाँ भी मिलता है, वहीं उसे स्वर्गीय अनुभूति होने लगती है।
सच्चे, निस्स्वार्थी, आत्मीय मित्र मिलना कठिन है। हमसें से बहुतों को इस सम्बन्ध में निराश ही होना पड़ता है। लेकिन अच्छी पुस्तकें सहज ही हमारी सच्ची मित्र बन जाती हैं। वे हमें सही रास्ता दिखाती हैं, जीवन-पथ पर आगे बढ़ने में हमारा साथ देती हैं। महात्मा गाँधी ने कहा है—‘‘अच्छी पुस्तकें पास होने पर हमें भले मित्रों की कमी नहीं खटकती वरन मैं जितना पुस्तकों का अध्ययन करता हूँ, उतनी ही ये मुझे उपयोगी मित्र मालूम होती हैं।’’
मानव जीवन संसार का ज्ञान असंख्य अनेकताओं से भरा पड़ा है। मनुष्य का एक अपना मानस ही इतने अधिक विचारों से भरा रहता है कि क्षण-क्षण नई लहरें उत्पन्न होती रहती हैं। इन अनेकताओं का परिणाम होता है—मनुष्य के अन्तर-बाह्य जीवन में अनेकों संघर्ष| विचार संग्राम में पुस्तकें ही मनुष्य के लिए प्रभावशाली शस्त्र सिद्ध होती हैं। एक व्यक्ति का ज्ञान सीमित एकांगी हो सकता है, लेकिन उत्तम पुस्तकों के स्वाध्याय से मनुष्य अपने आप का सही-सही समाधान ढूँढ़ सकता है। खासकर विचारों के संघर्ष में उत्तम पुस्तकें ही सहायक सिद्ध होती हैं।
पुस्तकें मन को एकाग्र और संयमित करने का सबसे सरल साधन हैं। अध्ययन करते-करते मनुष्य जीवन में समाधि अवस्था को प्राप्त कर सकता है। एक बार लोकमान्य तिलक का ऑपरेशन होना था। इसके लिए उन्हें क्लोरोफार्म सुँघाकर बेहोश करना था। लेकिन इसके लिए उन्होंने डॉक्टर को मना कर दिया और कहा—‘‘मुझे एक गीता की पुस्तक ला दो, मैं उसे पढ़ता रहूँगा और आप ऑपरेशन कर लेना।’’ पुस्तक लाई गई। लोकमान्य उसके अध्ययन में ऐसे लीन हुए कि डॉक्टरों ने ऑपरेशन किया तब तक वे तनिक हिले भी नहीं और न कोई दुःख ही अनुभव किया। पुस्तकों के अध्ययन में ऐसी तल्लीनता प्राप्त हो जाती है, जो लम्बी योग-साधनाओं से भी प्राप्त नहीं होती।
पुस्तकों के अध्ययन के समय मनुष्य की गति एक सूक्ष्म विचारलोक में होने लगती है। दृश्य जगत, शरीर यहाँ के कई व्यापार, हो-हुल्लड़ भी मनुष्य उस समय भूल जाता है। सूक्ष्म विचारलोक में भ्रमण करने का यह अनिर्वचनीय आनन्द योगियों की समाधि अवस्था के आनन्द जैसा ही होता है। इस स्थिति में मनुष्य दृश्य जगत से उठकर अदृश्य संसार में, सूक्ष्म लोक में विचरण करने लगता है और वहाँ कई दिव्य चेतन विचारों का मानसिक स्पर्श प्राप्त करता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे योगी दिव्य चेतना का सान्निध्य प्राप्त करता है ध्यानावस्था में। पुस्तकों का अध्ययन ऐसी साधना है जिससे मनुष्य अपने अन्तर्बाह्य जीवन का पर्याप्त विकास कर सकता है।
मनोविकारों से परेशान, दुःखी, चिन्तित मनुष्य के लिए उसके दुःख-दरद के समय उत्तम पुस्तकें अमृत हैं जिनका सान्निध्य प्राप्त कर उस समय वह अपना दुःख-दरद, क्लेश सब कुछ भूल जाता है। अच्छी पुस्तकें मनुष्य को धैर्य, शान्ति, सांत्वना प्रदान करती हैं। किसी ने कहा है—‘‘सरस पुस्तकों से रोग पीड़ित व्यक्ति को बड़ी शान्ति मिलती है। जैसे स्नेहमयी जननी की मीठी-मीठी थपकियाँ बच्चों को मीठी नींद में सुला देती हैं वैसे ही मन या शरीर की पीड़ा को शान्त करने के लिए उत्तम पुस्तकों का अवलम्बन लेना सुखकर होता है।’’
उत्तम पुस्तकें, आदर्श ग्रन्थ बहुत बड़ी सम्पत्ति है। अपनी सन्तति के लिए उत्तराधिकार में छोड़ने के लिए सर्वोपरि मूल्यवान वस्तु संसार में। जो अभिभावक अपनी सन्तान के लिए धन, वस्त्र, सुख, आमोद-प्रमोद के साधन न छोड़कर उत्तम पुस्तकों का संग्रह छोड़ जाते हैं, वे बहुत बड़ी सम्पत्ति छोड़ते हैं। क्योंकि उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन करके मनुष्य ऋषि, देवता, महात्मा बन सकता है। जिन परिवारों में ज्ञानार्जन का क्रम पीढ़ियों से चलता रहता है, उनमें से पण्डित, ज्ञानी, विद्वान अवश्य निकलकर आते हैं। जहाँ पुस्तकें होती हैं, वहाँ मानों देवता निवास करते हैं। वह स्थान मन्दिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक, किन्तु ज्ञान के देवता निवास करते हैं। वे माता-पिता धन्य हैं, जो अपनी सन्तान के लिए उत्तम पुस्तकों का एक संग्रह छोड़ जाते हैं क्योंकि धन, सम्पत्ति, साधन-सामग्रियाँ तो एक दिन नष्ट होकर मनुष्य को अपने भार से डुबो भी सकती हैं किन्तु उत्तम पुस्तकों के सहारे मनुष्य भवसागर की भयंकर लहरों में भी सरलता से तैरकर उसे पार कर सकता है।
जीवन में अन्य सामग्री की तरह हमें उत्तम पुस्तकों का संग्रह करना चाहिए। जीवन के विभिन्न अंगों पर प्रकाश डालने वाले, विविध विषयों के उत्तम ग्रन्थ खरीदने के लिए खरच के बजट में सुविधानुसार आवश्यक राशि रखनी चाहिए। कपड़े, भोजन, मकान की तरह ही हमें पुस्तकों के लिए भी आवश्यक खरचे की तरफ ध्यान रखना चाहिए। स्मरण रखिए उत्तम पुस्तकों के लिए खरच किया जाने वाला पैसा उसी प्रकार व्यर्थ नहीं जाता, जिस तरह अँधेरे बियाबान जंगल में प्रकाश के लिए खरच किया जाने वाला धन।
एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए। वह यह, कि पुस्तकें कमरे को सजाने के लिए अथवा प्रदर्शिनी लगाने के लिए न खरीदी जाएँ, वरन उनका नियमित अध्ययन जीवन के अन्य कार्यक्रमों की तरह ही आवश्यक अंग बना लेना चाहिए। उनसे अधिकाधिक लोगों को ज्ञान मिले, इसके लिए अध्ययन की प्रेरणा-सुविधा जुटाते रहना चाहिए। पुस्तकों की उपयोगिता अध्ययन से ही है। अन्यथा वे कीड़ों का भोजन बनने के सिवा कुछ नहीं रहतीं। नई पुस्तकें खरीदना, उनका अध्ययन करना, उनको अधिकाधिक उपयोग में लाना ही पुस्तकों की सच्ची कद्र करना है।
स्मरण रखिए, पुस्तकें जाग्रत देवता हैं। उनके अध्ययन, मनन, चिन्तन के द्वारा पूजा करने पर तत्काल ही वरदान पाया जा सकता है हमें नियतिम रूप से सद्ग्रन्थों का अवलोकन करना चाहिए। उत्तम पुस्तकों का स्वाध्याय जीवन का आवश्यक कर्तव्य बना लेना चाहिए।
सत्साहित्य से शक्ति और समुन्नति
वर्तमान अवस्था से ऊँचे उठकर समुन्नत बनने की, शक्तिशाली बनने की भावना एक आध्यात्मिक तथ्य है। उत्थान ही जीवात्मा का मूलभूत उद्देश्य है। इसी की पूर्ति में लोग लगे भी रहते हैं। यह एक दूसरी बात है कि वास्तविक प्रगति का सच्चा स्वरूप हम न समझ पाएँ। किन्तु आगे बढ़ने, उन्नत होने की आकांक्षा सभी में होती है।
विचारकों का कथन है कि इस संसार में निर्बल प्राणियों के लिए कोई स्थान नहीं है। प्रकृति के सारे आघात भी निर्बलों पर ही होते हैं। संसार के संघर्ष में योग्य व्यक्ति, साहसी और सूरमा ही ठहर सकते हैं। जीवन के लिए शक्ति अवश्य चाहिए। शास्त्रकार का कथन है—
या विभर्ति जगत्सर्वमीश्वरेच्छाह्यलौकिकी।
सैव धर्मो हि सुभगे! नेह कश्चन संशयः।
योग्यता वच्छिन्ना धर्मिणः शक्तिरेव धर्मः॥
इस संसार को परमात्मा ने अपनी अलौकिक शक्ति से धारण किया है। मनुष्य के लिए भी अपनी योग्यता बढ़ाकर शक्ति सम्पन्न होना, यही सबसे बड़ा धर्म है।
शक्ति उस साधन को कहते हैं जिससे विजय मिलती है। यों धन, जन, पशु आदि का होना भी लौकिक दृष्टि से शक्तिमान होने का सबूत है। शारीरिक बल को भी मनुष्य की योग्यता मानते हैं, किन्तु यह देख चुके हैं कि समुन्नति के मार्ग में धन-जन का न होना अवरोधक नहीं है। गौतम बुद्ध तब शक्तिमान बन सके जब उन्होंने लौकिक शक्तियों का परित्याग कर दिया। करोड़ों धनी सत्तावानों की तुलना में उनकी महत्ता सर्वश्रेष्ठ घोषित हुई। उस समय के सम्राट अशोक तक ने उनके समक्ष अपने घुटने टेके थे। गाँधी जी शरीर से बड़े दुबले-पतले और निर्बल थे। कुल ९६ पौंड वजन के गाँधी जी ने उस ब्रिटिश साम्राज्य को परास्त कर दिखाया, जिसके शासन में कभी सूर्यास्त नहीं होता था। अतः धन की शक्ति, जन और शारीरिक शक्तियाँ अल्प हैं, अपूर्ण हैं; इनको शक्तिशाली कहलाने का गौरव कभी भी नहीं मिल सकता।
संसार की सर्वश्रेष्ठ शक्ति का नाम है—विचार। जैसे हमारे विचार होते हैं वैसी ही हमारी शारीरिक स्थिति होती है। आन्तरिक स्थिति का निर्माण भी विचारों के ही अनुरूप होता है। गुण, कर्म और स्वभाव की त्रिवेणी में भी विचारों का यही जल बहता है। कोई व्यक्ति चाहे कि हमारी स्थिति इसके विपरीत हो, तो यह असम्भव है। निश्चयात्मक विचारों से ही निर्माण शक्ति का विकास होता है। स्वस्थ बनने का विचार न उठे, तो व्यायाम करने, मालिश करने और पुष्टिकारक आहार जुटाने का कष्टसाध्य श्रम और समयसाध्य कर्म मनुष्य क्यों करे? सत्याग्रह के दृढ़ विचारों से प्रभावित होकर ही महात्मा गाँधी स्वतंत्रता आन्दोलन में कूदे थे। विचारों की आवश्यकता पर ही सम्पूर्ण राष्ट्र ने उनके इस महान कार्य में हाथ बँटाया था।
विचारों का बल निस्सन्देह बहुत बढ़-चढ़कर है। दार्शनिक एमर्सन का कथन है—‘‘आध्यात्मिक शक्ति भौतिक शक्तियों से बड़ी है, विचार ही संसार पर शासन करते हैं।’’ अच्छे विचारों का परिणाम भी श्रेष्ठतर होता है। भविष्य का निर्माण भी विचारों के अनुरूप ही होता है। विचार ही शक्ति का स्रोत हैं, इस बात को संसार के सभी मनीषियों ने स्वीकार किया है। किसी भी उच्च साधना की सफलता के लिए विचारों की आवश्यकता प्रमुख है। विचार संचालन करते हैं, इसलिए वे श्रेष्ठ हैं। इस बात से इनकार करने का कोई कारण भी खोज में नहीं आया।
विचारों की शक्ति अलौकिक है, यह निर्विवाद सत्य है। किन्तु यह न भूलना चाहिए कि व्यक्ति के पतन का कारण भी उसके विचार ही होते हैं। हीन विचारों के कारण मनुष्य दुष्कर्म करता है, शक्ति का अपव्यय करता है, जिससे उसकी योग्यता फीकी पड़ जाती है। अत: उत्थान के लिए शक्तिशाली विचार चाहिए, ऊर्ध्वगामी विचार चाहिए।
विचार की योग्यता मनुष्य में साहित्य के द्वारा आती है। साहित्य में वह शक्ति होती है कि समाज की रूपरेखा बदलने में उनका महत्त्व सर्वोपरि है। यह कथन असत्य नहीं है कि ‘‘साहित्य ही समाज का दर्पण है।’’ अर्थात किसी भी समाज की शक्ति और योग्यता की परख उसके साहित्य से होती है। विचारों को ऊँचा उठाने वाला साहित्य यदि उपलब्ध हो सके, तो आत्मोन्नति का प्रथम प्रयास सफल ही समझना है।
साहित्य का अर्थ यहाँ उस साहित्य से है जिससे मनुष्य का चरित्र ऊँचा उठ सके और उसमें उच्च नैतिक सद्गुणों का समावेश हो। जीवन निर्माण के लिए ऐसे साहित्य की आवश्यकता होती है जो हमारी भावनाओं को ऊँचा उठाने की क्षमता रखता हो। स्कूली किताबें, नाटक, भजन या धर्म की लकीर पीटने वाली पुस्तकें ही इसके लिए पर्याप्त नहीं हैं। एक ऐसे साहित्य की आवश्यकता होती है, जो वैज्ञानिक हो और सन्मार्ग प्रेरक हो। जिस साहित्य से हमारी सुरुचि नहीं जगती, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति नहीं मिलती, उसे साहित्य कहने में संकोच होता है। जो साहित्य व्यक्ति और समाज में गति और शक्ति न पैदा कर सके, सौन्दर्य-प्रेम समुन्नत न कर सके, वह साहित्य नहीं, प्रवंचना है। हमारा तात्पर्य उस साहित्य से है जो सच्चा संकल्प और कठिनाइयों पर विजय पाने की सच्ची दृढ़ता उत्पन्न करे। सच्चा साहित्य उसे कहते हैं जिसके पढ़ने से पाठक का अन्तःकरण फूल की तरह सुविकसित हो जाए और उसके हृदय मन में आध्यात्मिक सुवास छा जाए।
पतनकारी साहित्य से व्यक्ति और राष्ट्र की शक्ति नष्ट होती है। आज इस बात के प्रमाण चारों तरफ फैले दिखाई दे रहे हैं। विलासिता, कामुकता और अनाचार फैलाने वाले साहित्य की जो बाढ़ आई हुई है उससे सामाजिक सामर्थ्यों का कितना विनाश हो रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। लोगों का चरित्र इतनी तेजी से गिरता जा रहा है कि विचारवान लोगों के हृदय इस आशंका से काँपने लगे हैं कि कहीं सामाजिक विद्रोह की ज्वाला न भड़क उठे। अश्लील साहित्य भी बहुत कुछ इसके लिए जिम्मेदार है। ऐसे साहित्य से जितना ही बच सकें उतना ही अपना परम सौभाग्य समझना चाहिए।
सत्साहित्य से सद्विचार ग्रहण करते रहने की परम्परा चल पड़े तो मानसिक उत्थान होता रहेगा और दुर्गुणों से बचते रहेंगे। आज के युग में जबकि सन्तजनों और सहृदय पुरुषों का नितान्त अभाव है, प्रेरणाप्रद विचार प्राप्त करने के लिए साहित्य का ही आश्रय लेना पड़ेगा। किन्तु यह ध्यान बना रहे कि साहित्य वही उपयोगी हो सकता है जो हमें ऊँचा उठा सके। हमारे अन्त:करण में प्रकाश उत्पन्न कर सके। जहाँ कोई अन्य साधन न हों, वहाँ नियमित रूप से सद्ग्रन्थों, आत्मनिर्माण करने वाली पुस्तकों का स्वाध्याय करते रहना चाहिए। इससे भी मन बुरे विचारों से बचा रहता है और सद्भावनाएँ उत्पन्न होती हैं।
साहित्य की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए विद्वान सिसरो ने लिखा है—‘‘साहित्य का अध्ययन युवकों का पालन-पोषण करता है, वृद्धों का मनोरंजन करता है, उन्नति का द्वार खोलता है, विपत्ति में धैर्य बँधाता है, घर में प्रमुदित रखना और बाहर विनीत रखना साहित्य का ही काम है।’’
उस सारे वाड्मय को ऐसे साहित्य की श्रेणी में ले लेते हैं जिससे अर्थ-बोध के साथ भावनाओं का परिष्कार भी होता हो और प्रत्येक तथ्य की समीक्षात्मक व्याख्या भी होती हो। केवल गूढ़ शब्दों को रट लेना मात्र पर्याप्त नहीं है। पढ़ना और उसे समझना, समझकर उसके सत्यासत्य पर विचार करना तथा जीवन-शोधक व्यावहारिकता का अनुसरण करना, इतना कर सकें तो यह समझें कि साहित्य की आवश्यकता को हमने समझ लिया है। रामायण पढ़ने का लाभ तब है जब हम भी राम, भरत या लक्ष्मण के सदृश बनने का प्रयत्न करें और रामायण का महत्त्व इसलिए है कि उससे आन्तरिक मलिनताओं पर द्वंद्व उत्पन्न होता है और सदाचार की प्रेरणा मिलती है। इस तरह का तालमेल यदि बन सके तो विचार दृष्टि से शक्तिशाली बनने में कोई कठिनाई न रहेगी।
बुरे संयोग से बचने के लिए और अपनी महानता जगाने के लिए हमें भी विचारवान बनना है। इसके लिए दूसरे साधनों की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कि ज्ञान साधना की जरूरत है। इस जरूरत को पूरा करना है तो साहित्य की शरण लेनी ही पड़ेगी। ऐसा साहित्य खोजना पड़ेगा जिससे ज्ञान-सम्वर्द्धन हो और आत्मा का परिष्कार हो। साहित्य हमारी शक्ति का उद्रेक है। हमें साहित्य के द्वारा अपनी प्रतिभा जगाने का कार्य अविलम्ब शुरू कर देना चाहिए।
सत् अध्ययन आत्म-उत्थान का आधार
ऋषियों ने ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’’ का सन्देश देते हुए मनुष्यों को अज्ञान की यातना से निकलने के लिए ज्ञानप्राप्ति का पुरुषार्थ करने के लिए कहा है। भारत का अध्यात्म दर्शन ज्ञानप्राप्ति के उपायों का प्रतिपादक है। अज्ञानी व्यक्ति को शास्त्रकारों ने अन्धे की उपमा दी है। जिस प्रकार बाह्य नेत्रों के नष्ट हो जाने से मनुष्य भौतिक जगत का स्वरूप जानने में असमर्थ रहता है, उसी प्रकार ज्ञान के अभाव में बौद्धिक अथवा विचार जगत की निर्भान्त जानकारी नहीं हो पाती। बाह्य जगत के समान मनुष्य का एक आत्मिक जगत भी है, जो कि ज्ञान के अभाव में वैसे ही अँधेरा रहता है, जैसे आँखों के अभाव में यह संसार।
अन्धकार से प्रकाश और अज्ञान से ज्ञान की ओर जाने को मनुष्य का प्रमुख पुरुषार्थ माना गया है। जिस प्रकार आलस्यवश दीपक न जलाकर अन्धकार में पड़े रहने वाले व्यक्ति को मूर्ख कहा जाएगा, उसी प्रकार प्रमादवश अज्ञानता दूर कर ज्ञान के लिए प्रयत्न न करने वाले को भी मूर्ख ही कहा जाएगा। भारतवर्ष की महिमामयी संस्कृति अपने अनुयायियों को विवेकशील बनने का सन्देश देती है, मूढ़ अथवा अन्धविश्वासी नहीं।
ज्ञानवान अथवा विवेकशील बनने के लिए मनुष्य को अपने मन-मस्तिष्क को साफ-सुथरा बनाना होगा, उनका परिष्कार करना होगा। जिस खेत में कंकड़-पत्थर तथा खर-पतवार भरा होगा, उसमें अन्न के दाने कभी भी अंकुरित नहीं हो सकते। वे तब ही अंकुरित होंगे, जब खेत से झाड़-झंखाड़ और कूड़ा-करकट साफ करके दाने बोए जाएँगे। उसी प्रकार मनुष्य में ज्ञान के बीज तब तक जड़ नहीं पकड़ सकते जब तक कि मानसिक एवं नैतिक धरातल उपयुक्त न बना लिया जाएगा।
हमारे मन-मस्तिष्कों में इसी जन्म की ही नहीं, जन्म-जन्मान्तरों की विकृतियाँ भरी रहती हैं। न जाने कितने कुविचार, कुवृत्तियाँ एवं मूढ़ मान्यताएँ हमारे मन-मस्तिष्क को घेरे रहती हैं। ज्ञान पाने अथवा विवेक जाग्रत करने के लिए आवश्यक है कि पहले हम अपने विचारों एवं संस्कारों को परिष्कृत करें। विचार एवं संस्कार परिष्करण के अभाव में ज्ञान के लिए की हुई साधना निष्फल ही चली जाएगी।
विचार-परिष्कार का अमोघ उपाय अध्ययन एवं सत्संग को ही बतलाया गया है। विचारों में संक्रमण एवं ग्रहणशीलता रहती है। जब मनुष्य अध्ययन में निरन्तर संलग्न रहता है तब उसको अपने विचारों द्वारा विद्वानों के विचारों के बीच से बार-बार गुजरना पड़ता है। पुस्तक में लिखे विचार अविचल एवं स्थिर होते हैं। उनके प्रभावित होने अथवा बदलने का प्रश्न ही नहीं उठता। स्वाभाविक है कि अध्ययनकर्ता के ही विचार प्रभाव ग्रहण करते हैं। जिस प्रकार के विचारों की पुस्तक पढ़ी जाएगी, अध्येता के विचार उसी प्रकार ढलने लगेंगे। इसलिए अध्ययन के साथ यह प्रतिबन्ध भी लगा दिया गया है कि अध्येता उन्हीं ग्रन्थों का अध्ययन करे, जो प्रामाणिक एवं सुलझे हुए विचारों वाले हों। विचार परिष्कार अथवा ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से पढ़ने वालों को एकमात्र जीवन निर्माण सम्बन्धी साहित्य का ही अध्ययन करना चाहिए। उन्हें निठल्ले एवं निकम्मे लोगों की तरह निम्न मनोरथ वाले उपन्यास, कहानी, नाटक तथा कविता आदि नहीं पढ़नी चाहिए। अश्लील, अनैतिक, वासनापूर्ण अथवा जासूसी आदि से भरे उपन्यास पढ़ने से लाभ तो कुछ नहीं ही होना है उलटे बहुत अधिक हानि ही होगी। अयुक्त साहित्य पढ़ने से विचारों की वह थोड़ी-बहुत उदात्तता भी चली जाएगी, जो उनमें रही होगी। अध्ययन का तात्पर्य सत्यं, शिवं एवं सुंदरम् साहित्य पढ़ने से है। सद्विचारों तथा सदुद्देश्य से पूर्ण साहित्य ही पढ़ने योग्य होता है। इसके विपरीत अनुपयुक्त एवं अवांछनीय साहित्य का पठन-पाठन विचारों को इस सीमा तक दूषित कर देगा कि फिर उनका पूर्ण परिष्कार एक समस्या बन जाएगी। आत्मोद्धारक ज्ञान प्राप्त करने के जिज्ञासु व्यक्तियों को तो सत्साहित्य के सिवा अवांछनीय साहित्य को हाथ भी न लगाना चाहिए। सच्ची बात तो यह है कि अयुक्त, अवांछनीय एवं निम्न मनोरंजनार्थ किए गए ‘‘लिपि-लेखन’’ को साहित्य कहा ही नहीं जाना चाहिए। यह तो साहित्य के नाम पर लिखा गया कूड़ा-करकट होता है, जिसे समाज के हित-अहित से मतलब न रखने वाले कुछ स्वार्थी लेखक उसी प्रकार लिखकर पैसा कमाते हैं, जिस प्रकार कोई भ्रष्टाचारी खाने-पीने की चीजों में अवांछनीय चीजें मिलाकर लाभ कमाते हैं। व्यावसायिक भ्रष्टाचारी जहाँ राष्ट्र का शारीरिक स्वास्थ्य नष्ट करते हैं, वहाँ अशिव लेखक राष्ट्र का मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक स्वास्थ्य नष्ट करते हैं। मनुष्य की चारित्रिक तथा आध्यात्मिक क्षति शारीरिक क्षति की अपेक्षा कहीं अधिक भयंकर एवं असहनीय होती है।
मनुष्य के लिए विचार-परिष्कार एवं ज्ञानोपार्जन के लिए यदि कोई मार्ग रह जाता है, तो वह अध्ययन ही है। जीवन का अन्धकार दूर करना और प्रकाशपूर्ण स्थिति पाकर निर्द्वंद्व एवं निर्भय रहना यदि वांछित है, तो समयानुसार अध्ययन में निमग्न रहना भी नितान्त आवश्यक है। अध्ययन के बिना विचार परिष्कार नहीं, विचार-परिष्कार के बिना विवेक और विवेक के बिना ज्ञान नहीं। जहाँ ज्ञान नहीं वहाँ अन्धकार होना स्वाभाविक ही है और अँधेरा जीवन शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक, तीनों प्रकार के भयों को उत्पन्न करने वाला है। जिससे अज्ञानी न केवल इस जन्म में ही बल्कि जन्म-जन्मान्तरों तक, जब तक कि वह ज्ञान का आलोक नहीं पा लेता, त्रिविध तापों की यातना सहता रहेगा। जीवनोद्धार के उपायों में अध्ययन का उपाय सबसे श्रेष्ठ, सरल, सुगम एवं सुलभ है। आत्मावान व्यक्ति को इसे ग्रहण कर भौतिक अज्ञान यातना से मुक्त होना ही चाहिए।
सद्ज्ञान का संचय एवं प्रसार
भारत की जनता स्वभावतः धर्मप्राण जनता है। धर्म के प्रति जितनी आस्था भारतवासियों में पाई जाती है, उतनी कदाचित ही किसी अन्य देश की जनता में पाई जाती हो। भारत एक आध्यात्मिक देश है। यहाँ के अधिकांश वासियों में आध्यात्मिक प्रवृत्तियाँ न्यूनाधिक मात्रा में विद्यमान पाई जाती हैं। उसका कारण यही है कि आदि काल से ही भारत के ऋषियों, मुनियों एवं मनीषियों ने जनता में धर्म के बीज बोने के सतत प्रयत्न किए हैं। उन्होंने धर्म के तत्त्व, महत्त्व तथा जीवन पर उसके सत्वभाव का मूल्य समझा और यह भी जाना कि धर्म की पृष्ठभूमि पर विकसित किया हुआ जीवन ही वह जीवन हो सकता है जिसे यथार्थ रूप में जीवन कहा जा सकता है और जिसको उपलब्ध करना मनुष्य के लिए वांछनीय होकर उसका लक्ष्य भी होना चाहिए।
भारतवासियों में आध्यात्मिक जिज्ञासा संस्कार रूप में विद्यमान है। हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में आध्यात्मिक प्रगति करने को उत्सुक रहा करता है और जिस उपलब्ध स्रोत अथवा सूत्र से वह जितना ज्ञान प्राप्त कर सकता है, करने का प्रयत्न करता है। किन्तु खेद है कि जनसाधारण अपनी इस जिज्ञासापूर्ति में असफल ही नहीं हो रहे हैं बल्कि पथ-भ्रष्ट होकर अज्ञानता के अन्धकार में भटक रहे हैं।
अनेक लोगों ने जनसाधारण की इस लालसा को समझा और धर्म के प्रति उनकी अडिग आस्था का भी आभास पा लिया। फलस्वरूप अपना स्वार्थ सिद्ध करने तथा जनता की भक्ति भावना द्वारा प्रतिष्ठित होने के लिए उन्होंने आडम्बर धारण कर धर्मगुरुओं का रूप बना लिया और धर्म अथवा अध्यात्मज्ञान के नाम पर जनता को भ्रमित करते हुए भटकाने और अपना उल्लू सीधा करने में लग गए। निदान ज्ञान के नाम पर समाज में अज्ञानता का अन्धकार इतना घनीभूत हो उठा है कि धर्म का सच्चा स्वरूप समझ सकना दुरूह हो गया है। आज इस बात की नितान्त आवश्यकता आ पड़ी है कि समाज में इस प्रकार फैलाए गए अज्ञानान्धकार के विरुद्ध अभियान चलाए जाएँ और सद् एवं सद्ज्ञान का प्रकाश प्रसारित करके अज्ञानता रूपी अन्धकार को निर्मूल कर दिया जाए। यह एक बड़ा काम है। किसी एक-दो या दस-बीस अथवा सौ-पचास व्यक्तियों द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए तो प्रत्येक समझदार व्यक्ति को अपना योगदान करना होगा। अज्ञानता के कल्मष में फँसी जनता का उद्धार करना सर्वोपरि सत्कर्म है, जिसे पूरा करने के लिए अध्यात्मवादी धर्मनिष्ठों को आगे आना ही चाहिए।
ज्ञान ही आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला है। ज्ञान के अभाव में आत्मिक उन्नति असम्भव है। ज्ञानरहित मनुष्य अन्य पशुओं की तरह ही मूल प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर अपना जीवन-यापन किया करता है और उन्हीं की तरह हाँके जाकर किसी ओर भी चल सकता है। अज्ञानी व्यक्ति में अपनी सूझ-बूझ नहीं होती और न वह जीवन प्रगति की किसी भी दिशा में विचार ही कर पाता है। ज्ञान के आधार पर ही मनुष्य अपने भीतर छिपी ईश्वरीय शक्ति का परिचय पा सकता है और उसी के बल पर उन्हें प्रबुद्ध कर आत्म-कल्याण की दिशा में नियोजित कर पाता है। अज्ञानी व्यक्ति की सारी शक्तियाँ उसके भीतर निरुपयोगी बनी बन्द रहती हैं और शीघ्र ही कुण्ठित होकर नष्ट हो जाती हैं। जिन शक्तियों के बल पर मनुष्य संसार में एक से एक ऊँचा कार्य कर सकता है, बड़े से बड़ा पुण्य-परमार्थ सम्पादित करके अपनी आत्मा को भव-बन्धन से मुक्त करके मुक्ति, मोक्ष जैसा परमपद प्राप्त कर सकता है, उन शक्तियों का इस प्रकार नष्ट हो जाना मानव जीवन की सबसे बड़ी क्षति है। इस क्षति का दुर्भाग्य केवल इसलिए सहन करता है कि वह ज्ञानार्जन करने में प्रमाद करता है अथवा अज्ञानता के कारण धूर्तों के बहकावे में आकर सत्य धर्म के मार्ग से भटक जाता है। मानव-जीवन को सार्थक बनाने, उसका पूरा-पूरा लाभ उठाने और आध्यात्मिक स्थिति पाने के लिए सद्ज्ञान के प्रति जिज्ञासु होना ही चाहिए और विधिपूर्वक जिस प्रकार भी हो सके, उसकी प्राप्ति करनी चाहिए। जड़तापूर्वक जीवन मृत्यु से भी बुरा है।
ज्ञान की जन्मदात्री मनुष्य की विवेक बुद्धि को ही माना गया है और उसे ही सारी शक्तियों का स्रोत कहा गया है। जो मनुष्य अपनी बुद्धि का विकास और परिष्कार नहीं करता अथवा अविवेक के वशीभूत होकर बुद्धि के विपरीत आचरण करता है, वह आध्यात्मिकता के उच्च स्तर को पाना तो दूर, साधारण मनुष्यता से भी गिर जाता है। उसकी प्रवृत्तियाँ अधोगामिनी एवं प्रतिगामिनी हो जाती हैं। वह एक जंतु-जीवन जीता हुआ उन महान सुखों से वंचित रह जाता है जो मानवीय मूल्यों को समझने और आदर करने से मिला करते हैं। निकृष्ट एवं अधो-जीवन से उठकर उच्चस्तरीय आध्यात्मिक जीवन की ओर गतिमान होने के लिए मनुष्य को अपनी विवेक बुद्धि का विकास, पालन तथा सम्वर्द्धन करना चाहिए। अन्य जीव-जंतुओं की तरह प्राकृतिक प्रेरणाओं से परिचालित होकर सारहीन जीवन बिताते रहना मानवता का अनादर है, उस परमपिता परमात्मा का विरोध है, जिसने मनुष्य को ऊर्ध्वगामी बनने के लिए आवश्यक क्षमता का अनुग्रह किया है।
आध्यात्मिक ज्ञान सिद्ध करने में बुद्धि ही आवश्यक तत्त्व है। इसके संशोधन, सम्वर्द्धन एवं परिमार्जन के लिए विचारों को ठीक दिशा में प्रचलित करना होगा। विचार-प्रक्रिया से ही बुद्धि का प्रबोधन एवं शोभन होता है। जिसके विचार अधोगामी अथवा निम्नस्तरीय होते हैं, उसका बौद्धिक पतन निश्चित ही है। विचारों का पतन होते ही मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन दूषित हो जाता है। फिर वह न तो किसी माँगलिक दिशा में सोच पाता है और न उस ओर उन्मुख ही हो पाता है। अनायास ही वह गर्हित गर्त में गिरता हुआ अपने जीवन को नारकीय बनाता चला जाता है। पतित विचारों वाला व्यक्ति इतना अशक्त एवं असमर्थ हो जाता है कि अपने फिसलते पैरों को स्थिर कर सकना उसके वश की बात नहीं रहती।
ज्ञानभूत आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने का यथार्थ अर्थ विचारों का उपयुक्त दिशा में विकसित करना ही है। विचारों के अनुरूप ही मनुष्य का जीवन निर्मित होता है। यदि विचार उदात्त एवं ऊर्ध्वगामी हैं तो निश्चय ही मनुष्य निम्न परिधियों को पार करता हुआ ऊँचा उठता जाएगा और उस सुख-शान्ति का अनुभावक बनेगा, जो उस आत्मिक ऊँचाई पर स्वतः ही अभिसार किया करती है। स्वर्ग-नरक किसी अज्ञात क्षितिज पर बसी बस्तियाँ नहीं हैं। इनका निवास मनुष्य के विचारों में ही होता है। सद्विचार स्वर्ग और असद् विचार नरक का रूप धारण कर लिया करते हैं।
विचारों का विकास एवं उनकी निर्विकारिता दो बातों पर निर्भर हैं—सत्संग एवं स्वाध्याय। विचार बड़े ही संक्रामक, सम्वेदनशील तथा प्रभावग्राही होते हैं। जिस प्रकार के व्यक्तियों के संसर्ग में रहा जाता है मनुष्य के विचार उसी प्रकार के बन जाते हैं। व्यवसायी व्यक्तियों के बीच रहने, उठने-बैठने, उनका सत्संग करने से ही विचार व्यावसायिक, दुष्ट तथा दुराचारियों की संगत करने से कुटिल और कलुषित बन जाते हैं। उसी प्रकार चरित्रवान तथा सदात्माओं का सत्संग करने से मनुष्य के विचार महान एवं सदाशयतापूर्ण बनते हैं।
किन्तु आज के युग में सन्त पुरुषों का समागम दुर्लभ है। न जाने कितने धूर्त तथा मक्कार व्यक्ति वाणी एवं वेश से महात्मा बनकर ज्ञान जिज्ञासु भोले और भले लोगों को प्रताड़ित करते घूमते हैं। किसी को आज वाणी अथवा वेश के आधार पर विद्वान अथवा विचारवान मान लेना निरापद नहीं है। आज मन, वचन, कर्म से सच्चे और असन्दिग्ध ज्ञान वाले महात्माओं का मिलना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। सत्संग के लिए तो ऐसे पूर्ण विद्वानों की आवश्यकता है जो हमारे विचारों को ठीक दिशा दे सकें और आत्मा में आध्यात्मिक प्रकाश एवं प्रेरणा भर सकें। वक्तृता के बल पर मनचाही दिशा में भ्रमित कर देने वाले वाक् वीरों से सत्संग का प्रयोजन सिद्ध न हो सकेगा।
ऐसे प्रामाणिक प्रेरणा-पुंज व्यक्तित्व आज के युग में विरले हैं। जो हैं भी, उनकी खोज तथा परख करने के लिए आज के व्यस्त समय में किसी के पास पर्याप्त समय तथा बुद्धि नहीं है। जो प्रेरणा एवं प्रकाशदायक प्रज्ञापात्र विदित भी हैं, उनका लाभ तो वे ही भाग्यवान उठा सकते हैं, जो उनके सन्निकट रहते हैं। दूर-दूर के लोग उनके पास न तो आसानी से रह सकते हैं और न पूर्ण प्रकाश पाने तक समय ही दे सकते हैं। इन सब कठिनाइयों के कारण विद्वानों का साक्षात सत्संग असम्भव सा हो गया है। इसलिए ज्ञान के उत्सुक लोगों के लिए स्वाध्याय का ही एक ऐसा माध्यम रह गया है, जिसके द्वारा वे सत्संग से अपेक्षित लाभ पुस्तकों से प्राप्त कर सकते हैं।
पुस्तकें क्या हैं? विद्वानों के विचार-शरीर ही तो हैं। सत्संग का प्रयोजन विचारों का श्रवण, मनन तथा ग्रहण ही है। विद्वानों तथा महापुरुषों के जो विचार उनके मुख से सुने जा सकते हैं, वे उनकी लिखी पुस्तकों से आँखों के द्वारा पढ़े जा सकते हैं। एक बार बौद्धिक सत्संग में विचार अस्त-व्यस्त भी हो सकते हैं। किन्तु पुस्तकों में संचित विचार व्यवस्थित तथा स्थिर होते हैं। ग्रन्थकर्ता अपनी पुस्तक में ज्ञान की परिपक्वता से ओत-प्रोत विचार ही अंकित किया करता है। स्वाध्यायरूपी सत्संग द्वारा कोई भी व्यक्ति उन विद्वानों का विचार-संग किसी समय भी, किसी स्थान पर प्राप्त कर सकता है, जो आज संसार में नहीं हैं अथवा जो सुदूर देशान्तर में रह रहे हैं। परिचित भाषा ही नहीं, अनुवादों द्वारा अपरिचित भाषाओं के विद्वानों के विचार संग में आया जा सकता है। पुस्तकों के माध्यम से प्रामाणिक विद्वानों का सत्संग विचार-विकास के लिए सबसे अधिक उपयोगी, सरल तथा निरापद है।
जहाँ यह आवश्यक है कि मनुष्य स्वयं स्वाध्यायी बने, उसके लिए प्रेरणादायक पुस्तकें संचित करे और नित्यप्रति उनका पारायण करता रहकर अपनी बुद्धि, विवेक तथा ज्ञान को विकसित करता रहे, वहाँ यह भी आवश्यक है कि स्वाध्याय की प्रेरणा दूसरे लोगों में भी भरे।
आज हममें से प्रत्येक शिक्षित भारतीय का पुनीत कर्तव्य है कि वह स्वाध्याय द्वारा स्वयं तो ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करे ही, साथ ही यथासाध्य अपनी परिधि में निवास करने वाले लोगों को भी प्रकाश एवं प्रेरणा दे। आज के युग का यह सबसे बड़ा पुण्य-परमार्थ है। यों भी ज्ञान पाना और ज्ञान से अन्यों में ज्ञानप्राप्ति की प्रेरणा भरना पुण्य कर्म ही कहा गया है। आज की भ्रांत स्थिति में तो यह सर्वोपरि पुण्य कर्म बताया गया है।
पुस्तकालय वंदना
ये किताबें मा-कहानी हैं, करुण अनगिनत मानव हृदय की मूक-सी।
ओह! कितनी साध है इनमें छिपी, सोचकर उठती हृदय में हूक-सी॥
महाजग में एक जो असहाय सा जानवर कहते जिसे इनसान हैं।
उसकी सारी बेवकूफी के जमा, इसमें इक से इक अजीब बयान हैं॥
किस तरह पेड़ों की डाली छोड़कर, गगनचुम्बी भवन में रहने लगा।
छोड़कर वह चाल वनमानुस की फिर कैसे वायु विमान में उड़ने लगा॥
किस तरह उसने खुदा पहचानकर, खूँ बहाया फिर खुदा के नाम पर।
और कैसे मर मिटा वह चाव से, बुजुर्गों के स्वर्ग से प्रिय धाम पर॥
मैं दबा-सा जाता हूँ इस ढेर में, जो हिमालय का-सा आलीशान है।
दिल मेरा धक-धक धड़कता सोचता, पुस्तकालय क्या अनोखी शान है!
इसमें गौतम की दया, गाँधी का सत्, क्षमा ईसा की, मुहम्मद का इमान।
साधना जरदुश्त की, कनफ्यूशियस की अमर उपदेश-माला का वितान॥
पुस्तकालय! क्या नहीं तुझमें बता, सब ही तीरथ तुझमें हैं मेरे लिए।
तुझमें वृन्दावन है मीरा का छिपा, जगमगाते तुझमें ‘जौहर’ के दिये।
तुझमें प्याला विषभरा सुकरात का, तुझमें सूली ‘अनलहक’ की तान की।
तेरे दामन में कहीं है ‘हल्दीघाट’ और ‘थरमापली’ भी यूनान की॥
कितने ही परताप लिओनिडाज हैं, कितने ही अर्जुन और सीजर हैं छिपे।
कौन-सा है दीप जगमग ज्योति से, जो न इस जागृत दिवाली में दिपे॥
है इसी में आदि कवि की गुरु गिरा, है इसी में प्रतिभा कालीदास की।
हैं इसी में ‘सूर के शर’ भी, इसी में अमर वाणी सन्त तुलसीदास की॥
इसमें मिल सकते हमें श्री प्रेमचन्द्र, गोरकी, ह्यूगो तथा हैं टाल्स्टाय।
जिसका चरचा था किया ‘खय्याम’ ने वही यह कारवानों की सराय।
भारती के भव्य मन्दिर! हे महान! कावे। विद्याप्रेमियों के पाक नाम।
जगत की जागृति के हे जेरुसलम! इसलिए है प्रेम से तुझको प्रणाम॥