संस्मरण - आ० डॉ. अमल कुमार दत्ता जी - 2

विजयवाड़ा कार्यक्रम में रहवर जी अपनी टोली सहित कार्यक्रम दे रहे थे। टोली सदस्यों का मन हुआ कि त्रिपति बालाजी के दर्शन किये जाये। रहवर जी जब प्रातः उठे उन्होंने अपना सपना सुनाया। कि जगदीश पाटीदार जी (गायक) आज रात मैंने एक सपना देखा कि गुरुजी कह रहे हैं कि जो मैं हूँ वही बालाजी हैं। और जो बालाजी है वही मैं हूँ। उन्होंने पूछा इसका मतलब तो उन्होंने कहा कि यदि आप जायेंगे भी तो आज बालाजी के दर्शन नहीं होंगे। पाटीदार जी ने कहा तो आज अवश्य जायेंगे आपकी बात सच निकलती है क्या। क्योंकि वहाँ दर्शन तो रोज ही होते हैं। प्रातः बहुत जल्दी जाना था क्योंकि साढ़े आठ बजे उनका कार्यक्रम था। मदुरा शक्तिपीठ की गाड़ीमें वे गये और जैसे ही वे पहुँचे कि बोर्ड में लिखा हुआ था कि आज ९ बजे तक दर्शन नहीं होंगे। टोली घूमकर वापस आ गई।

हैदराबाद के प्रमुख कार्यकर्ता जिनके यहाँ शान्तिकुँज की टोली ठहरती है है हीरसिंह जी विजयवाड़ा कार्यक्रम में आये हुये थे। श्री चेतराम रहवर जी का भाषण चल रहा था उन्होंने स्वयं मुझसे कहा कि मैं उनका भाषण सुन रहा था और ५मिनिट तक स्पष्ट रूप से मैंने गुरुजीकी वाणी सुनी। उसके आगे पीछे रहवर जी के ही शब्द थे।

२७ जनवरी १९९९ को मैंने श्री शिवप्रसाद मिश्रा जी का इंटरव्यू लिया जो इस प्रकार है। शिवप्रसाद जी बतलाते हैं कि मेरे पिताजी एक साधारण लायब्रेनियन थे। सन् १९५७ में मैंने पहली बार अखण्ड ज्योति और गुरुजी का कुछ साहित्य पढ़ा यद्यपि मुझे पढ़ने का बहुत शौक था प्रेमचंद, शरद चट्टोपाध्याय की बहुत सारी किताबें मुझे पढ़ने का शौक रहा पर गुरुजी के लेखों में कुछ अलग ही रस और प्रभाव था मुझे लगा कि इनके सारे लेख मानव कल्याण के लिये हैं। इन्हीं को मैं अपना गुरु बनाऊंगा। अखण्ड ज्योति के एक पेराग्राफ में यह लिखा था कि आपकी कोई भी समस्या आर्थिक पारिवारिक हो आप लेखक से सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं। चूंकि मैं एक गरीब परिवार का ही था मैंने अपनी समस्या लिख भेजी। उत्तर में एक कार्ड मिला कि समय पर तुम्हारी सारी समस्यायें दूर होंगी और तुमको इस संस्था के लिये असाधारण काम करना है। ,

मेरी पहली समस्या थी मेरी बड़ी बहिन की शादी। और उसके कोई इंतजाम की सम्भावना न थी। मैं इतना परेशान हुआ कि एक दिन मैंने निश्चय किया कि मैं जंगल में तब तक चलता रहूँगा तब तक कोई शेर बाघ मुझे न खा जाये। जिस जंगल में गया वहाँ सचमुच शेर बाघ रहते थे मैं चलता गया। पहाड़ के दूसरी तरफ मैंने बहुत से घृतकुमारी यानीमीठा ग्वारपाठा के पेड़ देखे मैंने आत्महत्या का इरादा छोड़ दिया और पटना के आयुर्वेदिक भवन से सम्पर्क स्थापित किया उन्होंने घृतकुमारी लेना स्वीकार किया पर दाम मुझे आठ आने किलोग्राम बतलाये। मेरे लिये यह भी बहुत था और मैं बेलगाड़ियॉ भरकर घृतकुमारी भरकर ले आया जिसमें मुझे ठीक १० हजार रुपया का फायदा हुआ और बहिन की शादी अच्छी तरह से निपट गयी।

हमारे बड़े भाई हिण्डोनको यानी बिड़ला कंपनी में काम करते थे। उनसे एक बड़ी गलती हो गई जो ट्रक लोड किया जाता था उसमें साधारणतः जितना सामान आताा था दाब-दाब कर भरने पर करीबन २५ प्रतिशत उसे ज्यादा भर लिया गया।

यह सलाह मुझे मैनेजर ने ही दी थी मैंने तो सिर्फ उनकी आज्ञा का पालान किया और लाभ हम दोनों ने आधा-आधा ले लिया। पर भाई की बेईमानी पकड़ी गयी बड़ी मुश्किल से रांची में जाकर बड़े भाई की बेल कराई और उस मैंनेजर ने पुलिस इंस्पेक्टर को तीन हजार देकर मुझे ही फसाना चाहा बेल के लिये कोई तैयार नहीं था हम गुरुजी को पत्र लिखते रहे एक अति घनिष्ठ व्यक्ति के पास गये उसने भी यह कहकर मना कर दिया हमारी सरकारी नौकरी है तबादला हो सकता है। केवल गुरुजी को याद करके कोर्ट में पहुँच गये। जिस व्यक्ति ने मना किया था उसके पास ही एक आदमी बैठा था जाने क्यों उसे मेरा बड़ा भाई बेकसूर लगा और बिना कुछ कहे बोले वह ११ बजे कोर्ट में पहुँच गया और ५० हजार रुपये के बेल के कागज प्रस्तुत कर दिये। गुरुजी ने पत्र में लिखा था अबकी तो हम रक्षा करते है पर आगे मत करना। केस भी समाप्त हो गया।

मिश्रा जी कहते हैं मैं गुरुजी को कई शरीर में विभिन्न प्रोग्राम में सम्मिलित होनेका साक्षी हूँ। १२ जनवरी सन् १९७० टाटा में हजार कुण्डीय यज्ञ के बाद हमने अपने यहाँ ९ कुण्डीय यज्ञ में गुरुजी को बुलाना चाहा। पर कोई सम्भावना प्रतीत नहीं हुई। पर अचानक रात ४ बजे मैंने एक सपना देखा। गुरुजी मुझसे कह रहे हैं कि बसन्त पंचमी में यज्ञ मत रखो १२ तारीख को मैं आऊंगा। मैंने सपने में एक एक्सप्रेस डिलेवरी का पत्र भी बिल्कुलठीक से पढ़ा जो पण्डित लीलापत शर्मा का लिखा हुआ था जिसमें गुरुजी की व्यवस्था और कार्यक्रम की विस्तृत जानकारीथी। मैंने गुरुजी को प्रणाम किया आँख खुली मैंने स्पष्ट रूप से जाग्रत स्थिति में गुरुजी को बाहर निकलते देखा तभी श्रीमती जी को जगाया तो वे बोली कि तुम्हारे दिमाग में यज्ञ छाया हुआ है पण्डित जी का पत्र मैंने जगने के बाद दूसरी छपकी में देखा था सबों को आश्चर्य था कि तैयारी कैसे करेंगे पर उसी दिन सचमुच वैसा ही पत्र पण्डित जी का एक्सप्रेस डिलेवरी प्राप्त हो गया।

सन् १९७१ में गुरुजी की विदाई के एक महीने पहिले मैं पहुँच गया। मुझको और केशव खंडेलवाल सतना को दिखाकर पण्डित जी वीरेश्वर जी, पण्डित जी और गिरजाशंकर व्यास को दिखाकर कहा कि इन दोनों की व्यापार बुद्धि है इसलिये व्यवस्था की बड़ी जिम्मेवारी इनको सौंपना और मुझे कई धर्मशाला व निवास व्यवस्था का कार्य सौंप दिया गया।

मैं नियमित प्रातः गुरुजी को प्रणाम करता था मेरे साथ अक्सर रमेश चंद्र शुक्ला जी रहते थे एक दिन मैं यज्ञ में बैठ गया और बहुत तेजी से गुरुजी को याद कर रहा था क्योंकि मैं प्रणाम नहीं कर पाया था। यज्ञ से मैं उठ भी नहीं सकता था मैं बहुत अधिक व्याकुल था क्या करूं और गुरुजीकी बहुत याद कर रहा था इतनी भीड़ में गुरुजी के पास पहुँचना भी मुश्किल था पर जैसे ही पालाी समाप्त हुई मैं उठा और उठते ही दा तीन व्यक्तियों ने कहा कि बाक्साइड वाले मिश्रा तुम्ही हो गुरुजी याद कर रहे हैं। मैं दौड़ते-दौड़ते पहुॅंचा गुरुजी बोले तू कैसे आया मैंने कहा आपने बुलाया गुरुजी बोले मैं बुला रहा था कि तू बुला रहा था। मैंने कहा गुरुजी मैं समझा नहीं गुरुजी बोले देख बिना कारण तू कभी मुझे याद नहीं करना। कोई खास काम में ही ऐसे याद किया जाता है क्या काम था। वे बोले गुरुजी चरण स्र्प्श करना था तो करले और जा।

गुरुजी ने लीलापत जी से कहा महासमुन्द यज्ञ में कि इस लड़के को ड्राफ्ट और पैसा सम्भला दो। यह सब ठीक से काम कर लेगा। गुरुजी ने मेरी तरफ देखा और बोले तू कब तक बिड़ला का भला करता रहेगा। मेरे बड़े भाई साथ थे बोले गुरुजी मैं आपकी सेवा के लिये आ जाऊ गुरुजी ने कहा नहीं तेरे बच्चे हैं मुझे इसकी आवश्यकता है इससे मैं सारे संसार में यज्ञ कराऊंगा। पण्डित जी ने यह बात सुन ली और इसके बाद पण्डित जी के सीधे तार आते थे कि इस तारीख से इस तारीख तक शिवप्रसाद मिश्रा यज्ञ करायेंगे।

मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मेरी मानसिक आपसे अब ऐसी बन्ध गयी है कि बिना आपका काम किये रह नहीं सकता। आप चाहे मुझे जहाँ रख लीजिये मथुरा, जसीडीह, या आपके पास। गुरुजी ने कहा तू मेरे रिजर्व फोर्स का सैनिक है शान्तिकुँज आ जा। तू सिखाने वाले को सिखाना उसके बाद लगातार मैं कार्यक्रम में जाता रहा।

गुरुजी मनोवैज्ञानिक ढंग से समस्याओं का समाधान भी करते थे। आगरे का एक तेल मिल का मालिक आया। गुरुजी के पास उसका मुनीम भाग गया था और उसने इन्कम टैक्स आफीसर को सारी जानकारियाँ दे दी। कैस चला १० लाख रुपये जुर्माना हो गया। यह सेठ मुझसे मिला और बोला कि मेरा खाना पीना छूट गया है मैं दो महीने से सोया नहीं गुरुजी के विषय में हमने सुना है क्या सचमुच यह सिद्ध पुरुष हैं तुम मुझे मिला सकते हो मैंने मिला दिया। सेठ गुरुजी से बोला कि ऐसे तो आप अन्तर्यामी है पर मेरा कष्ट बहुत बड़ा है गुरुजी बोले कि जब तू मुझे अन्तर्यामी मानता है तो मैं तेरी समस्या दूर कर दूँगा तू माताजी के पास जाकर खाना खा और सो वह सारे दिन सोया सारी रात सोया और ११ बजे जब मैंने उसे जाकर उठाया उसके पहले वह खर्राटे भर रहा था। वह खाना पीना खाकर गुरुजी के पास गया गुरुजी ने फिर उसे विश्वास दिलाया मैं तेरी समस्या हल कर दूँगा और आज फिर खाना खाकर सो। मैं भी उस सेठ के पीछे लगा रहा देखें क्या होता है। तीसरे दिन गुरुजी ने कहा अब तू पूरी बात बतला। क्या था क्या हुआ तूने क्या किया क्या हो सकता है तेरी क्या क्या प्रापर्टी है उसने बतलाया मेरी तीन मिले हैं और भी कुछ मकान हैं लगभग ५० लाख रुपये की जायजाद होगी। गुरुजी ने कहा तेरा खर्चा कितना है। सेठ ने कहा लगभग तीन हजार रुपया महीना गुरुजी ने कहा पचास में से १० गये चालीस लाख बचे उसका तो ब्याज भी ज्यादा होता है सेठ बोला गुरुजी यह तो आपने हिसाब बतला दिया मेरा क्या होगा। गुरु जी ने कहा सुनतो उसका भी इंतजाम कर दू मैंने जब कहा है तो तू क्यों चिन्ता करता है। अच्छा बचा इनकम टेक्स का सबसे बड़ा अफसर कहाँ रहता है। बोला कलकत्ते में गुरुजी बोले तू उससे जाकर मिल ले और स्पष्ट रूप से कह दे मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ तेरा काम हो जायेगा। उन दिनों एम्बेसडर कार की कीमत २५ हजार रुपये थी बाद में सेठ आकर मिला तो उसने कहा कि मेरा केस पूरी तरह खारिज हो गया मैंने एक गाड़ी उपहार में उसे दी।

मैंने गुरुजी से पूंछा गुरुजी आप हमारे पिता है मेरा छोटा सा व्यापार है यदि पूरा सेलटैक्स देता हूँ तो मैं भूखा मर जाऊगा फिर भी अफसर परेशान ही करते रहेंगे और नहीं देता हूँ तो बेईमानी है। गुरुजी ने कहा यह चोरों की दुनिया है इसमें बीस परसेंट तक आपत्ति धर्म के रूप में निभाया जा सकता है मैंने कहा गुरुजी ये तो गलत होगा जो लोग बाग आपकी संस्था को पैसा देते हैं ज्यादातर उसमें वे लोगबाग हैं जो दो नंबर का पैसा कमाते हैं। और इस दो नंबर पैसे से युगनिर्माण कैसे होगा। गुरुजी बोले अच्छा तू बता ईमानदारी का पैसा किसका है। एक मजदूर का जो आठ घण्टे काम करता है और उसको मुश्किल से आठ दस रुपये मिलते हैं और इस दस रुपये में से वह ५ रुपये की शराब पी जाता है। यह पाँच रुपये ईमानदारी के हैं कि बेईमानाी के। बेटे ईमानदारी और बेईमानी नीयत पर निर्भर करती है। अगर यदि वह कभी आपत्ति धर्म के रूप में हो जाये तो उसका सदुपयोग उसे एक नंबर का बना देता है पर यदि ईमानदारी का या बैईमानी का पैसा व्यसन में या गलत उपयोग होता है तो वह दो नंबर का है। जो भी पैसा इस संस्था में आता है जब तक यह संस्था उसका सदुपयोग करेगी वह सब पैसा केवल एक नंबर ही होगा और उसका सब पैसा ईमानदारी के खाते में जायेगा। मेरे पास आया हुआ सब पैसा एक नंबर का है।

गुरुजी ने एक दिन मुझसे कान में कहा देख मनुष्य की तकदीर की एक सीमा है। तू भी अपनी तकदीर के हिसाब से ही पैसा कमाता है यदि तकदीर से ज्यादा चाहता है भगवान से पार्टनरसिप करले। युग निर्माण योजना भगवान की योजना है इसमें यदि थोड़ा भी पैसा लगायेगा भगवान की असीम किस्मत का भी तू शेयर होल्डर हो जायेगा।

गुरुजी ने एक महत्त्वपूर्ण कही और सन्तों में और मुझमें एक फर्क है न मैं धोबी हूँ और न मैं तुझे गधा बनाना चाहता हूँ मैं तो केवल भगवान के खाते से देता हूँ और युग निर्माण के कार्य में लगाकर वसूल लेता हूँ।

मैंने शिवप्रसाद जी से पूंछा कि आप लगभग १० वर्ष तक लोगों को गुरुजी से मिलाते रहे। और उनकी समस्यायें तथा गुरुजी से हुई बातचीत के विषय में आपको जानकारी होगी। थोड़ा प्रकाशा डालेंगे। मिश्रा जी ने कहा कि प्राण प्रत्यावर्तन शिविर के समय ऐसा कोई पाप नहीं है जो हम पेपर में पढ़ते हैं कही भी सुनते है लोगों ने अपने दोष दुुर्गुण गुरुजी के सामने प्रकट न किये हों किसी बड़ी गलती पर पहले तो खूब नाराज होते थे और फिर बड़ा वैज्ञानिक प्रायश्चित बताते थे जैसे जितना बड़ा गड्डा खोदा है उतनी ही मिट्टी लाकर भरना होगा। जितना किसी को नुकसान पहुँचाया है शारीरिक मानसिक या नैतिक उससे अधिक लाभ पहुँचाना होगा। भारतीय संस्कृति में अंग्रेजी के सोरी शब्द का कहीं उपयोग नहीं है वहाँ केवल प्राश्श्चित है और प्रायश्चित दिये हुये कष्ट, पहुॅचायी हुई हानि से अधिक कड़ा प्रायश्चित और सेवा से ही सम्भव है। मिश्रा जी कहते हैं कि रामसुभग सिंह नाम का एक डाकू था जो बैगेन ब्रेकर के नाम से प्रसिद्ध था यानी रेल के बैगन ही लूट कर ले जाता था और अपनी कमर में दो पिस्तौल रखता था गुरुजी के मिलने के बाद उसने हावड़ा में १०८ कुण्डीय यज्ञ कराया तथा कितनी ही अखण्ड ज्योति के सदस्य केवल धौस के बलबूते पर बनाये। उसने डाका डालना छोड़ दिया और सुधर गया।

गुरुजी से यदि कहता कि मैं आपसे क्या कहूँ आप सब जानते हैं तो गुरुजी कहते कि मैं यदि तेरे अन्दर देखूंगा तो मुझे बहुत कुछ दिख जायेगा इसलिये तू वही बता जिसका समाधान तू चाहता है।

कम से कम ३०, ४० बच्चे गुरुजी ने केवल गयी स्थिति में देखकर अपना लिये और उन्हें तब तक अपनी संरक्षण में रखा जब तक वे अपने पैरों पर खड़े नहीं हो गये। एक दिन गुरुजी के ऊपर वाले कमरे में शान्तिकुँज में एक सुनील नाम का बच्चा पुताई कर रहा था। उम्र होगी ११, १२ साल गुरुजी ने उससे पूछा पड़ता क्यों नहीं। बोला मेरे न पिता है न माँ। खाऊँगा क्या। गुरुजी ने तभी उस बच्चे को ब्रह्मवर्चस को सौप दिया जहाँ वह पढ़ा लिखा काम सीखा और आज दिल्ली में एक अच्छा कारीगर है।

एक दिन गुरुजी ने कहा यदि कोई व्यक्ति कहे कि गुरुजी से बड़ा विद्वान कोई है तो एक बार मान लेना बड़ा साधक और तपस्वी भी हो सकता है और अच्छा लेखक भी हो सकता है पर यह कभी मत मानना कि तुम्हारे गुरुजी से ज्यदा प्यार भी कोई कर सकता है। मिश्रा जी कहते है कि गुरुजी जब कभी मुझे डाट लगाते थे और ऐसे मौके आया ही करते थे तो कहते थे कि तुझे यहाँ आये २० साल हो गये तू बैल की तरह काम करता है घोड़े की तरह दौड़ता है लेकिन बस कड़वा बोल लेता है। पर तू यह नहीं जानता कि शिवप्रसाद मिश्रा कड़ा नहीं बोल रहा मिशन कड़ा बोल रहा। गुरुजी कड़ा बोल रहे हैं। तू मिशन की प्रतिष्ठा को गिराता है। गुरुजी पहले पंद्रह प्रशंसा करते थे और तब एक बुराई गिनाते थे जैसे दाल में नमक। बुराई हजम तो होती थी पर पैर के नाीचे से जमीन खिसक जाती थी।

एक बार आनन्द स्वामी व्यास आश्रम में ठहरे हुये थे। मैं उनसे मिलने गया। वे बोले मैं गुरुजी से मिलने जाऊंगा मेरी पीठ पर दो थाप लगाई और बड़े खुश होकर बोले तू क्या चाहता है मैंने कहा आप मेरे प्रश्रों का जवाब देंगे। मैंने कहा पूज्य गुरुदेव कौन हैं। वे बोले मेरी नंगी आँखों से वे एक लेखक एक पत्रकार सिद्ध साधक सन्त हैं मैंने कहा मैं आपको एक सन्त मानता हूँ बोले क्यों क्योंकि आपको देखकर प्रसन्नता होती है और मैं यह चाहता हूँ कि आप यह बतायें कि एक सन्त की दृष्टि में हमारे गुरुजी क्या हैं। वे बोले तो सुन मैं जिसे तू सन्त मानता है उनके चरणों की धूल का एक कण के बराबरभी नहीं हूँ। और गुरुजी वे हैं जिसे मैं २४ घण्टे अपने हृदय में धारण करता हूँ। फिर उन्होंने एक कहानी सुनाई मैं हिमालय गया और ऊपर चलता ही चला गया। वहाँ के लोगों ने कहा कि आगे गया आदमी कभी जीवित नहीं लौटता है। मानसरोवर को यही से प्रणाम कर लो। मैंने कहा नहीं मैं चलता गया और जब मानसरोवर के पास ध्यान में बैठा तो मैंने ऊँ की आवाज सुनी ऊँ का ध्यान कर रहा था और मेरे सामने आचार्य जी स्पष्ट रूप से मौजूद थे और तुम्ही समझ लो वे कौन है आगे वे बोले मेरे बच्चो मेरे बच्चों मेरे कोढ़ियों पहचानों आचार्य जी कौन हैं पहचानो। मैंने दूसरा प्रश्र किया आध्यात्म क्या है। उन्होंने कहा आध्यात्म है आपन हाथ जगन्नाथ। मैंने पूंछा क्या मतलब मुझे समझ में नहीं आया। उन्होंने कहा अपना कल्याण अपने ही हाथ है। अपने को जानो अपने को शान्त रखो अपने गुण कर्म स्वभाव का शोधन करो अपना आत्मविश्वास बढ़ाओ बा वही अध्यात्म है जितना ही यह कर पाओंगे उतना ही आध्यात्मिक होगे।

देवकन्या आदर्श का सम्बन्ध ढूढ़ने के लिये गुरुजी ने मुझे भेजा मैंने लड़का देख लिया लेकिन आदर्श औरा उसकी सहेलिया आपस में बात करने लगी कि डिप्लोमा इंजीनियर क्या होता है यह तो हायर सेकेण्डरी के बराबर है। गुरुजी को खबर हो गई मुझे बुलाया और कहा कि जा लड़की शादी नहीं करेगी मना करदे। ठीक एक साल बाद मुझे फिर बुलाया और कहा कि वहीं फिर जा औरा उस लड़के से शादी की बात कर मेरी हालत खराब वहाँ बेहिसाब गाली सुननी पड़ेगी पर गुरुजी की आज्ञा मैं डरतेडरते गया चार बजे शाम को वहाँ पहुँचा एम एल वर्मा जी की पत्नी पद्मा ने दरवाजा खोला और बहुत हँसते हुये बड़े स्वागत के साथ मुझे बिठाया कि मैं तो सबेरे से ही आपकी प्रतीक्षा कर रही थी बोली क्यों मैंने तो कोई सूचना नहीं दी। वे बोली कि रात मुझे सपने में गुरुजी आये और उनके साथ आप भी थे और यह कहा कि पद्मा तू अपनी छोटी भाई की शादी आदर्श से कर देना मैं पत्र देकर शिवप्रसाद को भेज रहा हूँ और शादी पक्की हो गई।

बलराम जी वीरेश्वर जी और मैं एक शिविर में आये थे गुरुजी मुझसे बोले देख इस शिविर में देवकन्या सविता और कीर्ति की शादी कराना है यदि इस शिविर में शादी नहीं हुई तो फिर कभी शादी नहीं होगी। मैंने पूरा शिविर छान डाला कोई लड़का ही नहीं मिला लेकिन सोचता रहा गुरुजी ने कहा होगा जरूर लड़का नहीं है तो उसका बाप होगा। और मुझे एक पिता मिल गया जिसका एक होनहार लड़का था शिविर का अन्त हो रहा था और उस पिता को लेकर मैं गुरुजी के पास जा रहा था अखण्ड दीपक पर प्रणाम कर रहा था और घुस ही रहा था कि इतने में मैंने पूछा कि जिस लड़के की शादी आप कर रहे हैं उसका कोई छोटा भाई भी है उन्होंने कहा हाँ तो मैंने कहा एक और लड़की है जो उससे अधिक सुंदर और गृहिणी होगी। और गुरुजी के पास पहुँचते पहुँचते पिताजी को तिलक किया और दोनों लड़कियों की शादी पक्की हो गई। और वे प्रसन्न है।

सन्तोष महतो वर्तमान में जीजी वा डाक्टर साहब से शान्तिकुँज के आगन्तुकों मिलाने का कार्य मैंने उनका इंटरव्यू आज २९जनवरी ९९ को लिया वे कहते हैं कि मेरे माता पिता अखण्ड ज्योति व गायत्री साहित्य पढ़ा करते थे। वहीं पर श्री जगन्नाथ वासने अखण्ड ज्योति कार्यकर्ता थे और वे शान्तिकुँज हरिद्वार की जानकारी दिया करते थे मुझे न धर्म मे विश्वास था और न ही साधू सन्यासी में मैं चाकुलिया ग्राम के होस्ष्टल में रहता था और विभिन्न प्रकार के दुर्व्यसनों में फंसता जा रहा था मुझे नाबेल पढ़ने का बहुत शोक था और हर प्रकार के नाबेल पढ़ा करता था नशा भी करता था। सन् १९७२ के एक चौबीस कुण्डीय यज्ञ मैंने जमशेदपुर में देखा। और दीक्षा लेने के लिये मुझे कहा पर मेरा मानस नहीं बना। ३१ दिसम्बर १९७८ को मैंने दीक्षा ली। हमारी जाति के लोगों को कभी जनेऊ नहीं दिया जाता था और दीक्षा का सवाल ही नहीं। मुझे यह संस्था अच्छी लगी। एक और बात दक्षिणा याने पैसा देना भी मैं समझता था पर यहाँ तो बुराइयों की दक्षिणा दी जाती थी। मुझे बड़ी प्रेरणा मिली और शराब गाँजा मछली छोड़ दिया। मैं लगभग ७००, ८०० नाबेल पढ़ चुका और हफ्ते में कम से कम ३ सिनेमा तो देखता ही था। सन् १९८२ में मैंने अन्तिम सिनेमा ३६ पिक्चर आफ सोलोमन देखी। सन्१९७९ में मैं पहली बार शान्तिकुँज आया होस्टल में मेरे साथी कहते थे कि ९०० चूहे मार बिल्ली हज को चली। सन्१९८३ में कालेज के जीवन में मैं फिर से बुरी संगत में फंस गया। और डाक्टर रामनरेश सिंह जो कि गुजरात के डॉ० राजेन्द्र जी के भाई हैं की प्रेरणा से एक माह के शिविर में आया और इसके बाद एक साल का समय दान दिया। मैंने सपने में देखा कि मेरे दादी माँ को यमदूत ले जा रहे हैं पर पिताजी जो गायत्री उपासक थे सचमुच उनके जप से दादी माँ डाक्टर द्वारा मृत्यु घोषित के बाद फिर जीवित हो गई। मैं यू०पी०बिहार छै महीने टोलियों में गया। पिताजी ने घर पहुँचने पर मुझे भौतिक जीवन और व्यापार में लगाने की बहुत कोशिश की ट्रक खरीद दिया लकड़ी का बिजनेस लगा दिया गाय खरीद दी पर मैं पिता जी से बिना मिले और कहे भाग आया। मेरी तीन बहने भी थीं। मैंने नमक छोड़ा और अखण्ड ज्योति के और युगनिर्माण के १००, १०० सदस्य बनाये। मुजफ्फर नगर के दीप यज्ञ ने मुझे बहुत प्रभावित किया और ढपली लेकर सड़क-सड़क पर प्रज्ञा गीत गाने लगा। अब मैँ पूर्ण जीवनदानी हो गया हूँ और मेरा जीवन बदल गया है। यह सब गुरुजी माताजी का आशीर्वाद ही मानता हूँ।

डॉ०अशोक तिवारी का इंटरव्यू मैंने आज दिनाँक २८ जनवरी को लिया वे कहते हैं कि मैं अपने विद्यार्थी जीवन में बहुत उद्दण्ड व्यक्ति था। यद्यपि मैं बहुत कमजोर पैदा हुआ था और कम उम्र में मेरी माताजी का देहान्त हो गया। मुझे जिगर की बीमारी हो गयी और जैसे ही मैंने होश सम्भाला मैं बहुत कशरत करता रहा और मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा हो गया। शिकार का मुझे बहुत शोक था और बदखें लगभग रोज मारा करता था। अपनी बन्दूख से जमीन पर खड़े होकर मैंने ७ शेर अकेले मारे हैं। रात रहते मरघट पर एक मुसलमान दोस्त के साथ व्यायाम करना मेरा एक नित्य का नियम था। मरघट पर ही सो जाया करता था। मेरी मुलाकात एक किन्नर से भी हुई। जो मेरे मुसलमान साथी से परिचित थे। पर जब एक पच्चीस कुण्डीय यज्ञ लखनादौन में हुआ तो मुझे अक्षत फूल देकर गायत्री का संकल्प कराया छै माह तक मेरी जवान गायत्री मंत्र के लिये पलटती ही नहीं थी। पिताजी ने मुझे जो दवाई की दुकान सौपी थी पहले दिन मुझे याद है कुल आठ आने बिक्री हुई और हमारा जीवन बड़ी मुसीबत से ही चलता था। पर मैंने एक आश्चर्य देखा कि जब मैँ दुकान पर बैठता था तो बिक्री कम होती थी और हवन के लिये बाहर जाता था औरकम समय दुकान पर बैठता था तो बिक्री ज्यादा होती थी। मुझे एक यज्ञ कराने की जिम्मेदारी सौपी मेरे पास खुद का कोई पैसा नहीं था। पर मुझे जो करना सो करना। मैने तेदूपत्ते बेचने वालों से कहा कि तुम इसमें कुछ और भी रखदो पर तुम हर मुंशी को मुझे १०० रुपये देने पड़ेंगे तुम्हारी जो चेकिंग करता है उसको मैं ठीक कर दूंगा यदि उसने तुमको परेशान किया। जंगल में कही जाकर पेड़ के पेड़ काट के अकेला ही ट्रक पर चढ़ा देता था।

एक यज्ञ में एक बसोड़ की लड़की शायद कुछ चोरी करने आयी थी बिजली से चिपक कर रह गयी। उसको किसी तरह छुड़ाया और मैने उसे चार चपत जमाई लोग बोले क्या पीट रहे हो उसको वह तो मर गयी। तब मैं बहुत घबराया लेकिन फिर पानी छिड़का तो वह गुरुजी की कृपा से वह होश में आ गई और मैने उसे भगा दिया।

लखनादौन में शक्तिपीठ उद्घाटन के लिये गुरुजी आये थे और मुझे डाक्टर इंजीनियर व्यापारियों का बड़ा सहयोग मिला। मुझे जिसकी मदद करनी होती मैं मदद करता फिर उसके लिये कितना भी गलत काम मुझे क्यों न करना पड़े। यदि मैं पूरी तरह शान्तिकुँज न आया होता तो या तो मैं किसी जेल के कटघरे में बन्द होता या बागी बनकर कुछ लोगों को मारकर डाकू बन गया होता।

दिनॉंक २८ जनवरी को मैंने प्रताप शास्त्री जी का इंटरव्यू लिया वे बोले कि मेरे बड़े भाई मुझसे बहुत परेशान थे और मैं बहुत उद्दण्ड होता जा रहा था उन्होंने सोचा हम तो इसको नहीं सुधार सकते इसे किसी तरह युग निर्माण योजना मथुरा में भर्ती कराया जाये मुझे १९६९ में मथुरा भेज दिया गया। गुरुजी माताजी से मेरी बातचीत हुई और उनको बिल्कुल साधारण कपड़ों को देखकर मुझे पहला झटका लगा। इतना बड़ा आदमी और इतना साधारण। अवश्य ही ये और इनका कार्य असाधारण होगा। वीरेश्वर उपाध्याय जी ने बताया कि तुम एक वर्ष जीवन जीने की कला की शिक्षा ले लो। मेरे बड़े-बड़े बाल थे और वैसा ही जीवन था क्योंकि गुरुजी मुझे अच्छे लगे इसलिये मैंने कहा अच्छा लेकिन मेरी दो शर्ते हैं। यह शर्त मैंने गुरुजी के पास जाकर रखीं १- मैँ मन्दिर में पूजा नहीं करूंगा २- मैँ आपके पीले कपड़े नहीं पहनूगा। गुरुजी ने शर्ते स्वीकार करली। गुरुजी ने पूछा तुझे संगीत आता है। मैंने कहा नहीं। गुरुजी ने कहा के०डी०शर्मा यहाँ आये हुये हैं उनसे तुम थोड़ा बहुत संगीत सीखों। उन्होने एक वर्ष में मुझे काफी सिखा दिया। रोज प्रवचन सुनता था गुरुजी का विदाई भाषण होने को था मैं रोने लगा। गुरुजी के पास गया बोला गुरुजी आप मुझे आँवलखेड़ा मथुरा कहीं भी रखें मैं आपको छोड़कर नहीं जा सकता। गुरुजी बोले तेरी बिदाई नहीं करेंगे। मैं बहुत खुश हुआ। जिस समय मैं आया मेरी उम्र १३ वर्ष की थी। सन् १९७३ तक मैं श्रमदान का काम करता रहा। एक दिन मैं जब नाली साफ कर रहा था तो गुरुजी ने ऊपर से देख लिया और मुझे बुलाया। पूछने लगे तू क्या करता है। मैंने कहा गुरुजी मथुरा में आपने मुझे संगीत सिखवाया था गुरुजी को याद आ गया और मुझसे कहा कि तू हरिद्वार जा और किसी ढपली वाले को ढूढ़ ला। मैंने कहा हरिद्वार मैं कहाँ ढूढ़ूगा पर गुरुजी की आज्ञा थी मैं गया घूमते घूमते थक गया और हर की पेढ़ी पर सो गया। जब मेरी आँख खुली तो एक आदमी ढपली बजा रहा था। मैंने कहा ढपली बेचोगे उसने कहा नहीं ढपली थोड़े बेचता हूँ मैंने कहा अच्छा तो एक गाना सुनादो में पाँच रुपये दूंगा। उसने गाना सुनाया। उसने ढपली पर कहरवा बजाया मैंने उससे कहा इस गाने को एक बार और बजा। मैं उसकी उंगलियों की चाल पकड़ना चाहता था पाँच रुपये और दिये और शान्तिकुँज आयाा। दिन भर प्रेक्टिस करता रहा। अभी कुछ सीखा ही नहीं था कि गुरुजी ने बुलवाया। मेरे घर से निकलने की कहानी यह है कि मैं एक एक कपड़े बनियान जांघिया धोती दोस्त के यहाँ रखता रहा और लेकर भाग आया था। भैया का बहुत गालाी भरा पत्र आया मैने गुरुजी को बतलाया। गुरुजी ने कहा उसको बकने दे। तू एक चिट्टी लिख दे मैंने भैया को पत्र लिखा कि समाज ने अपने लिये क्या किया और अपने ने क्या किया। आप यहाँ आ जाइये मैं घर लौट आऊगा पत्र का कोई जवाब नहीं आया। ऐसे ही मैं संघ में जाया करता था रज्जू भैया ने कहा तुम संघ में काम करो तुमको देश भक्ति के गीत गाना है मैंने उनको कह दिया जहाँ से मैने दीक्षा ली है उनकी आज्ञा के बिना मैं कुछ नहीं करूंगा। गुरुजी ने मुझसे कहा कि आदर्श और गायत्री से तुम संगीत सीखो। एक माह बाद वे बोली कि भैया आपको तो हमसे ज्यादा आता है। एक दिन गुरुजी ने ढपली सुनी और बहुत खुश हुये बोले हरिद्वार में जितनी ढपली मिले खरीद लाओ और वीरेश्वर जी को बुलाकर कहा एक संगीत का शिविर लगाओ। उन दिनों संगीत में केवल एक हारमोनियम और एक नाल था और तीन लोग सीख रहे थे भाष्कर, राजेन्द्र एवं उपेन्द्र मिश्र बाराबंकी गुरुजी ने एक दिन बुलाकर कहा कि माताजी के गीत की धुन बना। मैं घबरा गया मैने हाथ जोड़ा गुरुजी ने कहा कैसे धुन बनाऊ गुरुजी ने कहा बस ऊगली चलाओ आ जायेगा। पहला गाना जिसको मैंने प्रयास में लाया वह था जिसने मरना सीख लिया जीने का अधिकार उसी को। मैं बड़ी खुशी से गुरुजी के पास अपनी धुन लेकर गया गुरुजी ने सुनकर कहा तू एक कबाड़ी बना लाया। कहना कल ठीक धुन बनाकर ला। तेरह चौदह दिन तक रोज डाँट पड़ती और रोता रोता मैं सीढ़ी से उतरता। पंद्रहवे दिन मैं माताजी के पास गया और बोला माताजी धुन बनाना मेरे वश की बात नहीं। मेरा कलेजा इतना मजबूत नहीं कि अब मैं सीढ़ी चढ़ सकूँ। माताजी खूब हँसी और बोलाी अच्छा गुरुजी के पास तू कल जाना मैं एक गाने की साधारण धुन बनाकर ले गया और सोचने लगा। कि अब डाँट पड़ी अब डाँट पड़ी धुन एक प्रार्थना की थी अचानक गुरुजी बोले वाह यह है धुन। तू पास हो गया। लौट कर मैं फिर माता जी के पास खूब रोया माताजी खूब हँसी और बोली बेटा गुरुजी डाँट के माध्यम से तुझे अनुदान दे रहे थेञ। इसके बाद सचमुच मुझे गुरुजी का यह अनुदान मिला कि अब मैं किसी भी गाने पर अब ५, १० मिनिट प्रयास करता हूँ तो नयी धुन आ जाती है। ढपली में मेरी धुन जो गुरुजी ने पहली बार सुनी वह थी माँ तेरे चरणों में और एक तारीख से ६०० व्यक्तियों का एक संगीत शिविर लगवाया।

एक और घटना मेरे दूसरे नंबर के भाई को टिटानिस हो गया। कहते है इस बीमारी में कोई बचता नहीं है उनको बालूघर यानी जहाँ लोगबाग मर जाया करते है भेज दिया गया मैं वहीं बस गुरुजी को याद करता रहा और बहुत मन से मैने प्रार्थना की और सचमुच वे ७ दिन में ठीक हो गये। मेरा विश्वास और निष्ठा उसके बाद से बहुत बढ़ गयी। मैं गुरुजी से अन्तिम १९ अप्रैल १९९० को मिला गुरुजी ने जो मुझसे कहा वह इस प्रकार था बेटे हमने जो तुम्हें दिया और जो कुछ भी अब तुम बने हो उसका उपयोग चैतन्य, मीरा, सून की तरह जन जन में फैलाना और इसी को मेरी तुमसे इसकी अपेक्षा है।

दिनॉंक १५-१-९९ को श्री रामेश्वर नैनीवाल जी वर्तमान में आँवलखेड़ा व्यवस्थापक का इंटरव्यू लिया। वे कहते हैं कि मैं खेड़ा राजवारा तीसवाला गाँव वारा का रहने वाला हूँ। मेरे माता पिता धार्मिक संस्कार के थे पर अच्छे खाते पीते घर के होने के कारण मुझमें गलत संस्कार जैसे जुआ शराब की आदत थी। मैं खंडेलवाल छात्रावास कोटा में पढ़ता था। मैं एक उद्दण्ड विद्यार्थीा के नाम से जाना जाता था। रामकृष्ण गोयल मेरे साथी थे और उन्होंने बतलाया कि मथुरा में १००८ कुण्डीय यज्ञ होने वाला है। मुझे पत्रिका दी अच्छी लगी। पर मैंने कहा मैं तो बस हनुमान चालीस और राम राम कर सकता हूँ यह बड़ा मंत्र मेरे बस की बात नहीं है पर वे जब तक पीछे लगे रहे जब तक मैंने संकल्प पत्र नहीं भर दिया। जब मैंने भर दिया तो मैंने कहा अब मैं पूरी भागीदारी करूंगा और मथुरा यज्ञ का यजमान बनूँगा सवा लाख का पुरश्चरण अस्वाद व्रत लेखन सब कुछ किया। कोहिला यज्ञ में मैंने गुरुजी से दीक्षा ली। कंवरपुरा में बाबूलाल शर्मा ने पाँच कुण्डीय यज्ञ कराया जिसमें गुरुजी आये थे। मुझसे कहा कि जनेऊ दीक्षा लो पर मैंने कहा कि हमारे यहाँ तो शादी में होता है। सन् १९६० में गुरुजी और शंभूनाथ कौशिक आये थे। उन दिनों शंभूनाथ कौशिक का बड़ा मान थाा। मैंने उनसे प्रार्थना की कि मेरी शादी में आप यज्ञ कराये वे बोले कि मैं तो बहुत व्यस्त हूँ हाँ आचार्य जी को आप ले जा सकते हो। मैने सोचा यह तो बहुत अच्छा है गुरुजी से प्रार्थना की गुरुजी बोले मैं आ जाऊंगा तेरे पास साधन क्या हैं। मैंन कहा गुरुजी मरकरी फोर्ड गाड़ी है मेरे पिता की बोले अच्छा मैने इसलिये पूंछा कि कोटा गाड़ी मिलानी होगी मथुरा के लिये। मेरे पिताजी को कैंसर हो गया उसी समय कोटा में कोयला वाली की हवेली में यज्ञ में गुरुजी आये थे। गुरुजी मेरे पिताजी से मिलने घर आये। पिताजी ने कहा कि मेरा यह बड़ा बेटा न परिवार में रुचि लेता है और न व्यापार में। बबहुत नुकसान करा दिया। गुरुजी ने कहा आप चिन्ता रहित होकर बंबई इलाज के लिये जायें और मेरे सिर पर हाथ रखते हुये गुरुजी बोले कि इस लड़के की जिम्मेदारी मुझ पर है। यद्यपि तब तक मैं तब तक लगभग डेढ़ लाख रुपये का नुकासान करा चुका था। मैंने कभी गुरुजी से अपने लिये नहीं माँगा मैने कहा गुरुजी मैं आपकी तपस्या अपने भौतिक सुख के लिये क्यों उपयोग करू। गुरुजी बोले हमेशा में तप थोड़े लगाता हूँ सुझाव मार्गदर्शन जैसी बहुत सी चीजें मेरे पास हैं। हमारे यहाँ दो दीवाली मनाई जाती हैं। सन् १९६४ में मैंने पहली दीवाली मना ली दूसरी दीवाली में मैं मथुरा चला गया। घर पर डकैती पड़ गयी वे मेरे चाचा को उठा कर ले गये। मैं गुरुजी के पास गया गुरुजी बोले तू बच गया और तेरे चाचा को भी वो छोड़ देंगे और वही हुआ। एक बार मुझे अपने मित्र के साथ मथुरा शिविर में जाना था। मेरे बच्चे दिनेश को १०३, १०४ बुखार था पर मैं गया जाते ही मैने गुरुजी से कहा मैं बीमार बच्चे को छोड़ आया। गुरुजी बोले वह तो ठीक हो गया है। और सचमुच वह ठीक हो गया था। मेरे छोटे भाई के साथ जब मैं गुरुजी से मिला तो गुरुजी बोले रामेश्वर यह तेरा बड़ा भाई है। और छोटे भाई से बोले घर का काम तू सम्भाल और यह अब से यह तेरे छोटे भाई की तरह कहना मानेगा। राम भरत की तरह तुम काम बाँट लो। रामेश्वर जी सुनाते हैं कि सन्१९७१ में जब गुरुजी रात को १२ बजे शान्तिकुँज से चुपचाप जा रहे थे मैं जगा रहा सोचा हमारे गुरुजी शायद हमेशा के लिये जा रहे हैं डाटेगे तो डाँट लेंगे प्रणाम तो कर ही लूँ मैंने प्रणाम किया और मेरे पीछे उन सबों ने जो जगे थे। एक वर्ष बाद प्राण प्रत्यावर्तन शिविर कल्प साधना आदि में मैं सम्मिलित हुआ।

सन् १९८० में गुरुजी ने मन्दिर वालों से अपील की कि हम आपके मन्दिर में थोड़ा स्थान चाहते है पर कोई नहीं माना तब २४ शक्तिपीठ बनाने का संकल्प लिया और लोगों को तो मानो शक्तिपीठ बनाने का उफान ही आ गया। सान्थोला की शक्तिपीठ बनाने का संकल्प मैंने लिया। गुरुजी मुझसे बोले तू शान्तिकुँज आ जा। मैंने कहा कि शक्तिपीपठ बनवा रहा हूँ गुरुजी बोले तू बना रहा है। मैं बोला नहीं गुरुजी आप बना रहे हैं। अच्छा तो बनवा कर फिर आ जाना।

शान्तिकुँज के एक परिव्राजक का जलूस निकल रहा था। दो पार्टियों में झगड़ा हो गया यह हमारे पारिवारिक लोग ही थे। जिसमें एक व्यक्ति मारा गया। मुझे और मेरे लड़के को आजीवन कारावास हो गया। गोपाल वैद्य ने यह सूचना गुरुजी को दी। गुरुजी ने कहा कि उससे कहना सब ठीक हो जायेगा तथा ब्रह्मवर्चस में नेनीवाल जी के लिये ११ से १२ बजे तक दिन में जप में बैठने के लिये कहा। मुझे (अमलकुमार) याद है गुरुजी ने कहा था कि जप तुम करो काम मैं करूंगा। नैनीवाल जी बोले ठीक उसी समय ११ ओर १२ के बीच में उसी दिन हमारे वकील विनोद शंकर दबे जो आगे हाईकोर्ट जज बन गये जज ने अपने कैबिन में बुलाया और पूछा क्या तुम सबूत कर सकते हो कि तुम्हारे साथी लोगों ने उनको नहीं मारा उन्होंने कहा जी हाँ कैसे उन्होंने कहा कि उनके पार्टी के लोगों में किसी को भी धारदार चोट नहीं है जबकि मेरे मुवक्किल के छोटे भाई की कोहनी तलवार से कटी है यानी सारी वारदात उन्होंने ही की हमारे लोग तो केवल बचाते रहे या प्रतिक्रिया में हाथ पैर चलाये और सचमुच मेडीकल रिपोर्ट में दूसरी पार्टी के किसी भी व्यक्ति को धाारदार हथियार से चोट नहीं थी। कहते है कि यह पहला मौका था जब यह जब जमानत मंजूर करे और खासतौर पर मुख्य अभियुक्त यानी रामेश्वर जी की जमानत की तो किसी को आशा ही नहीं थी सबकी जमानत हुई और बरी भी हो गये।

रामेश्वर जी कहते है कि मैने कहा गुरुजी मेरे बेटे बेटी बहुत बड़े हो गये हैं उनकी शादी होनी है और अभी मुकदमा चल ही रहा है गुरुजी बोले पहले मुकदमा निपट जाने दे फिर एक दिन बुलाया बोले यह लक्ष्मण अग्रवाल है न उसने भी अने बच्चे की शादी मुकदमा चलते ही की थी। मैं चिन्तित हुआ कि मेरे उस लड़के को जिसको आजीवन कारावास है कौन लड़की देगा। पर सचमुच विष्णु मित्तल जी के प्रयास से शान्तिकुँज में ही उनकी लड़की को देखकर लड़के के पिता ने अपनी बहु बनाया। (अग्रवाल परिवार) इसी प्रकार एक लड़की यज्ञ कर रही थी जो खंडेलवाल जी की साली थी एक कार्यकर्ता ने बताया कि जो लड़की यह यज्ञ कर रही है आपके लड़के के उपयुक्त होगी। संजय और सविता जबलपुर गये और बेटे अशोक की शादी न केवल ठीक कर आये गोद भी भर आये। उपाध्याय जी और मिश्रा जी आदि सारे व्यक्ति अशोक को समझाते रहे पर अशोक नहीं मान रहा था। माताजी ने मेरे बेटे अशोक को बुलाया और बोले देख सुन। तेरे लिये लड़की बहुत है और मेरी इस बेटी के लिये लड़के भी बहुत हैं मुझे एक शब्द में जवाब चाहिए हाँ या न। अशोक बोला माताजी हाँ। मैने बैटे से पहले ही कह दिया था कि माताजी की हाँ में तेरा सुख है और तेरी न में दुख आगे तू जान। रामेश्वर जी आगे कहते है कि मुझे प्रज्ञा पुराण स्वाध्याय बहुत लगता है और मेरी मान्यता है कि आगे की मानवता को अच्छे संस्कार इसी से मिलेंगे।

मैंने एक प्रश्र पूछा नैनीवाल जी आपकी समझ में आध्यात्म क्या है वे बोले मेरे जैसी छोटी बुद्धि वाला व्यक्ति आध्यात्म को परिभाषित नहीं कर सकता पर मेरा मानना यह है कि जितनी मनुष्य में अच्छाई बड़े बुराई घटे उतना वह आध्यात्मिक हो रहा है कर्मकाण्ड प्रेरणा है स्मरण पत्र है। चरित्र चिन्तन और व्यवहार जितना सुधरेगा अध्यात्म उतना उठेगा।

वांगमय प्रथम भाग युग दृष्टा का जीवन दर्शन में गुरुजी स्वयं लिखते हैं (४-१२) वैसे यह तथ्य है कि हमने अपनी चेतना के पाँच स्तरों अन्नमय मनोमय प्राणमय विज्ञानमय आनन्दमय इन पाँचों कोषों को गायत्री की उच्चस्तरीय उपासना के आधार पर एक सीमा तक विकसित किया है। और उनसे पाँच स्वतंत्र व्यक्तियों की तरह काम लिया है। फिर भी वह स्थिति उतनी पक्की नहीं कि उसका सदा सार्वजनिक परीक्षण कराकर एक अभिनव सिद्धान्त की पुष्टि काअधार प्रस्तुत किया जा सके। सम्भव है कुछ समय में शायद इसी जीवन में यह स्थिति आ जाये कि हम अपने को संसार के सामने परीक्षण के लिये प्रस्तुत करे कि एक ही शरीर के भीतर पाँच सत्तायें किस प्रकार काम करती रह सकती हैं और एक ही व्यक्ति एक ही समय में पाँच व्यक्तियों का काम कैसे निपटा सकता है। मेरा अपना व्यक्तित्व पाँच अति परिष्कृत जीवन यापन करने वाले व्यक्तियों के समतुल्य रहा है। और वह भी जिसके पास विपुल साधन हों।

दिनॉंक २-१-९९ को श्यामप्रताप सिंह का इंटरव्यू इस प्रकार है। वे कहते हैं कि मैं राजस्थान सरकार में कोआपरेटिव इंस्पेक्टर के पद पर था। जहाँ सन् १९७२ में नरेश चंद्र श्रीवास्तव से मेरा सम्पर्क हुआ। उन्होंने मुझे अखण्ड ज्योति दी तथा गायत्री जप ध्यान के लिये प्रेरित किया। हिण्डौन में मुझे आध्यात्मिक भूख जाग्रतहुर्ह मैं स्वाध्यायी था पर आचार्य जी की पुस्तकें पढ़ने के बाद उसमें न केवल विशेष बल्कि ऐसा लगा कि यह केवल मेरे लिये ही है। मैं इसी आनन्द में मोटर साईकिल में मथुरा पं०लीलापत शर्मा जी से मिलने गया। मेरे नानाजी का गाँव आँवलखेड़ा से केवल २ किलोमीटर दूर था। और मेरा गाँव लगभग १८ कि०मी० मैंने पचास पैसे वाली बहुत सी किताबे खरीदी। अनन्त चतुर्दशी के दिन पत्नि को भी दीक्षा दिलाई जब गुरुजी से मिला तो वह अकेले कमरे में एक अति साधारण व्यक्ति की तरह बैठे थे जाने कौन मुझे प्रेरित कर रहा हो और ऐसा कहने और सुनने के लिये बाध्य कर रहा हो कि इस रूप में आप छिपे बैठे हैं। गुरुजी ने पूछा कैसे आना हुआ मैने कहा आपके दर्शन निमित्त। गुरुजी बोले हाड़माँस के क्या दर्शन करना। मैंने कहा गुरुजी मैंने आपका साहित्य पढ़ा है गुरुजी ने मुझे प्राण प्रत्यावर्तन शिविर में ९६ घण्टे अपने साथ रहने के लिये कहा। उन दिनों गुरुजी काला चस्मा लगाते थे। और अपने भाषण में बोले देखों अब संभलना मैं तुम्हारा प्लग भगवान से जोड़ता हूँ गुरुजी ने मेरे सारे दकियानूसी विचार दिमाग से निकाल दिये। गुरुजी ने कहा कि अब कुछ दूर तुम मेरे साथ कदम मिलाकर चलो। गुरुजी ने मुझे समय दान के लिये भी कहा मैने कहा गुरुजी मैं ठाकुर हूँ दान के पैसे का नहीं खा सकता। गुरुजी बोले मुझे ऐसे ही आदमी की आवश्यकता है। यहीं से मेरी अनुभूतियाँ आरम्भ हुई चूंकि मेरी सर्विस केवल २० साल की थी और सरकार २५ साल में स्वैच्छिक पेंशन देती है। मैं पहला व्यक्ति था जिसके लिये राजस्थान सरकार का निर्देश हुआ कि २०साल में पेंशन दी जायेगी। मुझे उसका लाभ मिला। जमीन के बटवारे के लिये गुरुजी ने कहा और मैं घर पहुँचा तो खरीददार पहले ही मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। मेरी दूसरी चिन्ता मेरे दो लड़के और एक लड़की की थी गुरुजी ने कहा तू मेरा काम कर मैं तेरा काम करूंगा। हमारे ठाकुर परिवारों में बहुत सारे दुर्गुण ऐसे हैं जिन्हें शान मानी जाती है पर मैं बचा रहा मेरे बच्चे बचे रहे यह केवल गुरुकृपा से ही सम्भव हुआ। गुरुजी ने यह भी कहा तेरे बच्चों को एमएससी पीएचडीकरा देगे और दो चार हजार की नौकरी दिला देंगे। उस समय के दो चार हजार आज के ७, ८ हजार हैं और यही वेतन मेरे दोनों बच्चे पा रहे है तथा मेरी कन्या की शादी भी गायत्री परिवार में बहुत अच्छे से हुई। मुझे ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की व्यवस्था का जो काम सौंपा गया जहाँ वैज्ञानिक और बहुत बड़े बड़े व्यक्तित्त्व के लोग आते हैं यह मेरा सौभाग्य है।

गुरुजी ने मुझसे कहा कि तू बस दो काम करना १- अपनी योग्यता बढ़ाना २- समय और पवित्रता की तरफ अपनी नियत को साफ रखना।

मेरी माताजी बहुत वृद्धा भी थीं ओर दो माह से खाना नहीं खा रही थी मैंने कहा माताजी आप जाना चाहती हैं माताजी ने कहा नहीं वह मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी बोले ठीक है मैं देखूंगा और जब एक लम्बे समय बाद सूक्ष्मी करण से गुरुजी बाहर आये तो मुझसे पहला प्रश्र यही किया तेरी माताजी ठीक तो हैं मुझे विश्वास हो गया कि इतने दिनों जीवित और स्वस्थ गुरुजी ने ही रखा। जब जब मुझ पर कोई कठिनाई आती है और मैं बहुत दुखी होकर प्रार्थना करता हूँ तो गुरुजी मेरी सुनते हैं। अन्तिम समय जब मैं डाक्टर दत्ता साहब के साथ गुरुजी से मिला मई १९९० तो गुरुजी ने यही कहा कि काम कितना भी कम करना लेकिन अपनी नियत साफ रखना और एक बात यहाँ बहुत बड़े और ऊँचे व्यक्ति आयेंगे तुम उनका सम्मान तो न कर सकोगे पर कृपया अपमान मत करना उससे भी काम चल जायेगा।

श्री गजाधर सोनी जो आजकल उद्यान विभाग देख रहे हैं कहते हैं कि जिस प्रकार गूंगा स्वाद नहीं बतला सकता उस प्रकार मैं भी गुरुजी का व्यक्तित्व वर्णन नही ंकर सकता। मैं भिलाई में सेक्टर ४ ९क क्वाटर नं ११ बी में रहता था। दिनाँक २४ नवम्बर ७० को मैंने महेन्द्र शर्मा जी के साथ दीक्षा ली। मुझसे गुरुजी ने पूछा तू क्या दे रहा है। मैंने सोचा कुछ पैसा देना पड़ेगा गुरुजी बोले और क्या दे सकता है। मैंने तंबाखू छोड़ी। मैं बिलासपुर गुरुजी से मिलने मैं उमाकांत चतुर्वेदी जी के घर पर मिला। गुरुजी ने तीन बार मुझसे पूछा तुझे कुछ चाहिए दिनॉंक १७, १८, १९, २० मथुरा में विदाई में पहुँचा। हमारे बच्चे भी दीक्षा लेना चाहते थे इसमें एक की उम्र पाँच वर्ष की थी एक की आठ कार्यकर्ताओं ने उन्हें उठा दिया पर गुरुजी ने कार्यकर्ता को बुलाया और कहा इन बच्चों को दीक्षा लेने दो। गुरुजी ने यह भी कहा जब समय होगा तब मैं इनबच्चों को बुलवा लूँगा।

मैं यज्ञ की व्यवस्था में लगा हुआ था अचानक एक कौआ मेरे पैर पर बैठ गया और मुझे शान्तिकुँज के दरवाजे की तरफ ले गया मैंने पिताजी के स्वर्गवास की सूचना दी तो बिना कुछ बताये हुये गुरुजी बोले कि वे शंकर के भक्त थे सत्संग उन्हें बहुत अच्छा लगता था और उनके सारे स्वभाव के गुण बोल दिये और बोले मैं उनके लिये एक अनुष्ठान करूंगा।

सन् १९७३ में २४ वाँ प्रत्यावर्तन शिविर में सम्मिलित हुआ। मैं ३१ नंबर कमरे में तर्पण साधना कर रहा था। मैंने देखा गुरुजी मेरे पीछे खड़े हैं मैं पीछे मुड़ा वे नहीं दिखे फिर दप्रण में देखा फिर गुरुजी दिखे मेरे कमरे का दरवाजा बोल्ट था मेने गुरुजी से जाकर पूछा ऐसा क्यों हुआ गुरुजी ने कहा मैं इन दिनों हरएक के कमरे में रहता हूँ।

२० मार्च से २० अप्रैल के २९ दिन में गुरुजी के ५८ भाषण हुये और मैंने उपाध्याय जी, चौरसिया जी, महेन्द्र जी, कपिल जी, लीलापत जी बलराम जी व शिवप्रसाद मिश्रा जी ने साथ-साथ वानप्रस्थ धारण किया। सन् १९७७ में मैंने खूब समयदान किया। और मैंने कार्यकर्ताओं से कहा कि मैं अब घर जाऊँगा और पैसे कमाऊँगा मुझे अपने बच्चे पालने हैं। गुरुजी ने मुझे बुलवाया और कहा तू अपना दिमाग मत लगा यहाँ आ जा बच्चों की देखभाल मैं करूंगा। बच्चों को यहाँ भर्ती कर दे और तू भी भरती हो जा। बस तू चार काम करना। नं०-१ बच्चों को क्या करना है कोई दबाव नहीं डालना, नौकरी करेंगे तो उन्नति करा दूँगा, व्यापार करेंगे तो फायदा करा दूँगा, हमारे पास रहेंगे तो बाबा नाती का रिस्ता भी फायदेमन्द ही रहेगा।

दशहरे में मुझे आँवलखेड़ा भेज दिया। एक दिन जब अखण्ड जप चल रहा था तो मन्दिर की तरफ मैंने चौतीस फिट ऊँचे गुरुजी को खड़े देखा मैंने तीन बार आँखें मली मुझे हमेशा दिखे। वहाँ जानकी प्रसाद जोशी पूजा कर रहे थे मैंने पूछा तुमको कोई अनुभूति हुई बोले अभी-अभी यहाँ गुरुजी खड़े थे।

सन् १९८१-८२ में मैंने देखा कि माताजी अपने हाथ में कुछ उपकरण सा लेकर सूर्य भगवान को अर्ध्य दे रही है और सूर्य की एक गहरी प्रकाश किरणों का बैण्ड उनके चरणों में आ रहा है और यह प्रकाश किरणे वितरित होकर शान्तिकुँज के परिसर में सोखी जा रही हैं। मैंने गुरुजी से पूछा गुरुजी यह क्या है तो गुरुजी ने कहा कि माताजी के इसी दिव्य प्रकाश और शक्ति से शान्तिकुँज और युग निर्माण योजना संचालित है।

एक दिन मैं गुरुजी के कमरे में ऊपर गया गुरुजी जमीन पर बैठकर नक्शे मे कुछ देख रहे थे। गुरुजी के पैर का तलवा मुझे स्पष्ट दिख रहा था मैने देखा कि उसमें विष्णु के तले चिन्हित चक्र कमल जैसे मानो पेन्टिड हो दिख रहे थे मैने गुरुजी से पूछा यह क्या है गुरुजी गुरुजी ने कहा तूने मेरे सूक्ष्म शरीर के दर्शन किये हैं इस बात की बाहर चर्चा मत करना। सन् १९८६ में एक लड़की अपने पिता के साथ मेरे लड़के के लिये गुरुजी के पास पहुँची गुरुजी ने कहा इस लड़की की शादी मैं करोड़पति घर में करा दूंगा यद्यपि मैने उस मित्र की लड़की से शादी का वायदा किया था गुरुजी ने कहा अगर वह लड़की यहाँ आती तो तेरे लड़के को शान्तिकुँज से बाहर ले जाती।

मैने पूछा सोनी जी आपने एक इतना बड़ा काम किया है कि यदि वह इतिहास में प्रकट न भी हो तो भी वह इतिहास में अंकित रहेगा आप उस घटना को जिन भी शब्द में व्यक्त करना उचित समझे करें क्योंकि मैं श्रवण कुमार जी और आपका बहुत पुराना मित्र हूँ वे बोले आपके सामने मैं जरूर कहूँगा। गुरुजी ने मुझको और श्रवण कुमार सोनी जी को बुलवाया और दोनों को तिलक करते हुये कहा कि तुम दोनों समधी को तिलक कर रहा हूँ और तुम्हारे दोनों लड़कों की शादी श्रवण कुमार जी के लड़के से मैं तय करता हूँ। मैने अपने बड़े लड़के से कहा कि गुरुजी ने ऐसा कहा है पर इस लड़की की शादी हो चुकी है इसका एक बच्चा भी था जो पैसा होते ही मर गया तू तैयार है उसने गुरुजी की आज्ञा शिरोधार्य की और सहर्ष स्वीकृति दी। सन् १९९२ में रामकृष्ण जयंती के दिन मैने गुरुजी को एक चबूतरे पर खड़ा देखा उनका सिर अन्तरिक्ष में था और चारों तरफ से अग्रि की लपटे निकल रही थी। शायद वही गुरुजी के विराट स्वरूप का दर्शन था।

एक दिन गुरुजी ने मुझसे कहा कि हम दोनों के लिये दो घोंसले बनाओ। मेरे साथ कोमल और उपाध्याय जी भी थे उस पर कोई नाम न होगा वे होंगे सजल श्रद्धा प्रखर प्रज्ञा औरइन घोसले में मैं सौ साल रहूँगा और सबो की उसी प्रकार सेवा करूंगा जैसे जीवित अवस्था में कर रहा हूँ।

गुरुजी ने मुझसे कहा कि मुझको जितना परेशान मेरे नाते रिश्तेदारों ने किया उतना किसी ने नहीं फिर भी जब तक मैं धरती पर रहूॅगा आँवलखेड़ा मन्दिर पर जीवित रहने की तरह ही सेवा करता रहूँगा। मैं लगभग पाँच वर्ष आँवलखेड़ा रहा रोज मन्दिर में दस बीस पत्र रखे जाते और मैं साक्षी हूँ और शान्तिकुँज के ऊपरी कमरे की तरह यह मन्दिर भी सकारात्मक उत्तर ही देता रहा। एक दिन एक ठाकुर महिला शेरवा मेरे पास आयी और चीत्कार मारकर रो रही थी उस समय गुरुजी शरीर छोड़ चुके थे मैने कहा बहिन दुनिया के लिये गुरुजी शान्त हो सकते हैं अपने लिये नहीं तुम मन्दिर में जाकर बैठो बहुत देर वह महिला नहीं आयी मैं देखने गया वह उठकर बोली की यहाँ मेरा ध्यान लग गया और मैने माताजी के दर्शन एक शेर के ऊपर बैठे देखा। और पास ही मृगछाला पर त्रिशूल लिये गुरुजी। महिला बहुत प्रसन्न थी वो कहती है कि गुरुजी माताजी ने मुझे साक्षात् दर्शन दिये। एक दूसरी घटना एक महिला सुनाती है कि मैं एक दिन रोटी बना रही थी मुझे पैसों की बहुत जरूरत थी मैं गुरुजी की बहुत भक्त हूँ उनको याद करके बहुत रो रही थी अचानक बाहर से किसी ने आवाज दी वे पीली धोती कुर्ता पहिने थे बोले कि मैं एक रोटी खाऊँगा अचार और एक रोटी उस महिला ने दी वे कही चले गये लौट के देखती है कि परात कुछ उठी हुई थी और परात के नीचे एक नौटो का बण्डल था। गुरुजी ने मुझसे कहा था कि तू यह मत कहना कि मैं भगवान हूँ बस मुझे तहे दिल से प्यार करने वाला एक इंसान ही जानना और बताना।

मैने एक साठ चालीस फिट की जमीन डंडे के जोर पर दखल कर रखी थी जिसके तीन तरफ सड़क थी मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था क्योंकि उसकी कीमत बढ़ती जाती पर गुरुजी ने कहा तू जल्दी बेच मेरे पास एक सोने की पत्नी की करधनी भी थी १०, १५ तोले की गुरुजी के प्रवचन से लौटते समय मैने पूछा गुरुजी मैं इसका क्या करूं गुरुजी ने बहुत जोरो से डांट लगाई और भगा दिया तीन दिन बाद बुलाकर कहा मैं तुझे अकलमंद समझता था तू तो बड़ा बेवकूफ है ऐसी बाते और लोगों के सामने नहीं कही जाती।

शरद पारदी- आप आरचीटेक्ट है तथा शान्तिकुँज की अधिकतर बिल्डिंग का डिजाइन गुरुजी की संरक्षता में आपही का दिया हुआ है। उन्होंने अपना इंटरव्यू इस प्रकार दिया। मेरे पिताजी का गायत्री परिवार से सम्पर्क था उस समय में दसवीं कक्षा में पड़ता था। मुझसे पिताजी ने कहा कि तू गुरुजी को प्रणाम कर आ। गुरुजी हमारे घर आये थे। सन् १९६३ में मैं जब चंडीगढ़ टूर पर गया था तब गायत्री तपोभूमि में गुरुजी ने मुझे अकेले दीक्षा दी। मेरे पिताजी गायत्री परिवार के सक्रिय कार्यकर्ता थे। सामने वाली बिल्डिंग का नक्शा मुझे देना था पर मैं आ न सका इस कारण दूसरे मिल गया। सन् १९७३ में मैं प्राण प्रत्यावर्तन में आया और तब से नियमित सारी कंस्ट्रक्शन डिजाइनिंग के लिये गुरुजी मुझे बुलाते रहे। प्रत्यावर्तन शिविर में मुझे आभास होने लगा कि यह ईश्वर के कोई अंश हैं। मैंने क्या पाया यह बताना तो कठिन है पर वह मैं मैं नहीं रहा बदलाव आ गया। जो आनन्द मुझे मिला कहा नहीं जा सकता। पर गुरुजी के ही शब्दों में इस शिविर में कोई खाली नहीं गया।

जब भी कोई कठिनाई मुझे आती है मैं जब पूरा प्रयास करके हार जाता हूँ तब केवल गुरुजी के स्मरण मात्र से पहले हिम्मत मिलती है और फिर सफलता। चर्चा में गुरुजी ने मुझसे कहा था कि जब भी तू मुझे याद करेगा उठते बैठते मैं तेरे साथ रहूँगा। मेरे पिताजी बीमार पड़े मैने कहा ठीक करदो गुरुजी ने कहा पूर्व कर्माे का फल तो भोगना ही पड़ेगा इसके लिये तू हठ न कर लेकिन जो बीमारी तेरे पिताजी को है और वंश परम्परा में है आगे वाली तेरी किसी पीढ़ी में वह बीमारी न होगी और मेरे बच्चों के बच्चे तक अब उससे सुरक्षित हैं। पिताजी का दुख तो तुझे सहन करना ही होगा पर सहन की शक्ति मैं अवश्य दूँगा। मेरी लड़की के आपरेशन के समय मुझे एक अप्रत्यक्ष सहायता मिली। उन्होंने कहा कि जादुई अनुभूति तो मुझे कभी नहीं हुई पर संरक्षण मिला। नागपुरअश्वमेध में एक दिन मैं खूब रोया यह काम मैं कैसे कर सकूँगा लेकिन मैने एक जाग्रत स्वप्र मेंअनुभव किया कि गुरुजी मेरे पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा कि यह यज्ञ कठिनाइयों के बीच पूर्ण सफलता प्राप्त करेगा। पूजा में मुझे शाारीरिक और मानसिक दोनों ही शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। गुरुजी ने कहा कि मैं भीड़ नहीं बढ़ाना चाहता। जब गुरुजी को चोट लगी थी तब मैं केवल इसीलिये नहीं आया पर अचानक उसी दिन मुझे गुरुजी का तार प्राप्त हुआ। मैने कहा गुरुजी मुझे क्यों बुलाया। गुरुजी ने कहा कि तू मेरा बच्चा है तेरी याद आ गई इसलिये बुलाया। मेरे जैसे छोटे आदमी को इतने बड़े आदमी के याद भी आ सकता हूँ मेरे लिये बड़ा आश्चर्य था। एक शक्ति मुझे और मिली कि निर्माण सम्बन्धी गुरुजी जो समझाते थे मुझे १०० प्रतिशत समझ में आ जाती थी जबकि मेरी बुद्धि से समझ में नहीं आना चाहिए था। गुरुजी ऊपर के कमरे में खटिया में बैठते और मुझसे कहते तू आँख बन्द कर और सीढ़ियों से नीचे चला जा और सीधे १०० गज चलकर थोड़ा बाई तरफ देख थोड़ी जगह खाली है वहाँ देख वहाँ क्या बन सकता है। इस तरह मुझे मानसिक भ्रमणा कराते थे और आगे फिर वहीं बैठे बैठे सचमुच मुझे ऐसा लगता था कि गुरुजी ने खुद चलकर इंच इंच जगह में क्या करना है मार्गदर्शन दे दिया। उदाहरण के लिये कभी कभी यह कहते कि देख वहाँ जो टंकी है उसमें पानी नहीं है और सचमुच पानी नहीं मिलता मुझको रोज रिपोर्ट देना होती थी कापी में लिखकरदेता। गुरुजी कहते कि तू मेरा काम कर अनुष्ठान नहीं मैं साल में चार पाँच बार और अब तक सौ डेढ़ सौबार हरिद्वार आ चुका हूँ। गुरुजी कहते कि तूने हिमालय देखा नहीं है और मैने बनाया नहीं है। मैंने देखा और तू बना। मिलकर बनायेगे। क्योंकि मैं तो बना नहीं सकता। सचमुच मुझे लगा कि मैं उनकी इच्छा के अनुरूप हिमालय बना सका। लेकिन श्रेय १०० प्रतिशत उन्हीं को है। पहली यज्ञशाला का नक्शा गुरुजी ने बनवाया। आदमी के हिसाब से छत बनाने के लिये वह निशान बना देते थे। निर्माण के सिद्धान्त उनको जाने कैसे इतने साफ थे मैं नहीं समझ सकता। गुरुजी ने एक दिन मुझे ९ बजे एक गोष्ठी में आने के लिये कहा। मैं ठीक ९ बजे पहुँचा गुरुजी की गोष्ठी समाप्त हो रही थी वह ८ बजे ही प्रारम्भ हो गयी थी मैने कहा गुरुजी आपने मुझे ९ बजे बुलाया था। हम दो लोग थे पर गुरुजी ने २ व्यक्तियों के लिये पूरी गोष्ठी ९ से १० तक दोहरायी। गुरुजी कहते कि मुझे तू केवल विचार मान और अध्यात्म को विचारों को जीवन में उतारना उन्हीें की वजह से मुझे उनकी किताबों में आकर्षण हुआ। गुरुजी के व्यक्तित्त्व की कोई थाह नहीं पा सकता। वे कहते कि आगे सारे मजहब गायत्री नहीं गायत्री के सिद्धान्त मानेगा। यदि मैं कहूँ कि केवल मंत्र से सब कुछ होता है तो तुम जैसा मूर्ख मुझ जैसे धूर्त कोई नहीं होगा। जब हिमालय का बनना पूरा हो गया। गुरुजी बोले तुझे क्या चाहिए। मैं कहता रहा आपकी कृपा। पर बार बार कहने पर मैने कहा गुरुजी आप अपनी कुरता दे दीजिये। गुरुजी ने धोती कुरता बनियान माताजी से कहकर दिला दी। एक बार गुरुजी पटना क्षेत्र में गये तो माताजी ने खाने का सब सामान रख दिया था पर ऐसा लगा कि शक्कर भूल गयी जब लौटकर गुरुजी ने पूछा तो माताजी ने कहा शक्कर तो पीस कर रखी थी मैं गुरुजी के साथ था और सारे बर्तन उस पिसी शक्कर से माजकर धो डाले। गुरुजी तो साधारण कपड़े पहनते थे और भास्कर सिन्हा ड्रायवर पीले कपड़े जिसकी दाड़ी भी थी। लोग उन्हें ही प्रणाम करते थे। मेरे पहले गुरुजी के दर्शन में ही गुरुजी ने मुझे राखी बाँधी।

लास ऐजिल्स का के दुर्लभ बारोट का इंटरव्यू दिनाँक १७-२-९९ को लिया। सन् १९७९ में उन्होंने किसी गुजराती पेपर में पड़ा कि एक पण्डित श्रीराम शर्मा नाम के व्यक्ति ने जो यज्ञ कराते है और बुराइ्रयाँ छुडा़ते हैं मुझे अच्छा लगा मैने छोटी छोटी गायत्री सम्बन्धी किताबे पढ़ी पर फिर भूल सा गया। सन् १९८७ में मैने अमेरिका में तीनों गायत्री महाविज्ञान पढ़े। फिर मैने अनुष्ठान शुरु कर दिया। सवा सवा लाख के ८ अनुष्ठान मेरा गायत्री में पहला पदार्पण था। जब जब थकता था तो शीर्षासन लगाता था। मैं भारत आया और साहित्य से बहुत अधिक प्रभावित होने के कारण मैने सीधी बात गुरुजी से की मैं मन वचन कर्म से आपका काम करूंगा। गुरुजी ने कोई जवाब नहीं दिया। मैने फिर गुरुजी से कहा दूसरी बार भी कोई जवाब नहीं दिया जब तीसरी बार कहा तो वे मुस्करा दिये। मैने कहा गुरुजी मैं आपसे जवाब चाहता हूँ गुरुजी बोले मैं तुझसे बड़ा काम कराउँगा। अमेरिका में इनका बहुत बड़ा काम है और वह यह है कि अपने पैसे कैसे खर्च किये जायें। लगभग ३० करोड़ रुपये की एक स्कीम नारी जागरण की इन्होंने बनाई है जिसमें दो करोड़ रुपये इनके स्वयं के है तथा कुछ बड़ी कंपनियों ने स्पान्सर भी किया है। अमेरिका और इंग्लैण्ड में नारी जागरण का सेमिनार इनका विश्व प्रसिद्ध है और इन दिनों ८ महीने यह भारत में रहकर कार्य को आरम्भ करेंगे। आज इन्होंने बताया कि मेरे मन में एक इच्छा हुई कि क्या गुरुजी सचमुच महाकाल हैं। मैं इसका कोई प्रयोग परीक्षण करना चाहता हूँ मैने कहा क्या प्रयोग परीक्षण करेंगे। बोले मैने कर लिया मै मथुरा गया मुत्युंजय शर्मा जी से कहा कि मैं तीनघण्टे तीन दिन तक अखण्ड दीपक के सामने बैठूंगा। स्वीकृति मिल गयी। तीनों दिन मुझे ऐसा लगा कि मैं १० मिनट से ज्यादा नहीं बैठा जबकि शान्तिकुँज में मैं तीन दिन से ३ घण्टे रोज बैठता हूँ और मुझे ३ घण्टे में सारे के सारे मिनिट पार करने पड़ते हैं। मेरा मन मान गया कि मेरे गुरु पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य महाकाल थे। उनका स्मरण ही बियोण्ड टाइम पहुँचा देता है। दुर्लभ भाई की पत्नि जयश्री एवं दो बेटियाँ १७ वर्ष और १२ वर्ष एवं एक वेटा वेदान्त ८ वर्ष का है। घर का पता ८४०० सेडान एवेन्यू वेस्ट हिल्स केलिफोर्नियाँ ९१०४ यू०एस०ए० इन्होंने गुरुजी के साहित्य के ३५ हजार पन्ने पढ़े और जो कुछ पढ़ा उसका प्रयोग अपने मस्तिष्क की प्रयेागशाला में किया वे कहते है कि पहला प्रयोग मैंने अपने दाम्पत्य जीवन में किया मैंने अमेरिका में एम०बी०ए० किया और लगभग सारी बुराईयों के होते हुये भी इस साहित्य के प्रभाव से में ट्रान्सफार्म्ड हो गया यानि पूरा बदल गया। मैने उसी पढ़े साहित्य में से १९ हजार पन्ने केवल नारी जागरण पर निकाले। और गुरुजी के विचारों को नारी शिक्षा, नारी स्वास्थ्य, नारी स्वावलम्बन नारी में रुढ़िवादिता एवं भारती की नारी शीर्षक में १८ किताबें निकाली। मेरी पहली किताब लगभग ४०० पेज की केलिफोर्नियाँ से प्रकाशित हुई। मैने यह भी निकाला कि भारत में ही क्यों नारी सेवा करनी उचित है। गुरुजी के साहित्य में उसका जवाब मिला। १- विश्व में कोई भी नारी औसतन उतनी पतिव्रत नहीं होती है जितनी भारत की नारी। २-भारत की नारी ही बच्चों को संस्कार दे सकती है। मेरा मन उसको मान गया कि विदेश की एक हजार नारियों की सेवा की अपेक्षा भारती की एक नारी की सेवा अधिक है। मेरा यह प्लान २० करोड़ रुपये का है जिसकी पहली मुश्त मैंने अपनी ओर से ८१ लाख रुपये की दी है। बाकी मुझे अमेरिका की कई कंपनियाँ कई व्यक्ति का स्पोंसर प्राप्त है। गुजरात के मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री का सहयोग पत्र मैंने अभी अभी यहाँ आकर प्राप्त किया है। शिक्षा मंत्री ने किसी भी स्कूल का एक कमरा कुछ समय के लिये उपयोग करने की स्वीकृति प्रदान कर दी है। अमेरिका में पैसे खर्च कैसे किया जाये यह मेरी एक कंपनी है। दुर्लभ भाई का इंटरव्यू मैने ब्रह्मवर्चस में आज दिनॉंक २८ फरवरी को रिकार्ड किया।

रामकृष्ण नायक का इंटरव्यू आज २२ फरवरी को रिकार्ड किया। इनका पता एम०४३०-ई-७ एरेरा कालोनी भोपाल है। वे कहते हैं मेरे पिताजी १९६१-६२ से अखण्ड ज्योति पढ़ते थे १९७६ में हमारे यहाँ देवकन्या का प्रोग्राम हुआ। हमारी पत्नी रामकली नायक ने सन् १९७८ में सवा लाख का अनुष्ठान किया। मैं गुरुजी से सन् १९८८ में मिला। और डाक्टर अमल कुमार दत्ता के साथ एक चांद्रायण व्रत भी किया। एक दिन मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मेरी बड़ी लड़की बैंक में काम करती है उसकी शादी के लिये लड़का नहीं मिल रहा है। गुरुजी ने थोड़ी देर मेरी तरफ देखा और कहा कि जहाँ वह बैंक में काम करती है उसी के पास एक अच्छा लड़का मिल जायेगा। आस-पास दूर बहुत कोशिश की कोई लड़का नहीं मिला अन्त में उज्जैन में शादी लगभग पक्की हुई इसी बीच मेरे एक मित्र आये बोले मैं अपनी लड़की के लिये लड़का देखने आया था पर वह सनाड्य ब्राह्मण है वह पर्यावरण प्रदूषण में इंजीनियर है उस लड़के का आफिस बैंक से केवल एक किलोमीटर दूर था शादी पक्की हो गई और वे बहुत खुश हैं अभी वह एक्जीक्यूटिव इंजीनियर हैं। २- हमारे जवाई साहब हबीब गंज से एक गलत गाड़ी में बैठ गये गाड़ी छूटने पर हमें पता लगा और हम पीछे आने वाली गाड़ी से उस गाड़ी को पकड़ने इटारसी तक पहुँचे। जैसे ही हम गाड़ी से उतरे कि ठीक सामने हमको वे दिख गये और पीछे आने वाली सही गाड़ी में उनको विदा किया इस बीच हम केवल गायत्री मंत्र ही जपते रहे।

जब हम चांद्रायण व्रत में आये तो गुरुजी ने पूछा कोई समस्या। मैंने कहा गुरुजी मेरा प्रमोशन रुका हुआ है और हमारे एक सचिव महोदय उस पर कोई ध्यान ही नहीं देते और मेरी दो रिट बेकार गयी। गुरुजी ने कहा हो जायेगा। और बिना किसी कोर्ट बाजी के मेरा प्रमोशन हो गया। इसी प्रकार मेरी पत्नि का प्रमोशन सुपरसीट कर दिया गया था और यह मध्यप्रदेश के इतिहास का पहला उदाहरण है कि सन् १९६१ से रुका प्रमोशन सन् १९९१ में मिला। और सारे ड्यूज का पेमेन्ट गवर्मेन्ट ने कर दिया।

अशोक रघुवंशी इनका रिकार्डिंग इसलिये किया गया कि टोली में यह गये हुये थे और ११हजार के वोल्ट के करंट लगने के बाद भी और वह भी ७, ८ मिनट तक वे झूलते रहे सिर और पेर से अग्रि की लपटे रिकलती रही सिर की हड्डी का एक बड़ा हिस्सा जल गया जो उन्होंने दिखाया उसके बाद भी वे आज पूर्ण स्वस्थ है। मेरठ में कार्यक्रम के दौरान वे अपने कपड़े सुखा रहे थे और तार से करीब पाँच सात फीट दूर थे लेकिन वे खींच लिये गये। इसके पहले भी करीबन १० व्यक्ति मर चुके थे उसी तार से चिपककर और मैं पहला व्यक्ति था जो न मरा और न कोई अंग-भंग हुआ। मेरे आपरेशन में डाक्टर जग्गी के नरसिंगहोम में ७० हजार रुपये खर्च हुये। जिसमें २० हजार केवल दवाओं का विल था। डाक्टर जग्गी ने कोई पेमेन्ट नहीं लिया तथा मेरठ गायत्री परिवार वालों ने प्रज्ञा पुराण से बची २० हजार की राशि से दवाइयों का पेमेन्ट किया।

मैं ठाकुर परिवार का लड़का अशोक नगर में बी०ए०सेकेण्ड ईयर में पढ़ता था। गाँव से आकर मकान मुझे अशोक नगर शक्तिपीठ के पास ही मिला तभी से कार्यक्रम में भाग लेता रहा। शान्तिकुँज में समयदान में सुरक्षा केन्टीन और गाइड में काम किया। चित्रकूट में माता जी की पालकी मैंने उठायी और सारे समय उनके चरण अपने हाथों पर रखा रहा। माताजी बोली ये रघुवंशी आगे मैं तेरे ऊपर गिरुंगी और यह माताजी का आशीर्वाद ही है कि मेरे दो आपरेशन में मुझे डर नहीं लगा कोई चेतन शक्ति मुझे मदद करती है और आपरेशन के बाद ऐसी अनुभव होता है कि नींद से उठा हूँ। मैं रेल में जब यात्रा करता हूँ तो मेरा कुल सामान एक थेला होता है। हर स्टेशन पर डिब्बा बदलता हूँ और कहता हूँं कि मैं भारत माता का पत्र लाया हूँ मिशन का परिचय गुरुज्ी का साहित्य बाँटता हूँ और बेचता हूँं और विचार देता हूँ। पहले पिताजी नाराज थे और मैं मिशन से पैसा लेता था पर अब मेरा पूरा खर्चा मेरे पिताजी ही देते हैं। में डिब्बे में हरएक से एक ही बात कहता हूँ कि तुम डाक्टर हो, इंजीनियर या व्यापारी भारत माँ के दूध का ऋण अवश्य चुकाना। दीवाल लेखन में बहुत करता हूँ। स्कूल कालेज में गुरुजी के विचार और खटियों पर साहित्य की दूकान लगाता हूँ। पूजा और बुराई छोड़ने को गुरुजी की भाषा में एक बतलाता हूँ। मेरी प्रतिज्ञा है कि जीवन का हर क्षण गुरुजी के लिये समर्पित है। तुलसी का पौधा जन्मदिन पर देने की सलाह देता हूँ। बच्चों के जन्मदिन और कालेज में एक अच्छे इंसान बनने की गुरुजी की प्रार्थना दोहराता हूँ।

श्री राजकुमार शाह दिनाँक ४-३-९९ को उन्होंने अपने इंटरव्यू में कहा कि मैं भागलपुर बिहार गुप्ता शक्तिपीठ में पहली बार दीक्षा ग्रहण की। मेरे पिता पहले से ही गायत्री परिवार से जुड़े थे और उन्होंने सकल्प लिया था कि मैं अपने एक बेटे को गुरुजी को सौपूंगा मैंने सितम्बर ८६ को एक महीने का समय दान दिया। मैं एक साल तक यहाँ शान्तिकुन्ज रहा पर गुरुजी में बिल्कुल विश्वास नहीं करता था और पूरे वर्ष गाली देता रहा कि वे दूसरों को पीले कपड़े पहनाते हैं और स्वयं नहीं पहनते। मेरे पिताजी बहुत बीमार थे और कई बार वे मरते मरते वापिस जीवन में अपनी गायत्री साधना और गुरुजी के आशीर्वाद से प्राणरक्षा कर पाये। जबसे मैं जुड़ा हूँ तबसे हमारे घर परिवार में पूर्ण शान्ति और सामंजस्य है जबकि मैं लगभग हर तरह के उद्दण्डता में भाग लेता था। एक बार मुझे जेल भी हो गई। पोस्ट आफिस के पीछे मैं एक छोटे कमरे में रहता था और १२ से ४ तक दिन में और रात में सुरक्षा डियुटी देता था इस कारण कभी प्रणाम में नहीं जाता था। एक दिन मैने माताजी से कहा कि मैं डियुटी के कारण प्रणाम में नहीं आ पाता। माताजी ने कहा तू कभी भी आ जाया कर और नहीं आया तो मैं तेरे कमरे में आ जाया करूंगी। उसके बाद से ही मुझे एक परेशानी लगने लगी कि मेरे कमरे में मुझे कोई उठा देता था मानो कोई थप्पड़ मार रहा हो। माताजी के पास गया और बोला माताजी वहाँ कोई भूत रहता है। माताजी ने डाँट लगाई और भगा दिया यहाँ कोई भूत नहीं है तू समझता नहीं है। उस दिन से मेरा डर बिल्कुल चला गया और मुझे ऐसा अनुभव होने लगा कि शायद माताजी ही हमारे कमरे में आती थीं। मेरा गरदन दबाना भी बन्द हो गया। माताजी ने एक दिन कहा कि तू शादी कर ले मैने कहा कि अभी मेरे बड़े भाई की शादी नहीं हुई है। माताजी ने कहा कि यदि तू अभी शादी नहीं करेगा तो मैं शादी नहीं कराऊंगी। और हुआ भी यही माताजी हम को छोड़कर १९९५ में गई और शादी मेरी १९९६ में हुई पर माताजी ने नहीं कराई।

मुझे जब एक साल हो गया तो मैने गोरीशंकर जी से कहा कि मैं अब नहीं रुकूगा जाउाऊगा अब बहुत सेवा हो गई अब मैं पैसे कमाउाऊगा मुझे माताजी के पास भेजा मैने माताजी को भी साफ कह दिया। माताजी ने गुरुजी के पास भेज दिया। वह पहली बार था जब मैने गुरुजी से आमने सामने आँख मिलाकर बात की। गुरुजी बोले देख मैं तुझे कीचड़ से निकाल कर लाया हूँ अब आगे चलना तेरा काम है। मैं नहीं चलाऊँगा। मैने सोचा गुरुजी ऐसा क्यों कहते हैं मैं खाता पीता आदमी कीचड़ में तो था नहीं। पर गुरुजी ठीक थे। जब मैं यहाँ समयदान में था तो मेरे ग्रुप के पाच छै मित्रों को लम्बी सजा हो गई। टिस्को की सड़क का कोई झगड़ा था। यदि मैं शान्तिकुँज नहीं होता तो मैं जेल में अधिक समय ही रहता। शायद वही कीचड़ थी। उत्तर काशी डाक्टर दत्ता के ग्रुप के साथ मैं गया था और वहाँ कर हर घटना गुरुजी और माताजी के आशीर्वाद का जीता जागता नमूना था।

सिद्धार्थ दत्ता मेरठ मेडीकल कालेज में भर्ती था। उसकी पीठ में फोड़ा था और उसके पैरों में झुनझुनी होने लगी। मैं समझ गया कि उसके स्पाइनल कार्ड में दबाव पड़ने लगा है। जिसका अगला कदम पैरों को बेकार हो जाना ही था। हड्डी विशेषज्ञ ने प्लास्टर के लिये कह दिया। अचानक सबेरे हमारे कमरे में डाक्टर प्रणव आये। काफी मेग्जीन एवं फल आदि सिद्धार्थ के लिये लेकर आये और बोले कल शाम गुरुजी ने मुझे निर्देश दिया कि तुम दत्ता के पास जाओ उससे कहना कि प्लास्टर नहीं कराये। जो भी बीमारी बताई है वह या तो है नहीं और यदि है तो उसका निशान भी नहीं रहेगा। यह एक आश्चर्य का विषय है कि जब मैं नये एक्सरे कराकर भारत के प्रसिद्ध हड्डी विशेषज्ञ डॉ० ए०के०गुप्ता जीएसबीएम मेडीकल के पासस ले गया तो सचमुच वे आश्चर्य में पड़ गये कि काक्स बीमारी का नामोनिशान नहीं था जैसा कि कभी होता नहीं।

मैं जब नया नया गायत्री परिवार से जुड़ा था तब हर महीने दो चार अखण्ड ज्योति के सदस्य अपनी तरफ से बना देता था उस समय अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य तीन रुपये था। जब मैने गुरुजी से कहा तो गुरुजी बहुत नाराज हुये। बोले कि मुफत में मत दिया कर। कम से कम एक रुपया तो ले लिया कर। और किताब बाँटना महत्त्वपूर्ण नहीं है किताब वापिस लेना और वापिस न मिले तो चार पाँच बार तकाजा अवश्य करना। उससे हमारे विचारों का महत्त्व बढ़ेगा।

दिनॉंक ५-३-९९ को देवी सिंह तोमर का इंटरव्यू इस प्रकार है। वे कहते हैं कि मैं टेलीफोन विभाग में सुपरवाईजर था। मैं खूब माँस खाता था शराब पीता था। एक दिन गायत्री परिवार के कुछ लोगबाग आये और उन्होंने मुझसे कहा कि गुरुजी आने वाले हैं राजासाब का एक महल राजगढ़ में शक्तिपीठ के लिये मिल गया है। उसको ठीक करने और सजाने के लिये हम चंदा उगाह रहे हैं। गायत्री परिवार और गुरुजी से मैं थोड़ा थोड़ा परिचित था। उसी दिन मुझे १५०० रुपया मिले थे मैंने सब निकाल कर दे दिये। उसके बाद वे लोग मेरे पीछे पड़ गये कि ये तो काम का आदमी दिखता है। फरवरी ८१ में राजगढ़ में मैंने दीक्षा ली मैने कह दिया था कि मैं शराब पीकर ही आऊँगा। और सचमुच मैं शराब पीकर ही गया। जब मेरी पेंशन हो गई मेरे चार बच्चे थे जो दो लाख रुपया मुझे मिले दो बच्चों ने तो कहा पिताजी आप अपने लिये रखले पर दो बच्चे बहुत लड़ने लगे कहने लगे हमें धंधे के लिये पैसे दो। उन्होंने पैसे ले भी लिये और डुबो भी दिये। हम और हमारी पत्नि बहुत चिन्तित थे थोड़ी सी पेंशन में कैसे काम चलेगा। एक दिन रात में दो बजे गुरुजी ने मुझको एक थप्पड़ मारा और कहा उठ मेरे साथ चल मैंने तभी अपनी पत्नि को जगाया और बोला अब अपन शान्तिकुञ्ज चलते हैं। हमारी लड़की का डायवोर्स हो गया था। गुरुजी ने कहा उस शैतान के पास मत जाना यह हमारे पास रहेगी। मैने गुरुजी का एक भाषण सुना। गुरुजी ने कहा जो शराब पीता है वह अपना चरित्र सुरक्षित नहीं रख सकता। उसके लिये आत्मीयता, प्रेम, उत्तरदायित्व और परिवार कोई मायने नहीं रखते। मेरा दिमाग ठनका। मैं सामने ही बैठा था। गुरुजी फिर बोले जो माँस खाते हैं वे मुर्दा खाते है क्योंकि जब उसे काटा जाता है तो उसके टुकड़े बिलखते हैं और उस दर्द चीत्कार के हारमोन्स उसमें मिले होते हैं और मुर्दा तो वह हो ही जाता है। फिर तो मुझे ऐसा लगा कि आज जो मैंने माँस खाया आज जो शराब पी उसको उँगली डालकर उल्टी कर दूं। उसके बाद मैने कभी नहीं छिया।

मैं आफिस में शराब की बोतल रखता था। और पीकर ही काम करता था पर जो भी काम कोई कहे जरूर कर देता था। और जब मैं राजगढ़ से शान्तिकुँज आया तब मेरी बिदाई के लिये डिप्टी कलेक्टर, एक्जीक्यूटिव इंजीनियर, यहाँ तक कि कलेक्टर कुल सात गाड़िया मुझे राजगढ़ृ से व्यौरा पहुँचाने आयी। गुरुजी के पास पहुँचते ही गुरुजी बोले तू आ गया। मैं आश्चर्य में पड़ गया। मैने शान्तिकुँज आकर एक मजदूर की तरह काम किया और टोकरी सिर पर रखकर ले जाता था और हर काम मुझे बहुत गौरवशाली लगता था लगता है।

हरीराम केडिया २, मल्लिक स्ट्रीट कलकत्ता- सन् १९६६ में बृजमोहन जी भाला ने मुझे अखण्ड ज्योति और गायत्री परिवार से सम्बन्ध कराया। सन् १९७२ में पंचकुण्डीय गायत्री महायज्ञ में मैंने भाग लिया। जिसका संचालन के०के०पी०वर्मा ने कराया था। उसी में मैंने दीक्षा ग्रहण की। सन् १९७२ में भी मैं शान्तिकुँज आया। गुरुजी से साक्षात्कार हुआ। उन्होंने जो आशीर्वाद दिये उसे न मैं कह सकता हूँ और न मुझे कहना चाहिए। बस इतना ही काफी है कि मेरा परिवार मेरे बच्चे न केवल अनुशासन में है लेकिन माता पिता का उतना सम्मान करते हैं जितना शायद ही कोई माता पिता आशा करते हों। मैंने अपनी लड़की की शादी तुलसी पुरा निवासी गुलजारी लाल गोयल की सुपुत्री से गुरुजी माताजी की उपस्थिति में अपने सारे परिवार के विरोध में की। और बाद में पूरी तरह सबका सहयोग मिला। मुझे अपने कारोबार में एक लाख रुपये का नुकसान हुआ एक वर्ष में ही उसकी भरपाई हो गयी। एक दिन मेरे स्टोर से कई लाख रुपये का सामान चोरी हो गया। और चोरी करने वाले वो तत्व थे जिन पर पुलिस भी कभी हाथा नहीं उठाती थी लेकिन गुरुजी का आशीर्वाद था कि डीआई जी पुलिस जैसा कि वह स्वयं कहता है कि मेरे न चाहने पर भी न जाने कौन मेरे पीछे लगा रहा और चोरी करने वालों को पकड़कर काफी कुछ सामान बरामद हो गया। इसके बाद मैंने एक महीने और तीन महीने के शिविर किये। सन् ८४ से ८६ तक जगह जगह यज्ञ और अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाये। १९८६ में सूक्ष्मी करण साधना में गुरुजी ने मुझे शान्तिकुँज बुलाया और कहा कि देख अखण्ड ज्योति एवं साहित्य का बंगाली प्रकाशन की जिम्मेदारी मैं तुझे सौंपता हूँ। तू साफ बतला यह जिम्मेदारी तू लेगा। मैने कहा गुरुजी जब तक मेरा मकान न बिक जाये तब तक मैं इसको छोड़ूगा नहीं। सन् १९९७ में लगभग २२ लाख रुपये साहित्य प्रकाशन और गाड़ी आदि में खर्च किये और अब बड़ी गाड़ी का चल पुस्तकालय बहुत अच्छा चल रहा है साथ ही यज्ञ और संस्कार भी।

चंद्रवीर सिंह राठौर- दिल्ली बीकानेर रेल मार्ग में राजलदेशर से ८ कि०मी०दूर चुरू जिले में लूनासर गाँव का रहने वाला हूँ। मैं स्कूल में पढ़ाता था। व भजन मंडली में भाग लेता था एक दिन मुझे हिमालय भागने की सूझी। और मैं अपने एक साथी के साथ भागा। पर वह साथी मुझे छोड़ गया। मेरी आगे जाने की हिम्मत नहीं हुई। मैं रतनगढ़ स्टेशन पहुँचा गाड़ी रात को दिल्ली जाती थी। पास में पैसा एक भी नहीं था। मैं गाँव के साधुओं की सेवा करता था और मुझे अनुभव था कि ये सब धोखेबाज होते है और मैं खाओ पिओ मौज करो के सिद्धान्त का कायल था लेकिन मुझे स्कूल में रामसिंह राठौर मिल गया। मैं सन् १९६६ से अखण्ड ज्योति लेने लगा। मैं शराब पीता था और रात को नींद नहीं आती तो जप करने बैठ जाता था। छै महीने तक यही क्रम चला। मुझे एक दिन मन में आया कि तुम जैसा मूर्ख और कोई नहीं जिसका कोई गुरु नहीं। शराब माँस सिगरेट तेरा जीवन बिगाड़ देगे मैं गंगा किनारे गायत्री मंत्र जप करने बैठा और मैंने वहीं सब छोड़ दिया। कलकत्ते में मेरे अनुज भागीरथ सिंह के माध्यम से ब्रहमोहन भाला जी से मिला भाई नेमीचंद जी मूंदड़ा की देखरेख में सन् १९७० में गायत्री जयंती पर मथुरा पहुँचा। गुरुजी से मिलने की बड़ी तीव्र इच्छा हुई। गुरुजी हिमालय जा चुके थे तो मिलने की आशा भी नहीं थी पर मैने सोचा कि यदि मेरी श्रद्धा पक्की है तो गुरुजी मिलेंगे। सन् १९७२ सुजानगढ़ कस्बे में ५ कुण्ंडीय गायत्री महायज्ञ में शिवप्रसाद मिश्रा जी आये थे मैंने उसमें दिन भर काम किया और रात को सोया तो मुझे सपने में शान्तिकुँज की सीढ़िया गुरुजी का कमरा और गुरुजी दिखे। जब मैं शान्तिकुँज आया तो सचमुच बिल्कुल वैसा ही था। गुरुजी कुछ लिख रहे थे मेरे प्रवेश करते ही गुरुजी बोले चंदर तेरे पीछे मैं खूब घूमा ते अब आया है पकड़ में। मैंने सपने में ही प्रणाम किया। गुरुजी से सिर पर हाथ रखा मैं रोने लगा गुरुजी बोले शेर का बेटा रोता नहीं। मेरी नींद खुली सपना टूटा। गुरुजी हिमालय से लौट आये। गुरुजी ने पुराने सदस्यों को हिमालय से लौटकर बुलवाया। शायद किसी शिविर के लिये। मैंने कोई स्वीकृति नहीं माँगी कोई पत्राचार नहीं था फिर भी १५ सितम्बर से २२ सितम्बर तक की मेरी स्वीकृति आ गई। मैंने सोचा कि गुरुजी क्या सचमुच भगवान है और वही सब कुछ एक दिन प्रकट हुआ। उस समय मुझे चार दिन तक आँसू बहते रहे। बचपन के बाद में कभी रोयाा नहीं था डॉ० साहब जिस समय मैं आपको पत्र लिख रहा हूँ मेरे मन की उस दशा लेखनी की शक्ति के परे है। और फिर तो जब जब बुलाया जाता मैं चला जाता। फिर मैंने कलकत्ते में हिन्द मोटर्स ज्वाइन कर लिया। गुरुजी के प्रवासों में मैं उनका चालक बना समय समय पर जब जब माँग आती और वेतन पर और स्वयंसेवक के रूप में मैं बराबर चालक भेजता रहा। अब कलकत्ते के आसपास सारे कार्यक्रमों में मैं भोजन का कार्य सम्भालता हूँ।

अभी अभी जयराम बाटी जिला बाकुड़ा पश्चिम बंगाल में एक बड़ा कार्यक्रम १०८ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ तथा संस्कार महोत्सव मनाया गया इसमें ९८ प्रतिशत बंगाली थे और कलकत्ते से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर बिल्कुल ग्रामीण में यह कार्यक्रम था जहाँ लगभग एक लाख आदमियों को भोजन कराना था। अव्यवस्था अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई। पुलिस ने कहा कि अब भोजन बन्द कर दिया जाये अन्यथा भारी खून खराबी की सम्भावना है हमने अपने अफसर को सूचित कर दिया है कि हम स्थिति संभालने में असमर्थ है गायत्री परिवार का सहयोग माँ शारदामणि मठ के मुख्य स्वामी शिवरूपानंद भी अपने पूरे प्रयास के बाद हार चुके थे और उन्होंने माइक हाथ में लिया यह उद्घोषणा के लिये कि अब भोजन बन्द किया जा रहा है जाने क्या हुआ कि माइक चला ही नहीं उसके एक मिनट पहले भी चला था और बाद में भी चला। चंद्रसिंह जी राठौर कहते है कि मैने कहा कि आप चिन्ता न करें मैं सारे आदमियों को भोजन करा दूँगा क्योंकि गुरुजी मेरे साथ हैं। नयी रसद आ नहीं पायी थी पर पाँच क्विंटल चाँवल खतम ही नहीं हुये और देर रात तक सारे एक लाख व्यक्तियों को भोजन करा दिया गया। इस कार्यक्रम की यह अपूर्व घटना एतिहासिक बनेगी।

गुरुजी से तुम कम मिले

पहले वे मिले मैं तो बाद में १४ जून सन् १९६० में मिला। गायत्री जयंती के दिन शायद माताजी की एक बड़ी सिफारिश के साथ। शायद क्यों

जब मैं गुरुदेव से मिला। घियामंडी में वे ऊपर जाली में इधर से उधर या प्रतीक्षा में थे या कुछ सोच रहे थे। मैंने ऊपर जाकर प्रणाम किया। गुरुजी ने कहा अकेले आये हो। मैंने कहा जी। खाना खाओ। घियामंडी के बीच के कमरे में १०, १५ व्यक्ति के साथ गायत्री जयंती पर्व पर हम दावत पर बैठ गये। बैठने के पहले मैंने माताजी को भी प्रणाम किया। गुरुजी पूजा करने जा रहे थे माताजी ने उन्हें रोका और कान में कुछ कहा मैने देखा पर सुना नहीं। गुरुजी लौटकर हमारे पास आये और बोले अमल कुमार कौन है। मैं घबड़ाकर खड़ा हो गया। लगभग ११ बजे का समय था गुरुजी बोले तुमसे बहुत बात करनी है मैं पूजा में जा रहा हूँ। तुम गायत्री तपोभूमि में मेरी प्रतीक्षा करना। मैं घबराया तो कम पर आनन्द की हिलोरे बहुत उठी मैं वहाँ पहुँचा और सो गया। गुरुजी आये मैं उठा और यज्ञशाला के चारों तरफ घूमते घूमते बहुत लम्बी बातचीत हुई। क्या बात हुई।

यज्ञ स्थल के चारों तरफ कभी घूमते कभी खड़े हो जाते उस हर क्षण की अनुभूति मुझे है जो बहुत आनन्द दायक थीं वह कुछ ऐसी हैं।

तुम एक बहुत बड़े शानदार अस्पताल के इंचार्ज बनोगे। तुम यदि ३ माला गायत्री की भी जपोगे तो इतना मिलेगा कि बस पर शर्त एक ही है कि गायत्री के साथ तुम्हें एक अच्छे व्यक्ति बनना होगा। लोग कहें कि डाक्टर एक अच्छा इंसान भी है अन्यथा जप पूजन कितना भी हो बेकार होगा मेरी बात झूठ मत मानना।

गायत्री से पहला सम्बन्ध कहाँ कैसे और कब हुआ।

सन् १९५३-५४ में जब मैं एमबीबीएस पढ़ रहा था। तब हमारे मेडीकल कालेज के प्रिंसपल डाक्टर भगवत सहाय ने अपना शरीर छोड़ा तो हमारे एक सीनियर साथी डॉ० डी०पी०श्रीवास्तव शव यात्रा में गायत्री मंत्र उच्चारण कर रहे थे। मैं आश्चर्य में था कि यह १८ वर्ष का विद्यार्थी संस्कृत का जोरदार लम्बा मंत्र कैसे उच्चारित कर रहा है। इन दिनों हमारी बहन गीता और कमला नौकरी करती थीं। बड़ी बहन कमला आफिस से छोटी-छोटी गायत्री पुस्तकें लायी। थोड़ी बहुत पढ़ी रविवार को गायत्री चालीसा पढ़ने लगा उन दिनों हनुमान चालीसा और राम जप पिताजी की प्रेरणा से करता था।

जब मैं ५, ६ वर्ष का था तब भी मैं आँख आने पर भी अपनी बहनों का हाथ पकड़कर मन्दिर जाने के लिये जिद करता था। क्यों ले चलो मुझे मालुम नहीं हमारे घर मछली आतीथी छोटी छोटी जिन्दा मछलियाँ मैं रो रोकर ले आया करता था और पुस्तक के टीन के बक्स में पानी भरकर तेरा देता था और जब वे मर जाती थीं तो रोता था। मुझे पकड़ी मछली पानी में छोड़ने में बहुत आनन्द आता था आज भी जब जिन्दा मछलिया घड़ों में देखता हूँ तो जी करता है खरीद कर नदी तालाब में छोड़ दूं।

तुमने कहाँ गुरुजी पहले मिले मैं बाद में मिला यह कैसे?

हमारे पिताजी की मृत्यु के समय मैं नसरुल्लागंज से भोपाल कार में अपने बड़े भाई के साथ उनको ले जा रहा था। बीच में मृत्यु हो गई मेरा बड़ा भाई नाला पार करकर भोपाल के लिये टैक्सी लेने गया था क्योंकि हमारी गाड़ी पार नहीं हो सकती थी। पीछे बहुत गाड़ी रुकी थी मैं भैया के आने से सामने से हटने को तैयार नहीं था पिताजी को डायविटिक कोमा हुआ था। पिताजी का सर मेरी गोदी में था हनुमान चालीसा पढ़ रहा था और शायद इस श£ोक पर था अन्तकाल रघुपति पुर जाई जहाँ जन श्री भक्त कहाई पिताजी की आँख के बाई किनार से एक आँसू से छलकी और उनका सिर बाई तरफ गोद में लुड़क सा गया। मैं रोने लगा मैं गाड़ी हटाना नपहीं चाहता था पर मैने एक आवाज सुनी शायद वह गुरुज्ी की आवाज थी जिन्हें न मैने देखा था न सुना थाा उन्होंने बड़े प्यार से कहा बेटे गाड़ी को मोड़कर सड़क के किनारे खड़ी कर दो और दूसरों को अपने रास्ते जाने दो। मैंने सुना और ड्रायवर को वही निर्देश दिये किसने कहा किसने सुना किसने किया यह तो मुझे बाद में मालुम पड़ा। मुझसे कोई गलत काम हो या पाप हो तब हर समय मुझे एक दिव्य निर्देशित वाणी सुनाई देती है निर्देश देती है और काम भ्ज्ञी करा लेती है और मालुम मुझे तब पड़ता है जब सब कुछ हो चुकता है। जैसे

एक शाम को मैं साईकिल पर जय आरोग्य अस्पताल से माधव डिस्पेंसरी लश्कर १९५८ में जा रहा था किसी ने कहा तुम वहाँ मत जाओ मैं नहीं गया। मुझे कुछ करना नहीं पड़ा सब कुछ अपने आप हो गया। २-उन दिनों में कमला राजा अस्पताल ग्वालियर में मेडीकल आफीसर ओन डियुटी हाऊस सर्जन था अपने कमरे में मैंने एक आवाज सुनी तुम्हें बड़ा काम करना है। कोई गलत काम नहीं करना। यह निर्देश भी था और पालान करने की शक्ति भी। ३-लगभग नवम्बर दिसम्बर सन् १९५८ का समय था मेरी मेडीकल ट्रेनिंग पूरी हो रही थी कमला राजा के मेरे डियुटी रूप में मुझे एक आवाज सुनाई पड़ी अपनी जिम्मेदारी समझो। इन सब बातों में निर्देश भी था और शक्ति भी थी। मैं सब लगभग बेहोशी की हालत में कर जाता था आज्ञा का पालन हो जाता था। ऐसे मौके कई बार आये। जब कोई बड़ी शक्ति मुझे दुर्घटना से बचाती रही और कई काम में गलती से भी ठीक कर जाता हूँ।

बात सन् १९६४ की है। मैं भंवरकुँआ इंदौर में रविवार को सरकारी मकान में ज्योति अवधारण साधना कर रहा था अन्दर से एक आवाज उठी तू जो स्पेशलिस्ट की ट्रेनिंग करने लखनऊ जा रहा है कानपुर में भी एप्लाई कर दे तुझे वहीं पढ़ना होगा। तभी मेरे मित्र रेवाशंकर पण्डित ३, रूपराम नगर कालोनी एक्जीक्यूटिव इंजीनियर के पास गया और सारे कागज तैयार करके भेज दिये। मैं केवल लखनऊ जाना चाहता था क्योंकि वह मेरा ससुराल भी था जहाँ श्रपर्णा और बच्चा रह सकता था मैने गुरुजी से लखनऊ ही रहने की प्रार्थना की। पर गुरुजी ने कहा तुझे भारत के एक शानदार मेडीकल कालेज में विशेषज्ञ बनवाऊगा। और सचमुच कानपुर का जीएसबीएम कालेज भारत का एक शानदार मेडीकल कालेज था। यद्यपि मेरा एडमीशन डाक्टर बी०एन०सिन्हा भारत विख्यात आर्थोपीडिक सर्जन के मार्गदर्शन में हो गया जहाँ पर मेरे श्वसुर डायरेक्टर एसआरआई भी थे पर मुझे पढ़ना कानपुर ही पड़ा।

मैं लखनऊ से ग्वालियर जा रहा था मेरे पास थर्ड का टिकिट था गाड़ी की ऊपरी सीट पर बैठकर ध्यान कर रहा था एकदम अन्दर से आवाज आई तू गलत गाड़ी में बैठा है मैने पूछा और अपना बेग लेकर चलती गाड़ी से कूद पड़ा और जाकर सही गाड़ी में बैठ गया।

मैं एम०एस० की परीक्षा के लिये कानपुर गया हुआ था। कमरा नं० १६ पोस्ट ग्रेजुएट होस्टल में रह रहा था। दोपहर को परीक्षा थी पास के एक पार्क में हरी हरी घास में जूते उतारकर खााली पैर प्रातः घूम रहा था अचानक एक आवाज आई परीक्षा के ६ प्रश्रों में से तीन प्रश्र बतलाऊँ मैंने कहा नहीं मैं अपनी काबलियत से पास होऊँगा मैं वापिस आ गया और किताब तीन बार खोली और सामने के पेज पढ़े और उन तीनों पेजों में पहले तीन प्रश्रों के जवाब थे। जिनमें से एक प्रश्र सेक्शन डिस्क्रिप्शन आफ स्पाईनल कार्ड था जिसको बिना पढ़े कर ही नहीं सकता था। मेडीकल में च्वाईस होती नहीं इसलिये पास नहीं होता।

एक बात मुझे हमेशा होती थी। और लगभग या ६० के दशक से थी। और अब शायद ही कभी होती है। और वह यह है कि आधा या चौथाई मिनिट के लिये मुझे मृत्यु की पूर्ण अनुभूति होती है बिल्कुल रिलायजेशन स्तर की। मैं पसीना पसीना हो जाता था। हाथ पैर पटकने लगता हूँ कभी माँ कभी गुरुजी चिल्लाता हूँ और उसके बाद बिल्कुल ठीक हो जाता हूँ अक्सर यह दिन में होता था। पर जब सन् १९८३ में हम दोनों ने शान्तिकुँज आने का निश्चय कर लिया तब से बन्द हो गया।

शक्ति संचार साधना का प्रारम्भ?

१४ जुलाई सन् १९६१ गायत्री तपोभूमि मथुरा में मुझे अकेले दीक्षा दी। उसके बाद गोष्ठी हुई। १५, १६ व्यक्ति होंगे यज्ञशाला के बगल वाले कमरे में गुरुजी ने एक, दो, तीन, चार ऊँगली दिखाकर घियामंडी साधना कक्ष के सामने बुलवाया। बाहर निकलकर गुरुजी ने मुझसे कहा इन पाँच में तुम भी एक हो। मैं घबराया बिल्कुल नया था। मुझे गुरुजी ने क्यों चुना अन्य व्यक्ति थे जानकी बल्लभ जोशी आईपीएस एस पी मंदसौर आनेस्टी एवार्ड विनर, कलकक्त े के एक सेठ और उनकी पत्नी और मैं। गुरुजी खाट पर बैठे थे और हम लोग नीचे। गुरुजी बोले रविवार और बृहस्पितिवार को सूर्याेदय से एक घण्टा पूर्व से एक घण्टा बाद तथाा रात को ९ से साढ़े ९ के बीच हमारे गुरुजी और हम स्कालर की तरह शक्ति प्रदान करेंगे। तुमको मिलेगी या नहीं और कितनी मिलेगी केवल इस पर निर्भर रहेगा कि तुम उसका उपयोग क्या करते हो। तुम्हें केवल बैठना और सोचना है मैं वह लगभग नियमित करता हूँ चाहे मन लगे या ना लगे बाहर तो चूक हो जाती है अन्यथा नियमित इसके अपने अनुभव हैं। अब थोड़ा ध्यान भी लगता है। मालुम नहीं वह ध्यान है या शून्य की स्थिति परन्तु किसी उच्च कक्षा में या गुरुजी के पास पहुँचना सम्भव नहीं होता।

मेरी दीक्षा में गुरुजी ने दक्षिणा भी नहीं ली और कहा जमा करा देना। और यह भी कहा मेरी दक्षिणा है अच्छे इंसाान बनना।

लखनऊ स्टेशन पर गुरुजी को मथुरा जाना था। दोपहर भोजन के बाद गगुरुजी अकेले स्टेशन पर पहुँच गये और अपने घर से मैं भी पहुँचा गुरुजी बोले प्लेटफार्म पर घूमते हैं बात भी करेंगे। गुरुजी ने पूछा एम एस के बाद तू क्या करना चाहता है और क्या बन सकता है। मैने कहा मेरे लिये दो लाइने हैं। या तो मैं किसी मेडीकल कालेज में व्याख्याता बनू और फिर बढ़ने बढ़ते प्रोफेसर और दूसरा चिकित्सा सेवा में सिविल सर्जर्न। दोनों में क्या फर्क है। मेडीकल कालेज में प्रेक्टिस बन्द हो सकती है सिविल सर्जन का रास्ता थोड़ा कठिन है। तू क्या चाहता है। मैने कहा सिविल सर्जन और मैं वह बन गया। सन् १९८१ में जिला स्वास्थ्य अधिकारी। सन् १९७१ में गुरुजी की बिदाई हो रही थी बहुत भीड़ थी गुरुजी मेरे पास आये बोले दत्ता देख कितने डाक्टर आये हैं। मैं चुप रहा और मेरे रोने की आवाज निकलने ही वाली थी कि गुरुजी ने मेरी पीठ पर हाथ रखा और बोले कि मैं तुझे बिना सिविल सर्जन बनाये मरूंगा नहीं। और फिर जो मुँह फेरा बिदाई तक। जब में गुरुजी के साथ प्लेटफार्म पर घूम रहा था मैने कहा गुरुजी मुझे आपसे प्यार हो गया है और इस जीवन में मुझे विश्वास है यह बना रहेगा। और यदि मैं पागल नहीं हो गया तो इसे कोई नहीं तोड़ सकता। मैं आपको छोड़ूगा नहीं। गुरुजी बोले तू पागल नहीं होगा। मैंने कहा गुरुजी यदि अगले जीवन में मैं आपको न पहचानू अखण्ड ज्योति का सदस्य भी न बनू तो मेरा क्या होगा। गुरुजी ने कहा मैं तुझे नहीं छोड़ूगा किसी न किसी रूप में हर समय मैं तेरे साथ रहूँगा। कभी गुरु कभी रिश्तेदार कभी मित्र। मैने कहा कब तक गुरुजी ने कहा जब तक तू पूर्णता की स्थिति में न पहुँच जाये। मैं धन्य हो गया।

मथुरा जब भी जाता था स्टेशन पर उतरते ही रिक्शा वाला गायत्री तपोभूमि का नाम सुनते ही दुखी हो जाता था। कभी कभी तो नाराजी में गायत्री तपोभूमि की जगह कृष्ण जन्मभूमि ले जाता था। शायद उसकी आमदनी कम होती थी। मथुरा वृन्दावन देखेने का गाइडिंग हम लोगों को गुरुजी बहुत अच्छी तरह से कराते थे। जैसे जूते रिक्शे में छोड़ना दो तीन स्थान के अलावा पैसे नहीं चड़ाना गाइड से सावधान रहना वे पैसे तो कम लेते है पर चढ़वाते खूब है क्योंकि बाद में कमीशन मिलता है। पंडे सोचते है कि तपोभूमि वाले उनको आर्थिक हानि पहुँचाते हैँ और उनके आडम्बर चलने नहीं देते। कभी कभ्ज्ञी तो दुश्मन के स्तर तक चिढ़ जाते थे। पत्र देते थे चिट फेंकते थे हम मारेंगे मार डालेंगे। गुरुज्ी कहते थे बहुत अच्छा भगवान के भक्तों के हाथ मारा जाऊ थोड़ी बहुत मैं भी मदद करुगा अब तक रिक्शे में आता था अब पैदल आऊगा आगे जो भगवान की इच्छा यदि मेरी भूल आप बदलायेगें तो मैं सुधार अवश्य करूंूगा।

गुरुजी को ग्वालियर से मथुरा जाना था रात को ११ बजा था। पैसेंजर से थर्ड क्लास में मथुरा जाने का मन था सबेरे तक पहुँच जायेंगे। पर हम लोगों ने गुरुजी के साथ चलने के लोभ से चार फर्स्ट क्लास के टिकिट खरीदे मैं श्रीपर्णा और चिमनलाल अरोड़ा। इस बीच एक फास्ट ट्रेन आ गई। गुरुजी बोले इसी में चलते हैं। गुरुजी के साथ एक आसाम का युवक था यद्यपि उसका थर्ड क्लास का टिकिट था पर वह गुरुजी के साथ चढ़ गया। मैं भी चढ़ गया बाकी भीड़ ने इतनी जय बोली कि कोई नहीं चढ़ पाया गुरुजी उसी वक्त बहुत नाराज हुये तू क्यों इस क्लास में चढ़ा मैं बोला गुरुजी मेरे पास दो फर्स्ट क्लास के टिकिट खाली पड़े हैं क्योंकि श्रीपर्णा और चिमनलाल चढ़ ही नहीं पाये गाड़ी छोड़ दी। गुरुजी ने मुझे भी एक फटकार दी तेरे टिकिट से क्या लेना देना। गुरुजी बोले अमलकुमार इस गाड़ी से दो घण्टे में मथुरा आ जायेगा। मुझे जगा देना। मैंने कंडक्टर गार्ड से कहा स्वयं भी कोशिश की पर न उसने लगाया न मैं जगा पाया। गुरुजी ने ही मुझे जगाया। गेट पर उस आसाम के युवक को पकड़ लिया तुम थर्ड क्लास के टिकिट से सुपर क्लास पर कैसे आये गुरुजी मुझसे बोले गलत काम में कोई बहश नहीं फाइन पे करदो।

गुरुजी सन्त थे, ब्राह्मण थे। लोकसेवी थे। पर परिवार के बहुत अच्छे सदस्य थे। मैंने जब भी क्षेत्रों में देखा कितनी भ्ज्ञी व्यस्तता हो कितनी भी थकान हो माताजी को पत्र अवश्य लिखते थे। शायद वह एक शकुन था एक विश्राम था।

शान्तिकुँज में जब भी माताजी ऊपर जाती सीढ़ी पर चढ़ने पर थक जाती गुरुजी दरवाजे पर माताजी का हाथ पकड़कर बिठालते और पहले एक गिलास पानी पिलाते।

गुरुजी भी अपनी माताजी यानी ताईजी को बहुत प्यार करते थे कि मेरी माताजी द्वारकाधीश मन्दिर जाती तो हलुवे का प्रसाद लाती। बच्चों को बाँटती पर थोड़ा मुट्ठी में बॉधे रहती जो पसीने से चपचमा जाती पर कहती की श्रीराम भी बच्चा है उसको भी अवश्य दूंगी मैं माँ का प्रसाद लेता अवश्य था।

सन् १९७०-७१ की बात होगी। गुरुज्ी मंदसौर आये थे। प्रातः ५ बजे हम दो चार व्यक्ति को गुरुजी ने बुलाया था मैने एक प्रश्र पूछा गुरुजी मन की आवाज और आत्मा की आवाज में क्या अन्तर है। मेरा मन यदि १० बार बोलता है तो लगभग ९ झूठी निकल जाती एक सच होती है। आत्मा की आवाज झूठी क्यों हो जाती है। गुरुजी ने कहा आत्मा को सुख दुख प्रमोशन सफलता से कुछ लेना देना नहीं। आत्मा जब बोलती है बड़े आदर्श के लिये बोलती है शक्ति भी देती है और काम भी करा लेती है अन्यथा तो जीवात्मा अच्छे याा बुरे भोग के लिये सारंजाम जुटाती है। आत्मा का लक्ष्य केवल महानता की ओर अग्रसर करना होता है।

आज ब्रह्मवर्चस में पानी भर गया। कोई प्रणाम करने नहीं पहुँचा। मैं भी नहीं कहा। मातीजी ने शिवपूजन जी को भेजा और कहा देखकर आओ आज क्या बात हो गयी। दोपहर को मैं पहुँचा और मैने कहा माताजी कर्फ्यु लगा हुआ है। इंदिरा गाँधी को किसी ने गोली मार दी। पुलिस चिल्ला रही है जो घर से निकलेगा गोली मार दी जायेगी। माताजी ने कहा तू क्यों आया अभी ब्रह्मवर्चस से किसी को दूध लेने भी नहीं निकलने देना। मैं सारा सामान वहाँ भिजवाऊँगी। देख सरकार का हुक्म मानना तेरी जिम्मेवारी है। माताजी ने उसी समय यह भी बतलाया कि इंदिरा गाँधी बचेगी नहीं।

एक बार एक सेठ कलकत्ते से गुरुजी के पास आये और बोले कि हमने सुना है कि आप एक बहुत बड़े तांत्रिक साधक है। मैं देखना चाहता हूँ गुरुजी ने स्वयं कहा कि मैने भी सोचा चलो एक प्रयोग करते हैं। जंगल में एक आदम खोर तेंदुआ था। उसकी टट्टी पर हम दोनों ने मिलकर प्रयोग किया। दूसरे दिन वह तेदुआ मरा पाया गया और वहाँ उसकी खून की उल्टी भी पड़ी थी। बात आई गई हो गई। काफी समय बाद वह सेठ फिर आया और उसने एक ब्रीफकेश नोट मेरे चरणों पर रखते हुये बोला गुरुजी मैं आपके चरणों में अर्पित करता हूँ गुरुजी बोले बात क्या है। उसने बताया कि आपने जो प्रयोग बतलया था वह मैने अपने बड़े भाई पर किया और उसकी सारी जमीन मेरी हो गई। उसका एक छोटा सा भाग आपको समर्पित है। गुरुजी ने पैसे फेंक दिये उसे निकाल दिया और वे कहते है मैने जो प्रायश्चित किया मैं बतलाऊँगा तो नहीं पर उसका कष्ट आज तक भोग रहा हूँ उसके बाद मैंने प्रतिज्ञा की कि मैं ताँत्रिक प्रयोग जब तक परख नहीं लूँगा किसी को नहीं सिखाऊँगा शायद यह प्रयोग गुरु से कोई सीख नहीं सका।

मार्च अप्रैल १९९० अरविंद मेरा बड़ा बेटा अमेरिका में है छोटा सिद्धार्थ दिल्ली में दोनों अच्छी नौकरी करते है। मेरा छोटा भाई यतीन्द्र अमेरिका में बहुत अच्छे पद पर है। गुरुजी का मिलना लगभग बन्द था। हमारा मन हुआ कि गुरुजी के चरणों में एक लाख रुपये चढ़ाये जाये। सब मिलकर यतीन्द्र ने ५० हजार रुपया बाद में भेजे और हम तीनों ने मिलकर ६० हजार रुपये माताजी के चरणों में अर्पित किये। शायद माताजी ने यह सूचना गुरुजी को दी होगी। गुरुजी ने मुझको और श्याम प्रताप जी को ऊपर बुलाया। यह हमारी और गुरुजी की साफ-साफ अन्तिम वार्ता थी। माताजी ने मना किया हम कार्यकर्ताओं से पैसे नहीं लेते मैने कहा माताजी यह पैसे मैरे और मेरे दो बैटे के वह है जिससे मुझे कोई कमी नहीं होने वाली और फिर हम दोनों के बाद मेरे किसी भी पैसे की आवश्यकता किसी बच्चे को नहीं है। गुरुजी से बहुत अच्छी बात हुई। मुझे उन्होंने एक ही बात कही कि तू यहाँ आ गया तेरी जिम्मेदारी समाप्त हुई तेरा एक काम तो यह है कि खूब मस्त रहना और ब्रह्मवर्चस के हर व्यक्ति को देखकर बाहर बालों को यह लगे कि यह सब यहाँ आकर खुश है और इन्होंने यहॉ आकर कुछ खोया नहीं है। और दूसरी बात देख अमल कुमार तू यहाँ रहने कोई गलत काम मत करना बस इतना काफी है। गुरुजी केा उठने में कष्ट थाा वे लेटे थे मैं चाहता था कि आशीर्वाद स्वरूप गुरुजी मेरे सिर पर हाथ रखे पर चरण स्पर्श के लिये नीचे जाता तो गुरुजी का हाथ नहीं पहुँचता मैने वैसे ही सिर नवाया और गुरुजी ने सर पर हाथ फेरा और फिर उठकर लेटे लेटे गुरुज्ी को नीचे जाकर प्रणाम किया इसके बाद अन्तिम समय मैं ३० मई को मिला गुरुजी ने बुलाया था। डाक्टर प्रणव जी ने सारी मेडीकल रिपोर्ट बताई और कहा प्रणाम करलोगुरुज्ी लगभग बेहोश थे मैने सोचा अगर छिऊगा तो उनको कष्ट होगा बिना स्पर्श किये बिस्तर पर सर रखते हुये मैने प्रणाम किया और सोचा गुरुजी मेरा यह प्रणाम का अधिकार आप पर उधार रहा। कभी मन हो तो पटाना।

गुरुजी अति साधारण व्यक्ति थे मेरे ३० वर्षों के सम्बन्ध में एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि गुरुजी व्यस्त है अभी नहीं मिलेंगे। उनकी पूजा तो तब समाप्त हो जाती थी जब सब सोते थे। मैं चाहे जब उनके पास चला जाता था। एक दिन रात ९ बजे मैं मथुरा पहुँचा। मुझे मालुम था कि गुरुजी जल्दी सोते हैं इतनी रात उनके पास नहीं जाना चाहिए। पर फिर मन ने कहा कि नहीं जाना चाहिए तो मै रात को मथुरा आया ही क्यों। दरवाजा खटखटाया गुरुजी ने नींद से उठकर दरवाजा खोला गुरुजी बहुत खुश हुये माताजी उठी और प्रणाम लेकर चली गयी। मैने कहा मैं खाना नहीं खाऊँगा। गुरुजी बोले बिना खाना खाये सोयेगा। चल बात करें माताजी ने पराठे खाये गुरुजी ने परोसे और खिलाकर बोले आज कम बात की कल बहुत बात करेंगे।

जब हम मथुरा से ग्वालियर आते तो श्रीपर्णा के लिये रास्ते में न केवल माताजी खाना बनाकर देती लेकिन साथ में टिफिर केरियर भी और कहती यह कमजोर हैं इसे बाहर का नहीं खिलाना। सन् १९७१ में माताजी बीमार थी। रात को सतीश आया और माताजी की बीमारी की सारी पैथालाजी और मेडीसिन मुझसे बड़ी बारीकी से पूछता रहा। आज जहाँ एकाउन्ट आफिस है यहाँ हम दोनों सोये। और खूब हँसते बोलते रहे। इतना कूँदे कि एक खटिया तोड़ दी लीलापत जी ने सबेरे माताजी से शिकायत की। माताजी ये लोग इतना ऊधम मचाते है कि आपमी एक खटिया तोड़दी माताजी बोली तो क्या हुआ थोड़ी अच्छी खटिया बुलवा दो पण्डित जी चुप हो गये बोले जी माताजी

राम खिलावन अग्रवाल विमला देवी उमाशंकर चतुर्वेदी के माध्यम से गुरुजी और गायत्री माँ से जुड़ी शादी के पहले चौबीस हजार का अनुष्ठान किया। सन् १९६३ में दीक्षा ली। वे कहती हैं कि जो उन्होंने खाना खाया वह रोटी इतनी मीठी थी कि उन्होंने पूंछ ही लिया कि क्या रोटी में शक्कर मिली है। आज भी उसका स्वाद नहीं भूलता। मैं केवल मेट्रिक पास थी गुरुजी ने कहा तू एम०ए० करेगी और मैने सोलह साल बाद एम०ए० किया मैने अपने गहने बेचकर साहित्य के लिये ५ हजार रुपये दिये मेरे एक बहन के पति जो बहुत सीरियस हो गये थे। बेलोर अस्पताल में उनके पेट से लगभग एक बाल्टी पानी निकाला और डाक्टर के सारी आशा छोड़ने पर भी वे स्वस्थ हो गये। एक दिन गुरुजी ने कहा बेटी कुछ माँग मैने कहा गुरुजी मेरे कोई बच्चा नहीं है गुरुजी थोड़े ध्यान में गये और बोले बेटी तेरी पाँचों बहनों के कोई बच्चा नहीं है जिसमें एक बहन उस समय कुमारी थी। फिर गुरुजी बोले मैं तेरी एक दो बहन को बच्चा दूँगा। तेरा काम कठिन है पर हिमालय से लौटकर तू मेरी बेटी है इसलिये तुझे अवश्य दूँगा। मैंने कहा गुरुजी मुझे नहीं मेरी बड़ी बहन इस दुख को सहन न कर पायेगी। आप उसे दे दे। उसका पुत्र प्राप्ती हुई। उनका बेटा गुड्डू जो आज मेरे पास है बहुत अधिक बीमार हो गया था लेकिन मैने गुरुजी से प्रार्थना की और साहित्य के लिये कुछ दान दिया ठीक उसी समय से उसमें सुधार होने लगा और पूर्ण स्वस्थता को प्राप्त हो गया।

विमला जी कहती है कि विलासपुर में बी०के०श्रीवास्तव और रामाधार शर्मा बहुत काम करते हैं ४५० अखण्ड ज्योतियाँ बाटते है। रामाधार शर्मा जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में एकाउन्टेन्ट है कभी पैसा नहीं लेते पर सदस्य अवश्य बनाते हैं। मेरे पिताजी की मृत्यु के बाद भाइयों में बहुत झगड़ा हुआ ऐसा लगता था एक दूसरे की जान ले लेंगे। मैने गुरुजी से प्रार्थना की और जाने क्या हुआ बिना झगड़े के ही बटवारा हो गया।

भोपाल में श्री कुलकर्णी जी एडमिनिस्ट्रेटिव आफीसर थे गुरुजी से बोले गुरुजी डाक्टरों ने मुझे पाइल्स के आपरेशन के लिये कहा है। मेरे पिताजी को भी यह बीमारी थी और पिताजी के पिताजी को भी। गुरुजी बोले यह कोई वंश में चलने वाली बीमारी नहीं है। तेरे पिताजी के पिताजी तेरे पिताजी और तू सब मिर्ची मसाले खाने वाले है। आज से तू छोड़ दे और आपरेशन नहीं कराना पड़ेगा। पेट साफ के कुछ और उपाय बताये और दो महीने बाद जब मेरे पास आये तो मुझसे बोले मेरी पाइल्स ठीक हो गई।

सन् १९७८ में मैं एक बड़ी परेशानी में पड़ा। मेरा .........

सन् १९७८ जब मेरा झगड़ा वहाँ के एक मुसलमान से हुआथा तो उसने मुझपर एक कोर्ट केस चलाया जिस दिन गवर्मेन्ट डिसीजन हो रहा था जिसमें होम डिपार्टमेंट के सेकेट्री तथा एस०पी० मौजूद थे मैं काफी परेशान था। खरगौन में रेसीडेंस सर्जनथा इसलिये मेरी जान पहचान सब आफीसरों से थी। मैने पुलिस प्रासीक्यूटर से पूछा क्या सम्भावना है। तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट जज श्री द्विवेदी थे जो बहुत स्ट्रिक्ट माने जाते थे। मैं निर्णय की प्रतीक्षा में था कि मैने अपने अन्दर से माताजी की आवाज सुनी माताजी ने कहा तू किसी से बात मत कर। मैं तेरे साथ हूँ। निर्णय तो क्या तू देखना क्या होता है। जिला सत्र न्यायाधीश ने न मुझे दोषमुक्त किया बल्कि गवर्मेन्ट आफ मध्यप्रदेश को एक कड़ी फटकार दी कि बिना किसी बुनियाद के प्रथम श्रेणी के अफसर को कोर्ट में क्यों बुलाया गया। मुझे सरकारी सारे फायदे मिलते हुये शीघ्र ही सिविल सर्जन की पदोन्नति प्राप्त हुई।

अभी दिनॉंक १४ से १८ तक एनटीपीसी कोरवा में मुख्य अतिथि के रूप में शान्तिकुँज को निमंत्रित कियाथा। मैने उनके शिक्षण शिविर में लगभग १७ डिस्कोर्सेस दिये जिसमें ७ इंग्लिस में थे। श्री वीरेश्वर चौधरी जो गायत्री परिवार के मुख्य कार्यकर्ता हैं बतलाते हैँ कि एक बार मैने आचार्य जी का साहित्य पढ़ा और मुझे लगन लग गई मुझे आठ घण्टे आफिस में काम करना पढ़ता है फिर भ्ज्ञी न जाने कैसे मैने २४ हजार का अनुष्ठान किया नवे दिन मुझे पाँच हाजार का जप करना था मैने आफिस कीछुट्टी ली और बिना खाये पिये अनुष्ठान करने बैठ गया। बैठने की बिल्कुल आदत न थी फिर भी मैने जैसे ही आखिरी माला पूरी की वैसे ही मैने गुरुजी को अपने कमरे की दीवाल पर बहत जोर से अट्ठहास करते सुना। वे बोले तूने जंग जीत लिया। उस दिन से मेरी श्रद्धा बहुत बढ़ गयी ओर नियमित आफिस से लौटने के बाद मैं न घरबार देखता था न चाय पीता था और थेला लेकर निकल जाता था। जैसे ही मैने थेला टांगा कि हमारी श्रीमती जी नाराज होती रहती और तब तक बोलती रहती जब तक मेरे कान सुन सकते थे। एक दिनतो वह इतनी नाराज हुई कि उन्होंने मेरा थेला छीन लिया। मैं बैठ गया मैने गुरुजी को पत्र लिखा। गुरुजी या तो इसका बड़बढ़ाना बन्द हो जाये या यह थेला अब आपके पूजा स्थान पर ही रहेगा। मैने बहुत नाराज होकर पत्र लिखा। मेरी पत्नि की शिकायत थी कि उनके कोई पुत्र नहीं था और मैं कोई इलाज भी नहीं कराता था। माताजी का बड़ा स्नेह भरा प्रतिउत्तर आया कि तुम्हें शीघ्र ही पुत्र प्राप्त होगा और बहू को मेरा बहुत आशीर्वाद कहना एक साल बाद हमको एक पुत्र प्राप्त हुआ।

मैं बहुत लगन से गायत्री परिवार का काम करता हूँ। और जब से कोरवा में एनटीपीसी स्थापित हुई है तबसे सुपरवाईजर के ही पद पर हूँ। क्योंकि बुराई चाहे जिसकीहो कितने बड़े अफसर की भी हो मैं बोलने में नहीं चूकता। पर मुझे कई प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं और क्षमतायें प्राप्त हुई। जैसे १- क्या होने वाला है मुझे मालुम पड़ जाता है। उदाहरण के लिये मैं स्कूटर पर जा रहा था सामने एक लड़का साईकिल पर आ रहा था मुझे किसी ने कहा यह लड़का तुम्हारे स्कूटर पर गिरेगा और वह गिरा। मैने स्कूटर बचा ली। ऐसी घटनायें लगभग प्रतिदिन हुआ करती है। २-मुझे किसी भी व्यक्ति को देखकर यह मालुम पड़ जाता है कि यह व्यक्ति अन्दर से कैसा है साथ में यह कोई दिव्य आत्मा है या नहीं मैने पूछा आज बतला सकते हैं उन्होंने कहा नहीं कुछ दिनों से गुरुजी नाराज हैं लेकिन यह सारी शक्ति बहुत जल्दी मुझे मिलने वाली हैं। मैने कहा इस थोड़े समय में जितना मैं आपको पहचान पाया हूँ आप गिने चुने अच्छे कार्यकर्ताओं में है लेकिन किसी को भी ऐसे शब्द नहीं कहना चाहिए या बुराई भी नहीं बतलाना चाहिए यदि तुम्हें उससे अच्छाई की ओर ढकेलने के लिये विश्वास न हो। जब तक कोई शिक्षा लेने की स्थिति में न हो तब तक अच्छी शिक्षा भी नहीं देनी चाहिए।

मैने मन्दिर बनवने की सोची ओर यहाँ के प्रमुख कार्यकर्ता एस०एन०सिंह के साथ शान्तिकुँज गया। माताजी से प्रार्थना की माताजी मैं मन्दिर बनवाना चाहता हूँ श्री एस०एन०सिंह जी बोले माताजी मन्दिर बनाने के लिये गुरुजी नेमना किया है। माताजी ने कहा तेरा क्या नुकसान कर रहा है। बेटा तू मन्दिर बनवा। मैने बनवाना आरम्भ किया लेकिन कोई भी मुझे सहयोग देने को तैयार नहीं था तीन बार मैं हारकर थक गया औरघर पर बैठ गया हर बार मुझे गुरुजी का आभास होता वह कन्धे पर हाथ रखते और कहते चल मैं तेरा मन्दिर बनवाता हूँ और जबजब मैं फिर काम में लगता तो लोग पैसा देते सीमेन्ट देते और मजदूर भेजते और मेरा मन्दिर बनकर तैयार हो गया।

जब मैं मन्दिर के लिये मूर्ति लेने गया तो मेरे पास केवल आठ हजार रुपया थे कोई भी मूर्ति १२ हजार से कम की नहीं थी पर अचानक एक दूकान में पिछली मूर्तियों से भी बड़ी और सुंदर ७ हजार रुपये में मिल गयी। मैने गुरुजी से प्रार्थना की थी गुरुजी इस बार मेरा काम करदो आइन्दा मैं कभी भी दूसरों का पैसा लेकर गायत्री परिवार का काम करने नहीं आऊगा। मूर्ति जब ट्रेन से लायी गयी तो बहुत सम्भालकर लाने पर भी बिलासपुर स्टेशन पर वह गिर गयी और तीन बार पल्टी खा गई। सात दिन तक मैने मूर्ति खोली नहीं क्योंकि वह टूटी मिलेगी मै रोज रोता और कहता गुरुजी बचाओ सातवे दिन खोली तो वह बिल्कुल ठीक थी। इसे मैं गुरुजी की कृपा ही समझता हूँ। एक और बात जब मैं किसी का हाथ देखता हूँ तो मुझे रेखाये बोलती सुनाई देती हैं। मुझे समझ में आ रहा है यदि मैं अपने स्वभाव का कड़वापन छोड़ सकूँ तो शायद मैं अपने जीवन को पवित्र बना सकूँगा।

लक्ष्मण अग्रवाल जूना लाइन बिलासपुर म०प्र० फोन नं० ०१७७५२ फेक्स ४६६३६ निवास २०७३८, २०४१९

मेरे २ पुत्र है मनोज और राजू निम्रलिखित इंटरव्यू लक्ष्मण अग्रवाल जी ने ब्रह्मवर्चस में दिया। गायत्री यज्ञ से मेरा प्रथम परिचय छज्जूलाल शर्मा जी ने कराया। थोड़ी श्रद्धा जमी और १९७० में १०८ कुण्डीय यज्ञ का भागीदार बना। मैं तम्बाखू सिगरेट पीता था। और लखनऊ की एक बाबा छाप ३०१ तम्बाखू बिलासपुर में इतनी प्रसिद्ध थी कि कलेक्टर एवं अन्य बड़े अफसर भी मेरे पास उसी के लिए आते थे। मेरे जीवन का पहला चमत्कार सन् १९७३ में तब हुआ जब मैने एक राइस मिल किराये पर ली। तत्कालीन कलेक्टर मि०सरदार भाटिया ने ६००० क्विंटल लेवी लगाई और मेरा १० लाख रुपये का सामान जप्त कर लिया। मैं हरियाणा का रहने वाला हूँ और यदि मैं वह न दे सकता तो मेरी गिरफ्तारी निश्चित थी। मैं गुरुजी के पास गया गुरुजी ने कहा। तू अपनी तरफ से प्रयास कर और मैं तेरा सारा काम निपटा दूँगा मेरे १५ हजार रुपये खर्च हुये और मेरा सामान कलेक्टर ने वापिस कर दिया। इसके बाद मैं यज्ञों में सक्रिय भाग लेने लगा। डी०एम० मेरे ऊपर बहुत नाराज था और वह किसी न किसी मामले में मुझको बन्द कर देगा ऐसा लगभग निश्चित था। पर गुरुजी के आशीर्वाद से उनके ट्रांसफर होने से मेरी सारी समस्या सुलझ गई। मैने गुरुजी से कहा गुरुजी कमेटी यज्ञ का हिसाब नहीं रखती है इसलिये मैं उसमें भाग नहीं लूँगा। गुरुजी ने कहा तू दूसरे की चिन्ता न कर वे क्या करते हैं अपना काम कर और उसे ईमानदारी से कर। मेरी लड़की की शादी की मुझे बड़ी चिन्ता थी पर गुरुजी के आशीर्वाद से एक बहुत बड़े घर में बहुत अच्छे लड़के से बिना किसी विशेष दहेज के हो गई। मुझसे जो कुछ भी सम्भव होता था जीप से लेकर जमीन तक समय-समय पर मैं मिशन की सेवा करता रहा। मेरे लड़की की कपड़े की दूकान थी वह खूब बढ़ी और मेरा आज २ करोड़ रुपये का प्लाण्ट है। मेरी लड़की ससुराल में एक ऐसी बीमारी थी जिसमें बच्चे बचते ही नहीं थे। मैने उनको मिशन के सहयोग में लगाया और गुरुजी से भी मिलाया उसके बाद उनके किसी बच्चे की मृत्यु नहीं हुई। गुरुपूर्णिमा पर मैने डेढ़ लाख रुपये का अनुदान प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त एक गाड़ी भी मिशन को प्रदान की। मेरे एक मित्र दशरथ लाल खण्डेलवाल जिनके बड़े लड़के ने आत्महत्या कर ली थी और वे बहुत अधिक परेशान थे वे जब गुरुजी से मिले तो उन्होंने कहा कि उस लड़के की आत्मा अभी वहीं घूम रही है मुझे आना पड़ेगा। गुरुजी गये उसके बाद से उनके सारे दुख दूर हो गये। लक्ष्मण अग्रवाल जी कहते हैं कि मैं गुरुजी पर बिक गया हूँ पर आँवलखेड़ा पर मेरे डेढ़ करोढ़ रुपये का एक नया प्लाण्ट आरम्भ होने वाला था मैं आशीर्वाद नहीं पा पाया। और मैं लौट गया।

रजनीकाँत द्विवेदी पीएचडी जियोलाजी वे कहते हैं मैंने गुरुजी से पूछा गुरुजी आप बुद्ध के अवतार हैं। गुरुजी चुप रहे। मैं जन्म कुण्डली देखना थोड़ा बहुत जानता हूँ। और उसके अनुसार गुरुजी अतिसूर्य के स्तर के हैं।

मैंने कई बार विशिष्ट अनुभूतियाँ की। जैसे जहाँ सप्तऋषि बने हुये हैं वहाँ मैं एक विशेष सुगन्ध का अनुभव करता हूँ। मैं शान्तिकुँज में अपने अहंकार को गलाने के लिये ६-६ माह के समयदान के बढ़ौत्री के साथ ९ वर्ष से यहाँ हूँ। सन् २००० के बाद चला जाऊँगा मेरा विशेष कार्य उन पुरातत्व तत्वों को ढूढ़ना है जो बतलाते हैं कि जहाँ-जहाँ अश्वमेध यज्ञ हुये हैं वहाँ पहले भी बहुत बड़े यज्ञ हुये हैं। मैंने कभी नौकरी नहीं की और न करूँगा। मेरे पास अपना पैसा है। बाकी सब कुछ मेरे गुरुज्ी हैं। आज की स्थिति में जो कुछ हो रहा है और होगा वह हरएक के कर्मफल की प्रतिक्रिया होगी। आगे समय बहुत गम्भीर है पर परिणिति एक नये सृजन जैसी होगी।

वेदनारायण त्रिपाठी उन्नाव सन् १९५५ में मैं अखण्ड ज्योति पत्रिका से जुड़ा सन् १९५६ में मैं नरमेध यज्ञ में गया। १९४२-४३ में मैने काशी विश्वविद्यालय से बी०ए० किया। नरमेध यज्ञ में मैं पहाड़िया जी के साथ था गुरुजी ने यह हिदायत दी थी कि दो महापुरुष हिमालय से आयेंगे उनसे बात नहीं करना। स्पर्श नहीं करना वे आधा सेर उबले सेव केला दही खायेंगे एवं उनकी पत्तल जमीन में गाड़ देना मैने एक अनुभूति यह भी की कि गुरुजी को दो स्थानों पर एक पर प्रवचन करते और एक पर बातचीत करते देखा। गुरुजी ने मुझसे देखा तेरे बच्चे एमबीबीएस एमटेक होंगे तू मेरा काम कर।

एक बार बिहार के पूसा यूनिवर्सिटी के मेरे एक मित्र मेरे साथ मथुरा गये और गुरुजी के घियामंडी के मकान में ही ठहरे। उनको प्रातः टायलेट नहीं मिला तो कमरे में ही वे निवृत्त हुये पर गुरुजी ने कुछ नहीं कहा और स्वयं ही उसे साफ कर लिया बाद में मेरे मित्र ने बतलाया कि ऐसी गलती मुझसे हुई। मेरा लड़का जो इंजीनियर है उसको संगमरमर काटने की एक मशीन का पेटेण्ट चाहिए था जो कि वह विदेशी इंजीनियर उसे बताना नहीं चाहता था और बड़ी भारी कीमत माँग रहा था बजब मेरा बेटा एकदम निराश हो गया तो वह इंजीनियर आया और बोला कि मैं तुम्हें वह सारी टेकनिक बता दूँगा और कोई पैसा नहीं लूँगा। वेदनारायण जी बतलाते है कि मुझे क्षेत्रों में बहुत अनुभव हुये। एक बार गुण्डो ने मेरा मकान घेर लिया और वे लूटना चाहते थे पर अचानक वहाँ के एसएसपी एस०के० शुक्ला आ गये और रातोरात उन सबको बन्द कर दिया एक बार मैं अपने साथी श्रीराम बाजपेई के साथ शान्तिकुँज आया और ६, ७ बड़े बण्डल तथा अन्य सामान लेकर वापस लखनऊ जाना था बहुत अधिक भीड़ थी हमारा सामान तो चढ़ गया पर सारे बण्डल स्टेशन पर ही रह गये। पर जब थोड़ी देर बाद हमने देखा तो सारे बण्डल गाड़ी में चढ़ गये थे।

कृष्णकांत तिवारी जो ब्रह्मवर्चस में स्थायी कार्यकर्ता है बतलाते हैं कि मेरी छोटी बहिन के ससुराल वाले बहुत परेशान करते हैं। एक बार तो उनके पति उन्हें पहाड़ से ढकेलने ही वाले थे कि किसी प्रकार बच गई। उसने गुरुजी से बहुत रो रो कर प्रार्थना की गुरुजी ने कहा तुझे अपने पैरो पर खड़ा करना होगा बाकी रक्षा मैं करूंगा। वह अकेली रहती है उसका एक बच्चा है जब कोई परेशानी बाहर का आदमी या ससुराल वाले परेशान करने आते है तो वे हर समय एक काले नाग और नागिन को देखते हैं और मैं हमेशा सुरक्षित हूँ।

ध्रुवनारायण जौहरी दिनॉंक ३०-४-९९ को एक इंटरव्यू में उन्होंने बतलाया यद्यपि मैं धार्मिक परिवार का सदस्य हूँं पर परम्परागत किसी धर्म को मैं नहीं मानता। सन् १९५८ में मैने गुरुजी से कहा कि मैं दीक्षा लूँगा पर अकेले। गुरुजी ने उपवास करने के लिए कहा और दूसरे दिन बुलाया पर दूसरे दिन एक व्यक्ति और आ गया मैं उठ गया। मैने कहा गुरुज्ी मैने आपसे कहा था कि मैं दीक्षा अकेला लूँगा। गुरुजी ने दूसरे दिन फिर मुझे दीक्षा दी। समय-समय पर गुरुजी से मुझे भौतिक सहायता मिली। पर मैं अनुभव करता हूँ कि मेरे कर्मों के अनुसार और मेरा जैसा स्वभाव था गुरुजी ने मुझे नर्क के गर्त से निकालकर सही रास्ते पर लाया। मेरी यह भटकती जीवात्मा कई जन्मों से गलत रास्ते पर थी और गुरुजी की सबसे बड़ी कृपा यह है कि अत्यन्त करुणावश होकर ही अहैतू कृपा के रूप में मुझे सही रास्ते पर खड़ा किया अन्यथा सौ कल्पों में भी हमारी अपनी ताकत इसे सम्भव नहीं कर सकती ऐसा मुझे पूरा विश्वास है। मुझे उस सड़क पर खड़ा कर दिया जहाँ का रास्ता इंसानियत का है।

सोनीपत के मित्तल जी ने आज दिनाँक १७-६-९९ को बताया कि मेरे पिताजी गुरुजी को लुधियाना ले गये थे। और ऐसा उन्होंने इसलिये किया कि उन्होंने एक सपना देखा कि ऋषि विश्वामित्र ही पण्डित श्रीराम शर्मा जी के रूप में अवतरित हुये हैं। वे शिवभक्त थे। लुधियाना के सर्वधर्म सम्मेलन में गुरुजी का भाषण हुआ विषय था भारतीय संस्कृति। उनको केवल १५ मिनट का समय दिया गया था परन्तु गुरुजी ने इतने कम समय में बोलने की स्वीकृति नहीं दी। फिर उनको एक घण्टे का समय दिया गया उसमें उनको विशेष सम्मान के रूप में पंजाब सरकार ने लाइट आफ इंडिया के सम्मान से विभूषित किया तथा हाथी पर बिठालकर शंकराचार्य की तरह चाँदी का छत्र लगाकर रमेश शुक्ला जी के साथ शहर में शोभायात्रा भी निकाली।

श्री रजनीकांत भाई बड़ौदा, गुजरात

कुछ ३५ साल पहले गुरुदेव बड़ौदा शहर में यज्ञ के लिए आए थे। उस समय हमारा उनसे कोई परिचय नहीं था। लेकिन दूसरी बार जब गुरुदेव आए तब गुरुदेव जहाँ पर ठहरे थे वहाँ की परिस्थिति उन्हें अनुकूल नहीं लगी। लीलापति जी उनके साथ थे लीलापति जी हमारे स्कूल में आए। हमारे स्कूल का नाम है श्रेयस विद्यालय। श्रेयस स्कूल के सामने बहुत बड़ा खुला मैदान है कम से कम डेढ़-दो लाख स्केयर फीट एरिया खुला है। तो गुरुदेव को यह जगह अच्छी लगी इसलिए गुरुदेव वहाँ ठहरे गुरुदेव आए हमें बड़ी प्रसन्नता हुई हमने उनका स्वागत बड़ी अच्छी रीति से किया। तब से हमारा गुरुदेव के साथ सम्बन्ध शुरु हो गया। बाद में गुरुदेव जब-जब बड़ौदा आए श्रेयस स्कूल में ही ठहरे और हमारा मथुरा आना जाना शुरु हो गया और बाद में जब गुरुदेव हरिद्वार आए तो हमारा हरिद्वार आना जानाशुरु हो गया। पहले तो जिन्दगी में कभी एक बार भी हरिद्वार नहीं आए थे परन्तु गुरुदेव के आने के बाद हरिद्वार की यात्रा तो यात्रा ही हो गई। मालुम नहीं कितने बार हम हरिद्वार आए। यह जो स्कूल हम चला रहे है यह हम सात भाइयों ने शुरु किया था। युग निर्माण पत्रिका में गुरुदेव ने एक आर्टीकल लिखा और गुरुदेव ने बताया कि इन सात ऋषियों ने यह स्कूल चलाया है। पाक्षिक में गुरुदेव ने इन सात ऋषियों के बारे में अच्छा विवरण दिया है। मालुम नहीं इसके लिए हम आज कितने लायक सिद्ध हुए लेकिन गुरुदेव ने एक बहुत लम्बा चौड़ा आर्टीकल युग निर्माण में लिखा था। गुरुदेव बड़ौदा जब आते थे सारे गुजरात के लोग गुरुदेव से मिलने वहाँ स्कूल में आ जाते थे।

गुरुदेव के प्रति हमारा आकर्षण यह रहा कि गुरुदेव गाँधी वादी थे। वे साबरबती आश्रम में गाँधी जी के पास जाते थे। गुरुदेव खादी पहनते थे। सामाजिक उत्थान में उनकी रुचि थी। यह सब चीजें हमें इसलिए अच्छी लगी कि यह एक सच्चे सन्त हैं। क्योंकि आजकल के जो बाबाजी है वह मंजीरा बजाते हैं तंबूरा बजाते हैं लेकिन समाज के प्रति इनकी जो जिम्मेदारी है उसे नहीं जानते हैं तो हम सोसलिस्ट मूवमेन्ट में थे जयप्रकाश जी के साथ। इसलिए हमें लगा कि यह एक ऐसा सन्त है जो सामाजिक उत्थान करना चाहता है। इसीलिए उनके प्रति हमारा भाव और भी बढ़ गया। गुरुदेव के प्रति हमारा जो लगाव बड़ा उसके कई संस्मरण हमारे पास हैं। जिससे लगता है कि गुरुदेव आज सदेह नहीं है फिर भी उनका सूक्ष्म शरीर पथप्रदर्शन और मार्गदर्शन आज भी देता है।

एक बात मुझे याद है कि गुरुदेव बड़ौदा आए थे बड़ौदा से गुरुदेव पोरबन्दर में यज्ञ था। उस समय तो ऐसी बात थी कि युवक लोग चाहते थे कि जो भी आदमी यज्ञ करवाएँ यज्ञ को भंग करदो उसे तोड़ दो क्योंकि यज्ञ में जो घी की आहूति पड़ती है देश को बहुत घाटा पड़ता है इसलिए यह यज्ञ नहीं होने चाहिए। ऐसी मान्यता हमारे युवक वर्गों में थी लेकिन पोरबन्दर में इससे पहले भी जो एक हजार कुण्डीय यज्ञ हुआ था उससे युवकों की मान्यता थी कि इसमें घी और अन्न का बहुत नुकसान होता है इसलिए यज्ञ का बहिष्कार करो। लेकिन वह यज्ञ हो गया और उनसे कुछ न हुआ। दूसरी बार जब गुरुदेव पोरबन्दर आए थे हम बड़ौदा से साथ में निकले और सारसा पहुँचे। रात का समय था बारह साढ़े बारह बजे गुरुदेव सारसा पहुँचे और गुरुदेव का दो ढाई बजे तक प्रवचन हुआ और सुबह सात बजे सारसा से पोरबन्दर जाने के लिए हम लोग निकले। हमारे साथ दो तीन गाड़ियाँ थीं एक गाड़ी में गुरुदेव माताजी जैराम भाई और मैं और जयराम भाई की पत्नी बैठी थी पीछे की गाड़ियों में दूसरे भाई लोग आ रहे थे। तो हमारा रास्ता बहुत लम्बा था तो एक भाई साहब जो एग्रीकल्चर के बहुत बड़े अफसर थे उनका एक बहुत बड़ा फार्म था उनकी गुलाब की खेती थी हम वहाँ जाकर ठहरे गाँव की महिलाएँ कलश लेकर गुरुदेव के स्वागत के लिए आए। गुरुदेव ने कहा कि ये लोग आ रहे हैं उनके लिए कुछ बोल दो तो मैंने कुछ बोला पर क्या बोला यह याद नहीं। बाद में वहाँ भोजन हुआ उसके बाद हम गाँव से निकले और नटवर लाल जानी के यहाँ पहुँचे और उनके यहाँ ठहरे। वहाँ गुरुदेव ने स्नान किया चाय पी और नास्ता किया और बाद में राजकोट से पोरबन्दर के लिए हम निकल गए। रातकोट और पोरबन्दर का रास्ता करीबन चार-साढ़े चार घण्टे का है। तो इसलिए हम लोग शाम को निकले और बड़ी देर से पोरबन्दर पहुँचे पोरबन्दर में रास्ते में बादल मंडरा रहे थे और बारिश के छींटे भी आ रहे थे तो वहाँ पोरबन्दर में स्टेशन पर ठहरे और गुरुदेव जहाँ पर उनका मुकाम था वहाँ पर पहुँच गए। बाद में सुबह जो शोभायात्रा निकली गुरुदेव और माताजी शोभायात्रा में निकले दो दिन तक वह यज्ञ रहा। और दो दिन के बाद हम वापस आए पोरबन्दर में हमने यह देखा कि वहाँ बड़े बड़े पोस्टर थे श्रीमाँ के जैसे होते हैं उसमें गायत्री माता का चित्र था, श्रीरामकृष्ण महाराज का चित्र था गुरुदेव का चित्र था और उसमें ऐसे बताया गया था कि गायत्री माता का प्रकाश श्रीरामकूष्ण परमहंस जी पर पड़ रहा है और श्रीरामकृष्ण जी का प्रकाश पूज्य गुरुदेव पर पड़ रहा था। तो ऐसे बड़े-बड़े पोस्टर पोरबन्दर में लगे थे। उसका मायने यह था कि गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस हैं। पोरबन्दर से हम बड़ौदा वापस आ गए और पोरबन्दर से बड़ौदा वापिस आने के बाद गुरुदेव को महाराष्ट्र में जाना था इसलिए वहाँ से हम बड़ौदा से नवसारी के लिए रवाना हो गए। नवसारी में एक भावसार भाई जिनके यहाँ हम ठहरे उनका मकान सोसायटी में था। वहाँ हम ठहरे वहाँ से गुरुदेव को लेने श्रीराम पुर से लोग वहाँ आए थे तो उनके घर पर हम रहे। जब हम बड़ौदा से नवसारी के लिए निकले तब गुरुदेव पीछे बैठे थे और जयराम भाई आगे की सीट में थे तो हमारे जयराम जी भाई ने गुरुदेव से सीधा प्रश्र पूछा कि गुरुदेव हमने बड़े-बड़े पोस्टर पोरबन्दर में देखे तो क्या यह सच बात है कि आप ही रामकृष्ण परमहंस जी हैं। यह सीधा प्रश्र गुरुदेव से पूछा गया था। इसलिए गुरुदेव ने दो मिनिट के लिए मौन रखा कुछ जवाब नहीं दिया लेकिन फिर उन्होंने स्वयं अपने मुह से यह कहा कि हाँ मैं हूँ लेकिन जिसने यह कहा उसे नहीं कहना चाहिए था। जो भाई ने यह बताया उन्हें यह बताना नहीं चाहिए था। हम जानते है कि यह घटना घटी उसके कई सालों बाद गुरुदेव ने स्वयं बताया था कि उनके पूर्व के जो तीन जन्म हैं उनमें एक जन्म रामकृष्ण परमहंस का भी था। यह सिद्ध होता है कि गुरुदेव ने जो बात नवसाारी जाते समय बताई थी वह एक सत्य घटना है। और स्वयं ने बताई है इसलिए उसकी प्रमाणिकता है।

उद्धव ने कहा भक्ति को छोड़ो ज्ञानमार्ग को पकड़ों तो गोपियाँ बोली-उद्धव नाही मन दस बीस, एक हुतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश हे उद्धव जी आप कहते हैं कि ज्ञानमार्ग पकड़ो लेकिन हमारा तो एक मन है और वह भी कृष्ण लेकर भाग गया दूसरे कौन से मन से ज्ञान मार्ग की आराधना करें।

जब मथुरा से गुरुदेव हरिद्वार के लिए निकले तो सुबह साढ़े दस बजे से प्रणाम का सिलसिला चालू हो गया था लोग प्रणाम के लिए आते थे गुरुदेव रोते भी थे। रोते इसलिए थे कि उन्हें मालुम नहीं था कि वह वापिस मथुरा या हरिद्वार कब आएँगे। वे हिमालय जाने वाले थे। जब मेरी बारी आई तो उन्होंने माथे पर हाथ फेरकर कहा कि बेटा अब मालुम नहीं कि दुबारा कब मिलेंगे और जीवन में कोई ऐसी घटना आएगी तो हम दुबारा मिलेंगे फिर से। ऐसा गुरुदेव ने बताया था लेकिन जब रोते थे तो गुरुदेव कहते थे कि मैं कितना अभागा हूँ कि मुझे इस जीवन में कोई विवेकानन्द नहीं मिला। विवेकानन्द न मिलने से गुरुदेव बहुत व्यथित और दुखी थे। वह चाहते थे कि अब मैं मथुरा छोड़कर हरिद्वार जा रहा हूँ लेकिन इस मिशन को संभालने के लिए कोई विवेकानन्द मुझे नहीं मिला है उसका मुझे बहुत रंज और बहुत खेद है। यह बात गुरुदेव बतला रहे थे और यह बात बतलाते बतलाते गुरुदेव रोते भी रहे।

एक घटना जीवित करने वाली समझने वााली है- नवसारी में मगन लाल भावसार नामक एक व्यक्ति रहते थे गुरुदेव के बड़े भक्त थे उनको तीन चार बार हार्ट अटैक आ चुका था। एक बार आनन्द में गुरुदेव आए थे वहाँ मगनभाई भी आ गए थे और वहाँ उनको हार्ट अटैक आ गया। आदमी को कम से कम दो बार तीन बार हार्ट अटैक आए तो कभी जीवित नहीं रहता लेकिन इनको तो कई बार हार्ट अटैक आ गया था इसलिए यह हार्ट अटैक इतना तीव्र था कि उनके बचने की कोई आशा नहीं थी ऐसा लगा कि मगन भाई चल बसे। गुरुदेव को बताया गुरुदेव आए और उन्होंने कहा मगन भाई चल उठ और मगनभाई सीधे उठकर खड़े हो गए। तो गुरुदेव का प्रभाव मृत्यु पर भी था। व्यक्ति पर तो प्रभाव हो सकता है पर जो कुदरती तत्व है वायु है, प्रकाश है, ऐसे जो कुदरती तत्व है मृत्यु है इन पर प्रभाव डालना बहुत कठिन काम है पर गुरुदेव ने यह भी करके बतलाया।

श्रीमती निर्मला देवी विनोबा आश्रम

यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि हमारे बीच दो विशिष्ट अतिथि शान्तिकुँज पधारे हुए हैं। एक है निर्मला दीदी जो बाबा विनोबा के विचार जगत की उत्तराधिकारिणी या शिष्या के रूप में विख्यात हैं और दूसरे है रमेश भैया जो अखिल भारतीय रचनात्मक समाज के महामंत्री हैं। आप दोनों काशान्तिकुँज में स्वागत है। आपके पास समय कम है परन्तु हम कुछ जिज्ञासायें रखेंगे शान्तिकुँज को गुरुदेव ने गाँधी और विनोबा का आश्रम कहा है। यहाँ के प्रत्येक नरनारी के हृदय में उनके प्रति असीम श्रद्धा है। यह बहुत सी बातें हैँ कार्य करने के जो प्वाइंट है कार्य करने के जो तरीके हैं उनमें भिन्नता जरूर देखी जा सकती है। पर हृदय से हम लोग अभिन्न अनुभव करते हैं। सबसे बड़ी बात आप विनोबा जी के भूदान यात्रा में करीब करीब बारह तेरह साल रहीं और उसके बाद इतने दिन और बीत गए तो जैसा उनका लक्ष्य था आप कैसा अनुभव करती हैं कि हम सही दिशा में चल रहे हैं या कोई और बाधाएँ हैं जिन्हें दूर करना पड़ेगा।

सारा संसार ईश्वर की ओर वसुधैव कुटुम्बकम की ओर जाने अंजाने बढ़ रहा है। वैसे संसार में दो धाराएँ हैं। एक तो वे व्यक्ति हैं जिनमें बहुत सारी बाधाएँ दिखाई पड़ती हैं और दूसरी धारा है जो हमें लक्ष्य की तरफ ले जा रही है। जैसा पूज्य गुरुदेव ने देखा था कि आने वाली सदी आध्यात्मिक पुर्नजागरण की सदी होगी। उनके जैसे महापुरुष देख लेते हैं हम लोग देख नहीं पाते। पूज्य विनोबा जी भी अक्सर कहा करते थे मैं देख रहा हूँ कि आने वाला युग अहिंसा का है। जब हमने पूछा कि आप कहते हैं कि मैं देख रहा हूँ इसके क्या माने हैं। हम लोग तो उनके बच्चे जैसे थे तो बच्चे माँ बाप के साथ बेतकल्लुफी से पेश आते हैं ऐसे सवाल उनसे किया करते थे उन्होंने कहा कि जैसे तुम्हें अपनी आँखों से देख रहा हूँ वैसे ही आने वाले समय को भी देख रहा हूँ। तब मैं चौंक गई और आगे कुछ पूछा नहीं। उन्होंने कहा कि ईश्वर यदि नहीं चाहता होता तो मुझे भूदान माँगने की प्रेरणा नहीं देता और लाखों लोगों को भूदान देने की प्रेरणा नहीं देता। यह उसी की प्रेरणा है। यदि ईश्वर हिंसा युद्ध को चाहता होता तो मेरे हाथ में भी शस्त्र होता। ईश्वर की इच्छा के खिलाफ तो कोई कुछ नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि आज जो यह भूदान आन्दोलन चल रहा है यह ईश्वर की प्रेरणा से चल रहा है और इसीलिए हमें विश्वास रखना चाहिए कि आने वाला युग अहिंसा का है। आध्यात्मिकता का है और जैसा वेद में कहा है-यजरं विभ्रति बहुधा विवाचसं नाना धर्मानाम पृथ्वी यथौकसं। प्रकृति एक छोटा सा घोसला बनने वाली है बल्बि विनोबा जी ने अपने एक आश्रम का नाम ही दिया था विश्वनीलम यत्र विश्वम भवं एकनीलम जो वेद में मंत्र है। और जय जगत तो उन्होंने करोड़ों कंठों से बुलवाया। बल्कि उस समय के पूर्वी पाकिस्तान में गए थे तो वहाँ भी सबसे यही मंत्र बुलवाया। आपने जैसा कहा हमें बड़ी प्रेरणा मिलती है कि आप और हम एक ही मार्ग के पथिक हैं। और महात्मा गाँधी पूज्य विनोबा जी पूज्य गुरुदेव वह हमें उसी राह पर ले जा रहे हैं। अभी एक सामयिक है अन्त में तो हम पूर्ण अहिंसा की ओर तो जाएगे परन्तु जैसे बाबा कहते थे कि परमाणु बम को अहिंसा का शस्त्र मानते थे क्योंकि जहाँ परमाणु बम बन जाएगा तो लड़ाई बन्द हो जाएगी। क्योंकि इसमें तो कोई जीतता नहीं कोई हारता नहीं तो क्या यह जो कदम उठा है कोई अमुक देश हम नाम नहीं लेते मानलो परमाणु बम बना लिया हमारे पड़ौसी ने तो हम भी परमाणु बम बना लें तो हम लोग अहिंसा की तरफ ही बढ़ेंगे। बात यह है कि हम लोगों का परमाणु बम बनाना हमारा हो या पड़ौसी का हो किसी का हो इसे आज की परिभाषा में कहेंगे तो एक बचकाना हरकत कही जाएगी। अब तो परमाणु अस्त्रों को समाप्त करने का युग आ रहा है खैर अब नहीं रहा लेकिन पूर्व सोवियत यूनियन और अमेरिका दोनों के राष्ट्रपतियों ने मिलकर परमाणु युद्ध को समाप्त करने और परमाणु अस्त्रों को कम करने के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए तो हम लोग बनाए इसके कोई मानी नहीं है हमको कोई नया चिन्तन करना चाहिए। मतलब हम बनाले इससे युद्ध रुकेगा इसे तो आप मानेगी। युद्ध होगा ही नहीं। सवाल यह है कि युद्ध का जमाना बीत गया विनोबा जी जो अक्सर कहा करते थे। युद्ध का जमाना बीत गया बुद्ध का जमाना आ रहा है।

एक चीज जो बाबा विनोबा ने बहुत ज्यादा जोर दी वह है सामूहिक साधना। हमारे गुरुदेव ने भी सामूहिक साधना को बहुत जोर दिया। राष्ट्र की कुण्डलिनी जागरण की बात उन्होंने कही तो क्या आप यह मानती है कि पूरे देश को भले ही कम देर की सामूहिक साधना हो एक समय में की जाए सब लोग मिलकर एक जैसी साधना एक जैसा मंत्र चलिए एक जैसा मंत्र न भी हो एक सामूहिक साधना की आवश्यकता है और इससे जो मनमानस है जो हम देखते हैं कि दूषित है जिसमें ईर्ष्या है द्वेष है आशंकाएँ हैं नाना प्रकार की यह दूर होंगी। सामूहिक साधना इस युग का मंत्र ही है। विनोबा जी कहते थे कि सामूहिक साधना का प्रथम आचार्य तो बालक प्रह्लाद है। जब उसके सामने भगवान साक्षात प्रकट हुए और कहा कि तुमको मोक्ष देता हूँ तो प्रह्लाद ने कहा नैतान विहाय कृपणान विमुक्षये कहः मैं ऐसा कंजूस नहीं हूँ कि अकेला ही मोक्ष को पाऊंगा। मैं सबको साथ लेकर मोक्ष को पाना चाहता हूँ। उनने कहा कि उस छोटे से बच्चे ने कहा था इस युग में हमको व्यक्तिगत साधनाएँ चलती हैं चलने दीजिए लेकिन इस युग के अनुकूल है सामूहिक साधना और सामूहिक साधना, सामूहिक मुक्ति इसकी तरफ हमें बढ़ना है और इसी उद्देश्य से उन्होंने ब्रह्मविद्या आश्रम बनवाया जो ब्रह्मचारिणी बहनों की सामूहिक साधना का स्थाान है। उसकी स्थापना की थी। बल्कि रामकृष्ण परमहंस को जहाँ समाधि का अनुभव हुआ पश्चिमी बंगााल की यात्रा में मुझे याद है एक वृक्ष के नीचे बैठे थे विनोबा जी तो लोगों ने बताया कि यहीं पर उन्हें समाधि का अनुभव हुआ। तो विनोबा जी ध्यानस्त बैठ गए और कहने लगे रामकृष्ण देव को जो अनुभव अपने जीवन में आया वह अनुभव समाज को आए इसके लिए अब हमें सामूहिक साधना करनी होगी।

सामूहिक साधना में बाबा तो कर्म करते हुए या तो जप या पाठ को कहते थे या एक ऐसा पाठ या स्त्रोत जो सब आधा घण्टे या बीस मिनट के लिए करें और बाकी समय काम करें तो ऐसा ही स्वरूप आप देखती हैं कि सब देश एक जैसे पाठ को या एक जैसे समय को एक भावना से भगवान के नामों का जप करें या और कुछ आप सोचती हैं।

इसके विभिन्न तरीके हो सकते हैं। पहले तो जैसे गाँधी जी के जमाने में सर्वधर्म प्रार्थना चलती थी सब धर्मो के चुने हुए अंश लेकर वह चला। फिर विनोबा जी ने ऊँ तत्सत श्री नारायण स्त्रोत रचा जिसमें सभी धर्मों के नाम हैं बाद में उनके ध्यान में आया कि सर्वोत्तम भाषा मौन है। तो फिर वह सामूहिक मौन चलाते थे और एक स्थान का मुझे ध्यान है जहाँ कि मैं खुद रहने वाली हूँ वहाँ एक लाख से ज्यादा लोग थे सभा में विनोबा जी की और उन्होंने जैसे ही कहा शान्तिः शान्तिः शान्तिः अब सब लोग मौन बैठें और जिसको जो नाम प्यारा है वह ले। मेरे जैसे व्यक्ति को जो वर्षो उनके साथ रही है जब मैंने तीन चार मिनट बाद आँख खोलकर देखा कि सब भाग तो नहीं गए लाख लोग बैठे हैं और कोई आवाज नहीं अद्भुत वह दृश्य था तो इस तरह सामूहिक ध्यान सामूहिक मौन का उन्होंने प्रयोग चलाया। कई बार भाषा को लेकर विवाद भी होते हैं भाषा एक हद तक तो आगे ले जाती है उसकी आवश्यकता भी है लेकिन जैसे विष्णु सहस्रनाम में कहा है शब्दातिगत शब्दशः शब्दों से परे है परमात्मा वह शब्दों को सहन करता है। तो शब्दों को वह सहन करता है उन शब्दों का भी उच्चारण करें और वह जो शब्दों से परे है उसके लिए सर्वोत्तम भाषा मौन का भी आश्रय लें। विभिन्न तरीके हो सकते हैं।

यह जो आश्रम जीवन के साथ शरीर श्रम को आवश्यक ढंग से उन्होंने जोड़ा यह एक क्रान्तिकारी विचार मैं समझता हूँ कि गाँधी और विनोबा ने दिया या यज्ञ का अर्थ गाँधी जी ने दिया शरीर श्रम तो आज की परिस्थितियों में क्या हम शरीर श्रम की तुलना में क्या हम ऐसा माने कि हम समाज से जितना लेते हैं उससे सौ गुना समाज को लौटाएँ तो यह व्यावहारिक स्वरूप होगा या शारीरिक श्रम आवश्यक है उसी रूपों में जो आप विद्यामन्दिर में चलाती हैं। बात यह है कि भगवान ने यह शरीर दिया है तो इस शरीर को ठीक चलाने के लिए भी श्रम आवश्यक है। अक्सर आप देखते हैं कि समाज के धनी वर्ग के लोग ऐसे क्लब में जाकर जहाँ जाकर स्वास्थ्य के लिए एक्सरसाइज करते हैं विनोबा जी ने कहा कि यदि चक्की पीसने का काम यदि दे तो आप कहेंगी कि शरीर श्रम क्यों करवाया जा रहा है तो ठीक है उसमें गेहूँ नहीं डालेंगे लेकिन आप एक बारऐसा कीजिए एक बार ऐसा कीजिए एक्सर साइज हो जायेगा यह पसन्द आया आपको। हँसने वाले बहुत हँसे कि भाई गेहूँ डालदो तो आँटा भी पीसा जाएगा। तो सवाल यह है कि शरीर श्रम जीवन के लिए आवश्यक ही है। अब किसके लिए किस मात्रा में किस पद्धति का उसमें अन्तर हो सकता है। पण्डित जवाहर लाल नेहरू जब प्रधानमंत्री बने विनोबा जी तो उनको गुरुभाई कहते थे तो विनोबा जी से हर साल मिलते थे तो विनोबा जी ने कहा आओ आपको दो घण्टे शरीर श्रम करना चाहिए। खेती में काम कीजिए तो कुदाली नहीं चला सकते तो खुरपी चलाइए। नेहरू जी हँसे बोले विनोबा जी मुझे बहुत पसन्द है यह काम लेकिन समय नहीं मिलता तो विनोबा जी ने कहा समय निकालना पड़ेगा। तभी इस देश का प्रधानमंत्री सही दिमाग से काम करेगा।तो बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने के लिए भी वह शरीर श्रम को आवश्यक मानते थे और यह अनुभव की बात है।

यानी आश्रम जीवन में जहाँ आप रहती होगी वहाँ भी एक छोटा सा आश्रम है तो वहाँ व्यक्ति के लिए जो साधक है उसके लिए कितने घण्टे शरीर श्रम कितने घण्टे का बौद्धिक श्रम कितने घण्टे की उपासना ऐसा आप किस तरह से बना सकती हैं।

हर व्यक्ति का अपना-अपना बनाएँ क्योंकि हरएक का रुचि, प्रवृत्ति, क्षमता अलग-अलग होती है। अपना अपना मार्ग सबको तय करना है लेकिन इसमें समन्वय जरूर हो कर्म, ज्ञान, भक्ति तीनों का और शरीर श्रम, बौद्धिक श्रम सबका समन्वय संगम अवश्य हो यह देखें और जहाँ समूह रहते हैं जैसे यह एक सामूहिक साधना का स्थान है तो सामूहिक तौर पर समूह मिलकर तय करे जैसे हमारे यहाँ ब्रह्मविद्या आश्रम में समूह मिलकर तय करता है। लेकिन इसमेंं यदि कोई वृद्धहै, बीमार है तो स्वाभाविक है वह शरीर श्रम कम करेगा।

अभी जैसे आप लोग इस सम्मेलन में आए हैं रचनात्मक समाज के तो इसका विशिष्ट उद्देश्य क्या है जो अभी ऋषिकेश में आयोजित हो रहा है। हम हर साल रचनात्मक कार्यकर्ताओं का सम्मेलन करते हैं और पंद्रह से बीस हजार तक देश भर में काम करने वाले हमारे साथी और मित्रगण पहुँचते हैं। बल्कि आपको सुनकर खुशी होगी कि हमारे दो सम्मेलनों में वन्दनीया माताजी ने आशीर्वाद लिखकर भेजा था जिसमें हमारी पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया था। उनके आशीर्वाद हमें प्राप्त हुए। हर साल करते हैं पिछले साल हमने जम्मू में किया। इस साल हमारे रमेश भैया यहाँ कुंभ के अवसर पर आए और कुछ सेवा के कार्य चलाए सफाई की घाटों में, प्रार्थना यह सब चलाया इन्होंने तो सोचा कि इस साल क्यों न यहाँ किया जाए कुंभ के होते होते ताकि भीड़ भी कम हो जाऐगी और गंगा स्नान का अवसर भी सबको मिलेगा। यह सोचकर हमने यहाँ तय किया है और सारे देश में उत्सुकता है हजारों की संख्या में साथाी देश भर से आएगे बल्कि विदेशों से भी आऐगे। पाकिस्तान से कुछ मित्रगण आ रहे हैं एक विषय हमारा भारत पाक मैत्री भी होगा। दूसरा हिमालय की रक्षा और तिब्बत की मुक्ति पर भी हम एक गोष्ठी करेंगे फिर ग्राम स्वराज्य है, अहिंसक परिवर्तन समाज का सर्वधर्म समभाव, सामूहिक साधना स्त्री शक्ति जागरण, गौरक्षा अनेकों विषयों पर है। उसमें चर्चाए होगी।

तो अधिक समय न लेते हुए जैसे आप जो पत्रिका का संपादन करती हैं नूतन उसमें एक प्रकरण आया है कि किसी ने हजरत मुहम्मद से पूछा कि आप मुझे कोई ऐसी सरल बात बता दें ताकि मैं आपकी दूसरी बताई हुई बात न भूल जाऊँ मुझे बहुत याद रहे और मेरे जीवन में बहुत फलित हो तो उन्होंने कहा कि गुस्सा मत करो। तो इसी तरह इतने दिन आप बाबा के साथ रहीं तो इस सारे का निचोड़ यदि कोई ले मैन बाबा से पूछना चाहे कि कोई दो तीन शब्दों में एक वाक्य में हम सबके लिए आप कोई एक बात बताए।

तो बाबा की बात बताऊँगी। वो कहते थे मुख में राम, हृदय में नाम, और हाथ में सेवा का काम। यह उनका सन्देश है।आपका बहुत बहुत धन्यवाद आपने इतना समय दिया आप पुनः पुनः यहाँ आते रहिए।

किसी मिशन की सफलता इसी बात में निहित है कि उसमे नवजवान कितने आते हैं तो विनोबा जी के आन्दोलन की मिशन की सामूहिक साधना की सफलता में यह है कि रमेश भैया जैसे नवजवान इस आन्दोलन में पूर्ण समर्पण भाव से लगे हैं और इन्होंने अभी बहुत बड़ा तप किया था साल भर शरीर श्रम और साथ साथ साढ़े तीन हजार किलो मीटर की पदयात्रा यू०पी० की की। विनोबा जन्म शताब्दी के निमित्त, ग्राम स्वराज्य सर्वधर्म समभाव आदि सन्देश देने। बहुत अच्छे अनुभव आएँ और इनकी यात्रा के साथ सैकड़ों युवक इस कार्य से जुड़ गए।

स्वामी अवधेशानंद जी गिरि महाराज

लोग भारतीय संस्कृति के प्रति आस्थावान क्यों नहीं रहे।

संसार की बहुत सी वस्तुओं के आकर्षण और व्यक्ति की निरन्तर अपनी इच्छा और आकांक्षाओं की तात्कालिक पूर्ति आदमी चाहता है विजयविभूति कामनाओ की पूर्ति अनुकूलताओं का संचय प्रतिकूलताओं का परिहार्ययह सब चाहता है और आज पश्चिमात्य सभ्यता का किंचित आस्वादन करने के बाद ऐसा लगने लगा है कि सब वस्तुएँ यहाँ मिल जाऐगी और उसकी दौड़ भौतिकता की ओर है। लेकिन मुझे लगता है कि यह जो पतझड़ का युग है जैसा पतझड़ में सब कुछ क्षरण होता है और फिर नई कोपल आती हैं, प्रसून खिलते हैं तितलियाँ, भवरे और फिर शिशिर आ जाता है तो मुझे ऐसा लगता है कि आज फिर से भारतीय संस्कृति और उसकी अस्मिता के प्रति प्रसून बढ़ रहा है।

आप और हमारा मिशन प्रज्ञा अभियान विचारों की क्रान्ति कर रहे हैं तो आज के जनमानस को देखते हुए आपको क्या लगता है कि इसमें हम लोगों को सफलता मिलेगी।

आज पूरे संसार में बौद्धिक नैराश्य है अशान्ति है, आतंक है, भय है, असुरक्षा है, तनाव इतने बढ़े हैं कि इन सबकी मुक्ति के लिए अन्ततः व्यक्ति को इधर आना होगा नान्या पन्था विकृता अनाय मुझे ऐसा लगता है कि भारतीय संस्कृति विश्व की संस्कृति है वह मानव के रक्षण, पोषण और उसके संवर्धन की संस्कृति है वह मानवीय मूल्य और मानवीय जीवन के लिए बेहतर सुविधाओं को देने वाली संस्कृति है तो मैं ऐसा अनुभव कर रहा हूँ कि संसार का प्रत्येक प्राणी अब इस ओर बढ़ रहा है और विशेषतः मैंने पश्चिमी देशों में देखा है अमेरिका में देखा है कि भारतीय जीवन मूल्यों के लिए आस्था और समर्पण के भाव पश्चिमी देशों में बढ़ रहे हैं।

आजकल महिलाओं के लिए बड़ी बड़ी बातें की जाती है और राजनीतिज्ञ भी कहते हैं ३३ प्रतिशत आरक्षण की बात कर रहे हैँ और महिलाए भी वैसे पदों पर पहुँच रही हैं।उसके पश्चात् भी आज समाज में महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय है। तो इसमें कैसे सुधार किया जा सकता है।

पुरुष प्रधाान समाज है, यहाँ बहुत से अधिकार और कभी-कभी व्यक्ति को ऐसा लगता है कि मैं श्रेष्ठ हूँ पूज्य हूँ ज्ञानी हूँ लेकिन ऐसी बात नहीं है जिस नारी की मुक्ति की बात कही जा रही है नारी स्वतंत्र हैं हाँ नारी की स्वेच्छाचारिता, स्वच्छंदता कभी भी नहीं भाई कभी भी किसी भी व्यक्ति को और अपने देश में ऐसा है नहीं। यह तो पूजनीय देश है। गौरीशंकर सीताराम राधेश्याम नरनारी एक समान सदा से नारी पूज्य रही है और एक आख्यान भी आता है कि शतशतचान्द्र नाम की एक उन्मुक्त हास्य करने वाली देवांगना ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को जन्म दिया। तो सृष्टि के पूर्व और अपूर्व में भी हम देखें तो नारी की ही भूमिका है।

हमारे देश में महर्षि अरविंद, सूरदास, और पाश्चत्य के भविष्यवक्ताओं ने भी इस समय को संधिकाल कहा है और इसके पश्चात् जो युग आऐगा बहुत अच्छा आएगा कहा है तो आपका इस पर क्या विचार है?

मुझे लगता है कि युग के संक्रमण के साथ ही हम एक उज्जवलता की ओर बढ़ रहे हैं। मुझे लगता है शान्ति का, प्रेम का, ज्ञान का साम्राज्य आऐगा। और जैसे मैंने अभी पतझड़ की बात कही तो पतझड़ के बाद बसन्त आता है। जब सब क्षरण होता है, चारित्रिक ह्रास होता है, जीवन मूल्य गड़बड़ाते हैं और बहुत सी विभीषिकाएँ सामने आती हैं तब नवसृजन होता है। यह जो आने वाली सदी है मुझे लगता है कि यह सुख देने वाली है वह व्यक्ति को उन्नत और उत्कर्ष की ओर ले जाने वाली है।

आप अपने प्रवचन में परम पूज्य गुरुदेव पं०श्रीराम शर्मा आचार्य जी की काफी चर्चा करते हैं तो क्या आपने कभी इनका साहित्य पढ़ा है।

मुझे सन् १९७१ में हिमालय में एक बार उनका साक्षात्कार हुआ था तभी मैं उनकी आत्मा से स्पर्शित हुआ था कुछ साहित्य भी मैने पढ़ा है मुझे लगता है कि वह उत्कृष्ट है।

आप इस मिशन से कब परिचित हुए। मुझे तो ऐसा लगता है मैं इस मिशन की आत्मा से मैं वर्षों से परिचित हूँ और इस मिशन की आत्मा का अभिन्न अंग हूँ।

स्वामी जी ने महात्मा गाँधी ने एक रामराज्य का सपना देखा था। आज के समय में राज्य कैसा होना चाहिए कैसा हो सकता है।

मुझे तो शान्तिकुँज में आकर ऐसा लगता है कि शान्तिकुँज जिस प्रकार का कार्य कर रहा है ऐसा साधू समाज करे स्वयंसेवी संस्थाए करें अनेक संगठन करें सब संप्रदाय के लोग मिलकर यह करें तो रामराज्य तो हम अभी देख सकेंगे। चाणक्य ने एक स्थान पर कहा है कि यदि शासक वर्ग राष्ट्र को उन्नत नहीं कर सके तो यह कार्य धर्माचार्यों को करना चाहिए। और वैसे भी यह कहा जाता है कि राजतंत्र पर धर्मतंत्र का अंकुश होना चाहिए अथवा नहीं। काफी वादविवाद होता रहता है। इस विषय में क्या कहेंगे आप।

धर्मसत्ता का राजसत्ता पर अंकुश न हो मैं यह चाहता हूँ कि राजसत्ता धर्मसत्ता से प्रेरित हो। चूंकि वहाँ पर आचरण होता है, पवित्रता होती है। मन की उच्चता होती है। और राजनीति निरन्तर अपनी हितपूर्ति और तुष्टिकरण में लगी रहती है। तो राजनीति पर अंकुश नहीं बल्कि राजनीति प्रेरित हो धर्मसत्ता से।

आप गाते बहुत अच्छा है इसकी कहीं शिक्षा ली है। यह सब सहज स्फूर्त है।

लोकनाथ रुद्र लखनऊ

गुरुदेव का सम्पर्क पाकिस्तान में रावलपिंडी का मैं निवासी था वहीं मैंने शिक्षा प्राप्त की थी सन् १९४२ में गुरुदेव की अखण्ड ज्याति मेरे ध्यान में आई उसे मैने देखा तो मुझे बहुत अच्छी लगी और मैंने उसी समय पूज्य गुरुदेव को पत्र लिखा कि मुझे भी अखण्ड ज्याति भेजी जाए। मुझे इतनी प्रसन्नता हुई पत्र पाकर जिसमें उन्होंने यह उल्लेख किया अरे भाई लोकनाथ तुम्हें तो हम बहुत दिनों से ढृढ़ रहे थे। तुम मुझे मिल गए मुझे बड़ी ही खुशी हो रही है। इस पर मुझे यह आश्चर्य हुआ कि मेरा न कोई परिचय था न मुझे वह जानते थे फिर कैसे करके उन्होंने मुझे जान लिया। यह उनकी सूक्ष्म दृष्टि थी जिसके माध्यम से वह समस्त संसार को बताना चाहते थे कि जिस स्नेह का अकाल पड़ गया है उसको बढ़ाना अब मेरा काम है और हम लोग संगठन बनाकर दुनिया को बताएगे कि संगठन में कितनी शक्ति होती है।

१९४७ में हमें रावलपिंडी छोड़ना पड़ा पर अखण्ड ज्योति हमसे नहीं छूटी। अनेक कष्ट आए लेकिन गुरुदेव की ऐसी कृपा हमारे ऊपर रही कि हम लगातार कितने ही झंझटों से हमें मुक्ति मिली वहाँ से हमें तीन कपड़ों में आना पड़ा लेकिन फिर भी हम प्रसन्नचित्त रहे। १९५१ में गुरुदेव का सन्देश आया कि मैं गौंडा जा रहा हूँ और लखनऊ में थोड़ी देर के लिए रुकूगाँ वहाँ हम थोड़े से लोग इकट्ठे हुए और वहाँ एक परिचय का आयोजन किया गया था वहाँ तखत पर गुरुदेव को बैठाल दिया गया और आसपास हम लोग बैठे थे एक एक करके सब परिचय दे रहे थे हमने भी उठकर कहा लोकनाथ रुद्र वैसे ही गुरुदेव ने कहा अरे भाई लोकनाथ इधर आओ इधर आओ इतनी उन्होंने शक्ति दी न जाने मैं कहाँ उड़ गया। सचमुच वह अद्भुत अनुभूति थी जो आज भी नहीं भूलती। हमेशा उसी का ध्यान करता हूँ कि उनकी कितनी कृपा मुझ पर है। वहाँ से हम उनके साथ हो लिए और कई जगह उनके साथ यज्ञ और आयोजनों में गए।

श्री गुलशेर खां, सतना म०प्र०

मेरा बच्चा सतना में रहता है उसके द्वारा यहाँ कि किताबों को पढ़ने के बाद यह अहसास हुआ कि हरिद्वार में शान्तिकुँज कोई स्थान है उसकी लगन बहुत थी उसके बाद जब मुझे मौका मिला तो मैं शान्तिकुँज आया तो गुरुदेव की कृपा से मुझे यहाँ बहुत अच्छा लगा। यहाँ जो कुछ मैंने देखा वह किताबों से कई गुना मुझे ज्यादा दिखाई दिया है। यहाँ न हिन्दू मुसलमान का भेदभाव है न सिख ईसाई का सब एक है। गुरुदेव की कृपा है जो इतने बड़े समाज को बांधे हुए हैं।

श्री दिलशेर खां, सतना म०प्र०

मेरा एग्रीकल्चर का व्यवसाय है मैं बल्डिंग का काम करता हूँ। मैं आचार्य श्रीराम शर्मा जी से उनकी पुस्तकों के माध्यम से करीब १५ साल से जुड़ा हुआ हूँ। मन में इच्छा थी कि अपने धर्म को मानते हुए भी शान्तिकुँज जाकर इनके रहने का इनके काम करने का तरीका देखे और मैंने यहाँ आकर यह आश्रम देखा। यहाँ देखा कि वही आदमी प्रवचन करते हैं वही आदमी झाड़ू लगाते हैं। वही आदमी साथ में बैठकर खाना करते हैं वही हवन और पूजन करते हैं। पूरे संसार के मानव काल्याण की सेवा करते हैं कहीं भी यह नहीं लगा कि हिन्दू मुस्लिम अलग अलग हैं। मुसलमान अपनी कट्टरता में एक धागे से बन्धे रहते हैं वह कट्टरता यहाँ कहीं नहीं दिखी। कही यह नहीं कहा गया कि आप नमान नहीं पढ़ो। हमारे साथ हमारी माँ हैं हमारी पत्नी हैं वह नमाज भी पढ़ती है तो किसी को कोई एतराज नहीं है। यहाँ हवन के पास जाकर बैठती है तो भी कोई एतराज नहीं है। मुस्लिम धर्म में जो बन्धा हुआ है यहाँ सब खुलकर है। यहाँ हमने खाना खाने का ढंग देखा सब भाई हिन्दू मुस्लिम ईसाई हर जाति के लोग एक साथ बैठकर खाना खाते हैं। एक भाईचारा, प्रेम लोगों का एक अभिवादन देखने को मिला। यह बहुत अच्छा लगा। यह जाकर हम अपने भाइयों को बतायेगे अल्लाह की मर्जी है यह। अपना धर्म मानते हुए भी यहाँ रहे यहाँ के लोगों से मिले इंसाअल्लाह वो यदि यहाँ आएगे और यहाँ से जाने के बाद वापिस जाएगे तो मानव कल्याण के लिए ही काम करेंगे।

कैलाश कुमार लाम्बा कोरबा म०प्र०

मेरा जन्म पाकिस्तान के जिला झेलम में हुआ। सन् १९४७ में देश का बटवारा हुआ तो मेरा परिवार वहाँ से भारत आया मेरा जन्म एक सिक्ख परम्परा वादी परिवार में हुआ था और एक ऐसे गाँव में हुआ जहाँ सिर्फ एक गुरुद्वारा है। और न कोई राम को मानता है न कृष्ण को मानता है न कोई दूसरे देवी देवता का मन्दिर है। परन्तु मालुम नहीं क्या बात कि मैं बचपन से ही यह सोचता था कि इस जीवन में मेरा किसी महान व्यक्ति के साथ मिलन होगा उनके द्वारा मुझे कोई विशेष कार्य करने होंगे।

१९४८ की बात है कि मुझे ऐसा महसूस हुआ कि कोई दिव्य सत्ता कोई चेतन सत्ता मुझे निर्देश दे रही है कि बेटा गायत्री मंत्र की तेरे अन्दर जो तीव्र लालसा है वह यह मंत्र है मुझे किसी ने पढ़ाया नहीं सिखाया नहीं हिन्दी और संस्कृत जानता ही नहीं था पाकिस्तान में उर्दू और फारसी पढ़ा था। मैंने गायत्री मंत्र का मन ही मन जप करना शुरु किया। सुबह पूर्व की ओर मुँह करके बैठ जाता शाम को पश्चिम की ओर मुँह करके बैठ जाता पाँच सात मिनट जप करता लेकिन जप १९४८ से लेकर आज तक छूटा नहीं।

इसके उपरांत मथुरा में गुरुदेव ने अपने प्रवचन में कहा कि गुरु गोविन्दसिंह के पाँच प्यारे तैयार हो गए थे कि जो सीस देने के लिए तैयार थे क्या मेरे इतने सारे शिष्य बैठे हैं उनमें से कोई एक सीस देने तैयार हो सकता है। बहुत सारे व्यक्ति सीस देने को उठ खड़े हुए गुरुजी ने उनसे कहा कि बेटा राजस्थान में वज्र आसनी देवी है वहाँ पर नवरात्रि के समय एक हजार बकरों का बलिदान किया जाता है मैं चाहता हूँ कि उस पशुबलि को रोका जाए। आपमें से वहाँ कितने बेटे जाने के लिए तैयार हैं। बहुत सारों ने हाथ उठा दिया। गुरुजी ने कहा कि नहीं आप लोग में से अपने परिवार के लोगों से इजाजत लेने की कितने लोगों को आवश्यकता है बहुत सारे लोगों ने फिर हाथ उठाया कि हम अपने परिवार से पूछकर फिर आएगे। ऐसे कितने व्यक्त् िहै जो यहाँ से इसी वक्त क्षेत्र में जा सकते हैं तो आठ व्यक्ति तैयार हो गए कि साहब हम क्षेत्र में जाने के लिए तैयार है। माता जी ने बिदाई के समय पाँच किलो सत्तू और एक किलो गुण प्रत्येक भाई को दिया कि अपने साथ ले जाओ बेटा परदेश में पता नहीं तुमको खाने को मिलेगा कि नहीं मिलेगा। तुम्हारा कुछ इंतजाम हो पाएगा कि नहीं हो पाएगा। यह सत्तू घोल लेना औा बेटा खा लेना और गुरुजी का काम करना। भाई लोग राजस्थान चले गए। राजस्थान में चारों तरफ घूमते रहे और पशु बलि के खिलाफ आन्दोलन करते रहे। इसी समय जब भाई लोग पहुँचे तो एक विचित्र बात हो गई। जैसे ही दूसरे दिन भाई लोग सोकर उठे तो एक सन्यासी लंगोटी लगाए हुए कोपीन धारी शरीर में उसके कपड़ा नहीे पैर में चप्पल नहीं और गौर वर्ण दुबला पतला शरीर। उसने आकर पूछा कि आप लोग यहाँ किस काम के लिए आए हैं क्या बात है। भाइयों ने बताया कि हम पशुबलि आन्दोलन के लिए आए है और हम इस माँ के दरबार में पशुबलि नहीं होने देंगे। उसने कहा आपका बहुत अच्छा उद्देश्य है और मैं भी आपके साथ में रहूँगा और वह सन्यासी पूरा महीना भाइयों के साथ में घूमता रहा। भाई लोग जब शाम को थककर बैठ जाते पैरों में छाले पड़ गए थे लोगों की पिंडलियाँ सूज गई थी तब वह सन्सासी गरम पानी करता भाई के पैर धोता छालों को साफ करता भाई लोग बहुत मना करते कि देखिए साहब यह बात अच्छी नहीं पर वह सेवा करता रहा। यहाँ तक कि शाम को खाना भी बनाता और भाइयों को खिलाता। खटीकों का गाँव था एक हजार सीढ़ियों के ऊपर मन्दिर था। उस गाँव में मीटिंग होती कि यह सन्यासी लोग हमारा पशुबलि रोकेगे हम आठ लोग फांसी पर चढ़ जाएगे पर इनकीगर्दनें उड़ा देंगे लेकिन हम बकरा काटना नहीं छोड़ेगे। जब आखिरी दिन आया तो गवर्मेन्ट ने भी बहुत इंतजाम कर रखा था चारों तरफ पुलिस आ गई। हजारों की तादात में पब्लिक पहाड़ी के नीचे इकट्ठी हो गई कि आज क्या घटना होने वाली है और आठों भाई मन्दिर के दरवाजे के सामने आकर खड़े हो गए और वह खटीक भी अपने-अपने गड़ासे लेकर खड़े हो गए। कि आज हम बकरा तो नहीं लेकिन तुम्हारी गर्दने जरूर काटेंगे। अभी विवाद चल ही रहा था और पुलिस पूरी एलर्ट थी कि कोई घटना घट मत जाए। लेकिन खड़ी थी दर्शक के रूप में। अकस्मात् आंधी की तरह नीचे से वह सन्यासी आया अपने कंघे पर एक बकरा लादे हुए धड़धड़ाते हुए आँख झपकते ही नीचे से ऊपर आ गया ऊपर आकर दरवाजे के सामने अड़कर खड़ा हो गया खड़ा होकर खटीकों को एकदम ललकार कर कहा कि देखो तुम लोग किसी भी सन्यासी का बाल बांका करोगे तो तुम्हारे इस गाँव की क्या हालत होगी इसको कोई बचा नहीं सकेगा। और उसने अपने कन्धे पर लादे हुए बकरे को उन खटीकों को ऊपर पटक दिया जोर से कि तुम्हारी हिम्मत है तो इस बकरे को काटो तो जो तलवारे उठी हुई थी बकरे को क टने के लिए भाईयों को काटने के लिए सब झुक गई जो पुलिस की बन्दूके उठी हुई थी सब झुक गई सारी पब्लिक हजारों की देखकर दंग रह गई। कि अरे यह क्या हो गया और वह खटीक आगे पीछे सरकने लग गए और पुलिस भी हरकत में आ गई और उसने सबको कह दिया कि सब यहाँ से खाली हो जाइये नहीं तो हम गोली चला देंगे और मन्दिर धीरे धीरे खाली होना शुरु हो गया। भाइयों ने मन्दिर के चारों तरफ ऊपर नीचे बहुत ढूढ़ा कि वह सन्यासी जी कहा गए और उसके बाद नीचे आकर पूरा गाँव छान मारा सबसे पूछा भी पर वह सन्यासी नहीं मिले।

सन् १९७३ की घटना है प्राण प्रत्यावर्तन शिविर लग रहे थे ऐसा कहा गया था कि आप अपनी स्वीकृति प्राप्त करने के उपरांत प्राण प्रत्यावर्तन शिविर में आइए क्योंकि स्थान सीमित हैं। मेरे जीवन में गुरुजी की अनेकों घटनाएँ हो गई लेकिन फिर भी मैंने गुरुजी की परीक्षा लेना छोड़ा नहीं। मैं कभी पत्र लिखता नहीं था और यहाँ से कभी पत्र जाता नहीं था। मैंने मन में ठान लिया कि वास्तव मे यदि यह भगवान हैं और इनको मालुम है कि कौन शिष्य इनके काम के हैं तो अपने आप बुलाएगे यदि नहीं बुलाएगे तो मेरे लिए यह सामान्य गुरु हैं भगवान नहीं हो सकते। कोई विश्वास नहीं करेगा कि मेरे पास जुलाई के महीने में एक पत्र पहुँच गया शान्तिकुँज से कि आपको प्राण प्रत्यावर्तन शिविर में आना है। हम प्राण प्रत्यावर्तन शिविर में आए हमारे जीवन का गुरुजी ने क्या परिवर्तन किया यह बहुत रहस्य की बात है। यह समझ लीजिए कि हृदय परिवर्तन हो गया आत्मा का परिवर्तन हो गया।

१९७४ में वानप्रस्थ के शिविर लगे उसमें हमें बुलाया गया। मैं अपने पैदा होने से सन् १९७४ तक मेरी यह स्थिति थी कि मैं बिल्कुल अन्तर्मुखी था मेरे सामने मेरा कोई परिचित व्यक्ति भी बैठा है वह घंटों बैठा रहे पर मैं उससे बात नहीं करता था। बोल नहीं फूटते थे। वानप्रस्थ में आए ९-९ भाइयों की टोलियाँ बनी गुरुदेव जो भी प्रवचन देते थे रात में उस पर समीक्षा कराई जाती थी। पहले दिन उन टोली नायकों ने कहा कि अपना-अपना परिचय दीजिए मैं अपना परिचय भी नहीं दे पाया। दूसरे दिन उन्होंने कहा कि आपको गुरुदेव के प्रवचन में जो कुछ समझ में आया हो उसको लिखकर ले आइये वह लिखा हुआ पढ़ दीजिए मैं लिखा हुआ भी नहीं पढ़ पाया। पाँचवे दिन यह हुआ कि अब सबकी सामूहिक परीक्षा होगी कि किसने क्या क्या सीखा है हर टोली से हम एक आदमी बुलाएगे और जिस विषय में उसे बोलना है यह उसका अपना विषय होगा। सभी वरिष्ठ भाई और टोलियाँ बैठी हुई थीं एक एक करके बुलाया जा रहा था जब हमारी टोली का नंबर आया तो भाई लोगों ने हमारा नाम पुकार दिया कि आइये लाम्बा जी आप आइये। अब जब हमारा नाम आया तो पैर कांप गए। जवान सूख गई, गला सूख गया, चक्कर आने लगे कि अब मैं क्या कहूँगा कुछ समझ में आया नहीं। जैसे तैसे लड़खड़ाते हुए मैं मंच पर पहुँचा मंच पर पहुँचा गायत्री मंत्र का उच्चारण किया दो मिनट मौन होकर के गुरुजी का ध्यान करता रहा। अकस्मात् मैने महसूस किया कि गुरुजी के कक्ष की खिड़की जो इधर खुलती है वह खुली और वहाँ से हरी रंग की किरणे मुझे दिखााई दी एक प्रकाश पुंज मेरे मस्तिष्क पर पड़ा वह मेरे पूरे दिमाग पर छा गया और उसके उपरांत मैंने बोलना शुरु किया जैसा निर्देश था उसी के अनुसार पंद्रह मिनिट के समय में अपना प्रवचन समाप्त किया और उसको सुनकर सभी ने उसको सराहा कि आपके जो विचार आए हैं गुरुदेव के प्रवचनों के दौरान वह सबसे उत्तम हैं। सभी ठीक है पूरे सन्दर्भ सहित और पूरे प्रकिया सहित।

सन् १९७५ में रामायण के शिविर में हमने भाग लिया और रामायण के शिविरों में भाग लेने के बाद जब अपने क्षेत्र में पहुँचे तो वहाँ रामायण का सम्मेलन हो रहा था उस सम्मेलन में प्रकाण्ड विद्वान आए हुए थे। रामायण के पण्डित। तो गांव वालों ने हमें भी बुला लिया कि आप भी अपने उद्गार व्यक्त कीजिएगा। हम भी पहुँच गए देखा कि वहाँ एक से एक विद्वान जुड़े हुए हैं। जो संचालक लोग थे उनने घोषणा की कि पहले गायत्री परिवार के लोग अपने विचार व्यक्त करेंगे। उसके बाद पण्डित गण अपने अपने विचार देंगे। सम्मेलन शुरु होने में देरी थी भाई लोगों ने कहा कि चलिए जब तक चाय पी लीजिए। चाय पीनेके लिए कक्ष में गए चाय का कप मैंने हाथ में लिया गुरुदेव से प्रार्थना की कि गुरुजी यह तो बड़े-बड़े प्रकाण्ड विद्वान हैं यदि मुझे पहले बोलने को कहा जाएगा तो यह तो मुझे उड़ा देंगे। और यदि यह पहले बोल देंगे तो यह लोग किस धरातल पर हैं यह समझने का और सुनने का मौका मिलेगा और फिर मुझे आपके निर्देशानुसार इन्हें काटने में कोई दिक्कत नहीं जाएगी। आप विश्वास मानिए जैसे ही कप प्लेट पर रखा वैसे ही संचालक लोग फिर से आ गए और उन्होंने कहा नहीं साहब अब हमने प्रोग्राम बदल दिया है गायत्री वाले सबसे बाद में बोलेंगे पण्डितगण पहले बोलेगे। पण्डित लोग अपनी विद्वता बखान करते रहे हमने गुरुजी को धन्यवाद किया कि आप हमारे साथ में है यह कहीं भी नहीं लगेगे। जब हमारा नंबर आया हमने बोलना शुरु किया रामायण यहाँ से सीख कर गए थे। पहली पंक्ति से हीशुरु कर दिया प्यार का हम नाम भूले और हृदय से ममता उड़ी है हम कहते हैं कि हमने खूब रामायण पढ़ी है। जैसा गुरुजी ने समझाया था प्रेम का और भाईचारे का राम के परिवार का रावण के परिवार का भक्त हम राम के बनते हैं काम रावण का करते हैं इन्हीं बातों को लेकर के मैंने अपना प्रवचन दिया। यह हुआ कि संचालकों ने सोचा था कि पब्लिक अन्त में जब चाहे उठकर चली जाएगी कोई बात नहीं वह रात्रि को उठने का नाम नहीं ले रही एक बज गया दो बज गया नहीं साहब अभी तो हम और सुनेंगे आपकी बातों में इतनी सच्चाई है और सही रामायण भी यही है उठने का नाम नहीं ले रही थी।

श्री लक्ष्मण प्रसाद साहू कार्यपालन अभियंता सतर्कता विभागम०प्र०वि०मं० बिलासपुर

सन् १६६८ में तखतपुर में आफीसर इंचार्ज के पद पर कार्यरत था। वहाँ की लायब्रेरी की सारी किताबों को जब पढ़ चुका तो वहाँ के लायब्रेरियन ने एक दिन मुझे अखण्ड ज्योति लाकर के दिया और उस अखण्ड ज्योति को मैं हाथ लगाया रातभर में उसे पूरी तरह से पढ़ा और उसको पढ़ने के बाद मेरी उत्कंठा अत्यन्त तीव्र हुई कि इसके लेखक से मिला जाए और सबेरे में कार्यालय में आकर बैठा और यह सोच ही रहा था कि अखण्ड ज्योति के लेखक से कैसे भेंट की जाए तभी एक व्यक्ति अचानक आकर बोलता है कि आज हमारा कार्यालय बन्द है हमारे कार्यालय में एक पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य का प्रवचन है मैं तुरत वहीं से घर खबर भेजा और वहाँ से बिलासपुर के लिए रवाना हुआ जहाँ पूज्य गुरुदेव का प्रवचन था। वहाँ प्रबुद्धों की गोष्ठी थी विज्ञान और अध्यात्म पर। गुरुदेव का प्रवचन होना था जिसमें कलेक्टर कमिश्रर और बिलासपुर संभाग के बड़े से बड़े अधिकारी उपस्थित थे। साधारण प्रवचन नहीं था मैं उसमें पहुँच पाऊँ इसके लिए व्यवस्था बनाने के लिए मुझे जरा भी प्रयास नहीं करना पड़ा और मैं अपने एक विभागीय सुपरिन्टेन्डिंग इंजीनियर के साथ जो उस कार्यक्रम में जा रहे थे उनके साथ बैठकर के उस कार्यक्रम को मैंने सुना और सुनने के बाद यह विश्वास हुआ कि यह साधारण व्यक्ति नहीं है यह मेरे जीवन के संरक्षक हैं और इन्हीं की मुझे बहुत दिनों से तलाश रही है तब तक मैं गुरु बनाया नहीं था मैंने फैसला किया कि यह ही मेरे गुरु के लायक हैं तपोभूमि जाकर मैंने दीक्षा ली यज्ञोपवीत संस्कार कराया उन दिनों हमारे जाति में यज्ञोपवीत चलता नहीं था किसी को पहनाया नहीं जाता था अपने कुलगुरु को छोड़कर किसी दूसरे से दीक्षा नहीं ली जाती थी हमने यह बन्धन तोड़ा तो समाज के लोग बड़ी दूसरी दृष्टि से देखने लगे पर मैंने उसकी कोई चिन्ता नहीं की। इसके बाद एक अद्भुत घटना घटी। मैं अपने कार्य से एक गाँव गया हुआ था पोड़ी एकादशी और गुरुवार का दिन था सावन का महीना था मैं उस गाँव से पार हो रहा था जहाँ मैंने कभी विद्युतीकरण किया था। मैंने वहाँ देखा कि वहाँ के लोग झगड़े फिसाद के कारण दो भागों में बँट गए हैं और मनोहर लाल जी विद्युत मंत्री उस गाँव से सम्बन्धित थे। वहाँ के लोग कई बार प्रयास कर चुके थे लेकिन वहाँ का बलवा शान्त नहीं हुआ था। सौ लोग हल लेकर जा रहे हैं तो लगभग उतने ही लोग दूसरी पार्टी के हल लेकर जाते थे अकेले दुकेले कोई काम करने नहीं जाता था। हर आदमी के हाथ में लाठी, बल्लम, फरसे देखकर मेरे रोंगटे कांप गए। मैंने वहीं आते-आते गुरुदेव से प्रार्थना की हे गुरुदेव हे भगवान् इस गाँव को मैंने बड़े प्यार से देखा है यहाँ के लोग भले लगते हैं न जाने कैसी दुर्बुद्धि समा गई आप जरा कृपा करदे इस गाँव को शान्त करने की कृपा करदें आपकी बड़ी कृपा होगी मैं मन ही मन रास्ते भर यही प्रार्थना करता आ रहा था। लगभग एक किलोमीटर दूर मैं उस गाँव से निकला हूंगा कि उसमें से एक पार्टी का मुखिया मेरे सामने आता है और उससे जैसे ही मेरी भेंट होती है उनसे चर्चा करता हूँ कि भाई साहब आपके गाँव में बलवा हो गया है आप लोग मर जाए कट जाए तो कोई चिन्ता नहीं लेकिन उस गाँव के जो छोटे-छोटे बच्चे है उनका भविष्य क्या होगा आप उन्हें गाँव से बाहर नहीं कर सकते वह गाँव से दूर नहीं जा सकतेफिर उनका क्या होगा वह एक दूसरे का प्यार पाने के लिए एक दूसरे से दोस्ती करने के लिए सदैव जीवन भर तरसते रहेंगे। कुछ सोचना चाहिए आपको झगड़ा का क्या कारण है यह जानने की जरूरत नहीं है मुझे और न आपको बताने की आवश्यकता है पर आप इस बिन्दु पर सोचे आप तो करीब करीब कमा खा लिए पर इन बच्चों का क्या होगा। यह बात उनके अन्तरंग में छू गई और उन्होंने कहा आप सही कह रहे हैं आप बताइये कि हमें क्या करना चाहिए। हमने कहा आपको हर हालत में सुलह कर लेना चाहिए। आप मर जाए तो हमें एक पैसे की चिन्ता नहीं होगी हमें चिन्ता आपके गाँव के बच्चों की है और भविष्य की है इसलिए आप जल्दी से जल्दी सुलह कर लें तो बड़ी कृपा होगी। तो उन्होंने कहा कि आपकी जैसी इच्छा है हम आपकी बातों को काटेंगे नहीं। इतनी बात कहकर के मैं वापस तखतपुर आया रात्रि हो गई थी सबेरे मैंने नियत समय पर अपनी उपासना प्रारम्भ की और फिर वही प्रार्थना की कि आपकी कृपा से एक व्यक्ति आ गया अब दूसरे आदमी को मैं कहाँ तलासू और इन स्थितियों में कहाँ गाँव में जाऊं और किस तरह से उसे मैं इस काम के लिए तैयार करूं कि आप अपने गाँव का बलवा शान्त कर दें और जैसे ही मैं यह भावभरी प्रार्थना परम पूज्य गुरुदेव से कर रहा था मेरी उपासना जैसे ही समाप्त हुई मुझे आश्चर्य हुआ वह दूसरी पार्टी का मुखिया मेरे घर पर पहुँचा और मेरे से बोला साहू जी आप मुझे याद कर रहे थे मुझे देखकर ताज्जुब हुआ कि मैंने किसी के हाथ सन्देशा तो नहीं भेजा है लेकिन गुरुजी से जरूर कहा था मैने उस व्यक्ति को बैठाला और कहा हाँ मुझे आपकी बहुत जोरों से तलाश थी मैं आपको याद कर रहा था उनकी आव भगत करने के बाद मैने उनसे कहा कि आपके यहाँ जो बलवा खड़ा हुआ है उसमें आप लोग जेल चले जाए मर जाए कट मेरे को उसकी एक पैसे की चिन्ता नहीं है और अगरआप ऐसा नहीं करेंगे तो ऐसा निश्चित रूप से होगा लेकिन मुझे चिन्ता उस गाँव के ढेर सारे बच्चों की है जिनने हमें ढेर सारा प्यार दिया है जब हम आपके गाँव गए थे सारे के सारे लोगों ने हमें बड़े प्रेम से बैठाया था बच्चों ने आकर हमारी गोद में बैठकर कइयों ने चाचाजी कहा कई ने साहब कहा और हम उनके प्यार को भूल नहीं सकते उनका क्या होगा। यह बाद उनके दिल को भी छू गई। उन्होंने एक ही शब्द कहा आप जैसा निर्णय करेंगे हमें मान्य है। हमने कहा जैसा निर्णय करने के लिए तो कोई दूसरी बात ही नहीं है आप दोनों को सुलह ही करना है उन्होंने कहा ठीक है हमारी तरफ से बिल्कुल तय है कि हम सुलह करने को तैयार हैं मैंने पहली पार्टी से बात कर ही ली थी और दूसरी पार्टी वाले से भी जब मैंने यह बात सुनली तो मेरे हृदय में परम पूज्य गुरुदेव के प्रति कितनी कृपा का गुणगान करूं कि पहली प्रार्थना पर एक व्यक्ति आया दुबारा याद किया तो दूसरी पार्टी का व्यक्ति आया तुरत में उस गाँव पहुँचा और जाकर के दोनों मुखिया को और दोनों तरफ के ग्रामवासियों को बुलाकर के वहाँ के ग्राम देवता के पास मैंने जाकर सबको संकल्प कराया कि हमारे गाँव में किसी प्रकार का कोई झगड़ा नहीं होगा और हम आपस में लड़ेंगे कटेंगे नहीं और हम सब मिलजुलकर रहेंगे एक दूसरे की मदद करेंगे सहायता करेंगे दूसरे दिन मैंने वहाँ सामूहिक यज्ञ करवाया सामूहिक भोज करवाया और इसके परिणाम स्वरूप पूरे क्षेत्र में पूरे तहसील में और पूरे जिले में ऐसी बात फैली कि यह गायत्री वाले कितने चमत्कारी है कि जो काम एक सरकारी नेता और मंत्री भी नहीं कर पाया उसको इन्होंने आकर पूरा कर दिया। फिर उसके बाद में तखतपुर में अपने काम में लगा रहता था परम पूज्य गुरुदेव की किताबों को पढ़ते और पढ़ाते ज्ञानरथ चलाते हुए मेरे मन में बात आई गरमी के दिन थे होली के समय मुझे एक बात दिखाई पड़ी कि यहाँ वेश्याओं का नाच होता है तो मैंने उसी समय संकल्प किया कि इस नाच को किसी तरह खतम करना चाहिए। माताएँ, बहने, भाई सब मिल बैठकर नाच कराते और नगाड़ा बजाते बड़े हँसते खेलते थे पर इसके भीतर जो पनपती कुप्रथा थी उससे उस क्षेत्र में अशान्ति फैली थी मारकाट होता था जुआ शराब इत्यादि का भयंकर बोलबाला था मैने परम पूज्य गुरुदेव से प्रार्थनी की कि भगवान् कोई न कोई दिन आएगा कि इस प्रथा को बन्द करना पड़ेगा यह श्रेय हम छोटे-छोटे बच्चों को दे देते तो कैसा रहता और इसी के साथ मैंने पंपलेट तैयार किया वहाँ के प्रबुद्ध लोगों को गणमान्य लोगों को सहमत किया उनके नाम से मैंने पूरे क्षेत्र में पंपलेट बटवाएँ उसका असर हुआ लोगों में यह चेतना जागी कि होली को हमें शानदार ढंग से सांस्कृतिक ढंग से मनाना चाहिए। त्यौहार के ढंग से मनाना चाहिए और इस कुप्रथा को हम समाप्त करें बन्द करें तो निश्चित रूप से हमारे क्षेत्र में एक शान्ति और शालीनता का वातावरण पैदा होगा और कुछ लोगों ने सुना और बहुतों ने अनसुनी कर दिया। लेकिन यह क्रान्ति की एक छोटी सी चिनगारी थी लोगों में यह बात फैलने लगी। अचानक मेरा स्थानान्तर करबी रोड हो जाता है और करबी रोड में मैं काम करने लगता हूँ और करबी रोड में एक घटना घटती है एक दौराभाटा करके वहाँ एक गाँव था वहाँ के बहुत से लोग प्रातःकाल कार्तिक के महीने में फेरी लगाया करते थे और अन्नघट इकट्ठा करके गाँव के निर्माण के काम में लगाया करते थे। उन्होंने गायत्री और यज्ञ के बारे में जब सुना और हमारे बारे में सुना तो उन्होंने कहा कि इस बार की कार्तिक पूर्णिमा में इसका जो समापन होगा वह हम गायत्री यज्ञ से करेंगे। उन्होंने गाँव के तालाब के पास सामूहिक कार्यक्रम रखा अच्छा खासा स्थान था और वहाँ ऐसे लोग रहते थे जिनको रामायण गीता कंठस्थ याद था और बड़े दूर दूर तक प्रचार करने जाते थे और रामायण और गीता पर उनका प्रवचन होता था और अचानक उन्होंने मुझे बुलवा लिया और उस समय मेरा गायत्री परिवार का और कोई साथी नहीं था और मुझे ही वहाँ यज्ञ सम्पन्न कराना पड़ा। इसी के बीच अचानक एक घटना होती है कि जब हम पूर्णाहुति करते हैं और पूर्णाहुति करने के बाद प्रसाद वितरण करने के थोड़ा सा पहले उन्होंने कहा कि थोड़ा सा आप प्रवचन दे दीजिए। तो जैसे ही उद्बोधन देने के लिए मैं तैयार हुआ इसी बीच में वहाँ के जो पण्डित जी थे वह आकर बैठे बहुत बड़े रामायणी रामायण के जानकार और रामायण की हर चौपाइयाँ उन्हें याद उन्होंने आकर यह कहा जब उन्हें बोलने के लिए कहा गया यहाँ इस गाँव का पण्डित मर गया है क्या आप लोगों को कोई पण्डित नहीं मिला कि यहाँ कोई एक तेली आकर के यज्ञ करा रहा है और आप लोगों को मालूम नहीं है कि यह पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य है कौन यह जात के बढ़ई हैं और शूद्र हैं और उनको पूज्य मानकर आप यहाँ यज्ञ करवा रहे हैं आप लोगों को लानत है और आप लोग न जाने क्या क्या काम करते हैं जैसे ही उन्होंने हमारे परम पूज्य गुरुदेव के ऊपर प्रहार किया शब्दों से मेरे रोंगटे खड़े हो गए और मेरे शरीर में पसीना आ गया और मैंने जोर से उन्हें पण्डित जी कहकर ललकारा तभी उस पण्डित ने कहा चुप रहो उसके बाद में मेरा शरीर न जाने क्यों शान्त हो गया। मैंने उसी समय गुरुदेव को याद किया कि गुरुदेव या तो मुझे आप इसी समय खतम कर डाले या मैं आपके विपरीत शब्द हजम कर जाने की स्थिति में नहीं हूँ मेरे दिमाग में उस समय एक प्रकाश जैसी चेतना आई और मेरा सारा शरीर एकदम शान्त हो गया। जैसे पण्डित जी ने अपनी बात समाप्त की वैसे ही गाँव वालों ने पुनः मुझे आवाहन किया कि आप बोले। मैंने कहा हम यहाँ गायत्री यज्ञ कर रहे हैं और यहाँ हमने गायत्री माता को बुलाया है और इसलिए हम गायत्री माता के साथ गायत्री यज्ञ करवा रहे हैं अगर हम और दूसरा कुछ करवाते तो सम्भव हैं सारे इष्ट इत्यादि की चर्चा करते पर यह समय की आवश्यकता है गायत्री और यज्ञ के माध्यम से आज की समस्याओं का समाधान हो रहा है इसलिए अगर देखा जाए तो इसमें किसी प्रकार से ऐसी कोई चीज नहीं है जिसे न कोई कर सके या न किया जा सके। ऐसा न तो किसी धर्मग्रंथ में लिखा है और न रामायण न गीता न भागवत में इसे प्रतिबन्धित करने का उल्लेख कहीं नहीं मिलता। इस समय यदि हम गायत्री और यज्ञ का अवलम्बन पकड़ेंगे तभी हमारी सांस्कृतिक सुरक्षा हो सकेगी देश और समाज का कल्याण हो सकेगा इसको जन-जन तक पहुँचाने के लिए हमारे परम पूज्य गुरुदेव जो चारों वेदों के ज्ञाता है और सभी धर्मग्रंथों का उन्होंने अनुवाद किया है ऐसा आज तक दुनियाँ में कोई व्यक्ति नहीं है और जैसा पण्डित जी ने कहा कि यह तो बढ़ई हैं और यह शूद्र है मैं इनसे प्रार्थना करूंगा कि ऐसा व्यक्ति जिसने चारों वेदों का अनुवाद किया है आप बढ़ई कहें या भंगी कहें या चमार कहें इस देश में न कभी जाति की पूजा हुई है और न कभी जाति को स्थान दिया गया है यहाँ गुण और कर्म को महत्त्व दिया गया है यदि ऐसा होता तो रावण की पूजा होती राम की पूजा नहीं होती क्योंकि रावण जाति का ब्राह्मण था और भगवान् राम क्षत्रिय थे इतनी बात कहने के बाद गाँव वालों ने मुझे हषोल्लास के साथ गद्गद कंठ से उठा लिया पूरे गाँव की फैरी लगाया मैं उस दिन गुरुदेव की कृपा को क्या कहूँ उन्होंने मेरी इज्जत रखी सारे गाँव वालों की इज्जत रखी और इस तरह से उस सारे क्षेत्र में गायत्री परिवार का ठप्पा जम गयाऔर सारे लोग वहाँ हमारे मिशन से जुड़ने लगे मैंने वहाँ प्रथम गायत्री महायज्ञ कराने का सौभाग्य प्राप्त किया। उसके बाद एक साल के बाद मेरी पदस्थापना मुंगेली में हो गई। वह स्थान वेश्याओं के नांच से घिरा हुआ था यह बात मेरे दिमाग से उतरी नहीं थी और मैं फिर उस बात को लेकर लोगों से सम्पर्क करता रहा और सम्पर्क करते करते मैंने फिर वहाँ पंपलेट बाँटे लोगों से सम्पर्क करना यह मेरा क्रम था और वहाँ पहुँच कर जैसे ही होली का समय आया तो गाँव गाँव पहुँच-पहुँच कर यह आन्दोलन चलाया और जब मैंने यह देखा कि दूसरे साल में मुझे विशेष सफलता नहीं मिली तो तीसरे साल सन् १९७३ में मैंने जमकर अभियान छेड़ा और उसके बाद गाँव-गाँव जाकर के संकल्प कराना और लोगों को जाकर के बोलना कि तुम्हारे घर के सामने तुम्हारी बहू बेटियों के सामने वेश्या आकर के नाचती है हमारे घर की बहू बेटी को कल को यह वेश्याएँ वेश्याएँ बना देंगी। हमाराी बहू-बेटियों को यह नाचने के लिए बाधित कर देंगी। इस कुप्रथा को बन्द करो इस प्रकार मैं इनको ललकारता था दहाड़ता था पता नहीं मुझमें कहाँ से ऐसी शक्ति आती थी कि मालगुजार और बड़े-बड़े लोग ऐसे प्रतिष्ठित लोगों को भी मैंने इसके लिए अनेकानेक ऐसे शब्द कहे जिसको सामान्य स्थिति में कोई सुनता तो निश्चित मारपीट कर मुझे धकेल देते लेकिन लोगों ने मुझे सम्मान दिया और इस कुप्रथा को बन्द करने के लिए ढेर सारे लोग मेरे साथ जुड़ने लगे इसी बीच मैंने संकल्प अभियान शुरु किया और वहाँ के छात्र संघ से लेकर के व्यापारी संघ और अधिवक्ता संघ इन सब लोगों से सम्पर्क करके मैंने हस्ताक्षर अभियान चलाया और उसमें म०प्र० के राज्यपाल को मैने एक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया कलेक्टर बिलासपुर को एक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया एस०डी०एम० को दिया और थाने को दिया और ऐसा कुछ गुरुदेव के सामने रखने के बाद मैंने उस कागज को पोस्ट किया परम पूज्य गुरुदेव की ऐसी कृपा हुई कि एक सप्ताह के भीतर वहाँ का थानेदार रिक्शे में बैठकर के सिपाहियों को लेकर के माइक लेकर के एनाउन्स किया कि इस समय कोई वेश्या नाच यहाँ नहीं करायेगा होली के सिर्फ सात दिन थे वेश्या नाच किसी को कराना नहीं है आप सामान्य और सादे तौर से आप इस होली को मनाएँ और उसका प्रतिफल यह हुआ कि लोगों ने सुना और जो जो कराने के मूड में थे उन सारे लोगों ने यह नाच बन्द करने के लिए संकल्प लिया। दूसरी बात जिस क्षेत्र में यह वेश्याएँ रुकती थी वह तो आ गई थीं कोई कानपुर से आई कोई इलाहाबाद से आई कोई कलकत्ता से आई तुरत वापिस नहीं जा सकती थी लेकिन वह उस साल के लिए रुके लेकिन दूसरे साल के लिए मैंने उस क्षेत्र के ग्रामवासियों से निवेदन किया कि आप उनको यहाँ ठहरने न दें उन्हें आने न दें और उनसे भी कहा कि आप अगले साल यहाँ बिल्कुल नहीं आना लोगों ने इस बात को सुना और परिणाम यह हुआ कि वह वेश्यानाच बन्द हुआ और होली किस तरह से मनाएँ इसका स्वरूप देने के लिए मैंने ढेर सारे गंदे चित्र और गंदे साहित्य इकट्ठा किए और होलिका बनवाई और वहाँ के एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कालीचरण जी शुक्ला को बुलाया और उनसे उस होलिका का दाह कराया लगभग ११ से १२ के बीच में दिन के समय उसका दाह कराया और इतना शानदार माहौल बना कि लोग रंग और गुलाल के साथ ऐसे शानदार ढंग से गले मिले लोगों ने कहा कि वास्तव में होली इसी तरह से खेली जानी चाहिए। मेरे जीवन की यह दूसरी विलक्षण क्रान्ति थी। इसी बीच में मुझे २५ कुण्डीय यज्ञ अपने गाँव में भी कराना था। जब यज्ञ आन्दोलन के रूप में चलाया जा रहा था हमने अपने गाँव के लिए भी २५ कुण्डीय की स्वीकृति माँगी हमारे गाँव में २५ कुण्डीय यज्ञ हो रहा था हम अपने माता पिता से हमेशा कहते रहते थे माता जी आप कभी मथुरा चलकर हमारे परम पूज्य गुरुदेव का दर्शन तो कर लें यह आज के हमारे भगवान हैं और आप इनका दर्शन करेंगे तो निश्चित रूप से प्रसन्न होंगे और यह बहुत अच्छी बात होगी हमारी निष्ठा को देखकर हमारे माता पिता प्रसन्न होते थे और कहते थे कि बेटा तुम्हारे माता पिता को क्या तुम वहीं तक ले जाओगे तुम्हारे गुरु को ही यहाँ ले आओ तो क्या नुकसान है तुम्हें बार-बार वहाँ जाना पड़ता है तुम्हारे गुरु का फर्ज नहीं बनता है कि कभी तुम्हारे यहाँ आए यह बात मुझे बड़ा ताज्जुब लगा और मेरी माँ ने कहा कि बेटे तुम्हारे गुरु के यहाँ नहीं जाएगे अगर तुम उनके शिष्य हो तो तुम्हारे गुरु को भी तुम्हारे पास आना चाहिए। मैं ताज्जुब में पड़ गया मेरी माँ यह कैसी बात कह रही है और उसने संकल्प कर लिया कि मैं तुम्हारे गुरु के पास नहीं जाऊंगी तुम्हारे गुरु को मेरे यहाँ आना पड़ेगा यह बात आई गई हो गई पर यह बात मेरे दिमाग में रह रह कर याद आती थी और मैं सोचता था कि कब वह अवसर आएगा मेरी माँ ऐसा कह रही है और ऐसा कब होगा। इसी बीच में यज्ञ की स्वीकृति आई और उसमें लिखा था कि बेटे हम तुम्हारे यज्ञ में जरूर पधारेंगे और तुम्हारे यज्ञ का संरक्षण करेंगे उस यज्ञ की विलक्षण घटना यह है कि जब हमारे साहित्य स्टाल में परम पूज्य गुरुदेव का पूरा का पूरा चित्र समाप्त हो गया दीक्षा देने वालों के लिए हमारे पास कोई फोटो नहीं बचे तब हम रात के समय एक आदमी को बिलासपुर की आसपास की शाखाओं में चित्र और माला लेने भेज रहे थे तभी एक आदमी आकर के बोलता है कि आप लोग किसका चित्र लेने के लिए भेज रहे हो हमने कहा यह हमारे गुरुजी हैं इनका चित्र समाप्त हो गया है कल ढेर सारे लोग दीक्षा लेने वाले हैं तो उनको एक-एक फोटो देने की हमारी मंशा है अरे इनको तो मैं रोज यहाँ देखता हूँ यह रोज यहाँ प्रधान कुण्ड पर आते हैं और यहाँ जो वेदी हैं वहाँ प्रणाम करते हैं और चले जाते हैं उसको हमने प्रधान यज्ञ वेदी में यजमान बनाया था वैसे हमने २५ कुण्डीय यज्ञ के लिए ९ यजमान तैयार किए थे उसमें से एक यजमान वह भी थे उन्होंने यह कहा कि आपके गुरुजी तो यहाँ रोज आते हैं सफेद उनके बाल है उनके बाल खड़े रहते हैं और उन्होंने कुरते का रंग भी बताया तो हमने उनके भाग्य को सराहा हकीकत में वह व्यक्ति बड़े साधक थे उन्हांने ६ माह पूर्व से ही जमीन में सोना, एक टाईम खाना नित्य गायत्री का जाप करना यह उन्होंने प्रारम्भ किया था लेकिन गुरुदेव को उन्होंने न कभी देखा था और न गुरुजी के बारे में वह सुने थे चित्र को देखकर उन्होंने स्पष्ट किया कि यह परम पूज्य गुरुदेव ही है जो नित्य यहाँ आते हैं।

दूसरी घटना हमने यह देखी कि पूर्णाहुति के दिन बहुत ज्यादा भीड़ थी और बहुत भीड़ होने के साथ में सामने एक कुण्ड बहुत दहदहा कर जल रहा था लौ उठ रही थी हम वहीं पर खड़े थे एक महिला जो जो टेरीलीन की साड़ी पहने हुई थी अचानक उस कुण्ड में गिर गई दहदहाते कुण्ड के बीच में उस महिला का गिर जाना और हम तुरत उसको उठाए लेकिन टेरीलीन की साड़ी में आग नहीं लगना यह बड़े ताज्जुब की बात थी सब लोग देखते देखते दंग रह गए यह महिला बची है कि क्या हुई है लेकिन हमने देखा कि उसकी साड़ी में कहीं आग के निशान भी नहीं हैं और उसको किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं हुआ है जबकि होना यह चाहिए था कि उसको साड़ी के साथ उस महिला को तुरत उसमें जल जाना चाहिए था हमने गुरुदेव का पत्र लोगों के सामने दिखाया सारे के सारे लोग आश्चर्यचकित और दंग रह गए। परम पूज्य गुरुदेव सूक्ष्म रूप से किस तरह से यहाँ उपस्थित थे और किस तरीके से उन्होंने हमें संरक्षण दिया उसका प्रभाव यह हुआ कि हमारे यहाँ गायत्री यज्ञ के लिए सारे के सारे लोगों में एक स्पष्ट रूप से मंशा बनी और सारे के सारे लोग बड़े उत्साह के साथ उस यज्ञ में भाग लिए तब से लगातार हमारे गाँव में हर वर्ष कार्यक्रम होता रहा और गाँव वालों ने बड़ी श्रद्धा के साथ में उसमें दान देना प्रारम्भ किया सब लोग योगदान देते रहे।

१९८०-८१ के बीच में जब गुरुदेव का शक्तिपीठों का क्रम चला उन दिनों हम जसपुर में पदस्थ थे जसपुर में पदस्थ होने के बाद वहाँ एक तरफ ईसाई मिशनरी दूसरी तरफ कल्याण मिशन तीसरे अघोर पीठ और हमने हमारे मिशन की किस तरह से काम शुरु किया हालाकि एक छोटी सी शाखा थी और उस छोटी सी शाखा के बीच में जब हमने अपने काम का विस्तार करना शुरु किया सर्वप्रथम हमने २५ कुण्डीय यज्ञ का संकल्प लिया और २५ कुण्डीय यज्ञ का संकल्प लेने के लिए तत्कालीन उस समय के राजकुमार जू देव से सम्पर्क करके उनके राजपैलेस के बाजू में जमीन पड़ी थी उस समय उस जमीन को माँगकर के हमने यज्ञ किया उन दिनों वहाँ के कंस्ट्रक्शन के कार्यों में हमारी पदोन्नति हो गई थी हम वहाँ सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत थे हमारा पूरे क्षेत्र में कार्य चलता था हम गाँव गाँव जाकर लोगों को यज्ञ में आने के लिए आमंत्रित करते थे भटमुंडा और जानचुआ करके दो गाँव है जहाँ का काम चल रहा था मैंने उनको निमंत्रण दिया उस यज्ञ में मुझे यह नहीं मालुम था कि यह लोग ईसाई हैं और वह सारे के सारे लोग मुखिया सहित उस यज्ञ में पधारे और यज्ञ में भाग लेने के साथ-साथ उन्होंने यह कहा कि भेंट करके कि साहब हम लोग ईसाई हैं और हम लोग हिन्दू बनना चाहते हैं मेरे सामने समस्या आई कि किस तरीके से इसका स्वरूप चेंज किया जाए क्योंकि मैं सरकारी आदमी था और अगर हम इसको धर्मान्तरण का स्वरूप देते हैं तो स्थिति कुछ खराब हो सकती है इसलिए हमने उसे कुछ दूसरे तरीके से लोगों से सलाह करके कुमार साहब हमारे दिलीप सिंह जू देव और प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे कपिल केशरी जी को बैठाकर हम लोगों ने सलाह किया और निर्णय किया कि इसको हम इनका पूरी तरह से संस्कार कराएगे और सब प्रकार से इनको दीक्षा भी देंगे और पूरी तरह से संस्कार कराने के बाद हम इनसे यही निवेदन करेंगे कि भले ईसाई बने रहें पर गायत्री मंत्र का जप करें धर्मान्तरण हमारा लक्ष्य नहीं है। उन्होंने बड़े गद्गद होकर उसको प्रारम्भ किया और वह गाँव अभी भी बड़े साधक स्तर के वहाँ तैयार हुए और पूरे क्षेत्र में वहाँ यह हवा फैल गई यहाँ इस यज्ञ में ईसाई भी बैठ सकते हैं और मुसलमान भी भाग ले सकते हैं और आदिवासी और हरिजन सारे के सारे लोग इसमें भाग ले सकते हैं इसके बाद शानदार वहाँ का क्रम फैला और आज ईसाई मिशनरी के टक्कर में आज कम से कम वहाँ स्थिति ऐसी बनी है कि कोई वहाँ हिन्दुओं को ईसाई के रूप में परिवर्तित नहीं कर सकता। कुरुडी करके एक गाँव है वहीं पर उन हमारे एक गायत्री परिवार के श्रीवास्तव जी थे इंस्पेक्टर उनके यहाँ हमने एक दिन कार्यक्रम किया और कार्यक्रम कराने के बाद पूरे के पूरे गाँव के लोगों को बुलाकर यह कहा कि आप सारे के सारे गाँववासी यज्ञ क्यों नहीं कर लेते सामूहिक और उन्होंने आगामी रविवार को तय किया तय करने के बाद जब हम यज्ञ करने गए तो पता चला कि यहाँ का कोई भी आदमी यज्ञ करने के लिए तैयार नहीं है और वह रविवार का यज्ञ केंसिल हो गया। कारण पता करने पर पता चला कि ईसाइयों ने यहाँ लोगों को पैसा दे दिया है ढेर सारे सामान दे दिए हैं कपड़े दे दिए हैं और इनका बपततिस्मा होने वाला है हमने जसपुर में आकर कई लोगों को सुनाया कि आप लोगों में इतनी भी शक्ति नहीं है कि आप इन आदिवासियों को ईसाई होने से रोक सकें सारे जसपुर में यह बात हवा की तरह फैल गई और देखते देखते १४४ धारा लागू हो गई सारा का सारा इलाका तमतमा गया और वहाँ जाकर के लोगों ने उस गाँव के लोहार लोगों को ईसाई होने से बचाया उसमें पूरा का पूरा सहयोग किया और तब से लोगों ने यह कहा कि गायत्री परिवार अपनी संस्कृति का संरक्षण करने के लिए आगे है अगर इस क्षेत्र के किसी भी भाई को भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म में किसी भी तरह की अनिच्छा है या उसमें नहीं रहना चाहते तो हम उन्हें रोकेगे तो नहीं पर जाने के पहले सब लोग यह समझ लें कि भारतीय संस्कृति में दम क्या है इसकी खामियाँ क्या हैं उसके सिद्धान्त क्या हैं इसकी अच्छाईयाँ क्या है उसको जाने बगैर न जाएँ इस तरीके से पूरे के पूरे इलाके में यह बात फैली और परम पूज्य गुरुदेव की यह कृपा थी कि १४४ धारा लगने के बाद किसी प्रकार की मारकाट की कोई बात नहीं बनी और किसी प्रकार का बलवा नहीं हुआ और सारा का सारा इलका शान्त हो गया लेकिन हिन्दुओं में एक मजबूती के साथ उभार आया कि अब हममे से कोई भी ईसाई बनने के लिए यदि कोई आएगा तो सारे सारे के लोग वहाँ टूट पड़ेगे और किसी को ईसाई नहीं होने देंगे। इसके पहले एक छोटी सी घटना जिन दिनों में मुंगेली में था एक हरिजन परिवार आया वह मास्टर थे और यहाँ भाटापारा साईड के रहने वाले थे वह आकर के पूरे गाँव में मुंगेली शहर में लोगों के पास जाते अधिवक्ताओं के पास गए वहाँ के मन्दिरों में गए कि हम गलती से ईसाई बन गए थे हिन्दू बनना चाहते हैं आप हमारा संस्कार करा दीजिए लोगों ने कहा यह धर्मभीरू है पता नहीं ईसाई बनने के बाद यहाँ हिन्दू बनने की इसकी कोई गलत मंशा होगी सब लोगों ने उसे दुत्कारा और किसी ने उसे पुचकारा नहीं एक व्यक्ति ने उसे हमारे पास भेज दिया हमने कहा आप चिन्ता न करें हम आपको जरूर स्वीकार करेंगे आपका निश्चित रूप से संस्कार कराऐगे हमने कई लोगों से सम्पर्क किया और सबने कहा देखो यहाँ ईसाई का बड़ा गढ़ है और ईसाई लोग यह सुनेंगे तो उन पर बड़ी प्रतिक्रिया होगी हमने कहा हमारे ढेर सारे हिन्दुओं को यह ईसाई बना ले रहे हैं तो यदि एक हरिजन जो स्वेच्छा से हिन्दू बनने के लिए आया है उसको यदि हम गायत्री मंत्र की दीक्षा दे दे तो इसमें बुराई क्या है। वह तो कभी नहीं सोचते कि हम हिन्दुओं को ईसाई बना रहे हैं तो हिन्दू क्या कहेंगे और हम यह कैसे सोचे कि एक ईसाई हिन्दू बन जाएगा तो ईसाई क्या सोचेंगे। हमें इस बात की क्यों चिन्ता होना चाहिए हमने दमखम के साथ में इस बात को लोगों के सामने रखा उसका विधिवत संस्कार कराया शिक्षा संस्थापन कराया उसको दीक्षा दी यज्ञोपवीत संस्कार कराया और उसको यह कहा कि भाई साहब आपको यदि लगे कि ईसामसीह के प्रति श्रद्धा है तो ईसामसीह का भी चित्र रख लेना साथ में हमारे परम पूज्य गुरुदेव का चित्र रखना गायत्री माता का चित्र रखना आप जिसका जिसका भी चित्र रखना चाहे रखना और नित्य गायत्री मंत्र का जाप करना यह मात्र हिन्दुओं का नहीं ईसाइयों का भी है और सिक्खों का भी है और जितने भी धर्म के जानने वाले हैं इतना ही नहीं इस धरती पर जितने भी मानव मात्र हैं सबके लिए गायत्री मंत्र समान रूप से है और उसका जाप मनन और चिन्तन हर कोई कर सकता है यह जब मैंने बात कही तो उसका लोगों के बीच बहुत शानदार असर हुआ और यह मेरे जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना की शुरुआत थी एक क्रान्तिकारी घटना थी जिसका क्षेत्र में बहुत अच्छा प्रभाव हुआ।

सन् १९७६ में मंडला में मुझे पदस्थ होने का सुअवसर मिला। मंडला में भी एक छोटी सी शाखा थी।१९७६ में जब में वहाँ पहुँचा तो वहाँ गायत्री परिवार की लोग छुटपुट साधना तो करते थे लेकिन साप्ताहिक यज्ञ तक करने के लिए बड़ा प्रयास करना पड़ता था बड़ी मुश्किल पड़ती थी। फिर हमने अपने ही कुछ लोगों को लेकर के चार-पाँच लोगों को लेकर के नवरात्रि में सामूहिक अनुष्ठान किया। सामूहिक अनुष्ठान करने का इतना अच्छा प्रभाव पड़ा कि हम सब आपस में मिल जुल गए और उसी साल हम सबने मिलकर संकल्प किया कि हम ९ कुण्डीय यज्ञ करेंगे। वह क्षेत्र ऐसा था कि महिलाओं को कभी कलश यात्रा में निकलने नहीं दिया गया था मंडन मिश्र की वह बस्ती महिलाओं के लिए एक प्रकार से घर से निकलना एक प्रकार की कुप्रथा मानते थे निकलने नहीं देते थे हमने कहा कि महिलाओं को लेकर हम कलश यात्रा निकालेंगे तो लोग कहते थे कि यह हो नहीं पाएगा और जब कलश यात्रा की बात आई तो लोग घर-घर में जाकर यह अफवाह फैलाने लगे तुम कलश यात्रा में भाग लोगी तो विधवा हो जाओगी तुम्हारे पतिदेव मर जाएँगे तुम्हारे घर में कई प्रकार की बीमारियाँ आ जाऐगी कई प्रकार के कलह आ जाऐगे लोगों ने सब महिलाओं को रोक दिया सब तैयार खड़ी थी लेकिन घर वालों ने रोक दिया इसी समय हमने कहा कि चलो हम ही अपनी महिलाओं को अपनी पत्नियों को लाते हैं उसी से हम कलश यात्रा निकालेंगे और मित्रों हम चारछै लोगों को लेकर ही जब कलश यात्रा करने के लिए तैयार हुए हमने परम पूज्य गुरुदेव को स्मरण किया भगवान हमने कभी ऐसा माहोल देखा नहीं था और महिलाओं की चार छै की कलश यात्रा निकलेगी यह हमारे लिए बड़ी आत्म गौरव की बात नहीं रहेगी हम तो अपने आपको बहुत गिरा हुआ महसूस करते हैं पता नहीं हममे ऐसी कौन सी कमी आ गई कि आज महिलओं को हम इकट्ठा नहीं कर सक रहे हैं। जैसे ही हमने अपने मन में गुरुदेव को रोते हुए याद किया सारी की सारी महिलाएँ चाहे हमारे घर में कोई विधवा हो जाए कुछ भी हो जाए हम इस यज्ञ में जाएँगे ऐसा लड़लड़कर लोग दौड़ते दौड़ते आई महिलाएँ और देखते देखते कम से कम ढाई तीन सौ से अधिक महिलाएँ कलश यात्रा में आई जितने भी हमारे कलश थे सब पूरे हो गए। और उसके बाद भी ढेरों महिलाओं ने इसमें भाग लिया। मंडला की यह अपने आपमें एतिहासिक कलश यात्रा थी इतने महिलाएँ और पुरुष वहाँ के इतिहास में कभी नहीं निकले थे। दूसरा चमत्कार यह होता है कि जैसे ही यज्ञ प्रारम्भ होता है दूसरे दिन आँधी और तूफान आता है और वहाँ तीन लोग पेड़ में दबकर मर जाते हैं लोग कहते हैं देखो महिलाओं को यज्ञ करने का अधिकार नहीं है ब्राह्मणों को छोड़कर दूसरों को यज्ञ करने का अधिकार नहीं है यहाँ गायत्री यज्ञ में महिलाओं ने आहुतियाँ दे दी शूद्र लोग भी चमार लोग भी जाकर के तेली और लोहार न जाने कौन-कौन लोग जाकर आहूति दे दिए उसका परिणाम है कि यह आँधी तूफान आया और यह तीन लोग मर गए। उसके बाद लोग गायत्री शब्द को सुनना भी पसन्द नहीं करते थे हमारे सामने बड़ी समस्या हो गई यह तो किया कराया सब गुण मिट्टी हो गया फिर हमने परम पूज्य गुरुदेव को कहा कि हे भगवन् यह हो क्या गया। हम गुरुदेव की किताबों को लेकर के और अखण्ड ज्योति को लेकर के प्रबुद्ध लोगों तक पहुँचते थे जो जानते थे वह तो हमारी बातों को सुनते थे किताबें लेते थे पढ़ते थे सब कुछ होता था लेकिन जो सामान्य समुदाय था वह तो अन्धविश्वासी था और वह एक भी हमारे साथ आकर जुड़ते नहीं थे। उन्हीं दिनों एक बड़ी विचित्र बात होती है हमारे पास एक चिट्ठी आती है देवकन्याओं की एक टीम जा रही है आप चाहो तो अपने यहाँ कार्यक्रम रख लो। हमने फौरन तय किया कि हमारे यहाँ देवकन्याओं का कार्यक्रम होगा और हम करेंगे। हमारे कार्यकर्ता भाई बड़े निराश थे कि यहाँ कोई सुनता तो है नहीं और आप कार्यक्रम करा लोगे कैसे कार्यक्रम हो जाएगा। हमने बोला आपको परम पूज्य गुरुदेव पर विश्वास नहीं है देखना कैसे शानदार कार्यक्रम करेंगे। हमने तुरन्त एक योजना बनाई पंपलेट छपाया और लोगों के पास जाकर प्रचार करने का दूसरा तरीका अपनाया दूसरा तरीका यह था कि देखो पिछले दिनों जो लोग गायत्री यज्ञ में नहीं आए थे उन्हीं उन्हीं लोगों के घरों के छप्पर उड़ गए थे मंडला के जिन दिनों पिछले दिनों हमने यज्ञ किया था उन १२ लोगों का हमने नाम गिनाया आप जाकर देखना इन लोगों ने विरोध किया था और गायत्री यज्ञ में शामिल होने के लिए ये अपने घर से किसी को भेजे नहीं थे हमारे यज्ञ का इन्होंने विरोध किया था और इसके कारण इनके घर के छप्पर उड़ गए। पंपलेट देते देते यही कहा कि देखना भाई साहब पिछले दिनों जो यज्ञ में नहीं आए थे उनके घर के छप्पर उड़ गए थे आप हमारे इस कार्यक्रम में जरूर आना आपको और कुछ प्रचार करने की जरूरत नहीं है इतना कहकर के आप पंपलेट देकर के चले आना मित्रो हमने ऐसा चमत्कार देखा देवकन्याओं का जब कार्यक्रम होता था साढ़े सात बजे से संगीत और प्रवचन प्रारम्भ होता था हम आखिरी दम तक दरी बिछाते रहते थे हमारा भी संकल्प था मंच पर जो आएगा उसको हम दरी पर बैठाएगे आसन पर बैठाएगे खचाखच भीड़ में वह कार्यक्रम सम्पन्न हुआ और मंडला का वह कार्यक्रम बड़े एतिहासिक रूप से पूर्ण हुआ। इसके पश्चात् हमारे जीवन की अनेकानेक घटनाएँ ऐसी हैं जो ऐसी शानदार है जिनको सुनाकर के हम निश्चित रूप से गौरव महसूस करते हैं। मस्तूरी का एक यज्ञ करने का हमें सौभाग्य मिला उसमें केन्द्र के कोई प्रतिनिधि नहीं आ रहे थे और केन्द्र से प्रतिनिधि न आने के कारण उस यज्ञ को सम्पन्न कराने हमें जाना पड़ा १२ बजे रात्रि का समय था चारों तरफ पण्डाल से घिरा हुआ था गरमी के दिन थे हमने सोचा कि यही हमें सो जाना चाहिए हमारे साथ में एक कार्यकर्ता भाई था हम वहीं पण्डाल के बीच में सो गए चारों तरफ से पण्डाल घिरा हुआ था और अचानक आधा घण्टा हो पाया था कि चारों तरफ पण्डाल में न जाने कहाँ से आग लग गई हम भीतर सो रहे थे हमारे साथ का कार्यकर्ता भाई सो भी नहीं पाया था हम थके थे नींद लग गई और चारों तरफ से आग धू धू करके जलने लगी जो कार्यकर्ता भाई था उसको हमें जगाने की भी सूझबूझ नहीं रही कि हो क्या गया। उसने हमें जगाया भी नहीं हम भीतर ही पड़े पड़े सो रहे थे जिस दरी में हम सो रहे थे उस में आग लग लग गई थी हमारा कुरता हमारे सिर के पास रखा था उसमें आग लग गई थी और पण्डाल में चारों तरफ से आग ही आग लगी हुई थी सूझ नहीं रहा था अचानक सू-सू करके जब आवाज हुई तो नींद खुली तो चारों तरफ आग हम जाएँ तो जाएँ कहाँ पर अचानक ऐसा महसूस हुआ कि किसी ने हमें वहाँ से उठाकर फेंक दिया है और न तो हमें किसी प्रकार की खरोच आई जबकि हम मंच पर सो रहे थे वहाँ कूदने से मोच भी हमें आ सकती थी और इसी बीच हम उस पूरे घेरे से बाहर आते हैं जैसे ही हम उस स्थान को छोड़ते हैं ऊपर से पूरा का पूरा मलवा जिस स्थान पर हम सो रहे थे उस स्थान पर आकर के गिरता है हम परम पूज्य गुरुदेव को याद करते हैं यदि परम पूज्य गुरुदेव का संरक्षण नहीं होता तो उसी दिन हमारा प्राणांत हो जाता। ठीक उस यज्ञ को सम्पन्न करके आगे ओखर करके एक गाँव पड़ता है वहाँ एक तिवारी थे रामायणी थे और उस क्षेत्र के जाने हुए पण्डित थे। वह प्रकाण्ड विद्वान थे वेद भी पढ़ते थे दर्शन भी पढ़ते थे और गीता, पुराण, भागवत इत्यादि का प्रवचन करते थे। वहाँ के लोगों ने कहा आप हमारे गाँव में यज्ञ कर दीजिए। हम गाँव में गए तो जाने के बाद उस गाँव वालों को घर वालों को हमने यह कहा कि आपके गाँव में यज्ञ की तैयारी करने के लिए कम से कम दो तीन दिन का समय दीजिए और तैयारी के लिए क्या करना चाहिए यह हमने वहाँ के ग्रामवासियों को समझाई और समझाने के बाद हमने कहा कि ९ आदमी आप हमें ऐसे दीजिए जो किसी प्रकार से किसी की कोई कामना हो और हम जो कहेंगे वही वह करने के लिए तैयार हो जाएँ। दूसरे दिन हमारे सामने वहाँ के एक सज्जन थे जो हमें लेकर गए थे उनने कहा हमारे गाँव के यह ९ दम्पत्ति है इनसे आप जो कहना चाहें कहिए। मैंने उनसे कहा आप ९ दिन जमीन पर सोएगे एक समय भोजन करेंगे जब तक यज्ञ न हो जाए किसी प्रकार से न तो माँसाहार करेंगे और न किसी प्रकार से दूसरे कोई गलत काम करेंगे बोले ठीक हमने कहा आपकी इच्छा क्या है एक ने कहा हमारे लड़का नहीं है, दूसरे ने कहा हमारी लड़की नहीं है तीसरे ने कहा हमारा मुकदमा चल रहा है चौथे ने कहा हम निस्सन्तान है इस तरह से ऐसे ऐसे लोग जिनको कि हर प्रकार से वह हताश हो चुके थे उनको हमने उस यज्ञ में चुना उनको हमने यजमान बनाया। शानदार तैयारी चली कलशयात्रा शानदार ढंग से सम्पन्न हुई जब यज्ञ प्रारम्भ होने का समय आया तो उन दिनों हमने सोचा कि यदि हम यज्ञ कराते हैं तो यह पण्डित जी हमारे हाथ से निकल जाएगे हमने उन तिवारी जी से कहा कि आप इस यज्ञ को सम्पन्न करा दीजिए उन्होंने कहा नहीं हमको मस्तूरी जाना है वहाँ से ३०-४० किलोमीटर की दूरी पर वह मस्तूरी था वहाँ मंत्री महोदय आ रहे हैं और वहाँ उन्होंने मेरे हाथ में खबर भेजा है। मेरे मुँह से निकल गया आप मंत्री के स्वागत में तो जरूर जाएगे क्योंकि मंत्री आज का आपका देवता है अगर आप वास्तव में मानते हैं तो यज्ञ भगवान् आपके गाँव मे आ रहे हैं गायत्री माता आपके गाँव में आ रही है और हमारे परम पूज्य गुरुदेव आपके गाँव में आ रहे हैं यह आपको दिखाई तो नहीं देते पर यह देवता आपको भरपूर कर देंगे। इनको छोड़कर आप एक मंत्री के स्वागत के लिए जाऐगे जो ज्यदा से ज्यदा कुछ हमार आपके गाँव के लिए अनुदान दे देगा पैसे दे देगा इसके अलावा वह कर कुछ नहीं सकता। उनके स्वागत में आप यहाँ छोड़कर वहाँ जा रहे हैं आप जाइये हमें किसी प्रकार कोई एतराज नहीं है यदि आप रह जाते तो अच्छी बात होती। यह बात जब हमने उनसे कही तो न जाने किस प्रकार उनके दिमाग में फिरा और वह मस्तूरी जाना केंसिल किए और उसके बाद उन्होंने हमारे साथ रहकर यज्ञ सम्पन्न कराने के लिए अपनी सहमति दे दी। हम उन्हें साथ लेना इसलिए चाहते थे कि उस क्षेत्र के वह माने हुए पण्डित थे जब वह साथ में हो जाएगे तो यह सारा का सारा इलाका गायत्री मय हो जाएगा इस उद्देश्य से हमने उन्हें जाने से रोका और उसका परिणाम हमें अच्छा मिला उस क्षेत्रऋ में गायत्री का एक बहुत शानदार ठप्पा जमा और जब लोगों ने सुना कि पण्डित तिवारी जी इस यज्ञ को सम्पन्न कर रहे है और उस यज्ञ की बड़ी बड़ी अनुभूतियाँ यह रही कि जितने भी लोग यजमान बनकर बैठे थे सारे के सारे लोग जिनके यहाँ लड़कियाँ नहीं थी उनके यहाँ लड़कियाँ पैदा हुई जिनके यहाँ लड़के नहीं थे उनके यहाँ लड़का पैदा हुए। जिनके यहाँ सन्तान नहीं थी ऐसी गुरुदेव की कृपा कि उनके यहाँ सन्तान हुई। मुकदमे बाजी जिनके यहाँ चल रही थी उनके यहाँ से मुकदमेबाजी हट गया। और ढेर सारे चमत्कार हुए शाम को जब यज्ञ सम्पन्न हुआ था तो उस समय हमने सामूहिक रूप से उस गाँव में रेली निकाली थी और घर-घर जाकर हमने किसी से शराब माँगी थी, जुआ माँगी, थी माँसाहार माँगा था बिड़ी गुड़ाखू माँगा था लोगों ने बड़ी उदारता पूर्वक अपनी बुराइर्या छोड़ी थीं। और उस इलाके में बड़ा शानदार गायत्री परिवार का सिक्का जमा और इस प्रकार वह ऐतिहासिक यज्ञ अपने आप में सम्पन्न हुआ।

१९७४ में गुरुदेव ने जब प्रथम वानप्रस्थ सत्र प्रारम्भ किया उसमें शामिल होने का मुझे सौभाग्य मिला उसमें टोटल २६ लोग थे और उसमें कम से कम आयु का मैं ही था। उस वानप्रस्थ सत्र में भाग लेने के पश्चात् परम पूज्य गुरुदेव से सम्पर्क होता रहता था शान्तिकुञ्ज में रहकर मैंने ढेरों चमत्कार देखे परम पूज्य गुरुदेव के उन बातों का वर्णन न करते हुए मैं अपनी बात आगे बढ़ाता हूँ। मुझे दतिया जाने का सुअवसर मिला वहाँ से तीन महीने के लिए बुलाया गया था परन्तु परम पूज्य गुरुदेव ने एक ही माह में प्रशिक्षण पूरा करके हम लोगों को क्षेत्र में भेज दिया हम सबसे कम उम्र के थे। हम योग्यता में भी उन लोगों से कम थे हमें बड़ा डर लगता था कि हम इसमें आ गए हैं हमें पता नहीं इसके योग्य माना जाएगा कि नहीं हम अपनी योग्यता को बढ़ा पाएगे कि नहीं इस काम को करने का सौभाग्य हमें मिलेगा कि नहीं यह बात हमेंशा हमारे मन में बनी रहती थी। लेकिन जिस दिन गुरुदेव ने कहा कि बेटे तुमको भी जाना है तो मेरे मन में बड़ी आनन्द की अनुभूति हुई और मैं बड़ा गद्गद हुआ मथुरा आने के बाद हमें दतिया जाने को कहा गया। जैसे ही दतिया पहुँचे तो वहाँ के कार्यकर्ता भाई ने कहा कि हम यज्ञ नहीं करा सकते और आप लोग वापस चले जाइये। जब उनकी यह बात सुनने को मिली तो हमे बड़ा ताज्जुब लगा भाई साहब हम तो यहाँ यज्ञ करने के लिए आए हैं और १५ दिन के लिए आए हैं आप हमें एक दिन के लिए भी ठहरने नहीं दे रहे हैं। उन्होंने कहा ठीक है आप ठहरना ही चाहते हैं तो यह धर्मशाला है यहाँ हम व्यवस्था कर देते हैं और भोजन के लिए हमारा यहाँ होटल है वहाँ हम व्यवस्था कर देते हैं। हमने कहा ठीक है भाई साहब आपने इतना भी कर दिया तो बहुत बड़ी बात है। हम धर्मशाला में दो भाई ठहरते थे पाण्डे जी हमारे साथ थे और वह हमसे उम्र में काफी बड़े थे हेडमास्टर थे और उनके साथ हम रात में रुके रात में ही हमने भगवान् से प्रार्थना की गुरुजी से प्रार्थना की गुरुजी यहाँ यज्ञ भी नहीं होगा हमारा १५ दिन कैसे कटेगा हम क्या कार्यक्रम करें आप हमारा मार्गदर्शन करें जैसे ही हम यह प्रार्थना करके सोए थे उसमें एक बड़ी घटना घटती है सबेरे ४ बजे के आसपास हमें शंख, घण्टा और कीर्तन करते हुए लोगों की आवाज सुनाई पड़ती है। हम तुर्त फुर्त तैयार हुए और हमने पाण्डे जी से कहा चलिए हम लोग देरी नहीं करेंगे हम इनके साथ में हो लेते हैं हमने देखा कि वहाँ २२ साल से एक अंघा इस प्रभातफेरी को चला रहा है हमें सुनकर के बड़ा ताज्जुब हुआ वहा हम गए वहाँ दो बड़े बड़े डंडे रखे थे उसमें हमारी झंडियाँ थी हमारा पीला झण्डा लेकर के जब हमने उनसे कहा कि भाई साहब हम आपके साथ चलना चाहते हैं और हमने अपने झंडे को भी साथ में लगा ले तो आपको कोई एतराज है। उन्होंने कहा हमें कोई एतराज नहीं है आप आइए हमारे साथ-साथ थोड़ी दूर जाने के बाद में जब उन्होंने कहा कि आप लोगों में से किसी को कुछ गाना आता है हमने कहा भाई साहब गाना तो नहीं आता पर कुछ हम सुना सकते हैं फिर जब उनका निर्देश मिला तो हमने गाना शुरु किया नर से नारायण बन जाए प्रभु ऐसा ज्ञान हमें देना लोगों ने बड़े गद्गद होकर हमारे गीतों को सुना और उसके बाद उन्होंने कहा आप रोज आया करें और हमारे साथ प्रभात फेरी में शामिल हुआ करें। तबसे हमारा यह क्रम था उन दिनों वहाँ सट्टा और जुए का भयंकर बोलबाला था। गुरुजी ने हमको बता दिया था सट्टा वाले पूछे जुआ वाले पूछे तो उनको क्या जवाब देना है। जब लोगों को यहा पता चला कि पीले कपड़े धारी दो लोग आए हुए हैं धर्मशाला में ठहरे हुए हैं तो सारे शहर में हल्ला हो गया और लोगों का मिलने जुलने का तांता लग गया। हमने कहा पाण्डे जी आप यहाँ सम्भाले और हमें जाने दें हम सदवाक्य लेखन करेंगे। और यह क्रम चल गया हमने अपनी तरफ से व्यवस्था की सद्वाक्य लेखन कर ही रहे थे कि वहाँ बड़े बड़े मन्दिर है वहाँ एक मन्दिर का पुजारी आया और हमसे कहा कि क्या कर रहे हो हमने कहा हम गुरु का काम कर रहे हैं समाज का काम कर रहे हैं धर्म का काम कर रहे हैं उसने कहा यह भी कोई धर्म का काम है दीवाल का लेखन करना कोई धर्म का काम होता है और कुछ करते हो तो बताओ हमने कहा और कुछ तो नहीं कर रहे है अभी तो हम सिर्फ यही कर रहे हैं हमारे लिए यही काम हमारे गुरुदेव ने सौंपा है। हमने कहा आप क्या जानना चाहते हैं हमसे उनने कहा हम जानना चाहते है कि आप क्या करना चाहते हैं आपका क्या क्रम है कुछ साधना वाधना भी करते हो कि क्या करते हो। हमने कहा साहब यह सारी बातें करने का तो अभी समय नहीं है आप समय दीजिए तो हम आपको पूरी तरह विस्तार पूर्वक बताएगे। फिर उन्होंने कहा ठीक है आप आना हमारे पास हमने कहा ठीक है १२ बजे के बाद हम आएंगे अभी तो हम नहीं आ सकेंगे। १२ से २ का समय हमारा विश्राम का होता है उस समय हम आपके पास आएगे। ठीक १२ बजे हम उनके पास गए उस समय वह पूजा और आरती कर रहे थे। दंग रह गए हम कि १२ बजे इनका कोई आरती का समय होता है। आरती में शामिल हुए। आरती के बाद हम उनके साथ बैठे और जैसे ही बैठे उनने हमें प्रसाद दिया हमें लगा कि यहाँ अघोरी बहुत हैं न जाने किसी प्रकार से हमें कुछ खिला पिला दें अपने वशीभूत करले और कुछ उल्टी सीधी बात हो जाए तो बड़ा चक्कर में फंस जाए हमने प्रसाद तो रख लिया कि बाद में खाएगे पण्डित जी ने बड़ा आग्रह किया हमने कहा पण्डित जी अभी भोजन का टाइम है हम फिर खा लेंगे। फिर उन्होंने बात शुरु की उन्होने कहा कि आप साधना क्या करते हैं। हमने कहा हम तो गायत्री मंत्र का जाप करते हैं और क्या करते हैं और क्या करते हैं ढेर सारे प्रश्र की उन्होने झड़िया लगा दी हमने कहा यह पण्डित जरूर कुछ अपना बताने के चक्कर में हमसे यह सब पूछ रहा है हमने कहा महाराज जी जरा आप तो बताइये आप तो यहाँ के बहुत बड़े पण्डित है हम तो बहुत छोटे से आदमी हैं आप क्या करते हैं। उन्होंने कहा हम तो बड़ी बड़ी साधनाएँ करते हैं हमने कहा बड़ी बड़ी साधना में तो बड़ी बड़ी सिद्धी भी होंगी आपके पास उनने कहा हाँ हमने कहा जरा एकाध बताइये उन्होंने कहा हम हवा में ३२ फीट ऊंचाई तक उठ सकते हैं जैसे ही उनने कहा हम हवा में ३२ फीट ऊंचाई तक उठ सकते हैं हमने उसे जवाब दिया कि पण्डित जी इसमें कौन सी बड़ी बात हैं मैं तो तीन किलोमीटर ऊंचाई तक उड़ सकता हूँ और उड़कर बताऊं क्या जब मैंने कहा उड़कर बताऊं क्या तो पण्डित जी की घिघ्घी बन्ध गई सिट्टी पिट्टी रह गई फिर उनसे जवाब देते बन नहीं पाया। दतिया नगर में वहाँ की जो मेहतरानी भी थी सड़क झाड़ती थी वह भी कम से कम दो फिट घूंघट डालकर सड़क को झाड़ती थी किसी महिला का चेहरा देख पाना बड़ा दूभर था। लोगों ने कहा कि आप यहाँ यज्ञ करने का सोच रहे हैं और आप १५ दिन में यज्ञ की तैयारी भी कर लेंगे और यज्ञ भी हो जाएगा कैसी बात आप सोच रहे हैं आपको तो यह प्रयास छोड़ देना चाहिए। हमने कहा नहीं हमारा गुरु बहुत बड़ा है और हमारे गुरु के आदेश से हम आए हैं और यहाँ से हम अपनी पीठ दिखाकर नहीं भागेगे हम यहाँ यज्ञ करेंगे। हमने तुरत पण्डित जी को पत्र लिखा कि हमारा यहाँ १५ दिन का समय और बढ़ाया जाए हम यहाँ १५ दिन और रुकेंगे हमारा अन्यत्र जो स्थान है उसे केंसिल करके किसी और को भेजा जाए और बात वही हुई हम वहाँ रुके रुककर पूरी तैयारी की वहाँ के लोगों ने कहा आप गिनचुनकर २५-५० कलश बनवाइये और २५-५० से अधिक महिलाएँ किसी कीमत पर नहीं आने वाली। हमने कहा भगवान् हमने २५ की कलश यात्रा कभी देखी नहीं है। सुनना तो दूर की बात है कराना तो दूर की बात है २५ महिलाओं की यात्रा तो हमने कभी देखी नहीं है और हम यहाँ २५ महिलाओं की यात्रा निकालेंगे यह हमारे लिए बड़ा दुर्भाग्यशाली क्षण होगा और हमारी लाज रखना और उसके बाद घर-घर पीला चाँवल बाँटना लोगों को बताना कि कलश यात्रा में भाग लेने का पुण्य क्या होता है तो महिलाओं में महिलाओं का ऐसा प्रचार शुरु हुआ कि जिस दिन हमने कलश यात्रा प्रारम्भ किया हमारे पास कलश के लिए ५०० कलश जैसे तैसे बनवाकर लाना पड़ा और अन्त में लोटे उठवाकर कलश यात्रा प्रारम्भ करनी पड़ी उतनी भीड़ महिलाओं की लोगों ने दतियाँ नगर में कभी देखी नहीं थी। शानदार वहाँ की कलश यात्रा और शानदार वहाँ का यज्ञ सम्पन्न हुआ। उन दिनों हमारे बलराम भाई जो भोपाल वाले वह आए और बिजौलिया नरेश उस यज्ञ में पधारे और अच्छी अच्छी विभूतियों को तब तक हमने कोशिश करके बुलवाया। वह यज्ञ अपने आपमें बड़े शानदार ढंग से सम्पन्न हुआ।

जिन दिनों मुंगेली तहसील में मैं कार्यरत था उन दिनों वहाँ की स्थिति बड़ी विषमताएँ लिए हुए थी। उस क्षेत्र में सतनामियों का बाहुल्य था और सतनामियों के बीच से एक मालगुजार ने एक मन्दिर बनवाया उनके लड़के का नाम था खेलनराम जांगड़े और अगले दिनों वह जाकर सांसद हुए। वह मेरे मित्र थे और जब उन्होंने उस मन्दिर की प्राणप्रतिष्ठा के लिए बनारस के पण्डितों से सम्पर्क किया तो उन्होने कहा कि हम प्राण प्रतिष्ठा का एक लाख रुपया लेंगे और आने जााने का ए सी का किराया खाने पीने का पूरा खर्चा। उन्होंने माथा ठोक लिया इतना रुपया मैं कहाँ से लाऊंगा। फिर इसके बाद अपने जात वालों से सम्पर्क किया वह भी लम्बा खर्च बताएँ। फिर जब अचानक हमसे सम्पर्क हुआ तो हमने कहा आप बिल्कुल चिन्ता न करें हम यह प्राणप्रतिष्ठा कराएगे। सतनामियों के बीच में गायत्री परिवार द्वारा प्राणप्रतिष्ठा किया जाना यह उन दिनों अपने आपमें एक अद्भुत घटना थी। हमने गुरुदेव को पत्र लिखा और एक सप्ताह के भीतर ही उनका पत्र आया हमने क्षेत्र की सारी विषमता को जाति की असमानता को झगड़े को पूरा विवरण दिया था और गुरुदेव ने आशीर्वाद आया बेटे सम्पन्न कराओ हमारी सूक्ष्म उपस्थिति रहेगी और आप किसी प्रकार घबराना मत परिस्थितियाँ भले ही विषम आएँ पर किसी प्रकार से आप घबराना मत। हमने गाँठ बांधकर रख लिया और कहा कि किसी तरह भी इस काम को कराऐगे हमने उसे कराना शुरु किया जिन दिनों ंउस काम को कराना शुरु किया तो शासन ने यह समझा कि यहाँ तो सतनामी और सवर्णो का झगड़ा होता है यहाँ बलवा उठ जाएगा तो यह काम आपको लेना नहीं चाहिए था हमने कहा थानेदार से कहा आप निष्फिकर रहे किसी प्रकार का कोई बलवा नहीं होगा। फिर भी सिपाहियों की पूरी दो कंपनियाँ वहाँ आकर के मौजूद थीं सारा शहर सिपाहियों से पट गया था और जब वह कार्यक्रम निकला तो हमने उनसे निवेदन किया इससे और टेरर क्रिएट होगा हमारे परम पूज्य गुरुदेव का संरक्षण रहेगा हम आपको गेरंटी देते हैं किसी तरह से बलवा की स्थिति नहीं बनेगी। मित्रों शानदार कलश यात्रा निकली उस नगर के इतिहास इतने सतनामी और उतना लोग कभी एक साथ इकट्ठा नहीं हुए थे। बड़ शानदार माहौल में वह कलश यात्रा सम्पन्न हुई ढेरो भाटापारा, रायपुर, राजनांदगांव बसपुर, मस्तूरी कहां कहां से सब हरिजन इकट्ठा हुए थे वह यात्रा सम्पन्न हुई पूरा का पूरा क्रम सम्पन्न हुआ लोग इस ख्वाब में थे कि कहीं लड़ाई और झगड़े और फिसाद न हो जाएँ। प्रशासन भी सतर्क था और सामान्य जनता भी सतर्क थी लेकिन परम पूज्य गुरुदेव की छाया हमें दिखाई पड़ती थी यह कार्यक्रम शानदार ढंग से सम्पन्न हुआ और इस यज्ञ से यह प्रेरणा मिली की यही काम करना चाहिए जिससे यह असमानता की खाई दूर हो और उसके बाद लोगों में एक नया उत्साह आया और हरिजन वर्ग भी यह सोचने लगा कि हमारा भी हिन्दुओं के बीच में कोई संरक्षण है परम पूज्य गुरुदेव का सन्देशा पहुँचाने के लिए वह स्वयं आगे आने लगे। मेरे जीवन की अनेकानेक ऐसी घटनाएँ है जिसमें पलटती हुई जीप का सही रास्ते पर पहुँच जाना टायर पंचर हो जाने के बाद भी घाट मे चलते चलते खाई में गिरने से बच जाना पूरी तरह से परिवार सहित बैठे बैठे गाड़ी में बहुत बड़ी दुर्घटना होने से बच जाना यह मेरे जीवन की ऐसी ढेर सारी घटनाएँ हैं। जिस दिन से मैंने परम पूज्य गुरुदेव को अपने आप को समर्पित किया था उसी दिन से मैंने समझ लिया था कि यह सामान्य व्यक्ति नहीं हैं। गुरु तो सामान्य व्यक्ति के कहने के लिए हैं यह तो मेरे लिए साक्षात् परमेश्वर हैं। भगवान् को मैंने किसी रूप में देखा है तो अपने गुरुदेव के रूप में देखा है और वन्दनीया माताजी को मैंने साक्षात गायत्री माता के रूप में देखा है। जिन दिनों मेरी पत्नी का देहावसान हुआ उन दिनों जब मैं माताजी के पास आया तो मेरे माँ, बाप और यहाँ के वरिष्ठ परिजनों से लेकर के सभी लोगों ने एक ही बात कही कि अभी आपकी उम्र बहुत कम है आपको दूसरी शादी कर लेनी चाहिए और जिन दिनों माताजी ने कहा बेटे तुम पर यह बड़ा दुख आ गया मैंने कहा माताजी आप क्यों चिन्ता करती हैं इसमें कौन सी बड़ी बात है मेरी पत्नी चली गई उसको तो किसी न किसी दिन जाना ही था मुझे भी किसी न किसी दिन जाना ही है। माता जी ने कहा हाँ बेटे यह बात तो ठीक हैं लेकिन इस उम्र में तुम्हारे सथ वज्रपात हो गया। हमने कहा नहीं माताजी आप चिन्ता न करें बेटे तेरी क्या इच्छा है मैंने कहा माताजी आपकी क्या इच्छा है उन्होंने कहा बेटे जो तेरी इच्छा है वहीं मेरी इच्छा है। मैंने कहा माताजी यदि मैं मर जाता तो मेरी पत्नी को कोई दूसरी शादी करने के लिए कहता क्या। माताजी ने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए कहा बेटे मेरी भी यही इच्छा है मैं समझ गई तुम्हारी इच्छा को और उन्होंने कहा हमारा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ रहेगा मैं माताजी के आशीर्वाद को लेकर खड़ा हुआ उसके बाद परम पूज्य गुरुदेव के पास गया राजनांदगांव के राजेन्द्र तिवारी हमारे साथ थे हमने गुरुदेव से कहा हमारी पत्नी तो चली गई आगे के जीवन में हम किसी प्रकार से टूटने न पाएँ हमारे बच्चों को संभालने के लिए आप हमें साहस दें और परम परम पूज्य गुरुदेव ने कहा बेटे हम तेरे जीवन में साथ रहेगे तुम किसी प्रकार से चिन्ता न करना। हमें तो चिन्ता फिर भी नहीं थी परन्तु एक सांसारिक मनुष्य होने के नाते हमने गुरुदेव से कहा और उन्होंने हमें भरपृर आशीर्वाद दिया उन्होंने हमें अपने जीवन में ऐसे ऐसे सौभाग्य प्रदान किए कि हम एक अभियंता होकर के इंजीनियर होकर के हमने अपने विभाग की ईमानदारी से बखूबी कर्तव्य निभाया और अपने आप को हम यह कहलाने के लिए प्रयास करते रहे कि किसी तरह से हमारे गुरु का नाम बदनाम न हो कि कोई यह न कह सके कि यह पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य का बेटा इस तरह से कुकर्म करता है गलत काम करता है पैसा खाता है और बेईमानी करता है। यह लांछन कभी मेरे जीवन में न आएँ इसके लिए मैं सदैव प्रयासरत रहता था और परम पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना करता था। मैं इंजीनियर होने के नाते जब इस मिशन में अपने आपको झांककर देखता हूँ तो अपने परिवार के लिए मैं वास्तव में कुछ नहीं कर पाया लेकिन गुरुजी की असीम कृपा को देखता हूँ कि मैंने कितने असीम काम अपनेजीवन में कर लिए तो एक तरफ मैंने अपने विभागीय कामों को देखा और दूसरी तरफ अपने मिशन के काम को गुरुदेव के काम को देखा तो अपने आप को इतना धन्य मानता हूँ कि उस गुरु की इतनी महान कृपा कि जिस काम को मैं पूरे एक जीवन में नहीं कर पाता वह मैंने अपने थोड़े से समयदान से पूरा किया है यह गुरुदेव की असीम कृपा है। जीवन में दुर्घटनाओ से बच जाना कोई महत्त्व का काम नहीं रखता यह तो सारे लोगों के साथ में होता रहा है और मैंने कइयो के बारे में सुना और देखा है लेकिन मैं अपना मूल्यांकन परम पूज्य गुरुदेव को एक महान अवतारी चेतना के रूप में करता हूँ मैं सन् १९७१ से ही जान लिया था यह साक्षात् कल्कि अवतार है ओर लोगों के साथ मैं इस दावे के साथ कहता हूँ कि यह साक्षात् ईश्वर हैं पारस को छूने के बाद लोहा सोना ही बनता है मैंने भगवान् को छुआ है मैं निश्चित रूप से स्वर्ग जाऊंगा और वह उपलब्धिाँ प्राप्त करूंगा जो सामान्य आदमी को उपलब्ध नहीं होती।

गुरुदेव के संस्मरण रहत सिंह, हरिद्वार

गुरुदेव के चेहरे की बनावट मुझे भिन्न-भिन्न दिखाई दिया करती थी मैं महसूस करता था कि गुरुदेव मुझे आज क्या दिखाई दे रहे हैं। यह आप अपने मन में आश्चर्य की बात समझ रहे होंगे पर मुझे कभी भी गुरुदेव एक रूप में दिखाई नहीं दिए। गुरुदेव का दर्शन साक्षात विष्णु का दर्शन था। जो हम दैवी देवताओं का दर्शन पुराणों में सुनते आए हैं उनके दर्शन करके हमें इतनी शान्ति नहीं मिलती जितनी गुरुदेव के दर्शन करके मिलती है। गुरुदेव की बहुत सी ऐसी वाणी है जो हमें ऐसा लगता है कि यह साधारण पुरुष की वाणी नहीं है। यह भगवान की ही तो लीला है कि जो करोड़ों आदमी हमें आज दिखाई दे रहे हैं। अकेले गुरुदेव ने तपस्या शुरु कर दी माताजी ने हाथ से रोटी सेंककर खिलाई और आज गुरुदेव का परिवार सारे विश्व में और सब संगठनों से आगे चल रहा है तो यह भगवान की ही तो लीला है। यह तो सूक्ष्म साधना में गुरुदेव देश विदेश में जन-जन को झकझोर रहे हैं नेताओं को झकझोर रहे हैं प्रबुद्ध समाज को झकझोर रहे हैं। आफीसर लाइन में जितने हैं उन सब को झकझोरकर शान्तिकुञ्ज भेज रहे हैं। तो यह क्यों आ रहे हैं। जानवरों को तो हम बहका सकते हैं जानवरों को तो एक आदमी डंडा से हाक सकता है कहीं भी इकट्ठा कर ले। परन्तु मनुष्य जैसे बुद्धिमान जीव को हांकना यह भगवान का ही काम है। और गुरुदेव की शक्ति भगवान की ही शक्ति थी जो आज करोड़ों आदमी, पढ़े लिखे आदमी बेवकूफ नहीं। मैं तो एक अनपढ़ आदमी हूँ। बेवकूफ समझो पर बड़े-बड़े बुद्धिजीवी यहाँ इकट्ठे हो रहे हैं। यह चमत्कार ईश्वर का ही है। गुरुदेव के अन्दर ईश्वरी शक्ति थी और है गुरुदेव कहीं चले थोड़े गए अभी भी हैं। जैसा सन् ८० में गुरुदेव ने प्रवचन किया था अखण्ड ज्योति में लेख आए थे युग बदलेगा। हमें आश्चर्य होता था कि कैसे युग बदलेगा पर आज हमें गुरुदेव की जो वाणी निकली थी स्टेज पर वह साकार होती दिखाई दे रही है। हमें उनने यह भी संकेत किए थे कि २००० के समय इतना भयंकर समय होगा जितना कभी नहीं आया है यह हमने उनके मुख से सुना है और आज हमें दिखाई पड़ रहा है कारगिल का युद्ध देखिए कही भूकंप देखिए कहीं बाढ़ देखिए, जगह-जगह खतरा आतंकवाद का यह सब कुछ गड़बड़ हो रहा है तो यह पहले ही गुरुदेव ने कह दिया था तो यह भगवान ही हो सकते हैं और कौन हो सकता है।

श्री मनीष गुप्ता, एटा

यहाँ मैं पहली बार आया हूँ। १९९५ में काफी बीमार पड़ा मुझे आगरा ले जाया गया वहाँ तीन महीने तक लगातार इलाज चला लेकिन डाक्टर ने बाद में बताया कि तुमको एड्स हो गया है। यह सुनकर मैं बहुत ही परेशान हुआ आश्चर्यचकित हुआ फिर मैं घर आ गया वापिस। सोचा अब क्या करना है इलाज ही नहीं है इसका कोई। मैं गायत्री परिवार या शान्तिकुञ्ज के बारे में कुछ नहीं जानता था सिर्फ हमारे गाँव में दो चार लोग थे जो पीले कपड़े पहनकर रविार को हवन किया करते थे तो उन लोगों ने कहा कि भाई तुम हवन किया करो जो कुछ होगा देखा जाएगा गुरुदेव देखेंगे।

मैंने कहा गुरुदेव क्या देखेंगे जब डाक्टर लोग कुछ नहीं कर पाए गुरुदेव क्या करेंगे इसमें। बोले नहीं तुम आया करो। मैं हवन करने जाने लगा। मैं हर रविवार को हवन करने लगा। एक दिन उन लोगों ने मुझे गुरुदेव के चरणों से उठाकर एक फूल खिला दिया। तो धीरे-धीरे मैंने देखा छै महीने बाद कि मेरे शरीर में कुछ सुधार होने लगा और मैं दो साल में बिल्कुल ठीक हो गया। वापस गया आगरा और चेक कराया तो बिल्कुल ठीक पाया अपने को। बस तब से मैं इस मिशन से जुड़ गया हूँ और इस युगतीर्थ में पहली बार आया हूँ और अब गुरुदेव की कृपा से मैं नागरिक सुरक्षा अधिकारी भी बन गया हूँ।

मैं नौ दिवसीय सत्र करने आया हूँ। बहुत समय से मेरा एक सपना था कि मैं शान्तिकुँज अवश्य जाऊंगा जब मुझे नया जीवन मिला तभी से सोच लिया कि उस स्वर्ग में जरूर जाऊंगा। अब मैंने प्रण किया है कि मैं चार घण्टे नियमित मिशन के काम में दूँगा। दो वर्ष पहले से भी मैं मिशन का काम करने लगा हूँ। लेकिन अब नियमित रूप से चार घण्टे निकालने की कोशिश करूंगा।

गुरुदेव के संस्मरण डॉ०कृष्ण गोपाल माथुर, पटना

पटना शक्तिपीठ का प्रबन्ध ट्रस्टी हूँ। प्रथम बार हमारा सम्पर्क गुरुदेव से १९६४ से हुआ जब मैंने पहला पत्र उनको लिखा। उनकी ऐसी कृपा हुई कि उन्होंने १९६५ में मुझे सत्र में बुलाया। मैं आया हमारे हृदय में जो कल्पना थी गुरुदेव के प्रति कि कोई बहुत बड़े सन्त होंगे, बहुत अच्छे-अच्छे कपड़े पहने होंगे, जटा बढ़ी हुई होगी वैसी ही जैसी सन्तो के सम्बन्ध में होती है वैसी ही कल्पना हमारे मस्तिष्क में थी। जब मैं वहाँ उनके कमरे में पहुँचा तो मैंने देखा कि बिल्कुल साधारण सी वेषभूषा में है और जिनके बारे में इतनी बात सुन चुके हैं मैं उनके पास बैठ गया उन्होंने मुझसे पूछा बेटा कुछ पूजा पाठ भी करते हो मैंने कहा मैं शंकर जी का ऊँ नमः शिवाय का जप करता हूँ। बोले कौन सी माला पकड़ते हो मैंने कहा मैं रुद्राक्ष की माला पकड़ता हूँ। बोले ठीक है बेटा ऐसा ही किया कर। लेकिन अब तू ऐसा किया कर गायत्री का भी जप किया कर। और गायत्री माता का ध्यान किया कर। तो मैंने कहा गुरुजी ऐसा है कि मैंने देखा तो है चित्र में पर वह ध्यान में आती नहीं हैं। तो अच्छा तू ऐसा किया कर कि मेरा ध्यान किया कर।

मैंने कहा गुरुजी आपका ध्यान तो आएगा भी नहीं आप ऐसा करिए कि आप बगल वाले कमरे में चलकर बैठ जाइये जैसे मैं कहता हूँ ऐसे ही बैठ जाइये और मैं आपका एक टक बहुत देर तक देखता रहूँगा वहीं स्वरूप में ध्यान में लाऊँगा। मुझे आश्चर्य हुआ कि मेरे कहने के मुताबिक जैसे जैसे मैंने कहा कि आप ऐसे बैठ जाइये आप ऐसे देखिए आप मेरी तरफ मुँह कर लीजिए ठीक वैसे ही वैसे करते गए। तो मुझे वह याद आया प्रसंग जबकि भगवान राम कागभुसुण्डि जी के साथ विनोद कर रहे थे और वह छोटे बालक जैसा दौड़धूप कर रहे थे वैसा ही मुझे यह याद आया कि यह क्या है कि इतने महान सन्त हमारे एक इशारे पर ऐसा कर रहे हैं। खैर मैंने जी भर कर देखा। संस्मरण तो इतने सारे है कि बार-बार तबियत चाहती है कि वश उसको याद करें और प्रसंग होते चलें।

जब कभी भी मैं उनका संस्मरण याद करता हूँ बार-बार मन प्रफुल्लित और आनन्दित हो जाता है। सन् १९६९ की बात है उस समय रमेश चंद्र शुक्ला जी हमारे यहाँ आए हुए थे और गुरुदेव पधारे तो बहुत सारे लोग मिलने आए हुए थे। अन्दर कमरे ेहम लोग बैठे हुए थे तो हम लोगों ने कहा कि गुरुदेव सब जगह यज्ञ हो रहा है गुरुदेव तो एक यज्ञ आप पटना में भी दीजिए बोले कि यहाँ यज्ञ करेगा तू। यहाँ कितने गायत्री परिवार के लोग है एक तू है, और एक एम०एम० झा है और एक है वह ब्रह्मचारी, आधा ब्रह्मचारी समझ ढाई आदमी में कहीं यज्ञ होता है। हम लोगों ने नीचे गरदन कर लिया लेकिन वह भक्तवत्सल थे उन्होंने कहा अच्छा-अच्छा कर ले।

हम सभी लोग लग गए स्थान चयन करने के लिए तो कहीं स्थान नहीं मिल रहा था राजापुर गंगा के तट पर एक स्थान मिला तो स्थान मिल गया वहाँ का एनाउन्समेंट हम लोगों ने कर दिया कि यहाँ गायत्री यज्ञ होने वाला है १०८ कुण्ड का। लोगों ने हमसे कहा कि किस जगह को चुन लिया है वहाँ तो दिन दहाड़े मर्डर होता रहता है औरतों के शरीर से जेवरात छीन लिए जाते हैं यह ऐसी जगह आपने कैसे चुना है। जहाँ ९ बजे रात में लोगों को आना पड़ेगा तो आए दिन कोई न कोई घटना होती रहेगी जब यह दोष लोगों ने बताया तो कुछ तो हम लोगों को भीसोचने की बात आ गई। पर हमने कहा कि अब तो हमने सलेक्ट कर लिया है अब यह गुरुदेव जाने। यज्ञ हुआ २६ से २९ नवम्बर तक गंगा तट पर ही यज्ञ हुआ एक विशाल यज्ञशाला बनी पुरानी पर्णकुटी वाली वहाँ से स्टीमर पास होता था तो स्टीमर वाले देखकर कह रहे थे कि यह क्या हो रहा है पहली बार बिहार में इतना बड़ा यज्ञ हुआ था। उसके बाद वह इतना शानदार यज्ञ हुआ एक लाख से ज्यादा आदमी रोज उनके प्रवचन में उपस्थित होते थे और उसी में एक पहली शादी हुई मथुरा के वकील साब की लड़की थी और पटना यूनिवर्सिटी के जूलाजी का स्टूडेण्ट था मि० सिन्हा परम पूज्य गुरुदेव ने स्वयं शादी कराई।

इस यज्ञ में गंगा तट पर इतनी ज्यादा भीड़ हो गई। करीब करीब डेढ़ लाख आदमी इकट्ठा हो गए। जो विश£ेषण किया गुरुदेव ने पवित्रीकरण से लेकर दाम्पत्य सूत्र में बन्धने की प्रक्रियाओं का जो विश£ेषण किया लोग मंत्रमुग्ध रह गए। उसमें हमने पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को बुलाया था श्री हरीशचंद्र मिश्रा जी को। उन्होंने जो उद्गार व्यक्त किए उसमें उन्होंने कहा मैंने आचार्य जी का जो साहित्य पढ़ा है और जो कुछ भी हमने उनके विषय में धारणा जो मैंने बनाई मैं ऐसा समझता हूँ कि महापण्डित के रूप में मैंने उनका दर्शन किया है। यह आप लोगों का सौभाग्य है कि ऐसे महापुरुष ऐसे महान सन्त, इतने विद्वान जिनके गुणों का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता है वह यहाँ पधारे हैं हमारा भी सौभाग्य है कि मैं आज यहाँ आया हूँ। यह मि० सतीशचंद्र मिश्रा के उद्गार थे। इस यज्ञ में एक भी ऐसी घटना नहीं हुई जिसमें किसी के जेबर छिनने की बात तो दूर किसी को जरा सा भी किसी ने हाथ भी पकड़ा हो ऐसा भी नहीं हुआ। इससे हम लोगों हृदय और उत्साहित हुआ और काम करने की इच्छा हुई।

एक बार हमारी पोती को सल्फासिन सल्फा ड्रग्स का रिएक्शन हो गया उस वक्त में घर पर अकेला ही था सब बाहर गए हुए थे वह मेरी गोदी में थी सल्फासिन खिलाने के एक मिनट बाद से उसकी हालत खराब होने लगी, उसकी आँखें चढ़ने लगी काला बिन्दु ऊपर चला गया सिर्फ सफेद सफेद रह गया हाथ देखा कहीं पर नब्ज नहीं। मैं भी रोने लगा घर में करुण क्रंदन छा गया। पत्नी को याद आया गुरुदेव का चरणामृत रखा हुआ है। वह चरणामृत लाकर दिया। चरणामृत उसके मुँह में डाला और आँखें फिर पलट आयी और वह पूर्ववत स्थिति में आ गई। वह वास्तव में एक मृत बच्ची को गुरुदेव ने पुर्नजीवन दिया।

एक बार मुझसे हालचाल पूछने के बाद उन्होंने कहा बेटा ऐसा है तेरी आयु समाप्त हो गई। मैं स्तब्ध रहा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। उन्होंने कहा मार्केश लगा हुआ है तुझे। अब तू ज्यादा दिन तक जिन्दा नहीं रहेगा। लेकिन मैं तुझे मरने नहीं दूँगा। तुझसे अभी बहुत काम कराना है मैं देखूंगा चाहे मार्केश हो या कुछ हो मैं तुझे मरने नहीं दूंगा और आप देख लीजिए मैं आज दिन तक मैं उनका काम कर रहा हूँ लेकिन हमें यह विश्वास जरूर है जिस दिन चाहे कितना ही बूढ़ा हो जाऊं जिस दिन मैंने गुरुदेव का काम करना बन्द कर दिया तो मेरी जीवन लीला समाप्त हो जायेगी ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

उनकी सरलता, उनकी मृदुलता, उनकी सादगी उनका वात्सल्य यह सब देखकर के ऐसा लगता है कि भगवान कीएक विशेष अनुकंपा रही उनके सम्पर्क में आने का हमको सौभाग्य मिला। मैं उनकी सादगी का एकाध जिक्र आपको बताऊं। मैंने देखा वह आए तो काला जूता वह पहनते थे जिसकी उस समय कीमत एक डेढ़ रुपये रही होगी। उसमें ऊंगलियों के पास एक गोल सा सूराख था। उसी को पहनते रहे वह। कभी-कभी चूंकि हमारे यहाँ रहते थे जब कभी पटना आए उन्होंने हमारी ही कुटियाँ को पवित्र किया। तो एक बार हमने देखा कि उनका कुरता फटा हुआ है बटन अलग है लेकिन वह उसी कुरते को पहनकर के वह हमने वहाँ जो एडवोकेट्स की मीटिंग अरेंज की थी उसी में गए वह तो उनकी सादगी की बात मैं कह रहा था कि उनको कभी भी इस बात का ध्यान नहीं था कि वह कैसा कपड़ा पहन रहे हैं किस प्रकार से हैं सारी चीजें बड़ी सादी सादी। उनका एक छोटा सा टाबल था।

एक बार उनको आसाम जाना था बरौनी जंक्शन पर हम पटना के जितने गायत्री परिवार वाले थे वहाँ गए गाड़ी जब आयी तब तमाम लोग यहाँ वहाँ ढूढ़ने लगे मैं भी एक तरफ बढ़ गया मैंने देखा कि वह शेड के लोहे के खंबे से सटे हुए चुपचाप से खड़े हुए हैं और छोटा सा बक्सा था टीन का उसी को लिए हुए थे एक होलडाल था छोटा सा जिससे ज्यादा कुछ नहीं था बिल्कुल चिपटा हुआ था। हम लोगों ने कहा गुरुदेव हम लोग तो आ रहे थे आप खुद सामान लेकर यहाँ आ गए। बोले क्या बेटा कोई हर्ज तो नहीं है देखों कोई भारी सामान तो है नहीं। मैं समझ रहा था कि तुम लोग आओगे तो मैं यहाँ लेकर खड़ा हो गया। उनकी हर बात पर ऐसा लगता था कि सादगी की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं वह। यह सब ऐसी चीजें थीं जो हृदय पर अंकित होती चली गई और जो अटूट श्रद्धा उत्पन्न होती गई वह इन्हीं छोटी-छोटी बातों पर उत्पन्न होती गई। वैसे तो बहुत चमत्कार सुने हैं सन्तों के विषय में लेकिन मैंने यह देखा कि उनका चमत्कार कैसे कैसे होता है एक घटना मैं सुनाऊं।

हमारा पोता और पोती दहेड़ी में रहता था हमारे भान्जे भी वहीं रहते हैं। उनकी गाड़ी से एम्बेसडर कार से पंत नगर जा रहे थे दोनों बच्चे रास्ते में दूसरी तरफ से एक गाड़ी ने आकर के इतनी जोरों से टक्कर मारी कि लड़की तो अन्दर रह गई लेकिन लड़का बाहर फिका गया। और गाड़ी बुरी तरह तहस-नहस हो गई कि वहाँ जितने लोग गाड़ियों में जा रहे थे उन्होंने रुक कर कहा कि जो बच्चे इसमें जा रहे थे वह जिन्दा है कि नहीं है। आकर देखा तो दोनों बच्चों को जरा सी खरोंच लगी थी दोनों बच्चे हँसते खेलते रहे। वहाँ से फोन करके दूसरी गाड़ी बुलाई उससे बच्चे वापिस हुए। उसके बाद फिर ऐसा ही हुआ आगरा में भी हमारा बच्चा है वह जा रहा था स्कूटर से उसका एक्सीडेंट हो गया दूसरा वाहन उसको काफी दूर तक खींचता हुआ ले गया उसको काफी चोटें आ गई उसका प्लास्टर हुआ लेकिन उस सीरियस एक्सीडेन्ट में उसकी जान बच गई। तो यह सब चमत्कार तो मैंने खुद ही देखा है।

हमारी पत्नी के भतीजे को रेटीनल डिचर्चमेंट था तो सब डाक्टरों ने कह दिया इसकी आँख बहुत दिन तक काम नहीं करेगी तो उनको गुरुजी के पास ले गए। पत्नी ने आँख में आँसू भरकर कहा गुरुजी यह एक ही भतीजा है हमारा इसको रेटीनल डिचर्चमेंट हो गया है आँखे ही इसकी पूँजी है। गुरुदेव ने कहा मृदुला तू आश्वस्त रह इसकी आँखें जितनी खराब हो चुकी हैं तो हो चुकी है डाक्टर कुछ भी कहते रहे इससे आगे इसकी आँख खराब नहीं होंगी और यह मजे में काम करता रहेगा और गुरुदेव की परम कृपा आज भी वह काम कर रहा है।

एक बार हमारा मित्र है ओम कमलिया उसकी बच्ची वह डाक्टर से ब्याही है खुद भी डाक्टर है वह जा रही थी और नई गाड़ी थी मारूती उसमें तीन लोग थे बच्ची शर्मिला थी, उसके साथ एक बच्ची और एक आदमी और था। जिनकी वह दूसरी बच्ची थी। आगे जाकर ऐसा हुआ कि लोहे की छड़ों से लदा ट्रक पलट गया और इस मारूती के ऊपर गिर पड़ा अब आप कल्पना करिए कि इतना भारी ट्रक पर गिरा वह बिल्कुल चिपट गई लेकिन थोड़ा सा उसमें इतनी जगह रही कि एक बच्ची की तो मृत्यु हो गई लेकिन दूसरी जो हमारे मित्र की बच्ची थी जिसे में कुछ दिन पहले ही मैं गुरुदेव के पास लाया था आशीर्वाद प्राप्त हो चुका था गुरुदेव ने कहा था बेटा तेरे परिवार की रक्षा में करूंगा तो उनकी सिर्फ वह बच्ची बच गई आज भी है। दो बच्चों की माँ हैं अभी इंग्लैण्ड में है। उनकी विशेष अनुकम्पा कहूँ कि क्या कहूँ चमत्कार तो बहुत छोटी सी एक अभिव्यक्ति है। चमत्कार मैं नहीं कहूँगा लेकिन उनकी कृपा के कण से कैसे मृत्यु दूर हो जाती है मनुष्य से मैंने प्रत्यक्ष देखा।

एक बार गुरुदेव हमारे यहाँ आए तो उनको शौच जाने की इच्छा हुई तो उन्होंने कहा बेटा चप्पल है तो हमने कहा हाँ गुरुदेव चप्पल तो है मन में आया कि मैं अपनी पहली हुई चप्पल कैसे गुरुदेव को कहूँ कि इसे आप पहनिये। मैं चट्टी ले आया तो उन्होंने कहा नहीं बेटा मैं यह चट्टी पहनकर शौच नहीं जाऊंगा। तू ऐसा कर तू अपनी चप्पल ले आ। मैंने लाकर दे दिया वह पहनकर चले गए बहुत छोटी सी बात है लेकिन हमारे लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण है। इसके बाद हम लोग खाना खाने बैठे तो टेबिल पर हमारी इच्छा यह हुई थी कि परम पूज्य पधारे हैं अच्छे-अच्छे पकवान, मलाई रबड़ी ये सब चीज मैं दूं मैं खिलाऊतो मैने यह सब रखी तो उन्होंने कहा कि नहीं बेटे मैं सिर्फ रोटी, दाल, सब्जी खाऊँगा मैंने कहा ठीक खाने के बाद मैंने थोड़ा फल का रस उनके आगे रखा फल का रस देखने के साथ उनकी आँखें भर आयी। और उन्होंने कहा बेटे जब हमारे यहाँ लोग आते हैं तो मैं उनको रोटी दाल के अलावा और कुछ नहीं खिला पाता हूँ और आप यह फल हमें दे रहे हैं मैं फल खाऊं फल का रस पीऊं ऐसा नहीं होगा इसे आप हटा लीजिए। तो उनकी यह भावना की जब हम बच्चों को नहीं दे सकते हैं तो मैं कहाँ हकदार हूँ यह उनकी सरलता और यह उनका वात्सल्य था।

एक बार माता जी ने कहा जाओ ऊपर गुरुदेव से मिल आओ तो मैं गया ऊपर गुरुदेव अकेले कुछ पढ़ रहे थे मैं जैसे ही पहुँचा बोले अच्छा डाक्टर साहब आइए-आइए। एक कुर्सी फोल्ड की हुई रखी हुई थी वह खुद अपनी कुर्सी पर से उठे और वह कुर्सी उठायी उसको अनफोल्ड किया रखा और कहा बैठिए। हमारे ऊपर तो ऐसा लगा रहा था कि घड़ों पानी पड़ गया। मैने कहा यह हमें सेवा करने का कहाँ मौका मिला गुरुजी हमारे लिए कुर्सी रखें यह कहाँ तक उचित है। वह कहते थे बेटा मेरा स्वरूप पुरुष का है लेकिन मेरे हृदय वात्सल्य स्नेह और प्रेम माता का है। मेरा स्वरूप पुरुष का है और हृदय माता का है और वह मैंने हमेशा यही देखा। यह सब ऐसे संस्मरण है जो कि इतना गहराई तक दिमाग पर अंकित हैं कि इनको भुलाना कठिन है।

एक बार मैं उनके दर्शन करने ऊपर गया तो परम पूज्य कमरे में थे नहीं मैं और हमारी पत्नी मृदुला थी। वहाँ बैठे रहे पाँच मिनट तक एक कार्यकर्ता आए उनसे पूछा गुरुदेव कहाँ है उन्होंने कहा कि शौच गए हुए है तो हम लोग छत पर बैठे हुए थे गुरुदेव एक-दो मिनट के बाद बाहर आए तो छत पर एक छोटा सा बेसन लगा हुआ था तो वह उस पर आकर हाथ धोने लगे तो हद से हद एक मिनट बहुत है हाथ धुलने में लेकिन मैंने देखा कि उनको दो, तीन, चार मिनट लग गए तो हमें उत्सुकता हुई कि यह क्यों हाथ इतनी देर तक धो रहे हैं मेरी हिम्मत तो नहीं हुई उनसे यह पूछने की आपको हाथ धोने में इतनी देर क्यों लगी लेकिन जब हमारी बात समाप्त हो गई और चरण स्पर्श करके जब मैं आने लगा तो मेरी उत्सुकता बहुत ही प्रगाढ़ थी बहुत तेज थी मैं बेसिन के पास चला गया तो मैंने देखा कि साबुन का एक छोटा सा टुकड़ा वहाँ रखा था जिस में बार-बार घिसने पर पर्याप्त फेन नहीं निकल रहा था बार-बार घिसते थे और यही कारण था कि उनको हाथ धोने में इतनी देर लगी। सोचा जिसके एक संकेत पर सैकड़ों पेटियाँ साबुन का आ जा सकती हैं और भेजने में लोग अपना परम सौभाग्य समझते वह एक छोटे से टुकड़े से हाथ धो रहे थे यह उनकी सरलता की पराकाष्ठा कहा जाना भी बहुत ही छोटा सा शब्द होता है। उनको मैंने यह देखा कि वह कहते कि एक एक पैसा जो हमारे बच्चे देते हैं उसका दुरुपयोग हमसे सहन नहीं किया जाता। और हर बार मैने देखा कि जो कुछ भी उनने उपदेश दिया उनका अक्षरशः पाालन उनने जीवन में होते हुए हमने बड़ी पैनी नजर से भी देखा। उसमें कही पर भी कोई कमी नहीं थी। हमेशा जो कहा उन्होंने ठीक वही किया।

वन्दनीया माताजी स्नेह सलिला उनका भी बहुत प्यार मिला हम लोगों को। हमारी पत्नी का नाम पहले था कुसुम तो उन्होंने कहा ऐसा नहीं इसका नाम हम रखेंगे उन्होंने कहा डाक्टर साहब इसका नाम मृदुला है। हमने कहा माताजी ठीक है मृदुला को अपने हाथ से काजल बनाकर गोदी में बैठाकर आँख में लगाती थीं। शैल बहन छोटी सी थीं उस वक्त में तो उसके बाद जब इनकी शादी होने वाली थी तो उस वक्त माताजी ने कहा बेटी मृदुला तू जा और इसकी फोटो खिचवा ला तो साड़ी पहनकर के आयी शैल बहिनजी तो हमारी पत्नी ने कहा माताजी इसमें तो फोटो अच्छी नहीं आएगी। तो माताजी ने कहा बेटी ऐसा है इसके पास तो यही एक साड़ी है। तो हमारा सौभाग्य हमारी पत्नी ने साड़ी निकालकर के दी और उसी साड़ी में फोटो खिचवाई गई और वह इतनी सुंदर फोटो आई और जीजी की शादी में जो आमंत्रण पत्र छपा उसमें वही फोटो छपी इतना प्यार था उनका माताजी का हम लोगों के प्रति और वह बाजार भी जीजी को हमारी पत्नी के साथ ही भेजती थी कि मृदुला जा इसको घुमाला। तो हमारा लड़का थाा उमेश वह एडवोकेट हो चुका था तो उन्हीं के साथ मथुरा में था उस वक्त एक महीने के लिए हमारी पत्नी वहीं रह गई थीं। तो बराबर हमारी पत्नी और हमारा बच्चा और जीजी माताजी को हमारी पत्नी पर इतना भरोसा था कि शैल बहिन जी को और किसी के साथ ले जाने को या भेजने के लिए वह तैयार ही नहीं होती थीं। तो उनका भी स्नेह बहुत मिला है।

हमें खुद ही एक बार पेप्टिक अल्सर हो गया पटना के सारे जितने मेडीकल डाक्टर थे उन्होंने विविध प्रकार की दवाएँ दीं उनसे कोई फायदा नहीं हुआ तो लोगों की एडवाईज पर हम एक हकीम साहब के पास गए। हकीम साहब की दवाई से थोड़ा बहुत ज्यादा फायदा हुआ। लेकिन हमारी पत्नी को सन्तोष नहीं हुआ धीरे धीरे हम कमजोर होते चले गए, बिल्कुल पीले पड़ गए, एनीमिया हो गया इस प्रकार की तकलीफे होने लगी तो हमारे एक एक भाई इंजीनियरिंग कालेज में लेक्चर था वह आया एक दिन तो हमारी पत्नी ने उससे कहा कि शर्मन बाबू आप मेरे साथ चलिए आपकी छुट्टी भी है हम इनको ले जावे गुरुजी के पास दिखला लावें। यह कहीं अच्छे होने वाले नहीं है यह गुरुजी के पास अच्छे होंगे। तो वह राजी हो गए।

हम तीनों यहाँ आते ही माताजी गुरुजी जैसे हालचाल पूछती थीं पूछा हमसे कि डाक्टर साहब कैसे हैं तो हम चुप रह जाते थे तो बोले नहीं भाई डाक्टर साहब नहीं बताएगे मृदुला तू बता डाक्टर साहब का स्वास्थ्य कैसा रहता है। तो उन्होंने सारी बातें विस्तार पूर्वक कह दीं। पंद्रह रोज की हकीम साहब की दवा लेकर आए हैं तो गुरुजी ने कहा अच्छा ऐसा कर जितनी दवा ले आया है उसको फेक दो और शाम को घियामंडी जाया कर माताजी के हाथ की रोटी खाया कर। माताजी के हाथ की रोटी खाने के लिए हम तीनों आदमी वहाँ जाया करते थे रोज शाम को और जब थाली सामने आया करती थी सारा व्यंजन देखकर के हमें रुलाई आती थी घर पर वही सारी निसिद्ध चीजों को माताजी ने संयोगवश कहिए या क्या कहिए कि वह सारी चीजें थाल में परोस दी माताजी ने।

हमने भरपर खूब खाया बड़ी प्रसन्न तबियत हुई और उसके बाद में खाता रहा उनके हाथ की रोटी उसके बाद वह बीमारी कहाँ लापता हो गई आज तक तो नहीं लोटी और शाम को जब खाने जाते थे तो एक बार पाँच मिनट पहले ही गुरुजी आए थे तो गुरुजी वहाँ एक खरहरी खाट बिछी हुई थी उस पर एक चादर भी नहीं थी। खाली खाट वहीं पर एक चटाई रखी हुई थी हम लोग जब पहुँचे गुरुजी ने कहा मृदुला यह चटाई बिछा ले वहीं पर चटाई बिछा ली गई हम लोग बैठ गए गुरुजी एक टूटे पंखे से हवा झलने लगे हमारी पत्नी ने कहा लाइये गुरुजी में झल दूं। बोले नहीं बेटी हमें अच्छा नहीं लगेगा हमारी आदत अपने हाथ से झलने की है इससे हमें खुद को सन्तोष होता है। तू बैठ जा। हम लोग बैठ गए।

इसके बाद उन्होंने कहा अच्छा ऐसा कर कि एक गिलास पानी पिला दे। एक झरझर वहाँ रखा हुआ था झरझर की शकल जो थी अगरचे कोई किसी से भी कहता कि एक गिलास पानी इसमें का पी लो वह पीता नहीं लेकिन उसी झरझर में से सीसे के गिलास में पानी दिया गुरुदेव को निकालकर के और उन्होंने पी लिया। तो मैं बैठा बैठा यह सोचता रहा बिल्कुल खो गया इसी में कि इतने बड़े सन्त इतना सादा जीवन रामकृ ष्ण परमहंस के यहाँ दक्षिणेश्वर गया था एक बार तो मैंने देखा था कि उनके कमरे में पलंग था सादी सी चादर बिछी हुई थी और एक छोटा सा इतना बड़ा झरझर था मालुम हुआ कि इसी झरझर में से पानी पीते थे। तो मैंने देखा उसी प्रकार का झरझर जो न जाने कब का था उसी में से वह पानी पी रहे थे। तो यह सब देख-देख कर के हम अपने सौभाग्य को सराहते थे कि पूर्व जन्म का कोई विशेष संस्कार उदय हुआ है जो इतने बड़े महात्मा, इतने बड़े सन्त, इंतने बड़े महापुरुष, इतने बड़े युगदृष्टा का सान्निध्य हमको प्राप्त हुआ। अपने को अत्यन्त सौभाग्य शाली माना हमने। तो यह सब छोटी-छोटी बातें हैं जो उनकी सादगी का स्मरण दिलाती है।

एक बार उनको बरोनी से गाड़ी चेंज करके आसाम जाना था। जब हम लोगों को पता चला तो पटना के सारे कार्यकर्ता बरौनी में उनको रिसीव करने पहुँचे। गाड़ी आई तमाम इधर उधर दौड़ने लगे। उसके बाद मैने देखा कि वो छोटा सा ट्रंक और एक छोटा सा होलडाल लिए हुए एक खंबे के पास खड़े हुए हैं। मैंने कहाँ गुरुदेव आप यहाँ कैसे और हम लोग आ रहे थे यह सामान उतार लेते। बोले तो क्या हुआ बेटा इसमें क्या हर्ज है।

गायत्री तपोभूमि में हम लोग थे मैं भी वहीं पर था और गुरुजी भी वहीं पर साहित्य स्टाल था वहीं पर खड़े हुए थे। इतने में कुछ क्रिश्चियन नन आई तो उन्होंने पूछा तो लोगों ने बता दिया कि गुरुदेव वहाँ पर हैं लोगों ने चारों तरफ से जाकर घेर लिया उन्हें नन जब वहाँ से चली गई तो जितने और परिजन थे गायत्री तपोभूमि में तो उन्होंने भी चारों तरफ से घेर लिया। नन कुछ प्रश्र करने लगी कुछ जिज्ञासायें थी उनकी उनसे पूछने लगी तो बजाय इसके कि चुपचाप खड़े रहते एक डिसीप्लिन बॉवज जैसा जितने परिजन थे वह बोलने लगे वह नन्स पूछें उसका जवाब गुरुजी के पहले ही यह देने लगे। यह क्रम चलता रहा उसके बाद गुरुजी कुछ नहीं बोले जब वह नन्स चली गई। हम और गुरुजी रह गए हमने कहा गुरुजी हमें यह बड़ा बुरा लगा कि आपके पास आयी थीं आपसे बाते कर रही थी पर बीच में परिजनों को तो नहीं बोलना चाहिए था। कहाँ आप इतने बड़े सन्त, कहाँ इतने बड़े विद्वान और हम लोग छोटा सा कोई भी आ जाता है एक मजिस्ट्रेट आ जाता है, चाहे एसडीओ आ जाता है चाहे डीएम आ जाते हैं तो उनके बीच में टोकने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ती है तो यह आप बात कर रहे थे आपके बीच में इन लोगों का बोलना तो अच्छा नहीं लगा। हमें तो बड़ा बुरा लगा। तो बोले बेटा चलता है बच्चे नहीं समझते हैं क्या करें? तो किस प्रकार वह बड़ी बड़ी गल्तियों को भी एक हँसी में टाल देते थे। उनके मन में यह भाव ही नहीं था कि हम इतने बड़े सन्त है और हमारे साथ उसी तरह का व्यवहार होना चाहिए। छोटी-छोटी बच्चों की गलतियों को वो इस प्रकार टाल देते थे जैसे उसकी कोई महत्ता ही नहीं है।

परम पूज्य गुरुदेव जब कभी भी हमारे निवास पर आए उनकी कृपा रही तो जाते वक्त कोई विशेष बात नहीं करते थे लेकिन जाते वक्त १९७० में जब वह जाने लगे तो हम लोग उनको गाड़ी तक पहुँचाने आए तो दरवाजे पर ही एक मिनिट रुक गए वह और हमारी पत्नी से कहा मृदुला आज कौन तारीख है उन्होंने बता दिया आज अमुक तारीख है बोले डायरी में नोट कर लेना अब इसके बाद में पटना नहीं आऊंगा। तो सन्त की वाणी कभी झूठ होने का सवाल ही नहीं आता तो इसके बाद उधर से पास किया तो कितने बार ऐसा अवसर आया कि हमे कई जगह से फोन आया कि गुरुदेव आपके यहाँ जा रहे हैं लेकिन वह कभी आए नहीं हमेशा ऐसा ही हुआ कि बातें हुई लेकिन आए नहीं। तो उनकी वाणी जो मुँह से निकल जाती थी ऐसी अमोघ होती थी कि उसका नहीं होने का सवाल ही नहीं होता था। तो उन्होंने कह दिया कि बेटा नोट कर लेना वह एक्चुअली नोटिड ही है और उसके बाद वह पटना पधारे ही नहीं।

एक बार हमारे यहाँ निवास कर रहे थे वह स्नान कर रहे थे तो हमारे दामाद पानी टाबिल वगैरह दे रहे थे गुरुदेव स्नान करते जा रहे थे और बातें भी करते जा रहे थे पूछा क्या करते हो उस समय उनने हाई स्कूल का एक्जामिनेशन पास किया था। पूछा क्या इच्छा है क्या बनना चाहता है उन्होने कहा कि गुरुदेव हम ला करना चाहते ला ग्रेजुएट होना चाहते हैं उनने कहा हो जाएगा कोई बात नहीं है। इसके बाद वह हजार विपरीत परिस्थितियों में पढ़ते गए और हमेशा पास करते गए और यहाँ तक की ला ग्रेजुएट में एम०ए० बी०एड हुए और इसी बीच उनको बच्चे भी होते रहे बच्चों की शादियाँ भी होते रही और सब कुछ होता रहा तो कई बातें तो ऐसी थीं कि उनके मुँह से निकल गई लोग लालायित रहते थे कि उनके मुँह से कोई आशीर्वाद निकल जाए और वह फलीभूत हो जायेगा निश्चित रूप से लोगों का विश्वास था और ऐसा ही हमने देखा।

माताजी के विषय में भी ऐसा ही है जो आशीर्वाद उन्होंने दे दिया वह बिल्कुल अकाट्य और निश्चित रूप से फलीभूत हुआ करता था। जब अश्वमेध यज्ञ पटना में होने वाला था तो उसके लिए स्थल चयन करने की बात थी सारे लोग परेशान थे स्थल कहीं मिला नहीं आखिर में विटनरी कालेज का कैम्पस और केटिल फार्म यह दोनों हम लोगों की समझ में आया कि यहीं हो सकता है लेकिन वह तो बगैर मुख्यमंत्री की परमीशन के हो नहीं सकता था। तो मुख्य मंत्री से हम लोगों का साक्षात्कार कराने के लिए उनका इंटरव्यू दिलवाने के लिए कितनी ही चेष्टा की दो तीन महीने गुजर गए और साक्षात्कार नहीं हो सका।

माता जो को आकर हम लोगों ने कहा कि माताजी यह परिस्थिति है और उनके बिना हो ही नहीं सकता है कुछ लोग कहने लगे कि हाजीपुर में कर लीजिए तो पटना के प्रापर क्षेत्र से हाजीपुर बहुत दूर था और हम लोगों को पटना में ही करना था। हम लोग चाहते थे कि शहर में ही हो तो माताजी ने कहा हम विश्वास दिलाते हैं बेटा तुम बिल्कुल आश्वस्त रहो वह लालू जी जितने ही नास्तिक हैं उनकी आस्था में इतना परिवर्तन हो जाएगा कि तुम लोग देखकर चकित रह जाओगे और ठीक वही हुआ। एक बार कपिल जी के साथ हम लोग उनसे मिलने गए और हम लोगों ने कहा कि बहुत बड़े स्थान की आवश्यकता है केटल फार्म में नहीं होगा यह विटनरी कालेज का कैम्पस भी हमको मिलना चाहिए। उन्होंने कहा तुम लोग नहीं जानते हमारा देखा हुआ है चलो हमारे साथ। तो वह उसी वक्त गाड़ी में बैठकर हम लोगों के साथ देखने आए।

जब कपिल जी ने उनको सारा प्लान बताया तो बोले हाँ यह बात तो ठीक है नहीं हो सकता है इतने में। उसी वक्त उन्होंने खड़े-खड़े फाइल पर दस्तखत कर दिया। डायरेक्टर ने कहा कि इससे तो बहुत नुकसान हो गया तो बोले कोई बात नहीं है शासन की ओर से सारा कम्पनसेशन हम कर देंगे और वह उन्होंने कर दिया इसके बाद वह भूमिपूजन में भी आए पूजा पाठ से उनको सख्त परहेज था लोग जानते थे कि पूजा में अध्यात्म में वह विश्वास ही नहीं करते हैं लेकिन माताजी की कृपा से ऐसा परिवर्तन हुआ कि वह अश्वमेध यज्ञ में उन्होंने एतिहासिक सहयोग दिया। वह २ बजे रात में उठकर आते थे और देखते थे कि सड़क और पानी का इंतजाम हुआ है कि नहीं हुआ। जो सम्बन्धित मंत्री थे उनको उसी वक्त बुलाकर कहते थे यह सब हो जाना चाहिए यह लोग अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं। तो इतना बड़ा परिवर्तन हुआ यह सिर्फ माताजी के आशीर्वाद से ही हुआ क्योंकि माताजी ने तिलक करते वक्त कहा था तुझे कुछ करना नहीं है काम तो सब मैं करूंगी और वही हुआ बिल्कुल वैसे ही हुआ। यह सब ऐसे संस्मरण है जो बराबर याद आते रहते हैं। माताजी के भी आशीर्वाद जिसको जिसको दिया हमारी पत्नी को दिया उनका भी पूरा हुआ जो कुछ भी उनके मुखारविन्द से निकला वह बिल्कुल सत्य हुआ और वह समय पाकर के फलीभूत हुआ। गुरुदेव को मैंने समझा वह साक्षात् अवतारी पुरुष थे। सन्त बहुत सारे होते हैं बहुत सारी उनकी लीलाएँ होती हैं लेकिन वह हर दृष्टि से हर पक्ष जितना ज्यादा देखा हमने कहा वह सन्तों से कहीं ऊपर वह साक्षात अवतार थे भगवान् थे महेश्वर थे। और माताजी को पार्वती और शंकर के रूप में ही हमने समझा और इसमें हमें आज भी कोई संशय नहीं है।

श्रीमती मृदुला माथुर, पटना

हम एक बार मथुरा में घियामंडी गए तो गुरुदेव ने हमारा नाम पूछा हमने बताया कि हमारा नाम कुसुम है तो बोले कुसुम क्या होता है फिर माताजी को बुलाया शैल-शैल कहा करते थे माताजी को माताजी से पूछा माताजी इसका नाम बताइये क्या रक्खें। तो माताजी ने कहा ऐसा है सतीश की बहू निर्मला है इसका मृदुला रख देते हैं। तो मृदुला कहने लगे हमको पिताजी उनसे इतना प्यार पाया है कि उस वक्त हमको तो समझ ही नहीं थी कि हम क्या करें हम तो बिल्कुल यंत्र की तरह रहते थे जब उनके पास पहुँच जाते थे तो। समझ में ही नहीं आया कि क्या कहें बराबर यह कहा करते थे कि बेटा हम तेरे पिता है तू हमारी बेटी है बस पिता के समान उनको मानने लगे वही भाव रहा बाद में जब उनकाशरीर नहीं रहा तो भगवान का रूप हमको दिखाई पड़ा और वाकई में वह भगवान ही थे और आज भी हम कहते हैं कि ऐसे गुरु का सान्निध्य हमको प्राप्त हुआ जो ईश्वर स्वरूप थे हम बारम्बार उनको नमन करते हैं। उनके प्यार से हम ओतप्रोत है जो कि व्यक्त नहीं कर पाते हैं।

इस वर्ष जो महिला वर्ष घोषित किया गया है तो महिलाओं को यह नहीं सोचना चाहिए कि इक्कीसवीं सदी में महिलाओं का ही वर्चस्व होगा ऐसा नहीं है महिलाओं के अपने दिल में ममत्व पैदा करना चाहिए और फैशन परस्ती में न रहें जितना वह अध्यात्म की ओर रहेगी उतना ही उनका काम अच्छी तरह चलता रहेगा। पहले की जो हिन्दू संस्कृति है उससे बढ़कर और कोई चीज नहीं है। हमारे गुरुदेव के सान्निध्य में जो भी आया उसने कुछ खोयाा नहीं है बहुत पाया है। इतना प्यार दिया है उनने सबको यदि बहुत सारी कामनाएँ लेकर आया है तो जितना उनसे हो सका है उतनी उन्होंने सहायता की है। कोई उनके दरबार से खाली हाथ नहीं गया। और बराबर कहा करते थे कि हमारे परिजन की जेब कभी खाली नहीं रहेगी। और वही हुआ है। हमारे घर में इतनी बड़ी डकैती हो गई लेकिन हम लोग हमेशा खुश रहे और हमारे पास कभी पैसे की कमी नहीं आई। यह हमारे परम पूज्य गुरुदेव की ही कृपा है और आज हम इतने सौभाग्यशाली है उनके सान्निध्य में रहकर के कि हमको किसी चीज की भी इच्छा नहीं है।

गुरुदेव से जो कुछ भी माँगा है उन्होंने दिया है बहुत दिया है। हमारी इच्छा रहती थी कि हमारा सारा परिवार एक ही मिशन से जुड़ जाएँ। तो हमारे जितने भी रिश्तेदार है सारे के सारे इसी मिशन से जुड़े हैं हमको देखकर बहुत खुशी होती है बच्चे तो हमारे भी पढ़ रहे हैं अच्छे-अच्छे इंग्लिस स्कूलों में लेकिन आप उनको आप उनको दे दीजिए हवन विधि वह यज्ञ अच्छी तरह से करा देते हैं हम यही चाहते हैं कि जितने भी बच्चे हैं जितने संसार में लोग हैं सब इस मिशन से जुड़ जाए। उनको गुरुदेव बहुत देंगे आप किसी से भी पूछिए उनके परिजनेां से कि आपको कुछ कष्ट हुआ है उनके सान्निध्य में आने से सब लोग नतमस्तक है उनके आगे। सब महिलाओं से हम यही कहेंगे कि इस युग में जितनी जल्दी हो सके सब इस मिशन से जुड़ जाएँ।

मैं फिरोजाबाद में पी०टी० जैन कालेज में टीचर रहा वही मकान बनाकर रहने लगा। हमारा वहाँ कारोबार भी था जगदम्बा औद्योगिक संस्थान उसमें मैं उहता था उन दिनोंं रात दिन चिन्ताओं में रहता था पैसा कमाने की रहती थी। एल.आई.सी. की एजेन्सी मेरे पास थी। जमीन मकान सभी था। पत्नी हमारी शिक्षक थी। रात दिन बड़ी परेशानी में रहते थे बीच का समय भगवत्कृपा से ऐसा आया कि हमारे सामने आर्थिक संकट आ गया चार पाँच साल में ही हमारा सारा कारोबार खराब हुआ और हम भगवान के भजन की ओर झुके।

हम दुर्गा पूजा करते थे बात १९८७ की है बसन्त पंचमी को सायंकाल जब हम अपने साधनाकक्ष में बैठे हुए थे आत्मसाक्षात्कार हुआ आवाज आई। आप कहाँ से बोल रहे हैं मैं जबदम्बा औद्योगिक संस्थान से बोल रहा हूँ। मैंने पूछा आप कहाँ से बोल रहे हैं आवाज आई मैं विश्व ब्रह्माण्ड से बोल रहा हूँ। मैंने पूछा आप कौन है बोले मैं सत्गुरुदेव हूँ। मैंने कहा विश्वब्रह्माण्ड तो बहुत बड़ा हैं बोले में आपके अन्दर से बोल रहा हूँ नाम क्या है उन्होंने कहा मेरा नाम सत्गुरुदेव है। उन्होंने पूछा तुम्हारा नाम क्या है? मैंने कहा मेरा नाम बनवारी लाल कुलश्रेष्ठ है। आवाज आई अच्छा आपने कौन-कौन से श्रेष्ठ काम किए। मैंने बताया दो चार काम उन्होंने कहा तुमने कोई श्रेष्ठ कार्य भी किए। बहुत सी चर्चाएँ हुई उन्होने कहा जो आप जीवन जी रहे हैं क्या जीवन है कितनी कठिनाइयाँ परेशानियाँ हैं आध्यात्मिक जीवन आप जिए अनेक बातों पर चर्चाए हुई और लगातार सप्ताह में एक बार एक-एक, आधा-आधा घण्टे तक अनेक पहलुओं पर हम प्रश्र करते थे हमें उत्तर मिलता था इस तरह से करीब छै महीने का समय निकला।

एक बार उन सत्गुरुदेव ने बताया बेटा तुम चाहते क्या हो मैंने कहा हम चाहते हैं भगवान से मिलें बोले केवल मिलना चाहते हों आदमी मर जाता है आत्मा परमात्मा से मिल जाती है। बोले देखना चाहते हो मैं रास्ता बतलाता हूँ ठीक से समझ लो। बोले सिद्धान्त मैं बताता हूँ। बोले कहाँ बैठे हुए हो फिरोजाबाद में। बोले तुम आगरा जाना चाहते हो और तुम्हारे पास साधन हों सब कुछ हो आगरा पहुँच सकते हो तुम बिना चले फिरोजाबाद को छोड़े बिना आगरा पहुँच सकते हो। गुरुदेव ने जब यह बात बताई तो मैंने विचार किया सोचा कि वास्तव में हमारे पास साधन न हो और हम चल दें तो दो चार दिन में पहुँच ही जायेंगे। उस दिशा में हम चलें , उस दिशा में जाना बहुत जरूरी है। सब चाहते हैं भगवान से मिलना लेकिन भगवान् की दिशा में हम चलना नहीं चाहते परिवार से अपना मोह-लोभ हम छोड़ना नहीं चाहते। बोले विचार करो ज्यादा मेरे पास समय नहीं है यदि आप चाहते हैं तो मैं आपको बुला लूँगा लेकिन बुलाने से पहले आप क्या करते हैं मैंने कहा टीचर हूँ बोले नौकरी छोड़ दीजिए। फेक्टरी छोड़ दीजिए, जमीन, जायजाद सबसे छुट्टी कर दीजिए बिल्कुल जिसका जो हिस्सा है उसको दे दीजिए फिर मेरे पास आइये। मैंने कहा गुरुदेव यह तो भूखों मरने वाली बात है। बोले भूखे मरने की चिन्ता है तो फिर क्या जरूरत है इन सब बातों की मैंने कहा क्षमा करें अन्दर से लगन लगी हुई थी मैं चाहता था कि किसी तरह से मुझे यह सब प्राप्त हो।

मैंने पूरी तरह से एक डेढ़ वर्ष में फिरोजा बाद में मेरे दो तीन मकानथे मैंने अपना मकान बेचा जमीन बेची फेक्टरी छोड़ी बच्चे से कह दिया अब अपने कारोबार में लगो १९९० का वर्ष आ गया हम अपने भाई के पास गए भोपाल में वह पंद्रह वर्ष से इस मिशन से जुड़ा हुआ था एक दिन बाद कर रहे थे भाई से कि हमें ज्ञान तो बहुत है लेकिन हमको शान्ति नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि भैया शान्ति तो आपको शान्तिकुँज जाकर मिलेगी गुरुदेव से मिलिए। उन्होंने सारी बातें बताई हमने पत्र डाला स्वीकृति यहाँ से मिल गई स्वीकृति जब हमारे पास गई तो दस से उन्नीस अगस्त की स्वीकृति हमारे पास गई और २ जून को गुरुदेव ऊपर चले गए। हम बड़े दुखी हुए जब हमने पेपरों में पड़ा कि गुरुदेव अब नहीं रहे। हमने कहा बताइये हम जाना चाहते थे अब क्या करें लेकिन चलेंगे। जैसे ही १० अगस्त आया हम आए।

हमारे अन्तःकरण ने बताया यही वह जगह है जहाँ आपको आना था जहाँ के लिए बात हुई थी। गुरुदेव का चित्र देखा हमारी अन्तरात्मा ने बता दिया यह वही सद्गुरुदेव हैं उनकी वही वाणी है जो तुमसे बात करती थी। रात्रि को ११ बजे एक आवाज आयी उठो जल्दी उठो बोले समय हो गया हमने घड़ी देखी लेकिन घड़ी नहीं मिली। हम अकेले ही नहा धोकर चुपचाप वहाँ चले गए हमारे दुबे जी वहाँ बैठे हुए थे डियुटी पर हम सीढ़ियों पर बैठ गए हम रोने लगे कि हाय गुरुदेव आप हमसे मिले नहीं हमें रोता हुए देखकर पाँच मिनट के अन्दर छाया के रूप में गुरुदेव आए वहीं सीढ़ी पर एक गज की दूरी पर बैठ गए जैसा चित्र था उनका और उन्होंने दो घण्टे तक बड़ा सन्तोषजनक सभी पक्षों पर बात बताई हमने कहा गुरुदेव आपने स्थूल शरीर से दर्शन नहीं दिए बोले स्थूल शरीर क्या काम तो सूक्ष्म शरीर से होता है तुम्हें भी हमने इसीलिए बुलाया है कि तुम्हें बहुत कुछ काम करने हैं फिरोजाबाद नया जिला बन रहा है तुम्हें वहाँ काम करना है। हमने कहा अच्छा गुरुदेव। उन्होंने अनेक बातें बताई। उन्होंने कहा यह अमृत है इसे घर-घर बाँटना है। उन्होंने इतना दिया जो तीस वर्षों में भी कोई नहीं दे सकता। हम पूरी तरह से सन्तुष्ट हो गए। दो घण्टे के बाद जब हम आए दुबे जी ने पूछा अभी कैसे इतनी जल्दी कैसे हमने कहा साहब ऐसे ही आँख खुल गई और चले आए। फिर हम आए तबसे फिरोजाबाद जनपद पहुँच गए उसके बाद निरन्तर हम गुरुदेव के काम को करते रहे। हमें विश्वास हो गया कि गुरुदेव हमारे साथ हैं। हमारा एक नाती था उसको हम बंबई ले गए उसके हार्ट में एक छेद था डाक्टरों ने मना कर दिया बोले इसको बचाया नहीं जा सकता। लेकिन हमें विश्वास था हमने डाक्टरों से कहा इसको कोई मार नहीं सकता। डाक्टर आश्चर्यचकित हो गए। बोले अच्छा उन्होंने आपरेशन किया हम तीन-चार महीने में लौटकर आए और बच्चे को स्वस्थ लेकर के आए। जीवन में अनेक घटनाएँ हुई गुरुदेव ने हमको विश्वास दिलाया तब से हम बराबर गुरुदेव के कार्य में १९९० से अपने जनपद में इस कार्य को कर रहे हैं। उन्हीं के काम में शान्ति मिलती है हमारा पहले का जो जीवन था चिन्ताग्रस्त था अब प्रसन्न है।

एक बार गुरुदेव से बात हो रही थी परा वाणी से ही तब नाम के बारे में जैसे उन्होंने कहा यह नाम तुमने रखा है कुलश्रेष्ठ इसे हटाओ मैं कोई अच्छा से नाम रखूंगा। बड़ी जिज्ञासा हुई बोले हम तुम्हारा नाम कोई रखेंगे हमने सोचा कोई महात्माओं के नाम होते हैं वैसा रखेंगे। हमने कहा गुरुदेव अच्छा नाम रख दीजिए। गुरुदेव ने कहा बनवारी लाल तुम्हारे शरीर का नाम है लेकिन तुम आगे अज्ञानी लिखना मैंने कहाँ साहब मैं पागल नहीं हूँ मैं टीचर हूँ मैं जानता हूँ अज्ञानी तो मूर्ख होता है मैं तो इतना मूर्ख नहीं हूँ। उन्होंने नाराज होकर कहा अरे मूर्ख नहीं तो और क्या है शरीर को ही सब कुछ मानकर के सारा जीवन तूने निकाल दिया और इसी को समझ रहा है कि ठीक है।

फिर धीरे से समझाया कि बेटा तू जान नहीं रहा है जो शरीर को जानता है वह अज्ञानी है वास्तव में जिसको जानना है वह तो आत्मा है। तू नाम अपना यह रख ले नाम खराब जरूर है लेकिन तू जिज्ञासू बना रहेगा। जिज्ञासू बना रहेगा तो संसार के लोगों से ज्ञान तुझे मिलता रहेगा। और बराबर उसी तरह से काम करते रहे लेकिन मिशन ने दो तीन वर्ष पहले ही जो वरिष्ठ लोग हैं इसको अज्ञानी से बदलकर ज्ञानी कर दिया लिखकर के दिया कार्ड में और कहा कि अब हम ज्ञानी नाम आपको दे रहे हैं जो इतने वर्षों से दस बारह साल से गुरुदेव के काम में है वह अज्ञानी कैसे रह सकता है। ज्ञान है इसलिए ज्ञानी हमने भी अनुभव किया है कि हम लोग आत्मा हैं मैं आत्मा हूँ। और गुरुदेव को लोगों ने किस रूप में समझा शरीर देखा शरीर के रूप में समझा हो लेकिन मैं यह मानता हूँ मैंने गुरुदेव को जिस तरह से देखा गुरुदेव व्यक्ति नहीं गुरुदेव एक शक्ति थे गुरुदेव सूक्ष्म रूप से व्यापक थे। नहीं तो परा वाणी में कैसे बात होती किस तरह से उन्होंने विस्तार से मुझे ज्ञान दिया, अनेक तरह से जब-जब समय आया।

तीन वर्ष पहले की घटना है कि मेरा भतीजा संकट में आ गया उसकी दोनों किडनी फैल हो गई। गुरुदेव ने कहा बेटा जाओ तुम्हारा भतीजा संकट में है और तुम्हें जाकर के उसकी मदद करनी है तुम्हें अपनी एक किडनी उसको देनी है और तुम भय करना यह परोपकार का काम है इससे उसको जीवन मिलेगा यह बात जैसे ही हुई मैं जग गया था। मैं गया और यह घटना हुई। तमाम प्रयास के बाद वहाँ देख रहे थे बच्चे की हालत खराब थी उनके पिताजी का टेस्ट हुआ वह भी पास नहीं हुए माताजी का भी हुआ परिवार के अनेक लोगों के टेस्ट हुए लेकिन आखिर में मेरा टेस्ट हुआ १५ दिन तक लगातार टेस्ट हुआ और किसी तरह की कोई कमी नहीं लगी डाक्टरों ने मेरी किडनी को बढ़िया बताया और मैने अपने भतीजे को तीन वर्ष पहले किडनी दी। तो यह क्या है गुरुदेव के निर्देश गुरुदेव की बात गुरुदेव ने बीच में यह भी कहा कि बेटा अब मैं तुम्हारा आपरेशन कर रहा हूँ और अब तुम्हें धरातल पर भी आना है। सिद्धान्त के साथ संसार का ज्ञान भी जरूरी है तभी तुम्हारी पटरी बैठेगी नहीं तो सिर्फ सिद्धान्त की बात करोगे तो संसार के साथ पटरी नहीं बैठेगी। व्यावहारिक जगत में भी तुम्हें आना है तब से जैसे मुझे एक बात समझ में आयी कि लोगों से मेरे मतभेद थे अब किसी से कोई मतभेद नहीं है न किसी से झगड़ा होता है सभी लोगों से सौजन्य और प्रेम से बात होती है। इस तरह तरह तरह से मार्गदर्शन गुरुदेव देते हैं। कभी जब मैं बैठता हूँ विचार करता हूँ और गम्भीर होकर के साधना में बैठता हूँ कोई समस्या होती है तो गुरुदेव मुझे तुरन्त प्रेरणा देते हैं।

एक बार एक समस्या के लिए जब बैठा गुरुदेव ने मुझे प्रेरणा दी कि आप शान्तिकुँज जाएँ मिश्रीलाल व्यास से बात करें वह आपको मार्गदर्शन देंगे। यहाँ मैं आया और वास्तव में उन्होंने जो बात कही मैने उसी बात के अनुरूप अपनी समस्या का समाधान कर लिया। जगह-जगह ऐसी बातें आई जहाँ कहीं मुझे समस्या आई गुरुदेव ने प्रेरणा दी मुझे। स्वप्रों में चित्र के द्वारा मुझे गुरुदेव का स्वरूप दिखाई दिया गुरुदेव आते हैं उनकीआवाज सुनाई पड़ती है। आवाज उनकी वही है जो उनके केसेटों में है। मैं तो यह कह सकता हूँ कि गुरुदेव एक व्यापक शक्ति हैं परमात्मा की शक्ति की तरह से सद्गुरु कीशक्ति की तरह से। आज की कोई समस्या होती है तो हमारे सामने आते हैं चाहे स्वप्रों में आएँ चाहे सोते में आएँ। या हमें प्रेरणा दें और जो कुछ वह निर्देश देते हैं और समस्या का समाधान होता है। गुरुदेव के बराबर इस तरह से प्रेरणाएँ हमें कई रूपों में मिलती हैं। इन दिनों बराबर कहते हैं सोने का समय नहीं है काम करो तेजी से काम करो बेटा अपने लक्ष्य को पूरा करो। हम मन में कभी कभी सोचते हैं कि हमारा शरीर शिथिल हो गया है अवस्था हमारी ऐसी है हम करना तो बहुत चाहते हैं पर हमारा शरीर काम नहीं कर रहा है फिर भी इस अवस्था में भी हम महसूस नहीं करते कि हम वृद्ध हैं और उन्हीं की प्रेरणा से निरन्तर काम में लगे हुए हैं।

श्री लक्ष्मी प्रसाद श्रीवास दृष्टिहीन छात्र

मैं इस मिशन से पिछले दो ढाई वर्षों से जुड़ा हूँ। इस मिशन के विषय में मुझे प्रथम परिचय तब मिला जब मध्यप्रदेश के बिलासपुर जिले के ढबरा नामक ग्राम में शान्तिकुँज की तरफ से संस्कार महोत्सव नामक कार्यक्रम हुआ उस कार्यक्रम में मेरी भाभी सम्मिलित हुई। स्थिति यह थी कि मेरी भाभी की शादी हुए सत्रह-अठारह वर्ष हो चुके थे उनकी दुर्भाग्यवश कोई सन्तान नहीं थी। संस्कार महोत्सव में बहुत सारे संस्कारों का कार्यक्रम चला। उस कार्यक्रम में मेरी भाभी ने दीक्षा ली। तब कार्यकर्ताओं ने यह कहा कि गुरुदेव की यह उद्घोषणा है कि जो महिलाएँ यहाँ से दीक्षित होकर नियमित रूप से गायत्री साधना करेंगी और अपने घर में बलि-वैश्य यज्ञ का पालन करेंगी उनकी दिव्य सन्तानें होंगी और खासकर जो बांझ महिलाएँ हैं उनकी तो दिव्य सन्तान होने की पूर्ण आशा है मेरी भाभी को पूर्ण विश्वास हो गया और उन्होंने उस दिन से साधना प्रारम्भ कर दी और उसके दो वर्षों बाद उनका एक होनहार पुत्र हुआ।

यह घटना मैं प्रत्यक्ष देख तो नहीं सकता पर इस हालात को मैं महसूस करता रहा और इसके बाद मैं धीरे धीरे प्रेरित हुआ गायत्री मंत्र की प्रथम दीक्षा मुझे अपनी उन भाभी से ही हुई उन्होंने मुझे जप विधान सिखाया उसके पश्चात् ब्लाइण्ड रिलीफ एसोसियेशन जो नई दिल्ली के ओबेराय होटल के समीप स्थित है उस विद्यालय में जब दसवी कक्षा में पढ़ रहा था तब मेरे एक साथी ने मुझे गुरुदेव का साहित्य भेंट किया। उस मेरे मित्र के पिताजी इस मिशन से जुड़े हुए थे। इसलिए उसे सहजता से यह साहित्य प्राप्त हो जाता था किन्तु वह इस साहित्य को पढ़ने में असमर्थ था क्योंकि वह भी मेरी तरह दृष्टिहीन था। मैंने उस साहित्य को आदर पूर्वक ग्रहण करके अपने रीडर से रिकार्डिग कराली मैंने सुना सुनकर बहुत प्रफुल्लित हुआ।

सन् १९९७ में गुरुदेव की सूक्ष्म चेतना ने मुझे झकझोरा कि तूने इतना सारा साहित्य पढ़ लिया अब तू चल मेरे आश्रम में। चल मैं वहाँ तुझे प्रत्यक्ष दीक्षा दूँगा और मैं अपने एक मित्र को जबरजस्तीराजी करके २० मई १९९७ को किसी प्रकार हरिद्वार पहुँच गया और यहाँ जो समीपस्थ दृष्टिहीन विद्यालय अजरधाम आकर ठहरा और २० मई को सुबह आकर मैंने यहाँ से दीक्षा ली मुझे असीम आनन्द की प्राप्ति हुई। असीम शान्ति की अनुभूति हुई। इसके बाद मैंने सोच लिया कि मुझे जीवन भर गुरुवर का कार्य करना है इसके लिए क्यों न जान की बाजी लगाना पड़े। इसके लिए मुझे हर मुसीबत का सामना क्यों न करना पड़े। क्योंकि मुझे एक अगला सूत्र मिल गया था कि ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर हैं।

इसके बाद मुझमें आत्मविश्वास भी दृढ़ हो गया। इसके बाद मैंने यह देखा कि मेरा विद्यार्थी जीवन दिनो-दिन सफलता के कगार पर पहुँचने लगा। दसवी कक्षा में भी मैं बहुत अच्छे मार्कस लेकर उत्तीर्ण हुआ। उसके बाद मैंने उसी विद्यालय से बारहवी क्लास भी पास किया। उसके बाद दिल्ली का हाईहस्ट कालेज जो हैं जिसे बेहतरीन कालेज सेन्ट डिफेंस कालेज जो क्रिश्चिन मिशनरी के द्वारा चलाया जाता है जिसको प्रत्यक्ष कैम्बरेज से एड मिलती है उस कालेज में पढ़ने का सौभाग्य मिला औरक्योंकि मुझे प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से बहुत लगाव है इसलिए मैंने संस्कृत ओनर से ही बी०ए० करना सार्थक समझा और मैंने बी०ए० में संस्कृत के काफी वांङमय पढ़े इसके पश्चात् में बी०ए० में भी ७० प्रतिशत मार्क्स लेकर पास हुआ। इसके बाद मैंने ६२ मार्क्स लेकर बी०एड० पास किया। अब मैं एम०ए०प्रीवियस कर रहा हूँ इसके अलावा हर जगह हर एक क्षेत्र में मेरा आत्मविश्वास दृढ़तर होता जा रहा है। मुझे इस मिशन से बहुत सारी प्रेरणाएँ मिली और मुझे ही नहीं मेरे अन्य साथियों को भी बहुत प्रेरणाएँ मिल रही हैं। मेरे बहुत सारे साथी है जो तरह तरह की निजी समस्याओं में उलझे हुए थे आज वह शान्तिपूर्वक अपना अध्ययन कार्य कर रहे हैं।

अब मैं इस मिशन से यह आशा करता हूँ कि कुछ गुरुदेव का जो दुर्लभ साहित्य है क्योंकि आप यह समझिए कि इस भारत देश में लगभग ९५ लाख की आबादी दृष्टिहीन लोगों की भी है। इसमें १५-२० लाख ऐसे हैं जो अध्ययन कर रहे हैं। इनके लिए गुरुदेव का साहित्य शान्तिकुँज के माध्यम से आडियों केसेट के माध्यम से उपलब्ध हो जाए। तो हमारे दृष्टिहीन भाई यहाँ आए और वह साहित्य के केसेट यहाँ से क्रय करके ले जा सके और उससे स्वयं लाभान्वित हों और अपने अन्य मित्रों को भी लाभ पहुँचा सकें। मुझे इस मिशन में जुड़ने से काफी लाभ मिला है मुझे विद्यार्थी जीवन में भी लाभ मिला है और मेरी व्यक्तिगत समस्याएँ भी सुलझी हैं। और मुझे जो आत्मिक शान्ति की अपेक्षा थी जो मुझे दूसरे माध्यमों से मिलना बहुत ही असम्भव जान पड़ रहा था वह मुझे उपलब्ध हुई। मैं आज हर तरह से सुखाी हूँ और अपने कार्यक्षेत्र में कुशलता पूर्वक अग्रसर हो रहा हूँ। मुझमें ऐसा विश्वास जागा है कि मैं दृष्टिहीन होते हुए भी समाज के अन्य घटकों की सहायता कर सकता हूँ। औरथोड़े रूप में कर भी रहा हूँ। अभी मैने इस इकाई के रूप में अपने ही दृष्टिहीन साथियों को चुना है। मैं अपने कुछ कनिष्ठ साथियों को समय देकर पढ़ाता हूँ और गुरुदेव का जो रिकार्डिड साहित्य है प्रज्ञागीत को दिल्ली में अपने साथियों को लगभग ५-६ विद्यालयों में साहित्य और आडियो केसेट भेजता हूँ और अपने साथियों की कभी-कभी छोटी-छोटी सभाएँ भी बुलाता हूँ।

श्री हरीराम केडिया कलकत्ता

मैं १९६६ से अखण्ड ज्योति पत्रिका पढ़ता था। सन् १९७२ में कलकत्ता में एक पाँच कुण्डीय गायत्री महायज्ञ हुआ। इसके अन्दर मैंने यज्ञोपवीत और गुरुदीक्षा ली। उस टाइम पर मुझे यह मालुम नहीं था कि मैं इतनी बड़ी सत्ता से जुड़ रहा हूँ। इसके बाद गुरुदेव हिमालय चले गए थे पर जब मैं १९७३ में शान्तिकुँज आया तो मालुम पड़ा कि गुरुदेव हिमालय से आ गए हैं। उस समय शान्तिकुँज बहुत छोटा था। और मेरे को कहा गया कि गुरुदेव १२ बजे मिलेंगे। गुरुदेव करीब ग्यारह साढ़े ग्यारह बजे नीचे उतरे उन्होंने कन्धे पर हाथ रखकर कहा कहो भाई कहाँ से आना हुआ। क्या हालचाल है तब मैने देखा गुरुदेव खड़े हैं उस समय मैंने गुरुदेव को प्रणाम किया। मेरा प्रथम साक्षात्कार गुरुदेव से उसी समय हुआ उसके बाद उन्होंने एक घण्टा तक मेरे को समय दिया बहुत अच्छी तरह घर की माफिक सब बातचीत की। १९७३ में प्राण प्रत्यावर्तन शिविर में मैं सपरिवार यहाँ आया था उस समय मुझे गुरुदेव से जो अनुभूति हुई और जितनी शक्ति मिली उसका मैं वर्णन नहीं कर सकता हूँ उसके बाद १९८० में मैं शान्तिकुँज आता रहा हर नवरात्रियों में आता रहा तो १९८१ की आश्विन की नवरात्रि में जब मैं आया तो उस समय गुरुदेव मैं परिवार के साथ आया था मेरा बड़ा पुत्र और बहू कलकत्ते में ही थे। गुरुदेव ने कहा कि केडिया तुम्हारे लड़के की शादी इस लड़कीसे कर दो परिवार वाले न नुकर करते रहे हमने कहा कि गुरुदेव ठीक है कर देंगे लेकिन अभी तो आश्विन में हमारे यहाँ शादी होती नहीं है आश्विन के अन्दर में देव सोए रहते हैं। तो गुरुदेव ने कहा कोई देव नहीं सोते हैं हम और माताजी वहाँ बैठेंगे बराबर।

बोले देव कभी सोते नहीं है देव जब सोएगे तो दुनियाँ में प्रलय हो जाएगा। फिर कहा देव तुम्हारे कब सोते हैं। मैंने कहा असाढ़ एकादशी से सोते हैं और कार्तिक शुदी एकादशी को उठते हैं। उन्होंने कहा सबसे बड़ा कौन होता है तो मैंने कहा गुरु होता है। गुरुपूर्णिमा कब आती है मैंने कहा देव सोने में आती है। उसके बाद उन्होंने कहा ब्राह्मणों का सबसे बड़ा पर्व कौन सा है। मैंने कहा रक्षाबन्धन है। बोले वह कब आता है मैंने कहा देव सोने में आता है। इसके बाद उन्होंने कहा सबसे पहले किसकी पूजा करते हो मैने कहा गणेश जी की तो उन्होंने कहा गणेश जी का जन्म कब हुआ। मैने कहा भाद्रशुदी चौथ को हुआ। तो देव बोले जब देव सोए हुए है तो उस समय जनम कैसे हो गया। इसके बाद उन्होंने कहा बंगाल में सबसे बड़ी पूजा क्या होती है मैने कहा दुर्गा पूजा होती है बोले दुर्गापूजा कब आती है देव जगे में आती है कि देव सोए में आती है। मैंने कहा देव सोए में आती है। बोले क्षत्रियों का सबसे बड़ा त्यौहार कौन सा है। मैने कहा क्षत्रियों का सबसे बड़ा त्यौहार विजयादशमी है। बोले वह कब होता है और तुम लोगों का सबसे बड़ा त्यौहार कौन सा है हम लोगों ने कहा दीवाली है बोले दीवाली पर तुम लोग नया खाता खोलते हो नए खाते की पूजा करते हो नया कारबार करते हो नया बिजनेस स्टार्ट करते हो नए भवन में जाते हो सब काम नया करते हो गणेश जी लक्ष्मी जी की पूजा करते हो। सम्पत्ति मागते हो जब देव सोया हुआ है तो किससे सम्पत्ति माँगते हो।

फिर उन्होंने मेरे को समझाया कि देव कभी सोते नहीं है भारत कृषि प्रधान देश था इसीलिए कृषि प्रधान देश के अन्दर में जिस टाईम पर चार महीने खेती किसानी के रहते थे और उस समय लोग शादी विवाह में आने-जाने लगेंगे तो खेती किसानी नहीं होगी फिर खाएगे क्या लोग और उस समय इतनी यातायात की व्यवस्था नहीं थी और शादी तय हो गई नदी के इस पर लड़का और नदी के उस पार लड़की हो तो शादी कैसे होगी। इसलिए कोई देव नहीं सोता आजकल वह कुछ नहीं है इसलिए तुम शादी करदो और उन्होंने उसी टाइम पर अपने हाथ से ही सगाई का दान किया और उसके बाद वह बैठे दो-ढाई घण्टा वही उनका लास्ट शिविर था जिसमें वह दो ढाई घण्टा बैठे और शुरु से लेकर आखिरी तक वह शादी में बैठे। उसके बाद वह बोले बहू को साथ में लेकर जाओ। लक्ष्मी को हम दीवाली में तुम्हारे साथ भेजते हैं तुमको साथ लेकर जाना पड़ेगा। हम लेकर गए घर में जब मालुम पड़ा लोगों को कि भई यह क्या बात है तो लोग बहुत गुस्सा हुए लड़का बहू सब बोले यह कैसे शादी हो गई हमको किसी को मालुम नहीं है। लेकिन मुझे वहाँ सबसे बहुत लड़ना पड़ा और धीरे-धीरे सब ठीक हो गया अब लोग बोलते हैं कि ऐसा सौभाग्य बहुत कम होता है। और अब लोग बहुत सराहते हैं उसको।

सन् १९८३ में मेरे साथ एक पार्टनर था वह भी गायत्री परिवार का था हम लोगों ने कारोबार किया उसमें नुकसान लग गया। नुकसान लगने के बाद हम लोग गुरुदेव के पास आए उन्हें सब बताया गुरुदेव से कहा आधा नुकसान मैं दे दूँगा आधा वह दे दे। उसने गुरुदेव से कहा मैं तो नुकसान देने की स्थिति में नहीं हूँ पूरा नुकसान केडिया वहन करे। तो उन्होंने कहा कि ठीक है बेटा मैं कह दूँगा। तो उन्होंने मुझे मिश्रा जी के मार्फत कहा कि पूरा नुकसान तू उठा ले। उस समय मेरे ऊपर कर्जा था मैंने कहा ठीक है गुरुजी ने कहा है तो मैं कर लूँगा पूरा नुकसान वहन मिश्रा जी ने कहा नहीं गुरुजी से जाकर पूछ लो तो बोले कि देखले मिश्रा जैसा कहता है करले। मैंने कहा मेरे ऊपर लाख रुपये का कर्जा है दो लाख हो जायेगा। बोले मैं हिसाब किताब नहीं जानता हूँ जैसा मिश्रा कहता है करले तेरी मैं पूर्ति कर दूँगा और उन्होंने न सिर्फ मेरी पूर्ति कर दी बल्कि ऐसा कर दिया कि मैं अपनी रोटी कमाने खाने लायक हो गया। इसके बाद सन् १९८४ में जब गुरुदेव सूक्ष्मीकरण में गए थे उस समय मैं साधना करने आया। मेरे को कहा गया कि थोड़ा एकाउन्ट का काम है केडिया जरा देख लेना तीन-चार महीने एकाउन्ट का काम किया। एकाउन्ट का काम क्या था मेरे को सिर्फ श्रेय देना था वह उन्होंने दिया इसके बाद में १९८८ में मैं चेत्र की नवरात्रि में आया था तो पूर्णाहुति के पहले गुरुदेव ने मुझे ऊपर बुलाया मैं और मेरी धर्मपत्नी ऊपर गए उस वक्त गुरुदेव ने मुझसे कहा केडिया यह जो अखण्ड ज्योति है यह बंगला में भी निकलनी चाहिए।

मैंने कहा साहब आपका मन है तो जरूर निकलेगी। बोले जानते हो इसमें कितना खर्चा होगा मैंने कहा एक लाख रुपया करीब इसमें खर्चा हो जाऐगा। बोले हाँ हो जाएगा उसमें काम कर तू जा। मैंने कहा साहब आपका आशीर्वाद होगा तो जरूर करेंगे। फिर उन्होंने कहा ठीक है आज तू मथुरा चला जा वो बोले गोपाल तू इसके साथ में जाना। प्रणव जी को बोले तुम जरा चिट्ठी लिखदो मेरे नाम से कि वहाँ वृन्दावन जाकर अनुवादक खोज लेंगे और तपोभूमि में छपाएगे। मैं गोपाल जी के साथ वहाँ गया पण्डित जी ने अपनी असमर्थता जाहिर की कि यहाँ वृन्दावन में कोई अनुवादक नहीं मिलते हैं। और न हमारे पास बंगला लिपि है मैने कहा पण्डित जी को कि साहब मेरे को उन्होंने चिट्ठी लिखकर दी है आप मेरे को जवाब दे दीजिए। उन्होंने मेरे को जवाब दिया मैं लेकर आया गुरुदेव ने मुझे ऊपर बुलाया हमने कहा साहब ऐसी-ऐसी असमर्थता व्यक्त की है। बोले ठीक है असमर्थता व्यक्त की है तो तू कलकत्ता से कर। मेरा आशीर्वाद तेरे साथ में हैं।

मैंने कहा साहब मेरे को पावर दीजिए। तो गुरुदेव ने उसी वक्त चिट्टी लिखाकर अपना साइन करके और वन्दनीया माताजी का साइन करके मेरे को दिया कि आप बंगला पत्रिका निकालो उसके बाद मैंने पत्रिका निकालने का विचार किया तो उन्होंने कहा नहीं पहले साहित्य निकालो तो पहले में दो वर्ष साहित्य निकालता रहा और १९९० से त्रैमासिक पत्रिका निकालना शुरु किया। मेरे को न तो बंगला का कोई अनुभव है न बंगाली जानता हूँ न बंगाली पढ़ना जानता हूँ, न बंगाली लोगों से सम्पर्क है और न जिन्दगी में मेरा संपादन से कोई सम्बन्ध रहा है लेकिन गुरु का आशीर्वाद ऐसा है कि आज वह पत्रिका लोगों के पास जन-जन तक जाती है लोग उसे बहुत पसन्द करते हैं। विदेशों तक में पत्रिका जाती है।

पत्रिका भले ही नुकसान में चलती है हमने एक दृष्टि से किया था कि जब तक घर में थाली लोटा है तब तक तो हम इसको चलाएगे बाकी गुरुदेव की इच्छा। पर आज तक न तो मेरा थाली लोटा बिका और कम से कम ३०-४० हजार रुपया सालाना नुकसान होताा है वह नुकसान भी पूर्ति होकर पत्रिका के ऊपर कोई लायबिलिटी नहीं है और पत्रिका चल रही है और उसके साथ कम से कम बंगला में १०० पुस्तकें निकाली हैं। वह भी चल रहा है और धीरे-धीरे मेरे को विश्वास है गुरुदेव का ऐसा आशीर्वाद है कि मैं जहाँ भी अटकता हूँ वहाँ मेरे को अन्दर से ऐसी प्रेरणा आती है कि तुमको ऐसा काम करना चाहिए। और मैं किसी से भी सलाह न लेकर उसी हिसाब से कार्य करता रहता हूँ और मेरे को बड़ी शान्ति मिलती है।

अभी २५ आदमियों का मेरा परिवार है २५ आदमियों के परिवार के रहते हुए भी मैं सुखी हूँ। गुरुदेव कहते थे कि भगवान के पास तीन चीज देने को है दैवी अनुग्रह, आत्मसन्तोष और लोकसम्मान और गुरुदेव की बात से कहाँ मैं एक छोटा सा प्राणी जिसको कोई आइडिया नहीं न पढ़ा न लिखा लेकिन गुरुदेव का अनुदान इतना मिला कि मेरे को दैवी अनुग्रह मिला मेरा कभी कोई काम नहीं अटकता। जब भीकभी कोई काम अटकता है गुरुदेव की प्रेरणा मेरे भीतर आ जाती है और मैं उस हिसाब से वह कार्य कर देता हूँ और वह काम कितना भी कठिन से कठिन हो वह काम पूरा हो जाता है। इसके बाद आत्मसन्तोष मेरे को इतना है कि मेरे बराबर राजा को भी आत्मसन्तोष नहीं होगा और लोक सम्मान गुरुदेव ने मुझे इतना दिलाया है कि मेरे जैसे कीड़े-मकोड़े आदमी को ऐसा सम्मान नहीं मिलना चाहिए जितना सम्मान मेरे को मिला है। मैं जब शान्तिकुँज में साधना करने आता हूँ उस समय में मुझको जो सम्मान मिलता है जो शान्ति मिलती है मेरे को जो पावर मिलता है उससे मैं बराबर काम करता हुआ चला जाता हूँ और मुझे विश्वास है कि आगे भी जितना महापूर्णाहुति का काम है या जो भी काम मुझे सौंपा जाएगा गुरुदेव के आशीर्वाद से और गुरुदेव की प्रेरणा से वह मैं अवश्य पूर्ण करूंगा।

मैं पहले गुरुदेव को गुरू के हिसाब से मानता रहा लेकिन अब मुझे यह अनुभव होने लगा है कि बस भगवान हैं तो ये ही हैं गुरु हैं तो ये हैं और मेरे सर्वस्व ये हैं। और मेरे यही सब कुछ हैं मैं इनको बॉस मानता हूँ मार्गदर्शक मानता हूँ, मेरा भगवान मानता हूँ और दैवी देवता जो कुछ हैं सब मैं गुरु की छवि में देखता हूँ। और मेरा ध्यान भी सिर्फ गुरु के ऊपर रहता है। गायत्री मंत्र करता हूँ तब भी गुरु का ध्यान करके ही करता हूँ और गुरु के अलावा मैं कुछ भी नहीं मानता हूँ। गुरु को जैसा रामायण में कहा गया है कि उत्तम के अस मन माही सपनेहु आ न पुरुष जग माही तो वैसे ही मेरे लिए एक पुरुष है एक मालिक है जो कुछ है तो मेरा गुरु है। इसके अलावा और कुछ नहीं है।

गुरुदेव के संस्मरण श्रीमती कुन्ती देवी पाण्डे मथुरा

मैं आँवलखेड़ा के पास मेरा पीहर है। मथुरा के पास बल्देव में मेरी ससुराल है। मेरा पति अलीगढ़ में सर्विस करते थे मेरी सन् ५१ में लड़का हुआ और उसके बाद मुझे भयंकर टी०वी० हो गई और बहुत तबियत खराब हो गई्र। कुछ दिन बाद में टी०वी० सेनिटोरियम में भर्ती हो गई और डेढ़ साल रही। डेढ़ साल के बाद आपरेशन के लिए डाक्टरों ने बोल दिया। और डाक्टरों ने कहा कि ९ हड्डियाँ गल गई हैं निकलेंगी इसी बीच में ५ दिन रह गए थे मैं परम पूज्य गुरुदेव के दर्शन करने गायत्री माता का दर्शन करने तपोभूमि चली गई। वहाँ से लौटने पर डाक्टर से शिकायत कर दी गई मेरी मुझे डिस्चार्ज कर दिया गया और मेरे घरवालों को तार दे दिया और घरवाले भी सब नाराज थे कोई लेने नहीं आया। फिर मैंने सोचा कहाँ जाऊँ पूरी रात मैंने मरने का भी प्रयास किया पर नहीं मर पाई।

जब आचार्य जी के पास पहुँची मैं तो उन्होंने कहा बेटा क्यों रोती है क्या बात है मैंने कहाँ मुझे कौन रखेगा मैं कहाँ जाऊँगी। इसी बीच में उन्होंने मुझे जल और भस्मी दी मन्दिर पर बैठकर और कहा बेटी तू ठीक हो गई। कोई टी०वी० नहीं है। डाक्टर कहता था आपरेशन होगा। गुरुदेव बोले कोई आपरेशन नहीं होगा। ते ठीक हो गई। मुझे ससुराल भेज दिया और कुछ दिन के बाद कह दिया तुझे कोई परेशान करे तो यहाँ आ जाना। घियामंडी भी दिखा दी। घियामंडी आ जाना मैं रखूंगा। उसके बाद मैं ठीक होती चली गई मुझे कोई बीमारी नहीं रही वास्तव में।

एक प्रथम भाग गायत्री महाविज्ञान दे दिया मैंने कहा पिताजी मैं तो ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूँ नई बेटी तू पढ़ी-लिखी हो जाएगी और पढ़ लेगी तू इसे ले जा। ले गई और थोड़ा मैंने देखा पढ़ा मैं थोड़ी सी औरआगे बढ़ी उसके बाद मैं स्वस्थ होती चली गई। सन् १९५८ में जब यज्ञ हुआ तो मेरे सभी घरवाले मुझे लेकर के ५८ केयज्ञ में आए मैं डाक्टर के यहाँ भी मिलने गई डाक्टर भी आश्चर्य में रह गया तू वहीं कुन्ती देवी है। और मैं पूर्ण स्वस्थ होकर सन् ५८ के यज्ञ में ८ दिन रही। और पिताजी के पास माताजी के पास घियामंडी में भोजन करती थी। जो कुछ भी जैसा होता था चलते फिरते थे काम करते थे। उसके बाद गुरुदेव ने बहुत बड़ा यज्ञ किया पण्डा सब विरोध में आ गए। हम लोग भी पण्डाओं में से ही है सब विरोध में आ गए हमारे ससुराल वाले भी विरोध में आए परन्तु हमने किसी की परवाह न करते हुए बस हम गुरुजी के साथ ही रहे। तरह-तरह की बात कहते थे पर एक आश्चर्य की बात देखी जो विरोध कर रहे थे वही लोग फिर गुरुजी की ऐसी प्रशंसा करने लगे और सभी ने कहा कि हम इनको पहचान न पाए। यह तो बड़ा महान व्यक्ति है इतने बड़े यज्ञ को किया है और हमें बहुत बड़ा लाभ मिला है। वही सब बदल गए। और उसके बाद में फिर यज्ञ बड़ा शानदार हुआ और देखा जब प्रबन्ध कोई ज्यादा अच्छा नहीं बन पा रहा था बीच सड़क में डाकखाने बनाए गए थे जगह-जगह। फिर भी बहुत लोग सेवा भाव में बदले हुए थे और यज्ञ की प्रशंसा सुनकर जब चारों ओर से लोग इकट्ठे हुए और भोजनालय देखा बहुत छोटा भोजनालय था और भोजनालय में से सबको भोजन देने की व्यवस्था थी। उसको भी आश्चर्यचकित होकर देखते थे लोग कि कहाँ से इतने लोगों को भोजन देते हैं ये लोग कहाँ से पंक्तियों की पंक्तियाँ खाती चली जा रही हैं।

वहाँ छोटी-छोटी भट्टियाँ थीं उन पर भगोने रखे हुए थे हम भी देखने गए थे तो हमें लग रहा था कि कैसे भोजन कर लेंगे इतने में पर माता जी के पास माँ की शक्ति थी और माताजी वहाँ बैठती थी यह हमने अपनी आँखों से देखा। और सभी लोग भोजन करते थे कोई भी परेशानी नहीं थी पानी की कोई कमी नहीं थी। आश्चर्य लगा कि इतने छोटे-छोटे भगोने रखे हैं यहाँ इसमें कैसे लोग भोजन करेंगे। लेकिन गुरुजी ने कह दिया था मंच पर बैठकर हमने अपने कानों से सुना कि मेरे पास कुछ नहीं है। एक किलो जो लेकर के मैं इस यज्ञ को करने जा रहा हूँ। तभी लोग सोचते थे कि यह एक किलो के जौ में कैसे इतना बड़ा यज्ञ होगा वहाँ देखा वास्तव में ऐसा बढ़िया यज्ञ हुआ कि हमारे समय में तो क्या पुरुखाओं के समय में भी यज्ञ नहीं हुए होंगे। पहला यज्ञ था मथुरा में उसके बाद में सब सम्पन्न हो गया गुरुजी की सब प्रशंसा करने लगे लोगों में बदलाव आया और मथुरा जाने लगे तपोभूमि जाने लगे। सब लोग मेल जोल से रहने लगे फिर कोई विरोध नहीं था। उसके बाद में गुरुजी की बिदाई हो गई तब फिर हम यहाँ पहली बार आए थे शान्तिकुँज। तब यहाँ पर एक तिवारी नाम का आदमी रहता था मथुरा से आया था और मैं थककर के आई थी पिताजी के साथ। दोपहरी भर पैदल चलकर आई थी और जब मैंने कहा पिताजी ने बेटी भोजन करले। भोजन कर लिया उसके बाद मैं नीचे उतरकर आई तिवारी ने कहा कि अब तुम यहाँ क्यों बैठी हो मैने कहा क्या करूं कहाँ जाऊ तो कहने लगा वापिस जाइये हरिद्वार यहाँ कोई रहने की जगह नहीं है। मैं फिर पिताजी के पास दौड़ी हुई ऊपर गई मैंने कहा पिताजी एक मूछों वाला आदमी यह कह रहा है कि यहाँ तो कोई जगह नहीं है रहने की वापिस जाओ। अब मैं क्या करूं। वह उतरकर आए यहीं स्वागत कक्ष के पास ही एक कमरा था बस उसमें बुरादा और लकड़ी सब भरी हुई थी पिताजी ने अपने आप साफ कर गुरुजी ने रखा तब हम सात आठ दिन यहाँ रहे। फिर हमें दुबारा यहाँ के पूजन के लिए बुलाया गया। गायत्री नगर की ईटें रखवाई गई शिवजी की स्थापना जब हुई थी। ब्रह्मवर्चस में हमें बुलाया गया ब्रह्मवर्चस की ईटें धरींफिर हिमालय की तो आपको पता ही है सबके सामने धरी गई थीं।

उसके बाद घर में भी मेरे बड़े बडें काम ऐसे हुए कि मैं आपको क्या बताऊँ। घर नहीं था मेरा मढै़या में रहती थी मैं किराये की में। गुरुजी से धीरे से मैंने कहा गुरुजी मकान नहीं हैं बोले बेटी तू मकान क्या करेगी हरिद्वार मकान है मथुरा मकान है। मैंने कहा नही पिताजी। तो एक रुपया दिया। और एक रुपया में मैं सच कह रही आपको मेरे पति सहारनपुर में थे बेटा करनाल में था और एक रुपये को लेकर मैं ऐसी बन गई कि मैंने मकान बनाना शुरु कर दिया और दो मंजिल मकान बनकर तैयार हो गया। कारखाना डाल लिया। बेटियों की शादियाँ कर ली। बस पता नहीं कहा से पैसा आया मेरे पति यह सामने बैठे हैं यह आश्चर्य करते हैं बेटा आश्चर्य करता है कि रुपये कहा से आ गया था एक रुपये में कैसे काम कर लिया तुमने।

मैं पढ़ी लिखी नहीं थी मुझसे दस्तखत करना नहीं आता परन्तु गुरुजी ने कहा बेटी तुम काम करो। मैंने कहा क्या काम करूं। जाकर के घर-घर में मंत्र सुनाओ, यज्ञ कराओ, किताबें बाँटो, मैंने कहा मैं तो पढ़ी-लिखी नहीं हूँ कैसे करूं। उन्होंने कहा तुम पढ़ गई। मैंने कहा मैं पट्टी पेंसिल लेकर भी नहीं आई। कैसे पढ़ गई। तब मेरी अवस्था १८ साल की थी उस समय। मैं गाँव की लड़की थी ज्यादा जानती भी नहीं थी। मैंने कहा कैसे पढ़ गई पट्टी पेंसिल तो लाई नहीं आपके पास। नहीं बेटी तू पढ़ गई और उसी समय से मैंने गायत्री परिवार का काम शुरु कर दिया। मैं यज्ञ भी कराने लगी। और संस्कृत भी पढ़ती हूँ। और किताबें पढ़ती हूँ पढ़ाना पढ़ना और गायत्री परिवार की स्थापना हो गई। लिखना तो नहीं आता अभी भी। ज्यादा दस्तखत भी नहीं आते परन्तु पढ़ती हूँ सब। उसके बाद मेरे साथ में गायत्री परिवार की स्थापना हो गई जगह-जगह महिला संगठन खड़े हो गए लोग कहते थे कि आप महिला संगठन देखें तो अलीगढ़ का देखें। जहाँ -जहाँ प्रोग्राम देने जाते थे लोग वहाँ कहते थे कि संगठन देखो महिलाओं का तो अलीगढ़ में देखों। अपने हाथ से ही हम लोगों ने ईटे, मिट्टी हाथ से दीं। प्रज्ञापीठ बनाई उसमें भी लोगबाग विरोध में आए कागज रसीद बुकें सब ले गए। एक वर्मा नाम का आदमी था यहाँ उसको गुरुजी ने बुलाया और कहा क्या कर रहा है इस लड़की के साथ कैसे तुम इनकी सब चीजें उठा ले गए हो। फिर उसका दिमाग ही अस्तव्यस्त हो गया वह काम नहीं कर पाया पहले काम करता था और उस समस से मैंने प्रज्ञापीठ भी छोड़ दी १९७९ में। फिर गुरुजी ने कहा था प्रज्ञापीठ तू हाड़माँस की मान ले और तू जहाँ चलेगी जंगल में चल जंगल में मै तेरे साथ चलूँगा। मैं जगह-जगह अपना काम करती रही और गुरुजी से जुड़ी रही और जो कुछ भी हो सका करती रही। फिर मेरा बेटा करनाल चला गया सर्विस छूट गई बैंक की १६ बच्चे उसमे निकाले गए थे। फिर ९ बरस तक मैं यही कहती रही पिताजी मेरा तो बेटाा भी चला गया मैं कहाँ से काम करूं अकेली कैसे जाऊँ कहाँ जाऊ में। बोले अच्छा बेटी तेरे बेटे को लाऊँगा। जब मैं घर में कहती थी कि गुरुजी कह रहे हैं कि तेरे बेटे को ले आऊँगा यहाँ अलीगढ़ तो ये लोग कहते थे कि तुम तो पागल हो गई हो जाने क्या कहती रहती हो। परन्तु ९ बरस के बाद मे दो ही बच्चे उसमें बाहर हुए। एक वशिष्ट नाम का और एक महेश पाण्डे नाम का। दोनों को लाकर यहाँ रख दिया। और बाल-बच्चे भी घर आ गए फिर आनन्द से रहने लगे।

अभी पुरश्चरण की बात चलीथी मैने आठ दिन अनुष्ठान कराया हमने लड़के को आठ दिन जाप चला बड़ी अनुभूतियाँ हैं इनकी। उसमें दो तीन बाद ट्रेक्टर में जनरेटर रखा था बहुत हैवी जनरेटर था बैंक का। और उसमें लड़के ने हाथ डालकर पानी देखा और उस जनरेटर ने पकड़ लिया। उस समय पानी भरा हुआ था वह मुँह फाड़ के जवान निकाल के पड़ गया उसके पिताजी गए छुड़ाने उनको भी पकड़ लिया। हम जनरेटर बन्द करना नहीं जानते थे बहू भी रो रही थी छाती पीट-पीटकर हम भी रो रहे थे पर हम गुरुजी को बुला रहे थे गुरुजी आओ तुम हम लोगों को ऐसी धुन है। फिर हमने देखा एक लड़का आता है डंडा लेकर और उस समय हमने गुरुजी का बहुत बड़ा चमत्कार देखा और लड़के को छुड़ाता है और फिर भी लड़का बिल्कुल सुरक्षित। हमने कहा तुम कहाँ थे क्या हुआ तुम्हें। उन्होंने कहा हमें तो ऐसा मालुम पड़ा कि हम एक बगीचे में घूम रहे हैं और बहुत आनन्द का बगीचा था गुरुजी के पास हमने यह सब बातें लिखी। गुरुजी ने कहा बेटा मैं छुड़ाकर लाया तेरे बेटे को। और मैं तेरे सब काम करूंगा तू मेरा काम करती रह। इस तरह की बातें हम लोगों के साथ कहती रही।

आगरे में एक महिला मंडल का प्रोग्राम चल रहा था मुझे उसमें भेज दिया गया और बोले तू भाषण देना वहाँ। मैंने कहा पिताजी मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूँ मैं भाषण दूँगी क्या कह रहे हैं आप। उन्होंने कहा न बेटा मैं दूंगा तुम तो बैठ जना मंच पर जाकर। मैं मंच पर बैठ गई मेरे पति साथ में गए मेरे और इन्होंने कहा हम सुनेंगे तुम क्या बोलोगी। मैंने इनको कहा तुम छुपकर बैठ जाना सामने नहीं आना और गुरुजी ने वह शानदार भाषण बोला कि सब देखते रहे गए इन्होंने कहा आज मान गए आपके गुरुजी को और वास्तव में गुरुजी ही बोलते हैं उसी दिन से मैं भाषण देने लगी। जगह-जगह भाषण के लिए जाते थे हम। बहुत जगह हमने भाषण दिए। और रामायण की बात आई रामायण भी हम बहुत बढ़िया बोलते थे। जब साप्ताहिक रामायण के लिए आदेश हुए थे तो साप्ताहिक रामायण भी हम कराते थे।

एक दिन में जन्मपत्री लेकर पहुँची मथुरा पिताजी बैठे थे मैंने कहा पिताजी मेरे बेटे की तो यह कही है कि बेटा पानी में डूब जाएगा एक ही बेटा है मैं कैसा करूंगी। बोले बेटी जब यह डूबेगा तो मैं निकालकर लाऊंगा अभी क्षीरसागर में जाकर आप देखिए पाँच कुए हैं वहाँ हर साल दो चार मौत हो जाती है और बालक उसमें डूब गया गुरुजी निकालकर लाए उसे और पार पर कर आए। हल्ला सुना हमने पाण्डे जी का लड़का डूब गया, पाण्डे जी का लड़का डूब गया। जब हमें पता लगा कि हमारा लड़का डूब गया तो गुरुजी का एक पत्र गया पत्र में लिखा था कि तेरा बेटा सुरक्षित है कि नहीं। हम लोग आश्चर्य में पड़े कि यह बात पिताजी को कैसे पता चल गई कि डूब गया था। तो ऐसी बहुत सी बातें है उनकी जो हम लोगों को आश्चर्य चकित करती है उस समय हम तो एकदम अज्ञानी थे हम तो उनको पहचान ही नहीं पाते थे कि यह कौन हैं क्या हैं। परन्तु उन्होंने ऐसे अनुदान बरसायें एक से एक बढ़िया अनुदान है उनके हमारे पास।

एक डॉ० श्रीवास्तव टोली नायक के रूप में हमारे यहाँ शान्तिकुँज से गए। और उन्होंने तीन-चार दिन प्रोग्राम कराया। इसके बिदाई की हम लोगों ने बहुत बड़ा जत्था था महिलाओं का। गली में कुत्ता सोया हुआ था बड़ी वाली गाड़ी थी वह गाड़ी कुत्ते के ऊपर से निकल गई और कुत्ता मर गया तो श्रीवास्तव जी को भी खदेड़ लाए। मेरे पति को भी खदेड़ लाए मुझे भी खदेड़ लाए कहने लगे कि यह कुत्ता जिन्दा करवाओ अपने गुरु से यह ढोंग कर रखा है यह है वह है खूब गाली गलौज दे रहे थे हम लोग गिड़गिड़ा रहे थे घबड़ा रहे थे फिर श्रीवास्तव भी खड़े हो गए हम भी खड़े हो गए हाथ जोड़ कर आँसू बहाते बहाते कि अब कैसे भी यह लाज रहे कहने लगे कि कुत्ता श्रीवास्तव की पीठ से बँधेगा उस समय हम बहुत घबरा रहे थे तो हमने गुरुजी को याद किया कुत्ता फोरन उठकर उसके घर में भाग गया। हमने कहा ले भइया हमारे गुरुजी ने तेरा कुत्ता जिन्दा कर दिया। ले अपना कुत्ता। तब फिर वहाँ से श्रीवास्तव जी की बिदाई हुई।

संस्कार महोत्सव के लिए यहाँ से टोली पहुँची और बहुत बढ़िया प्रबन्ध किया गया। और तालानगरी नाम के स्थान पर था वहाँ बहुत बढ़िया सजाया गया। देखते ही देखते पाँच मिनट में इतना तेज तूफान आया कि हमने साठ वर्ष की उम्र में ऐसा तूफान नहीं देखा और लोग उस समय कांप रहे थे कमर-कमर तक ओले थे। पानी बहुत तेज था हवाएँ सहन नहीं हो रहीथीं। उस समय ऐसा लग रहा था कि पता नहीं आज क्या हो जाएगा सारी ताला नगरी के लोग खतम हो जाएगे क्या? परन्तु देखिए गुरुजी की कृपा कितना बड़ा संघर्ष होते हुए भी गुरुजी ने हम लोगों में से किसी की भी मौत नहीं हुई सब सुरक्षित बच गए और २५ मिनिट के तूफान ने ताला नगरी को बिल्कुल ध्वस्त कर दिया। धोकर फेंक दिया। दूसरे दिन फिर भी शानदार यज्ञ हुआ और सारी व्यवस्था ज्यौं की त्यों कर ली गई। लोग बड़े आश्चर्यचकित हुए कि ऐसी कौन सी शक्ति है यहाँ कल रात तो सारे कलेक्टर और मजिस्ट्रेट सारे आए और यहाँ कुछ नहीं था और सुबह-सुबह यज्ञ के लिए यहाँ टोली भी मौजूद है यज्ञ भी प्रारम्भ हो गया और सभी आश्चर्य में पड़ गए। गुरुजी के तो सभी काम ऐसे बढ़िया हुए है कि जिनको कोई पहचान नहीं सका देवशक्तियाँ चारों और फैल जाती है और जरा सी देर में पता नहीं क्या से क्या काम कर डालती हैं देवशक्तियों ने सब संभाल लिया और फिर बढ़िया यज्ञ हो गया।

श्री तारकनाथ पाण्डे प्रवक्ता राजकीय इंटरकालेज

सन् १९५६ से ही गुरुजी के सम्पर्क में रहा। सन् १९५८ में भी पत्नी और अपने परिवार के साथ गया। उसके पश्चात् सन् १९६६ में मेरा ट्रांसफर मथुरा हो गया ढाई वर्ष के लिए। तो मैं घियामंडी में रहा गुरुजी के समीप एक मकान में। और हाथरस में एक पाँच कुण्डीय यज्ञ की आवश्यकता पड़ी उस यज्ञ की आवश्यकता जिनके यहाँ पड़ी वह राजदुलारी मित्तल अब जीवनदानी है आपके यहाँ शान्तिकुँज में काम कर रही हैं। उनके पुत्र के विवाह के अवसर पर मैं गुरुजी के पास गया मैने कहा कोई व्यक्ति को दे दीजिए जो कि वहाँ पाँच कुण्डीय यज्ञ करादे। गुरुजी ने तुरन्त मुझसे कहा कि मैंने आदमी भेज दिया। मैँ बड़े आश्चर्य में कि कोई आदमी आया नहीं भेज किसे दिया। मैंने गुरुजी से कहा मुझे नाम बता दीजिए मैं सम्पर्क स्थापित कर लूं तो गुरुजी ने मेरा ही नाम बोल दिया तारकनाथ पाण्डे को भेजा है मैं एकदम स्तंभित हो गया मैं कुछ नहीं जानता यज्ञ कराना मैंने गुरुजी के सामने अपनी असमर्थता व्यक्त की। तो गुरुजी ने कहा कि भाई तुम तो किताब लेकर खड़े हो जाना सब काम मैं करुँगा। इस प्रकार का अनुभव मेरा रहा मैंने उस समय से यज्ञ कराना प्रारम्भा कर दिया। मैने २५ कुण्डीय यज्ञ, ५१ कुण्डीय यज्ञ अलीगढ़ में आयोजित किए।

दूसरी चमत्कार की बात यह रही कि श्रद्धांजलि समारोह में हम अलीगढ़ से बस लेकर के आए थे और बस जब वापिस जा रही थी तो हर की पेढ़ी की अपोजिट साइट में हमने बस खड़ी की और मना कर दिया महिलाओं से कि कोई महिलाएँ उतरें नहीं तीन महिलाएँ उतर गई और तीन महिलाएँ एक के बाद एक बहने लगी उसके पश्चात् वह महिलाएँ आई वहाँ से लौटकर के तो उनने बताया कि उन्हें कोई दाड़ी वाले बाबा थे सरदार जी उन्होंने हाथ में उठा-उठाकर पार पर रख दिया तो हमें ध्यान आया कि यह दादागुरु हो सकते हैं और कोई नहीं हो सकता। कोई सरदार इनको दिखाई दिया नहीं हमने उनसे बहत भला-बुरा कहा वह महिलाएँ आज भी जिन्दा है और आज भी हमारे साथ आई हैं सत्र में।

हमारा लड़का स्टेट बैंक की नौकरी से निकल दिया गया साढ़े नौ वर्ष तक मुकदमा लड़े १६ लड़कों में से दो ही लड़के आए एक हमारा लड़का और एक और लड़का। इस प्रकार के अनुग्रह अनुदान गुरुजी के हमारे ऊपर रहे। और हम जितनी शक्ति सामर्थ थी सेवा करते रहे। मैं और पत्नी सऩ् ८७ के रिटायरमेंट के बाद मैं अधिक समय दे पाया हूँ और अखण्ड ज्योति पत्रिका मँगाकर बाँटता हूँ। और भी सेवा कार्य जो कुछ है करता हूँ और लोग खुले हृदय से प्रशंसा करते हैं कि आचार्य जी ने बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य किए। वह माानव नहीं देवता थे।

सन् १९८७ में जीप का एक्सीडेंट बस से हुआ उसमें मेरा लड़का था दो तीन व्यक्ति और थे तो दो व्यक्ति तो मरणासन्न हो गए एक व्यक्ति मर गया। लड़का मेरा भी मरणासन्न था उसे लाकर अस्पताल हम लेने गए पत्नी ने स्वप्र देखा मेडीकल में उसके पलंग के पास बैठे-बैठे कि दादागुरु यह कह रहे है कि मेडीकल के दरवाजे पर भीख मिल रही है बेटी तू भीख ले आ। तो वह पल्ला पसारकर भीख माँगने लगी इसके बाद आँख खुल गई तो इस प्रकार का यह आश्चर्यजनक कार्य हुआ लड़का आज भी जीवित है। सब ठीक है गुरुजी की कृपा है।

गायत्री तपोभूमि जब शैशवावस्था में थी वहाँ प्रातःकाल के यज्ञ के समय हम लोग जाया करते थे यज्ञ के समाप्त होने पर गुरुजी यज्ञशाला के गेट पर खड़े होकर के चना चिरौजी का प्रसाद दिया करते थे तो हम यह समझते थे कि यह साधारण व्यक्ति है कोई तो बहुत समय तक यही दिमाग मे रहा आया कि यह साधारण व्यक्ति हैं। परन्तु जब हमने उनके मानवेतर कार्य देखे उन मानवेतर कार्यों को देखकर के दिमाग हमारा बदलने लगा और हम यह पहचानने लगे कि उनके अन्दर दिव्य शक्ति छुपी हुई है। दूसरी बात कोई भी प्रयास कोई भी प्रसंग लेकर के जब हम गए तो उन्होंने उसका समाधान किया हालाकि समय लगा लेकिन हमारा इच्छित कार्य हुआ। एक बार हमने कहा गुरुजी चार-पाँच रक्षा कवच दे दीजिए बोले रक्षा कवच हम रक्षा कवच यहाँ कहाँ तक बनाएगे। हम तुम्हें आदेश देते हैं कि तुम रक्षा कवच बनाओ और रक्षा कवच बनाकर के अपने अलीगढ़ के लोग जो चाहे उनको दो। इस प्रकार के आदेश भी उन्होंने दिए और दूसरी बात यह है कि इतना विशाल आयोजन हम आप अन्दाजा नहीं लगा सकते संस्कार समारोह और श्रद्धांजलि समारोह जो हुआ उसमें हम तो क्या गवर्नर तक ने आकर यह कहा कि इतना बड़ा प्रबन्ध करना चाहती तो लाखों करोड़ों रुपये खर्च हो जाते यह प्रबन्ध हो ही नही सकता था जो प्रबन्ध स्वयंसेवकों ने किया है। तो इसप्रकार यह सब बाते देखकर के हमारे दिमाग में बात आती है कि गुरुजी की दिव्य शक्ति थी उसे हम लोग बहुत बाद में ही पहचान पाए जीवन काल में ही पहचान पाए तब हमने भी यह समझा कि ऐसी महान आत्मा से जो जुड़ जाएगे उसी प्रकार धन्य हो जाएगे जिस प्रकार हम हो गए।

श्री लक्ष्मी प्रसाद

परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से जब से हम उनसे जु़ड़े सन् १९५८ से हमने जाकर पशुबलि के विरुद्ध आन्दोलन में काम किया। पशुबल बन्द कराए फिर आकर हमने अपने गाँव में यज्ञ किया गाँव वालों ने विरोध किया हम परास्त पड़ गए फिर भी गुरुजी ने हमको जाकर जगाया और कहा बेटा तुम चिन्ता नहीं करो यह भगवान का काम है तुम्हारा काम नहीं है और हम तुम्हारी मदद करेंगे और तब जाकर के गाँव वालों ने मदद की और यज्ञ हो गया। हमको एक बार सर्प ने काटा पर गुरुजी की कृपा से सर्प हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाया। हमारी पत्नी बीमार हो गई हमने गुरुजी का नाम लेकर गायत्री मंत्र पढ़कर उनको पानी पिला दिया तो वह भी ठीक हो गई।

गुरुजी की कृपा से जिस काम के लिए भी हम खड़े हो गए वह गुरुजी ने सफल किया। एक बार सूखा पड़ गया हम १३ दिन अनसन पर बैठ गए गायत्री महामंत्र का जाप करने लगे तो पानी खूब बरसा।

जमीन पर हमारा मुकदमा लगा गाँव वालों ने कहा यह जमीन अब यह पा नहीं सकते हैं। गुरुजी ने यहाँ से लिखा कि नहीं बेटा जमीन तुम्हारे पास रहेगी तो जमीन हमारे पास है हम मुकदमा जीत गए। हमारे मकान में आग लग गई हम घबरा गए सारे गाँव वाले घबरा गए अग्रि घर के ऊपर खपरों से निकलने लगी हमने ५ बाल्टी पानी फेका और आग बुझ गई बाद में देखा गया जब अग्रि शान्त हो गई तब देखा कि हमारा मकान भी बच गया, अनाज भी बच गया, भूसा भी बच गया जो किताबे रखी थी प्रज्ञा पुराण अखण्ड ज्योति हमारे बक्से में वह नहीं जली लेकिन चारों तरफ किनारे काली पढ़ गई लेकिन एक भी अक्षर नहीं जला, हमारे बालबच्चों के जो कपड़े रखे थे प्लास्टिक की बोरी में वह जलकर के मुर्दा जैसे बन गए।

गुरुजी से जब हमने दीक्षा ली और कहा कि गुरुजी हमारे गाँव में पशुबलि होता है लगभग २०० बकरा हर साल कट जाते हैं अण्डा, मुर्गा, शराब का दौरचलता रहता है तब गुरुजी ने कहा बेटा अपने गाँव का पशुबलि तुम बन्द करो तो हमने जाकर गुरुजी की कृपा से अपने गाँव का पशुबलि बन्द किया। और यहाँ तक समस्या आ गई कि पूरा गाँव एक तरफ हो गया रोकने के लिए और एक तरफ हम पर गुरुजी ने कहा बेटा चिन्ता नहीं करना हम मदद करेंगे तो आज कम से कम तीस साल हो गया हमारे यहाँ कोई पशुबलि नहीं होता। इसी प्रकार राजस्थान में इन्दरगढ़ गए वहाँ पर भी हमने पशुबलि के विरुद्ध आन्दोलन किया और वहाँ का पशुबलि बन्द किया।

एक बार हम जा रहे थे सामने से मोटर साईकिल आ रही थी तो हमारे सामने आकर अड़ गई एकदम से उसकी मशीन फट गई। वह मोटर साईकिल वाला गिर गया गुरुजी ने वहाँ भी हमको बचा दिया।

हवलदार आर०के० मिश्रा

२२५ वर्कसाप कंपनी में पोस्टिड था और मास्को वेली में किसी काम के लिए मैं गया था और गाड़ी रिपेयर किया और सभी कठिनाइयों को सहते हुए गुरुदेव को स्मरण करने से प्रेरणा मिली कि आप निरन्तर आगे बढ़ते रहें। जब भी बन वगैरह पड़ता था गुरुदेव का नाम लेते थे और गुरुदेव हमारी रक्षा करते थे। हम सुबह शाम गायत्री माती की आरती करता था और गुरुदेव माताजी को याद करता था। हमें ऐसा लगा कि आप निरन्तर आगे बढ़ते रहें आपको कुछ नहीं होने वाला है और जैसे ही एक बार हमें लगा कि यहाँ बम गिरेगा हम वहाँ से ४० फीट आगे जाकर एक गड्डे में लेट गए वैसे ही वहाँ वहाँ बम गिरा और हमारे दो भाई शहीद हो गए और हमें ऐसा लगा कि अब हमें आगे बढ़ना चाहिए और दुश्मन को मार गिराना चाहिए।लेकिन जब हम आगे बढ़े तो दुश्मनों का टोला भाग चुका था और हम फिर नीचे आ गए और नीचे आकर पोस्ट संभाल ली। पोस्ट संभालने के बाद वहाँ दस आदमी को रख दिया गया हमें नीचे भेज दिया गया। हम नीचे आए और उनका सहयोग करते रहे।

एक बार हम पोस्टिंग आए जोधपुर से जोधपुर से दिल्ली आए हमने सोचा माताजी के दर्शन करें आते समय किसी ने कहा यह मंशा देवी है हमारे पेकेट से पूरा पेसा निकाल लिया और यहाँ आकर हमें बड़ा दुख हुआ लेकिन सुबह जब हमने माताजी को घटना बताई माताजी ने सिर पर हाथ रखकर कहा कि बेटा तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी आपका काम निरन्तर आगे बढ़ता रहेगा। उन्हीं की कृपा से हम त्रिपुरा पहुँच गए। कही कोई टिकिट नहीं लिया और आराम से हम गए। माताजी की मेरे ऊपर बहुत कृपा रही।

कारगिल युद्ध के समय जब बमबारी होने लगी तो हमारे बहुत भाई शहीद हो गए हम पाँच सात आदमी बच गए वहाँ से। हमने जैसे ही आरती की ध्यान किया वैसे ही हमें लगा कि बेटा अब यहाँ से हट जाइए यहाँ बम गिरने वाला है वहाँ से जैसे ही हम हटे पाँच दस मिनिट के बाद गोला गिरा और वहाँ पर हमारे तीन चार आदमी मर गए हम पाँच सात आदमी वहाँ से बच गए। निकलने के बाद हम फिर अपनी यूनिट में वापिस आ गए।

कारगिल युद्ध के दौरान इतनी अधिक गुरुदेव की प्रेरणा आती थी कि मैं अपने शब्दों में बयान नहीं कर सकता। जब मैँ आँख बन्द करके ध्यान करता था तो साक्षात् प्रकट हो जाते थे और कहते थे कि बेटा तुम चिन्ता न करो तुम्हारी सुरक्षा के लिए हम हैं आप आगे बढ़ो, हम आगे बढ़ते थे।

श्री शीतला प्रसाद अवस्थी एकाउन्ट आफीसर

हम सन् १९७८ में बाराबंकी में पोस्ट थे परम पूज्य गुरुदेव से सन् ७८ से ही जुड़ा हुआ था सन् १९८० में मेरे बड़े भाई साहब के लड़के का जनेऊ था बाराबंकी से हम और हमारी पत्नी दो बच्चे को लेकर बस में सवार हुए बच्चे छोटे-छोटे थे। बाराकंकी से लखनऊ आए। लखनऊ से माल कस्बा पड़ता है वहाँ हम लोग बस से उतरे वह बस वास्तव में गाँव तक जाती थी लेकिन सवारियाँ उसमें थीं नहीं इसलिए वहीं माल पर उसने उतार दिया। बोले आगे जगह नहीं है जाने की लाख हमने समझाया लेकिन वह माना नहीं आगे एक साईकिल वाला जा रहा था हमने उससे कहा बच्चे को बैठाल लीजिए लेकिन उसने मना कर दिया। दो लोग थे पानी बरस रहा था शाम का समय था जबरजस्त वारिश हो रही थी वारिश हल्की हुई तो हम बैग लिए हाथ में पत्नी ने छाता लगाया बच्चे पर बच्चा दो महीने का था। हम लोग वहाँ से चल दिए पाँच किलोमीटर हमने हिम्मत बांधी हमने कहा गुरुदेव का नाम लेकर हम चल दिए फिर साईकिल वाले से लाख कहा लेकिन उसने नहीं बैठाया। वे चले गए रास्ते में बरसात जबरजस्त हुई इतना जबरजस्त तूफान आया कि छाता उड़कर अलग चला गया। अब बच्चा भीगने लगा एक बच्चा पैदल चल रहा था। हम लोग बड़ा परेशान हुए। साधारण रूप में हम लोग गुरुदेव को परेशान नहीं करते हैं लेकिन जहाँ बहुत कष्ट होता है वहाँ हम लोग गुरुदेव का ध्यान करते हैं। हमने परम पूज्य गुरुदेव से कहा गुरुदेव अब आपकी मदद की जरूरत है। इतना हमारा कहना था कि एक ट्रक आया। ट्रक अपने आप रुका रुककर के उसका आदमी दौड़ा हुआ हमारे पास आया कहने लगे भैया आप बहुत परेशान लग रहे हैं आप सब लोग चलकर ट्रक में बैठ लीजिए उसने आगे बैठाल लिया जबकि वह साईकिल वाला आगे जा रहा था उसने कहा कि हम बैठ लें तो तुरन्त उसको मना कर दिया बोले नहीं आपको नहीं बैठना है ढकेल दिया उसको हम लोगों को बैठाल लिया बैठालकर ले गया और हमारे गाँव के पड़ौस तक बिल्कुल छोड़ दिया। हमसे कहा अब आप चले जाए बिल्कुल नजदीक गाँव रह गया है हमने कहा पैसे ले लीजिए बोला पैसे नहीं लेंगे आप हमारे भाई हैं यह हमारा कर्तव्य है कि हम आपकी मदद करें जितना भी हमसे हो सके। इस तरह हमने देखा कि जहाँ कहीं भी परम पूज्य गुरुदेव काध्यान किया वह हम लोगों को तुरन्त मदद करते हैं। जैसे भी हो सकता है। किसी न किसी रूप में मदद अवश्य मिलती है।

अभी एक किस्सा है हम ८ बजे आफिस से उठे। परम पूज्य गुरुदेव की हमने पुस्तके पढ़ी हैं गुरुदेव कहा भीकरते थे जब हमारा काम करोगे तो साईकिल गिरेगी तो एक हाथ हमारा लग जाएगा। इसी का दृश्य हमें याद आ गया। स्कूटर से हम घर जा रहे थे डबल रोड थी। पहली रोड से जब हमने दूसरी रोड पर क्रास किया तो उधर से बुलट पर एक दरोगा आ रहा था हमारा स्कूटर सीधा से जा रहा था उसने साइड से हमारे स्कूटर में इतनी तेजी से मारा स्कूटर हमारा छैः फीट पर आगे गिरा जाकर के हम अगल गिरे चस्मा अलग गिरा चप्पल अलग गिरी जाकर के। इतनी तेज आवाज हुई बाजार के सारे लोग दौड़ आए। यह लगा कि कोई न कोई आदमी इसमें खतम हो गया है। दौड़े लोग हमारे स्कूटर को उठाया बुलट वाले को उठाया उसको तो चोट आ गई बुलट वाले को हम उठे थोड़ी देर बाद होश आया हम उठे बुलट वाले को हमने डाँटा थोड़ा बहुत।खैर वह चुप रहा बोला नहीं उसके बाद हमने अपना चस्मा ढूढ़ा, चप्पल ढूढ़ी उठकर के हमने स्कूटर स्टार्ट किया स्कूटर स्टार्ट करके अपने घर चले गए। घर में जाकर के हमारा चालीस दिन का अनुष्ठान चल रहा था उसी समय हमें जरा सा भी अनुभव नहीं हुआ कि हमें चोट आई है। हम गए होम्योपैथी डाक्टर ने जरा सी दवाई लगा दी बोले अवस्थी जी आपको कहीं चोट नहीं आई है। हमारे स्कूटर में न कहीं जर्क आया आज तक स्कूटर वैसे ही चल रहा है। कही पिचका नहीं और पक्की रोड पर एक्सीडेंट हुआ था। यह परम पूज्य गुरुदेव का हाथ न लगा होता तो स्कूटर कहाँ का कहाँ कैसा हो गया होता क्या दशा मेरी हेाती इस तरह से हमारे गुरुदेव हमेशा मदद करते हैं।

गुरुदेव को हम साक्षात परब्रह्म भगवान मानते हैं गुरुदेव ऐसी-ऐसी बातें बताते थे लोगों को बल्कि हमें भी अनुभव जीवन में होता है कि ऐसी मदद भगवान के अलावा कोई नहीं कर सकता है। सन्त होते हैं उनकी एक सीमा होती है लेकिन जो असीमित काम कर सके असीमित आपके बारे में जान सके आते हुए तुरन्त गुरुदेव जान जाते थे तुममें क्या है। हमारे साथ एक यादव भाई साहब हैं उनसे हमारी बात हुई तो उन्होंने कहा कि हम जैसे ही गए उनसे हमने छिपाया कि गुरुदेव हम ऐसे ही मिलने आए हैं। उन्होंने कहा तू झूठ बोलता है सही बता हमसे क्यों छिपा रहा है। उन्होंने कहा गुरुदेव हमारी बिजनेस में हानि हो गई है जरा सा भी फायदा नहीं है। हम बड़ा परेशान है किसी तरह से यहाँ चले आए हैं तो गुरुदेव ने हाथ उठाकर के कहा कि जा बेटे आज से तेरे पैर पीछे नहीं पड़ेंगे। आज वह मौजूद हैं मनीष यादव जी जिस भी बिजनेस में हाथा लगाते है उनको लाभ हो जाता है। नेपाल में उनके सारे कर्मचारी भाग आए एक उन्होंने काम लिया था यह जब पहुँचे तो नेपाल के काम को इतना बढ़ायाँ कि आज इनका वहाँ लगा हुआ है समूह और काम बढ़ रहा है पैसे इनके घर पर आ रहे हैं। जो जो क्रिटिकल काम होते है गुरुदेव का कहा हुआ पूरा सफल होता हुआ चला जाता है। भगवान क्या करता है भगवान यही करता है। भगवान मृत्यु से बचा लेता है, भगवान आपकी कार्य में मदद कर देता है। ईश्वर सद्बुद्धि देता है इसलिए हम परम पूज्य गुरुदेव को ईश्वर मानते हैं।

श्रीमती ऊषा देवी गोरखपुर

१९७१ से मैं गुरुदेव से जुड़ी हूँ और गुरुदेव से बहुत ही प्रेरणा मुझे मिली। उस प्रेरणा से मैं आज भी बढ़ती चली जा रही हूँ। उन्होने मुझे मकान दिया, बच्चे दिए। परिवार दिया। जो कुछ मुझे जीवन में मिला सब उन्हीं के द्वारा मिला। गुरुदेव ने कहा बेटी तेरा मकान मैं बनवा दूंगा उनके आशीर्वाद से मकान मुझे मिला। मैं भटक रही थी तो माताजी से मैने प्रश्र किया कि मैं मायके में रहती थी परिवार में रहना चाह रही हूँ अपने पति के साथ में रहना चाह रही हूँ माताजी ने बहुत ही समझा कर हम लोगों को एक किया और मेरा जीवन धन्य किया।

श्री लालजी प्रसाद गोरखपुर

मैंने १५ वर्ष से पत्नी को छोड़ दिया था। जब गुरुजी के पास दीक्षा दिलाने गए तो मेरी पत्नी ने अपनी कथा बताई तो गुरुजी ने कहा कि यह हमारी बेटी है इसे तुम तंग करोगे तो मैं तुम्हारी चमड़ी पीठ का खीच लूंगा। उसी दिन से मेरी आँख में आंसू आ गए जब उन्होंने बेटी बनाया। मैने अपनी पत्नी का पैर छूकर प्रणाम किया कि अब मैं किसी तरह से गलती नहीं करूंगा। गुरुजी की इतनी अुनभूतियाँ मुझे मिली हैं गुरुजी ने कहा बेटे तुम शक्तिपीठ के लिए संकल्प करो। मैंने कहा गुरुजी मेरे पास जमीन एक पैसे की नहीं है। मेरे रहने के लिए। गुरुजी ने जबरजस्ती संकल्प कराया गोरखपुर के लोग पैसा लेकर के खोज रहे थे जमीन नहीं पाये लेकिन आचार्य जी के आशीर्वाद से मैं अपने रिश्तेदार की सम्पत्ति उपलब्ध कराया मेरे मामा लगते थे जो करोड़ों की सम्पत्ति थी बहुत गोरखपुर वाले चाहते थे कि यहाँ शक्तिपीठ न बने बहुत दूर है लेकिन शान्तिकुँज से आदेश मिलने पर उसकी रजिस्ट्री हुई वहाँ शक्तिपीठ बनी।

इसके बाद गुरुजी ने कहा ७१ की बिदाई के समय कि जो कोईयहाँ आएगा मर जाएगा। वाकई में मैंने वहाँ देखी मैंने घटना मरने वाली जहाँ पर ८-१० लाख आदमी हों और तूफान आ रहा है और कहीं भागने की जगह नहीं है। मथुरा वृन्दावन के बीच कहीं ठहरने की जगह नहीं हैं आँधी आई ४० शादियाँ हो रही थी लगता था कि सारे जोड़े सब जल जाएगे लेकिन गुरुजी ने कहाँ पाँच मिनिट ठहरो घबराओ नहीं अभी खतम हो जाएगा और पाँच ही मिनिट में सारा संकट दूर हो गया।

इसके अलावा हमारा मकान बनने लगा माताजी आशीर्वाद दे दी तो गुरुजी से कहा गुरुजी गुरुजी हमारा सारा सीमेंट बह जाएगा बादल चढ़ा हुआ है लेकिन गुरुजी का फोटो मैं ऊपर टाँग दिया सैकड़ों बोरी सीमेंट हमारा बहने वाला था वहीं पर बन्द हो गया और हमारा मकान बन गया।

हमारे लड़की की शादी नहीं हो रही थी हम लोग परेशान थे गुरुजी ने बहुत बड़े सम्पन्न परिवार में शादी करा दी वहाँ गर्ल्स इंटरकालेज उसका अपना है उसकी वह प्रिंसपल बन गई है। कभी हम सोच नहीं पाते थे उस परिवार में जाकर उनका माँस, मदिरा छुड़ाया हमारे पास मकान नहीं था माता जी के आशीर्वाद से मकान हो गया। मेरी दूकान हो गई कई लाखों की जमीन बिना पैसे की मिल गई। वहाँ बिजली की दूकान है जिसमें ४, ५ लाख रुपये का सामान है। लड़के सब हमारे अनुसार हैं उनमें कोई दुर्गुण नहीं आया है। हमारे दो भाई हमारे विरोध में थे अब दोनों सहयोगी बन गए हैं।

श्री शोभा प्रसाद तिवारी परिव्राजक गायत्री शक्तिपीठ अयोध्या

परम पूज्य गुरुदेव से सन् १९६० में मथुरा में प्रथम बार भेंट हुई। १९६२-६३ की बात है में किसी शिविर में मथुरा गया था वहाँ रात में एक व्यक्ति जिसको लकवा मार गया था स्ट्रेचर पर उसका परिवार उन्हें गुरुदेव के पास ले आए और उसको मन्दिर के सामने लिटा दिया। वह विद्वान था बड़ी अच्छी कविताएँ सुनाता था उसका और सब शरीर ठीक था लेकिन उठने बैठने में असमर्थ था परम पूज्य गुरुदेव प्रातः ७ बजे घियामंडी से तपोभूमि आते थे जब वह आए तो उसके परिवार के सभी सदस्य रोने लगे और वह व्यक्ति कविता कहता हुआ परम पूज्य गुरुदेव के चरणों में नतमस्तक हुआ और अपनी सारी व्यथा सुनाई। गुरुदेव ने उसको समझाया बुझाया कि भाई दवा करो और पूछा कि दवा में क्या-क्या दिया। यहाँ रहो दो चार रोज हम भगवान से प्रार्थना करेंगे कि ठीक हो जाओ लेकिन वह व्यक्ति लगातार परम पूज्य गुरुदेव के पैर पकड़े रहा। किसी तरह गुरुदेव ने अपना पैर छुड़ाया और अपने काम में लगे। दूसरे दिन फिर वही किस्सा किया फिर परम पूज्य गुरुदेव का पैर पकड़कर रोने लगा। गुरुदेव को दया आ गई गुरुदेव ने कहा ठीक है कमरे में जाओ मैँ भगवान से प्रार्थना करूंगा वह आदमी गया अपने कमरे में परम पूज्य गुरुदेव उसको कमरे में देखने गए। परम पूज्य गुरुदेव ने बताया प्रवचन में कि मैँने उससे पूछा कि तुमने अपनी कथा के माध्यम से जो जीवन भर पैसा कमाया है उसका तुमने कुछ लोकमंगल में लगाया कि नहीं। उसने कहा नहीं साहब मैने सारे पैसे को अपने बच्चों पर ही लगाया मकान बनवा दिया बच्चों को पढ़ा दिया अच्छी गृहस्थी हमारी चल रही थी लेकिन अब मैं चौपट हो गया अब मैं असमर्थ हो गया बच्चों को अब खाने पीने की दिक्कत आ रही है। परम पूज्य गुरुदेव ने उससे कहा कि तुमने जीवन भर समाज से जो कथा के माध्यम से पैसा कमाया कुछलोक मंगल में लगाया कि नहीं कि सब अपने बच्चों के हित में लगा दिया उसने स्वीकार किया कि हमने लोकमंगल में कुछ नहीं लगाया और बच्चों के लिए सारी गृहस्थी बनाता रहा गुरुदेव ने कहा तुम्हें वही दण्ड भुगतना पड़ रहा है तुमने सारा का सारा समाज का ऋण अपने ऊपर चढ़ा लिया है तुमको कुछ चुकाना चाहिए था यदि तुम भविष्य के लिए संकल्प करो कि मैं ठीक होने पर अपना समय और जो धनार्जन होगा उसे लोक मंगल में लगाऊँगा तो प्रार्थना कर सकता हूँ शायद तुम ठीक हो जाओ उसने संकल्प लिया कि यदि आप हमें ठीक कर देते हैं तो मैं भविष्य में जो भी कमाऊँगा उसका अधिकांश समाज की सेवा में लगाऊँगा। अपना समय भी लगाऊँगा। कथा वार्ता के माध्यम से मैं समाज सेवा कर सकता हूँ लेकिन आप मुझे ठीक कर दें तभी यह सम्भव है। गुरुदेव ने कहा कि जाओ विश्राम करो हम प्रार्थना करेंगे भगवान से। रात में १२ बजे वह व्यक्ति आया डंडालेकर के और हम लोगों के चरण छुआ उने कहा हमें परम पूज्य गुरुदेव ने ठीक कर दिया है आज में कुछ चल पा रहा हूँ। हम लोगों ने देखा वह हँसते हुए आया था और जितने आश्रम में लोग ठहरे थे सबके पैरों में माथा टेका था। प्रातःकाल जब गुरुदेव आए तो उनके चरणों में गिर पड़ा बोला गुरुदेव आपने हमें खड़ा कर दिया है अब अगर हम और ठीक हो जाए तो आपकी बड़ी कृपा होगी। गुरुदेव ने कहा आज तुमको वृन्दावन तक पैदल जाना है। वहाँ से पैदल आना है। सवारी नहीं करना तुम्हें शक्ति मिल जाएगी। लेकिन तुमने जो संकल्प लिया है उसे तुम याद रखना। वह व्यक्ति पैदल गया और पैदल आया हम लोगों ने अपनी आँखों से देखा।परम पूज्य गुरुदेव ने उस दिन अपने प्रवचन में कहा था कि हम चमत्कार तो नहीं करते हैं लेकिन दीन-दुखी आदमी कोई आता है और उसके दर्द को मैं देखता हूँ तो मैं अपनी तप की पूँजी लगाकर और उसकी सहायता करता हूँ यह मेरा स्वभाव है अब वह कुछ करता है तो ठीक है नहीं करता है तो ठीक है। हमने अपना काम किया।

सन् १९६५ की बात है जब मैंने परम पूज्य गुरुदेव से निवेदन किया कि आप सुल्तानपुर कृपा करके पधारे मैं प्रचार के दृष्टिकोण से एक कार्यक्रम करना चाहता हूँ परम पूज्य गुरुदेव ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। उस समय तक मुझे पाँच वर्ष जुड़े हुए हुआ था। मैं केवल उन्हें अपना गुरु मानता था।मुझे भान नहीं था कि यह भगवान के अवतार है। मैंने गुरु मानकर एक कुण्डीय गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया। रामलीला मैदान में। परम पूज्य गुरुदेव सायंकाल अकेले गाड़ी से पहुँचे हम आगे ढूढ़ते रहे गुरुदेव अपना बिस्तर लेकर नीचे खड़े थे हमने देखा अकेले हैं हम लोगों ने जयकारा लगाया गुरुदेव का उनको लेकर बाहर आए बाहर गाड़ी खड़ी थी लेकर हम लोग गए विद्यार्थी प्रेस वहीं करीब था विद्यार्थी जी जो रहते है शान्तिकुँज मं उनके पिताजी ने कहा था कि हम पहले स्वागत करेंगे गुरुजी का उसके बाद आवास पर ले जाना। वहाँ हमने गाड़ी रोक दिया परम पूज्य गुरुदेव से कहा गुरुदेव जी यहाँ आपका कुछ स्वागत होगा। गुरुदेव ने कहा नहीं स्वागत की कोई जरूरत नहीं है यहाँ क्या करना है। हमने कहाँ यहाँ कुछ नास्ता कर लेना फिर आगे चलना है परम पूज्य गुरुदेव ने कहा नास्ता देखा उन्हांने तमाम तस्तरियाँ लगी हुई थीं। गुरुदेव ने कहा यहाँ नास्ता वास्ता कुछ नहीं करूंगा जहाँ मुझे रुकना है वहाँ ले चलो। वहाँ चलकर के पहले नहाऊगा धोऊंगा संध्या करूंगा उसके बाद कुछ नास्ता करूंगा। परम पूज्य गुरुदेव को वहाँ ले गए जहाँ उनके लिए रुकने का स्थान बनाया गया था। बाबूरामचंद्र अग्रवााल के यहाँ। वहाँ पर परम पूज्य गुरुदेव रुके दो दिन कार्यक्रम हुआ। उपस्थित तो दो चार सौ की रही उस समय। पर दो तीन कालोनियों में गुरुदेव का प्रवचन करवाया। कार्यक्रम समाप्त हुआ तो गुरुदेव को लेकर के स्टेशन पर बिठालने गए। उस समय फर्स्ट, सेकेण्ड, थर्ड चलता था। सेकेण्ड क्लास का टिकिट मैंने ले लिया। हमने सोचा फर्स्ट क्लास में चढ़ेंगे नहीं, थर्ड में भीड़ होती है सेकेण्ड क्लास में ठीक रहेगा और जब गाड़ीआई तो हमने स्वयं सेवकों से कहा कि भाई गुरुदेव का सामान सेकेण्ड क्लास में ला दो। उन्होंने कहा सेकेण्ड क्यों थर्ड में ला दो। गुरुदेव से हमने कहा गुरुदेव टिकिट लीजिए सेकेण्ड क्लास का टिकिट है आपका आराम से जाना आप। उन्होंने कहा नहीं मैं थर्ड में जाऊँगा जाकर सेकेण्ड क्लास का टिकिट बदलकर थर्ड क्लास का ले आओ। हमने कहा गुरु देव हम दे रहे हैं इसमें आपको क्या परेशानी है उन्होंने कहा नहीं नहीं तुम टिकिट लाओ बदलकर के मैं नया टिकिट बदलकर ले आया। गाड़ी में उनके साथ फैजाबाद तक गया। उनने बताया देखो इसलिए मैंने तुमसे टिकिट बदलवाया कि मैं जनसेवक हूँ। जनसेवक जनता से ऊपर अपना स्तर बनाता है खाने, पीने चलने का तो जनसेवक नहीं कहा जाएगा वह जनमालिक हो जाएगा। गाँधी का उदाहरण भी उनने दिया कि गाँधी जी हमेशा थर्ड क्लास में चलते थे और बहुत कम कपड़ा पहनते थे इसलिए कि जनता के स्तर से कम रहना चाहते थे। जनसेवक हम हैं और हम जनता के स्तर से नीचा स्तर हम रखते हैं जिससे कि हम सेवा कर सकें और भाव बना रहे। उस समय हमें भान हुआ कि परम पूज्य गुरुदेव एक गुरुसत्ता ही नहीं हैं यह एक उच्चकोटि के जनसेवक भी हैं।

१९८४ ३१ जनवरी को मैं रेलवे से रिटायर हुआ। अप्रैल में मैं शान्तिकुँज एक महीने के शिविर में आया परम पूज्य गुरुदेव ने मुझे ऊपर बुलाया अपने पास और मुझसे पूछा कि तुम्हारी क्या लायबिलिटी हैं। मैंने कहा दो बच्चे हमारे एम्पलायड हो चुके हैं तीन बच्चे पढ़ रहे हैं। दो लड़कियों में एक लड़की की शादी मैंने कर दी है एक छोटी बच्ची नाइंथ क्लास में पढ़ रही है। गुरुदेव ने थोड़ा सा सोचा और फिर कहने लगे बेटा तुम तो यहाँ आ जाओ शान्तिकुँज और मैं तुम्हारे बच्चों को सबको देख लूँगा। मुझे असमंजस हुआ कि लायबिलिटी बहुत हैं अगर में गुरुदेव का काम वहीं रहकर करूं। और मैंने कह भी दिया कि परम पूज्य गुरुदेव यदि आपकी आज्ञा हो तो अयोध्याशक्ति पीठ बन रही है मैँ वहाँ रहकर के काम भी करूं और थोड़ा बाालबच्चों की देखभाल भी कर लूं साल दो साल और। गुरुदेव ने कहा क्या तू अपनी सामर्थ से कर लेगा सब काम। मुझे तुरन्त ध्यान आया कि मैं गलत बात कर रहा हूँ। मैंने कहा नहीं गुरुदेव आपकी कृपा से ही सम्भव होगा। तो उन्होंने कहा कि जब मेरी कृपा से होगा तो जो मैं कह रहा हूँ वह कर। मैने कहा गुरुदेव मैं आज से ही आपके चरणों में आ गया। बोले तू यहीं रह जा उसी समय वीरेश्वर उपाध्याय जी पहुँच गए और उन्होंने उनसे कहा कि उपाध्याय यह तिवारी गार्ड यही रहेगा इसको कमरा दो और यह छुट्टी लेकर घर जाएगा। मैं उनके साथ आ गया। यहाँ दो-तीन महीने रहने के बाद मुझे टोली में भेजा गया। बिलासपुर म०प्र० मैं गया। ९ महीने मैं टोलियों में रहा। ९ महीने टोलियों में रहने के बाद जब मैं लौटा तो १० दिन यहाँ रहने के बाद छुट्टी लिया और एक महीने के लिए घर गया चिट्ठियाँ घर से आती रहती थीं सब काम ठीक चल रहा था। जब घर गया तो पता चला कि दो लड़के हमारे हमारी अनुपस्थिति में ही एम्पलायड हो चुके हैं एक लड़के का इंटरव्यू हो गया है और बाद में वह भी एम्पलायड हो गया। तीनों बच्चे सन् ८५ में एम्पलायड हो गए। पाँचों लड़के सुलतानपुर में ही एक ही जगह नौकर हैं। और जो छोटी बच्ची थी उसके लिए मैँ फिर आया दोबारा यहाँ ८५ में और ८६ में गया तो हमारे सहयोगी जो रेलवे में गार्ड थे उन्होंने अपने आप आफर किया कि हमारा भतीजा है उसके साथ आप अपनी बच्ची की शादी कर सकते हैं और उन्होंने बिना किसी माँग के हमारी बच्ची की शादी कर ली और गुरुकृपा से ही वह शादी ८६ के अन्त में सम्पन्न हो गई। इस प्रकार मुझे पूरी लायबिलिटी से सन् १९८६ में छुट्टी मिल गई। यह मैं परम पूज्य गुरुदेव की ही अहैतुकी कृपा मानता हूँ।

फरवरी सन् १९९५ मैं फैजाबाद से सुल्तानपुर ट्रेन में जा रहा था करीब दो बजे ट्रेन पहुँची स्टेशन पर मेरी तबियत कुछ गम्भीर जरूर मुझे लग रही थी लेकिन अहसास नहीं था लेकिन जब उठने लगा गाड़ी से तो लगा कि मैं गिर पड़ृंगा। मैँ बैठ गया सीट पर और मुझे ऐसा लगा कि मुझे पेरालायसिस का अटैक हो गया है लेकिन मैं होश में था फिर मैं १५ मिनिट तक गायत्री मंत्र का मानसिक जप करता रहा। सारे मुसाफिर गाड़ी से उतर गए। कोई नहीं रहा गाड़ी में १५ मिनिट के बाद में गाड़ी पकड़कर धाीरे धाीरे नीचे उतरा और नीचे एक गार्ड बाक्स पड़ा था उस पर बैठ गया और बैठकर के मैं फिर ध्यान करने लगा। और परम पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना करने लगा। पाँच हजार रुपये उस समय मेरे पास थे पोर्टर आया रेलवे का मैने उससे कहा कि स्टेशन मास्टर को बुला दो रिटायर गार्ड हैं उनको पैरालायसिस हो गया है आपको बुला रहे हैं। पोर्टर गया स्टेशन पर सूचना दिया एएसएम दौड़ा आया और उसने कहा कहिए बाबूजी क्या सहायता की जाए आपकी। हमने कहा भैया मुझे पैरालासिस सा हो गया है मैं उठ नहीं पा रहा हूँ डाक्टर बुलादो रेलवे डाक्टर बुलाया गया। डाक्टर भी मेरा परिचित था एक कार्ड का लड़का था वह। उसने कहा बाबूजी मैं दवा दे रहा हूँ पर आपको तुरन्त एडमिट होना चाहिए हास्पिटिल में वह मुझको ले गए और जिला चिकित्सालय में भर्ती करा दिया और मेरे घर सूचना दिया। बच्चे आ गए वहाँ मेडीकल एड मुझे मिली और मेडीकल एड के बाद तीसरे दिन मुझे डिस्चार्ज किया गया वहाँ से। बोले कंट्रोल में हो गया है लेकिन इसकी दवा करनी पड़ेगी अब घर भी जा सकते है। मैं घर गया डाक्टर ने लखनऊ रिफर किया वहाँ जो मेरा टेस्ट हुआ डायग्रोस्टिक सेंटर में ब्रेन का तो डाक्टरों ने रिपोर्ट में लिखा कि ब्रेन में खून के थक्के जम गए थे ब्रेन हेमरेज की शिकायत थी लेकिन वह जमने के साथ-साथ खून का जो रिसाव हुआ उसके साथ-साथ वह खुल भी गए कुछ देर बाद यदि न खुलते तो डेथ की सम्भावना थी। और डाक्टरों ने रिक्मंड किया कि ब्रेनहेमरेज के साथ पैरालायसिस हो गयाथा डयू टू हाई ब्लड प्रेशर। डाक्टरों ने बताया कि इस बीमारी में ९५ प्रतिशत लोग बचते नहीं हैं लेकिन आप दैवी कृपा से बच गए। हमने कहा दैवी कृपा परम पूज्य गुरुदेव की कृपा। मैं अहसास कर रहा हूँ कि उनको कुछ काम अभी लेना है इसलिए उनने यह कृपा की है। मैं चल फिर रहा हूँ। अपना काम कर रहा हूँ। पैर तो नार्मल नहीं होंगे क्योंकि एज का सवाल है दवा भी चल रही है लेकिन कोई काम मेरा रुका नहीं है। परिव्राजक के रूप में काम भी कर रहा हूँ और घर भी जाता हूँ। सारे काम हो रहे हैं शान्तिकुँज भी आता हूँ कोई दिक्कत नहीं है। यह गुरुदेव की ही कृपा है। पहले जब मैं जुड़ा तो गुरुदेव को मैं एक अच्छा गुरु मानता था मैं गुरु की तलाश में था और दसियों वर्ष इधर-उधर भटका गुरु मिले हमारे खानदानी गुरु भी हैं। अयोध्या के हैं लेकिन हमने वहाँ दीक्षा लेना पसन्द नहीं किया क्योंकि हमें वह स्तर के नहीं दिखाई पड़े। जब मैं मथुरा आया था तो मै यह सोचकर आया था कि पहले ट्रायल करूंगा कि यह भी वैसे ही गुरु है जैसे काशी, मथुरा, बनारस में होते हैं या उनसे भिन्न है अखण्ड ज्योति पढ़ने के बाद ही मैं आया था। अखण्ड ज्योति पढ़ने के बाद लगा कि विद्वान हैं सन्त है। मैं तपोभूमि गया तो चार दिन रहा मैं जब गया तो प्रवचन चल रहा था उसका समापन चल रहा था। मैं प्रवचन हाल के द्वार पर खड़ा हो गया। गुरुदेव मंच से उतरे और आए उन्होंने पीछे से मेरे कन्धे पर हाथ रख दिया और पूछा बेटे कहाँ से आ रहे हो उनके हाथ रखते ही बहुत शान्ति मिली और ऐसा लगा कि बहुत ही आत्मीय से मुलाकात हो रही है बहुत ही सुख की अनुभूति हुई। फिर गुरुदेव को बताया में सुल्तानपुर से आ रहा हूँ ऐसे ही घूमने फिरने आया हूँ आपके यहाँ रहना चाहता हूँ। उन्होंने कहा ठीक है कमरा उनने दिलवा दिया। उन्होने कहा भोजन करो मैं शाम को आऊँगा पाँच बजे फिर बात करूंगा। पाँच बजे गुरुदेव आए बातचीत हुई फिर मैं चार दिन वहाँ रुका। और चार दिन रहने के बाद मैंने बहुत करीब से देखा उनका व्यवहार, बर्ताव, प्यार वह भुलाया नहीं जा सकता है और हमने स्वीकार किया ऐसा गुरु और मिल नहीं सकता है और हमें इनसे दीक्षा ले लेनी चाहिए। मैंने प्रार्थना की गुरुदेव से कि दीक्षा हम लेना चाहते हैं उसमें क्या खर्च आऐगा क्या हमें करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कुछ नहीं करना पड़ेगा गुरुवार को दीक्षा होगी सामूहिकपरसों हैं गुरुवार उसमें बैठ जाना हमने कहा आपके लिए कपड़े, बर्तन कुछलिया जाता है बोले कुछ नहीं जो कुछ देना हो वहाँ दे देना रसीद ले लेना वह समाज के काम आऐगा यदि देना है तो लेकिन कोई अनिवार्यता नहीं है। अपने लिए भी तुम भी जो धोती कुरता पहने हो इसी में आ जाना साफ करके सुबह सात बजे दीक्षा देंगे। दीक्षा ली गुरुदेव ने कहा एक बुराई छोड़ना पड़ेगी दीक्षा में। मैं नहीं समझ पा रहा था कि कौन सी बुराई छोड़ू बुराइयाँ तो भयंकर थीं जीवन में। हमने गुरुदेव से ही पूछा आपही बतावें गुरुदेव कौन सी बुराई छोड़ू। बुराइयाँ बहुत है और छोड़ने में कठिनाई मालुम पड़ रही है। गुरुदेव ने कहा तुम झूठा छोड़ते हो मैंने कहा हाँ गुरुदेव कभी कभी छोड़ देता हूँ गुरुदेव ने कहा नहीं भोजन उतना ही लो जितना खा सको। भोजन में जूठा छोड़ना गुनाह है। यही छोड़ो इसमें क्या दिक्कत है मैंने कहा कोई दिक्कत नहीं है। एक बुराई छोड़ने का फल यह हुआ कि हर साल एक बुराई छूटती चली गई। उसमें आनन्द आता रहा और धीरे-धीरे मैं गुरुदेव के करीब आता रहा। गुरुदेव को सुल्तानपुर भी ले गया एक रिक्शे पर दोनों चले हैं साथ-साथ बातचीत करते हुए और जहाँ हम ले गए वहाँ गुरुदेव गए। अनुशासन देखा उनका अपने मन से किसी के घर भी नहीं जाते थे कोई कितना भी उनसे रिक्वेस्ट करे। यह सब देखते हुए परम पूज्य गुरुदेव से हम जुड़ते गए। घनिष्ठत होती गई। और हमने आगे चलकर देखा कि गुरुदेव जो कुछ प्रवचन में कहते थे वह सब होता हुआ हमको दिखाई पड़ता था। बहुत दिनों का अनुभव यह बताने लगा कि परम पूज्य गुरुदेव कोई व्यक्ति नहीं है एक शक्ति के रूप में आए हुए हैं और जो कुछ भी उनका संकल्प है वह अवश्य पूरा होगा। सन् ६० में जब मैं जुड़ा था एक छोटा सा मिशन था बहुत कम लोग थे तीन रुपया चंदा अखण्ड ज्योति का था हजारों में ही संख्या रही होगी उसकी लेकिन फिर वह बढ़ती चली गई और मत्स्यावतार की लीला हुई मिशन के साथ में। और हम लोगों को अनुभूतियाँ हो रही है कि पवरम पूज्य गुरुदेव युगऋषि युगदृष्टा इस परिवर्तन के महाकाल हैं पूर्ण विश्वास हो गया है। यही नहीं टोलियों में गया वहाँ अनेकों लोगों ने अपनी अनुभूतियाँ बताई कि गुरुदेव से उन्हें क्या मिला। कितने लोग लाभान्वित हुए है। कितनों को सन्तान मिली जो निस्सन्तान थे। कितने लोगों की शादियाँ जैसी वह चाहते थे वैसी हो गई। धनवान तो न जाने कितने लोगों को गुरुदेव ने बना दिया। लोग मिशन को भूल जरूर गए हैं धन पाकर लेकिन याद तो करते ही है कि धन गुरुदेव का दिया हुआ है। और टोलियाँ जब जाती थी तो हम लोगों की सेवा तो वह करते थे और कहते थे कि यह गुरुदेव का दिया है बच्चे गुरुदेव के दिए हैं। सभी लोग कहते हैं जहाँ जिस प्रदेश में गए। मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र बिहार, उ०प्र० एक व्यक्ति का इतना वर्चस्व बढ़ता हुआ चला जाए हमने अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी अनुभव किया जितनी घनिष्ठता बढ़ती गई समर्पण बढ़ता गया उतना अनुदान मिलता चला गया घाटे में नहीं रहे और चारों तरफ उनका जस फैलता हुआ चला जा रहा है। वह महाकाल है, युगदृष्टा है, युगऋषि हैं। ऋषियुग्म है दोनों माता-पिता यह पूर्ण विश्वास है। पूर्ण आशा भी है कि गुरुदेव ने जो कुछ कहा है वह हम लोगों को दिखाई भी पड़ेगा।

श्री रामचंद्र अग्रवाल उम्र ५९ वर्ष प्रमुख ट्रस्टी सुलतानपुर शक्तिपीठ उ०प्र०

सन् १९६३ में परम पूज्य गुरुदेव से साक्षात्कार हुआ। उनकी अखण्ड ज्योति से प्रभावित होकर मैं सपत्नीक गायत्री तपोभूमि मथुरा गया और १५ अगस्त को परम पूज्य गुरुदेव से दीक्षा ली। इसके बाद मैं साल में एक बार बराबर गायत्री तपोभूमि जाता रहा सन् १९६४ में परम पूज्य गुरुदेव ने हमको एक माह के लिए चांद्रायण व्रत में बुलाया में उसमें गया और परम पूज्य गुरुदेव से सुलतानपुर आने की प्रार्थना की। गुरुदेव ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। मैंने गुरुदेव से कहा गुरुजी आपके लिए वहाँ क्या व्यवस्था करें गुरुदेव ने कहा तुम्हारे यहाँ रहेंगे तुम जो कुछ खाते हो वह खिला देना और कुछ विशेष व्यवस्था करने की आवश्यकता नहीं है। उस समय हमारे सुलतानपुर में कुल चार-पाँच परिजन थे।

श्री उत्तमचंद अस्थाना, आगरा

आगरा में अध्यापक था उसी समय मैंने गायत्री महाविज्ञान प्रथम भाग पढ़ा। उसे पढ़कर हमें लगा कि यह महान सत्ता हैं इनसे हमें दीक्षा लेनी चाहिए। मैंने पत्र डाला गुरुदेव का उत्तर आया सम्भवतः गायत्री माता तुम्हारा कल्याण करेगी। नवरात्रियों का अनुष्ठान चल रहा था उसी समय मैं पहुँचा। सुबह के समय ९ बजे कई प्रान्तों के लोग खड़े थे वहाँ पर मैं उनके बीच में बातचीत कर रहा था गुरुदेव के बारे में उसी समय गुरुदेव आए औरआकर के तुरन्त मेरे पास आए बोले बेटा तुम्हीं आए हो आगरा से तो मैं आश्चर्य में रह गया कि इतने लोगों के बीच में मुझे कैसे पहचान लिया। बहुत से लोग आए हैं। बोले तुम्हारी गुरु दीक्षा अभी हो जाएगी। बस उन्होंने मुझे बैठाया यज्ञ में और गुरुदीक्षा दी अपने मुख से। फिर तीन चार दिन में और रहा एक विपद निवारणी गायत्री पुस्तक में ले गया उसे पढ़ने के बाद लगा कि कितनी सूक्ष्म दृष्टि उनकी थी और गायत्री के बारे में कितना विवेचन उसमें भर दिया था उससे प्रभावित हुए। उसी समय हमें मालुम हुआ कि अखण्ड ज्योति पत्रिका निकलती है। अखण्ड ज्योति पत्रिका के सदस्य बने फिर उसके बाद में प्रचार करते रहे और लोगों को जोड़ते रहे उनकी शक्त् िहमें मिलती रही।

एक बार शान्तिकुँज चांद्रायण शिविर में आए थे उसी समय एक व्यक्ति आए और कहा कि गुरुदेव हमारे यहाँ पाँच कुण्डीय यज्ञ चल रहा है कोई परिव्राजक भेज दीजिए। गुरुदेव ने मुझे बुलाया मैं डर गया उसके दिन एक घटना हुई थी म०प्र० एक एक व्यक्ति चांद्रायण व्रत में गलती कर रहा था पूरा भोजन ले रहा था गुरुदेव ने उसे बहुत डाँटा था सबके सामने। मैंने सोचा कहीं मेरे से भी तो कोई गलती नहीं हो रही है तो मैं डरते डरते गया गुरुदेव ने कहा बेटे तुम पाँच कुण्डीय गायत्री यज्ञ करा आओ। मैंने कहा गुरुदेव मैं तो चांद्रायण व्रत कर रहा हूँ गुरुदेव ने कहा बेटे मैं तेरे साथ हूँ तेरा चांद्रायण व्रत चलता रहेगा मैं वहाँ गया तो बड़ी सफलता से गुरुदेव की शक्ति से कार्य करते रहे दो बज गए लोग उठे ही नहंी वहाँ लोग कहने लगे कि गंगा के किनारे इतना बड़ा तीर्थ शान्तिकुँज हो गया है और हमें पता ही नहीं चला तो दूसरे दिन वह सब लोग फिर वह आए शिविर की स्वीकृति लेने और दूसरे दिन उन्होंने फिर रख लिया। फिर वह पहुँचे परिव्राजक के लिए गुरुदेव ने फिर बुलाया मुझे। गुरुदेव ने कहा बेटे आज फिर चले जाओ। तो मैंने गुरुदेव से थोड़ी बनाकरबात बोली कि गुरुदेव वहाँ तो थोड़े से ही व्यक्ति थे। तो गुरुदेव हँसते हुए बोले अरे बेटा एक कथा कहने वाला एक सुनने वाला कागभुसुण्ड कहने वाले गरुण सुनने वाले तो कथा हो गई कि नहीं। वहाँ एक से तो ज्यादा ही होंगे तो मैं रह गया और फिर गया वहाँ गुरुदेव की शक्ति का चमत्कार मैंने देखा उससे बहुत लोग जुड़े। पढ़े लिखे व्यक्ति थे उन्हें आश्चर्य हुआ हमने कहा गुरुदेव कीशक्ति कार्य कर रही है हम तो सन्देशवाहक मात्र हैं।

गुरुदेव शान्तिकुँज में बैठे हुए थे हम लोगों से बोले भाई हमें समयदान की जरूरत है कौन-कौन देंगे। हम सबने हाथ उठा दिया। तो हम समयदान में पहली बार आगरा से निकले और कोटा में पहुँचे। कोटा में शाम के समय हम सोच रहे थे कि कहाँ ठहरा जाए हमें कोई अनुभव भी नहीं था कि कैसे ठहरा जाता है तो सोच ही रहे थे कि एक लम्बा आदमी आया और बोला कि बेटा ये जो चाय वाले की बगल में दुकान है उसमें मत ठहरना यह आदमी को मार भी देता है और लूट भी लेता है। वहाँ से दो दुकान छोड़कर रुकना वहाँ तुम्हारी व्यवस्था हो जाएगी व्यवस्था कर दी गई है। अब मैंने सोचा कि मैंने तो अपने मुँह से एक शब्द भी नहीं निकाला यह कैसे बता रहे हैं मैं उनकी तरफ देखने लगा इतने में ही वह गायब हो गए। मैंने सोच लिया कि गुरुदेव ही साक्षात् आ गए मुझे दिशा देने के लिए और जब निर्दिष्ट स्थान में जब मैं पहुँचा तो उस व्यक्ति ने बड़ा मेरा आदर किया और बड़ी सहूलियत दी। मैं जब बिस्तर खोलने लगा तो उसने कहा पण्डित जी बिस्तर मत खोलिए हम आपसे पैसे नहीं लेंगे आपके बिस्तर की व्यवस्था कर दी गई है। मैंने सोचा यह भी बहुत अच्छा आदमी निकला। सब व्यवस्था बताकर वह चला गया। सुबह आया तो थोड़े से पैसे उसने लिए। हमारी बस सामने खड़ी हो गई तो उसमें बैठाल दिया उसने। तो हमने गुरुदेव का आभार माना कि हम नई यात्रा में आए हैं गुरुदेव कितनी सहायता कर रहे हैं। हमारे साथ-साथ चल रहे हैं। तो पहुँचे वहाँ पर विवाह संस्कार के लिए तो पहली बार हमें तीन कालेज को अटैण्ड करना पड़ा दो इंटर कालेज थे एक डिगरी कालेज था। तो डिगरी कालेज में डेढ़ घण्टा बोले अध्यात्म के ऊपर प्रिंसपल बोले पण्डित जी आपको स्वयंसेवकों की जरूरत पड़ेगी हमने कहा पड़ेगी साहब तो बोले हम आपको स्वयंसेवक देंगे और यह उद्देश्य जो आपने बताया है बड़ी अच्छीतरह समझाया आज तक किसी ने समझाया ही नहीं जो श्रीराम शर्मा जी आपके माध्यम से समझा रहे हैं। उसी समय पण्डितों ने हमारी घेराबन्दी कर दी हमने गणेश पूजन करा दी और दक्षिणा कुछ ली नहीं। वह नाराज होकर हमारे पास आए हमारा नाम पूछा गुरुदेव ने हमसे पहले ही बता दिया था कि बेटे अपनी जात नहीं बताना गोत्र हमारा भारद्वाज है गोत्र अपना भारद्वाज बताना। तो हमने बताया कि हमारा नाम उत्तम चंद शर्मा है। बोले आप कौन से ब्राह्मण है हमने कहा सनाड्यब्राह्मण हैं बोले आप तो बहुत ऊँचे ब्राह्मण हैं। अगला प्रश्र करने से पहले हमने बता दिया कि भारद्वाज गोत्र है। बोले अरे ऐसा है हमने कहा बाहर जब किसी आदमी को भेजा जाता है तो किसी समझदार आदमी को भेजा जाता है आपकी क्या दिक्कत है आप बताइये हमें बोले साहब आपने दक्षिणा नहीं दिलवाई हमे तो हमने कहा दक्षिणा हमने ही कहाँ ली है तुमसे। कहने लगे नहीं ब्राह्मण को पहले दक्षिणा देना चाहिए हमने कहा भिखारी लेता है पहले ब्राह्मण देता है समाज को फिर समाज ब्राह्मण को देता है यह श्रद्धा का प्रश्र है। लेनदेन नहीं है। बोले एकाध दो रुपया। हमने कहा एकाध दो रुपये से होगा क्या किराया भाड़ा खर्च करके आए हो ४१ रुपया मिलेगा आपको अरे बोले पण्डित जी इतना दोगे हमने कहा हमने तो इतना ही सोचा है आपको तो माँगना भी नहीं आता फिर हमने कहा चलिए कलश पूजन हमारी तुम्हारी संयुक्त जिम्मेदारी है हमारी अकेले की नहीं है क्योंकि दक्षिणा तुम्हें भी मिलनी है। चलो देखे कोई गलती हो गई हो कोई भूल रह गई हो तो आपस में मिलकर काम करें। वह गए हर कलश का ढक्कन उठाते चले गए। देखा कि उसमें तो पूजन हुआ है। वकील साहब से कह रहे थे कि पूजन ही नही कराया।वकील साहब बोले पूजन हो रहा है कि नहीं बोले पूजन हो रहा है। हमने कहा वकील साहब इनसे पूछिए कि हल्दी और दूर्वा क्यों रखी हुई है। पण्डित बोले भाई हम तो जानते नहीं है तो वकील साहब ने बड़ी फटकार लगाई पण्डितों को कि तुमने व्यर्थ में शान्तिकुँज के पण्डित जी की शिकायत की और तुम्हें यह भी पता नहीं है कि यह हल्दी और दूर्वा क्यों डाली जाती है। उसी समय हमने वकील साहब को कह दिया कि इन बूढ़े तोतों को हम एक को भी नहीं लेंगे। एक लड़का कक्षा सात पास है इसको हम प्रशिक्षण देंगे और उसको लेंगे। फिर हम कालेज के विद्यार्थियों को लेकर के बहुत भीड़ थी उस समय राजस्थान के मिनिस्टर उद्घाटन करने के लिए आए थे जब हम व्याख्या कर रहे थे तो उस व्याख्या से बड़े द्रवित हुए उन्होंने कहा हमारी भारतीय संस्कृति इतनी महान इतनी ऊँची है किसी पण्डित ने नहीं बताया आज तक। उसी समय वकील साहब हमारे हाथ थपथपनाने लगे उनको लगा कि भाई जल्दी करें। हमने कहा वकील साहब यहाँ दो जिन्दा आदमियों की बेल्डिंग हो रही है इसमें थोड़ा टाइम लगेगा उस समय हमने बहुत अच्छे ढंग से व्याख्या की गुरुदेव की शक्ति टपक रही थी बड़े शान्ति के साथ में सभी लोग सुन रहे थे जब कार्यक्रम हो गया तो मिनिस्टर ने वकील साहब को फटकार दिया कि पण्डित जी का हाथ क्यों हिलाया इतनी अच्छी व्याख्या हम सुन रहे हैं उसको क्या शार्ट कर दे तो फिर बाद में जब कार्यक्रम हो गया तो कालेज के प्रोफेसर वगैरह सब आए। बोले पण्डित जी आपने बहुत अच्छे ढंग से कार्यक्रम कराया हमारे दो कालेज और हैं उनको भी आप कल करा दें।

हमारे पास समय था तो हम गए। उन्होंने बताया कि यहाँ सतोषी माता चल रही हैं। हमसे पूछा सन्तोषी माता काक्या इतिहास है। तो हमने बताया कि सन्तोषी माता कोई माता नहीं है। वहाँ लड़के लड़कियों ने कहा किआज हमारी भ्रान्ति दूर हुई हम बेकार में समय बर्बाद कर रहे थे और पूजा पद्धति को लिपटाये हुए थे। हमने गायत्री मंत्र के बारे में उन्हें बताया कि गायत्री मंत्र एक वैज्ञानिक मंत्र है। यह साधना हमेशा से होती आई है इस तरह से लोग बड़े प्रभावित हुए।

गुरुदेव ने ९ कुण्डीय और २५ कुण्डीय गायत्री यज्ञ करने का संकल्प घोषित किया था। २५ कुण्डीय गायत्री यज्ञ के लिए अलग तिथियाँ रखी थीं उन्होंने और ९ कुण्डीय गायत्री यज्ञ के लिए अलग तिथियाँ रखी थीं। लेकिन ऊहापोह में २५ कुण्डीय गायत्री यज्ञ की तिथियाँ निकल चुकी थीं। हमने लोगों ने कहा कि तुम और एक व्यक्ति चले जाओ तुम गुरुदेव के निकट हो और ९ कुण्डीय गायत्री यज्ञ का संकल्प लेकर चले आओ। हम दोनों यहाँ आए तो पण्डित लीलापत प्रवचन में बता रहे थे कि झुनझुना से खेलने आए हो ९ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ गुरुदेव की शक्ति को पहचानते नहीं हो तुम पच्चीस कुण्डीय का ले जाओ तो हमने उसी समय पच्चीस कुण्डीय का बदल दिया संकल्प गुरुदेव से जाकर कह भी दिया। हमारे साथ जो भाई आए थे उन्होंने विरोध किया कि गुरुदेव हम तो ९ कुण्डीय का संकल्प लेने आए थे गुरुदेव ने कहा ९ कुण्डीय नहीं २५ कुण्डीय का तुमने संकल्प ले लिया है यही करो तो कहने लगे आपतो इन्हीं की बात मानते हो हमारी नहीं तो गुरुदेव ने कहा बेटा यह अपने पैरों पर चलने लगा है और तू अभी बच्चा है तो बच्चे को गोदी में खिलाया जाता है। फिर गुरुदेव ने मुझे अलग से बुलाकर कहा कि बेटा तू सबको इकट्ठा करके बता बस देना कि हम पच्चीस कुण्डीय का संकल्प लेकर आए हैं। तो तेरा सफल हो जाएगा हमने ऐसा ही किया आगरा में मन्दिर में सब लोगों को बुलाया जिले के कार्यकर्ताओं को और शहर के सब लोगों को बुलाकर कहा २५ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ का संकल्प गुरुदेव की सहमति से लेकर आए हैं गुरुदेव ने बता दिया है। तो सबने कहा जब गुरुदेव ने बता दिया है तो फिर हम करेंगे तीन पहले एक कुलश्रेष्ठ थे उन्होंने कहा अभी भी बदल दो ९ कुण्डीय में। यह सामान नहीं आ रहा है रुपया नहीं आ रहा है मैंने कहा आप निष्ठा से काम करते रहें गुरुदेव के भरोसे यह गुरुदेव का है यह आप अपने ऊपर लेंगे तो नहीं काम पूरा होगा। यह छोड़ देंगे गुरुदेव की शक्ति है गुरुदेव का कार्यक्रम हैं इसी भावना से काम करें। इसी भावना से लोगों ने काम किया तो इतनी अपार भीड़ हुई कि ऐसा मालुम पड़ा कि सारा आगरा टूट पड़ा हो। जितना हमने प्रचार किया उससे कई गुना लोगों ने भागीदारी की उसमें और कई लोगों ने तो धोती का अंबार लगा दिया कि भाई धोती आप हमारी लेते जाइये पेंट उतार जाइये फिर प्रसाद कम पड़ रहा था तो लोग आए बोले क्या प्रसाद बनेगा बोले प्रसाद हमारी तरफ से बनेगा। बाद में बहुत प्रसाद बचा। हमने कहा गुरुदेव की शक्ति वाला कार्यक्रम जो रखा जाता है तो अपने ऊपर जो आदमी लेता है तो मनुष्य की सामर्थ सीमित होती है और भगवान की असीमित होती है। भगवान का कार्य समझकर जो कार्य किया जाता है वह इसी तरह से सफल होता है।

गुरुदेव मथुरा से जयपुर जा रहे थे यहाँ आगरा से मैं भी जा रहा था। तो रास्ते में गुरुदेव से मुलाकात हो गई हमने गुरुदेव के पैर छुए गुरुदेव ने पूछा कहा जा रहे हो हमने बताया बोले नहीं बैठ गाड़ी आ जाए तब चले जाना। बैठे बातचीत करते रहे गुरुदेव अपने गुरु के बारे में बताते रहे हमे कहानी। कि किस तरह से गुरुदेव हमारे घर आए और हमें दीक्षा दी। इसी तरह से बातचीत और भी करी उन्होंने हमने कहा गुरुदेव हमारे अन्दर ऐसी टीस होती है कि हम कुछ और भी ज्यादा काम करें। तो उन्होंने कहा बेटा तूने पिछले जन्म में तो देश का बहुत बड़ा काम किया है इस जन्म में भी तू करेगा। और फिर विदेशों में भी जाएगा वहाँ भी करेंगा। इसी बीच में एक लड़के से मेरा सम्पर्क हो गया था वह बड़ा दुखी था। गुरुदेव इसी बीच बोले कि बेटे इस लड़के को बुलाकर ला तू यह बहुत दुखी है। मैंने गुरुदेव से उसके बारे में एक शब्द भी नहीं कहा था और गुरुदेव ने स्वयं कहा कि इस लड़के को बुलाकर लाओ। मैं बुलाकर लाया गुरुदेव ने कहा बेटा तू दुखी क्यों है। तुझे ड्यूटी पर ले लिया जायेगा तू दुखी मत हो। उसने कहा कैसे विश्वास हो मैंने बताया कि तुम अखण्ड ज्योति मंगाते हो यही अखण्ड ज्योति भेजते हैं ये ही अखण्ड ज्योति लिखते भी हैं वह लड़का गुरुदेव के पैरों में गिर पड़ा मेरे कहा आपने बड़ा अच्छा सम्पर्क कराया। इसी बीच मैंने गुरुदेव से कहा कि गुरुदेव हमारा पड़ौसी है उसके सन्तान नहीं है उससे हमने बोला तो वह बोला हम तो नहीं जाते हैं। गुरुदेव ने कहा कि बेटा उससे कह देना कि तुम्हारा लड़का होगा। गुरुदेव की गाड़ी जब चली गई तो हम अपने गाँव आए उससे बताया कि गुरुदेव ने कहा है कि तुम्हें लड़का होगा वह बोले अरे तेरा गुरुदेव ऐसा ही है कहीं लड़का वड़का नहीं होगा मेरे तो कोई सन्तान ही नहीं है। मैंने कहा नहीं होगा। एक साल बाद जब उनके यहाँ लड़का हुआ तो पूरे गाँव में प्रसिद्धि फैल गई खुशी की लहर फैल गई कि भाई उत्तमचंद के जो गुरु हैं वह वास्तव में कोई सिद्ध पुरुष मालुम पड़ते हैं। देखो उनके यहाँ लड़का हो गया। वह लड़का बड़ा सुशील निकला बाद में उसने अच्छे काम किए। इसी के साथ साथ एक प्रोफेसर थे उनके भी कोई सन्तान नहीं थी। हम उनको साहित्य पढ़ाते रहे। हमने उनकी पत्नी से कहा कि शान्तिकुञ्ज जाओ उनने अपने पति से कहा तो उन्होने कहा कि मैं किसी बाबाजी के पास नहीं जाता उसके दिमाग में था कि कोई बाबाजी होंगे मोटे पेट वाले जो दान दक्षिणा में पलते रहते हैं। मैंने उनको समझाया कि तुम प्रोफेसर हो मैं भी अध्यापक हूँ और फोफेसर होते हुए भी तुम्हारी बुद्धि कहा चली गई है जो इतने ऊँचे विचार दे सकते हैं वह कोई भिखमंगे हो सकते हैं। कोई बाबाजी हो सकते हैं। वह तो सादा कपड़े पहनते हैं गाँधीजी जैसे खद्दर के कपड़े पहनते हैं और बड़े अच्छे स्वभाव के हैं तुम पहचान ही नहीं सकते हो। उस साल वह नहीं गए अगले साल फिर हमने उनसे निवेदन किया तो पत्नी और वह आए हम भी आए इसके पहले उन्होंने पिताजी को भेजा तो पिताजी तो बड़े गद्गद होकर गए और मेरे से कहा कि आपने तो तुझे स्वर्ग में भेज दिया। गुरुदेव तो साक्षात् परमात्मा के अवतार हैं आपने उनके पास हमें भेज दिया उन्होंने ने भी काफी काम किया। तो गुरुदेव से से मिलने गए प्रोफेसर और उनकी पत्नी तो अपनी बात नहीं कह पाए हमने पूछा आपने अपनी बात कह ली तो बोले नहीं साहब तो हमने कहा चलो हमारे साथ तो गुरुदेव बोले कहो भाई उत्तमचंद मैंने उनक ी तरफ इशारा कर दिया कि यह हमारे साथ में आए हैं बैठो भाई बोले बालबच्चे हैं सबसे पहले उनसे यही प्रश्र किया तीन बार कहा और तीनों बार वह चुप रहे गुरुदेव हँसकर बोले अच्छा इसका मतलब है तुम्हारे कोई बच्चा नहीं है क्या करेगा बच्चा लेकर के जनसंख्या बढ़ रही है देश की रहने दो। उसके बाद हम लोग चले आए। एक साल दो महीने बाद ही उनके एक लड़का हुआ वही एक सन्तान उनकी है। तब से वह प्रोफेसर थैला लेकर के गुरुदेव का काम कर रहे हैं। उनके रिस्तेदारों में, मित्रों मे लहर पहुँच गई कि देखो भाई इनके भाई भानुप्रताप प्रोफेसर है उनके सन्तान नहीं थी १५ वर्ष से पं० श्रीराम शर्मा आचार्य के आशीर्वाद से लड़का हुआ है तो सभी वकील वगैरह सब गुरुदेव का जहाँ कार्यक्रम होता वहाँ गुरुदेव के दर्शन करने जाते यह प्रसिद्धि काफी फैली।

श्री रामवचन वर्मा सेवा निवृत्त उप जिलाधिकारी, वारावंकी

अखण्ड ज्योति के माध्यम से मिशन के सम्पर्क में १९७६ से आया। जब मैं गौंड़ा जनपद में तहसीलदार के पद पर कार्यरत था। उसी समय वहाँ कर्नेलगंज स्थान पर कुछ लोगों के सहयोग से गायत्री शक्तिपीठ की स्थापना कराई गई जिसमें प्राणप्रतिष्ठा १९८४ में हुई तभी से मैं उसका प्रबन्ध ट्रस्टी रहा और जगह जगह रहते हुए उस क्षेत्र में मिशन को आगे बढ़ाने में अपना योगदान देता रहा और शक्तिपीठ की गतिविधियों में समय-समय पर सम्मिलित भी होता रहा। जिन जनपदों में मैं रहा वहाँ भी मिशन के कार्य को जहाँ तक सम्भव हुआ मैंने उसमें सहयोग किया। वैसे तो मैने पूज्यवर का दर्शन १९८४ में कर सका राजकीय सेवा में रहते हुए अवकाश मिलता नहीं था। परन्तु उसके पूर्व से ही उनकी शक्तियों और प्रेरणाओं का आभास मुझे होता रहा था। वैसे तो पूरी में अनेको अवसर ऐसे आए जिसमें सामान्य परिस्थितियों में आदमी का धैर्य छूट जाता और उसको नुक सान भी हो सकता था परन्तु मुझे हमेशा उनका संबल मेरे दिमाग में रहता था एक प्रेरणा रहती थी जिससे मैंने सही मौके पर सही निर्णय लिए। जिससे मुझे सेवा में ३४ साल रहते हुए कोई व्यवधान नहीं आया। मैं कुछ संस्मरण जो मेरे दिमाग में हैं उद्धृत करता हूँ।

सन् १९८२ में मैं जब गौंडा जनपद में था तो उस समय सितम्बर ८ से घनघोर वारिश हो रही थी लगातार तीन दिन तक वारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी उस समय स्वप्र में मुझे कुरता धोती में एक महात्मा की शकल में एक व्यक्ति चूंकि दर्शन मैंने किए नहीं थे गुरुवर के इसलिए मुझे पूर्व पहचान तो नहीं थी लेकिन यह लगा किसी ने प्रेरणा दी कि इसमें नावें मंगाई जाना चाहिए अन्यथा स्थिति भयंकर हो सकती है। उस समय जो जिलाधिकारी महोदय थे वो उस समय इस बात से सहमत नहीं थे उनका कहना था चूंकि घाघरा में भी बाढ़ आई हुई है सारी नावें वहाँ लगी हुई हैं तो बाहर से नाव आना सम्भव नहीं होगा और कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन मैं अपने निर्णय पर दृढ़ रहा और मैंने अपनी रिस्क पर इलाहाबाद से ३६ नावें मंगाई और नौबत यह आई कि गाँव-गाँव बाढ़ आ गई स्थिति भयावह हो गई वही नावें सभी जगह काम आयी। अगर कहीं बाढ़ न आती और स्थिति ऐसी न बनती तो मेरे विरुद्ध सम्भवतः बढ़ी कार्यवाही होती क्योकि मैंने अपने आप निर्णय लिया था। और चूंकि मेरे निर्णय से बहुत बड़ा काम हुआ इसलिए बाद में मेरी प्रशंसा हुई और तमाम सेवा कार्य हुए।

इसी प्रकार १९९१ क मुझे स्मरण है मैं रायबरेली में जनपद में लालगंज तहसील का एसडीएम था। तो उस समय अयोद्धा मन्दिर राममन्दिर निर्माण सम्बन्धी अभियान चल रहा था। कार्यसेवक गिरफ्तार किए गए थे और गिरफ्तार करके अस्थाई जेल लालगंज की मंडी में बनाई गई थी। उनके खाने पीने की व्यवस्था करने के कोई निश्चित निर्देश जिला स्तर से नहीं थे और यह कहा गया था कि सामान्यतया इनको रोके रखना है और जैसे भी सम्भव हो आप कर सके करें इनके लिए। मैने अपनी ओर मंडी समिति के माध्यम से वहाँ उनके लिए अच्छा से अच्छा भोजनबनवाया चूंकि ज्यादा दिन रहना नहीं था वहाँ उनको। लेकिन वह बहुत ही शान्तिपूर्वक वहाँ रहे यह निर्णय भी मैंने किसी प्रेरणा से ही लिया था। अन्यथा और भी जगह पर जनपद में जेले बनाई गई थी और वहाँ से कारसेवक भाग गए। तमाम मारपीट हुई। शान्तिव्यवस्था भंग हुई और मेरे यहाँ सब शान्तिपूर्वक निपट गया। इस निर्णय के पीछे मैं पूज्यवर की ही कृपा मानता हूँ।

एक दृष्टांत और है बाद में मैं उसी जनपद की तिलुई तहसील में एसडीएम कार्यरत था। तो वहाँ एक बहुत बड़ा अधिवेशन काग्रेस पार्टी की ओर से आयोजित हो रहा था। कठौरा अधिवेशन के नाम से उस समय केप्टन सतीश शर्मा केन्द्र में मिनिस्टर थे। उनके आगमन का प्रोग्राम था वहाँ इण्डोगल्फ का बहुत बड़ा रेस्ट हाऊस है एसी है वह आए उनके साथ जो स्टाफ होता है उसकी जिम्मेदारी एसडीएम की होती है कि उनकी देखभाल करे उनकी व्यवस्था करे। जिस कक्ष में उनके पायलट अधिकारी को रोकना था वहाँ जैसा कि होता है नेता के आने पर स्थानीय नेता उस कक्ष में घुस गए और उसके लिए स्थान उस समय उपलब्ध नहीं हो पाया। तो पायलट अफसर जोकि सेना के अधिकरी थे तो उन्होंने रोस भी जताया और शिकायत करने की बात भी कही तो चिन्तित हुआ और उस समय स्थिति विषम होने लगी मैने गुरुदेव को स्मरण किया और थोड़ी दूर उनको लेकर ठहला फिर दिमाग में आया कि अब देखे दाखे वह कमरा जो इनके लिए रिजर्व किया गया था वहाँ क्या स्थिति है तो देखता हूँ कि वहाँ जो स्थानीय नेता थे उन्होंने वह कक्ष स्वतः खाली कर दिया और वह पायलट आफीसर वहाँ ठहरे प्रसन्नतापूर्वक रहे। जो पायलट आफीसर थे वह मेरी शिकायत मेरे उच्चाधिकारियों से कमिशनर से कर सकते थे। यह संस्मरण बताते हैं कि प्रेरणा कहीं न कहीं से गुरुवर की रहती है कि मौके पर जो निर्णय लिए वह सही साबित हुए। सेवा में मैंने जहाँ भी जो चाहा जितने दिन रहना चाहा रहा कोई भी जनप्रतिनिधि, नेता या अधीनस्थ कर्मचारी अधिकारी असन्तुष्ट नहीं होते थे। मुझे किसी विषम परिस्थिति का सामने नहीं करना पड़ा और पूरी सेवा मैंने शानदार ढंग से की।

राजकीय सेवा के अतिरिक्त व्यक्तिगत जीवन में भी मुझे समय-समय पर जो अनुदान मिले। दोनों लड़की की शादी बिना दहेज के सम्पन्न हुई। बड़ी लड़की की शादी एक सर्जन से हुई जो जिला चिकित्सालय फैजाबाद में ही नियुक्त हैं। और दूसरी लड़की की शादी जिसके लिए मैं काफी परेशान था किसी प्रेरणा से ही एक बहुत अच्छे वर से जो रेलवे में क्लास वन में इंजीनियर है उनसे सम्पन्न हुई और मुझे इसके लिए कोई बहुत बड़ा खर्च नहीं करना पड़ा। यह बिना गुरुकृपा के हो नहीं सकता था।

श्री रामचंद्र अग्रवाल सुलतानपुर

सन् १९८४ की घटना है मैं पेटदर्द से बहुत परेशान हो गया तीन दिन तक कोई भी इंजेक्शन कोई भी दवा कोई काम नहीं कर रही थी। तो डाक्टरों ने कहा आपके फेफड़े में घाव हो गया है आप लखनऊ तुरन्त चले जाइये। कार के द्वारा हम लोग लखनऊ जाने के लिए तैयार हुए हमने कहा पहले गायत्री शक्तिपीठ माँ का दर्शन करलें फिर चलें वहाँ हमने माँ का दर्शन किया और परम पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना की अब यह कष्ट सहा नहीं जाता या तो हमारा शरीर समाप्त कर दें या काम करने का हमारे में कुछ हो तो काम करने की प्रेरणा दें वह कार जो लखनऊ जानी थी रास्ते में बंफर फेल हो जाने के बावजूद भी लखनऊ पहुँच गई और डाक्टर हमारा इंतजार कर रहे थे जैसे कि कोई पहले से ही एपाइन्मेन्ट कर दिया हो और डाक्टर साहब ने कहा कि आइये आपका तो मैं इंतजार कर रहा हूँ उन्होंने देखने के बाद कहा घबराइये नहीं तीन दिन में ही मैं आपको ठीक कर दूँगा डाक्टर साहब ने अस्पताल में हमें भर्ती कराया डॉ० ओमप्रकाश शर्मा भी वहाँ हमको देखने गए और उन्होंने कहा यह तो आश्चर्य हो गया तीन दिन के अन्दर आपके फेफड़े में जो छेद हो गया था वह बिल्कुल सही जुड़ गया है। और आप बिल्कुल स्वथ हो गए हैं परम पूज्य गुरुदेव की यह बहुत बड़ी कृपा हमारे ऊपर हुई है और मुझको नया जीवन मिला।

एक बार हम शान्तिकुँज आए थे परम पूज्य गुरुदेव के दर्शन के लिए गए तो मुझे साक्षात् यह दिखाई पड़ा कि मैं महाकाल के दर्शन कर रहा हूँ। एक सेकेण्ड के लिए मैं स्तब्ध रहा गया। परम पूज्य गुरुदेव ने जो झांकी दिखाई वह हमारे जीवन की अविस्मरणीय घटना है।

डॉ० के०एन० भारद्वाज पूर्व प्रबन्ध ट्रस्टी सीतापुर

आचार्य जी से सन् १९५९ से जुड़ा हुआ हूँ। गुरुदेव कहते थे मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहता हूँ हवा के जो झोके लगते हैं उसमे भी मैं तुमको स्पर्श करता रहता हूँ। मैं हमेशा यह अनुभव करता रहा कि आचार्य जी वास्तव में मेरे साथ हैं। घटना १९६५ की है मेरी पोस्टिंग टिहरी गड़वाल में थी होम्योपैथी सेंटर में मैं मेडीकल आफीसर था। वहाँ से घर आ रहे थे ऋषिकेश में जयपुर वालों की धर्मशाला में मैं, मेरी पत्नी और तीन वर्ष की बच्ची सोए हुए थे कमरे में लकड़ी की कड़ी पड़ी हुई थीं। सो रहे थे अचानक स्वप्र में देखा आचार्य जी कह रहे हैं उठो जल्दी से बाहर चलो आँख खुल गई देखा एक नाग दो तीन फीट का मेरे सामान पर से उतरता हुआ नीचे की ओर आ रहा है। मैं जल्दी से अपनी पत्नी को और बच्ची को उठाकर बाहर भागा आँगन में जैसे ही आया वैसे ही छत गिर गई। धर्मशाला में कोहराम मच गया कि डाक्टर भाारद्वाज दब गए और उनके बच्चे भी दब गए। मैं बाहर खड़ा था मैने कहा भाई मैं बाहर आ गया हूँ मैं नहीं दबा मेरा सामान जरूर दब गया है। मैं समझ गया आचार्य जी ने हमें जगाया बाहर निकाला और हमारी रक्षा की। वास्तव में जैसा वह कहते थे कि मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहता हूँ वह बात सत्य प्रतीत हुई। मैं घर आया फिर मथुरा गया आचार्य जी से मिला यह घटना बताई हँसने लगे और कहने लगे बेटा मैं तो तुमसे कहता हूँ कि मैं तुम्हारे साथ रहता हूँ लेकिन जब तक मेरा शरीर है यह बात किसी से मत कहना। मेरी पत्नी और मैं यह बात जानते हैं और यह बात मैंने किसी से नहीं कही।

वर्ष अगस्त १९७३ में प्राण प्रत्यावर्तन में हम लोग यहाँ आए हुए थे। आचार्य जी के पास बैठे हुए थे। आचार्य जी ने कहा बेटा कुछ विशिष्ठ साधना करो। मैंने कहा साहब बताइये क्या करें। बोले सवा लाख का अनुष्ठान करलो ४० दिन तक सिले हुए वस्त्र मत पहनना। ४० दिन तक अन्न मत खाना केवल फल और दूध लेना। ४० दिन तक किसी को देखना मत। ४० दिन तक तुम्हें कोई नहीं देखेगा। ४० दिन तक मौन रखोगे। मैंने कहा गुरुदेव दवाखाने पर मरीज आएगे उन्हें मैं कैसे देखूगा यह घटना सीतापुर की है। गुरुदेव ने कहा तुम साधना करो बाकी मैं सब संभाल लूँगा। उन्होंने कुछ आवश्यक निर्देश दिए उन निर्देशों के अनुसार मैंने साधना शुरु कर दी। पाँच सात दिन साधना चलने के बाद विश्वा में नगर पालिका के चेयरमैन की माँ बीमार हो गई हमेशा इलाज मेरा ही कराती थीं उन्होंने अपने पुत्र से कहा डॉ० भारद्वाज को बुलाकर लाओ मेरी तबियत बहुत खराब है कल्याण कुमार जी डिस्पेंसरी पर आए कंपाउन्डर से पूछा डाक्टर साहब कहाँ हैं कंपाउन्डर ने कहा डाक्टर साहब तो नहीं मिल पाएगे वह साधना में हैं उनके गुरुदेव ने उन्हें कुछ साधना बताई है ४० दिन की साधना है चालीस दिन बाद मिलेगें। उन्होंने कहा मेरी माँ की दवा कैसे जाएगी कैसे होगा उन्होंने कहा आप हमें हाल बता दीजिए हम दवा दे देंगे। वह बोले हम दवा नहीं लेंगे हम तो डाक्टर साहब को ही दिखाएगे। बोले डाक्टर साहब तो मिल नहीं पाएगे। वह अपने घर चले गए। घर जाकर कहा कि यहाँ और भी बहुत से डाक्टर हैं किसी और डाक्टर को बुला लाते हैं दिखा देंगे डाक्टर भारद्वाज तो उपलब्ध नहीं हो पाएगे वह साधना में लगे हुए हैं ४० दिन बाद मिलेंगे चालीस दिन उनकी साधना चल रही है। उनकी माँ बोली बेटा झूठ क्यों बोलता है डाक्टर भारद्वाज अभी आए थे मुझे देख गए हैं और एक पुड़िया दवा की खिला गए हैं तीन पुड़िया मेरे तकिया के नीचे रखी हुई हैं देख ले। कल्याणकुमार चक्रवर्ती लौटकर डिस्पेंसरी पर आए तुमने हमें झूठ बोलकर बहका दिया डाक्टर साहब हमारे घर गए थे हमारी माँ को देखकर चले आए हैं दवा भी दे आए हैं। कंपाउन्डर बोला मैं तो यहीं बैठा हूँ डाक्टर साहब निकले ही नहीं हैं बाहर। जब अनुष्ठान समाप्त हुआ शान्तिकुँज आया गुरुदेव को बताया हँसने लगे मैंने तो कहा था तू अपना काम कर डिस्पेंसरी मैं देखूंगा। उस महीने में डिस्पेंसरी पर सबसे अधिक मरीज आए और सभी ठीक हुए। अब इसको क्या कहें यह रहस्य समझ में नहीं आता बस यही समझ में आता है कि गुरुदेव साक्षात ईश्वर थे। थे नहीं हैं।

सन् १९९८ की घटना है। मेरी लड़की की शादी अतरेली में हुई है। उसके ज्येठ का हालत बिगड़ गई उसे लोग लखनऊ पी०जी० हास्पिटिल में भर्ती कराने ले गए। हमें तो कुछ पता भी नहीं था हम तो विस्वा में थे। रात को स्वप्र आया प्रवचन हाल में बहुत भीड़ लगी हुई है आचार्य जी की प्रतीक्षा कर रहे हैं मैं भी वहाँ बैठा हुआ हूँ हमें कुछ पता नहीं था कि कहाँ कौन बीमार हो गया है क्या हो रहा है। इसकी कोई सूचना नहीं थी। शान्तिकुँज में जब हमने यह स्वप्र देखा आचार्य जी जब आए तो उनसे लोगों ने कहा कि साहब बहत देर करदी आपने। हम बहुत देर से प्रतीक्षा कर रहे हैं प्रवचन के लिए। बोले डाक्टर भारद्वाज के दामाद बीमार हो गए थे उन्हें पी०जी०आई० हास्पिटिल ले गया था दाखिल कराने वहाँ एडमिट कराकर लौट रहा हूँ। लखनऊ में पी०जी०आई० है इसलिए मुझे देर हो गई। मेरी आँख खुल गई मैं उठकर बैठ गया पत्नी बोली क्या बात है क्यों परेशान हो मैने उन्हें स्वप्र बताया स्वप्र मेरे सच्चे होते हैं कहीं ऐसा तो नहीं है कि कहीं कोई बीमार हो। रात को हम लोग काफी देर के बाद सो गए। दूसरे दिन सूचना मिली कि डाक्टर साहब आप लखनऊ चलिए प्रदीप बाबू बहुत ज्यादा बीमार हैं पीजीआई में एडमिट हैं। यह घटनाएँ बताती है कि आचार्य जी इंसान नहीं साक्षात् भगवान् हैं।

जुलाई ९९ की घटना है रात को हम सो रहे थे आचार्य जी कह रहे थे कि बेटा अजमेर से रुक्साना नाम की मरीज आ रही है तुम उसको यह दवा देना इससे ठीक होगी। सब जगह से निराश होकर लौटी है हम डिस्पेंसरी पर बैठे हुए थे ७ बजे का समय था दो तीन लोग एक स्त्री को डिस्पेंसरी में लेकर आए और बेंच में लिटा दिया। और बता दिया कि हम दिल्ली के रहने वाले है अजमेर से लौटे हैं सब डाक्टरों ने मना कर दिया है कि इनकी किडनी फैल हो गई है यह अब ठीक नहीं हो सकती हैं। यह कम से कम एक महीने से नहीं सोई है अंग्रेजी दवाईयाँ दे-देकर सुलाते हैं नींद फिर भी नहीं आती है। अब आप कोई उपचार करिए। समझ में आ गई बात कंपाउन्डर से कहा परचा बनाओ इनका। कहने लगे हम अजमेर के रहने वाले हैं इनका नाम रुक्साना है। बात समझ में आ गई वहाँ और लोग बैठे थे बोले डाक्टर साहब इस मरीज का इलाइ मत करिए ठीक नही होगी सब जगह से लौटकर आई है। हमें गुरुदेव पहले ही बता चुके थे इसको यह दवा देनी है। दवा शुरु कर दी गई लोगों ने आकर बताया कि आज रात को सोई हैं और जो चल नहीं सकती थी अब आनन्द में घूम रही हैं। इस प्रकार की कई घटनाएँ हैं। मैं कहा तक बतााऊँगा बहुत समय लगेगा मैँ किताब में लिखकर भेजूगा। मेरे रोम-रोम में आचार्य जी बसे हुए हैं। मैं हमेशा आचार्य जी के दर्शन करता रहता हूँ वह मुझे समय समय पर मार्गदर्शन भी देते रहते हैं चेतावनी भी देते रहते हैं सूक्ष्म शरीर में आकर, स्वप्र में आकर झकझोरते रहते हैं जो काम उन्हें कराना होता है वह मुझसे करा लेते हैं।

जब मै ११ वर्ष का था पं० प्रताप नारायण दीक्षित ने मेरा यज्ञोपवीत किया था। स्वप्र में मैने उन्हें देखा कभी वह बन जाते हैं कभी आचार्य जी बन जाते हैं। कह रहे है कनकपुर से किशनलाल नाम का मरीज आवेगा उसकी दोनों आँखें चली गई हैं उसका इलाज करना है यह दवा देनी है। लगभग १५ दिन बाद किशनलाल जी की पत्नी उन्हें लेकर मेरे पास आई। किशन लाल जी जवाहर टाकीज में आपरेटर हैं मशीन चलाते हैं। उनकी आँखों की रोशनी अचानक चली गई। उनकी पत्नी ने आकर हमें बताया कि उनकी आँखों की रोशनी चली गई है आपके बारे में लोगों ने हमें बताया कि वह डाक्टर साहब ठीक कर सकते हैं तो मैं आपके पास लेकर आई हूँ। हमें तो आचार्य जी ने १५-२० दिन पहले ही बता दिया था सचेत कर दिया था। चिकित्सा शुरु कर दी गई लगभग १० दिन में उनकी आँखों की रोशनी वापिस आने लगी घड़ी देखने लगे और अखबार पढ़ने लगे। हमें उन्होंने सूचना दी घर वाले आए पैर छूने लगे कहने लगे डाक्टर साहब आपने तो हमारा कल्याण कर दिया अब सही हो चुके हैं आंखों की रोशनी बहुत कुछ हो चुकी है और वह ठीक हो गए उसके बाद उन्होंने पंजाब से कई लोग हमारे पास भेजे जो उनके रिश्तेदार थे आंखों की रोशनी वाले उनकी भी चिकित्सा की इस प्रकार से हम तो समझते हैं कि आचार्य जी हमेशा हमारे साथ रहते हैं। जैसा कि उन्होंने हमसे कहा हमेशा तुम्हारे साथ रहता हूँ। यह बात मैं हमेशा अनुभव करता रहता हूँ उठते बैठते चलते फिरते कि परम सत्ता आचार्य जी हमे झकझोर रहे हैं।

बरेली में बैंक आफ बड़ौदा में श्री सुनील खंडेलवाल सर्विस करते हैं उनके श्वसुर की सरदर्द होने से आँखों की रोशनी चली गई। केवल एक आँख से थोड़ा-थोड़ा दिखाई पड़ता है। एक आँख की रोशनी जा चुकी है। यह घटना अभी की है बहुत समय नहीं हुआ है। खंडेलवाल की के श्वसुर जी ने बताया हमें स्वप्र हुआ कि हमारे गुरु उड़ीसा में रहते हैं उन्होंने हमें सूचना दी है कि तुम अपना इलाज डाक्टर भारद्वाज से कराओ। वह इस समय बरेली में हैं। वे पता लगाते हुए हमारे पास आए। उनकी चिकित्सा शुरु की गई। तीन दिन में उनके सर का दर्द शुरु हो गया। आँख की रोशनी धीरे-धीरे वापिस आने लगी और उन्होंने फोन पर उड़ीसा में अपने गुरु से बातचीत की आपने उनका नाम हमें कैसे बताया आपको कैसे मालुम हुआ उन्होंने बताया कि मुझे पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी जो शान्तिकुञ्ज में रहते हैं उन्होंने मुझे निर्देश दिया कि इनको वहाँ भेजो। मैंने उनके निर्देश पर तुम्हें वहाँ भेजा। जब उन्होंने मुझे यह सारी बात बताई तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए आँखों में आसूं आने लगे कि गुरुजी कहाँ से कहाँ तक पहुँचते हैं। कहाँ से कहाँ किसको कहाँ भेजते हैं।

श्रीमती भारद्वाज

मैं पन्ना आ रही थी तो वहाँ देहरा एक्सप्रेस आ रही थी सहजानपुर में सहजानपुर में हम बैठे थे वहाँ देखा कि बहुत भीड़ थी ट्रेन में तो दो-तीन लोग थे मेरे साथ में वह तो भीड़ देखकर चले गए। मैंने सोचा कि माँ बुलाएगी तो जरूर जाएँगे। नहीं तो वापिस कर देंगे टिकिट। फिर देखा तो मुझे ऐसा लगा एक बुड्डे आदमी थे उन्होंने मुझे ट्रेन में चढ़ा दिया। मैंने खिड़की में से झांककर देखा मैं तो चढ़ गई पर वह बुड्डे आदमी तो नीचे ही रह गए उनको देख लें। तो जब मैंने देखा खिड़की में से वह दिखाई नहीं दिए। जब मैं शान्तिकुँज आई तो गुरुदेव मुझसे पूछने लगे कि बेटी तुझे जगह मिल गई थी ट्रेन में तुम्हें कोई दिक्कत परेशानी तो नहीं हुई। मैंने कहा आप तो थे ही आपने ही तो मुझे चढ़ाया। बोले नहीं मैं तो नहीं गया शान्तिकुँज से मैं तो कहीं बाहर जाता ही नहीं हूँ तुझे धोखा हो गया होगा। मैंने कहा नहीं आप जैसा कुरता पहने हैं वैसा ही कुरता पहने थे जैसे आपके बाल हैं वैसे ही बाल थे उनके और आप ही जैसी शकल थी आप बता नहीं रहे हैं। बोले बेटा मैं नहीं था तुम्हें धोखा हो गया होगा। वहम हो गया होगा।

डाक्टर साहब शान्तिकुञ्ज आए थे हमारे एक पड़ौसी आए बोले जगह बिक रही है और तुम पैसा निकलवा दो जगह हम दिलवा दें मैंने कहा डाक्टर साहब शान्तिकुञ्ज गए हैं अगर मैं पैसा दूंगी तो वह नाराज होंगे तो क्या होगा। तो बोले नहीं नाराज नहीं होंगे। मैंने कहा अगर डाक्टर साहब नाराज हों तो हमें उतने ही पैसे दिलवा देना बोले हाँ हम दिलवा देंगे। तो मैंने पैसा दे दिया उन्होंने रजिस्ट्री करा दी। जब डाक्टर साहब लौटकर आए तो मैने कहा जगह तो खरीद ली तो बोले जगह कहाँ से खरीद ली तुमने मैंने कहा जगह खरीदली आपके पीछे बोले जगह तो खरीद ली पर मकान कैसे बनेगा। तो मैंने कहा सब माँ की कृपा होगी तो बन जाएगा। जिनने जमीन दिलवाई वह बोले की अगर व्यवस्था नहीं है तो कच्ची बुनियाद भरवा दें जिससे कब्जा हो जाए नहीं तो लोगबाग दबा लेंगे जगह। तो मैंने कहा ठीक है तो इतने में सचानंद भट्टा वाले थे उनके लड़के को दौरा पड़ते थे वह आ गए वह डाक्टर साहब के इलाज में थे तो उनका लड़का ठीक हो गया। उन्होंने कहा डाक्टर साहब हमने सुना है आपने प्लाट खरीदा है आप ईट हमारे भट्टा से बुलाएँ। हमने कहा पैसे ही नहीं हैं मंगाएगे कहाँ से। तो बोले पैसे जब हो जाए तब दे देना मैं ईट भिजवाता हूँ। उन्होंने ट्रक भरकर ईट भिजवा दी। फिर बुनियाद भरवा दी हमने। फिर धीरे-धीरे पता नहीं कैसे मकान हमारा बन गया। कमरा बना पहले तो फिर एकदम बाढ़ आ गई। बाढ़ आ गई तो सब लोग हँसने लगे स्टेशन रोड पर था हमारा मकान सब लोग कहने लगे डाक्टर साहब तलैया में मकान बनाने को बैठे ढह जाएगा। डाक्टर साहब परेशान हुए तो मैंने कहा दुनिया शराब पी लेती है शराब पी लेती है अगर हमारा मेहनत का पैसा होगा तो नहीं ढहेगा आप चिन्ता नहीं करना और अगर ढह भी जाएगा तो हम यही सोच लेंगे कि जुआ खेल लिया ऐसा समझा दिया मैंने इनको फिर मेरा मकान ऐसा ही खड़ा रहा सब लोग बोले वास्तव में डाक्टर साहब में कोई शक्ति है सबके मकान ढह गए इनका नहीं ढहा। मैंने कहा मेहनत की कमाई है मेरी तो रुकेगा क्यों नहीं। इसके बाद फिर एक तहसीलदार आए उनकी लड़की के पेट में दर्द था वह सबमें इलाज करा आए ठीक नहीं हुई उनकी लड़की। वह हमारे यहाँ आए तो उनके ऊपर थोड़ी मिट्टी गिरी बोले डाक्टर साहब सीमेंट नहीं कराया प्लास्टर करादो डाक्टर साहब ने कहा सीमेंट नहीं मिल रही है तो उन्होंने २५ बोरी का परमिट काट दिया उसके बाद फिर प्लास्टर हो गया। लोहा की जरूरत थी तो लोहा वाले इलाज में आ गए बोले डाक्टर साहब लोहा हमारे यहाँ से खरीदना पैसा हम उधार कर देंगे थोड़े थोड़े करके निपटा देना। इस तरीके से मेरा मकान बन गया।

डॉ० पी०के०झा इलाहाबाद

मैं १५ वर्ष पूर्व अखण्ड ज्योति के माध्यम से मिशन से जुड़ा। १९९१ में शरदपूर्णिमा में शान्तिकुँज में मैंने परम वन्दनीया माताजी से दीक्षा प्राप्त की। उस समय में देवरिया में कार्यरत था। हमारा एक मुकदमा इलाहाबाद में चल रहा था हमारे पिताजी प्रत्येक डेट में उपस्थित होते थे हमारी उपस्थिति माफ थी एक पेशी मेंजब जज ने बोला कि यह किसके नाम का मुकदमा है डाक्टर साहब कहां है तो फिर उस बार हमारे पिताजी ने देवरिया हमें फोन किया कि इस बारतुम आ जाओ सम्भवतः अगली डेट में तुम्हें उपस्थित होना पड़े। मैंने गरुदेव एवं माता जी के सामने नतमस्तक होकर प्रार्थना की कि इस बार मैं जा रहा हूँ और कुछ न कुछ मुकदमे का फैसला हो जाए। बहुत परेशानी हाती है पिताजी को बार-बार आना जाना पड़ता है। मैं जब इलाहाबाद में कोर्ट मे पहुँचा तो पहले ही नंबर पर हमारे मुकदमे की सुनवाई हुई। जज ने पूछा कि डाक्टर साहब कहाँ है मैं प्रस्तुत हुआ तो उन्होंने पूछा कि आप कहाँ पोस्टिड हैं क्या कर रहे हैं। इसके बाद अपोजिट साइड से विकास प्राधिकरण के जो वकील थे उन्होंने एप्लीकेशन लगाई कि साहब डेट आगे बढ़ा दी जाए। लेकिन जज ने कहा कि नहीं डेट आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। इसके बाद उन्होंने कुछ लिखना शुरु किया उसी समय मैंने आँख बन्द करके परम पूज्य गुरुदेव का स्मरण किया दो सेकेण्ड आँख बन्द किये रहा ऐसा लगा कि मैं शून्य में चला गया और सामने अन्तरिक्ष में परम पूज्य गुरुदेव और परम वन्दनीया माताजी का आधा शरीर आशीर्वाद की मुद्रा में सामने था। जबकि हमने परम पूज्य गुरुदेव को याद किया थाा लेकिन दोनों हमारे सामने आशीर्वाद की मुद्रा में थे मैंने उनसे प्रार्थना की कि आप जज की कलम पर बैठ जाइये और यह मुकदमा आज खतम हो जाना चाहिए। जज ने जब आर्डर लिखकर वकील साहब को दिया कि इसमें डाक्टर साहब के दस्तखत करा लीजिए तो वकील देखकर आश्चर्य चकित था कि इसमें तो एक डेट और मिलना चाहिए थी विकास प्राधिकरण को इस चेतावनी के साथ डेट दी जाना चाहिए थी कि इस डेट में आप प्रस्तुत नहीं हुए तो अगली डेट में मुकदमा खारिज कर दिया जायेगा। पर मैंने गुरुदेव को याद किया और ऐसा युग्म बना कि उसी दिन मुकदमा खारिज हो गया। उस दिन से मेरी असीम श्रद्धा गुरुदेव परम वन्दनीया माताजी के प्रति हो गई।

सन् १९८० में मुझे बलिया में बहुत जबरजस्त हार्टअटैक हुआ। डिस्ट्रिक्ट हास्पिलिटल में लोगों ने हमें भर्ती कराया। करीब २०-२२ घण्टे के बाद हमको होश आया था। यहाँ बीस पच्चीस दिन रहने के बाद भी कोई सही इलाज न होने से हमें लखनऊ मेडीकल हास्पिटिल भेजा गया। लखनऊ में डॉ० वी०के० पुरी एवं मंसूर हसन काफी परिश्रम के बाद भी जब किसी निष्कर्ष पर निकल सके तो हमें आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली के लिए रिफर किया गया। वहाँ डाक्टर इस निर्णय पर पहुँचे कि इन्हें ओपन हार्टसर्जरी करके पेसमेकर लगाना पड़ेगा नहीं तो इनकी हार्टबीटिंग इतनी एबनार्मल है कि विदिन ए सिक्स मंथ ये कभी हो कोलेप्स कर जाएँगे। सारी तैयारी हो गई उस पेसमेकर बाहर से आता था में चूंकि स्वतंत्रता संग्राम परिवार से था पिताजी विधायक थे इसलिए उसे सरकारी खर्च पर इंग्लैण्ड से बुलाने के लिए आदेश भी हो गया कि सरकारी तौर पर इन्हें मुहैया कराया जाए। आपरेशन की डेट भी फिक्स हो गई। पता नहीं मुझे क्या सूझा में अव्यवस्थित महसूस करते हुए अस्ताल में ही एक चिट्टी लिखकर में हरिद्वार भाग आया और यहाँ सीधे गुरुदेव के पास पहुँचा। सुबह के समय जब गुरुजी के पास दर्शन के लिए ले जाया गया उस समय गुरुजी सब लोगों से मिलना छोड़ चुके थे फिर भी मुझे मिलवाया गया मुझे देखते ही गुरुदेव ने एक ही सवाल किया डरकर के अस्पताल से भाग आया। अच्छा ठीक है चल रह। इसके बाद ४० दिन तक गुरुदेव ने मुझे यहाँ रखा भोजन बन्द कर दिया और बिना नमक की सब्जी और दूध अलाऊ किया था। और एक भ्रामरी प्राणायाम उन्होंने स्वयं करके बताया था कि यह ९ सुबह, ९ दोपहर और ९ शाम २७ प्राणायाम तुम्हें रोज करना है। ४० दिन के बाद उन्होंने स्वतः बुलाकर कहा कि तुम्हारे घर पर लोग काफी परेशान हैं और अब तुम जाओ। मैं यहाँ एक दो दिन और रुकना चाहा लेकिन काफी नाराज हो गए। घर पर सब लोग परेशान थे क्योंकि ६ महीने डाक्टरों ने हमारा जीवन ही निर्धारित कर दिया था मुझे पुनः वहाँ से लेकर लोग दिल्ली पहुँच गए। डाक्टरों ने कहा इतना गेप हो गया है इसलिए पुनः जाँच करना पड़ेगी इसके बाद ही आपरेशन की प्रक्रिया प्रारम्भ की जाएगी। पुनः हमारी जाँच हुई जाँच के बाद डाक्टरों ने कहा कोई आवश्यकता नहीं है। इस पिताजी वगैरह काफी नाराज हुए कि पहले तो आपने कहा था कि ६ महीने का जीवन है आपरेशन नहीं करते तो खतरा है अब क्या हो गया बोले भाई अब क्या कहा जा सकता है चह कोई चमत्कार ही है अब आवश्यकता नहीं है तो जबरजस्ती तो हम आपरेशन करेंगे नहीं। वह सारे रिकार्ड आज भी हमारे पास मौजूद हैं डाक्टरों का लिखा हुआ। बहुत ही मोटी फाइल है जिसको देखकर मैं आश्चर्य करता हूँ कि मैं कैसे अभी तक जीवित हूँ। और तब से लेकर आज तक एक टेबलेट तक हमने दवा के नाम पर नहीं लिया है। आज ६४ वर्ष की मेरी उम्र हो रही है और मैं पूर्ण स्वस्था अपने आपको महसूस करता हूँ। और इसकी देन मैं स्वतः गुरुदेव की आन्तरिक शक्ति को मानता हूँ कोई ऐसी शक्ति थी जो हमारे अन्दर एक तरीके का परिवर्तन किया जिसकी वजह से हम मौत के कगार पर पहुँच कर वापिस आ गए। मैँ तभी से कहता हूँ कि यह जो शेष जीवन मिला हुआ है यह गुरुजी का है। मैं अपना जीवन तो जी चुका था गुरुजी ने यह जीवन दिया है और अपने कार्यो के लिए दिया है तभी से मैं गुरुदेव के विचारों का प्रसार प्रचार करने के लिए तत्पर रहता हूँ। और जब तक जिन्दा रहूँगा यह करने के बाद भी अपने अन्दर से यह निकाल नहीं पाऊंगा कि गुरु ऋण से मैं उऋण हो पाया कि नहीं हो पाया।

श्रीराम तिवारी

मैं श्रीराम तिवारी यह घटना सुना रहा हूँ सन् ७१ के आसपास जब गुरुदेव अज्ञातवास के लिए गए थे या उसके पहले की होगी। उस समय तक मैं फाइव स्टार वाली जिन्दगी जीता था और जो भी धनपशुओं के अन्दर बुराई होती है वह सब मेरे अन्दर नख से लेकर शिख तक भरी हुई थीं और बड़े बाप का बेटा राजनीतिज्ञ होने का अहंकार भी भरा हुआ था। उसी के वशीभूत होकर एक दिन बियर पीकर गुरुदेव के सामने पहुँच गया। हमने सोचा इसकी गन्ध तो आएगी नहीं कुल्ला कर लिया इलायची खा लिया श्रद्धा तो रहती थी लेकिन बुराई जो थी वह गई नहीं थी वह वैसी ही भरी पड़ी थी और यही कारण था कि अहंकार के कारण गुरुदेव के सामने पहुँच गया। और प्रणाम करके काफी दूर उनसे बैठना चाहा कि किसी प्रकार की कोई गन्ध उन तक न जाए लेकिन उनसे कहाँ कुछ छिपने वाला है। थोड़ी सी नजर टेड़ी की और इशारा किया कि जाओ सुबह आना सुबह। डर के मारे में चला गया कैलाश होटल में रुका हुआ था वहाँ जाकर मैं सोया। पर शाम को फिर चंडाल चौकड़ी पहुँच गई और बियर की बोतल व्हिस्की की बोतल इकट्ठी हो गई शाम के लिए पर लाख प्रयास करने के बाद भी मैं उस दिन उसको अपने होट के नीचे नहीं कर पाया। जब भी पेग होट के पास ले जाऊं तो लगे कि अन्दर के सारी अन्तड़िया बाहर आ रही हैं और उल्टी हो जाए। दो तीन बार प्रयास किया फिरहमारे मित्र लोग भी बोले को छोड़ो जाने तुमको कुछ हो गया है और तुम लोगो तो और पता नहीं क्या हो जाएगा। मेरी हिम्मत ही नहीं थी मैं नहीं ले पाया उन लोगों को हटा दिया। रात किसी तरह मैं काटा और सुबह जल्दी जल्दी तैयार होकर के गुरुदेव के पास फिर पहुँचा सूर्योदय के पूर्व ही जाकर गुरुदेव के चरणों में बैठा तो बोले कैसी तबियत है रात ठीक ठाक रहे और मुस्कराने लगे देखकर के बोले जाओ जाओ जितनी तेरे हिस्से की थी उतनी तूने पी ली। अब तू चाहकर भी पी नहीं पाएगा। पूर्व जन्म का तू शापित व्यक्ति था शॉप से तू मुक्त हो गया। यह भी शब्द उनके थे। बोले जाओ आज के बाद चाहकर भी तुम नहीं ले पाओगे। बोले जा रहे हो घर मैंने कहा हाँ आज तो जाना है बोले आज शाम को चले जाओ और उसी के बाद से आज तक पीनी तो दूर रही अगर कोई व्यक्ति शराब पिए हुए मेरे बगल से गुजर जाता है तो मेरे रोंगटे खड़े होकर ऐसा लगने लगता है कि मेरे मुँह में पानी भर गया। १६ वर्षो तक मैंने लगातार शराब पी शायद ही कभी एक दिन नागा हुआ हो उस दिन के बाद से आज तक मैँ उसकी गन्ध से भी इतनी दूर भागता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि उसका कोई रिएक्शन मेरे ऊपर हो जाए। यह साक्षात गुरु की कृपा और उन्हीं का अनुदान समझिए पग पग पर हम लोग पाए हैं और उसी को याद करके जी रहे हैं।

१९९७ में हमारे यहा संस्कार महोत्सव हुआ था उसमें एक अत्यन्त ही आश्चर्यजनक बात देखने को मिली कि हमलोग शक्तिकलश के स्वागत के लिए गाजीपुर पहुँचे थे और यहाँ से उस समय के व्यवस्थापक परिहार जी और रघुवंशी जी प्रतिनिधि बनकर गए थे। हल लोग गए वहाँ तो ऐसा लगा कि वह हमें देख रहे हैं पर उन्हें हम लोगों को देखकर कोई खास प्रसन्नता नहीं हुई। जैसा कि होता है कि शान्तिकुँज से कोई भाई जाता है तो बड़ी आत्मीयता से मिलता है लेकिन वहाँ बड़ी अजीबोगरीब बात लगी और यह बात हमारे बड़े भाई साहब के दिल में लग गई और वहाँ से कुछ विचारधारा बदली उन लोगों के प्रति और उसके बाद हम लोग उस शक्तिकलश के साथ घूमते रहे चारों तरफ शक्तिकलश बलिया में रखा गया फिर एक गोष्ठी बुलाई गई थी और उस गोष्ठी में हम लोग पहुँचे करीब एक दो घण्टे इंतजार कराया लेकिन वह लोग आए नहीं गोष्ठी लेने के लिए उस दिन भाई साहब को बड़ीऊबन हो रही थी। और अपनी व्यग्रता यह संभाल नहीं पाए और उन दोनों लोगों को अपशब्द कहे कि गुरुदेव को यह लोग बेच देंगे ऐसे लोग आ गए हैं जबकि अन्य लोगों को बड़ा बुरा लगा कि शान्तिकुञ्ज के प्रतिनिधि को ऐसा कह रहे हैं यह कहकर के सभी लोग चले आए वहाँ से और बाद में जब यहाँ से एन्टी मिशन गतिविधि के आरोप में यह लोग निकाले गए उस समय लगा कि इन पर गुरुदेव की कितनी कृपा है कि उस समय ही कहला दिए इनसे कि यह ऐसे ही लोग हैं इनको ऐसा ही कहना उचित होगा।

उस समय यह आश्चर्य हुआ कि वह बड़ा गर्मी और लू का समय था और उस समय हम अपने जो समर्पित कार्यकर्ता थे उनको जीप में बिठाकर के और अकेले रिसीव करने गाजीपुर पहुँच गए गए कि गुरुदेव का अस्थिकलश आ रहा है उसको सम्मान देना है लू और गर्मी की परवाह किए बिना हमारे साथ जो बैठे थे वह सभी लगभग क्लाश टू के अधिकारी थे मित्र थे सभी बौद्धिक वर्ग के लोग थे जो मेरे साथ जलती धूप और लू में रिसीव करने पहुँचे थे और वहाँ से उनके पीछे-पीछे पूरे जिले का भ्रमण करते हुए बलिया हम लोग पहुँचे उसी धूप और लू में लेकिन कहीं भी उस व्यक्ति ने यह नहीं देखा कि यह लोग आ रहे हैं इन्हें भी पूछना चाहिए। हालाकि जहाँ भी उनका प्रोग्राम लगवाया गया था जहाँ हम लोगों की मर्जी नहीं थी वहाँ अच्छे प्रोग्राम हुए भी नहीं। वहाँ लोग उपस्थित भी नहीं थे। जहाँ हम लोगों का थोड़ा बहुत प्रभाव था हम लोगों को तो वह जानकारी भी नहीं देते थे उनके कुछ लोग थे उन्हीं को वह जानकारी देते थे और ऐसा हम महसूस किए कि यह तो गायत्री मिशन में भी राजनीति करके अपना एक दल अपना एक ग्रुप तैयार कर रहा है और इसके अलावा सबसे बड़ी बात कि गुरुजी को हम लोगों ने देखा है कि गर्मी के दिन में भी यदि कोई आ गया तो पंखा चला दिया और चला गया तो पंखा बन्द कर दिए।दो धोती दो कुरता के अलावा उनके शरीर पर कभी कुछ रहा नहीं एक कंबल बिछाकर सादगी के तौर पर सोते रहे और उनका प्रतिनिधि बनकर जो आज आया हुआ है उसके लिए मिनरल वाटर के लिए एक आदमी गाड़ी औरमोटर साईकिल में दस-दस किलोमीटर भाग कर जा रहा है। मिनरल वाटर उनके लिए नहीं है जल्दी ले आओ तो वह ले आओ पानी ठंडे करने के लिए वक्शे ले आओ उसमें ले चलो और मेरे सब्र का बांध टूट रहा था और अन्दर से बेचेनी घबराहट और अजीब तरह की सोच, धृणा, क्रोध जो भी कहिए सब उत्पन्न होता चला गया। शाम को उन्होंने डाक्टर अशोक सिंह जो हमारे यहाँ अच्छीहस्ती हैं उनके यहाँ गोष्ठी रखी बड़े सम्मानित और आध्यात्मिक व्यक्ति है उन्हीं के यहाँ उनको रोका भी गया था सजावट की गई थी जैसे कोई बहुत बड़ा शंकराचार्य आ रहा हो इस तरीके से और ठीक भी था मिशन का कोई प्रतिनिधि जा रहा है तो होना भी चाहिए था। रात को ७-८ बजे उन्होंने गोष्ठी बुलवाया उसमें हम लोग भी गए। डेढ़ घण्टे तक लोग नीचे बैठे हुए थे एक तो दिन भर के धूप में मरे हुए बाहर खड़े हुए थै क्या है साहब ए सी में बैठे हुए है जाकर के यह जा रहा है वह जा रहा है अन्त में हमारे सब साथी परेशान जो समर्पण के भाव से वहाँ खड़े थे और जितने धनपशु हैं वह आगे पीछे इधर-उधर कर रहे हैं। अन्त में मैं अपने को रोक नहीं पाया और वहीं से चिल्लाकर कहा तुम लोग चलो यहाँ से यह चोट्टे हैं सब औरयह आए है प्रतिनिध बनकर नहीं यह गुरु को बेचने आए हैं। और ये गुरु को शान्तिकुँज को भी बेच देंगे सब। दो साल पहले मैँ इन लोगों के लिए कहा किसी की हिम्मत नहीं हुई कि मुझसे कोई बात भी कर सके जितने लोग थे मेरे साथ कुछ लोगों को अच्छा लगा कुछलोगों को बुरालगा मेरे साथ सब लोग चले गए उसके बाद मैं उनसे मिलने नहीं गया कई बार उन लोगों ने मुझको बुलवाया बाता करना चाहा हालाकि डाक्टर साहब को भी उस दिन यह बात बहुत बुरी लगी मैं भी जब घर पर गया रात को आत्मचिन्तन करना शुरु किया तो कहा कि अरे यह कैसे मुझसे हो गया मिशन का एक प्रतिनिधि आया है वह भी वहाँ का व्यवस्थापक और किस तरीके से मैं उसके विरोध में और सारी जनता के बीच में ऐसी बात कह दिया अब मैं बहुत बेचेन अन्दर से कि यह तो हमने बहुत बड़ा अपराध कर दिया है गुरु का स्वरूप होता है जो प्रतिनिधि आता है और किस तरह से हमने यह कह दिया। इतना अपमानित किया पूरी जनता के बीच में उसको। लेकिन स्वतः पता नहीं कहाँ से प्रेरणा आई कि जो कुछ भी हमने किया है वह ठीक किया है गुरुदेव की प्रेरणा से किया है और मैंने अपने आपको शान्त कर लिया।

आज जब वह लोग शान्तिकुँज से निकाले गए तो वही लोग जो उस समय नाराज थे डॉ अशोक ने कहा कि तिवारी जी आपके ऊपर गुरुदेव की बड़ीमहती कृपा है कि शान्तिकुँज नेजिसको दो साल बाद समझकर निकाला उसको आपने दो साल पहले घोषित कर दिया कि यह चोट्टा है, बेईमान है और यह बेच देंगे सब शान्तिकुँज को।

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श्री चंद्रेश्वर प्रसाद, पटना

२२ नवम्बर १९६९ को गुरुदेव का सान्निध्य प्राप्त हुआ। १९७५ की इमरजेंसी के बाद जब देश की स्थिति बहुत ही खराब हो चली थी तो स्वर्गीय जयप्रकाश नारायण ने मई १९७६ में शान्तिकुँज मेंअपने एक प्रतिनिधि को भेजा था कि अब इस देश को कोई बचा सकता है तो पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य बचा सकते हैं। क्योंकि इनके पास गायत्री परिवार की एक ऐसी सेना है। जो आरएसएस जैसा राजनीति में आकर और सीधा संघर्ष करके इमरजेंसी से त्राण दिला सकता है। वे प्रतिनिधि रीवा के सर्वोदयी नेता थे। वे यहाँ आए और तीन चार बार उनकी परम पूज्य गुरुदेव से बातचीत हुई। लेकिन परम पूज्य गुरुदेव ने उन्हें यही कहकर विदा किया और कहा कि आप जयप्रकाश नारायण जी से कह दें कि मुझे भी देश के प्रति प्रेम है मैंने भी राजनीति की है मुझे जो करना होगा अपने स्तर से करूंगा और अपने ही माध्यम से करूंगा। वे बेचारे यहाँ से विक्षुब्ध होकर के के गए। और उसके ठीक बाद परम पूज्य गुरुदेव ने स्वर्णजयंती साधना वर्ष की घोषणा की और ऐलान किया कि मुझे भारत वर्ष में एक लाख ऐसे साधक चाहिए जो सूर्योदय होते होते ६ माला का जाप करके दान करदे और उसमें बहुतों ने एप्लाई किया मेरा भी सौभाग्य था मैं भी उसमें चयनित हुआ। वह एक साल की साधना थी और १९७७ में जो इलेक्शन हुआ जैसी हमारी साधनाएँ थी आसाम से लेकर पंजाब और हरयाणा तक इलेक्शन में कांग्रेस हारती हुई चली गई। यहाँ तक कि इंदिरा गाँधी भी हारी और जनता सरकार बनी। जनता सरकार का जो जन्म हुआ वह तिहाड़ जेल में बन्द नेताओं के बीचहुआ था मुरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जनता सरकार चल पड़ी। आप स्मरण कर सकते हैं कि मुरारजी देसाई जिस समय प्रधानमंत्री थे ट्रेन की दुर्घटना हुई पाँच पायलट मर गए और उस ट्रेन से मुरारजी देसाई हाथ जोड़कर बाहर आए। आप यह भी सुन लें इतने वृद्ध व्यक्ति को इतने दिनों तक डायलेसिस पर जिन्दा रखा जाए यह सम्भव नहीं था पर परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से जयप्रकाश नारायण जैसे व्यक्ति को डायलेसिस करके जिन्दा रखा गया। उनके एक से एक चमत्कार हुए। फिर जब जनता सरकार लड़खड़ाई तो जयप्रकाश नारायण की इसमें चिन्ताएँ बढ़ी परम पूज्य गुरुदेव ने अवस्थी जी को यहाँ से पटना भेजा अवस्थी जी मेरे पास आए और हम लोगों ने जाकर जयप्रकाश नारायण जी से मुलाकात की। जयप्रकाश नारायण जी से बातें हुई उन्होंने कहा कि मेरी उम्मीद से ज्यादा आचार्य जी ने देश में कर दिया लेकिन संभाल वहीं सकता है जिसके पास चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता है हम लोगों ने तो किया संभालने वाले नहीं संभाल रहे हैं इमसें हमारा क्या दोष है जाकर के हमारा हार्दिक धन्यवाद शर्मा जी को देना और कहना कि जो जैसा करता है पाता है और फिर कुछ ही दिनों के पश्चात् जनता सरकार जाती रही। ऐसे अनेक दृष्टांत है कि परम पूज्य गुरुदेव ने अपनी चमत्कारिक साधना से पूरे विश्वव्यापी मानवता को किस तरह से त्राण देने के लिए हमको और आपको उद्बोधित किया प्रेरित किया यह हमारा बहुत बड़ा दुर्भाग्य होगा यदि हम उनकी प्रेरणाओं को उनके उद्बोधनों को अपने जीवन में नहीं उतारेंगे तो शायद हमसे बढ़कर अभागा कोई नहीं होगा। परम पूज्य गुरुदेव ने कहा था कि बेटा यदि तुम आगे बढ़ते हो तो विजय श्री तुम्हारे आगे माला लेकर आगे खड़ी है औरयदि तुम पीछे हटते हो तो तुम समझ लो कोर्टमार्शल के लिए तुम्हें आना पड़ेगा। यह बहुत बड़ी चेतावनी थी और यह हम लोगों को बराबर याद रहनी चाहिए।

१९७० में गुरुदेव की शरण में जाने के बाद प्रथम बार में मथुरा आया। ज्योही तपोभूमि के सामने मेरी टमटम रुकी जितने कार्यकर्ता वहाँ थे वह सब आत्मभाव से आकर के कोई हमारा सामान उठा रहा है कोई हमें प्रेम से अन्दर ले जा रहा है। उनकी आत्मीयता देखकर के आँखें छलछला गई कि इतना प्यार तो अपने सम्बन्धियों के यहाँ जाने पर भी नहीं मिलता है। हम लोग श्ििावर में रहे। परम पूज्य गुरुदेव परम वन्दनीया माताजी को बराबर देखने का बन करता था। जहाँ वे रहते थे निगाहे बराबर वहीं पर टिकी रहती थीं। एक बार की बात है परम पूज्य गुरुदेव प्रवचन करके बाहर निकले और मैं टुक-टुक उनको देख रहा था बराण्डे से खड़ा होकर के क्योंकि डर भी लगता था देखकर के। उस समय मेरी आयु ३१ वर्ष की थी। परम पूज्य गुरुदेव ने इशारा किया कि चलो में कक्ष में जा रहा हूँ तुम भी ऊपर आओ। उनका इशारा समझकर मैं उनके पीछे-पीछे ऊपर गया ऊपर गया तो यह देखा कि परम पूज्य गुरुदेव और परम वन्दनीया माताजी मसलन पर बैठ गए हैं। और बहुत सी वहाँ स्लेट पेंसिल रखी हुई हैं। जिसको जो पूछना होताा था स्लेट पर लिख देते थे परम पूज्य गुरुदेव पढ़ते थे जवाब देते थे। मैंने भी कुछ आध्यात्मिक प्रश्र किया था गुरुदेव ने मेरे प्रश्रों को पढ़ा बोले बेटा अभी तुम नये-नये आए हो सारी चीजों को समझ जाओगे पहले तुम अपनी शारीदिक बात बताओ कोई कष्ट है क्या? कोई और तुम्हारी अपनी बात है क्या। मैंने कहा पिताजी आप तो सब जानते हैं कोई खास कष्ट नहीं है। बोले नहीं मैं पूछता हूँ कष्ट है कोई तुमको। हमने कहा पिताजी जब आप पूछ ही रहे हैं तो १९६५ में मैं बहुत जबरजस्त बीमार पड़ा था तब से मेरा हार्ट बहुत कमजोर हो गया है। मैं डेथ बाडी को नहीं देख सकता हूँ सीढ़ियों पर चढ़ता हूँ तो हाँफ जाता हूँ। बहुत परेशानियों में रहता हूँ गुरुदेव ने अने पास बुलाया और कहा तुम्हारा हार्ट कहाँ है तुम्हारा हार्ट कहाँ हैं और उन्होंने मेरे कुरते में हाट डालकर ठीक हार्ट के पीछे उन्होंने एक छौटी सी चिउटी काटी और बस उस चिउटी में इतनी शक्ति थी कि मैं ६१-६२ वर्ष का होने जा रहा हूँ फिर भी में इतनी हिम्मत औरताकत के साथ सेवारत रहता हूँ परम पूज्य गुरुदेव ने इस तरह से मेरे हृार्ट में शक्तियों का अंबार लगा दिया।

१९७१में बक्सर में १०८ कुण्डीय यज्ञ हुआ उस समय मैं जान्डिस से पीढ़ित था। परम पूज्य गुरुदेव के पास मेरीपत्नी ले गई। यह कहते हुए कि यह मेरे पति है बराबर बीमार रहते हैं परम पूज्य गुरुदेव ने दो फूल दिया और कहा बेटा कि अबतुम्हें कुछ नहीं होगा और सचमुच में मैं उस दिन से बिल्कुल स्वस्थ हूँ और कोई बीमारी मुझे नहीं होती है।

जब मेरी बच्ची शादी करने को हुई तो परम वन्दनीया माताजी ने कहा कि क्यों जी तुम लड़के को डूढ़ रहे हो क्या। मैं जवाब देने ही वाला था कि मेरी पत्नी बोल उठी की माताजी यह तो सिर्फ गायत्री परिवार में ही जाते हैं अन्यत्र जाते नहीं गायत्री परिवार वाले इन्हें देखकर घबड़ा जाते हैं कि यह भी गायत्री परिवार का है दहेज तो मिलेगा नहीं फिर वे लोग किसी न किसी बहाने से टाल देते हैं मेरी बच्ची की शादी नहीं हो रही है परम वन्दनीया माताजी ने कहा कि बेटा तुम क्या समझते हो कि सिर्फ गायत्री परिवार में ही अच्छे लोग हैं गायत्री परिवार के बाहर भी अच्छे लोग हैं तुम बाहर भी प्रयास करो और देखो। सचमुच में हम यहाँ से गए और जाने के २४ घण्टे के अन्दर मेरी बच्ची की शादी तय हो गई और जहाँ शादी तय हुई उसके बड़े भाई जो उसका गार्जियन था उससे पूछा कि भाई आप लोगों की क्या डिमाण्ड हैं उन्होंने यह बताया कि डिमाण्ड की बात करते हैं बच्चा तो इतना सिद्धान्तवादी है वह यदि सुन लेगा कि आप कुछ देने के योग्य है तो वह शादी नहीं करेगा वह गरीब से गरीब लड़की से शादी करना चाहता है। इसलिए आपको जो कुछ भी देना हो शादी के बाद ही देंगे अभी उसकी चर्चा तक न करेंग और मेरी बच्ची की शादी इतनी अच्छी हुई कि मैं क्या कहूँ सब परम पूज्य गुरुदेव के चमत्कार और उनकी कृपा का फल था।

शादी के बाद हम अपनी बेटी और दामाद को लेकर यहाँ आए परम पूज्य गुरुदेव ने बातें की और मेरे दामाद से जो बातें हुई तो मैंने कहा कि पिताजी यह कम्युनिष्ट पार्टी के बहुत ही अच्छे लीडर हैं और ये अपने यूनियन के इंडिया फेम के आदमी हैं। परम पूज्य गुरुदेव ने उन्हें बुलाया और कहा कि कम्युनिष्ट पार्टी को हिन्दुस्तान की भूमि पर जिसने उतारा है वह हमारा सहयोगी रहा है और जब तुम यहाँ से पटना जाओ तो मथुरा होते हुए उनसे मिलते हुए चले जाना वे सत्यभक्त जी के नाम से मथुरा में जाने जाते थे। पत्रिकाओं और किताबों को लिखकर परम पूज्य गुरुदेव का सहयोग किया करते थे। हमारे दामाद यहाँ से मथुरा गए और श्री सत्यभक्त जी ने उन्हें कम्युनिष्ट पार्टी के जो बहुत ही गोपनीय दस्तावेज जो थे वह उन्हें समर्पित किया और कहा कि बस लगता है कि हम आपके ही लिए रखे हुए हैं इसलिए हम इसको आपको समर्पित कर रहे हैं इसे आप सुरक्षा से रखियेगा। हमारे दामाद खुश होकर उसको लाए और बहुत ही बढ़िया तरीके से उसको रखे हुए हैं।

हमारा बच्चा जब योग्य हुआ बीएससी उसने कर लिया इंजीनियर का टेस्ट दिया जब हम लोग यहाँ आए परम पूज्य गुरुदेव ने कहा तुम्हारे बच्चे के क्या हाल हैं हमने बताया पिताजी उसने आलइंडिया बेस पर काम्प्रेटिव टेस्ट दिया है स्कूल आफ माइन्स धनवाद में एडमीशन के लिए उन्होंने उसका नाम लिख लिया और हर वर्ष ७० से ७५ लड़कों का ही सलेक्शन होता था एडमीशन के लिए उस वर्ष १३५ लोगों का सलेक्शन हुआ जिसमें हमारे बच्चे का क्रमांक १२२ था यदि उस साल परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से बच्चों की संख्या नहीं बढ़ी होती तो शायद हमारा बच्चा इंजीनियरिंग स्कूल में नहीं जा सकता था। परन्तु परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से वह इंजीनियर बना।

एक बार हमारे दूसरे बच्चे ने सामूहिक अनुष्ठान में एक ऐसे घर में अनुष्ठान कर दिया जो भूतों का अड्डा था और इस गायत्री अनुष्ठान से यह भूत इस तरह से उग्र हो गए। कि ४, ५ भूत मेरे सेकेण्ड बच्चे पर उतर गए और बहुत अधिक तंग कर डाला। अपने बच्चे को मैं मरणासन्न स्थिति में यहाँ लेकर के आया और परम पूज्य गुरुदेव के समक्ष ले गया परम पूज्य गुरुदेव ने सारा वृतांत सुना और कहा कि अगर वह लड़की गुलाबों की फूल माँगती है तो देख हमने आज सिर्फ गुलाब के फूल चढ़ाये हैं अपने पूजा कक्ष पर तुम इन फूलों को ले जाकर उस बच्ची को दे देना और बस उन्होंने थोड़ा सा माथा ठोका और हमारा बच्चा ठीक हो गया। जब मैंने आत्मचिन्तन किया तो यही पाया कि वह भूत भी इसलिए पकड़े हुए था कि हमारा उद्धार इन लोगों के माध्यम से शान्तिकुञ्ज में हो जाऐगा और उसका उद्धार हुआ और बच्चा हमारा ठीक हुआ।

किसी सन्त या व्यक्ति पर मेरा धार्मिक विश्वास नहीं जमता था बल्कि मैं उपहास उड़ाया करता था कि भक्त और भगवान के बीच में इन सन्तों की क्या आवश्यकता है या किसी पुरुष की क्या आवश्यकता है। १९ नवम्बर १९६९ की बात है जब १०८ कुण्डीय यज्ञ के प्रथम चरण में कलश यात्रा पटना में निकाली जा रही थी परम पूज्य गुरुदेव एम्बेसडर गाड़ी से नीचे उतर रहे थे और जितने इनके भक्तगण थे वह दोनों तरफ से परम पूज्य गुरुदेव को चरण स्पर्श करने के लिए पंक्तिबद्ध होकर खड़े हुए थे। मैं इनकी मूर्खता को समझकर उपहास उड़ा रहा था और उस समय मैं पान खाकर के चूना चाट रहा था और यही मैं समझ रहा था कि कैसे यह मूर्ख लोग हैं जो एक व्यक्ति को इतने आदर की दृष्टि से देख रहे हैं। ज्योही परम पूज्य गुरुदेव नजदीक आते चले गए मैं एक कोतूहल वश उस भीड़ के नजदीक पहुँचता गया और गुरुदेव एकदम नजदीक आ गए तो जब सभी चरण छूकर के प्रणाम कर रहे हैं तो फिर मैं ऊपर से कैसे प्रणाम करूं वातावरण ने मुझे कम्पेल किया मैं भी उनका चरण स्पर्श करूं। मैं भी चरण स्पर्श करने के लिए झुका, हाथ बढ़ाया संयोग यह हुआ कि मेरे हाथ की उंगलियों का स्पर्श उनके पैर के चमड़े से हो गया और ज्योही स्पर्श उनके चमड़े से हुआ मुझे यह अहसास हुआ कि मेरे अन्दर किसी ने बहुत तेज विद्युत प्रवाह प्रवाहित कर दिया और मैं अकबकाकर के इधर उधर देखने लगा यहाँ पर तो करंट का तो कोई श्रोत है नहीं फिर यह करंट कहां से मुझे लग रहा है। और ऐसे करंट मुझे लगे दो तीन बार झटके मुझे महसूस हुए और उस झटके में शायद परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से हमारे जितने पूर्व जन्मों के कुसंस्कार थे या नासमझी थी या अज्ञानता थी वह सब उन्होंने साफ कर दिया और इतनी जबरजस्त श्रद्धा उमड़ी इतना जबरजस्त प्यार उमड़ा कि अब उन्हें चारों तरफ जहाँ भी वह रहते थे मेरा उन्हें देखने का मन करता था और देखता ही रहता था। उस समय हमारे चारों बच्चे बहुत ही कम उम्र के थे। पत्नी हमारी कहाँ रह रही है बच्चे हमारे कहाँ रह रहे हैं इसका भी मुझे बोध नहीं रहता था। जहाँ परम पुज्य गुरुदेव बैठै रहते थे खड़े रहते थे वहीं मैं मड़राता रहता था और यदाकदा हम दोनों की आँखे चार होती रहती थीं उन आँखे चार होने में कितनी प्रेरणाएँ उन्होंने मुझे दी कितनी शक्ति दी कि कार्यक्रम के करीब २०-२५ दिनों तक मैं मदहोशी की स्थिति में रहता था। गद्गद रहता था इतना आन्तरिक आनन्द रहता था कि उसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता। बल्कि मुझे एक और यह अनुभूति हुई कि मेरे परिवार में पारिवारिक उलझनों के कारण किसी प्रकार का मनोमालिन्य था मनमुटाव था तो मुझे यह लगता था कोई आने वाले व्यक्ति को जब मैं देखता था तो मुझे यह लगता था कि यह तो वही व्यक्ति है जिससे मेरा मनमुटाव है और जब वह नजदीक आते थे तो लगता था कि यह तो कोई दूसरा व्यक्ति है। ऐसे एक नहीं अनेक बार ऐसी घटनाएँ घटी। और इन घटनाओं पर जब मैंने आत्मचितन किया तो मुझे यह अहसास हुआ यह ज्ञान हुआ कि परम पूज्य गुरुदेव यह कह रहे हैं कि बेटा यह जितने दुनिया के व्यक्ति है यह सब तुम्हारे आत्मस्वरूप हैं और तुम इस तरह अनबन करके रहोगे तो कैसे चलेगा। जिस-जिस से तुम्हारी पारिवारिक उलझन हैं पहले उनके घर जाना चाहिए और उनके चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लेना चाहिए और मैंने यही किया जिन-जिन से परिवार में किसी प्रकार का मनोमालिन्य था दीक्षित होने के बाद मैं उनके घर गया चरण स्पर्श किया प्रणाम किया और कहा कि मुझे बहुत बड़े सन्त के सम्पर्क में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और मुझसे कोई गलती हो गई हो तो मुझे क्षमा करेंगे आगे से हमारा आपका पारिवारिक सम्बन्ध बहुत अच्छा रहेगा और ऐसा हमने व्यवहार करना शुरु किया औरउसका नतीजा यह हुआ कि मुझे परिवार में चारों ओर से सहयोग मिलता हुआ चला गया।

परम पूज्य गुरुदेव जब हिमालय यात्रा में गए थे तो उन्होंने कहा था कि तुम्हें बहुत अधिक साधना करने की आवश्यकता नहीं है तुम मेरा काम करो मैं तुम्हारा काम करूंगा और हिमालय से शक्ति अर्जित करके तुम लोगों को प्रदान करता रहूँगा। दूसरा उन्होने कहा था कि यदि तुम्हारे चार बच्चे हैं तो तुम एक बच्चा और युग निर्माण को लेकर जाओ और जिस तरह से अपने बच्चे का लालन पालन करते हो उसी तरह युग निर्माण का तुम काम करना अपना बच्चा समझकर। परम पूज्य गुरुदेव ने इन सन्देशों के साथ-साथ ऐसी प्रेरणा दी कि सचमुच में युग निर्माण के कार्यक्रम करने का इस तरह से सौभाग्य मिलता गया कि उसका भी उल्लेख करना छोटे मुँह बड़ी बात होगी लेकिन फिर भी कार्यक्रम के क्रम में यह बात भले ही विश्वसनीय न हो लेकिन इस तरह से मैं व्यस्त रहता था कि मुझे यह भी पता नहीं रहता था कि हमारे कौन बच्चे किस क्लास में पढ़ रहे हैं। परिवार की क्या स्थिति है। परिवार में कौन सामान है या नहीं है। लेकिन हमारी पत्नी वीणा प्रसाद ने इस सन्दर्भ में मुझे बहुत सहयोग किया। और जितनी व्यवस्था सम्बन्धी बातें थी यह स्वयं करती रहीं और इन्होंने मुझे पूरी छूट दे रखी थी कार्यक्रमों को सम्पादित करने के लिए कभी कभी यह भी झल्ला जाती थीं इसलिए कि इनके लिए मैं थोड़ा सा भी समय नहीं निकाल पाता था और पारिवारिक कुछ बातें हों कहीं जाना हो बाजार हाट ही जाना हो उसमें कुछ व्यवधान आता तो यह कभी कभी झल्ला भी जाती थी लेकिन फिर भी हम लोगों का सम्बन्ध खास कोई उतना बुरा नहीं था। एक बार जब हम लोग यहाँ आए तो परम पूज्य गुरुदेव ने पूछ ही डाला क्यों आपस में कोई लड़ाई झगड़ा तो नहीं होता है। इन्होंने बताया कि कि कभी कभी कोई बात हो जाती है यह इतना अपने काम में व्यस्त रहते हैं कि परिवार का इनको कोई खास ख्याल नहीं रहता। गुरुदेव ने कहा देख तू मुझसे ज्यादा व्यस्त नहीं होगा बेटा फिर भी मैं माताजी को प्रसन्न करके ही काम करता हूँ माताजी को किसी प्रकार की मुझसे शिकायत नहीं है तुमको भी इसी तरीके से करना चाहिए। मैने तबसे प्रयास किया आपसी तालमेल हम लोगों का बहुत अच्छा बना बहुत अच्छा मिलजुलकर हम लोगों ने काम किया। हमारी पत्नी ने हर जगह सहयोग किया।

एक बार की बात है मैं कार्यालय से लंच टाइम में निकल जाया करता था झोला पुस्तकालय लेकर आफिसों में पढ़ाने के लिए एक आईएएस अफसर जिनके साथ मेरा अटैचमेन्ट था और उस समय इमरजेंसी का समय था और मुझे आने में कुछ विलम्ब हो गया तो उन्होंने बहुत ही तुनक करके मुझसे कहा कि क्यों साहब आपको मालुम नहीं है कि लंच पीरियड आधे घण्टे का होता है और आप दो-दो घण्टा बाहर रह जाते हैं। मैंने बहाना बनाया कि मैं बहुत दूर से आता हूँ और मेरे पास सायकिल है वह भी अच्छी नहीं है आने जाने में समय लग जाता है। इसलिए विलम्ब हो जाता है। बातें बहुत बढ़ गई इतनी बढ़ गई कि मैंने लिखित रूप में उनको दे दिया और बहुत ही जबरजस्त रूप में नौक-झौक करके मैंने उनको लिखित रूप में दे दिया। उस समय इमरजेंसी का समय था और चीफ मिनिस्टर बिहार उनके खास फ्रेंड थे दोनों एक साथ मिलकर नास्ता करते थे लंच लेते थे। देने को तो मैंने दे दिया लेकिन रातभर मुझे नींद नहीं आई कि यदि यह थोड़ा सा भी एक कलम लिख दें तो मेरी नौकरी जा सकती थी लेकिन धन्य है हमारे गुरु और धन्य है हमारी गुरुमाता की प्रेरणा कि दूसरे दिन जब मैं आया तो मेरे बॉस ने बुलाकर कहा कि क्योंकि जो कुछ तुमने लिखकर के दिया है यह सही दिमाग से दिया है मैंने समझा कि अगर मैं यहाँ से मुकरता हूँ तो शायद यह मेरी सर्विस ले लेंगे मैंने कहा जी हाँ सर मैंने जो कुछ भी लिखकर दिया है सत्य बात लिखकर के दिया है मुझे उससे एक इंच भी इधर उधर डिगना नहीं है। उसका ऐसा असर उनके ऊपर हुआ कि उन्होंने हँसते हुए हमारे कागज को लौटाते हुए कहा कि चंद्रेश्वर अभी तुम बच्चे हो नौकरी बहुत बड़ी चीज होती है लो मैं तुम्हें लौटाता हूँ और यही तुमसे कहूँगा कि नौकरी से खिलवाड़ मत करना। कहने का मतलब यह कि कितने भी किसी प्रकार के अवरोध आए लेकिन गुरु के कार्य में कोई हमें नहीं रोक सका। चाहे हमारी पारिवारिक उलझन हो चाहे हमारे कार्यालय का कोई उत्तरदायित्व हो हमारे मिशन के कार्य में कोई उलझन पैदा नहीं कर सका। यह परम पूज्य गुरुदेव की कृपा मैं मानता हूँ।

श्री गुलाबचंद मीणा गुना मध्य प्रदेश

मेरा पूरा परिवार गायत्री मिशन से जुड़ा हुआ है। मेरी आँखें खराब हो गई थी आँखों की रोशनी चली गई थी जिला स्तर पर डाक्टरों को दिखाया कोई अराम नहीं हुआ इसके बाद इंदौर में दिखाया। डाक्टरों ने मस्तिष्क के ट्यूमर की सम्भावना व्यक्त की। इसके बाद माताजी को पत्र लिखा माताजी के पत्र का जवाब पहुँच गया जिसमें लिखा था यह तो पूर्व जन्म के भोग होते हैं जो भोगकर ही चुकते हैं लेकिन जीवन के कोई क्रियाकलाप रुके नहीं रहेंगे कोई योग्य चिकित्सक को दिखाए इसके बाद पुनः चिकित्सक को दिखाया बीमारी की जो सम्भावना थी वह समाप्त हो गई इसके बाद में शान्तिकुँज आया माताजी को बताया तो माताजी ने कहा कि गायत्री माता से प्रार्थना करेंगे की ठीक हो जाओ इसके बाद में पूर्ण स्वस्थ हूँ।

श्री दीनू जैन हजारीबाग बिहार

१९७६ में हमारे यहाँ यज्ञ हुआा उस अवसर पर आपके कार्यकर्ता हमारे यहाँ चंदा लेने आए। चंदा में सिर्फ एक ही रुपया माँगा और आने के लिए निवेदन किया। मैं सोचने लगा कि इसके पहले हजारी बाग में यज्ञ हुआ तो लोगों ने एक सौ इंक्यापन पाँच सौ एक और एक हजार एक रुपया माँगे और यह एक ही रुपया माँग रहे हैं इसमें क्या कारण है तो मन में बड़ा कौतूहल हुआ कि इस यज्ञ को जरूर देखनाचाहिए कि एक रुपये में कैसे यज्ञ हो जाता है। मैं यज्ञस्थल पर गया तो देखा कि चारों और अच्छे अच्छे सद्वाक्य लगे हुए हैं। साहित्य स्टाल लगा हुआ है उसमें से मैंने कुछ पुस्तकें खरीदी। लेकिन उस समय इन किताबों को पढ़ने का मौका नहीं मिला। इन किताबों को पढ़ने का मौका मिला १९७८ में मेरे काका जी का देहान्त हो गया था उस समस दूकान बन्द रहती है तो उस समय किताब पढ़ने का मौका मिला। एक किताब मैने पढ़ी मानव जीवन की गौरव गरिमा। किताब के तीन, चार पन्ने पढ़ने के बाद ऐसा लगने लगा कि यह किताब किसी सन्त महात्मा की लिखी हुई ही है। मैं किताब यह समझकर लिया था कि कोई रायटर होगा। लेकिन यह राईटर नहीं हो सकता राइटर होता तो इतना हाई क्वालिटी का नहीं हो सकता था रायटर होता तो इसका दाम तीस पैसा नहीं तीन रुपये होता। सन्त महात्मा जो होते हैं उनके मार्गदर्शन में आदमी उन्नति के रास्ते पर जाता है। वह किताब पढ़ने के बाद यह जिज्ञासा हुई कि जिन्दगी में कुछ न कुछ अच्छा काम करना चाहिए। फिर सोचा अच्छा काम क्या करना चाहिए? तो अच्छा विचार आया कि अच्छा काम तो वही हो सकता है जो समाज की आज आवश्यकता है। तो देखा कि आज अज्ञान अभाव और अनीति की वजह से आदमी परेशान है। अतः इसी को दूर करने के लिए मैं खाते कमाते हुए काम करूंगा ऐसा उद्देश्य बना।

अब मन में बात आई कि इस काम करने के लिए रुपया कहाँ से आएगा। इसके लिए पैसे की आवश्यकता पड़ेगी। तो जो कमाते हैं उसी में से निकालना पड़ेगा। तो कभी सोचा चार आने निकालूं, कभी सोचा आठ आने निकालू कभी सोचा एक रुपया निकालूँ। तो यह मन्थन १५ दिन तक चलता रहा। सोचता था कि इतना बड़ा संकल्प चार आने आठ आने में कैसे पूरा होगा एक रुपया निकालने से कुछ काम बनेगा तो सोचा कि जो कमाते हैं तो एक रुपया निकाल देंगे तो कैसे होगा तो सोचा कि दूसरे मिसलेनियस खर्च जो दूकान में होते हैं उसी में से निकाल दूँगा। और एक रुपया रोज निकालने का निर्णय लिया अब सोचा कि स्टार्ट कब से किया जाए तो महावीर जयंती आया तो सोचा कि अच्छा काम अच्छे दिन से करना चाहिए तो उसी दिन घर में यज्ञ करवाया मथुरा से कोई वरिष्ठ परिजन आ गए थे उनके माध्यम से यज्ञ हुआ। उसी दिन संकल्प लिया कि इस कार्य के लिए एक रुपया रोज निकालूँगा और निकालता चला गया। कुछ रुपया इकट्ठा हुआ तो फिर मन में आया कि इस सन्त को देखना चाहिए। तो जाऊं कैसे मैं दूकान पर अकेला हूँ और कोई बैठने वाला है नहीं। और जाने के लिए १२ दिन का समय चाहिए और उसमें १२०० रुपये का लास हो जाएगा तो फिर सोचा कि मैं बीमार हो जाऊं या किसी केस में फंस जाऊं तो जेल तो जाना पड़ेगा तो यही समझ लेना चाहिए कि मैं बीमार पड़ गया हूँ या कुछ दिन की जेल ही सही। अअपने मन को इस तरह से समझाकर के मैंने सोचा कि दूकान बन्द करके जाना पड़ेगा तो मैं जाऊँगा अब सत्र में आते समय मन में यह आ रहा था कि कैसे मैं निकलंू कोई भी जाते हुए देखेगा कि हरिद्वार जा रहा है और जैन समाज का आदमी है और हरिद्वार में न तो इसका कोई तीर्थ स्थान है न कोई रिस्तेदार है तो मैं क्या बहानेबाजी करूंगा। किसी गुरु के पास जाने की बात कहूंगा तो कहेंगे कि जैन समाज का आदमी होकर कहाँ भटकता रहता हैयह लोग पूछेंगे तो क्या जवाब दूंगा। इसलिए मैं रात में ९ बजे न निकलकर स्पेशल गाड़ी करके रात में तीन बजे मैं निकला ताकि कोई जाते हुए न देखे। हजारी बाग से कोडर्मा आया वहाँ से ट्रेन में बैठा और सोचा कि अब कोई पूछेगा तो बहाने बाजी बना दूँगा कि लखनऊ जा रही हूँ या हरिद्वार जा रहा हूँ। मैं शान्तिकुं ज पहुँच गया शान्तिकुँज पहुँचा तो पूछा गया कि परमीशन लाए हैं क्या मैने कहा परमीशन तो नहीं लाए हम पाँच लोग थे मैं, मेरी पत्नी, बहन और दो बच्चे तो गुरुदेव तक बात गई और मेरे रहने की व्यवस्था हो गई। लेकिन जब खाना खाने बैठे तो रूखी रोटी सब्जी दाल और भात और साधारण सा खाना और उस तरह का साधारण खाना हमने जिन्दगी में खाया नहीं था। तो थोड़ा बहुत खाकर रह जाता था और बाकी खाना जो नास्ता पानी लाया था वह खाता रहता था। तो सोमवार मंगल बुध तीन दिन तो इस तरह गुजारा जब चौथा दिन आया उसमें खाना खाने बैठे तो उसमें नमक नहीं था तो मैं सोचा भाई गलती से नमक छूट गया होगा। मैं एक कार्यकर्ता भाई साहब से पूछा कि भाई साहब इसमे नमक छूट गया है नमक दीजिए। तो बोले आज कौन दिन है मैंने कहा गुरुवार है बोले आपको नहीं मालुम है गुरुवार अस्वाद व्रत रहता है। मैंने माथे पर हाथ रखा एक तो खाना अच्छा नहीं लगता है ऊपर से आज खाने में नमक नहीं। तो सोचा आज परिवार वाले जरूर बिगड़ेंगे कि कहाँ हमें लाकर फंसा दिया है। जब कमरे में पहुँचा तो सचमुच परिवार वाले झगड़ने लगे कि एक तो वैसे ही खाना अच्छा नहीं लगता था और आज तो नमक भी नहीं है मैं तो एक कौर भी खाना नहीं खाया कहाँ लाकर फंसा दिया। अब तो नास्ता भी खतम हो गया है। खाना नहीं खाएगे क्या भूख भी लगी है। तो यहाँ से आटो से हरिद्वार गए और वहाँ खाना खाया। वहाँ से आए तो १२ से डेढ़ गुरुदेव का प्रवचन होता था उस प्रवचन पर गुरुदेव ने इन्द्रिय कंट्रोल जीभ पर आँख पर इस पर प्रवचन दिया। बोले जो आदमी मिर्च मसाने खाता है पेट खराब हो जाता है उसमें पैसा भी ज्यादा लगता है और अनपच की बीमारी हो जाती है। कभी कुछ खाया कभी कुछ खाया इस तरह से खाने से पेट खराब हो जाता है औरमन चंचल हो जाता है इसलिए कोई अच्छा काम कर नहीं सकता है। फिर बोले की आँख अच्छी अच्छी चीज देखना खोजता है और उसी के लिए पापकर्म करता है। यदि आदमी आँख पर और जीभ कर कंट्रोल करले तो महानता की ओर बढ़ सकता है। तो मन में यह विचार हुआ कि क्या मैं इन्द्रिय कंट्रोल में इतना कमजोर हूँ। जीभ पर कंट्रोल नहीं कर सकता हूँ। तो बस उसी समय उस खाने का महत्त्व समझा। कि सात्विक खाने में यह राज है और फिर शाम से वही खाना खाने लग गया तो फिर वही खाना अच्छा लगने लगा। फिर चार पाँच दिन बचे उस खाने को बड़े शौक से खाया परिवार वालों को भी अच्छा लगा। हमारे साथ हमारी बहिन भी आई थी उसको एक साल के लिए प्रशिक्षण के लिए यहाँ छोड़ दिया था छोड़ते समय तो बड़ा दिक्कत हुआ कि अकेली बहिन को छोड़कर जा रहा हूँ वह भी रोले लगी मैं भी रोने लगा। उसको समझ लो कि आज ही तुम्हारी शादी हो गई है ससुराल जाती तो हमें छोड़ना ही पड़ता समझ लो कि यही तुम्हारी यही ससुराल है और इसी तरह से तुम्हें रहना है। फिर हम लोग चले गए। मन में एक वहम था कि बारह तेरह दिन दूकान बन्द रही है तो हमारे ग्राहक टूट गए होंगे कहाँ से कहाँ चले गए होंगे। लेकिन देखा कि ग्राहक हमारे टूटे नहीं है बल्कि दूकानदारी हमारी और बढ़ गई। गुरुदेव के प्रवचन में मैंने सुना था कि यहाँ आने वाले को कोई नुकसान नहीं होता तो विश्वास नहीं था लेकिन दूकान पर जाकर देखा कि वाकई में मेरी दूकानदारी बढ़ गई तो मन में विश्वास जम गया कि सन्त महात्मा जो कहते है वह सत्य होता है। सौभाग्य की बात है कि उसी साल सन् १९७८ में २५ कुण्डीय यज्ञ का प्रस्ताव लेकर केन्द्रीय प्रतिनिधि रांची के मिश्रा जी वहाँ आए। उन्होंने वहाँ गोष्ठी ली गोष्ठी में बहुत लोग पहुँचे सब ने कहा कि २५ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ होना चाहिए लेकिन मिश्रा जी ने बताया कि संकल्प लेने शान्तिकुँज जाना पड़ेगा। दो लोगों के जाने की बात तय हुई मैंने सोचा कि अब जाऊं कैसे जून में गया था अब सितम्बर में कैसे जाऊं क्या बहाना बनाऊं घर में तो मैने बहाना बनाया कि जो आदमी वहाँ छोड़कर आया है उसे दो महीने के बाद देखने के लिए जाना पड़ता है। घर में बात उठाई तो माता पिता को लगा कि बेटी है वहाँ तो जाना चाहिए और नियम भी है तो पिताजी बोले कि मैं चला जाता हूँ तो फिर बहाना बनाया कि नहीं जो छोड़कर आया है उसी को जाना पड़ता है तो बोले ठीक है जाना तो पड़ेगा ही तो इस तरह से मंजूरी मुझे मिल गई। हम चार लोग यहाँ आए आने के बाद गुरुजी से मिलने का मौका मिला गुरुजी हाल चल पूछे परिवार का पूछा पूछने के बाद अपनी बात रखी कि २५ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ का संकल्प लेने आया हूँ। गुरुदेव ने कहा यहा तू कर लेगा गुरुदेव ने कहा तू चेन से नहीं बैठेगा चैन से नहीं बैठेगा। यह बात समझ में नहीं आई मैं खुश होकर वहाँ से उतरा तीन दिन के बाद संकल्प के लिए मेरा एनाउन्समेंट हुआ तो मैं संकल्प के लिए नहीं बैठा अपने प्रतिनिधिन चिरंजीलाल को बैठाल दिया जो मेरे साथ गए थे। मैं इसलिए नहीं बैठा कि जैन धर्म का होने के नाते प्रचार प्रसार करूंगा तो लोग कहेंगे कि अपने धर्म को छोड़कर दूसरे के धर्म का कैसे प्रचार प्रसार करता है और दूकान में अकेला हूँ इसलिए प्रचार प्रसार नहीं कर सकता। इसलिए उन्हें ले गया लेकिन मन में लगा कि लेना चाहिए, लेना चाहिए बाद में मैं भी बैठ गया। जब हमारा नंबर आया तो गुरुजी तिलक लगाए रक्षासूत्र बांधे माताजी ने फूल दिया। उसके बाद मनोबल जो डाऊन था दस पंद्रह मिनिट बाद हमारा मनोबल ऊँचा हो गया। उमंग और उल्लास आने लग गया तो हमने तुरन्त यह असर देखा कि गुरुजी के तिलक लगाने के बाद में यह प्रतिक्रिया हुई। फिर हम वापिस हजारी बाग आए यहाँ आकर हमारी आटा चक्की खराब हो गई ठीक ही नहीं हुई तो मन में आया कि गुरुजी के यहाँ जाने के बाद तो आटा चक्की खूब बढ़िया चलना चाहिए उद्योग खूब चलना चाहिए यह ऐसी आटा चक्की खराब हुई कि कुछ पता ही नहीं चल रहा है यह क्या बात हुई। फिर चक्की को अलग कर दिया और वहाँ गुरुजी का पुस्तकालय खोल दिया और रोज यज्ञ करने लगा सुना था कि रोज यज्ञ करने से जो भी मनोकामना होती है उसकी पूर्ति हो जाती है। डेली पूजा करने लगा और डेली यज्ञ करने लगा। चूंकि यहाँ से बीस पैसा नित्य और एक घण्टा समय देने का नियम बनाकर गया था तो दूकान खोलने के पहले एक आदमी से मिल लेता था उसके बाद ही दूकान खोलता था। कभी कभी ऐसा भी हुआ कि दूकान भी खेलना है सम्पर्क के लिए भी जाना है तो जिस दिन सम्पर्क करने गया उस दिन एक दो बज जाते थे पर लौटकर दूकान खोली तो जितनी बिक्री होना चाहिए वह हो जाती थी। और कभी कभी ऐसा भी हुआ कि जिस दिन गुरुजी का काम छोड़ दिया और अपना काम करने में लग गया उस दिन हमारा शेल नहीं हुआ। गुरुजी ने प्रवचन में कहा था कि बेटा तू हमारा काम कर हम तेरा काम करेंगे तो गुरुजी का काम करते थे तो हमारा काम निश्चित रूप से हो जाता था। १९७९ में आयोजन बहुत अच्छी तरह सम्पन्न हुआ।

मार्च १९७९ में अपनी सिस्टर को लेने के लिए हमें यहाँ आना पड़ा उसी समय शक्तिपीठों का संकल्प हुआ था उसी समय हमारे हजारी बाग के भी बहुत से परिजन आए हुए थे उसमें राजेन्द्र प्रसाद जी ने संकल्प लिया था मैं सहयोगी के रूप में संकल्पित हुआ था। बड़ी खुशी हुई कि इस माध्यम से हमारा संकल्प पूरा होगा। पर कुछ विरोधी परिजन भी थे जिसकी वजह से वह संकल्प पूरा नहीं हुआ और संकल्प लौट गया। मन में दुख हुआ कि गुरुजी हजारी बाग आएगे कैसे। उसी समय प्रज्ञापीठ का भी संकल्प निकला था कि प्रज्ञामन्दिर बीस हजार के अन्दर हो जाते हैं। मैंने सोचा यह तो मैं कर लूंगा रुपया तो मैं लगा लूँगा किसी तरह से। एक आदमी और तैयार किया कि वह प्रचार प्रसार करेगा मैं रुपया देता चला जाऊंगा। उनको लेकर मैं यहाँ आया ७९-८० का समय होगा उस समय प्रज्ञापीठ का संकल्प मैंने लिया। संकल्प लेने के बाद बहुत दिन तक जमीन नहीं मिली। तो मन में यह भाव आया कि दूसरे लोगों ने संकल्प लिया उनको जमीन भी मिल गई शक्तिपीठ भी बन गया हमें अभी तक जमीन भी नहीं मिली कैसे संकल्प पूरा होगा। तो मन के अन्दर बड़ा विचारआने लग गया मन भावुक होने लग गया सोचते सोचते मन में यह विचार आया कि गुरुजी यह कार्य तो नहीं हो रहा है पर आपका उद्देश्य है जनजागरण करना साहित्य का प्रचार-प्रसार करना वह मैं अपनी दूकान से कर लूँगा इस घर से कर लूँगा। आँख से आंसू गिरने लग गए। जब मन स्थिर हुआ तो सोचा कि जिस महापुरुष का दर्शन नहीं होता उसकी कल्पना करताा है कि वह हमारे घर पर आ जाएँ यह कैसे सम्भव होगा। लेकिन भावनाओं में कितनी सचाई है यह उस समय देखने को मिला जब १९८१ में गुरुदेव उसी स्थान पर पहुँचे जिस स्थान पर मेरे आँसू गिरे थे और उनका आशीर्वाद हमें मिला और उसी समय वह भोजन भी किए। भोजन में पता लगा कि गुरुजी उतना ही लेते हैं जितना वह खाते हैं तो मन में सोचा कि प्रसाद कैसे मिलेगा तो प्रसाद लेने के लिए मैने भात ज्यादा दे दिया तो गुरुजी ने कहा बेटा इतना भात क्यों ले आया मैं क्या जानवर हूँ इतना खाऊंगा मैने कहा गुरुजी थोड़ा तो है बोले ला, ला, ला में समझ गया तेरी बात को मैं थाली लाया उसमें उन्होंने हाथ से चाँवल उठाकर अलग से थाली में रख दिया मन में खुशी हुई कि चलो भाई प्रसाद मिल गया। अन्त में इस इंतजार में था कि थाली में जो जूठन बचेगा उसे में खा जाऊंगा। लेकिन गुरुजी ऐसा साफ करके खाये कि उसमें थोड़ा बहुत ही कण बचा होगा तो थाली ले गया और उसको धोकर पी गया सोचा यह महाप्रसाद है इसे नहीं छोड़ना चाहिए। आज जब में सोचता हूँ कि दूकान में जाता हूँ मकान में जाता हूँ परिजनों में जाता हूँ तो हमेशा ही मिशन की बात करता रहता हूँ यह सोचता रहता हूँ कि कैसे मिशन से जोड़ू तब यह बात याद आती है कि गुरुजी कहते थे कि बेटा तू चेन से नहीं बैठेगा चेन से नहीं बैठेगा। तो अब देखते हैं कि ठीक वही बात हमारे साथ में गुजर रही है। पहले हमारा आटा मिल थी तेल मिल थी उससे भी गुजारा नहीं होता था लेकिन आटा चक्की और मिल उठ जाने से दूकान में ही हमारा ध्यान गया और उसी से हमारा डेव्हलपमेंट होता चला गया। उसी से हम बढ़े और इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ी। एक ही चीज पर ध्यान रहा गुरुदेव का काम करना और अपने परिवार का जीवन निर्वाह करना। यह उद्देश्य रहा।

जिस समय गुरुदेव आए उस समय वह हजारी किसान की बात बताया करते थे कि वह अशिक्षित था निर्धन था लेकिन मन में यह बात थी कि लोकमंगल का काम करना चाहिए। इसलिए उसने हजार बाग लगाए मैं सोचता हूँ कि आज समाज को देश को गुरुजी को जाग्रत आत्माओं की आवश्यकता है। मैंने यह आदर्श रखा कि हजारी बाग से हजार जाग्रत आत्माओं को निकालूँगा और उन्हें मिशन के काम में नियोजित करूंगा।

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डॉ० रजनीश ठाकुर पटना बिहार

मैं अखण्ड ज्योति के माध्यम से १९७३ से गुरुदेव से जुड़ा हूँ उस समय मैं इनको एक अच्छा विद्वान, लेखक, समाज सुधारक के रूप में जानता था। घटना उस समय की है जब मेरा एक पुत्र एक साल ग्यारह महीने का था उसका देहान्त हो जाता है और जब मैं उसकी आत्मा की शान्ति के लिए योगिक कार्यक्रम करना शुरु किया जो बौद्धिक रीति रिवाज के अनुसार है तो वह उस समय अपनी बड़ी बहिन के शरीर में प्रवेश कर कहने लगा पापा तुममुझे खोज रहे हो मेरा शरीर कहा है लाओ में प्रवेश करूंगा मैने कहा तुम्हाराशरी तो तुम कल चले गए यह तो मैं योग किया था कितुम वापिस आ जाओ तो तुम क्यों नहीं आए। तो पापा मैं क्या करूं हम मंत्र के वश में हो गए थे। अब मेरा शरीर कहा है लाओ। मैंने कहा शरीर तो मैने गंगा के सुपुर्द कर दिया। अब तुम्हारा शरीर कहाँ से लाऊँ तो हमारा शरीर ले गए हैं गुरुदेव मैंने कहा गुरुदेव कौन गुरुदेव कैसा गुरुदेव तो वह दौड़कर घर जाता है और वहाँ गुरुदेव की एक तस्वीर लगी हुई थी यही तो गुरुदेव हैं यही तो हमारा शरीर ले गए हैं चलो ले चलो हरिद्वार। जल्दी हरिद्वार चलो वहाँ वह रखे हुए है। हमें विचित्र लगा कि कैसा कह रहा है। हम लोग बच्चे के मोह में हरिद्वार के लिए प्रस्थान किया। तो जब मैं लक्सर आया तो वहाँ से दूसरी गाड़ी पकड़कर हरिद्वार के लिए चढ़ा तो मुझे लगा कि कौन है गुरुदेव जो इसका शरीर यहाँ लेकर आए। मैं इसके पूर्व सन्त लम्पा का साहित्य पड़ा था उनकी सोलह किताबें थी और मैं उन्हें अपने मानसिक गुरु के रूप में मान लिया था। उनकी सारी किताबे लिखी हुई है कि उन्होंने आध्यात्मिक रीति से जब तक सृष्टि का सृजन हुआ जब तक सृष्टि रहेगी यह सारी बातें उसमें हैं और इस पृथ्वी पर जितने भी साहित्य हैं उन सबके विषय में उन्होंने लिखा मेडीकल साइंस पर लिखा होम्योपैथी, एस्ट्रोलॉजी, खनन विद्या सारी चीजें लिखी सारी घटनाएँ उसमें हैं। सोल कहाँ से आती है बर्थ क्या है रीबर्थ क्या है यह सारी बातें तो इस तरह से उनको गुरु मानकर उनकी बातों को प्रयोग किया और उसी प्रयोग के माध्यम से निकला कि चलो देखे गुरुदेव कौन है कहाँ हैं। उनके विषय में पूरी जानकारी लो और इतना कहकर मैं ध्यानस्थ हो गया। ध्यानस्थ होने के बाद मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि साक्षात शंकर आसन में बैठे हुए हैं और इतनी चमक है कि उस चमक से हमारा ध्यान टूट जाता है। तो मैंने सोचा कि क्या गुरुदवे साक्षात् शंकर हैं। तो विचित्र बात है। मैंने उस समय किसी से कुछ नहीं कहा। और सीधे शान्तिकुँज पहुँचा रिसेप्सन में कहा और कहा कि गुरुदेव से मिलना है। तो वहाँ मुझे रहने की व्यवस्था कर दी गई। फिर स्नान भोजन के बाद हमें गुरुदेव से मिलने का समय दिया गया। उस समय इतनी भीड़ नहीं होती थी जितनी की आज होती है। बैठा स्लिप भेजा उसके बाद वीरेश्वर उपाध्याय जी ऊपर से आए। बोले चलिए आपको बुला रहे हैं। तो गुरुदेव ऊपर अपने सोफासेट पर बैठ लिख रहे थे मैं उनके पैर के पास बैठ गया। मैं रो रहा था और मेरी आँसू उनके दाहिने अंगूठे पर टप-टप गिर रहे थे। गुरुदेव मुझे समझाते जा रहे है कि बेटा देखो दुनिया है। हमने कहा इस बच्चे का शरीर कहा हैं दे दीजिए हम इतने दूर से आए हैं हमें ऐसा विश्वास हुआ है बच्चा बोलता है कि गुरुदेव हमारा शरीर ले गए है और वापिस कर देंगे। बोले बेटा यह तो ठीक बात नहीं है वैसे मेरे लिए कोई असम्भव बात नहीं है मेरे लिए मैं सब कुछ कर सकता हूँ। मैंने कहा सब कुछ कर सकते हैं तो दे दीजिए। बोले नहीं बेटा प्रकृति के नियम को हम कैंसे तोड़ेगे। ऐसा करो इसको गया ले जाओ और इसका श्राद्ध कर दो। मुझे गुरुदेव विभिन्न आध्यात्मिक उदाहरणों से भरमाने लग गए तो मुझे तो रम्पा साहब की किताबों से सारी जानकारी मिल गई थी। मैंने सोचा यह तो बड़ी मुश्किल बात है यह तो घुमा रहे हैं हमको। लेकिन ये तो है स्वयं। मैंने कहा देखिए गुरुदेव क्षमा कीजिएगा आप क्या है मैं देख लिया हूँ आपको आप मुझे मत भरमाइये हम आपको छोड़ेगे नहीं। आप कौन है मैं बोलता हूँ। जैसे ही कहने लगा बो लेखनी छोड़कर बोाले चुप बस मन की बात पूरी हो गई मैंने कहा धन्य हो गुरु तुम सचमुच वही हो नहीं तो प्रकट नहीं करने दिया नहीं तो कैसे जान लिया कि मैं क्या कहने जा रहा हूँ। मैं रोए जा रहा हूँ पत्नी इधर रो रही है बच्चे उधर रो रहे हैं परेशान बच्चे की हालत मैने कहा अब क्या होगा बोले देखो सारा चीज हम करेंगे लेकिन प्रकृति का नियम नहीं तोड़ेगे बेटा। अरे आया है घूम फिर लो कनखल जाओ, ऋषिकेश जाओ घूम लोऔर अन्त में गया जी जाना तो वहाँ श्राद्ध कर देना।

इसके पूर्व में ब्रह्मवर्चस गया था यहाँ यह घटना बिजली की तरह फैल गई। कि एक बच्ची के शरीर में दो आत्माएँ किस तरह से हैं। तो ब्रह्मवर्चस वाले बोले कि भाई कल आइये इसको जरा हम टेस्ट करेगे। कि एक शरीर में दो आत्माएँ कैसे हो गया। अब जब बच्चे से बात करें तो बच्चा वेद वेदान्त की बात एस्टालाजी की बात सारी बतलाने लगा। अब ये लोग दंग कि यह क्या हो रहा है। इतनी बड़ी बच्ची और सारी चीज बताता है। बोले अच्छा ठीक है कल आइए। दूसरे दिन मैं गया तो उस समय प्रणव पंड्या जी थे उस समय वो सादी धोती और खादी के कुरते में थे। बोले भाई हम आपको बुलाए थे पर रात को गुरुदेव इस विषय पर हम लोगों की क्लास लिए हैं और यही कहा है कि यह तुम्हारा विषय नहीं है यह मेरे ऊपर छोड़ दो। इतने के बाद बच्ची नार्मल हो गई। और बच्ची बोलती है कि पापा हम कहाँ आए हैं। तुम कहा थी इतने दिन बोली हम तो थे नहीं हम कहाँ हैं हमने कहा हरिद्वार में हैं बोली हम भी देखेंगे जरा। वह चारों तरफ घूमकर देख लिया। अब चले तो डगमग करे हमने कहा क्यों ठीक से चलो बोली डोलता है शरीर हम तो थे नहीं उड़ते थे तो आया कैसे बोली बबुआ आया हमको धकेल दिया। वह घुस गया हम क्या करें हम उड़ रहे थे। तो यह स्थिति रही। दो-तीन दिन के बाद हम जाने लगे तो हमें ऐसा लगा कि गुरुदेव को पाकर के हम गवा दे रहे हैं। अरे साक्षात हमारे आराध्य उनको पाकर हम गवां रहे हैं अब हम गाँव नहीं जाएगे हम तो यहीं रहेंगे। गुरुजी बड़े प्रेम से बोले पीठ थपथपाकर अरे बेटा जा रे। तू जो करता है वही कर हम तुम्हारे साथ है सब ठीक हो जाएगा। आदेश हुआ अब क्या करे मुझे जाना पड़ा।

दूसरी बार आए उस समय गुरुदेव सूक्ष्मीकरण में थे माताजी थीं। मैंने सोचा दीक्षा ले लेते हैं। सारा सामान लेकर माताजी के पास गया। हमने कहा माताजी हमको दीक्षा दीजिए। बोले अरे जा रे ठीक है तुझे दीक्षा की जरूरत नहीं है। मैंने कहा मैने सामान ले लिया। जा ना किसी को दे देना। अब यह बात आज तक रहस्य है कि माताजी हमें दीक्षा क्यों नहीं दी। जा तू ठीक है रे। अब हम क्या कहें। घर गया ंजब वहाँ ध्यान किया गायत्री माता का परम पूज्य गुरुदेव का गायत्री माता की जगह पर वन्दनीया माताजी हाजिर। कभी तो शारदा माँ आ जाए। कभी यह आ जाए। मैंने कहा क्या बात है बड़ी हँसी आवे। पाण्डे जी की बात जब आँवलखेड़ा में हुई उन्होंने कहा हमी कुछ आदमी है चार पाँच आदमी है जो उनको परमात्मा के रूप में नारायण के रूप में जाना। तो समय मेरा रोंया खड़ा हो गया आँसू चलने लगे कि गुरुजी हमको ठग लिए। बहुत रोए उस दिन तब से जिस दिन याद पड़ता है सचमुच मेरी आँख से आँसू आ जाते हैं कि गुरुदेव को मैं पाकर भी खो दिया। लेकिन वह हमेशा हमेशा हमारी रक्षा करते रहते हैं।

एक बार जब इंदिरा जी का मर्डर हुआ था मैं जा रहा था बोकारो उस समय मैं सिक्ख धर्म में था कृपाण पगड़ी वाला पटना जंक्शन आया तो सब सिक्ख को पकड़ पकड़कर कत्लेआम हो रहा था मुझे माब घेर लिया चलिए प्लेटफार्म पर चलिए एक बाबा पहुँचे सन्यासी बाबा बड़े लम्बे-तगड़े गेरुआ वस्त्र खड़ाऊ बोले यहाँ क्या कर रहे हो चलिए पुलिस कस्टेडी में जाइए मैंने कहा जान न पहचान मेरे को कह रहे हैं जाइये पुलिस कस्टेडी में। बोले जाइये उठना पड़ा हमको। तो फर्स्ट क्लास में घुस गए फर्स्ट क्लास में सब कूपे बन्द एक खुला हुआ था उसमें घुस गए। रात में गाँव पहुँचे वहाँ दो भाग हो गए बोले यह सिक्ख है मारो इसको कुछ लोगों ने कहा यह तो गाँव का लड़का है। इसको कैसे मारोगे इसको कुछ भी हो गया तो गाँव में आग लग जाएगी। ऐसा नहीं हो सकता। यह सब उन्हीं की कृपा थी।

१९९६ में मेरे घर के पास आग लग गई। देखते देखते मेरे घर के पास आ गई। चहार दीवारी की तरफ हमारे भाई साहब का मकान है। उनका स्वाहा हो गया मैने कहा गुरुदेव यह क्या आग। जल्दी पानी लाओ पानी का गिलास लिया थोड़ा पिया कंठ सूख गया था उसके बाद उसी में से जल लेकर शान्ति मंत्र पढ़ा हमको यह नहीं पता कि पाानी झूठा है हमने मारा और आवाज लगाई गुरुदेव बचाओ एकाएक मेरे मुँह से निकलता है बचाओ अब इतना पानी गिरने लगा कि लगा कि गंगा स्वयं पहुँच गई। और कहाँ से कितना आदमी आया मंत्र पढ़ने के दो ही मिनट बाद शान्त हमारा कुछ भी बर्बाद नहीं हुआ भाई साहब का सारा चीज स्वाहा हो गया। लोग कहते हैं अरे तुम्हारा कैसे बच गया। हमने कहा हमारा कैसे बच गया हम क्या बताए हमारे बचाना वाला तो वह है। उसके पहले हम दो तीन महीने पहिले लाउड स्पीकर का सेट खरीदे थे गुरुदेव हमसे यहाँ कहे कि बेटा हमारा काम तुम करना तुम्हारा काम हम करेंगे। जो हमको दस पैसा देगा उसको हम हजार दे देगे। पाँच हजार कुछ रुपये लगे उसमें। साहित्य वगैरह सबमें बस उसी में से सुबह शाम पढ़ते थे। कैसेट बजाते थे। गाँव वाले बहुत प्रभावित हुए बच्चे बच्चे के मुँह पर गायत्री मंत्र कुछ खास खास आदमियों को बताया पाँच हजार रुपया गुरुदेव के नाम पर खर्च किया हमारा लाखों बचा दिया नहीं तो जल जाता तो हम कहाँ रहते।

दो साल पहले हमारी बच्ची का विवाह किया शादी में दहेज भी दिया हालाकि हम इसके विरोधी है फिर भी नहीं देने से काम नहीं चलता है। तो उन लोगों की हमेशा यही माँग रहती थी कि पैसा दो पैसा दो। प्रथम दिन से ही उसने दुर्व्यवहार किया बच्ची तीसरे दिन चली आई। फिर बुलवाया बच्ची को भेज दिया हालाकि ऐसा नहीं होना चाहिए था लेकिन क्या करें। बच्ची है गर्ज है इसके लिए मान-अपमान कुछ नहीं। उसको इतना मारा कि इसका आई साइट इफेक्टिव हो गया। एक दिन हमसे कहा बच्ची ने कि बाबूजी आपही बताइये हम क्या करें तो गुरुदेव की किताब रखी हुई थी जीने की कला हमने कहा तू क्या करेगी ले पढ़। दूसरे दिन क्या देखते हैं कि नहा धोकर चली गई पूजा घर में जप करने लगी हमको लगा कि अब गुरुजी इसको पकड़ लेगें। फिर अब ट्रेनिंग कर रही है नर्सिग ग्रेड १ की पीएमसीएस में। सब उन्हीं की कृपा है।

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गुरुदेव के संस्मरण

श्री वासुदेव पुरी जमालपुर मुंगेर, सभापति जी बिहार

सन् १९८० में हम जयपुर गायत्री माता की मूर्ति लाने गए थे। मूर्ति को बक्सा में बन्द करके स्टेशन पर पहुँचे कुली को बुलाया तो कुली आया उससे पूछा तो उसने कहा १०० रुपया लेंगे। उस समय लदाई का रेट था दस रुपया। हमने कहाँ हिन्दू नहीं हो मुसलमान हो क्या? यह तो मूर्ति लादना है तुम्हें कम में लादना चाहिए। इतना कहने पर चार-पाँच कुलियों ने मिलकर घेर लिया। बोलो बेवकूफ एक बार और बोलो। हम बोले बार-बार बोलेंगे क्या करोगे। जान ले लोगो। तुम कहते हो १०० रुपया जब बहुत समीप आने लगा तो हमे लगा कि अब तो यह मार ही देगा। उसी समय ऊपर से ओले की वर्षा होने लगी शाम को पाँच बज रहे थे। उस समय पानी के कोई आसार नहीं थे। पत्थर गिरने लगा तो सारे कुली भाग गए और हम तो दास थे छोड़कर कहाँ भागें। पत्थर से चोट खाने लगे। इतने में जब वह भाग गए तो पत्थर बन्द हो गया। इतने में एक आदमी आया और बोला बाबू उठाइये हम लाद देते हैं। हमने कहा नहीं पहले पैसा बताओ कितना लोगे। वह बोला हम हिन्दू हैं हम पैसा नहीं लेंगे। ऐसे ही लादेंगे। दोनों मूर्ति उठाकर के डब्बा में लाद दिया बैठा दिया। उसको पैसा देने लगे वह बोले नहीं हम पैसा नहीं लेंगे हम हिन्दू हैं, हम हिन्दू हैं हम पैसा नहीं लेंगे। हम बहुत प्रार्थना किए उसको केला दिए एक दर्जन केला था केला वह लिया बहुत परिश्रम के बाद हमको उस समय लगा कि हमारे भगवान ही आए हैं। हमारे गुरुदेव किसी न किसी रूप में आए हैं। चाहे सूक्ष्म रूप में इसके दिमाग में आ गए हों या खुद ही आ गए हों। नहीं तो इतने लोग टूट पड़े थे फिर पत्थर क्यों आ गया। और वह १०० रुपये माँग रहे थे फिर यह मुफ्त में क्यों लाद गया यह हमारे भगवान हैं।

इसके बाद वहाँ से चलकर इटावा स्टेशन पर आए। इटावा स्टेशन पर एक बाबू चढ़े। उनकी धोती फट गई मूर्ति के बक्से से लगकर दो-तीन थप्पड़ हमको मार दिया बेवकूफ माल वाले डब्बा में क्यों नहीं लादा यहाँ लाद दिया। चन्दन टीका किया है हमारी धोती फट गया। हम हाथ जोड़े और उसका पैर पकड़े हमको जानकारी नहीं थी कि कहाँ लदाता है इसलिए हम लाद दिया कुली लाद दिया है, मारिए मत। कूछ दूर चलकर के चार बदमाश गाड़ी पर चढ़ा और चढ़कर के लोगों का पैसा छीनने लगा। हमारे पास आए बोले बाबा जो पैसा पास में हो तो दे दीजिए। हमने हाथ उठाए और कहा कि भाई हमारे शरीर में जो तुम्हारे लायक हो तो ले लो। इतने में से उनमें से एक ने बोला बाबा को छोड़ दो और पीछे लोटे तो बाए साईड वह बाबू साहब बैठे थे जिनने हमें दो-चार चांटे लगाए थे। उनका पकड़ लिया कालर और कहाँ कि पैसा दे। वह अकड़ रहे थे पैसा ऐसे ही दे देंगे तुम्हारे कहने से दे देंगे। उनको दो आदमी पकड़ लिया दो ने चांटे लगाए उनके पास ४००० रुपया था वह ले लिया और लेकर जब चैन खींचकर उतर गया तो हमारे पैर पर गिरकर वह रोने लगे हमें माफ कर दीजिए हमने कहा हमने आपके साथ क्या किया आप तो हमें मारे हैं। जान हमारा बच गया मार खाने से हमको कुछ नहीं हुआ। रुपया ले लिया हम कमा लेंगे हमको लगता है कि आप भगवान है। इसलिए हमने आपके ऊपर हाथ चला दिया इसका नतीजा हमको मिला है हमारी आँखें खुल गई। हमने कहा हम भगवान नहीं हैं हमारे कहीं हैं आपने हमारे साथ गलत किया है उसका जुर्माना आपको लगा है हमने कुछ नहीं किया। हमने किसी को पुकारा भी नहीं है।

इस मूर्ति लेने के लिए चंदा इकट्ठा करने के लिए हम कलकत्ता गए थे वहाँ एक आदमी ने हमको बताया कि एक आदमी है जगन्नाथ सिंह मखौल कर दिया वह बहुत बड़े आदमी हैं आप जाएगे तो हजार दो हमार रुपया आपको चंदा देंगे। हम उनके पास पूछते-पूछते गए। जाकर उनको प्रणाम किया। उन्होंने चौकी पर बैठाया बोले समाचार कहिए हमने कहा सारसा जिला से हम आए हैं मूर्ति की स्थापना होना है चंदा दीजिए। उन्होंने कहा कि एक बात आप बता सकते हैं हमने कहा जानकारी होगी तो जरूर बताएगे। नहीं बता पाएगे तो किसी से पूछकर आपको बताएगे हम किसी के दूत हैं। हम किसी के हज्जाम हैं हम इतना अनुभव नहीं है लेकिन जवाब हम पूछकर देंगे। तो बोले आप चंदा लेने क्यों चले हैं जब पूछकर जवाब देंगे। हमने कहा प्रश्र कीजिए हम जवाब देंगे अन्दर से हमको गुस्सा आया। बोले धरती पर एक आदमी भी ऐसा है जो ईमानदार हो जिसका धर्म बचा हो। हमने कहा इसका जवाब हम अभी देंगे लेकिन एक बात आपसे पूछेंगे हम। जवाब आप दीजिए। बोले कहिए क्या पूछेंगे आप। हमने कहा आप जाइये घर में अपनी पत्नी से पूछिए और आप अपने हृदय से पूछिए दोनों आदमी आपस में बात करके निर्णय निकालिए आप दोनों आदमी ठीक हैं तब तो दुनियाँ ठीक है अगर दोनों आदमी में कोई गलत है तो दुनियाँ गलत है। इतने में जूता निकालकर हमको मारने को तैयार हो गया बोला जूता मारकर खाल को खींच लेंगे। हमने कहा कि खाल आप खींच सकते हैं लेकिन प्राण नहीं खींच सकते। इतना कहा तो जूता नीचे रख दिया और भक-भक करके रोने लगे। उस समय हम भी रो दिए अरे भगवान को हमने तकलीफ दिया। यह जो जूता मारने वाला था इसको कौन रोक दिया। जूता उठा लिया था रो क्यों दिया इतना मूड इसका खराब था। किसी ने भेज दिया इसके समीप चंदा मिलेगा यह हमारी क्या दशा कर रहा है। हमें हुआ तो हुआ हमारे भगवान को आना पड़ा रोकने के लिए। हमको याद आ गया कि शायद द्रापदी के जैसे भगवान आकर जूता को थाम लिए हैं क्या?

जब वहाँ से बाहर निकले रोते हुए तो एक आदमी हमको थोड़ी दूर जाने पर मिल गया बोले क्यों रो रहे हो। झोली लेकर आए हो पीला झोली था और गर्दन पर गायत्री मंत्र का दुपट्टा था झोली में क्या है हाथ डाल दिया जबरजस्ती। निकाला तो उसमें मुस्कराते रहो स्टीकर दस बीस हमारे पास थे अखण्ड ज्योति था वही निकाल लिया और पढ़ा और कहा आप रोते क्यों हो। हमने कहा हम तो आए थे चंदा के लिए हम मार खा रहे हैं आप लोग यहाँ बसते हैं और हम मार खा रहे हैं। बोले कौन मारा है हमने कहाँ उसका नाम हम नहीं लेगें झगड़ा बढ़ जाएगा। अब हम जाएँगे चंदा वसूलेंगे नहीं। बोले नहीं अभी चलिए चंदा हम आपको दिलवाते हैं जब गए तो एक घण्टे में ४५६ रुपया दिलवाया और बोले अभी हमको जाना है गाड़ी पकड़कर दूसरी जगह।आप कल यहाँ आइये आपको चंदा वसूल करा देंगे। दूसरे दिन आठ बजे गए तो दोनों दिन का मिलाकर ४०२६ रुपया कुछ पैसे हमको वसूल करवाया वहाँ भी हम देखा तमाशा जहाँ हमारा कोई परिचित नहीं था मारने वाला आदमी भी हमारा परिचित नहीं था हमारा स्टीकर निकाला वह भी हमारा परिचित नहीं था। चंदा जो दिया वह भी परिचित नहीं था और हमें वहाँ इतना पैसा मिला उसको लेकर हम घर आए उससे हमारा मन्दिरका प्राण प्रतिष्ठा हुआ यज्ञ हुआ। इसी के आधार पर हमारा विश्वास जमता गया हमारों के बीच में गोली चलता है बन्दूक चलता है लोग डरकर भाग जाते हैं हम बीच में आ जाते हैं दोनों साइड के लोग बोलते हैं अरे अन्धड़ आ गया चलो भागो इसके सामने कुछ मत करो। यह भगवान गुरुदेव का काम है। हमारा इसमें कुछ नहीं है। हाँ एक बात है गुरुदेव ने जो कहा है उसको हमने किया है एक बार यहाँ आए तो गुरुदेव ने कहा हम जो कहते हैं तो उसको मानियेगा। हमने कहाँ आपका कहना तो सब मानेंगे। बोले बेटा बेटी की शादी कैसे करेंगे हमने कहा जो नारा लगाते हैं उसके आधार पर करेंगे। कैसा नारा लगाते हैं? हमने कहा बेटा बेटी नहीं बिकेंगे। तो बोले क्या आप बिना तिलक के शादी करेंगे। हमने कहा हाँ करेंगे। हवन कुण्ड पर बैठकर आप संकल्प ले लेंगे हमने कहा हाँ ले लेंगे। बोले अच्छा ठीक है। तो हमने एक बेटी की शादी यहाँ से की है शान्तिकुञ्ज से कोई तिलक नहीं दिया है। सन् ९५ के ज्येष्ठ की दसवी के दिन और ९६ के चैत्र की नवमी के दिन दो बेटों की शादी गाँव में की है एक लाख रुपया मिल रहा था हमने कहा कि नहीं पैसा से हम शादी नहीं करेंगे। हम गुरुदेव को वचन दिए हैं वहीं करेंगे हमने उससे एक चम्मच तक नहीं लिया। उसका एक चम्मचअन्न नहीं खाया हम गाड़ी पर आया अपना खाते-खाते और लौटे अपना खाते-खाते उससे हम कुछ लिया नहीं है तो गुरुदेव को हमने जो वचन दिया है वह हम करते आए हैं। इस पर हमारा भरोसा है कि हम भगवान का काम करते हैं हमारा काम क्यों नहीं होगा।

रामचंद्र बाबू जब हरिद्वार आए और यज्ञ करना था हजार कुण्डीय गुरुदेव ने कहा कि रामचंद्र आपको १०८ अखण्ड ज्योति का ग्राहक बनाना है उन दिनों १०० से नीचे ग्राहक थे। तो रामचंद्र बाबू रोने लगे बोले हम पढ़े-लिखे नहीं हैं अज्ञानी व्यक्ति है हमारी बात कौन सुनेगा। इतना हमसे नहीं होगा। दस पाँच और लोग थे उन्होंने भी कहा हम पाँच बनाएगे दो बनायेगे। परन्तु रामचंद्र बाबू से गुरुदेव ने कहा श्रीराम का चेला राम तुमको तो करना ही है। राम का काम किया था हनुमान ने तुम्हें भी करना है यह काम और तुम उसी तरह से स्वीकार लो तब तक हनुमान शक्तिशाली नहीं थे जब तक राम से भेंट नहीं हुई थी। वे सुग्रीव के नौकर थे। लेकिन जब राम से मिल गए तो उनको समुद्र लांघने की ताकत मिल गई। बोले लो अक्षत और फूल लो अक्षत और फूल लेकर भागे भागे घर गए कि वहाँ बनाएगे। लेकिन वहाँ एक भी नहीं बना। तो वहाँ से करजा लेकर आसाम गए बिहार के बहुत से लोग आसाम में रहते हैं सोचा वहाँ अखण्डज्योति के ग्राहक बनेंगे लेकिन लेकिन वहाँ एक महीने रहे एक ग्राहक भी नहीं बना। एक आदमी आया बोले बाबूजी आपकी बात हमको बहुत अच्छी लगी आप हमारे यहाँ चलकर एक कुण्ड का हवन करा दीजिए एक मन्दिर है शंकर जी का बोले हम चलेंगे हमारा तो यही काम है। यह गए जबकि इनका अच्छी तरह से पढ़ना नहीं आता था। लेकिन मजबूरी वश उसको उच्चारण किया किसी तरह टूटे फूटे शब्दों में। ज्योंही हवन शुरु हुआ कि उस मन्दिर में किसी ने देखा नहीं एक बहुत मोटा सफ आया और उसी स्थान पर लिपटकर बैठ गया और उसी स्थान पर एक एक ड़े किलो का मेढक आया। यह खबर आस पास के क्षेत्रों में फैली उस दिन दो बजे तक हवन होता रहा। वह मेढक और सफ हटा नहीं। अब वहाँ जवार वाले कहे कि हमारे यहाँ भी हवन होगा तो बोले आज नहीं होगा कल से होगा। लेकिन एक बात है हवन तो हम कराऐगे लेकिन हम एक काम लेकर चले हैं भगवान का काम। आपके सामने जब भगवान साक्षात दिखाई दे रहे हैं ऐसा तो आपने कभी नहीं देखा होगा कि सांप और मेढक एक साथ रहें। तो आपने देखा इसके आधार पर आपको विश्वास यदि हो रहा हो तो हवन कराइए विश्वास नहीं हो रहा हो तो हमें परेशान मत कीजिए। हवन कराइये लेकिन १०८ हमें अखण्ड ज्योति का ग्राहक बनाना है अखण्ड ज्योति दिखलाए और दिखलाने के बाद हवन वहाँ होता रहा और एक डेढ़ बजे तक में १०८ अखण्डज्योति के ग्राहक बने वह पैसा जमा किए। और तीन दिन हवन कराकर वह रसीद का कट्टा वह गुरुदेव को लाकर दिए।

एक बार गुरुदेव रांची गए थे में यज्ञ होने वाला था। यज्ञ होने के तीन-चार दिन पहले दस-बीस लोगों ने वहाँ जो बांस बल्ली जो यज्ञ के लिए एकत्रित की गई थी काट दिया तोड़ दिया। कहा कि कलयुग में गायत्री जपने का किसी को अधिकार नहीं है। यज्ञ जप हम होने नहीं देंगे। वहाँ से गुरुदेव को फोन किया गुरुदेव को तीन दिन थे जाने के लिए उस समय गुरुदेव यज्ञों में जाते थे। गुरुदेव यज्ञ के एक दिन पहले पहुँचे। वहाँ पण्डाल बनना बन्द हो गया था। गुरुदेव जब वहाँ गए तो कहा कि देखिए साहब आप लोग जितने कार्यकर्ता है बारह तेरह तो हैं सब जाइये और लोगों के कहिए कि श्रीराम शर्मा आचार्य नाम के जो हमारे गुरुदेव है वह आ गए है चलिए आप सब चलकर उनसे भेंट कीजिए। सबों को बुलाइये और एक काम कीजिए बहुत सारी रस्सी रखिए नारियल की और चारों तरफ आप रहिए गायत्री परिवार के जो लोग सहयोगी हैं और जितने लोग बढ़्ते जाए रस्सी को बढ़ाते जाना। जितने लोग रस्सी के अन्दर आ जाएगे कोई बगावत नहीं करेंगे। सारे जो लूटपाट कर ले गए थे अत्याचार किए थे उन सबको बुलाया गया। सब आए मखौल के रूप में चलिए एक आदमी आया था तो क्या करेगा उनसे पूछा जाएगा। जप यज्ञ हम लोग होने नहीं देंगे। वह लोग आए और चारों तरफ से रस्सी घूम गया वह लोग आए थे हिम्मत बांध कर नहीं होने देंगे तकरार करेंगे लेकिन किसी का कुछ नहीं चला। गुरुदेव ने बैठने को कहा सब लोग चुप बैठ गए। बोले हमारा तो कहना है कि हम आपके भले के लिए यज्ञ करने आए हैं आपको ही करना है, आप ही हमारे हैं, हम आपके हैं, आपके घर में यज्ञ हो रहा है। फायदा आपका होगा कि हमारा होगा। आप सभी इसमें सहयोग करिए और जितना बांस बल्ली इसमें लगे उसकी व्यवस्था कीजिए। आपका अपना पैसा हो तो लगाइये चंदा हो तो कीजिए। जो ले गए हैं उठाकर तो दीजिए। हाँ गुरुदेव हम सब करेंगे गुरुदेव ने कहा हाथ तो उठाइये। सारे लोग हाथ उठाए और उसी दिन दिन भर में सारी व्यवस्था करके पण्डाल लगाया गया सारी व्यवस्था करके कलश यात्रा हुई। उसमें सारे लोग कहने लगे यह आदमी नहीं भगवान हैं। यह दृश्य वहाँ देखने को मिला।

एक आदमी हमारे पास आया बोला हमारी बहु को सन्तान नहीं हो रहा है जरा आप देखिएगा जाइयेगा हरिद्वार तो कहिएगा तो हम आए तो कहा नहीं, जहाँ दर्शन के लिए गए वहाँ चिट्टी लिखकर रख दिए और जब यहाँ से गए तो उनसे कहा कि आप एक गाय खरीदिए और कहा कि गाय का मूत्र थोड़ा सा पानी में मिलाकर पीजिए और स्नान कीजिए। उन्होंने किया तो साल के अन्दर उनको पोता हुआ। वह भी बहुत खुशहाल है उनका पोता भी जिन्दा है। गुरुदेव को हम गुरु नहीं भगवान मानते हैं। भगवान मानकर हम उन पर विश्वास करते हैं। भगवान थे ही मानने का सवाल ही क्या है। हमें कई बार ऐसा संकट पड़ा है कि भगवान कई बार आकर हमको गोदी में उठा लेते हैं।

हमारे यहाँ एक आदमी को दिन में १० बजे हरवाही में सांप काट लिया लोग उठाकर हमारे पास लाए नाड़ी देखा तो नाड़ी की चाल धीमी हो गई थी कभी मिलती थी कभी नहीं। उनको हम काली तुलसी के पत्ते का रस पिला दिए पाँच चम्मच दो-दो, तीन-तीन मिनट पर और एक कप रस निकालकर पूरे देह में मालिश कर दिए। उनको होश आने लगा इसी तरह हम तीन चार घण्टे तक चलाते रहे देह में चलाते रहे वह बिल्कुल ठीक हो गया। इसमें हम कुछ नहीं जानते हैं गुरुदेव का नाम याद करते हैं और रोज सुबह उठकर ४५ माला गायत्री का जाप हम अभी करते हैं। किसी को कुछ लाभ हो जाता है वह गुरुदेव की कृपा हैं हमारा इसमें कुछ नहीं है।

एक बार हम शान्तिकुञ्ज आए तो रामचंद्र बाबू के साथ गुरुदेव से मिलने गए। गुरुदेव बोले रामचंद्र तूने तो बहुत यहाँ काम किया तुम अपनी घर की बात कहो क्या घर बन गया। उन्होंने कहा गुरुदेव हमारा घर नहीं बना बगल में हमारे एक जमीन है जो हमारे लायक है पास में पैसा भी नहीं है और वह हमें देने के लिए तैयार भी नहीं है। गुरुदेव ने कहा अच्छा-अच्छा अबकी बार तुम जाओ वह तुमको अपने आप जमीन दे देगा। हम लोग दोनेां जब यहाँ से वापस गए वह आदमी आया उन्हीं के यहाँ आकर हम उतरे वह आदमी बोला रामचंद्र भाई बहुत दिन से आप जमीन माँग रहे थे अब यह जमीन ले लीजिए उन्होंने कहा जमीन लेना तो हमें जरूरी है वह तो लेगें ही पर अभी पैसा नहीं है तो बोले चलो पैसा हमें पाँच महीने के बाद देना हमें लग रहा है कि जितनी जल्दी हो हम जमीन आपको लिखा दे यदि नहीं लिखायेगे तो लगता है कि हम जिएगे नहीं उसको उन्माद जैसा हो गया। रामचंद्र बाबू दूसरे से पैसा लेकर शाम तक रजिस्ट्री करा लिए और पाँच महीने के बाद पैसा दिया। वहाँ भी हमें बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह नहीं देता था और गुरुदेव बोले कि अब दे देगा वहाँ भी हमको लगा कि ये भगवान हैं। बार-बार जहाँ भी गए हमको लगा भगवान हैं।

हमने जिसको कुछ किया उन्हीं को याद करके हम गायत्री माँ को याद नहीं करते गायत्री माँ का जप करते हैं याद करते हैं माताजी और गुरुदेव को और ज्यो ही कोई प्रश्र होता है तो त्यों ही दिमाग में समाधान आता है यहीं शान्तिकुञ्ज गुरुदेव की फोटा पर गुरुदेव की लीला पर और हाथ बढ़ाकर दे देते हैं लोगों को फायदा हो जाता है। हमारा इसमें कुछ नहीं है। एक हमारे परिचित दीपचंद सिंह है उनको लकवा हो गया वह ग्रामसेवक थे तीन साल पहले और उनका इलाज होने लगा उनकी स्थिति अच्छी नहीं थी। हम उनके यहाँ गए उनको देखे हमको भी लगा कि यह ठीक नहीं होंगे बिल्कुल खतम हैं पर हमने सोचा जब तक सांस है तब तक आस है। हम भी कर दे हमने कहा कि एक गाय खरीदिए और इनको खटिया में रखकर गाय के समीप ले जाइए और गाय की देह को इनको स्पर्श कराइये आगे से पीछे तक और गाय पेशाब करे तो इनकी देह पर गिर जाने दीजिए और उनके शरीर को इनसे स्पर्श कराइए मेहनत करके और इनके हाथ से गाय को चोकर डलवाइये। ये कुछ ही दिन में ठीक हो जाएगे। उसी दिन उनका बेटा गया चार दिन के अन्दर गाय खरीदकर लाया और ७-८ दिन ऐसा किया तो बोलने लगे। दस-पाँच दिन में सहारे से खड़े होकर चलने लगे एक महीने में बिल्कुल ठीक हो गए। अब वह मोटर साईकिल चला रहे हैं।

अभी हम अन्धा हो गए हैं। एक मचान बनाए हैं पीपल का पेड़ नीम का पेड़ है, बड़ का पेड़ हैं, पाकर का पेड़ है चार पेड़ के नीचे मचान एक बनाए हैं बांस के तख्ता का उसी पर बैठकर हमारा सारा समय बीतता है और सुबह नहाकर वहीं ४५ माला का जप करते हैं। दोपहर को जब आदमी नहीं रहता है तो मौन मानसिक जप करते हैं शाम में हम आरती करते हैं, प्रार्थना करते हैं भोग लगाते हैं और उस समय भी हम जप करते हैं शाम को भी एक माला का जप करते हैं। अब हमारा काम है कोई आ गया तो उससे बात करना नहीं तो भगवान के नाम का जप करना। अब हमारे पास कोई काम नहीं है कोई अशान्ति नहीं है। खाने की कोई दिक्कत नहीं है हम कोई बहुत बड़े धनवान, सामर्थ्यवान नहीं है जितना है उसमें हमको कम नहीं हो रहा है। शान्तिकुँज को हम स्वर्ग मानते हैं। स्वर्ग कहीं आकाश में नहीं है। शान्तिकुञ्ज ही हमारा स्वर्ग है। इसमें कितने चोर, बदमाश हत्यारे आए पर किसी का कुछ चला नहीं।

माताजी के बारे में हमारा अनुभव है एक बार हम लोग शान्तिकुँज आए थे जहाँ आज सप्तऋषि क्षेत्र है वहाँ टीन का शैड था और उस समय प्रवचन के समय में गुरुदेव के समय में कुछ बात कह रहे थे उस समय हम लोग ज्यादा से ज्यादा पचास बावन आदमी थे। उसमें वह कुछ बात हम लोगों से पूछे क्या आप लोग समाज में जाकर के घर-घर यह सन्देश सुनाते हैं। अखण्ड ज्योति पढ़ाते हैं ग्राहक बनाते हैं। हाथ उठाए तो दो-तीन लोगों ने हाथ उठाया। सचमुच हम लोगों में उतनी शक्ति नहीं थी हम लोग उतना समझे नहीं थे यह सन् ७५ की बात है। हम लोग हाथ उठाने में कमजोर पड़े गुरुदेव बोले भागो-भागो-उठो यहाँ से बेवकूफ गुड़ गोबर को फेट रखा गुड़ अलग रहेगा तो खाने के काम आएगा गोबर अलग रहेगा तो लीपने के काम आएगा। हम लोग रोते रोते वहाँ से उठ गए। सोचने लगे इतना डांट दिए तो रहे कैंसे। हम लोग सलाह कर रहे थे कि क्या किया जाए चला जाए कि रहा जाए। गुरुदेव तो नाराज हो गए। माताजी ने हम सबको बुलाया और बोले छोड़िये छोड़िये पिता का फर्ज ही होता है डांटने का तो कोई बुरा नहीं किए हैं। तुम्हारा कुछ फर्ज बनता है कुछ करने का। बाप की बात नहीं मानोगे तो डांटेगे नहीं। लेकिन ठीक है तुमने नहीं किया तो हमारे बेटे हो। और डांट दिए तो तुम्हारे पिता है लेकिन हम तुम्हें आंचल में रखेंगे आंचल की छांव में रखेंगे। हम उसी तरह का व्यवहार तुम्हारे साथ चाहते हैं जैसे गोप ग्वाल गोवर्धन के नीचे रखे गए थे कृष्णा ने उन लोगों को बचाया था उन्होंने उंगली से उठाया था लेकिन सब लोगों को कहा था कि लकड़ी लगाओ तो तुम लोगों को लकड़ी लगाना है भागो मत। डांटते हैं तो डांटने दो। कुछ नहीं होगा तुम हमारे आंचल के नीचे रहो गुरुदेव तुम्हारा कुछ अनिष्ट नहीं करेंगे। सुधरने के लिए डांट रहे हैं। उस समय हम लोगों ने समझा कि ये गुरुदेव से शायद इनके अन्दर शक्ति ज्यादा है गुरुदेव ने डांट दिया और हम लोग भागे जा रहे थे माँ हमारी बुलाकर के रख ली और खाना खिला दिया तो हमारे लिए तो गुरुदेव से भी ज्यादा शक्ति इनके अन्दर हैं। तो हम लोग उस समय उनको मान लिए कि या तो ये हैं पार्वती या तो हैं ये लक्ष्मी जी या ये हैं काली जी। या आदिशक्ति जगदम्बा हैं यह। गुरुदेव भगवान है यह हमारी माँ है। वह श्रद्धा का भंडार थी। उनके अन्दर दया करुणा का भंडार था। लोगों के ऊपर कभी उनका आँख गरम नहीं हुआ। कभी भी उनका किसी से बात करने में उनकी आँख से आँसू गिरने लगता था कोई दर्द सुनाता था तो उसका दर्द हटाने के लिए गुरुदेव से पैरवी करती थीं और गुरुदेव उसके लिए आनाकानी भी नहीं करते थे। गुरुदेव से जरा भी कम उनके अन्दर शक्ति नहीं थी।

गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद जब हम लोग आते थे माता जी से मिलते थे तो लगता था कि एक में ही दोनों हैं आँखों की रोशनी हमारी कम हो गई थी लेकिन फिर भी देखने का प्रयास करते थे एक बार माताजी बोली क्या देख रहे हो बड़े गौर से। हम कोई जवाब नहीं दिए पर हमको लगा कि इसी में दोनों हो गए हैं। एक साथ हो गए हैं और एक साथ होकर के काम कर रहे हैं।

रामचंद्र बाबू मथुरा से आते समय गुरुदेव के साथ वहीं आए और यहाँ गुरुदेव को साईकिल के कैरियर पर बैठाकर जहाँ-जहाँ वह कहते थे ले जाते थे और गुरुदेव को रोटी बनाकर खिलाते थे जब वहाँ रहने की कोई जगह नहीं थी। रामचंद्र बाबू भी १२ साल तक साग खाकर रहे फल दूध उन्होंने नहीं खाया। वह कहते थे कि जब भगवान के साथ हम रह रहे हैं तो खाने से क्या होगा हम तो कुछ भी खाकरजी लेंगे हमारे सामने जब हमारे भगवान है तो हमारा बिना खाए काम चल जाएगा। लेकिन खाने से हमारा काम नहीं चलेगा। तो गुरुदेव को वह भी कहते थे गुरुदेव भगवान।

एक बार हम बीमार पड़े तीन महीने बीमार रहे डाक्टरों ने कह दिया आप बचेंगे नहीं मर जाएगे। आप मरने के लिए तैयार रहिए पैसा खर्च करना बन्द कीजिए। उस समय तक एक भी सन्तान नहीं था। उसके बाद भी हम इलाज कराते रहे। इसी समय हमको स्वप्र में एक अनुभूति हुई हमको दिखाई दिया सुबह का समय था और सूर्योदय का समय था नींद हमारी नहीं खुली थी उस समय हम देख रहे थे कि किसी एक जगह पर गए हैं उस स्थान का एक गेट पूरब में हैं और एक पश्चिम में है और वहाँ एक माँ जी हैं जिनके शरीर से आग की लपट निकल रही है जल नहीं रही है। उसको देखकर हम वहाँ से हटना चाहे वह हमको बुला ली बोली मत डरो बेटा इससे हम जलेंगे नहीं तुमको भी कुछ नहीं होगा। साथ में हम अन्दर आए अन्दर आकर देखा सोलह लड़की पीले वस्त्र में जनेऊधारी पंद्रह सोलह साल की हमको देखने को मिला हम और भयभीत हुए कि अरे यह तो खाली लड़की की जमात है इसमें तो हमें दोष लग जाएगा लोग हमें क्या कहेंगे कि वहाँ क्या करने गए हैं। फिर हटना चाहे फिर वह माताजी जिनके अन्दर से लपट निकल रही थी हमको पकड़ ली और पकड़कर दूसरी मंजिल पर ले गई और सूखी रोटी और साग खिलाई और एक कत्थई रंग की दरी और कत्थई रंग में कुरता और एक काला कंबल हमको दिया और पूर्ब गेट में हमको निकाल दिया और कहा कि यहाँ से जल्दी भागो तूफान आने वाला है हम भागने लगे तो देखा कि गिर पड़े फिर नींद खुल गई देखा तो सूर्योदय हो गया है अब इस पर हमारा दिमाग घबड़ाया और हम सन्तो, महात्माओं, ज्योतिषियों के यहाँ भटकने लगे ८-१० दिन भटकने पर हमको एक आदमी मिला हमारे परिचित का नहीं था लेकिन हममें कोई अन्दर नहीं था जैसा हम लोग है वहाँ के उसी तरह का आदमी मिला वह बोले कहाँ जा रहे हो हड़बड़ाये इतना उदास क्यों हो। हमने कहा कि ऐसा-ऐसा हम देखे हैं आप कौन हो आप कहिए बोले हम तो चलता फिरता राही हैं आप कहिए आप क्यों उदास हैं हमने सारी घटना सुनाई बोले इसका यहाँ कोई समाधान नहीं मिलेगा बोले तुम शान्तिकुँज जाओ हमने कहा शान्तिकुँज कहाँ है बोले हरिद्वार में है हमने कहाँ वहाँ हम जाए कैसे हमारे पास तो उसका अता पता नहीं है। बोले वहाँ चले जाओगे तो वहाँ सब मिल जाएगा। हमने कहा आप पता लिखा दीजिए। उन्होने पता लिखाया हम फेर में पड़े कि हमें कोई आदमी मिल जाए तो हम वहाँ जाएगे। एक हमारे परिचित थे हरनारायण सिंह उनका लड़का भागते भागते यहाँ आ गया था। यहाँ शान्तिकुञ्ज से तार गया कि आपका बेटा यहाँ आया है तो वह हरनारायण सिंह बोले कि चलिए शान्तिकुञ्ज के लिए आदमी खोज रहे थे हम चल रहे हैं हमारा लड़का वहीं गया है उसको लाने के लिए हम जा रहे हैं। उनके साथ हम आए आने पर हमारी आंख की रोशनी कम थी रोगी थे बीमार थे वह सब ठीक हो गया हमको दो लड़का और पाँच बच्ची हुआ। बच्चा का हम बीए तक पढ़ाए हैं एक बच्ची को आई०ए०कराकर शादी किए हैं। एक बच्ची को मेट्रिक कराया है दो बच्ची अभी खेलकूद रही है।

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डॉ० वेदनाथ त्रिपाठी उन्नाव

सन् १९५५ में अखण्ड ज्योति पत्रिका हमने गुरुदेव की पढ़ी और इससे प्रभावित हुए क्योंकि हम बनारस यूनिवर्सिटी के स्नातकमालवीय जी के सान्निध्य में रहे। आध्यात्मिक विचार थे पढ़कर हम यहाँ आए और परम पूज्य गुरुदेव से मिले। गुरुदेव ने कहा बेटा यहाँ १०८ कुण्ड का यज्ञ होगा उसको करके तू जाना। हम रुक गए और यज्ञ देखा नरमेध यज्ञ हुआ था। नरमेध यज्ञ में पहाड़िया जी ने बताया कि डाक्टर साहब इन सन्तों के दर्शन करना। परम पूज्य गुरुदेव ने अपने बाण्ड और माताजी ने अपने जेवर तपोभूमि को समर्पित किये। उसी बीच में तीन सन्तों को हमने देखा उसकी व्यवस्था पहाड़िया जी को दी गई थी। परम पूज्य गुरुदेव ने कहा था बेटा इनके शरीरको स्पर्श मत करना और भोजन करने के बाद इनके पात्रों को जमीन में गाड़ देना भोजन में एक सन्त के लिए आधा सेर सेव दो सन्तो के लिए केला और दही। इसी बीच हमने देखा कि गुरुदेव के प्रवचन हो रहे हैं गायत्री तपोभूमि के बगल में ही वह सन्त रुके थे गुरुजी की वाणी भी सुनाई पड़ रही है और यहाँ गुरु देव का दूसरा रूप हमने देखा उससे प्रभावित होकर के गुरुजी से उसी समय हमने गुरुदीक्षा ली उस गुरुदीक्षा में चौबीस पच्चीस लोग थे और उसके बाद आते जाते रहे।उसके बाद १००८ कुण्डीय यज्ञ जो हुआ उसमे ऐसा लगता था कि ऋषियों के साथ हम यज्ञ कर रहे हैं इतना आनन्द हमें कभी नहीं आया। उसके बाद सन् १९७४ में गुरुदेव ने कहा बेटा अब तू मेरा काम कर भगवान का काम कर मेडीकल प्रेक्टिस चलती रही अच्छी प्रेक्टिस चलती रही दुबारा फिर आया गुरुदेव ने कहा बेटा तेरा लोभ मोह नहीं छूटता तू नहीं जानता कि तू पूर्व जन्म में क्या था तू उस जन्म का ऋषि था और तुझे यह कार्य करना है ंतो मैंने डेढ़ महीने का वानप्रस्थ प्रशिक्षण लिया इसके बाद टोली में गए दो आदमी और हमारे साथ थे हमने कहा गुरुदेव हम भाषण देना तो जानते नहीं गुरुज्ी जी ने कहा बेटा मैं विद्वान बोल रहा हूँ और सब कंकड़ पत्थर बैठे हुए हैं। उसी समय एक थपाक लगाई उस थपाक की तरंग ऐसी आई कि ऐसा आनन्द कभी जीवन में नहीं आया था वह आनन्द लेकन हम चल दिए। इसी प्रकार पाँच वर्षों तक अनेक प्रान्तों में भ्रमण करते रहे जहाँ जहाँ गुरुदेव भेजते थे वहाँ जाते रहे। इस बीच में हमने यह देखा एक जगह का संस्मरण है भिण्ड में एक व्यक्ति हमें मिले कहा कि हम बड़े दुखी थे और इलाज झाड़फूंक सब कुछ कर डाला कहीं फायदा नहीं हुआ पता लगा कि एक आचार्य श्रीराम शर्मा मथुरा में रहते हैं वहाँ जाइये वहाँ गए गुरुजी ने उनका बड़ा आदर किया और कहा बेटा बैठ कहा कि चार दिन रहेंगे इनकी रहने की व्यवस्था कर दी गुरुदेव ने बता दिया कि यह भोजनालय है यहाँ भोजन बनता है लेट्रिन बाथरूम उधर है वह सब दिखाकर चले गए यह उठे सुबह और इन्होंने भोजनालय के चूल्हें में ही टट्टी फिर दी। सुबह जब माताजी गुरुदेव साधना से उठे उन्होंने सब सफाई कर डाली उनसे कुछ नहीं कहा। पूरी सफाई करने के बाद शाम को जब गुरुदेव आए तो कहा बेटा देख यहाँ यह लेट्रिन है यहाँ भोजनालय है सब व्यवस्था देखले। इनसे एक शब्द भी नहीं कहा उन्हें याद आया कि देखों हमने क्या गड़बड़ी की वह शर्मा गए। किन्तु गुरुदेव की सहिष्णुता हमें सुनने को मिली। अनेक जगह हमने अनेक स्थलों पर विलक्षण बाते हमने सुनी। हम मध्य प्रदेश में एक स्थान पर गए तो एक भाई साहब मिले और उन्होंने कहा कि हमे गुरुदेव का बहुत स्नेह मिला अपने गुरुदेव की शादी में हमने गुरुदेव को निमंत्रण दिया और वहाँ गए भी तो गुरुदेव ने कहा कि बेटा मैं तेरी रक्षा करूंगा मैं आ तो नहीं सकता। शादी होने के बाद लड़का लड़की जब विदा होते हैं ट्रेन के पास वह लड़का खड़ा हुआ था खिड़कीके पास उसी समय ट्रेन चली और ट्रेन से लड़का गिर गया तो वह बीच में आ गया बच गया बड़ा तहलका सा मच गया निकालकर उसे घर लाए उस लड़के ने गुरुदेव का जब चित्र देखा तो कहा कि यही व्यक्ति हैं जिनने हमें बीच में कर लिया था गुरुजी से उन्होंने प्रार्थना की गुरुदेव यह सब घटनाएँ हुई।

जिस समय में उन्नाव शक्तिपीठ में था उस समय एक व्यक्ति जो गवर्मेन्ट सर्विस में थे उनको केंसर हो गया था वह बड़े दुखी थे पूना जाते थे दवा करते थे उनको कोई विशेष लाभ नहीं था। उनका परिवार देखकर हमें दया लगी हमने कहा चलो हम आपको ले चलते हैं पूज्य गुरुदेव के पास। उनको हम यहाँ लाए गुरुदेव को दिखाया उनकी स्थिति बताई और कहा कि गुरुदेव इनको आवश्यक है जीना अच्छा गुरुदेव ने उनको आशीर्वाद दिया वह यहाँ आए कानपुर में वहाँ हमारा लड़का मेडीकल कालेज में है उसने एक चिट्ठी लिख दी केंसर हास्पिटिल में गए और एक इंजेक्शन लगा एक ही इंजेक्शन से उनको ७५ प्रतिशत फायदा हो गया। अब वह पूर्णतः स्वस्थ हैं रिटायर भी हो गए हैं अपने परिवार को चला रहे हैं।

हमारा लड़का जो मेडीकल कालेज मे प्रोफेसर है उसके दो बच्चे हैं वह आई एस ई करके आए गुरुदेव के पास उन लड़कों ने कहा गुरुजी हम पीएमटी में आ जाएँ तो गुरुदेव ने कहा तुम तो मेरे बेटे हो वेदनाथ के नहीं मेरे बेटे हो और दोनों पीएमटी में आ गए। दोनों एम डी और एम एस कर रहे हैं और इसी तरह एक हमारा छोटा जो लड़का था एम टेक किया था दिल्ली से उसने नौकरी करके ५० लाख का लोन लिया लोन लेने के बाद गुरुजी के पास आया और कहा गुरुजी इतना बड़ा प्लाण्ट कैसे होगा गुरुजी से उसने पूछा गुरुजी ने कहा सब ठीक होगा। पाँच बार उसने पूछा पाँच ही बार बोले अच्छा कुछ हो तो मेरा ब्रह्मदण्ड रख लेना। उसने १० लाख रुपया इटली में एक मशीन बनाने के लिए दिया उसकी ट्रेनिंग के लिए गया सात दिनों तक ट्रेनिंग ली उसी समकक्ष की दूसरी भी मशीन थी उसने कहा इसकी भी ड्राईंग दे दीजिए। कहा इसके लिए दस हजार डालर लगेगा। उसने कहा पैसा तो हमारे पास है नहीं। वह आकर सो गया सुबह वह इंजीनियर आया और साथ ले गया और वही मशीन दिखाने लगा लड़के ने कहा जब आप इसकी ड्राईंग नहीं देंगे तो हम क्यों देखे बोले नहीं हम देंगे। लड़के ने कहा बिना पैसे आप कैसे दे रहे हैं कहा मुझे रात भर चैन नहीं पड़ा और इसीलिए हम सुबह सुबह तुम्हारे पास आए हम तुम्हें ड्राईग भी दे देंगे। लड़के ने कहा हमारे साथ भी एक गॉड है बोला कोन सा गॉड कैसा गॉड कहा आप इंडिया आइये हम उस गॉड को दिखाएँ उससे मिलाएँ। बीच में ऐसा समय आया कि इसने बड़ी बड़ी मशीन बनाई संगमरमर की पालिश करने की मशीन २५-२५ लाख की तीन चार मशीने बनाने के बाद उसे आर्डर नहीं मिला ६ मशीने तक बनाई उसके बाद आर्डर नहीं मिला। वह बड़ा घबराया ४-५ महीने बड़ी परेशानी में रहा। किन्तु हमें विश्वास था हम ब्रह्मदण्ड ले जाकर उसके यहाँ रख आए। इसके बाद रेलवे इंजन के पार्ट बनाने को मिले। वह पार्ट बनाता रहा। इसके बाद इंजन जिसमें रखा जाता है वह डिब्बा बनाने लगा और जो बड़ी बड़ी कंपनियों को नहीं मिलते थे गुरुदेव की कृपा से छोटी फेक्टरी में वह काम कर रहा है।

श्री चन्द सिंह राठौर कलकत्ता

एक बार की बात है में राजस्थान से यहाँ आया था तीन चार दिन रहने के बाद जब में शाम को जाने से पहले गुरुदेव से मुलाकात करने गया तो गुरुदेव ने कहा कि क्या करेगा जाकर रहने दे मैंने कहा जैसी आपकी इच्छा मैं रह गया संयोग से ऐसी जोर का पानी गिरा और बाढ़ आई रेलवे लाइन टूट गई आठ दस दिन तक कोई गाड़ी नहीं पहुँच पाई हावड़ा। आठ दस दिन के बाद गुरुदेव ने फिर कहा कि कलकत्ता कब जा रहा है मैंने कहा आप जब कहेंगे तब चला जाऊंगा गुरुदेव ने कहा आज ही चला जा और मेरे लिए हिन्दुस्तान मोटर्स वाले इंतजार कर रहे थे कि कब आए और गाड़ी लेकर जाए। सबसे बड़ा संयोग यह रहा कि यदि दस दिन पहले मैं जाता तो कहीं बैठा रहता तकलीफ होती।

एक बार राजस्थान में यज्ञ का कार्यक्रम था हम लोग रात का कार्यक्रम करके विश्राम कर रहे थे। रात में स्वप्र में दिखाई दिया शान्तिकुँज की सीढ़ियाँ दिखाई दीं पहले मैंने जो गुरुदेव का दर्शन किया था वही दिखाई पड़ा गुरुदेव ने कहा बेटा तू आ गया मैं तेरे पीछे बहुत दिन तक घूमा अब आया तू पकड़ में अब तू काम कर मुझे बहुत दिन तक तेरे पीछे दौड़ना पड़ा। और जब में यहाँ आया प्राणप्रत्यावर्तन में १९७४ में आते ही वही दृश्य देखने को मिला और गुरुदेव ने वही बात दोहराई और मैं रोने लगा गुरुदेव ने कहा बेटा तू क्यों रोता है आज तक तेरी जितनी भूलें हुई वह मैं अपने ऊपर लेता हूँ आज तुझे कोरे कागज की तरह बना देता हूँ अब आगे के लिए तेरी जिम्मेदारी शुरु होती है। अब मेरी जिम्मेदारी खतम हो गई। जितना मेरा काम करोगे उतना ही आगे बढ़ते जाओगे यह मेरा आशीर्वाद है।

एक बार यहाँ आया तो माताजी ने कहा बेटा तुम्हारा कारबार बैसा चल रहा है। मैंने कहा माताजी कारबार तो ठीक ही चल रहा है पर परेशानियाँ बहुत आती हैं। माताजी ने कहा सब परेशानियाँ दूर हो जाऐगी। यहाँ से गया कलकत्ता गाड़ी लेकर के जा रहा था २०-२५ गाड़ियाँ थीं सब आगे आगे चल रहीं थीं मैं पीछे था। आंध्रा में एक ट्रक बहुत जोर से स्पीड में आया औरआकर के बड़े जोर से टक्कर मारा मेरी गाड़ी पीछे जाकर नाले में चली गई आगे से पूरा हिस्सा पानी में डूब गया मैं घबड़ा गया बेहोशी सी आ गई आँखे बन्द की तो माताजी ने जैसे मुझे गोदी में ले लिया औरबाहर निकाला बाहर आकर के जब देखता हूँ तो बिल्कुल सुरक्षित मुझे खरोच भी नहीं आयी। गाड़ी का पूरा हिस्सा पूरी तरह टूट चुका था और मैं बिल्कुल सुरक्षित बाहर आया बाहर आने के बाद गाड़ी बनवाकर ले गया दो तीन महीने के बाद जब यहाँ आया तो माताजी ने कहा बेटा तू बंगलोर गया था उस समय तुझे परेशानी तो नहीं हुई मैंने कहा माताजी परेशानी तो कोई नहीं हुई आपने ही तो मुझे गोदी में उठा लिया था बोली बेटा यह तो ठीक है तेरा कारोबार ठीक चलेगा उसके बाद से मेरे सारे एक्सीडेंट बन्द हो गए सारे के सारे परेशानियों के कारण अपने आप नष्ट हो गए और मेरा कारोबार भी ठीक तरह से चलने लगा। इसके बाद जब गुरुदेव माताजी बुलाते थे मैं दो महीने चार महीने सेवा देने चला आता था।

कलकत्ता में मेरे एक मित्र का बेटा खो गया था जब मैं यहाँ आने लगा तो मुझसे कहने लगे कि तुम शान्तिकुँज जाते हो तो माताजी से पूछना मेरे बच्चे के बारे में। मैं यहाँ आया चर्चा की माताजी ने कहा कि बेटा लौट आयेगा। फिर मैं यहाँ से चला गया फिर बहुत दिनों तक जब वापिस लौटकर नहीं आया तो वह मुझसे बार-बार कहने लगा कि तुमने ठीक से पूछा था कि नहीं पूछा। मैंने कहा पूछा तो था माताजी ने कहा था कि आ जायेगा। बोला क्या आ जायेगा उसने कहा अबकी बार तुम चिट्ठी लिखो या जाना हो तो जाओ मैंने कहा महीने पंद्रह दिन में मेरा प्रोग्राम बनेगा तो फिर जाऊंगा मैं फिर आया माताजी ने कहा बेटा अभी तक नहीं लौटा क्या? मैंने कहा माताजी अभी तक तो नहीं लौटा अच्छा बेटा मैं देखती हूँ कल मिलना मुझसे। दूसरे दिन मैं जब मिलने गया माताजी ने कहा ठीक है बेटा तीस दिन के भीतर भीतर तुम्हारे पास अपने आप आ जाएगा। संयोग ऐसा हुआ कि पच्चीसवें दिन वह लड़का अपने आप आ गया। उसने बताया कि तुझे ऐसे ऐसे उठाकर ले गए थे और मुँह बांधकर के रख दिया था और फिर अचानक मुझे एक बूढ़ा सा व्यक्ति दिखाई दिया उसने दरवाजा खोल दिया और मैं वहाँ से निकलकर भागकर आ गया।

चुरू जिले में हम लोग यहाँ से प्रज्ञापीठ बनाने का संकल्प लेकर गए। और जब उसका निर्माण शुरु किया तो बहुत बाधाएँ आई। एक बार तो ऐसा हुआ हमारे गाँव में भयंकर आग लगी उसमें कम से कम सौ डेढ़ सौ घर जलकर खाक हो गए। हमारे गायत्री परिवार के कार्यकर्ताओं के जो आठ दस घर थे उन्हें कोई भी नुकसान नहीं हुआ ऐसे बच गए जैसे किसी सुरक्षा कवच ने उनकी रक्षा की आसपास के सारे घर जल गए बीच में से आग निकल गई पीछे से निकल गई चारों तरफ से निकल गई लेकिन उनके घरों में कुछ भी नहीं हुआ और जब निर्माण कार्य शुरु हुआ था उसमें एक लड़का जो पत्थर मंगवाए जा रहे थे उन पत्थरों के नीचे दबकर मर गया उसमें भी ऐसा हुआ गाँव वालों ने सहयोग दिया किसी तरह की कोई बाधा नहीं आई। यहाँ आए तो गुरुदेव ने कहा बेटा अच्छे काम करने में मुसीबतें आती हैं लेकिन मुसीबतों में मैं तुम्हारे साथ था कोई मुसीबत तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं पाई।

श्री बोधिराम साहू भटगांव

अखण्ड ज्योति को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि इसमें जो लेख हैं वह हमारे अन्तरंग की आवाज है। हम जिस तरह की विचारधारा चाहते हैं वही विचारधारा इस पत्रिका में है। ऐसे महापुरुष से सम्पर्क करना चाहिए। २४ नवम्बर ७० को हमने भिलाई में दीक्षा ली। गुरुदेव ने दीक्षा में हमसे देवदक्षिणा के लिए कहा हमने कहा गुरुदेव हम अपनी सामर्थ अनुसार लोकसेवा का समाज सेवा का कार्य करते रहेंगे। गुरुदेव गालों और सिर को थपथपाते रहे और बोले कि बेटा तू मेरा बहुत प्यारा बेटा है। उनकीइन बातों से ऐसा लगा कि अपना सारा शरीर प्यार से सराबोर हो गया है उसी रात के प्रवचन में गुरुदेव ने कहा था आज २४ नवम्बर ७० की रात मैं भिलाई के मंच से बोल रहा हूँ और इस समय पोरबन्दर में भी मुझे बोलते हुए मुझे पाओगे अर्थात इस समय मैं इस समय दोनों समय उपस्थित रहकर कार्यक्रम संचालित कर रहा हूँ।

मेरे जीवन की एक घटना है कि मेरे तीन बच्चियाँ और एक बच्चा हो चुका था पाँचवी सन्तान छोटी बच्ची गर्भ में आई पत्नी प्रसव के समय काफी पीड़ित होती थी काफी वेदना सहती थी हमारी आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी कि अधिक सन्तान हम पैदा कर सकें गुरुदेव के शब्द भी याद आते थे पत्नी के विशेष जोर देने पर यद्यपि न चाहते हुए भी मैंने अपनी पत्नी को गर्भपात की सलाह दे दी और सलाह देने के बाद अपनी बड़ी बहन के यहाँ चला गया। रात में पत्नी को स्वप्र हुआ गुरुदेव स्वप्र में आए और एक छोटा सा खिलौना हाथ में लेकर के गुरुदेव मेरी पत्नी को दिखाते हुए बोले देखों मैं कितनी मेहतन से यह खिलौना तैयार कर रहा हूँ और तुम इसका गला काटना चाहती हो जैसे ही लौटकर आया पत्नी ने कहा कि ऐसा-ऐसा स्वप्र हुआ है हमने पत्नी से कहा कि अब इसकी चिन्ता मत करो चार सन्तानों में भले ही तकलीफ हुई हो लेकिन इस सन्तान के लिए तकलीफ नहीं होगी और उसकी व्यवस्था वह स्वयं करेंगे क्योंकि उनसे जब हम जुड़े हुए हैं और उनको इसकी जानकारी है इसलिए कोई तकलीफ नहीं होगी। सचमुच उस सन्तान का जिस दिन जन्म हुआ आज वह बच्ची जहाँ ब्याही गई है उसके स्वसुर उसी दिन पहली बार जो मेरे मित्र थे मेरे घर आए। उनके आने के बाद ही उस बच्ची का जन्म हुआ वह घर से सम्पन्न थे तीस एकड़ उनकी जमीन थी वह स्वयं शिक्षक थे एक मात्र उनका लड़का था और तीन बच्चियाँ है लेकिन ऐसे सम्पन्न आदमी को एक-एक से सम्पन्न व्यक्ति अपनी बच्चियाँ देने को तैयार थे दबाव भी डाले दहेज देने के लिए लेकिन साहू जी ने कहा कि मुझे बेटी चाहिए, कन्या चाहिए मुझे दहेज नहीं चाहिए। और वह सहज उस कन्या को ब्याह कर ले गए। मैने विरोध भी किया कि देखिए साहू जी आप और हम मित्र हैं लेकिन जहाँ विवाह का सवाल आता है घर परिवार के लोग आपको कई तरह के ताने देंगे हमारी आर्थिक स्थिति नहीं है हम आपको ज्यादा दे सके बोले आपको ऐसी नौबत नहीं आयेगी और इस तरह से हम देखते है कि गुरुदेव जिन्होंने वचन दिया था उस आश्वासन का उन्होंने पालन किया। जब हम प्रथम बार शान्तिकुँज आए थे जब उनसे मिलने गए उनसे कहा कि कुछ माँग हमने कहा कि गुरुदेव घर परिवार में सब सुखी हैं आप देना चाहते हैं तो ज्ञान दीजिए। प्रेरणा दीजिए, भक्ति दीजिए, शक्ति दीजिए। गुरुदेव ने कहा बेटा समाज का काम करने वाले को यह बिना माँगे मिलता है। लेकिन अपने लिए तो कुछ माँग। हमने कहा कि गुरुदेव बस यही दीजिए। आपकी कृपा से हमें नौकरी मिली हुई है। और उससे हमारा गुजारा अच्छी तरह से हो जाता है। उन्होंने कई बार हमें बहकाने की कोशिश की हमने कहा गुरुदेव देना है तो बस यही हमको दीजिए कि आपके चरणों में जन्म जन्मांतर तक हमारी सच्ची भक्ति बनी रहे औरसमाज की सेवा हम अपनी सामर्थ के अनुसार करते रह सकें। उन्होंने सिर को थपथपाया ओर कहा तू मेरा प्यार बेटा है और कहा अच्छा बेटा जा दूसरे को आने दे माताजी से मिल ले। माताजी के पास आया रोता रहा। सिसकियाँ बन्द नहीं हो रही थी माताजी ने कहा क्या गुरुदेव ने डांट दिया, कोई गलती हो गई हमने कहा कि नहीं माँ यह तो प्यार के आंसू हैं पता नहीं उन्होंने क्या प्यार किया कि प्यार के आंसू थमते नहीं। उन्होंने तो बहुत ही प्यार किया।

हम १९७१ की बात बता रहे थे एक और घटना कि अवतारी पुरुष किस तरह संरक्षण देकर जीवन को धन्य बना देते हैं। प्रथम बार हमारे यहाँ यज्ञ हो रहा था हम छोटे-छोटे भाई नए जुड़े हुए थे। चंदा कर रहे थे शीतकालीन अवकाश में चार दिन का कार्यक्रम रखा मैं महासमुन्द प्रशिक्षण से लौटकर गाँव आया और यज्ञ की जल यात्रा प्रारम्भ होने के पहले दिन हिसाब लगाया कि अपना गाँव बड़ा गाँव है आसपास के लोग आएगे यज्ञ में कितना खर्च होगा। हिसाब लगाया कि हम जो चंदा और चाँवल इकट्ठा कर रहे थे तो ऐसा लगा कि छै सात सौ रुपए चंदा और चाँवल इकट्ठा होगा। इसमें ४ दिन के कार्यक्रम में सैकड़ों लोग आऐगे भोजन करेंगे कैसे इसकी पूर्ति होगी। हम आपस में चर्चा किए रात में हम देखते क्या हैं कि हम स्वप्र में शान्तिकुँज पहुँचे वहाँ एक तालाब है तालाब से लगा रोड है रोड पर परम पूज्य गुरुदेव वन्दनीया माताजी बैठे हैं गुरुदेव देखकर मुस्करा रहे थे जैसे ही नजदीक आया माताजी ने कहा बेटा सब ठीक है यज्ञ का कार्य ठीक तरह से चल रहा है हमने कहा कि वन्दनीया माताजी हम लोग तो अपनी सामर्थ के अनुसार प्रयास कर रहे हैं लेकिन आर्थिक स्थिति हमारी अच्छी नहीं लगती पता नहीं सफल हो पाएगा कि नहीं क्योंकि पाँच छै सौ ही हमारे पास चंदे के आंकड़े बता रहे हैं और सैकड़ों लोग चार दिन तक इस कार्यक्रम में भोजन करेंगे यह कैसे होगा। वन्दनीया माताजी ने कहा बेटे तुम अपने काम में लगे रहो अर्थ की चिन्ता छोड़ दो इस काम मे तुमको जो करना है उसमें लगे रहो भगवान सब पूरा करेंगे स्वप्र समाप्त हो गया सबेरे जब यज्ञशाला में गया हमारे जांजगीर क्षेत्र के आए हुए वरिष्ठ कार्यकर्ता जो हमको प्रेरणा देते रहे छेदीलाल जी साहू उनको बताया सुनकर के बड़े प्रसन्न हुए। उस यज्ञ के बाद हमारे पास डेढ़ हजार रुपए बच गए शानदार यज्ञ हुए और उससे हमने दरिया, टाटपट्टी प्रदर्शनी चित्र बनवाए। उस समय तक मुझे शान्तिकुँज आने का अवसर नहीं मिला था। शान्तिकुँज कैसा है यह भी मुझे मालुम नहीं था पर हम यह जानते थे कि गुरुदेव २० जून को मथुरा छोड़कर आए और यहाँ से हिमालय चले गए हैं। इसी बीच पत्रिका से पता चला कि गुरुदेव कुछ समय के लिए अपनी तपस्या को अधूरा छोड़कर के कुछ समय के लिए शान्तिकुँज लौटकर आए इसलिए कि माताजी की बीच में तबियत खराब हो गई और माताजी को ऐसा लगा कि मैंने सच्चे समर्पण भाव से आपके सहचरी के रूप में काम किया है तो यदि मेरा प्राण निकले तो आपके सान्निध्य में निकले इस तरह व्याकुल होकर माताजी ने प्रार्थना की थी और माताजी की प्रार्थना पर गुरुदेव अपनी साधना को छोड़कर शान्तिकुँज आए थे। यह बात जो मैंने स्वप्र में देखी थी वह पत्रिका से पता चली कि सचमुच गुरुदेव उस बीच शान्तिकुँज आए हुए थे। यह बातें बताती हैं कि गुरुदेव असाधारण अवतारी चेतना हैं। वे साक्षात महाकाल के अंशधर हैं उन्होंने जो भी कहा है वह सारे समय-समय पर सत्य होते रहे हैं।

सन् १९७४ की बात है हमारे क्षेत्र में कोई भी कार्यकर्ता नहीं थे और जैसे हमने दीक्षा ली हम पूरी तत्परता के साथ जुट पड़े थे एक बहिन थी उसको दस बारह वर्ष शादी के हो गए थे उसको कोई सन्तान नहीं थी मेरे नजदीकी साथी वहाँ शिक्षक थे और वह इस मिशन से जुड़े हुए थे वह इस मिशान की गतिविधि को जानते थे उन्होंने उस बहिन से कहा कि बहिन जी आप गायत्री यज्ञ को कराइये भगवान ने चाहा तो आपको सन्तान मिलेगी। वह तैयार हो गई देहात की अशिक्षित अपढ़ महिला थी भाई जी ने मुझे कहा कि आप आइये और यज्ञ कराइये मैं गया समय पर उसके यहाँ यज्ञ किया और यज्ञ करने के बाद वापस आ गया वहाँ से एक सप्ताह बाद हमारे साथी आए उनने बताया कि जिस जगह पर हमने यज्ञ किया था ठीक उसी जगह परम पूज्य गुरुदेव का प्रकाश शरीर प्रगट हुआ उनके चारो और तेजोवलय था उनके शरीर के बाल खड़े थे गोल तेजस्वी चेहरा उस बहिन ने देखा बहिन गुरुदेव के चेहरे को देखती रही गुरुदेव तीन बार बोले कि बोल बेटी क्या माँगती है उस बहिन ने बताया कि मैं तो उनका चेहरा देखते ही अवाक रह गई कुछ नहीं माँग सकी लेकिन उसके बाद ही वह बहिन गर्भवती हुई और निर्धारित समय बाद एक स्वस्थ सुंदर शिशु को जन्म दिया। आज वह बच्चा २४-२५ साल का हो गया है। छोटे से कार्यकर्ता के मनोबल को बढ़ाने के लिए महाकाल लोगों को इस विचारधारा से अवगत कराने के लिए देवता बनाने के लिए किस तरह से अनुदान और वरदान बाँटते चले गए जो भी उनसे जुड़े उनने एक से एक चमत्कारिक कार्य कराया यह मेरा प्रथम पाँच कुण्डीय यज्ञ था अपने गाँव से १२-१३ किलोमीटर धोबनी नाम का गाँव था। वह पहला मेरा पाँच कुण्डीय यज्ञ सम्पन्न कराना था वहाँ गया और वहाँ एक बहुत ही बड़े कानून विद थे जिन्हें कानून की धाराएँ कंठस्थ याद थीं उसके नाम से आसपास के लोग कांपते थे लेकिन जब मैं वहाँ यज्ञ करने गया गुरुदेव का स्मरण किया। माताजी का स्मरण किया और जब मंत्र बोला तो लोग अवाक सुनते रहे मैं मन में सोचता था अकेला बोलूँगा पता नहीं बनेगा कि नहीं बनेगा लेकिन लोगों ने बताया कि आप तो गजब का बोल रहे हैं आप तो ऐसे बोल रहे हैं कि लोग अवाक होकर के सुन रहे हैं। लोगों के आँख से आंसू आ जाते थे। लोगों ने बताया कि आप हकलाते क्यों हैं आपतो ऐसे नहीं हकलाते थे लेकिन मंच पर जब आप बोलते हैं तो आप हकलाते क्यों हैं। तब मैंने भी अनुभव किया कि गुरुदेव जिस तरह बोलते समय हकलाते थे उसी तरह से गुरुदेव का कार्य करने के लिए यज्ञ में चाहे प्रवचन मे जब गुरुदेव को स्मरण करके हम बोलने लगते थे तो गुरुदेव की शक्ति आती थी और गुरुदेव जिस तरह से हकलाकर बोलते थे उसी तरह से हमारी वाणी भी हो जाया करती थी। यह मेरा ही अनुभव नहीं था मैंने अनेक लोग जो उस समय के वरिष्ठ कार्यकर्ता थे उनसे अनुभव किया कि सभी लोगों की जो शैली है वह गुरुदेव की है। गुरुदेव जिस तरह से हकलाकर बोला करते थे उसी तरह से लोग हकलाकर बोला करते थे। काफी समय से मैं अनुभव कर रहा हूँ कि बहुत दिनों के बाद वह स्थिति बन्द हो गई अब वह हकलाहट अब किसी के पास भी दिखाई नहीं पड़ती। यह भी यह प्रयोग था गुरुदेव का।

गुरुदेव का २४ दिन का जल उपवास चल रहा था मेरी छोटी बच्ची के श्वसुर भी आने वाले थे प्रथम बार आए थे यहाँ और मेरी मझली बच्ची के जेठ थे वह दोनों प्रथम बार शान्तिकुँज आना चाहे हम लोग तिथि निर्धारित कर लिए पता चला कि गुरुदेव जल उपवास में हैं वह किसी से मिलेंगे नहीं वह प्रवचन देंगे कैसे किया जाए हमने कहा ठीक है गुरुदेव के प्रवचन सुनने को नहीं मिलेंगे कोई बात नहीं लेकिन गुरुदेव के दर्शन तो मिलेंगे हम जाएगे ऐसी स्थिति में हम लोग लेकर के आए करीब आठ दस दिन का गुरुदेव का जल उपवास व्यतीत हो चुका था यहाँ आने के बाद एक सप्ताह बाद हम लोग जाने के लिए तैयार हुए भाइयो ने कहा वीरेश्वर उपाध्याय मिश्रा जी ने कि देखिए इस समय यहाँ कार्यकर्ताओं की कमी है और गुरुदेव जल उपवास पर है सारे देश से लोगों के पत्र आ रहे हैं सारे देश से लोग आएगे व्यवस्था बनाने के लिए कार्यकर्ताओ की आवश्यकता पड़ेगी जब आप लोग आ ही गए हैं तो आप लोग थोड़े दिन रुकिए हम यहाँ रुक गए दीवाली का दिन था हमने एक और चमत्कार देखा गुरुदेव के जीवन का करीब करीब गुरुदेव के जल उपवास का सोलह सत्रह दिन बीत गया था फिर दीवाली का दिन आया। गुरुदेव का शरीर जल उपवास के कारण काफी दुबला पतला हो गया था। बोलने में उन्हें तकलीफ होती थी आने वाले कार्यकर्ताओ से वह चाहते थे कि कम से कम बात करें। कार्यकर्ताओं को संकेत दिया करते थे गुरुदेव कि बेटा बहुत तकलीफ होती है और कम से कम इशारे में वह काम चला लें इसके बावजूद भी लोग आते थे बात करते थे गुरुदेव का शरीर तो दुबला हो गया था लेकिन तेज काफी था। दीवाली का दिन था सबेरे जब हम प्रणाम करने पहुँचे देखते क्या है कि जल उपवास की अवधि में जो शरीर उनका सूख गया था उस दुर्बलता का नाम नहीं उनका चेहरा एकदम गोल शरीर एकदम लाल पाँव गुलाब की पंखुड़ी जैसे और गुलाबी हम देखकर के दंग रह गए। हमारे साथी भी देखे कि आज तो गुरुदेव का चेहरा कैसा लाल है। पता लगता नहीं कि यह जल उपवास पर है इतने दिन हो गए हैं। हम आपस में बात करते रहे शाम को हमने फिर देखा तो गुरुदेव के शरीर की लालिमा वह गोल चेहरा बुलंदी नदारत। दुबला पतला सामान्य चेहरा इस तरह से गुरुदेव का स्थूल चमत्कार हमने देखा है। गुरुदेव ने कहा कि बेटा यह समय परिवर्तन का है और आप लोग अपने समय को गफलत में खोना मत। यह समय हजारों वर्षो बाद आता है जब ब्राह्मी चेतना का जो साथ देते हैं वह धन्य हो जाते हैं। बहाना मत बनाना। आज जो बहाना बनाओगे कल पछताओगे कल का आने वाला समय ऐसा आ रहा है कि तुम चाहकर भी समय देना चाहोगे तो परिस्थितियाँ ऐसी कस जाऐगी कि तुम चाहकर भी समय नहीं दे पाओगे। आज जो समय मिला हुआ है उसका सदुपयोग कर लो धन्य बन जाओगे ऐसा समय हजारो वर्ष बाद आता है जब साक्षात भगवान् आते हैं ब्राह्मी शक्ति आती है ईश्वरीय शक्ति आती है और अपने साथ वह करोड़ों लोगों को अपने नाँव में बैठाकर पार कर जाती है व्यक्तिगत स्वर्ग मुक्ति की बात छोड़कर के भगवान की योजना यह भगवान की योजना है गायत्री परिवार की योजना समाज सेवा का कार्य यह जो है यह भगवान की इच्छा है महाकाल की इच्छा है वह युग को बदलना चाहते हैं वह प्रज्ञायुग लाना चाहते हैं नया युग लाना चाहते हैं तो व्यक्ति को सुधरना पड़ेगा अपने गुण, कर्म, स्वभाव को बदलना पड़ेगा जो स्वयं जलेगा वह दूसरों को जलायेगा दूसरों को प्रकाश देगा गुरुदेव कहते थे कि बेटा अपनी सामर्थ के अनुसार समाज सेवा में लगे रहना यदि आगे कठोर काम नहीं कर सकते तो कम नीचे मत गिरना जहाँ तक तुम आगे बढ़ चुके हो वहाँ से कदम पीछे पत हटाना। कम से कम वहाँ तो बनाकर रखना और कम से कम अपने आचरण, चरित्र, चिन्तन को अच्छा बनाकर रखना देखना तुम समाज में देवता बन जाओगे। समाज तुम्हें कंघे पर बैठायेगा और समाज में तुम प्रमाणिक व्यक्ति बनकर समाज में तुम्हें प्रतिष्ठा मिलेगी। समाज में जो इज्जत मिलेगी समाज में जो प्रमाणिकता मिलेगी और उससे तुम्हारा जीवन धन्य बन जायेगा आने वाली पीढ़ी तुम्हें याद करेगी तुमसे प्रेरणा लेगी तुमसे प्रकाश लेगी।

बालकृष्ण अग्रवाल झांसी

सन् १९५३ में मथुरा में गुरुजी से दीक्षा ली थी। सन् १९५६ में नवरात्रि के अनुष्ठान के समय एक मौनी बाबा गायत्री तपोभूमि मथुरा में आए। वह मौन थे उन्होंने वहाँ अनुष्ठान किया। अनुष्ठान करते समय गुरुजी ने कहा आज मौनी बाबा से आरती करवाइये गायत्री माता की। उन्होंने आरती की और आरती करते करते इतने मस्त हो गए कि उनका मौन टूट गया और वह जय गायत्री माता जय गायत्री माता कहते रहे और गुरुजी से आकर लिपट गए और पैरों में पड़ गए। उनका मौन छूट गया और थोड़ी देर बाद वह वहाँ से चले गए।

एक बार गुरुजी रायपुर गए वहाँ बहुत भीड़ लगी हुई थी वह सबकी बाते सुन रहे थे उनके पास समय बहुत कम था उन्होंने कहा आप लोगों की सब तकलीफें हम जानते हैं और अभी हम सबको बतलाते हैं और वह खड़े हो गए सबको बतलाते रहे कि आपका यह काम होना है हो जाएगा। जितने आदमी थे सबकी बात बता दी उन्होंनेऔर सब लोग सन्तुष्ट हो गए।

एक बार हमारा लड़का झांसी से दतिया जा रहा था दतिया के रास्ते में वह स्कूटर से गिर पड़ा उसके सिर पर बहुत चोट आ गई खून बहने लगा और लोगबाग निकलते रहे किसी ने देखा भी नहीं कि पुलिस आ जायेगी और हमें पकड़ लेगी इसलिए किसी ने परवाह नहीं की। इसके बाद दो आदमी आए उन्होंने उसे बस में बिठाला बस में बिठाकर झांसी लाए और टू सीटर करके हमारी दूकान पहुँचा दिया। दूका में हमारा बड़ा लड़का था उसको देखते हो होश उड़ गए चारों ओर खून बह रहा था सारा सामान दतिया में पड़ा रह गया था। जब वह नीचे आया तो देखा कि दोनों आदमी गायब थे।

एक बार हमने अपनी पत्नी और दो बच्चियों को गाड़ी में बैठा दिया हरिद्वार जाने के लिए रास्ते में ट्रेन एक्सीडेंट हो गया। और बहुत लोगों को चोटे आई पर इनको कोई चोट नहीं आई घबरा जरूर गई लेकिन एक आदमी थाा राते के समय उसने कहा हम मदद करेंगे आपकी आप घबराइये नहीं और दूसरी ट्रेन जब आई सबेरे उसी में उसने बैठाल दिया जब यहाँ आई तो गुरुदेव उसकी याद ही कर रहे थे कि कब आ रही है हमारी बेटी। जब वह आई तो बहुत रोने लगी गुरुजी ने कहा घबराओ नहीं हम सब देख रहे थे हमने तुम्हें बचाया अगर तुम नहीं होती तो पूरी ट्रेन खतम हो जाती तुम्हारी वजह से बच गए लोग।

एक बार मैं यहाँ से गया देहली देहली में हमारी पत्नी थी और नातिन थी। हम लोगों को पश्चिम बिहार जाना था बस में हमने बैठाल दिया मैं पानी पीने को उतरा इतने में उसने गाड़ी स्टार्ट कर दी। बहुत चिल्लाये पर उसने बस रोकी नहीं। बस चली गई रात को ग्यारह बज रहे थे मैंने कहा अबक्या करूं मैं। अब कैसे जाऊं ये लोग कहाँ जाएगी इतने में एक सरदार जी आए अपने आप और बोले इसमें पीछे बैठ जाओ हमने पूछा भी नहीं कौन है क्या है और उसने जहाँ बस खड़ी थी वहाँ पहुँचा दिया और कहा देखो यह बस है तुम्हारी इसमें बैठ जाओ तो गुरुदेव हमारी हर जगह हर पल पर रक्षा करते रहते हैं।

मेरा पुत्र की जन्मपत्री दिखाई तो बताया कि उसकी लाइफ १४ वर्ष है हमने गुरुजी से कहा बड़े दुखी हुए कि हमारा बच्चा १४ साल में चला जाएगा। गुरुजी से कहा गुरुजी ने कहा कोई बात नहीं हम रक्षा करेंगे। गुरुजी ने कहा बनियान का टुकड़ा भेज दीजिए हमने भेज दिया एक दिन घटना घटी वह ऊपर साइंस लेब में चला गया वहाँ एसिड गिरा तो उसने कपड़े जला दिए उसने देखा नहीं कि क्या गिर रहा है नहीं तो उसकी आँखें चली जाती तो गुरुजी ने हमेशा रक्षा की है। वह महाकाल हैं उन्होंने जो कहा वह करके दिखाया। उन्होंने हम पर बड़ी कृपा की है। आज वह लड़का पचास साल का हो गया है। उन्हीं की कृपा से वह पचास साल का है। लड़के हुए बच्चे हुए और लड़कियों की शादी भी कर दी है उन्होंने।

गुरुजी प्रज्ञावतार है और हमने इसी रूप में माना और उन्होने हमारी रक्षा भी की उसी रूप में। गुरुदेव २४ अंश के अवतार है अभी तक राम हुए कृष्ण हुए सब अलग अंश के गुरुदेव २४ अंश के अवतार हैं। उन्होंने जो काम करके दिखाया है अब तक किसी ने नहीं किया। मेरी धारणा यही है हम इसी रूप में पूजते हैं कि गुरुदेव हमारे भगवान हैं।

श्री लटूरेलाल यादव, जिला कोटा राजस्थान (शान्तिकुञ्ज हरिद्वार)

मैं गुरुदेव से सन् १९५८ से जुड़ा हुआ हूँ। मैं पेट की बीमारी से पीड़ित था गुरुदेव ने तपोभूमि में प्राकृतिक चिकित्सा शिविर लगाया। मैं उसमें गया मैंने चिकित्सा ली तब से मैं पूर्ण स्वस्थ हो गया। इसके बाद में साल में एक दो बार तपोभूमि जाता रहता था। गुरुदेव ने पूछा तेरी कोई सन्तान है कि नहीं है मैंने कहा गुरुदेव नहीं है। कहा कि हम तुझे एक बच्ची देते हैं ताकि तेरी सम्पत्ति समाज के काम आए। कुछ समय के बाद गुरुदेव ने एक पत्र भेजा कि बेटा टोली के लिए गाड़ियाँ खरीदना है तेरे पास जो कुछ भी हो वह दे देना। मेरे पास पिताजी के चांदी के सिक्के थे वह मैंने निकालकर बाजार में बेचे सवा लाख रुपया मिला मैंने सारे के सारे गुरुदेव के चरणों में समर्पित कर दिए। गुरुदेव से मैंने कहा गुरुदेव मेरी जो सम्पत्ति है वह आपके चरणों में समर्पित है गुरुदेव ने कहा बेटा इसे तू मेरी मानकर मेरा प्रतिनिधि मानकर काम करता रह जो कुछ हो वह लोकमंगल के लिए लगाता रह। इसके बाद जो बचत होती थी साल में पचास हजार रुपये चार पाँच साल तक भेजता रहा। इसके बाद एक लाख रुपया छै सात साल तक दिया उसके बाद आँवलखेड़ा के लिए साहित्य के लिए एक गाड़ी दे दी। इसके बाद शान्तिकुँज में एक मासीय सत्र नौ दिवसीय सत्र में जो झोला पुस्तकालय चलता है वह आधे मूल्य में अपनी तरफ से दिया जा रहा है वह एक डेढ़ लाख रुपया हर साल आ जाता है। मैं साठ-पैसठ वर्ष की आयु में भी पूर्ण स्वस्थ हूँ। मानला बच्ची की जगह कोई बच्चा होता तो कुछ भी नहीं कर पाते। तो गुरुदेव ने बचाया इसलिए सारा का सारा गुरुदेव के कार्य में लग रहा है।