गुरुसत्ता का मिला हमें जो प्यार है

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि वे व्यक्ति के अन्तर्मन को झकझोरते भी हैं और साथ ही साधकों-याजकों-शिष्यों को एक उत्कृष्ट पथ का पथिक बनने के लिए प्रेरित भी करते हैं। अपने एक ऐसे ही विशिष्ट उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी गायत्री जयन्ती के पावन अवसर पर सभी गायत्री परिजनों को भावविभोर करते हुए कहती हैं कि गायत्री जयन्ती का पावन पर्व न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से संकल्प के जागरण का पर्व है, अपितु पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण का दिवस होने के कारण हर गायत्री परिजन के लिए समर्पण का पर्व भी है। वन्दनीया माताजी स्मरण दिलाती हैं कि पूज्य गुरुदेव ने कितने कष्ट-कठिनाइयों के मध्य दुर्द्धर्ष तपस्या करके गायत्री परिवार के विराट मिशन को खड़ा किया और अब समय उनको एक सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने का है और इस हेतु हर परिजन को उनके अधूरे संकल्प को पूर्ण करने के लिए जुट जाने की आवश्यकता है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को..........

भावनाएँ या विवेक

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

हमारे आत्मीय परिजनो ! भावनाएँ तो कुछ और कहती हैं और विवेक कुछ और कहता है। अब किसकी बात सही माननी चाहिए, विवेक की या भावनाओं की? प्रत्यक्ष की या परोक्ष की? किसकी मानी जानी चाहिए? विवेक तो कहता है कि वे हर क्षण हमारे साथ हैं, हम अनुभव भी करते हैं, लेकिन आखिर भावनाओं को, हम अपने आप को किस तरीके से समझाएँ?

जो शरीर हमारे सामने था और जिसने हमें चलना सिखाया है, सोचना सिखाया, ऊँचा उठाया और जिसने भरपूर प्यार और दुलार दिया हो, उस शरीर को कैसे भुलाया जा सकता है? और हमारा जो विवेक है, वह यह कहता है कि बहाने बनाने की अपेक्षा वास्तविकता को समझना चाहिए और उन्होंने जो कार्य अधूरे छोड़े हैं, उन कार्यों के लिए अपने तन-मन से, हृदय से उसमें लग जाना चाहिए। सच्ची श्रद्धांजलि तो तभी होगी। शरीर को तो हम रोते रहे और जो हमसे उम्मीदें की गई थीं उनका क्या हुआ? उनका तो वही हुआ न कि जिस तरीके से उन दो मालियों के लिए दो बाग सौंप दिए गए। एक तो भावनाओं में डूबा रहा और उसने उसका मटियामेट कर दिया, एक ने अपने कर्तव्य को समझा तो बाग को भरा-पूरा, हरा-भरा बना दिया और हमसे जो अपेक्षा की गई, आप बताइए उसमें कहीं कमी हो तो हम इसे सुधारें और इस बाग को विकसित करें।

इसका श्रेय किसको देना पड़ेगा? श्रेय उसी को देना पड़ेगा, जो भावनाओं से ज्यादा अपने कर्तव्य की ओर चल रहा है। प्रत्यक्ष को न देख करके परोक्ष को देख रहा है, सर्वव्यापी को देख रहा है।

गुरुजी जब शरीर में थे, तब एक सीमा बन्धन था। शरीर की आवश्यकताएँ होती हैं और जो शरीर से जुड़े हुए होते हैं उनका मोह होता है, जैसा कि मैंने अभी निवेदन किया। आप शामिल हैं, मैं भी उसी में शामिल हूँ। शरीर से जुड़े थे तो वो शरीर हमको रुला रहा है और कर्तव्य यह कह रहा है कि नहीं रोना कायरता है। रोने की अपेक्षा तो हमको उनके जो सौंपे हुए कार्य हैं, उनको आगे बढ़ाना है। उनकी शक्ति तो हमको मिलती ही रहेगी और अभी भी मिल रही है।

अभी आप यह सोच रहे हैं कि शक्ति नहीं मिल रही है, शक्ति मिल रही है। बिलकुल हर क्षण, हर पल यही महसूस होता है कि वे हमारे साथ हैं। आज गायत्री जयन्ती, गंगा दशहरा और गुरुजी की पहली पुण्यतिथि है। गंगा दशहरा और गायत्री जयन्ती एक ही हैं। जिस तरीके से भगीरथ ने गंगा को लाने में प्रयास किया था, जब उनकी उपासना पूरी हो गई, तपश्चर्या पूरी हो गई तो गंगा आने को तैयार हो गईं। जब गंगा आने को तैयार हो गईं तो उनने कहा कि वेग कौन सँभालेगा? इस गंगा का वेग कौन सँभालेगा?

गंगा-गायत्री एक हैं

वेग सँभालेगा योगी। योगिराज शिव सँभालेंगे। शिव ने अपनी जटाएँ बिखेर दीं। जटाएँ बिखेर दीं तो उसमें से वो गंगा आती हुई, प्रवाहित होती हुई चली गईं। उन्होंने कहा कि क्या गंगा जटाओं तक सीमित हो जाएँगी? नहीं, यह तो लोक-मंगल के लिए सारी पृथ्वी पर चाहिए। उन्होंने कहा कि गंगा का ताल्लुक लोक-कल्याण से है, जिससे कि मनुष्यों की मलिनताएँ निकलें। गंगा का उद्देश्य एक ही है और वह है शीतलता, गतिशीलता, प्रवाहित होना और मल-विक्षेपों को निकालना |

गुरुजी ने ज्ञान की गंगा को लाने में अथक प्रयास किया। इतना प्रयास किया कि शायद ही कोई कर पाए। एक दूसरे कौन? शंकर। उसका वेग कौन सँभालेगा? शंकर। ज्ञान की गंगा का वेग वही सँभालेगा, जो शंकर के समान हो। दृढ़ हो। जिसको कि काँटों की परवाह न हो, विष की परवाह न हो, साँप-बिच्छुओं की परवाह न हो। वो कौन होता है? वो शंकर होता है, शिव होता है। उन्होंने भी शिव जैसी शक्ति पाई और उस ज्ञान की गंगा को धारण किया अर्थात गायत्री को धारण किया।

आज गायत्री जयन्ती है न? गंगा दशहरा है न आज? उनकी पुण्यतिथि है न आज। उन्होंने गायत्री को धारण किया, अपने जीवन में उतारा। जौ की रोटी खा करके और छाछ पी करके चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस पुरश्चरण किए। उन्होंने अपना सारा अन्तःकरण धोया। देखिए उनका जीवन, कहते हैं कि मनुष्य के पाँच जीवन होते हैं अर्थात पंचकोश होते हैं। गायत्री पंचमुखी होती है। उन्होंने भी एक शरीर में रहते हुए पाँच जीवन जिए। पहला जीवन कौन-सा था?

गुरुदेव के अनेक जीवन

उनका पहला जीवन वो था जो मनुष्यों की कष्ट, कठिनाइयाँ हैं, दुःख हैं, उनका निवारण करना। जो उनकी आन्तरिक कमजोरियाँ हैं, उनको निकालना, उनको ऊँचा उठाना यह था जीवन नम्बर एक।

जीवन नम्बर दो— गायत्री को उन्होंने आत्मसात् कर लिया और उस गायत्री के लिए उन्होंने यह शपथ ली, यह संकल्प लिया कि इसको चौबीस लाख व्यक्तियों तक पहुँचना चाहिए और पहुँचाने में वो सफल हुए। यह था उनका दूसरा जीवन।

उनका तीसरा जीवन साहित्यिक जीवन था। साहित्य उन्होंने इतना लिखा कि अपने वजन से भी ज्यादा लिखा और पढ़ा कितना? अरे आप को क्या मालूम है कितना पढ़ा-कितना बताएँ आपको? सैकड़ों, हजारों, लाखों पुस्तकें उन्होंने पढ़ डालीं। लोग कहते हैं कि हमारे पास फुरसत नहीं है। हम आगे नहीं बढ़ सकते और वो हर दिशा में आगे बढ़ते हुए चले गए।

बड़े से बड़ा व्यक्ति आता हुआ चला गया और माप देता हुआ चला गया। यह विषय तो हम पूर्णतः जानते ही नहीं हैं। इस विषय को हम लेकर के बैठे हैं, जिससे हमारा रोज काम पड़ता है। हम तो समझते हैं कि वे विषयशून्य हैं। उनकी जो दलीलें थीं, उनका जो प्रतिपादन था वो अपने आप में बड़ा ही विलक्षण था। बुद्धि भी विलक्षण थी। जो भी काम उन्होंने किए सब विलक्षण-ही-विलक्षण किए और शानदार-ही-शानदार करते हुए चले गए। उसी का वो परिणाम था, जिसमें कि उन्होंने साहित्य की स्थापना की।

हमारी जो शक्तिपीठें बनी हैं, वो तप की शक्ति के द्वारा उनके प्रभाव से ही बनी हैं। लोग अपने जीवन में थोड़ा-बहुत ही कर पाते हैं, ज्यादा नहीं कर पाते, लेकिन उन्होंने अपने जीवन में 3500 शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ बना डालीं और क्या हुआ? गायत्री तपोभूमि बनी, ब्रह्मवर्चस बना, आपका शान्तिकुञ्ज बना।

अभी जो होने जा रहा है, वो कितना विशाल होने जा रहा है? आप कल्पना नहीं कर सकते कि कितना विशाल होने जा रहा है। अभी-अभी मैंने तीन शरीरों की बात की थी। स्थूलशरीर—एक, कारणशरीर—दो और सूक्ष्मशरीर—तीन। यह कितना विशाल और कितना विस्तार है, जो सारे वातावरण में घूम रहा है, सारे ब्रह्माण्ड में घूम रहा है और वो जो चाहें सो कराएँ।

अभी-अभी देवस्थापनाएँ हुईं थीं। आपको मालूम है गायत्री माता और यज्ञ भगवान को घर- घर पहुँचाने के लिए यह प्रेरणा मिली और यह प्रेरणा मिलते ही क्या-से-क्या होता हुआ चला गया? बड़े-से-बड़े व्यक्ति जुड़ते हुए चले गए। अगले दिनों क्या होने वाला है? अगले दिनों 24 करोड़ भाई ! लाख से कम तो हम गिनती-गिनते ही नहीं हैं। लाख से नीचे तो गिनती है ही नहीं, करोड़ों की बात करते हैं।

अभी 24 करोड़ घरों में देवस्थापना होनी है, केवल इशारा है आपका। तो आप क्या करेंगे? आप क्या कर सकते हैं, केवल आपका इशारा ही बहुत है। काम तो सब ऊपर वाला करा लेगा। जिनका कार्य है वो स्वतः ही करा लेंगे, उसमें दो राय ही नहीं है। आपने श्रद्धांजलि समारोह देखा था न? कितने लाख व्यक्ति थे? जो हमने संकल्प लिया था तो श्रद्धांजलि समारोह जिस पिता के शरीर के न रहने पर जो बच्चे नहीं आए थे वो अब आए और अपनी श्रद्धांजलि भेंट की।

श्रद्धांजलि भेंट का मतलब पैसा नहीं था कि आप पैसे दे जाइए। वह तो कार्य पैसे से ही चलेगा। सारा का सारा सरंजाम बनेगा तो पैसे से बनेगा, लेकिन उसके मूल में आपकी भावनाएँ थीं। जो कार्य आपने किया था, वह आपकी भावनाओं ने किया था और शक्ति?

शक्ति बेटा गुरुजी की मिली थी। नहीं तो एक दिन में ही पस्त पड़ जाते। ढाई महीने रह करके जिन्होंने कार्य किया, वो सराहनीय है। हम सराहते हैं। और शक्ति? अरे शक्ति देने वाले ने शक्ति दी थी। आपमें क्या शक्ति है? आप तो मिट्टी के खिलौने हैं। आपके अन्दर तो शक्ति का संचार होता है और जब शक्ति का संचार होता है तो पूरा हमारा जो शरीर है गतिशील होता हुआ चला जाता है। भावनाएँ हमारी उछलने लगती हैं, फिर न दिन का ख्याल रहता है न रात का ख्याल रहता है, काम-ही-काम, काम-ही-काम सवार रहता है।

एक शरीर में पाँच शरीर

बेटे, ये मैंने उस शक्ति के लिए कहा कि एक शरीर में रहते हुए उन्होंने पाँच शरीरों का काम किया। कई बार मैं ऐसा कहती रहती थी। उन्होंने कहा नहीं, अरे मैंने तो जिन्दगी का सब आनन्द ले लिया, अब कोई नहीं रहा। इतनी मेहनत करनी थी कि एक शरीर में रहकर के पाँच शरीरों की हमने जिन्दगी जी, बड़ी शानदार जिन्दगी जी। कौन जी सकता है ऐसी जिन्दगी? जो योगी होता है, वही जी सकता है, वरन हर किसी का साहस नहीं पड़ता है। व्यक्ति को दुःख होता है तो दुःख में नर्वस हो जाता है और जब सुख होता है तो उसमें वह पागल हो जाता है।

योगी जो होता है, वो दोनों ही परिस्थितियों में एक-सा होता है। वो प्रसन्नता में भी उतना ही विवेक रखता है और गम में भी उतना ही विवेक रखता है। दोनों का सन्तुलन बैठा करके चलता है। वो दोनों का सन्तुलन बैठा के चलते थे। अब आपकी और हमारी बारी जो आई। जिसको कि हमने वचन दिया है और शपथ ली है कि जब तक इस शरीर में प्राण है, तब तक अपने शरीर को हम निछावर करते रहेंगे। जब तक शरीर में से प्राण नहीं निकल जाएगा, तब तक हर कार्य के लिए हम मजबूत बनेंगे।

आज गायत्री जयन्ती है। आपने तो केवल माला घुमाई है। उन्होंने तो गायत्री माता को अपने हृदय में धारण किया, धारण ही नहीं किया, उसकी गोद में समा भी गए। उसी दिन जिस दिन गायत्री माता का और गंगा का प्रादुर्भाव हुआ। उसी दिन उन्होंने अपनी माँ की गोद में विश्राम ले लिया। शरीर ने विश्राम लिया है, मन ने विश्राम नहीं लिया है। कोई भी यह मत समझना कि मन ने विश्राम लिया है, नहीं उनके शरीर ने विश्राम लिया है।

मन कहाँ जाएगा? मन तो यहीं रहने वाला है। हमारे पास ही रहने वाला है। मन कहाँ जाएगा। मन तो अपनों के बीच में ही रहता है। आप भी अनुभव करते हैं, आपके जो दुःख, कष्ट, कठिनाइयाँ होती हैं उसमें आप अनुभव करते हैं कि नहीं करते हैं कि गुरुजी हमारे साथ हैं, गुरुजी हमारी रक्षा कर रहे हैं। आपको अनुभव जरूर होता होगा। जो हृदयहीन होगा, उसके लिए तो क्या कर सकते हैं?

चलिए उन्हें भगवान मत मानिए, एक शक्ति तो मानेंगे, एक महापुरुष तो मानेंगे, एक सन्त तो मानेंगे, एक पिता तो मानेंगे? जब आप पिता मानेंगे, तो फिर बच्चे की यह हिम्मत नहीं होती कि वो अपने पिता को भूल जाए। चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो तब भी कहीं-न-कहीं उसके मन में यह होता ही होगा कि हमारा पिता हमारी रक्षा कर रहा है।

वो गुरु पीछे थे और पिता पहले थे, पिता ही नहीं, बल्कि माँ पहले थे। माँ बड़ी कोमल होती है, सहृदय होती है। उनका हृदय बहुत ही कोमल था। जो दुःख और पीड़ा और पतन सारे संसार में फैल रहा है, उसे वो देख करके, अनुभव करके द्रवित हो जाते थे।

इतने द्रवित होते थे कि उनकी रात यों ही गुजर जाती थी, बगैर सोए ही गुजर जाती थी। आपको पीड़ा-पतन के बारे में भान भी नहीं है और उनको ज्ञान था। उस पीड़ा-पतन को मिटाने के लिए उन्होंने अपने जीवन की लगभग आहुति दे डाली। अन्तिम क्षणों तक जो उन्होंने पुस्तकें लिखीं।

अप्रतिम लेखनी के धनी

उन्होंने कहा कि ये मैं नहीं लिख रहा हूँ ये महाकाल मुझसे हाथ पकड़वा करके लिखवा रहा है और जब ये सारे देशों में और विदेशों में छपकर के सामने आएँगी तब लोग हमारा मूल्यांकन करेंगे। ऐसा ही है। जब घर-घर पहुँचेगा तो आप देखना कि दाम्पत्य जीवन और गृहस्थ जीवन किस तरीके से मुड़ता हुआ चला जाएगा। उनका जीवन शानदार होता हुआ चला जाएगा।

गाँधी जी का नमक सत्याग्रह और सूत कातना - स्वतंत्रता आन्दोलन से कोई ताल्लुक नहीं था, लेकिन परोक्ष रूप से जो भावनाएँ उसमें जुड़ी थीं, वो बड़ी गजब की थीं और वो स्वतंत्रता को साकार करके ही रहीं। इसी तरीके से जवाहरलाल नेहरू और पुरुषोत्तम दास जी मिल करके कार्य करते थे, घर-घर खादी पहुँचाते थे, वही गुरुजी का उद्देश्य रहा। ज्ञानरथ और झोला पुस्तकालय चलाने का यही उनका उद्देश्य था कि हमारे विचार ज्ञानरथ और झोला पुस्तकालय के माध्यम से घर- घर पहुँचें।

हमारे आगे के कार्यक्रम सारे के सारे यथावत् ही नहीं, बल्कि पूरे उत्साह के साथ और भी आगे बढ़ेंगे। यह मत समझिए कि गुरुजी आपको देख नहीं रहे हैं। तब दो आँख से देख रहे थे अब हजारों आँखों से देखते हैं। अब हजारों आँख से अपने प्रत्येक बच्चे को परखते हैं कि हमारा बच्चा कोई निर्जीव तो नहीं हो गया है, कोई निरुत्साहित तो नहीं हो गया है। हो गया है तो इसको झकझोरना चाहिए, वो स्वयं आपको झकझोरेंगे।

हम अनुभव कर रहे हैं कि आप झकझोरे जा रहे हैं और कमी रह जाएगी तो उसकी पूर्ति यह शरीर करेगा। राजी से भी करेगा, बहला कर पुचकार के भी कहेगा। माँ की दो आँख होती हैं, एक तो होती है प्यार की बड़ी ममता भरी होती है और दूसरी होती है उसकी सुधार की। जहाँ कहीं भी हम गड़बड़ी पाएँगे, जहाँ कहीं भी आपको हम निर्जीव पाएँगे, वहाँ हम आपको झकझोरते हुए चले जाएँगे।

यहीं हैं गुरुदेव

आप विश्वास रखिए कि गुरुजी यहीं हैं, बिलकुल यहीं हैं, आप देख नहीं पा रहे हैं। यह छवि आप देख पा रहे हैं। शरीर नहीं देख पा रहे हैं न? शरीर से नहीं, अब हम आत्मा से जुड़े हैं। पहले शरीर से भी थे आत्मा से भी थे। अब हम विशुद्ध आत्मा से जुड़े हैं और आत्मा से जुड़े हैं तो शरीर को विवेक के पीछे दबाना पड़ेगा। जिस तरीके से ईसाई मिशन फैला, बौद्ध धर्म फैला, इसी तरीके से हम उनके उद्देश्यों के लिए, उनके लक्ष्य के लिए सतत आगे बढ़ते ही जाएँगे। हिंदुस्तान में ही नहीं, सारे संसार में फैलने जा रहे हैं।

बौद्ध धर्म सारे संसार का हो गया था, ईसाई मिशन सारे संसार का हो गया था, तो यह गायत्री परिवार सारे संसार का क्यों नहीं होगा। जो माँ हमको दुलारती है, उस माँ गायत्री के मंत्र के एक-एक अक्षर में जो शिक्षण भरा हुआ पड़ा है, हम घर-घर जा करके उसका शिक्षण, उसका उद्देश्य और लक्ष्य समझाएँगे। उनकी ठोड़ी में हाथ डालेंगे। जो भी तरीका बनेगा अपनाएँगे। हम अपने स्वार्थों को नहीं देखेंगे कि हमको खाना मिला कि नहीं मिला।

बेटे ! आपने नहीं देखा है। कई बार मैं गुरुजी के साथ गई और वो परिस्थितियाँ हमारे सामने आईं, पर मुँह से उफ तक नहीं किया। जो परिस्थितियाँ हैं, वो हैं और उन्होंने उनकी तारीफ ही की जहाँ कि सुविधाएँ नहीं हैं। सुविधाएँ देखने जाएँगे क्या? नहीं सुविधा नहीं चाहिए, चाहे पैरों में छाले क्यों न पड़ जाएँ? नहीं मिलेगा खाना, चने तो मिलेंगे। चने जेब में डाल करके चलेंगे, लेकिन अपने लक्ष्य तक पहुँच कर रहेंगे।

यह बात निश्चित है कि हम गुरुजी से जुड़े हैं। जुड़े हैं तो हमें उन तक हर हालत में पहुँचना है और हम पहुँचेंगे। कब पहुँचेंगे? तब पहुँचेंगे जब हमारी आस्था, हमारी निष्ठा और हमारी श्रद्धा यह कबूल करेगी कि गुरुजी ने जो हमारी सेवाएँ की थीं, उन सेवाओं का ऋण हम किस तरीके से चुकाएँ? क्यों साहब! क्या-क्या सेवाएँ की थीं? अब यह सेवाएँ तो आपका मन बताएगा कि क्या-क्या सेवाएँ की थीं।

गुरुदेव के चमत्कार नहीं, उनका तप

नहीं तो अभी आपमें से खड़े कर दूँगी, कितनों को खड़ा कर सकती हूँ, जिनको जीवनदान मिला, कई जो अपने आर्थिक संकट से ऊपर उभरे, कितने ही मुकदमों से उभरे हैं। मैं चमत्कार बताने नहीं बैठी हुई हूँ। यहाँ आ करके आपको उनका मैं कोई चमत्कार बता रही हूँ, चमत्कार नहीं उनका व्यक्तित्व बता रही हूँ। उनका यह व्यक्तित्व था, जिससे उन्होंने अपने को इस लायक बना लिया था।

उनकी तपश्चर्या थी, उनकी शक्ति थी। जो बात कहते थे, वो सही ही होती थी। न मालूम कितने बच्चों को कहाँ-से-कहाँ उछाल करके जाने क्या से क्या बना दिया है। जिसकी कभी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी कि हम आगे चल करके ऐसे भी बन सकते हैं क्या? ऐसा भी हमें हो सकता है क्या? ऐसा सम्मान भी मिल सकता है। बच्चों का सम्मान है, जो बच्चे ये कल्पना करें कि यह हमारा सम्मान है, वो उनकी भूल है।

यह उस शक्ति का सम्मान है, वही शक्ति उनके अन्दर भावनाएँ पैदा करती है। चूँकि वो उसका नुमाइन्दा बन करके आया है। वो उसका एक बालक बन करके आया है, प्रतिनिधि बन करके आया है, उसका स्वागत है। स्वागत उस लड़के का नहीं है, स्वागत है उस सत्ता का। वो सत्ता करा रही है और उनकी भावनाएँ कर रही हैं।

अपने लिए नहीं, समाज के लिए जिएँ

आज के दिन मैं आपसे एक ही बात कहना चाहती हूँ कि गायत्री जयन्ती का यह महापर्व हमारे लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। गायत्री माता के प्रादुर्भाव के श्रेष्ठ दिन के साथ एक कड़ी और जुड़ गई—गुरुजी की पुण्यतिथि। इसमें हम संकल्प लें कि हमको अपने लिए नहीं, लोक-मंगल के लिए जीना है। अपने लिए तो पशु भी जिन्दा रहता है, चारा खाता है और बच्चे पैदा करता है। इसके अलावा और कौन-सी जिन्दगी है?

मनुष्य की जो जिन्दगी है, बड़ी शानदार जिन्दगी है और वो जिन्दगी लोक-मंगल के लिए है। लोकसेवी बनकर काम करने की है। जितना भी आप समय निकाल सकते हों, आप इसमें से जरूर अपना समय निकालिए। आज यही उनके लिए एक श्रद्धांजलि हो सकती है। आपकी जो भावनाएँ, आपकी जो निष्ठाएँ हैं, वही उनकी श्रद्धांजलि है। पूरे मन से हम श्रद्धांजलि देंगे और आप पाएँगे कि उनका जीवन इस मिशन को बनाने में समर्पित हो गया। वो हर कण-कण में समाये हैं और हमारे बीच में ही हैं।

अभी तो मैंने शान्तिकुञ्ज के लिए कहा था कि आप यहाँ शान्तिकुञ्ज में आए हैं तो आपको हर समय यही अनुभव होना चाहिए कि गुरुजी हमारे साथ हैं, हमारे सामने विद्यमान हैं और मैं यह भी कहूँगी कि शान्तिकुञ्ज में ही क्यों? हर बच्चे के पास, जो भी हमारे परिजन बैठे हैं, हमारे बच्चे बैठे हैं, हर बच्चे के साथ हैं। जहाँ कहीं भी आपको कोई दुःख, कष्ट, कठिनाई हो तो आप पुकारना, आपका पिता दौड़ा आएगा और आपकी जो पहले मदद होती रही है, वही मदद अब भी होगी और आगे भी होगी। मैं दृढ़ता के साथ कह सकती हूँ कि पहले भी होती रही है, अभी भी होती रही है और आगे भी होती रहेगी।

बारी तो हमारी और आपकी है। पिता बदले में कुछ नहीं चाहता, माँ बदले में कुछ नहीं चाहती। माँ निस्स्वार्थ भाव से सेवा करती है, बच्चा पैदा होता है और बच्चे को सूखे में सुलाती है, खुद गीले में सोती है, अनेक कठिनाइयाँ सहते हुए भी माँ उसका पालन-पोषण करती है। पिता उसके साधन जुटाता है। वे तो पिता भी थे और माँ भी थे। आप यह मत समझिए कि आपकी आँखें ही नम हुई होंगी। उनका भी हृदय रोया है। चूँकि उनका हृदय विशाल था।

वे सांसारिकता में तो कभी नहीं चिपके, लेकिन सारे विश्व के लिए वो तत्पर रहे। हर सुख- सुविधाओं को उन्होंने ठुकराया था। कभी उनको ईंट के तरीके से आगे आड़े नहीं आने दिया। आप भी यदि यही अनुकरण करेंगे, तो आप पाएँगे कि आप भी उस विशाल पिता की सन्तान में शामिल हो सकते हैं। सन्तान तो आप हैं ही, लेकिन जो विशालता आपके अन्दर आनी चाहिए उस विशालता की थोड़ी कमी है।

विशाल हृदय बनें

हम चाहते हैं कि आपकी विशालता आगे बढ़े, आपकी उदारता आगे बढ़े, आपकी सेवा आगे बढ़ें तो आपका घर-परिवार भी समुन्नत होता हुआ चला जाए। आइए श्रद्धांजलि दें उस महापुरुष को, उस सन्त को, उस ऋषि को जो आज हमारे बीच सशरीर नहीं हैं, आत्मा हैं, उसको हम श्रद्धांजलि दें। अभी वर्ष भर पहले उनका शरीर था। यही समय था, जिस समय मैंने अपनी बात का अन्त किया है। यही वो समय था, जब बच्चों ने गीत गाया था—माँ तेरे चरणों पर हम शीश झुकाते हैं, उन्होंने सदैव के लिए अपना शीश झुका दिया।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात खतम करती हूँ और मैं आश्वासन दिलाती हूँ कि आप सबकी ओर से और अपनी ओर से भी मैं उनको आश्वासन दिलाती हूँ कि जो कार्य अधूरे रह गए हैं, उन कार्यों को हमें गति देनी है, उनको फैलाना है, आगे बढ़ते रहना है, पीछे की ओर नहीं देखना है। वे हमेशा यही कहा करते थे, कभी मैं मथुरा छोड़ के आई थी, बच्चों की याद आ जाती थी, तो उन्होंने कहा कि नहीं पीछे की जिन्दगी देखोगी तो हैरान हो जाओगी, आगे का लक्ष्य देखो।

हमको आगे जो कार्य करने हैं, वो हमें महान कार्य करने हैं। तुमने कभी पीछे मुड़कर के देखा तो तुम्हें दुःख ही दुःख होगा। बेटे! मैंने वो बात गाँठ में बाँध ली है, जो अनायास ही याद आ जाती है। भाई भावुक हूँ, मैं क्या करूँ? भावनाओं पर ही कई बार कण्ट्रोल नहीं हो पाता है। नहीं हो पाता है तो नहीं हो पाता है। वो मेरी मजबूरी है, चाहे जो भी आप कह सकते हैं। वो क्षण कभी-कभी आता है, पर वैसे मैं चट्टान के तरीके से हूँ, लोहे के तरीके से खड़ी हूँ और चट्टान के तरीके से मैं मजबूत भी हूँ। मुझे कमजोर नहीं पाया जाएगा।

प्राण तो निकल सकते हैं, पर मैं कायर नहीं हो सकती। न तो मैं कायर हो सकती हूँ, न मैं बुजदिल हो सकती हूँ और न मेरे फौलादी और चट्टानी इरादों में कोई कमी आ सकती है। बच्चों के लिए मुझे सौंप गए हैं कि लाखों बच्चे जो प्यार के प्यासे हैं, जिन्हें मैं आज तुम्हारे भरोसे छोड़े जा रहा हूँ, बेटे मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि अपनी छाती से लगा करके आपको रखूँगी। आप अनुभव करेंगे कि माँ अपनी छाती से लगा करके हमको रख रही है। बिलकुल उसी तरीके से आपको लगा करके रखूँगी, जिस तरीके से आपके पिता ने रखा था। आपके पिता ने माँ का रोल भी अदा किया और पिता का रोल भी अदा किया।

बेटे ! अब वो रोल मैं करूँगी, जहाँ कहीं कमी, कमजोरियाँ आएँगी मैं पिता का भी रोल करूँगी और माँ के तरीके से मैं अपने बच्चों को समेटकर रखूँगी, प्यार से चिपकाकर रखूँगी कि कहीं मेरा एक भी बालक ऐसा न हो कि विलग हो जाए। नहीं, मैं नहीं चाहती।

मिशन का विस्तार करें

मैं तो अपने बच्चों की वृद्धि चाहती हूँ। माँ-दादी ये चाहती हैं कि हमारी वंश-परम्परा आगे बढ़े। हम चाहते हैं कि हमारा जो वंश है, जो आप लोग हैं, इसमें वृद्धि होती चली जाए। हम अपनी आँखों से देखना चाहते हैं। अभी एक पूर्णाहुति हुई है। अभी सन् 1995 में पूर्णाहुति करनी है। आगे और काम सन् 2000 में करने हैं। अरे! कितना विशाल कार्य करना है? वो विशाल कार्य कौन करेगा?

वो करेगा, आप करेंगे और हम करेंगे, लेकिन हम अपनी ओर से आपको आश्वासन दिलाते हैं कि आप इतने व्यक्ति आए हैं, भले से हम आपसे बात तो नहीं कर पाए हैं, क्षमा करना कि हम आपके कोई दुःख-कष्ट नहीं पूछ पाए हैं, आप सो गए होंगे, लेकिन हम नहीं सोये।

हर क्षण गुरुजी आपके साथ रहे, हम आपके साथ रहे हैं। आप की देख-रेख की है। आपके हर दुःख, कष्ट-कठिनाई में हम सदैव शामिल रहे हैं और सदैव शामिल रहेंगे। आप रहेंगे की नहीं रहेंगे, हमें नहीं मालूम, पर हम रहेंगे। यदि आपके अन्दर भी यह भावना हो तो हमारा वजन आप हलका करिए।

अब आप एक ही कार्य कर सकते हैं कि हमारा वजन हलका करिए। वजन मतलब मिशन का विस्तार। वजन का मतलब यह नहीं है कि हमारे ऊपर कोई वजन रखा है, उसे तुम हलका करो, नहीं एक ही है कि पिता के कार्य को जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो आगे बढ़ाते हैं। आप हमारे कार्य को आगे बढ़ाइए, हमें और कुछ नहीं चाहिए। आपका एक नया पैसा नहीं चाहिए। आपकी न हमें साड़ी चाहिए, न हमें आपका पैसा चाहिए, न आपका भोजन चाहिए। हमें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए, लेकिन हम तो अपने बच्चों को देखेंगे, आजमाएँगे कि हमारे बच्चे कैसे हैं? कायर हैं, बुजदिल हैं कि दिलेर हैं।

ये क्या हैं? ये समाज सेवा के लिए थोड़ा वक्त निकाल सकते हैं कि नहीं निकाल सकते हैं? या इनके पास जो समय है, केवल बीबी-बच्चों के लिए है? क्या उस पिता के लिए भी है, उस गुरु के लिए भी है, जिसने कि आपको खड़ा होना सिखाया। आपको भावनाएँ दीं, आपको निष्ठाएँ दीं, आपको श्रद्धा दी जिससे कि जहाँ कहीं भी आप जाते हैं, वहाँ विजयी हो करके आप आते हैं। तो उनका भी आप कर्ज चुकाएँगे कि नहीं चुकाएँगे, आपको कर्ज चुकाना चाहिए।

हम भी उनका कर्ज चुकाएँगे, आप भी कर्ज चुकाइए। इसके बगैर कल्याण नहीं है। मैंने बस, इतना ही आपसे निवेदन किया कि आज आत्मशोधन का दिन है। आप अपनी आत्मसमीक्षा करिए, ये आत्मसमीक्षा का पर्व है।

आज चूँकि इसमें पुण्यतिथि और जुड़ गई, अतः यह समीक्षा का दिन है, बेटे! आप समीक्षा करना और अपनी भावभरी श्रद्धांजलि हम और आप उनके लिए दें।

आज की बात समाप्त
॥ॐ शान्तिः॥