उपासना का आधार

परम वन्दनीया माताजी के व्याख्यानों की यह विशिष्टता है कि उनकी अमृतवाणी न केवल साधारण व्यक्ति को उसके जीवन को जीने के सूत्रों से परिचित कराती है, वरन साधना के दुष्कर पथ पर बढ़ने वालों को भी साधनात्मक उत्कर्ष का मार्ग दिखाती है। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी सभी साधकों को उपासना के वास्तविक आधार से परिचित कराते हुए कहती हैं कि मनुष्य के पास शक्तियों के अपरिमित भण्डार हैं, परन्तु वे साधना के स्वर्णिम पथ पर बढ़ने से ही हस्तगत हो पाते हैं | वन्दनीया माताजी हर साधक को स्मरण दिलाती हैं कि साधना का पथ निरभिमानता का पथ है एवं अपने अभिमान व अहंकार को त्यागने वाले ही साधना से सिद्धि का पथ तय कर पाते हैं। उपासना का वास्तविक आधार अपने आराध्य के प्रति सर्वोच्च समर्पण ही है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.......... |

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

शक्तियों के भण्डार

भगवान की शक्ति अनन्त है और उस अनन्त भाण्डागार में से व्यक्ति जितना चाहे, उतना प्राप्त कर सकता है। शर्त इतनी भर है कि उसकी पात्रता का विकास हुआ या नहीं हुआ। सर्वत्र शक्तियों के भाण्डागार भरे पड़े हैं, लेकिन कहते हैं कि—

सकल पदारथ हैं जग माहीं।
करमहीन नर पावत नाहीं॥

व्यक्ति चाहते हुए भी क्यों पा नहीं पाते हैं? क्योंकि वे प्रयास नहीं करते। प्रयास करें, तो ऐसी कोई भी दुनिया की शक्ति नहीं है, जिसको हम प्राप्त न कर सकें। खासतौर से आध्यात्मिक मार्ग पर हम चाहे जो उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं।

मैं उपासना की महत्ता बताने जा रही हूँ कि जीवन में उसका कितना महत्त्व है। उपासना से व्यक्ति का विकास, किस प्रकार होता हुआ चला जाता है और वह क्या-से-क्या बनता हुआ चला जाता है? वह सन्त बनता हुआ चला जाता है, ऋषि बनता हुआ चला जाता है और न मालूम जीवन में क्या-क्या अच्छाइयाँ लेकर के आता है और उन अच्छाइयों को दूसरों के अन्दर डालता हुआ चला जाता है।

बेटे ! कोई एक सन्त थे, जिन्होंने उपासना की। उपासना की, तो उनको वरदान मिला। वरदान मिला, तो वे वरदान पाकर के कुछ बौखलाने लगे कि जब मेरे अन्दर इतनी शक्ति है, तो मैं कुछ भी कर सकता हूँ॥ एक बार उन्होंने ऊपर को देखा, ऊपर देखते ही चिड़िया जो थी, वह नीचे आ पड़ी और जलकर मर गई। चिड़िया जब मर गई, तो उनके अन्दर एक अहंकार आ गया, अहंकार वृत्ति आ गई।

साधक में न हो अहंकार

साधक के अन्दर अहंकार वृत्ति नहीं होनी चाहिए। लोभ और मोह की जंजीरें नहीं होनी चाहिए। उन्होंने उस चिड़िया को देखा, तो कहा कि मेरे अन्दर तो इतनी शक्ति है कि जब मैं इस चिड़िया को जला सकता हूँ, तो मनुष्य को तो और भी भून सकता हूँ। भीतर से उनका अहंकार जाग गया। सन्त के अन्दर अहंकार नहीं होना चाहिए। पूजा-उपासना की है, तो अहंकार किस चीज का?

अब वह आगे बढ़े, तो भिक्षा माँगने के लिए एक व्यक्ति के यहाँ पहुँचे। भीतर उसकी पत्नी बैठी थी। तो उन्होंने कहा— भिक्षा लाओ, तो उसने अन्दर से यह कहा कि देखिए मैं अपने पति की सेवा कर रही हूँ, मैं इस समय आपको भिक्षा नहीं दे सकती। थोड़ी देर आप इंतजार करिए, तो मैं आपको भिक्षा दूँगी। थोड़ी देर बैठा, तो तिलमिला गया और बड़ी जोर से कहा कि देती है कि नहीं देती।

उसने कहा—जाओ-जाओ, चिड़िया जला दी होगी, आप मुझे नहीं जला सकते। उन्होंने कहा कि चिड़िया की बात इसको कैसे मालूम पड़ी? फिर उससे पूछा कि तुम्हें चिड़िया के बारे में कैसे मालूम? उसने कहा कि देखिए मुझे आत्मज्ञान है; क्योंकि जो भी मेरा कार्य है, उसे मैं भगवान की पूजा समझ करके ही करती हूँ। जो मेरा दैनिक कृत्य है, उस हर कार्य में भगवान समाया हुआ है। चाहे घर की सफाई हो, चाहे घर का कोई भी कार्य हो, चाहे मेरे पति की सेवा हो और चाहे जो भी हो, मेरे लिए भगवान की पूजा है। इसलिए मुझे आत्मज्ञान है कि आप मुझे नहीं जला सकते।

उन्होंने कहा—इसका रहस्य बताओ? रहस्य जानने के लिए, फिर कहा कि इसके लिए आप तुलाधार वैश्य के यहाँ जाइए। तुलाधार वैश्य के यहाँ पहुँचे, तो उन्होंने भी यही जवाब दिया।

उन्होंने कहा— देखिए आपको यहाँ उस महिला ने भेजा है। उन्होंने कहा कि तुम्हें कैसे मालूम? उन्होंने कहा—देखिए हम कर्म करते हैं और कर्म में ही हम भगवान के दर्शन करते हैं। जो भी ग्राहक हमारे यहाँ आता है, उसको हम यह मानकर चलते हैं कि भगवान का राजकुमार है और भगवान का राजकुमार है, तो इसको हम धोखा क्यों देंगे? इसको मिलावट की चीजें क्यों देंगे? हम बराबर अपनी ईमानदारी से पेश आते हैं और सभी कार्यों को हम इस तरीके से करते हैं कि जितने घण्टे हमें काम करने हैं, वह पूरा अपना मुआवजा चुका लेते हैं, अपने शरीर को निचोड़ देते हैं। हम इतना काम करते हैं और उसमें हमें सफलता मिलती है; क्योंकि हम हर व्यक्ति को भगवान का स्वरूप मानते हैं।

फिर उन्होंने कहा कि अब आप चाण्डाल के यहाँ चले जाइए। चाण्डाल के यहाँ गया। चाण्डाल के यहाँ पहुँचा, तो चाण्डाल ने भी यही कहा कि अभी आप बैठ जाइए। आपको तुलाधार वैश्य ने भेजा है, मैं पूरा रहस्य आपको समझा दूँगा, आप बैठ जाइए। उन्होंने कहा कि तुम्हें कैसे मालूम पड़ा कि तुलाधार वैश्य ने भेजा है।

उन्होंने सारा काम किया और सारा काम करके घर में उनके बुजुर्ग माता-पिता थे, उनकी उन्होंने सेवा की और सेवा के पश्चात फिर उन्होंने बताया। उन्होंने बताया कि देखिए जो हम कर्म कर रहे हैं और जो हमारा कार्य है, आपने देखा कि जितनी देर हम मैला उठाते रहे, झाडू लगाते रहे; लेकिन क्या मजाल कि उसमें हमारी तल्लीनता न रहे। हमने ऐसे ही तल्लीनता के साथ अपने कार्य को किया | हमारा हर कार्य पूजा है, उपासना है। उसी से हमको इतना आत्मज्ञान मिला हुआ है कि हमने आपको यह बताया कि वैश्य ने आपको भेजा है।

आत्मज्ञान की उपासना

उन्होंने कहा कि जरा-से व्यक्ति को इतना ज्ञान है और हमें ज्ञान नहीं है, क्यों नहीं है? उसने कहा कि तुम्हें ज्ञान इसलिए नहीं है कि तुम्हारे अन्दर अहंकार की वृत्ति ज्यादा हो गई है। आपने तपश्चर्या तो जरूर की है, लेकिन तपस्या का मर्म नहीं पहचाना। इतने दिन खराब भी किए, आपने उपासना भी की और फिर भी आप वैसे-के-वैसे ही रह गए।

ये कौन-सी उपासना है? उपासना कहती है कि हम भगवान की उपासना करते हैं, तो हमारे मन की मलिनताएँ दूर हों, जो हमारी दुष्ट प्रवृत्ति है, उस प्रवृत्ति को हम त्यागें और अच्छाइयों को ग्रहण करें, लेकिन हम बुराइयों को इस कदर (तरह) चिपकाए रहते हैं, जिस तरीके से नदी में कम्बल बह रहा था और एक ने उसे पकड़ लिया। उन्होंने कहा—छुड़ाओ। क्यों, क्या बात है? अरे ! यह रीछ नहीं छोड़ रहा है। उन्होंने कहा—ये रीछ नहीं, ये तो कम्बल है। अरे! तूने तो इसे पकड़ रखा है, कम्बल को तू छोड़ दे, फिर देख छोड़ता है कि नहीं छोड़ता।

हमारे अन्दर की जो क्षुद्रताएँ हैं, उनको हम नहीं त्यागते, उनको हम पकड़े रहते हैं। माया-मोह की जंजीरों से लेकर के अहंकार तक हमारे ऊपर इस तरीके से छाया हुआ है कि हमें न उपासना करने देता है, न हमें जनजागरण के कोई अच्छे काम करने देता है।

हमारे अन्दर अहंकार इतना समाया हुआ है कि हमें कुछ नहीं करने देता है, खासतौर से उपासना में तो कहीं भी नहीं, कोई स्थान अहंकार का नहीं है। उसमें तो नम्रता होती है। व्यक्ति जितना नम्र होगा, उतना ही पाएगा।

आन्तरिक पवित्रता है उपासना

उपासना में आन्तरिक पवित्रता बहुत जरूरी है। यदि आन्तरिक पवित्रता नहीं है, तो कूड़े के ढेर पर आखिर क्या पाएँगे? कूड़े के ढेर पर कोई नहीं आएगा, सफाई कीजिए। जब कहीं घर पर कोई आता है, तो हम घर की सफाई करते हैं। हमारे यहाँ कोई मंत्री आने वाला है, हमारे यहाँ कोई रिश्तेदार आने वाला है, तो उसके लिए हम सफाई करते हैं। तो फिर यह बताइए कि उस परब्रह्म को हम किस तरीके से पाएँ? गायत्री माता को किस तरीके से पाएँ?

जब तक हमने अपनी आन्तरिक मलिनताओं को दूर नहीं किया है और अपने अन्दर हमने झाड़ू नहीं लगाई है, सफाई नहीं की है, तो फिर बताइए गायत्री माता कैसे आएँगी? गायत्री माता तो नहीं आएँगी। फिर क्या आएगा? छलावा आएगा। जो अपनी आत्मतुष्टि के लिए माला तो फेर रहे हैं, आप चौबीस हजार का अनुष्ठान तो कर रहे हैं; लेकिन उस अनुष्ठान में जो भावनाएँ होनी चाहिए, जो श्रद्धा होनी चाहिए, वह श्रद्धा न होकर के एक छलावा मात्र हो जाता है।

कर का ‘मनका’ छोड़कर
मन का ‘मनका’ फेर

जब हम माला के साथ में अपने मन का ‘मनका’ नहीं फेरते—‘‘कर का ‘मनका’ छोड़कर मन का ‘मनका’ फेर’’ कर का मनका हाथ में रह जाता है, मन का मनका न जाने कहाँ घूमता रहता है, अर्थात किधर चलता रहता है, किधर जाता रहता है? क्या? हमने कभी अपने बारे में विचार किया? अपने बारे में विचार नहीं किया। न हमने अपनी श्रद्धा को इस लायक बनाया कि हमारी श्रद्धा पल्लवित हो, फले-फूले और विकसित हो; ताकि इस श्रद्धा के बल पर हम जो भी चाहें, भगवान से माँग सकते हैं।

दीजिए और लीजिए

हमारा अधिकार भगवान पर है और भगवान का अधिकार हमारे ऊपर है। यदि आप माँगते ही चले गए और भगवान को देना नहीं सीखा, न श्रद्धा दी है न आपने भावनाएँ दी हैं, बस, लाइए भगवान जी। जहाँ कहीं चले जाइए, वहीं से लाओ, सन्तोषी माता से लाओ, चण्डी माता से लाओ, भैरव से लाओ, सबसे लाओ, पर हम कुछ भी नहीं दें। हनुमान जी हमें दे जाओ, शंकर जी हमें दे जाओ, सब दे जाओ, तो फिर आप क्या देंगे? आप भी कुछ देंगे, कि नहीं देंगे।

आप दीजिए, पहले आप दीजिए और फिर लीजिए। आप शक्ति लीजिए, विवेकानन्द जैसी आप शक्ति पाइए, अर्जुन की जैसी आप शक्ति पाइए। निवेदिता की जैसी शक्ति पाइए। निवेदिता कौन थी? निवेदिता एक विदेशी महिला थी और विवेकानन्द के साथ वह जुड़ गई। जुड़ गई, तो वह भारत आ गई। भारत आकर के उसने नारी जागरण का बहुत कार्य किया है। वह विदेशी महिला घर- घर घूमी।

आश्चर्य की बात है कि हमारे देश की जो महिलाएँ हैं, उनका शोषण किया गया और उनको दबाया गया। उनको ऊँचा नहीं उठाया गया, वे जहाँ-की-तहाँ बनी रहीं। न उनको उपासना करने दी गई और न ही साधना करने दी गई। उपासना करने दी तो महिलाओं के साथ जाने क्या हो जाएगा? अरे क्या तो सभी के साथ होता है और कौन ऐसा है, जो साथ-साथ जाता है? साथ कोई नहीं जाता है, कभी कोई जाता है, कभी कोई जाता है, जिसका नंबर आता है, वह जाता है और जिसका नंबर नहीं आता है, वह नहीं जाता है।

उपासना नहीं करेंगे, तो हमारे साथ में कभी कुछ नहीं होगा। होना होगा, तो होकर के रहेगा। जो प्रारब्ध भोग है, वह तो होंगे-ही-होंगे, उसे कोई रोक नहीं सकता है। सहायता आपको मिल सकती है। यदि आपके प्रारब्ध में है, तो आपको सहायता तो मिल सकती है; लेकिन प्रारब्ध बिलकुल साफ हो जाए, कोई भी दिक्कत न हो, तो ऐसा मनुष्य जीवन कहाँ है?

प्रारब्ध सबको भोगने हैं

मनुष्य योनि में जन्म लिया है, तो मनुष्य जैसे सारे-के-सारे क्रियाकलाप करने पड़ते हैं और जो भी प्रारब्धजन्य भोग हैं, वे भी भोगने पड़ते हैं। कृष्ण की बहन थी—सुभद्रा, उसका पुत्र अभिमन्यु मारा गया और उसने कहा कि कृष्ण तू तो मेरा भाई है, फिर ऐसा कैसे हो गया? तो उन्होंने कहा कि भाई तो मैं जरूर हूँ और भगवान भी हूँ, पर देखो जिस तीर से मैंने बालि को मारा था, वह तीर अभी तक रखा है और वह मेरे को लगेगा और मैं मारा जाऊँगा। मुझे गान्धारी का शाप लगा था।

उसने यह कहा था कि तुम्हारे सारे-के-सारे कुल का नाश हो जाए, जैसे मेरा हो गया, वैसे ही तेरा हो जाएगा। एक सती नारी की जो बद्दुआ थी, वह मैंने स्वीकार की; क्योंकि मैंने भूल की थी, मैंने गलती की थी और मैंने छलावा किया था। उसने मुझे शाप दे दिया।

किसी ने दुर्योधन से कह दिया कि तू अपनी माँ के सामने जा। तेरी माँ तो सती-साध्वी है, एक बार वह आँख से पट्टी खोल देगी और तेरे शरीर पर नजर डाल देगी, तो तेरा शरीर पत्थर का हो जाएगा, जिस पर कोई प्रहार नहीं कर सकता, पर जब वह नंगा हो गया, तो कृष्ण ने कहा—भले आदमी ! तुझे शरम नहीं आएगी। इतना बड़ा हो गया, अब माँ के सामने तू नंगा जाएगा, लँगोट पहन और उसने लँगोट पहन लिया।

कहते हैं कि वही स्थान कच्चा रह गया और वहीं भीम की गदा पड़ी। श्रीकृष्ण को जब मालूम पड़ा कि वह नहीं मारा जा रहा है, तो उन्होंने बताया कि उसका एक स्थान कच्चा है, जहाँ इसकी माँ की नजर नहीं पड़ी थी, उस स्थान पर आप गदा मारेंगे, तो यह मर जाएगा और वही हुआ। जो भी प्रारब्धजन्य भोग हैं, हमको उन्हें भोगना चाहिए। इससे हम क्यों कतराएँगे?

अच्छा है कि हम खुशियों में रह सकते हैं, लेकिन अगर खुशी नहीं है, तो फिर सारी जिन्दगी रोकर के बिताने से क्या फायदा? फिर तो हमें वह काम करना चाहिए, जो हमें अच्छा लगता था। जो काम करते थे, उन कार्यों में हम आगे बढ़ें। हमें प्रेम था, तो क्या केवल शरीर के लिए प्रेम होता है? नहीं, आत्मा के लिए भी प्रेम होता है। जब आत्मा के लिए प्रेम होता है, तो मनुष्य ऊँचा उठता हुआ चला जाता है और फिर वह जन्मों तक इंतजार करता हुआ चला जाता है कि चाहे कितने भी जन्म हमें क्यों न लेने पड़ें, लेकिन शर्त एक ही है कि हमारी जो श्रद्धा है, हमारी जो निष्ठा है, वह डिगने न पाए। उपासना यही है।

जब हम उपासना करते हैं, तो हमारी जो इच्छाएँ हैं, उस इच्छाशक्ति का हमें दमन करना पड़ता है और भगवान के जो अनुदान, वरदान हैं, वे हमें प्राप्त होते हुए चले जाते हैं। समर्पण के बगैर हमको भगवान की प्राप्ति नहीं होती। नारी का जीवन ऐसा ही है। एक माने में उसको देवी कहें, तपस्विनी कहें, हाँ बेटा! तपस्विनी कहना पड़ेगा। उसको त्यागी कहना पड़ेगा।

क्यों कहना पड़ेगा कि पिता का घर छोड़कर के जब वह आती है, तो अपने पति को ही सर्वस्व मानती है। उसी के घर को अपना घर मानती है और जैसे वह चलाता है, उसी मार्ग पर चलती हुई चली जाती है। जैसा भी उसके पल्ले पड़ जाता है, आजीवन उसके साथ जीवन व्यतीत करती चली जाती है। नारी यदि उद्दण्ड हो, तो नर नहीं सहन कर सकता है, लेकिन नारी ही तो सहन करती है।

ये ही गुरु

स्वामी श्रद्धानन्द थे। पहले उनका नाम था—मुन्शीराम। शुरू में वे बहुत ज्यादा बिगड़ैल थे, शराब भी पीते थे, वेश्यागमन भी करते थे। एक दिन शराब ज्यादा पीकर के आए और अपनी पत्नी के ऊपर उन्होंने उलटी कर दी। वह तो धुत्त थे, उसने नहला-धुला करके, साफ करके चारपाई पर सुला दिया। दूसरे दिन सवेरा हुआ, उनकी आँख खुली, कुछ खाने को लाई।

उन्होंने कहा कि यह आटा कैसे मल रखा है? अभी रोटी नहीं बनी क्या? उसने कहा कि नहीं, रोटी नहीं बनी। उन्होंने कहा, तो फिर तुमने क्या खाया? उसने कहा कि देखो मैंने आपको अपना भगवान समझा है और मैं जब तक भगवान का भोग न लगा लूँ, तब तक मैं कैसे खा सकती हूँ? मैंने नहीं खाया। तो उनकी आत्मा चीत्कार करने लगी।

उन्होंने कहा कि तुम्हें हमारे ऊपर कभी घृणा नहीं हुई, नफरत नहीं हुई। उसने कहा कि नहीं, आपसे नहीं हुई, आपके जो दुर्गुण हैं, उनसे तो हुई; लेकिन आपसे नहीं हुई। आप तो मेरे देवता हैं, आप तो मेरे भगवान हैं, अपने भगवान के प्रति मैं कैसे इतना दुस्साहस कर सकती हूँ, तो वह रोने लगे।

स्वामी श्रद्धानन्द ने अपनी जीवनी में लिखा है कि मेरी गुरु, मेरी पत्नी है। यदि उसने इतना धैर्य नहीं किया होता, तो आज मैं नालियों में पड़ा होता, सड़ रहा होता; लेकिन मैं स्वामी श्रद्धानन्द बन गया। वह पत्नी के द्वारा बने और वह बनाती हुई चली गई और वह बनते हुए चले गए। उन्होंने आर्यसमाज का गजब का काम किया है। वह ढेरों पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक रहे और अन्त में उनको गोली मार दी गई थी। उनका प्राणान्त हो गया, लेकिन जब तक वे जिए, उन्होंने बहुत काम किया। बेटे ! मैं समर्पण की बात कह रही हूँ। यह समर्पण सभी के लिए है। यह केवल नारियों के लिए नहीं है, नर के लिए भी है।

अभी यह बात आपको मैंने उपासना के सन्दर्भ में सुनाई है कि समर्पण एक सती महिला के तरीके से होता है, जो कि अपना सर्वस्व छोड़ करके आती है। भगवान न करें कभी उसका भी बिछोह हो जाए, तो सारी सम्पत्ति की मालिक हो जाती है। कौन पत्नी नहीं हो जाती है, तो क्या वेश्या हो जाएगी? नहीं हो सकती है।

वेश्या के अन्दर एक लालच है, एक स्वार्थ है। वह कहती है कि लाओ-लाओ, जैसे कि आप कहते हैं न सन्तोषी माता से कि लाओ, मनसा देवी तुम भी लाओ, चण्डी देवी तुम भी लाओ, भैरव जी तुम भी लाओ, शंकर जी तुम भी लाओ, हनुमान जी तुम भी लाओ, तुम भी एक बच्चा दे जाओ। हनुमान जी के बच्चे तो हैं नहीं, तुझे कहाँ से बच्चा दे जाएँ? वे तो बाल ब्रह्मचारी हैं, तो फिर वे कहाँ से लाएँगे?

शृंगी ऋषि के बारे में नहीं सुना। नहीं सुना है, तो मैं तुम्हें सुनाती हूँ। शृंगी ऋषि, वे एक ऋषि थे, जिन्होंने दशरथ जी के यहाँ पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था। दशरथ जी ने कहा कि मेरे बच्चे नहीं हैं, तो कौन ऐसा है? उन्होंने वसिष्ठ जी से कहा, तो वसिष्ठ जी ने यह कहा कि देखो भाई, मेरे तो सौ बच्चे हैं, मैं इस योग्य नहीं हूँ कि मैं आपको इतना वरदान दे सकूँ। तुम्हें एक व्यक्ति दे सकता है—शृंगी ऋषि

शृंगी ऋषि कौन है? शृंगी ऋषि वह है, जो महिलाओं को जानता भी नहीं है। समझता भी नहीं है। उन्होंने कहा कि एक जंगल में शृंगी ऋषि रहते थे, वहाँ महिलाएँ पहुँच गईं। कोई विनोद करने लगे। रसगुल्ला रखा था। तो उन्होंने कहा कि यह क्या चीज है? उन्होंने कहा—साहब ! यह बड़े मीठे फल हैं। यह फल कहाँ लगते हैं? उन्होंने कहा—पेड़ पर लगते हैं। रसगुल्ला कहीं पेड़ पर लगता है? पेड़ पर नहीं लगता, लेकिन उसने यही समझा कि ये पेड़ पर लगते हैं। उन्होंने कहा कि बड़ा अच्छा मीठा फल है।

शृंगी ऋषि अपने गुरु के पास गए और अपने गुरु से यह कहा कि हे गुरुदेव ! आज तो महिलाएँ मिलीं। महिलाएँ नहीं, ऐसे साधक मिले, ऐसे तपस्वी मिले कि मैंने उनसे कहा कि यह बताओ की तुम्हारा जो सीना है, ऐसा कैसे है? तो उन्होंने कहा कि हम लोग दण्ड पेलते हैं, खूब व्यायाम करते हैं, इसलिए हमारे सीने बड़े हैं।

गुरु ने सब बातें सुनीं। उन्होंने कहा कि अरे ! यह दुष्ट मेरे लड़के को बहका देंगी। उन्होंने उनसे तो कुछ नहीं कहा; लेकिन शृंगी ऋषि से कहा कि बेटा ! अब तुम उधर को मत जाना, फँस जाएगा। तू तो जानता ही नहीं है। जो यह भी नहीं जानता कि औरत क्या है, मर्द क्या है, इतना फरक नहीं समझता है, वह ऋषि हो सकता है। उन्होंने कहा कि उसी के द्वारा किया गया यज्ञ फलेगा। उसी के द्वारा उन्होंने यज्ञ कराया।

शृंगी ऋषि के द्वारा कराए गए यज्ञ से दशरथ जी के चार पुत्र पैदा हुए—राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। चारों ही एक से बढ़िया, एक क्वालिटी वाले पुत्र थे। भगवान तो पीछे बने हैं, पर जब बच्चे रहे, तो वे क्वालिटी के बने रहे। फिर विश्वामित्र आए और उन्होंने कहा कि अपने ही लालच के लिए ये बच्चे रहेंगे? अरे भले आदमी ! बुढ़ापे में पैदा हुए हैं, तो क्या? इनके अन्दर प्रतिभा है।

इन दो बच्चों को मुझे दे दो। कौन-से दो बच्चे? राम और लक्ष्मण को मुझे दे दो। मुझे इनकी बहुत आवश्यकता है। उन्होंने राम और लक्ष्मण दोनों को उनके हवाले कर दिया। एक संकीर्ण मन ने कहा कि अच्छे काम के लिए हम क्यों दे दें? हमें क्यों देना चाहिए? बच्चे हमारे हैं, लेकिन दूसरा जो हृदय था, उदार था। उन्होंने कहा नहीं, सन्त की सेवा के लिए हम दे रहे हैं। इसमें कुछ अच्छा ही होगा और उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

का चुप साधि रहेहु बलवाना

विश्वामित्र दोनों बच्चों को जब ले गए, तो उन्होंने उनको भगवान बना करके भेजा। विश्वामित्र ने बला और अतिबला दोनों ही शक्तियाँ राम को दे डालीं और उन्होंने राम को भगवान बना करके भेज दिया।

ऐसा पराक्रम, ऐसा शौर्य उनके अन्दर भर दिया, ऐसी भावना भर दी और रामराज्य लाने में सक्षम हुए, अन्यथा वह रामराज्य नहीं ला सकते थे। यदि विश्वामित्र के संरक्षण में नहीं रहे होते, तो रामराज्य नहीं ला सकते थे; लेकिन रामराज्य लाने में समर्थ हो गए।

उसी तरीके से हनुमान जी थे। हनुमान जी में कोई शक्ति नहीं थी; लेकिन जामवन्त ने एक बार ललकारा और ललकार के यह कहा कि तू अपनी शक्ति को नहीं पहचानता। तू तो भगवान से जुड़ चुका है और भगवान में इतनी शक्ति है कि तुझे जाने क्या से क्या बना डालें। उस शक्ति को और अपने को पहचान और हनुमान ने अपनी शक्ति को पहचाना। सीता की खोज के लिए राम ने हनुमान जी को भेजा था और हनुमान जी ने जाकर के लंका दहन किया, सीता की सुध लेकर के आए, प्रमाण दिया। यह सारा का सारा कार्य करने में वह सक्षम हो गए।

जब विभीषण आए, तो विभीषण को उन्होंने लंकापति कह करके सम्बोधित किया; जबकि वे राजा नहीं थे। वे तो भाई के द्वारा ठुकराए हुए थे, लेकिन भगवान राम के पास जब वे पहुँचे, तो उन्होंने उन्हें अपना लिया, क्योंकि उनका अन्तःकरण जो था, वह सन्त जैसा था। वे उपासना करते थे।

लंका में कहीं भी राम का नाम नहीं पाया गया; लेकिन उनकी कुटिया के ऊपर राम का नाम लिखा हुआ पाया गया। हनुमान ने कहा कि बस, यही एक सन्त हो सकता है और भगवान राम ने उनको लंकापति कह करके पुकारा। उनने कहा कि आप यह क्या कह रहे हैं? उन्होंने कहा कि जो कह दिया-सो कह दिया और तुम लंकापति ही होगे, तुम्हारा राज्याभिषेक हम करेंगे। उन्होंने वहीं से मिट्टी लेकर के उनका राज्याभिषेक कर दिया। उन्होंने कहा कि आगे चल करके लंका के राजा तुम्हीं होगे।

माताजी ! आप यह क्या बात कह रही हैं? फिर तो हम भी सब राजा बनेंगे। बनेंगे, पर उसके लायक आप की क्षमता है कि नहीं है, आपके अन्दर वह श्रद्धा और निष्ठा है कि नहीं। वह तो सारा राजपाट त्याग करके, छोड़कर के, उसको ठोकर मारकर के चला आया। आपके अन्दर इतना साहस है या नहीं है। आप तो डाल-डाल और पात-पात पर घूमने वालों में से हैं, चाहे जहाँ कहीं भी चले जाओ।

एक बार गुजरात जाने का हुआ, तो मैंने कुछ नहीं देखा। हाँ, एक चीज मैंने जरूर पाई कि जो भी, जितनी भी चौकियों पर भगवान धरे हैं, धरे होंगे बीसियों भगवान, उनमें सब पर सिन्दूर लगा हुआ था। किसी का भी मुँह नहीं दिखाई पड़ता था। सारी चौकियों में भानुमती का कुनबा बैठाल रखा है। सबका मुँह पोतकर रख दिया। मैंने यह नहीं देखा कि यह अमीर है या कोई गरीब है, गरीब-अमीर से क्या लेना देना है? हमें तो इसकी श्रद्धा को देखना है, परखना है।

मैंने देखा कि इनको तो कुछ नहीं मिलेगा; क्योंकि वे डाल-डाल और पात-पात पर घूम रहे हैं और हर चौकी पर रखे भगवान जी का मुँह पोतकर लाल-पीला कर दिया। जिससे कोई नहीं दिखेगा। न गुरुजी दिखेंगे, न माताजी दिखेंगी, सब लाल-लाल पोत-पात करके रख लिए हैं। मैंने कहा—इसको क्या मिलेगा? सब बेकार है, छलावा है। इसको कुछ नहीं मिलेगा। क्यों नहीं मिलेगा? ‘‘एकहि साधे सब सधे और सब साधे सब जाय॥’’ सबको साधने में सब चला जाएगा और एक को साधेंगे, एक का पल्ला पकड़ेंगे, तो वही फलीभूत होगा।

[ क्रमशः अगले अंक में समापन ]

परमवन्दनीया माताजी की अमृतवाणी

उपासना का आधार

परमवन्दनीया माताजी के व्याख्यानों की यह विशिष्टता है कि वे न केवल साधना-पथ के पथिकों को जीवन जीने का मर्म बताती हैं, वरन यह पथ उनके लिए भी प्रशस्त करती हैं, जो जीवन की साधारणताओं में उलझे हुए हैं। अपने इस विशिष्ट उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी सभी साधकों के लिए उपासना का आधार स्पष्ट करते हुए कहती हैं कि मनुष्य के भीतर शक्तियों के असीम भण्डार सुरक्षित हैं, परन्तु वे उसी को हस्तगत हो पाते हैं, जो अपने अहंकार को विलगना जानता है। जो स्वयं को अभिमान व अहंकार से रहित कर पाता है एवं जिसके जीवन में पवित्रता का समावेश हो पाता है, वही उन शक्तियों को प्राप्त करने की सामर्थ्य विकसित कर पाता है। परमवन्दनीया माताजी कहती हैं कि हर साधक को इसी पथ को अपनाना चाहिए एवं इसे उपासना का वास्तविक आधार समझना चाहिए। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को ...

अबोध बच्चे की तरह उपासना

एकलव्य ने केवल एक का—द्रोणाचार्य का पल्ला पकड़ा था। द्रोणाचार्य की मिट्टी की एक मूर्ति बना करके, एक आसन पर बैठा दी थी और उसी से वह अर्जुन से ज्यादा धनुर्विद्या सीख गया था। अर्जुन से ज्यादा धनुर्विद्या उसके अन्दर आ गई। मुझे आपसे एक ही निवेदन करना है कि आप 9 दिन के लिए आए हैं, यह लड़कियाँ आई हैं, तो आप मन लगा करके एक अबोध बच्चे के तरीके से उपासना कीजिए।

आप मान करके चलिए कि हम माँ की गोद में बैठे हैं। बच्चा जब छोटा होता है, तो माँ की गोद के अलावा उसको और कोई याद नहीं होता और कोई दूसरा गोद में ले ले, तो रोने लगेगा। अगर माँ गोद में ले ले, तो प्रसन्न हो जाएगा; क्योंकि माँ उसको पालती है, पोषण देती है। आप तो वही खाइए, जो माँ दे।

इसी वातावरण में आप घुलिए, रहिए; ताकि आप और परिपक्व होते हुए चले जाएँ। आप बाहर जाएँगे, घूमने जाएँगे, तो आपका ध्यान बँटेगा; क्योंकि इस वातावरण से आप अलग हो गए। इस वातावरण से आप अलग हो गए हैं, तो जहाँ कहीं भी आप जाएँगे, बाहर का जो वातावरण है, वह सारा-का-सारा आपको प्रभावित करता हुआ चला जाएगा। कहीं आप मरघट में कभी चले जाइए, तो आपके ऊपर थोड़ी देर में वैराग्य छा जाएगा; जबकि आपने वहाँ कोई चिता नहीं देखी है; फिर भी वैराग्य छा जाएगा। जुआरियों में आप बैठिए, तो आप खेल नहीं रहे हैं; लेकिन उससे प्रभावित हो रहे हैं और कभी-न-कभी दो हाथ कर ही लेंगे।

वातावरण का प्रभाव

अब नहीं करेंगे, फिर कर लेंगे और लोग पकड़े जाएँगे, तो आप भी पकड़े जाएँगे। कैसे? हम तो नहीं खेल रहे थे, खेल तो दूसरे रहे थे, बैठे तो आप भी थे। आप थोड़े दिन शराबियों में बैठ जाइए और बैठ करके देखिए, आप जरूर शराब पीने लगेंगे, निश्चित रूप से पीने लगेंगे। चाहे आप कैसे भी हों, जरूर आप शराब पीने लगेंगे; क्योंकि आप उस वातावरण से प्रभावित हो गए।

आप यदि शराब पीने लगे, तो यह वातावरण का प्रभाव है, जिसकी अभी मैं बात कह रही हूँ। वातावरण एक ऐसा कारक है कि जहाँ भी जो चीज होती है, उसी के अनुरूप ढल जाती है। जैसे यहाँ हमने आपके लिए वातावरण बनाया है, ऐसा वातावरण आपको पृथ्वी पर और कहीं भी नहीं मिलेगा।

उपासनाओं से जो वातावरण यहाँ बनाया है, यहाँ कितने पुरश्चरण होते रहे हैं, यहाँ अखण्ड दीपक है। यहाँ गुरुजी की शक्ति है, हम यहाँ बैठे हैं। इतनी शक्ति जहाँ विद्यमान हो, तो वहाँ कितना बढ़िया सुन्दर वातावरण होगा? यह आन्तरिक अनुभव की चीज है। यह कहने की नहीं है; बल्कि अनुभव करने की है।

भगवान की शक्ति

जब भगवान की शक्ति आती है और भगवान हमारे निकट आता है, तो व्यक्ति में परिवर्तन होता हुआ चला जाता है। वह बदलता हुआ चला जाएगा, ऊँचा उठता हुआ चला जाएगा और दूसरों को ऊँचा उठाता हुआ चला जाएगा। साधक की पहचान है कि कितने अंशों में भगवान उसके अन्दर आया, यह उसकी सम्वेदना और उसकी श्रद्धा बताएगी।

जिस तरीके से मीरा के साथ भगवान खेलता था सूरदास के साथ चलता था, बन्दा वैरागी के साथ था। अनेक ऋषियों के, अनेक सन्तों के ढेरों उदाहरण ऐसे हैं, जिन्हें पढ़कर हम रोमांचित तो हो जाते हैं, पर रोमांच होकर के ही रह जाता है। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर हम आगे को बढ़ने की कोशिश नहीं करते।

हमें उनसे प्रेरणा पाना चाहिए | कबीरदास और रैदास एक ही समय में दो सन्त हुए हैं। जब तक जीवित रहे, दोनों ने साथ काम किया है। कबीर ने कहा है—मैं तो विश्राम पाऊँगा और हरि मेरी सेवा करेंगे। ‘‘सुमिरन मेरा हरि करे, मैं पाऊँ विश्राम।’’ मैं विश्राम पाऊँगा और भगवान मेरा स्मरण करेंगे। क्यों? क्योंकि वे भक्त थे, सारी जिन्दगी उन्होंने भगवान के निमित्त ही लगा दी थी।

कबीर ने एक और दोहा कहा है और यह कहा है कि भक्त का हृदय कैसा होना चाहिए? निर्मल और पवित्र होना चाहिए। जब तक उसका हृदय पवित्र नहीं है, निर्मल नहीं है, तो भगवान क्यों मिलेगा? उन्होंने कहा—

कबीरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर।
पीछे-पीछे हरि फिरे कहत कबीर-कबीर॥

उन्होंने कहा कि कबीर-कबीर कहता हुआ पीछे-पीछे भगवान फिरता है, उसकी पीठ सहलाता है। बेटे ! इसी तरीके से गुरुजी के बारे में भी यही बात है कि उनके दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे हर समय गायत्री माता और उनके गुरु उनके साथ-साथ रहते थे।

सोने में, उठने में हर समय उनके साथ रहते थे। उनका ऐसा कहना था कि मुझे ऐसा लगता है कि मेरे गुरु एक तरफ और मेरी गायत्री माता एक तरफ सोती हैं। एक तरफ मेरे गुरु सोते हैं और बीच में मैं सोता हूँ। ऐसा अनुभव होता है। हमें लगा कि हाँ ऐसा ही होता है। वास्तव में होता ही होगा, जरूर होता होगा; क्योंकि वे उस रंग में रँग गए थे।

जन-जन की गायत्री

जब व्यक्ति रँग जाता है, तो उधर ही सोचेगा, उधर ही विचार करेगा और उन्होंने उधर को ही विचार किया। गायत्री को जन-जन की गायत्री माता बना दिया।

उन्होंने गायत्री माता को सारे विश्व में फैला दिया। हिन्दुस्तान में ही नहीं, सारे विश्व में गायत्री माता फैलती हुई चली जा रही हैं। क्यों फैलती हुई चली जा रही हैं? क्योंकि उन्होंने उनके ही निमित्त जिया।

उनके ही निमित्त उन्होंने कार्य किए तथा पीड़ा और पतन को उन्होंने अपनी छाती से लगाया। उसके निवारण के लिए सारी जिन्दगी प्रयास करते रहे और उसी की खोज में लगे रहे कि किस तरीके से पीड़ा और पतन का निवारण हो और कोई पीड़ा-पतन के निवारण के लिए निकलता है क्या? नहीं, वह नहीं निकलता।

उन्होंने हजारों कष्ट उठाए। हजारों कठिनाइयाँ झेलीं; लेकिन झेलते हुए भी उन्होंने उफ तक नहीं किया। यह नहीं कहा कि हमको अमुक कठिनाइयाँ हैं, अमुक दिक्कत है; क्योंकि जिस किसी के कष्ट और कठिनाइयों को अपने ऊपर लिया, तो बदले में आखिर कुछ तो चुकाना ही पड़ेगा।

कर्ज लिया है, तो या तो बेटा चुकाए, नहीं तो पिता चुकाए। कोई तो चुकाएगा ही। जब उनकी पीड़ा में, दुःख-कष्ट में शामिल हो गए और उनके निवारण के लिए कुछ करेंगे, तो कुछ तो चुकाना पड़ेगा, कुछ तो करना पड़ेगा। उसके निवारण के लिए यदि किया है, तो अपने ऊपर उठाना भी पड़ेगा।

हमारा फर्ज और कर्तव्य

कई बार उन्होंने ऐसे कष्टसाध्य कष्ट उठाए, जिनका वर्णन मैं आपके सामने नहीं कर रही हूँ और न कोई मैं यह एहसान बता रही हूँ कि उन्होंने आप लोगों के लिए किया। आपको भी मिशन के लिए कुछ करना चाहिए। यह आपका फर्ज और कर्तव्य है।

आपको मिशन के कार्यों में सहयोग करना चाहिए। आपको नारी जागरण का काम करना चाहिए। आपको झोला पुस्तकालय लेकर के आगे निकलना चाहिए और जहाँ-जहाँ अश्वमेध यज्ञ हो रहे हैं, अश्वमेध में भाग लीजिए, उसको सफल बनाने के लिए, उसमें जो भी कुछ योगदान हो सकता हो, उसमें योगदान देना चाहिए।

ये तो आपके फर्ज और कर्तव्य हैं, इन बातों को मैं क्यों कहूँ? मैं क्यों कहने लगी, मैं तो एक ही बात कह रही हूँ कि जो भी आपके कष्ट और कठिनाइयाँ होंगे, उनके निवारण के लिए जो भी कुछ कर सकते होंगे, जितना भी कर सकते होंगे, आप सही मानना जरूर करेंगे और आपको अनुभव भी होगा। आप तो इस वातावरण में रहिए।

बेटे ! अभी मैं वातावरण का महत्त्व बता रही थी कि जहाँ कहीं भी आप देखिए, जैसे वलसाड़ में चीकू ज्यादा होता है और जगह होता तो होगा, पर ऐसे ही होता होगा। वहाँ की जलवायु, वहाँ का वातावरण उसके अनुकूल है और सन्तरा नागपुर में ही होगा। केला दूसरी जगह ही होगा। अमरूद इलाहाबाद का ही होगा। हमने आपके लिए वातावरण बनाया है, जिसमें रह करके आप यहाँ से सन्तोष, शान्ति और शक्ति लेकर के जाइए।

अपने को बदलिए

आप यहाँ से प्रसन्नता लेकर के जाइए, आप अपने को यहाँ से बदल करके जाइए। आप तो बदलना ही नहीं चाहते, तो फिर बताइए कि आप किस तरीके से पाएँगे? अपने को बदलिए। जो भी आपके दुर्गुण हैं, जो भी आपके अन्दर बुराइयाँ हैं, उन बुराइयों का निष्कासन कीजिए।

आपको दो कागज मिलेंगे। एक में जो भूलें आपसे जाने या अनजाने में हो गई हैं, उन भूलों को लिखना। दूसरे में जो भी आपकी कष्ट-कठिनाइयाँ हैं, उनको लिखना। हम उन्हें पढ़ेंगे और जो भी कुछ आपकी मदद कर सकते होंगे, हम वह मदद करेंगे। कितना होगा, हमें नहीं मालूम है। आपके हिस्से में कितना आएगा? जितना आपके हिस्से में आ जाएगा, उतना आपका हो जाएगा; पर आप अपनी मनोकामनाओं को यहाँ निकाल दें।

इन 9 दिनों के लिए तो विशेषतौर से निकाल दें। फिर आप यहाँ से, बाउण्ड्री से बाहर जाएँ। फिर आपकी इच्छा है। हम तो यही कहेंगे कि हमेशा के लिए ही अपनी चिन्ता, जिसमें आप घुलते जा रहे हैं, जो आपके ऊपर टेंशन है, न मालूम काहे का टेंशन है, उसे यहीं छोड़कर जाइए। सारे हिन्दुस्तान का भार इन्हीं के ऊपर है क्या? सारे टेंशन को आप यहाँ छोड़ करके जाइए, चाहे आप में से कोई भी हो।

बेटियो ! आपको भी बहुत मुकाबला करना पड़ेगा। नारी में बड़ी शक्ति है, उस शक्ति का क्या कहना? नर के अन्दर इतनी शक्ति नहीं होती है, जितनी महिला के अन्दर शक्ति होती है। जो आँकड़े पाए गए हैं, उनमें जीवनीशक्ति महिलाओं में ज्यादा पाई गई; जबकि महिला कष्ट उठाती है, बच्चे होते हैं, तो मरती नहीं है; वरन उसकी सब गति हो जाती है। कितना कष्ट उठाती है, बच्चे को पालती है, घरवालों की, सबकी सुनती है, सास की सुनती है, ननद की सुनती है।

पति जो है, सो बेताज का बादशाह है, वह आया, तो एक बन्दा उठाता है, एक रखता है, क्या कहना है, वह तो बादशाह है न? इतनी सहिष्णुता नारी के अन्दर होती है, दयालुता भी नारी के अन्दर होती है, ममत्व भी नारी के अन्दर होता है।

नारी के दो रूप

दो स्वरूप नारी के होते हैं। एक होता है—उसका ममता लिए हुए, जो दोष और दुर्गुण हैं, उन पर परदा डालती रहती है। हम अपना आपा क्यों बिगाड़ें, हम क्यों बुरे बनें? यह बुरा है, तो इसका मतलब यह थोड़े है कि हम भी बुरे बन जाएँ। हमको बुरा नहीं होना चाहिए। वह बेचारी उसको सारी जिन्दगी खेती हुई चली जाती है। यह उसका त्याग है। यह उसकी ममता है।

एक स्वरूप है—उसका पत्नी का, जो कदम-से-कदम मिला करके चलती है। जैसे आप हमको ही देख लीजिए, हम दोनों एक और एक ग्यारह बन कर रहे और अभी भी उनकी शक्ति विद्यमान है।

इसलिए एकाकी होते हुए भी हम इतनी लम्बी छलाँग मारने की कोशिश करते हैं कि हम मिशन को कहाँ से कहाँ ले जाएँगे? क्योंकि हम मिशन के लिए समर्पित हैं, उनके लिए समर्पित हैं, जो हमसे कह रहे थे कि हम इन लाखों बच्चों को तुम्हारे भरोसे छोड़े जा रहे हैं। भावुक होकर तुम कोई ऐसा कदम नहीं उठाओगी, जिससे यह बच्चे बिलखते रह जाएँ। मैंने वही बात अपने पल्ले में बाँध ली। मैंने कहा—‘‘नहीं ! जो आपने कह दिया है, वह मेरे लिए ब्रह्मवाक्य है।’’

मैंने भगवान को तो नहीं देखा है, लेकिन एक भगवान को मैंने जरूर देखा है। विश्वमानव के रूप में भगवान को मैंने देखा है। वह भगवान तो बुलाने पर आता भी नहीं है, पर यह भगवान तो हमें आशीर्वाद भी देता है। यह भगवान हमें ऊँचा भी उठाता है। सब कुछ करता है और इस भगवान के लिए हम जो भी कुछ करेंगे, वह भी कम है।

हम आगे निरन्तर बढ़ते हुए चले जा रहे हैं। कहाँ-कहाँ अश्वमेध होते हुए चले जा रहे हैं; जबकि शरीर इतना गवारा नहीं करता है और बुढ़ापा भी आ गया है, पर मैं उस बुढ़ापे को नहीं मानती हूँ जो शरीर का बुढ़ापा है। मन की हिम्मत के सहारे अभी मैं कहाँ से कहाँ पहुँचती हुई चली जा रही हूँ। मेरे घुटने तो काम नहीं करते हैं, अब थोड़ा कम करते हैं, बाकी का शरीर मेरा ठीक है, बाकी शरीर में कोई दिक्कत नहीं है। घुटने में थोड़ी-सी परेशानी है।

बुढ़ापे में कुछ-न-कुछ तो होता ही है, पर इतने पर भी हिम्मत रखते हैं। कहाँ से कहाँ लन्दन में अश्वमेध होगा, वहाँ जाऊँगी; अमेरिका में होगा, वहाँ जाऊँगी, जबकि 20 घण्टे तो हवाई जहाज में बैठे रहना पड़ेगा। बाबा हवाई जहाज में बैठना अलग है और तखत पर बैठना अलग बात है। तखत पर बैठी रहती हूँ, बीच-बीच में मुझे नहीं मालूम पड़ता कि कहाँ बैठी हूँ।

लक्ष्य को देखें

मैं तो अपने लक्ष्य को देखती हूँ, शरीर को नहीं देखती हूँ। फिर भी वहाँ के लिए हाँ कर दिया, जहाँ-जहाँ अश्वमेध हो रहे हैं और मैं सब जगह पहुँच रही हूँ। एकोएक जगह पहुँचूँगी। जहाँ भी अश्वमेध होंगे, मैं सब जगह पहुँचूँगी। शरीर बिलकुल ही गवाही न दे, तो मैं कहती नहीं हूँ या कोई परिस्थितियाँ ऐसी आ जाएँ, कि मैं न जा पाऊँ, तो बात अलग है, अन्यथा मैं जाऊँगी।

माताजी ! आप यह क्या कह रही हैं? बेटे ! मैं हिम्मत और हौसले की बात कह रही हूँ। आप लोगों को हिम्मत रखनी चाहिए। अपने घर में पवित्रता रखना, अपने घर में बच्चों को संस्कार देना आपका ही काम है, आपके पति संस्कार नहीं देंगे। न उन पर संस्कार है, न वह दे सकते हैं। संस्कार नारी में होते हैं, वही अपने बच्चों को संस्कार, अपने घरवालों को संस्कार, अपने पति को संस्कार दे सकती है।

अभी मैंने श्रद्धानन्द का उदाहरण सुनाया था। पत्नी ने ही उन्हें स्वामी श्रद्धानन्द बनाया। सन्त तुलसीदास को किसने बनाया था? उनकी पत्नी ने ही तो बनाया था। यदि पत्नी यह नहीं कहती कि तू इतना कामुक है कि यदि जितना मेरे लिए तेरा ध्यान जाता है, कहीं उस भगवान की तरफ जाए, तो तेरा कल्याण हो जाए। उसकी यह बात तुलसीदास को लग गई और वह सन्त तुलसीदास हो गए और ऐसे हो गए कि भगवान उनको तिलक लगाने के लिए आए। उन्होंने कहा—

चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीर।
तुलसीदास चन्दन घिसें तिलक देत रघुवीर ॥

घर सँवारें, परिवार बनाएँ

ऐसा जीवन हो सकता है? बिलकुल हो सकता है। तुम तो सारे घर की कायापलट कर दो, सारे घर को ऐसा बना डालो कि जैसे एक तपोवन होता है। हमारा घर एक तपोवन है, उस तपोवन में रहने वाले प्रत्येक प्राणी जो भी हैं, वह सन्त प्रकृति के होने चाहिए। उनको कैसे भी बनाओ, अपनी सेवा से बनाओ, अपने मीठे शब्दों से बनाओ। किसी तरीके से बनाओ, आप खुद कष्ट सहो; लेकिन अपने घर को बढ़िया क्वालिटी का बना करके रखो।

अपने बच्चों में कोई गलत आदत मत पड़ने दो। अपने पति को भी सँभालकर रखो। जैसा कुछ है, उसके दुर्गुणों को धोने की कोशिश तो करो। ऐसा मत करो, ऐसा तो हम नहीं सिखाते कि जो दोष पनप रहे हैं, वह पनपते चले जाएँ। यह तो हम नहीं कहेंगे कि तुम दबती हुई चली जाओ, पर यह जरूर कहेंगे कि उसके दोष और दुर्गुण धोने के लिए भरसक प्रयास जरूर करो; लेकिन अपनी जीभ में मिठास बनाए रखो। जबान को कटुता की ओर मत चलने दो। कटुता की ओर आपकी जबान चली नहीं कि हमारी घर-गृहस्थी बिगड़ती ही चली जाती है।

तुम्हें मालूम नहीं है कि हमारी सास यह कहा करती थीं कि सास मिट्टी की भी बुरी होती है। भगवान करे सास तो किसी को दे ही नहीं; क्योंकि वह जब-जब आती है, बहू को कुछ-न-कुछ कुचियाती रहती है कि तेरे बाप ने यह नहीं दिया और तेरी माँ ने यह नहीं सिखाया और तू ऐसी कुलक्षणी है, हजार नुक्स उसमें निकालते हुए चली जाएगी।

अरे, तू किस मतलब की दवा है | इतनी बड़ी पढ़ी-लिखी लड़की तुझे इसलिए सौंपी थी कि प्यार से बता देना और मुँह से यह दो शब्द कहना कि बेटा ! ऐसे काम नहीं होता है, ऐसे कर लिया कर। ऐसे करोगी, तो मुझे अच्छा लगेगा। थोड़े दिन बिगड़ेगा, बेटा ! फिर ठीक हो जाएगा। आज नमक ज्यादा हो गया है, तो यह थोड़ी न है कि आज नमक ज्यादा हो गया, तो हमेशा पड़ेगा। उसको नाप से बता दो कि देखो बेटा! इतनी दाल में इतना नमक पड़ता है, इस हिसाब से डाल दिया कर। वह डाल दिया करेगी।

बहू को हम अवज्ञाकारी कब बनाते हैं, जब हम यह मानकर चलते हैं कि यह सौतन है और सौतन का डाह तो होता ही है। आप यह जानते हैं कि जब से ब्याह हुआ, तो बेटा ! बहू का हो गया। पहले हमारे घुटने के पास बैठा रहता था और अब बहू के पास रहता है, प्यार तो बँटेगा ही। पहले माँ के पास था, अब पत्नी के पास या फिर बच्चे हो जाएँगे, तो उनके पास, फिर और आगे बढ़ेगा, समाज में बँटेगा, सारे राष्ट्र में बँटेगा। प्यार तो बँटेगा-ही-बँटेगा। आप ऐसा कैसे सोच रहे हैं? आप ऐसा मत सोचिए।

आने वाला समय नारी का है

आप हर सदस्य को ऊँचा उठाती हुई चली जाओ, अपनी मानसिकता को ऊँचा उठाओ। आप पढ़ी-लिखी हो, तो आप स्वाध्याय करो, दूसरों को स्वाध्याय कराओ, उन्हें पढ़ाओ। जो बगैर पढ़ी-लिखी महिलाएँ हैं, उनको संस्कार दो; ताकि नारी जाति हमारी ऊँची उठे और जो हमारा राष्ट्र है, आगे आने वाला समय है, सब जगह पूरे राष्ट्र पर सारे के सारे क्षेत्र में हमारी लड़कियाँ ही छा जाएँ, तो कोई अचम्भे की बात नहीं हो सकती है।

हाँ, कोई हिम्मत करे, तो बिलकुल ऐसा हो सकता है। मध्य प्रदेश की एक लड़की थी, वह सौ मंत्रियों के बीच में घुस जाए, अपने आप सबके पास धड़ल्ले से चली जाए। मैं कहती थी कि वहाँ तेरे कोई रिश्तेदार हैं? नहीं माताजी, रिश्तेदार तो कोई नहीं है। उसका स्वभाव ऐसा है, जो कहीं भी जाकर के धड़ल्ले से काम करा ही लेवे। बेटी ! आप में से हरेक में भी ऐसी ही हिम्मत होनी चाहिए। आप दब करके अपनी मानसिकता को दबा न लें।

एक तो फैशनपरस्ती नहीं होनी चाहिए। फैशन से यह मालूम पड़ता है कि यह चाहती है कि सब हमारी ओर देखें कि हम कैसी लगती हैं? उस फैशन को तिलांजलि दो। एक बार कई लड़कियाँ मिल करके बापू के पास गईं और उनसे यह कहा—बापू ! हमें लड़के छेड़ते हैं। लड़के बड़े खराब हैं, बहुत बदमाश हैं। इनसे ज्यादा उद्दण्ड कोई है ही नहीं; पर बेटी, तुम एक काम करना कि कल तुम जब आओ न, तो सारे सिर पर उस्तरा फिरवा के आना और फिर देखना कौन-सा गुण्डा तुम्हें छेड़ता है। एक भी नहीं छेड़ेगा।

फैशनपरस्ती त्याग दें

अरे बाबा! यहाँ से बाल कतर, वहाँ से कतर, कपड़े कतर, जिसे देखो ऐसा ही नजर आएगा। यहाँ भी लाल, वहाँ भी पीला, खैर यहाँ तो कोई नहीं है, यह सब ठीक शालीन बैठी हैं, पर बाहर लड़कियों की पोशाकों को देखो, तो हैरान हो जाते हैं कि जाने यह कौन है—लड़की है या लड़का? यह बवाल कौन है? उनकी चाल-ढाल देखते ही बनती है।

टी०वी० और सिनेमा देख-देख करके हमारे बच्चों का क्या हाल हो रहा है? इनको घर में कौन बनाएगा? इनको घर में माँ बनाएगी। माँ खुद जब फैशन करेगी, तो फिर बच्चे क्यों नहीं करेंगे। मैं तो देखती हूँ कि बाहर से महिलाएँ आती हैं और यहाँ हिन्दुस्तान से भी आती हैं। पैंट पहने रहेंगी, बूढ़ी-बूढ़ी होंगी, दाँत निकल रहे होंगे और फैशन के मारे मरी जा रही हैं। जब यह इतना कर रही हैं, तो फिर बच्चे क्यों नहीं करेंगे?

भगवान अब आपके सफेद बाल बना रहा है, तो बनने दो न सफेद बालों को, जो चाँदी जैसे लगते हैं। औरों के काले-कलूटे कैसे बुरे लगते हैं। हमारे बाल देखो कैसे सफेद होते चले गए, जो और भी ज्यादा बढ़िया लगते हैं। काले-कलूटे बालों में क्या रखा है? कुछ नहीं है। उनमें कब तक रंग भरती रहोगी, काले करती रहोगी, यह दिखाने के लिए कि साहब ! अभी हम बूढ़े नहीं हुए हैं। अभी हम जवान हैं और यही सोचते रहते हैं कि हमारा सम्मान होगा।

बड़े-बूढ़ों का सम्मान होता है कि नहीं होता, बुजुर्गों का सम्मान होता कि नहीं होता है। अब वह जो बुजुर्ग नहीं हैं, उनका सम्मान नहीं होता है क्या? मैंने कहा—अरे, यह खाली खोपड़ी का है, इसे क्या अनुभव है? अपने घर में हम फैशनपरस्ती का सामान न रखें; ताकि हमारे बच्चे फैशन की ओर न चले जाएँ।

पाश्चात्य सभ्यता न अपनाएँ

हमारे बच्चे पाश्चात्य सभ्यता की ओर बढ़ते हुए जा रहे हैं, बड़े दुःख की बात है। बड़े शरम की बात है कि हमारे बच्चे पाश्चात्य सभ्यता की ओर अग्रसर होते जा रहे हैं। हमारे बच्चे सभ्य-शालीन बनते हुए चले जाएँ आगे इनको आपको बनाना है, आपको इन्हें विनोबा जैसे बनाना है।

यह तीन भाई हुए हैं—विनोबा भावे, बालकोबा भावे और विठोबा भावे और तीनों एक से बढ़कर एक सन्त थे। इनके ऊपर था—उनकी माँ का हाथ। माँ ने ही उनको संस्कार दिए थे। आप अपने बच्चों को संस्कार दीजिए।

रोज उनसे गायत्री मंत्र कहलवाइए, छोटे बच्चे हैं, तो छोटों से कहलवाइए, बड़े हैं, तो बड़ों से कहलवाइए और उनसे बोलिए कि नाश्ता तब मिलेगा, जब पहले गायत्री मंत्र बोलेंगे। नहीं साहब ! पहले बेड-टी पिएँगे, बेड-टी नहीं मिलेगी। पहले उठो और फ्रेश हो जाओ, जाकर मुँह-हाथ धोकर दाँत साफ करो, फिर इनको नहलाओ, नहलाते नहीं बनता हो, ठंढक हो, तो उनके कपड़े बदलवा करके, फिर उनसे कहिए कि आप गायत्री मंत्र बोलो। गायत्री मंत्र कम-से-कम पाँच बार तो बुलवाओ।

बच्चों को संस्कार दीजिए

कुछ तो कराइए, उनके संस्कार बनाइए। उनको प्रणाम कराइए, माता-पिता को प्रणाम कराइए, बुजुर्गों को प्रणाम कराइए; ताकि वह प्रणाम करना सीखें। इससे मन में जो मलिनता होती है, वह भी धुलती हुई चली जाती है। कहीं कोई गलती होती है, तो वह भी चली जाती है। तो अपनी सास की बात बता रही थी कि हमारी सास यह कहा करती थीं कि मैंने रोटी जो खाई है या तो मैंने अपनी माँ के हाथ की रोटी खाई है या मैंने इसके हाथ की रोटी खाई है। क्या बात थी?

सब मेरे हाथ में है। मैंने तो उनकी माँ को देखा भी नहीं था। मैंने तो इनकी माँ को देखा और यह समझा कि यह रोटी कैसे पकाती हैं, देखती रही। बस, जैसा वे कर रहीं थीं, वैसे ही करना शुरू कर दिया और उनको मन भा गया। मेरे बगैर उनको चैन नहीं पड़ता था। कहीं भी कथा सुनने जाती थीं, तो वहाँ से आकर के मुझे मालूम पड़ता था कि ताईजी आ रही हैं। सब लोग उन्हें ताईजी कहते थे।

जल्दी से अपने घर का काम, चौका-बरतन, रोटी जो भी होती है, जल्दी बना लेते कि वे आएँगी, तो जितनी देर कथा सुनकर आई हैं, उतनी देर कथा सुनाएँगी और वे सुनाती थीं। ज्यादा पढ़ी- लिखी तो नहीं थीं, थोड़ा-थोड़ा एकाध अक्षर जानती रहीं होंगी; लेकिन बुद्धि उनकी ऐसी थी कि वे अक्षरश: पूरी कथा को कह जाती थीं।

आवाज उनकी इतनी बुलन्द थी कि कोई गीत गाने को उन्हें कह दिया जाए, तो पहले ढोला-बोला से जाने क्या-क्या चला करते थे? जब वे गाती थीं, तो लगता था कि उनकी आवाज, तो कोई एक मील भर जाएगी। ऐसी बड़ी बुलन्द आवाज थी।

पूज्य गुरुदेव की देवतुल्य माँ

एक बार वे गा रहीं थीं और चक्की चला रही थीं। सुबह कौन-सा एक गीत होता है, इधर बुन्देलखण्ड में होता है, मुझे अभी इस समय याद नहीं है, तो वे जोर से गा रहीं थीं और लोढ़ी लेकर के ऐसे जोर से मारा कि चक्की के पत्थर के दो टुकड़े हो गए। उनकी सास लड़ती हुई आईं और बोलीं—यह तूने क्या किया? आल्हा-ऊदल बड़े लड़ैया गा रही थीं। सो आल्हा-ऊदल गाते हुए उनको जोश आ गया, सो हथौड़े से लोढ़ी मार दी और भड़ाक से उसके दो टुकड़े हो गए। वे बड़ी बुद्धिमान थीं और बड़ी सभ्य और शालीन थीं। ऐसी देवी तो शायद ही कोई होगी, ऐसी देवतुल्य थीं वे। त्रिकालसंध्या भी चलती थी। वही सारे गुण गुरुजी में आते हुए चले गए। बेटी, यही आप भी करना कि आपके बच्चों में अच्छे गुण आते हुए चले जाएँ, बस, इन्हीं शब्दों के साथ अपनी बात समाप्त करती हूँ। मैंने समर्पण की बात कही, आपसे और कई बातें कही हैं, इन पर आप ध्यान देना।

आज की बात समाप्त
॥ॐ शान्तिः॥