ज्योति कभी बुझेगी नहीं
परमवन्दनीया माताजी के व्याख्यानों की यह विशिष्टता है कि वे भावों के जागरण का कार्य भी करते हैं और उद्देश्यों की प्रतिष्ठा का भी। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी सभी परिजनों को यह स्मरण दिलाती हैं कि सभी गायत्री परिजन पूज्य गुरुदेव और वन्दनीया माताजी के अंग-अवयव ही हैं। वन्दनीया माताजी कहती हैं कि वे और पूज्य गुरुदेव सदा अपने बच्चों को उस तरह से सुरक्षित रखते हैं, जैसे टिटिहरी अपने अण्डों का ध्यान रखती है। वन्दनीया माताजी स्मरण दिलाती हैं कि गुरुसत्ता के स्थूलदृष्टि से दूर हो जाने पर भी किसी को भी यह कभी नहीं समझना चाहिए कि वे हमसे दूर हो गए हैं। वे कहती हैं कि उनकी जलाई यह ज्योति कभी बुझेगी नहीं और हमें, हर गायत्री परिजन को सदा एक ही प्रार्थना करनी चाहिए कि हम गुरुवर की तरह बन सकें। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को .......
मिनी वसन्त पर्व
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
हमारे आत्मीय परिजनो! यह मिनी वसन्त पर्व है। मिनी वसन्त पर्व क्यों है? वसन्त पर्व तो अभी एक महीना पहले ही व्यतीत हुआ है, फिर यह कैसा मिनी वसन्त पर्व है? हाँ बेटे! यह मिनी वसन्त पर्व है। जो हमारे परिजन छूटे हुए थे। जिनको कि हम दायाँ-बायाँ हाथ कहते हैं। कहीं ऐसा न हो कि पीछे ये कहें कि हमें तो गुरुजी के चरणस्पर्श करने को भी नहीं मिले। हम इस लायक भी नहीं समझे गए कि हमको उनके दर्शनों का लाभ मिलता और हम कम-से-कम चरणस्पर्श तो कर लेते।
दर्शन तो सम्भव हैं, हमें दूर से भी हो सकते हैं; लेकिन हम एक क्षण, एक पल के लिए जो चरणस्पर्श कर सकते थे, हमारी माँ ने हमको इस लायक भी नहीं समझा कि हमको बुलाया जाता। इसलिए यह मिनी वसन्त पर्व है। आप लोग जो यहाँ बैठे हुए हैं, कहाँ-कहाँ से और कितनी-कितनी दूर से आए हैं? क्यों साहब! आपने हमको क्यों नहीं बुलाया? इतने आपके चौबीस लाख बेटे हैं।
हाँ बेटे! वह भी हमारे ही हैं, पर जितना आपके लिए हमारी भावना है, स्नेह और प्यार है, उतना उनके लिए थोड़ा कम है। कम क्यों है? इसलिए कम है कि जो कमाऊ पूत होता है, माँ- बाप उसकी तरफ देखते हैं, निगाह रखते हैं कि यह लड़का कमाल का है। यह सारे घर का, परिवार का पालन-पोषण करता है। उसकी तरफ माँ-बाप का ध्यान ज्यादा जाता है। जो उत्तरदायित्व को जितना निभाता है, उतना ही उसको शक्ति देने के लिए माता-पिता ज्यादा आगे को धकेलते हैं।
प्रगति का द्वार
एक कारीगर था। वह खिलौने बनाता था। उसका बेटा भी खिलौने बनाता था और रोज उसे बेचने के लिए जाता था। उसका पिता रोज यह कहता था कि देखो भाई, अभी तुम्हारे इस खिलौने में कमी रह गई। यह तो तुम्हारा चवन्नी का ही बिका है। फिर उसने और प्रयास किया और अठन्नी का बिकने लगा।
पिता ने कहा—नहीं, अभी यह ठीक नहीं है। अभी तो तुमको इसमें और मेहनत-मशक्कत करनी पड़ेगी। हमको? हाँ, तुमको और करनी पड़ेगी। फिर वह बारह आने का बिका। फिर वह एक रुपये का बिका।
एक दिन बच्चा बोला कि पिताजी आपकी बात समझ में नहीं आई। हमने तो आप से भी ज्यादा बढ़िया खिलौने बनाए हैं और आप हमारे काम में नुक्ताचीनी निकालते रहते हैं; जबकि हमारे खिलौने ज्यादा पैसे के बिके।
बस बेटा! यही समझ ले कि तेरी प्रगति का द्वार रुक गया है। तेरे अन्दर अहम् की भावनाएँ आने लगी हैं। अब तू आगे नहीं बढ़ सकता है क्योंकि तेरे अन्दर वह क्षुद्रता आ गई कि हम सब कुछ जानते हैं और सब कुछ करने लायक हो गए हैं और आप हमारे काम में उँगली करते हैं। बुजुर्ग हमें आगे बढ़ाते हैं, हिम्मत देते हैं, साहस देते हैं और जो भी कुछ उनके अन्दर, पिता के अन्दर कला होती है, सारी की सारी कला और सारी की सारी जो अपनी विशेषता है, वह बच्चों को देते हुए चले जाते हैं।
आप हमारे बच्चे हैं
बेटे! माँ के पास जो कुछ भी होता है, वह सब बच्चे के लिए छिपाकर रखती रहती है। बाप से भी छिपाकर रखती गई कि जब जरूरत पड़ेगी, बेटे को झट थमा देंगे। तू ले जा बेटा, तेरे काम आएगा। जबकि वह जानती है कि यह करने लायक है, यह समर्थ है, फिर भी माँ की ममता होती है न कि बेटे हैं। वही स्थिति हमारी है। आप जान नहीं पाएँगे कि हमको आप कितने प्रिय लगते हैं। जैसे एक टिटिहरी अपने अण्डे को अपनी छाती से लगाकर सेती है और अपनी जान की बाजी लगा देती है। उन्हीं में से हम और गुरुजी हैं।
प्रत्येक परिजन को हम टिटिहरी के अण्डे के तरीके से सेते रहते हैं और उनको समय-समय पर भावनाओं से लेकर के, प्रेरणाओं से लेकर के, मार्गदर्शन से लेकर के कि कहीं यह विचलित तो नहीं हो रहा है; कहीं इसके पाँव तो नहीं डगमगा रहे; कहीं यह दुनिया की दौड़ में; कहीं चमक-दमक में, कहीं लुभावनेपन में तो नहीं आ गया? आ गया है, तो उसको सँभालने के लिए भरसक प्रयास किया गया। इतना किया गया कि हमने हार नहीं मानी। तब तक उसको बनाते ही रहे। न बना पाते, यह बात अपने ऊपर नहीं लागू होती। हमारे ऊपर लागू तब होती है, जब हम उसको बना न सकते होते। उसका समर्पण न होता।
एक शिष्य ने अपने गुरु से कहा—‘‘गुरुदेव! आप तो सर्वव्यापी हैं, आप तो सब कुछ कर सकते हैं, आप तो बना सकते हैं।’’ उन्होंने कहा—‘‘बेटे! हाँ बना तो सकते हैं, इसमें तो कोई शक नहीं है।’’ बेटे! जिस दिन से गुरुजी ने अपने गुरु का पल्ला पकड़ा है, फिर उन्होंने पीछे की जिन्दगी को नहीं देखा है। आगे-आगे चलते हुए, आगे आने वाले दूरगामी परिणामों को देखा है। उन्होंने पीछे को मुड़कर नहीं देखा।
उससे पहले सम्भव है कि साधारणतः जैसे व्यक्ति जीवन जीते हैं, वैसे ही जिया होगा; लेकिन जब से गुरु की छत्रछाया उनको मिली और प्रेरणा मिली और छाया के रूप में उनके ऊपर प्रकाश आया, उस दिन से अपने जीवन का क्रम ही बदल दिया और पूर्णरूप से समर्पित हो गए। उन्होंने अपने समय का समर्पण, अपनी वाणी का समर्पण, अपनी लेखनी का समर्पण कर दिया।
आप समझते हैं कि जहाँ-के-तहाँ ही रह गए होंगे, नहीं बेटे! आज वे इतने ऊँचे हैं कि जैसे हिमालय के बराबर ऊँचाई और सागर की तरह गहराई के तरीके से हैं। आज उनका मस्तक ऊँचा है और गर्व से कह सकते हैं कि ये ऐसी शानदार जिन्दगी है कि कोई भी नहीं जी सकता, जो शानदार जिन्दगी हमने जी है। कीड़े-मकोड़े की तो सभी जीते हैं; लेकिन जिसे शानदार जिन्दगी कहना चाहिए, जो समाज के लिए अनुदान और वरदान समाजसेवी के लिए होना चाहिए, उन्होंने भरपूर सेवा की है और अभी और करेंगे।
ज्योति कभी बुझेगी नहीं
बेटे! पिछले दिनों में कुछ ऐसा हुआ कि मेरे मुँह से निकल भी गया। कुछ वैसा निकला था, जो सही बात है, तो भी निकल ही गया। उसका उलटा अर्थ लगाया गया। उलटा अर्थ कौन-सा लगाया? अखण्ड ज्योति में एक लेख चला गया कि ज्योति अभी बुझी नहीं। चण्डीगढ़ का एक लड़का रोता-बिलखता आया।
उसने यह कहा कि मैं इसलिए अपने परिवार को लेकर के आया हूँ कि मैंने यह सुना है कि वसन्त पर्व पर गुरुजी अपना शरीर छोड़ देंगे। ऐ तेरी की, अरे बेटा! तू ये क्या खबर लाया। तू तो वह खबर लाया है कि मेरे पेट में न मालूम क्या होने लगा है? अच्छा होता कि तूने अपना यह मुँह बन्द रखा होता। वह जाएँगे, तो जाएँगे ही। हाँ, हमने यह भी कहा है कि हम अपना बिस्तर समेट रहे हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि हम मरने जा रहे हैं।
अरे! मरने की क्या चल रही है? अभी हमने इतने कार्यकर्ता बुलाए हैं और जो 500 कार्यकर्ता हमारे यहाँ रहते हैं, इनको भावना कौन देगा? इनको प्यार कौन देगा, इनको बनाएगा कौन? अभी तो हमारी इतनी जिम्मेदारियाँ हैं, हम कैसे पीछे हटेंगे? अभी हम पीछे नहीं हटेंगे। आप लोगों को अभी तो हमें बहुत बनाना है, अभी तो आप अनगढ़ हैं। अभी तो किस मेहनत से, मशक्कत से हम यहाँ तक आप लोगों को ला पाए हैं। अभी तो आपको बहुत कुछ बनाना बाकी है, अभी कहाँ हैं आप इस लायक? अभी हम कहते हैं कि बेटे! जिम्मेदारियाँ सँभालो। गुरुजी के जो उत्तरदायित्व हैं, उनके ऊपर जो वजन है, उसको हलका करो। आप उस वजन को उठाइए।
माताजी! आप यह कह रही थीं कि भाई, माता-पिता जो बुजुर्ग हो जाते हैं, बूढ़े हो जाते हैं, तो रिटायरमेंट में आ जाते हैं, रिटायर हो जाते हैं। हाँ बेटा! सही कहा था कि रिटायर हो जाते हैं और रिटायर्ड का मतलब यह नहीं होता कि आमतौर पर जैसे लोग रिटायर्ड होते हैं, फालतू समय गँवाते हैं और चारपाई पर मगरमच्छ के तरीके से पड़े रहते हैं और सारा समय गुजारते रहते हैं।
बेटे! हम उनमें से नहीं हैं। हम तो तिल-तिल करके जलेंगे और गलेंगे और समाज के लिए बराबर अनुदान देते रहेंगे और उसकी जो भी सेवा बन पड़ेगी, वह हम करते रहेंगे।
उसके लिए उन्होंने चाहा कि एकान्त में रह करके हम ज्यादा-से-ज्यादा अपनी शक्तियों को एकत्रित करें और आप लोगों को बाँटें और दें। नहीं तो यह स्थूलशरीर, स्थूल का काम करेगा। स्थूल का मतलब गुरुजी को हर समय घेरे रहेंगे। अभी देख लो।
3 घण्टे तक लाइन लगी है। जरा लगाम ढीली कर दें, तो बस। सोना भी हराम, खाना भी हराम, सब हराम। गुरुजी जब बाहर जाते थे, लेट्रिन जाते थे, वहाँ भी लोग खड़े रहते थे। देखते रहते थे कि कब गुरुजी निकलें और हम अपनी बात शुरू करें।
तो बेटे! बताइए कि इतना महत्त्वपूर्ण काम जो कि सारे विश्व का लेकर के चले हैं, जो प्रभाव परिवर्तन का लेकर के चले हैं, वह कैसे होगा और जो हम आपसे कराना चाहते हैं, वह कैसे होगा जरा बताना तो सही, जब शरीर ही नहीं रहेगा, तो कैसे होगा? शरीर की आवश्यकता है। मन की आवश्यकता है। मन से आप हमसे जुड़े हैं। शरीर से आप जुड़े हैं, भावनाओं से आप जुड़े हैं। उसकी अभी आवश्यकता है। कब तक है आवश्यकता? यह अभी बस यहाँ की, यहीं रहने दो कि कब तक की आवश्यकता है, पर अभी उसकी जरूरत है। यह तो मैं आपके दिमागों की सफाई कर रही हूँ कि ऐसा जरूर कहा गया था।
हम दावे से कहते हैं कि हमने कहा है और कहेंगे कि स्थूल-से-सूक्ष्म की ज्यादा वैल्यू है और ज्यादा ताकत है। बम, एकदम छोटा-सा होता है, जरा-सा जर्रा होता है और क्या तहस-नहस कर देता है। बेटे! सूक्ष्मतत्त्व की ज्यादा शक्ति होती है। उन्होंने कहा कि एकान्त में हम रहेंगे और एकान्त में रह करके अपनी सूक्ष्मशक्तियों को एकत्रित करेंगे और हमको जो बड़े काम करने हैं, उनमें लगाएँगे और इनसे क्या कराएँगे? इनसे तो आपको जो विज्ञप्तियाँ बाँटी गई हैं, उनको आप पढ़ लेना।
अपने जैसा बना लें गुरुवर
हाँ, एक बात मैंने यहाँ छोड़ दी थी कि एक शिष्य ने अपने गुरु से कहा था। उसने यह कहा कि गुरुदेव! आप हमको वैसा बना दीजिए, जैसे कि आप हैं। उन्होंने कहा—बेटा! बना तो दूँ, पर मेरे हाथ की बात नहीं है। क्यों नहीं है? आप तो बना सकते हैं। हाँ, बना तो सकते हैं, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन तब बना सकते हैं, जबकि तेरे अन्दर समर्पण का भाव हो तब। कैसा समर्पण? जैसा अर्जुन का समर्पण था कृष्ण के प्रति।
उन्होंने कहा कि आप जैसा चाहें, वैसा कराएँ, आपके हम सुपुर्द हैं। जो भी आप कराना चाहें, जो भी हमसे काम लेना चाहें, हम आपका काम करेंगे। उन्होंने कहा कि लड़ाई मैदान में लड़ेंगे। जो भी आप कहेंगे, वही हम करेंगे। तो बेटे! मैं कह रही थी, कि अभी एक शिष्य ने अपने गुरु से कहा कि आप बनाइए। उन्होंने कहा कि बेटे! बना दूँ, पर एक काम तू कर। क्या करूँ? तू तिनके के समान हो जा। अपने सारे अस्तित्व को मिटा दें, छोड़ दे, हम में मिला दे। जिस दिन तेरा अहं हट जाएगा और तू तिनके के बराबर छोटा-सा हो जाएगा, तो बस उस दिन मैं तुझे सँभाल लूँगा।
उस दिन मैं दावा करता हूँ कि अपने मुकाबले के जैसा मैं हूँ, वैसा ही तुझे बना दूँगा, पर अभी तो तेरे अन्दर बहुत खामियाँ हैं, तो मेरे बराबर कैसे बन जाएगा? अभी तो तू मेरे पाँव के धोवन के बराबर भी नहीं बन सकता है। अभी तो तू पाँव की उँगली जैसा भी नहीं बन सकता है, तो तू बता मेरे बराबर कैसे शक्तिशाली बनेगा? शक्तिशाली तो तब बनेगा, जबकि सारी-की-सारी अहन्ता को हटा देगा।
दो नहीं, एक हैं हम
अपने लोभ, प्रलोभन और जो अहंता है, जो आपकी कमजोरियाँ हैं, उनको हटा दो और जो मुँह में जकड़े हुए हो, उस जकड़न को हटाओ। तो क्या करें? घर-गृहस्थी को छोड़ दें। नहीं, बेटे! ये नहीं कहा है कि घर-गृहस्थी को छोड़ दीजिए। घर-गृहस्थी को हमने भी नहीं छोड़ा है। कहाँ छोड़ा? पत्नी भी है, बच्चे भी हैं, बेटी भी है, बेटा भी है, जमाई भी है, सब हैं। कहाँ छोड़ा है, बता? कहीं नहीं छोड़ा, लेकिन हाँ, वो छोड़ दिया, जो स्वार्थ था।
स्वार्थ से परे हट गए हैं, स्वार्थ उनको डिगा नहीं सकता, स्वार्थ उनको डगमगा नहीं सकता। बस, यही बनने की कसौटी है और यही आप आज उनसे माँगने आए हैं। चाहे तो इसे माँ की वाणी समझ लो, चाहे गुरुजी की समझ लो, एक ही बात है। दो नहीं हैं, हम एक हैं, एक प्राण और दो शरीर हैं।
हम एक प्राण हैं, आप सही मानना हम अलग-अलग नहीं हैं। आपको दिखाई तो जरूर पड़ते हैं, भाषा में, सन्तुलन में, शिक्षा में। हाँ, कमी हो सकती है, है ही, लेकिन आन्तरिक दृष्टि से हम एक प्राण हैं। प्राण अकेला रह नहीं सकता। एक प्राण के बगैर दूसरा प्राण कैसे रहेगा? मुश्किल है। हम एक प्राण हैं।
बेटे! मैं आपसे यह कह रही थी कि आप हमारे हाथ बन जाइए, कौन-सा हाथ बनेंगे? बेटे! दाहिना हाथ बन जाए, तो बड़ी अच्छी बात है, पर चल तू, बायाँ हाथ बना रहे, तब भी हमें कोई एतराज नहीं। कौन-सा बायाँ हाथ? वह, जो अपना समय देता है। थोड़ा अंश देता है, थोड़ा समय देता है और दायाँ हाथ हमारा वह, जो अपना पूरा समय देता है, जो हमारे कन्धे से कन्धा मिला करके चलता है और भुजा-से-भुजा मिला करके चलता है, वह हमारा दाहिना हाथ है। आप में से जिसकी भी ऐसी कोई सामर्थ्य है, अपने को टटोलना केवल उदरपूर्ति में ही मत लगे रहना।
उदरपूर्ति कहने का मतलब यह है कि जो आप में से रिटायरमेण्ट के हैं, जिनकी कि नौकरी ज्यादा दिन की हो गई है। रिटायरमेण्ट का मतलब यह नहीं है कि आप 60 वर्ष के हो गए, तभी छोड़ेंगे। आप इस लायक हैं कि आपके पास थोड़ा-बहुत है तो आप यहाँ आ जाइए, आप से यहाँ काम लेंगे। आप यहाँ नहीं आ सकते हैं, तो आप से वहाँ काम लेंगे। कम-से-कम आप अपनी संकीर्णता को तो छोड़िए।
आपके ऊपर इतना उत्तरदायित्व है, आपके ऊपर ऋण है। समाज का ऋण है और राष्ट्र का ऋण है। राष्ट्र का ऋण चुकाया जाना चाहिए। आपको नहीं मालूम पड़ता; लेकिन हमको मालूम पड़ता है कि हमारे और आपके ऊपर राष्ट्र का कितना बड़ा ऋण है। जिस मार्गदर्शक ने आपको प्रेरणा दी है, आपको मार्ग बताया है, आपकी जिम्मेदारी होती है कि आप थोड़ा आगे आइए। अपनी जिम्मेदारियों का भी निर्वाह करिए और साथ-साथ में आप समाजसेवा भी करिए। यह परिपूर्ण तपस्या है।
विचारों की गति
नहीं साहब! माला ही जपेंगे और माला के अलावा और कोई काम नहीं करेंगे। नहीं बेटा! यह तो अधूरा है, न इससे स्वर्ग मिलेगा, न मुक्ति मिलेगी और न तुझे कुछ मिलेगा। माला भी ले हाथ में और भाला भी ले हाथ में। एक गुरु हुए हैं—अर्जुनदेव।
उन्होंने एक हाथ में माला और एक हाथ में भाला का नारा दिया था। भाले का मतलब क्रान्ति। क्रान्ति किसकी? विचारों की क्रान्ति। विचारों की क्रान्ति कैसी है? विचारों की क्रान्ति आपको नहीं मालूम है? आपको नहीं मालूम है, तो मैं समझा देती हूँ।
विचारों की क्रान्ति वह है कि जहाँ कहीं भी हम जा रहे हैं, वहाँ दूसरों पर अपनी छाप छोड़ते हुए चले जा रहे हैं और लोग हमारे विचारों को सुनने-समझने के लिए आते हुए और यह कहते हुए चले जा रहे हैं कि हाँ, यह है कोई काँटे का आदमी। यह है कोई लायक व्यक्ति, इसकी बात सुननी चाहिए। कौन-सी सुननी चाहिए? यही आप उसको समझ लें, ज्यादा गहराई में न जाएँ।
बेटे! मैं तो यही कहने के लिए आई। अभी दो-चार दिन हुए हैं, मैंने एक पेपर पढ़ा। पेपर पढ़ा कि एक व्यक्ति की तीन कन्याएँ थीं। उनको दहेज का दानव निगलता हुआ चला गया। हमारी बेटियों को, हमारी बहनों को, हमारी बहुओं को, बेटे! यह खाए जा रहा है। आप सही मानना हम भीतर ही भीतर ऐसे तिलमिला जाते हैं, पर क्या करें? सिर धुनकर रह जाते हैं। हम अपने भाग्य को कोसते हुए रह जाते हैं और लानत उन पर डालते हैं कि जो हमारे कहे जाते हैं, हमारे कहाए जाते हैं। हमारे भी हैं और लालची भी हैं और स्वार्थी भी हैं। आगे भी याद करते जाते हैं। पीछे से दहेज भी लेते जाते हैं, दोनों काम करते हैं। यह कैसी विडम्बना है?
[क्रमशः अगले अंक में समापन ]
परमवन्दनीया माताजी की अमृतवाणी
ज्योति कभी बुझेगी नहीं ( उत्तरार्द्ध ) परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों में एक अद्वितीय सारगर्भिता भी है एवं हृदय को झकझोर देने वाले भावों की प्रगाढ़ता भी। अपने इस प्रस्तुत व्याख्यान में परमवन्दनीया माताजी सभी गायत्री परिजनों को यही स्मरण दिलाती हैं कि हम सभी पूज्य गुरुदेव-वन्दनीया माताजी के अंग-अवयव हैं। उन्हीं की भुजाएँ बनकर, अंग बनकर एवं प्रतिनिधि बनकर हमें उनके कार्यों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। वन्दनीया माताजी कहती हैं कि वे दोनों सभी गायत्री परिजनों की देख-भाल उसी भाँति करते रहेंगे, जैसे एक टिटिहरी अपने बच्चों की करती है। वे हर कार्यकर्ता को यह आश्वासन प्रदान करती हैं कि उनके द्वारा src='प्रज्वलित की गई यह ज्योति कभी बुझेगी नहीं, वरन अनवरत आगे बढ़ती, विकसित होती रहेगी। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को ......
संकल्प लें दहेज नहीं लेंगे
आपको संकल्प लेना चाहिए कि हम दहेज नहीं लेंगे। अपनी बच्चियों को भेड़ियों के यहाँ नहीं देंगे। डॉक्टर नहीं होगा, इंजीनियर नहीं होगा, तो मास्टर होगा, मास्टर नहीं होगा, तो और कुछ होगा, रोज कमाएगा, रोज खाएगा, लेकिन अपनी लड़की को हम योग्य बनाएँगे। अब तो मैं यह कह रही थी कि बाप बेचारा गरीब था, दहेज दे नहीं सकता था; बाप तो बाहर गया किसी काम से और तभी कमरे में आकर के तीनों लड़कियों ने फाँसी लगा ली।
बेटे! इस अनाचार को अपने लोग ही मिटाएँगे। कौन मिटाएगा? विचारों की क्रान्ति ही मिटाएगी। अन्यान्य जो कुरीतियाँ हैं, उनके लिए भी आपको जद्दोजहद करनी चाहिए। वह किससे करेंगे? डण्डे से करेंगे? डण्डे से नहीं करेंगे, जबान से करेंगे, विचारों से करेंगे।
नशाखोरी से लेकर अन्यान्य जो दुष्प्रवृत्तियाँ हैं, उनको हटाने के लिए और अच्छाइयों का समर्थन करने के लिए आपको आगे आना चाहिए, आपको यह कार्यकर्ता बताएँगे कि क्या करना है। आपको नारी जागरण के लिए कार्य करना है, नारियों को आप आगे लाइए। नारियों को मैं देख रही हूँ, तो मुझे यह मालूम पड़ रहा है कि आधे से भी ज्यादा तो बिलकुल अपंग हैं। एक हिस्सा अपंग क्यों रहने देंगे? आप आगे बढ़िए और जो बगैर पढ़ी-लिखी हैं, इनको पढ़ाइए और जो थोड़ा पढ़ी-लिखी हैं, उनको आगे बढ़ाइए। इनकी बहुत जरूरत है, बहुत आवश्यकता है।
21वीं सदी—नारी सदी
21वीं सदी में समझ लेना कि राष्ट्र को नारियाँ सँभालेंगी, तो फिर यह आधा अंग बेकार क्यों पड़ा रहेगा? नहीं साहब! हम तो दकियानूसी हैं। जैसा खुद है, वैसा ही स्त्री के प्रति अपनी भावना रखता है। जैसे खुद संकीर्ण है, वैसे ही संकीर्ण उनको समझ रखा है। नहीं, आगे बढ़ाइए। इनकी बहुत जरूरत है। इनको यहाँ भेजिए, तीन-तीन महीने का प्रशिक्षण यहाँ दिलाएँगे। बेटे! यह वातावरण के परिशोधन के लिए बहुत आवश्यक है और इसके लिए आप लोगों को कदम उठाना ही चाहिए।
ये मैंने तीन बातें आपको बताईं। एक तो विचार क्रान्ति की, एक दीपयज्ञ की दो और नारी जागरण की तीन। इन क्रियाकलापों के अतिरिक्त जो आपको बताए नहीं गए और जो महत्त्वपूर्ण हैं, वे हैं—आस्था और वे हैं—व्यक्ति की श्रद्धा और भावना। उसके अन्दर यदि भावना नहीं है, आस्था नहीं है तो वह जड़ है बेटा, जड़ से कुछ काम नहीं करा सकती हूँ, जड़ किसी काम का नहीं है।
अखण्ड दीप से लें प्रेरणा
चन्द्रगुप्त यदि जड़ होता तो कैसे बनाया जाता, बताना? जड़ नहीं था, उसका समर्पण था। उसको बना दिया। गुरु का अनुदान और वरदान मिलता है और मिलता रहा है और मिलता रहेगा। इसमें गुरु की संकीर्णता नहीं है, इसमें संकीर्णता है शिष्य की कि लेने वाले का दामन कैसा है? वो सँभाल भी सकता है कि नहीं। जितना छोटा बरतन होगा, उतना ही थोड़ा पानी आएगा और बड़ा बरतन होगा, तो ज्यादा पानी आएगा। यह तो पात्रता के ऊपर है, सीधी-सादी बात है, देने वाले ने कंजूसी नहीं की है।
देने वाला तो देता है। क्यों साहब! अर्जुन ही क्यों बना और क्यों नहीं बने? अरे इसलिए नहीं बने कि उनकी पात्रता नहीं थी। एकलव्य का समर्पण था। समर्पण था, तो अर्जुन से भी ज्यादा बन गया और शिवाजी? छत्रपति शिवाजी हो गए। क्यों हो गए? अरे! इसलिए हो गए कि उनका समर्पण था। उन्होंने कहा—जैसा आप बनाना चाहें, हम वही बनने के लिए तैयार हैं। हाँ, वही बनने के लिए तैयार हैं। हमारा अखण्ड दीपक है। आप जब कभी भी यहाँ आ पाएँ, हम नहीं भी रहें, तो बेटे! आप उसको नमन करना, आप दर्शन करना, आपको हम दोनों प्राणी उसी में दिखाई पड़ेंगे। उसी से आपको प्रेरणा मिलेगी और उसी में आपको हम दोनों की झलक मिलेगी, जिसके पास बैठकर उन्होंने 24-24 लक्ष के पुरश्चरण किए और अभी भी वह अखण्ड ज्योति src='प्रज्वलित है।
वह हमारी बहुमूल्य पूँजी है। हम कोई पूँजी लेकर तो नहीं आए, लेकिन वह हमारी सबसे बड़ी पूँजी है।
इसको कोई हमसे जुदा नहीं कर सकता है और सब को जुदा कर सकता है। हमारे बेटे-बेटियों को जुदा कर सकता है। हमारे सम्बन्धियों को जुदा कर सकता है, लेकिन हमारे अखण्ड दीपक को हमसे जुदा नहीं कर सकता; क्योंकि हम उसमें समाये हुए हैं और उसी से प्रेरणा पाई है, उसी से शक्ति पाई है। उससे हम अलग कैसे रहेंगे? जब हमारा शरीर नहीं रहेगा, तो हमारी आत्मा उसमें रहेगी।
शरीर तो बेटे! हाड़-माँस का है, जो सबका होता है, वही उसका होगा। उसके लिए भी हमने कह रखा है कि हमारा शरीर भी इस शान्तिकुञ्ज से बाहर नहीं जाएगा। यहीं गड्ढे खोदकर के हम दोनों को दफनाया जाएगा। हमने सब लड़कों से यह कह दिया है कि हमारा शरीर भी यहीं रहेगा। तो हमारी आत्मा के दर्शन वहाँ करना और शरीर के आप यहाँ करना। हम आप से अलग कहाँ हैं? बच्चों से अलग माँ-बाप रहेंगे कहीं? नहीं, कभी भी नहीं रह सकते।
बेटे! आपके, हमारे गुरु और शिष्य के जो बन्धन हैं, जन्म-जन्मान्तरों तक चलेंगे, इस जन्म में भी और अगले जन्म में भी। इस जन्म का तो ठेका है ही, अगले जन्म की, अगले जन्म में देखी जाएगी, पर इस जन्म में तो हमारा, आपका बन्धन है ही, वह कभी टूटने वाला नहीं है, यदि सच्ची आस्थाओं से और निष्ठा से और श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। यदि आपकी श्रद्धा डगमगा गई, तो हम नहीं कह सकते, फिर हमारा कोई दावा नहीं है। फिर तो हमको पश्चात्ताप होगा और हमको अपने मन में दुःख होगा कि अरे! कैसा बढ़िया लड़का था, देखो इसकी निष्ठा कहाँ गई, बेचारा यह कहाँ डगमगा गया? था तो बड़ा अच्छा। था तो बड़ा भोला, पर यह कैसे डगमगा गया?
उसको कुछ हो गया, अपने बीबी-बच्चों में कुछ हो गया, हो गया, तो हो गया। है तो हमारा ही, पर बेटे! वे भाव नहीं रहेंगे, जो रहने चाहिए, हमको दुःख होगा। आप में से कोई भी भुजा हमारी कटती है और कोई भी भुजा हमारी इधर-उधर होती है, तो हमको आन्तरिक पीड़ा होती है और यह पीड़ा होती है कि यह हमारी भुजा गिर कैसे पड़ी? यह कट कैसे गई? यह लगाई क्यों नहीं गई? इसका ऑपरेशन कैसे नहीं हुआ? कोई कुशल डॉक्टर नहीं मिला, या तो हममें कमी है या आपमें कमी है।
क्या है श्रद्धा?
कहीं-न-कहीं कमी है बेटे! सम्भव है, हममें कोई कमी हो। हममें नहीं है, तो आपकी आस्थाओं में कमी है, आपकी निष्ठा में कमी है या आपकी श्रद्धा और आपकी निष्ठा इस लायक नहीं है कि आप जुड़े रह सकें। आप तो थोड़ी-थोड़ी बाधाओं में, थोड़ी-थोड़ी मुश्किलों में डगमगा जाते हैं। जरा भी विपरीत परिस्थिति आई, तो आप तिलमिला गए और जाने कहाँ, किधर आपका चिन्तन चला गया कि आपकी श्रद्धा कहाँ रही?
श्रद्धा तब होती है बेटे! गुरुजी ने स्वतंत्रता आन्दोलन में कार्य किया था, तो सारे घर के लोग विरोधी थे; लेकिन उन्होंने बीड़ा उठाया था कि नहीं, हमको तो काम करना ही है। तो उन्होंने इतना कार्य किया है।
यूपी में आँवलखेड़ा से जुड़े जहाँ अपने बाईस गाँव हैं, सारे बाईस गाँव का लगान उन्होंने माफ करा दिया। वह समय की पुकार जो स्वतंत्रता आन्दोलन में थी, जिन्होंने कार्य किया था, उनको तो आज कितनी पेंशन मिल रही है? चार सौ तो प्रान्त की मिल रही है और छह सौ केन्द्र सरकार की मिल रही है, एक हजार मिल रही है और फर्स्ट क्लास के पास मिल रहे हैं और हमने तो सुना है, अब हवाई जहाजों के भी टिकट मिलने वाले हैं। यह सब गुरुजी ने राहत फण्ड में दे दिए।
कितने लाभ में हैं? वे जिन्होंने उस समय निस्स्वार्थ भाव से कार्य किया था। अब तो उसमें स्वार्थ भी घुस गया, लाइए साहब! दीजिए, हम तो वहाँ गए थे और स्वतंत्रता आन्दोलन में कष्ट झेले थे। धत् तेरे की। स्वार्थ से नहीं गए थे, परमार्थ से गए थे। राष्ट्रीय भावनाओं से गए थे, तो आज भी उनको घूमने का और किसका-किसका लाभ मिलता है। आपको मिलेगा? आपको भी मिलेगा, पर समय चूक जाओगे, तो नहीं मिलेगा। चूक मत जाना, जैसे और लोग चूक गए हैं, जो अपने घर के काम-धन्धे में लगे रहे, बीबी-बच्चों को ही देखते रहे, वह भी हाथ मलते रह गए।
उन्होंने कहा—हाय रे! हम भी होते, चाहे भले छह महीने की क्या एक दिन हवालात में हो आते, तो कम-से-कम हमें भी पेंशन मिल तो जाती। हाँ, बेटे! अब भी बहुत से लोग हैं, जो पछता रहे हैं। हमें तो मिला था। अभी गुरुजी की पेंशन उन्होंने डिक्लेयर की और उन्हें दी भी, परन्तु उन्होंने कहा—हमको नहीं चाहिए। किनको चाहिए? उनको दो, जो जरूरतमन्द हैं, हमको नहीं चाहिए, हमारे तो हाथ-पाँव मौजूद हैं, हम क्या करेंगे पेंशन लेकर के और सरकार का खाएँगे? अरे! हम काहे को सरकार का खाएँगे। सरकार का आज तक नहीं लिया है, अब सरकार की पेंशन लेंगे? हमारे हाथ-पाँव कहाँ चले गए। हमने राष्ट्र के लिए काम किया है, न कि पेंशन के लिए किया है। पेंशन के लिए नहीं किया।
समय की पुकार
बेटे! यह समय की पुकार है और समय की पुकार नहीं सुनेंगे, तो आप पीछे पछताते रह जाएँगे। यह समय ऐसा है कि गुरुजी से जितना चाहें आप ले सकते हैं। बेटे! हम से आप ले सकते हैं, पर साथ में शर्त यही है कि आप की पात्रता कितनी है? आप अपनी पात्रता का विकास करना। आपकी कोई कष्ट-कठिनाई होगी, बेटे! अभी हम जिन्दा हैं। अभी कहीं नहीं जा रहे हैं और हर कष्ट-कठिनाई में आपको ऐसा महसूस होता रहेगा कि गुरुजी-माताजी बिलकुल हमारे समक्ष हैं।
प्रारब्धवश आपकी समस्या हल नहीं होती होगी, तो कह नहीं सकते। मान लीजिए आपका प्रारब्ध ही ऐसा उलटा है कि हम आपकी उतनी सेवा और मदद नहीं कर पा रहे हैं, पर आपको हिम्मत जरूर दे रहे होंगे, आपको साहस जरूर दे रहे होंगे, आपको बल जरूर दे रहे होंगे, आपको हिम्मत दे रहे होंगे, आपकी पीठ थपथपा रहे होंगे, आपका सर सहला रहे होंगे और कहेंगे कि बेटे! तू काहे को घबरा रहा है? चल आगे आ जा। आगे आ गया। कहाँ चला गया। समर में चल, लड़ाई के मैदान में चल।
पहले कोई जमाना था, जबकि क्षत्रियों के कुल में से एक, कुटुम्ब में से एक व्यक्ति सेना में भरती होता था और ब्राह्मण परिवार में से एक ब्राह्मण समाजसेवा के लिए होता था। उन्होंने कहा कि सारे-के-सारे हैं, अब इसमें से एक परिवार में से एक जाएगा और समाजसेवा करेगा और सिक्खों के गुरु में क्या था कि हर परिवार में से एक गुरु के लिए होता था। गुरु के लिए उसका सिर समर्पित है।
बेटे! हम आपसे निवेदन करते हैं कि आप अपने परिवार में से कम-से-कम एक व्यक्ति को समर्पित कर जाइए। आपके यहाँ कमाने वाले आपके लड़के हैं, फिर भी आप उसी दलदल में पड़े हैं, क्यों पड़े हैं? आपका भाई कमाने वाला है, आपने इतना कमा लिया है, तो फिर क्यों आप उसमें पड़े हैं? आप उसमें से तो निकलकर आइए? आपको मिशन माँगता है, गुरुजी माँगते हैं और हम आपको माँगते हैं कि आप आ जाइए।
यदि आप नहीं आएँगे तो फिर आपने डण्डा देखा है कि नहीं देखा, नहीं, रहने दो, अब नहीं कहूँगी, नहीं तो बच्चे कहेंगे कि माताजी यह क्या कह रही हैं? अभी तो प्यार की बात कह रही थीं, अब डण्डा की बात कर रही हैं। डण्डे की बात मैं नहीं कहती बेटे! जब विश्वामित्र गए थे और राजा दशरथ जी से राम और लक्ष्मण को माँगा था और राम, लक्ष्मण नहीं आए होते, तो वे केवल राजकुमार-के-राजकुमार ही रह गए होते। राजा दशरथ के पुत्र राजकुमार भगवान राम हो गए थे। यदि न गए होते, तो क्या हो जाते? बिलकुल नहीं होते भगवान राम।
समर्पण से बने भगवान
भगवान बनने की विद्या किसने दी? विश्वामित्र ने बनाया और विश्वामित्र ने तब बनाया, जब वे समर्पित हो गए। उन्होंने फिर मुड़कर के नहीं देखा कि हम तो राजकुमार थे। वे ऐसे रहते थे, बेटे! जो जमीन पर सो गए। लकड़ी काटकर ला, हाँ! लकड़ी काटेंगे, फूल बीन के ला, हाँ! फूल बीन के लाएँगे। उन्होंने कहा अच्छा यज्ञशाला की रखवाली करो, यहाँ राक्षस आएँगे। धनुष-बाण लेकर के खड़े हो गए। उनसे जो कहा—वही किया। वे बन गए। बन जाएँगे, आप में से ही बन जाएँगे। हाँ! आप में से ही बन जाएँगे। असली—असली तो बन जाएँगे और नकली—नकली नहीं बनेंगे। अब यह आपके ऊपर है कि आप असली हैं कि नकली हैं। अपनी छाती पर हाथ रखकर देखो कि तुम असली हो कि नकली, तो फिर आपको मालूम पड़ जाएगा कि हम कितने असली हैं और कितने नकली हैं। हम तो चाहेंगे कि आप असलियों में भरती हो जाएँ और नकलीपन को छोड़ दें। नकलीपन को छोड़िए और असली में आ जाइए। बेटे! ज्यादा तो मुझे कुछ नहीं कहना है। पैंतीस-चालीस मिनट हो गए, मैं अब बात को लगभग समाप्त करती हूँ।
यह मिनी वसन्त पर्व किस उद्देश्य से लगाया गया था? इसी उद्देश्य से लगाया गया था कि जो हमारे परिजन हैं, जो छूट गए थे, जो वसन्त पर्व पर नहीं आए थे, उनको हमने बुलाया; ताकि पीछे इनको कोई पश्चात्ताप न रह जाए और ये गुरुजी को प्रणाम कर लें, उनके चरणस्पर्श कर लें। फिर मौका जाने मिला या नहीं मिला।
बेटे! हम क्या कह सकते हैं? उन्होंने तो अपने ऊपर बन्धन लगा लिया। मिल भी सकते हैं, किसी को बुला भी सकते हैं। ऐसा भी नहीं है, चाहेंगे तो उसको बुला लेंगे, इतना बड़ा काम करना है, तो क्यों नहीं बुला लेंगे? बुला भी सकते हैं और कभी भी न बुलाएँ, किसी को भी न बुलाएँ, तो आप उसमें निराश मत होइए, आप हमसे जुड़े हैं। तो आपके लिए तो वे बातचीत करें, चाहे न करें हैं तो आपके पिता ही। न मिलेंगे तो न मिलेंगे, मैं तो मिलूँगी आपसे।
नहीं साहब! आप भी कहाँ मिलती हैं? आप भी कहीं नहीं मिलतीं, बैठा लेती हैं आधा घण्टा और फिर कहती हैं उठ जा। बेटा! यह तो अब विशेष परिस्थितियों की बात है। बताइए, कमरे में पचहत्तर व्यक्ति आते हैं और पचहत्तर को मैं पूछूँ, तो उसमें दो घण्टे लगेंगे कि नहीं लगेंगे और सबको मौका देना है, तो फिर मुझे यहीं बैठे रहना पड़ेगा। आप तो इसमें प्रसन्नता अनुभव कीजिए।
दुनिया के बड़े-से-बड़े व्यक्ति आते हैं, जो पाँच मिनट के लिए तरसते हैं कि हमें पाँच मिनट तो कम-से-कम मिल जाएँ; लेकिन उन्हें पाँच मिनट का भी मौका नहीं लगता है, कम-से-कम आपको बैठाया तो है। आधा घण्टा अपने समीप तो बैठाया है, तो यह क्या कम है। हमारे बच्चे आए हैं। बेटे! आपको प्यार का अनुभव तो हुआ, आपको स्नेह का अनुभव तो हुआ और हमारी भावना यही रही कि देखो बच्चे कितनी-कितनी दूर से आए, थोड़ी देर हमने आपको बैठा लिया। आप इसमें सन्तोष करिए, आपको करना चाहिए।
बस, यहीं मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ कि आप आगे आइए और आगे की लाइन में खड़े होइए, पीछे की लाइन में नहीं। पीछे की लाइन में आप खड़े रहेंगे, तो आप वहीं के वहीं रह जाएँगे। आगे आएँगे, तो आप सैनिक के तरीके से आगे सीना तान करके चलेंगे, जिसकी उम्मीद आपसे गुरुजी ने की है।
हमने उम्मीद की है कि हमारे परिजन और ज्यादा-से-ज्यादा समय निकाल करके समर्पित भाव से समाज की सेवा करेंगे। बेटे! समाजसेवा की बहुत जरूरत है। आपको नहीं मालूम गुरुजी के अन्दर कैसी अग्नि जल रही है, उसमें से एक चिनगारी भी आप ले जाएँ, तो आप धन्य हो जाएँगे, बेटे! मैं तो धन्य हो गई। अब मुझे लगता है कि और किसी को तो मालूम नहीं है, पर मैं तो पूर्णरूप से उनमें समा गई हूँ और वे मुझमें समा गए हैं।
मुझे अब कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता है। सारा-का-सारा बस, मेरे लिए वे ही भगवान हैं और मेरे लिए सब कुछ वे ही हैं। तेल वे हैं, तो बाती मैं हूँ। जलेंगे, तो दोनों मिल करके ही जलेंगे। एक जलेगा? नहीं, एक क्यों जलेगा? साथ-साथ हैं, वे दोनों जलेंगे। यही समर्पण काश बेटे! आप में भी आ जाए, भगवान करे आप में आ ही जाए। यह हमारा आशीर्वाद भी है और वरदान भी है। आप उस आशीर्वाद को, उस अनुदान को, बलिदान को निभा लें, तो बेटे! आप धन्य हो जाएँगे जैसे कि मैं धन्य हो गई हूँ, आप भी धन्य हो जाएँगे।
आज की बात समाप्त