ज्ञान की गंगा का अवतरण

परम वन्दनीया माताजी के उद्बोधनों में एक अलौकिक मधुरता भी है और एक सामुद्रिक गाम्भीर्य भी। उनके शब्द जहाँ अन्तर्मन की प्यास को बुझाते हुए प्रतीत होते हैं तो वहीं ज्ञान की क्षुधा को तृप्त भी करते हैं। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में वन्दनीया माताजी प्रत्येक साधक को स्मरण दिलाती हैं कि यदि पूज्य गुरुदेव ने भागीरथ की तरह से तपस्या न की होती तो जन-जन को गायत्री की उपासना सुलभ न हो पाई होती। वन्दनीया माताजी यह भी स्मरण दिलाती हैं कि जन-जन को गायत्री का अधिकार दिलाने के लिए पूज्य गुरुदेव ने अनेकों कष्टों को वरण किया और तब महर्षि भगीरथ की तरह ज्ञान की गंगा का अवतरण करने में सफल हो सके। उनकी उपासना वस्तुस्थिति में जीवन शोधन की उपासना है। वन्दनीया माताजी हर गायत्री परिजन को प्रेरित करती हैं कि वे अपने भीतर की बुराइयों को हटाने की साधना करें और पूज्य गुरुदेव के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने की साधना करें। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को—

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

गायत्री मंत्र के तीन चरण

आत्मीय परिजनो, आज के ही दिन माँ गायत्री का प्रादुर्भाव हुआ, आज के ही दिन गंगा का प्रादुर्भाव हुआ। भगीरथ ने तपश्चर्या की और वे गंगा को लेकर के धरती पर आए। एक भगीरथ और पैदा हुए, जो ज्ञान की गंगा लेकर के आए और उन्होंने माँ गायत्री को अपने हृदय में तपश्चर्या के द्वारा धारण किया। गायत्री मंत्र के 24 अक्षर होते हैं, 24 अवतार होते हैं, तीन चरण होते हैं, जिसको त्रिपदा कहा गया है। उपासना, साधना, आराधना— यह गायत्री मंत्र के तीन चरण हैं, जिनको आप लोग धारण किए हुए हैं। उनके उद्देश्यों के, उनके लक्ष्यों के बताए गए मार्ग पर आप चल रहे हैं।

गायत्री क्या थीं? यह गायत्री केवल थीं तो ब्राह्मणों की, पर ब्राह्मण भी इसको नहीं जानते थे। धूल में दबी हुई, जिस तरीके के शाप से अहल्या पत्थर की हो गई थी और जब भगवान राम के चरण पड़े तो उसका उद्धार होता हुआ चला गया। इसी तरीके से गायत्री शापबद्ध थीं, यह तो मैं नहीं कहती हूँ, लेकिन एक बात मैं कहती हूँ कि जो हमारी माँ पाषाण के नीचे दबी हुई थी, जो धूल के नीचे दबी हुई थी, उस माँ को उन्होंने अपने हृदय में धारण किया और हृदय में स्वयं ही धारण नहीं किया, बल्कि जन-जन तक गायत्री माँ को उन्होंने पहुँचाया। घर-घर तक पहुँचाया।

आपको नहीं मालूम कि उन्होंने जिन्दगी में कितने कष्ट उठाए? आपको नहीं मालूम, आपको तो पका हुआ मिल गया है और उन्होंने ये पकाया है। जो पकाता है, वह महत्त्व समझता है, जो पैसा कमाता है, वह उसका महत्त्व समझता है और जिसने कमाया ही नहीं, बाप-दादा की कमाई है, वह उस पैसे का क्या महत्व समझेगा? उस पैसे का महत्त्व नहीं समझेगा। आपने कमाया नहीं है, इसलिए आपको उसके महत्त्व का पता नहीं है।

जीवन-शोधन की उपासना

उन्होंने जिन्दगी में कमाया और सारी जिन्दगी उसी में झोंक दी। न परवाह की बच्चों की, न परवाह की किसी रिश्तेदार की, न परवाह की किसी और की। वे अपने सिद्धान्त के, अपने उसूलों के धनी थे। हमेशा उसी पर वे चलते रहे और गायत्री माता को जन-जन का, घर-घर का बना दिया और लाखों के हाथों में माला थमा दी। माला ही नहीं थमा दी, यही नहीं कहा कि एकान्त में बैठ करके आप उपासना करना, वरन उन्होंने एक और बात कही।

उन्होंने यह कहा कि तुम अपने जीवन-शोधन के लिए समय जरूर निकालना, ताकि जो भी आपके अन्दर की मलीनता है, वह मलीनता अन्दर से निकलती हुई चली जाए। उन्होंने पलायनवादी नहीं बनाया। उन्होंने तो एक सद्गृहस्थ के तरीके से यह बताया कि सद्गृहस्थ रहते हुए भी राष्ट्र के लिए, समाज के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है।

गुरुदेव ने कितने कष्ट उठाए?

यही नहीं कि हम जंगल में चले जाएँ, धूनी रमा लें और स्वर्ग-मुक्ति की बात सोचने लगें। मान लीजिए एक की स्वर्ग-मुक्ति हो भी गई, जब हमारा सारा देश अग्नि में झुलस रहा हो, विभीषिकाओं में झुलस रहा हो, सारा विश्व विनाश के कगार पर खड़ा हो, तो फिर बताइए कि एक की मुक्ति हो भी गईं तो उससे क्या बनेगा? जब तक सारे संसार का कल्याण नहीं हो जाता, पीछे नंबर अपना है, यही काम उन्होंने किया।

उन्होंने नारियों के लिए 'स्त्रियों का गायत्री अधिकार' नामक पुस्तक लिखी। उसका इतना विरोध हुआ, पण्डों ने अपने ढंग से विरोध किया और आर्यसमाज ने अपने ढंग से विरोध किया। सब विरोध करते हुए चले गए, लेकिन उन्होंने किसी की भी परवाह नहीं की।

जब उन्होंने हजार कुण्डी यज्ञ किया तो लोगों ने मखौल उड़ाया। उन्होंने कहा कि लोग पागल हैं। हम उनके लिए पागल हैं, हमारे लिए वे पागल हैं। वे अभी हमारे अंतरंग को पहचान नहीं पाए कि हम क्या कर रहे हैं? उसके द्वारा हम क्या करने जा रहे हैं। हमें बहुत कुछ करना है। हमें जब करना है तो फिर किसी का हमें डर क्या है? कोई हमारा साथ देगा-न-देगा, मत दे। तेरी इच्छा। हम तो तुझे कलेजे से लगाएँगे, पर तू साथ देता है कि नहीं देता, हमें नहीं मालूम। मत दो कोई भी साथ नहीं देगा तो अकेले चलेंगे।

एकला चलो रे

रवींद्रनाथ की एक कविता है, उसमें है— एकला चलो रे .... एकला चलो रे। अकेले चलेंगे और अकेले चलकर के उन्होंने कितना बड़ा संगठन तैयार किया, कितना बड़ा संगठन बना दिया। देवत्व का जागरण उन्होंने हरेक हृदय में कर दिया, हर किसी के हृदय में पौधे को स्थापित कर दिया, बीज को डाल दिया, अब रह गई खाद-पानी की बात, तो खाद-पानी देंगे और वह फूलेगा-फलेगा अन्यथा बीज गल करके रह जाएगा। बीज गल करके न रह जाए, इसलिए तरह-तरह से उन्होंने उपाय बताने की चेष्टा की।

वाणी के द्वारा, लेखन के द्वारा, अपने व्यवहार के द्वारा, अपने चरित्र के द्वारा उन्होंने हर सम्भव बताने की कोशिश की है। उन्होंने जनता के साथ में गद्दारी नहीं की। जिस तरीके से मदारी भीड़ इकट्ठी करता है, इस तरह से उन्होंने भीड़ इकट्ठी नहीं की। उन्होंने हर किसी में अपने प्राण फूँकने की कोशिश की। अपना एक अंश देने की कोशिश की और इसके लिए वे रात-रात भर जगे। आपको नहीं मालूम हमको मालूम है, हम साथ रहे हैं। साथ रहे तो जो हमको मालूम है, वह आपको कैसे मालूम हो सकता है। आपको मालूम नहीं हो सकता, मुझे ज्यादा मालूम हो सकता है; क्योंकि मैं उनके निकट रही हूँ।

नारी के लिए पति का महत्त्व

नारी के जीवन में पति का बहुत महत्त्व है। पति के अलावा और सब रिश्ते नंबर दो पर, नंबर तीन पर आते हैं। नारी के लिए पति ही उसका आराध्य है, पति ही उसका उपास्य है। सबके लिए है कि नहीं है मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैंने देखा, मैंने समझा है।

कइयों का यह सवाल है कि साहब ! आपकी उम्र में और गुरुजी की उम्र में तो अन्तर है, हाँ बेटा जरूर अन्तर है मैं ये नहीं कहती, लेकिन भावनाओं से और सिद्धान्तों से हम एक-दूसरे के प्रति ऐसे रहे कि हमारे जीवन की कोई कल्पना नहीं कर सकता।

बच्चे के लिए पिता की उम्र ज्यादा हो सकती है, शिष्य के लिए गुरु की उम्र ज्यादा हो सकती है। नाती के लिए दादा की उम्र ज्यादा हो सकती है, लेकिन पत्नी के लिए, चाहे कितना ही बुढ़ापा क्यों न आ जाए? 100 वर्ष का क्यों न हो जाए, 150 साल का क्यों न हो जाए? लेकिन पति और पत्नी के जो सम्बन्ध हैं, वे तो अटूट हैं, एक-दूसरे के वे पूरक हैं, पूरक बनना अभी कोई नहीं जानता।

हमने समझा है बेटे और हमने समझा ही नहीं है, बल्कि उस रास्ते पर हम चलते हुए चले गए, जहाँ उन्होंने कहा कि इस तरीके से चलना है, वही हमने शिरोधार्य किया। गलत रास्ता तो उन्होंने नहीं बताया, ऐसी तो मैं किसी को सलाह नहीं दूँगी कि आप ऐसे अन्धविश्वासी बन जाइए, ऐसी नारी बन जाइए कि गलत हो तो गलत को भी स्वीकार कर लीजिए।

गलत को तो स्वीकार नहीं करें, गलत को भी अच्छे ढंग से समझाने का प्रयास करें, ताकि गलतियाँ भी हटती हुई चली जाएँ, लेकिन अच्छाइयों के लिए तो कदम-से-कदम बढ़ाना चाहिए। अपने जीवन में कदम-से-कदम बढ़ा करके हम आगे चलते हुए चले गए और उन्होंने उस स्थान पर लाकर हमें बैठा दिया जहाँ वे भी बैठते थे। वहाँ उन्होंने बैठा दिया, यह उनकी सहजता थी, सरलता थी।

गुरुदेव और माताजी एकप्राण

हमारा योगदान यह था कि हम साथ-साथ रहे और प्राण से, जीवात्मा से अभी भी हम साथ हैं। अभी भी हमको ऐसा महसूस होता है कि वे हमारे पास ही बैठे हैं। शरीर हमारे बीच में नहीं है, पर शरीर से ज्यादा तो हम उस आत्मा से जुड़े हुए हैं, जो हमको पल-पल निर्देश देती है, हमको प्रेरणा देती है और हमको आगे चलाने के लिए भरसक प्रयास करती है और धकेलती है। चलो—चलो, जो हमारे काम हैं उन कामों में योगदान दो, आँखों में आँसू नहीं, ओंठों पर मुस्कान, आँखों के आँसू से काम नहीं चलेगा, ओठों की मुस्कान से काम चलेगा।

दूसरों को गले लगाओ और दूसरों के दरदों को बाँटो और अपनी खुशियाँ उनको दो। खुशियाँ बाँटो और दूसरों के दर्द को अपनाओ, दूसरों के दरदों को पीना सीखो। उन्होंने सारी जिन्दगी दूसरों के दरदों को ग्रहण किया और पिया और हम भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं, हम भी उन दरदों को पिएँगे। हम इतने मुलायम नहीं हैं, बहुत कड़े हैं, बहुत शक्ति है, अपार शक्ति है। उम्र तो उम्र ही होती है, उसे तो नकारा नहीं जा सकता। शरीर के कल-पुरजे भी ढीले पड़ते हैं, उन्हें भी नहीं नकारा जा सकता, पर जो आन्तरिक शक्ति होती है, वह शक्ति अलग चीज है। आपकी भी शक्ति कम नहीं होनी चाहिए, क्योंकि आप भी जुड़े हुए हैं। जो कार्य वे छोड़ गए हैं, उन कार्यों को हमें आगे गति देनी है।

दें गति गुरुदेव के विचारों को

हमें घर-घर जाना पड़ेगा। हमको अपनी इज्जत को नहीं देखना, हमें अपने बड़प्पन को नहीं देखना। जिस तरीके से ईसाई मिशन बढ़ता हुआ चला गया, कैसे बढ़ता हुआ चला गया? यह उनके कार्यकर्ताओं पर निर्भर है। आप भी डाल-डाल और पात-पात मत डोलिए, आप भी यह मानिए कि हम गुरुजी के हैं। उस राम के हैं, एक राम ने तो केवल अयोध्या में ही रामराज्य स्थापित किया था और ये राम तो ऐसे पैदा हुए कि जिन्होंने यह चाहा कि सारे विश्व को हम एक सूत्र में बाँध देंगे। यह उनकी भावनाएँ थीं और यह हमारी भी हैं, पूरे विश्व को नहीं तो अपने राष्ट्र को तो बना देंगे। उन्होंने पूरे विश्व में छा जाने की कोशिश की।

छा जाने का मतलब विचारधारा को, सिद्धान्त को फैलाना, विचारों को फैलाना, साहित्य को फैलाना मूल उद्देश्य था। ज्ञान का प्रवाह, ज्ञान की धारा और ज्ञान की गंगा को बहाना उद्देश्य था, जिस तरीके से भगीरथ ने गंगा बहाई, तपश्चर्या की और गंगा शंकर जी की जटाओं में से उत्पन्न होती हुई चली आईं।

गंगा का वेग कौन सहेगा? शंकर जी। ज्ञान का वेग कौन सहेगा? गुरुजी, जिनका नाम श्रीराम शर्मा है, ज्ञान का वेग वे ही सहेंगे। उन्होंने उस ज्ञान के वेग को सहा और उस ज्ञान के वेग को सारी धाराओं में फैलाते हुए चले गए और जन-जन में उल्लास बाँटते हुए चले गए, प्यार बाँटते हुए चले गए और सबको धन्य बनाते हुए चले गए।

ये था उनका जीवन, जिसके लिए मैं कोई उदाहरण नहीं जोड़ रही, मैं आपको केवल उन्हीं की बात कहूँगी। आज उनकी तीसरी पुण्यतिथि है। हम आज और भी नया संकल्प करें, जो संकल्प हमारे पहले थे, वे हमें पूरे करने हैं और आगे की भी घोषणा करेंगे और नए संकल्पों को भी हम पूरा करेंगे।

उनकी पुण्यतिथि पर हमें अपने सच्चे मन से संकल्प लेना है कि आजीवन हम जिस तरीके से जुड़े थे और भी हम प्रखर होते हुए चले जाएँगे, हम जुड़ते हुए चले जाएँगे। वे कहाँ गए, कहीं नहीं गए, हमारे अंतरंग में हैं, हमारे रोम-रोम में हैं। बाहर कहाँ है शरीर, शरीर के लिए रोना आ रहा है? नहीं शरीर तो पंचतत्त्वों का बना हुआ है, वह तो नाशवान है, वह तो एक दिन जाएगा ही।

जितने भी अवतार और जो भी इस पृथ्वी पर आए हैं, उन सबको एक-न-एक दिन जाना ही पड़ा। भगवान राम को जाना पड़ा था, भगवान कृष्ण को जाना पड़ा था, भगवान बुद्ध को जाना पड़ा, गाँधी जी को जाना पड़ा, ईसा को जाना पड़ा, सभी को जाना पड़ा। सभी अवतारों को जाना पड़ा है; क्योंकि यह शरीर सीमित होता है और इसकी आवश्यकता होती है।

वे कई सालों से हमेशा यह कहते आए हैं। उन्होंने कहा कि देखो शरीर की अपनी एक आवश्यकता होती है और शरीर एक सीमित काम कर सकता है और जब मैं कारणशरीर में और सूक्ष्मशरीर में जाऊँगा तो, मैं विशाल काम कर सकता हूँ और सारे वातावरण में छा सकता हूँ। इस समय मैं अपने शरीर में रह रहा हूँ तो शरीर से जितना काम हो सकता है वह किया।

भावना के साथ कर्त्तव्यपालन

ऐसे तो पाँच शरीरों का काम उन्होंने किया। अपने एक शरीर में रहते हुए उन्होंने पाँच शरीरों का काम किया और उन्होंने यह कहा कि मैंने अपनी जिन्दगी का सारा आनन्द उठा लिया, अब तो मैं अपना जो भी जीवन जी रहा हूँ, फोकट में जी रहा हूँ। यह उनके शब्द थे और उनके शब्द थे कि अन्य महिलाओं के तरीके से तुम उतनी भावुक नहीं बनोगी।

भावुक तो मैं हूँ। भावना मेरे अन्दर है, पर मैं कर्तव्य को भी अच्छी तरह से समझती हूँ। जो मेरे हाथ में जिम्मेदारी थमा गए, उसे मैं अच्छी तरह से समझ रही हूँ और अपनी छाती से भी लगाए हुए हूँ और जब तक जीवन है, तब तक और जीवन नहीं रहेगा तो जिस तरीके से गुरुजी सारे वातावरण पर छाए हुए हैं, मैं भी उनके साथ-साथ छाई रहूँगी। आप कभी भी अलग नहीं पाएँगे कि गुरुजी अलग हैं और माताजी अलग हैं। हम आपसे अलग नहीं हैं।

बेटे, हम आपके समीप हैं, लेकिन आपको दो कदम उठाने पड़ेंगे। माँ एक ही काम नहीं करती है, जो माँ केवल प्यार करती है, वो बच्चों को बिगाड़ लेगी। उसकी एक आँख प्यार की होती है और एक आँख उसकी सुधार की होती है। एक से लताड़ भी लगाती रहेगी, दंगा मचाएगा तो समझ ले तेरी पिटाई करेगी और दूसरे से यह भी कहती रहती है कि पिटाई करूँगी तो इसके लग जाएगी, दोनों काम करती है। दोनों काम अर्थात पिता का भी काम करना है और माँ का भी काम करना है, दोनों काम करने हैं और तुम्हें भी एक ही रूप में दोनों को समझना भी है, समझाना भी है।

हमारे लिए क्या दिशा-निर्देश है? आप इनको नहीं समझ पाए, जीवन के लक्ष्य को नहीं समझ पाए, अपने कर्तव्य को नहीं समझ पाए, समाज को नहीं समझ पाए, राष्ट्र को नहीं समझ पाए? जिसमें कितनी विभीषिका है।

इन विभीषिकाओं के लिए यदि आपने कोई कदम नहीं उठाया तो फिर गुरुजी के शिष्य कैसे हो गए? केवल माला पहनने के लिए हो गए। उन्होंने आपको केवल माला फेरना ही नहीं बताया था।

उन्होंने हमको भी केवल माला ही नहीं बताई। उन्होंने यहाँ 6 घंटे रोज उपासना की थी, लेकिन हमसे यह कहा था कि तुम उपासना जितनी बन पड़े उतनी करो, लेकिन सारा-का-सारा जो काम बताया जा रहा है उसमें योगदान दो, तुम वह काम करो और वही हमने किया।

बुराइयाँ हटाने की साधना

आपके लिए भी यही निर्देश है कि आप पूजा-उपासना तो थोड़ी-बहुत करना, लेकिन अपनी मँजाई ज्यादा करना कि कहाँ आपके अन्दर बुराइयाँ पनप रही हैं? उन बुराइयों को निकालो। सारे समाज में से सारी बुराइयों को निकालना पड़ेगा। वे आसानी से नहीं निकलेंगी, जड़ जमाए बैठी हैं।

दहेज से लेकर, मृत्युभोज से लेकर और नशा से लेकर, निरक्षरता से लेकर के न जाने कितनी-कितनी बुराइयाँ जड़ जमाए बैठी हैं। इन जड़ों को बिलकुल साफ करना है। जहाँ हमें पेड़-पौधे लगाने हैं, जहाँ हमें साक्षरता प्रदान करनी है, दहेज के लिए विरोध करना है और भी हमारे जो राष्ट्रीय कार्यक्रम हैं, वह भी हमें पूरे करने हैं और अपने मिशन को भी हमें पूरा करना है।

उसके लिए हमें ज्यादा-से-ज्यादा समय निकालना पड़ेगा। केवल अपनी घर-गृहस्थी तक सीमित मत रहो। यह मत करो कि सारी जिन्दगी इन औलादों के लिए ही हो जाए। सारी जिन्दगी आपके बाल-बच्चों के लिए, पत्नी के लिए, इनके लिए ही बरबाद हो जाए। एक दिन ऐसे काल के थपेड़े पड़ेंगे कि उस दिन पछताते हुए रह जाएँगे। हाय रे ! हमें ऐसी बहुमूल्य जिन्दगी मिली, हमें मानव जीवन मिला और हमने यों ही तबाह कर दिया। हमने इसका महत्त्व नहीं समझा। यदि यह किसी के काम आ जाता तो हम धन्य हो जाते।

मात्र अपने लिए नहीं जिएँ

पशु का चमड़ा काम आ जाता है, उसके पर्स बन जाते हैं, जूते बन जाते हैं, उसकी खाल काम आ जाती है, लेकिन मनुष्य का तो कुछ काम नहीं आता। यह तो जाता है तब भी इसको काठी, कफन, लकड़ी, सामग्री, घी जाने क्या-क्या चाहिए? तब भी चाहिए और जाते-जाते भी चाहिए। वो जाता भी चुपचाप नहीं है। चुपचाप चला जाए, न माँगे तब भी माँगता है। सिकन्दर के तरीके से जीना ठीक नहीं।

पहले सिकन्दर खून-खराबे की ओर बढ़ा और जब उसे पश्चाताप हुआ तो मरते समय उसने यह कहा कि मेरे दोनों हाथ ताबूत से बाहर निकाल देना; ताकि दुनिया वाले यह देखें कि इस सिकन्दर ने कितना कमाया, कितना खून-खराबा किया और आज दोनों हाथ फैलाए जा रहा है। कुछ भी नहीं है। एक कौड़ी भी हाथ में नहीं है। किसके लिए कमाया? बच्चों के लिए, पत्नी के लिए, नहीं इसमें औरों का भी हिस्सा है, समाज का भी हिस्सा है, इसमें राष्ट्र का भी तो हिस्सा है कि केवल आपका ही है? आपका नहीं है, आपके गुरु का भी है, आपकी माँ का भी हिस्सा है।

तो क्या करें माताजी? फिर आपके लिए साड़ी लाएँ, खाने को लाएँ? नहीं बेटा, आपसे हमें कुछ नहीं चाहिए। हम कभी भी यह नहीं कहेंगे कि हमारे लिए लाइए, हमको नहीं चाहिए, हमारे लिए तो आ जाता है, इतना पर्याप्त आ जाता है। वह साल भर में भी नहीं खरच होता है और पैदा हो जाता है, लड़का भेज देता है। हम पहन लेते हैं। आपका हमें नहीं चाहिए, जरा भी नहीं चाहिए। हमें चाहिए तो मिशन के लिए चाहिए।

मिशन की भूख है। हाँ, बेटे कितनी भूख है, कितना बड़ा पेट है इसका कि आप उसकी कल्पना नहीं कर सकते। कितना हमको यहाँ बनाना है। अभी यहाँ कुटिया बन रही है। हमको निर्माण कराना है। भवन बनाने हैं। क्यों? आप इतने का क्या करेंगे? हम बता रहे हैं न कि इतनी हमारी भूख है। इतने कार्यकर्ता जो हमने आह्वान किया है कि अभी नहीं तो फिर कभी भी नहीं।

समय है सँभल जाओ

अब समय है सँभल जाओ, यह महत्त्वपूर्ण समय है, मिशन की यह आवश्यकता है। हम यह माँगते हैं कि आपने इतना कमा लिया है कि आपके बीबी-बच्चे खा सकते हैं, फिर आपको क्या जरूरत है कोल्हू के बैल के तरीके से लगने की? चलो, आप समाज की सेवा कीजिए, घर में से निकलिए, आप यहाँ आ जाइए। आपको मोह नहीं छोड़ता है, नाती-पोते को नहीं छोड़ते तो यहाँ तो छोड़ेंगे। यहाँ आइए, पर हमको कोई ऐसे बुढ्ढा-बुढ्ढ़ी नहीं चाहिए, जिनको कि दूसरे ही दिन हमें गंगाजी पहुँचाना पड़े, ऐसे नहीं चाहिए।

हमें जीवन्त व्यक्ति चाहिए, जीवन्त कार्यकर्ता चाहिए, जिनमें जीवट हो और जीवट नौजवान में होगी, नौजवान में जीवट होगी तो हम उन नौजवानों से भी कहेंगे, हम अधेड़ों से भी कहेंगे। जिनकी नार बिलकुल हिल गई है, उनको तो जाने दीजिए, जिनकी पेंशन हो गई है, वह फिर क्या काम करेगा? वह तो हो गया बूढ़ा। बूढ़ा हो गया तभी तो उसको नौकरी से निकाला गया। उसमें उतनी जान नहीं, पर हमको जानदार व्यक्तित्व चाहिए और वह जानदार हमें आप में से चाहिए। आप निकल करके आइए, आपके लिए यह युग की माँग है, मिशन की माँग है, यह देश की माँग है।

हमें राष्ट्र का काम करना है। राष्ट्र का काम करना है तो क्या हम घर में बैठ करके काम करेंगे? गुरुजी ने घर में बैठ करके काम किया था क्या? घर में बैठ करके काम नहीं किया था। घर में बैठ करके केवल उन्होंने 24-24 लक्ष के 24 पुरश्चरण किए थे।

पुरश्चरण के बाद उनके गुरुदेव की जो आज्ञा हुई थी, वह काम उन्होंने शुरू किया। फिर उन्होंने कहा कि गायत्री मन्दिर बनना चाहिए। गायत्री मन्दिर बना, फिर उन्होंने कहा कि भाई यज्ञ होना चाहिए।

यज्ञों की शृंखला शुरू हुई। जिस यज्ञ को कोई जानता भी नहीं है और जिस यज्ञ की परम्परा ही समाप्त हो गई, उन परम्पराओं को शुरू करना कितना कठिन काम था। वह सारे-के-सारे यज्ञीय जीवन, त्यागमय जीवन, समर्पित जीवन जीने के लिए उन्होंने प्रेरित किया। उन्होंने यज्ञों की परम्परा डाली। फिर दीपयज्ञों की परम्परा डाली। उन्होंने कहा कि इसमें घी और सामग्री ज्यादा खरच होती है। लोग यह कहते हैं कि घी जलता है, अच्छा तो घी नहीं जलाएँगे, दीपक जलाएँगे।

दीपक का मतलब स्नेह होता है। उसमें घी और तेल भरा रहता है, तेल का मतलब है स्नेह से लबालब, प्यार से लबालब भरा हुआ। तेल और बाती के तरीके से जलिए और दूसरों को रोशनी दीजिए, प्रकाश दीजिए। आप दे सकते हैं चाहे छोटी हैसियत के ही क्यों नहीं हैं? बड़े लोग ही काम कर पाएँगे? बड़े नहीं कर पाएँगे? छोटे ही काम करेंगे।

राष्ट्रदेवता पर श्रद्धासुमन अर्पित करें

गुरुजी ने बचपन से काम किया था। तो क्या अपने घर में रहे? वे तो जमींदार थे, लेकिन उन्होंने अपने घर में से एक थाली भी नहीं ली। एक लोटा लेकर के घर से निकले थे। आगरा में जाकर के लोहे के तसले में आटा गूँधा था, क्योंकि उनकी माताजी यह कहा करती थीं कि जब स्वतंत्रता मिल जाएगी तो यह राजा बनेगा और इसकी पत्नी बनेगी रानी। अब बेचारी कहे नहीं तो क्या कहे। उसका एक बेटा और वो भी कांग्रेस आन्दोलन में इधर-उधर घूमे तो घर की परवाह कौन करे? उनका भी कहना सही था।

आचार्य जी एक लोटा लेकर घर से निकले और आज इतना बड़ा वैभव आप देख रहे हैं। यहाँ से लेकर के, गायत्री तपोभूमि से लेकर के और आँवलखेड़ा से लेकर के ये सारा-का-सारा पसारा आप देख रहे हैं, उनकी तपश्चर्या का, उनकी निस्स्वार्थ भावना का है। ये तो आपकी जेबों का भी है। साहब ! हमने दिया था, हाँ तुमने दिया था और किसी को दिया था क्या? या सिर्फ अपने रिश्तेदारों को ही दिया है? जबरदस्ती गले पकड़कर डलवाया गया है। आपने अपनी राजी से दिया है? अपनी राजी से नहीं दिया, थपेड़ों ने निकलवाया है।

बेटे, आपसे निकलवाया गया है, कंजूस कहीं के, निकाल, सारा तेरे लिए नहीं है। तुमने बड़े-बड़े मिल और कारखाने इकट्ठे कर लिए हैं, अब तेरे कारखाने, मिलें देखे जाएँगे। अभी तो पिता के पड़े थे, अब माँ के भी पड़ेंगे तब तुम्हें अच्छे तरीके से आनन्द आएगा। मारती तो मैं किसी को नहीं, मेरे हाथ चलते हैं कभी?

मैंने कभी किसी को नहीं मारा। मैं प्यार से ही बोलती हूँ, लेकिन वाणी भी ऐसी होती है, जो कभी-कभी मार का काम कर जाती है और वाणी नहीं करती है, तो परोक्ष रूप काम करता है। प्रत्यक्ष से न माने तो परोक्ष से मान। बेटा ! जब तू सोएगा और जब हम नहीं रहेंगे तो भूत बनकर तेरे घर में आएँगे।

हम और गुरुजी भूत बन करके आएँगे और एक इधर से और एक उधर से पड़ेगा, तो नानी याद आ जाएगी। अरे भूत दिख रहा है, माताजी दिख रही हैं, गुरुजी दिख रहे हैं, अरे जी ! क्या हो गया? भूत दिख रहा है। मत बनवावे भूत, बेटा ! हम जहाँ जैसे हैं, वैसे ही हमको रहने दो; लेकिन अब कार्य के लिए आपको आगे आना ही पड़ेगा और आपको आना ही चाहिए।

उनकी पुण्यतिथि पर आप संकल्प करें कि हमको ज्यादा-से-ज्यादा राष्ट्र का काम करना है। हमें राष्ट्र इतना प्यारा है, राष्ट्रदेवता पर, युगदेवता पर आप श्रद्धा-सुमन चढ़ाएँ। आप श्रद्धा तो दे सकते हैं, आपको पैसे की किसने कहा है? पैसे हों तो पैसे भी दीजिए, पर आप श्रद्धा तो दे सकते हैं, आप भावनाएँ तो दे सकते हैं, आप अपने हाथ-पाँव तो दे सकते हैं। हाथ-पाँव भी नहीं दे सकते? आप हाथ-पाँव दीजिए और काम करिए, सहयोग आपको मिलेगा। अरे ! इतना अपार सहयोग मिलेगा आपको कि आपसे सहयोग सँभाला भी नहीं जाएगा, इतना सहयोग मिलेगा। अभी हम जीवित हैं, गुरुजी की शक्ति है, देखो होता है कि नहीं होता?

(क्रमशःअगले अंक में समापन)

परमवन्दनीया माताजी की अमृतवाणी

ज्ञान की गंगा का अवतरण

परमवन्दनीया माताजी के व्याख्यानों की यह विशिष्टता रही है कि उनके उद्बोधन गायत्री परिवार के प्रत्येक परिजन को अपने जीवन की दिशा को निर्धारित करने का संकल्प एवं साहस प्रदान करते हैं। परमवन्दनीया माताजी न केवल प्रत्येक साधक को साधना के पथ पर अग्रसारित होने का निमंत्रण प्रदान करती हैं, वरन वे हर परिजन को पूज्य गुरुदेव की तरह से भगीरथ बन ज्ञान की गंगा का अवतरण कर पाने का भाव भी पैदा करने को कहती हैं। वे कहती हैं कि हम पूज्य गुरुदेव के तपोमय जीवन से प्रेरणा प्राप्त करें और सन्मार्ग पर चलने का साहस पैदा करें। किसी भी साधक के जीवन का समग्र मूल्यांकन इस आधार पर हो पाता है कि उसके भीतर सत्पथ पर बढ़ने का जज्बा एवं साहस जन्म ले पाया या नहीं। वन्दनीया माताजी हर परिजन को वही आत्मबल जगाने की प्रेरणा प्रदान करती हैं। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को................

कुछ करने का साहस पैदा करें

वहाँ मुरादनगर का लड़का बैठा है। उसकी फैक्टरी नहीं चल रही थी, कम चल रही थी, अरे! माताजी आ गईं। माताजी चला दो। बेटा! माताजी कोई मशीन हैं, जो माताजी चला देंगी मशीन को। तेरी भावना है और भगवान की कृपा हो जाए तो हो ही जाए, चल हो जाए।

जो बिलकुल ऐसी लग रही थी कि बन्द होने वाली है, अब वह करोड़ों में जा रही है। मैंने कहा बस, तू खड़ा भर रह और फिर तू देख कमाल। चाहे तेरी और फैक्टरी बन्द हो जाएँ, पर वह फैक्टरी बन्द नहीं हो सकती। तेरी शुगर मिल नहीं बन्द हो सकती, वह चलेगी।

व्यक्ति के अन्दर कुछ कर गुजरने का साहस तो हो। साहस भी न हो, भावना भी न हो, तो फिर व्यक्ति जैसे-का-तैसा बौना-का-बौना ही रह जाएगा। बेटा, उसके व्यक्तित्व की कोई कीमत नहीं है। वह कितना कमा रहा है, कितना बड़ा अफसर है या कौन है, क्या है? इसकी कीमत नहीं है।

बेटा इसकी कीमत तब तक है, जब तक रिटायर्ड नहीं हो रहे हैं, तब तक दाएँ-बाएँ नौकर भी हैं। फिर उतर गए तो कोई दो कौड़ी का नहीं पूछेगा। बताइए फिर रिटायर्ड होकर क्या होगा? फिर उसकी वैल्यू समझनी चाहिए। मनुष्य जीवन की वैल्यू आप समझिए।

मैंने आपसे यह निवेदन किया कि आप मनुष्य जीवन की वैल्यू समझिए और उसको किसी अच्छे काम में लगाइए। आपके पास 24 घण्टे होते हैं, 24 घण्टे में 6 घण्टे आप सो लीजिए और 8 घण्टे या 6 घण्टे आपके जीवन के उपार्जन के लिए हैं।

इससे ज्यादा तो आप काम क्या करेंगे? हमें मालूम है कितना काम करते हैं?

फाइल-की-फाइल पड़ी रहती हैं। सिवाय गपशप के और कुछ नहीं होता। सब मिलाकर 8 घण्टे का काम 2 घण्टे में हो सकता है। 2 घण्टे से ज्यादा नहीं होता। लग करके आदमी काम करे, फिर काम रह जाएगा क्या, बिलकुल काम नहीं रह सकता।

अपना मूल्य बढ़ाइए

एक सज्जन थे। बहुत पुरानी बात मुझे याद आ गई। वे पाकिस्तान से आए हुए थे। उनका नाम लालचन्द था। लालचन्द मेहरा था, ऐसा ही कुछ नाम था उनका? मुझे ठीक याद नहीं आ रहा। वे एक बार गुरुजी के पास आए। उन्होंने यह कहा कि देख लालचन्द ऐसा करना। उसने कहा—गुरुजी जो आप कहेंगे, वही मैं करूँगा।

उन्होंने कहा—बॉस के हाथ-पाँव तोड़ देने चाहिए। उन्होंने कहा—गुरुजी बॉस के हाथ-पाँव हम तोड़ देंगे तो हमारा क्या हाल होगा? फिर तो हम नौकरी कैसे करेंगे? जेल में जाएँगे। यह मतलब नहीं है मेरा, मेरा मतलब समझ ले। मैं क्या कह रहा हूँ? मैं यह कह रहा हूँ कि जो उसका काम है, उसके काम को छीनने की कोशिश कर। छीनने का मतलब काम करने की कर्मठता होनी चाहिए।

उस समय बस वही ऑपरेटर थे, फिर ऑल इंडिया तार विभाग में चले गए। अब तो बेचारे चले गए होंगे, नहीं चले गए होते तो जरूर आते। वे खादी की धोती पहनते थे। खादी का दुपट्टा कन्धे पर पड़ा रहता था, तो मैं भी यह कहती कि इसी वेश में आप सर्विस में जाते हैं? हाँ माताजी! मैं इसी वेश में जाता हूँ। धोती-कुरते में ही जाता हूँ, इज्जत भी होती है। जो कोई भी साहब आए, वही सब रिमार्क लगाते हैं। सबसे वे कहते रहते हैं, लाइए साहब! हम बाजार जा रहे हैं, आपका काम कर लाएँगे। उनकी यह बहुत बड़ी विशेषता थी।

गुरुजी सैनिक प्रेस में थे। जिस दिन सैनिक प्रेस उन्होंने छोड़ा, उस दिन सबके सब ऐसे रोने लगे, जैसे कोई अपने किसी प्रियजन के न रहने पर रोते होंगे।

इस तरीके से रोते रहे, वे इतने जनप्रिय थे। उनको कभी अहंकार नहीं था। आप में से कभी कोई सज्जन उनसे मिले होंगे, पास में बैठाया होगा, पर यही नहीं मालूम पड़ा होगा कि यह गुरुजी हैं। इतने सादा, इतने सिंपल, कितने प्यार से बात कर रहे हैं, कैसे दुलार रहे हैं? अपने पास बैठा लेते। चारपाई में बैठे हैं, कभी उनको अपने अन्दर यह अहंकार नहीं आया कि हम कहाँ बैठें, कैसे बात करें? जैसे में हैं, वैसे बात करेंगे। बनियान पहने बैठे हैं तो उनको कभी ऐसा नहीं लगता था।

इसी तरीके से मैं आपको उनका उदाहरण सुना रही थी। उन्होंने जो मंत्र दिया, उन्होंने कहा कि यह मंत्र है, आप मंत्र समझ लें और इसको इस्तेमाल करें। वही इस्तेमाल किया और जो कोई भी आते गए, अक्सर वही रिमार्क लगाते हुए चले गए। इस लालचन्द को मत भूलना, यह बड़े कमाल का लड़का है। यह बहुत ही सज्जन है, ईमानदार है। यह बहुत प्यारा लड़का है। जो गए सो ही लगाते गए। ऊँचा उठता हुआ चला गया। कहाँ-से-कहाँ तक पहुँच गया। कैसे पहुँच गया? अपने पुरुषार्थ से और अपनी भावना से।

भावनाशून्य न बनें

भावनाशून्य व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। भावनाशून्य तो शासन कर सकता है, सख्ती बरत सकता है, पर किसी को अपना नहीं बना सकता। सख्ती से अपना नहीं बनता, मुलायमियत से अपना बनता है, प्यार से अपना बनता है। यह सारी-की-सारी भीड़ इतनी दिख रही है, इतनी लाखों की जो भीड़ है उन्होंने क्या दिया? उन्होंने प्यार दिया, भावनाएँ दीं। उन्होंने सिद्धान्त दिए और उन्होंने साहित्य दिया। दिमाग की धुलाई के रूप में जो काम करे, उन्होंने उस साहित्य की रचना की।

चारों वेदों से लेकर 108 उपनिषद्, 6 दर्शन, 18 पुराण लिखे और आपकी अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना ये सब उन्हीं के तो हैं और इतना सब कुछ वे लिख करके रख गए। अब तो केवल खाने की बारी है। केवल खाना भर है, आपको पकाना नहीं है, खाना है और खिलाना है। इसको खाइए भी और खिलाइए भी।

भावनाओं में एकता

आज उनकी तीसरी पुण्यतिथि है। आपको याद होगा कि मैंने एक बात यह कही थी कि कइयों ने यह कहा कि आप और गुरुजी में अन्तर है? हाँ, मैंने कहा अन्तर है, जरूर अन्तर है। उम्र में अन्तर है, लेकिन भावनाओं में अन्तर नहीं है, सिद्धान्तों में अन्तर नहीं है। सुकन्या थी और च्यवन ऋषि थे। च्यवन ऋषि तपश्चर्या कर रहे थे और मिट्टी का ढेर उनके सर तक चला गया था। केवल आँखों का हिस्सा बचा था। उस सुकन्या के द्वारा दोनों आँखों को क्षति पहुँची। मालूम है सुकन्या ने क्या किया? सुकन्या ने कहा कि यह ऋषि हैं, ये सन्त है, ये भगवान हैं, इनको मैं वरूँगी और मैं इनकी आँखें बनूँगी, मैं इनकी लाठी बनूँगी, मैं इनके साथ-साथ चलूँगी।

ऐसा तो मैंने कुछ नहीं किया, लेकिन मेरी भावनाएँ हैं, मेरी विचारणा है और मेरा सिद्धान्त कम नहीं है। उसूलों के लिए मर मिटना भी मुझको आता है। भावुक भी बहुत हूँ और कठोर भी बहुत हूँ। भावुक भी इतनी हूँ कि मैं किसी का दुःख, पीड़ा नहीं देख सकती, लेकिन यह सारा दृश्य मैं देखती रही और मैं पाषाण के तरीके से बैठी भी रही।

वे कहा करते थे कि मैं नहीं रहूँगा तो तुम जिन्दा नहीं रहोगी। मालूम है कि तुम जरूर कोई कदम ऐसा उठाओगी। तुम ऐसा कोई कदम नहीं उठाओगी, यह मुझे वचन दो। मैंने कहा कि नहीं! जो आप कह रहे हैं वही होगा। उन्होंने कहा कि रामकृष्ण परमहंस की पत्नी ने 30 साल तक मिशन की सेवा की थी और तुम वादा करो कि इस मिशन की सेवा करोगी। मैंने कहा यह मेरा परम कर्तव्य है और मेरा धर्म है, आपने जो कहा है, उसको मैं जरूर पूरा करूँगी।

चलते समय मैंने उनसे एक ही चीज माँगी कि मुझे आप शक्ति देना बस, और कुछ मुझे नहीं चाहिए। आपकी शक्ति मेरे साथ है, मेरे अंतरंग में विराजमान है तो फिर मैं कर दिखाऊँगी। तो फिर एक माँ को जो करना चाहिए, तो माँ की हैसियत से इतना बड़ा परिवार जो आप बना करके गए, अपने बच्चों को, परिवार को मैं सँभाल लूँगी।

वे कहते भी थे कि माताजी तो रानी मक्खी हैं, इतना बड़ा परिवार है इनका। कभी विनोद में कहा करते थे तो मैंने कहा कि आपने तो विनोद में कहा था और मैं इसको करके दिखा दूँगी। शरीर नहीं चलेगा तब भी इसको डण्डे मार-मार करके चला लूँगी और मैं चलाती भी हूँ। इस उम्र में चलने में परेशानी होती है, पर मैं कहाँ-से-कहाँ धावा भरती रहती हूँ।

हमारा मनोबल अटूट है

अश्वमेध यज्ञ हो रहे हैं, मैं कभी घर से निकली थी? मैं कभी घर में से नहीं निकली। उनके साथ ही कभी गई थी। कभी गुजरात वगैरह जहाँ कहीं भी कार्यक्रम हुए। हजार कुण्डीय यज्ञ हुए थे, वहाँ-वहाँ मैं सब जगह उनके साथ गईं थी। अकेला जाना मैंने पसन्द कभी नहीं किया। मैं कभी नहीं गई, लेकिन अब मैंने कहा कि नहीं जहाँ भी अश्वमेध यज्ञ होंगे, वहाँ जरूर जाऊँगी। चाहे यहाँ हों या विदेश में हों, कहीं भी हों, पर मैं जरूर जाऊँगी।

बच्चों ने कहा मत जाइए आपकी स्थिति ऐसी नहीं है कि आप जाएँ। हमने कहा स्थिति क्या होती है? किस चिड़िया का नाम है? हमारे अंतरंग में साहस है। हर स्थिति में तुम हमारा मनोबल गिरा रहे हो?

हमारे मनोबल को गिराओ मत। हम जाएँगे, हर जगह जाएँगे और हर जगह ही पहुँच रहे हैं। चार जगह तो हो आए और तीन जगह अभी-अभी जा रहे हैं। लन्दन जा रहे हैं, टोरण्टो जा रहे हैं, अमेरिका जा रहे हैं और फिर अपने यहाँ के हो गए, लखनऊ का हो गया और आपका नागपुर का हो गया, जाने कहाँ-कहाँ के हो गए, ढेरों हो गए। पूरे साल के बुक हैं, उसमें जाना पड़ेगा। हाँ कह दिया है तो जाना ही पड़ेगा या तो हम कहते ही नहीं, जबान से निकालते ही नहीं। वह तीर है, निकल गया तो निकल गया, अब वापस तो होता नहीं। भाई हम तो वापस नहीं करेंगे। हम तो अब जाएँगे, सब जगह जाएँगे। इसी उत्साह से आप भी जहाँ कार्यक्रम हो रहे हैं, वहाँ पूरे उत्साह के साथ पूरे कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए काम करेंगे, यह मुझे उम्मीद है।

जब आपकी माँ का साहस कम नहीं हुआ है तो बेटों का, बेटियों का क्यों होना चाहिए? आप में से कितनों के लिए कितने स्वप्न उन्होंने सँजोए थे कि इनमें से कितने एकलव्य बनेंगे, कितने विवेकानन्द बनेंगे और कितनी ये लड़कियाँ सिस्टर निवेदिता बनेंगी? उन्होंने केवल कल्पना ही नहीं की थी, श्रम भी तुम्हारे लिए किया है।

ऐसे ही बन करके दिखाओ, इन लड़कियों को भी महिला जागरण के लिए जो समय इनका बचता है, 1 बजे से 3 बजे तक का, उसमें 2-3 घण्टे यह महिला जागरण का काम कर सकती हैं। इनको साक्षरता सिखा सकती हैं और अपने मिशन की जो कार्यप्रणाली है उनको बता सकती हैं। गृह उद्योग बता सकती हैं।

नारी का सम्मान करें

इस तरीके से इन महिलाओं को भी निकलने दो। इनको काम की गुड़िया मत बनाओ। गुड़िया बनाकर के घर में मत बिठा लो। जैसे तुम हो, वैसे ही ये हैं। नहीं साहब! नर में और नारी में तो अन्तर है। क्या अन्तर है। तुम कमाते हो, यही अन्तर है न, इसीलिए धौंस जमा रहे हो, इसीलिए उसके ऊपर साहबजादे बन रहे हो? अरे! वह घर में कमाती है। यदि घर को सँभाल के न रखे तो सारा सत्यानाश हो जाए, बिलकुल चौपट हो जाए। ला खाना पकाने वाली, ला कपड़े धोने वाली, झाड़ू वाली लाओ और आपकी सेहत की देख-भाल करने वाली लाओ, डॉक्टर लाओ, लाओ इतना?

कितना खर्च होगा, जरा बताना? और चूल्हे-चौके पर जो पैसा खरच होता है, उसमें से बचाती रहती है और भी अपव्यय होता है, उसमें से भी बचाती है। उसके लिए कोई और बचाएगी? पत्नी बचाती है। आप जानते नहीं हैं कि पत्नी पति से ज्यादा कमाती है। क्यों वह कमाती नहीं है? आपने तो उसके सिर पर वे दायित्व रख दिए हैं—बच्चा-बच्ची का पालन करने का।

एक तो वे सब हैं, साथ में बच्चे-कच्चे और। जो पति है वह भी एक बच्चे से ज्यादा है। बच्चों में तो तमाचा लगा करके तब भी ठीक कर दे, पर उस देवता से तो कुछ कह भी नहीं सकते सिवाय उसको सुनने के, एक शब्द भी मुँह में से नहीं निकाल सकती। लो जी अच्छा तुमने यह समझ लिया कि यह एक नौकरानी है? तुम नौकरानी खरीद के लाए हो? अरे! इसके माँ-बाप ने बाइज्जत आपको इसे दिया है, इज्जत से दिया है और तुम्हारी तो गरदन नीची होनी चाहिए; क्योंकि दहेज में पैसा लिया है।

आपने दहेज में पैसा लिया है, इसलिए आप खरीदे हुए गुलाम हो। वास्तव में जो काम पत्नी करती है, वह काम आप लोगों को करना चाहिए। इसलिए करना चाहिए कि उस बेचारी ने सब दिया है। आपने कुछ दिया नहीं, इस तरीके से बेटा नर और नारी दोनों एक हैं। दोनों को एकदूसरे का पूरक होना चाहिए। उनको पूरक बनाओ, नहीं तो बिलकुल गई-गुजरी स्थिति में हो जाएँगी। उनको गई-गुजरी स्थिति में न रखो, कम-से-कम हमारे गायत्री परिवार के जो हैं, वे तो कम-से-कम इस बात को अच्छी तरीके से समझ लें कि गुरुजी ने कभी किसी को अपने से छोटा नहीं माना।

हम में से कभी भी न मेरे अन्दर यह भाव आया कि वे मुझसे बड़े हैं और न उनको कभी मेरे प्रति यह भाव आया कि मुझसे छोटी हैं। कभी भी नहीं आया। वे हमेशा माताजी ही कहते रहे, अकेले में भी कहते रहे, सबके सामने भी कहते रहे—उन्होंने कहा कि इनके अन्दर माँ की जैसी ममता है, इसलिए मैं इनको माताजी कहता हूँ और सब लोग माताजी तो कहेंगे ही, पर वे स्वयं कहते थे। बेटा! इतना बड़ा सम्मान देना हर किसी के बूते की बात नहीं है।

आप माँ नहीं कह सकते तो कम-से-कम बराबर के तरीके से तो रहने दीजिए। उसको जरा साँस तो लेने दीजिए। आप तो साँसों पर भी प्रतिबन्ध लगाते हैं। आप तो उसको बिलकुल दबा के रखना चाहते हैं। मार-पीट करके रखना चाहते हैं। तो आप कौन हैं जो मारेंगे-पीटेंगे? उसके हाथ में डण्डा दे दो, फिर तुमको होश में न कर दे तो कहना।

एक लड़का था। यहाँ शायद बैठा हो, कहीं हो तो सुन रहा होगा। वह अपनी पत्नी को जरा पीट-पाट के आया। पत्नी आई और बोली कि देखिए माताजी! मेरे यहाँ लग गई, वह नहीं मानता। मैंने कहा अच्छा! मैंने उसे अपने पास बुलाया। मैं हाथ नहीं उठाती। पहले तो उसको बुला करके अपने पास बैठाया और फिर मैंने उसके गाल पर तीन-चार तमाचे जमाए। मैंने अच्छी तरह से बताया कि बेटा जी कैसा लगा तुझे।

अब वह तो कुछ समझ भी नहीं पाया कि मुझको तमाचे क्यों पड़े? मैंने कहा बता कि तूने अपनी औरत के साथ में ऐसा क्यों किया, बता उसको क्यों मारा? कोई चौपाया है? आखिर वह कौन है, इसके ऊपर तूने हाथ क्यों उठाया? अब आगे हाथ उठाया तो तेरे हाथ को तोड़ दूँगी। आज तो चार तमाचे पड़े हैं और अब की बार आएगा तो अच्छी तरह से डण्डा पड़ेगा।

माँ के बच्चों के लिए शब्द

मैंने आपसे एक ही निवेदन किया। मैंने थोड़े कड़े शब्द कह दिए, ताकि आपके दिल और दिमाग खुल जाएँ, इसलिए मैंने कड़े शब्द कहे हैं। मुझे आप लोग बहुत प्यारे लगते हैं। मेरे बच्चे हैं, मेरी बच्चियाँ हैं, तो मुझे प्राणों से भी ज्यादा प्रिय हैं। मैं इनके लिए कड़े शब्द क्यों कहूँ? पर कभी-कभी कहने भी पड़ते हैं। उनको सही रास्ते पर चलाने के लिए कुछ तो करना ही पड़ता है। आपको एक दिशाधारा देने के लिए मैंने कुछ शब्द ऐसे भी कहे हैं, जो मुझे नहीं कहने चाहिए, पर मैं कह गई इस नाते से कि एक माँ बैठी है और आप बच्चे बैठे हैं। बच्चे बैठे हैं तो सुनेंगे ही और क्या करें इसलिए मैंने आपसे कहा है।

आज बहुत भावनापूर्ण पर्व है। गायत्री जयन्ती और गुरुजी की पुण्यतिथि है। दोनों दृष्टि से यह पर्व हमारे जीवन में बहुत महत्त्व रखता है। ये अंतरंग में जाने का पर्व है। बाहरी नहीं, वरन अंतरंग में विचार करने का है कि हमको क्या करना चाहिए? उनकी यह पुण्यतिथि है। आइए, हम सब उनके लिए श्रद्धा-सुमन चढ़ाएँ और एक गीत है, उसको मैं आपके सामने प्रस्तुत करूँगी—

मेरी अनन्त आत्मा का यह विश्वास है,
मेरा उपास्य तो प्रतिक्षण मेरे पास है ॥

कितने युग बीते इस दासी को राह में,
फिर भी आई न कमी अपनी इस चाह में।

अब भी तो महामिलन की निश्चित आस है,
मेरा उपास्य तो प्रतिक्षण मेरे पास है ॥

मेरा भगवन् तो कालदर्शी और युगद्रष्टा,
वही मेरा स्वर्णिम अतीत है।

वही तो मेरे वर्तमान का हास है,
मेरा उपास्य तो प्रतिक्षण मेरे पास है ॥

वह बसता है तन में, मन में और आत्मा में,
जो कुछ उसमें वह नहीं इसी परमात्मा में।

वही मेरे जीवन का पूर्ण विकास है,
मेरा उपास्य तो प्रतिक्षण मेरे पास है ॥

साँसों में जीवित है बन्दी है प्राण में,
बनकर सुवास छाया रहता है प्राण में।

तन में चेतन का मन में मधुमय वास है,
मेरा उपास्य तो प्रतिक्षण मेरे पास है ॥

सुख में वह हँसता साथ मेरे दुःख में रोता,
वह नित प्रातः उठता साथ-साथ ही है सोता।

ममता का हाथ और करुणा का विश्वास है,
मेरा उपास्य तो प्रतिक्षण मेरे पास है ॥

है अन्तिम चाह पूरी भी हो ही जाएगी,
यह आत्मा अन्तिम गति उसमें ही पाएगी।

मेरी सरिता को सागर का विश्वास है,
मेरा उपास्य तो प्रतिक्षण मेरे पास है ॥

बादल बरसते हैं तो पक्षपात नहीं होता है

जहाँ तालाब होता है, तालाब भर जाता है। जहाँ कहीं गड्ढा होता है, गड्ढा भर जाता है। समतल जमीन होती है तो समतल पर बह जाता है। कटोरा-कटोरी होते हैं तो वह जितनी उनकी पात्रता है, उतना उसमें जल आता हुआ चला जाता है।

उनकी करुणा, उनकी दया, उनकी ममता, उनकी उदारता, उनकी सहजता का द्वार हमेशा-हमेशा के लिए खुला हुआ है। जो भी आएगा, वह सब इसको पाएगा। मैं ही अधिकारी नहीं हूँ, आप भी अधिकारी हैं। मैं अधिकारी और तरीके से हूँ। वे मेरे पति भी थे और मेरे भगवान भी थे। मैंने भगवान को नहीं देखा। भगवान तो बोलता भी नहीं है, वे भगवान तो बोलते भी थे।

वे मार्गदर्शक भी थे, वे प्रेरणा भी थे। मैं उन्हें गुरु भी कहती हूँ, गुरुजी भी कहती हूँ। क्या मतलब है, क्यों कहती हूँ गुरुजी? इसलिए कहती हूँ कि हर पल, हर समय उनकी प्रेरणा मुझको मिलती रहती है। कोई भी क्षण ऐसा नहीं होता, जिस क्षण मुझको ऐसा लगता हो कि वे मेरे पास नहीं हैं। मुझे दिखाई भी पड़ता है। आप यह कहेंगे कि आपका दिमाग खराब हो गया। आप पागल हो गई हैं, इसलिए आप ऐसा कहती हैं।

नहीं, बेटा मैं पागलपन नहीं दिखाती, किसी को मैं यह नहीं कहती और कोई कहता है, तो मैं उसको झिड़क देती हूँ; लेकिन मेरी आँखें देखती रहती हैं और मेरी अंतरंग की जो आँखें हैं, वे हर समय अपने समीप अपने उपास्य को, अपने आराध्य को पाती हैं।

इसी तरीके से भगवान करे आपका उपास्य, आपका आराध्य भी आपके समीप ऐसे ही रहे, जैसे वे मेरे समीप रहते हैं, वैसे ही आपके समीप भी रहें। इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ।

आज की बात समाप्त
॥ॐ शान्तिः॥