श्रद्धा के बीजारोपण की साधना

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधन साधकों के अन्तःकरण की उस अभीप्सा को पूर्ण करते हैं, जिसमें उनकी साधनात्मक क्षुधा भी तृप्त होती है और साथ ही उनके हृदय में कुछ अच्छा करने की और ऊपर उठने की आकांक्षा भी बलवती होती है। उनका ये प्रस्तुत उद्बोधन नवरात्र के पावन काल में एक ऐसी ही उमंग को जगाता हुआ दिखता है। वे कहती हैं कि नवरात्र की पावन वेला सन्धिकाल की वेला होती है और इस समय में की गई साधना तभी फलीभूत हो पाती है, जब हम अपनी साधना में श्रद्धा का और एकाग्रता का बीजारोपण कर पाते हैं। परमवन्दनीया माताजी कबीरदास जी का, मीरा का, स्वामी विवेकानन्द का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि आत्मा की पुकार सुनने वाले और भगवान से प्रेम करने वाले ही साधना के पथ पर सफलता को प्राप्त कर पाते हैं। वे हर साधक को गुरुदेव के जीवन से सीखने को प्रेरित भी करती हैं। आइए, हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.....

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

श्रद्धा का बीजारोपण

हमारे आत्मीय परिजनो ! चैत्र के और आश्विन के जो नवरात्र होते हैं, इनको हमारे यहाँ सन्धिवेला कहते हैं। सन्धिवेला का मतलब है—दो ऋतुओं का मिलन, जैसे कि सरदियों का समापन और गरमी का आगमन। उधर गरमी का समापन होता है और इधर सरदियों का आगमन होता है। उसको हम सन्धिवेला कहते हैं।

सन्धिवेला के जो ये दोनों नवरात्र हैं, ये अपने आपमें बहुत महत्त्व रखते हैं। इनमें जो भी उपासना की जाती है वह यदि मन लगा करके की गई है, श्रद्धा के साथ की गई है तो फलीभूत अवश्य होती है।

यदि श्रद्धा को नहीं लगाया गया है तो फिर उसके हाथ कुछ नहीं लगना है। क्यों साहब ! हम 27 माला रोज करेंगे, तब भी कुछ नहीं लगना है। हाँ, तब भी कुछ नहीं लगना है; क्योंकि आपने अपने इष्ट के लिए श्रद्धा का बीजारोपण तो किया ही नहीं, आपने श्रद्धा को नहीं लगाया, आपने अपनी निष्ठा को नहीं लगाया।

माला तो जरूर फेरी, आपने ढाई घण्टा तो जरूर लगाया, लेकिन वह तो आपका निरर्थक चला गया। क्यों साहब ! निरर्थक कैसे चला गया? आप और आपके इष्ट एकाकार नहीं हुए न? आपने अपना सब कुछ इष्ट के तईं समर्पित कहाँ किया? आपका प्रेम इष्ट के प्रति कहाँ रहा है? आपका मन तो न मालूम कहाँ-कहाँ डाल-डाल और पात-पात पर डोल रहा है। कभी घरवालों की याद आएगी, कभी बच्चों की याद आएगी।

बहुत दिन हो गए, इसी तरह नवरात्र का अनुष्ठान हो रहा था, तो एक लड़का—एक-दो दिन तो चुप रहा, लेकिन तीसरे दिन बोला—माताजी ! मुझे तो घर की बहुत याद आ रही है। तो बेटा! तू अभी जा, तुरन्त जा, तेरे दिमाग में घरवालों की याद सता रही है तो तू अच्छी तरह से मन लगा करके अनुष्ठान कर ही नहीं सकता।

अगर जीभ पर काबू नहीं है, यहाँ के प्रसाद पर विश्वास नहीं है कि हमें जो यहाँ भोजन मिल रहा है, वह भोजन नहीं, प्रसाद मिल रहा है और इस प्रसाद से हमको बल मिलेगा, हमें शक्ति मिलेगी। यह न करके आप बाहर जाते हैं और वहाँ बाहर कुछ खाकर के आते हैं। बाहर क्यों खाते हैं, जबकि हमने एक टाइम का भोजन आपके लिए भरपूर रखा है।

जितना आपके पेट में समाये, उतना आप खा लीजिए, नहीं तो जैसे कोई फलों पर अनुष्ठान करते हैं, कोई दूध पर करते हैं, कोई काहे पर करते हैं, पर आपके लिए तो इतनी छूट है कि आप लोग यहाँ चौके में जो भोजन बनता है, आप इसी में अपनी तृप्ति को मानिए। इसी में आप तृप्त हो जाइए कि हमें जो प्रसाद मिल रहा है, भरपेट मिल रहा है और यह प्रसाद हमें जिन्दगी भर काम देगा। इस बात को आपने अपने मन में रखा कहाँ? आप तो बाहर गए और देखा कि समोसा सिक रहा है तो चलो खा लें, साहब! नहीं माताजी देख रही हैं।

एकाग्र होकर साधना करें

यहाँ प्राण प्रत्यावर्तन सत्र चल रहा था, तो पहले ऐसा था कि किसी साधक को बाहर नहीं निकलने देते थे। तब 5 दिन का सत्र होता था। पाँचों दिन उसको यहीं रहना था। जो कुछ है यहीं चिन्तन-मनन कर, अपने से विचार कर कि आखिर भगवान ने मनुष्य का शरीर दिया है तो किसी के काम आएगा कि नहीं आएगा। किसी को बाहर नहीं जाने देते थे।

मेरे यहाँ एक खिड़की थी और मैं उससे देखती रहती थी। भूला-भटका जो कोई बाहर दिखा, मैंने झट किसी से बुलवाया और फिर उससे सवाल-जवाब किया कि तू क्यों जा रहा था? क्या कारण था जो बाहर जा रहा था। जब मना कर दिया गया है कि आप मत जाइए, आप गंगा जी मत जाइए, कहीं मत जाइए।

जहाँ आप बैठे हैं, यहीं आपका सप्त सरोवर है, यहीं आपकी गंगा जी हैं। यहाँ गंगा जी के कुएँ हैं। सब कुछ यहाँ आपके लिए मुहैया है, फिर आप क्यों भागते हैं वहाँ? वहाँ भागने से आपका क्या भला होगा? नहीं साहब ! हम गंगा जी नहाएँगे तो हमारा बहुत भला हो सकता है, सारे पाप कट जाएँगे।

नहीं साहब! आपका एक भी पाप दूर नहीं होगा, जरा भी नहीं होगा। क्यों नहीं होगा? क्योंकि आपने पाप को हटाने की कोशिश तो की नहीं और समझ लिया कि नहाने से हमारे पाप चले जाएँगे। नहाने से कैसे पाप चले जाएँगे? नहाने से होता तो मछली भी उसी में रहती है, तो मछली क्यों नहीं तर जाती है? एक गाना बहुत अच्छा है, मुझे पूरा याद नहीं रहा, ये आर्य समाज का है। आर्य समाजवालों ने इसे बनाया था।

इसमें उन्होंने कहा है—गंगा के नहाये से क्या पापी नर तरते हैं, तो मीन क्यों न तरी जाको जल में ही घर है। शंख के बजाये क्या पापी नर तरते हैं, तो गधा क्यों न तरा, जिसका शंख-सा ही सुर है। उसका तो शंख-सा सुर है, वह क्यों नहीं तरता है? इसमें भावना मिलाने की जरूरत है। इसमें श्रद्धा को मिलाने की जरूरत है।

श्रद्धा इष्ट से मिलाएँ

यदि आपने अपनी श्रद्धा इष्ट के लिए मिला दी है, तो फिर आप उसे पा जाएँगे। कबीर ने, मीरा ने और दादू ने तथा अन्य भक्तों ने, जिन्होंने पाया है, उसे श्रद्धा के बल पर पाया है। अच्छा तो बताइए मीरा कहाँ तक पढ़ी थी? बिना पढ़ी-लिखी थी? लेकिन भक्ति के क्षेत्र में वह आगे रही और नारी जागरण का बहुत काम मीरा ने किया है। इसी तरीके से शबरी कहाँ तक पढ़ी थी? लेकिन भगवान राम शबरी के यहाँ गए और शबरी के यहाँ जाकर के जूठे बेर खाए।

क्यों साहब? ऐसा क्या आन पड़ा था? क्या उनके लिए और कुछ खाने को नहीं था? खाने को सब कुछ था, लेकिन भक्त की भावना खाने को कहीं भी नहीं थी।

वहाँ भक्त की भावनाएँ थीं और उसकी श्रद्धा थी। पढ़ी-लिखी भी नहीं थी। बहुत श्लोक जानती हो और कर्मकाण्ड जानती हो, वह बेचारी कुछ नहीं जानती थी। वह मतंग ऋषि के आश्रम में रहती थी, अछूत थी।

वह इतना भर जानती थी कि जिस रास्ते से मतंग ऋषि जाएँगे और उनके शिष्य जाएँगे तो कहीं काँटा न लग जाए। तो वह उनके गंगास्नान जाने से पहले ही झाडू लगाया करती थी। झाड़ू लगाने का उसका यह नित्य क्रम था और साथ ही वहाँ रोज फूल लगाने का भी था कि कभी भगवान राम मेरे घर आएँगे। भला कैसे राम आएँगे जरा बताइए? पर उसकी भावना थी और उसकी श्रद्धा थी।

भगवान राम शबरी के यहाँ पहुँचे और भगवान कृष्ण मीरा के पास पहुँचे। मीरा ने अपनी श्रद्धा के बल पर पत्थर के टुकड़े में से कृष्णगोपाल निकाल लिया। उसने श्रद्धा से पैदा किया और ऐसा पैदा किया कि भगवान उसके साथ नाचता भी था और भगवान गरल भी पीता था, जहर भी पीता था। मीरा के लिए जहर दिया गया, पर मीरा ने नहीं, कृष्ण ने उस जहर को पिया। जहर उसके लिए अमृत हो गया। किसने पिया? उसे भगवान कृष्ण ने पिया है।

एक जगह एक उदाहरण आता है। मुझे याद नहीं रहा जरा कि किसी को चोट मारी तो वह कृष्ण की पीठ पर जा करके लगी। साँप छोड़ा था, तो उसने जब भक्त को काटा, तो उसके बजाय भगवान की उँगली नीली पड़ गई, ऐसा सुना गया है। श्रद्धा के बल पर ही रामकृष्ण परमहंस ने एक काले पत्थर में से काली को उत्पन्न किया और वे कालीमय होते हुए चले गए। कौन? रामकृष्ण परमहंस।

विवेकानन्द का भी ऐसा ही हाल हुआ। विवेकानन्द एक नौकरी माँगने के लिए गए और उन्होंने यह कहा कि बेटा मेरे पास तो नौकरी नहीं है, तू काली माँ के पास चला जा और जब उन्होंने काली माँ का विराट स्वरूप जो देखा, तो वहीं वे माँ के चरणों पर गिर पड़े। उन्होंने कहा कि बस, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरी परीक्षा ली गई थी, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे तो केवल अपने गुरु का काम करना है, अपने भगवान का काम करना है। वे कितने ऊँचे उठते हुए चले गए।

विवेकानन्द की एक शिष्या थी—सिस्टर निवेदिता, जो अपने देश को छोड़ करके हिन्दुस्तान में आई और हिन्दुस्तान में आ करके उसने नारी जागरण का बहुत कार्य किया, बहुत काम किया। हमारे समय में तो भैया महिलाएँ अपने घर में से निकलती भी नहीं हैं।

नारियों को आज तो कामुकता की गुड़िया बना दिया गया है, चाहे जैसे इस गुड़िया को नाच नचाओ और चाहे जो ला दो पहनने के लिए, बस सजने-धजने को वह अपना स्वरूप समझने लगती है कि हमारा जो स्वरूप है, वह सजने-धजने का है। एक और दूसरा काम है बाल-बच्चे पैदा करने का, दो ही काम हैं और बाकी की जो आत्मा की भूख है वह?

नहीं आत्मा की कोई भूख नहीं होती है। नहीं साहब ! आत्मा की भूख होती है। परमात्मा को पाने के लिए आत्मा की भूख होती है। आत्मा जब ऊँची उठती है तो स्वतः ही उसका व्यक्तित्व ऊँचा उठता हुआ चला जाता है। जब तक उसकी आत्मा की भूख पूरी नहीं होती, आत्मिक दृष्टि से वह ऊँचा नहीं उठता है तो वह बौना ही बना रहता है। फिर ऊँचा कैसे उठेगा?

आत्मा की पुकार सुनें

बेटे ! जो व्यक्ति अपनी आत्मा की पुकार को स्वतः ही सुनेगा, अपने सोये हुए भगवान को स्वयं ही जगाएगा, तो फिर भगवान उसका साथ देता हुआ चला जाएगा। जैसा कि मैंने अभी कहा था कि मीरा के भगवान ने उसका साथ दिया और उसने कहा—सखी री मैंने गिरधर लीनो मोल।

तुमने किससे मोल लिया है? और कितने दामों में लिया है, कितने रुपये में लिया है? उसने कहा कि नहीं मेरा भगवान बिकता नहीं है। मेरे भगवान की तो प्रेम और निष्ठा के साथ, श्रद्धा के साथ शादी होती है और उसी से वह बिकता है।

उन्होंने कहा—सखी री मैंने लीणो गिरधर मोल, काहे से? श्रद्धा से। श्रद्धा से लीन्हा प्रेम तराजू तोल, प्रेम की तराजू में मैंने तोला है। उन्होंने पहले एक और बात कही। उन्होंने कहा—सखी री मैंने गिरधर नौकर राखो सी, चाकर राखो सी। मैंने तो चाकर रखा है भगवान को। अरे चाकर तो प्रोविडेंट फंड माँगेगा, न जाने क्या- क्या माँगेगा? ये भी बेकार है तो फिर क्या करना चाहिए? भगवान को मोल ले लेना चाहिए। अच्छा मोल ले लिया भगवान को।

मैं आपको यह बात बता रही हूँ, जो वास्तविकता है। इसमें आपकी श्रद्धा अटूट है कि नहीं है? आप जिस समय जप कर रहे हैं, उस समय आपकी भावनाएँ कहाँ हैं? आपकी भावनाएँ घर- गृहस्थी के अन्दर घूम रही हैं, व्यापार में घूम रही हैं या अपने इष्ट के प्रति लगाव है आपका? जहाँ प्रेम होता है, वहीं मन भागता है। व्यापार में मन होगा, तो व्यापार में भागेगा। नौकरी में होगा, तो नौकरी में भागेगा। बीबी-बच्चों में होगा, तो बीबी-बच्चों में भागेगा। वह तो वहाँ भागेगा, इष्ट के प्रति है कहाँ?

करें भगवान से प्रेम

भगवान के प्रति हमारा प्रेम है कहाँ? यदि हमारा प्रेम सच्चा है तो भगवान हम से दूर नहीं है। तो अब आप कहेंगे कि यह बताइए कि उसकी परिभाषा क्या है?

उसकी एक ही परिभाषा है और वो है सम्वेदना की परिभाषा। सम्वेदना के रूप में भगवान हमारे निकट आता हुआ चला जाता है और हम बनते हुए चले जाते हैं और दूसरों को बनाते हुए चले जाते हैं।

हमारे यहाँ मथुरा में एक पिसनहारी महिला हुई है। वह बालविधवा थी। जब वह विधवा हुई तो लोगों ने आ करके यह कहा कि हम तुम्हारा भरण-पोषण करेंगे और हम तुम्हारे साथ हैं। हम तुम्हारे भाई-बहन हैं। कोई उसके भाई तो थे नहीं और पिता भी नहीं थे। अकेली महिला थी, तो उसने कहा कि देखो भाई आप सब हैं तो जरूर, लेकिन आपकी मुझे आवश्यकता नहीं है। मेरे दो हाथ हैं, यही मेरे दोनों भाई हैं। एक मेरा परमार्थ करेगा, दूसरा पुरुषार्थ करेगा। उसने चक्की पीस करके ही इतने पैसे इकट्ठे कर लिए थे, जिससे उसने एक कुआँ बनवाया।

पिसनहारी का कुआँ

सारे मथुरा में खारे पानी के कुआँ हैं और वह एक ही कुआँ सारे मथुरा में मीठे पानी का है। वही एक कुआँ मीठा है। आज तो होटलों में बरात ठहरती है। धर्मशाला तो कोई बुक कराता ही नहीं है, होटल होते हैं।

पहले तो धर्मशाला में या पेड़ों के नीचे ही बरात पड़ी रहती थी, तो वहाँ पेड़ लगा दिए गए। और छाया में बरात ठहरती थी और उस कुएँ का पानी इतना मीठा था कि सारे कुएँ एक तरफ और वह कुआँ एक तरफ।

ये क्या हो गया? ये उसका समाज के प्रति और व्यक्तियों के प्रति प्रेम था कि मानव जाति के लिए मैं एक ऐसा काम करके जाऊँ, जिससे कि वे यहाँ कुएँ पर पानी पिएँगे। यहाँ ठहरेंगे। राहगीर यहाँ शान्ति पाएगा। उसे क्या मालूम था कि यहाँ इतना मीठा पानी निकल सकता है। देखो पिसनहारी एक महिला थी और इतनी गरीब होते हुए भी उसने कुछ अंश निकालना शुरू किया और उसी से यह सब हो गया है। यह उसकी निष्ठा और श्रद्धा थी।

हमारी श्रद्धा कहाँ तक है? हमारी श्रद्धा तो इसी के लायक है कि हमें बच्चा दे दीजिए या हमें नौकरी दे दीजिए या अमुक दे दीजिए। ये तो पुरुषार्थ से भी कमाया जा सकता है। एक बच्चे की बात तो हम नहीं कहेंगे, पर बाकी का तो हम यह कह सकते हैं कि यदि हमारे अन्दर सामर्थ्य है, पुरुषार्थ है, तो हर चीज मुहैया करा सकते हैं। पुरुषार्थ होना चाहिए।

फिर भगवान से हम ये क्यों माँगें? भगवान से माँगें तो हम वह चीज माँगें, ताकि हम तो निहाल हों ही, आने वाले हमारे साथी, हमारे पड़ोसी, सारा का सारा हमारा समाज, हमारा राष्ट्र निहाल होता हुआ चला जाए।

लोकहित के लिए भावना जगाएँ

ये भावनाएँ रहती हैं क्या? कभी नहीं रहती हैं। यों तो मैंने सवेरे कहा था कि गंगा के किनारे जाओ, समुद्र के किनारे जाओ, घोंघे ढूँढ़ के लाओ, गंगा के किनारे जाओ और प्यासे ही चले आओ। जल बिच मीन पियासी, मोहि सुनि सुनि आवत हाँसी। ये गंगा के किनारे भी बैठे रहे और प्यासे भी चले आए।

ये क्या है? ये क्यों करके आए? ये गंगा के किनारे गए हैं तो गंगा जैसा पवित्र, उज्ज्वल, निरन्तर गतिशील रहने वाला ऐसा तो बनना ही चाहिए। यह गंगा का उदाहरण है। भगीरथ का उदाहरण है। भगीरथ और परशुराम ने तपस्या की थी और उन्होंने वरदान पाया, अपने लिए नहीं, लोकहित के लिए माँगा।

भगीरथ ने माँगा तो गंगा को पृथ्वी पर लाने में वे समर्थ हुए, जो पतितपावनी गंगा आज भी अनवरत रूप से अभी भी बह रही है। परशुराम और राम—ये दोनों एक ही समय के हैं। दोनों में कुछ झगड़ेबाजी हो गई। दोनों में कुछ लड़ाई-झगड़ा हो गया।

उन्होंने कहा—अच्छा तो तुम इस धनुष को उठा दो, तुम धनुष को उठा दोगे तो हम तुमसे दीक्षा ले लेंगे। तो उन्होंने कहा अच्छी बात है। उन्होंने उठा दिया, तो उन्होंने फिर दीक्षा ले ली। उन्होंने कहा कि आप तो ब्राह्मण हैं और मैं क्षत्रिय हूँ, तो यह ऐसे कैसे हो सकता है? नहीं, अब तो आपको देनी पड़ेगी? तो उन्होंने दीक्षा दी।

फिर उन्होंने कहा कि देखो ये फरसा जो आपको संहार के लिए दिया गया है, अब आप इससे मिट्टी खोदो। मिट्टी खोदी जाएगी। बिलकुल, जो हम कह रहे हैं, सो कह रहे हैं। जब आपने गुरु ही मान लिया है तो आपकी ये शक्तियाँ विनाश के लिए नहीं हैं। अब इस फरसे से आप मिट्टी खोदेंगे। अच्छा जी, मिट्टी खोदेंगे, फिर भगवान परशुराम हिमालय चले आए। यहाँ झोंपड़ी बनाई। उन्होंने चारों तरफ पौधे लगाए। पौधे लगाए तो राम जी आए।

उन्होंने कहा कि आप यह क्या कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि देखो जो मैं कर रहा हूँ न, यही तुम्हें करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं रचनात्मक दिशा में काम कर रहा हूँ, आप भी ऐसा करिए। अगले जन्म में आप मेरे गुरु बनेंगे और मैं आपका शिष्य बनूँगा। उन्होंने कहा—ऐसा कैसे हो सकता है? उन्होंने कहा ऐसा ही होगा। आप गुरु बनेंगे और मैं शिष्य बनूँगा। इस समय तो मैं गुरु हूँ आप शिष्य हैं, अगले जन्म में मैं गुरु बनूँगा।

गुरुदेव से सीखिए

यह उदाहरण पूर्णतया गुरुजी के ऊपर लागू होता है। उन्होंने सारी जिन्दगी रचनात्मक दिशा में सोचा और रचनात्मक दिशा में ही वे आगे बढ़ते हुए चले गए और जो उनसे जुड़े थे, उनको भी रचनात्मक दिशा में ही ले करके वे आगे बढ़ते हुए चले गए और उनको भी बढ़ाते हुए चले गए। जरा-जरा सी लड़कियाँ हैं, कहीं जा करके बोल देती हैं। कई बार उनका कितना स्वागत होता है, वे कितना काम करती हैं। गुजरात में चले जाइए, मैं समझती हूँ कि शायद ही ऐसा कोई घर होगा, जिसमें महिलाएँ घर से निकल करके बाहर न आई हों और काम न किया हो।

गुजरात को छोड़ दीजिए और भी अन्य प्रान्त हैं, जिनमें हमारी लड़कियाँ बहुत कुछ काम कर रही हैं। गुरुजी ने वह करके दिखा दिया कि हम क्या नहीं कर सकते हैं और हम क्या नहीं करा सकते हैं। कर भी सकते हैं और करा भी सकते हैं। उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी, जिसका नाम था—स्त्रियों का गायत्री अधिकार। उसका इतना विरोध हुआ कि सारे पण्डे-पुजारी एक हो गए और उधर में आर्यसमाजी अपने ढंग से और सनातनी अपने ढंग से सब विरोधी हो गए।

अरे ! बाबा हमने किसी का क्या बिगाड़ा है, हमने पुस्तक लिखी है तो ऐसा क्या गुनाह किया है? आप महिलाओं को यज्ञोपवीत पहनाते हैं। तो क्या हर्ज है? पुरुष पहन सकता है तो फिर महिलाएँ क्यों नहीं पहन सकती हैं? यदि पुरुष की दो शादियाँ, 3-3 शादियाँ हो जाती हैं और रखैल भी रख लेता है, तो मान लीजिए कोई बाल विधवा हो जाती है, तो उसकी शादी कर देंगे तो क्या हर्ज है? कोई अपने सतीत्व पर रहती है, बड़ी मेहरबानी, रहना ही चाहिए।

शादी एक बार होती है, पर मान लीजिए कोई ऐसी घटना घटित होती है, तो क्या जरूरी है कि वह सारी जिन्दगी अपनी उम्र ऐसे ही बिता दे। क्यों बिता दे? सारे नियम-कायदे केवल महिलाओं के लिए हैं, पुरुषों के लिए नहीं हैं। खराब तो पुरुषों के लिए भी हैं और महिलाओं के लिए भी हैं। यदि अच्छे हैं, तो फिर जो नियम उनके लिए लागू हैं, वही नियम उनके लिए लागू क्यों नहीं हैं?

(क्रमश: समापन अगले अंक में)

परमवन्दनीया माताजी की अमृतवाणी

श्रद्धा के बीजारोपण की साधना (उत्तरार्द्ध )

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि वे गहन आध्यात्मिक विषयों का समाधान करने में भी सक्षम हैं और एक जीवन की सामान्य उलझनों में उलझे व्यक्ति को ऊपर उठा पाने में भी सक्षम हैं। एक ऐसा ही जीवन का दिशा-निर्देश सुनिश्चित करने वाले अपने इस उद्बोधन में वन्दनीया माताजी प्रत्येक साधक को यह स्मरण दिलाती हैं कि नवरात्रि साधना का मूल आधार श्रद्धा के बीजारोपण में है। वे मीरा, पिसनहारी जैसे श्रद्धानिष्ठ एवं समर्पण के धनी व्यक्तित्वों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताती हैं कि हर वो व्यक्तित्व जिसने आत्मा की पुकार को सुना और अपनी श्रद्धा को इष्ट के सम्मुख समर्पित किया—उसके जीवन में चमत्कार घटित हो करके रहे। किसी भी साधना का मूल यदि किसी एक तत्त्व को कह करके पुकारा जा सकता है तो उसका नाम है—श्रद्धा, समर्पण, विश्वास। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को........

भगवान का व्रत

भगवान राम ने अश्वमेध यज्ञ किया था, तो उस समय वसिष्ठ जी ने कहा—‘‘राम ! बगैर पत्नी के यज्ञ सफल नहीं होता है। तुम दूसरी शादी कर लो।’’ राम ने पता है क्या कहा? उन्होंने कहा—‘‘मैंने एक पत्नीव्रत धारण किया है और मेरी तो सीता ही सब कुछ हैं।’’ उन्होंने कहा—‘‘सीता यहाँ कहाँ हैं?’’ तो उन्होंने एक सोने की मूर्ति बनवा करके यज्ञस्थल पर रख दी।

उन्होंने कहा कि ये मेरी पत्नी हैं। जो नियम हैं, वे सबके लिए एक से हैं। नहीं साहब ! पत्नी मरेगी तो कोई शोक नहीं मनाया जाएगा, कुछ नहीं होगा और पति न हो तो पत्नी को सती करा दिया जाएगा। सती प्रथा है, सती करा दिया जाएगा। क्यों साहब ! उसको क्यों कराया जाएगा? उसने आखिर क्या बिगाड़ा है?

आखिर बताइए, यह बुद्धिसंगत बात नहीं है। बुद्धिसंगत तो यह है कि जैसे कोई गलत कदम उठा रहे हैं, तो उस गलत कदम पर भी हमको सहयोग नहीं करना चाहिए। क्यों करेंगे? क्यों उस बेचारी ने क्या बिगाड़ा है? आपको मालूम नहीं है राजस्थान की एक घटना का? बहुत हंगामा मचा था, जब जबरदस्ती एक लड़की को उसके पति के साथ धकेल करके सती कर दिया गया।

उन दिनों जब शिविर चले तो मैं बहुत ही गुस्से में, बहुत ही आवेश में थी। जो सत्र होते थे, उनमें अक्सर मैं इसी बात को कहती थी। मैंने कहा—‘‘आज के बाद हम एक अध्यादेश लागू करने वाले हैं कि जिसकी पत्नी मर गई है, तो उस पत्नी के साथ उसके पति के हाथ-पाँव बाँधकर उसकी चिता में धकेल देना चाहिए।’’ क्यों? इसलिए कि दाल-आटे का भाव मालूम तो पड़ेगा कि पीड़ा कैसी होती है? दरद कैसा होता है? वह भी अपनी माँ की बेटी है, उसकी माँ को दरद नहीं होगा, तेरी माँ को होगा, तेरे बाप को होगा। तो इनको जरूर धकेलो। कम-से-कम 10, 20, 50 ऐसे धकेले जाएँगे, तो फिर जितनी भी ये सती प्रथा है सब एकदम बद हो जाएगी।

आस्था जगाएँ

मैंने कहा कि मैं तो भावनाओं की दृष्टि से यह कह रही थी। भावनाओं और आस्थाओं की दृष्टि से परिपक्व नारी हो या नर हो, दोनों के लिए मैंने आज सुबह के प्रवचन में यह कहा था। मैंने कहा कि दोनों एक हो जाओ। जैसे साल भर का शिशु अपनी माँ की गोद में ही खेलता है। माँ जो देती है, वही खाता-पीता है। वह अपनी माँ का दूध पीता है। आप एक छोटे से शिशु की भाँति बन जाइए। एक साल भर के शिशु बन जाइए और गायत्री माता की गोद में आप इस तरीके से अपना चिन्तन रखिए कि हम छोटे से बच्चे हैं और हमारी माँ हमको दूध पिला रही है।

माँ की जो आँखें हैं और आँख में जो काला बिन्दु है, वह एक ज्योति के समान चमक रहा है। यह ज्योति हमारे अंग-अंग को प्रकाशित कर रही है। सूर्य के अन्दर सूर्य का जो गोला है, उस गोले में गायत्री माता की जो छवि है, उस छवि को निहारो और उसमें यह भावना करो कि सूर्यमण्डल में गायत्री माता की छवि है, गायत्री माता हैं। इनका जो प्रकाश है वह हमारे सारे शरीर में, हमारे अन्तरंग में सब जगह व्याप्त हो रहा है। यदि हम ऐसा समझने लगें, ऐसा सोचने लगें, ऐसा विचार करने लगें और ऐसी हमारी आस्था हो, तो फिर भगवान दूर कहाँ है? फिर और ज्यादा फासला नहीं है।

एक बार ऐसा हुआ कि भगवान और लक्ष्मी, दोनों में शर्त लग गई। उन्होंने कहा—देखो आपको कौन भजता है और कौन मेरा सम्मान करता है? तो उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि पृथ्वी पर पहले तुम ही जाओ। वे आईं और जहाँ गईं, वहाँ धरती माँ जगमगाने लगीं, जहाँ जिसके घर पहुँच गईं, उसका घर निहाल होता हुआ चला गया।

फिर उन्होंने कहा—‘‘देख लीजिए भगवन् ! क्या हाल है? अब आप नीचे आइए और मैं ऊपर आती हूँ। आप नीचे पृथ्वीलोक पर जाइए।’’ जब भगवान पृथ्वीलोक आए, तो वहाँ जैसे ही वे आए तो पहले किसी में आस्था ही नहीं थी। थोड़ी-बहुत थी तो इतनी थी कि चलो हम उनके दर्शन कर आएँ।

अब वे मथुरा पहुँचे। मथुरा पहुँचे तो वहाँ न गोपियों ने छोड़ा, न ग्वाल-बालों ने छोड़ा, किसी ने नहीं छोड़ा। फिर उन्होंने कहा—अब कहाँ जाएँ भाई ! फिर वे द्वारका चले गए, तो वहाँ भी लोग जा पहुँचे। उन्होंने कहा कि अब क्या करना चाहिए? फिर उन्होंने कहा कि अच्छा तो कैलास पर्वत पर चले जाएँ। वे शंकर जी के कैलास पर्वत पर चले गए कि अब तो कोई नहीं ढूँढ़ पाएगा। अरे, वहाँ भी लोगों ने ढूँढ़ निकाला, तो नारद जी आ गए। नारद जी से बोले—‘‘भाई ! ऐसा कौन-सा उपाय करना चाहिए, जिससे कि ये देख न पाएँ, ढूँढ़ न पाएँ?’’

उन्होंने कहा कि एक बात बता दें, हाँ बता दो, तो फिर आप एक काम कीजिए कि आप जाइए और लोगों के दिलों में बैठ जाइए। वहाँ कोई नहीं देखेगा, कोई भी आपको नहीं ढूँढ़ पाएगा। जो कोई अन्तरंग में देखेगा, वही भगवान को पाएगा। उस दिन से कहते हैं कि भगवान हृदय में छिपकर बैठा है। भगवान को ढूँढ़ने के लिए हमें कहीं नहीं जाना पड़ेगा।

दर्शन माने फिलॉसफी

भगवान के हम दर्शन करने जाते हैं, लेकिन दर्शन एक फिलॉसफी भी है। उस फिलॉसफी को समझे बगैर हम जहाँ-तहाँ भटकते रहते हैं, अपने पैसे खराब करते रहते हैं। चलो साहब ! कहाँ चलो? वहाँ जगन्नाथपुरी चलो, बदरीनाथ चलो और कहाँ चलो? केदारनाथ चलो, अच्छा साहब! बदरीनाथ चलो। अच्छा बदरीनाथ की फिलॉसफी मालूम है। बदरीनाथ में कृष्ण जी ने 12 साल तक तप किया था और उसके बाद रुक्मिणी जी के लड़का पैदा हुआ। इससे उनका इतना बड़ा परिवार हो गया। नाम मैं जरा भूल गई। प्रद्युम्न कुछ ऐसा ही नाम था। आप वहाँ तपश्चर्या करने के लिए जाते हैं और ढोक लगाकर आते हैं। आप बदरीविशाल पहुँच गए, वहाँ से फिर केदारनाथ पहुँच गए और वहाँ भी जय बोल आए और चले आए, लेकिन उसके पीछे छिपा हुआ जो शिक्षण है, वह कहाँ चला गया?

आप गंगोत्तरी जाते हैं और गंगोत्तरी जा करके एवं नहा करके वहाँ का सारा वातावरण गन्दा और अशुद्ध कर आते हैं। टट्टी पेशाब से सब जगह गन्दगी फैल जाती है। गरमियों में कभी जाओ और फिर वहाँ ठहरने को मन करे तो एक ही नहीं 10 दफे सोचना पड़ता है।

ऐसा था, एक बार मैंने गुरुजी से कहा कि आप हिमालय गए हैं, मैं भी जाना चाहती हूँ कि जरा देख करके आऊँ। हो करके आऊँ। जरा मैं भी थोड़े दिन रह करके आऊँ। तब गरमी के दिन थे, उन्होंने कहा—मत जाना, मैंने कहा—क्यों मत जाना? मैंने कहा—आप तो एक साल रह करके आए हैं और मुझसे कह रहे हैं कि मत जाओ। उनने कहा—मेरी बात और थी, तुम्हारी और है।

मैंने कहा—मेरी क्या बात है? उन्होंने कहा—देखो वहाँ ऐसी घोर गन्दगी है कि इस गन्दगी के मारे नाक में बदबू आने लगेगी। इन दिनों तुमसे जरा देर भी ठहरा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा—लोग वहाँ गन्दगी फैलाने को जाते हैं। वहाँ न कोई गंगोत्तरी के दर्शन करने जाता है, न गंगोत्तरी नहाने जाता है। जाड़े की वजह से नहाया नहीं जाता, ठंढक की वजह से नहीं नहा पाते और दर्शन? दर्शन तो उस विशाल भगवान का कैसे कर पाएँगे? आप क्या दर्शन करेंगे उसका, दर्शन तो एक फिलॉसफी है।

बेटा दर्शन करने तो हम गए थे, जहाँ गुरुजी ने तपस्या की थी। उसमें एक शिला थी—भागीरथ शिला। तो मेरा मन हुआ कि जहाँ-जहाँ गुरुजी गए हैं, वहाँ जाने का मेरा भी मन है। जहाँ उन्होंने तप किया है, मैंने बच्चों से कहा कि वहाँ तक जाना चाहती हूँ। दो, एक लड़कों को साथ ले गई थी। आज कहीं घूमने-घामने नहीं गई।

जहाँ भागीरथ शिला थी, गंगा में थोड़ा आचमन किया, स्नान भी किया और भागीरथ शिला पर मैं जा बैठी। आधा घण्टा बैठ चुकी, उसी दिन लौटना था। अहा.... इतना आनन्द आया कि मैं आपसे वर्णन नहीं कर सकती। जहाँ उन्होंने तप किया था, मुझे अनेक रूपों में दिखाई पड़े। इसको आप पागलपन भी कह सकते हैं। इसको चाहे जो भी कह सकते हैं, लेकिन जो मैंने अनुभव किया वह अनुभव शायद किसी को भी नहीं होगा, कभी नहीं होगा। न हुआ होगा, न कभी होगा। उस शिला पर बैठते ही मैं अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। लड़कों ने हिलाना शुरू कर दिया।

नहीं, आपको चलना है, आप उठिए-आप उठिए। उस जगह को जब मैंने छोड़ा तो ऐसा मालूम पड़ा कि क्या छोड़ करके मैं यहाँ से जा रही हूँ, किसी अपने सगे को छोड़ करके मैं जा रही हूँ। मुझसे वह जगह छोड़ी नहीं जा रही थी। मुझे जोर से रोना आने लगा। लड़कों ने कहा—माताजी को ये क्या हो गया? यहाँ से जल्दी चलना चाहिए। मैं आपको दर्शन की, रोने वाली बात नहीं कह रही हूँ। यह भी एक उन्माद है। मैं तो यह कह रही हूँ कि वहाँ से शिक्षण ले करके आई कि हमें अश्वमेध यज्ञ करने हैं। हमें प्रेरणा मिली और उस प्रेरणा को हमने सब में बिखेर दिया और देखिए किस तरीके से सारी जनता में, जो हमारे अपने हैं, उनमें ज्वार-भाटा के तरीके से भावनाएँ उमड़ने लगी हैं।

साकार और निराकार उपासना

बेटे, यही तो है दर्शन और बाकी का दर्शन तो बेटा स्पर्श किया और चलते बने। पुजारी रोज़ भगवान को नहलाते हैं, लेकिन उनका भला नहीं होता। क्यों नहीं होता? क्योंकि पुजारी नहलाता है, खिलाता है, सुलाता है, लेकिन पुजारी में भावनाएँ नहीं हैं। आज हमारे राष्ट्र में कितने मन्दिर हैं? हजारों मन्दिर हैं, हजारों की तादाद में पुजारी हैं, फिर तो ये सभी पुजारी वैकुण्ठ को चले जाएँगे? ये वैकुण्ठ को नहीं जाएँगे। लिखवा लो, एकाएक नरक में जाएँगे।

क्यों साहब! ये तो पुजारी हैं, ये नरक में क्यों जाएँगे? इसलिए जाएँगे कि उन्होंने भगवान के उस स्वरूप को नहीं देखा, जो मानव जाति के रूप में है। सुबह मैं निराकार और साकार की बात कर रही थी कि निराकार के लिए पहुँचा तो जाता है, लेकिन देर लगती है। पहले हमको साकार बनाना पड़ता है और साकार में ही अपना ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। जब उसमें हम पूरा ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं, तब फिर हम निराकार की उपासना करते हैं। निराकार की उपासना सबके बूते की नहीं है, सब नहीं कर सकते। कोई-न-कोई आकार चाहिए। इसलिए हमने गायत्री मंत्र की और गायत्री माता के स्वरूप की सुबह व्याख्या की थी।

आप लोगों को बताया था कि किस तरीके से आपको उपासना करनी चाहिए। एक तो निराकार भगवान है, निराकार तो नियमन और नियंत्रण के अलावा कुछ करता भी नहीं है। नियमन और नियंत्रण—अच्छा कीजिए, अच्छा पाइए, बुरा करिए, बुरा पाइए। सीधी-साधी बात है कि विश्वमानव की तरफ से तो हम आँख मूँद लेते हैं, आँखें फेर लेते हैं। हमें आँखें नहीं फेरनी चाहिए, बल्कि हमें विश्व मानव की सेवा के लिए तत्पर रहना चाहिए।

मैंने अनेक सेवाएँ की, इन सब पहलुओं को सुबह आपको बताया था। मुझे आपसे एक ही निवेदन करना है, एक ही बात मुझे कहनी है कि आप 9 दिन का अनुष्ठान करने आए हैं या आई हैं। जो भी लड़कियाँ आई हैं, वे अपने आप को अपने इष्ट में इस कदर मिला लें कि आपके इष्ट और आपके अलावा तीसरे किसी की जरूरत नहीं हो। तीसरा आपके बीच में नहीं रहना चाहिए। न यहाँ कोई पति है, न कोई बेटा है, न कोई और है। यह मानकर चलो कि हम गुरुजी के बेटे हैं, गुरुजी की बेटी हैं।

हमारे साथ न ही औरत आई है और न तो वह हमारी धोती धोएगी और न हमारे लिए नहाने के लिए पानी लाएगी। भैया यहाँ न कोई किसी की औरत है, न कोई किसी का मर्द है। यहाँ सब गुरु जी के बेटे-बेटियाँ हैं, तो आप अपना काम स्वयं कीजिए, आप अपने में ही खोए रहिए। आप अपने में ही चिन्तन करते रहिए कि आखिर आगे चल करके हमको क्या करना है? इस पृथ्वी पर भगवान ने हमको इतनी अमानत दे करके भेजा हैं, जितना कि और किसी के साथ में देकर नहीं भेजा।

मनुष्य को कितना कुछ मिला

भगवान ने इस माने में पक्षपात किया है। क्या पक्षपात किया है कि मनुष्य को शरीर दिया है, उसको अकल दी है। सारी की सारी विभूतियाँ मनुष्य को दे डाली हैं और किसी जीव के लिए नहीं रखा है, जैसे कि साँप बनाया तो पेट दे करके फेंक दिया और कुछ बनाया, तो चाहे जैसा बना दिया, लेकिन मनुष्य को बनाने में तो उसको पसीना आ गया होगा कि किस कदर उसने मेहनत की और बनाया।

इसके लिए मनुष्य के ऊपर करोड़ों रुपये निछावर करके फेंक दिए जाएँ, तब भी कम हैं। यदि कोई यह कहे कि हमें आपकी आँखें चाहिए, आप अपनी आँखें दे दीजिए और इतने लाख रुपये ले लीजिए। मैं कहती हूँ कि किसी को मोतियाबिन्द हो जाए तो बात अलग है, अन्यथा तो कोई अपनी आँखें देने के लिए तैयार नहीं होगा। किसी की वैसे ही आँखें चली जाएँ, तो बात अलग है, पर वह अपनी आँखों को नहीं देगा। कोई यह कहे कि अपने दोनों हाथ दे दो और आप इतने लाख रुपये ले लो, तो कोई दे देगा? कोई भी नहीं देगा।

जब इतने करोड़ रुपये से ज्यादा की सम्पत्ति हम ले करके बैठे हैं, फिर कौन-सी चीज चाहिए? कैसा बढ़िया लेंस दिया, जो आप देख सकते हैं आप सुन सकते हैं, यदि कान में बहरापन आ जाए तो सारा संगीत, सारे व्याख्यान बेकार हो जाएँ, आँखों की ज्योति चली जाए तो इतना बढ़िया संसार, कैसी फुलवारी है, इसको हम देख सकते हैं क्या? हम नहीं देख सकते हैं। अकल काम न दे, बेकार हो जाए तो हम पागल हो जाएँगे। जरा-सा कोई पुरजा खराब हो जाए तो सारा का सारा हमारा जीवन बेकार हो सकता है, तो उस भगवान को हम बार-बार धन्यवाद क्यों न दें?

जिसने इतना बड़ा हमारा शरीर बनाया, इसमें इतनी अकल लड़ाई तो फिर हमको और किस चीज की आवश्यकता है? आवश्यकता है तो एक ही है कि हमारी जो बे-अकली है, ये बे-अकली ठीक हो और भगवान हमको वह हिम्मत, वह साहस, मनोबल और सम्वेदना देता हुआ चला जाए, ताकि हम जिस तरीके से मक्खन पिघल जाता है और उसी तरीके से हम दूसरों के दुःखों और कष्टों को देख करके पिघलते हुए चले जाएँ।

सन्त के लिए कहा गया है—सन्त हृदय नवनीत समाना। नवनीत का मतलब है मक्खन, अर्थात हमारा हृदय मक्खन जैसा कोमल होना चाहिए। हमारा हृदय उदार होना चाहिए, हमारा हृदय परोपकारी होना चाहिए। अपने निहित स्वार्थों के लिए न जी करके परमार्थ के लिए भी जीने की हम कोशिश करें, उसी में हमारा कल्याण हो सकता है, भगवान की परिभाषा यही है।

भगवान को यदि हम पाना चाहते हैं, भगवान के निकट हम बैठना चाहते हैं तो अपने स्वार्थों को छोड़ना पड़ेगा। कर्तव्यनिष्ठा तो रखनी पड़ेगी। कर्तव्य को याद रखना पड़ेगा। आपके बीबी है, बच्चे हैं, तो आपका जो फर्ज और कर्तव्य है, उसका पालन तो करना पड़ेगा, लेकिन उस कर्तव्य पालन के साथ में एक और पालन करना होता है और एक उसमें जकड़ना होता है।

जिस तरीके से मकड़ी जाला बुनती है और उसी जाले में फँस जाती है, फिर जाले को समेट भी लेती है, उसको निगल जाती है और बाहर आ जाती है। आप भी लोभ, मोह और अहंकार की जंजीरों में जकड़ें नहीं। अपने आप को उन मोह, लोभ की जंजीरों से खुले रखें। आप खुले रहेंगे तो ही आप भगवान के निकट पहुँच सकते हैं, अन्यथा न तो भगवान आपके निकट आएगा और न आप भगवान के निकट जा पाएँगे।

नहीं साहब ! भगवान बहुत दूर बैठा है। हम तो बहुत दूर हैं। नहीं, भगवान बिलकुल भी दूर नहीं है। वह हमारे समीप है, आस-पास है और आगे-पीछे है। यदि हम ये हिम्मत कर सकें, हम ये साहस दिखा सकें और हम अपना मनोबल दिखा सकें, अपनी श्रद्धा रख सकें, अपनी निष्ठा रख सकें तो हमारा कल्याण हो जाए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ। भगवान करे, आपका अनुष्ठान सब प्रकार से पूर्ण हो।

आज की बात समाप्त
॥ॐ शान्तिः॥