गुरु दक्षिणा चुकाएँ-समयदान करें
(हीरक जयंती वर्ष १९८५ की पूर्व वेला में दिया गया श्रावणी सन्देश)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! आज रक्षाबन्धन का सामूहिक पर्व है। यह संकल्प का पर्व है। कर्तव्य-निर्धारण का पर्व है। आज हमारे ध्यान के दो केन्द्र हैं-एक तो भगवान्, जो हमें धक्का देता रहता है और आगे बढ़ाता रहता है। दूसरा भगवान् आप लोग हैं, जो हमारे कन्धे से कंधा मिलाकर चलते हैं। एक भगवान् निराकार है तथा दूसरा साकार है। आप साकार भगवान् हैं, जो हमारे कदम से कदम मिलाकर चलते हैं। हमारी बातों को मानते हैं तथा श्रम करते हैं। हमारे क्रियाकलापों में शामिल रहते हैं। आज हमारी इच्छा हुई कि आपसे अपने मन की बातें-जी की बातें करूँ। तो महाराज जी आप अपना कुशल समाचार बताएँ।
मित्रो! हमारे ऊपर भगवान् की छाया है और जब तक वह बनी रहेगी, हमारा कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। स्वास्थ्य हमारा ठीक है। थोड़े दिन पहले एक पगले व्यक्ति द्वारा वार करने के कारण कुछ चोट लग गयी थी, अब वह ठीक है। सेहत हमारी ठीक है। मन भी ठीक है। साधना भी ठीक है और कुछ कमी रह जाएगी, तो आप लोग कदम बढ़ा देंगे, तो वह भी पूरी हो जाएगी। हमने अब तक बहुत काम किया है। अभी हमारे सामने तो आपको पता नहीं चलता है, परन्तु बाद में पता चलेगा कि हमने काफी काम किया है। हमने पेपरबाजी भी नहीं, विज्ञापन भी नहीं किया और भी कुछ नहीं किया, परन्तु फिर भी हमने इतना काम कर लिया, जितना किसी संस्था ने नहीं किया। न केवल हिन्दुस्तान में, वरन् उसके बाहर भी बहुत काम किया है। हमने ठोस काम किया है।
मित्रो! हम से मतलब आप सबके द्वारा है। आप हमारे मित्र हैं, सहयोगी हैं। हम एवं आपने मिलकर बहुत बड़ा काम किया है। एकाकी भगवान् के लिए भी यह सम्भव नहीं था। गाँधी जी ने भी अकेले स्वतंत्रता संग्राम नहीं लड़ा था। उनके साथ भी एक सत्याग्रही सेना थी। उसके माध्यम से ही आन्दोलन चलाया तथा अंग्रेजों को इस देश से खदेड़ बाहर किया एवं भारत को आजाद कराया। भगवान् बुद्ध के लिए भी अकेले धर्मचक्र-प्रवर्तन सम्भव नहीं था। उन्होंने एक लाख परिव्राजक बनाए और उनके माध्यम से उन्होंने विचारों को जन-जन तक पहुँचाया। विनोबा ने भूदान का कार्य भी अनेक सर्वोदयी कार्यकर्ताओं के सहयोग से किया था।
भगवान् राम ने समुद्र को पाटने एवं रावण पर विजय प्राप्त करने का कार्य क्या अकेला ही किया था? नहीं उसे, उन्होंने हनुमान, अंगद, नल-नील आदि वानर एवं भालुओं के सहयोग से पूरा किया था। भगवान् कृष्ण ने महाभारत यानी ग्रेटर इंडिया का कार्य क्या स्वयं अकेले किया था? नहीं यह सम्भव नहीं था। तो क्या गोवर्धन उन्होंने स्वयं उठा लिया था? नहीं, यह भी सम्भव नहीं था। यह सब कार्य उन्होंने ग्वाल-बालों के सहयोग से पूरा किया।
जगत की परम्परा को जाग्रत एवं जीवन्त बनाए रखने के लिए भगवान् के कार्य को पूरा करने के लिए हमने भी एक संगठन बनाया। आप हमारे साथी एवं सहयोगी हैं। आपको हमने बहुत मुश्किल से ढूँढ़ा है। आपने तो सोचा होगा कि हम पत्रिका के ग्राहक बन गए और गुरुजी के हो गए। नहीं बेटे, हमने आपको हिलाया है, झकझोरा है, प्रेरणा दी है, तब आप आए हैं। आपको हमने बुलाया है। हमने आपके पहले जन्म की बात पर विचार किया, जिसमें देखा कि इनमें संस्कार हैं, जो भगवान् का काम कर सकते हैं, उन्हें हमने जगाया है। बहुत से बाबा जी आते हैं और न जाने क्या-क्या बातें बतला जाते हैं। उनकी बातों को कोई सुनता भी नहीं है, परन्तु हमारे बारे में आपने ऐसा नहीं किया, आपने हमारी बातों को ध्यान से सुना, हृदय में धारण किया। इसके साथ ही उसे क्रिया में परिणत करने के लिए भी अपना समय, श्रम व अकल लगाने के लिए तैयार हो गए और लग रहे हैं। यह बहुत प्रसन्नता की बात है। यह हमारे प्रयास के साथ ही साथ आपके पूर्व जन्म के संस्कार का ही फल है।
मित्रो! शेर का एक बच्चा भेड़ों के बीच में चला गया था और अपने स्वरूप को भूल गया था। जब एक शेर ने उसे उसकी छाया दिखाई और उसका स्वरूप दिखलाया, तो वह जाग्रत हो गया। हम एवं आप दोनों सिंह हैं। भेड़ वह होता है, जो चौबीस घण्टे पेट और प्रजनन की बात सोचता है। आप इससे आगे हैं। आपके सहयोग से ही यह मिशन आगे बढ़ पाया है। हमने आपको ढूँढ़ निकाला है। हमने गहरे पानी में डुबकी लगायी है और मोतियों को चुन-चुनकर इकट्ठा किया है। मोती सड़क पर नहीं पड़ा था, जो हमने केवल चुन लिया है। हमने काफी परिश्रम किया है, तब आपको पाया है। आपको बड़ी मुश्किल से जोड़ पाए हैं हम। आपको हमसे जुड़ा रहना चाहिए।
साथियो! आजकल हम सूक्ष्मीकरण साधना में हैं। दुनिया के सामने एक बड़ी मुसीबत आ गयी है। उसके समाधान के लिए हमें बड़ा काम करना है। आगे खुशहाली लाने के लिए भी प्रयास करना है। यह प्रयास भागीरथ व गंगा अवतरण एवं दधीचि की हड्डी से वज्र बनाने से कम नहीं है, जो असुरता को समाप्त करने के लिए आवश्यक है। हमारा प्रयास उसी स्तर का है। इस महान कार्य को जब हम कर रहे हैं तो आपको हमारा सहयोगी एवं सहभागी अवश्य बनना चाहिए। आपको बनना ही पड़ेगा, चाहे आप मन से करें या बिना मन से।
आपको इसमें क्या करना होगा? हमने आपको दो काम बतलाए हैं। आपको हमने एक बात यह कही है कि सूर्योदय के समय एक माला गायत्री महामंत्र का जप आपको अवश्य करना चाहिए, ताकि हमारे इस महापुरश्चरण को-इस योजना को बल मिले। दूसरा हमने आपको यह कहा था कि आपको जब हमसे मिलना हो, बातें करनी हो तो आप बेतार का तार बना लें। सूर्योदय के एक घण्टे पहले से सूर्योदय के एक घण्टे बाद तक जब आप हमारा चिन्तन करेंगे, तो आपको हमारा सन्देश, मार्गदर्शन एवं सहयोग मिलेगा। इसके अलावा हम आपसे और क्या चाहेंगे। आप हमारे बच्चे हैं, हम जो कर रहे हैं, वह आप करें, यही हमारी इच्छा है। हम जिस परम्परा पर चले हैं, आपको भी उसी पर चलाना चाहिए।
मित्रो, हमने ऋषि परम्परा को ग्रहण किया है। हमने साधु-ब्राह्मण का, सन्त का जीवन ग्रहण किया है। आपको भी वही ग्रहण करना चाहिए। सन्त वह, जो दुनिया को हिला दे। गाँधी, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द सन्त थे, जिन्होंने दुनिया को हिला दिया था। आपको भी वैसा ही बनने का प्रयास करना चाहिए। ब्राह्मण अपरिग्रही होता है तथा सन्त सेवाभावी होता है। आपको इन दोनों परम्पराओं को कायम रखना चाहिए। हमने यही रास्ता अपनाया है। आप से जितना सम्भव हो, इसी परम्परा को अपनाने का प्रयत्न करें। आप अपनी निजी महत्त्वाकाँक्षा में काट-छाँट करें। आपकी महत्त्वाकाँक्षा कम होनी चाहिए। आपकी इच्छा कम होनी चाहिए। हिन्दुस्तान के आम नागरिक की तरह आपका जीवन होना चाहिए। आपको अपने परिवार को ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहिए। जो हैं, उनमें से प्रत्येक सदस्य को स्वावलम्बी बनाने का प्रयास करें। इससे आपको व उनको दोनों को प्रसन्नता होगी। यदि आप ऐसा कर सकेंगे, तो ही हमारे साथ चल सकेंगे।
अभी तो आप इस समय हमारे साथ जब उत्साह आता है, तो चलने लगते हैं और जब उत्साह कम हो जाता है, तो मगर की तरह पानी में जा बैठते हैं। यह पानी के बुलबुले की तरह से काम करना क्या कोई शान की बात है? अगर चलना है, तो फिर चलना ही है, रुकना नहीं। यही शान की बात होगी। हमारे गुरु ने हमारी शान रखी, हम आपकी शान रखेंगे। आप हमारी जिन्दगी को देखिए, गाँधी जी की जिन्दगी को देखिए, अन्य सन्तों की जिन्दगी को देखिए, जिन्होंने जो संकल्प लिया, जो लक्ष्य बनाया, उसके लिए जीवन के अन्त तक डटे रहे। बीच-बीच में वह भागे नहीं हैं। अगर बीच-बीच में वह व्यक्ति भागेगा, तो वह वापस कैसे आएगा? महापुरुष आखिरी दम तक अपने उद्देश्य पर डटे रहे, संकल्प पर अडिग रहे, अपने स्थान पर बने रहे। वे बीच में भागे नहीं है। अगर बीच में भागोगे, तो काम कैसे बनेगा? इससे बड़ी मुसीबत होगी। अगर कोई बैल मारने आएगा, तो आप गोबर करने लगेंगे, तो काम कैसे चलेगा? आपको उत्साह आता है, उमंग आती है, तो आप काम करते हैं और जब आपकी हवा निकल जाती है तो आप चुपचाप हो जाते हैं। इससे काम कैसे चलेगा? अगर किसी काम को कीजिए, तो पूरा कीजिए। थोड़ा-सा काम करने से क्या फायदा?
मित्रो! हमने तो हमेशा अर्जुन की तरह तीर की नोंक तथा चिड़िया की आँखें ही देखी हैं। हमेशा हमें अपना लक्ष्य दिखलाई पड़ा है। आपको भी जितना बन पड़े, त्याग करना चाहिए, परन्तु बीच में काम बन्द करके भागना ठीक नहीं है। ढीला-पोला होने में फायदा नहीं है। शानदार आदमी एकनिष्ठ रहते हैं, एक जैसे रहते हैं। आपसे भी जितना बने, मिशन के लिए त्याग करें, महाकाल के लिए त्याग करें। हमारा एक ही निवेदन है कि नवयुग लाने के लिए जनमानस का परिष्कार करना है। इसके लिए आपको बढ़-चढ़कर काम करना है। आपको मुस्तैदी का जीवन जीना चाहिए। आप वैसा बैल न बनें, जो रास्ते में बैठ जाता है। आप एक निष्ठा से, एक श्रद्धा से काम करें तथा लगे रहें। इससे आपका, हमारा तथा मिशन तीनों का कल्याण है। हमने अपना सारा जीवन एक लक्ष्य के लिए नियोजित किया है, आप भी अपने सारे जीवन को एक लक्ष्य के लिए नियोजित कीजिए।
एक बात और आपसे कहनी है कि अब मिशन की रजत जयंती होने वाली है। अब हम पचहत्तर साल के हो गये। अरे हम तो जब से यह सृष्टि बनी है, तभी से काम कर रहे हैं और जब तक यह रहेगी, हमें काम करना है। हमारी मुक्ति नहीं होगी। इस संसार में जब तक सब आदमी मुक्ति नहीं पा लेंगे, हमें मुक्ति की अभिलाषा नहीं है। इस दुनिया के सभी आदमी जब मुक्ति पा लेंगे, तो हम सबसे आखिरी आदमी होंगे, जो मुक्ति की अभिलाषा रखेंगे।
मित्रो! यह हीरक जयंती क्या बात है? जब आदमी पचहत्तर वर्ष का हो जाता है, तो यह जयंती मनाई जाती है। सौ साल में शताब्दी मनाई जाती है। अब हमारा यह स्थूल शरीर विद्रोह कर रहा है। हम बहुत दिन जिएँगे नहीं, यह हमारी कामना नहीं है। अब हम सूक्ष्म एवं कारण शरीर में रहकर काम करना चाहते हैं। अब हम पाँच कोषों से, पाँच शरीरों से, पाँच मोर्चों पर लड़ेंगे। हीरक जयंती वसन्त पंचमी से शुरू हुआ है और अगले वर्ष तक यह मनाया जाएगा। हमारे पास ढेरों पत्र आए हैं कि गुरुजी हम आपका जुलूस, निकालेंगे, प्रदर्शनी लगाएँगे। इसी तरह न जाने क्या-क्या पत्र आए हैं। हमने विचार किया कि हमें इस जयंती वर्ष में क्या करना चाहिए? हम यानी हमारे मिशन का विस्तार कैसे हो? जन-चेतना को कैसे जगाया जाए?
हमने जुलूस आदि के लिए लोगों को मना कर दिया। इस धूम-धड़ाका से कोई लाभ नहीं होगा। हमने एक सौ आठ व एक हजार आठ कुण्डीय तक यज्ञ किए, जो शानदार थे, लेकिन देखा कि उसके दो साल बाद लोग उसे भूल गए। इस तरह इस धूम-धड़ाके से कोई लाभ नहीं होता है। अब इससे मेरा मन भर गया है। अभी हम इन्हें नहीं मनाना चाहते। आपको हमारी बात मानना चाहिए। आगे जब जरूरी होगा, हम बता देंगे। अगर आप हमारी इच्छा के अनुसार मनाना चाहते हैं, तो हमारी एक इच्छा रह गयी है। क्या रह गई है? फूल-माला हमने ढेरों मन पहन लिए हैं। अब हमें जेवर पहनने की इच्छा है। हमारे पास ढेरों आदमी हैं। हमारा मन है कि अब हम कदम से कदम मिलाकर चलने वालों की माला पहनें। हमने गायत्री शक्तिपीठें बनाई थीं। उस काम से भी अब मेरा मन भर गया है। अब केवल मन्दिर बनकर रह गए हैं। वहाँ जागृति की-जनजागरण की कोई बात नहीं है। वहाँ एक देवी बैठी है, जिसकी सुबह-शाम आरती हो जाती है। हो सकता है, अगले दिनों रचनात्मक क्रिया-कलाप चलें, उनका भी कायाकल्प हो, पर अभी तो सब देखकर हमें बहुत दुःख होता है कि जनता के बहुत सारे पैसों को बर्बाद कर दिया गया व परिणाम स्वल्प ही हाथ आया।
हमारा मन है कि हमारे पास दस हजार ऐसे व्यक्ति हों, जिनकी हम माला पहनें, जो हमारे साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलें। हमारी व उनकी एक आवाज हो, एक दिशा हो तथा लगातार मिलकर लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें। उन्हें किसी बात का डर या भय न हो। इस वर्ष हमारी इच्छा दस हजार हीरे का हार पहनने की है। अगर कोई व्यक्ति मरता है या फाँसी पर चढ़ाया जाता है, तो उसकी एक इच्छा होती है, जो पूरी की जाती है। जैसे किसी की इच्छा होती है कि हम मिठाई खाएँ तथा सिगरेट पिएँ, तो उसकी इच्छा पूरी कर दी जाती है। हमारा भी मन है कि इस वर्ष हम दस हजार हीरों का हार पहनकर शहर में निकलें। जब हमारा जुलूस निकले, तो जनता यह समझे कि यह बहुत मालदार आदमी है, बहुत शानदार आदमी है, वजनदार आदमी है।
बेटे, आज मैं कबीर की तरह से पहेली कह बैठा। यहाँ दस हजार हीरों से मेरा मतलब है कि दस हजार ऐसे साथी हो जाएँ, जो नियमित रूप से हमारे कार्य अर्थात् मिशन के लिए समयदान दे सकें। पैसे की इच्छा नहीं है। इसका मतलब यह है कि हमारे हाथ-पाँव मजबूत हो जाएँ। हाथ-पाँव से हमारा मतलब आपसे है। आप हमारे चलते-फिरते हाड़-माँस के शक्तिपीठ बन जाएँ। हमने जो उम्मीद शक्तिपीठों से लगाई थी, वह आप स्वयं पूरा करना शुरू कर दें। हमें ज्ञानरथ के लिए नौकर नहीं चाहिए। हमें इसके लिए आपका समयदान चाहिए। विवेकानन्द, गाँधी, विनोबा का काम स्वयं उन्होंने किया। इसी तरह यह काम आपको करने होंगे। आपके पास चौबीस घण्टे हैं। आठ घण्टे काम के लिए, सात घण्टे सोने के लिए, पाँच घण्टे नित्य काम के लिए रख लें, तो भी आपके पास चार घण्टे बचते हैं। आपको नियमित रूप से चार घण्टे नित्य मिशन के लिए, समाज के लिए, भगवान् के लिए देना चाहिए।
समयदान आज की अनिवार्य आवश्यकता है। इसके लिए आपको समय निकालना ही चाहिए। मान लीजिए अगर आप बीमार हो जाएँ, तो आपका समय बचेगा कि नहीं? आप यह समझें कि आप चार घण्टे नित्य बीमार हो जाते हैं। आप कहेंगे कि गुरुजी हम किस काम के लिए समय दें, जैसा कि मैंने कहा है कि जनजाग्रति के लिए और किसके लिए-गुरुजी को पंखा झलने के लिए, पैर दबाने के लिए नहीं। बेटे, हमें तो जनजाग्रति के लिए समय चाहिए। आप समय की माँग को पूरा कीजिए। इस माँग से हमारा कान फटा जा रहा है, दिमाग पर बोझ-सा धरा है। यह कार्य अकेले से पूरा नहीं हो सकता है। इस कार्य हेतु आपसे समयदान चाहता हूँ। आप हमारे हाथ-पैर बनें, सहायक बनें। हमारा साहित्य घर-घर पहुँचाकर क्रान्ति कर दें। आपके चार घण्टे से हमारा काम बन जाएगा। दो घण्टे से कम में तो बन ही नहीं सकता। अगर इतना न बने, तो फिर आप वही हल्ला-गुल्ला करने वाले, जुलूस निकालने वाले बने रहें।
हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र से, एकलव्य ने द्रोणाचार्य से, शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास से, विवेकानन्द ने रामकृष्ण परमहंस से दीक्षा ली थी तथा गुरुदक्षिणा चुकायी थी। आपको भी गुरु-दक्षिणा के रूप में समय देना चाहिए। जनजाग्रति के लिए आपका समयदान हीरे-मोतियों से, जवाहरात से भी बढ़कर है। इससे कम में युगपरिवर्तन का लक्ष्य पूरा नहीं होगा। आप हमारे बेटे हैं, साथी-सहयोगी हैं। आपसे यही अपेक्षा है, आशा है।
॥ॐ शान्तिः॥