| हम कौन हैं? | पूज्य गुरुसत्ता के अंग-अवयव, बेटे-बेटियाँ, भगवान राम के रीछ-वानर और भगवान श्रीकृष्ण के ग्वाल-बाल हैं। |
| पूज्य गुरुसत्ता कौन हैं? | ‘‘हमारी कितनी रातें सिसकते बीती हैं, कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख-बिलख कर, फूट-फूट कर रोये हैं। इसे कोई कहाँ जानता है? लोग हमें सन्त, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं। कोई लेखक, विद्वान, वक्ता, नेता समझते हैं, पर किसने हमारा अन्तःकरण खोलकर पढ़ा-समझा है? कोई उसे देख सका होता, तो उसे मानवीय व्यथा-वेदना की अनुभूतियों की करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इन हड्डियों के ढाँचे में बैठी-बिलखती दिखाई पड़ती।’’ — सुनसान के सहचर, मेरा परिचय क्या पूछ रहे रचयिता, रक्षक, पोषक हूँ — वन्दनीया माताजी, ‘‘लोगों से आप यह मत कहना कि गुरुजी बड़े सिद्धपुरुष हैं, बड़े महात्मा हैं और सबको वरदान देते हैं, वरन् यह कहना कि गुरुजी एक ऐसे व्यक्ति का नाम है, जिसके पेट में से आग निकलती है, जिसकी आँखों से शोले निकलते हैं। आप ऐसे गुरुजी का परिचय कराना, सिद्धपुरुष का नहीं।’’ — पूज्य गुरुदेव — Vang. 68 - 5.5 |
| हमारा उद्देश्य — पूज्य गुरुसत्ता की चाह दीक्षा ली है, तो हमारे जीवन से कुछ सीखें। |
‘‘अपने अनन्य आत्मीय प्रज्ञा-परिजनों में से प्रत्येक के नाम हमारी यही वसीयत और विरासत है कि हमारे जीवन से कुछ सीखें। कदमों की यथार्थता खोजें, सफलता जाँचें और जिससे जितना बन पड़े अनुकरण का, अनुगमन का प्रयास करें। यह नफे का सौदा है, घाटे का नहीं। ’’ — हमारी वसीयत और विरासत — मनुष्य में देवत्व का उदय, धरती पर स्वर्ग का अवतरण। — व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण। — स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन, सभ्य समाज। — आत्मवत् सर्वभूतेषु, वसुधैव कुटुम्बकम्। — एक राष्ट्र, एक भाषा, एक धर्म, एक शासन। — लिंगभेद, जातिभेद, वर्गभेद से ऊपर उठकर सबको विकास का अवसर। — हम बदलेंगे-युग बदलेगा, हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा। — ‘‘प्यार, प्यार, प्यार यही हमारा मंत्र है। आत्मीयता, ममता, स्नेह और श्रद्धा यही हमारी उपासना है। आत्मीयता के विस्तार का नाम ही अध्यात्म है।’’ — ‘‘मेरे विचारों में—मेरे साहित्य में, मेरी इच्छाओं को ढूँढ़ो। उन शिक्षाओं का अनुसरण करो जो मेरे गुरु ने मुझे दी थीं और जिसे मैंने तुम्हें दिया है। सदैव अपनी दृष्टि लक्ष्य पर स्थिर रखो। अपने मन को मेरे विचारों से परिपूर्ण कर लो। मेरी इच्छा और विचारों के प्रति जागरूकता, स्थिरता और भक्ति में ही शिष्यत्व है।’’ — गायत्री मंत्र दीक्षा लेना अर्थात पूज्य गुरुसत्ता के जीवन का अनुकरण-अनुगमन का संकल्प — सविता रूप में पूज्य गुरुसत्ता का वरण — गायत्री मंत्र दीक्षा में लिए गए व्रत-अनुशासन-अनुबन्धों के अनुरूप महान जीवन जीने का संकल्प। |
| गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज का दिव्य वातावरण | उत्कृष्ट जीवन बनाने के लिए ऋषि प्रणीत सामूहिक दिनचर्या और जीवनचर्या की उपस्थिति — देवात्मा हिमालय का द्वार हरिद्वार में स्थित है गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज — गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की तपोभूमि, गायत्री मंत्र के विशेषज्ञ ऋषि विश्वामित्र की तपःस्थली है, जहाँ सूक्ष्म रूप में देवात्मा हिमालय की ऋषि सत्ताएँ सतत निवास कर रही हैं — अखण्ड दीप जल रहा है, निरन्तर जप हो रहा है, नित्य यज्ञ होता है — वन्दनीया माताजी-पूज्य गुरुदेव की गोद में, संरक्षण में, मार्गदर्शन में, तपःस्थली में बैठे हैं — करोड़ों-अरबों-खरबों बार गायत्री मंत्र का जप हो चुका है, यज्ञ आहुतियाँ पड़ चुकीं हैं, गायत्री अनुष्ठान हो चुके हैं — यज्ञ ऊर्जा से ऊर्जित, गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित पूज्य गुरुसत्ता का प्राण भरा स्नेह और स्नेह भरी प्रेरणा दिव्य प्राण के रूप में निरन्तर विद्यमान है — जिनके कारण हमारे शरीर का कण-कण झंकृत हो रहा है; शरीर, मन और अन्तःकरण सभी अभिमंत्रित हो रहे हैं। — ऐसी दिव्य साधना स्थली और वातावरण सारी पृथ्वी पर केवल यहीं गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज में उपलब्ध है, जहाँ अभी हम बैठे हुए हैं। |
| प्रातः जागरण | आत्मबोध — नित्य नया जन्म — सविता ईष्ट, लक्ष्य, उपास्य — सविता रूप में विद्यमान पूज्य गुरुसत्ता/ईश्वर/परमात्मा को आज के जीवन के लिए धन्यवाद और आज मिलने वाले सभी परिजनों को भी उनके सहयोग के लिए धन्यवाद। दिन भर की मानसिकता और कार्यों की संक्षिप्त रूपरेखा-योजना। मानवीयता का प्रथम गुण — कृतज्ञता। |
| प्रातः प्रार्थना | ईष्ट ध्यान — सविता देवता से प्रार्थना — हम क्या चाहते हैं? — दीक्षा में लिए गए व्रत के अनुरूप जीवन जीने का संकल्प। |
| स्वच्छता | घर — शरीर — मन — अन्तःकरण की नियमित सफाई। |
| आरती | विवेक की देवी गायत्री माता की आरती — विश्व में सभी के लिए सद्बुद्धि-सद्भाव और महान जीवन की प्रार्थना। |
| प्राणायाम | प्राणायाम में नासिका द्वारा ब्रह्माण्डव्यापी प्राण-तत्त्व को खींचने, धारण करने और घुसे हुए अशुभ को बुहार फेंकने की भावना की जाती है। संसार में भरा तो भला-बुरा सभी कुछ है, पर हम अपने लिए मात्र दिव्यता प्राप्ति को ही उपयुक्त समझें। जो श्रेष्ठ-उत्कृष्ट है, उसी को पकड़ने और सत्ता में प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करें। |
| ध्यान | मैं क्या हूँ? का प्रयोग रूप — गायत्री मंत्र से तीनों शरीरों का — पंचकोषों का जागरण और अभिमंत्रित होना। |
| प्रणाम व तीर्थ दर्शन | अखण्ड दीप, गायत्री मन्दिर, भटका हुआ देवता, ऋषि-क्षेत्र, समाधि स्थल व देवात्मा हिमालय दर्शन — दिव्य सत्ताओं की अनुभूति और उनके जीवन मूल्यों के प्रति आदर व कृतज्ञता के भाव। |
| सद्वाक्य | दिव्य प्रेरणाएँ — सूक्ष्म शरीर की साधना। जीवन की समस्याओं का समाधान। |
| गीत | प्रेरणा, प्रार्थना, प्रतिज्ञा-संकल्प — गीतों में जीवन की समस्याओं का समाधान। |
| यज्ञ | सहयजन, सामूहिक मन, सद्भावों का सामूहिक जागरण, कर्मकाण्डों से प्रेरणा। |
| जप | सहभजन, सविता देवता से प्रार्थना, अनुशासन, प्रतिज्ञा-संकल्प — गायत्री मंत्र के तत्त्व दर्शन को (भगवान् के अनुशासन को — ईश्वर-स्वयं-प्रकृति क्या-कैसा है? — क्या, क्यों, कैसे, कहाँ, कब करें?) बार-बार समझना-स्वीकारना — जीवन में अपनाना। |
| व्यायाम | आसन, प्राणायाम, प्रज्ञायोग, मुद्रा, बन्ध — स्वस्थ शरीर भगवान का मन्दिर। |
| उदीयमान सूर्य का दर्शन | प्रणाम — आत्म स्वरूप की अवधारणा — मैं क्या-कैसा हूँ? लक्ष्यबोध — साधक सविता एक — भक्त भगवान् एक। |
| ‘‘अपने अंग-अवयवों से’’ का चिन्तन | प्रतिदिन स्वाध्याय-स्वीकारना — पूज्य गुरुसत्ता से आत्मीयता के भाव का बढ़ना — एकत्व बोध — सजल श्रद्धा स्वरूप। |
| ‘‘युग निर्माण सत्संकल्प’’ का चिन्तन | प्रतिदिन स्वाध्याय-स्वीकारना — पूज्य गुरुसत्ता के अनुशासन से स्वयं को अनुबन्धित करना — प्रखर प्रज्ञा स्वरूप। |
| अंकुरित अन्न | जीवन्त भोजन — चलें प्रकृति की ओर। |
| सत्संग — सत्य का संग | दिव्य प्रेरणाओं और सद्भावनाओं से अभिभूत होना — प्रवचन, ऑडियो-वीडियो या पुस्तकों के माध्यम से। |
| सहभोजन | सहभोजन, सामूहिक भोजन एक जैसा, भेदभाव रहित भोजन परसना — आत्मीयता का विस्तार। |
| स्वाध्याय | जीवन की मार्गदर्शक प्रेरणाएँ — महापुरुषों का सत्संग — आत्म निरीक्षण-परीक्षण व समीक्षा। |
| ध्यान दोपहर | गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित होना, सवेरे से अभी तक की आत्मसमीक्षा — आत्म निरीक्षण-परीक्षण — चिन्तन-मनन। |
| श्रमदान | सुव्यवस्था-स्वच्छता का व्यक्तिगत व सामूहिक अभ्यास, झूठे अहंकार का स्वयंसेवक भाव में परिवर्तन। |
| आरती | साकार उपासना — ईष्ट गुणगान-चिन्तन और वैसा ही बनने-बनाने का संकल्प। |
| नादयोग | मौन अन्तर्मुखी ॐकार नाद — भाव सम्वेदनाओं का — उदार आत्मीयता का जागरण-विस्तार। |
| रात्रि प्रार्थना | तत्त्वबोध — दिन भर की मानसिकता व कार्यों की कठोर समीक्षा — क्षमा प्रार्थना — सभी के प्रति कृतज्ञता-आभार के भाव — अगले दिन की मानसिकता और कार्यों की संक्षिप्त रूपरेखा-योजना, प्रतिदिन प्रगति पथ पर चलने की चाह-संकल्प। |
| जीवन अर्थात समय (का सदुपयोग या दुरुपयोग) | हमको लोक-संग्रह और लोकमंगल और लोककल्याण देने वाला जीवन, भगवान का अनुग्रह लाने वाला जीवन और लोकहित करने वाला जीवन, भगवान् को सन्तोष देने वाला जीवन, आत्मा को शान्ति देने वाला जीवन, और लोकसम्मान और लोकश्रद्धा से भरा हुआ जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए। |
| सीखना | जानना (जीवन जीने की विधा-तरीका) , मानना (जीवन जीने की विधा-तरीके को स्वीकारना) और अभ्यास-संस्कार (जीवन का सहज अंग बना लेना) |
| सीखने का सरलतम तरीका | स्वयं की जिज्ञासा, मनोयोग और प्रयास। साथ ही बाहरी सहायता प्रेरणा, प्रोत्साहन, मार्गदर्शन, स्नेह, आत्मीयता के रूप में और उपयुक्त स्थान — वातावरण (गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज)। |
| चार सूत्र | साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा। — समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी। — इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम। — आत्मसमीक्षा, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण, आत्मविकास। |
| तीन आधार | उपासना, साधना, आराधना। — ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग। — स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर। — भावना, विचारणा, क्रिया-प्रक्रिया। — श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा। — गुण, कर्म, स्वभाव। — चिन्तन, चरित्र, व्यवहार। |
| तीन को त्यागें | लोभ, मोह, अहंकार। — वासना, तृष्णा, अहंता। — पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा। |