आत्मबल सम्पादन ही सर्वोपरि लक्ष्य हो (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
हम जो ग्रहण करते हैं, उसे पेट ठीक ढंग से पचा लेता है। पिप्पलाद ऋषि ने अपना सारा जीवन केवल पीपल के फल से ही काटा था। इससे उन्हें बहुत फायदा था। आहार के द्वारा मनुष्य के विचार बनते हैं
हम जो ग्रहण करते हैं, उसे पेट ठीक ढंग से पचा लेता है। पिप्पलाद ऋषि ने अपना सारा जीवन केवल पीपल के फल से ही काटा था। इससे उन्हें बहुत फायदा था

दो ही सम्पत्ति, दो ही विभूति: योग एवं तप (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
शान्ति के साथ हमारे चौबीस साल व्यतीत हो गए। कणाद ऋषि, पिप्पलाद ऋषि पीपल के फल खाकर के गुजारा किया करते थे। कणाद ऋषि जमीन पर गिरे अनाज के दाने बीनकर गुजारा किया करते थे। अगर आप इस तरह धान्य-कुधान्य के बारे में ध्यान रखें तो हम यह कह सकते हैं कि आपने तप की पहली वाली प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी
यह क्या हुआ? यह पीपल का पेड़ हो गया, जिसकी बाबत गीताकार ने कहा है—ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं--- ॥ गीता-१५/१ अर्थात यह पीपल का पेड़ ऐसा है, जिसकी टाँगें ऊपर को हैं, जड़ें ऊपर को हैं, पत्ते नीचे को हैं। महाराज जी! ऐसा पीपल का पेड़ तो हमने कहीं नहीं देखा। बेटे! ऐसा पीपल का पेड़ होता है—व्यक्ति। कौन सा व्यक्ति? जिसको हम योगी कहते हैं
महाराज जी! ऐसा पीपल का पेड़ तो हमने कहीं नहीं देखा। बेटे! ऐसा पीपल का पेड़ होता है—व्यक्ति। कौन सा व्यक्ति? जिसको हम योगी कहते हैं। वह दिन में सोया करता है और रात में जागा करता है
पाँव ऊपर कर दीजिए और सिर नीचे। यह क्या हुआ? यह पीपल का पेड़ हो गया, जिसकी बाबत गीताकार ने कहा है—ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं--- ॥ गीता-१५/१ अर्थात यह पीपल का पेड़ ऐसा है, जिसकी टाँगें ऊपर को हैं, जड़ें ऊपर को हैं, पत्ते नीचे को हैं। महाराज जी! ऐसा पीपल का पेड़ तो हमने कहीं नहीं देखा। बेटे! ऐसा पीपल का पेड़ होता है—व्यक्ति

समझें देववाद का मर्म एवं लें उनसे शिक्षण (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
बेटे बके मत कि एक हाथ में तलवार लिए है, एक में चाबुक है और एक में गदा है। कहाँ लिए है और कहाँ बैठी है? साहब! वहाँ बैठी है- पीपल के पेड़ पर। नीम के पेड़ पर बैठी है, पहाड़ पर बैठी है। बेटे, बेकार की बातें मत कर, बात को समझ जरा

आप अपने आपको पहचान लीजिये कि आप सामान्य आदमी नहीं हैं, असामान्य हैं (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
हीरक जयंती के समय में आप कपड़ा और सब करे बड़ा शानदार जुलूस निकालें आपका यह करे नहीं साहब हमने लोगों से मने कर दिया था अब हम जिन कामों में लगे हुये हैं वह इतने शानदार काम हैं कि न हमें जुलूस निकलवाने की फुरसत है न हमें अमुक काम की फुरसत है न हमें किसी से सम्मान पाने की फुरसत हैं न हमें अपने ऊपर चवर डुलवाने की फुरसत है न किसी से आरती उतरवाने की फुरसत है हम चौबीसों घण्टे अपने काम में लगे रहते हैं और जो काम हमको करने पड़ रहे हैं वह इतने भारी और जबरदस्त हैं कि जिसके बारे में कभी आपको हमारे मरने के पीछे पता चलेगा कि जब गुरुजी एकान्त सेवन कर रहे थे सूक्ष्मीकरण करते थे तो क्या काम करते थे तो यह बात अभी बता दें नहीं यह बात अभी बता देंगे तो मालूम पड़ेगा कि अपनी शेखी मार रहे हैं। और उसके अलावा क्या क्या संकल्प किये है और इसके अलावा हमने यह संकल्प किया है कि २४ लाख पेड़ लगायेंगे काहे के पेड़ लगायेंगे हवन सामग्री के लिये जब आपको जरूरत होगी गाँव गाँव होगे और घर घर होंगे जब यज्ञायोजन होंगे तो आप कहाँ से लायेंगे लकड़ी इसलिए अभी से हम पेड़ लगाने की बात कहते हैं बड़े-बड़े पेड़ पीपल के नहीं पीपल तो २५ साल में तैयार होता है। २४ लाख हमने पेड़ लगाने का भी संकल्प लिया है। दीवारों पर वाक्य लिखने का भी संकल्प लिया है

गायत्री ही कामधेनु है (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
मित्रो! अगर जीभ को हम परिष्कृत कर लें तब? तब आपकी जीभ ही सरस्वती बन जाती है, क्योंकि सरस्वती वहीं रहती है। नहीं साहब! सरस्वती पीपल के पेड़ पर रहती है। हाँ बेटे, पीपल के पेड़ पर भी रहती है। वीणा बजाती है और गाती है
नहीं साहब! सरस्वती पीपल के पेड़ पर रहती है। हाँ बेटे, पीपल के पेड़ पर भी रहती है। वीणा बजाती है और गाती है। मोर पर सवार रहती है

सुर दुर्लभ है यह मनुष्य का जीवन(गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
मित्रो! पिप्पलाद ऋषि केवल पीपल के फल तोड़ लाते थे और उन पीपल के फलों को सुखा करके अपना काम चलाते थे। उस पागल ने नारद जी को यह उदाहरण देते हुए पूछा—क्यों पिप्पलाद ऋषि ऐसे ही अपना काम चलाते थे कि नहीं? नारद जी ने कहा—हाँ चलाते थे। पिप्पलादि ऋषि को मिठाइयाँ नहीं मिल सकती थीं क्या? उन्होंने कहा—मिल सकती थीं
मैं सन्त हो करके भी अन्न खाऊँ, तो मेरे लिए धिक्कार है। भगवान से बड़े सन्त मित्रो! पिप्पलाद ऋषि केवल पीपल के फल तोड़ लाते थे और उन पीपल के फलों को सुखा करके अपना काम चलाते थे। उस पागल ने नारद जी को यह उदाहरण देते हुए पूछा—क्यों पिप्पलाद ऋषि ऐसे ही अपना काम चलाते थे कि नहीं? नारद जी ने कहा—हाँ चलाते थे। पिप्पलादि ऋषि को मिठाइयाँ नहीं मिल सकती थीं क्या? उन्होंने कहा—मिल सकती थीं

गर पूछे कोई मुझसे तो मैं कहूँ कि स्वर्ग बस यहीं है (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
दूसरे लोग हिन्दुओं पर हँसा करते हैं और कहते हैं कि ये हैं हिन्दू। हिन्दू क्या पूजते हैं-पीपल। और क्या पूजते हैं-पत्थर। क्या पूजते हैं-कुत्ता, गधा, कुआँ, घूरा, कूड़ा

जीवन साधना का मर्म है भक्ति, समझें उसका व्यापक रूप (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
बीज अगर न हो, तो बरगद का वृक्ष पैदा नहीं हो सकता। पीपल का वृक्ष पैदा नहीं हो सकता, चन्दन का वृक्ष पैदा नहीं हो सकता। इसलिए बीज का महत्त्व जरूर मानूँगा, लेकिन बिना जमीन के अगर आप बीज को हवा में उगाना चाहें, बगीचा तैयार करना चाहें, तो यह बेकार है। केवल बीज के रहने भर से आप बगीचा नहीं लगा सकते
दिशाशूल खराब है। कहाँ है दिशाशूल? साहब! वहाँ है-पीपल के पेड़ के नीचे बैठा हुआ है। दिशाशूल पकड़ लेगा। दिशाशूल के कारण चूल्हा नहीं बना सकते, चक्की नहीं बना सकते

देवपूजन का मर्म (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
हम एक बार कैलाश पर्वत पर थे तो मरते-मरते बचे थे। देवता कहाँ रहते? पीपल के पेड़ पर रहते होंगे। अच्छा तो चलिए दिखाइए। नहीं साहब, वहाँ तो देवी रहती है

परिष्कृत मनःस्थिति ही स्वर्ग है (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
ये क्या पूजते हैं? पत्थर। ये क्या पूजते हैं? पीपल। ये क्या पूजते हैं? घूरा। बेवकूफ वे लोग हैं, नहीं, हम लोग उनसे ज्यादा बुद्धिमान हैं

जीवन्त विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
भजन कर रहे हैं इधर और पीठ खुजा रहे हैं उधर। भला ऐसी कोई भक्ति होती है? तुलसीदास ने भक्ति की, तो कैसी मजेदार भक्ति की कि बस पीपल के पेड़ पर से, बेल के पेड़ पर से कौन आ गया? भूत आ गया। उन्होंने कहा कि हमको भगवान् के दर्शन करा दो। उस भूत ने कहा कि भगवान् के तो नहीं करा सकते, हनुमान् जी के करा सकते हैं
जहाँ कहीं भी चमक ज्यादा दिखाई पड़ती है, वह मेरा विशेष अंश है। उन्होंने कहा, वृक्षों में मैं पीपल हूँ। छलों में मैं जुआ हूँ। वेदों में मैं सामवेद हूँ

इन्सान के अन्दर का भगवान् जगाएँगी प्रतिभावान विभूतियाँ (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता की विभूतियों में ये कहा है कि जहाँ कहीं भी चमक दिखाई पड़ती है, वहाँ-वहाँ मैं हूँ। पेड़ों में पीपल का पेड़, खेलों में जुआ, नागों में वासुकी मैं हूँ। पांडवों में अर्जुन मैं हूँ, इत्यादि उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जहाँ कहीं भी चमक पाई जाए, वहाँ ये मानकर चलना कि यहाँ भगवान का विशेष अंश है। भगवान् के उस विशेष अंश को, जो मिट्टी में पड़ा हुआ है, कूड़े में पड़ा हुआ है, उस हीरे को निकाल लें और मुनासिब जगह पर लगा दें, तो हीरे की कीमत निकल सकती है और वह पाँच हजार में बिक सकता है

चेतना का परिष्कार—अध्यात्म (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
आपकी परिभाषा से देवताओं को इन वस्तुओं के द्वारा प्रसन्न होना चाहिए। इन वस्तुओं के द्वारा बृहस्पति को प्रसन्न करने का क्या तरीका है? पीपल का पत्ता, केले का पत्ता, केले के पत्ते पर हल्दी, हल्दी के ऊपर आँवला, आँवले के ऊपर सुपारी लेकर के चले जाइए और बरगद के नीचे रख करके आइए, बृहस्पति देवता प्रसन्न हो जाएँगे। आपकी परिभाषा के मुताबिक़ यही तरीका है न? जैसे आप, वैसे आपके विचार। जैसे आपके सिद्धान्त, जैसे आपके विश्वास—एक से बढ़कर एक वाहियात हैं—बृहस्पति देवता को प्रसन्न करने के लिए, शनि देवता को प्रसन्न करने के लिए लोहे की अंगूठी पहन लीजिए
आपकी परिभाषा से देवताओं को इन वस्तुओं के द्वारा प्रसन्न होना चाहिए। इन वस्तुओं के द्वारा बृहस्पति को प्रसन्न करने का क्या तरीका है? पीपल का पत्ता, केले का पत्ता, केले के पत्ते पर हल्दी, हल्दी के ऊपर आँवला, आँवले के ऊपर सुपारी लेकर के चले जाइए और बरगद के नीचे रख करके आइए, बृहस्पति देवता प्रसन्न हो जाएँगे। आपकी परिभाषा के मुताबिक़ यही तरीका है न?

बहुदेववाद को समझें, भ्रम-जंजाल में न उलझें (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
ये देवियाँ, ये देवता किस कदर हमारे ऊपर हावी हो गए हैं, मैं क्या कह सकता हूँ आपसे? ये देवी-देवता इस कदर हावी हैं हमारे ऊपर कि इन देवी-देवताओं के बिना हम एक कदम नहीं चल सकते। किसी गाँव में आप चले जाइये, पीपल के पेड़ के नीचे तरह-तरह के रंग-बिरंगे निरे (बहुत-से) देवता बैठे हुए हैं। पत्थर का टुकड़ा कहीं से भी मिल जाए बस! वो देवी हो जाता है। हमारे यहाँ शीतला माई की जात होती है
ब्राह्मण देवता हैं? हाँ, देवता होते थे। देवता कौन? जिन्होंने मुट्ठी भर अनाज खाया; जिन्होंने फटे-पुराने कपड़े पहने; जिन्होंने लँगोटी पहनी; जिन्होंने पीपल के ऊपर गुजारा कर लिया—पीपल की फलियाँ पर गुजारा कर लिया और जिन्होंने जमीन पर पड़े हुए दानों पर गुजारा कर लिया। गुजारा उन्होंने अपना किफायतशारी से कर लिया; लेकिन उन्होंने अपनी हजारों-लाखों कीमत की दिमाग की शक्ति और अपना कीमती वाला श्रम और पसीना बिना कीमत के सारे समाज के ऊपर बिखेर दिया। इनको हम क्या कहेंगे? देवता कहेंगे
दुनिया में हम ड्रामा करने के लिए आये हैं। ड्रामा हमारा यहाँ होता है और हमारा घर वहाँ रखा हुआ है, पीपल के पेड़ के नीचे। वहाँ पर आप जाकर के अपने-आपको देखिये, आपकी शक्ल कैसी है और चेहरा कैसा है? इसके लिए मुर्दे की खोपड़ी को देखा कीजिए, जिसको आप हर बार क्रीम लगाते हैं, पाउडर लगाते हैं और जिसकी शक्ल आप बार-बार शीशे में देखते रहते हैं; उसका असली स्वरूप क्या है? जरा एक खोपड़ी को देखिये और आपके गले में, आपके हृदय में वो खोपड़ी भी रहनी चाहिए और आपके शरीर के ऊपर मुर्दे की राख भी रहनी चाहिए और आपको यह ध्यान रहना चाहिए कि हमारा असली निवास कहाँ है?
दुनिया में हम ड्रामा करने के लिए आये हैं। ड्रामा हमारा यहाँ होता है और हमारा घर वहाँ रखा हुआ है, पीपल के पेड़ के नीचे। वहाँ पर आप जाकर के अपने-आपको देखिये, आपकी शक्ल कैसी है और चेहरा कैसा है? इसके लिए मुर्दे की खोपड़ी को देखा कीजिए, जिसको आप हर बार क्रीम लगाते हैं, पाउडर लगाते हैं और जिसकी शक्ल आप बार-बार शीशे में देखते रहते हैं; उसका असली स्वरूप क्या है? जरा एक खोपड़ी को देखिये और आपके गले में, आपके हृदय में वो खोपड़ी भी रहनी चाहिए और आपके शरीर के ऊपर मुर्दे की राख भी रहनी चाहिए और आपको यह ध्यान रहना चाहिए कि हमारा असली निवास कहाँ है? शंकर भगवान मौत के देव हैं। मौत के देव—जिनको हमने भुला दिया है

श्रद्धा, सिद्धान्तों के प्रति हो (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
हम देखेंगे कि जिन लोगों को हम पीछे छोड़कर आए थे, उन्होंने हमारी परम्परा को निबाहा है और अगर हमको यह मालूम पड़ा कि इन्होंने हमारी परम्परा नहीं निबाही और इन्होंने व्यक्तिगत ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया और अपना व्यक्तिगत अहंकार, अपनी व्यक्तिगत यश−कामना और व्यक्तिगत धन-संग्रह करने का सिलसिला शुरू कर दिया। व्यक्तिगत रूप से बड़ा आदमी बनना शुरू कर दिया, तो हमारी आँखों से आँसू टपकेंगे और जहाँ कहीं भी हम भूत होकर के पीपल के पेड़ पर बैठेंगे, वहाँ जाकर के हमारी आँखों से जो आँसू टपकेंगे-आपको चैन से नहीं बैठने देंगे और मैं कुछ कहता नहीं हूँ। आपको हैरान कर देंगे हैरान। दुर्वासा ऋषि के पीछे विष्णु भगवान का चक्र लगा था तो दुर्वासा जी तीनों लोकों में घूम आए थे, पर उनको चैन नहीं मिला था

युग निर्माण योजना के आदर्श और सिद्धान्त (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
(५) वन्य प्रदेश में वर्षा अधिक क्यों होती है? (६) वनों से नेत्रों की तेजी बढ़ती है- सिद्ध करो। (७) फल- फूल एवं हरियाली के लाभ बताइये? (८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है? (९) पीपल, बड़ एवं आँवले की पूजा क्यों की जाती है? (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं?
(५) वन्य प्रदेश में वर्षा अधिक क्यों होती है? (६) वनों से नेत्रों की तेजी बढ़ती है- सिद्ध करो। (७) फल- फूल एवं हरियाली के लाभ बताइये? (८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है? (९) पीपल, बड़ एवं आँवले की पूजा क्यों की जाती है? (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं? तुलसी हमारे हर घर में शोभायमान रहे प्राचीनकाल में यह प्रथा में तुलसी की उपयोगिता से नित्य प्रति लाभ उठाने और उसके प्रति श्रद्धा बनाये रखने का भाव था। निःसन्देह यह साधारण दीखने वाला पौधा अपनी संस्कृति में उसे इतना ऊँचा स्थान मिला है। पद्मपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, वृहद् धर्म पुराण, स्कन्दपुराण, गरुड़पुराण आदि में तुलसी की महिमा के सम्बन्ध में अनेक अध्याय पाये जाते हैं, जिनमें धार्मिक उपाख्यानों के रूप में उसके प्रभाव और लाभों का वर्णन किया गया है
तीन-चार वर्ष में उनकी रखवाली, सिंचाई आदि का प्रबन्ध कर लिया जाये तो आगे फिर उनके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ता है। आम, जामुन, खिरनी, महुआ, कटहल, आँवला, गूलर, पीपल जैसे वृक्ष एक बार लगे तो सदा के लिए निश्चिन्तता हो गई। अंगूर, केले, पपीते जैसे सामान्य फलों को तो खेल-खेल में ही थोड़ी-सी जगह में उगाया जा सकता हैं और हरियाली की शोभा के साथ बहुमूल्य आहार भी प्राप्त किया जा सकता है। दुर्भाग्य से अपने देश में वृक्षारोपण के लाभों की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं जबकि सुविकसित देशों में उनके सम्वर्धन के लिए हर नागरिक में पूरा उत्साह पाया जाता है
धर्म-शास्त्रों में वृक्ष लगाने का पुण्य बहुत माना गया है। पीपल, बरगद, आँवला जैसे वृक्षों की तो पूजा भी होती है। लोकोपयोगी हर कार्य धर्म, पुण्य की गणना में आता है। इस दृष्टि से शास्त्रों और ऋषियों ने वृक्षारोपण को यदि स्वर्गदाता परमार्थ बताया है तो उनका मन्तव्य सच ही माना जाना चाहिए
तीन-चार वर्ष में उनकी रखवाली, सिंचाई आदि का प्रबन्ध कर लिया जाये तो आगे फिर उनके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ता है। आम, जामुन, खिरनी, महुआ, कटहल, आँवला, गूलर, पीपल जैसे वृक्ष एक बार लगे तो सदा के लिए निश्चिन्तता हो गई। अंगूर, केले, पपीते जैसे सामान्य फलों को तो खेल-खेल में ही थोड़ी-सी जगह में उगाया जा सकता हैं और हरियाली की शोभा के साथ बहुमूल्य आहार भी प्राप्त किया जा सकता है

युग निर्माण योजना के आदर्श और सिद्धान्त (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
(५) वन्य प्रदेश में वर्षा अधिक क्यों होती है? (६) वनों से नेत्रों की तेजी बढ़ती है- सिद्ध करो। (७) फल- फूल एवं हरियाली के लाभ बताइये? (८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है? (९) पीपल, बड़ एवं आँवले की पूजा क्यों की जाती है? (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं?
(५) वन्य प्रदेश में वर्षा अधिक क्यों होती है? (६) वनों से नेत्रों की तेजी बढ़ती है- सिद्ध करो। (७) फल- फूल एवं हरियाली के लाभ बताइये? (८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है? (९) पीपल, बड़ एवं आँवले की पूजा क्यों की जाती है? (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं? तुलसी हमारे हर घर में शोभायमान रहे प्राचीनकाल में यह प्रथा में तुलसी की उपयोगिता से नित्य प्रति लाभ उठाने और उसके प्रति श्रद्धा बनाये रखने का भाव था। निःसन्देह यह साधारण दीखने वाला पौधा अपनी संस्कृति में उसे इतना ऊँचा स्थान मिला है। पद्मपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, वृहद् धर्म पुराण, स्कन्दपुराण, गरुड़पुराण आदि में तुलसी की महिमा के सम्बन्ध में अनेक अध्याय पाये जाते हैं, जिनमें धार्मिक उपाख्यानों के रूप में उसके प्रभाव और लाभों का वर्णन किया गया है
तीन-चार वर्ष में उनकी रखवाली, सिंचाई आदि का प्रबन्ध कर लिया जाये तो आगे फिर उनके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ता है। आम, जामुन, खिरनी, महुआ, कटहल, आँवला, गूलर, पीपल जैसे वृक्ष एक बार लगे तो सदा के लिए निश्चिन्तता हो गई। अंगूर, केले, पपीते जैसे सामान्य फलों को तो खेल-खेल में ही थोड़ी-सी जगह में उगाया जा सकता हैं और हरियाली की शोभा के साथ बहुमूल्य आहार भी प्राप्त किया जा सकता है। दुर्भाग्य से अपने देश में वृक्षारोपण के लाभों की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं जबकि सुविकसित देशों में उनके सम्वर्धन के लिए हर नागरिक में पूरा उत्साह पाया जाता है
धर्म-शास्त्रों में वृक्ष लगाने का पुण्य बहुत माना गया है। पीपल, बरगद, आँवला जैसे वृक्षों की तो पूजा भी होती है। लोकोपयोगी हर कार्य धर्म, पुण्य की गणना में आता है। इस दृष्टि से शास्त्रों और ऋषियों ने वृक्षारोपण को यदि स्वर्गदाता परमार्थ बताया है तो उनका मन्तव्य सच ही माना जाना चाहिए
तीन-चार वर्ष में उनकी रखवाली, सिंचाई आदि का प्रबन्ध कर लिया जाये तो आगे फिर उनके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ता है। आम, जामुन, खिरनी, महुआ, कटहल, आँवला, गूलर, पीपल जैसे वृक्ष एक बार लगे तो सदा के लिए निश्चिन्तता हो गई। अंगूर, केले, पपीते जैसे सामान्य फलों को तो खेल-खेल में ही थोड़ी-सी जगह में उगाया जा सकता हैं और हरियाली की शोभा के साथ बहुमूल्य आहार भी प्राप्त किया जा सकता है

गायत्री महाविज्ञान भाग १ (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
समिधा- बेल, छौंकर, करील। सामग्री- रक्त चन्दन, तगर, असगन्ध, जायफल, कमलगट्टा, नागकेशर, पीपल बड़ी, कुटकी, चिरायता, अपामार्ग, काकड़ासिंगी, पोहकरमूल, कुलञ्जन, मूसली स्याह, मेथी के बीज, काकजंघा, भारंगी, अकरकरा, पिस्ता, अखरोट, चिरौंजी, तिल, उड़द, गुड़। गुणों के अनुसार साधन- सामग्री उपयोग करने से साधक में उन्हीं गुणों की अभिवृद्धि होती है, तदनुसार सफलता का मार्ग अधिक सुगम हो जाता है। नवदुर्गाओं में गायत्री साधना यों तो वर्षा, शरद, शिशिर, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म- ये छ ऋतुएँ होती हैं और मोटे तौर से सर्दी, गर्मी, वर्षा ये तीन ऋतु मानी जाती हैं, पर वस्तुत दो ही ऋतु हैं- (१) सर्दी (२) गर्मी
लाल वस्त्र पहनकर सिंहारूढ़, खड्गहस्ता, विकराल वदना, दुर्गा वेशधारी गायत्री का ध्यान करना चाहिए। जिन व्यक्तियों का द्वेष- दुर्भाव निवारण करना हो, उनका नाम पीपल के पत्ते पर रक्तचन्दन की स्याही और अनार की कलम से लिखना चाहिए। इस पत्ते को उलटा रखकर प्रत्येक मन्त्र के बाद जल पात्र में से एक छोटी चम्मच भर के जल लेकर उस पत्ते पर डालना चाहिए। इस प्रकार १०८ मन्त्र जपने चाहिए
इस प्रकार की घटनायें घटित होने पर गायत्री शक्ति द्वारा उपचार किया जा सकता है। पीपल वृक्ष की समिधाओं से विधिवत् हवन करके उसकी भस्म को सुरक्षित रख लेना चाहिए। अपनी नासिका का जो स्वर चल रहा है, उसी हाथ पर थोड़ी- सी भस्म रखकर दूसरे हाथ से उसे अभिमन्त्रित करता चले और बीच में ‘हूं’ बीजमन्त्र का सम्पुट लगावे तथा रक्तवर्ण अश्वारूढ़ा गायत्री का ध्यान करता हुआ उस भस्म को विषैले कीड़े के काटे हुए स्थान पर दो- चार मिनट मसले। पीड़ा में जादू के समान आराम होता है
तिलक- चन्दन। हवन में समिधा- पीपल, बड़, गूलर। हवन सामग्री- श्वेत चन्दन, अगर, छोटी इलायची, लौंग, शंखपुष्पी, ब्राह्मणी, शतावरी, खस, शीतलचीनी, आँवला, इन्द्रजौ, वंशलोचन, जावित्री, गिलोय, वच, नेत्रवाला, मुलहठी, कमल, केशर, बड़ की जटाएँ, नारियल, बादाम, दाख, जौ, मिश्री। रजोगुण- माला- चन्दन

युग निर्माण की शिक्षण प्रक्रिया-2 (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
(८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है। (९) पीपल, बड़ एवं आँवलेइ की पूजा क्यों की जाती हैं। (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं। कथाएँ —— (१) मास्टर साहब ने प्रश्न किया बताओ सहारा में जल क्यों नहीं मिलता और अफ्रीका में अमोजन नदी जितना पानी क्यों है? छात्र ने उत्तर दिया सहारा रेगिस्तान है अफ्रीका में घने जंगल हैं

गायत्री महाविज्ञान भाग २ (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
पहाड़ की चोटी पर, नदी किनारे, बिल्व वृक्ष के नीचे नदी या तालाब पर, गौशाला में, देव मन्दिर में, पीपल के नीचे, बगीची में, तुलसी-वन में, तीर्थ-स्थान में, गुरु के निकट या जहाँ चित्त की एकाग्रता बढ़ती हो उस स्थान पर मन्त्र जानने वाले को पुरश्चरण करना चाहिए, वहाँ सिद्धि मिलती है, इसमें सन्देह नहीं
अश्वत्थ समिधो हुत्या युद्धादौ जयमाप्नुयात्। अर्कस्य समिधो हुत्वा सर्वत्र विजयी भवेत्॥54॥  —दे. भा. 11/24/56  पीपल की समिधाओं से हवन करने पर युद्ध में विजय प्राप्त होती है। आक की समिधाओं से हवन करने पर सर्वत्र ही विजय होती है। संयुक्तेः पयसा पत्रैः पुष्पैर्वा वेतसस्य च
हे मुने! अधिक समय तक जीने की इच्छा वाला विद्वान् राजा इस कार्य को अवश्य कराए तथा इस अभिषेक के समय ऋत्विजों को सौ गायों की दक्षिणा देनी चाहिए या ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करने वाली दूसरी दक्षिणा देनी चाहिए अथवा अपनी शक्ति के अनुसार जो हो सके, वह देनी चाहिए। शनिवार के दिन जो ब्राह्मण, पीपल के नीचे बैठकर सौ बार जप करता है, वह निःसन्देह भूत बाधा आदि से विमुक्त होता है। गुडूच्याः पर्व विच्छिन्नैर्जुहुयाद्दुग्ध-सिक्तकैः। द्विजो मृत्युञ्जयो होमः सर्व व्याधिविनाशनः॥22॥ जो द्विज गुर्च (गिलोय) की समिधाओं को दूध में डुबा-डुबाकर हवन करता है, वह सम्पूर्ण व्याधियों से छुटकारा पा जाता है
गोष्ठे देवालयेऽश्वत्थे उद्याने तुलसी वने ॥ पुण्य क्षेत्रे गुरोः पार्श्वे चित्तैकाग्रयस्थलेऽपि च। पुरश्चरणकृन्मंत्री सिध्यत्येव न संशयः ॥ —विश्वामित्र कल्प पहाड़ की चोटी पर, नदी किनारे, बिल्व वृक्ष के नीचे नदी या तालाब पर, गौशाला में, देव मन्दिर में, पीपल के नीचे, बगीची में, तुलसी-वन में, तीर्थ-स्थान में, गुरु के निकट या जहाँ चित्त की एकाग्रता बढ़ती हो उस स्थान पर मन्त्र जानने वाले को पुरश्चरण करना चाहिए, वहाँ सिद्धि मिलती है, इसमें सन्देह नहीं। क्षीराहारी फलाशी वा शाकाशी वा हविष्यभुक्। भिक्षाशी वा जपेद्यत्तत्कृच्छ्र चान्द्रसमं भवेत् ॥ दूध पीने वाला, फल खाने वाला, शाक खाने वाला, हविष्यान्न खाने वाला या भिक्षान्न खाने वाला यदि जप करे, तो वह कृच्छ्र के समान होता है अर्थात् फिर उसे जप करने में पूर्ण कृच्छ्र करने की आवश्यकता नहीं होती है
हे मुने! अधिक समय तक जीने की इच्छा वाला विद्वान् राजा इस कार्य को अवश्य कराए तथा इस अभिषेक के समय ऋत्विजों को सौ गायों की दक्षिणा देनी चाहिए या ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करने वाली दूसरी दक्षिणा देनी चाहिए अथवा अपनी शक्ति के अनुसार जो हो सके, वह देनी चाहिए। शनिवार के दिन जो ब्राह्मण, पीपल के नीचे बैठकर सौ बार जप करता है, वह निःसन्देह भूत बाधा आदि से विमुक्त होता है
पीपल की समिधाओं से हवन करने पर युद्ध में विजय प्राप्त होती है। आक की समिधाओं से हवन करने पर सर्वत्र ही विजय होती है

हमारी वसीयत और विरासत - 1 (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
ऋषि पिप्पलाद ने ऋषिकेश के समीप ही अन्न के मन पर प्रभाव का अनुसन्धान किया था। वे पीपल वृक्ष के फलों पर निर्वाह करके आत्म संयम द्वारा ऋषित्व पा सके। हमने २४ वर्ष तक जौ की रोटी एवं छाछ पर रहकर गायत्री अनुष्ठान किए। तदुपरान्त आजीवन उबले आहार, अन्न-शाक पर ही रहे

युग निर्माण योजना के आदर्श और सिद्धान्त (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
(५) वन्य प्रदेश में वर्षा अधिक क्यों होती है? (६) वनों से नेत्रों की तेजी बढ़ती है- सिद्ध करो। (७) फल- फूल एवं हरियाली के लाभ बताइये? (८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है? (९) पीपल, बड़ एवं आँवले की पूजा क्यों की जाती है? (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं?
(५) वन्य प्रदेश में वर्षा अधिक क्यों होती है? (६) वनों से नेत्रों की तेजी बढ़ती है- सिद्ध करो। (७) फल- फूल एवं हरियाली के लाभ बताइये? (८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है? (९) पीपल, बड़ एवं आँवले की पूजा क्यों की जाती है? (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं? तुलसी हमारे हर घर में शोभायमान रहे प्राचीनकाल में यह प्रथा में तुलसी की उपयोगिता से नित्य प्रति लाभ उठाने और उसके प्रति श्रद्धा बनाये रखने का भाव था। निःसन्देह यह साधारण दीखने वाला पौधा अपनी संस्कृति में उसे इतना ऊँचा स्थान मिला है। पद्मपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, वृहद् धर्म पुराण, स्कन्दपुराण, गरुड़पुराण आदि में तुलसी की महिमा के सम्बन्ध में अनेक अध्याय पाये जाते हैं, जिनमें धार्मिक उपाख्यानों के रूप में उसके प्रभाव और लाभों का वर्णन किया गया है
तीन-चार वर्ष में उनकी रखवाली, सिंचाई आदि का प्रबन्ध कर लिया जाये तो आगे फिर उनके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ता है। आम, जामुन, खिरनी, महुआ, कटहल, आँवला, गूलर, पीपल जैसे वृक्ष एक बार लगे तो सदा के लिए निश्चिन्तता हो गई। अंगूर, केले, पपीते जैसे सामान्य फलों को तो खेल-खेल में ही थोड़ी-सी जगह में उगाया जा सकता हैं और हरियाली की शोभा के साथ बहुमूल्य आहार भी प्राप्त किया जा सकता है। दुर्भाग्य से अपने देश में वृक्षारोपण के लाभों की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं जबकि सुविकसित देशों में उनके सम्वर्धन के लिए हर नागरिक में पूरा उत्साह पाया जाता है
धर्म-शास्त्रों में वृक्ष लगाने का पुण्य बहुत माना गया है। पीपल, बरगद, आँवला जैसे वृक्षों की तो पूजा भी होती है। लोकोपयोगी हर कार्य धर्म, पुण्य की गणना में आता है। इस दृष्टि से शास्त्रों और ऋषियों ने वृक्षारोपण को यदि स्वर्गदाता परमार्थ बताया है तो उनका मन्तव्य सच ही माना जाना चाहिए
तीन-चार वर्ष में उनकी रखवाली, सिंचाई आदि का प्रबन्ध कर लिया जाये तो आगे फिर उनके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ता है। आम, जामुन, खिरनी, महुआ, कटहल, आँवला, गूलर, पीपल जैसे वृक्ष एक बार लगे तो सदा के लिए निश्चिन्तता हो गई। अंगूर, केले, पपीते जैसे सामान्य फलों को तो खेल-खेल में ही थोड़ी-सी जगह में उगाया जा सकता हैं और हरियाली की शोभा के साथ बहुमूल्य आहार भी प्राप्त किया जा सकता है

संस्मरण - आ० डॉ. अमल कुमार दत्ता जी - 2 (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
अभी हम अन्धा हो गए हैं। एक मचान बनाए हैं पीपल का पेड़ नीम का पेड़ है, बड़ का पेड़ हैं, पाकर का पेड़ है चार पेड़ के नीचे मचान एक बनाए हैं बांस के तख्ता का उसी पर बैठकर हमारा सारा समय बीतता है और सुबह नहाकर वहीं ४५ माला का जप करते हैं। दोपहर को जब आदमी नहीं रहता है तो मौन मानसिक जप करते हैं शाम में हम आरती करते हैं, प्रार्थना करते हैं भोग लगाते हैं और उस समय भी हम जप करते हैं शाम को भी एक माला का जप करते हैं। अब हमारा काम है कोई आ गया तो उससे बात करना नहीं तो भगवान के नाम का जप करना

युग निर्माण योजना के आदर्श और सिद्धान्त (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
(५) वन्य प्रदेश में वर्षा अधिक क्यों होती है? (६) वनों से नेत्रों की तेजी बढ़ती है- सिद्ध करो। (७) फल- फूल एवं हरियाली के लाभ बताइये? (८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है? (९) पीपल, बड़ एवं आँवले की पूजा क्यों की जाती है? (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं?
(५) वन्य प्रदेश में वर्षा अधिक क्यों होती है? (६) वनों से नेत्रों की तेजी बढ़ती है- सिद्ध करो। (७) फल- फूल एवं हरियाली के लाभ बताइये? (८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है? (९) पीपल, बड़ एवं आँवले की पूजा क्यों की जाती है? (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं? तुलसी हमारे हर घर में शोभायमान रहे प्राचीनकाल में यह प्रथा में तुलसी की उपयोगिता से नित्य प्रति लाभ उठाने और उसके प्रति श्रद्धा बनाये रखने का भाव था। निःसन्देह यह साधारण दीखने वाला पौधा अपनी संस्कृति में उसे इतना ऊँचा स्थान मिला है। पद्मपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, वृहद् धर्म पुराण, स्कन्दपुराण, गरुड़पुराण आदि में तुलसी की महिमा के सम्बन्ध में अनेक अध्याय पाये जाते हैं, जिनमें धार्मिक उपाख्यानों के रूप में उसके प्रभाव और लाभों का वर्णन किया गया है
तीन-चार वर्ष में उनकी रखवाली, सिंचाई आदि का प्रबन्ध कर लिया जाये तो आगे फिर उनके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ता है। आम, जामुन, खिरनी, महुआ, कटहल, आँवला, गूलर, पीपल जैसे वृक्ष एक बार लगे तो सदा के लिए निश्चिन्तता हो गई। अंगूर, केले, पपीते जैसे सामान्य फलों को तो खेल-खेल में ही थोड़ी-सी जगह में उगाया जा सकता हैं और हरियाली की शोभा के साथ बहुमूल्य आहार भी प्राप्त किया जा सकता है। दुर्भाग्य से अपने देश में वृक्षारोपण के लाभों की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं जबकि सुविकसित देशों में उनके सम्वर्धन के लिए हर नागरिक में पूरा उत्साह पाया जाता है
धर्म-शास्त्रों में वृक्ष लगाने का पुण्य बहुत माना गया है। पीपल, बरगद, आँवला जैसे वृक्षों की तो पूजा भी होती है। लोकोपयोगी हर कार्य धर्म, पुण्य की गणना में आता है। इस दृष्टि से शास्त्रों और ऋषियों ने वृक्षारोपण को यदि स्वर्गदाता परमार्थ बताया है तो उनका मन्तव्य सच ही माना जाना चाहिए
तीन-चार वर्ष में उनकी रखवाली, सिंचाई आदि का प्रबन्ध कर लिया जाये तो आगे फिर उनके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ता है। आम, जामुन, खिरनी, महुआ, कटहल, आँवला, गूलर, पीपल जैसे वृक्ष एक बार लगे तो सदा के लिए निश्चिन्तता हो गई। अंगूर, केले, पपीते जैसे सामान्य फलों को तो खेल-खेल में ही थोड़ी-सी जगह में उगाया जा सकता हैं और हरियाली की शोभा के साथ बहुमूल्य आहार भी प्राप्त किया जा सकता है

युग निर्माण योजना के आदर्श और सिद्धान्त (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
(५) वन्य प्रदेश में वर्षा अधिक क्यों होती है? (६) वनों से नेत्रों की तेजी बढ़ती है- सिद्ध करो। (७) फल- फूल एवं हरियाली के लाभ बताइये? (८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है? (९) पीपल, बड़ एवं आँवले की पूजा क्यों की जाती है? (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं?
(५) वन्य प्रदेश में वर्षा अधिक क्यों होती है? (६) वनों से नेत्रों की तेजी बढ़ती है- सिद्ध करो। (७) फल- फूल एवं हरियाली के लाभ बताइये? (८) वृक्षों से भूमि संरक्षण कैसे होता है? (९) पीपल, बड़ एवं आँवले की पूजा क्यों की जाती है? (१०) वृक्ष हमारी खाद्य समस्या को हल करने में कैसे सहायक होते हैं? तुलसी हमारे हर घर में शोभायमान रहे प्राचीनकाल में यह प्रथा में तुलसी की उपयोगिता से नित्य प्रति लाभ उठाने और उसके प्रति श्रद्धा बनाये रखने का भाव था। निःसन्देह यह साधारण दीखने वाला पौधा अपनी संस्कृति में उसे इतना ऊँचा स्थान मिला है। पद्मपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, वृहद् धर्म पुराण, स्कन्दपुराण, गरुड़पुराण आदि में तुलसी की महिमा के सम्बन्ध में अनेक अध्याय पाये जाते हैं, जिनमें धार्मिक उपाख्यानों के रूप में उसके प्रभाव और लाभों का वर्णन किया गया है
तीन-चार वर्ष में उनकी रखवाली, सिंचाई आदि का प्रबन्ध कर लिया जाये तो आगे फिर उनके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ता है। आम, जामुन, खिरनी, महुआ, कटहल, आँवला, गूलर, पीपल जैसे वृक्ष एक बार लगे तो सदा के लिए निश्चिन्तता हो गई। अंगूर, केले, पपीते जैसे सामान्य फलों को तो खेल-खेल में ही थोड़ी-सी जगह में उगाया जा सकता हैं और हरियाली की शोभा के साथ बहुमूल्य आहार भी प्राप्त किया जा सकता है। दुर्भाग्य से अपने देश में वृक्षारोपण के लाभों की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं जबकि सुविकसित देशों में उनके सम्वर्धन के लिए हर नागरिक में पूरा उत्साह पाया जाता है
धर्म-शास्त्रों में वृक्ष लगाने का पुण्य बहुत माना गया है। पीपल, बरगद, आँवला जैसे वृक्षों की तो पूजा भी होती है। लोकोपयोगी हर कार्य धर्म, पुण्य की गणना में आता है। इस दृष्टि से शास्त्रों और ऋषियों ने वृक्षारोपण को यदि स्वर्गदाता परमार्थ बताया है तो उनका मन्तव्य सच ही माना जाना चाहिए
तीन-चार वर्ष में उनकी रखवाली, सिंचाई आदि का प्रबन्ध कर लिया जाये तो आगे फिर उनके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ता है। आम, जामुन, खिरनी, महुआ, कटहल, आँवला, गूलर, पीपल जैसे वृक्ष एक बार लगे तो सदा के लिए निश्चिन्तता हो गई। अंगूर, केले, पपीते जैसे सामान्य फलों को तो खेल-खेल में ही थोड़ी-सी जगह में उगाया जा सकता हैं और हरियाली की शोभा के साथ बहुमूल्य आहार भी प्राप्त किया जा सकता है

समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान-5 (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
इनके एक भाग में चैत्य होता है, जिसमें प्रमुख भिक्षुओं की अस्थियाँ स्थापित की जाती हैं। इन विहारों में एक बुद्ध का प्रतिमा मन्दिर होता है और बोधि वृक्ष के वंशज पीपल के पेड़ की स्थापना की जाती है। प्रवचन और साधन प्रायः यहीं होते हैं
इनके एक भाग में चैत्य होता है, जिसमें प्रमुख भिक्षुओं की अस्थियाँ स्थापित की जाती हैं। इन विहारों में एक बुद्ध का प्रतिमा मन्दिर होता है और बोधि वृक्ष के वंशज पीपल के पेड़ की स्थापना की जाती है। प्रवचन और साधन प्रायः यहीं होते हैं। श्रीलंका और वर्मा में इन दिनों बौद्ध धर्म के प्रसार-विस्तार का कुछ कहने योग्य उत्साह दिखाई देता है

आपत्तिकाल का अध्यात्म (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
योगी की परिभाषा एक ही है कि योगी दिन में सोया करता है और रात में जागा करता है। क्या मतलब है इसका? यह ‘‘आश्वत्थम् प्राहुरव्ययम्’’ अर्थात पीपल का पेड़ है जिसकी टाँगें ऊपर हैं, जड़ें ऊपर हैं और उसकी शाखाएँ एवं पत्ते नीचे हैं। मतलब यह कि दुनिया वाले जिधर चलते हैं, उससे ये तरकीबें भिन्न हैं। दुनिया वाले लोगों के सोचने, करने का जो तरीका है, आकाँक्षाओं, इच्छाओं का जो ढंग है, उससे आध्यात्मिक जीवन की प्रक्रियाएँ भिन्न हैं, जिन्हें अलग ढंग से करना पड़ता है

बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक 31-40 (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
श्रवण कुमार ने गंगाजल के स्थान पर अपने अन्धे माता-पिता को काँवर में बिठाकर तीर्थ यात्रा की थी। जो लोग दूर नहीं जा सकते, समीप ही तीर्थ यात्रा का पुण्य लेना चाहते हैं, वे विशिष्ट पर्वों पर पीपल, बरगद, आँवला, तुलसी आदि की अमुक संख्या में परिक्रमा कर लेते हैं। देवालयों की प्रदक्षिणा की जाती है। यज्ञ की पूर्णाहुति के समय चार परिक्रमाएँ करने का विधान है

बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक 201-210 (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
गाय की अपेक्षा भैंस के दूध में मक्खन और स्वाद दोनों अधिक होते हैं, पर महत्त्व गौ के दूध से बने पंचगव्य को ही दिया जाता है। तुलसी, आँवले और पीपल के पौधों की अपेक्षा दूसरे पौधे अधिक फलप्रद, आर्थिक एवं स्वाद की दृष्टि से उपयोगी हो सकते हैं, पर उनमें प्राप्त सूक्ष्म संस्कारों के आधार पर उन्हें जो देवोपम श्रद्धा दी जाती है वह अन्य पौधों, वृक्षों को नहीं
गाय की अपेक्षा भैंस के दूध में मक्खन और स्वाद दोनों अधिक होते हैं, पर महत्त्व गौ के दूध से बने पंचगव्य को ही दिया जाता है। तुलसी, आँवले और पीपल के पौधों की अपेक्षा दूसरे पौधे अधिक फलप्रद, आर्थिक एवं स्वाद की दृष्टि से उपयोगी हो सकते हैं, पर उनमें प्राप्त सूक्ष्म संस्कारों के आधार पर उन्हें जो देवोपम श्रद्धा दी जाती है वह अन्य पौधों, वृक्षों को नहीं। यज्ञ प्रक्रिया में प्रायः हर पदार्थ की कारण शक्ति को उभारा जाता है तभी वह यजनकर्ता के मन और अन्तःकरण में अभीष्ट परिवर्तन ला सकती है। यदि इसी प्रकार के प्रयत्न न किये जायें तो फिर यह अग्निहोत्र अपना प्रभाव वाष्पीकरण स्तर का ही दिखा सकेगा, आग जलाने से भी कई तरह के लाभ उठाये जा सकते हैं, प्रायः वैसा ही कुछ यज्ञ धूम्र भी कर सकता है

बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक 211-220 (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
तीर्थयात्रा षोडश संस्कारों को मनाना, शिखा और सूत्र को मान्यता देते हुए आदर्शवादिता का पक्षधर स्वयं को घोषित करना व्रत स्नान तथा पीपल, तुलसी जैसे स्थावर पवित्र प्रतीकों की आराधना भी इसी प्रकार भारतीय संस्कृति की शाश्वत परम्पराएँ हैं, जो उद्देश्य विशेष को लेकर प्रचलित की गयी थी। इन सभी के साथ जो आदर्शवादिता, सुसंस्कारिता का शिक्षण, आरोपण जुड़ा हुआ है वही भारतीय संस्कृति को श्रेष्ठता के शिखर पर पहुँचाता हैं। दायित्व हमारा है कि हम इन मान्यताओं को विकृतियों के दलदल से उबारे एवं स्वयं अपनाकर अपना व संसार का भविष्य उज्ज्वल बनाएँ
भारतीय धर्म में प्रतीक पूजा के माध्यम से उपयोगी उपकारी पदार्थों, शक्तियों एवं व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है और उनमें जो श्रेष्ठता सन्निहित है उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने एवं अपनाने का भाव है। तीर्थयात्रा षोडश संस्कारों को मनाना, शिखा और सूत्र को मान्यता देते हुए आदर्शवादिता का पक्षधर स्वयं को घोषित करना व्रत स्नान तथा पीपल, तुलसी जैसे स्थावर पवित्र प्रतीकों की आराधना भी इसी प्रकार भारतीय संस्कृति की शाश्वत परम्पराएँ हैं, जो उद्देश्य विशेष को लेकर प्रचलित की गयी थी। इन सभी के साथ जो आदर्शवादिता, सुसंस्कारिता का शिक्षण, आरोपण जुड़ा हुआ है वही भारतीय संस्कृति को श्रेष्ठता के शिखर पर पहुँचाता हैं। दायित्व हमारा है कि हम इन मान्यताओं को विकृतियों के दलदल से उबारे एवं स्वयं अपनाकर अपना व संसार का भविष्य उज्ज्वल बनाएँ

बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक 1-10 (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
खान-पान के सम्बन्ध में इन बातों का विशेष ध्यान उन लोगों को रखना चाहिए, जो अपनी चित्त वृत्तियों को उच्चस्तरीय रखना चाहते है और चिन्तन में अवांछनीयता को घुसने न देने के लिए विशेष रूप से इच्छुक है। पिप्पलाद ऋषि ने मात्र पीपल के फल खाकर निर्वाह किया था। औदुम्वर ऋषि गूलर मात्र लेकर जीवनचर्या चलाते थे। कणाद जंगली घासों से उपलब्ध होने वाले साँवा, मकरा, कोदों, साठी जैसे अनायास ही उत्पन्न होने वाले बीज कणों को समेट कर पेट भरते थे
पिप्पलाद ऋषि ने मात्र पीपल के फल खाकर निर्वाह किया था। औदुम्वर ऋषि गूलर मात्र लेकर जीवनचर्या चलाते थे। कणाद जंगली घासों से उपलब्ध होने वाले साँवा, मकरा, कोदों, साठी जैसे अनायास ही उत्पन्न होने वाले बीज कणों को समेट कर पेट भरते थे

देवात्मा हिमालय एवं ऋषि-परम्परा (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
वह भी यहीं रहते थे हिमालय पर, लक्ष्मण झूला के पास। पीपल के फल खाकर के ही उन्होंने जिन्दगी काट दी थी, क्योंकि वे जानते थे—‘जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन’—यदि हम अपने मन को अच्छा बनाने की फिकर में हैं तो सबसे पहले शुरुआत अच्छे खाने से करनी चाहिए। अच्छे अन्न से करनी चाहिए। अच्छे अन्न का मतलब होता है कि बेईमानी से कमाया हुआ अन्न न हो
बिना हराम का जो अपने खून-पसीने से कमाया हो, उसी को खा करके रहना चाहिए। पीपल के पेड़ उन दिनों ज्यादा थे। उनके फल भी ज्यादा होते होंगे। तोड़-ताड़ कर उन्हें साल भर के लिए रख लेते रहे होंगे और उसे ही खाते रहे होंगे

आपत्तिकाल का अध्यात्म (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
योगी की परिभाषा एक ही है कि योगी दिन में सोया करता है और रात में जागा करता है। क्या मतलब है इसका? यह आश्वत्थम प्राहुरव्ययम् अर्थात पीपल का पेड़ है जिसकी टाँगें ऊपर हैं, जड़े ऊपर हैं और उसकी शाखाएँ एवं पत्ते नीचे हैं। मतलब यह कि दुनिया वाले जिधर चलते हैं, उससे ये तरकीबें भिन्न हैं। दुनिया वाले लोगों के सोचने, करने का जो तरीका है, आकांक्षाओं, इच्छाओं का जो ढंग है, उससे आध्यात्मिक जीवन की प्रक्रियाएँ भिन्न हैं, जिन्हें अलग ढंग से करना पड़ता है
योगी की परिभाषा एक ही है कि योगी दिन में सोया करता है और रात में जागा करता है। क्या मतलब है इसका? यह आश्वत्थम प्राहुरव्ययम् अर्थात पीपल का पेड़ है जिसकी टाँगें ऊपर हैं, जड़े

जीवन्त विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
जहाँ कहीं भी चमक ज्यादा दिखाई पड़ती है, वह मेरा विशेष अंश है। उन्होंने कहा, वृक्षों में मैं पीपल हूँ। छलों में मैं जुआ हूँ। वेदों में मैं सामवेद हूँ
भजन कर रहे हैं इधर और पीठ खुजा रहे हैं उधर। भला ऐसी कोई भक्ति होती है? तुलसीदास ने भक्ति की, तो कैसी मजेदार भक्ति की कि बस पीपल के पेड़ पर से, बेल के पेड़ पर से कौन आ गया? भूत आ गया। उन्होंने कहा कि हमको भगवान के दर्शन करा दो। उस भूत ने कहा कि भगवान के तो नहीं करा सकते, हनुमान जी के करा सकते हैं

देवात्मा हिमालय एवं ऋषि परम्परा (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
वह भी यहीं रहते थे हिमालय पर लक्ष्मण झूला के पास। पीपल के फल खाकर के ही उनने जिन्दगी काट दी थी, क्योंकि वे जानते थे-'जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन'। यदि हम अपने मन को अच्छा बनाने की फिक्र में हैं तो सबसे पहले शुरुआत अच्छे खाने से करनी चाहिए। अच्छे अन्न से करनी चाहिए
ऋषि पिप्पलाद ने ऋषिकेश के समीप ही अन्न के मन पर प्रभाव का अनुसन्धान किया था। वे पीपल वृक्ष के फलों पर निर्वाह करके आत्मसंयम द्वारा ऋषित्व पा सके। हमने २४ वर्ष तक जौ की रोटी एवं छाछ पर रहकर गायत्री अनुष्ठान किए। हर की पौड़ी हरिद्वार में सर्वमेध यज्ञ में हर्षवर्धन ने अपनी सारी संपदा तक्षशिला विश्वविद्यालय निर्माण हेतु दान कर दी थी
ऋषि पिप्पलाद ने ऋषिकेश के समीप ही अन्न के मन पर प्रभाव का अनुसन्धान किया था। वे पीपल वृक्ष के फलों पर निर्वाह करके आत्मसंयम द्वारा ऋषित्व पा सके। हमने २४ वर्ष तक जौ की रोटी एवं छाछ पर रहकर गायत्री अनुष्ठान किए
बिना हराम का जो अपने खून पसीने से कमाया हो, उसी को खा करके रहना चाहिए। पीपल के पेड़ उन दिनों ज्यादा थे। उनके फल भी ज्यादा होते होगे। तोड़-ताड़कर उन्हें साल भर के लिए रख लेते रहे होगे और उसे ही खाते रहे होंगे

कल्प साधना का उद्देश्य और स्वरूप (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
मन की चंचलता इतनी अधिक हो जाती है कि सामान्य कार्यों में भी एकत्रित हो पाना सम्भव नहीं हो पता। फिर साधना में अभीष्ट मनोयोग तो आहारशुद्धि बिना कैसे प्राप्त हो? पिप्पलाद ऋषि पीपलवृक्ष के फल खाकर निर्वाह करते थे। कणाद ऋषि जंगली धान्य समेटकर उससे सुधा शान्त करते थे। भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े हुए धर्मोपदेश दे रहे थे, तब द्रौपदी ने पूछा, "देव ! जब मुझे भरी सभा में नग्न किया जा रहा था, तब आपने कौरवों को यह उपदेश क्यों नहीं दिए
पिप्पलाद ऋषि पीपलवृक्ष के फल खाकर निर्वाह करते थे। कणाद ऋषि जंगली धान्य समेटकर उससे सुधा शान्त करते थे। भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े हुए धर्मोपदेश दे रहे थे, तब द्रौपदी ने पूछा, "देव ! जब मुझे भरी सभा में नग्न किया जा रहा था, तब आपने कौरवों को यह उपदेश क्यों नहीं दिए