भज सेवायाम् ही है भक्ति

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

देवियो, भाइयो! ज्ञानयोग और कर्मयोग इन दो योगों के सम्बन्ध में कल और परसों आपको हमने बताया कि आपको ज्ञानयोगी और कर्मयोगी होना चाहिए। ज्ञानयोग अर्थात् आपको ऐसा आदमी होना चाहिए, जिसे दूरदर्शी और विवेकवान कहते हैं। कर्मयोग अर्थात आपको अपने कर्तव्यों और फर्जों को पूरा करने वाला होना चाहिए, जैसे कि कर्मठ, बहादुर और जिम्मेदार आदमी हुआ करते हैं। ज्ञानयोग और कर्मयोग के बाद में एक और सबसे बड़ा योगाभ्यास रह जाता है, जिसका जाम है 'भक्तियोग'। चिन्तन में यही योग काम करता है। जीवन में इसका समावेश होना चाहिए। वे योग अलग हैं, जिनमें किसी तरह के अभ्यास किए जाते हैं। वह योगाभ्यास कहलाते हैं, जैसे प्राणायाम वगैरह। उस योगाभ्यास की बात मैं आपसे नहीं कह रहा हूँ। मैं तो आपसे उस योग की बात कह रहा हूँ, जो कि इनसान को भगवान के साथ जोड़ने में सहायक होता है। आदमी का आत्मज्ञान इनसान और भगवान को जोड़ देने में समर्थ होता है। कर्मयोग अर्थात् कर्तव्यपालन भी इनसान को भगवान के साथ छोड़ देता है। तीसरा है 'भक्तियोग', जिसके सम्बन्ध में ही आज आपके सामने निवेदन करना है।

भक्ति का अर्थ भावोन्माद नहीं

भक्ति किसे कहते हैं? 'भक्ति' शब्द मैं जान बूझकर उपयोग नहीं करूँगा, क्योंकि भक्ति के सम्बन्ध में इतनी ज्यादा गलतफहमियाँ लोगों में छा गई हैं कि मैं क्या कहूँ? लोगों की सम्वेदनाएँ, भावनाएँ उभर आएँ और वह केवल रोने लगे, नाचने लगे, उचकने लगे, मस्तक झुकाने लगे, हाथ जोड़ने लगे, प्रार्थना करने लगे, आँसू बहाने लगे, बस हो गई भक्ति? नहीं, यह भक्ति नहीं है। यह तो एक तरीके से भावोन्माद है, भाव-सम्वेदना है, जो कइयों को, देरी आदमियों को होता है। लोग बात-बात पर हँस जाते हैं। बहुत भी औरतें ऐसी होती हैं कि जरा सी बात हुई, गलत बात हुई और रोने लगती हैं। यह भावुकता है। सामूहिक भावुकता भक्ति की निशानी नहीं है। जैसे किं आमतौर से लोग समझते हैं। देवी-देवताओं के सामने नाक रगड़ना, गिड़गिड़ाना, आँसू बहाना, उछलना-कूदना, हल्ला-गुल्ला मचाना, उलटा पड़ जाना, सीधा बैठ जाना, नाचने लग जाना आदि बातों को करने वालों को लोग-बाग समझते हैं कि वह व्यक्ति बहुत बड़ा भक्त है। नहीं मित्रो! ये भावुकताएँ हैं। भावुकता की दृष्टि से तो ये क्रियाएँ ठीक हो भी सकती हैं, लेकिन जहाँ तक आध्यात्मिक उन्नति का सम्बन्ध है, इस तरह की भक्ति का योग से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है और न सीधे भगवान से ही। यह भक्तियोग नहीं है।

भक्ति किसे कहते हैं? भक्ति का सीधा-सादा अर्थ होता है, प्यार और मोहब्बत। प्यार और मोहब्बत आदमी के भीतर की एक ऐसी विशेषता है, जो जिस आदमी के भीतर होगी, उसको आरम्भ से ही स्नेह से लबालब, खुशहाल बनाए रखेगी। प्यार के बिना आदमी तो कहीं है ही नहीं। आनन्द की तलाश में जीवात्मा इधर-उधर घूमता रहता है। कभी इसके पास जाता है, कभी उसके पास जाता है। कभी वहाँ जाता है कि कहीं तो इसको आनन्द मिल जाए, कहीं सुख मिल जाए और जीवन का आनन्द उठा ले। वस्तुतः लोग समझते हैं कि वस्तुओं में आनन्द होता है, जैसे कि खाने-पीने की चीजों में लोग समझते हैं और कहते हैं कि आज तो बड़ा आनन्द आया। खाने को मिठाई मिली, नमकीन मिली, कचौड़ी मिली, क्या यही आनन्द है? नहीं यह आनन्द नहीं है। यह तो सम्वेदना है, आदमी की जीभ का जायका है। यह स्थायी नहीं हो सकता। जितनी देर तक आपका पेट नहीं भरा है, उतने समय तक के लिए तो यह भी हो सकता है कि आपको खाने के लिए जायकेदार चीजें मिलें। लेकिन वह तो क्षणिक हुआ न।

इसी प्रकार दूसरी तरह को चीजें हैं, जैसे आँखों से कोई दृश्य देखना है, तो आप थोड़े समय तक ही तो उसे देखेंगे। दो-ढाई घण्टे में सिर घूमने लगेगा और आपकी आँखें खराब होने लगेंगी। आप कितनी देर तक बैठेंगे सिनेमा में? ज्यादा देर तक नहीं बैठ सकते। यही बात कामवासना के सम्बन्ध में है। कामवासना का कितनी देर तक का सुख होता है? कुछ सेकण्डों का सुख होता है और इसके बाद में वही बातें बड़ी बुरी मालूम होने लगती हैं।

भीतर की मोहब्बत ही है आनन्द

मित्रो! आनन्द उस चीज का नाम है जो इंद्रियों से ताल्लुक नहीं रखता, वरन जीवात्मा से ताल्लुक रखता है। जीवात्मा का आनन्द किस तरीके से मिल सकता है, इसका एक ही उत्तर है और एक ही जबाब है। क्या उत्तर है? यही कि आदमी के भीतर की मोहब्बत का ही दूसरा नाम आनन्द है। उसी का नाम प्यार है। उसी का नाम प्रसन्नता है, उसी का नाम उत्साह है, उसी का नाम उल्लास है, उसी का नाम भाव-सम्वेदना है। यह सब प्यार के ऊपर टिका हुआ है। आपने देखा है न कि आप प्यार किस चीज को करते हैं? जो अपना है, जिसको आप अपना समझते हैं, उसी से तो प्यार करते हैं। जैसे आपकी साइकिल है, उसी भर से आप प्यार करते है, अन्यथा उस साइकिल स्टैण्ड पर इतनी सारी साइकिलें रखी हैं कि उनमें से किसी में छेद हो रहा है, तो कोई धूप में पड़ी है, लेकिन आपको तो केवल अपनी साइकिल की ही फिक्र है कि इसे लेकर हमको चलना चाहिए। जब तक कोई मोटर आपकी है, तब तक तो आपको ख्याल है कि इसकी मरम्मत होनी चाहिए। जब कोई बच्चा इसको छूने लगता है, तो आप उसे भगा देते हैं, लेकिन अगर पड़ोसियों की मोटरें खड़ी हों, बस स्टैण्ड पर मोटरें खड़ी हो, तो तब आपको उनसे क्या लेना-देना? जो चीजें अपनी हैं केवल वही चीजें प्यारी लगती हैं।

मित्रो! वस्तुतः यह प्यार ही खुशी की आवाज होती है। आप हर चीज को अपनी मानना शुरू कीजिए, फिर देखिए कि वह आपको प्यारी लगेगी कि नहीं? अपना बच्चा काला कुरूप होता है, नाक टपकती रहती है, पेट भी बढ़। हुआ होता है, बहुत भी बुरी आदतें भी होती हैं, फिर भी आप उसे गोदी में लिए फिरते हैं, क्योंकि वह हमारा है। लेकिन अगर पड़ोसी का बच्चा मचलता रहे और आपकी गोदी में आने की कोशिश करे, तो आप उसे धमकाकर भगा देते है, क्यों? बच्चे तो सब एक से होते हैं। नहीं साहब! वह हमारा है, इसलिए प्यारा है। 'हमारा होने से' जो कोई भी चीज हमारे सास है या होगी, बड़ी अच्छी मालूम पड़ेगी, खुशनुमा मालूम पड़ेगी, प्यारी मालूम पड़ेगी और उसकी उपस्थिति में भी आपको आनन्द मिलेगा। जिनको आप अपना मित्र मानते हैं सबसे प्यारा मानते हैं, उसका साथ मिलने में कितना आनन्द आता है। जिनको आप अपना मित्र मानते हैं, यदि वे आपके घर आ जाते हैं, तब कितनी खुशी होती है। क्यों? इसलिए कि आप उसको अपना मानते हैं।

अगर ऐसा न मानें तब? कोई भिखारी आ जाए तब? कोई ऐसा मेहमान आ जाए, जो आपका समय खराब करने चला आए, जिससे आपको कोई फायदा नहीं है, जिससे आपकी कोई जान-पहचान नहीं है, तब क्या आप उसको पसन्द करेंगे? स्वागत करेंगे? चाय पिलाएँगे? घंटों बातचीत करेंगे? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। आपसे कोई काम-काज की बात भी होगी, तो दो मिनट में बात करने के बाद उसे आप भगा देंगे। कहेंगे कि भाई! समय मत खराब कीजिए। ऐसा क्यों? एक मित्र जो आपके नजदीक आया था, उसका आप इतना स्वागत कर रहे थे, घंटों घुल-मिलकर बात कर रहे थे। अपना काम भी हर्ज कर रहे थे। दूसरा भी तो आदमी था, उससे क्यों नहीं की? क्योंकि वह हमारा नहीं था।

डालें प्यार की, आत्मीयता की टार्च

मित्रो! अपने और पराये का जो यह फर्क है, वह बहुत बड़ा फर्क है। अपना घनिष्ठ होता है। आपने देखा है न कि जब कभी आप टार्च जलाते हैं, तो जितनी चीजों के ऊपर टार्च का प्रकाश पड़ता है, उतनी दायरे की चीजें चमकती हैं, लेकिन जहाँ टार्च का प्रकाश नहीं पड़ता, वहाँ अन्धकार छाया रहता है। आप प्यार की टार्च, आत्मीयता की टार्च जहाँ कहीं भी डालेंगे, जिस किसी पर भी डालेंगे, वही चीज खुशनुमा मालूम पड़ेगी। हर तरीके से अच्छी-अच्छी बातें मालूम पड़ेगी, सुंदर मालूम पड़ेगी, बढ़िया मालूम पड़ेगी, लेकिन जिसको आप पराया मान लेंगे, वह कैसा ही सुंदर क्यों न हो, कैसा ही लुभावना क्यों न हो, आपको उससे कोई खास लगाव नहीं को सकता। लैला और मजनूँ का किस्सा सुना होगा आपने। लैला स्याह काले रग की थी, बिलकुल काली-कलूटी, लेकिन मजनूँ उसके ऊपर इतना फिदा था कि उसने अपनी सारी जिन्दगी को तबाह कर डाला। उसने कहा कि मैं लैला के बिना जिन्दा नहीं रह सकता।

मित्रो! शक्ल-सूरत कैसी भी वाली-कुरूप, भौंड़ी क्यों न हो, लेकिन जिस किसी के साथ भी आदमी अपनापन जोड़ लेता है, वह बहुत अच्छा मालूम पड़ता है, बड़ा आनन्ददायक मालूम पड़ता है। जो पराई चीजें होती हैं, डरावनी वहीं मालूम पड़ती हैं। शेर के बच्चे शेरनी के साथ खेलते रहते हैं, दूध पीते रहते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि ये हमारी है। शेरनी अपने बच्चों को देखकर प्रसन्न होती है। नाराज भी नहीं होती, लेकिन अगर लोमड़ी के बच्चे आ जाएँ, खरगोश के बच्चे आ जाएँ तब शेरनी उनका सफाया कर देती है, क्योंकि वे पराये हैं। अपने और पराये में बहुत फर्क है।

साथियो! 'रस' को आनन्द कहा जाता है। यही बात हमारे शास्त्रों में बताई गई है— 'रसौ वै सः' अर्थात भगवान क्या है? रस है। रस किसे कहते है? रस, आनन्द को कहते हैं। आनन्द कहाँ है? भगवान में है। भगवान कैसा होता है? आत्मीयता आप जिसके ऊपर आरोपित कर लेते हैं, वही आपके आनन्द का माध्यम बन जाता है। भगवान के ऊपर आप अपनेपन का आरोपण कर लें तो भगवान की भक्ति का आपको बेहद आनन्द आएगा, फिर आप कहेंगे कि वे हमारे हैं और हम इनके हैं। मीरा ने अपना सम्बन्ध भगवान से स्थापित कर लिया कि यही हमारे पति हैं। गोपियों ने भी यह मालूम कर लिया था कि ये हमारे सबसे अजीज और प्यारे हैं। बस क्या था, भगवान श्रीकृष्ण उनको प्यारे लगने लगे, अपने लगने लगे। अगर उन्हें यह मालूम पड़ता कि वे पराये हैं, तो क्या होता? आपने देखा नहीं, भगवान श्रीकृष्ण के बारे में जरासन्ध की, कंस की, दुःशासन की, शिशुपाल की, और भी ढेरों आदमी थे, उनके प्रति क्या मान्यता थी। उनको न वे भगवान मालूम पड़ते थे और न सुन्दर मालूम पड़ते थे। वरन उन्हें वे कुरूप मालूम पड़ते थे, खराब मालूम पड़ते थे, चालाक और विरोधी मालूम पड़ते थे।

ध्वनि का प्रतिध्वनि है—प्यार

शिशुपाल ने भगवान को बहुत गालियाँ सुनाई थीं। अर्जुन की तरह वह भी भगवान की प्रशंसा क्यों नहीं करता था? शिशुपाल उनको अपना बैरी मानता था, विरोधी मानता था, पराया मानता था। मित्रो! इस दुनिया में न कोई सुंदर चीज है, न कोई बिना सुंदर अर्थात खराब चीज है, न कोई आनन्द की चीज है और न कोई बिना आनन्द को चीज है। यहाँ सब वस्तुएँ माने वस्तुएँ, प्राणी माने प्राणी, मनुष्य माने मनुष्य। आपको किससे प्यार मिलेगा? जिससे आप करेंगे। प्यार नहीं होगा तो आनन्द कहाँ से आएगा। आनन्द और प्यार एक ही चीज हैं। अतः यदि आपको इस जीवन में आनन्द पाना है तो आपको अपने प्यार का माद्दा बढ़ाना पड़ेगा। प्यार का माद्दा बढ़ाने से क्या मतलब है? प्यार का मतलब सामयिक शिष्टाचार नहीं है, दिखावट नहीं है। दावत खिलाना नहीं है। कोई प्रेम-उपहार देना नहीं है। वरन प्यार का मतलब यह है कि हम यह मानकर चलें कि यह हमारा है, अपना है। फिर आप देखिए कितना आनन्द आता है और उसके साथ में आप कितनी सेवा करते हैं और उसके नजदीक रहने में कितनी प्रसन्नता अनुभव करते हैं। पहले आप अपने अपनत्व का दायरा तो बढ़ाइए आप को प्यार तो कीजिए।

मित्रो! आपने अपने शरीर को प्यार किया है न। जरा भी बात हो जाती है, नुकसान हो जाता है, तो उसको ठीक करने की कोशिश करते हैं। इसको कपड़ा पहनाते हैं, इसकी सजावट करते हैं, शृंगार करते हैं इसके बाल बनाते हैं। इसके लिए और न जाने क्या-क्या करते हैं, क्योंकि इसे आप अपना मानते हैं। पड़ोस में जो दूसरे आदमी रहते हैं, उनके भी आप बाल बनाते हैं क्या? कभी नहीं साहब! उनके तो हम नहीं बनाते। उनको कपड़ा पहनाते है क्या? नहीं पहनाते। उनको आप क्यों नहीं पहनाते? इसलिए नहीं पहनाते, क्योंकि वे हमारे नहीं हैं। अगर बच्चे हमारे हैं, तो हम उनकी बराबर देख−भाल करते हैं, उनको सुंदर बनाते हैं। उनको पढ़ाते हैं, शिक्षा देते हैं, क्योंकि वे हमारे हैं। हमारेपन का, अपनेपन का माद्दा इनसान के पास एक ऐसी चीज है, जो जहाँ कहीं भी टक्कर खाता है, वहीं से लौटकर आपके पास आ जाता है, ठीक उसी तरह से जिस तरह से रबर की गेंद फेंककर जब मारते हैं, तो मारने के बाद वह जिधर से मारी गई थी, लौटकर उसी स्थान पर आ जाती है। ठीक इसी तरीके से जब हम प्यार और मोहब्बत किसी के ऊपर फेंककर मारते हैं तो वह लौटकर हमारे पास आ जाती है। आप जिससे भी प्यार कीजिए, गुंबज की आवाज की तरह से, कुएँ की आवाज की तरह से उसकी प्रतिध्वनि लौटकर आपके पास आ ही जाती है।

सर्वत्र अपना आपा बिखरा मानें

मित्रो! इसी तरीके से अगर संसार में आप द्वेष बुद्धि से देखेंगे तो आपको द्वेष बरसता दिखाई पड़ेगा। आप लोगों की उपेक्षा करना शुरू कर दे, तो आपको चारों ओर उपेक्षा, उदासी छाई हुई दिखाई पड़ेगी। परायापन दिखाई पड़ेगा। सब माया और मिथ्या दिखाई पड़ेगा। परन्तु यदि आप सब चीजों के प्रति आत्मीयता का भावना रखें, तब ये सारा संसार भगवान का विराट स्वरूप दिखाई पड़ेगा, सर्वत्र अपना आपा ही बिखरा हुआ दिखाई पड़ेगा। तुलसीदास के 'सीय राममय सब जग जानी' की अनुभूति होने लगेगी। संसार का जर्रा-जर्रा सिया से भरा है, राम से भरा है। अपनत्व विकसित होने पर आपको हर जगह राम दिखाई पड़ेंगे और हर जगह सीता जी दिखाई पड़ेगी। कब? जब आप उसे अपना मानेंगे तब। आप सबको अपना मानना शुरू कीजिए। अपनेपन के दायरे को बढ़ा दीजिए। अभी तो आपके अपनेपन का दायरा शरीर तक है, इसलिए शरीर में सुख है, तो आप सुखी हैं, शरीर में दुःख है तो दुखी हैं। अभी तो आपने अपना दायरा अपने कुटुम्ब तक सीमित रखा है। कुटुम्बियों को अच्छी नौकरी मिल गई, खाना मिल गया, इज्जत मिल गई, तो आप खुश हैं और अगर नुकसान हो गया तो आप नाखुश हैं। अतः आप एक काम कीजिए, अपने इस छोटे से दायरे को बढ़ा दीजिए। आप अपने आप को सारे विश्व तक फैला दीजिए, तब सारी चीजें आपकी हो जाएँगी।

स्वामी रामतीर्थ अपने आप को रामबादशाह कहते थे। वे कहते थे कि मैं बादशाह हूँ। आप किसके बादशाह हैं? बादलों का बादशाह, नदियों का बादशाह, पहाड़ों का बादशाह। वे कहते थे कि मैं इनके ऊपर जा सकता हूँ और देख सकता हूँ। यह सब उनका ख्याल था, क्योंकि वे समझते थे कि सारी दुनिया मेरी है मैं दुनिया का मालिक हूँ। वे अपने को बादशाह कहते थे। इसमें कोई रुकावट थी बताइए? कोई रुकावट नहीं थी। कोई नदी का पानी पीना चाहे तो उसे कौन रोक सकता है? सड़क पर चलना चाहे तो कौन रोकता है? बादलों को निहारना चाहे तो कौन रोकता है? किसी चिड़िया के आगे दाना फेंकते हैं तो कौन रोकता है? किसी की सेवा-शुश्रूषा करने लगे तो कौन रोकता है? केवल बुराइयों के सम्बन्ध में तो रोकथाम हो भी सकती है कि किसी के साथ में आप चोरी का व्यवहार करें, लड़ाई-झगड़े का व्यवहार करें, तो कानून भी आपको रोक सकता है। लेकिन आप किसी से मीठे वचन बोलें, किसी की मदद कर दे, किसी के काम आएँ, तब भला आपको कौन रोकने वाला हैं?

इसलिए मित्रो! भक्ति न केवल भाव−सम्वेदना से ताल्लुक रखती है, वरन व्यक्ति के बहिरंग जीवन से भी उसका ताल्लुक है। भक्ति या मोहब्बत यह सिखाती है कि हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए। आप जिससे भी मोहब्बत करेंगे, उसकी सेवा करने के लिए आप खुशी-खुशी तैयार हो जाएँगे। आपकी यदि अपनी साइकिल है, तो आप इसे झाड़ेंगे, पोछेंगे, उठाकर रख देंगे तेल डालेंगे। आपका अपना बच्चा है तो उसे अपनी गोद में उठाएँगे, बिठाएँगे, पढ़ाएँगे, लिखाएँगे, शिक्षा देंगे। आप उनके माँ-बाप हैं, तो उनके लिए क्या कुछ करेंगे नहीं? आपकी धर्मपत्नी है तो क्या उसके लिए कुछ करेंगे नहीं? हम जिस किसी से भी आत्मीयता रखते हैं, उसके लिए कुछ करने की इच्छा होती है। प्यार का वास्तविक स्वरूप यही है। प्यार का वास्तविक स्वरूप सेवा में निखरता है। आप किसके साथ में प्यार करते है और किसके साथ में प्यार नहीं करते, इसकी पहचान सिर्फ यही है कि जिसको आप पार करते हैं, उसकी आप सेवा करना चाहते हैं कि नहीं। प्यार सेवा करना सिखाता है। प्यार अनुदान सिखाता है। प्यार अपने प्यारे को सुखी बनाने के लिए स्वयं कष्ट उठाता है और सामने वाले प्रेमी को सुखी बनाता है। देशभक्ति इसी का नाम तो है। विश्वभक्ति इसी का तो नाम है। भगवान की भक्ति इसी का नाम तो है कि भगवान को आप प्रसन्न बनाएँ। इसके लिए योगदान करें। आप हैरान होते हों, तो हो, पर बच्चों को आप सुखी बनाएँ, देश को आप सुखी बनाएँ। ऐसी हैरानी में भी आदमी प्रसन्न रहता है।

भज सेवायाम् ही है भक्ति

मित्रो! भक्ति न केवल मानसिक और भावनात्मक संपदा है, वरन उसके आधार पर पुण्य करने और परमार्थ करने का भी मौका मिलता है। आप भक्ति कीजिए और सेवा भी कीजिए। प्यार का अर्थ जैसा कि आमतौर से आपने लगा रखा है, वह प्यार, प्यार नहीं हो सकता है। आपको खूबसूरत चीजों से प्यार है और बिना खूबसूरत चीजों से प्यार नहीं है। इसका क्या मतलब हुआ? खूबसूरत है तो क्या, बिना खूबसूरत है तो क्या? यह संसार एक बगीचा है। इसमें सभी तरह की चीजें हैं। हमारा सीमितपन क्यों हो? हम मोह के बन्धन में क्यों बँधे? मोह और बन्धन एक ही तरह से होते हैं। जिनसे हमको फायदा होता है, उसके साथ हमारी मोहब्बत होती है, लेकिन जिन लोगों के साथ हमारा फायदा नहीं होता आमतौर से उन लोगों के साथ हमारी मोहब्बत नहीं होती। शंकर भगवान के साथ उनके भक्त भूत-प्रेत भी रहते हैं। भूत प्रेतों की भी वे सेवा करते हैं, मदद करते हैं। भक्ति है, तो हमसे गए-बीते लोगों, पिछड़े हुए लोगों, गए-गुजरी हुए लोगों की भी सेवा करनी चाहिए। बच्चों को हम गोदी में लिए फिरते हैं, क्यों? जो हमसे इतने छोटे हैं, उनकी समझदारी भी कम होती है। जिनकी क्षमताएँ कम हैं, जो उठने में असमर्थ हैं, तो क्या उनकी सेवा नहीं करनी चाहिए? सेवा करनी चाहिए।

साथियो! सेवा और भक्ति दोनों एक ही चीज हैं। 'भज सेवायाम्' संस्कृत में 'भज' शब्द जो बना है, उससे भजन बना है, भक्ति भी बनी है। भक्ति का अर्थ क्या होता हैं? भक्ति का अर्थ सेवा होता है। कौन करेगा किसकी सेवा? वह करेगा और उसकी करेगा जिसको वह मोहब्बत करता है। तो आप अपनी मोहब्बत को बदल डालिए और उसका दायरा बढ़ाइए। बस यही भक्ति है। भक्ति का अभ्यास हम भगवान से करते है। यह व्यायामशाला है। व्यायामशाला में हम प्रेरणा पाते हैं। कुश्ती लड़ना सीखते है। दौड़ लगाना सीखते हैं और जब दंगल होता है, प्रतियोगिताएँ होती हैं, तब कमाल दिखाते हैं। आप भगवान की कोठरी में बैठकर भक्ति किया कीजिए। किसकी भक्ति करें? सिद्धान्तों की भक्ति, आदर्शों की भक्ति। भगवान क्या है? सिद्धान्तों का समुच्चय, आदर्शों का समुच्चय, श्रेष्ठताओं का समुच्चय ही भगवान है। भगवान व्यक्ति विशेष नहीं है, जिसको हम और आप मिठाई खिलाएँगे, लड्डू खिलाएँगे और उनको मुकुट पहनाएँगे, साड़ी पहनाएँगे। बेटे, भगवान कोई व्यक्ति थोड़े ही है। भगवान तो एक सच है। भगवान तो एक नियम है। भगवान तो एक सत्ता है। भगवान तो एक ऊँचे आदर्शों का समुच्चय है। उससे प्यार कीजिए, बस भक्ति का अभ्यास हो गया।

आदर्शों से असीम प्यार ही है भक्ति

भक्ति के लिए पूजा-उपासना के लिए आपने कोई इष्टदेव की मूर्ति बनाकर रखी होगी तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन उसको आप सिद्धान्तों का समुच्चय मानिए, आदर्शों का समुच्चय मानिए। उसे व्यक्ति विशेष मत मानिए। अगर व्यक्ति विशेष मानेंगे तो भ्रम और जंजाल में घूम रहे होंगे। आपने अगर शंकर जी को एक आदमी माना होगा, जो बैल की सवारी करता हुआ, जहाँ-तहाँ घूमता रहता है और बेल के पते खाता है। आक के फूल और धतूरे के फल खाता है, तो आप गलती कर रहे हैं। शंकर ऊँचे आदर्शों का समुच्चय है। शंकर जी के सिर से गंगाजी निकलती हैं, जो आदर्शों की गंगा हैं। गले में मुण्डों की माला डाले फिरते हैं, जिसका अर्थ है कि वे मौत और जिन्दगी को एक मानते हैं। यह क्या है? सिद्धान्त है। उनके मस्तक पर चन्द्रमा टिका हुआ है अर्थात वे मानसिक सन्तुलन बनाए हुए हैं। भूत प्रेतों को हमेशा साथ लिए फिरते हैं, इसका मतलब है कि वे गए -गुजरे और पिछड़े हुए आदमियों की बात करते हैं। श्मशान में रहते हैं अर्थात वहाँ रहते हैं जहाँ कि अस्तव्यस्तता छाई हुई है, जहाँ नीरसता छाई हुई है। जहाँ कोलाहल छाया है, वहाँ पर रह करके अपनी विशेषता के कारण शान्ति और भक्ति का वातावरण बना देते है। ये शंकर भगवान की विशेषता है।

इस तरह शंकर भगवान क्या हैं? सिद्धान्तों का समुच्चय हैं। ठीक इसी तरीके से भगवान का प्रत्येक रूप सिद्धान्तों का एक समुच्चय है। चाहे वे गणेश जी हों, चाहे वे हनुमान जी हों, चाहे रामचंद्र जी हों, चाहे लक्ष्मण जी हो, कोई भी क्यों न हो! ये सारे के सारे देवी-देवता या भगवान का अवतार एक तरीके से सिद्धान्तों का समुच्चय हैं, श्रेष्ठता के, दिव्य गुणों के, उच्च आदर्शों के समुच्चय हैं। आप इनकी भक्ति करते हैं, इस कारण से होना यह चाहिए कि आप यह देखें कि उन सिद्धान्तों के प्रति क्या करते हैं? आप सिद्धान्तों के प्रति प्यार करना सीखिए। अगर सिद्धान्तों के प्रति आपकी आस्थाएँ बलवान होती चली गई, मजबूत होती चली गई, तो आप उन सिद्धान्तों को क्रियान्वित करने में भी हिम्मत दिखाएँगे और उनको काम में भी लाएँगे। भक्ति का पूजा-पाठ से जहाँ तक ताल्लुक है, तो वह यहीं खत्म हो जाता है कि हम सिद्धान्तों के लिए अपनी निष्ठाओं को मजबूत करें। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यह मानकर चलें कि यह भारी सृष्टि ईश्वर को क्रीड़ास्थली है और सबमें वही समाया हुआ है। अतः जिस भक्ति को हम भगवान के प्रति करते हैं, उसी भक्ति को जन-जन क प्रात करने मे समर्थ हो सके। अगर आपने ऐसा किया तो आप भगवान के सच्चे भक्त कहलाएँगे।

भक्ति की फलश्रुति

मित्रो! अगर आप सच्चे अर्थों में भगवान के भक्त हैं तो ध्यान रखिए कि इससे आपको क्या फायदा होगा और क्या फायदा नहीं होगा? स्वर्ग मे आप जाएँगे कि नहीं जाएँगे? ये बाद की बातें हैं लेकिन आपको अपने विचारों में एवं चहुँओर ऐसा नजारा दिखाई पड़ेगा, जिसको कि हम स्वर्ग कहते हैं। आँखों में आपको स्वर्ग नाचता हुआ दिखाई पड़ेगा। सारे लोग अपने ही दिखाई पड़ेंगे। बुरे आदमी भी? हाँ, बुरे आदमी भी। कोई व्यक्ति रोगी होता है, तो उसका इलाज करते हैं उसकी जान बचाने की कोशिश करते है। बीमारी को मारते हैं और बीमार को बचाते हैं। बीमार व्यक्ति को कौन मारता है? नहीं साहब! अमुक आदमी बुरा है। ठीक है तो क्या बुरे आदमी को मार दे? बुरे आदमी इस दुनिया में इसलिए नहीं हैं कि आप उनसे घृणा करें। हाँ, बुराइयों के प्रति आप घृणा कीजिए और उसे ठीक कीजिए। बुराइयों से लड़िए। बुराइयों से जद्दोजहद कीजिए। अपने बच्चे में भी कोई बुरी आदत है, तो कोशिश कीजिए कि बुरी आदत से उसको छुटकारा दिला दे, न कि उस बच्चे को ही मार डालने की कोशिश करें।

आज चारों और फैली हुए घृणा और नफरत की दुनिया में और अधिक की गुंजाइश नहीं है। आप प्यार के आधार पर भी लोगों का सुधार कर सकते हैं। आप यह मत सोचिए कि प्यार का हथियार कमजोर है। प्यार का हथियार कमजोर नहीं है। प्रह्लाद की बात आपको मालूम नहीं है? प्रह्लाद ने अपने पिता से प्यार-मोहब्बत की। लेकिन उसने उनका कहना नहीं माना और उनसे बराबर जद्दोजहद करता रहा। क्योंकि पिता जब गलती करते थे, तो उनको सुधारने में प्यार से लगा रहता था कि व्यर्थ के कामों में इनका श्रम क्यों जाए। इसे रोकने के लिए उसने पिता से असहमत होकर उनकी अवज्ञा करना शुरू कर दी। आप भी इस मामले में किसी से भी लड़ाई-झगड़ा शुरू कर सकते हैं, लेकिन उसके पीछे प्यार का, मोहब्बत का माद्दा अवश्य होना चाहिए। आप प्यार की लड़ाई लड़िए। प्यार की लड़ाई भी बहुत अच्छी है, प्यार के अंजाम भी बहुत अच्छे हैं, यह सबके लिए अच्छा है, हमारे लिए भी और आपके लिए भी। इससे हमारे आनन्द में हजारों गुना वृद्धि हो जाती है। हमारी खुशहाली में वृद्धि होती है। हमारी शान्ति में वृद्धि होती है। हमारी गौरव-गरिमा की वृद्धि होती है और हम गरीबी में रहते हुए भी, अभावों में रहते हुए भी चारों ओर प्यार और मोहब्बत की नजर डालते हैं, तो हमारी खुशी का टिकाना नहीं रहता। यह आपके हाथ में है कि आप खुशी अपनी मुट्ठी में रखें, सब ओर खुशी देखें, आनन्द देखें और पर देखें। अगर आप अपनी भक्ति के लिए यह दृष्टिकोण बना सकें तो आपके लिए चारों ओर आनन्द ही आनन्द है। आनन्द आपके अन्दर ही छिपा हुआ है, साथ ही साथ आपके चारों ओर अमृत ही अमृत बिखरा हुआ है। आप चाहें तो इसे समेट भी सकते हैं और चाहें तो पी सकते हैं और दूसरों को भी पिला सकते हैं, ऐसा मेरा विश्वास है। आज की बात समाप्त।

॥ॐ शान्तिः॥

विश्व प्रेम ही ईश्वर प्रेम

एकांगी उपासना का श्रेय विकसित कर अपना अहंकार बढ़ाने वाले व्यक्ति, ईश्वर के सच्चे भक्त नहीं कहे जा सकते। परमात्मा सर्व न्यायकारी है। वह ऐसे भक्त को जो अपना सुख, अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहता हो कभी पार नहीं कर सकता। संसार के और भी जितने प्राणी हैं, वे सब भी उसी परमात्मा के प्यारे बच्चे हैं। किसी के पास शक्ति कम है, किसी के पास गुण कम हैं, तो इससे क्या? अपने सभी बच्चे पिता को समान रूप से प्यारे होते हैं। जो उसके सभी बच्चों को प्यार कर सकता है, परमात्मा का वास्तविक प्यार उसे ही मिल सकता है। केवल अपनी ही बात, अपने ही साधन सिद्ध करने वाले व्यक्ति लाख प्रयत्न करके भी उसे प्राप्त नहीं कर सकते।

प्रेमी भक्तों का लक्षण बताते हुए गीता में भगवान कृष्ण ने लिखा है-


अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रिय:॥

-गीता १२/१३-१४

हे अर्जुन! मैं उन भक्तों की प्यार करता हूँ जो कभी किसी से द्वेष-भाव नहीं रखते, सब जीवों के साथ मित्रता और दयालुता का व्यवहार करते हैं। ममतारहित, अहंकारशून्य, दुःख और सुख में एक सा रहने वाला, सब जीवों के अपराधों को क्षमा करने वाला सदैव सन्तुष्ट, मेरा ध्यान करने वाला विरागी, दृढ़निश्चयी और जिसने अपना मन तथा बुद्धि मुझे समर्पित कर दिया है, ऐसा भक्त मुझे अतिशय प्रिय है।

यहाँ हमें एक बात समझ लेनी चाहिए कि यह सारा संसार भगवान के एक अंश में ही स्थित है। छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे सब उसी के बनाए हुए हैं। उनके हित और कल्याण का भी उसे ध्यान होना चाहिए। केवल अपनी-अपनी इच्छाओं की तृप्ति साथ द्वेष न करे। सुख की इच्छा में प्रतिस्पर्द्धा आवश्यक है। कामनाग्रस्त मनुष्य किसी की भलाई भी क्या कर सकेगा और ऐसा व्यक्ति परमात्मा की दया का अधिकारी भी क्यों बन सकेगा?

चराचर जगत में एक ईश्वर की सत्ता ही अनेक रूपों में कार्य कर रही है। ईश्वर के एक अंग की उपासना की जाए और अन्यों की बिलकुल उपेक्षा की जाए तो परमात्मा उस भक्त से कैसे सन्तुष्ट हो सकता है? भक्ति का स्वरूप सर्वांगीण होना चाहिए मुँह से भोजन कराया जाए और पाँवों को बाँधकर एक ओर पटक दिया जाए तो वह परमात्मा अपने उपासक की भावनाओं से कैसे सन्तुष्ट हो सकेगा? ईश्वर के पारलौकिक और अदृश्य जगत को यदि माना जाए और सम्पूर्ण संसार को, उसकी देह को उससे भी उतना प्यार होना चाहिए जितना प्राण से देह की उपेक्षा से प्राणों का अस्तित्व भला कही सम्भव हो सका है?

ईश्वर के उपासक में श्रद्धा, भक्ति, एकाग्रता बुद्धि की तीक्ष्णता के साथ-साथ जीव और प्रेम का भी समन्वय होना चाहिए क्योंकि प्रेम ही विश्व का आधार है, विश्व की आत्मा है। ईश्वर-प्रेम भी विश्व के अन्तर्गत है। प्राणिमात्र के साथ सद्व्यवहार, आत्मीयता और मैत्री की भावना रखने वाले लोग उसे बिना साधन प्राप्त कर लेते हैं।

चतुर जनों की यह रीति है कि वे किन्हीं महापुरुषों की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी प्रिय सन्तान की सेवा और प्यार करते हैं। अपने आत्मीय जनों को प्यार करता हुआ देखकर, उन्हें कठोर हृदय के व्यक्तियों को भी पिघलता देखा गया है; फिर परमात्मा जो इतना सहृदय और दयालु है वह अपने बालकों के प्रति कर्तव्य भावना को पूरा हुआ देखकर भला क्यों न प्रसन्न होगा? इससे तो वे भक्त की अन्य कामनाएँ भी सहर्ष पूरी कर देते हैं।

वेद में कहा गया है कि जो लोग सम्पूर्ण प्राणियों के हित में संलग्न रहते हैं, परमात्मा उनका भार स्वयं वहन करता है। पर समाज क प्रति अपने कर्तव्यों का समुचित रीति से पालन न करने वाले ईश्वरभक्त आत्मकल्याण में समर्थ नहीं होते। समाज भी तो मनुष्य का अपना ही स्वरूप है। अपने स्वार्थ की पूर्ति में उद्यत रहा जाए, पर अपने ही समान अपने समाज के प्रति परमार्थ का ध्यान न रखा जार तो उस ईश्वर उपासना से आत्मसन्तोष होना असम्भव है।