पात्रता की महत्ता

दो दिनों से आप ये सुन रहे हैं कि कल्प क्या है? कल्प के लिए आपको क्या करना पड़ेगा? कल्प के लिए दूसरे भी आपकी सहायता करेंगे। पर आप ये मानके चलिए कि आपको ही करना पड़ेगा। आप अगर कुछ नहीं करेंगे केवल क्रिया ही करते रहेंगे। भीतर वाले हिस्से को ठीक नहीं करेंगे, केवल कर्मकाण्ड तक ही सीमित होकर के रह जायेंगे तो वो उद्देश्य कैसे पूरा होगा। ये कल्प कोई शारीरिक थोड़े ही है। ये क्रियाओं से थोड़े पूरा हो जाएगा। ये आन्तरिक कायाकल्प है। इसीलिए आपको अपने मनःस्थिति को, अपने चिन्तन को और अपनी विचारणाओं को, आस्थाओं को—दृष्टिकोण को भी बदलना पड़ेगा। ये कर सके तो आप ये समझिये कि बाहर की सहायता आपको जरूर मिलती रहेगी।

आमतौर से ये समझते हैं लोग कि देवताओं की खुशामद करके और देवताओं से कुछ प्राप्त करके हम अपना फायदा उठा लेंगे। अध्यात्म इसी का नाम है। ये लोगों का गलत ख़याल है। देवताओं का अनुग्रह मिलता तो है, ये तो मैं नहीं कहता देवताओं का अनुग्रह नहीं मिलता, लेकिन बिना शर्त नहीं मिलता। कुपात्रों को नहीं मिलता। पात्रता पहले साबित करनी पड़ती है, इसके बाद में ही कहीं ऐसा होता है, कि देवता कोई सहायता कर सकें और किसी भक्त को या साधक को लाभ देने में मददगार बन सकें। आपको भी यही विचार कर के चलना चाहिए। आपको देवानुग्रह कि आशा तो करनी चाहिए, गुरूजी के आशीर्वाद कि आशा तो करनी चाहिए, गायत्री माता के कृपा कि आशा तो करनी चाहिए, लेकिन उस आशा के साथ-साथ में एक जो शर्त जुड़ी हुई है उसको भूल नहीं जाना चाहिए। वो शर्त ये है कि आप अगर अपनी पात्रता साबित करेंगे तो देवता आपकी जरूर सहायता करेंगे।

देवता अगर, अगर अपनी पात्रता साबित नहीं, नहीं कर सकते तो फिर ये विश्वास रखिये कि आपको निराश ही होना पड़ेगा। देवता से आप किसी से ऐसे कृपा की आशा मत कीजिये जो कि कुपात्रों को भी मिल सकती है। देवता बड़े होशियार हैं। --- बहुत होशियार हैं। इससे पहले कि आप कर्मकाण्ड करें उसके पहले कर्मकाण्डों को देख कर के प्रसन्न थोड़े होते हैं। कर्मकाण्डों के पीछे छिपी हुई साधक की भावनाओं को देखते हैं, और अगर भावना उसकी सही है, तो निश्चित रूप से वही फल देते हैं जैसे कि आपने सुना है। लेकिन अगर आपने भावना को ध्यान नहीं रखा है। केवल क्रिया करने की चिन्ह पूजा को कर लिया है। तो उसकी बहुत शक्ति से क्रिया के बदले में आपको वो लम्बी-चौड़ी आशाएँ नहीं करना चाहिए जो देवताओं कि सहायता (सहायता) से मिलती थी या मिल सकती है।

एक उदाहरण में आप ध्यान दीजिये। बादलों को आप देखते हैं न। बादल कितनी कृपा करते हैं। बादलों के बराबर उदार देवता कौन सा हो सकता है? बिना कीमत पानी बरसाता है। चाहे जितना पानी बरसाता है समुद्र से लाता है और जमीन, प्यासी जमीन को पानी पूरा करने के लिए कितना पानी बरसाता है। लेकिन आपको ध्यान है क्या? उस पानी से कौन लाभ उठा पाता है? आप ये बताइए। हर कोई फायदा उठा लेता है? न। हर कोई फायदा नहीं उठा सकता। हर जगह हरियाली बादलों से हो जाती है लेकिन जो चट्टानें हैं, उन चट्टानों पर एक तिनका भी पैदा नहीं होता। आप नदी में पड़े हुए पत्थरों को ज़रा देखिये न। नदी के पानी से किनारे गीले हो जाते हैं, जमीन गीली हो जाती है सब गीले-गीले हो जाते हैं पर जो चट्टान जो पत्थर का टुकड़ा नदी के बीच में सैकड़ों वर्षों से पड़ा हुआ है, ज़रा तोड़ कर तो देखिये। नदी का कोई अनुग्रह नहीं हो सका क्योंकि वो पत्थर है। बादलों का कोई अनुग्रह से लाभ नहीं हो सका क्योंकि वो चट्टान है।

आप देखते हैं न भूमि, (पानी) बादलों के पानी से भूमि में हरियाली पैदा हो जाती है, पर चट्टानों पर क्यों पैदा नहीं होता? छात्रवृत्ति के बारे में आप जानते हैं न। जो फर्स्ट डिविजन पास होते हैं सरकार की ओर से छात्रवृत्ति उनको दी जाती है। थर्ड डिवीज़न को मिलती है क्या? फेल होने वाले को मिलती है क्या? हमको हमारे साथ में उदार कीजिये दया कीजिये, उदार कीजिये दया कीजिये, उदार कीजिये दया कीजिये ये मत कहिए।

उदारता और दया का इस दुनिया में कोई ख़ास व्यवहार नहीं है। यहाँ दुनिया में पात्रता की परख है। आपने देखा है न किसी भी खूबसूरत कन्या को बहुत से पड़ोसी, ये माँग सकते हैं। ऐसे आवारा लड़के अपनी कन्या हमारे हवाले कर दीजिये। हमसे शादी कर दीजिये। आपका क्या ख्याल है कोई अपनी जवान लड़की को जो पढ़ी-लिखी भी है, सुन्दर है, सुयोग्य है किसी माँगने वाले को सुपुर्द कर देगा क्या? न, नहीं करेगा। क्यों? बिचारा प्यासा फिर रहा है। कोई अच्छा जमाई मिल जाए तो पैसे भी देंगे, खुशामद भी करेंगे, बरात भी लायेंगे, कपड़े भी देंगे। कितना तलाश करता फिरता है। क्यों साहब, आप क्यों तलाश फिरते हैं जमाता को जब कि आपके पड़ोस में ही पचास जामाता उसके लिए तैयार हैं कि हम भी आपके जमाई बनेंगे। हमको भी आप अपनी लड़की दे दीजिये। फिर, फिर बेटी का बाप क्यों नहीं देता उनको, क्यों उनसे मने कर देता है, क्यों उनसे लड़ने-झगड़ने पे आमादा हो जाता है। क्यों अच्छे लड़के के पास जाता है और खुशामद भी करता है, पैसा भी देता है। मिन्नतें भी करता है ऐसा क्यों होता है। आप बता सकते हैं? सिर्फ एक ही वजह है। वो जामाता इस लायक है, इसके अन्दर इतनी पात्रता है कि इस लड़की का गुजारा कर सके। इस लड़की का ठीक उपयोग कर सके। इस लड़की की देखभाल कर सके। इसीलिए लडकी का बाप ऐसे जामाता को तलाश करता है, जो कि उसके योग्य हो। ठीक बिलकुल ठीक यही बात समझिये।

देवताओं के अनुग्रह हर एक के हिस्से में नहीं आ सकते, गुरुओं के अनुग्रह हर एक के हिस्से में नहीं आ सकते। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को अनुग्रह दिया था। माँगने वाले तो कितने आते थे, हजारों आदमी आते थे, हजारों आदमी छोटी-मोटी अपनी जरूरतें पूरी करा कर के भाग खड़े होते थे। लेकिन जो विवेकानन्द लेना चाहते थे कि हम दें किसी को तबीयत से। उन्होंने फिर विवेकानन्द को दिया क्योंकि उसके अन्दर पात्रता का अंश पाया, इसीलिए उसको सुपुर्द कर दिया।

देखते हैं न आप। माता, भ्रूण पेट में, पेट में रहता है, पेट में रहता है ज़िंदा होता है तो माता कि सहायता प्राप्त करता है, माता का दूध प्राप्त करता है। लेकिन वो भ्रूण माता का होता है। उसकी पात्रता को माता समझती है इसीलिए वो देती है।

पेड़ (अपने) चुम्बक शक्ति से बादलों को घसीट लेते हैं, और बादलों को बरसने के लिए मजबूर कर देते हैं। बादल कहाँ बरसते हैं? वहाँ बरसते हैं जहाँ कि घनी हरियाली होती है। और बादल वहाँ बरसने से इनकार कर देते हैं जहाँ पेड़ नहीं होते हैं। मसलन रेगिस्तानों में कहाँ पानी बरसता है। मसलन जहाँ पेड़ नहीं हैं वहाँ कम पानी बरसेगा। लीबिया में कुछ दिन पहले ऐसे ही हुआ था। पेड़ काट डाले गए उसका परिणाम ये हुआ कि पानी ने बरसना बन्द कर दिया और बिलकुल सूखा पड़ गया। फ़िर पेड़ लगाए गए, फिर बादल बरसे। मसलन मतलब सिर्फ ये है कि बादल पेड़ों के चुम्बकत्व से खिंच करके चले आते हैं। खदानें कैसे बनती हैं आप जानते हैं। खदानों में कहीं थोड़ा सा लोहा, थोड़ा पीतल, चाँदी वगैरह होती है। अपने चुम्बकत्व से दूर-दूर से फैले हुए छोटे कणों को भेजती रहती है, बड़ी खदान लगती रहती है। इस वर्ष सौ, सौ टन लोहा है तो अगले वर्ष में दो सौ टन हो जाएगा। अगले वर्ष तीन सौ टन हो जाएगा क्यों? क्योंकि वो खदान जो है चारों से खींचती रहती है और जमा करती रहती है। ठीक यही बात है। देवताओं की कृपा को घसीटा जा सकता है। गलाया जा सकता है। देवता अपने आप देंगे? नहीं। अपने आप कौन दे देगा? आप अपने पैसे किसी को दे देंगे क्या? नहीं। बैंक वाला स्वयं किसी को रुपया दे देगा क्या? नहीं। क्योंकि बैंक वाला उधार देने के पहले हजार बार ये तलाश करता है जिस आदमी को दिया जाने वाला है, वो ठीक पैसे का इस्तेमाल करेगा कि नहीं करेगा? उसको पैसा वापस मिलेगा कि नहीं मिलेगा। अगर ये न हो तो कोई देने को तैयार नहीं हो सकता। आपने देखा है न, देखा है न समुद्र, समुद्र के पास नदियाँ अपना-अपना सामान लेके भागती हैं। कितनी सारी नदियाँ, कितनी सारी नदियाँ, कितनी सारी नदियाँ लीजिये साहब हमारा पानी लीजिये, हमारा पानी लीजिये क्यों, क्यों लीजिये? क्योंकि वो समझते हैं कि हमारे पानी को जमा करने कि शक्ति इसमें है। और हम अपने पानी को जमा करती हैं तो हमारा एक मुनासिब जगह पर जमा हो जाएगा। नदियों के तरीके से दैवी शक्तियाँ भी देती तो हैं पर हर एक को नहीं देती। आप भूल मत जाइए। जो कोई माँगेगा उसी को देगा।

नारियल चढ़ा देगा उसी को दे देगा, ग्यारह सौ जप कर देगा उसी को दे देगा, पाठ कर देगा उसी को दे देगा, बरगलाने और (फु) फुसलाने से, मतलब है क्रियाएँ करने से, आप देवताओं का अनुग्रह नहीं प्राप्त कर सकते। क्रियाएँ आवश्यक तो हैं कपड़े के तरीके से। क्रियाएँ आवश्यक तो हैं चाकू के तरीके से लेकिन सामान तो हो आपके पास। चाकू से कैसे काटेंगे आम को। इसीलिए से केवल क्रियाएँ बहुत थोड़ा सा काम करती हैं। कर्मकाण्ड जिसको आप कर रहे हैं, ग्यारह सौ जप कर रहे हैं और काम कर रहे हैं। ये है तो महत्त्वपूर्ण जरूरी भी हैं। लेकिन आप ये मत ख्याल कीजिए - केवल जप करने से, या अनाज कम खाने से आप कोई लम्बे-चौड़े फायदे उठा सकेंगे। आपको मन:स्थिति को जरूर बदलना पड़ेगा। फूल जब खिलता है न, फूल खिलता है तो आपने देखा है भौंरे उसके ऊपर आते हैं, कितने सारे भौंरे बैठ जाते हैं। आपने उनके ऊपर तितिलियों को घूमते हुए देखा है न। आपने उनके ऊपर, उनके ऊपर शहद की मक्खियों के बच्चे देखे हैं न। कब आते हैं जबकि फूल खिलता है।

फूल की तरीके से अगर आप अपने जीवन को खिला सकते हों, अपनी पात्रता को विकसित कर सकते हों, आप अपनी मन:स्थिति में हेर-फेर कर सकते हों, तो आपको हम यकीन दिला सकते हैं कि देवताओं के अनुग्रह आपको जरूर मिलेंगे, जो आप यहाँ प्राप्त करने आये हैं। आपको गुरुओं के आशीर्वाद,……….. हमें मरने दीजिये कोई और दूसरे गुरु आपके पास आयेंगे और आपकी आवश्यकता को पूरा कर देंगे। पूरा जरूर कर देंगे।

आप इस ख्याल से मत रहिए, मिन्नतें मत माँगिए, नाक मत रगड़िए, झोली मत फैलाइए, और ये उम्मीदें मत कीजिए—कोई आदमी (आप पर) आपकी पात्रता को देखे बिना, केवल आपके क्रिया-कृत्यों से ही प्रसन्न हो कर के आपको निहाल कर जाएगा—ऐसा हो नहीं सकेगा।

आपको इतिहास मालूम है न। शिवाजी को, शिवाजी को भवानी, भवानी नाम की एक तलवार मिली थी। क्यों मिली थी? इसीलिए मिली थी कि उसने अपनी पात्रता साबित की थी। सिंहनी का दूध दुहने के लिए, परीक्षा कि थी उनके (पिता) उनके गुरु ने। आप जाइए सिंहनी का दूध दुह के लाइए। देखा गया कि इतना निष्ठावान है कि अपने कर्तव्य के लिए अपने प्राण भी दे सकता है। तो भवानी से उन्होंने प्रार्थना की कि आप ऐसी तलवार दे दीजिए जो अक्षय हो। हो गयी न, अच्छा। गाण्डीव किसको कहाँ से मिला था। अर्जुन को, गांडीव जो अर्जुन को मिला था ये देवताओं ने दिया था। उन्होंने दिया था क्या नाम है इंद्र देवता ने। कैसे दिया? सबको क्यों नहीं दे दिया। अर्जुन को क्यों दिया? क्यों कि उन्होंने एक बार इम्तहान लिया था। इतनी कीमती चीज को अपने विश्वस्त आदमी को प्रमाणिक आदमी को ही दिया जाय, हर एक को नहीं दिया जाय। आपको ख्याल होगा जब वो अर्जुन वहाँ गए थे तो उन्होंने इम्तिहान लेने के लिए गाँव कि सबसे खूबसूरती, खूबसूरत युवती उर्वशी को भेजा, उर्वशी को भेजा ऐसे हाव-भाव करने लगी। उसके साथ में शादी कि बात करने लगी, दूसरी बात करने लगी। अर्जुन ने ये कहा आप तो हमारी माँ के बराबर हैं अब हम आपके चरणों की धूल अपने सर पर रखते हैं। और आप जानिए कि हम ही आपकी सन्तान हैं। इस जवाब से प्रसन्न होकर इंद्र ने ये समझा ये इस लायक है इसको गाण्डीव दे देना चाहिए। अर्जुन को गाण्डीव इंद्र ने दे दिया था। क्योंकि उसको यह विश्वास हो गया था, ये इसी लायक है।

आपको बापा जलाराम कि बात मालूम है। भगवान् आये थे उनको एक झोली दे गए थे। उसमें से अक्षय अन्न के भण्डार निकलते थे। ये वरदान भगवान ने दिया था। अभी भी आप गुजरात में कभी गए हों और वीरपुर नाम के गाँव में कभी पहुँचे हों, आपको एक सिद्ध पुरुष जलाराम बापा का स्थान मिलेगा। वहाँ एक अन्न कि झोली अभी भी टँगी हुई है जो भगवान ने दी थी। उनकी इच्छा थी, उनकी इच्छा थी-क्या इच्छा थी कि हमारे दरवाजे पे से कोई खाली हाथ न जाने पाए।

भगवान ने इनकी इच्छा पूरी की। क्यों पूरी की? औरों की क्यों नहीं की। और इच्छा करते हैं, मनोकामना करते हैं उनकी इच्छा क्यों नहीं पूरी करते। क्योंकि वो जलाराम इम्तिहान में पास हो गए थे। क्या इम्तिहान में पास हो गए थे? उन्होंने (अपनी जमीन में से) दो प्रतिज्ञाएँ की थीं, कि जलाराम (मेहनत) मेहनत मजूरी करेंगें, और खेती में से अनाज उगाएँगे, और उनकी स्त्री ने ये प्रतिज्ञा की थी कि हम पेट भरने के बाद में जो कुछ भी अनाज हमारे पास बच जाता है, उसको दुखियारों को, सन्तों को खिलाते रहेंगे। उनकी स्त्री खाना पकाती रहती थी सारे दिन और उनका, उनके बापा जलाराम खेतीबाड़ी करते रहते थे। अनाज उगाते थे, पैदा करते रहते थे और वो खिलाती रहती थी। बस इस बीच में जो पेट भरने के लिए मिल गया बहुत, उसी से गुजारा कर लिया।

सन्त की यही निशानियाँ हैं—सन्त का चरित्र ऊँचा होना चाहिए। भक्त का चरित्र ऊँचा न हुआ तब— (हम क्या) कीर्तन करते हैं, और अखण्ड कीर्तन करते हैं, और रात्रि जागरण करते हैं, और फलाना करते हैं, ढिकाना करते हैं—बेकार बातें मत करिए। आप अखण्ड कीर्तन करते हैं तो मुबारक, आप पूजा करते हैं तो मुबारक, लेकिन आप अपनी पात्रता को विकसित करते हैं कि नहीं करते? पहले इसका जवाब दीजिये। भगवान सिर्फ एक ही बात को देखते रहते हैं। पूजा तो आप हमारे अपने मन को धोने का एक तरीका है। भगवान को बरगलाया नहीं जा सकता। भगवान को फुसलाया नहीं जा सकता। भगवान के साथ में ब्लैक मेलिंग नहीं किया जा सकता। भगवान के साथ में तो सीधा रास्ता एक ही है।

हम पात्रता साबित करें भागीरथ की तरीके से। भागीरथ गंगाजी को माँगने गए थे। पानी कि जरूरत थी, उनको अपनी फसल के लिए भी जरूरत थी। अपने बाप-दादों का उद्धार करने के लिए भी जरूरत थी। लेकिन साथ-साथ में इसलिए भी जरूरत थी। सारे संसार को पानी की जरूरत है और पानी मिलना चाहिए। सारे संसार के लिए, पानी के लिए, निःस्वार्थ भाव से भागीरथ आगे आये। भागीरथ ने तप किया और तप के कारण ये हुआ। अगर ये कारण रहा होता, भागीरथ पानी का श्रेय इकठ्ठा करेंगे और हर आदमी से पैसे वसूल करेंगे और अपना फायदा उठाएँगे और गंगाजी को अपने पास बुला लेंगे। गंगा जी से अपना उल्लू सीधा करेंगे, आप विश्वास रखिये गंगाजी कभी भी भागीरथ के चंगुल में फँसने से तैयार न हुई होतीं। उन्हें जालदार आदमी कि नीयत, नियत का अर्थ है पात्रता, चिन्तन का अर्थ है पात्रता, चरित्र का अर्थ है पात्रता—आपको विकसित करनी ही चाहिए। आपको मालूम है न, देवताओं के अनुग्रह में कोई कमी है क्या? गंगा को, जब गंगा हिमालय से, हिमालय से निकलके चली। अब हम यहाँ नहीं रहेंगे हमको लोगों कि प्यास बुझानी (ह) है खेतों कि हरियाली को पूरी करेंगे, हम हर जगह जाएँगी, हर जगह जाएँगी, हम पशु और पक्षियों की प्यास बुझाना चाहती हैं। खेतों में हरियाली पैदा करना चाहती हैं और आपकी, आपकी गोदी में और आपके हिमालय में अब हमारे रहने का जरा भी मन नहीं है। जैसे ही उन्होंने अपना संकल्प प्रगट किया। पहले तो हिमालय ने मना भी किया नहीं आपको नहीं जाना चाहिए। आप यहीं रहिये। यहाँ क्या आपको क्या कष्ट है। उन्होंने कहा कष्ट का सवाल नहीं है। हमारी आत्मा नहीं मानती है। हमारी आत्मा कहती है कि हमको अपने जीवन को श्रेष्ठ काम में खपा देना चाहिए। लगा देना चाहिए। बस चल पड़ी गंगा। चल पड़ी गंगा। लोगों ने ये भी कहा आप सूख जाएँगी और आप खाली हो जायेंगी, आप दिवालिया हो जाएँगी। लेकिन गंगा ने कहा कि दिवालिया हो जाने में कोई हर्ज है क्या? जिन्दगी एक अच्छे काम के लिए लग जाय तो कोई हर्ज है क्या? बस वो चल पड़ी, चल पड़ी फिर हिमालय ने देखा, हिमालय ने देखा ऐसी शानदार छोकरी, ऐसा शानदार उसका मन। ऐसी शानदार उसकी भावना—उसको कमी नहीं पड़ने देनी चाहिए। हिमालय ने उसको यकीन दिलाया, विश्वास दिलाया—बेटी, तुम बराबर बहती रहना, और तुम्हारे अन्दर सूखने का कभी मौका नहीं आएगा। हमारी बरफ बराबर गलती रहेगी, और तुम्हार पेट और तुम्हारी उद्देश्यों को पूरा करती रहेगी। लाखों वर्ष हो गए गंगा को बहते हुए पर क्या कुछ कमी पड़ी क्या? नहीं, कभी कमी नहीं पड़ी।

आप, आप ये तरीके हैं। आप देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए कल्प साधना कर रहे होंगे। जरूर आपका विश्वास होगा कि गायत्री माता का हम जप करेंगे तो गायत्री माता अनुग्रह करेंगी, आप पर जरूर अनुग्रह करेंगी। गायत्री माता का स्वभाव है, वो जरूर सहायता करती हैं। और गुरूजी का आशीर्वाद मिलेगा। वो अपने पुण्य का एक अंश देंगे बिल्कुल दे देंगे। हमने सारे जिदगी भर अपने पुण्य के अंश बाँटे हैं। बाँटे हैं और हमको बाँटने में बड़ी ख़ुशी होती है। लोगों को खाने में ख़ुशी होती है, हमको खिलाने में ख़ुशी होती है।

और एक और शक्ति है जो हमारी ऊपर छाई हुई है। जिसकी वजह से ये ब्रह्मवर्चस बना है और ये शान्तिकुञ्ज बना है। जिनकी प्रेरणा से ये कल्प साधना के शिविर लगाए गए हैं। और जिनकी इच्छा के हिसाब से आपको बुलाया गया है। वो आपको खाली हाथ जाने देंगे क्या? नहीं, ये तीनों शक्तियाँ ऐसी हैं जो बराबर आपकी सहायता करने के लिए अमादा हैं और सच्चे मन से चाहती हैं कि आपको दें। गाय सच्चे मन से चाहती हैं कि अपने बच्चे को हम सारा का सारा दूध पिला दें। जब घास खा करके गाय आती है, दूध लेके आती है और ये चाहती है हम अपने बच्चे को पूरा का पूरा दूध पिला दें। लेकिन बच्चा तो उसका होना चाहिए। बच्चा किसी और का हुआ तब, कुत्ती का बच्चा हुआ तब, बिल्ली का बच्चा हुआ तब, गधी का बच्चा हुआ तब तो क्यों पिलाएगी गाय। आपको गाय का ही बच्चा होना चाहिए।

आपको सन्त का बच्चा होना चाहिए, आपको ॠषियों का बच्चा होना चाहिए, आपको अध्यात्म का बच्चा होना चाहिए, (अथवा आप) अर्थात आपका चिन्तन, और आपका चरित्र, और आपका व्यक्तित्व, ऐसा होना चाहिए जिससे कि देवता आपकी बराबर सहायता करते हुए चले जाएँ। इससे कम में बात बनेगी नहीं।

इसके लिए आपको त्याग करना ही चाहिए, आपको अपनी बुराइयाँ छोड़नी ही चाहिए, आपको उदार होना ही चाहिए, आपको अपने दृष्टिकोण में महानता (साबित) करनी चाहिए। भगवान को हम क्या करें? देते तो बहुत हैं लेकिन वो उस परीक्षा के बिना कहाँ देते हैं।

आपको याद है न। सुदामा जी एक बार माँगने गए थे और सुदामा जी से माँगने से पहले श्रीकृष्ण भगवान ने ये देखा, ये कुछ हमको भी दे पायेंगे कि नहीं? उनकी पोटली में चावल रखा हुआ था। चावल रखा हुआ था गए थे माँगने कि इच्छा से। लेकिन उन्होंने कहा चावल हमारे हवाले कीजिये। बाद में करना बात। आप चावल नहीं खाली कर सकते तो हम क्यों आपके लिए खाली करेंगे? क्यों हम आपकी सहायता देंगे। उन्होंने चावल कि पोटली को उनके हाथ से छीन लिया और छीनने के बाद अपने पास रखा। बस वही चावल बढ़ते हुए चले गए और चावलों से सुदामा जी को वह धन मिल गया जिसके बारे में सुना होगा आपने। द्वारिकाधीश से सारा धन सुदामा जी को चले गया था। वो चावल ले गए थे। यदि चावल लेकर अगर द्वारकाजी नहीं गए होते। कौन द्वारिकाजी सुदामाजी न गए होते तब, तब उनको खाली हाथ आना पड़ता। आप देंगे नहीं तो ले कहाँ से लेंगे। इसलिए देने की बात विचार कीजिए, परिशोधन की बात सोचिए, पवित्रता की बात सोचिए, अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने की बात सोचिए। इतना अगर आप सोच सकते हों। तो फिर आप देखिये किस कदर आपको, किस कदर आपको भगवान की सहायता मिलती है। देवताओं की कैसी सहायता मिलती है, आपके मंत्र कैसे चमत्कारी सिद्ध होते हैं। आपका बेहतर अनुष्ठान से कितना ज्यादा फायदा मिलता है।

भगवान तो ऐसे ही हैं। कैसे? द्रौपदी को निहाल किया था न आपको ध्यान है कि नहीं है। भगवान ने द्रौपदी को कितना वस्त्र दिया था। लेकिन आप माँगें तो आपको मिलेगा क्या? न, आपको नहीं देंगे। क्यों? द्रौपती के साथ पक्षपात, आपके साथ पक्षपात क्यों नहीं? नहीं मतलब एक ही बात है कि द्रौपदी ने साबित कर दिया था उसको मिलने का हक़ है।

आप ये साबित कीजिये कि आपको मिलने का हक़ है। आपको ध्यान है एक बार द्रौपदी के जीवन की घटना है कि वो गंगा स्नान कर रही थी। एक महात्मा जी बगल में नहा रहे थे। उनके पास एक लंगोटी नहाने को थी और एक पहनने को थी। बस जरा हवा का झोंका आया और एक लंगोटी बह गयी। जिसको पहने हुवे थे वो लंगोटी फट गयी। देखा न आपने दुर्भाग्य। दुर्भाग्य देखा। द्रौपदी ने देखा महात्मा जी की एक लंगोटी बह गयी और एक लंगोटी फट गयी और शरम के मारे अपने शरीर को छुपा करके एक झाडी में जा बैठे। उनकी सहायता करनी चाहिए, उनका मन पिघल गया द्रौपदी का। उन्होंने अपनी साड़ी के दो टुकड़े काटे, आधा वाला टुकड़ा महात्मा जी को दे दिया और ये कहा आपकी शरम चली जायेगी। आपको साड़ी में से, साड़ी में से अपने लिये दो लंगोटी बना लिजीए, मैं तो आधी साड़ी से भी काम चला सकती हूँ। बस ऐसा हो गया। ये क्या थी? उदारता, जो उनके कपड़े के साथ में जुड़ी हुई थी। कपड़े की कीमत क्या हो सकती है? कपड़ा तो ज़रा सी कीमत का था। लेकिन भगवान के भण्डार में चला गया तो लाखों गुना हो गया।

भगवान ने देखा जो आदमी उदार है, इसके लिए उदार होना चाहिए। जो आदमी दयालु है, इसके लिए दयालु होना चाहिए। जो आदमी चरित्रवान है, इसके लिए चरित्रवान होना चाहिए। बस द्रौपदी के लिए भगवान ने कितना सारा, जब वो नंगी कर रहे थे दुःशासन तो कितना सारा कपड़ा भेज दिया और कितनी सारी सहायता की। आपसे मुझे यही कहना था और कुछ नहीं और कुछ कहना नहीं है। आप यहाँ से देवता का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए आये हैं। और आपको वरदान पाने की इच्छा है। आपकी इच्छा सही है, मुनासिब है। और आप, आप किसी गलत फहमी में नहीं हैं। किसी अन्धविश्वास में जकड़े हुए नहीं हैं। प्राचीन काल के असंख्य इतिहास ऐसे हैं, जिसमें कि देवताओं ने सहायता की है और अनुग्रह किये हैं। आपको जरूर सहायता मिलेगी पर एक शर्त को भूलिए मत। अगर वो शर्त को भुला देंगे तो आप घाटे में रहेंगे। फिर आप निराश होंगे, फिर आप गाली देंगे, फिर आप ये सोचेंगे मंत्र मिथ्या होते हैं, देवता मिथ्या होते हैं। क्यों मिथ्या होते हैं? अगर आप ये पात्रता जिसके लिए हमको बहुत जोर देना है। जिसके लिए आपको अनुष्ठान करा रहे हैं। चिन्तन बदलने के लिए, ताकि आपका भीतर का कायाकल्प हो जाय और देवता आपको कायाकल्प करने में बहुत सहायता दें। आप अपने भीतर को बदलने की कोशिश कीजिये, आप अपना चिन्तन बदलिए, अपना चरित्र बदलिए, अपने जीवन का ढर्रा और ढाँचा बदलिए, फिर देखिये आपकी बदली हुयी परिस्थिति में जो देवता आपसे नाखुश थे, जो मुँह मोड़े हुए थे, किस तरह आपके गुलाम हो जाते हैं। कैसे आपकी सहायता करते हैं, कैसे आपको छाती से लगाते हैं। कैसे आपको निहाल कर देते हैं।

बस यही अनुभव हमारे जीवन का भी है, और इस अनुभव से आपको लाभ उठाना चाहिए। आप (को) अपने आप को खाली कीजिए, और निहाल हो के जाइए। बस इतना ही कहना था आज मुझे आपसे।

॥ॐ शान्तिः॥