शिक्षा और विद्या का ज्ञान-विज्ञान

मनुष्य की विशेषता ज्ञान। ज्ञान न हो तब, ज्ञान विहीन होने की वजह से चेतन होते हुए भी सब प्राणी को नीचे दर्जे में गिना जाता है। जीवन तो वनस्पति में भी है, पर ज्ञान नहीं। दूसरे भी हैं मक्खी हैं, मच्छर हैं, कीड़े हैं, मकोड़े हैं, जीवन है। उनमें भी जिन्दगी है। मेढक में भी जिन्दगी है, मछली में भी जिन्दगी है, कछुए में भी जिन्दगी है, चिड़िया में भी जिन्दगी है फिर इनको क्यों हम घटिया दर्जे का मानते हैं? उनको एक ही कमी है। इनको ज्ञान की कमी। मनुष्य ज्ञान का देवता माना गया है। ज्ञान की वजह से, मननशील होने की वजह से, विचारशील होने की वजह से, मनुष्य का स्तर ऊँचा उठा है। कल्पना कीजिए - प्राचीनकाल में जब मनुष्य वनमानुष रहा होगा, जब उसको ज्ञान नहीं रहा होगा, सामाजिकता का ज्ञान नहीं रहा होगा, और जीवन की ज़िम्मेदारियों का ज्ञान नहीं रहा होगा, अपनी गौरव-गरिमा और गुण-कर्म-स्वभाव की विशेषताओं के बारे में कोई जानकारी नहीं रही होगी तब, तब वो भी जैसे कि डार्विन साहब कहते थे बन्दर की औलाद, वास्तव में बन्दर की औलाद की तरीके से इंसान भी रहा होगा तब। लेकिन आज सृष्टि का स्वामी बना हुआ है। किस वजह से? हाथ-पाँव बड़े हो गए हैं, नहीं। हाथ-पाँव बड़े नहीं हुए हैं, हाथ-पाँव उसके वही हैं। हाथ-पाँव में कोई अन्तर नहीं हुआ है, लम्बाई-चौड़ाई में कोई अन्तर नहीं हुआ है, नाक-कान-आँख की बनावट में कोई अन्तर नहीं हुआ है - लेकिन जो अन्तर हो गया है, प्राचीनकाल की तुलना में आज, वो आदमी का ज्ञान बढ़ता हुआ चला गया है।

ज्ञान की दो धाराएँ हैं और दोनों को ही बढ़ाना चाहिए। एक धारा वो है जो हमारे जीविका पैदा करने के लिए काम आती है - उसको शिक्षा कहते हैं। लोक-व्यवहार उसी के आधार पर सीखा जाता है। बच्चों को स्कूल में जो हम पढ़ाते हैं, ये शिक्षा पढ़ाते हैं। शिक्षा का क्या मतलब? शिक्षा का मतलब है - उनको लोकाचार आए, उनको ये मालुम पड़े कि संसार की बनावट क्या है, भूगोल क्या है, इतिहास क्या है? दुनिया में इंसानों की चाल-चलन क्या रहे हैं? दुनिया में किस तरीके से उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, ये हम इतिहास से सीखें। पेड़ कैसे (पैदा हो) पैदा होते हैं, ये सृष्टि क्या है, राजनीति क्या है, समाज क्या है, (ये) नागरिक कर्तव्य क्या हैं, जीविका उपार्जन कैसे करनी चाहिए, अर्थशास्त्र क्या है वैगरह बातें सीख करके हम जीविका उपार्जन कर सकते हैं और जीविका उपार्जन के तरीके से लोक व्यवहार में प्रवीण बन सकते हैं। लोक-व्यवहार में प्रवीण बनने के सम्बन्ध में - एक और जीविकोपार्जन के सम्बन्ध में - दो - जो जानकारियाँ हमको मिलती हैं उसका नाम शिक्षा है।

आवश्यक है। शिक्षा (आव) आवश्यक है। शिक्षा न होगी तो आदमी अपने शरीर को सम्हाल किस तरीके से पाएगा, समाज के साथ में तालमेल बिठा किस तरीके से पाएगा, अपनी अकल का उपयोग किस तरीके से कर पाएगा - ये (सब) सब जानकारियों के लिए शिक्षा तो आवश्यक है। लेकिन शिक्षा से ही काम चलने वाला नहीं है। शरीर - शरीर के जीवन के लिए, भौतिक जीवन को ठीक बनाए रहने के लिए शिक्षा बेहद जरूरी है। लेकिन (एक) केवल भौतिक जीवन ही तो नहीं है। एक और भी तो हमारा जीवन है, जिसको हम आध्यात्मिक जीवन कहते हैं। चेतना भी तो कोई हमारे भीतर है, आत्मा भी तो कोई (अंद) हमारे भीतर है, विवेक भी तो (कोई) कोई हमारे भीतर है, सम्वेदनाएँ भी तो हमारे कोई भीतर हैं - इन सबको ठीक रखने के लिए एक और चीज़ की ज़रूरत है जिसका नाम है विद्या। ज्ञान की धारा उसी को कहते हैं, जिसको विद्या कहा गया है।

विद्या का (नाम) पूरा नाम - अध्यात्म-विद्या आप मानें तो भी हर्ज़ नहीं है। ऋतम्भरा-प्रज्ञा इसी को कहें, तो भी कोई हर्ज नहीं है। विवेक आप इसको कहें तो भी हर्ज नहीं है। इसको आप गायत्री कहें, प्रज्ञा कहें तो भी हर्ज नहीं है। वास्तव में महत्त्व उसी का है। जानकारियों के बारे में - दुनिया की जानकारियों के बारे में तो ढेरों आदमी ऐसे हैं जिसकी जानकारियाँ बहुत हैं, होशियार बहुत हैं। आदमी विद्यावान कम है क्या दुनिया में, कलाकार कम हैं क्या दुनिया में, चतुर आदमी दुनिया में कम है क्या, क्रिया-कुशल लोगों की कमी है क्या? पर वो स्वयं के लिए और दूसरों के लिये क्या मुफीद साबित हुए, आप बताइए न। जेलखाने में पड़े हुए लोगों को आपने देखा है। एक से एक होशियार आदमी, एक से एक समझदार आदमी वहीं कैदखाने में - जालसाजों में पढ़े-लिखे ही आदमी ज्यादा होते हैं। नासमझ आदमी जालसाझी नहीं कर सकते। नासमझ आदमी जेब कटी कर सकते हैं और छोटे-मोटे काम कर सकते हैं पर दुनिया में जो बड़े-बड़े जालसाजियाँ हुई हैं, ये पढ़े-लिखे लोगों ने की हैं।

शिक्षा की बात मैं नहीं कहता। शिक्षा अपनी जगह पर मुबारक मुझे कुछ लेना-देना नहीं। लेकिन जहाँ आप लोगों की सेवा में मैं कुछ बात कह रहा हूँ, विद्या के बारे में कह रहा हूँ। आपको विद्या का महत्त्व समझना चाहिए। विद्या का अगर महत्त्व समझ सकें, तो मजा आये। विद्या से क्या मतलब? विद्या से मतलब ये है कि आप अपने विचारों का इस्तेमाल किस तरीके से करें? आप अपने शरीर का इस्तेमाल किस तरीके से करें? साधनों का इस्तेमाल कैसे करें? परिस्थितियों का उपयोग किस तरीके से करें? अपने पास जो सामान और साधन मिला हुआ है या मिल सकता है, आप (इसमें) ठीक तरीके से इस्तेमाल किस तरीके से कर पायेंगे, बस इसी का नाम विद्या है। इसी का नाम विद्या है। इसके लिए सामान्य लोक ज्ञान से काम नहीं चलता। इसके लिए आदमी को थोड़ा ऊँचे स्तर पर बैठ कर के विचार करना होता है और ये देखना पड़ता है कि इंसान की गरिमा और इंसान की महत्ता की सुरक्षा किस तरीके से की जाए। उसके लिए क्या करना चाहिए - बस इसी का नाम विद्या है। और विद्या किसी को मिल जाए तब, तब फिर धन्य हो जाते हैं।

शास्त्रों में विद्या की महत्ता के लिए न जाने क्या से क्या कहा गया है—‘विद्या अमृतमश्नुते’। विद्या को अमृत कहा गया है। जिसने विद्या प्राप्त कर ली है, उसको अमृत मिल गया। जो ठीक तरीके से उचित और अनुचित का फल जानता है, उसके लिए फिर दुनिया में कोई चीज़ मुश्किल नहीं रह जाती। जिसको ये मालुम है - समस्याएँ किस तरीके से पैदा होती हैं और उनके समाधान क्या हैं। यह लोगों को मालुम नहीं है। लोगों का ये ख्याल है, परिस्थितियों की वजह से समस्याएँ उत्पन्न होतीं हैं। लेकिन सही बात ये नहीं है। परिस्थितियों की वजह से समस्याएँ उत्पन्न नहीं होतीं। दूसरों की वजह से परिस्थितियाँ उत्पन्न नहीं होतीं। बल्कि आदमी की मन:स्थिति इसकी ज़िम्मेदार है। ये बात आमतौर से लोगों की समझ में नहीं आती। महापुरुषों के इतिहास को जब आप पढ़ें, तो आप आसानी से जान सकते हैं, कि समस्याएँ कहाँ से उत्पन्न हुईं, और आदमी किस तरीके से बढ़े।

आपने इब्राहिम लिंकन का नाम पढ़ा है न, जार्ज वाशिंगटन को जानते है न, गाँधी जी के जीवन का इतिहास पढ़ा है न, बुद्ध का इतिहास पढ़ा है न, इनकी परिस्थितियों में क्या खास बात थी बताइए, बल्कि सामान्य लोगों के बराबर अथवा उससे भी गई बीती परिस्थितायाँ थीं। लेकिन गई-बीती परिस्थितियों में से भी उनकी मन:स्थिति इतनी शानदार, इतनी शानदार मन:स्थिति हुई कि न जाने कहाँ से कहाँ उठते, और कहाँ से कहाँ बड़े होते हुए चले गए। शंकराचार्य में क्या विशेषता थी आप बताइए, समर्थ गुरु रामदास में क्या विशेषता थी बताइए, कबीर में क्या परिस्थितियाँ थीं बताइए, कबीर को कौन कन्धे पर उठा कर ले गया था आप बताइये। केवल मनःस्थिति थी, जिसमें विवेकशीलता मुख्य है। मन:स्थिति में एक चीज़ अगर आ जाए - विवेक - आदमी के भीतर आ जाए, तो अपनी समस्याओं का हल कर सकता है, और दूसरों की समस्या को हल कर सकता है, और अपने पास जो साधन सामग्री मिली हुई है, इसका ठीक तरीके से इस्तेमाल कर सकता है। आदमी को समय मिला हुआ है, आदमी को श्रम मिला हुआ है, आदमी को समय मिला हुआ है, (आ) आदमी को कैसा अच्छा-खासा शरीर मिला हुआ है, आदमी को कैसा बढ़िया वाला दिमाग मिला हुआ है। आदमी को कैसा वाला कुटुम्ब मिला हुआ है। आदमी को कैसा कार्यक्षेत्र मिला हुआ है। सारे के सारे क्षेत्र का उचित और अनुचित का समाधान हम निकाल नहीं पाते, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए बस यहीं हम भटक जाते हैं। यहीं भटक जाने की वजह से हम कहीं के मारे कहीं जा पहुँचते हैं। जो हमको करना चाहिए वो हम कर नहीं पाते और जो हम को नहीं करना चाहिए वो हम कर पाते हैं। इसकी क्या वजह है, इसकी वजह यह है कि हमारे पास एक खास किस्म का पुर्जा नहीं है, जिसको हम विवेक कहते हैं। ज्ञान का अर्थ यहाँ विवेक है। ज्ञान का अर्थ वो नहीं है, नॉलेज (knowledge) नहीं है - ज्ञान का अर्थ है (विज़) विज़डम (wisdom)।

विज़डम (wisdom) अगर आपके पास है तो आप हर चीज़ को उचित और अनुचित के कसौटी पर कस सकते हैं, और सिर्फ उसी बात को अपने जीवन में धारण कर सकते हैं जो आपको करनी चाहिए। इसके लिए सबसे बड़ी कमजोरी और सबसे बड़ी कठिनाई ये है कि हम दूसरों को काम करते देखकर, दूसरों को उसके रास्ते पर चलने लगते हैं। ये काम तो अन्धी भेड़ों का है, इंसान का थोड़ी है। इंसान जहाँ ज्यादा लोग चलें वहीं हम चलें, जो दूसरे लोग करें वही हम करें, दूसरे लोग कहें वही हम करें, दूसरे लोग जिस तरीके से मरें वही मरें, ये भी कोई ढंग है। ये कोई ढंग नहीं। समझदारी का और आध्यात्मिकता का तकाज़ा आदमी को ये है कि प्रत्येक परिस्थिति के बारे में गुण के हिसाब से, उसके परिणाम के हिसाब से, स्वयं विचार करना चाहिए। (स्व) स्वतंत्र चिन्तन इसी का नाम है। स्वतंत्र चिन्तन अगर आपके पास है, तो आप उचित और अनुचित का निर्धारण कर सकते हैं।

अपने यहाँ गायत्री माता का आपको शिक्षण दिया जाता है। आप यहाँ उपासना में गायत्री का शिक्षण प्राप्त करते रहे हैं। गायत्री की उपासना में भी लगे हुए हैं। लेकिन आप भूल जाते हैं कि गायत्री किसके कन्धे पर सवार होती है और कौन गायत्री को अपने इशारे पर नचाये-नचाये फिरता है। आपने गायत्री माता की तस्वीर को आप रोज ध्यान करते हैं। इस तस्वीर में उसका वाहन देखा है न आपने, उस वाहन का नाम है हँस। हँस किसे कहते हैं? हँस के ऊपर गायत्री माता सवारी करती हैं। ये बात शायद आपकी समझ में न आये क्योंकि इंसान के बराबर शरीर जिनका है वो एक जानवर पर - पशुओं पर सवारी तो कर सकते हैं लेकिन पक्षियों पर सवारी नहीं कर सकते। घोड़े पर आप बैठ सकते हैं, गधे पर बैठ सकते हैं, हाथी पर बैठ सकते हैं, ऊँठ पर बैठ सकते हैं, भैसे पर बैठ सकते हैं, इन पर तो बैठ सकते हैं, लेकिन आप बताइए किसी पक्षी पर जिसका वजन बेचारे का नहीं के बराबर है, उसके ऊपर आप कैसे आदमी बैठ पाएगा। मुश्किल है। लम्बाई-चौड़ाई इतनी नहीं है। बहुत छोटी चीज है। ज्ञान पीठ पर बाँध दे हँस की तो बात अलग है। लेकिन इंसान के बराबर कोई आदमी देवता बैठेगा तो कैसे बैठेगा।

ये एक अलंकार है। जिसमें ये बात बताया गया है कि हँस उस व्यक्ति का नाम है, जो उचित और अनुचित का फर्क करना जानता है। आपको उचित और अनुचित का फर्क करना चाहिए। लोगों के रास्ते पे चलने के बनस्पत, आपको अलग खड़े हो कर के देखना चाहिए कि मुनासिब रास्ता क्या है? मुनासिब तरीके क्या हैं? मुनासिब क्या है? लोग गलती करें तो आप क्या कर सकते हैं? (लोग) तो गलतियों का ही जमाना है। आप पानी के बहाव में तिनके के तरीके से बहते चले जाएँ, भला ये भी कोई समझदारी है? आप हवा में उड़ते हुए पत्तों की तरीके से उड़ते हुए चले जाएँ भला ये भी कोई समझदारी हुई? आपको वजनदार होना चाहिए। आपका गौरव होना चाहिए। आपका वजन होना चाहिए। गौरव का मतलब वजन होता है, भारीपन होता है, भारी भरकम होना चाहिए। भारी भरकम का मतलब ये है कि आपको अपनी जिन्दगी के बारे में फैसले स्वयं करने चाहिए। अपने रास्ते का चुनाव करने वाले में आपकी हिम्मत आपकी सहायक होनी चाहिए। भगवान और आपका ईमान - ईमान और भगवान - दो चीजें ऐसी हैं जिनकी सहायता से आप बड़े से बड़े फैसले कर सकते हैं।

दुनिया में तो आमतौर से गलत काम होते हैं। लोग तो अपने आपको शरीर समझते हैं और शरीर की खुशहाली के लिए जो भी बुरे से बुरा काम हो सकता है, सब करते हैं। लोग तो ऐसे बेअकल हैं कि लोगों को तो आज का फायदा दिखाई पड़ता है, (कल का फायदा) कल का नुकसान कहाँ दिखाई पड़ता है? जितनी भी सामाजिक कुरीतियाँ हैं, उसमें क्या बात है जरा बताइए? आज का फायदा, कल का नुकसान। आप भी यही करेंगे, न। लोगों के रास्ते से हटिए। लोगों के रास्ते से हट करके अलग खड़े होकर के नये ढंग से विचार करना शुरू कीजिए। क्या मुनासिब है और क्या मुनासिब नहीं है। आपका भविष्य किन बातों से बनता है और किन बातों से बनता नहीं है। अगर आप ये बातें तैं करने लगेंगे, तो मैं आपको ज्ञानवान कहूँगा।

ज्ञानवानों की आपने तवारीख पढ़ी है न। भगवान बुद्ध का नाम सुना है न। भगवान बुद्ध में क्या विशेषता हुईघ? भगवान से क्या वरदान मिला? उनको क्या विशेष सम्पदा मिली? आप उनके जीवन को पढ़िए। बोधिवृक्ष के नीचे, एक पेड़ के नीचे, जिसके नीचे उन्होंने तप किया था, उनको एक खास चीज़ मिल गई। उस (चीज़) खास चीज़ का नाम था - विवेक। दूर की बात समझने का उनको माद्दा मिल गया। उन्होंने कहा - सारी दुनिया से प्रभावित हमको होना नहीं है, हमको दूसरों को प्रभावित करना है। दूसरे जो मुनासिब कहें, मान भी सकते हैं। लेकिन अधिकांश बातें - खासतौर से जीवनयापन करने के सम्बन्ध में, जीवन की सम्पदाओं को उपयोग करने के सम्बन्ध में, अधिकांश लोगों की रायें गलत हैं, लोगों के ढर्रे गलत हैं। उन्होंने अपने आप को - भगवान बुद्ध ने अलग से खड़ा करके शुरू किया और जमाने की ओर से आँखें बन्द कर लीं।

आपने ध्यान मुद्रा देखी है न भगवान की। ध्यान मुद्रा का मतलब यही है कि उन्होंने अपनी आँखें बन्द कर लीं - आँखें बन्द कर के, और फिर स्वयं अपने भीतर देखा - और अपनी ज़िम्मेदारियों को देखा, अपने भविष्य को देखा, अपने कर्तव्यों को देखा। और उन्होंने वो फैसले किये जिसके आधार पर एक सामान्य राजकुमार भगवान का अवतार कहलाने में समर्थ हुआ। उस जमाने में क्या होता था, उन्होंने जरा भी विचार नहीं किया। उन्होंने कहा - मुनासिब क्या है? जो मुनासिफ था, वही लोगों से कहा। यज्ञों में, यज्ञों में हिंसा होती है न, हम हिंसा नहीं करेंगे। यज्ञ की बात वेदों में लिखी है तब। भगवान बुद्ध वेदों के बारे में जानकार नहीं थे, तो उन्होंने कहा - वेद में ऐसा लिखा है, तो वेद को आपको नहीं मानना चाहिए। फिर लोगों ने कहा - वेद तो भगवान बनाये हैं। उन्होंने ये कहा अगर भगवान ने ऐसे वेद बनाये हैं जिसमें कि नैतिक सिद्धान्तों का परिपालन नहीं हुआ है, तो फिर ऐसे भगवान को मानने की आवश्यकता क्या है? फिर उन्होंने भगवान के मानने से इन्कार कर दिया। कहने का अर्थ ये है कि उन्होंने विवेक को, बुद्धम शरणम् गच्छामि, नाम ही उनका बुद्ध रखा गया, जन्मजात नाम बुद्ध नहीं था उनका। लेकिन विवेक, बुद्ध का अर्थ है यहाँ विवेक - ठीक बात - वास्तविकता, वास्तविकता को उनको अंगीकार कर लिया। उन्होंने ये फैसला किया जो वास्तविकता होगी, सच्चाई होगी हम सिर्फ उसी बात को मानेंगे और बातों को नहीं मानेंगे। इसी का नाम है आत्मज्ञान, इसी का नाम है ब्रह्मविद्या, इसी का नाम है प्रज्ञा, इसी का नाम है ऋतम्भरा। ऋतम्भरा है, इसी को विद्या कहते हैं, विद्या कहा गया है।

मैं आपसे यही निवेदन है कर रहा था कि आपको शिक्षा प्राप्त कर ली होगी, बहुत कर ली होगी, करनी चाहिए। लेकिन आप विद्या के बारे में वंचित न रहिए। गायत्री की महत्ता आपने जानी है, तो (आ) आप उसका वाहन बनना शुरू कीजिए। उसके वाहन की दो ही तो विशेषता हैं - एक तो ये है कि नीर और क्षीर को अलग कर देता है, पानी और दूध को अलग कर देता है। इस दुनिया में जो कुछ भी मिला हुआ है, घपला है। सब गुड़गोबर मिला हुआ है। कहीं सच्चाई की झलक दिखाई पड़ती है और इसी के साथ में ढिठाई और बेइमानी का कितना गहरा पुट दिखाई पड़ता है। आप अलग किस तरीके से करेंगे? आपकी विवेकशीलता के माध्यम से सम्भव है कि आप दोनों को अलग कर दें। नहीं तो अलग नहीं हो सकेंगे दूध और पानी मिला ही चला जाएगा। सच्चाई की थोड़ी सी झलक, और बेइमानी का अधिक से अधिक माद्दा, यही तो लोकव्यवहार है। दुनिया यही तो है, आप अलग कीजिए और हँस बनने की कोशिश कीजिए। ये तो आपकी समझ की बात हुई। अकल आपको उचित और अनुचित का फर्क करना जाने और एक और, इससे आगे वाली बात, आगे आती है - ग्रहण आप क्या करें? छोड़ें क्या? फैसला करना - काम नम्बर एक - और व्यवहार में उतारना - काम नम्बर दो। व्यवहार में उतारने के बारे में भी हँस का जो प्रतीक बनाया गया है, वो ये बनाया गया है कि मोती खाता है, कीड़े नहीं खाता - अर्थात जो चीज़ें मुनासिब हैं, जो चीज़ें सही हैं, वो सिर्फ उन्हीं को अपनी जिन्दगी में ग्रहण कर लेता है। बाकी चीजों को उनके बारे में इनकार कर देता है। नहीं, ये हमको चाहिए नहीं।

राजहंस के बारे में ये बताया गया है कि या हँसा मोती चरे या लंघन मर जाए। लंघन मरना ठीक है। अगर आप ईमानदारी से नहीं कमा सकते, मुनासिब जिन्दगी नहीं जी सकते, तो ऐसी जिन्दगी जीने से क्या फायदा। आप नहीं जीएँ। नहीं जीने से मेरा मतलब ये है - आप गरीबी में गुजारा कर लें, कंगाली में गुजारा कर लें, तकलीफ में गुजारा कर लें। तकलीफ में गुजारा ढेरों आदमी करते हैं। कोई हारी-बीमारी से करता है, कोई जेलखाने चला जाता है, किसी के बाल-बच्चे खराब हो जाते हैं, किसी के ऊपर और मुसीबतें आ जाती हैं। ढेरों आदमी इस दुनिया में ऐसे हैं, जो किसी वजह से मुसीबत उठाते हैं। आप सच्चाई की वजह से, ईमानदारी की वजह से, और दयानतदारी की वजह से अगर मुसीबत उठा लें तो क्या हर्ज़ की बात है? यहाँ तक कि आप मुसीबत उठाने तक के लिए तैयार रहें। आमतौर से इसमें मुसीबत उठाने की जैसी कोई बात है नहीं। आप किफायतशारी से रहें, खर्च अपना कम मान के चलें, महत्त्वाकांक्षाएँ को आप गिरा कर के रहें - तो आपकी जिन्दगी में फिर कोई दिक्कत नहीं आ सकती।

ज्ञान यही सिखाता है आपको कि हम अपना रवैया बदल दें। जिसके बारे में हमको शिकायत हैं, दुनिया हमको ऐसे हैरान करती है, दुनिया हजार हैरान करती है। दुनिया ऐसा हैरान करती है, अगर आप दुनिया के बारे में गौर करने की (अ) बनस्पत, अपनी गुण-कर्म-स्वभाव के बारे में विचार करना शुरू करें, अपनी आदतों की देखभाल करना शुरू करें, और ये विचार करें - कोई कमियाँ हमारे भीतर तो नहीं हैं। अगर आप (अप) अपनी कमियों को सुधारने की (की आप) बाबत तैयार हो जाएँ, तो आप देखेंगे सारी दुनिया किस तरीके से बदल गई। जो दुनिया आपको गन्दी मालूम पड़ती थी, जलील-गलीज मालूम पड़ती थी, वही जलील और गलीज दुनिया आपको अपना दृष्टिकोण बदल लेने के बाद में कैसी खूबसूरत मालूम पड़ेगी। आप गुलाब के फूल, आप भौंरे की तरीके से किसी बगीचे में जायें तो बगीचा कितना सुहावना मालूम पड़ेगा। अगर उसी अपनी दृष्टि को गुबरीले कीड़े के तरीके से जाएँ तो उसी बगीचे में आपको ढेरों की ढेरों गलाजत पड़ी हुई मालूम पड़ेगी, गन्दगी मालूम पड़ेगी।

आप अपना दृष्टिकोण क्यों नहीं बदल लेते? इस दुनिया में क्या चीज़ नहीं है? इस दुनिया में सन्तों की कमी है? सज्जनों की कमी है? शराफत की कमी है? भलमनसाहत की कमी है? नेक कामों की कमी है? नहीं, कहीं कमी नहीं है। लेकिन आपका दृष्टिकोण क्यों गन्दा है? दृष्टिकोण की वजह से आपका मन वहीं जा पहुँचता है, जहाँ दुनिया में गन्दगी है। ये तो नहीं कहते कि दुनिया में गन्दगी नहीं है, दुनिया में पाप नहीं है, दुनिया में असहयोग नहीं है, दुनिया में गैर वफादारी नहीं है, ये तो मैं नहीं कहता। लेकिन आप सम्पर्क रखिये न, जिनसे आप सम्पर्क रखेंगे वो ही चीज तो खिंचती हुई चली आएगी। जिन लोगों ने गन्दे लोगों से सम्पर्क रखा है, उनको जुआरी दिखाई पड़ते, चोर दिखाई पड़ते हैं, लफंगे-उचक्के दिखाई पड़ते हैं और बहुत से ऐसे आदमी हैं जिन्होंने कि अपने ऊँचे ख़यालातों से रिश्ता रखा है - उनके सामने अच्छी किताबें ही आती हैं, अच्छे सज्जन ही आते हैं, अच्छी परिस्थितियाँ ही आती हैं, अच्छे मौके ही सामने आते हैं।

आप अपने आप को बदल लीजिए न। अपने आप को बदल देने के बारे में अगर आपको जानकारी हो, तो इसका नाम विद्या है। विद्या उस चीज का नाम है, जो दुनियावी जानकारियों के सम्बन्ध में नहीं, अपनी विशेषताओं के सम्बन्ध में ज्ञान कराती है। न केवल विशेषताओं के बारे में ज्ञान कराती है, बल्कि ये बताती है - गुत्थियाँ भीतर से पैदा होती हैं, बाहर से नहीं। जड़ों से पेड़ पैदा होता है, हवा से नहीं। हवा से पेड़ को सहायता तो मिलती है, पर लेकिन असल में उसको खुराक जो मिलती है, जड़ों से मिलती है। आदमी के भीतर जो कुछ है, वही उसकी जिन्दगी के विकास करने का मूलभूत आधार है। इस मूलभूत आधार का काम स्वयं कीजिए न। बाहर के लोगों की क्यों आप खुशामद करते हैं? बाहर के आदमी के लिए क्यों आप ये देखते हैं, इनका सहयोग हमको मिला कि नहीं मिला। दूसरों का सहयोग न मिला तो नहीं भी सही, दूसरे आदमी अच्छे नहीं हैं, तो न भी सही। आप अच्छे बन जाइए न। आप अपना दृष्टिकोण ठीक कर लीजिए न, आप अपना रवैया ठीक कर लीजिए न, आप अपने पैरों पर खड़े हो जाइए न, फिर आप देखेंगे किस तरीके से जिसकी आपको शिकायतें थीं, सारी शिकायतें दूर हो गईं। तो इसी का नाम विद्या है।

अपना समय का उपयोग करना सीखिए, अपने शरीर का उपयोग करना सीखिए, अपनी अकल का उपयोग करना सीखिए, अपने प्रभाव का उपयोग करना सीखिए। भगवान ने जो कुछ भी दिया है, उन सब चीज़ों का ठीक इस्तेमाल करना सीखिए - ज़रा सीखिए तो सही। आप अपने आपका ठीक चीजों का इस्तमाल कर लें, फिर - फिर आपके सामने वो ढेरों की ढेरों समस्याएँ - जो कभी आपको आर्थिक तंगी के रूप में दिखाई पड़ती हैं, कभी बीमारी के रूप में दिखाई पड़ती हैं, कभी मान-अपमान के रूप में दिखाई पड़ती हैं, कभी लोगों के असहयोग के रूप में दिखाई पड़ती हैं, कभी क्या दिखाई पड़ती है सब दिखाई पड़ती हैं, आप उन सारी समस्याओं का मुकाबला कर सकते हैं, अगर आपने अपने आप को सही करने का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, और उस समझदारी को अपने जीवन में धारण कर लिया है।

बुरे आदमी हैं। मान लिया बुरे आदमी हैं, तो बुरे आदमियों के साथ में दूसरे सूलूक कर सकते हैं। दिक्कत क्या है। आप एक डाक्टर के तरीके से उनके साथ में रवैया करना शुरू कर दीजिए। बुरे आदमी हैं - तो बीमार भी तो बुरे आदमी हैं - बीमारियों से आप (ल) लड़िए, और (उसके) बीमार की हिफ़ाजत कर दीजिए। ये हो सकता है। ये बिलकुल हो सकता है। आप बैर तो रखें, आप केवल बुराइयों से बैर रखें। हमला जो आप पर हुआ है चारों ओर से बुराइयों ने किया है - व्यक्ति को और बुराइयों को अगर आप फर्क करना सीख लें, तो आपको मैं ज्ञानवान कह सकता हूँ।

ज्ञानवान आप रहेंगे। तो ज्ञानवान जिस दिन आप बनेंगे, उस दिन आपका दरिद्र दूर हो जाएगा - क्योंकि आप बड़ों के साथ में मुकाबला करने की तुलना में, अपने छोटों के साथ मुकाबला करना शुरू कर देंगे। फिर आपको ये मालुम पड़ेगा कि आप मालदार हैं, आप अमीर हैं, आप सम्पन्न हैं, और भाग्यवान हैं। अगर आप बड़ों के साथ में मुकाबला करते रहेंगे तो ये मालूम पड़ेंगे, हम उनकी बराबरी के नहीं हैं। उनकी तुलना में गरीब हैं, उनकी तुलना में गए-बीते हैं, उनकी तुलना में दुःखी हैं। तुलना भर की तो बात है। न कोई गरीब है दुनिया में, न कोई अमीर है - जो आदमी (अपने) मुकाबला अमीरों से करता है, वो गरीब है और जो गरीबों से मुकाबला करता है, अमीर है। जब अमीरी और गरीबी की कोई व्याख्या नहीं हो सकती तो फिर आप ऐसा क्यों न करें अपनी परिभाषाओं को ही बदल दें, अपने सोचने के तरीके को ही बदल दें। आप अपने आप को, सोचने के तरीके को ठीक तरीके से बदल दें, और अपनी रीति-नीति में आवश्यक सुधार कर लें, तो मैं आप से ये कहता हूँ, आपकी सारी की सारी गुत्थियों के समाधान होंगे। आप सुखी जीवन जिएँगे, आप शान्ति का जिन्दगी जिएँगे, आप खुशी की जिन्दगी जिएँगे, आप खुशहाली की जिन्दगी जिएँगे। इसीलिए विद्या की ओर आपको गौर करना चाहिए।

आपको अपनी आन्तरिक स्थितियों के बारे में देखभाल करनी चाहिए। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का पुनः निरीक्षण और निर्धारण करना चाहिए। आपको अपने गतिविधियों के बारे में, दृष्टिकोण के बारे में विचार करना चाहिए। इसमें गलतियाँ कहाँ हैं? जहाँ कहीं गलतियाँ हैं, अगर आप उसको सुधार पाएँ तो फिर मैं आपको ये कहूँगा, आपको एक ऐसी चीज हाथ लग गई जिसके आधार पर आप खुशी की जिन्दगी जिएँगे, शान्ति की जिन्दगी जिएँगे, मोहब्बत की जिन्दगी जिएँगे, प्यार की जिन्दगी जिएँगे और ऐसी जिन्दगी जिएँगे कि जिसमें आपकी खुशी उन सब लोगों को मिले जो आपके नजदीक आते हों, जो आपसे सम्बन्ध रखते हों। आपके घर वाले आपसे बेहद खुश देखे जाएँगे अगर आप विवेकशीलता का रस्ता अख्तार कर लें। आप अपने आप को ढाँचा बना लें, साँचा बना लें। जो कोई भी आपके नज़दीक आएगा, इसमें ढलता हुआ चला जाएगा। आपके चन्दन के नज़दीक आने के बाद में अगर झाड़-झंखाड़ खुशबूदार बन सकते हैं, तो कोई वजह नहीं कि अगर आप समुन्नत स्तर के व्यक्ति हैं, जो भी आपके नजदीक आए, जो भी आपका सहयोगी बने, जो भी आपका सम्पर्क में आए, खुशहाल न बने, समुन्नत न हो। आत्म-कल्याण का भी इसी में रास्ता है, और लोक-कल्याण का भी इसी में रास्ता है। ये दोनों रास्ते आपको विद्या के आधार पर, ज्ञान के आधार पर आपको मिल सकते हैं। इसीलिए शिक्षा की तरीके से, विद्या का भी महत्त्व समझिए, और उसको प्राप्त करने के लिए निरन्तर कोशिश करने में लगे रहिए। ………… समाप्त ॥

॥ॐ शान्तिः॥