कल्प साधना का स्वरूप
कल कल्प साधना के सन्दर्भ में आपको थोड़ी सी जानकारी दी थी कि कल्प आखिर क्या है? कल्प माने परिवर्तन। क्या परिवर्तन होना है? और ये कौन करेगा? कैसे सम्भव होगा? आप कुछ सहयोग करेंगे, हम आपकी सहायता करेंगे। कल हमने कहा था—और आपको अपने भीतर के दृष्टिकोण को बदल देना चाहिए। क्रिया भी इसमें सहायक है। क्रिया आपसे कुछ करा रहे हैं, जप करा रहे हैं, अनुष्ठान करा रहे हैं, ध्यान करा रहे हैं, भोजन के बारे में अन्न का हेर-फेर कर रहे हैं—ये क्रियाएँ भी हैं। लेकिन ये क्रियाओं का मतलब सिर्फ ये है, कि आप अपने भीतर वाले दृष्टिकोण, चिन्तन, चरित्र, और स्वभाव और रुचि और आकांक्षाओं को बदल दें। इन सारी क्रियाओं का मतलब ये है।
अगर आपने ये अनुमान लगा लिया हो, कि केवल क्रिया करने से कोई जादूगरी की तरीके से आपको कहीं आसमान से कोई सिद्धियाँ टपकेंगी, तो आप इस ख्याल को निकाल दीजिए। करना आपको ही पड़ेगा, आपके किये बिना कोई रास्ता नहीं है। आप अगर चुपचाप बैठ कर के, गुरुजी के आशीर्वाद से, या गायत्री माता के आशीर्वाद से, या किसी मंत्र के चमत्कार से बदलना चाहते हों, और अपनी परिस्थितियों को सुधारना चाहते हों, और स्वयं कुछ करने से इंकार करते हों, तो आप ख्याल रखिए, फिर आपको सफलता मिलने वाली नहीं है। एक महीने का समय भी आपका बेकार चला जायेगा।
अच्छा है, अब आप इस प्रक्रिया को पहले समझ लें तब कदम बढ़ाएँ। अब हमने आपको कल ये बताया था कि किस तरीके से लोगों ने अपने आपको बदल लिया। बदलने के बाद में, मनःस्थिति बदलने के बाद में परिस्थिति किस तरीके से बदल गयी। कायाकल्प का स्वरूप यही है। फिर, कायाकल्प में करना क्या पड़ता है?
चलिए, इसके लिए एक उदाहरण मैं आपको सुनाऊँगा। ये उदाहरण महामना मालवीय जी का है। महामना मालवीय जी ने एक कायाकल्प किया था। उनका भी ख्याल और उनके भी बारे में भी वो भी ऐसे ही सोचते थे कि शरीर का कायाकल्प होगा। शरीर का कायाकल्प तो अब कह चुके हैं कि सम्भव नहीं है। लेकिन मन का कायाकल्प करने के लिए भी कम से कम प्रक्रिया वही इस्तेमाल करनी पड़ती है, जो शरीर का कायाकल्प करने के लिए कभी की जाती रही होगी या कभी सफल होती रही होगी।
महामना मालवीय जी का कायाकल्प हुआ था। क्या-कैसे हुआ था? मथुरा जिले में एक कोशी नाम की जगह है। उसके पास जंगल में एक महात्मा रहते थे, तपसी बाबा उनका नाम था। तपसी बाबा ने मालवीय जी से सम्पर्क स्थापित किया और ये कहा कि आपको काया कल्प करा देंगे। आपके बुढ़ापे को जवानी में बदल देंगे। वो प्रक्रिया जिस तरीके से इस्तेमाल की गई, वो आपके लिए बहुत ध्यान देने लायक है, और आपकी मानसिक कायाकल्प में वो प्रक्रिया जरूर सहायता कर सकती है। क्या हुआ था उनका। उनके तीन काम हुए थे— मालवीय जी को सबसे पहले पंच कर्म करने पड़े थे।
१. पंच कर्म किसे कहते हैं? पंच कर्म कहते हैं शरीर का संशोधन। उनको पाँच कर्मों में बाँटा गया है:
(i) एक आता है टट्टियाँ जाना, दस्त करा देना—उसको विरेचन कहते हैं।
(ii) एक कै करा देना—आमाशय में जितना भी मल और ज़हर भरा हुआ पड़ा था, उल्टी करा के निकाल दिया। आँतों में जो भी ज़हर भरा हुआ पड़ा था, उन्होंने दस्त करा करके निकाला। दो कर्तृत्व हुए न। तीन और रह जाते हैं।
(iii) एक पसीना निकालना कहते हैं, जिसको संस्कृत में स्वेदन कहते हैं। भाप दे कर के पसीना निकाला। क्यों? इसलिए निकाला गया कि उनके शरीर में जहाँ कहीं भी कोई विषाणु भरे होंगे, या संचित मल भरा होगा, उसको निकालने के लिए प्रयत्न किया गया। उसके बाद में क्या किया गया।
(iv) उनको छींक देने का—(v) नस्य भी उसी में आता है। बार-बार छींक दी गईं। जुकाम के कीटाणु, अथवा मस्तिष्क में जो मल भरे पड़े थे, उनको निकाला गया।
इस तरीके से सारे-के-सारे मलों का संशोधन किया गया। पहला कर्म, और पहला कृत्य, और पहला अध्याय कल्प का ये है।
ये मैं मालवीय जी की बात कर रहा था। अन्य लोगों को भी, जिन किन्हीं को भी पूरा न सही अधूरा ही सही, शारीरिक काया-कल्प करना होगा तो पहले मलों को निष्कासन करना पड़ता है एक।
दूसरा—
२. दूसरा मालवीय जी को ये करना पड़ा कि चालीस दिन तक एक झोंपड़ी के भीतर कैद रहना पड़ा। चारों ओर से झोपड़ी बन्द थी। न हवा जाती थी, न सूरज की रोशनी जाती थी, न धूप जाती थी, न रोशनी जाती थी। बस उसके भीतर एकान्त कोठरी में चालीस दिन उनको काटने पड़े। केवल उसी में रहना पड़ा। उसी में टट्टी जाते थे, नहाते भी उसी में थे, पूजा-पाठ भी उसी में करते थे। जो कुछ भी खाना खाते होंगे, वो भी वहीं भेजते थे। बहरहाल उनका निकलना नहीं हो सकता था। टहलना होता तो उसी में टहलना होता था। ठीक इस तरीके से चालीस दिन उन्होंने काटे। अध्याय नंबर दो।
मैं आपको ये समझाने वाला हूँ—इन तीनों क्रियाओं का क्या उद्देश्य है, और ये तीनों क्रियाएँ मन में—मन:क्षेत्र का कायाकल्प करने के लिए भी किस तरीके से लागू हो सकती हैं। दो बातें हो गयी न। एक तो ये हुआ मल का संशोधन, दूसरा हुआ उनका एकान्त सेवन। तीसरा एक और था।
३. तीसरा ये था कि उनको विशेष पदार्थ खिलाए गए। क्या खिलाए गए? ऐसे पदार्थ खिलाए गए जिससे कि उनके शरीर में नए जीवाणु बनें, नया जीवन आए, टॉनिक टाइप की कुछ चीज़े थीं ऐसी। उनको परास के एक खोपरे में गिलोय या दूसरी चीजें बन्द करके रखते थे। बन्द करके रखते थे और सात दिन में वो तैयार हो जाती थी। तब उसको पीस करके उनको पिलाते थे। टानिक थी एक तरीके से जिससे की कायाकल्प में पुरानी खराबियाँ निकल जाएँ और नई अच्छाईयाँ शुरू हो जाएँ। बस, यही कृत्य चालीस दिन तक चला।
चालीस दिन के बाद में क्या लाभ हुआ। ज्यादा तो मैं ये ठीक मालूम नहीं क्या-क्या लाभ हुए। इतना लाभ उन्होंने मालवीय जी ने स्वयं ही छापा था। मेरी स्मरण शक्ति ठीक हो गयी है और मेरे सफेद बाल काले हो गए हैं। ऐसे कई लाभ उनको हुए थे। और वो लाभ कब तक टिके, उसके लिए कुछ कहना नहीं है। मैं चूँकि शारीरिक काया-कल्प कराने की बाबत में कुछ कहा भी नहीं हूँ। और हम ऐसा कुछ कराने की स्थिति में भी नहीं है। लेकिन मानसिक कायाकल्प में भी इन्हीं तीनों सिद्धान्तों को बराबर आपको लागू करना पड़ेगा, इससे कम में कुछ काम चलने वाला नहीं है।
एक काम आपको ये करना पड़ेगा कि आपके भीतर जो भी संचित मल, आवरण और विच्छेप हैं, जो भी कषाय और कल्मष भरे पड़े हैं, उनकी ओर गौर करना पड़ेगा, और गौर करके, न केवल गौर करना पड़ेगा, बल्कि उनको निकालना भी पड़ेगा। एक जद्दोजहद करनी पड़ेगी। लड़ना पडेगा। आपका पिछला जीवन कैसे कुसंस्कारों से भरा हुआ पड़ा है। इन कुसंस्कारों को दूर करने के लिए आपको क्या करना चाहिए और कैसे सम्भव है। प्रायश्चित्त की प्रणाली हमारी यही है। प्रायश्चित्त की पद्धति हमारी यही है।
प्रायश्चित्त पद्धति में ये बताया जाता है कि आदमी की आध्यात्मिक उन्नति में सबसे बड़ी रुकावट उसके पुराने किए हुए कर्मों के कारण हैं। पुराने दुष्कर्म पत्थर की तरह से रास्ते में खड़े हो जाते हैं, और एक कदम आगे नहीं बढ़ने देते। बार-बार रोक देते हैं। क्योंकि उसका भविष्य बुरा आना है। उसको दण्ड मिलने हैं। इसलिए अच्छे काम भी नहीं करने देते। अच्छे कामों से मन उचाट देते हैं।
इसीलिए पहला काम हर साधक को अपने आप की धुलाई के रूप में करना पड़ता है। रंगने से पहले धुलाई। रंगने से पहले धुलाई, रंगने से पहले धुलाई, धुलाई अगर नहीं करी जाएगी तो कपड़ा रंगा ही नहीं जायेगा। इसलिए पहला काम ये करना पड़ता है, ये जो आप कल्प विस्तार कल्प साधना में आये हैं। उसके लिए एक कार्य पद्धति आप समझिए। आप के ऊपर दबाव डाला जायेगा और आप में उत्साह पैदा किया जायेगा कि आप के अन्दर पिछले स्वभाव और पिछली गन्दी आदतें और पिछली क्रिया पद्धति जो जम गयी हैं, उसको आप हटा दीजिये, उसको निकालिये, उसको छोड़ दीजिये। उसको छोड़ने में बुरी आदतें आपको छोडती न हों तो आप लड़ना शुरू कर दीजिये। उसके विरुद्ध बगावत कीजिये, उनको अस्वीकार कर दीजिये, उनको असहयोग कीजिये और उनका दबाव मानने से इंकार कर दीजिये। ये करना पहला काम है। किसका? ये आपके कायाकल्प का ये एक काम करना ही करना पड़ेगा। अगर आप न करेंगे तो कल्प साधना जिसकी कि हमने रंगीन सपने आपको दिखाए हैं और ये बताया है कि आप का जीवन दैवी जीवन हो के रहेगा और आप अच्छे शानदार आदमी होके रहेंगे। एक कदम तो आपको करना ही चाहिए।
अगर आप ये नहीं करेंगे और पुराने घिनौने जीवन के ढर्रे को ही करते रहेंगे तो हम क्या कर पाएँगे, बताईए। केवल पूजा क्या कर लेगी आपके लिए, बताईये। फिर आपका जप और अनुष्ठान में आके जादू चमत्कार कैसे दिखा पायेगा। नहीं, जादू-चमत्कार जैसा अध्यात्म नहीं है, अध्यात्म तो मानसिक पुरुषार्थ को कहते हैं। मानसिक पुरुषार्थ का नाम है अध्याम, मानसिक पुरुषार्थ आपको करना पड़ेगा। एक काम।
दूसरा काम एक और आपको यहाँ करना पड़ेगा, उसका अर्थ है—जैसे मालवीय जी को चालीस दिन तक एक कोठरी में एकान्त सेवन करना पड़ा था, आपको भी यहाँ, चालीस दिन तो नहीं, पर एक महीने भर तक एकान्त सेवन करना चाहिए। ये खास बात है। आपको निवास करने के लिए हम एक कोठरी खास तौर से इसीलिए दी है कि आप ये मान के चलें की आप एकाकी हैं। आप अकेले हैं, इस दुनिया में आप अकेले हैं, अकेले ही आप आये थे और अकेले ही आप को जाना है। अकेले ही आप को जाना है। चलना है किसी रास्ते पर तो भी आप को अकेला ही चलना है। ये एकान्त सेवन है।
इसको कुटी प्रवेश कहते हैं, इसको गुफा प्रवेश कहते हैं। प्राचीन काल के सन्त महात्मा गुफा में घुस जाते थे, कोठरियों में रहते थे। एकान्त सेवन करते थे, क्यों? क्योंकि उनका बाहर का चारों ओर का जो जंजाल जिसमें उनको बुरी तरीके से चक्रव्यूह में फँसे हुए अभिमन्यु की तरीके से जकड़ लिया है उनमें से वो पार हो सकें, उससे कुछ अलग अनुभव कर सकें।
अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए आपको एकान्त चाहिए। एकान्त अगर नहीं मिलेगा तो आप विचार तक नहीं कर पायेंगे कि आखिर हमको क्या करना है। पुरानी चीजों से कैसे आपको छुटकारा पाना है और नई चीजों से निर्धारण कैसे करना है। इन दोनों के लिए एकान्त सेवन आपके लिए आवश्यक है। ये एकान्त सेवन का दिन जो आपको महीने भर का है, ये बहुत महत्त्वपूर्ण है। आपको रोका गया है कि आप जगह-जगह मत जाइए, घूमिए मत, टिकट रिज़र्वेशन कराने मत जाइए, तीर्थ यात्रा के बहाने यहाँ-वहाँ मटरगश्ती मत कीजिए, यहाँ-वहाँ चक्कर मत काटिए, ॠषिकेश मत जाइए, कहीं मत जाइए, ॠषिकेश के लिए जिन्दगी पड़ी है। (पर) एक ये महीना भर है, (भले आपको) इसमें भी एक जगह नहीं रह सकते?
आपको ऐसे रहना चाहिए जैसे कि माता के गर्भ में बच्चा रहता है। आप कल्पना कीजिए आपकी कोठरी, अथवा सारा गायत्री नगर, जिसमें आप निवास करते हैं—शान्तिकुञ्ज इसको आप ये मानिए, ये माताजी का गर्भ है, कि आप माताजी के गर्भ में पल रहे हैं। आपका नया जन्म हो रहा है। आप कायाकल्प करा रहे हैं अपना। इसलिए आप माताजी के पेट में रह रहे हैं। भ्रूण जो रहता है पेट में चुपचाप बैठा रहता है, गड़बड़ नहीं फैलाता। जो माता देती रहती है उसी से अपना गुजरा करता रहता है। माता जिस हैसियत में रखती है वैसे ही रहता हैl आप को इस हैसियत में रहना चाहिए। आपको ये अनुभव करना चाहिए आप यहाँ शान्तिकुञ्ज में निवास करते हैं, गायत्री नगर में निवास करते हैं। ये क्या है ये गुरूजी का बर्तन पकाने का आँवा है। कुम्हार को आप जानते हैं न। बर्तन बनाता है। बर्तन बनाने के बाद में कच्चे बर्तनों को पकाता है। बस उस आँवे में से खिलौने भी निकलते हैं, क्या निकलते हैं। आप चाहें तो ये मान सकते हैं कि गुरुजी ने ये आँवा लगाया हुआ है। कहाँ है आँवा? जिस कोठरी में आप रहते हैं उसको आप आँवा मानिए, अथवा शान्तिकुञ्ज को आप आँवा मानिए। इस अँवे में आपको कैद कर दिया गया है, आपको पकाया जा रहा है, और आप एक महीने तक तपते रहेंगे, गड़बड़ नहीं फैलाएँगे, तो मज़ा आएगा। आप गड़बड़ मत फैलाइए, चित्त को इधर-उधर मत ले जाइए, घरवालों की याद मत कीजिए, बाहर वालों की समस्या पे ध्यान मत दीजिए, मन को इधर-उधर भागने मत दीजिए, शरीर को यहाँ-वहाँ मटकने मत दीजिए, मन को भटकने मत दीजिये, शरीर को मटकने मत दीजिये, मन को भटकने मत दीजिये। आप यहाँ-वहाँ घूमते रहेंगे तो बताइए बच्चा माँ के पेट में से दंगल मचाये कि मम्मी मैं तो अभी नौ महीने पेट में नहीं रह सकता, जरा छुट्टी दे दो बाजार में घूम कर के आऊँगा तो आप समझ सकते हैं कि बच्चे का क्या हाल होना है। और कुम्हार के बर्तन, बर्तन अगर चुपचाप न बैठे रहें ये कहें साहब अभी शाम को आ जाया करेंगे बाजार में घूमा करेंगे। रात को आँवें में घुस जाया करेंगे, आप ही बताइए बर्तन पकेंगे क्या? कुछ भी नहीं होगा, सब बिगड़ जायेगा। इसलिए आप न बाहर की चिन्ता कीजिये, न शरीर को बाहर घूमने दीजिये, न बाहर भ्रमण करने दीजिये। तो क्या काम करें। आप, बस यही मैं बताने वाला था। तीसरा वाला काम, तीसरा वाला काम भी अगर आप कर लेते हैं तो समझना चाहिए कि आपका कल्प साधना का उद्देश्य पूरा हो गया और जिस लक्ष्य पर आप पहुँचने की इच्छा करते थे अथवा हम जहाँ जिस लक्ष्य पर आपको पहुँचाने के लिए कोशिश करते थे, वो निश्चित रूप से सफल हो जायेगा।
एक और काम कीजिये। कौन सा? मालवीय जी से तीसरा जो काम कराया गया था या किया था, उसका नाम था—टॉनिक सेवन। आपको एक काम टॉनिक सेवन का करना चाहिए। टॉनिक सेवन से क्या मतलब है? टॉनिक सेवन से मतलब ये है कि जिन विचारों का अब तक आपको अभाव रहा है, उन विचारों को फिर से सेवन करना शुरू कीजिए। टॉनिक शुरू कीजिये। टॉनिक आप को मिला ही नहीं। आप तो कुपोषण के शिकार रहे हैं। अथवा व्यथित भोजन करते रहे हैं। इसलिए आपका सारे का सारा स्वास्थ्य गड़बड़ा गया है। मानसिक स्वास्थ्य से मेरा मतलब है। तो क्या करें?
अब आपको भविष्य में ऐसी विचारधारा के साथ, ऐसे लोगों के साथ, ऐसे लक्ष्य के साथ, ऐसी महान सत्ता के साथ अपने आप को सम्पर्क में लाना है जो आपको महान बनाने में समर्थ है। जो आपको सहारा दे सकती है। जो आपको ऊँचा उठा सकती है। आप उनसे सम्पर्क मिलाइए। किससे सम्पर्क मिलाएँ? भगवान से। भगवान से आप इस बीच आप सम्पर्क मिलाने की कोशिश कीजिये। और लोगों से अपने आपको पीछे हटा लीजिये। थोड़े दिन के लिए आप ये मान के चलिए। आप और आपका भगवान दो ही हैं। भगवान किसे कहते हैं? भगवान सद्गुणों का, सत्प्रतीकों का, आदर्शों के समुच्चय का नाम है। एक भगवान तो वो है जो सारे विश्व को सम्हालता है, जिसको हम नियमन कह सकते हैं, नियंत्रण कह सकते हैं। एक भगवान वो है, जो विश्वव्यापी है। विश्वव्यापी भगवान के लिए तो आप उसका कायदा का पालन कीजिये, फायदा उठाइये। कायदे को तोडि़ये और पिटाई उठाईये। बस भगवान तो आदमी को न्याय और नियमन के अलावा दूसरे कुछ काम करता भी नहीं है। लेकिन जो व्यक्तिगत सहायता कर सकता है वो हमारा सुपर,सुपर कांसियसनेस है। हमारा अन्तरात्मा है। अन्तरात्मा, परमात्मा उसी का नाम है। अन्तरात्मा को ही परमात्मा कहते हैं। अन्तरात्मा किसे कहते हैं। गुण, कर्म और स्वभाव की विशेषता का नाम परमात्मा है। उसी को सुपर कान्सियसनेस कहते हैं। आप उसके साथ अपने आपका सम्बन्ध जोड़ दीजिये।
अभी तक आपका सम्बन्ध किसके साथ रहा है। कुसंस्कारों के साथ, घिनौनेपन के साथ, घटिया लोगों के साथ, चारों ओर का वातावरण जो चारों ओर का छाया हुआ है, आपको गिरावट के अलावा और क्या नसीहत देगा बताइये। आपने जो स्वभाव सीखा है, वह आपको घिनौने जीवन के अलावा क्या सिखा सकता है। पशुओं की जिन्दगी में हम जी रहे हैं और चारों तरफ से नर पशुओं से घिरे हुए हैं। आप थोड़े दिनों के लिए इस बाड़े से बाहर आ जाइए।
फिर आप क्या करें बाहर हो करके? फिर आप ऐसे लोगों के साथ रिश्ता मिलाइए, ऐसे लोगों के साथ रिश्ता मिलाइए जिनके कि समुदाय में जाकर के आपका ऊँचा उठना सम्भव है। ॠषियों के साथ सम्बन्ध मिलाइए, सन्तों के साथ सम्बन्ध मिलाइए, देवताओं के साथ सम्बन्ध मिलाइए, भगवान के साथ सम्बन्ध मिलाइए। ये सब हैं बिलकुल आपके साथ। आप देख नहीं रहे हैं? यहाँ जहाँ आप जिस कोठरी में रहते हैं, अथवा जिस वातावरण में रहते हैं, उसमें चारों ओर सन्त छाया हुआ है, चारों ओर ॠषि छाया हुआ है, चारों ओर भगवान छाया हुआ है, अर्थात आदर्श छाए हुए हैं, दृष्टिकोण छाए हुए हैं, प्रेरणाएँ छाई हुई हैं, और आपको ऊँचा उठने के लिए जो दिशाधाराएँ आवश्यक थीं वो छाई हुई हैं। आप इनके साथ सम्बन्ध मिला लीजिए।
आप पीछे की तरफ मुड़-मुड़ करके मत देखिये। आगे की तरफ विचार कीजिये। आप महानता के साथ में जुड़ जाइए। आप आदर्शों के साथ जुड़ जाइए। एक महीने तक आपको यही करना है। एक महीने तक आपको साधना में लगा रहना है। अपने आप को साधने में, और किसमें लगा रहना है। स्वाध्याय में लगा रहना है। आपको चिन्तन और मनन करना है, आपको इस बीच में जप और अनुष्ठान करना है, आपको इस बीच में योगाभ्यास करना है, आपको (भी) इस बीच में तप करना है, और अपने आप को परिशोधन करना है। आप ये कीजिये। ये करना आप को चाहिए। फिर हम अकेले कर लेंगे। नहीं, अकेले तो नहीं कर लेंगे। फिर हम पीठ पर तो हैं। आप क्यों हिम्मत हारते हैं। हम पीठ पर हैं। आप सहायता करेंगे। तो हम जरूर आपकी सहायता करेंगे।
इम्तिहान में पास तो बच्चे ही होते हैं। पढ़ना तो उन्हीं को पड़ता है। स्कूल तो वही जाया करते हैं। पर आप समझते हैं कि बच्चे स्कूल जाते हैं, क्या अपने ही बलबूते पे पास हो जाते हैं। माता उनको खाने का इन्तजाम करती है, पिता उनके लिए फीस का इन्तजाम करता है। मास्टर उनको पढ़ाने में सहायता करता है। तीन ओर की सहायता उनको मिलती है, तब कहीं हो पाता है। उनके पढ़ने की मेहनत और पढ़ने का प्रताप सफल हो जाय। हम आपके लिए सब तीनों इंतजाम कर रहे हे हैं। माता आपके लिए खुराक देने को तैयार है। हम आपके लिए, आपको ऊँचा उठाने के लिए जो पिता का जो कर्तव्य था, वो हम करने को तैयार हैं। गुरु का, चलिए साहब गुरु न सही हमको न सही, तो हमारा गुरु है। वो भी आपको इस वातावरण में जिसमें आप निवास करते हैं। आपकी सहायता करने के लिए हम तीनों तैयार हैं। गुरु के रूप में वो सत्ता जिसके आधार पर ये शान्तिकुञ्ज बनाया गया है, और जिसकी आज्ञा से ये कल्प साधना के शिविर लगाए गए हैं। ऐसी कोई परम सत्ता आपके गुरु की तरीके से मार्गदर्शन करने में यहाँ तैयार है और साथ में विद्यमान है। आप उसका फायदा उठाइए। आपकी सहायता करेंगे। हमको आप चाहे तो वो मान सकते हैं, अभिभावक मान सकते हैं। हमारे पास कुछ पुण्य होगा, तप होगा, ज्ञान होगा, चरित्र होगा दबाव होगा आप यकीन रखिये हम आप पर न केवल दबाव ही डालेंगे न केवल सिखाने में बल्कि उसका एक हिस्सा भी देंगे। बाप भी सिर्फ बच्चों को शिक्षा थोड़े ही देता है। सहायता भी देता है। हमारी शिक्षा भी आपको मिलने वाली है और सहायता भी मिलने वाली है। माताजी का भी आपको स्नेह भी मिलने वाला है, प्यार भी मिलने वाला है, अनुदान भी मिलने वाला है, दुलार भी मिलने वाला है।
तीन तरफ से आप कैसे भाग्यवान हैं कि आप माता का स्नेह यहाँ पा रहे हैं, आप कैसे भाग्यवान हैं जो अपने पिता का अनुशासन और उनका सहयोग प्राप्त कर रहे हैं, आप कैसे भाग्यवान हैं जो आप ऐसे महान गुरु से जो न केवल आपको, बल्कि आप जैसे लाखों आदमियों को, न केवल लाखों आदमियों को बल्कि सारे जमाने को, और जमाने की प्रवृत्तियों को मार्गदर्शन करने में समर्थ है। जो इस लायक है। आपको तीनों का सहयोग मिलता रहता है। आपके भाग्य की सराहना किये बिना हम रह नहीं सकते।
आपके लिए कल्प की सम्भावनाएँ बिलकुल सुनिश्चित हैं। आपका भूतकाल जैसा था, वो यहाँ का यहीं रह जाय। आपका पुराना वाला केंचुल यहाँ का यहीं रह जाय और आप जब जाएँ, ऐसे नए आदमी होकर के जाएँ कि मजा आ जाए। आप जिस पिंजड़े में रहे हुए हैं, उन तीलियों को काटने का हमारा मन है। आप भी थोड़ा प्रयत्न कीजिए, थोड़ा हम प्रयत्न करेंगे। पंखों को आप पैने कीजिये ताकि जैसे ही ये पिंजड़े की तीलियाँ कटें, आप इसमें से भागना शुरू कर दें। और तीलियाँ हम काट देते हैं, आप पंखों को पैना कीजिये। आप अपने पंखों को पैना नहीं करेंगे, पंखों को सिकोड़ के रखेंगे तो हम तीलियाँ काट भी दें आप के पिंजड़े की, तो भी आप वहीं बैठे रहेंगे। पंख तो आपके ही उड़ाने हैं, हम उड़ेंगे थोड़े ही। तीलियाँ काट देंगे। आप हमारे सहयोग का फायदा उठाइए, इस वातावरण का फायदा उठाइए, यहाँ की परिस्थितियों का फायदा उठाइए, यहाँ के मार्गदर्शन का फायदा उठाइए, और, और अपने भाग्य को और भविष्य को शानदार बनाने के लिए कमर कस के तैयार हो जाइए।
आपको मालवीयजी के जो तीन कृत्य थे वही जो शारीरिक कृत्यों के लिए कराये गए थे। मानसिक दृष्टि से, भावनात्मक दृष्टि से, चिन्तन की दृष्टि से आपको वही तीन काम करने पड़ेंगे। परिशोधन आपको करना ही चाहिए और करना ही पड़ेगा। इसी को प्रायश्चित कहते हैं, तपश्चर्या भी इसी को कहते हैं। और, और आपको एकान्त सेवन करना ही पड़ेगा। आप गुफा में रहिए, एकान्तसेवी रहिए, अपने हृदय की गुफा में घुस जाइए, एकान्त में रहिए, अन्तरंग ही होकर के रहिए, बाहर की बातों पे विचार मत कीजिए, केवल अपनी ही समस्या पर विचार कीजिए, अपने भविष्य के बारे में विचार कीजिए, अपने भूतकाल का विचार कीजिए, और भविष्य का निर्धारण करने के लिए वो काम तैयार कीजिए जिनकी कि आपको जरूरत है। उस सहयोग को आप ग्रहण कीजिये। उस सहयोग को आप हजम कीजिये। उस सहयोग को आप चबा जाइए। हम आपको थाली में भोजन परोस कर देते हैं, आप खाइए इसको। और आप इसको पचाइए। खाना आपका काम है। पचाना आपका काम है। भोजन ही तो हम दे पायेंगे, आपके बदले की हम पचा थोड़े देंगे। आप के बदले का हम चबा थोड़े देंगे। चबाइए आप, थाली हम परोसते हैं। दोनों का सहयोग, भगवान करे कितना शानदार हो और आपका उज्जवल भविष्य करने में आपके इस शिविर का कितना बड़ा योगदान हो, आप ये देख पाएँगे और ये सम्भव है। जिसकी हम आशा करते थे और आपको आशा दिलाते थे। थोड़ा सा अगर रास्ता दिखाइए और थोड़ी सा अपना मनोबल बढ़ाइए, फिर देखिये आपका ये कल्प साधना का सत्र कितना शानदार और कितना आपके भविष्य को निर्माण में कितना सहायक सिद्ध होता है।
॥ॐ शान्तिः॥