परिवार—व्यक्तित्व के विकास की प्रयोगशाला

व्यक्तित्व का विकास गुणों के ऊपर है। उसका व्यक्तित्व वजनदार बन सकता है। व्यक्तित्व ही वो सम्पदा है जिसके आधार पर मनुष्य आध्यात्मिक जीवन व सांसारिक जीवन में सफल होता है। सफलता के लिए धन काफी नहीं है, सफलता के लिए साधन काफी नहीं है, सफलता के लिए दूसरों का सहयोग काफी नहीं है - इन चीज़ों की ज़रूरत तो है, लेकिन सबसे ज्यादा आदमी के पास हथियार है, और सबसे बड़ा जो वैभव है, आदमी का व्यक्तित्व है। व्यक्तित्व को कैसे विकसित किया जाए? उसे सद्गुणों से, सत्प्रवृत्तियों से सम्पन्न कैसे किया जाए? एक प्रश्न यही है, सबसे बड़ा, जिसको अगर कोई आदमी समाधान कर लेता है, तो समझ लीजिए उसने अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आधी मंजिल पार कर ली।

व्यक्तित्व का विकास, व्यक्तित्व का विकास कैसे हो? आइए जरा विचार करें। इसके लिए कोई न कोई काम करने के लिए जगह होनी चाहिए न - प्रयोगशाला कहीं होनी चाहिए न, तैरने के लिए तालाब होना चाहिए न, कसरत करने के लिए व्यायामशाला होनी चाहिए न, पढ़ने के लिए कोई विद्यालय होना चाहिए न, काम को सीखने के लिए, काम को करने के लिए कोई प्रयोगशाला की आवश्यकता पड़ती है। इसके बिना कोई बात सीखी नहीं जा सकती, कोई चीज अभ्यास में उतारी नहीं जा सकती, कार्यक्षेत्र के बिना। इसके लिए कार्यक्षेत्र कहाँ हो व्यक्तित्व के विकास करने का? ये स्वयं में, स्वयं में चिन्तन आवश्यक तो है, उपासना आवश्यक तो है, भावना आवश्यक तो है - पर एक क्रिया पक्ष भी तो चाहिए, कर्म करने के लिए कोई जगह भी तो चाहिए, अभ्यास करने के लिए कोई स्थान भी तो चाहिए, दौड़ने के लिए कोई जंगल भी तो चाहिए, कुछ न कुछ काम करने को जगह भी चाहिए, जगह करने के लिए, व्यक्तित्व का विकास करने के लिए जिस जगह की आवश्यकता है - उसका नाम है परिवार।

परिवार वो स्थान है जिसमें कि आदमी अपनी सद्गुणों का, सद्वृत्तियों का अभ्यास कर सकता है। अगर परिवार न हो तब, अकेला रहे तब, अकेला आदमी बिलकुल बेकार है। अकेला आदमी, अकेला आदमी जंगल में कहीं रहने लगे तो न बोलना सीख सकता है, न सीखना सीखता है, न चलना फिरना सीख सकता है, कुछ नहीं सीख सकता। उसके लिए सब बिलकुल बेकार हो जायेगा। जैसे दूसरे जानवर अकेले रहते हैं, ऐसे ही गूंँगे बहरे की तरीके से, बन्दर की तरीके से आदमी रहने लगेगा। अगर आदमी के लिए चारों ओर काम करने के लिए समान प्रकार के लोग न हों तब। परिवार उसी का नाम है जिसमें कई तरह के, कई स्तर के लोग रहते हैं - और किस स्तर के लोगों की विचारणा कैसी होती है, आवश्यकता कैसी होती है, भावना कैसी होती है - इसके साथ में तालमेल बिठा कर के, अपनी समझदारी को बढ़ाने का मौका, केवल कुटुम्ब के बीच ही मिलता है। इसीलिए मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा गया है - और ये कहा गया है - उसका विकास इस बात के ऊपर टिका हुआ है - आदमी किन लोगों के साथ रहा, किस तरीके से रहा। ये रहने के लिए आदमी को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए भी आवश्यकता पड़ती है और शारीरिक जिन्दगी को पूरा करने के लिए भी, आदमी ऐसे बन्धनों से जकड़ा हुआ है कि अगर चाहे अकेला रहूँगा, अकेले रह करके जीवनयापन करना मुश्किल है। कमाने के लिए जाएगा तब घर के सामान का क्या होगा? चोरी कोई कर ले जाएगा तब, रखवाली के लिए तो कोई चाहिए न। अगर बच्चे न पैदा करने हो तो बात अलग, बच्चा अगर पैदा हुए हैं तो उनकी रखवाली के लिए कोई संरक्षक चाहिए न, चौबीस घण्टे के संरक्षक की आवश्यकता है। ये कौन आए, कहाँ से आए बताइए, ये सब उनकी धर्मपत्नी करती हैं। धर्मपत्नी को सहायता के लिए बूढ़ी माँ होती है, पिताजी बुड्ढे हो जाते हैं वो घर को देखभाल करते हैं, कई बच्चे आपस में सलाह-मशवरा करते हैं, खेलकूद करते हैं - इस तरीके से एक सारा माहौल बन जाता है कुटुम्ब का, परिवार का और इस परिवार के बीच में रह कर के प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व (को) विकास करने का मौका मिलता है। बच्चे अपने ढंग से विकास करते हैं - बच्चों को हँसने के लिए, खेलने के लिए, माँ की गोदी में, गोदी में बैठ कर के कपड़े पहनने के बारे में, कपड़े धोने के बारे में, टट्टी-पेशाब करने के बारे में, बहुत सारी जानकारियाँ मिलती हैं। अगर अकेला बच्चा हो तब, गाय के बच्चे की तरीके से, और बन्दर के बच्चे की तरीके से अनगढ़ रहेगा, बच्चों को विकास करने के लिए अपना मौका मिलता है।

औरों का भी विकास मिलता है। लड़कियाँ हैं जब माँ बन जाती हैं, तो उनको बच्चे की देखभाल करना आता है। पहले स्कूल ही जाती थीं, अपनी सहेलियों में हँसी-मजाक करती रहती थीं, खाना खाया खेलने लगीं, उपन्यास पढ़ लिया बात खतम। ज्ञान की वृद्धि के लिए उनको भी तो मौका मिलता है। पति के साथ व्यवहार किस तरीके से किया जाए? सास क्या होती है? देवर किसे कहते हैं? बच्चे किसे कहते हैं? अमुक बात कैसे होती है, मेहमान किसे कहते हैं? अतिथि घर में कैसे आते हैं? पैसे की देखभाल कैसे रखी जाती है? घर और सामान की सुव्यवस्था को किस तरीके से रखा जाना चाहिए? - वगैरह, वगैरह, सांसारिक ज्ञान उन महिलाओं को कुटुम्ब के बीच में ही रह कर के मिलता है। कुटुम्ब इससे बाहर रख दिया तब, अकेली रहें तब, केवल दफ्तर में जायें और होटल में खाने लगें तब, शादी न करें तब, ठीक है अपनी जीविका कमा सकती हैं लेकिन सांसारिक ज्ञान के सम्बन्ध में अपना अनुभव विकसित करने के सम्बन्ध में कोई मौका ही नहीं मिलेगा। इसलिए कुटुम्ब महिलाओं से ले कर के, बूढ़ों तक के लिए, बच्चों तक के लिए, हर एक को अपने-अपने ढंग का, व्यक्तित्व का विकास करने के लिए, एक बहुत अच्छा सा एक कारखाना है, एक प्रयोगशाला है। ये एक प्रयोगशाला में हममे से हम और आप में से हर एक को रहना चाहिए।

अपना कुटुम्ब हो तो ठीक है, अपना सही। अपना नहीं है चलिए, अपना नहीं बसाया है या नहीं बसाने का मन है तो दूसरों का कुटुम्ब सही। कुटुम्बों के बीच में तो रहना ही पड़ेगा। आप कुटुम्ब से अलग रहकर के एकाकी रहने की बात अगर विचार करते हैं, तो गलती करते हैं। थोड़े समय के लिए कोई आदमी अपना बौद्धिक या भावनात्मक विकास करने के लिए चिन्तन करने के लिए एक सामयिक समय निकाल ले, बात भिन्न है भिन्न है। आदमी उपासना करने के लिए एक आदमी गुफा में रहने लगे तो बात अलग है। ये कोई विशेष बात है, अपवाद है, और विशेष उद्देश्य के लिये किया जा सकता है, पर सामान्य बात नहीं है। सामान्य जीवन के विकास करने के लिए आदमी को परिवार में रहना बहुत सख्त आवश्यक है, परिवार से विलग मत होइए। शादी नहीं करना चाहते हैं तो कोई हर्ज की बात नहीं है। आपके माता-पिता हैं, बड़े हैं, भाई के बच्चे हैं, दूसरों के बच्चे हैं एक कुटुम्ब में रहिए ताकि आपके जीवन-यापन करने के लिए सारी व्यवस्थाएँ बन सकना सम्भव हो सके। नहीं तो फिर आपको ही खाना पकाना पड़ेगा, आपको ही बाजार से आटा खरीद कर लाना पड़ेगा, आपको ही साग-भाजी बनानी पड़ेगी, आपको ही बर्तन साफ करने पड़ेंगे, आपको ही घर का हर काम करना पड़ेगा, और घर का हर काम करने में जिसमें जिन्दगी के लिए हर दिन की जरूरतें पड़ती हैं, आपका इतना सारा समय खर्च हो जाएगा आपके लिए जाना मुश्किल हो जाएगा और फिर आप थके हुए आएँगे, थके हुए आकर के अपने हिस्से में ही सारी जिन्दगी काम करेंगे या तो बड़े सीमित हो जायेंगे जैसे बन्दर वैगरह होते हैं। पेट भरते हैं अपना ट्टटी का कोई इंतजाम नहीं है, मिल गया तो खा लिया या तो आप ऐसी जिन्दगी जीयें अथवा सभ्यता की जिन्दगी जीना चाहते हैं तो परिवार के अलावा और कोई गुजारा नहीं है।

परिवार की महत्ता को आप समझिए। परिवार की आवश्यकता को समझिए। परिवार की आवश्यकता को समझ करके सबसे पहली बात ये समझिए कि इसमें शारीरिक जीवनयापन करने की सुविधा ही नहीं है केवल, काम-वासना से ले करके हँसने, खेलने और नित्य कर्म के लिए खास काम सुविधाएँ मिलने तक की बात नहीं है। मुख्य बात इसमें ये है कि इससे व्यक्तित्व का विकास करने में, सद्गुणों की सम्पदा को विकसित करने में, सबको मौका मिलता है, जिसमें आप भी शामिल हैं। खास तौर से घर के मालिक को सबसे ज्यादा मौका मिलता है कि वो अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके, जो दुकान पर नहीं कर सकता, जो खेती-बाड़ी में रहकर नहीं कर सकता, नौकरी में रहकर के नहीं कर सकता। वो सारे के सारे गुण विकसित करने का मौका उसको अपने छोटे कुटुम्ब में रह करके ही मिलता है, इसीलिए कुटुम्ब की महत्ता आप में से हर एक को समझनी चाहिए। हर एक को उसका प्रयोग इस तरीके से करना चाहिए आदमी के व्यक्तित्व का विकास हो। जिसमें आप भी शामिल हैं और आप के घर के हर सदस्य शामिल हैं, जिनको आप प्यार करते हैं, जिनको आप अपना मानते हैं। अपना मानते हैं तो उनके व्यक्तित्व के विकास में मदद कीजिए। धन बढ़ाने में, धन बढ़ाएँ कि न बढ़ाएँ मैं इसमें आपसे बहस नहीं करता। धन की आवश्यकता है कि नहीं, मैं बहस नहीं करता। धन कितना चाहिए और कितना नहीं चाहिए ये तय करना आपका और दूसरों का काम है हमारा नहीं। हम तो सिर्फ एक बात कहना चाहते हैं कि व्यक्तित्व अगर आपको विकसित करना है तो आपको कुटुम्ब के बीच में, परिवार के बीच में रहना चाहिए।

आपका बनाया हुआ हो, आपके पिताजी का बनाया हुआ हो, भाइयों का बनाया हुआ, पड़ोसियों का बनाया हुआ हो फिलहाल किसी न किसी के कुटुम्ब (के) का सदस्य हो कर के रहना चाहिए - अलग रहने की बात, अकेला जिन्दगी जीने की बात, इक्कड़ रहने की बात, समाज से विरत रहने की बात, परिवार से दूर रहने की बात आपको नहीं सोचनी चाहिए। पर परिवार में रह करके भी एक कैदी के तरीके से आप रहें, दूसरे लोगों में दिलचस्पी न लें, ये उससे भी बुरी बात है। आप रोटी तो खा लें, लेकिन अपने कुटुम्बियों के बारे में ये न ख्याल करें - इनका विकास कैसे होना चाहिए, और इनके बारे में क्या हमारे फर्ज और कर्तव्य हैं - बुरी बात है। जब तक उतने लोगों के बीच में दिलचस्पी लेना शुरू नहीं करेंगे, तब तक आपका स्वयं के व्यक्तित्व का विकास भी सम्भव नहीं। एकाकी रहिए भली से, गुफा में चले जाइये, जंगल में रहिए, जेल खाने में चले जाइए, कालकोठरी में बन्द हो जाइए, फाँसी घर में चले जाइए, जहाँ भी रहिए अथवा कुटुम्ब में आप इस तरीके से रहिए जिससे आपको खाना खा लिया, कपड़ा पहन लिया, चारपाई पे सो गये, सवेरे उठ करके बाहर चले गये। घर में कौन रहते हैं, कौन नहीं रहते हैं, किसको किस तरह की चीज की जरूरत है, किसको किस चीज की आवश्यकता है, किसकी भाव-सम्वेदनाओं को ऊँचा उठाने में आपकी क्या जिम्मेदारी है, अगर आप इसको नहीं ख्याल करते, तो आपका घर रहना न रहना बराबर है।

मैं चाहता हूँ आप कुटुम्बी हो कर के जिएँ, परिवार हो कर के जिएँ, वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता से ओतप्रोत रहें, और आत्मवत् सर्वभूतेषु के सिद्धान्त लागू करने के लिए, दर्शन शास्त्रों का अध्ययन करने (के) के साथ-साथ, आप ये भी करें - इस थ्योरी (theory) को प्रैक्टिस (practice) में लाएँ। और प्रैक्टिस में लाने के लिए इससे बेहतरीन प्रयोगशाला शायद ही दुनिया में कोई हो, जैसी कि हमारे कुटुम्ब के रूप में हमको भगवान ने दी है। ये क्या है - कुटुम्ब। इसमें से आप बहुत बड़े-बड़े काम कर सकते हैं। आप अपने आपको लोक-व्यवहार के बारे में जानकार बना सकते हैं। कई तरह के लोग होते हैं, बच्चों के साथ आपका व्यवहार कैसा हो, बड़ों के साथ आपका व्यवहार कैसा हो, बराबर वालों के साथ आपका व्यवहार कैसा हो, मिल-बाँट के खाने में कैसा आनन्द आता है, इसको आप समझें। और एक-दूसरे के दु:ख और दर्द, सुख और सुविधाएँ बँटा लेने से कितना ज्यादा आदमी सुखी और समुन्नत रह सकता है, इसका आप प्रत्यक्ष अनुभव करना सीखें। ये सारी बातें कुटुम्ब में ही सम्भव हैं। और कुटुम्ब में क्या-क्या सीखा जा सकता है - लोकव्यवहार, लोकव्यवहार, लोकव्यवहार - इसको शिष्टाचार कहते हैं, अनेक स्तर के लोगों के साथ में, अनेक प्रकार के व्यवहार कैसे किए जा सकते हैं, इसको आप छोटी प्रयोगशाला में देख सकते हैं। बच्चे गड़बड़ भी फैलाते हैं, कोई-कोई बात भी हो जाती है, कोई नाराज़ भी हो जाता है, नाराज़ हुए आदमी को समझाया कैसे जाना चाहिए और मनाया कैसे जाना चाहिए, गड़बड़ पैदा करने वाले आदमी के साथ टेड़ी आँख कैसी करनी चाहिए, उनको धमकाना कैसे चाहिए, अपनी नाराजगी जाहिर कैसे करनी चाहिए, ये बातें आप कुटुम्ब में रहकर के सीख सकते हैं। बाहर वाले लोगों के साथ में सीखेंगे तो गड़बड़ी फैल जाएगी और झगड़े खड़े हो जाएँगे और आपको आदमी तलाश करने पड़ेगें और फिर बार-बार चक्कर कैसे काटेंगे अथवा वो कैसे आपके पास आयेंगे। इसका अच्छा तरीका सहज तरीका यही है कि अपने कुटुम्ब में आप अपने आप के तंई वो बात सीखें और सारे कुटुम्ब को वो बातें सिखाएँ जो आदमी के मानवीय गुणों के साथ में सम्बद्ध हैं।

आप बहुत से काम कर सकते हैं घर के भीतर दायरे में रहकर के भी। समाज में सेवा तो करनी चाहिए लेकिन समाज की सेवा में से ये न विचार करें कि कुटुम्ब में हमारी जो समय खर्च होता है इससे समाज की सेवा नहीं होती। कैसे सेवा नहीं होगी? आप नर रत्नों का उत्पादन घर की खदान में कर सकते हैं, अगर आप अपने घर का संस्कारी वातावरण बना लें। सब लोगों को, आरम्भ से अन्त तक, शिष्टाचार, और दूसरी मर्यादाओं को पालन करने के लिए शिक्षित करते रहें, तो आप विश्वास रखिए, आपके घर के लोग स्वावलम्बी बन सकते हैं, सुसंस्कारी बन सकते हैं। स्वावलम्बी बनना, सुसंस्कारी बनना बहुत कुछ इस बात के ऊपर निर्भर रहता है घर का वातावरण कैसा है। ये स्कूलों में नहीं सिखाया जा सकता, इसको कोई आदमी कथा-उपदेशों के द्वारा किसी के गले नहीं उतार सकता। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि समूचे कुटुम्ब का एक खास तरह का वातावरण बनाया जाए। और वातावरण जैसा बना लिया है उसमें हर आदमी को ढाला जाए। वातावरण ढालता है आदमी को, आप यकीन रखिए, वातावरण ढालता है। एक आदमी के उपदेश करने से कहाँ काम चलता है। कोई समर्थ आदमी ऐसे हुए भी होंगे जिनके उपदेश का किसी ने एक दस-पाँच मिनट में कोई लाभ उठा लिया होगा, नारदजी जैसे आदमी। हर आदमी कहाँ होते हैं ऐसे। आदमी को ढालने के लिए वातावरण की जरूरत है। ईंट को पकाने के लिए एक गरम अवे की जरूरत है, गरम अवा न हो तब आप कैसे ईंट पका लेंगे।

मनुष्यों को पकाने के लिए घर का वातावरण चाहिए। आपने अगर जिस तरीके से अपनी दुकान को चलाने के लिए, व्यापार को चलाने के लिए, खेती-बाड़ी को बनाने के लिए, अपनी इज्जत बढ़ाने के लिए, अपनी नेतागिरी बनाने के लिए बहुत से काम किये हैं, उनमें से एक काम अगर आप ये भी कर लें कि हम अपने घर का वातावरण ऐसा बनाएँगे कि जिसमें जो कोई भी रहे उन सब को गरम होने का मौका मिले। अवे में जो भी चीज लगा दी जाती है या तो वो ईंट हो, या खिलौना हो अथवा बर्तन अथवा कोई भी चीज हो, हर एक चीज पक करके तैयार हो जाती है। ठीक इसी तरीके से आप अपने यहाँ, घर में, एक ऐसा वातावरण बना सकते हों जिसमें आदमी समझदारी के साथ जिन्दगी जिएँ, ईमानदारी की जिन्दगी जिएँ, और, और, और ज़िम्मेदारी की जिन्दगी जिएँ। जिम्मेदारी की जिन्दगी एक, ईमानदारी की जिन्दगी दो, समझदारी की जिन्दगी तीन। ये ऐसी जिन्दगियाँ हैं कि अगर किसी को जीने का मौका मिले, आप विश्वास करिए ये आदमी बड़ा मजबूत, बड़ा समर्थ, बड़ा सही और सफल हो कर के रहेगा।

आप ऐसा नहीं कर सकते, हाँ कर सकते हैं। अगर आपका ध्यान उस ओर जाए। जिन चीजों की ओर आपका ध्यान गया है वो आपने की भी हैं और कर भी सकते हैं। मसलन, आपने इस बात का ध्यान रखा है कि आपके घर वाले अच्छे साफ सुथरे रहें, उनको पहनने के लिए कपड़े अच्छे रहें, फटे हुए कपड़ों में आप बेज्जइती समझते हैं इसलिए आपने कोशिश की है कि अपने घर के सब लोगों के पास अच्छा-खासा कपड़े हों, अच्छी तरीके से रहें, लिबास उनके ठीक हों, घर आपका अच्छा हो, छप्पर आपका अच्छा हो, बर्तन आपके अच्छे हों, दूसरों की आँखों में अपनी इज्जत जमाने के लिए जमाने का महत्त्व समझा है। फलस्वरूप आपने सबकुछ घर के वातावरण में जहाँ तक आपका ये सम्भव था ये किया है कि आपका घर देखने में प्रभावशाली हो और दूसरों पर ये छाप डालें कि ये सब संजीदा व बढ़े आदमियों का घर है। आप चाहें तो ऐसा भी कर सकते हैं कि आप अपने घर का वातावरण वातावरण में समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी का माद्दा हर शक्स के भीतर पैदा कर सकते हैं ताकि ये खूबसूरती के लिहाज से भी, कपड़ों के लिहाज से भी, शिक्षा के लिहाज से भी, आजीविका के लिहाज से भी, बुद्धिमानी के लिहाज से भी सबसे ज्यादा वजनदार चीज हो।

आप इसके लिए क्या काम करेंगे, आप एक सुव्यवस्था का शिक्षण, सुव्यवस्था का शिक्षण अपने घर में ही रह कर के कर सकते हैं। सुव्यवस्था - मैनेजमेन्ट (management), मैनेजमेन्ट का प्रत्येक भाग घर से ताल्लुक रखता है। एक बढ़े राष्ट्र को आपके सुप़ुर्त किया जाए अथवा एक कारखाने को सुपुर्त किया जाए अथवा एक शहर का आपको मेयर बना दिया जाये तब आप क्या करेंगे। जिन गुणों की, जिस समझदारी की आवश्यकता है इसका अभ्यास करने के लिए आपको अपने छोटे कुटुम्ब में उन सारे के सारे गुणों को, व्यवस्थाओं को सीखना चाहिए एवं सिखाना चाहिए। फाइनेन्स मिनिस्ट्री (finance ministry) घर में है न! जो आप कमाते हैं, उस कमाई को बढ़ाना तो घर से बाहर होता है, लेकिन उसको खर्च कैसे किया जाए? खर्च कैसे किया जाए? किन, किन मदों में किया जाए? किन मदों में होने वाले खर्च को रोका जाए? किन मदों में खर्च को बढ़ाया जाए? अर्थ सन्तुलन कैसे रखा जाए? जो आप कमाते हैं, उसी हिसाब से बजट कैसे बनाया जाए? ये पूरे का पूरा गणित और अर्थशास्त्र आपको घर के, कुटुम्ब में, दायरे में रह कर के सीखने को मिल सकता है। आप जो कमाते हैं उसको इस हिसाब से खर्च कीजिए, उस हिसाब में से कटौती कीजिए, जो चीज़ बढ़ानी है उसमें से बढ़ाइए, बेकार कामों में से जो पैसा खर्च हो जाता है इसकी रोकथाम कीजिए। इस तरीके से आप एक अच्छे, अच्छे अर्थशास्त्री बन सकते हैं, अपने घर की व्यवस्था बना कर के।

आप अच्छे एक समाजशास्त्री बन सकते हैं - समाज में ढेरों की ढेरों अच्छाइयाँ भी हैं, और ढेरों की ढेरों बुराइयाँ भी हैं। अच्छाइयों को किस तरीके से बढ़ाया जाना चाहिए, और बुराइयों के साथ में किस तरीके से निपटा जाना चाहिए, इसके लिए आपको पग-पग पर मौके मिलते हैं। ये पूरा समाज है। समाज में कौन-कौन से गुणों को बढ़ाया जाये, ढेरों की ढेरों कुरीतियाँ समाज में हैं, आपको समाज में से कुरीतियाँ निकालनी हैं, आप समाज में कहाँ-कहाँ जायेंगे जरा बताइए, किस-किस के पास जाएँगे बताइए, कौन-कौन आपका कहना मानेगा बताइए, टाइम तो - फुरस्त तो मिलती नहीं है। आप अपने घर में वो सारे काम कर सकते हैं। मसलन सामाजिक कुरीतियाँ को दूर करने की बात - अपने घर में से कीजिए न। आपके घर कोई कुरीति नहीं है? आपके यहाँ ढेरों की ढेरों कुरीतियाँ हैं। नर और नारी एक समान वाली बात है? आप बार-बार कहते हैं न, नर और नारी को समानता का दर्जा मिलना चाहिए, इसका प्रयोग आप अपने घर में नहीं कर सकते? आप चाहें तो कर सकते हैं। आपकी घर की महिलाएँ भी ये अनुभव करें वो भी उसी तरीके की सम्मानित सदस्य हैं, दूसरे दर्जे के नागरिक नहीं हैं, जैसे की दूसरे समाज में माना जाता है।

आप अपने घर की प्रयोगशाला में ये प्रयोग कर सकते हैं। इसी प्रकार से दूसरी कुरीतियाँ हैं। जो निकम्मे आदमी को भिक्षा देने वाली बात, ये आप सीख सकते हैं। सैनीटेशन (sanitation) सारे समाज में फैलाया जाना चाहिए। स्वच्छता का आन्दोलन सारे देश में फैलाया जाना चाहिए। गन्दगी लोगों के दिमागों में बढ़ती है, गन्दगी लोगों के शरीरों में बढ़ती है, गन्दगी लोगों के सामान के (ऊपर) छाई रहती है, गन्दगी आदमी के नालियों और टट्टी (पखानों) में भरी रहती है। ये गन्दगी सारे समाज में फैली हुई है। आप सारे सामाज को तो शायद ठीक कर नहीं पायेंगे, लेकिन आप अपने घर में उस प्रयोग को करना शुरू करें तो जिस तरीके से छूत फैलती है, एक से दूसरे को, दूसरे से तीसरे को, तीसरे से चौथे आदमी पे चली जाती है, इस तरीके से आप एक अच्छी खासी छूत फैलाने में समर्थ बन सकते हैं। चलिए छूत न भी सही, समाज सेवा न भी सही, आप लोग ये अपने मनों के अन्दर सुसंस्कारिता जमा सकते हैं कि सफाई कैसे रखी जा सकती है, व्यवस्था कैसे बनाई जा सकती है, कपड़ों को कहाँ रखा जा सकता है, धूप में सुखा कर के गन्दगी को दूर कैसे किया जा सकता है, नालियों में किस तरीके से सफाई रख कर के गन्दगी, और सडान्ध, और बदबू, और बीमारियों से बचा जा सकता है। बहुत सी बातें हैं जो आप सफाई जैसे महकमे को ठीक कर सकते हैं।

खान-पान के बारे में समाज में बहुत सी कुरीतियाँ फैली हुई हैं। कुपोषण के बारे में बहुत सारी बातें-शिकायतें सुनने में आती हैं। लोग कुपोषण से कितने बीमार हो गये हैं, कितने कमजोर हो गये हैं, कितने हैरान हो रहे हैं। आप चाहें तो कुपोषण के बारे अपने घर का निर्धारण आप स्वयं कर सकते हैं। गरीब हैं तो भी आप ऐसा कर सकते हैं। साग-भाजियाँ आप बना करके, साग भाजियाँ उगा कर के अपने घर में नई पैदावार, नया गृह-उद्योग करने की मनोवृत्ति पैदा कर सकते हैं, और कुपोषण से बच सकने के लिए एक वातावरण बना सकते हैं।

आप सारे संस्कारों को अपने घर में जैसी अच्छी तरीके से बना पायेंगे उतना शायद और कहीं नहीं। मिल-जुलने की वृत्ति, सहकारिता की वृत्ति का अभिवर्धन आज के जमाने में बहुत जरूरी है। हर आदमी को मिल-जुल के काम करना चाहिए। आपके घर में मिल-जुल के काम करने की आदत नहीं है, आप इस आदत को शुरू करिए। स्त्रियाँ बिचारी अलग से काम करती रहती हैं, मर्दों का कोई इसमें कोई सहयोग नहीं है। मर्द अपना काम अलग करते रहते हैं, स्त्रियों का कोई सहयोग नहीं है। बच्चे अपने अलग खेलते रहते हैं, उनके माँ-बाप के कामों में हाथ बँटाने का कोई सहयोग नहीं है। बड़ा भाई घूमता तो रहता है, ताश तो खेलता रहता है, रेडियो तो सुनता रहता है, पर इस बात का सहकार नहीं है कि हमारे छोटे भाई-बहन जिसके लिए ट्यूशन लगाया नहीं जा सकता, फालतू समय में अपने छोटे भाई और बहनों को पढ़ाना शुरू करे। बुड्ढे माँ-बाप हैं, बुड्ढे घर के बाबा-दादी हैं, उनको छोटे-छोटे कामों के लिए दूसरों की सहायता की जरूरत पड़ती है, उनको उठने-बैठने में सहायता की जरूरत पड़ती है, उनको पानी से लेकर के नाश्ते और चाय तक के बारे में जरूरत पड़ती है। कपड़े अपने आप साफ नहीं कर पाते, तब उनके कपड़े धोकर करके दूसरे धूप में बिठाने तक के ढेरों काम ऐसे हैं, जिसमें दूसरों की मदद की जरूरत है। बड़ों को अपनी बुड्ढों की मदद करनी चाहिए, बच्चों को अपने बड़ों की मदद करनी चाहिए। इस तरीके से घर में वातावरण अगर सहकारिता का बनाया जाए, तो आप विश्वास रखिए, जो आदमी आपके घर के मेम्बर (member) हैं, जब आप बड़े होंगे, तो एक सहकारी व्यक्ति साबित होंगे।

अपना कुटुम्ब में जब कभी भी रहेंगे सहकारिता का आनन्द उठाएँगे, और समाज में जहाँ भी उनका योगदान होगा, सहकारिता का वातावरण बना सकने में समर्थ बन गये होंगे। ऐसी ढेरों की ढेरों चीजें हैं, जो आप कुटुम्ब में रह करके अपने दायरे में छोटे सी बातें पैदा करते हुए बड़ी अच्छी तरीके से कर सकते हैं। दायरे का विस्तार जैसा अच्छी तरह कुटुम्ब में हो सकता है और कहीं नहीं हो सकता। आप जो कमाते हैं, हिल-मिल के खाते हैं न! मिल-जुल के खाते हैं न! अगर कुटुम्ब न हो तब - तब मुश्किल है। ये हिल-मिल के खाने का आध्यात्मिक साम्यवाद आप अपने घर से शुरू कर सकते हैं। चुरा करके खाएँगे, जो आदमी अपनी ज्यादा कमाता है वो आदमी ज्यादा खायेगा, नहीं, ये साम्यवादी सिद्धान्तों के विरुद्ध है। चाहे आप कुटुम्ब में रहते हैं, समर्थ हैं तो क्या, असमर्थ हैं तो क्या, संयुक्तता का मतलब ही यही होता उस पर हरेक का हिस्सा, हरेक का है हक।

आप हरेक का हक स्वीकार करिए। आप ज्यादा कमाते हैं, तो आप खर्च मत कीजिए। आप ज्यादा पैसे अपने हिस्से में मत लीजिए। आप पान खाने में खर्च करना चाहते हों, बच्चों को स्कूल के लिए किताब को, ट्यूशनों की कमी पड़ती है। क्यों करते हैं आप ऐसा? आप सिगरेट पीना चाहते हैं, कोको-कोला पीना चाहते हैं, इसीलिए पीना चाहते हैं न कि आप कमा करके लाते हैं और आप की जेब में पैसे हैं और आपको खर्च करने से कोई रोक नहीं सकता, गलत बात। रोक नहीं सकता आपको दबाव की वजह से तो आपको ईमानदारी और शराफत सिखाई जाए और आप अपनी मर्जी से न करें। ऐसा क्यों? इसके लिए आप ये समझिए कि आपका कुटुम्ब इस तरीके से बहुत ही अच्छा एक वातावरण है, जो आपको समझदारी स्वयं को सिखाता, जिम्मेदारी आपको सिखाता है और आपके आपको ईमानदारी आपको सिखाता है। आप न केवल स्वयं सीखें बल्कि सारे घर को सिखायें। अगर आप ऐसा करने में समर्थ हो सकें, तो आपका कुटुम्ब न केवल आपके लिए बल्कि आपके घर में रहने वाले सभी सदस्यों के लिए सुख और शान्ति का आधार बनेगा। न केवल घर में रहने वालों के लिए, बल्कि उसकी समाज में हवा फैलेगी तो चन्दन का दरख्त जिस तरीके से अपनी खुशबू से चारों ओर वातावरण अच्छा बना देता है, ऐसे ही आप सारे समाज को सुगन्धित, और सुविकसित, और समुन्नत बनाने में समर्थ हो सकेंगे। ऐसा है अपने परिवार के प्रति उत्तरदायित्वों का निर्वाह जिसमें से आप में से हर एक को करना चाहिए।

॥ॐ शान्तिः॥