सेवा-साधना
आप इस शिविर में साधना के अलावा कुछ शिक्षण भी प्राप्त कर रहे हैं। आपका आधा समय साधना में लगेगा और आधा समय शिक्षण में लगे, ऐसी योजना बनाई हुई है। शिक्षा भी साधना का ही अंग है। शिक्षा को आप साधना से बाहर मत मानिये। आपकी साधना और शिक्षा, समन्वित (की) जो कार्य पद्धति है इस कल्प साधना शिविर की, आप इसके बारे में थोड़ा विचार कीजिए कि क्यों कराया जा रहा है? क्या कर रहें हैं इसके बारे में तो आप जानते ही हैं, मुझसे भी ज्यादा जानते हैं। आप क्या सीखते हैं? आपको यहाँ वाणी का मुखर होना सिखाया जाता है। आपको यहाँ प्रज्ञा पुराण की कथा कहना सिखाया जाता है, और स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से व्याख्यान देने का अभ्यास कराया जाता है। आपको यहाँ संगीत के माध्यम से जन-जागरण करने की भूमिका निभाने का अभ्यास कराया जाता है। आप तो जानते हैं न। भाषण देने की कला, गायन की कला ये एक शिक्षण यहाँ का है। शिक्षण भी साधना का अंग है, कम मत मानिये। दूसरा एक और चीज सिखाई जाती है आपको। क्या सिखाया जाता है इसके अलावा? वाणी के उपयोग करने के अलावा वाणी के कई उपयोग सिखाये जाते हैं। संगीत का शिक्षण इसलिए सिखाया जाता है कि आप जनमानस की भावनाओं को बढ़ाने में ठीक हो सकें। आपको दृश्य, शिक्षण का एक क्रिया सिखाई जाती है। दृश्यों के माध्यम से, ये तो वाणी से कहा लोगों ने कान से सुना। लेकिन दिखाने से भी कुछ बात बनती है। लोगों को स्वाध्याय का लाभ दें, सत्संग का लाभ दें। स्लाइड प्रोजेक्टर उसी में शुमार होता है कि आप उसको दृश्य, घटनाएँ दिखाते चलें। ये-ये परिस्थितियाँ आज की हैं। इन परिस्थितियों के विरुद्ध बगावत हमको करनी चाहिए। अगर हम ये नहीं करेंगे, हमको ये ही करना चाहिए। उचित-अनुचित आज का विवेक दूसरे शब्दों में सत्संग कहते हैं, यहाँ आपको स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से सुनाया जा रहा है। शिक्षा नम्बर दो हुई। तीसरी आपको दृश्य उसी में शुमार होता है, चित्र प्रदर्शनी भी उसी में आती है। चित्र स्लाइड प्रोजेक्टर से दिखा दिए तो क्या, और प्रदर्शनी की नुमाइश लगा के दिखा दी तो क्या, बात एक ही है। चित्रों के माध्यम से, दृश्य के माध्यम से शिक्षण, ये अपने आप में एक बहुत बड़ा काम है।
तीसरा, इसके सिवाय क्या कराया जा रहा (है) आपको? आपको कुछ सेवा-साधना के लिए, स्वास्थ्य-सम्वर्धन करने के लिए काम दिया जा रहा है। जन-साधारण की सेवा भी तो करनी पड़ेगी। प्रत्यक्ष सेवा भी तो आपको करनी चाहिए। प्रत्यक्ष सेवा नहीं करेंगे? केवल मात्र ज्ञान ही सुनाते रहेंगे, उपदेश ही करते रहेंगे। केवल उपदेश! उपदेश केवल नहीं है। ज्ञान के साथ-साथ में कर्म का समावेश भी आवश्यक है। ज्ञान की महत्ता सबसे अधिक है, बेशक। स्वाध्याय की महत्ता को मैं क्या कम बताऊँगा क्या? न। सत्संग की महत्ता कम करने का मन है क्या? न। चिन्तन-मनन की महत्ता कम है क्या, न। लेकिन एक बात आप ध्यान रखिए। केवल मात्र ज्ञान के साथ, ज्ञान अपूर्ण है - उसके साथ-साथ में कर्म का जुड़ा रहना बेहद जरूरी है। कर्म और ज्ञान - जब दोनों मिल जाएँगे, तब बात बनेगी। ध्यान, जप के साथ-साथ में आपको सेवा-कार्य करना नितान्त आवश्यक बताया गया है। अपने मिशन में, ॠषियों की प्राचीन परम्परा का अनुकरण करते हुए, साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा, इन चार चीज़ों को समान रूप से महत्त्व देने के लिए बताया गया है। आपको अपनी साधना में सेवा का भी समावेश करना पड़ेगा। सेवा किस तरीके से करें? सेवा से मतलब है - प्रत्यक्ष सहायता। ज्ञान दान भी एक सेवा है। लेकिन यहाँ ज्ञान दान और ब्रह्म विद्या की बात नहीं चल रही है। चल ये रहा है कि आप लोकमंगल के लिए, और जन-साधारण (को) की सेवा कैसे करेंगे? आपने जो समाज से ॠण लिया है, उसको चुकाएँगे कैसे? आप लोगों को ऊँचा उठाने के लिए करेंगे क्या? ये भी तो एक काम है आपके जिम्मे।
ये भी साधना का एक अंग है। इसलिए एक काम यह है कि आप दूसरों की सहायता कर पाएँ। सहायता कौन सी कर पाएँ? जैसे ज्ञान की साधना एक चीज़ है - आप किसी आदमी का ज्ञान बढ़ा दें, तो उसकी असली सेवा हो गई। ज्ञान के बाद दूसरा नम्बर आता है स्वास्थ्य का - किसी आदमी की सेहत खराब हो रही है, आप ऐसी नसीहत दें, ऐसा तरीका बताएँ, अथवा कोई चिकित्सा कर दें, जिससे कि उसका खोया हुआ स्वास्थ्य फिर से मिल जाए - ये दूसरे नम्बर की सेवा है।
तीसरे नम्बर की सेवा, जो आजकल सब लोगों ने सबसे पहला नम्बर दिया हुआ है, वो है जिसको पैसे की सहायता कहते हैं। पानी पिला देंगे किसी को, ठीक है पिलाइये। क्या करेंगे हम, ठहरने का इंतजाम करेंगे धर्मशाला खोलेंगे वो भी ठीक बात। और क्या करेंगे हम सदावर्त खोलेंगे, सदावर्त में रोटी-पानी खिलाना, फोकट की रोटी का इंतजाम कर देंगे, चलिए ये भी अच्छी बात।
धर्मशाला बनाने से लेकर के, सदावर्त लगाने और पिआऊ लगाने तक के ढेरों के ढेरों काम ऐसे हैं, जिससे कि एक आदमी दूसरे की सेवा किया करते हैं। लेकिन इन सारी की सारी सेवाओं में, ज्ञान की सेवा सबसे बड़ी सेवा है। ज्ञान की सेवाओं से आदमी का जीवन बदल जाता है। वस्तुओं की सेवाएँ जो आजकल सबसे बड़ी माने जाने लगी हैं वास्तव में सबसे बड़ी है नहीं। इसकी कोई निन्दा थोड़ी करता है, ये थोड़ी कह रहे हैं कि आप किसी की सेवा मत कीजिए या किसी को पैसा मत दीजिए या किसी को रोटी मत खिलाइए या किसी की दवा दारू मत करिए, ये कौन कहता है। पर मैं तो क्वालिटी की बात कहता हूँ आपसे। धन के द्वारा शरीर की सहायता, धन के द्वारा शरीर की सहायता, धन के द्वारा शरीर की सहायता, धन के द्वारा शरीर की आप सहायता कर सकते हैं - बस। धन किसी की जीवात्मा को ऊँचा उठाने में मददगार नहीं हो सकता। धन केवल कपड़े का इंतजाम कर सकता है, भूख का इंतजाम कर सकता है, इलाज का कर सकता है - ये शरीर की सेवा है।
आत्मा की सेवा? मन की सेवा? आदमी के उज्ज्वल भविष्य की सेवा? ये तो सेवा केवल ज्ञान से ही बन सकती है। लेकिन ज्ञान भी अपूर्ण है। आदमी सेवा न करे, (लोगों का) श्रम अपना खर्च न करे, केवल ज्ञान ही खर्च करता रहे, जीभ को ही चलाता रहे, प्रत्यक्ष सहायता के लिए किसी के काम न आए - तो भी बात बनती नहीं है। इसीलिए यहाँ इस शिक्षण में, एक लोकसेवा का बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य आपको ये सिखाया जा रहा है - आप जड़ी-बूटियों के द्वारा आप चिकित्सा कर सकते हैं। जड़ी-बूटियाँ वास्तव में ये औषधियाँ हैं - अमृत औषधियाँ। आदमी जिन्दा रहता है, वनस्पतियों पर जिन्दा रहता है। शरीर में जो कमियाँ पड़ जाती हैं वो भी वनस्पतियों से ही दूर की जा सकती हैं। शरीर में जो विषाणु पैदा होते हैं वो भी वनस्पतियों के उपयोग से दूर किये जा सकते हैं क्योंकि शरीर वनस्पतियों का बना है, घास का बना है, ये अनाज का बना है। इसमें जो भी चीजें हैं, आप कहाँ से पाते हैं? अन्न से पाते हैं, फिर जल से पाते हैं दो, और कहाँ से पाते हैं? जो कुछ भी शरीर के भीतर है ये सब मिट्टी का है। मिट्टी की सेवा करना अच्छा तो है, जरूरी भी है, लेकिन वो पर्याप्त नहीं है। लेकिन तारीफ तो करना चाहिए, इसीलिए लोगों के स्वास्थ्य का सम्वर्धन करने के लिए जड़ी-बूटी चिकित्सा सिखाई जा रही है ताकि आप जड़ी-बूटियों से न केवल बीमारियों का इलाज करें, बल्कि जो भी (आपको) इलाज के बहाने आपके सम्पर्क में आए, उसको आप ये बात सिखाएँ कि संयमशील होना पड़ेगा।
स्थाई निवारण करने के लिए दवाएँ काफी नहीं हैं - ये टेम्परेरी रिलीफ (temporary relief) तो है - पर, पर ये स्थाई समाधान नहीं है। स्थाई समाधान के लिए जरूरी है कि आदमी संयम सीखे। इसीलिए आप चिकित्सा के माध्यम से बुखार, खाँसी आ जाये तो दे दिया उखाड़ कर के। क्या है तुलसी दे दी, गिलोय दे दी। कोई नुकसान इसमें कोई नुकसान की चीज नहीं है, सब फायदे की चीज हैं। नुकसान की चीज़ें हमने जड़ी-बूटी विज्ञान में ली ही नहीं। नुकसान की चीज़ों को हमने हवन में लिया ही नहीं। केवल सौम्य और सात्विक चीज़ों का ही हमने उपयोग किया है और कराया है। इसीलिए यहाँ बीसों औषधियों के द्वारा, बीस जड़ी-बूटियों के द्वारा जहाँ आप चिकित्सा सीखें, वहाँ एक बात जरूर सीखें कि आसन और प्राणायाम के माध्यम से, स्वास्थ्य और संयम के माध्यम से, आदमी किस तरीके से अपने शरीर को और सेहत को ठीक कर के रखे।
ये तीन तरह की शिक्षाएँ इस समय आपको मिलती हैं। एक - चिकित्सा, स्वास्थ्य संवर्धन, फर्स्ट एड (first aid), वगैरह। एक - संगीत, व्याख्यान, प्रवचन, वगैरह। तीसरा - संगीत, और संगीत के माध्यम से, संगीत के माध्यम से जन-जागरण। ये ही कुछ और हैं रचनात्मक सेवाएँ। जैसे दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखना वैगरह। इन सारी की सारी शिक्षाओं के पीछे, इन सारी की सारी गतिविधियों के पीछे जो बात छिपी हुई है, सो एक ही बात छिपी हुई है कि आपको लोकमंगल के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण कदम बढ़ाने चाहिए। आज लोगों को विचार देने की बेहद जरूरत है। जीभ खोलनी ही पड़ेगी आपको। हर आदमी कितना भूला हुआ भटका हुआ है आदमी।
हर दिशा में जहाँ कहीं भी आप देखिए आदमी के भटकाव का ठिकाना नहीं। पहले आदमी जब जंगली था, आदिमानव था, तब कम से कम प्रकृति के साथ में लड़ाई-झगड़ा नहीं था। जितनी भी सीमित जानकारी थी, उसे सही जानकारी थी। लेकिन आज तो आदमी ने जानकारी बहुत इकट्ठी कर ली है लेकिन सारी जानकारियाँ गलत, गलत, गलत पूरी तरीके से आदमी गलती के भटकाव में आ गया है, उसका चिन्तन प्रगतिशील है। सुना जाता है प्रगतिशील है, पढ़े-लिखे भी लोग बहुत हैं, ग्रेजुएट भी कहलाते हैं, लेकिन जहाँ तक जीवन की समस्याओं का सम्बन्ध है, उसके बारे में वो जानकार नहीं हैं। जनता को भी यही करना पड़ेगा। सोये हुए को तो जगाना ही चाहिए। आप सोए हुए को जगायेंगे नहीं तो ये मरे हुए मुर्दों के तरीके से बैठे रहेंगे। जनजागरण इसी का नाम है। लोक मानस का परिष्कार, आदमी का चिन्तन उलटा हो गया, उलटे चिन्तन को उलट देने की वजह से उसने सारी समस्याओं को गड़बड़ दिया है। स्वास्थ्य को गड़बड़ा दिया, मानसिक सन्तुलन को गड़बड़ा दिया, अर्थव्यवस्था को गड़बड़ा दिया, अपने कुटुम्ब और परिवार को गड़बड़ा दिया, सामाजिक सम्बन्धों को गड़बड़ा दिया, अपने लोक और परलोक और भविष्य को गड़बड़ा दिया। ये कैसे गड़बड़ हुई? ये केवल एक ही कारण है कि आदमी को सही चिन्तन न मिल सका - सही चिन्तन के अभाव में सारे जीवन की ये मोटर गड़बड़ा गई। सही ड्राइवर के न मिलने की वजह से, सही मार्गदर्शन न होने की वजह से अच्छी-खासी मोटर एक्सीडैंट में चली जाती है और बस जहाँ की तहाँ पड़ी रहती है। हमारा जीवन एक मोटर की तरीके से है, इसको संचालन करने के लिए एक अच्छा ड्राइवर चाहिए। न केवल आपके लिए सारे समाज के लिए भी।
आज सबसे महती आवश्यकता इसी ज्ञान यज्ञ की है, इसी विचार क्रान्ति अभियान की है, इसी प्रज्ञा अभियान की है, इसी जन-जागरण की है। आपको इस सम्बन्ध के काम करने के लिए यहाँ शिक्षण चलाया जा रहा है। आपको ईसाई चर्चों की वो सीरीज सिखाई जा रही है कि जिसमें आप लोगों की सेवा करें, सेवा करने के बाद में सहानुभूति इकट्ठी करें, सहानुभूति के बाद में सहयोग प्राप्त करें और जनता के सहयोग से बड़े से बड़े काम करने में सफल और समर्थ हो सकें। ईसाई चर्चों की नीति यही है। प्राचीनकाल के ॠषियों की भी नीति यही थी। जनता की वो सेवा भी करते थे, केवल उपदेश ही थोड़े देते थे। जहाँ जाइए उपदेश, जहाँ जाइए उपदेश, जहाँ जाइए उपदेश। अरे उपदेश को खाएँ या सिर पर बिठाएँ, क्या करें। आप सहानुभूति तो लीजिए पहले। सहानुभूति इकट्ठी करने के पीछे ये सम्भव है कि आपकी बात कोई सुने और अपने विचारों को बदलने के लिए कोई तैयारी करे। आप के कहने से क्यों विचार बदलेगा, क्यों अपनी कोई बेइज्जती कराएगा, क्यों तौहीन कराएगा। क्या उसके विचार गलत थे कि आपके विचार सुनते ही बदल देगा। कोई नहीं सुनेगा। आप सहानुभूति इकट्ठी कीजिए पहले। सहानुभूति इकट्ठी करने के लिए सेवा के क्रम यहाँ बनाए गए हैं। आपको इसके अलावा भी पहले बताए गए हैं। स्लाइड प्रोजेक्टर चलाने की बात कही गई थी - घर-घर में जाइए, घर-घर में जन-जागरण का सन्देशा सुनाइए, युग बदल रहा है इसकी बात कहिए। आपको इससे पहले भी बताया गया था कि आप कभी साइकिल से संगीत बजाते हुए निकल पड़ें, दो या चार की टोली में निकल पड़ें फिर देखिए क्या मजा आता है। पिकनिक के लिए घर से निकलते हैं इससे बेहतरीन पिकनिक कुछ हो ही नहीं सकती। तीर्थयात्रा के बाबत हमने आपसे कहा है कि आप तीर्थयात्रा की तैयारी करें, आप बाहर जाने की तैयारी करें। आप बोलना सीखें, सम्भाषण सीखें, लोगों से बातचीत करें। ऐसी बातचीत करें जो आप दूसरों पर प्रभाव डाल सकें। वैगरह ये बातें आपको यहाँ सिखाई जा रही हैं। केवल एक ही बात सिखाई जा रही है संक्षेप में आप सुनना चाहें तो जो नया युग आ रहा है, इस नए युग की तैयारी की पहली वाली भूमिका निभाने की बात आपको सिखाई जा रही है। जड़ी-बूटियों के द्वारा, इलाज के द्वारा, आसन के द्वारा, प्राणायाम के द्वारा, आप लोगों की खोई हुई सेहत को किसी तरह से पाने में मददगार बनें। अगर आप किसी की मदद करेंगे तो कोई एहसान मानेगा। जो एहसान मानता है वो कहना भी मानता है, एहसान मानता है वो कहना भी मानता है। आपका लोग एहसान मानें इसके लिए आप ईसाई चर्चों की तरीके से चिकित्सा को अपना व्यवसाय बना लें, व्यवसाय नहीं सेवा का माध्यम बना लें। चिकित्सा में हमारे यहाँ आसन और प्राणायाम की भी चिकित्सा होती हैं - आप इनको बना लें। स्वास्थ्य के नियमों की बात करें, खेल-कूदों की बात करें, जिससे जनता के स्वास्थ्य का सम्वर्धन होने का तरीका निकल आवे।
आज के कल्प साधना सत्रों में जो व्यक्ति आये हुए हैं हम उनको ये शिक्षण देते हैं कि आप जनता की सेवा, स्वास्थ्य सम्वर्धन की, बहुत सी सेवाएँ हैं। लेकिन ये सेवा सरल है, कठिन नहीं है। इसका हाथों-हाथ लाभ होता है, तुरन्त इससे आदमी की समस्याओं का समाधान हो जाते हैं। स्वास्थ्य की सेवा के लिए आपको व्याख्यान के माध्यम से, ये आजकल का जमाना बच्चा है। ये कोई प्रौढ़ समाज नहीं है। इस प्रौढ़ समाज को तो तर्क, तथ्य और दूसरी चीजें भी काम में आती हैं। लेकिन अपने ७० फीसदी हिन्दुस्तान को जिसमें बिना पढ़े लोग रहते हैं, पिछड़े हुए लोग रहते हैं, इनको किसी और तरीके से आप बता नहीं सकेंगे। धर्म मंच से जाइए और कथानक कहिए। कहानियाँ कहिए, कहानियाँ तो बच्चों को भी प्यारी लगती हैं। सिनेमा तो कहानियाँ ही तैयार करते हैं, कहानियाँ ही बेचते हैं उसी में मालदार हो जाते हैं। कहानियाँ अपने आप में एक सामर्थ्य का स्त्रोत हैं जो किसी ने कहा नहीं। पुराने लोग तो समझ जाते थे। भागवत की कथा, रामायण की कथा, वाल्मीकि रामायण की कथा, अमुक की कथा, अमुक की कथा - ये सब व्याख्यान और सत्संग इसी बात के थे, कि जन-मानस को परिष्कृत बनाने के लिए कोई रस्ता निकाल दें और लोगों को समझाएँ। ये बोलने की कला - भाषण की कला आपको यहाँ सिखाते हैं। संगीत उससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। हृदय का स्पर्श करने के लिए, भावना का स्पर्श करने के लिए, अगर कोई चीज़ आती है तो संगीत आता है। इसीलिए संगीत की शक्ति अपने आप में खासतौर पर अशिक्षित लोगों में जो कि देहात में पड़े हुए हैं उनको व्याख्यान की बात समझ में नहीं आती, संगीत में भाव रहते हैं। इससे अगर उनकी भाषा से, स्थानीय भाषा से थोड़ी भिन्नता हो तो भी काम चला लेते हैं।
आज का व्यक्ति हर दृष्टि से गिरावट के रास्ते पर चल रहा है। ये गिरावट स्वाभाविक नहीं है, अस्वाभाविक है। भगवान की दुनिया में कोई चीज ऐसी नहीं है जो आदमी को गिरा पाती हो। आदमी अपनी खुराफातों से, अपनी गलतियों से, गिरने के लिए कोशिश तो करता है। आज यही हुआ है। पहले भी जब कभी भी ऐसी मुसीबतें आई थीं यही हुआ था। लोगों ने अपनी गलतियाँ की, अपना रास्ता भुला दिया, अपने कर्तव्य और फर्जों की ओर से मुँह मोड़ लिया, इसका परिणाम क्या हुआ? इसका परिणाम यह हुआ कि एक के बाद एक के बाद मुसीबतें आईं और लोग तबाह होते चले गए, बर्बाद होते चले गए। आज आप नजर तो उठा के देखिए, सारे संसार के ऊपर नजर उठाके देखिए। सारे संसार की न सही अपने ऊपर नजर उठाके देखिए और अपने घर वालों के ऊपर नजर उठाके देखिए। यह कैसे हो रहा है। इनका स्वास्थ्य सबका गिर रहा है। स्वास्थ्य बराबर गिरता चला जा रहा है। औसत आदमी का स्वास्थ्य दिन-दिन नीचे की तरफ चल रहा है, ऊपर की ओर नहीं बढ़ रहा। क्या कारण क्या है? पहले की अपेक्षा खाने की वस्तुएँ भी ज्यादा हैं, सामान भी ज्यादा है फिर इस तरह की मुसीबत क्यों आती हैं?
आदमी भटक गया है। जीवनयापन करने की चर्चा के सम्बन्ध में, खान-पान सब अस्त-व्यस्त, सब अस्त-व्यस्त। जिसको हम खाली नमक कहते हैं ये सोडियम क्लोराइड है। सोडियम क्लोराइड एक तरह का जहर है। मनुष्य के लिए जरूरी है नमक, बिल्कुल जरूरी नहीं है। सोडियम क्लोराइड है। ऐसे-ऐसे हम रोज नशे पीते क्या करते क्या नहीं करते, इसका परिणाम है स्वास्थ्य की तबाही हमने अपने आप की है। हमने, किसी ने, नेचर ने, नेचर ने नहीं की। पैसे की तंगी हमने स्वयं की है और अपनी घर की समस्याओं को उलट-पलट कर हमने ही रखा है और पैसे की तंगी का जहाँ तक सवाल है - फिजूलखर्ची की वजह से - एक - अथवा, योग्यता न बढ़ा कर के, कम योग्यता की स्थिति में बने रहना, और थोड़ी योग्यता के बदले में कम पैसे प्राप्त करना। कम पैसे प्राप्त करेंगे तो आपका गुजारा कैसे हो सकता। करना इसी में है, सीधी-साधी सी बात है। खर्चे आप फिजूल खर्ची से करेंगे तो आप मुसीबत में रहेंगे और अच्छी आमदनी होते हुए भी आप तंगी का अनुभव करेंगे। इसके विरुद्ध अगर कोई आदमी गरीब है, कम कमाता है तो भी अपनी 'जेती लम्बी सौर' के हिसाब से अपना पैर कम फैला के रख लेता है, तो खुशी की जिन्दगी जीता है, हँसती जिन्दगी जीता है, कम पैसों से (ही) गुजारा कर लेता है।
सवाल पैसे का नहीं है - सवाल आदमी के विचार करने के, सोचने के तरीके का है। आया स्वास्थ्य तबाह हुआ हो, अथवा मानसिक सन्तुलन तबाह हुआ हो, अथवा गृहस्थ तबाह हुआ हो, अथवा सामाजिक सम्बन्ध तबाह हुए हैं। इसके मूल में दूसरों की गलती न हो ये तो मैं नहीं कहता, दूसरों की ‘भी’ हो सकती है लेकिन दूसरों की ‘ही’ मत कहिए। उसमें कुछ गलतियाँ अपनी भी होती हैं। अपनी गलती क्या है। जानबूझ के तो नहीं करते लोग पर स्वभाव का अंग बन गलतियाँ अकसर होती रहती हैं। तब तब आपको एक ही बात करना है कि जन-जन के लिए, उसके विचारों को परिशोधन करने के लिए, ब्रेन वॉशिंग (brain washing) के लिए, दिमाग की सफाई के लिए, दिमाग में नई स्थापना करने के लिए, आप कुछ कदम बढ़ाने चाहिए। ये जो शिक्षण है यहाँ का, समाज की इतनी महती आवश्यकता को पूरा करने के लिए सिखाया जा रहा है। इसीलिए नहीं सिखाया जा रहा कि आप यहाँ वक्ता हो जाएँ और पैसे ले आया करें। इसीलिए संगीत नहीं सिखाया जा रहा है कि आप नाचना सीखें। इसलिए आपको जड़ी-बूटी चिकित्सा नहीं सिखाई जा रही है कि आप यहाँ रह कर के कोई दवाखाना खोलें, और अस्पताल खोलें, और कोई मालदार बनें। मालदारी ही हमारा उद्देश्य नहीं है। मालदारी का दूसरे दुकानों का उद्देश्य है। आपको मालदार बनना हो तो दूसरी दुकानों पर जाना चाहिए। हमारे पास एक ही दुकान है। अध्यात्म के पास तो एक ही हथियार है कि लोगों के विचारों को बदल दे, और दृष्टिकोण को बदल दे, और भावनाओं को बदल दे, और ईमान को बदल दे - ये बदल देने के बाद में दुनिया बदल जाती है।
मन:स्थिति बदल जाने के बाद में परिस्थितियाँ बदल जाती हैं - ये बात सही है। तो आदमी की मन:स्थिति को कैसे बदला जाए? आदमी की मन:स्थिति को बदलने के लिए वही किया जा रहा है, जो आपको सिखाते हैं। आपको वाणी का उपयोग सिखाते हैं - ये सबसे बड़ा हथियार है वाणी का। नारद जी ने इसी का उपयोग किया था और नारद जी ने वाल्मीकि का दिमाग बदल दिया था। नारद जी ने प्रह्लाद का दिमाग बदल दिया था, नारद जी ने पार्वती का दिमाग बदल दिया था, नारदजी ने ध्रुव का दिमाग बदल दिया था। इसी वाणी का प्रयोग यदि ठीक तरीके से किया जा सके, तो आप विश्वास रखिए लोगों के दिल और दिमागों को बदलने में बहुत बड़ा योगदान मिल सकता है। सिनेमा देखा है ना आपने। दृश्य और फिल्म दो ही चीजों के मिलाने के पश्चात में सिनेमा कितना हावी हो गया है। लोगों के विचार और ध्यान को बदलने में उसने भला यी बुरा कितनी भूमिका निभाई है। आपको वाणी का दृश्य-श्रवण का यहाँ शिक्षण दिया जा रहा। ये इतने पैने हथियार हैं। अगर आप इन हथियारों का उपयोग कर सकें तो आज की अवांछनीय परिस्थितियों से लोहा लेने में समर्थ बन सकते हैं।
कल का उज्ज्वल भविष्य हमको बनाना है। उज्ज्वल भविष्य को बनाने के लिए जिन तैयारियों की जरूरत है, उन तैयारियों में आदमी को अपने विचार करने की शैली बदलना बहुत जरूरी है। इसके लिए आपको वाणी की जरूरत है। हृदय को गुद-गुदाने के लिए संगीत की जरूरत है। सेवा के लिए जड़ी-बूटियों की जरूरत है। ऐसे थोड़े-थोड़े काम आपको सिखाये गये हैं। आदर्श वाक्य दीवारों पे लिख कर के लोगों (के) के दिलों और दिमागों को घुमा देने का प्रयत्न, अचेतन मन को घुमा देने का प्रयत्न - वगैरह ये बहुत सी चीज़ें ऐसी हैं जो बड़े ऊँचे उद्देश्यों से सम्बन्ध रखती हैं। आप उनकी गहराई में विचार करना, तब आपको महत्त्व मालूम पड़ेगा, तभी आप उसको सच्चे मन से करेंगे। अगर आपको महत्त्व न मालूम पड़ा तो आप सच्चे मन से उस काम को कर नहीं सकेंगे। कर नहीं सकेंगे। उसका महत्त्व ही नहीं समझेंगे। समझेंगे, अरे साहब क्या प्रज्ञा-पुराण हमें कथा कहनी है क्या, देखिए प्रवचन कराना है। हमें प्रवचन करने के हैं क्या, हमें कोई जड़ी-बूटी सिखाई जा रही हैै अब जड़ी-बूटी फैलाएँगे के क्या, अब हमको संगीत सिखाया जा रहा है हम क्या करेंगे? आपके व्यक्तिगत जीवन में आर्थिक स्थिति से भले ही इनका कोई महत्त्व न हो लेकिन आप विश्वास रखिए जो कुछ भी सिखाया जा रहा है, अगर आप (बाहर) सच्चे मन से सीखने की कोशिश करेंगे, तो आपके भीतर एक ऐसी नवीनता, और एक ऐसी विशेषता पैदा होगी, जिसकी वजह से आप अपना भला कर सकते हैं, समाज का भला कर सकते है, अपनी अन्तरात्मा को ऊँचा उठा सकते हैं, और दूसरों की अन्तरात्मा को ऊँचा उठा सकते हैं।
मेहन्दी पीसने वाला दूसरों के हाथ तो लाल करता ही है, पिसाई की वजह से उसके अपने हाथ अनायास ही लाल हो जाते हैं। आप लोकमंगल की बात विचार कीजिए, जन-साधारण की विचार कीजिए, जन-कल्याण की बात विचार कीजिए - साथ-साथ में आप ये देखिए, जैसे आप दूसरों के लिए सेवा करते हैं, दूसरों के लिए कष्ट उठाते हैं, भगवान आपके लिए कष्ट उठाएगा, समाज आपके लिए कष्ट उठाएगा, समाज आपका सहयोग करेगा, जनता आपका सहयोग करेगी। मानव आपका सहयोग करेगा, इसलिए आपको दूसरों का सहयोग अर्जित करने के लिए भगवान के नजदीक आना चाहिए। भगवान के नजदीक आने का मतलब ये है - ऊँचे विचारों का समुच्चय। ऊँचे विचारों को फैलाने के लिए आप को हर चन्द प्रयत्न करना चाहिए। साहित्य का प्रयोग कैसे किया जा सकता है, ये हमने बता दिया है। लेकिन जन-जन के पास जाना तो पड़ेगा। जन-जन को परामर्श तो देना पड़ेगा। अगर आप परामर्श नहीं दें तो फिर अपने आप किताबों से ही काम हो जाएगा, आपके परामर्श की जरूरत क्या पड़ेगी। नहीं जरूरत है, बहुत जरूरत है। आपको व्यक्ति के पास जाकर के अपनी क्षमता और प्रतिभा की छाप उन पर डालनी चाहिए और छाप डालने के बाद में ये कोशिश करनी चाहिए कि आप बराबर ऐसे परामर्श दें, आप मिलजुल के बातचीत करने में, आप विचार गोष्ठी के रूप में, आप सम्मेलनों के रूप में, किसी न किसी रूप में आप जनता के लिए ये प्रयत्नशील रहिए कि उनके विचार बदल दिए जाएँ, भावना बदल दी जाएँ और घिनौनी जिन्दगी का परित्याग करके इनके अन्दर ऐसे नेक पैदा किये जायें, जन समाज के लाभ के लिए बड़े से बड़े काम बिना हिम्मत खोये कर सकें। यही कहना था आप लोगों से -----समाप्त ॥
॥ॐ शान्तिः॥