तीर्थ कैसे होने चाहिए?

तीर्थ शब्द याद कर के कितना आनन्द आता है, कितनी प्रसन्नता होती है, कि प्राचीनकाल में जब तीर्थ अपने वास्तविक तीर्थ रूप में रहे होंगे, तब कितना आनन्द आता होगा! वहाँ जाने के बाद में लोग अपने (क) कलुष और कषायों को धोकर के, पुनीत और पवित्र हो के कैसे निकलते होंगे! गंगा के बारे में तो मुझे मालूम नहीं है इसमें पानी में नहाने के बाद में आप पुनीत पवित्र हो जाते हैं कि नहीं, पर एक और ज्ञान-गंगा की बाबत मैं आपको यकीन दिला सकता हूँ, (तीर्थ) जिन्हें कहते थे। उस ज्ञान-गंगा में अगर आपको वास्तविक मौका मिल जाए, और कहीं आपको किसी वास्तविक तीर्थ में रहने का मौका मिल जाए, तो आप ये यकीन रखिए, आप अपने आप को धो कर के तो जाएँगे ही। भविष्य में अपना कपड़ा धुला हुआ रहेगा, क्योंकि इसलिए हमने वहाँ रह करके के उपासना की है, साधना की है। और उपासना-साधना करने के साथ-साथ अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए वहाँ के वातावरण का लाभ उठाया है। वहाँ जो ऋषि होते हैं उनसे परामर्श करके आप रास्ता भी तलाश करते हैं। और उस रास्ता तलाश करने में एक रास्ता ये भी है आपने जो गल्तियाँ की हैं उनका प्रायश्चित कैसे होगा? भरपाई कैसे होगी? आप उसके लिए उदार सहयोग क्या करेंगे? आप उसके लिए जनसेवा के लिए क्या कदम उठाएँगे? इसके लिए आप अपने गुण, कर्म और स्वभाव में शालीनता का समावेश करने के लिए ऐसी (ग) गतिविधियाँ क्या अपनाएँगे जो आपके संस्कारों के रूप में परिणित (बन) सकें?

जप से संस्कार नहीं बनते। रामायण पाठ से संस्कार थोड़े ही बन जाएँगे कोई। पूजा के साथ-साथ में आपको कुछ कुछ न कुछ कृत्य भी करने पड़ेंगे। विचार और कृत्यों का, दोनों का समावेश करने के बाद ही ये सम्भव है कि एक समग्र प्रक्रिया पूर्ण हो जाए। वास्तव में अध्यात्म का मतलब संस्कार पैदा करना है, और संस्कार ज्ञान और कर्म दोनों के समन्वय से ही होते हैं। ज्ञान में पूजा आती है, पाठ आता है, रामायण पाठ (आती) है, सत्संग आता है, स्वाध्याय आता है - ये ज्ञान पक्ष है। और कर्म पक्ष? कर्म पक्ष उसे कहते हैं जिसमें सेवा का समावेश होता है, परोपकार का समावेश होता है, पुण्य कर्मों का समावेश होता है, जन-कल्याण का समावेश होता है। इन दोनों बातों को अगर हम मिला देंगे तो आपकी प्रक्रिया पूर्ण हो जाएगी। बिजली के दो तार मिल जाने से करेण्ट चालू हो जाता है। आप ज्ञान और कर्म का समावेश अगर कर पायें तो आपका पूर्ण उपासना हो जाएगी और आप उस आध्यात्म के चमत्कार देख पायेंगे।

चलिए आपको तीर्थों का महत्त्व बताते हुए प्राचीन काल के तरीके से ये बताया था अगर कहीं तीर्थ आपको मिल जाए, और आपको तीर्थ में रहने का सौभाग्य मिल जाए, आप वहाँ वही प्रक्रिया को ग्रहण करना जो करनी चाहिए। आपको यहाँ रह करके अगर आप इसको गायत्री तीर्थ मानते हैं अपना जो समय, इसको एक सुव्यवस्थित रूप से व्यय कीजिए। यहाँ एक सुव्यवस्थित रूप से व्यय करने का क्रम बैठा हुआ है। सबेरे से उठने से लेकर के, सायंकाल को सोने तक का एक टाइम-टेबल (time-table) बना हुआ है। ये पूरे का पूरा टाइम-टेबल इस बात पर निर्भर रहता है कि आपकी गतिविधियाँ क्या होनी चाहिए? आपको अनुशासित कैसे होना चाहिए? आपको संयमी कैसे रहना चाहिए? आपको तपस्वी की तरह जीवनयापन कैसे करना चाहिए? ये जीवनयापन करने की पद्धति, दिनचर्या का प्रावधान ऐसा है, इसको आप ग्रहण कर लेते हैं तो भी (आपको) अपने आप को प्रशिक्षित करने में बहुत कुछ सफल होते हैं।

यहाँ का एक वातावरण भी है। सैनेटोरिमों का एक वातावरण भी होता है। इलाज तो कहीं भी कराये जा सकते हैं पर सैनेटोरियम जिसमें डाक्टर भी रहते हैं, वातावरण भी रहता है, क्लाइमेट भी रहता है वहाँ रहने से आदमी जल्दी अच्छे हो जाते हैं। सैनेटोरियम में रह करके जो फायदा उठाया जा सकता है वही प्राचीन काल के बच्चे गुरुकुलों में रह कर उठाते थे। बड़ी (उ) उमर के आदमी आरण्यकों में रहते थे। आरण्यक बड़े आदमियों (की) के लिए सेवा-साधना के विद्यालयों को कहते हैं। बुद्ध ने बहुत सारे संघाराम बनाये थे, विहार बनाये थे। उसमें लोक सेवा के लिए इच्छुक लोगों की शिक्षाओं का निवास करने का प्रबन्ध था। ये आरण्यक कहलाते थे, इनको बुद्ध विहार कहिए, आप आरण्यक कह लीजिए, नाम-शब्दों से क्या फर्क पड़ता है। ऐसे स्थान जहाँ कहीं भी हो वहाँ आदमी को अपनी आत्म साधना करनी पड़ती है। तीर्थ ये थोड़ी ही हैं, जहाँ का तहाँ, यहाँ खिलौना देखा एक पैसा फेंका, यहाँ खिलौना देखा एक पैसा फैंका, बस यहाँ से वहाँ, यहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ धक्के खाते फिरें और जहाँ-तहाँ, जहाँ-तहाँ जेब कटाते फिरें। इस बहाने, उस बहाने, साहब यहाँ दान कीजिए यहाँ फलाना कीजिए। ये तो भाईसाहब अज्ञानियों का जंजाल है। आप इस अज्ञानियों के जंजाल से दूर रह करके तीर्थ-यात्रा की गहराई तक जाने की कोशिश कीजिए। तीर्थ-यात्रा की गहराई ये है, कि आप (उ) उतने समय, जितने समय कि तीर्थ सेवन करें, उतने समय में अपने आपको परिशोधन के लिए कोशिश करें, भूतकाल के गड्ढे भरने की कोशिश करें, और भावी योजनाओं को बनाने की कोशिश करें। भविष्य में हम क्या बनेंगे, इसके लिए आज के वर्तमान में हमको तपश्चर्या करनी चाहिए। आज के वर्तमान की तपश्चर्या का मतलब है, भावी जीवन के लिए नीति निर्धारण करने का संकल्प। ऐसे करेंगे तो आपका तीर्थसेवन सशक्त हो जाएगा। आप यहाँ आए हैं तो आप ये मान के चलिए कि यहाँ कल्प साधना शिविर में बुड्ढे (को) जवान बनने के लिए नहीं, बल्कि आपका अन्तरंग परिष्कार करने के लिए आए हैं। इसलिए जितना भी समय है आप इसको स्वाध्याय में लगाइए, आत्म-चिन्तन में लगाइए, चिन्तन में लगाइए, मनन में लगाइए, पूजा में लगाइए, उपासना में लगाइए, और अच्छे लोगों के सम्पर्क में लगाइए, अच्छे वातावरण में रहने में लगाइए, गंगा के किनारे पे (जा) जा के रहिए। पूरे का पूरा समय आपका ऐसा हो जिसमें कहीं अवांछनीयता के लिए गुंजाइश न हो।

आपका चिन्तन ऐसा हो जिसमें अवांछनीयता के लिए कहीं गुंजाइश न हो। ऐसे हैं ये तीर्थ जो हमने बनाए हैं। मान्धाता की सहायता से जगतगुरु शंकराचार्य ने चार धाम बनाए थे, चार तीर्थ बनाए थे, वो शानदार तीर्थ बनाने के इच्छुक थे इसलिए उन्होंने शानदार ही बना डाले। भगवान बुद्ध ने बहुत सारे तीर्थ बनाए थे, कहाँ बनाए थे सारे भारत वर्ष में। बुद्धों के विहार, बुद्धों के विहार, संघाराम, बुद्धों के विहार, उन विहारों में शिक्षण, शिक्षण, साधना, शिक्षण, ये भरा रहता था। वो विहार थे, तीर्थ कहेंगे, बिल्कुल मैं कहूँगा तीर्थ। भगवान महावीर ने भी ऐसा ही किया था, उन्होंने समर्थ गुरु रामदास ने भी यही किया था।

समर्थ गुरु रामदास ने महाराष्ट्र के हर गाँव में, हर गाँव में दौरा किया था और वहाँ की उस समय की परिस्थिति के अनुसार से हनुमानजी के मन्दिर बना दिये थे। महावीर मन्दिर, पैसों का प्रबन्ध कहाँ हो सकता था? विचार शील बातों में कोई आदमी कहाँ पैसा खर्च कर सकता है? ठगिए आप लोग, जेबें काट लीजिए, बेवकूफों की कमी है क्या, कहीं कमी नहीं है। मालदार, मालदार उससे भी ज्यादा बेवकूफ होते हैं, गरीबों को चाहे तो आप गरीबों को बहका दीजिए, मालदार को बहकाने के तरीके अलग हैं। उन तरीकों को आप अख्तयार कर लीजिए, मालदारों को खूब बहकते हैं, मालदार कोई कम बहकते हैं क्या? गरीबों की जेब कटती है, वो इनकी जेब कटती है और मालदारों को उल्लू बनाया जाता है, मालदार और भी ज्यादा उल्लू बनते हैं। इसीलिए में उसकी बात नहीं कहता। किसकी बात, कि बड़े शानदार मन्दिर बनाना जरूरी है क्या? या बना सकते हैं क्या? समर्थ गुरु रामदास ने महावीर मन्दिर बनाए, कैसे बनाए? मिट्टी के (झोंपड़ो) मिट्टी के दीवारों के बने हुए, फूस के झोपड़ों के बने हुए। हनुमानजी की मूर्तियाँ, हनुमानजी की मूर्तियाँ उन्होंने गाँव में पड़े हुए पत्थर के टुकड़ों से स्थानीय कारीगरों के माध्यम से जैसे-तैसे बना लिए। कहीं उलटे कहीं पुलटे। उसमें क्या किया, उनको लिबास कहाँ से आया? पोशाक कहाँ से आये? शृंगार कहाँ से आये? उन्होंने सिन्दूर से उनको लपेट दिया, और सिन्दूर से उन पत्थरों को लपेट देने के बाद में हनुमानजी की मूर्ति बना दी, बालाजी की मूर्ति बना दी, बस मूर्तियाँ बन के तैयार हो गईं। तब फिर क्या हुआ उनका? वहाँ लोग पूजा तो करते थे, पर पूजा 'भी' करते थे, पूजा 'ही' नहीं करते थे। आज (आज) की खराबी ये है, आज हमारे मन्दिरों में केवल पूजा 'ही' होती है। होना ये चाहिए कि पूजा 'भी' हो, बाकी समय में कुछ (औ) और भी हो। समर्थ गुरु रामदास ने जगह ली, इस तरह का प्रबन्ध किया कि उन्होंने हर हर महावीर मन्दिर के साथ में एक व्यायामशाला अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रखी। स्वास्थ्य संवर्धन, साहस का संवर्धन, स्वास्थ्य का संवर्धन, सन्तुलन का संवर्धन, और (अ) अनुशासन का (प) परिपालन। इसके लिए उन्होंने हर जगह व्यायामशाला बनाई। व्यायामशालाएँ एक तरह की विद्यालय है इसमें की ये बातें सिखाई जाती हैं। फिर इसके बाद में हर (हर) महावीर मन्दिर के साथ-साथ में एक पाठशाला, जिसमें गाँव के बच्चे, बड़े आदमी, छोटे आदमी, औरतें, जो कोई भी, जिनको विद्या का शौक था, वो जाएँ और वहाँ के पुजारी से विद्या प्राप्त करें। स्वास्थ्य संरक्षण, विद्याअध्ययन और इसके अलावा रात्रि को कथाएँ थीं, कथाओं का अर्थ है प्राचीनकाल (के) ऐतिहासिक घटनाक्रमों को सुना कर के आज की समस्याओं का समाधान। कथा का मतलब ये नहीं है कि आप इधर की गपबाजी, उधर की गपबाजी, इधर की गपबाजी, श्री कृष्ण भगवान ने सोलह हजार एक सौ आठ से शादी कर ली, एक-एक के आठ-आठ बच्चे पैदा कर लिए, बेकार की बातें, बे सिलसिले की बातें, बेकार की बातें, बे सिलसिले की बातें, न इनका कुछ माने ही है, न कोई मतलब है, न इन शिक्षाओं का आज कोई उपयोगिता है न प्राचीन काल में उपयोगिता थी। आप कथाएँ इन्हीं को कहते हैं, शंकरजी ने गणेशजी का सिर काट डाला और हाथी का चिपका दिया। भई क्या मतलब है? बेकार की बातें, बेकार की बातें। पुराण पढ़ते हैं, सत्संग करते हैं, ये न पुराण है न ये सत्संग है, न ये कथा है। कथा के पीछे उद्देश्य होना चाहिए और लक्ष्य होना चाहिए। प्राचीन काल में समर्थ गुरु रामदास ने दास बोध की कथाएँ, दास बोध इसी ने बनाया था। प्राचीनकाल में क्या सुनाया जाता था उसमें इतना कूढ़ा करकट, इतना जाल जंजाल भर गया है कि इनको सुनाना मुश्किल पड़ गया। इसीलिए दास बोध की कथाएँ हर महावीर मन्दिर में रात को होती थीं। (उ) उनको एक नया ही शास्त्र बनाना पड़ा, नया ही पुराण बनाना पड़ा, नया ही वेद बनाना पड़ा।

क्या करते बिचारे, उस कूड़े कचरे में से क्या चीज पल्ले पड़ती। आज आपको इस कूड़े-कचरे में से क्या चीज पल्ले पड़ने वाली है कुछ भी तो नहीं है सिवाय आफत पैदा करने के और दिमाग खराब करने के और पुरानी गपबाजियाँ खड़ी करने के, अपना समय और दूसरों का समय खराब कराने के, क्या है कथा? इसलिए कथा इन्होंने बनाई तो सही, कथा की परम्परा को जिन्दा रखा तो सही, ऐसी शानदार ढंग से कथा बनाई की मजा आ गया। शिवाजी की सारी की सारी सेना को समर्थन वहीं से मिला, हथियार वहीं से मिले, अनाज वहीं से मिला और आजादी की लड़ाई महावीर मन्दिरों से भी लड़ी गई। आपको इसी तरीके से पुनरावृत्ति आज हुई है। हमने दो धाम पहले बनाए थे - (मथुरा का धाम बनाया) मथुरा का धाम बनाया, और एक यहाँ का बनाया। एक संगठन के लिए बनाया, एक शिक्षण के लिए बनाया। (हरिद्वार) मथुरा का और यहाँ का, दोनों को शिक्षण का बनाया और शिक्षण को देने के बाद में फिर क्या किया, फिर हमने दूसरे भी बनाए तीर्थ। जगत गुरु शंकराचार्य ने चार तीर्थ बनाए थे, महावीर भगवान समर्थ गुरु रामदास ने सारे महाराष्ट्र में दो हजार के करीब मन्दिर बनाये थे।

आज हमारे भी मन्दिरों की बहुत बड़ी संख्या है - बनती हुई चली जा रही है। गायत्री शक्तिपीठों के नाम से चौबीस सौ मन्दिर बना दिए। अभी और भी बहुत सारे मन्दिर (बनाने) बनने जा रहे हैं। इनको कोशिश हमारी यही थी कि इनको गायत्री तीर्थों का रूप दिया जाए। और तीर्थों में मन्दिर नहीं, बल्कि वहाँ (इसके) शिक्षण संस्थाओं का रूप दिया जाए। वहाँ शिक्षण संस्थाएँ चलें, (ज्ञान) ज्ञान वृद्धि के उपदेश चलें, (रच) रचनात्मक कार्यक्रमों का उपयोग चलें। ठीक उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए यहाँ हमारा स्थानीय यही है गायत्री तीर्थ, आप ऐसे तीर्थों को मजबूत बनाने के लिए कोशिश कीजिए। तीर्थ यात्रा करें ये तो बहुत अच्छी बात है, तीर्थ यात्रा में आपको समय लगाना चाहिए बहुत अच्छी बात है पर मैं ये पूछता हूँ जब तीर्थ नहीं हैं तो आप कहाँ जाएँगे फिर आप। कहाँ हैं तीर्थ आपको कहीं दिखाई पड़ते हैं क्या? मुझे तो कहीं भी दिखाई नहीं पड़ते। सैरगाह, सैरगाह दिखाई पड़ते हैं, पुरानी, ऐतिहासिक घटनाएँ जरूर जहाँ-तहाँ से जुड़ी हुई हैं पर वहाँ कहीं जीवन्त तो दिखाई ही नहीं पड़ता। कईं ऐसे तीर्थ दिखाई भी नहीं पड़ते, कहीं आरण्यक दिखाई भी नहीं पड़ते, कहीं गुरुकुल दिखाई भी नहीं पड़ते, कहीं लोगों को साधना कराने वाले, और साधना का मार्गदर्शन करने वाले और परामर्श देने वाले सत्र और ऐसे आरण्यक कहीं दिखाई भी नहीं पड़ते।

इसलिए आपको एक काम और भी करना है जहाँ तीर्थ यात्रा करनी है, वहाँ तीर्थों की स्थापना करने में भी योगदान देना है। तीर्थ यात्रा, तीर्थों की मरी हुई परम्परा को पुनर्जीवित भी करना है। कोई आदमी आये और ये तलाश करे कैसे होते थे तीर्थ, तो आप कहीं दिखा तो सकें, कहाँ हैं तीर्थ। कहीं नहीं हैं, कहीं नहीं हैं, तीर्थ कहीं नहीं हैं। तीर्थों की जगह पर सब जगह बड़े-बड़े विशालकाय मन्दिर बने हुए पड़े हैं, बड़े-बड़े पेट वाले लोग उनके माध्यम से अपना पेट भरते रहते हैं और गुजारा करते रहते हैं। तीर्थों के वातावरण, तीर्थों के गुण, तीर्थों के कर्म, तीर्थों के उद्देश्य, तीर्थों के लक्षण सब ऐसे गायब हो गये जाने कौन हैं, बस डुबकी लगाइए, खिलौना देखिए, पैसा चढ़ाइए, पैसा चढ़ाइए, डुबकी लगाइए, मन्दिर देखिये, पैसा चढ़ाइये, इसके अलावा भी कुछ होता है तीर्थ, नहीं भाई साहब ये तो बिलकुल उपक्रम है। असली बात तीर्थ की अलग होती है, जिसमें ज्ञान गंगा बहती है, जहाँ प्रेरणा मिलती है, जहाँ दिशा मिलती है, जहाँ भावनाओं को उकसाया जाता है, आदमी को समुन्नत स्तर का बनाया जाता है। ऐसे तीर्थों की स्थापना की आज नई सिरे से जरूरत पड़ गई है, तीर्थों का पुनर्जीवन आवश्यक पड़ गया है। इसीलिए हमने तीर्थों की स्थापना की है। स्थापना की है, आप इन तीर्थों की स्थापना में योगदान दीजिए। जहाँ बन चुके हैं, आप उनको मजबूत बनाने (में) कोशिश कीजिए। जहाँ बन नहीं चुके हैं, वहाँ बनाने के लिए कोशिश कीजिए। जहाँ बन गये हैं और बनाये जाएँगे उनको एक बात ध्यान रखिए कि यहाँ वो प्रक्रियाएँ जुड़ी रहनी चाहिए, (जो) जो पूजा (उस) से भिन्न हैं - यहाँ, इन सारे के सारे गायत्री तीर्थों में हमने शिक्षण का प्रबन्ध करने के लिए प्रावधान रखा है - यहाँ बच्चों की पाठशाला, बुड्ढों की पाठशाला, प्रौढ़ों की पाठशाला, महिलाओं की पाठशाला चलनी चाहिए। यहाँ आसन और प्राणायाम के केन्द्र होने चाहिए, यहाँ जड़ी-बूटियों के द्वारा चिकित्सालय चलने चाहिए, यहाँ रात्रि को कथाएँ होनी चाहिए - ये सारे काम होने चाहिए - तब तो हम ये कहेंगे कि ये तीर्थ - गायत्री मन्दिर कहिए, तीर्थ कहिए, बात तो एक ही है - ये बनना चालू हो गए। आप (तीर्थ यात्रा को) न केवल तीर्थ यात्रा पर निकलें, बल्कि नए आदमियों के लिए ये रास्ता भी बनाएँ - तीर्थ यात्रा के लिए कोई आदमी जाने वाला हो (त) (ये तो) उसको ये तो मौका मिल (जाए) - तीर्थ कहाँ हैं? किस जगह जाएँ? किसके पास जाएँ? क्या करें वहाँ जा कर के? क्या करें?

सैरगाहों में क्या करेंगे? सैरगाहों में कितने आदमी आते हैं आप ने देखे नहीं, विदेशों में भी जाते हैं, घूमक्कड़ लोग जाते हैं, कोई नैनीताल जाता है, कोई कहाँ जाता है, कोई दार्जीलिंग जाता है, कोई आगरा का किला देखने जाता है, कोई दिल्ली की सैर करने जाता है, कोई बम्बई जाता है आप भी चले जाइए, कईं धामों में चले जाइए, दोनों में फर्क कुछ फर्क नहीं है। इसीलिए फर्क करने वाले तीर्थ तो बनाने पड़ेंगे, इनको नव जीवन देना पड़ेगा, (इसको) नए प्राण संचार करने पड़ेंगे - हमने इसके लिए कदम बढ़ाया है। आप हमारा कन्धा मिलाइए, आप हमारे हाथ में हाथ मिलाइए, आप हमारे कदम से कदम मिलाइए - थोड़ा सा प्रयत्न किया है - आप इसमें सहयोग कर सकते हैं? आप जरूर कर सकते हैं। आप मान्धाता तो नहीं हैं लेकिन इसके बनाने में कुछ तो कर सकते हैं, आप इसके निर्माण में योगदान किसी तरीके से तो दे सकते हैं। अपने पास कोई धन न हो तो पड़ोसी से धन माँग सकते हैं, पड़ोसी से भी धन ले करके आप इसमें लगवा सकते हैं। तीर्थों के नए युग की न केवल तीर्थ यात्रा प्रायश्चितों के लिए करनी आपको जरूरी है, बल्कि तीर्थों का पुनर्जीवन उससे भी ज्यादा जरूरी है। आप (लोगों) दूसरे लोगों को तीर्थ यात्रा करने के लिए ऐसे मौके दें, स्थान बनाएँ, यहाँ का वातावरण बनाएँ - आपको ये काम बहुत बड़ा करना है।

आप मान्धाता की तरीके से तीर्थों की स्थापना करने के लिए कुछ कर सकें तो जरूर करें। आप अहिल्याबाई की तरीके से तीर्थों का उद्धार करने के लिए फिर से कुछ कर सकते हों तो अपने ढंग से करें। उन्होंने अहिल्याबाई ने मन्दिरों के जीर्णोद्धार कराए थे, अब इनके भी जीर्णोद्धार कराने हैं। जीवनोद्धार तो क्या मैं तो ये कहता हूँ इन मरों को जिन्दा करना है। उन्होंने कम से कम वो तो था जीर्ण, अब यहाँ जीर्ण भी नहीं है, खण्डहर भी नहीं है, खण्डहरों की तरीके से थोड़े से नाम-निशान पड़े हुए हैं। यहाँ कभी तीर्थ रहे होंगे, आप तीर्थ जो रह रहे हैं उनको जीवन्त करने के लिए कुछ प्रयत्न कीजिए और उसको अपने प्रायश्चित में शुमार कर लीजिए।

आप प्रायश्चित में शुमार करने के लिए जहाँ अब तक गायत्री शक्तिपीठें बन गई हैं उसमें एक काम की बहुत कमी है - वहाँ ऐसे प्राणवान परिव्राजक नहीं हैं जो वहाँ रहें और सारे वातावरण को हिला दें, सारे वातावरण को जगा दें। बड़ी मुश्किल से कहीं पण्डा मिल गया, कहीं पुजारी मिल गया, कहीं आरती करने वाला मिल गया, कहीं नौकर मिल गया, कहीं कर्मचारी मिल गया, कहीं झाड़ू लगाने वाला मिल गया बस इनसे बिचारे जैसे-तैसे काम चला रहे हैं। ऐसे प्राणवान परिव्राजकों का घोर अभाव है जो वहाँ रहें, और अपनी निष्ठा के, और अपनी सेवा भावना के आधार पर उस सारे क्षेत्र को जगा दें, और सारे क्षेत्र का वातावरण ऐसे बना दें जैसे कि तीर्थों का होना चाहिए। तीर्थों का वातावरण होता है। तीर्थों में जो कोई भी जाता है, उस ढाँचे में ढलने लगता है। वहाँ एक वातावरण बनता है।

वातावरण बनाना नौकरों का काम नहीं है, कर्मचारियों का काम नहीं है, पुजारियों का काम नहीं है - प्राणवानों का काम है। आप प्राणवान मालूम पड़ते हैं। यहाँ इस कायाकल्प चिकित्सा में आप कल्पसाधना में आये हुये हैं, प्राणवान न होते तो आप क्यों आ पाते, कष्ट क्यों उठाने पड़ते। हर आदमी तो माल मारने के लिए भगवान जी के मन्दिरों में फोकट का प्रसाद पाने के लिए घूमता रहता है। त्याग कौन करता है? भूखा कौन रहता है? अपना घर का काम कौन छोड़ता है? आपके अन्दर वो शराफत मालुम पड़ती है, और वो जिन्दगी मालुम पड़ती है, जिससे कि आध्यात्मिकता का परिचय मालुम पड़ता है। अगर ये बात सही हो तो आप अगला वाला समयदान देने के लिए एक ही स्थान चुनना चाहिए। परिव्राजक के अलावा, घूम-घूम के प्रचार करने के अलावा एक तरीका ये भी है कि आप किसी समीपवर्ती शक्तिपीठ में जा करके बैठ जायें, कुछ समय तक निवास करें, और निवास करने के बाद में अपने जीवन को न केवल परिष्कृत करें, बल्कि उस क्षेत्र को जगा देने की सेवा साधना में भी संलग्न हो जाएँ - ये भी आपका बढ़िया वाला प्रायश्चित है। बहुत बढ़िया वाला प्रायश्चित है। आप किसी शक्तिपीठ में कुछ समय रहने के लिए आप कार्यक्रम बना करके जाएँ, तो मैं बराबर ये कहूँगा कि आपने तीर्थ यात्रा का मर्म समझ लिया। और उसको करने के लिए तैयारी के लिए कदम बढ़ा लिया, दो काम ये कीजिए।

और क्या करें और आप ये कीजिए तीर्थों का हमको पुनर्जीवन करना है। तीर्थ हमारे सूने पड़े हुए हैं। (तीर्थ) तीर्थों को (ह) देश और विदेशों में स्थापना करने के लिए हमारा बड़ा मन है - आप हमारा हाथ बँटा दीजिए। हाथ बँटा देंगे तो आपके सहयोग से हम इतना बड़ा काम कर सकेंगे तीर्थों का पुण्य जैसा कि धर्म ग्रन्थों में लिखा हुआ है वास्तव में ऐसे ही हो जाए। वहाँ आ करके (लोग) सच्चे अर्थों में लोग प्रायश्चित कर सकें। ऐसे तीर्थों का बनाना आज की बहुत ज्यादा जरूरत है, आप इसको दोनों ही तरीके से कर सकते हैं। जो उसमें तीर्थों में दान-पुण्य की भी परम्परा है, क्षति पूर्ति के लिए आर्थिक सहयोग की भी परम्परा है, ब्राह्मण भोजन की भी परम्परा है, पहले लोग गंगाजी जाते थे, तीर्थ यात्रा आते थे, घर लौटने पर जप कराते थे, कथा कराते थे, भागवत कराते थे, ब्रह्म भोजन कराते थे, दान भी करते थे, तीर्थों में भी दान करते थे, घर आकर भी दान करते थे। वास्तव में समयदान का दूसरा रूप है अर्थ-दान। (समयदान) समयदान जो आदमी नहीं कर सकते, वो अर्थ-दान कर सकते हैं। समयदान और अर्थ-दान दोनों सम्भव हो सकें तो क्या कहना। लेकिन नहीं है अपने समय के बदले में आप दूसरे आदमियों का समय खरीद करके भी ऐसा कर सकते हैं। आप नहीं करना चाहते या नहीं कर सकते तो मत कीजिए आपके स्थान पर कोई और आदमी काम कर देगा, आप उसके गुजारे का प्रबन्ध कर दीजिए - गुजारे का प्रबन्ध आप कर देते हैं तो अपने काम करने के बराबर बात बन गई। अपने यहाँ (गायत्री) गायत्री परिवार में ऐसे हजारों-लाखों लोग हैं जो सेवा करने के बड़े इच्छुक हैं पर क्या कर सकते हैं? घर की गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ ऐसी हैं इनको कुछ दिये बिना और अपना शरीर का निर्वाह दिये बिना, कपड़ा दिये बिना काम चलता नहीं है। कपड़ा अपने घर से ले आएँ, खाना अपने घर से ले आएँ, बच्चों का प्रबन्ध अपने घर से कर आयें, ऐसे आदमी हो तो सकते हैं पर बहुत कम हैं। अधिकांश लोग ऐसे हैं जिनको खर्च तो चाहिए, पेट भरने को चाहिए, पेट भरने को चाहिए, इस तरीके से जो समाजसेवी - लोकसेवियों की कितनी बड़ी संख्या सिर्फ इसलिए रुकी हुई पड़ी है, इनका हम गुजारे का प्रबन्ध न कर सके, रोटी का प्रबन्ध न कर सके, कपड़े पहनाने के साधन हमारे पास नहीं हैं और जिनको बहुत जरूरत पड़ रही है उनके बच्चों के लिए नमक-रोटी का इन्तजाम करने में हम समर्थ नहीं हो सके, इसके लिए हजारों-लाखों कार्यकर्ता जो आज समाज का नए उत्थान के लिए आवश्यक थे, उन ब्राह्मणों के लिए रोटी आज हमारे पास नहीं है।......अपने खर्चे में से कटौती करके ये दान भी कर सकते हैं। ये प्रायश्चित के तरीके हैं। तीर्थयात्रा में डुबकी मारना ही नहीं है, जप करना ही नहीं है, पंचामृत पीना ही नहीं है, मन्दिरों के दर्शन करना ही नहीं है पर असली बात भी तो सोचिए। बिल्ली के गले में घंटी भी तो बाँधिए। वास्तविकता के नजदीक तो आइए। आप कुछ त्याग भी तो कीजिए। सेवा की बात भी तो सोचिए। मन से तो उदार बनिए। कुछ कष्ट भी तो उठाइए। कुछ मेहनत भी तो कीजिए। कुछ त्याग करके तो दिखाइए। नहीं साहब पंचामृत पिएँगें, पंचामृत पिएँगें, पंचामृत ही पिएँगें, अपना पंचामृत पिएँगें, एकादशी का उपवास करेंगे, गंगाजी में डुबकी मारेंगे, प्रायश्चित करने के लिए जेब काट लाइए, डाका डालिए, प्रायश्चित करेंगे। ये प्रायश्चित करेंगे। ऐसे प्रायश्चित होते हैं। खामियाना चुकाइए। खामियाना को चुकाने के लिए (तीर्थ) सबसे अच्छे मायने में तीर्थयात्रा के लिए मैंने आपसे निवेदन किया, आप गाँव-गाँव घूम करके पदयात्रा कर सकते हैं। आप अपने घर छोड़कर कुछ समय तक किसी शक्तिपीठ में गायत्री प्रज्ञापीठ में आप निवास कर सकते हैं। ……….. समाप्त॥

॥ॐ शान्तिः॥