तीर्थ यात्रा का उद्देश्य
आपको ये बताया गया, आपको पापों का प्रायश्चित करना चाहिए। कैसे करें प्रायश्चित? आपको मालूम है हम कुछ घटनाएँ सुनाते हैं आपको। आम्रपाली ने प्रायश्चित किया, आम्रपाली ने सैकड़ों आदमियों की जिन्दगी खराब कीं, कुमार्ग पर चलाया, बहुत सारा धन कमाया और उस पाप से निजात पाने के लिए भगवान बुद्ध की शरण में गई और भगवान बुद्ध ने शरण में तो ले लिया, मंत्र तो दे दिया लेकिन साथ-साथ में ये भी कहा पिछले जो गुनाह हैं उसकी भरपाई करनी ही पड़ेगी। उसके बिना आध्यत्मिक उन्नति का केवल मंत्र लेने से रास्ता थोड़े ही खुलेगा। आम्रपाली ने कहा ठीक है, कि मैंने जो कुछ भी गुनाह किये हैं, उस गुनाह के केवल दो तरीके के केसेज (ज्यादा) बहुत हुए। जो कुछ भी पैसा मेरे पास इस अनीति का कमाया हुआ है ये सारे के सारे पैसे को मैं दुनिया में ज्ञान की सम्वर्धन करने के लिए खर्च कर दूँगी। उसके पास करोड़ों रूपए की सम्पत्ति थी वो ला करके भगवान के बुद्ध के चरणों में रखी और ये कहा जिस तरीके से मैंने अनेकों को गुमराह किया है, आप अनेकों को अच्छे मार्ग पर लगा देने के लिए इस पैसे को खर्च कर डालिए। बस ऐसा ही हुआ। भगवान बुद्ध ने आम्रपाली की करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति से बुद्ध विहार बना दिये। धर्म प्रर्चारकों के शिक्षण का प्रबन्ध कर दिया बस। उससे एक तरीके से जो अनीति का धन था वो सन्मार्ग पर लग गया। प्रायश्चित का एक सही और ईमानदारी का तरीका।
यही तरीका एक और ने भी किया, किनने किया? दूसरे का नाम था अंगुलिमाल, अंगुलिमाल ने अपनी जिन्दगी में बहुत हत्याएँ की थीं, कितनों के कतल किये थे और कतल करने के बाद में बहुत सारा धन कमा लिया, बहुत धन था उसके पास। भगवान बुद्ध का शिष्य होने के लिये आया, मन्त्र माँगने के लिये आया तो उन्होंने भगवान ने मजाक में ये कहा - अच्छा, आप तो मंत्र जप कर के स्वर्ग को जाने की फिराक में फिरते मालुम पड़ते हैं। हाँ साहब, हमने सुना है कि कोई मंत्र जप कर लेता है, राम नाम ले लेता है, तो बैकुण्ठ को जाता है। भगवान (बहुत) बहुत हँसे। उन्होंने कहा जिस आदमी ने आपको ऐसी सलाह दी है, वो बड़ा पागल आदमी मालुम पड़ता है, और आपने ऐसे विश्वास कर लिया, आप उससे भी ज्यादा पागल मालुम पड़ते हैं। आप राम नाम का जप करने से, या किसी शब्द का उच्चारण करने से, अथवा देवी-देवता की नाक रगड़ने से, अथवा किसी क्रिया-कृत्य को पूरा करने से आध्यात्मिकता का लक्ष्य प्राप्त करने में कभी समर्थ नहीं हो सकते। आप ऐसे कीजिए, जो गल्तियाँ की हैं उनको बराबर कीजिए, खाइयों को पाटिए। क्या खाईं पाटें। जो आपने धन कमाया है अनीति से, उसे खर्च कर डालिए। बस उन्होंने ऐसा ही किया, उन्होंने किया। अंगुलिमाल के पास भी बहुत सम्पत्ति थी, करोड़ों रुपये की सम्पत्ति थी उसको भी ऐसे ही खर्च ऐसे ही किया गया। भगवान बुद्ध ने सारे संसार भर में, सारे संसार भर की भाषा में उन्होंने उनकी भाषाओं में बौद्ध धर्म के ग्रन्थों का अनुवाद कराने और उन ग्रन्थों को बाहर नावों में रख-रख करके देश-विदेश में भेजने के लिए उपक्रम किया और अंगुलिमाल का सारा धन इसमें खर्च हो गया। धन खर्च हो गया और धन के अलावा भी तो कुछ किया था न, हाँ और क्या किया था उनका ईमान खराब किया था, चरित्र खराब किया था न, दुखों और दर्दों की आग में ढकेल दिया था न, कितने आदमियों का कतल करने के बाद में कितनी आत्माओं ने चीत्कार किया होगा वो, पैसा ही तो चुका दिया, और वो उसका क्या हुआ?
आम्रपाली ने अपने भावी जीवन को भूत काल की खाई को पाटने के लिए समर्पित कर दिया, वो सन्त हो गई। सन्त हो गई और संघमित्रा की तरीके से सारे एशिया में, और सारे हिन्दुस्तान में गाँव-गाँव घूमती फिरी, ज्ञान की शिक्षा देने के लिए, सत्कर्म की शिक्षा देने के लिए। इस तरीके से उन्होंने न केवल अपने धन को उत्सर्ग कर दिया बल्कि अपने समय को और पसीने को भी इसी में खर्च कर दिया। जो उत्साह उन्होंने बुरे कर्म करने में, गन्दगी गन्दी जीवन जीने में लगाया था वही उत्साह उन्होंने भावी जीवन को पुनीत और पवित्र बनाने के लिए खर्च करने में भी इकट्ठा कर लिया। जो काम उन्होंने जो श्रम और समय उन्होंने पाप कमाने के लिए खर्च किया था वो ही श्रम और समय उन्होंने पुण्य कमाने के लिए खर्च कर दिया। मैंने बताया न आपको आम्रपाली का जीवन, जा के पढ़िये। कितना शानदार, कैसा शानदार बुरे कर्मों का जीवन और कितना शानदार अच्छे कर्मों का जीवन। न केवल उन्होंने पूजा-पाठ किया, बल्कि उन्होंने अपने शरीर के श्रम के द्वारा समाज में सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने के लिए घनघोर तप किया, और पूरी-पूरी मेहनत से काम लिया। जो उनके पास संग्रह था, उसको भी उन्होंने खर्च कर डाला। खर्च कर डाला। प्रायश्चित ये हो गया, आम्रपाली सच्चे अर्थों में सन्त हो गई।
अंगुलिमाल को भी ये करना पड़ा, अंगुलिमाल के पास जो कमाया हुआ था वो तो उन्होंने खर्च कर ही दिया, बौद्ध धर्म के ग्रन्थों को सारे विश्व की भाषा में अनुवाद कराने के लिए, पर धन से ही थोड़े ही काम चलता है, धन ही धन थोड़े ही अर्पण किया था। उन्होंने कितनी आत्मा को दुखाया भी तो था, कितनों को कुमार्ग के रास्ते पर धकेला भी तो था। उसका प्रायश्चित ये हो सकता था कि अपना समय और श्रम बचे हुये जीवन का उसी काम में खर्च कर दें। वैसा ही हुआ, वैसा ही हुआ। अंगुलिमाल भी एक सन्त हो गये और सन्त हो करके सारे संसार भर में सारे संसार भर में काम करते रहे और चलते रहे, बराबर ये हुआ।
ये प्रायश्चित के यही तरीके हैं। इससे कम में कोई प्रायश्चित का तरीका नहीं हो सकता। इससे आप अपना समय दान नहीं दें, अंश दान नहीं दें, क्षति पूर्ति न करें तो फिर क्या हुआ, ये प्रायश्चित का मखौल हुआ, दिल्लगी बाजी हुई, और विधि की व्यवस्था के साथ में उपहास हुआ। भगवान के यहाँ कोई नियम नहीं है, पाप करने वाले अगर हाथ-पाँव जोड़ेंगे, नाक रगड़ेंगे, पूजा करेंगे, पंचामृत पीयेंगे तो क्षमा हो जाएँगे। भगवान की दुनिया में नियम क्या रहा, व्यवस्था कहाँ रही, ऐसी ही लोग कर लिया करेंगे, पाप कर लिया करेंगे और बस प्रार्थना-पूजा कर लिया करेंगे, पंचद्रव्य पी लिया करेंगे, डुबकी मार लिया करेंगे, फिर पापों का दण्ड तो कुछ रहेगा ही नहीं, संसार की व्यवस्था को कौन कायम रखेगा। आप ऐसा मत सोचिए। केवल मात्र आपको ये सोचना चाहिए कि हमको उसको उसके लिए करना है। चान्द्रायण व्रत जिसका लगभग आप यहाँ काम कर रहे हैं ये चान्द्रायण व्रत का एक ढंग है - जो आप को कराया गया है, कल्प साधना। चान्द्रायण में भी अन्न को कम करना पड़ता था, आहार को कम करना पड़ता था, भोजन पे नियंत्रण करना पड़ता था, स्वाद की रोकथाम करनी पड़ती थी - वही आपको करनी पड़ी है - दोनों एक ही बात (हैं)। इसीलिए आपको ये प्रायश्चित करने के साथ-साथ में तितीक्षा करने के साथ-साथ में अब एक नया काम शुरू कर देना चाहिए - क्या शुरू कर देना चाहिए? पापों का प्रायश्चित - समयदान। समयदान के लिए क्या करना चाहिए? समयदान के लिए (क्या) क्या करना चाहिए? अच्छा - इस विषय में एक पुरानी, बहुत शानदार परम्परा है - तीर्थ यात्रा करनी चाहिए। पापों के लिए तीर्थ यात्रा, तीर्थ यात्रा, तीर्थ यात्रा, तीर्थ यात्रा, आप देख लीजिए कहीं भी प्रायश्चितों में आप पता लगा लीजिए तीर्थ यात्रा करनी चाहिए।
ये तीर्थ यात्रा क्या होती है? तीर्थ यात्रा कहते हैं - धर्म प्रचार की पद यात्रा - धर्म प्रचार की पद यात्रा। तीर्थ यात्रा - इसका अर्थ ये है - गाँव-गाँव घूमना, जगह-जगह जाना, लोगों को अच्छे (उ) उपदेश करना। प्राचीन काल में गऊ हत्याएँ जब हो जाती थीं तो लोग गाय की पूँछ लाठी से बाँध के गाँव-गाँव घूमते थे मुँह ढककर के और ये कहते थे हमसे गाय की हत्या हुई है और हम कलंकी हैं, कलंक लग गया है, अपने पापों को गाँव-गाँव बताते थे लेकिन साथ-साथ में लोगों को ये भी कहते थे हमने गलती की है आप में से ऐसे कोई न करना, हमने गलती के साथ में गुस्से में आ करके गाय के साथ हमला किया और उसको मार डाला, आप ऐसे न करना। ये उपदेश भी करता था और अपनी गलती को बताता भी था।
आपको ये ही करना चाहिए, आपको हर जगह जा करके तीर्थ यात्रा के रूप में पद यात्रा करनी चाहिए। पद यात्रा के रूप में गाँव-गाँव घूमिये, पद यात्रा का एक रूप तीर्थ यात्रा का एक रूप अभी भी विद्यमान है। आपकी तरफ क्या रिवाज है मुझे ठीक से मालूम नहीं लेकिन अपने यहाँ यूपी में ऐसा रिवाज है कि शिवरात्रि के समय पर लोग गंगा जल चढ़ाने के लिए लाते हैं गंगाजी से, और अपने यहाँ के आस-पास के किसी देवालय पर उसको चढ़ाते हैं। काँवर रख कर लाते हैं, कन्धे पर काँवर लाते हैं काँवर ला करके चलने वाले रास्ते भर अच्छे गीत गाते जाते हैं, अच्छे दोहे सुनाते जाते हैं, रास्तागीरों को हर बार शिक्षा देते जाते हैं। जहाँ जाते हैं चुपचाप नहीं निकलते वो। जहाँ भी रास्तागीर मिलते हैं जहाँ भी लोग गाँव में प्रवेश करते हैं, वहाँ अच्छे दोहे, ज्ञान के दोहे, भक्ति के दोहे, वैराग्य के दोहे, कर्तव्य पालन के दोहे सुनाते चलते हैं। इसलिए उनका धर्मोपदेश भी साथ-साथ चलता रहता है, पद-यात्रा भी चलती रहती है, जन सम्पर्क का कार्य भी होता रहता है। जन सम्पर्क - एक, पद-यात्रा - दो, धर्म प्रचार - तीन - इन तीन बातों को मिला दें, तो आपकी सच्चे अर्थों में (ती) तीर्थ-यात्रा हो जाएगी।
और ये इस समय भाई साहब, इस समय वाली का मैं क्या कहूँ आपसे। ये तो अब भगदड़ है, ये पर्यटन है खाली, पर्यटन है, पर्यटन के लिए देश-विदेशों में लोग घूमने जाते हैं, घुमक्कड़ लोग इसको देखते हैं, ये देखने जाते हैं - दर्शन करना कहाँ आता है? दर्शन करने की बुद्धि कहाँ है? केवल देखने जाते हैं। बद्रीनाथ का खिलौना, जगन्नाथ का खिलौना, फलाने जगह का खिलौना। मन्दिरों में रखे हुए जगह-जगह के खिलौने देखने जाते हैं - दर्शन इनको कहाँ आता है? फिलॉसफी इनको कहाँ आती है? देखने की दृष्टि कहाँ है? दर्शन के लिए दृष्टि चाहिए। दिव्य-दृष्टि दी थी श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को। अर्जुन कहता था हमको भगवान का रूप दिखा दीजिए तो उन्होंने कहा पहले दृष्टि तो ला, देख काये से लेगा। नहीं साहब हम देख लें, हम हैं तो सही भगवान, देख ले। नहीं साहब आप नहीं हैं, हम तो भगवान देखना चाहते हैं तो फिर दृष्टि निकाल। दृष्टि से दर्शन होता है, जिनके पास दृष्टि जो नहीं है उनको घुमक्कड़ कह सकते हैं हम, घुमक्कड़ हैं, घुमक्कड़ से क्या फायदा है। ठीक है इतना, ये मनोरंजन है, यहाँ-वहाँ नहीं गये कलकत्ता-बम्बई नहीं गये, बद्रीनाथ हो आये, कोई फर्क नहीं, बिल्कुल फर्क नहीं, एक रत्ती भर फर्क नहीं। दोनों की घूमने की, फिरने की ये आवश्यकता, उत्सुकता पूरी होती है, स्वयं की होती है, तीर्थ यात्रा का पुण्य कैसे मिलने वाला है। तीर्थ यात्रा के पीछे तो उद्देश्य जुड़ा हुआ है, क्रिया जुड़ी हुई है। क्रिया का अर्थ ये है कि आपको धर्म प्रचार की पद यात्रा में संलग्न होना चाहिए। धर्म प्रचार की पद यात्रा में अगर संलग्न हैं तो आपकी तीर्थ यात्रा मानी जाएगी। प्राचीन काल के ऋषि ये ही करते थे। घर-घर अलख जगाते थे, अलख क्या? अलख ऐसे कहते थे, घर-घर दरवाजे पर खड़े होते थे और गीत गाते थे, एक आदमी हो तो एक, नहीं तो दो हों तो दो। अलख जगाना कहते हैं, हर आदमी जो घर के निवासी थे दरवाजे पे निकल कर बाहर आते थे उनकी बात महात्मा जी की सुनते थे, गाना हो तो क्या, उपदेश हो तो क्या, अलख जगाना कहते हैं। घर-घर जाना, सम्पर्क बनाना, घर-घर जाना, आपके पास आयेंगे, आपके पास नहीं आ सकते लोग। बादलों के पास खेत कैसे आ पाएँगे - बताइए? खेतों में इतनी सामर्थ होती, तो फिर आप (क्यों) क्यों किसी का इन्तजार करते?
बादलों को ही आना पड़ेगा। घर-घर आपको ही जाना पड़ेगा - आपके पास नहीं आएँगे। दुर्घटना से घिरे हुए आदमी किस तरीके से आपके पास आएँ, जरा आप बताइए तो सही। किसी की टाँग टूट गई है, एक्सीडैंट हो गया है, आइये साहब हमारे यहाँ आइये और प्रार्थना पत्र लिखिये और हमसे अर्जी कीजिए तब हम आपकी सहायता करेंगे। इतनी हैसियत होती तो बेचारा टाँग टूटा हुआ क्यों होता? फिर तो घुड़सवार न होता। घुड़सवार नहीं है, टाँग टूटा हुआ आदमी, वो चल नहीं सकता, इसलिए आपको ही जाना पड़ेगा। बाढ़ आती हैं, दुर्घटनाएँ होती हैं, और कोई मुसीबत आती हैं, भूकम्प आते हैं, महामारी फैल जाती है, तो सेवाभावी लोग ये इंतजार नहीं करते कि वो लोग, दुखी लोग, हमारे पास आएँ, और अर्जी दें, और हमसे प्रार्थना करें - ना - आपको ही भाग के जाना पड़ेगा, और दौड़ना चाहिए। हवा अपने आप भाग करके यहाँ पहुँचती है हर आदमी की नाक में घुस जाने के लिए, सूरज की रोशनी हर आदमी के पास अपने आप चली जाती है, अपने आप चले जाने के बाद में उसको गरमी दे करके आती है, रोशनी दे करके आती है। आपको सूरज की तरीके से, हवा की तरीके से, और बादलों की तरीके से, उन सभी जगह पे जाना चाहिए जहाँ ज्ञान की आवश्यकता है। पिछड़े हुए आदमियों को भी जरूरत है और प्रगतिशीलों को उससे भी ज्यादा जरूरत है। पिछड़े आदमी एक ढंग के बेहूदे और पढ़े हुए आदमी दूसरे ढंग के बेहूदे, इनमें-उनमें कोई खास फरक नहीं है। चरित्र की दृष्टि से, चिन्तन की दृष्टि से, नीति के दृष्टि से, आदर्शों की दृष्टि से सारी समाज लगभग एक ही स्तर पर जा पहुँचा है। इसमें धनी और निर्धन का भेद करना मुश्किल है, इसमें पढ़े और बिना पढ़े का भेद करना मुश्किल है। जहाँ तक जहालत का सम्बन्ध है, जहाँ तक दुर्भावनाओं का सम्बन्ध है दोनों ही क्षेत्र अपने आप से बाजी मारने पर तुले हुये हैं। पढ़े-लिखे ज्यादा कमा लेते हैं, बिना पढ़े कम कमा पाते हैं बात अलग है। पढ़े आदमी ज्यादा चालाक होते हैं और बिना पढ़े कम चालाक होते हैं, ये बात अलग है। पढ़े आदमियों के पास अच्छे महल, मकान और पैसा तिजोरी होती हैं गाँव वालों के पास फटे-टूटे कपड़े होते हैं ये अलग बात है, लेकिन जहाँ तक चरित्र का सम्बन्ध है वहाँ तक दोनों एक ही स्तर के हैं।
इसीलिए हम और आप में से हर आदमी जिनको प्रायश्चित करने की बात हो तीर्थ यात्रा की तैयारी करनी चाहिए। घर-घर जाना चाहिए, किसके लिए? जन सम्पर्क के लिए, जन सम्पर्क किसके लिए? धर्म धारणा जागृत करने के लिए, विचार क्रान्ति के लिए, जन मानस का परिष्कार करने के लिए, लोक मानस में आदर्शवादिता की प्रति स्थापना करने के लिए - यही उद्देश्य होना चाहिए। घर-घर आप जाएँगे। किसके लिए जाएँगे? भीख मागेंगे घर-घर जा के, नहीं साहब भीख तो नहीं, घर-घर जाएँगे, ऐसे ही बीड़ी का प्रचार करेंगे। आप जा करके घर-घर एक उद्देश्य के लिए जाइए, गाँव-गाँव एक उद्देश्य के लिए जाइए कि हमको जन जागरण का हवा पैदा करनी है, तीर्थ यात्रा का यही उद्देश्य है। इसके लिए पैदल चलना पड़ता था, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को रास्ते में मिलें, और (उनके) सम्पर्क (में) बनाएँ। आपको भी ऐसी ही तीर्थ-यात्रा की तैयारी करनी चाहिए। आप यहाँ से जाएँ तब, यहाँ से जाएँ तब आप योजना बना के ले जाइए कि हम किस तरीके से एक लम्बा सफर करेंगे और उसमें से किस तरीके से अधिकतर लोगों के साथ में मिलेंगे और उनको अच्छी नसीयत देंगे। इसका एक ही तरीका है आप साइकिल यात्रा, पद यात्रा ही मैं कहता हूँ उसे, साइकिल को तो मैं एक वो मानता हूँ वजन ढोने का, वजन ढोने का आया आपको बिस्तर ले कर चलना पड़ेगा, कपड़े ले कर चलने पड़ेंगे, साइकिल पर लाद कर लेकर चलिए, ज्यादा अच्छी बात है और क्या करें? और आप ये कीजिए जगह-जगह शिक्षण देने के लिए, अलख जगाने के लिए, एक योजना बना के ले जाइए। दीवारों पर आदर्श वाक्य, खड़िया, मिट्टी से लिखने की आदत आप डालिए, उससे आप असंख्यों आदमी को, रास्ता चलते आदमी को प्रेरणा दे सकने में समर्थ होंगे। आदर्श वाक्य लिखिए दीवार पर। ये भी एक प्रायश्चित का और तीर्थ यात्रा का तरीका है और क्या काम करें, यहाँ के शिविरों में संगीत सिखाया जाता है, ढपली पे गाना - स्ट्रीट सिंगर (street singer) - सड़क पे खड़े हो के गाने वाले।
स्ट्रीट सिंगरों की एक नई पीढ़ी और नई पौध हमने लगाई है। आप भी उसमें शामिल हों, तो एक आदमी या दो आदमी ले कर के, ढपली, खंजरी ले के चले जाएँ - किसी गाँव के लोगों को कहीं भी इकट्ठा कर लें - जहाँ प्याऊ है वहाँ पानी पीने के लिए जा बैठें, ढपली बजाने लगें। बस में सफर करना है आप बस में सफर करने के लिए चल सकते हैं, चल सकते हैं, रास्ते में बैठे हुए हैं दो आदमी, आप हैं या अकेले हैं एक अच्छा वाला भजन गाना शुरू कर दीजिए, और लोगों के दिल में एक नई गुदगुदी पैदा कर दीजिए। ये छोटी-छोटी बातें हैं। इसके अलावा भी हैं, आप कहीं जा करके प्रज्ञापुराण की कथाएँ कह सकते हैं, रात को सत्संग का प्रबन्ध कर सकते हैं। इस तरीके से आप में से हर एक आदमी को जहाँ ज्ञान की दृष्टि से हर आदमी बेअकल है, हर बेअकल आदमी, पढ़े और बिना पढ़े का फर्क मत कीजिए। जहाँ तक चरित्र का सवाल है, चिन्तन का सवाल है, आदर्श का सवाल है, सब लोग एक ही जैसे हैं। इसलिए आपको शिक्षण करने में फरक करने की जरूरत नहीं है कि आप किसको कहें, किसको न कहें, किससे कहना चाहिए, किससे नहीं कहना चाहिए। आप किसी से भी कहिए हर आदमी इस मामले में दरिद्र, दरिद्र है, हर आदमी को आपके ज्ञान की आवश्यकता है इसीलिए आपको तीर्थ यात्रा की योजना बनानी चाहिए।
सम्भव हो सके तो अपने घर से चलिए, हरिद्वार के लिए चलिए, मथुरा के लिए चलिए, ये भी दो गायत्री के बड़े तीर्थ हैं। दर्शन करने के लिए तो तीर्थ बहुत सारे हैं लेकिन ऐसे तीर्थ जिसमें कि प्रेरणा मिलती है, और कहीं नहीं मिलती है। तीर्थों का बड़ा महत्त्व है। तीर्थों में जा करके प्रायश्चित की बात बताई गई है, लाखों आदमी अभी भी जाते हैं, प्रायश्चित की विधि पूरी करते हैं, मुण्डन संस्कार कराते हैं, तीर्थ में सुनाते हैं, वहाँ जा करके गोदान करते हैं, ब्राह्मण भोजन करते हैं, ये सब बातें ये बताती हैं कि तीर्थ यात्रा का स्वरूप क्या होना चाहिए था। तीर्थ यात्रा से पाप कटते हैं अर्थात पापों का खामियाना पूरा होता है। कैसे मैंने बताया न, आपको जन सम्पर्क साधना चाहिए, और जन-जन के पास अलख जगानी चाहिए। इसके अलावा तीर्थ यात्रा में और भी कई महत्त्वपूर्ण बातें जुड़ी हुई हैं। बहुत और भी कई महत्त्वपूर्ण बात जुड़ी हुई हैं। आप कुछ समय एकान्त में रह कर के अपने प्रायश्चित कीजिए, साधनाएँ कीजिए, उपासनाएँ कीजिए, आत्म परिष्कार के लिए पृष्ठभूमि बनाइए। कैसी पृष्ठभूमि? जैसे कि (ती) तीर्थों में बनाई जाती थीं। तीर्थों में प्राचीन काल में दो तरह के लोगों के शिक्षणों का प्रबन्ध था - एक - बच्चों का शिक्षण, जिनको गुरुकुल कहते थे।गुरुकुलों में गुरुकुल सब जितने भी गुरुकुल थे तीर्थ स्थानों में बने हुए थे, तीर्थ स्थानों की वजह से गुरुकुल बनाए गए अथवा गुरुकुल बनने से तीर्थ बन गये, ये बात तो बहस करने का ये समय ऐसे विवाद में पड़ने का नहीं है। दोनों एक ही बात थी, प्राचीन काल में जहाँ तीर्थ थे वहाँ गुरुकुल भी थे, जहाँ गुरुकुल थे उसको तीर्थ बना दिये गये।
राजस्थान का वनस्थली बालिका विद्यालय को हम तीर्थ कहते रहेंगे। बाबा साहब आमटे के अपंग चिकित्सालय को हम तीर्थ कहते रहेंगे। तीर्थ पहले थे, पहले तो नहीं थे पर अब अच्छे व्यक्तियों से तैयार हो गये अथवा प्राचीनकाल में अगर बने थे तो किसी श्रेष्ठ कार्य से बने हुए थे। आप हरिद्वार की तैयारी कर सकते हैं और आप मथुरा की गायत्री तपोभूमि जाने की तैयारी कर सकते हैं। साइकिल से आप चलें, गाँव-गाँव जाएँ, घर-घर रुकें, गाँव-गाँव जाएँ, दीवारों पे आदर्श वाक्य लिखें, ढपली से गीत और संगीत सुनाएँ, रात को प्रवचन की व्यवस्था करें, यज्ञ वगैरह की बात सोचें, अच्छे साहित्य को लोगों तक पहुँचाने का इस बीच में प्रयत्न करें, वगैरह बातें ऐसी हैं कि जिससे जनजीवन में (नवजी) नवचेतना भरने का, संचार का मौका मिलता है, और आपको सेवा करने का, श्रम करने का, त्याग करने का, उदारता दिखाने का मौका मिलता है। (ये) तीर्थ-यात्रा के पीछे यही उद्देश्य था। मुण्डन कराते थे (ती) तीर्थों में जा कर के - इसका मतलब यही था कि हमने अपने पुराने विचारों को बदल दिया है।
बालों को मस्तिष्क के ऊपर उगे हुए बालों को अपने कुविचारों का प्रतीक मानते थे, और प्रतीक मान कर के ऐसा करते थे, इनको मुण्डन के माध्यम से उतार के फेंक देते थे, अर्थात ये विश्वास करते थे कि हमारे पुराने संग्रहित दुर्विचार, कुसंस्कारों को हमने हटा दिया - अब हम नई जिन्दगी जीने के लिए तैयारी कर रहे हैं - यही था तीर्थ जिसके लिए अभी भी लोगों को प्रोत्साहन मिलता है। शास्त्रकारों ने इतना ज्यादा तीर्थों का महात्म्य बताया है, इतना महात्म्य बताया है शायद और किसी तीर्थ और किसी पुण्य-फल का बताया न हो। तीर्थ अवश्य जाना चाहिए, तीर्थ अवश्य जायें। मुसलमान धर्म में भी ऐसा है, मक्का को एक बार जिन्दगी में जरूर जाना चाहिए। हिन्दुओं को भी जाना चाहिए, तीर्थ यात्रा जरूर करनी चाहिए पर तीर्थ यात्रा उद्देश्यपूर्ण होनी चाहिए। रास्ते में जनजीवन, जनजीवन को जगाने के लिए, अलख जगाने के लिए प्रयास, गाँव-गाँव फैलने का प्रयास तरीका नम्बर एक, तरीका नम्बर दो - ये कि जहाँ आप जिस तीर्थ में निवास करें, वहाँ कुछ दिन निवास कीजिए, साधनाएँ कीजिए, तपश्चर्या कीजिए, उपासना कीजिए, और ऐसे वातावरण और सत्संग में रहिए जिससे कि आप पिछले वाले, घिनौने भूतकाल को छोड़ करके, उज्ज्वल भविष्य में प्रवेश करने में समर्थ हो सकें। ये काम वातावरण से ताल्लुक रखता है, ये कार्य ॠषियों के सान्निध्य से ताल्लुक रखता है, यहाँ ये कार्य प्राणवान प्रक्रिया से ताल्लुक रखता है। तीर्थों में ये सारी बातों की सुविधा होती थीं, इसीलिए लोग तीर्थों में जाते थे, और वहीं निवास करते थे।
अनुष्ठान तो अपने घर रह करके भी किया जा सकता है पर अच्छे वातावरण में रह करके अनुष्ठान करना बात एक और घिनौने वातावरण में, गिले सिकवे के वातावरण में, काम-वासना के वातावरण में, लोभ और मोह के वातावरण में आप रह करके कर भी लें तो वो एक चिन्ह पूजा जैसी हो जाएगी। वातावरण का भी बड़ा महत्त्व था, इसीलिए प्राचीन काल में तीर्थ यात्रा के लिए वातावरण को भी देखा जाता था। ऋषियों का सान्निध्य, साधना का उपक्रम, सारी बातें उसमें होती थीं। आप ये मान कर चल सकते हैं कि आप यहाँ जो कल्प साधना शिविर में आये हैं एक महीने का तीर्थ सेवन सत्र में आये हैं, ये तीर्थ सेवन सत्र भी आप कह सकते हैं। तीर्थों में ऐसी परम्परा होती थी, अभी भी ऐसा होता है, अभी भी ऐसा होता है। प्रयाग में त्रिवेणी तट के ऊपर माघ के महीने में ठीक इससे मिलते-जुलते शिविर होते हैं, ऐसे सत्र होते हैं जैसे आप कर रहे हैं। एक महीने तक त्रिवेणी तट के बीचों-बीच बालू में लोग झोपड़ी डाल कर रहते हैं, पूरा एक महीना उसी में रहते हैं न कहीं बाहर जाते हैं न कहीं बाहर आते हैं, न किसी को आने देते हैं, न किसी को घर-गृहस्थी की चिन्ता करते हैं, अपनी ही चिन्ता में आत्म कल्याण की चिन्ता में डूबे रहते हैं और लोक कल्याण की आत्म कल्याण, लोक कल्याण आत्म कल्याण, लोक कल्याण, घर-गृहस्थी से जुड़े हुए सम्बन्धों के बारे में एक महीने के लिए वैरागी हो जाते हैं। घर वालों से कह देते हैं घर-गृहस्थी के समाचारों की चिट्ठी-पत्री मत डालना, जान-जंजाल का खबर मत देना, कोई दिक्कत परेशानी आ गई हो तो अपने तक सहन करना और हम तक जाना मत और हमारे लिए, हमारे सपने में विघ्न मत डालना। घर वाले भी उनकी बात पर ध्यान रखते हैं। जरूरत होती है तो कोई सामान की कमी तो नहीं पूछते हैं कोई सामान कम पड़ता है क्या, हमको कोई चीज चाहिए क्या, बस कोई चीज चाहिए उसे मालूम कर लिया और दे आये। बाकि वो सारी की सारी तीर्थ यात्रा का वातावरण में, कल्प साधक प्रयाग की त्रिवेणी तट पर गुजारा करते हैं।
आप भी इसी तरह से मान के चलिए, आपको अपनी मनःस्थति ठीक करनी है, आपको अपने भावी कुसंस्कारों को धो करके साफ करना है। न केवल इतना करना है लेकिन भावी जीवन के लिए भी कोई ऐसी रूप-रेखा निर्धारित करनी है, इसको इष्टा पूर्ति कहा जा सके, क्षति पूर्ति कहा जा सके। आत्मकल्याण के लिए क्या करेंगे, इसकी तैयारी करना इसी प्रायश्चित का अंग है। जिस कल्प साधना में आप आये हुये हैं, जिस कल्प साधना में आत्म परिष्कार और आत्म परिशोधन की प्रक्रिया उससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है जैसा कि आपको पूजा, उपासना, जप और ध्यान करने के लिए बताया गया है उससे कम नहीं, ज्यादा ही मूल्यवान है, इसलिए आप उस ओर भी ध्यान रखें ऐसी हमारी प्रार्थना। समाप्त ॥
॥ॐ शान्तिः॥