﻿युग-ऋषि की ग्राम-तीर्थ योजना—आदर्श ग्राम अभियान

• संस्कार युक्त  • व्यसन-कुरीति मुक्त  • स्वच्छ  • स्वस्थ  • सुशिक्षित  • स्वावलम्बी  • सहयोग-सहकार से भरापूरा सुरक्षित गाँव

गाँव की गोद में 
	आज भी भारत की 72% आबादी गाँवों में रहती है। प्रस्तुत ग्राम-तीर्थ योजना में इन्हीं अधिकांश लोगों को ध्यान में रखा गया है। व्यक्ति से परिवार, परिवार से गाँव और गाँव से अपने देश का निर्माण सम्भव है। वैश्विक बाजारवाद के फ लस्वरूप व्यवसायिक संगठनों की घुसपैठ एवं ओछी राजनीति के कुचक्र ने गाँवों की सहयोग-सहकार युक्त संस्कृति को तहस-नहस कर दिया है। परिणाम में गंदगी, अशिक्षा, परावलम्बन, अस्वस्थता, बिखराव एवं पलायन की समस्या मुँह बाये खड़ी है। गाँव दुबले हो रहे हैं और शहरों का मोटापा बढ़ रहा है।

समाधान है युगऋषि की ग्राम-तीर्थ योजना

ग्रामोत्थान के मूलभूत आधार
•	ग्राम-तीर्थ योजना का उद्देश्य है—	ग्रामोत्थान, ग्राम-सेवा और ग्राम-विकास।
•	विकास का मूल आधार—	पवित्र व्यक्तित्व (अच्छे विचार, भाव, चरित्र और व्यवहार सम्पन्न सेवाभावी लोग) और सेवा (पोषण-ज्यादा देने की प्रवृत्ति) आधारित स्वावलम्बी व्यवस्था।
•	समयदान-श्रमदान,  अंशदान  (मुट्ठीफण्ड) का प्रचलन एवं बगैर सरकारी आर्थिक सहायता के भी जनस्तर पर विकास का सामाजिक तंत्र।
•	भारत की आवश्यकता व जमीनी हकीकत के अनुरूप प्राचीन और आधुनिक तकनीकी एवं साधनों का उपयोग हो व योजनाएँ बनें।
•	सहकारिता, सामूहिकता और स्वावलम्बी मानसिकता विकास-प्रक्रिया के प्रमुख अंग।
•	समग्र एवं टिकाऊ विकास (व्यक्ति, प्रकृति एवं समाज के समन्वित-संतुलित विकास) की अवधारणा एवं पहल।
•	परिष्कृत धर्मतंत्र के साथ-साथ साहित्य, संगीत एवं कला से लोकशिक्षण का व्यवस्थित क्रम।

संस्कार युक्त गाँव
•	सद्विचारों के अनुसार चरित्र और व्यवहार गठन की साधना। आत्मविश्वास-ईश्वरविश्वास, परस्पर-विश्वास (आत्मीयता-विस्तार) और पुरुषार्थ (सेवा-भाव) का जागरण।
•	संस्कार परम्परा से व्यक्तित्व निर्माण।
•	देवालयों का प्रबंधन एवं जन-जागरण केन्द्र के रूप में विकास।
•	पर्व-त्यौहारों के सामूहिक प्रगतिशील समारोहों के द्वारा सामूहिक चेतना का जागरण।
•	दीवार लेखन (स्टिकर, बैनर, पर्चा आदि) एवं नियमित व्यक्तिगत-सामूहिक स्वाध्याय।
•	खेल प्रतियोगिता व सामूहिक भोजों का प्रचलन।

व्यसन-कुरीति मुक्त गाँव
•	नशा-मुक्ति प्रदर्शनी, गोष्ठी आयोजन। व्यसन से बचाकर सृजन में लगाने की प्रेरणा।
•	नशा-मुक्ति उपचार एवं परामर्श केन्द्र।
•	सार्वजनिक स्थलों पर नशीली वस्तु के विक्रय एवं प्रयोग पर पूर्णतः प्रतिबंध। आर्थिक दण्ड का प्रावधान।
•	नशा-मुक्त विद्यालय, पंचायत निर्माण।
•	पुत्र-पुत्री के बीच भेद-भाव न हो।
•	जनसंख्या-नियंत्रण और परिवार नियोजन का महत्त्व।
•	टोना-टोटका, झाड़-फूँक, ताबीज से मुक्ति।
•	सामूहिक आदर्श विवाहों का प्रचलन।
•	मृतक भोज पर रोक।

स्वस्थ गाँव
•	श्रम के प्रति सम्मान का भाव विकसित करना।
•	योग-व्यायाम-प्राणायाम-ध्यान केन्द्र संचालन।
•	गौ द्रव्य-दूध, दही, मठा, घी, गो-मूत्र, पंचगव्य के प्रयोग को बढ़ावा।
•	अंकुरित अन्न, शाकाहार, मौसमी स्थानीय फल, शाक-वाटिका, जवारा रस का प्रयोग।
•	वनौषधि, एक्यूप्रेशर, प्राकृतिक चिकित्सा का प्रबंध करना।
•	प्राथमिक चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराना।


स्वच्छ—निर्मल—सुवासित गाँव 
•	निस्तार जल निकास का उचित प्रबंध, नाली, सोकपिट  निर्माण। 'Clean & Green'  ग्राम ।
•	पॉलीथीन, प्लास्टिक, डिस्पोजल दोने-पत्तल पर प्रतिबंध एवं उपयोग की स्थिति में उचित निबटान।
•	कपड़े के थैले, पत्ते/कागज के दोना-पत्तल का उपयोग।
•	खुले में शौच पर रोक, शौचालय। कूड़ेदान का प्रयोग।
•	गोबर, गोमूत्र, मल-मूत्र का बायोगैस / खाद में उपयोग। 'Best out of Waste'।
•	सामूहिक श्रमदान की अनिवार्यता और नियमित प्रयोग।
•	जल-संरक्षण, हरीतिमा सम्वर्धन, वृक्षारोपण पर विशेष ध्यान।

सुशिक्षित गाँव 
•	शिक्षा के साथ नैतिकता का समावेश।
•	भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा जैसी अन्य प्रतियोगिताओं के आयोजन का क्रम।
•	घर-घर पुस्तकालय, गाँव-गाँव सामूहिक वाचनालय।
•	रात्रिकालीन प्रौढ़शाला, बाल संस्कारशाला। कामकाजी विद्यालय, एकल विद्यालय का संचालन, व्यावहारिक ज्ञान सीखने-सिखाने का प्रशिक्षण।
•	गाँव विकास की विविध धाराओं की नई जानकारियाँ।
•	बालकों-बालिकाओं की अनिवार्य शिक्षा हेतु प्रयास।
•	स्कूली बच्चों हेतु निःशुल्क कोचिंग (कुशलता विकास)।

स्वावलम्बी गाँव
•	गौ आधारित कृषि, गौ रक्षा-गौ संवर्धन, वैकल्पिक ऊर्जा, प्रकृति आधारित स्वास्थ्य तंत्र का विकास।
•	गाँव के लिए उपयोगी अधिकांश दैनिक जरूरत की  वस्तुओं का गाँव में ही कुटीर उद्योगों से उत्पादन हो।
•	कच्चे माल की जगह तैयार माल के विक्रय-निर्यात को प्रोत्साहन। सौर-ऊर्जा, दूर-संचार व यातायात व्यवस्था।
•	गाँव के श्रम का उपयोग गाँव में ही सुनिश्चित करें।
•	समयदान-श्रमदान एवं अंशदान-मुठ्ठी फण्ड का ग्राम विकास हेतु नियोजन।
•	ऋषि-कृषि से खेती को स्वावलम्बी बनाएँ। खाद, ऊर्जा-तकनीकी, कीट-बीमारी नियंत्रण आदि के लिए प्राकृतिक-जैविक विधियों का उपयोग हो।


सहयोग-सहकार से भरा-पूरा सुरक्षित गाँव 
•	सामूहिक श्रमदान/अंशदान के नियमित अभ्यास का प्रचलन हो। सहभजन, सहभोजन और सहयजन।
•	जाति, लिंग, वर्ग, अर्थ भेद को कम करना।
•	पर्व-त्यौहारों का सामूहिक आयोजन।
•	रास्ते, सड़कें, कुएँ, पाठशाला, मंदिर, बागीचे, तालाब का सामूहिक श्रमदान से निर्माण/जीर्णोद्धार/प्रबंधन।
•	फावड़ा वाहिनी, निगरानी/सुरक्षा वाहिनी का निर्माण।
•	बालकों-बालिकाओं को आत्मरक्षार्थ साहस बढ़ाने वाले खेल एवं प्रशिक्षण अनिवार्य हों।
•	आपसी मतभेद-मुकदमे ग्राम-सभा स्तर पर हल करें।

ग्रामतीर्थ योजना के कार्यक्रमों से सम्बन्धित पुस्तकें
•	ग्रामोत्थान की ओर		•	राष्ट्र के अर्थतंत्र का मेरुदण्ड - गौशाला
•	गोपालन व गौशाला प्रबंधन	•	आर्थिक स्वावलम्बन - भाग-1  
•	आर्थिक स्वावलम्बन - भाग-2	•	आर्थिक स्वावलम्बन - भाग-3
•	केंचुआ खाद संदर्शिका		•	जड़ी-बूटी की व्यावसायिक खेती
•	गंदगी से घृणित असभ्यता	•	वृक्षारोपण एक परम पुनीत पुण्य

सम्पर्क सूत्रः शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार 
फोन नं.- 09258360652, 09258369676, 09258369531, 09258369532    (1334) 260602 (Ex- 436, 104)
Email:  shantikunj@awgp.org ,  youthcell@awgp.org
Web:    www.awgp.org   • www.dsvv.ac.in


	मित्रो! वास्तविक शक्ति जनता के हाथ में है। जनता से बड़ा दैत्य, जनता से बड़ा राक्षस, जनता से बड़ा जालिम, जनता से बड़ा शक्तिशाली और कोई नहीं है। जनता के पास जो शक्ति है वह और किसी के पास नहीं है। वह चाहे जिसे शासन के शीर्ष पर बिठा दे और चाहे तो धूल में मिला दे। ...जनता की शक्ति अपने आप में सबसे बड़ी शक्ति है। जनता की इस शक्ति को हम जाग्रत करेंगे और लोगों को यह बात बताएँगे कि अपनी समस्याओं का समाधान आप स्वयं कर सकते हैं और आपको करना ही चाहिए। ...स्कूल बनाना, कॉलेज बनाना उतनी बड़ी बात नहीं है, जितनी कि जनता की स्वावलम्बी वृत्ति को जगाना। यह सबसे बड़ी बात है। जो भी राष्ट्र कभी उठे हैं, स्वावलम्बी होकर उठे हैं, अपने बलबूते पर उठे हैं, अपनी ताकत के आधार पर उठे है। दुनिया में जहाँ कहीं भी तरक्की हुई है, जनता ने अपने बाजुओं के बल से की है। परायी सहायता से न तो आज तक कोई उठा है और न कभी उठेगा। इसमें गवर्नमेण्ट भी शामिल है। ...हम हर गाँव में जाएँगे, हर घर में जाएँगे और लोगों से यह कहेंगे कि आप हर रोज अपना एक घण्टा समाज के लिए दीजिए। ...तो गुरुजी क्या यही अध्यात्म है? हाँ बेटे, यही अध्यात्म है और यही धर्म है। यही भगवान् की भक्ति है। हमको और आपको भगवान् की यही भक्ति लोगों को सिखानी पड़ेगी। 	- पू0 की अमृतवाणी-1 - वां0-68 पृ0 53-55

नोटः पढ़ें-पढ़ाएँ, छपवाएँ और बाँटें-बँटवाएँ।





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