<p>सौभाग्यशाली वसन्त</p><p>
 
परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों में एक अलौकिक भाव समाहित है। वे न केवल मानवीय भावनाओं को झकझोरने का कार्य करते हैं वरन वे श्रोताओं को उस पथ पर चलने के लिए प्रेरित भी करते हैं, जिस पर बढ़ने के बाद मानवीय उत्कर्ष की सम्भावना साकार हो पाती है। अपने एक ऐसे ही विशिष्ट उद्बोधन में वन्दनीया माताजी सभी गायत्री परिजनों को स्मरण दिलाते हुए कहती हैं कि वसन्त पंचमी का यह सौभाग्यशाली दिवस पूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्मदिवस भी है और माँ सरस्वती के अवतरण का दिवस भी। ऐसे पावन अवसर पर हर परिजन को पूज्य गुरुदेव से मिले अनुदानों का स्मरण कर स्वयं को उसी रंग में रँग लेने की तैयारी कर लेनी चाहिए, जिस रंग में पूज्य गुरुदेव ने स्वयं को रँगा। वन्दनीय माताजी स्मरण दिलाती हैं कि यदि हमारे भीतर श्रद्धा, निष्ठा और विवेक जाग्रत हो जाए तो हमारे ही भीतर से एकलव्य, अर्जुन और शिवाजी का प्राकट्य सम्भव है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को—</p><p>
 

सौभाग्यशाली वसन्त</p><p>
 
 
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—<br>
'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।'</p><p>
 
बेटियों और हमारे आत्मीय प्रज्ञापुत्रो! आज बड़े हर्ष और खुशी का दिन है कि आज हमारे और आपके मार्गदर्शक का जन्मदिन है। यों तो शरीर का जन्मदिन क्वार (आश्विन) के महीने में मनाया जाता था, लेकिन वो जन्मदिन नहीं है। असली जन्मदिन तो आज है, जो आज से 60 वर्ष पूर्व वसन्त पर्व से आरम् हुआ। उनके जीवन में वसन्त आया था, हरियाली आई थी, गुरु की चेतना आई थी और गुरु का प्रकाश आया था। उसी दिन को हम जन्मदिन मानते हैं और उसी को हम मनाते आए हैं और उसी के लिए आज आप और हम एकत्रित हैं। मनाने के लिए एक जन्मदिन और दूसरा भगवती माँ सरस्वती का अवतरण वसन्त पंचमी और तीसरा आज 26 जनवरी, देखो कैसा सुयोग कि तीनों मिल गए। कभी-कभी ऐसा योग आता है। तो मैं क्या कह रही थी? मैं ये कह रही थी कि आज आपके और हमारे मार्गदर्शक का जन्मदिन है।</p><p>
 
बेटे! वे आपको सामने दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, मैं मानती हूँ, लेकिन आप भावनाओं से पास में पाएँगे यह मैं जानती हूँ। दर्द और पीड़ा किसको कहते हैं? मैं समझती हूँ। मैं बड़ी भावुक महिला हूँ, अभी भी कहती हूँ कि वो अभी भी मेरे साथ हैं। छाया के तरीके से आगे भी हैं और पीछे भी हैं, और सामने भी हैं, लेकिन बेटे! जब मैंने ऊपर से नीचे की ओर पाँव रखा तो न मालूम क्यों जाने किस कोने में और जाने कहाँ से मेरी भावुकता उभर आई और मैं रोक नहीं सकी और मैं यहाँ भी आप लोगों के समक्ष भी नहीं रोक सकी। मुझको रोकना चाहिए था।</p><p>
 
चूँकि भावुकता ही सब कुछ नहीं होती है। भावनाएँ उससे ज्यादा होती हैं और जब भावनाएँ होती हैं तो मनुष्य कुछ करने के लिए आगे बढ़ता है और कोरी भावुकता हो तो ढोल जैसे आँसू बहाते रहो, आँसू से कोई बात बनेगी नहीं बेटे! यदि हम उन्हें अपना सच्चा मार्गदर्शक मानते हैं, आप अपना मार्गदर्शक मानते हैं तो आपको उनके साथ जुड़ जाना चाहिए।</p><p>
 

मिला गुरु का अनुदान अपार</p><p>
 

बेटे! हमने अपने को जोड़ लिया और एक साल के इस सूक्ष्मीकरण तप में हमको सिद्धान्त मिला और हमने उसको व्यावहारिक स्वरूप दिया। लोग कहते हैं, हमारे परिजन कहते हैं, अन्य भी कहते हैं कि माताजी! आपने क्या देखा और क्या पाया? बेटे मेरा एक लड़का कह चुका है, अन्य आपको कहते रहे हैं, लेकिन आज मैं दिल खोल करके आपके सामने कह रही हूँ कि मैंने जीवन में क्या देखा, क्या सुना और क्या पाया। मैंने ही नहीं, लाखों ने, लाखों ही नहीं करोड़ों ने पाया।</p><p>
 
बेटे, मैं तो आपके सामने एक उदाहरण के रूप में बैठी हूँ, सच्चे हृदय से आप बताइए कि आपको मिला कि नहीं मिला। अभी मेरे बालक गा रहे थे—'मिला गुरु का अनुदान अपार'। अरे गुरु का तो अनुदान मिलता रहा, लेकिन हम सँभाल कहाँ पाए। जिसने पाया और जिसने सँभाला, वो निहाल हो गया। जिसने अपने गुरु के आदर्शों के लिए अपने शरीर को गला दिया। जो आदेश हुआ, जो निर्देश हुआ पूरे मन से और पूरे तन से उसी में लगा दिया। न बीबी को देखा, न बच्चों को देखा, लेकिन फर्ज और कर्त्तव्य तो बेटे जरूर जिन्दा रहे हैं। वो तो अभी भी विद्यमान हैं, लेकिन, उसमें लपटे नहीं रहे।</p><p>
 
अपने गुरु के आदर्शों और आदेशों में अपने को लगा दिया, झोंक दिया, अपने को दाँव पर लगा दिया। उन्होंने कहा कि बेटे हमको चाहिए तेरी अक्ल। उन्होंने कहा लीजिए गुरुदेव। उनने कहा कि ले बेटे, ले तू मेरी शक्ति ले। उन्होंने कहा कि गुरुदेव मैं आपको सब कुछ देने के लिए तैयार हूँ। मैं अपना सर्वस्व देता हूँ।</p><p>
 
मैं तो कहती हूँ कि चौबीसों घण्टे उन्हीं के लिए समर्पित हैं। आप कहेंगे कि किंवदन्ती है। माताजी तो वैसे ही भावुक हो रही हैं। कुछ कहेंगे कि उनकी अर्धांगिनी हैं, उनकी पत्नी हैं, इसलिए अपने पति की शेखी बघार रही हैं। बेटे, मैं शेखी नहीं बघार रही हूँ। उन महिलाओं में से मैं नहीं हूँ। मैं तथ्य की बात कहती हूँ।


सच्ची गुरुभक्ति</p><p>
 

उनकी उपासना चौबीस घंटे चलती है। हाँ सो जाते हैं तो मैं उसे भी उनकी उपासना ही कहूँगी। मैं उसको भी कहूँगी। जितनी देर सो जाते हैं, उतने गुनहगार हैं। बाकी का? बाकी का बेटे सारा-का-सारा जीवन विश्व मानव के लिए, अपने गुरु के लिए लगा दिया। इतनी सच्ची गुरुभक्ति तभी सार्थक होती है, जब हम गुरु के लिए और गुरु के मार्ग पर चलेंगे तो हमारी गुरुभक्ति सार्थक है, नहीं तो बेटे निरर्थक हो जाएगी, उपासना भी हमारी निरर्थक हो जाएगी व एकांगी हो जाएगी, सर्वांगपूर्ण नहीं हो सकती।</p><p>
 
कैसे हो जाएगी जरा मुझे बताइए। एक कोने में आप माला ले करके बैठ भी जाएँ, आपका उद्धार भी हो जाए, मैं समझती हूँ चलो हो जाए तो इतने व्यक्तियों में से, करोड़ों की संख्या में से एक घट गया, एक की हो गई मुक्ति तो बाकी का क्या होगा? बाकी के पूरे संसार का क्या होगा? सारे विश्व का क्या हुआ और हमारे राष्ट्र का क्या होगा?


राष्ट्र के लिए सोचे वही सन्त</p><p>
 

बेटे! राष्ट्र के लिए जो चिन्तन करता है, विश्व के लिए जो चिन्तन करता है, वही सन्त है। उसी को सन्त कहेंगे, उसी को ऋषि कहेंगे और जो अपने लिए ही जीता है, अपने लिए ही खाता है, अपने बीबी-बच्चों के लिए जीता है, वो तो पशु योनि है। पशु अपने लिए जीता है, अपने बच्चों के लिए जीता है और अपने परिवार के लिए जीता है। बस खतम। बाकी हमारे जीवन को क्या हुआ?</p><p>
 
बेटे! हमारा जीवन यों ही बेकार चला जाता है। जैसे हम आए थे—'मुट्ठी बाँधकर आया बन्दे हाथ पसारे जाएगा।' जब आते हैं तो मुट्ठी बाँध कर आते हैं और जाते हैं तो संसार से यों ही चले जाते हैं। धन-दौलत, बीबी-बच्चे सारे-के-सारे यों ही धरे रह जाते हैं। हमारा कोई साथ देता है क्या? साथ तो हमारा अपना आपा ही दे सकता है, जो कि हमारे संस्कारों के रूप में होता है। वही इस लोक और परलोक में भी हमारा साथ देता है।</p><p>
 
बेटे! पिछली बार मैंने एक उदाहरण दिया था। एक बन्दरिया का दिया था। ध्यान नहीं है बकरी का था या एक बन्दरिया का था। मैं आपको संस्कारों की बात बताती हूँ। एक बन्दरिया थी तो उसके पिछले जन्म के जो संस्कार थे, वो मनुष्य जैसे संस्कार थे। तो बकरियों का जो झुण्ड था और उसका जो मालिक था, वह गड़रिया था।</p><p>
 
गड़रिया उसको पकड़ लाया और जब उसकी हरकतें देखीं तो वहाँ का जो व्यापारी था, उस व्यापारी के यहाँ उसको ले गया। उसके यहाँ भी कुछ ऐसा ही व्यापार था। भैंसों का, कुछ भेड़ों का, कुछ काहे का, कुछ काहे का, तो उसने जब देखा कि इस बन्दरिया का जो विचित्र संस्कार है वह कैसे है? उन्होंने कहा कि इसको देखना चाहिए। तो वहाँ जा पहुँचे जहाँ गड़रिया रहता था। उसके यहाँ भेड़ों की छुट्टी कर दी। तो अब जो बन्दरिया थी, उन भेड़ों को चराने को ले गई और ढूँढ़कर लौटा भी लाई।</p><p>
 
देखती रही कि कहीं कोई रह तो नहीं गई। उसमें से कोई एक रह गई तो वो ढूँढ़कर ले आई और वहीं लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ उन्हें बँधना चाहिए था, रहना चाहिए था। क्या बात हो गई? वो तो थी बन्दरिया और वो थी भेड़। बेटे ये पूर्वजन्मों के संस्कार थे, जो उसको अगले जन्म में मिले। थी तो सही बन्दर की योनि, लेकिन संस्कार जो होते हैं वो जन्म-जन्मान्तरों तक चलते हैं।</p><p>
 

हमारे ऊपर है गुरु का ऋण</p><p>
 

बेटे! इस जन्म में हमारे भी कुछ ऐसे ही संस्कार हैं। हमारे और आपके ऊपर भी ऋण हैं और संस्कार भी हैं। संस्कार इस माने में हैं कि उनसे हम जुड़े हैं, उस बाजीगर से जुड़े हैं, जो न मालूम क्या-क्या बना देता है? कोई तर्क-वितर्क भी कर सकते हैं, लेकिन मैं तो अपना ही उदाहरण बताती हूँ। बेटे! मेरे मुँह से आज तक किसी ने दो शब्द नहीं सुने होंगे कि जो आज मैं इस स्थिति में बैठी हूँ किसकी बनाई हुई हूँ।</p><p>
 
बेटे उस बाजीगर की, जिससे हम जुड़े हैं और आप लोगों को किसने बनाया है? बेटे उसी ने बनाया, उसी ने दिशा और धारा दी है। हमको और आपको तो पका-पकाया मिल गया है। हमको पकाना नहीं पड़ रहा है। साहित्य के रूप में जो आग उन्होंने पैदा की है, हमारे और आपके लिए तैयार करके वो महल बनाकर रखा है। ये तो ईंट और पत्थर का है। बेटे वो जान, वो फिजा और वो हवा और वो करुणा और वो दरद किसका बनाया हुआ है? जनता जिस दरद में कराह रही है, मानवता पुकार रही है कि आइए, आइए हमारा दुःख-दर्द बँटाइए, कोई सुनने वाला नहीं है।</p><p>
 
बेटे! ऐसा सन्त आपके और हमारे जीवन में आया जिसने कि इतने दिन 75 वर्ष की आयु, अपना सारा जीवन दाँव पर लगा दिया, लेकिन अब भी हमारी और आपकी आँखें न खुलें तो बेटे आपको भी और हमको भी धिक्कार है। जिसके साथ हम जुड़े, जिसको हमने गुरु कहा और हमने उसको पति कहा, भगवान कहा। हमने पति पीछे कहा, पहले हमने भगवान कहा, क्योंकि हमें अपने अन्दर विश्वास है।</p><p>
 

रंग दे बसंती चोला</p><p>
 

हमने उनका हर क्रियाकलाप एक भगवान के रूप में ही देखा। आइए हमसे शिक्षा लीजिए, देखिए उनके जीवन से और हमारे जीवन से। हमारे से नहीं, उनके जीवन से पढ़िए जो भगवान साथ-साथ है। आप तो कहने दीजिए बेटे, गुरुजी भगवान हैं और उस भगवान का आज जन्मदिन है। आइए हम और आप मन से भावभरी श्रद्धांजलि दें, मन से बेटे, तन से नहीं। अभी-अभी मेरे बच्चों ने गाया था 'रंग दे वसंती चोला'। बेटे! चोले को रंगिए, मन को रँगिए, कपड़े को चाहे रंगिए या चाहे मत रंगिए।</p><p>
 
एक बार मन से तो सही श्रद्धांजलि दीजिए, पैसे से नहीं। बेटे हमको पैसे नहीं चाहिए, रख अपने पैसे। हमको चाहिए आपकी भावना। हमको चाहिए आपकी निष्ठा और हमको चाहिए आपकी श्रद्धा, जिसके बल पर हमें वो महल तैयार करना है, जो श्रद्धा और निष्ठा के ऊपर टिका होता है। सारे मानव जाति के लिए, सारे विश्व के लिए और सारे राष्ट्र के लिए आप लोगों से हमें जो काम कराना है, वह तभी सम्भव है, जब आपकी श्रद्धा सच्ची है तभी मैं कहूँगी कि आप भक्त हैं।</p><p>
 
जो आप चिन्तन कर रहे हैं, अपने पेट में मलाल भी कर रहे हैं, दुःखी भी हो रहे हैं कि गुरुजी की एक झलक हमको दिख जाए तो हम धन्य हो जाएँ। बेटे आपके अन्दर तो गुरुजी ने वो बीज बोया है, यदि आप दिग्दर्शन कर सकें, अपने गले में मुँह डाल सकें तो मैं समझूँगी कि आपने गुरुजी के दर्शन कर लिए। गुरुजी आपके हृदय में कब से हैं। हमारे कितने ही परिजन जो तीस-तीस साल, चालीस साल, पचास साल से हमसे जुड़े हुए हैं। अभी तक आपका पेट नहीं भरा, आपने दर्शन नहीं किए, तो मैं समझती हूँ जिन्दगी में कभी होने वाले भी नहीं हैं, कभी होंगे भी नहीं। आप खाली हाथ आए हैं और खाली हाथ ही जाएँगे।</p><p>
 
बेटे! गुरुजी चार बार अपने गुरु के पास कुछ क्षण के लिए गए और सारा-का-सारा जीवन गुरु के आदर्शों पर चले। गुरु का काम किया और जो माँगा सो दिया। गुरु ने माँगा? हाँ बेटा माँगा। सो दिया। उन्होंने कहा कि माँगना क्या है? ऐसे लम्बे-लम्बे हाथ-पाँव हैं, अक्ल है, हम कमा लेंगे और खा लेंगे। पत्नी हमारी बीमार है तो क्या पत्नी के लिए माँगेंगे? हमको नहीं चाहिए। गुरुदेव! होना होगा तो ठीक हो जाएगी, नहीं तो मर जाएगी, हजारों मर जाते हैं और मर भी गई तो क्या हो जाएगा? बच्चे हैं ठीक हो जाएँगे, नहीं होंगे तो क्या? बच्चों के लिए क्या माँगना। देना है तो हमें वो शक्ति, वो सामर्थ्य, वो अक्ल दीजिए, जिससे हम जन-उपयोगी बन सकें, जनता के लिए जी सकें।</p><p>
 
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 जापान के गाँधी</p><p>
 

जापान के गाँधी कागावा थे। जैसे अपने हिन्दुस्तान में महात्मा गाँधी थे, वैसे ही जापान में गाँधी कागावा और उनकी पत्नी थीं। उन्होंने कहा कि जनता के लिए, इन कोढ़ियों के दर्द के लिए हमको समर्पित होना है और उनकी जो पत्नी थीं, उन्होंने कहा कि हमें आप से पहले समर्पित होना है।</p><p>
 
अरे तुम तो धनवान की बेटी हो, तुम हमारे साथ कैसे रह सकोगी? उन्होंने कहा कि इस धन को धिक्कार है, यह साथ जाने वाला नहीं है। मेरा परिवार, मेरा स्वामी और मेरे देवर और जेठ जो कुछ भी हैं वही हैं, जिसके बीच में आप सेवा कर रहे हैं और मेरी यह भावना है कि मैं भी सेवा करूँ तो इससे सौभाग्यशाली और कौन हो सकता है। बेटे वही हूबहू उन्होंने अपने जीवन में धारण किया है।</p><p>
 
आप जानते नहीं हैं कि अलगाव कितना दुःखद होता है, बिछड़न कैसी पीड़ा देती है। आप बच्चों की आँखों में आँसू देखते हैं तो आप क्या ऐसा समझते हैं कि गुरुजी को अच्छा लग रहा होगा। ऐसा नहीं हो सकता। वो करुणा की मूर्ति हैं। बेटे! उनको माँ भी कह लें तो कोई हर्ज नहीं है, क्योंकि माँ का जैसा उनका दिल उदार करुणा से भरा-पूरा है। क्या उनको ये नहीं होगा कि हम अपने बच्चों की एक झलक देखें या बच्चों से हम मिलें, पर बेटे जो संकल्प लिया है, जो लक्ष्य है, उस लक्ष्य तक हमको पहुँचना है, उद्देश्य की पूर्ति हमको करनी है, वो हमारा मुख्य ध्येय है।</p><p>
 
बेटे! तुमको तो माँ भी सँभाल लेगी। अभी लड़का कह रहा था— 'माँ का प्यार-दुलार' ... अरे बेटे तुम्हें तो मैं अपनी छाती से लगा लूँगी, लेकिन जो विश्वहित के लिए लग रहे हैं वो कौन करेगा? उनको करने दीजिए, उनके काम में आप रोड़ा मत अटकाइए। नहीं साहब! हम तो बड़े भावनाशील हैं, बेटे! आप अपनी भावनाशीलता को रखो। भावनाशील हैं तो आप काम आइए, हाथ बँटाइए, काम करिए। किन का हाथ बँटाएँगे? गुरुजी का हाथ? अरे बेटे तू गुरुजी के हाथ क्या बँटाएगा? हमने तेरे कन्धों पर जो वजन रखा है, तू उसको सँभाल, उनके गुरु ने उनको काम सौंपा है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव! सौंपिए, आप सौंपेंगे, हम काम करेंगे।</p><p>
 
बेटे वही उद्देश्य आपका होना चाहिए, जो आपके कन्धों पर वजन डाला गया है, जो आपको सौंपा गया, उसका निर्वाह आपने किया कि नहीं किया। किया है तो आपकी गुरुभक्ति पक्की है और आपने नहीं किया तो मैं समझूँगी कि बस ये वाचाल हैं या तो यों कह दूँगी कि चलिए ये मेरे बच्चे हैं। बच्चे कैसे? छोटे-छोटे से। जिनमें कोई विवेक नहीं होता। अरे माताजी! छोटे-छोटे से बैठे हैं, इसमें से कोई 70 साल का, कोई 60 साल का, कोई 50 साल का और कोई 25 साल का है। आप कह रहे हैं कि बच्चे हैं।</p><p>
 
हाँ बेटे! बुद्धि की दृष्टि से वे मेरे बच्चे ही तो हैं। जो माँ कह रहे हैं, वे मेरे लिए बालक हैं। मैं सोचूँगी कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं, जिनको कोई अक्ल नहीं है, जिनको कोई जानकारी नहीं है, जो अबोध हैं, ये बालक हैं। मैं आपको बालक कहूँगी। वो तो नहीं कहूँगी, कर्कशता तो मेरी वाणी में नहीं है, लेकिन यह जरूर कहूँगी कि मेरे बच्चों को अक्ल नहीं है। यदि अक्ल होती, विवेक होता और सिद्धान्त होते तो अपने गुरु के तईं बेटे जैसे वो मर-मिटने की तैयारी करते हैं, आप भी ऐसा ही करते कि गुरुदेव हम साथ हैं।</p><p>
 

जगाएँ अपनी श्रद्धा</p><p>
 

रामकृष्ण परमहंस को एक विवेकानन्द मिला था, जो सारे संसार में चमक गया और अपने गुरु को भी चमका दिया। उसने अपने गुरु को चमका दिया और हमको लो, 1000 तो यहीं बैठे हैं। मैं समझती हूँ कि 1000 से ज्यादा बैठे हैं। विवेकानन्द की कमी है क्या? कोई कमी नहीं है बेटे हाथ-पाँव वही हैं, वही आप सबके हैं। हाथ भी उनके दो थे, आँखें भी दो थीं, कान भी दो थे, पाँव भी दो थे, फिर आपमें क्या कमी है? आपमें सिर्फ कमी है तो केवल सिद्धान्तों की कमी है, निष्ठा की कमी है, और श्रद्धा की कमी है और आपके अन्दर कोई कमी नहीं है।</p><p>
 
यदि श्रद्धा आ जाए, निष्ठा आ जाए और हमारा विवेक जाग्रत हो जाए, तो बेटे तुममें से जाने कौन-कौन एकलव्य हो सकता है और कौन-कौन आप में से क्या-क्या हो सकता है, अर्जुन हो सकता है और शिवाजी हो सकता है, जानें कौन-कौन हो सकते हैं? लेकिन हाय रे! उस क्षुद्रता के लिए हम क्या करें? वो जीवन में से नहीं जाती है। उस क्षुद्रता को हम हटा नहीं पाते, उस संकीर्णता को हटा नहीं पाते।</p><p>
 
बेटे, यदि संकीर्णता जीवन में से हट जाए, तो आप इस संसार के लिए, राष्ट्र के लिए और सारे विश्व के लिए कितना काम कर पाएँगे? सब साक्षर हो जाएँगे। दहेज का जो दानव है, वो कहीं जिन्दा रह जाएगा क्या? बेटे नहीं रहेगा। जब अपने यहाँ लड़की होती है तो हम ऐसे गौ बन जाते हैं, बिलकुल दीन और जब लड़का होता है तो हम बब्बर शेर जैसे हो जाते हैं कि बस, बकरी आई और हमने खाया। अब खा ही जाएँगे बेटी वाले को, इसको नहीं छोड़ेंगे जिन्दा।</p><p>
 
क्यों छोड़ेंगे? हमारे यहाँ बेटा जो हो गया, तेरे यहाँ क्या हो गया, बेटे को मोल दे रहा है। बेच रहा है, अपने बेटे को? फिर कैसे रह सकता है ये। दहेज का दानव मर करके ही रहेगा और जो भी हमारे समाज में कुरीतियाँ हैं वो बेटे हट करके ही रहेंगी। एक भी कुरीति नहीं रह सकती है, लेकिन बेटे वो जरूर रहेंगी, क्योंकि आप जो दीन-हीन बने बैठे हैं, हीनता की ग्रन्थि पाले बैठे हैं। आप कुछ करना नहीं चाहते, करना चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं।</p><p>
 
अरे देखो एक ने! आचार्य जी ने कितना किया है, एक अकेले ने किया है और आप इतने हैं। चलिए मैं यह कहूँगी कि अकेले ने इतने को बनाया तो उनका सहयोग मिला। चलिए पहले तो आपको बनाया गया न। कुम्हार के तवे में जब बरतन तप जाता है तो काम का हो जाता है और तपता नहीं है तो जो भी उसमें डालेंगे, वो नीचे से निकल जाएगा, वो बरतन गल जाएगा। तो आपको कुम्हार के अवे में पहले तपाया गया और बनाया गया और खींचा गया। अन्तर बस अब इतना ही है, थोड़ा-सा ही फरक है। कितना फरक है? कोई फरक नहीं है। हम तर्क चाहे जितना दे सकते हैं, लेकिन भावनाओं से शून्य हैं। हमारे अन्दर भावनाएँ आ जाएँ तो वो करुणा, वो दया आपके अन्दर आ जाएगी। फिर आप अकेले घर में बैठ करके नहीं खा सकेंगे। दुखियारों की ओर देखेंगे और जो मानवता पीड़ा और पतन से कराह रही है, हाथ फैलाए बैठी है और कह रही है, पुकार रही है, उसकी सेवा-सहायता के लिए चल पड़ेंगे।</p><p>
 
(समापन अगले अंक में)</p><p>
 
परमवन्दनीया माताजी की अमृतवाणी</p><p>
 
सौभाग्यशाली वसन्त</p><p>
 
परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह विशिष्टता है कि वे न केवल कष्ट से पीड़ित व्यक्ति के लिए भावनात्मक मरहम का काम करते हैं, वरन वे जीवन-पथ से विमुख सभी व्यक्तियों के लिए एक दिशानिर्देशक का कार्य भी करते हैं। अपने एक ऐसे ही विशिष्ट उद्बोधन में वन्दनीया माताजी हर गायत्री परिजन को स्मरण दिलाती हैं कि हमारे लिए वसन्त पंचमी का अवसर अत्यन्त सौभाग्यशाली है; क्योंकि वह न केवल माँ सरस्वती के अवतरण का दिवस है; वरन पूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्मदिवस भी है। ऐसे में हमें यह स्मरण रखने की आवश्यकता है कि गुरुवर का हमारे ऊपर कितना अनुदान व कितना ऋण है तथा उस ऋण से उऋण होने का प्रयत्न हममें से हर परिजन को करना चाहिए। वे कहती हैं कि हमें पूज्य गुरुदेव से अतुलनीय अनुदान मिला है और हमें स्वयं से यह अपेक्षा करनी चाहिए कि हम गुरुदेव के लिए कुछ कर सकें, तभी हम उनके सच्चे शिष्य बन पाएँगे। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को—</p><p>
 

गुरु की पुकार</p><p>
 

अभी बच्चे कह रहे थे—अभी गाना गा रहे थे— "देश की पुकार है", बेटे और मैं कहूँगी कि गुरु की पुकार है और मार्गदर्शक की पुकार है और वो कहता है कि मेरे बच्चों आओ, अब मैं थकता जाता हूँ। अरे थकेगा तू, तेरे घरवाले, वो नहीं थक रहे। उनके अन्दर अभी इतनी जीवनीशक्ति है, जितनी एक अठारह साल के नौजवान में होगी।</p><p>
 
बेटे, उनकी कलाइयों में, उनके दिमाग में इतनी क्षमता है कि किसी विद्यार्थी के भी नहीं हो सकती जितना उनमें है, लेकिन अब समय है कि आप आइए और साथ दीजिए। बेटे आप नहीं देंगे तो आप पछताएँगे कि हम किस सन्त के साथ जुड़े थे और अभागे-के-अभागे रह गए।</p><p>
 
भगवान ने सब कुछ दिया—आँचल ही न समाय तो क्या करिए। देने वाले ने बहुत दिया, पर आँचल ही न समाय तो क्या करिए। बेटे देने वाले ने कोई कसर नहीं छोड़ी। बेटे उन्होंने अपने शरीर के साथ भी अन्याय किया। अपनी अक्ल के साथ में भी किया। एक घड़ी चैन से कभी विश्राम नहीं किया। सारा-का-सारा जीवन लगा दिया। उन्होंने किसके लिए लगाया है? अपने लिए? नहीं बेटे, आप सबके लिए, सारे विश्व के लिए, लेकिन आप तो संकीर्ण हैं न। आपका आँचल भर दिया गया, लेकिन आप हर समय उसको यों ही झटकारते रहे, फैलाते रहे, तो बताइए फिर वो अनुदान कहाँ रुकेगा? कहाँ जाएगा? बेटे वो तो ठोकर खाकर के लौट जाएगा।</p><p>
 
शंकर और पार्वती जा रहे थे। सोमवती अमावस्या थी। गंगास्नान करने को लोगों की भीड़ जा रही थी। उन्होंने कहा कि शंकर जी! ये सारी इतनी जो भीड़ है, ये कहाँ जा रही है। उन्होंने कहा कि यह सब गंगा जी नहाने जा रही है, तो फिर इनका होगा क्या? तुम्हें नहीं मालूम है क्या होगा?</p><p>
 

भगवान शिव ने ली परीक्षा</p><p>
 

उन्होंने कहा कि ये स्वर्ग में जाएँगे। तो एकोएक जो भी गंगास्नान करने जा रहा है, ये सब स्वर्ग में जाएँगे? अरे शंकर जी! आप तो मजाक कर रहे हैं। इतनी भीड़ स्वर्ग में कहाँ समाएगी। उन्होंने कहा—तुम्हें विश्वास नहीं है? कतई नहीं है। उन्होंने तर्क करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि मेरी समझ में नहीं आता, जाने आप कौन-सी भाषा में कह रहे हैं कि ये सब स्वर्ग को जाएँगे। उन्होंने कहा कि अच्छा चलो मेरे साथ अभी दिखाता हूँ कि जाते हैं कि नहीं जाते।</p><p>
 
तो शंकर जी ने कोढ़ी का रूप बनाया, बूढ़े का रूप बनाया और पार्वती का रूप था नौजवान खूबसूरत लड़की के रूप में। उन्होंने कहा कि पार्वती! तुम मेरे बोझे को सँभाल लोगी। उन्होंने कहा—नाथ! जब आप मुझे शक्ति देंगे तो मैं क्यों नहीं आपका वजन सँभाल लूँगी। आप जो कुछ भी मेरे ऊपर वजन लादेंगे, मैं सब सहन कर लूँगी।</p><p>
 
उन्होंने कहा—तो बस, बन गया काम। शंकर जी कन्धे पर सवार हो गए और पार्वती जी शंकर जी को लेकर गंगास्नान के लिए ले जा रही थीं। तो जो भीड़ जा रही थी, क्या कह रही थी, जरा देखना-सुनना। अपनी जबान से उस माँ के लिए कहते हुए
उनकी जबान नहीं कटी। हमारी जो बेटियाँ, हमारी ये बहनें जिनकी ओर कुदृष्टि डालते हैं, उनकी आँखें फूटती नहीं हैं और जबान कटती नहीं है। तब भी ये ऐसे ही थे, अभी भी ऐसे ही हैं।</p><p>
 
उन्होंने कहा—अरे! क्या मिलेगा इस कोढ़ी के साथ, तू चल हमारे घर। हमारे यहाँ भैंसें हैं और कोठी है, कार है, खूब खिलाएँगे तो ऐसी मोटी हो जाएगी और कार में घुमाएँगे जेवरों से लाद देंगे। बढ़िया-बढ़िया कपड़े पहनाएँगे। इस कोढ़ी को यहीं डाल, यहीं फेंक और चल हमारे साथ। तो पार्वती जी दुःखी हुईं और उन्होंने कहा—नाथ! इसी के लिए, मेरा निरादर कराने के लिए मुझे लाए थे क्या? क्या यही भक्त स्वर्ग में जाएँगे? ये तो न अब जाएँ न फिर जाएँ, ये तो कभी नहीं जाएँगे, सौ जन्म में भी नहीं जाएँगे।</p><p>
 
उन्होंने कहा—पार्वती! अभी देखती चल आगे-आगे क्या होता है? उन्होंने कहा—भगवान! मैंने देख लिया आपकी माया अब मुझे तो कुछ देखना नहीं है, अब तो मैं थक गई। मेरी आँखें भी फूटी जा रही हैं और मेरे कान भी ऐसा मालूम पड़ रहा है, जैसे कोई गरम तेल डाल रहा हो। मुझे माँ कहते थे और लोग मुझे अर्घ्य चढ़ाते थे, नहलाते थे। बेलपत्र चढ़ाते थे कि ये शंकर जी की पत्नी हमारी माँ हैं, विश्व की माँ हैं और आज ये माँ के लिए ऐसे-ऐसे शब्द कह रहे हैं कि मैं क्या करूँ?</p><p>
 
उन्होंने कहा—पार्वती! इस दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, देखती जाओ और शाम हो गई, तो उधर से गंगा जी की तरफ एक राहगीर आ रहा था। पार्वती अपने पति को लिए बैठी थीं कि अब तो मैं थक गई। वो पास आया, प्रणाम किया। उसने कहा कि माँ धन्य है आप जैसी पवित्र नारी के लिए। आप साक्षात् माँ हैं, देवी हैं जो आप सेवा कर रही हैं, थोड़ा-सा लाभ हमें भी दीजिए। क्या दूँ बेटे! क्या करेगा? आप क्यों आई हैं? उन्होंने कहा कि बेटे! मैं इसलिए आई हूँ कि मेरे पति का मन था कि मुझे गंगास्नान कराया जाए।</p><p>
 
तो मैं गंगास्नान कराने के लिए लाई हूँ, पर बेटे! अब मेरे पैरों में दम नहीं रहा, अब मैं थक गई हूँ, अब मैं कैसे इनको गंगास्नान कराऊँ, इसलिए मैं यहीं बैठी हूँ। उसने कहा कि माँ मैं जो आपका बेटा हूँ, आपने जन्म ही तो नहीं दिया है, लेकिन मेरे लिए तो आप साक्षात् माँ हैं। आप साक्षात् पार्वती हैं, चलिए मैं नहलाता हूँ और बेटे वो गया, गंगाजल लाया, उनको नहलाया। जहाँ पीव-मवाद थी, उसको पोंछा और कहा कि माँ अब मैं चलता हूँ।</p><p>
 
तब शंकर जी ने कहा कि पार्वती! ये जाएगा स्वर्ग। अब तक तो ये जितने भी थे, ये भड़ुए थे। गंगास्नान वाला कोई भी नहीं था, यह सब भड़ुए थे और भड़ुए कहाँ जाएँगे, अपना पैसा भी गँवाएँगे और समय भी गँवाएँगे, निरर्थक गँवाएँगे और खाली हाथ चले जाएँगे; क्योंकि ये भड़ुए हैं। जैसी इनकी नीयत है, वैसी ही बरक्कत और स्वर्ग में सिर्फ जाएगा तो यह जाएगा, जिसका मैंने उदाहरण दिया।</p><p>
 
ज्ञान की गंगा को लाइए</p><p>
 
बेटे अभी मैंने शंकर और पार्वती का उदाहरण दिया है। ये लोक-कल्याण के लिए, ज्ञान की गंगा को लाने के लिए आपके लिए तैयार हैं, आप भी नहाइए और दूसरों को नहलाइए। उसमें आप भी सराबोर हो जाइए और दूसरों को भी सराबोर कीजिए। उनको भी अवसर दीजिए, नहीं खुद ही खाएँगे, खुद ही लेंगे, नहीं बेटे न खुद खाएँगे न खुद लेंगे अन्यथा आप भी खाली-के-खाली रह जाएँगे।</p><p>
 
इसी सन्दर्भ में चलिए आपको मैं एक और कहानी सुनाती हूँ। एक ब्राह्मणी थी, एक ब्राह्मण था और एक था उसका बच्चा, तीनों जन जा रहे थे। फिर वो शंकर-पार्वती आ गए। पार्वती ने कहा कि साहब! तीनों ने आपकी इतनी उपासना की है। तीनों को आप वरदान नहीं देंगे? उन्होंने कहा कि पार्वती! देने को तो मैं लालायित हूँ कोई हो तो सही। जैसे गाय के थनों में दूध भरा रहता है, गाय रम्हाती है कि मेरा बच्चा कहाँ है, जो मेरे थन का यह दूध पी जाए और ये हलके हो जाएँ। दूध देने के लिए गाय रम्हाती है, अरे ले तो सही, कोई हो तो सही, मैं किसको दूँ आखिर?</p><p>
 
उन्होंने कहा कि इतने दिनों से जो उपासना कर रहे हैं और माला सटका रहे हैं, सटक-सटक, सीताराम सटक सीताराम का सवा लाख का अनुष्ठान, 24,000 का अनुष्ठान। अच्छा और जीवन में कुछ नहीं धारण किया तो क्या हुआ? खाली हाथ मिलेगा, कुछ नहीं मिलेगा। अरे, माताजी क्या करें? हाँ बेटा देख वही कह रही हूँ, सच्ची कह रही हूँ, मैं झूठ नहीं कह रही।</p><p>
 
उन्होंने कहा कि तीनों ने इतना तप किया अब तो आप इनको दे दीजिए। आप ऐसे संकुचित क्यों हो रहे हैं? आप भी मनुष्यों की तरह संकीर्ण रहेंगे क्या? नहीं, सो तो नहीं हूँ। मनुष्यों की तरह से संकीर्ण रहूँगा तो मुझमें और साधारण मनुष्य में क्या अन्तर रह जाएगा। तुम कहती हो तो अभी देता हूँ चलो। उन्होंने कहा—तो सबसे पहले बुढ़िया आगे आ गई।</p><p>
 
शंकर जी ने कहा—भाई ऐसा है तुमने तप किया है, मैं बहुत प्रसन्न हूँ और चलो जो तुमको माँगना है, वरदान माँग लो। तो सबसे आगे बुढ़िया आ गई। बुढ़िया ने कहा—भगवान! यदि आप वरदान दे रहे हैं तो एक वरदान मुझे दे दो। क्या वरदान दें? बस, मुझे तो खूबसूरत बना दो। बच्चियों को हँसी आ गई देख लो खूबसूरत बना दो। उन्होंने कहा—दे दिया तुम्हें वरदान। बस, अब वो अठारह साल और 16 साल की खूबसूरत जवान बन गई, जो खूब जेवर पहने हुए थी, पाउडर लगाए हुए थी, लिपिस्टिक पोते हुए थी, खूब लाल-लाल गाल और ओंठ भी लाल, सब लाल-ही-लाल दिखे और कपड़े भी उसके चमक-दमक।</p><p>
 
सो बुड्ढा यह देखकर जल करके खाक हो गया। उसका तन, बदन जल गया और उसने कहा कि चुड़ैल इसी दिन के लिए तूने उपासना की थी और वो झल्लाया कि आज तो मैं इसे जान से ही मार दूँगा। शंकर जी बोले कि भाई, ऐसे गरम क्यों हो रहा है? दुःखी क्यों हो रहा है, तू क्यों परेशान हो रहा है? तू भी माँग ले एक वरदान। उसने कहा कि हाँ तो मेरा काम बन गया। तो माँग, क्या माँगता है।</p><p>
 
उसने कहा कि यदि आप वरदान दे रहे हैं तो एक वरदान मुझे ऐसा दे दो कि बस, फिर मुझे कुछ माँगना नहीं पड़े, तू माँग ले। उसने कहा कि यह जो चुड़ैल बुढ़िया है, इसको सुअरिया बना दो। तो उन्होंने कमण्डल से जल लिया और छिड़क दिया और सुअरिया बना दिया।</p><p>
 
अब उसका बच्चा रोने लगा, अरे मम्मी को क्या हो गया? मेरी मम्मी तो सुअरिया हो गई। उसने कहा महाराज जी! क्या कर रहे हैं? आपने इसे सुअरिया बना दिया, ये क्या कर दिया? उन्होंने कहा कि बेटे तू क्यों रो रहा है? तू भी एक वरदान माँग ले, हम तो देने के लिए खड़े हैं, लेना है तो ले-ले। उसने कहा कि भगवान मैं तो कुछ नहीं माँगता, जैसी मेरी माँ थी, वैसी ही आप बना दीजिए। फिर वो बुढ़िया हो गई।</p><p>
 
तब शंकर जी ने कहा कि देख लिया पार्वती जी मैंने तो तीनों को एक-एक वरदान दे दिया। मेरी तो कंजूसी नहीं रही, अब तो वही बात आ गईं। देने वाले ने बहुत दिया, लेने वाले के आँचल ही न समाये तो क्या करेंगे। उन्होंने कहा कि इनकी खोपड़ी में ही नहीं आया, इनकी समझ में ही नहीं आया, जो माँगना चाहिए था वो इनकी खोपड़ी में ही नहीं आया, इनकी समझ में ही नहीं आया, जो माँगना चाहिए था वो इन्होंने नहीं माँगा और जो नहीं माँगना चाहिए था वो इन्होंने माँग लिया। अब मैं क्या कर सकता हूँ? खाली हाथ के खाली हाथ रहेंगे।</p><p>
 
हाँ बेटे, आप भी इसी तरीके से रहेंगे। यदि आप भी उसी में से होंगे ब्राह्मण, ब्राह्मणी में से, बच्चों में से तो फिर आपका भी यही हाल होने वाला है, समझ लेना। फिर गुरुजी को दोष मत देना कि गुरुजी ने नहीं दिया। गुरुजी ने तो बेटे सब कुछ दे दिया। आप नहीं समझे तो वो क्या कर सकते हैं? उनके हाथ की बात नहीं है, आपके हाथ की बात है।</p><p>
 
सन्त की तपस्या</p><p>
 
बेटे एक सन्त थे। सन्त ने तपस्या की और गणेश जी आए। कहा—भाई! वरदान माँग लो। तुमने इतना तप किया है तो वरदान ले लो। उन्होंने कहा—जाओ अपने घर, हमने इसके लिए तप नहीं किया। हमारी जीवात्मा के ऊपर जो कषाय-कल्मष चढ़ा हुआ है, मल की जो पर्त चढ़ी हुई है, उसके लिए हम तप कर रहे हैं, हम वरदान के लिए नहीं कर रहे हैं। जाइए यहाँ से हम अपने आप ही वरदान पा लेंगे। काहे का वरदान माँगें, पैसे का माँगें तो हमारी भुजाएँ कहाँ चली गईं। अक्ल हमारी कहाँ चली गई है। हम अक्ल से कमा लेंगे, भुजाओं से कमा लेंगे। करोड़ों रुपये की, अरबों रुपये की काया जो संसार की सारी दौलत से ज्यादा है, जो भगवान ने हमें नियामत रूप में दिया है। फिर हमारे पास काहे का घाटा रह गया है। केवल घाटा है तो हमारी अक्ल का घाटा है, अन्तःकरण का कोई घाटा नहीं। उन्होंने कहा—चला जा।</p><p>
 
गणेश जी भगवान शंकर जी के पास पहुँचे। पापा जी! उन्होंने मेरी नहीं मानी, दुत्कार के भगा दिया। उन्होंने कहा कि भाई, ये तो भगवान का भी तिरस्कार हो गया अब तो मुझे ही चलना चाहिए। शंकर जी आए और उससे कहा कि भाई हम तुम्हारे तप से बहुत प्रसन्न हैं, तुम माँग लो। उसने कहा कि हमको नहीं चाहिए। तुम्हें नहीं चाहिए तुम मत लो, लेकिन लोक-कल्याण के लिए, लोकहित के लिए ले लो।</p><p>
 
उसने कहा कि तब आपका वरदान सिर माथे पर है। फिर तो मुझे लेना ही चाहिए और लूँगा ही। तो उन्होंने कहा—माँग। उसने कहा कि भगवन्! आपकी छाया चाहिए, जिधर जाऊँ, मेरी छाया जहाँ पड़े, वहीं स्वर्ग, वहीं प्रसन्नता, वहीं प्रफुल्लता, वहीं आनन्द और वहीं ज्ञान का सागर लहराता चले। उन्होंने कहा—मैंने बेटे दे दिया।</p><p>
 
सन्त आगे बढ़ता गया और छाया पीछे-पीछे चलती गई और जहाँ-जहाँ छाया पड़ती गई, बेटे वहीं कायापलट होता गया। हरे-भरे पेड़ हो गए, जहाँ से निकला वहीं से सुगन्ध, वहीं से प्रकाश और वहीं से छाया आगे बढ़ती गई। सन्त ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बेटे हूबहू आपके साथ भी यही बात है। इस सन्त ने भी कुछ नहीं माँगा है। बिलकुल खाली हाथ सारे दिन कमाया और शाम को सब पल्ला झाड़ दिया और चैन की नींद सोए। कई बार रात को कोई परिस्थितियाँ आ जाती हैं तो मैं कहने भी लगती हूँ कि साहब! कुछ ऐसा, कुछ वैसा न हो जाए। उन्होंने कहा कि देखो जी! कोई ऐसा-न-वैसा, शाम हो गई है? हाँ साहब! हो गई। छोड़ो, हमें न कोई चिन्ता है न कोई फिकर है। जिस भगवान ने हमको बनाया है वही हमारा सब कुछ है, हमको कुछ नहीं चाहिए, सो जाओ चुपचाप।</p><p>
 
हमने कहा—साहब! बिलकुल ठीक, मेरी अक्ल थोड़ी ऐसी हो रही थी, इसलिए मैं कह रही थी। बेटे चिन्ता नाम की कोई चीज नहीं है और जिसे लिप्सा कहते हैं, मोहग्रस्तता कहते हैं, जो मोह में डूबे रहते हैं, लोभ में डूबे रहते हैं, बेटे रत्ती भर लोभ भी नहीं है और रत्तीभर मोह भी नहीं है। फर्ज और कर्तव्य जरूर है। फर्ज और कर्तव्य के प्रति तो बेटे ऐसे ईमानदार हैं कि मैं समझती हूँ कि सारे संसार में यदि हम दीपक लेकर ढूँढ़ें तो शायद ही कोई ईमानदारी में मुकाबले का निकले। वफादारी और ईमानदारी, फर्ज और कर्त्तव्य में अद्वितीय, बीबी के लिए भी फर्ज और कर्तव्य। कोई बीमार पड़ जाए तो बेटे उपचार से लेकर सारी-की-सारी जिम्मेदारी स्वयं अपने कन्धे पर ले लेते हैं। सारे में लिप्त हैं? लिप्त नहीं हैं, बेटे लिप्त होते, तो हम भी कहीं महल बनाकर रहे होते, गाड़ियों में सवार हुए होते और जाने क्या होता। फिर हम तो जानें कौन हो गए होते? लेकिन फकीर हैं बेटे, बिलकुल फकीर। कोई हम भिखारी नहीं हैं। हम दिलेर हैं, सारा समाज हमारा अपना है, सारा विश्व हमारा अपना है।</p><p>
 
स्वामी रामतीर्थ कहते थे कि यह सारा संसार राम बादशाह का है। बेटे हम तो बादशाह हैं। इतने बच्चों की माँ हूँ। इतने बच्चे तो मेरे सामने बैठे हैं और जो लाखों-करोड़ों मेरे बालक हैं सो? ये मेरी बहन के हैं। इनकी जेब, मेरी जेब है। दौलत की कोई कमी है क्या? हमारे पास दौलत की कोई कमी नहीं है। बेटे जिन्दगी में कमी किस चीज की है? किसी चीज की कमी नहीं है। जिन्दगी भर बेटे उस सन्त ने प्यार लुटाया और श्रद्धा पाई। बेटे दिया- ही-दिया है और हजारों गुना लिया। ये सिद्धान्त सही है देना और लेना। आप लोगों ने लेना सीखा, लेकिन देना नहीं सीखा। जिस दिन देना सीख जाएँगे तो सच मानिए अनुदानों की जो वर्षा हमारे ऊपर हुई है, आपके ऊपर भी अनुदानों की वही वर्षा होने वाली है।</p><p>
 
भावना दें पैसे नहीं</p><p>
 
माताजी! आपका संकेत क्या पैसे की तरफ है। अरे हट, फिर तू पैसे को लेकर आ गया। अरे पैसे की कौन कहता है? पैसा नम्बर दो पर आता है। ठीक है इमारत पैसे से बनती है, कल-कारखाने पैसे से चलते हैं। हाँ, पैसों की भी जरूरत है, इतनी गाड़ियाँ गई हैं, पैसे से गई हैं, कार्यकर्ताओं का निर्माण होता है और वो पैसे से होता है और इतनी टूट-फूट का इतना जो खरचा लेकर बैठे हैं, वो सब पैसे का ही है। हाँ बेटे बिलकुल पैसे का, लेकिन पैसा ही सब कुछ नहीं है, वो भावना है, वो निष्ठा है, वो आस्था है। यदि आपकी भावनाएँ हमें मिल जाएँ, तब तो बेटे हमको सब कुछ मिल गया। आपकी भावना नहीं मिली तो? अरे तो फेंकते रहो इन ठीकरों को, ठीकरों से क्या होता है? यही दे गए, फिर इससे सारा काम चलेगा क्या? इससे कुछ काम चलने वाला नहीं है। आपकी भावनाओं से काम चलने वाला है। आपकी आस्थाओं से काम चलने वाला है और आपकी निष्ठा और श्रद्धा से ही हमारा काम चलने वाला है। मिशन की जो जिम्मेदारी आपके ऊपर डाली है वह और माताजी इस मिशन का काम इन्हीं से चलने वाला है।</p><p>
 
बेटे, ये गुरुजी का और माताजी का आज का सन्देश है। गुरुजी और माताजी अलग नहीं हैं। कहते हैं—अरे साहब! हमने सुना था कि माताजी के रूप में गुरुजी विद्यमान होंगे। हाँ तो देख बेटे, हैं। नहीं हैं, बिलकुल नहीं हैं। कहाँ हैं बता मैं बैठी हूँ। मैं नारी हूँ वो नर हैं, पर हमारे विचार और सिद्धान्त दूध और पानी के तरीके से, छाया और वृक्ष के तरीके से एकदूसरे के साथ हैं, शरीरों के लिए नहीं, उद्देश्यों के लिए हैं। मैंने पहले भी कहा था अब भी कह रही हूँ, बेटे शरीरों के लिए नहीं, उद्देश्यों के लिए हैं, लक्ष्य के लिए हैं। जो मार्ग हमको दिखाया है, हमने कसम खाई है कि हम इसी मार्ग पर चलेंगे और चलाएँगे। मैं अपने बेटों से कहूँगी बेटे, तुम्हारे सामने मैं जीती-जागती बैठी हूँ, मैं आगे-आगे चल रही हूँ, साथ रहना, आगे चलना। यह बाप की पुकार है, ये माँ की पुकार है।</p><p>
 
बेटे! आज वसन्त पंचमी का दिन है। आज गुरुजी का जन्मदिन है। बेटे यह भावभरी श्रद्धांजलि भावनाओं की है, पैसे की नहीं। पैसे होंगे तो पैसा भी देना, नहीं हमें नहीं चाहिए पैसे-वैसे। हमें चाहिए आपकी भावना, हमें चाहिए आपकी आस्था। आज का दिन, आज का ये पर्व हमारे लिए कितना उल्लास का, कितना पवित्र है। उस माँ के लिए क्या कहें, लाख-लाख बार प्रणाम जिसने ऐसे सन्त को जन्म दिया और उस सन्त के लिए भी बार-बार प्रणाम, जो हमारे और आपके जीवन में आया।</p><p>
 
आज बेटे वही सन्देश मैं आपको सुनाने आई थी कि आपके अन्तःकरण में यदि ये धारण हो सके तो समझूँगी कि आपका आना सार्थक है। जो अग्नि उनके अन्दर जलती रहती है, मेरे बच्चे एक-एक चिनगारी भी लेकर चले जाएँ तो धन्य हो जाएँ। धन्य हो जाए मेरे बालक की वो चिनगारी जो बाप की चिनगारी और बाप का दर्द, पिता का दर्द, गुरु का दरद ले करके जाए।</p><p>
 
जैसे कि आचार्य जी ने, गुरुजी ने अपने गुरु के दर्द पर अपना सारा-का-सारा जीवन लगा दिया। गुरु ने आदेश दिया कि बेटे जा घर-घर अलख जगा, ज्ञान के द्वारा अपनी अक्ल को लगा दे, दाँव पर हाथ-पैर लगा दे। बेटे उन्होंने अपने को दाँव पर लगा दिया। बच्चे कहते हैं कि अरे! गुरुजी को क्या हो गया? बीमार हो गए? बीमारी नहीं है। देख ले बीमार कहाँ हैं, देखा नहीं था। वीडियो कैसेट में देख ले, बीमार कहाँ हैं? बीमार नहीं हैं। तो डर है? अरे जा रे, डर होगा किसी और को।</p><p>
 
हम डरपोक व्यक्ति नहीं हैं। हम तो वो हैं शेर, हाथी अपने रास्ते पर चलता रहता है और पीछे-पीछे कुत्ते भी चलते रहते हैं, भौंकते रहते हैं, भौंकने दो। ये भौंकेगा सो भौंकेगा, लेकिन हम तो शेरों में से हैं और उस हाथी में से हैं। उन दिलेरों में से हैं, जो करके दिखाएँगे। बेटे, कुछ करके दिखाने के लिए आज मैं आपको सम्बोधित कर रही थी कि जो हमने संकल्प लिया है, वही संकल्प आपको लेना चाहिए। आप लेंगे कि नहीं लेंगे, इसमें तो मुझे शक है, पर मैं विश्वास करती हूँ कि मेरे बच्चे जरूर मेरा अनुकरण करेंगे, आज वसन्त पर्व है, बेटे गुरुजी की ओर से और मेरी ओर से आपको शुभकामनाओं समेत बहुत-बहुत प्यार, आशीर्वाद आप सबके लिए।</p><p>
 
॥ ॐ शान्तिः ॥ 
