समझदारों की नासमझी

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि वे चिन्तनशील व्यक्ति को समाज के उत्थान के लिए, उसके विवेक का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं तो वहीं भावनाशीलों को उनकी भावना का उपयोग राष्ट्र के जागरण में करने के लिए कहते हैं। ऐसे ही एक प्रस्तुत उद्बोधन में वन्दनीया माताजी स्मरण दिलाती हैं कि आज के समय की सबसे बड़ी समस्या समझदारों की नासमझी है। जो करने योग्य कार्य हैं और जो सोचने योग्य विचार हैं, उनको त्यागकर व्यक्ति उन उद्देश्यों के लिए जीवन को लगाता नजर आता है, जो सर्वथा त्याज्य एवं निन्दनीय हैं। वन्दनीया माताजी ‘टॉम काका की कुटिया’ पुस्तक का उदाहरण देते हुए सभी साधकों को प्रेरित करती हैं कि वे समाज की विकृतियों को दूर करने एवं राष्ट्र का उत्थान सुनिश्चित करने हेतु कृतसंकल्पित हों। वन्दनीया माताजी पूज्य गुरुदेव की तपस्या और उनकी सहृदयता का स्मरण भी प्रत्येक गायत्री परिजन को कराती हैं।

आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को......

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

समझदारों की नासमझी

हमारे आत्मीय परिजनो! समझदारों की नासमझी क्या होती है? समझदारों की नासमझी वह होती है कि जब कोई समझदार गलती करता है तो वो क्षम्य नहीं होता और नासमझ गलती करता है, कोई अनपढ़ करता है, कोई बे-समझ करता है, उससे कोई गलती हो गई, भूल हो गई, तो क्षमा कर दिया जाता है; क्योंकि उसमें अक्ल ही नहीं है। वो तो पीछे-पीछे चलने वाला है, लेकिन आज समझदारी का क्या ठिकाना है, व्यक्ति समझदार होते हुए भी नासमझ है।

मैं आज उस घटना को लेकर के चलूँगी, जो विदेशी है। एक अँगरेज था। वो बाहर से आया और घर में आते ही थोड़ा-सा एक मिनट का अन्तर हो गया, नौकर ने नमस्कार नहीं किया तो उसके ऊपर लगा कोड़े बरसाने और उसके ऊपर इतने कोड़े बरसाए कि हर कोड़े के साथ उसका खून छलछला आया। एक लड़की उसको देख रही थी, वो तिलमिलाने लगी और उसने कहा भी, अनुनय-विनय भी की कि ऐसा अत्याचार मत करो, यह इनसानियत नहीं है।

इसी तरीके की एक और घटना है। अमेरिका में एक व्यक्ति था, जहाँ गोरे और कालों में भेद है। तो वो वहाँ खेत जोत रहा था। कहीं तो ऐसा है कि बैलों के साथ जुताई होती है। हमारे यहाँ बैल करते हैं, वहाँ घोड़े करते होंगे। तो वहाँ घोड़े के साथ उस नीग्रो को लगा दिया गया और उसे थोड़ी-सी नींद आ गई। नींद आ कैसे गई? नहीं आनी चाहिए। खरीदा हुआ गुलाम है।

अब खरीदे हुए गुलाम की कोई जान होती है? वो तो पशु से बदतर है। पशु से बदतर की जो जिन्दगी है और जो उसके साथ में व्यवहार है, वो उसके अनुकूल नहीं है, प्रतिकूल है। उसने भी इतने कोड़े बरसाए उस पर कि वह आह भी न कर सका और धूल में मिल गया। उसने दम तोड़ दिया और वो लड़की चुपचाप देखती रही।

इसी तरीके से एक और घटना है, जिसमें एक दासी को बेचा गया। उसका 3 वर्ष का एक बच्चा था। वह बच्चा अपनी माँ के लिए तड़पता हुआ रह गया और माँ अपने बच्चे के लिए तड़पती रह गई और उसको बेच दिया गया।

‘‘उसने दोनों हाथ फैलाए और कहा कि अरे! मेरा बच्चा क्यों छीनते हो।’’ किसी माँ से पूछिए कि उसके बच्चे को कोई उठा ले जाए तो कितनी पीड़ा उस माँ को होगी, लेकिन वो नहीं माने और उस दासी को बेच दिया गया, बच्चा अलग और माँ अलग।

टॉम काका की कुटिया

लड़की यह सारा दृश्य देखती रही और यहाँ से जो कहानी शुरू हुई तो उस छोटी-सी एक लड़की ने अपने मन में एक शपथ ली, एक संकल्प लिया। उसके मन के, अन्तःकरण के भगवान ने कहा कि इस अनीति से जूझना चाहिए और अन्त तक जूझना चाहिए। हमको चाहे सजा होगी, चाहे हमारे प्राण जाएँगे, जाएँगे तो जाएँगे, पर हम अपने संकल्प बल से विचलित नहीं होंगे।

उसने एक पुस्तक लिखी, जिसका नाम है— ‘टाम काका की कुटिया’। इस पुस्तक के 300 संस्करण छप चुके एवं अन्यान्य भाषाओं में, जाने कितनी भाषाओं में इसे छापा गया और उसने सारे अमेरिका में तहलका मचा दिया। उन दिनों अब्राहम लिंकन वहाँ के राष्ट्रपति थे, जो एक नया कानून बनाने जा रहे थे, जिसमें कि नीग्रो के अधिकारों की बात थी, लेकिन उनके हृदय पर गहरी चोट पहुँची। उनके ऊपर प्रहार हुआ। ऐसा प्रहार किसका हुआ? बन्दूक का या तलवार का? नहीं, आप नहीं जानते, शब्दों का प्रहार और विचारों का प्रहार जबरदस्त होता है।

विचारों का प्रभाव

आप क्या समझते हैं कि विचारों का प्रभाव इतना जबरदस्त होता है कि अभी हमारे लड़के ने कहा था कि रावी तट पर संकल्प लिया गया था और स्वतंत्रता मिल करके ही रही। कोई रोक सका क्या? कोई नहीं रोक सका था। हमारी यह हृदयहीनता हमें कहाँ ले जाएगी?

हम समझदार बनते हैं, हम पढ़े-लिखे बनते हैं, फिर ये हृदयहीनता क्यों है, विशालता क्यों नहीं आई? इसी तरीके से एक घटना अभी-अभी की याद आई है और जब मुझे यह याद आती है तो मेरा हृदय तिलमिलाने लगता है कि जिसके घर में बारात आने वाली हो, उसका पिता तैयारियाँ कर रहा हो, उसकी माँ खुशी से तैयारियाँ कर रही हो और उसी दिन उसके निर्दोष बाप की हत्या कर दी जाए जिसका कोई दोष नहीं, अब उस माँ को पूछिए कि उसका क्या हाल होगा?

उस बेटी को देखिए, उसका क्या हाल होगा? जिसके यहाँ अभी गीत गाए जा रहे थे, उत्सव मनाया जा रहा था, ब्याह-शादी का माहौल था और उसके पिता को भून दिया गया। ये कहाँ की घटना है?

ये हमारे ही राष्ट्र की है। ये दिल्ली की घटना है, जहाँ एक बड़े अधिकारी थे और उनको गोली मार दी गई। यह समझदारों की नासमझी है। यदि इनके मन में समझदारी आ जाए तो? तो फिर ये क्या-से-क्या नहीं कर लेंगे।

वे बहुत कुछ कर सकते हैं, लेकिन समझ में नहीं आता है। तर्क तो बहुत है, पढ़ाई-लिखाई बहुत है, शिक्षा तो बहुत है। शिक्षा का तो क्या कहना है। विज्ञान से लेकर अनेक जाने क्या-क्या किस तेजी से बढ़ती हुई जा रही है। उतने ही अपराध बढ़ते जा रहे हैं।

पुराने वक्त में थोड़े अपराध होते थे, इतने अपराध नहीं होते थे। मैं उसको यह तो नहीं कहती हूँ कि कोई अच्छी बात है, लेकिन जो कोई अपराध करता था, तो उसे कठघरे में रख दिया जाता था और शेर छोड़ दिए जाते थे, जो नोच-नोच करके उसको खा जाते थे। नमक छिड़क दिया जाता था, ताकि यह अपने कसूर को समझने की कोशिश करे कि हमने यह गलती की है और सब देखें, ताकि औरों को हिम्मत नहीं मिले।

समाज की विकृति

आज इतने अपराध बढ़ते हुए चले जा रहे हैं। शिक्षा जितनी बढ़ती हुई चली जा रही है, उससे ज्यादा अपराध बढ़ते हुए चले जा रहे हैं। आखिर क्यों अपराध बढ़ते हुए चले जा रहे हैं? यह कभी विचार किया क्या? नहीं, यह विचार नहीं किया। केवल अपने ही लिए जिए, अपना ही पेट भरा, अपने ही प्रचलन के लिए, अपनी ही रोटी के लिए सीमित रह गए।

पराया दुःख-दरद और पीड़ा ज़रा भी समझ में नहीं आया। एक नाव में तीन व्यक्ति बैठे थे। तो उनमें से एक बोला—जी साहब! जिनने विज्ञान नहीं पढ़ा, जिन्होंने विज्ञान नहीं पढ़ा वो तो कुछ भी नहीं जानता, वह तो महामूर्ख होता है।

उनमें से दूसरा बोला—उसने कहा कि जो इतिहास नहीं जानता, वो कुछ नहीं जानता। इतिहास में क्या है भाई? विज्ञान में क्या है? इतिहास वाला बोला—वाह! कुछ है ही नहीं, बाबर, हुमायूँ और जाने कौन-कौन बैठे हैं। फलाने सन् में पैदा हुए, फलाने सन् में मरे। तुम क्या जानते हो? तीसरा बोला—गणित सबसे बड़ा है और गणित के बाद कुछ नहीं है। मल्लाह जो नाव को चला रहा था, वो सबके ये तर्क सुन रहा था।

तर्क सुनते ही उसने एक बात कही कि भाई साहब! आप ये बताइए कि आपको नाव चलाना आता है क्या? तैरना आता है क्या? उनने कहा—नहीं, तो उसने कहा कि आपका विज्ञान किस काम का है? आपका इतिहास किस काम का है? आपका गणित किस काम का है? तूफान आने वाला है और यह नाव डूबने वाली है और मैं तो ये चला। मैं तो तैरकर पार हो जाऊँगा, लेकिन तुम लोग तैर कर पार नहीं हो सकते और जैसे ही तूफान आया मल्लाह तो कूद करके पार हो गया और वो तीनों-के-तीनों डूब गए। क्यों डूब गए? इसलिए डूब गए कि तर्क तो उनके पास बहुत थे।

बदला जाए दृष्टिकोण यदि

इसमें कोई दो राय नहीं हैं, शिक्षक भी थे, लेकिन समय के अनुसार उनको चलना नहीं आया, यदि समय के अनुसार चलते और समय के साथ-साथ कोई उपाय ढूँढ़ लेते तो सम्भव है, वो भी पार हो जाते। मैंने आपसे एक और निवेदन किया कि व्यक्ति यदि चाहे तो अपने दृष्टिकोण को बदल दे, ‘‘बदला जाए दृष्टिकोण तो इनसान बदल सकता है।’’ दृष्टिकोण को बदल दे तो इनसान बदलता हुआ चला जाता है। ये हमारी नासमझी है कि समय के अनुसार न हम सँभल पाए, न हम चल पाए, तो इससे ज्यादा नासमझी और क्या हो सकती है? यह नासमझी ही होती है।

‘‘किश्ती ने मोड़ा रुख तो किनारे बदल गए’’, किनारे बदल जाते हैं। हम नाव का मुँह जिस ओर कर देते हैं, उस ओर ही किनारा आ जाता है। तो फिर यह दृष्टिकोण क्यों नहीं बदला जाता है, ये विचारधारा क्यों नहीं बदली जाती है। हमारी यह विचारधारा जो सड़ी-गली है, इसको हम निकाल करके फेंकें।

कल हम शपथ लेंगे कि राष्ट्र के उत्थान के लिए आजीवन हमें सब कुछ करना है। शायद कल या परसों ही मैंने कहा था कि हमारे राष्ट्र में करोड़ों व्यक्ति हैं। यदि ये करोड़ों व्यक्ति एक समय का भोजन त्याग दें तो राष्ट्र की समस्याएँ बहुत कुछ हल हो सकती हैं, पर क्या कहें इस हृदयहीनता को। मैं इसे हृदयहीनता कहूँगी या हृदयहीनता नहीं, संकीर्णता कहूँगी। कमी है कोई? नहीं। देने वाला होता है तो गरीब भी दे करके खाता है।

गरीब भी खिलाकर खाता है और कंजूस होता है तो वो चाहे उसके पास जितनी अपार सम्पत्ति क्यों न हो, वो कंजूस-का-कंजूस ही बना रहता है और अगले जन्म में अपने उस धन पर वो साँप बनकर बैठेगा। साथ तो कुछ ले नहीं जा सकता, जैसा इस जन्म में है, वैसा ही उस जन्म में होगा, क्योंकि जैसे संस्कार बनाए हैं, उन संस्कारों के अनुसार ही हमें अगले जन्म में वही मिलने वाले हैं। वही ज्यों-का-त्यों हमें मिलने वाले हैं। इसलिए चौरासी लाख योनियों में घूमते हुए हमें जो यह मनुष्य योनि मिली है, फिर इसका सदुपयोग क्यों नहीं करना चाहिए? इसका दुरुपयोग क्यों करें? सदुपयोग करें, गुरुजी ने यही तो आप लोगों को सिखाया था न कि जिन्दगी का श्रेष्ठतम एक भी क्षण मत गँवाइए।

राष्ट्र का उत्थान करें

बेटे! जो क्षण चला गया वो आने वाला नहीं है। वो तो गया पीछे, वो तो पीछे रह गया। आप हर क्षण आगे बढ़ते जाइए और हर क्षण आप विश्वव्यापी चिन्तन करिए। अपने राष्ट्र का चिन्तन करिए कि हम राष्ट्र को क्या दे पाए। किस तरीके से हमारा राष्ट्र खुशहाल बने, खुशहाल ही नहीं, बल्कि इनके दृष्टिकोण को किस तरीके से हम बदलें।

हम विचारों से बदल सकते हैं और हम जैसे हैं, उससे बदल सकते हैं। पहले तो खुद बदलेंगे तो दूसरे बदलेंगे, जब तक हम नहीं बदलते हैं तो दूसरे नहीं बदलने वाले। इतनी जो भीड़ बैठी है, यह लाखों और करोड़ों का झुण्ड कम नहीं है। लाखों तो वे हैं, जो कि हमारी पत्रिका के सदस्य हैं और बाकी के वो हैं, जो एक से दस जुड़े हुए हैं। जो पत्रिकाओं को पढ़ते हैं, उनकी गिनती तो है ही नहीं और नाती-पोते, पंती-संती इनकी तो कोई गिनती ही नहीं है। इतनी फौज हमारे पास है।

ये फौज तो जाने क्या कर दे, जाने क्या कर सकती है। गुरुजी ने यह संगठन अकेले बनाया। कोई साथ था उनके? नहीं, एक भगवान उनके साथ था, उनका गुरु उनके साथ था और उनका पुरुषार्थ साथ था।

सारा-का-सारा यह जो पुरुषार्थ आपको दिखाई पड़ रहा है, उनकी सूक्ष्म प्रेरणा दिखाई पड़ रही है, उनकी वो उपासना दिखाई पड़ रही है, जिसमें कि चौबीस-चौबीस लक्ष के 24 पुरश्चरण किए थे। जौ की रोटी खाकर के और छाछ पीकर के अपनी जबान पर कौन लगाम लगा सकता है। जौ हम धोते थे, जौ को पहले गाय को खिलाते थे, फिर उसको सुखाते थे। जो गोबर में से निकलता था, उसे सुखाकर के हाथ से पीसते थे और उसकी रोटी बनाकर हम उनको खिलाते थे।

गुरुदेव की तपस्या

बाहर एक बार जाना हुआ। शुरू-शुरू में तो बोले—जौ का आटा रख दो। मैंने रख दिया। मैंने कहा कि देखिए आप बाहर जा रहे हैं, तो सबकी भावना होती है कि गुरुजी हमारे यहाँ आए हैं तो हमारे यहाँ का पका हुआ भोजन करें। फिर उनकी निष्ठा का, उनकी सुविधा का क्या हुआ।

पहली बार तो मैंने रख दिया, दूसरी बार बोले कि अच्छा तो रहने दो। तुम जौ का दलिया रख दो, तो मैंने कहा कि बात तो वही हो गई, चाहे दलिया रख दो और चाहे आटा रख दो। अच्छा ऐसा है कि एक स्टोव रख दो और बाकायदा स्टोव और सब चीजें मैंने रख दीं। वो बोले—मैं बना लिया करूँगा और खा लिया करूँगा, कभी तो टाइम मिलेगा ही। दो बार तो रख दिया, तीसरी बार मैं अड़ गई।

कभी-कभी मैं भी अड़ जाती थी। वैसे तो बहुत सभ्य हूँ और बहुत विनम्र भी हूँ। जीवन में मेरा किसी से लड़ाई-झगड़ा कभी नहीं हुआ और होगा भी नहीं। तीखा स्वभाव भी मेरा नहीं है कि हर वक्त किसी पर भी बरस पड़ूँ। यह मेरा स्वभाव है ही नहीं, माँ हूँ तो सब की माँ हूँ, पर मैं अड़ गई मैंने कहा कि साहब! मैं नहीं ले जाने दूँगी। मान लीजिए हमारे यहाँ कोई अतिथि आ रहे हैं और हम भोजन बनाकर उनके पास ले जाएँ और वो नहीं खाएँ तो फिर हमको कैसा लगेगा, जरा बताना। आप ही बताइए बुरा लगेगा कि नहीं।

मैंने कहा कि जब हमको बुरा लगेगा तो उनको भी बुरा लगेगा। उनने कहा—‘‘जैसा खाए अन्न-वैसा बने मन।’’ न मालूम कौन का, कैसा कुधान्य है। मैंने कहा कि धान्य-कुधान्य की ओर नहीं देखना है, हमें उनकी भावनाओं की ओर देखना है। वो हमारे हैं, उसका प्रायश्चित आप घर आकर कर लीजिए। यह बात तो समझ में आ गई और वो करते भी थे।

उस दिन से उनके मन में न मालूम क्यों मेरे लिए इतना सम्मान था कि मैं इसका वर्णन नहीं कर सकती। एक शब्द में मैं यह कहूँ कि उन्होंने माँ से भी ज्यादा अपने मन में मुझे स्थान दिया। मैं बहुत ऋणी हूँ, हजार जन्म भी लूँ तब भी मैं इस ऋण को नहीं चुका सकती। उनके हृदय में मेरे लिए इतना सम्मान और उदारता है कि मैं कह नहीं सकती कि मुझमें क्या विशेषता थी जिससे वे इतने प्रभावित थे।

जब मैं ऊपर सीढ़ी चढ़ती थी तो मेरा हाथ पकड़ करके पहली सीढ़ी से दूसरी पर ले जाते थे। मैंने कहा—साहब! आप ऐसा क्यों करते हैं कि मुझे देखते ही आप ऐसे खड़े हो जाते हैं, जैसे कोई राष्ट्रपति की अगवानी प्रधानमंत्री करता है। मैं कहती थी कि मैं आ जाऊँगी। आप जब नीचे से आएँगे तो मैं भी आ जाऊँगी।

गुरुदेव की सहृदयता

उनकी विनम्रता, उनका स्वभाव सबके लिए बिलकुल एक-सा था। मुझे मेज पर पहले से ही गिलास में पानी भरा रखा हुआ मिलता था। 5 मिनट लेट हो जाती थी तो प्रणव से यों कहते थे कि प्रणव क्या बात है आज माताजी 5 मिनट लेट कैसे हो गईं। वो तो ठीक साढ़े तीन बजे आ जाती हैं। क्या बात हो गई? उनकी तबीयत तो नहीं बिगड़ गई। उन पर लोड ज्यादा है न, मेरा भी लोड उनके ऊपर आ गया है देखना तो जरा। यह क्या है? यह सहृदयता है। यह ऊँचे उठाने की निशानी है। दूसरों को मनोबल देने की बात है। इससे उनके सामने मेरा मस्तक झुक जाता था। वे इतने उदार और इतने विनम्र थे।

मैंने तो भगवान की झाँकी देखी है। मैं क्या कहूँ कि व्यक्ति की भावनाएँ कहाँ से चलती हैं? बचपन से चलती हैं, पर चलिए किसी की बचपन से चलती हैं और किसी को चलाना पड़ता है। आपको हम चला रहे हैं। वो चले हुए थे, उनके अन्तर का जो भगवान था, वो बचपन से पहले से ही जगा हुआ था।

किसान आन्दोलन से लेकर के, किसानों के लिए काम करने से लेकर के, बुनता घर खोलने से लेकर, सारे गाँव को रोज़ी-रोटी तक दिलवाने से लेकर उन्होंने अनेक कार्य ऐसे किए जिससे की जनता की भलाई हो, वो काम उन्होंने किया। पढ़ाने का काम किया। लोग यों कहा करते थे कि पण्डित जी! नाम लिखना तो सीख गए, अब आप उर्दू और बता दो। तो वो हँसते थे।

उन्होंने कहा कि देखिए नाम लिखना ही काफी नहीं है। अभी तो आप पुस्तक भी पढ़ना नहीं जानते। पहले पुस्तक पढ़िए और फिर आप शुद्ध भाषा लिखिए। कम-से-कम मिलावट के दो अक्षर तो लिखिए। आप नाम लिख करके ही समझ गए कि अब हमें उर्दू पढ़ा दीजिए। उर्दू भी आपको पढ़ाएँगे। अभी हम प्रौढ़ शिक्षा के बारे में कह रहे थे। वे सारे गाँव के लोगों को इकट्ठा करते थे और उनको पढ़ाते थे। यह मैं उनकी सहृदयता के बारे में कह रही हूँ। समझदारी की बात कह रही हूँ। पहले तो मैंने नासमझी की बात कही थी, लेकिन अब मैं समझदारी की बात कह रही हूँ।

समझदारी से हमें सबक लेना चाहिए कि आखिर हमारा जो चिन्तन है, वो किधर जाता है। उनका चिन्तन किधर गया? उनका चिन्तन उधर गया है—पहले तो कांग्रेस आन्दोलन में कूद पड़े, उनकी माँ तक न रोक सकी, न पत्नी रोक सकी, न घर वाले रोक सके। यहाँ तक कि खुद जेल में थे, बहन की शादी तय कर दी गई।

आप अन्दाजा लगाइए कि जिसकी जवान माँ विधवा बैठी हो और जिसके सहारे का एक ही पुत्र हो और वह भी जेल में, घर में लड़की की शादी हो, बताइए जरा उसका क्या हाल होता होगा? लेकिन नहीं, उन्होंने कर्तव्य को सबसे ज्यादा माना और अपनाया।

उन्होंने कहा कर्तव्य पहला है और बाकी के गौण हैं। अपनी बहन की शादी पक्की करके आया हूँ तो हो ही जाएगी। माँ रोएगी तो रोएगी, पत्नी रोएगी तो रोएगी, मैं क्या कर सकता हूँ, लेकिन मुझे तो काम करना है। सारे किसानों का लगान उन्होंने माफ करा दिया था। इतना जबरदस्त था उनका व्यक्तित्व।

(क्रमशः अगले अंक में समापन)

परमवन्दनीया माताजी की अमृतवाणी

समझदारों की नासमझी (उत्तरार्द्ध)

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि वे व्यक्ति के अन्तर्मन को झकझोरते भी हैं और साथ ही साधकों-याजकों-शिष्यों को एक उत्कृष्ट पथ का पथिक बनने के लिए प्रेरित भी करते हैं। अपने एक ऐसे ही विशिष्ट उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी सभी को चेताती हैं कि वर्तमान समय समझदारों की नासमझी का है। जिन्हें आगे बढ़कर समाज को नई दिशा दिखानी थी, नई चेतना प्रदान करनी थी—वे अपने उद्देश्य को भूलकर कुछ और करते दिखाई पड़ते हैं। वे सभी गायत्री परिजनों को पूज्य गुरुदेव के आडम्बररहित जीवन से प्रेरणा प्राप्त करने को कहती हैं तो वहीं उन्हें परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करने के लिए प्रेरित भी करती हैं। वे सभी को स्मरण दिलाती हैं कि सच्चा अध्यात्म क्या है और पूज्य गुरुदेव की सन्तान होने के नाते हमें कैसा जीवन जीने की आवश्यकता है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.....

आडम्बर के विरोधी थे गुरुदेव

गुरुदेव सभ्य-शालीन इतने थे कि हर व्यक्ति उनकी सादगी को मान देता था। बनावटीपन ज़रा भी नहीं था। एक बार गोरखपुर गए थे तो पोद्दार जी ने पूछा—यह बताइए पण्डित जी! आपकी कितनी पत्रिका निकलती हैं, तो बता दिया कि कितनी निकलती हैं। नहीं साहब! ऐसा नहीं लगता, खैर आपकी निकलती होंगी। तो उन्होंने कहा कि आपको विश्वास नहीं होता तो रहने दीजिए, इसमें क्या बात है, थोड़ी निकलती होंगी, लेकिन आपके पहनावे और भाव से, आपकी सादगी से, आपके बिस्तर से ऐसा नहीं लगता कि आपकी पत्रिका इतनी निकलती होंगी। तो गुरुजी ने एक बात कही।

उन्होंने कहा कि आडम्बर पर मुझे कतई विश्वास नहीं है। मैं जैसा हूँ, वैसा ही हूँ। आप तो अपना बिस्तर कन्धे पर रख करके आए हैं। हमेशा वो थर्ड क्लास में चलते थे। लोग फर्स्ट क्लास का टिकट कराते थे कि गुरुजी! हम आपके लिए फर्स्ट क्लास का टिकट कर रहे हैं। दो-चार जगह तो जरूर जहाँ मैं गई हूँ, वहाँ तो जरूर हुआ है, अभी-अभी 4-5 बार गई हूँ; क्योंकि मुझे बीड़ी, सिगरेट, मीट, प्याज की गन्ध नहीं सुहाती है। अब गाड़ी में कोई खाएगा, कोई पिएगा तो कोई किसी को रोक लेगा क्या? और उनका स्वभाव तो यह था कि कोई खा रहा है तो खाए और पिए तो पिए, पर अपनी तो जान निकल जाती है। तो फिर दो-दो सीटों का जो कूपन होता है, उससे वो सफर करते थे कि भाई! माताजी की दशा खराब हो जाएगी और जब तक यह पहुँचेंगी, तब तक तो इनका आधा ढेर हो जाएगा, अब तो मैं कहती नहीं हूँ।

गुरुदेव से सीखें

आप उनकी सादगी से शिक्षा लेना, उनके विचारों से शिक्षा लेना, उनके रहन-सहन से शिक्षा लेना, उनकी त्याग-तपस्या से शिक्षा लेना। तभी तो उनकी जबान पर सरस्वती थी कि जो भी कह दिया, सच्चे मन से किसी के सिर पर हाथ रख दिया तो पूरा हुआ। मैं समझती हूँ पचहत्तर परसेंट तो सही हुआ और पच्चीस फीसदी तो भाई अपने-अपने प्रारब्ध भी हैं, प्रारब्ध को तो कोई नहीं टाल सका।

दशरथ के प्रारब्ध को राम नहीं टाल सके, तो फिर हम कैसे टाल सकते हैं। कृष्ण अपने भानजे अभिमन्यु की मृत्यु को नहीं रोक सके तो सुभद्रा ने रोते हुए कहा था—‘‘भैया मेरा तो यह सर्वनाश हो गया। मेरा तो इकलौता बेटा था, जो चला गया। तू तो भगवान है, तुझसे क्यों नहीं रोका गया?’’ उन्होंने कहा—‘‘मैं भगवान जरूर हूँ, इसमें कोई दो राय नहीं है पर कर्मफल सभी को भुगतना पड़ता है। तेरा बेटा गया है और मेरे लिए भी जंग लगा तीर रखा हुआ है; क्योंकि मैं जब राम था तो मैंने सात पेड़ों के बीच में से बाली को मारने के लिए तीर चला दिया था, तो वही तीर मेरे लिए भी रखा है। हर व्यक्ति को कर्मफल भोगना ही पड़ता है, उसके लिए दृढ़ता की जरूरत है; मनोबल की जरूरत है।’’

परिस्थितियों का मुकाबला करें

परिस्थितियों के साथ मुकाबला करना हर व्यक्ति का कार्य है। जो भी परिस्थितियाँ आएँ, अच्छी भी आती हैं बुरी भी आती हैं। अच्छा व्यक्तित्व होगा तो ऊँचे उठते हुए चले जाएँगे, खराब व्यक्तित्व होगा तो निचाई की ओर चलते हुए चले जाएँगे। सारे अन्तरिक्ष में सूक्ष्म विचार ऐसा फैला हुआ है कि हम चाहे जो बन सकते हैं, डकैत भी बन सकते हैं, जेबकतरे भी बन सकते हैं, हम बुरे-से-बुरे व्यक्ति बन सकते हैं और अच्छे-से-अच्छे व्यक्ति बन सकते हैं।

बनने का साहस भी हमारे अन्दर है कि हम क्या बन सकते हैं। इसके लिए थोड़ा त्याग करना पड़ता है, अपने मनोबल को तैयार करना पड़ता है, अपने मस्तिष्क को तैयार करना पड़ता है और दुनिया में जो भी बहाव होता है, उस बहाव से हमें हट करके चलना पड़ता है।

जिस तरीके से मछली बहाव की विपरीत धारा को चीरकर अपना रास्ता बनाती हुई चली जाती है। जो सामाजिक प्राणी है, जो सेवा करने वाला है, जो सन्त के पदचिह्नों पर चलने वाला है, उसको अनेक कठिनाइयाँ आ सकती हैं, पर हम कठिनाइयों के साथ हँसते-खेलते जूझेंगे।

सबको प्यार बाँटें

न हमें किसी से लड़ाई करनी है, न किसी को मारना है, न पीटना है, हमें तो अपने विचारों को, ईश्वरीय प्रेरणा को घर-घर पहुँचाना है। जिस तरीके से ये नन्हे-नन्हे दीपक जल रहे हैं, उसी तरीके से आपको एक दीपक के तरीके से जलना है। दीपक में जो तेल पड़ा है, जो बाती पड़ी है, उसमें तेल माने स्नेह होता है, प्यार होता है। यही प्यार हमको जन-जन तक बाँटना है। हम जन-जन तक इस पुकार को पहुँचाएँगे कि प्यार वह दौलत है कि प्यार से व्यक्ति बदलता हुआ चला जाता है। वह कहाँ-से-कहाँ पहुँच जाता है। इस सौदे में घाटा नहीं आता है।

गुरुनानक जी एक बार बाजार गए। उनसे कहा गया कि तुम इतने पैसे ले जाओ और सौदा लेकर के आओ और जब वह बाजार गए तो फिर क्या हुआ मालूम है। रास्ते में उनको कुछ व्यक्ति मिल गए, जिनको कि उन चीजों की जरूरत थी। उन्होंने उनको दे दी और घर वापस आ गए। जब घर वापस आए तो पिता ने कहा कि बेटा ले आया सौदा।

उन्होंने कहा कि पिताजी! आज मैं ऐसे सौदागर के पास पहुँच गया कि बस, आज जो मैंने सौदा किया है वो जिन्दगी भर नहीं हो सकता। वो झूमते रहे और पिता बुरा-भला कहते रहे। उन्होंने कहा कि पिताजी मैं तो आज उस भगवान की खेती में बो आया हूँ और जैसा मैं बो आया हूँ, बस, वैसा ही मैं काटूँगा। वो नानक बन गए।

यह मैंने आपको नानक का एक प्रसंग सुनाया, मैंने गुरुजी के प्रसंग सुनाए। मैंने ये भी सुना है कि उन्होंने कसाई से गाय को छुड़वाया था। उन्होंने कहा था कि तू इसको छोड़, बूढ़ी गाय है तो क्या हुआ? बूढ़ा पिता भी होता है, बूढ़ी माँ भी होती हैं, तो क्या माँ को काट करके खा जाते हैं? माँ को निकाल देंगे क्या? छोड़ इसको हम अपने यहाँ बाँध लेंगे और हम इसकी सेवा करेंगे।

यह है सच्चा अध्यात्म

कबूतर का किस्सा तो मैंने अभी सुनाया ही था कि कोई खाने के लिए कबूतर ले जा रहा था तो उन्होंने उसके हाथ से छुड़वाया था और उसे छोड़ना पड़ा। यही हमारा अध्यात्म है। जब यह संसार बनेगा और हमारा राष्ट्र बनेगा तो यह अध्यात्म से ही बनेगा। जब तक कि यह अध्यात्मवादी नहीं होगा और आध्यात्मिक प्रेरणा नहीं पहुँचेगी, तब तक व्यक्ति में बदलाव नहीं आ सकते। बिलकुल नहीं आ सकता चाहे वे कितने भी देवी-देवताओं पर चले जाएँ।

सन्त एकनाथ की कथा तो तुमने सुनी ही होगी। सन्त एकनाथ रामेश्वरम् जा रहे थे, तो बीच रास्ते में ही रामेश्वरम् गधे का रूप धारण करके पड़ गए और प्यास से तिलमिलाने लगे। भीतर की जो संकीर्णता थी उसने यह कहा कि हम अपना जल क्यों दें, हम तो लाए थे सेतुबन्ध रामेश्वरम् के लिए, हम इन्हें क्यों पिला दें? हमें न तो वहाँ जाना है न स्वर्गलोक में और न मुक्तिलोक में। कौन से स्वर्गलोक में? क्षीरसागर में।

मुसलमानों में क्या होता है? जन्नत होती है, जहाँ शराब की नदियाँ बहती हैं, हूर और गुलमा मिलते हैं और हिन्दुओं में क्षीरसागर होता है। क्यों साहब! क्षीरसागर में क्यों जा रहे हैं? उस खीर को यहीं बनाकर खा लें तो? क्या अर्थ है? खीर के लिए ही जा रहे हैं न, कोई अच्छा काम करने तो नहीं जा रहे न? पर माना हम इसलिए जा रहे हैं कि हमें मुक्ति मिलेगी। तो मुक्ति मिल गई? पाप के भागियों को मुक्ति नहीं मिलेगी, आपको किसी भी कीमत पर नहीं मिलेगी। आप मुक्ति का काम करिए, फिर देखिए मुक्ति मिलती है कि नहीं मिलती है।

आप गुरुजी के पदचिह्नों पर चलना, गुरुजी की प्रेरणाओं पर चलना, गुरुजी के मार्गदर्शन पर चलना। गुरुजी ने इतना साहित्य लिखा है, जो इतना प्रेरणादायक है कि आग फूँकने लायक है कि हर दिल को फड़फड़ा देगा, हर दिल को झकझोर देगा और झकझोरना ही हमारा काम है। मरते दम तक हमें यह चिन्ता नहीं है कि कौन हमारी बुराई कर रहा है, कौन हमारी भलाई कर रहा है।

बड़ाई-बुराई से ऊपर बढ़ें

गुरुजी का उसूल था, उन्होंने कहा कि न हम बड़ाई से ऊँचे उठेंगे और न हम बुराई से गिरेंगे। हमें किसी की चिन्ता नहीं है कि कौन बुराई करता है। हाँ बुराई करेंगे, अपने-अपने ढंग से कोई बुराई करता है तो कोई समर्थन करता है। तो समर्थन से फूल के लट्टू हो जाएँ और बुराई से मुँह लटका लें, करो न बुराई हम तो आगे बढ़ते हुए चले जाएँगे। हमें बुराई से कुछ नहीं लेना-देना और हमें मरने से भी डर नहीं लगता।

निर्भय जीवन जिएँ

सही बात तो यह है कि हम निर्भय रहें। गुरूजी निर्भय रहे। उन्होंने कहा कि मैं वो व्यक्ति हूँ कि मैंने कांग्रेस आन्दोलन में सैकड़ों व्यक्तियों की जानें जाते हुए देखा है। कलकत्ता में मैं अकेला खड़ा रह गया और मेरे सैकड़ों साथी गोली से भून दिए गए। मुझे कहा कि वो तो मरघट में भी रह लिए। वो जंगल में रहे। मरघट और घर, जंगल और घर, बिलकुल उन्हें कहीं रख लीजिए।

मितव्ययी कितने हैं? मैं समझती हूँ कि आज के युग में तो शायद ही कोई इतना मितव्ययी होगा। सन् सत्तर की बात मैं आपको बताती हूँ, आखिर जहाँ कहीं भी रहे होंगे तो उदर-पूर्ति के लिए कुछ तो चाहिए कि नहीं चाहिए और कुछ तो करते होंगे, पत्ती खाते होंगे, जड़ खाते होंगे, कुछ खाते होंगे। कहीं कोई फल-मूल मिलता होगा, वो खरीदते होंगे। कुछ तो लेते होंगे। फल तो खाते ही नहीं थे, पर कुछ तो शाक-भाजी खरीदते होंगे। यह सुन करके मेरी आँखों में आँसू आ गए।

गुरुदेव का ओज

हम घर में खरच अधिक कर लेते हैं। उन्होंने पन्द्रह रुपये महीने में इतनी मितव्ययता के साथ सारे साल-के-साल निकाल दिए और कैसे हो करके आए? कोई लाल टमाटर जैसा, तो लोग पूछने लगे गुरुजी! आपने खाया क्या था?

उन्होंने कहा कि मैंने वो अध्यात्म की शक्ति खाई है और मैंने भक्ति खाई है, मैंने पुरुषार्थ खाया है। उसके बल पर ही ऐसा जो चेहरा आपको दिखाई पड़ रहा है, वो उससे दिखाई पड़ रहा है। उससे नहीं दिखाई पड़ रहा है, जिसको आप समझ रहे हैं कि ये तो खूब मेवा खाते होंगे, दूध पीते होंगे और जाने क्या सल्लम-गल्लम खाते होंगे। इससे ही इनका जो चेहरा है, वो चमकता होगा। नहीं बेटे, उनके चेहरे का जो ओज़ था, जो चमक थी, वो उनकी आध्यात्मिकता का तेज था। कोई भी व्यक्ति उनसे आँख मिला करके बात नहीं कर सकता था। किसी में भी हिम्मत नहीं थी सिवाय मेरे। न कोई आँख मिला करके बात कर सकता था और न कोई बात को छिपा सकता था।

कोई भी व्यक्ति छिपाने की हिम्मत नहीं करता था, उनके सामने एक-एक बात को ऐसे उगलता था कि अपनी कच्ची-पक्की बात सब निकाल करके रख देता था और वो बात को इस तरीके से पी जाते थे कि जाने यह बात हुई ही नहीं थी। क्या मजाल एक कान ने सुना है, तो दूसरा नहीं सुन सकता था।

उनमें इतना धैर्य और उतनी ही गहराई उनके अन्दर थी। यही उनको ऊँचा उठाती हुई चली गई, जिनसे आप लोग इतने परिजन जुड़े हुए हैं, जो लाखों-करोड़ों की संख्या में हैं, जिनको हम अपना कहते हैं। शेर का बच्चा शेर होता है, गीदड़ नहीं होता और सन्त का बच्चा सन्त के पदचिह्नों पर चलता है।

सन्त की सन्तान हैं आप

आप सन्त की सन्तान हैं, आप उस माँ की सन्तान हैं, जो कि उनके पदचिह्नों पर चलते हुए अपने शेष जीवन को उस मंजिल तक ले जा रही है, जहाँ तक वो पहुँच गए। वहाँ हमें भी मिलना है। वो मुझमें मिल गए और मैं उनमें मिल गई। वो मुझमें मिल चुके और मैं भी दिखाई तो पड़ रही हूँ, पर मैं भी उनमें ही मिल गई।

मिलने का अर्थ है—जुड़ जाना और जुड़ जाना है उस फूल के तरीके से, जिसका पहले मैंने उदाहरण दिया था कि फूल जब डाली से टूटता है तो उसे कष्ट सहना पड़ता है, फिर वह भगवान के चरणों पर आता है। उसी फूल को हम पिरो देते हैं तो भगवान के गले का हार बन जाता है।

आप गले का हार बनने की कोशिश करना, जन-जन के गले का हार बनना। भगवान का तो हम बनेंगे ही, जब भगवान के हम कार्य को करेंगे तो भगवान प्रसन्न क्यों नहीं होगा। एक और प्रसंग को सुना करके इस बात को मैं बन्द करूँगी।

एक फ़रिश्ता निकल रहा था, कोई एक डायरी भी उसके हाथ में थी। तो एक व्यक्ति ने कहा कि यह क्या ले जा रहे हैं साहब! यह कौन-सी डायरी है? यह वो डायरी है, जिसमें कि किसी ने भगवान का स्मरण किया हो, अल्लाह-ताला का स्मरण किया हो। उसने कहा कि तो आप ज़रा देखिए कि इसमें कोई हमारा नाम है क्या? उन्होंने पलटा और कहा कि नहीं साहब! इसमें तो कुछ नहीं है। वह बहुत दुःखी हुआ।

उसने कहा कि मैं तो नाम जप करते-करते मर गया, पर मेरा नाम ही नहीं है। बहुत परेशान हूँ। फिर उसी रास्ते से वो फ़रिश्ता निकला। उसने कहा कि अब डायरी किसकी है? उन्होंने कहा कि यह डायरी वो है, जिसको अल्लाह-ताला जपता है। उसने कहा—अच्छा! ऐसी भी डायरी होती है। तो आप दिखाइए न। दिखाया तो पहला नाम उसी का था।

जलाराम बापा का नाम आपने सुना होगा। गुजरात में हैं न, जानते हैं आप। गुजरात के जो बच्चे बैठे हैं वे जानते हैं कि वहाँ जो स्थान है, उनकी वो झोली अभी भी वहाँ रखी हुई है और उसी से भरण-पोषण इतना होता है कि उस झोली का अनाज ही खतम नहीं होता है।

यहाँ वासुदेव सिंह आते थे। एक बार उनके मुँह से यह निकल गया कि माताजी अन्नपूर्णा हैं, इनका भण्डार कभी खत्म नहीं होगा। तो हम सौ-सौ व्यक्तियों को लेकर के आए, पर इन्होंने मिनटों में सौ-सौ व्यक्तियों को खिला दिया। कहाँ से चमत्कार हो गया? मैंने कहा-साहब! यह चमत्कार नहीं है, ये हमारी अक्ल का खेल है। हम ऐसा फेर बाँधकर रखते हैं कि न मालूम कब कौन-सा व्यक्ति कब आ जाए, तो हम उतना फेर बनाकर बैठते हैं, जिससे हमें कोई देर नहीं लगती है।

बेटे हम बने तो अपने व्यक्तित्व के सहारे बने। आप अपने व्यक्तित्व को घटिया मत बनने देना, बौना मत बनने देना, आप उच्चकोटि का श्रेष्ठ जीवन जीना। श्रेष्ठता की ओर आगे बढ़ना।

घर-घर तक पहुँचे भारतीय संस्कृति

हमको भारतीय संस्कृति को जन-जन तक पहुँचाना है। घर-घर तक पहुँचाना है। उनके पदचिह्नों पर चलिए, तभी आप सच्चे रूप में हमारे लड़के, हमारी लड़कियाँ, हमारे विवेकानन्द, हमारी सिस्टर निवेदिताएँ, हमारे अर्जुन, हमारे एकलव्य आप हो सकते हैं।

हम आपके रथ की लगाम तो जरूर सँभाल लेंगे, इसमें दो राय नहीं है। जिस नाव में आप बैठे हैं, वो नाव कभी आपको डूबने नहीं देगी। खुद डूबेगी, तभी डूबेंगे। न वो खुद डूबेगी न आपको डूबने देगी। हर हालत में आपको किनारे से लगाएँगे। आप इसके लिए तैयार हो जाइए।

हम आपके मल्लाह बनेंगे और आप के रथ के पहिये बनेंगे। कृष्ण तो सारथी बने थे, हम आपके मल्लाह बनेंगे और पहिये बनेंगे। हम आपके जीवन के रथ को चलाएँगे, आपको समर्थ बनाएँगे, आपके मनोबल को बढ़ाएँगे, आपको शक्तिशाली बनाएँगे।

शक्तिशाली माँ के बेटे शक्तिशाली होंगे और शक्तिशाली पिता के शक्तिशाली बच्चे पुरुषार्थी होंगे। तो कृपा करके आप उस ओर ध्यान दीजिए कि आप कायरों की श्रेणी में न आवें, आप भगोड़ों की श्रेणी में न आवें, बल्कि बहादुरों की श्रेणी में आवें, जिस तरीके से ठाकुर होता है।

ठाकुर और ब्राह्मण ये दो मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। क्यों साहब! ठाकुर और ब्राह्मण क्यों अच्छे लगते हैं। इसलिए अच्छे लगते हैं कि ब्राह्मण ज्ञान दान देता है, सेवा करता है, विनम्र होता है। ये कौन होता है? ब्राह्मण होता है। कोई जाति विशेष को ब्राह्मण हमने कभी नहीं माना, हमने तो उस सिद्धान्त को, उस ऋषि परम्परा को माना है कि जो ब्राह्मणोचित जीवन जीता है। दूसरा कौन होता है? क्षत्रिय। क्षत्रिय कैसा होता है? वो डरपोक नहीं होता। वो ऐसा नहीं होता है कि डर के मारे चूहे के बिल में घुस जाए।

मेरा निवेदन है कि आप स्वयं ऊँचा उठिए और दूसरों को ऊँचा उठाते हुए चले जाइए। समझदारों को यह नासमझी छोड़नी पड़ेगी और समझदारी पर आना पड़ेगा। पढ़े-लिखे होना बिलकुल अलग बात है और समझदार होना बिलकुल अलग बात है।

बिना पढ़ा-लिखा भी समझदार हो सकता है। पढ़े-लिखे की अपेक्षा बिना पढ़े-लिखे में ज्यादा आध्यात्मिकता होती है; क्योंकि पढ़े-लिखे के पास तर्क-वितर्क ज्यादा रहते हैं। वो तर्क का पुंज है, बस, उससे चाहे जितने तर्क करवा लो, पर उसके अन्दर वो भावना नहीं है। बिना पढ़ा-लिखा भावनाओं को जानता है।

शबरी बिना पढ़ी-लिखी थी, मीरा बिना पढ़ी-लिखी थी, सूरदास बिना पढ़े-लिखे थे। वो भक्ति को जानते थे कि भक्ति क्या चीज़ होती है। भक्ति माने है सेवा, सेवा के अलावा कुछ नहीं। सेवा और सुमिरन।

भक्त हरि सुमिरन करता है और अपने भगवान के इशारे पर चलता है। भगवान के नियमों को तोड़ता नहीं है। भगवान के नियमों को तोड़ा नहीं कि बस, वो गया। उसका स्वास्थ्य भी जाएगा, दिमाग से भी जाएगा, सब खोखला होता हुआ चला जाएगा। समाज सेवा तो तब कर पाएगा, जब अपने शरीर को स्वस्थ रख पाएगा, अभी तो शरीर इस लायक नहीं।

दिमाग का, चिन्तन का हमारे जीवन पर इतना असर पड़ता है कि जैसा हमारा चिन्तन होगा, वैसा ही हमारा चरित्र होगा और जैसा हमारा चरित्र होगा, वैसा ही हमारा व्यवहार होगा। जैसा हमारा व्यवहार होगा, वैसा ही हमारा वातावरण होगा, इसमें दो राय नहीं है।

यहाँ के वातावरण का प्रभाव आपने देखा है न, सब प्रभाव वातावरण का है, जो गुरुजी ने बनाया है। इन शब्दों के साथ मैं आज अपनी बात को समाप्त करती हूँ।

आज की बात समाप्त
॥ॐ शान्तिः॥