प्रायश्चित का पर्व
परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि उनको एक बार सुन लेने वाला व्यक्ति अपने जीवन को सन्मार्ग की ओर ले चलने के लिए विवश हो उठता है। उनके शब्द सम्वेदना को जाग्रत भी करते हैं और अन्तर्मन को झकझोरते भी हैं। रक्षाबन्धन के पुनीत अवसर पर उनके द्वारा दिए गए एक ऐसे ही विशिष्ट उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी कहती हैं कि रक्षाबन्धन का पर्व प्रायश्चित का पर्व है और चिन्तन-मनन का पर्व है। इस पर्व का तात्पर्य है कि जो दोष और दुर्गुण हमारे भीतर हैं, उनको हम आस्था-श्रद्धा-विश्वास के आधार पर धोने और बाहर निकालने का कार्य सम्पन्न करें। वन्दनीया माताजी कहती हैं कि रक्षाबन्धन का सही पर्व तब मन पाता है, जब हम एक अच्छा और सच्चा इनसान बनने का प्रयत्न करते हैं। अपने अहंकार को त्यागने का प्रयत्न करते हैं। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.......
प्रायश्चित का पर्व
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
हमारे आत्मीय परिजनो ! आज रक्षाबन्धन का पर्व है। यों तो यह बहन-भाई का भी पर्व है। बहन अपने भाई को राखी बाँधती है और वह आशा करती है कि उसका भाई उसकी रक्षा करेगा। पर्व का एक और दूसरा पक्ष है कि यह प्रायश्चित का पर्व है। हमने एक वर्ष में क्या-क्या भूलें की हैं और हमारे अन्दर क्या-क्या कमियाँ थीं? हमारे अन्दर क्या दोष और दुर्गुण थे? उनको हम न दोहराएँ।
यह प्रायश्चित का पर्व है, जिसका कि आज आपको पूजन कराया गया है। आपको दस स्नान कराए गए हैं, आपका यज्ञोपवीत बदला गया है। आज आपका शुद्धिकरण कराया गया है। तो अब तक हम अशुद्ध थे? हाँ, अब तक अशुद्ध थे। आज आपकी शुद्धि हुई है और आगे के लिए आपने यह प्रण किया है कि हम जीवनभर उन गलतियों को न दोहराएँगे, जो हम पूर्व में कर चुके हैं। यदि वे गलतियाँ आगे बढ़ती हुई चली गईं, तो फिर यह प्रायश्चित का पर्व क्या रहा? यह प्रायश्चित का पर्व है।
चिन्तन-मनन का पर्व
यह चिन्तन और मनन का पर्व है और दोषों को धोने का यह पर्व है। यह पर्व हमको चिल्ला-चिल्लाकर कहता है कि हमारे अन्दर कोई बुराइयाँ तो नहीं पनप रहीं, यदि पनप रही हैं, तो हम उन्हें निकाल दें। दीक्षा का क्या अर्थ है? दीक्षा का मतलब है—जुड़ जाना। किससे जुड़ जाना? उस महान शक्ति से जुड़ जाना, जो प्रेरणा का स्रोत है। शक्ति से जुड़ जाना, उस शक्ति को पा लेना, उसके प्रकाश को पा लेना और अपने रोम-रोम को प्रकाशित कर लेना। हमारे रोम-रोम में प्रकाश फैलता हुआ चला जा रहा है। गुरुजी का प्रकाश और माताजी का प्यार एवं दुलार, गुरुजी के तप का अंश, माताजी के तप का अंश। यह हमारे अन्दर घुलता हुआ चला जा रहा है। यही दीक्षा का तात्पर्य है।
बेटे ! इस पर्व का तात्पर्य है कि जो दोष और दुर्गुण हमारे अन्दर हैं, तो उनको हम निकालते हैं और आगे के लिए हम प्रण करते हैं। यह पर्व है—रक्षासूत्र का, गुरु अपने शिष्यों को रक्षासूत्र बाँधते थे और यह आश्वासन दिलाते थे कि हम आपकी सदैव रक्षा करते रहेंगे।
ब्राह्मण भी अपने यजमानों को रक्षासूत्र बाँधते रहे हैं। अभी भी यह परम्परा है कि ब्राह्मण अपने यजमानों के यहाँ जाते हैं और रक्षासूत्र बाँधते हैं। यह बात अलग है कि आज न वे ब्राह्मण हैं और न वे बँधवाने वाले रहे।
रक्षासूत्र का मर्म
उन्होंने रक्षासूत्र माँगा और उन्होंने उसको दे दिया, बस मामला साफ। बहन ने भाई को राखी बाँध दी और भाई ने उपहार में कुछ दे दिया, बस खतम हो गया मामला? गुरु ने रक्षासूत्र बाँध दिया, शिष्य ने कुछ दे दिया। नहीं, गुरु अपनी पूरी जिम्मेदारी के साथ बाँधता है और यह कहता है कि हमने इस सूत्र में तुमको बाँध दिया है और बाँधा ही नहीं है, बल्कि आपकी रक्षा का भार हमने अपने ऊपर लिया है। हम सदैव आपकी रक्षा करते रहेंगे। यह हमारा प्रण है। यह गुरु और शिष्य का पर्व है, यह प्रायश्चित का पर्व है। यह रक्षाबन्धन का पर्व है, जिसमें रक्षासूत्र बाँधा जाता है। यह जिम्मेदारी का पर्व है।
चलिए अब आगे चलते हैं, आप नौ दिन का सत्र करने आए हैं, एक महीने का सत्र आप करेंगे। आप सबको संकल्प दिलवाया गया है। पूरे मनोयोग से और पूरी निष्ठा के साथ आप अपने संकल्प को पूरा करेंगे। हमारे अन्दर यदि भावनाओं की कमी हो जाती है और श्रद्धा की कमी हो जाती है, आस्था की कमी हो जाती है, तो फिर कुछ हाथ नहीं लगता है।
आस्था—एक, श्रद्धा—दो और विश्वास—तीन आधारस्तंभ हैं। यह तीनों ही हमारे जीवन में काम आते हैं। इन तीनों में ही कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
यह दिनोंदिन विकसित हों; ताकि अन्तःकरण भी विकसित होता हुआ चला जाए। नहीं, तो वह ज्यों-का-त्यों बना रहे, तो फिर न आपकी दीक्षा काम आई और न आपका अनुष्ठान काम आया, केवल आपने मालाभर घुमाई है। माला घुमाने से आपका क्या भला होगा? कुछ भला नहीं होगा, वह तो आपने ढाई घण्टे पूरे किए हैं। आपने हृदय से माला को नहीं फेरा।
कर का मनका छोड़कर, मन का मनका फेर
‘कर का मनका छोड़कर, मन का मनका फेर।’’ यदि मन का मनका आपने फेरा है, तो आपका अनुष्ठान पूर्ण माना जाएगा और इस बीच में आपने कामनाओं को स्थान दिया, तो फिर आपका अनुष्ठान पूर्ण नहीं हुआ; क्योंकि आप तो कामना लेकर के आए थे। आप तो आशीर्वाद के लिए आए थे। आशीर्वाद तो आपको मिलेगा ही, इसमें तो कोई दो राय है ही नहीं।
इस स्थान पर आप आए हैं और जिसका विश्वास लेकर के आए हैं, जिसके आँचल के नीचे आए हैं और जिसकी छत्रछाया के नीचे आप आए हैं, तो वह तो आपको मिलेगा ही; लेकिन आपने अपनी तरफ से कोई प्रयास नहीं किया है, तो आपको कितना मिलेगा? बताइए न? थोड़े दिन आशीर्वाद काम करेगा। फिर तो अपना पुरुषार्थ ही काम करेगा।
सन्त हृदय नवनीत समाना
बेटे ! आपको पुरुषार्थ करना चाहिए। कौन-सा पुरुषार्थ? अपनी आस्था का, अपनी श्रद्धा का, अपने विश्वास का। कौन-सा विश्वास? जो शंकर जी ने कहा था कि श्रद्धारूपी पार्वती और विश्वासरूपी शंकर मैं उनको नमन करता हूँ। भक्त की यह कसौटी है कि उसका अन्तःकरण कैसा है? मलिनताओं से भरा हुआ है अथवा उसका एक सन्त जैसा हृदय है। तो सन्त का हृदय कैसा होता है? सन्त का हृदय बहुत कोमल होता है।
‘सन्त हृदय नवनीत समाना’ है। सन्त का जो हृदय है, वह मक्खन के समान पिघलने वाला होता है। दीन-दुखियों का कष्ट देख करके उसका हृदय द्रवित होने लगता है। जिस तरीके से वाल्मीकि ने एक पक्षी के जोड़े को जब मरते हुए देखा, बिलखते हुए, तड़फड़ाते हुए देखा, तो वे द्रवित होने लगे और द्रवित ही नहीं हुए, वरन उनकी वह द्रवितता एक काव्य के रूप में फूट निकली, जिसको की वाल्मीकि रामायण कहते हैं। इनको ही ऋषि कहते हैं।
ऋषि वे व्यक्ति बन जाते हैं, जो कि अपनी कमी और कमजोरियों को निकाल देते हैं और महानता की ओर चल देते हैं और महान बनते हुए चले जाते हैं। तुलसीदास भी इसी तरीके से बने थे। अन्य भी इसी तरीके से बने हैं। भगीरथ ने लोक-मंगल के लिए तप किया और गंगाजी निकलती हुई चली आईं। शंकर जी ने उनकी सहायता की। आपकी सहायता करेंगे शंकर जी? चाहे जितना बेलपत्र चढ़ाइए, चाहे जो कुछ करिए; लेकिन शंकर जी आपके झाँसे में आने वाले नहीं हैं; क्योंकि आपका हृदय शंकर को पाने लायक हुआ ही नहीं।
जब हुआ नहीं है, तो फिर आप खुशामद करने के लिए गए हैं, कामनाओं के लिए गए हैं। शंकर जी की आप खुशामद कर रहे हैं कि हम आपके ऊपर बेलपत्र चढ़ाते हैं। आज सोमवार है और हम आपके ऊपर बेलपत्र चढ़ाते हैं। हमारी कामनाएँ पूरी होनी चाहिए; लेकिन आपकी क्षुद्रता में कमी नहीं आनी चाहिए। क्षुद्रता और संकीर्णता जैसी हमारी है, वैसी बनी रहनी चाहिए, तो फिर शंकर के कृपापात्र आप कैसे बन सकते हैं?
शंकर के कृपापात्र तभी बनेंगे जैसे कि शंकर जी ने जहर पिया था और सारे संसार को अमृत बाँटा था। लोक-मंगल के लिए उन्होंने विष का पान किया अर्थात उन्होंने संकटों का सामना किया, जो कि सारे संसार में व्याप्त था। शंकर जी के भक्त आप तभी बन सकते हैं। यदि आपके अन्दर उस शीतलता की महत्ता हो, जैसे चन्द्रमा उनके सिर पर विराजमान है। वह शीतलता लिए हुए है। आपके भीतर शीतलता होनी चाहिए।
अहंकार को त्यागें
बेटे ! कहीं क्रोध तो नहीं आ रहा है, किसी बात पर हम क्रोधित तो नहीं हो रहे हैं? इसके स्थान पर हमारे भीतर शीतलता होनी चाहिए। जो भी बात कहें, तो नम्रतापूर्वक कहें। हम नम्र हैं कि नहीं हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी जबान पर बिच्छू का डंक हो। जहाँ कहीं भी जाएँ, बिच्छू का डंक मारते हुए चले जाएँ। चाहे घर में हैं, चाहे बाहर में हैं, कहीं हम अहंकारी तो नहीं हैं। नहीं, अहंकार तो है। फिर शंकर जी के भक्त कहाँ से हुए?
बिच्छू, साँप, भूत-पलीद सभी शंकर जी के परिवारीजन थे और उस परिवार में होने पर भी वे कितने गम्भीर, कितने कृपालु, कितने दयालु और अहंकाररहित थे। जरा-जरा-सी बात में अहंकार आपके अन्दर आता हुआ चला जाता है।
गायत्री माता के भक्त कौन होते हैं? गायत्री माता किसके ऊपर सवारी करती हैं? गायत्री माता हँस पर सवारी करती हैं। हँस जैसा पाक-साफ जिसका जीवन हो, विवेकशील जिसका जीवन हो, उस पर गायत्री माता सवारी करती हैं। उसके हृदय में गायत्री माता का निवास होता है। यदि आप एक भक्त होना चाहते हैं, तो आपको भी हँस जैसा जीवन, पवित्र जीवन, साफ-सुथरा जीवन, विवेकशील जीवन जीना पड़ेगा। अपने लिए कम, दूसरों के लिए ज्यादा ब्राह्मणोचित जीवन आपको जीना पड़ेगा।
ब्राह्मण को ही गायत्री मिली है, गायत्री सबको नहीं मिली। तो साहब ! क्षत्रिय को या और किसी को नहीं मिलीं? किसी को भी नहीं मिलीं। माताजी आप यह क्या कह रही हैं? विश्वामित्र जब तक क्षत्रिय थे, तब तक नहीं मिलीं। जब वह सन्त और ब्राह्मण हो गए, तब गायत्री माता को वे पा सके, तभी गायत्री मंत्र उनको फलित हुआ और जब राम और लक्ष्मण उनके पास आए, तो उन्होंने राम को बला और अतिबला अर्थात गायत्री और सावित्री दोनों ही विद्याएँ, ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ उनको दे डालीं। यह है—भक्त का स्वरूप और सन्त का स्वरूप।
[ क्रमशः अगले अंक में समापन ]
परमवन्दनीया माताजी की अमृतवाणी
धन्य होंगे जो कि इस अभियान से जुड़ जाएँगे (उत्तरार्द्ध)
परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह विशिष्टता है कि उनको सुन लेने वाला व्यक्ति अपने जीवन को सत्पथ की ओर ले चलने के लिए विवश हो उठता है। उनके शब्द भावनाएँ भी जगाते हैं और मनुष्य को संकल्पवान भी बनाते हैं। रक्षाबन्धन के पुनीत अवसर पर उनके द्वारा दिए गए एक ऐसे ही विशिष्ट उद्बोधन की विगत किस्त में आपने पढ़ा कि परमवन्दनीया माताजी कहती हैं कि रक्षाबन्धन का पर्व वस्तुस्थिति में प्रायश्चित का एवं चिन्तन-मनन का पर्व है। हममें से हरेक व्यक्ति को, जो एक साधक है, शिष्य है—उसे रक्षाबन्धन के इस पावन पर्व पर अपनी आत्मसमीक्षा इस आधार पर करनी चाहिए कि वो पूज्य गुरुदेव के द्वारा निर्दिष्ट पथ पर आगे बढ़ पा रहा है या नहीं। परमवन्दनीया माताजी कहती हैं कि गुरुसत्ता द्वारा चलाया गया यह अभियान ईश्वरीय है और जो इससे जुड़ेंगे, वो हमेशा के लिए धन्य हो जाएँगे। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.............
समर्पण के बिना भक्ति कैसी?
अभी मैंने बताया था कि भक्त का समर्पण होना चाहिए, समर्पण यदि नहीं है, तो फिर वह भक्ति कैसी है? और यदि उसका समर्पण है, तो फिर उसको सब कुछ मिलता हुआ चला जाता है। नाचीज चन्द्रगुप्त, जिसको गुरु की कृपा मिल गई और वह राजा बन गया, सम्राट हो गया। जरा-सा लड़का शिवाजी, अब वह छत्रपति राजा बन गया। कैसे बन गया? अपने गुरु की कृपा से वह बनता हुआ चला गया। उसने अपने अहं को गला दिया और अपने गुरु से उसने कहा कि जो भी कुछ है, आपका है।
अब जो भी मेरा शरीर है, जो भी मेरा ज्ञान है, जो भी कुछ है, सो सब आपका है। तो उन्होंने उसे अभय कटारी दे दी। गुरुजी ने तपश्चर्या की। गायत्री माता की उपासना की, उन्होंने अपने गुरु की, अपने आराध्य की उपासना की और सब कुछ उन्होंने अपनी जिन्दगी में पा लिया। जो और व्यक्ति नहीं पा सकते हैं, सब कुछ उन्होंने पा लिया। मैं तो कहती हूँ कि भगीरथ से भी ज्यादा पा लिया। शिवाजी से भी ज्यादा पा लिया। अर्जुन से भी ज्यादा पा लिया। उन्होंने इतना कुछ पा लिया।
उन्होंने तो थोड़े काम किए थे; लेकिन गुरुजी ने तो कितना काम किया है? उन्होंने उपासना के द्वारा अपने जीवन का परिशोधन करके साहित्य की इतनी रचना की, जो अपने वजन से भी ज्यादा हो गई। समाज सेवा उन्होंने इतनी की, कि उनके बराबर किसी ने नहीं की। दीन-दुःखियों के उन्होंने आँसू पोंछे और उन्हें मुस्कान दी।
उन्होंने कहा—तुम रोते हुए जरूर मेरे पास आए हो; लेकिन मेरे पास से रोते हुए मत जाना, हँसते हुए जाना। बेटे ! मैं हँसी देने वाला हूँ, मैं रोतों का साथ नहीं देता। मैं हँसने वालों का साथ देता हूँ, मुस्कराते हुए जाओ। जो भी तुम्हारी परिस्थितियाँ हैं, हर परिस्थिति में मुस्कराते रहो, हँसते रहो, हँसाते रहो, खिलखिलाते रहो, दूसरों को देते रहो।
देकर के चलो, कुछ नहीं है, तो मुस्कान तो दे सकते हैं, प्रसन्नता तो दे सकते हैं। भावनाएँ तो दे सकते हैं, किसी को प्यार तो दे सकते हैं। जिनके हृदय में कोई प्यार का अंकुर ही नहीं है, जिनके हृदय पाषाण के हैं, उनका क्या करें? उन्होंने सदैव प्यार का वह झरना बहाया, जिस झरने से लाखों की संख्या में व्यक्ति लाभान्वित होते हुए चले गए। उस झरने का पानी पीने से वह तृप्त होते हुए चले गए, जिसमें कि आप लोग बैठे हुए हैं।
गुरुजी का अनुकरण कीजिए
आप लोग अनुकरण करें, तो गुरुजी का करिए। हमारा अनुकरण कीजिए कि किस कदर हमारे अन्दर साहस है, हिम्मत है। इस बुढ़ापे में भी हिम्मत से हम जाने कहाँ-से-कहाँ पहुँचते हुए चले जाते हैं। जहाँ कहीं, हमने देखा भी नहीं था, कहीं गए भी नहीं थे, घर से निकल करके कभी पाँव भी नहीं दिया था, घर में ही रहे। हमारी सारी जिन्दगी एक घर में ही बीती और उस घर में ही अपने बच्चों का लालन-पालन किया और बच्चों को अपनी छाती से लगाए बैठे रहे, जिसमें आप लोग भी सम्मिलित हैं। जब हमने सोचा कि हमारा लक्ष्य ऊँचा है, हम लक्ष्य के लिए जी रहे हैं, तो उन्होंने हमको बताया कि हमारा लक्ष्य क्या है और यह अभी अधूरा है। इसको पूरा करना तुम्हारा कर्तव्य होता है। हमने उस कर्तव्य को अपनी छाती से लगाया और अपने हृदय से पत्थर को बाँधा और कोई महिला होती, तो शायद उठकर भी इतनी जल्दी खड़ी नहीं हो सकती थी; क्योंकि हमारा जो जीवन बीता, वह दूध और पानी के तरीके से था और एक-दूसरे के लिए हम इतने समर्पित थे कि हमारा जीना भी मुश्किल था, लेकिन उनके शब्द, उनका आदेश, उनका मार्गदर्शन हमारे लिए ब्रह्मवाक्य हो गया है। ब्रह्मवाक्य हो गया है, तो फिर एक टूटे-फूटे शरीर को जहाँ-कहीं भी जाना पड़ेगा, जाएँगे।
पिछले दिनों चार अश्वमेध अपने हिन्दुस्तान में हुए—जयपुर हुआ, गुना हुआ, भुवनेश्वर हुआ, भिलाई हुआ। चार यहाँ हुए और दो विदेश में हुए। एक लन्दन में हुआ, दूसरा टोरण्टो में हुआ। दोनों ही यज्ञ अभूतपूर्व सफलता के साथ सम्पन्न हुए।
अभूतपूर्व सफल कार्यक्रम
यह कहना चाहिए कि अपने देश में तो हुए ही बहुत बढ़िया, लेकिन विदेशों में इतने बड़े कार्यक्रम हो जाएँ। यह बहुत बड़ी बात है। ऐसी उस कर्ता की लहर दौड़ रही है। रोम-रोम में व्याप्त हो रही है, न मालूम पैरों में पहिए लगा देती है कि न जाने क्या कर देती है? जाने हृदय में क्या रख देती है कि रात-दिन मालूम नहीं पड़ता है कि रात और दिन यह कहाँ निकल गया और किधर को गया? जो भी व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं और जब हम छोड़ के आते हैं, तो वे रोते-बिलखते ऐसे मालूम पड़ते हैं जैसे अपनी माँ से बच्चे बिछड़ रहे हैं। माँ भी बिछड़ रही है। बेबस हमारी आँखों में भी आँसू आ जाते हैं। ऐसे भी बिछड़ते हैं। कितने बढ़िया कार्यक्रम होते हैं कि उसमें मंत्री भी आते हैं, वहाँ के सांसद भी आते हैं। अँगरेज लोग भी उसमें शामिल होते हैं।
इसमें एक अँगरेज शामिल हुआ, जो कि तीन दिन तक धोती-कुरता और जनेऊ पहन करके शामिल हुआ। बराबर वह शाम को हर कार्य में शामिल हुआ। उसमें पादरी भी आए, सभी वर्ग के व्यक्ति आए और सभी व्यक्तियों ने इतनी सराहना की कि इतनी बड़ी भीड़ हमने कभी भी यहाँ के इतिहास में नहीं देखी। यहाँ की प्रदर्शनी देख करके उससे लोग इतने प्रभावित हुए और कहते हुए सुने गए कि इतना बड़ा सन्त, इतने बड़े ऋषि, जिन्होंने इतना बड़ा काम किया है, यह तो हमने सुना तक नहीं था।
हम बड़े दुर्भाग्यशाली रहे। हम ऐसे ऋषि के, ऐसे सन्त के दर्शन नहीं कर पाए, यह उनका कहना था। इतनी जनसंख्या थी कि मैं आपको क्या बताऊँ। मैं तो इतना बड़ा अश्वमेध देखकर के हैरान हो गयी। हम तो कहते थे कि हिन्दुस्तान में बड़ा अश्वमेध था, पर यहाँ तो उससे भी ज्यादा बाजी मार गए। लाखों की संख्या में तो नहीं कहा जा सकता, तो भी एक-दो लाख की संख्या तो जरूर रही होगी। तीनों दिन को मिला करके एक लाख की संख्या से कम नहीं हो सकते हैं। इतनी संख्या थी, इतनी संख्या वहाँ के लिए बहुत बड़ी थी।
सभी को प्रभावित करता गुरुदेव का चिन्तन
दो सौ लोगों ने अपने दोष-दुर्गुण छोड़े, शराब पीना छोड़ा, मीट खाना छोड़ा, अन्य भी जो नशीले पदार्थ लेते हैं, उन पदार्थों को उन्होंने छोड़ा और अपने मिशन के लिए काम करने की जिम्मेदारी उन्होंने ली। टोरण्टो की तो एक मंत्री थीं, वह आईं और उस कार्यक्रम के लिए उन्होंने 30,000 दिए तथा इंग्लिश में कहा कि जैसा मिशन यह है, ऐसा मिशन हमने नहीं देखा। मैं जानती तो नहीं हूँ; लेकिन मैं भीतर से अपने अन्तरंग से यह कहती हूँ कि इसके मुकाबले का दूसरा कोई मिशन नहीं हो सकता है। यह उन अँगरेज महिला ने कहा।
अन्य भी थे, जिनको बोलने का मौका दो-पाँच मिनट का ही दिया गया था; क्योंकि हम दो-तीन थे, इतना समय कहाँ से लाते? तो 2-2, 5-5 मिनट सबको दिए और सभी के यही उद्गार थे कि मिशन को बनाने वाला धन्य है। हम उसके चित्र को ही देखकर के पावन हो गए, उसकी झलक-झाँकी देखकर के ही हम धन्य हो गए।
ऐसा मौका हमको कभी नहीं मिलता। तीन साल हो रहे हैं। अभी अमेरिका बाकी है, अभी हम वहाँ जाएँगे। प्रणव वही हैं। मैं और शैलो 17 या 18 तारीख को जाएँगे और उसको पूरा करेंगे। उसके बाद तीन कार्यक्रम अगले वर्ष के लिए दिए हैं। जो वर्षाकालीन समय है, वह अपने यहाँ तो होता नहीं है, हमारे शान्तिकुञ्ज के जो 9 दिन के सत्र हैं, एक महीने के सत्र हैं, यह तो सदैव चलते रहते हैं, चलते रहेंगे। अन्य कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं होता है, इसलिए वर्षाकालीन का जो समय है, वह विदेशों के लिए दिया है।
विश्व को मथ देंगे हम
तीन कार्यक्रम अगले वर्ष होंगे और कैसे होंगे? बड़े सक्सेसफुल होंगे। जैसे अब हुए, उससे भी बड़े होने जा रहे हैं और होंगे। इतना प्रचार-प्रसार बाहर भी हो रहा है। यहीं नहीं हो रहा है। यह नहीं समझना चाहिए कि यहीं हो रहा है, बाहर सारे विश्व का जब बीड़ा उठाया है, तो सारे विश्व को मथ करके हम रख देंगे। इसमें दो राय ही नहीं है। सारे विश्व को हम न मथें, ऐसी कोई बात नहीं है।
हमारे साथ जो शक्ति है, जो सामर्थ्य है, जो हमारे साथ प्रेरणा है, वह अभूतपूर्व ऐसी प्रेरणा है, जिसको लेकर के हम चलते हैं, तो थकावट महसूस नहीं होती है। तीन-चार दिन-रात यों ही निकल जाते हैं। चाहे रात भर जागना पड़े, चाहे दिन भर जागना पड़े, तो मालूम ही नहीं पड़ता। पीछे थोड़ी थकान मालूम पड़ती है, तभी थकान को निकाल लेते हैं; लेकिन काम करने में थकान मालूम नहीं पड़ती।
मिशन का मत्स्यावतार
बेटे ! मैंने आपको यह बताया कि आपका मिशन किस तेजी से बढ़ता हुआ चला जा रहा है। जिस तरीके से मनु के कमण्डलु में मछली थी और वह मछली बढ़ती हुई कहाँ तक पहुँच गई? आपका मिशन भी उसी तरीके से है और यह बढ़ता हुआ चला जा रहा है। इसमें जो कोई भी भागीदार बनेगा, वह श्रेय पाएगा, जिस तरीके से स्वतंत्रता संग्राम में जिन व्यक्तियों ने भाग लिया, वे आज स्वतंत्रता सेनानी हो गए। उनको पेंशन मिल रही है। आज कोई जेल भी जाएगा, तो पिटेगा भी और कुछ मिलेगा भी नहीं और तब जिन्होंने अपना जीवन दाँव पर लगाया था, उन्होंने आज श्रेय पा लिया। आप भी यदि श्रेय के भागीदार बनना चाहते हैं, तो फिर आप इसमें शामिल हो जाइए और शामिल होकर के आप आगे कदम बढ़ाइए।
आगे कदम बढ़ाने का मतलब है—रचनात्मक कार्य। हमारी गतिविधियाँ चलती ही रहनी चाहिए, ऐसा नहीं हो कि कार्यक्रम हो गए, अब हमको क्या करना है? छोटे-छोटे कार्यक्रम कर लेते हैं, बड़े कर लेते हैं, पर अब क्या करना है? यह नहीं होना चाहिए, निरन्तर क्रियाशीलता आपके अन्दर बनी रहनी चाहिए। आपके पिता के अन्दर, आपके गुरु के अन्दर इतनी क्रियाशीलता बनी रही कि अन्तिम क्षणों तक उनका लेखन बन्द नहीं हुआ, उनकी उपासना कम नहीं हुई, तो फिर आप इतने बूढ़े तो नहीं हो गए?
आप कोई 80 साल के नहीं बैठे हैं। आप कम उम्र के हैं। उनकी 80 साल की जिन्दगी ऐसी खुशनुमा हुई कि शायद ही कोई ऐसा जीवन जी सकता होगा, जैसा उन्होंने जीवन जिया, तो फिर उनके बच्चे ऐसा जीवन क्यों नहीं जिएँगे?
शेर का बच्चा शेर होता है, सन्त का बच्चा सन्त होता है, ऋषि का बच्चा ऋषि होता है, तो फिर आप बकरी के बच्चे क्यों बनते हैं? बकरी के बच्चे नहीं होने चाहिए, मैं...मैं नहीं होनी चाहिए। हम सब होना चाहिए। मैं...मैं जो करता है, उसका गला कटता है। बकरी का गला कटता है और शेर का सिर दहाड़ता हुआ चलता है और जो दाएँ-बाएँ होते हैं, वे भी भाग जाते हैं। सभी भाग जाते हैं। आपको सन्त की सन्तान होना चाहिए। आपको उस माँ की सन्तान होना चाहिए, आपकी जो माँ तिल-तिल जलती हुई चली जा रही है। आपको उस माँ का बच्चा होना चाहिए, आपको उस ऋषि की सन्तान होनी चाहिए, जिसने कि सारे विश्व के लिए तिल-तिल करके अपना जीवन गला डाला।
आपको उसकी सन्तान होना चाहिए। मैं आशा करती हूँ कि आप वैसा ही अनुकरण करेंगे और उसी पथ पर आप चलेंगे, जिस पथ पर आपका प्रेरणास्त्रोत चलता रहा। उन्हीं के मार्गदर्शन में यहाँ सारा कार्य हो रहा है। उसी मार्गदर्शन में आप उस ओर चलते रहेंगे। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ।
॥ॐ शान्तिः॥