﻿चिन्तनन का महत्त्व और स्वरूप
संभव जहां वहां 


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चिन्तन उसे कहते हैं जिसमें कि, भूतकाल के लिये विचार किया जाता है। भूतकाल, हमारा किस तरीके से, व्यतीत हुआ, इसके बारे में समीक्षा करिये। अपनी समीक्षा नहीं कर पाते आप। दूसरों की समीक्षा करना जानते हैं। पड़ोसी की समीक्षा कर सकते हैं, बीबी के दोष निकाल सकते हैं, बच्चों की नुक्ताचीनी कर सकते हैं, सारी दुनिया की गलती बता सकते हैं, भगवान् की गलती बता देंगे और हरेक की गलती बता देंगे। कोई भी ऐसा बचा हुआ नहीं है, जिसकी आप गलती बताते न हों। लेकिन अपनी गलती; अपनी गलती का आप विचार ही नहीं करते। अपनी गलतियों का हम विचार करना शुरू करें और अपनी चाल की समीक्षा लेना शुरू करें और अपने आपका हम पर्यवेक्षण शुरू करें तो ढेरों की ढेरों चीजें ऐसी हमको मालूम पड़ेंगी, जो हमको नहीं करनी चाहिए थी और ढेरों की ढेरों ऐसी चीजें मालूम पड़ेगी आपको, जो इस समय हमने जिन कामों को, जिन बातों को अपनाया हुआ है, उनको नहीं अपनाना चाहिए था।

मन की बनावट कुछ ऐसी विलक्षण है, अपना सो अच्छा, अपना सो अच्छा, बस। यही बात बनी रहती है। अपना स्वभाव भी अच्छा, अपनी आदतें भी अच्छी, अपना विचार भी अच्छा, अपना चिन्तन भी अच्छा, सब अपना अच्छा, बाहर वालों का गलत। आध्यात्मिक उन्नति में इसके बराबर अड़चन डालने वाला और दूसरा कोई व्यवधान है ही नहीं। इसीलिये आप पहला काम वहाँ से शुरू कीजिए कि आत्म समीक्षा।

एकान्त में चिन्तन के लिये जब आप बैठें तो आप यह समझें कि हम अकेले हैं और कोई हमारा साथी या सहकारी है नहीं। साथी अपने स्थान पर, सहकारी अपने स्थान पर, कुटुम्बी अपने स्थान पर, पैसा अपने स्थान पर, व्यापार अपने स्थान पर, खेती-बाड़ी अपने स्थान पर; इन सबको अपने-अपने स्थानों पर रहने दीजिए। आप तो सिर्फ ये विचार किया कीजिए, हम पिछले दिनों क्या भूल करते रहे? रास्ता भटक तो नहीं गए, भूल तो नहीं गए, इसीलिये जन्म मिला था क्या? जिस काम के लिये जन्म मिला था, वही किया क्या? पेट के लिये जितनी जरूरत थी, उससे ज्यादा कमाते रहे, क्या? कुटुम्ब की जितनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए थी, उसको पूरा करने के स्थान पर अनावश्यक संख्या में लोड बढ़ाते रहे क्या? और जिन लोगों को जिस चीज की जरूरत नहीं थी, उनको प्रसन्न करने के लिये उपहार रूप में लादते रहे क्या? क्यों? वजह क्या है? ये सब गलतियाँ हैं।

इसी तरीके से अपने स्वास्थ्य के लिये जो खान-पान, आहार-विहार जैसा रखना चाहिए था, वैसा रखा क्या? चिन्तन की शैली में जिस तरीके की शालीनता का समावेश होना चाहिए था, वो रखा गया क्या? ना। न हमने अपने शरीर के प्रति कर्तव्यों का पालन किया, न अपने मस्तिष्क के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन किया, न हमने अपने कुटुम्बियों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन किया। कर्तव्यों की दृष्टि से हम बराबर पिछड़ते हुए चले गए। जहाँ-जहाँ हम पिछड़ते हुए चले गए, उन सबको एक बारगी विचार कीजिए। क्यों? विचार करने से क्या फायदा? ये फायदा है कि गलतियाँ समझ में आयेंगी तो सुधार की भी गुंजाइश रहेगी। गलतियाँ समझ में नहीं आयेंगी तो आप सुधारेंगे क्यों? इसीलिये समीक्षा जरूरी है, नाड़ी परीक्षा, अपने आपकी कीजिए, भूतकाल के सम्बन्ध में।

पाप क्राइम को ही नहीं कहते। पाप उन्हें भी कहते हैं, जो कि जीवन को अस्त-व्यस्त बनाकर रखें। चोरी, डकैती, हत्या वगैरह ये तो बुरे कर्म हैं ही, लेकिन ये भी कम बुरा कर्म नहीं है कि आप आलस्य और प्रमाद में ही समय काट डालें। आप अपने स्वभाव को गुस्सेबाज बनाकर रखें, ईर्ष्या किया करें, चिन्तन और मनन को अस्त-व्यस्त बनाकर रखें। ये भी कोई ढंग है। ये क्या है, ये भी गलतियाँ हैं। व्यक्तिगत जीवन में आपको गुण, कर्म, स्वभाव सम्बन्धी गलतियाँ क्या हुईं और क्राइम, अपराध, जुल्म करने के सम्बन्ध में क्या भूलें हुईं, इन दोनों के बारे में एक बार विचार किया कीजिए। ये विचार करना बहुत जरूरी है। इससे, यह मालूम होता है कि हमारी गलतियाँ कहाँ हैं और हम कितना चूकते रहे हैं और चूक रहे हैं। इन चूकों को सुधारने वाला अगला कदम आता है—आत्म परिष्कार।

आत्म निरीक्षण के बाद में आत्म परिष्कार का दूसरा नम्बर आता है। सुधार कैसे करें? सुधार में क्या बात करनी होती है? सुधार में रोकथाम करनी पड़ती है। मसलन, आप शराब पीते हैं तो आप बन्द कीजिए। नहीं साहब, हम शराब नहीं पीयेंगे। आप बीड़ी पीते हैं, सिगरेट पीते हैं, अपना कलेजा जलाते हैं, तो विचार कीजिए। अब हम कलेजा नहीं जलायेंगे। आत्म परिशोधन इसी का नाम है। जो गलतियाँ हुई हैं, उसके विरुद्ध आप बगावत खड़ी कर दें, रोकथाम के लिये आमादा हो जाएँ, संकल्प बल का ऐसा इस्तेमाल करें कि जो भूल होती रही हैं, अब हमसे न हों। इसकी स्कीम बनाएँ।

गलतियाँ न होने देने का तरीका क्या है? क्या हम करेंगे? अपने आप में जो कच्चाइयाँ आयेंगी, जब आपको कच्चाइयाँ यह मजबूर करेंगी कि जो करते रहे हैं, वही ढर्रा चलते रहना चाहिए। अपने साथ में पक्षपात और रियायत करने का जब आपका मन उठे, तब आप उस मन के विरोधी हो जाइये, मन को निग्रहीत कीजिये, मन को तोड़िए। मन से लड़ाई कीजिए। आत्म परिष्कार इसी का नाम है। आत्म निरीक्षण और आत्म परिष्कार अथवा परिशोधन इन दो कार्यों को मिला देने से चिन्तन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। यही कहना था आज आपसे।

॥ॐ शान्तिः॥


भूमिका निःसन्देह कर्म की बड़ी गहन है। धर्मात्माओं को दुःख, पापियों को सुख, आलसियों को सफलता, उद्योगशीलों को असफलता, विवेकवानों पर विपत्ति, मूर्खों के यहाँ सम्पत्ति, दंभियों को प्रतिष्ठा, सत्यनिष्ठों को तिरस्कार प्राप्त होने के अन


इन सब बातों को देखकर भाग्य, ईश्वर की मर्जी, कर्म की गति के सम्बन्ध में नाना प्रकार के प्रश्न और सन्देहों की झड़ी लग जाती है। इन सन्देहों और प्रश्नों का जो समाधान प्राचीन पुस्तकों में मिलता है, उससे आज के तर्कशील युग में ठीक प्रकार समाधान नहीं होता। फलस्वरूप नई पीढ़ी, उन पाश्चात्य सिध्दांतों की ओर झुकती जाती है, जिनके द्वारा ईश्वर और धर्म को ढोंग और मनुष्य को पंचतत्व निर्मित बताया जाता है एवं आत्मा के अस्तित्व से इंकार किया जाता है। कर्म फल देने की शक्ति राज्यशक्ति के अतिरिक्त और किसी में नहीं है। ईश्वर और भाग्य कोई वस्तु नहीं है आदि नास्तिक विचार हमारी नई पीढ़ी में घर करते जा रहे हैं।

इस पुस्तक में वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण से कर्म की गहन गति पर विचार किया गया है और बताया गया है कि जो कुछ भी फल प्राप्त होता है, वह अपने कर्म के कारण ही है। हमारा विचार है कि पुस्तक कर्मफल सम्बन्धी जिज्ञासाओं का किसी हद तक समाधान अवश्य करेगी। पं श्रीराम शर्मा आचार्य 