सुन्दरता आपकी प्रसन्नता, मुस्कुराहट, उत्तम स्वास्थ्य, आशायुक्त निचिन्त जीवन, हर्ष और उल्लास में छिपी हुई है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य क्रोध इतना फुर्तीला मनोविकार है कि इसमें सोचने, विचारने, समझाने-बुझाने का अवसर ही नहीं रहता। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य मनुष्य को सच्ची और चिरस्थायी तृप्ति तभी मिलती है, जबकि उसके अन्तः करण की आनन्द पिपासा पूरी हो जाय। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य मनुष्य के सारे मोक्ष प्राप्ति के साधन बेकार ही सिद्ध होंगे, यदि उसने सद्‌गुणों का अपने जीवन में विकास नहीं किया। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जो विद्या अहंकार, आलस्य और अनीति की ओर धकेले, उसे प्राप्त करने की अपेक्षा अशिक्षित रहना ही अच्छा। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य उपलब्धियाँँ इस संसार में भरी पड़ी हैं, पर उन्हें प्राप्त करने के लिए ज्ञान, चरित्र एवं साहस चाहिए। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अनीति और असफलता में से यदि एक को चुनना पड़े तो असफलता को ही पसन्द करना चाहिए, अनीति को नहीं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जो भीतर से स्वच्छ होते हैं, उन्हीं का बाह्य प्रकाश भीतर के प्रकाश से चमककर लोगों के नेत्र और हृदय दोनों को प्रकाशित कर देता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य मनुष्य आत्म दुर्बल तभी तक रहता है, जब तक वह आत्म-विवेचन का सच्चा स्वरूप ग्रहण नहीं करता। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ईमानदारी, निष्कपटता, सरलता, सच्चाई ऐसी वृत्तियाँ हैं, जो जीवन को खुले पन्ने की तरह रखती हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य झगड़ने वाले दुश्मनों से उतना डरने की आवश्यकता नहीं, जितना मित्र बनकर घात करने वालों से। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिसे केवल अपने ही लाभ की बात सूझती है, दूसरों के दुख-दर्द से कोई वास्ता नहीं, वह सबसे बड़ा नास्तिक है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जल्दी सफलता प्राप्त करने के लोभ में अनीति के मार्ग पर चल पड़ना ऐसी बड़ी भूल है जिसके लिए सदा पश्चाताप ही करना पड़ता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य प्रेम इस धरती का अमृत है और मनुष्य का प्राण। यह जितना ही विकसित होगा, उतनी ही सुख-शान्ति की सम्भावना साकार होगी। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिन्होंने सुविधाएँ पाने का अधिकार तो जाना, पर कर्तव्य पालन की शर्त भूल गए, उनके लिए घर और नरक में कोई अन्तर न रहेगा। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ईमानदारी बरतना सरल है, जबकि बेईमानी बरतने में अनेकों प्रपंच रचने और छल-छद्म अपनाने पड़ते हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य परस्पर प्रेम सहानुभूति, स्वार्थरहित सेवा भाव और दूसरे के लिए त्याग तथा उत्सर्ग की तत्परता ही परिवार की प्रमुख लक्षण हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य विचारों को विचारों से काटने की कला जिसने सीख ली, समझना चाहिए की उसने मानसिक उलझनों को सुलझाने का रहस्य सीख लिया। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भौतिक सम्पन्नता में ईमानदारी बाधक सिद्ध होती है, यह मान्यता उन लोगों की है जो पुरुषार्थ से जी चुराते हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एक दिन का सदाचार युक्त और ज्ञानपूर्वक जीना सौ वर्ष के असंयमित और अज्ञानमय जीवन से कहीं अच्छा है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य चिन्ता एक प्रबल मनोव्याधि है। इससे मानसिक शक्तियों का नाश होता है, और शरीर पर दूषित प्रभाव पड़ता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य नास्तिकता चित्त की वह स्थिति है, जो दुर्बलता और रुग्णता के कारण कर्कश, दुराग्रहपूर्ण तथा हठवादिता से भरपूर होती है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ईश्वर उपासना करने वाले व्यक्ति का श्रम और समय कभी व्यर्थ नहीं जा सकता। उसे आशाजनक सत्परिणाम प्राप्त होकर रहते हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जो लोग सामाजिक जीवन में विषमताएँ पैदा कर रहे हैं, वे दुःखी, पीड़ित और दलित आत्माओं के अभिशाप से बच नहीं सकते। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य निष्ठा के साथ अपने कर्तव्य का पालन करने वाला और संकट के क्षणों में कर्तव्य के प्रति ईमानदार रहने वाला ही सच्चा देश भक्त है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिस तरह दुःख ही दुःख हमें प्रिय नहीं है। उसी तरह सदैव सुख की भी कल्पना नहीं की जा सकती। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य स्वार्थ की भावना और भविष्य के लिए अनुकूल साधन प्राप्त होने की दृष्टि से जो सेवा की जाती है, वह परोपकार नहीं प्रवंचना है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य हम उत्तम अवसरों का इन्तजार न करें, बल्कि साधारण समय को ही उत्तम अवसर में बद‌लने के लिए प्रयत्नशील रहें। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य मनुष्य जीवन की सभी संभावनाओं के मूल में माँ का असीम प्यार, उसका त्याग, उसकी महान सेवाएँ ही पूर्ण निहित हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अन्तःकरण को कुसंस्कारों कषाय-कल्मषों की भयानक व्याधियों से साधना रुपी औषधि ही मुक्त करती है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिनमें कुछ कर गुजरने की भावना होती है, मार्ग में हजार बाधाएँ आने पर भी उनके क्रिया-कलाप नहीं रुकते हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य दूसरों के दुःखों में अपने को दुःख जैसे भावों की अनुभूति हो तो हम कह सकते हैं कि हमारे अन्तःकरण में सच्ची सहनुभूति का उदय हुआ है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जो आदर्श जीवन बनाने, बिताने के लिए जितना इच्छुक-आतुर एवं प्रयत्नशील है, वह उतने ही अंशों में आस्तिक है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अनजान होना उतनी लज्जा की बात नहीं, जितनी सीखने के लिए तैयार न होना। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य प्रेम संसार की वह ज्योति है, जिसका प्रकाश पाकर हर व्यक्ति अपने अन्तरंग के कषाय-कल्मषों को दूर, हृदय को पवित्र और निर्मल बनाता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भूख से अधिक खाना एक ऐसा अपराध है, जिसके बदले में अकाल मृत्यु का दण्ड भुगतना पड़ता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य सफलता का रहस्य है कि लक्ष्य को सोच-विचारकर निर्धारित करना, फिर उस पर संकल्प और साहस के साथ चल पड़ना। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य परमार्थ के कार्यों में न समय बाधक बनता है और न ही साधनों का अभाव, बस कमी होती है तो केवल संकल्पों की। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य तुच्छ स्वार्थों की उपेक्षा करने का दुःसाहस जो कर सके, समझना चाहिए कि उसे आत्मबल के भण्डार की चाबी मिल गई। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य सद्गुण जिसकी सम्पति है, वह कहीं भी, किसी भी स्थान में बाधित नहीं हो सकता। गुण ही उसकी सेवा के लिए सदैव तैयार रहेंगे। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य दुःख निवृत्ति, चिर-विश्राम पूर्ण स्वाधीनता और प्रेम स्वरूप की प्राप्ति ये चार वस्तुएँ जीवन की चतुर्मुखी आवश्यकताएँ हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य संसार के किसी भी बाह्य पदार्थ को अपने सुख का कारण न मानना मनुष्य के सर्वोत्कृष्ट ज्ञान का परिचायक है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य दूसरों को उपदेश देने और मार्ग दिखलाने का वही सच्चा अधिकारी होता है, जिसका आचरण स्वयं उसके आदर्श के अनुरूप हो। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य बुद्धि दुधारी तलवार है। सामने वाले को भी मार सकती है और अपने को काटने के लिए भी प्रयुक्त हो सकती है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य किसी आदर्श के लिए, सिद्धान्त की रक्षा के लिए हँसते-हँसते जीवन का उत्सर्ग कर देना सबसे बड़ी बहादुरी है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य कर्तव्य मार्ग पर चलने में आने वाले कष्टों को स्वेच्छा और शान्ति से सहन करना ही सच्ची तपस्या है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य परेपकार मनुष्य का आध्यामिक सद्‌गुण है। इसी भावना पर संसार का सृजन, उसकी व्यवस्था और उत्थान सन्निहित है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ईश्वर के किसी भी रुप का साक्षात्कार करने के लिए केवल एक ही नैसर्गिक विधान है, आत्म संयम। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जो सफलता जितना अधिक संघर्ष और संकट सहन करने के बाद मिलती, उसका आनन्द उतना ही अधिक यथार्थ और स्थायी होता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य कठिनाइ‌याँ और संकट ही मनुष्य जीवन को सक्रिय तथा सरस बनाए रखने में सहायक होते हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य प्रेम आत्मा से करते हैं, शरीर से नहीं। कर्तव्य से करते हैं, कामुकता से नहीं। प्रेम में किसी तरह का विकार नहीं होना चाहिए। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य परिवार निर्माण का तात्पर्य है, उस छोटी सी संस्था में सद्‌भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण, परिपोषण और अभिवर्धन। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जीवन का अर्थ है समय। जो जीवन से प्यार करते हों, वे आलस्य में समय न गवायें अर्थात स्वाध्याय में प्रमाद न करें। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य स्वास्थ्य संसार में सुख का बहुत बड़ा आधार है। इसके अभाव में सुख-साधनों का कोई मूल्य नहीं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य श्रद्धा मनुष्य में दृढ निश्चय शक्ति पैदा करती है, जिससे वह उस कंटकाकीर्ण पथ को प्रसन्नतापूर्वक पार कर लेता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य आलसी और अव्यवस्थित छिद्रान्वेषी और उद्विग्न मनुष्य के लिए संसार नरक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अध्यात्म का अर्थ है—आत्म सुधार, आत्म विकास तथा आत्म निर्माण जिनके आधार पर शुभ कर्मों और शुभ विचारों की प्रेरणा मिल सके। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य केवल मानवाकार में जीवन का प्रवाहित होते रहना मानवता नहीं है। मानवता का लक्षण है— प्रतिदिन उन्नति की ओर बढ़ते जाना। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य सत्प्रयत्न कभी निरर्थक नहीं होता। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य विचारों का विकास एवं उनकी निर्विकारिता दो बातों पर निर्भर हैं—स्वाध्याय और सत्संग। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य सम्पदा को सब कुछ मान बैठने और चेतना की उत्कृष्टता को उपेक्षित रखने की भूल निश्चित रूप से अदूरर्शिता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर हैं, ईश्वर केवल उन्ही की सहायता करता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य परिवार में स्वर्गावतरण उसी समय होता है जब सुमति, सहमति, सहयोग एवं संस्कार का सामंजस्य स्थापित हो जाता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य यदि हम अपने परिवार को आदर्श अथवा उच्च बना लें तो मानो विश्व को उन्नत करने का अपना कर्तव्य पूर्ण कर दिया। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य असंयम और अनियमितताओं की कुल्हाड़ी चलाकर शरीररूपी मन्दिर तोड़-फोड़ डालने वाला मनुष्य धर्मात्मा नहीं हो सकता। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य शत्रु भाव एक संक्रामक रोग की तरह है, जो धीरे-धीरे समस्त वातावरण में व्याप्त होकर उसे विषैला बना देता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य स्वाध्याय निःसन्देह एक ऐसा अमृत है, जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट कर देता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य उच्च आदर्शवादी, पवित्र, महान बनने की अभिलाषा आस्तिकता है। इसे अपनाना हर अध्यात्मवादी का प्रथम कर्तव्य है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अपनी आकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए संघर्ष द्वारा अपनी शक्तियों को व्यक्त करना ही मनुष्य का सच्चा पुरुषार्थ है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अपने को मनुष्य बनाने का प्रयत्न करो, यदि इसमें सफल हो गए, तो हर काम में सफलता मिलेगी। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य राष्ट्र को धन-दौलत ऊँचा नहीं उठाते, वरन् वहाँ के नागरिकों की चरित्र निष्ठा में वह शक्ति होती है जो उसके गौरव को ऊँचा उठाती है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जो अपना एक-एक मिनिट बहुमूल्य समझकर उसे सुव्यवस्थित कार्यक्रम बनाकर खर्च करते हैं, वे अपने जीवन का सच्चा लाभ उठा लेते हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिन्हें इस जीवन में किसी प्रकार के सुख की आकाँक्षा हो, उन्हें सर्वप्रथम चिन्ता रहित बनने का प्रयत्न करना चाहिए। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिस कल्पना के पीछे योजना न हो, जिस कामना के पीछे पुरुषार्थ न हो, उसकी पूर्ति असम्भव ही रहती है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ईश्वर विश्वास का - आस्तिकता का प्रतिफल एक ही होना चाहिए — सन्मार्ग का अवलम्बन और कुमार्ग का त्याग। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वैराग्य उस अवस्था या स्थिति का नाम है, जब मनुष्य की चित्त वृत्तियाँ विभिन्न भावों से हटकर चिर सत्य की ओर जाग्रत हों। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य सच्ची उपासना का सच्चा प्रतिफल यही है कि मनुष्य अधिकाधिक आदर्शवादी एवं उत्कृष्ट जीवन जी सके। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य यदि आप दूसरों को सुधारना चाहते है तो पहले स्वयं सुधरने का प्रयत्न कीजिए। ‘‘हम सुधरेगें — युग सुधरेगा’’ —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य समय की बर्बादी की तरह ही अनुपयोगी और निरर्थक चिन्तन भी हमारी बहुमूल्य शक्ति को नष्ट करता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अपनी सीमा और शक्ति से परे की आकाँक्षाएँ बना लेना बड़ी भारी भूल है। ऐसे लोगों की आकाँक्षाएँ कभी पूरी नहीं होती। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य पूर्णतया अनियंत्रित कामनाओं का नाम तृष्णा है। इसी से मनुष्य जीवन में तरह-तरह की जटिलताएँ, दुःख और परेशानियाँ आती हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ईश्वर की दृष्टि से कोई भी छुपकर पाप और अत्याचार नहीं कर सकता। वह बड़ा कठोर है। दुष्ट को कभी क्षमा नहीं करता। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य निष्काम कर्मयोग परमात्मा की प्राप्ति और सांसारिक सुखोपभोग का सबसे सुन्दर और समन्वय-युक्त धर्म है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य गुण देखें, गुणों की चर्चा करें, गुणवानों को प्रोत्साहित करें तो यह स्वभाव अपने लिए भी परम मंगलमय सिद्ध हो सकते हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अपने बच्चे को अच्छा, सच्चा और श्रेष्ठ व्यक्ति बनाने के लिए माता का समझदार और सुशिक्षित होना जरूरी है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भाग्य एवं ईश्वर का वरदान एवं अभिशाप भी मनुष्य के अपने विचारों एवं कार्यों के आधार पर ही प्राप्त होता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य शरीर से भी अधिक शक्तिशाली और सामर्थ्यवान है मनोबल। यह मनोबल दुर्बल से दुर्बल काया को मृत्युञ्जयी बना देता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य प्रशंसक बनकर हम हर व्यक्ति के मित्र बन सकते हैं। उसे समझाने और सुधारने में भी सफल हो सकते हैं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिसका जीवन खाने-पीने में बीता, वस्तुतः वह मर गया। जिसने परमार्थ कमाया, उसे ही जीवित एवं अमर कहा जा सकता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य बिना संकटों के मनुष्य का जीवन निखर नहीं सकता और न उसमें त्याग, तितीक्षा एवं सहिष्णुता का ही विकास हो पाता है। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य कठिनाई को देखकर न चिन्ता करो, न निराश होओ वरन धैर्य और साहस के साथ उसके निवारण का उपाय करने में जुट जाओ। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य केवल ‘‘ज्ञान’’ ही एक ऐसा अक्षय-तत्त्व है, जो कहीं भी, किसी भी अवस्था और किसी काल में भी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य आलस्य, अकर्मण्यता और प्रमादपूर्ण जीवन में आनन्द देखने वाले वस्तुतः आनन्द का रहस्य जानते ही नहीं। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिस समाज के लोग परिश्रमी, ईमानदार, सत्यनिष्ठ एवं आदर्शप्रिय होंगे, वह अपने आप उत्तरोतर उन्नत होता चला जाएगा। —पं. श्रीराम शर्मा आचार्य In Chanakya or Mitra font âé‹ÎÚUÌæ ¥æÂ·¤è ÂýâóæÌæ, ×éS·é¤ÚUæãÅU, ©žæ× SßæS‰Ø, ¥æàææØé€Ì çÙç¿‹Ì ÁèßÙ, ãáü ¥õÚU ©„æâ ×ð´ çÀÂè ãé§ü ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ·ý¤ôÏ §ÌÙæ Èé¤ÌèüÜæ ×Ùôçß·¤æÚU ãñ ç·¤ §â×ð´ âô¿Ùð, çß¿æÚUÙð, â×ÛææÙð-ÕéÛææÙð ·¤æ ¥ßâÚU ãè Ùãè´ ÚUãÌæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ×ÙécØ ·¤ô â‘¿è ¥õÚU ç¿ÚUSÍæØè Ìëç# ÌÖè ç×ÜÌè ãñ, ÁÕç·¤ ©â·ð¤ ¥‹ÌÑ ·¤ÚU‡æ ·¤è ¥æÙ‹Î çÂÂæâæ ÂêÚUè ãô ÁæØÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ×ÙécØ ·ð¤ âæÚUð ×ôÿæ Âýæç# ·ð¤ âæÏÙ Õð·¤æÚU ãè çâh ãô´»ð, ØçÎ ©âÙð âÎ÷‌»é‡æô´ ·¤æ ¥ÂÙð ÁèßÙ ×ð´ çß·¤æâ Ùãè´ ç·¤ØæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Áô çßlæ ¥ã´·¤æÚU, ¥æÜSØ ¥õÚU ¥ÙèçÌ ·¤è ¥ôÚU Ï·ð¤Üð, ©âð Âýæ# ·¤ÚUÙð ·¤è ¥Âðÿææ ¥çàæçÿæÌ ÚUãÙæ ãè ¥‘ÀæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ©ÂÜçŽÏØæ¡¡ §â â´âæÚU ×ð´ ÖÚUè ÂǸè ãñ´, ÂÚU ©‹ãð´ Âýæ# ·¤ÚUÙð ·ð¤ çܰ ™ææÙ, ¿çÚU˜æ °ß´ âæãâ ¿æçã°Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥ÙèçÌ ¥õÚU ¥âȤÜÌæ ×ð´ âð ØçÎ °·¤ ·¤ô ¿éÙÙæ ÂǸð Ìô ¥âȤÜÌæ ·¤ô ãè Ââ‹Î ·¤ÚUÙæ ¿æçã°, ¥ÙèçÌ ·¤ô Ùãè´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Áô ÖèÌÚU âð Sß‘À ãôÌð ãñ´, ©‹ãè´ ·¤æ Õæs Âý·¤æàæ ÖèÌÚU ·ð¤ Âý·¤æàæ âð ¿×·¤·¤ÚU Üô»ô´ ·ð¤ Ùð˜æ ¥õÚU NÎØ ÎôÙô´ ·¤ô Âý·¤æçàæÌ ·¤ÚU ÎðÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ×ÙécØ ¥æˆ× ÎéÕüÜ ÌÖè Ì·¤ ÚUãÌæ ãñ, ÁÕ Ì·¤ ßã ¥æˆ×-çßßð¿Ù ·¤æ â‘¿æ SßM¤Â »ýã‡æ Ùãè´ ·¤ÚUÌæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü §ü׿ÙÎæÚUè, çÙc·¤ÂÅUÌæ, âÚUÜÌæ, â‘¿æ§ü °ðâè ßëçžæØæ¡ ãñ´, Áô ÁèßÙ ·¤ô ¹éÜð Âóæð ·¤è ÌÚUã ÚU¹Ìè ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Ûæ»Ç¸Ùð ßæÜð Îéà×Ùô´ âð ©ÌÙæ ÇÚUÙð ·¤è ¥æßàØ·¤Ìæ Ùãè´, çÁÌÙæ çטæ ÕÙ·¤ÚU ƒææÌ ·¤ÚUÙð ßæÜô´ âðÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÁâð ·ð¤ßÜ ¥ÂÙð ãè ÜæÖ ·¤è ÕæÌ âêÛæÌè ãñ, ÎêâÚUô´ ·ð¤ Îé¹-ÎÎü âð ·¤ô§ü ßæSÌæ Ùãè´, ßã âÕâð ÕǸæ ÙæçSÌ·¤ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÁËÎè âȤÜÌæ Âýæ# ·¤ÚUÙð ·ð¤ ÜôÖ ×ð´ ¥ÙèçÌ ·ð¤ ׿»ü ÂÚU ¿Ü ÂÇ¸Ùæ °ðâè ÕǸè ÖêÜ ãñ çÁâ·ð¤ çܰ âÎæ ÂpæÌæÂ ãè ·¤ÚUÙæ ÂÇ¸Ìæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Âýð× §â ÏÚUÌè ·¤æ ¥×ëÌ ãñ ¥õÚU ×ÙécØ ·¤æ Âýæ‡æÐ Øã çÁÌÙæ ãè çß·¤çâÌ ãô»æ, ©ÌÙè ãè âé¹-àææç‹Ì ·¤è âÖæßÙæ âæ·¤æÚU ãô»èÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÁ‹ãô´Ùð âéçßÏæ°¡ ÂæÙð ·¤æ ¥çÏ·¤æÚU Ìô ÁæÙæ, ÂÚU ·¤ÌüÃØ ÂæÜÙ ·¤è àæÌü ÖêÜ »°, ©Ù·ð¤ çܰ ƒæÚU ¥õÚU ÙÚU·¤ ×ð´ ·¤ô§ü ¥‹ÌÚU Ù ÚUãð»æÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü §ü׿ÙÎæÚUè ÕÚUÌÙæ âÚUÜ ãñ, ÁÕç·¤ Õð§ü׿Ùè ÕÚUÌÙð ×ð´ ¥Ùð·¤ô´ Âý´¿ ÚU¿Ùð ¥õÚU ÀÜ-Àk ¥ÂÙæÙð ÂǸÌð ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÂÚUSÂÚU Âýð× âãæÙéÖêçÌ, SßæÍüÚUçãÌ âðßæ Öæß ¥õÚU ÎêâÚUð ·ð¤ çܰ ˆØæ» ÌÍæ ©ˆâ»ü ·¤è ̈ÂÚUÌæ ãè ÂçÚUßæÚU ·¤è Âý×é¹ Üÿæ‡æ ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çß¿æÚUô´ ·¤ô çß¿æÚUô´ âð ·¤æÅUÙð ·¤è ·¤Üæ çÁâÙð âè¹ Üè, â×ÛæÙæ ¿æçã° ·¤è ©âÙð ׿Ùçâ·¤ ©ÜÛæÙô´ ·¤ô âéÜÛææÙð ·¤æ ÚUãSØ âè¹ çÜØæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÖõçÌ·¤ âÂóæÌæ ×ð´ §ü׿ÙÎæÚUè ÕæÏ·¤ çâh ãôÌè ãñ, Øã ׿‹ØÌæ ©Ù Üô»ô´ ·¤è ãñ Áô ÂéL¤áæÍü âð Áè ¿éÚUæÌð ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü °·¤ çÎÙ ·¤æ âÎæ¿æÚU Øé€Ì ¥õÚU ™ææÙÂêßü·¤ ÁèÙæ âõ ßáü ·ð¤ ¥â´Øç×Ì ¥õÚU ¥™ææÙר ÁèßÙ âð ·¤ãè´ ¥‘Àæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ç¿‹Ìæ °·¤ ÂýÕÜ ×ÙôÃØæçÏ ãñÐ §ââð ׿Ùçâ·¤ àæç€ÌØô´ ·¤æ Ùæàæ ãôÌæ ãñ, ¥õÚU àæÚUèÚU ÂÚU ÎêçáÌ ÂýÖæß ÂÇ¸Ìæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÙæçSÌ·¤Ìæ ç¿žæ ·¤è ßã çSÍçÌ ãñ, Áô ÎéÕüÜÌæ ¥õÚU L¤‚‡æÌæ ·ð¤ ·¤æÚU‡æ ·¤·¤üàæ, ÎéÚUæ»ýãÂê‡æü ÌÍæ ãÆßæçÎÌæ âð ÖÚUÂêÚU ãôÌè ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü §üEÚU ©ÂæâÙæ ·¤ÚUÙð ßæÜð ÃØç€Ì ·¤æ Ÿæ× ¥õÚU âר ·¤Öè ÃØÍü Ùãè´ Áæ â·¤ÌæÐ ©âð ¥æàææÁÙ·¤ âˆÂçÚU‡ææ× Âýæ# ãô·¤ÚU ÚUãÌð ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Áô Üô» âæ×æçÁ·¤ ÁèßÙ ×ð´ çßá×Ìæ°¡ ÂñÎæ ·¤ÚU ÚUãð ãñ´, ßð Îéѹè, ÂèçÇ¸Ì ¥õÚU ÎçÜÌ ¥æˆ×æ¥ô´ ·ð¤ ¥çÖàææÂ âð Õ¿ Ùãè´ â·¤ÌðÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÙDæ ·ð¤ âæÍ ¥ÂÙð ·¤ÌüÃØ ·¤æ ÂæÜÙ ·¤ÚUÙð ߿ܿ ¥õÚU â´·¤ÅU ·ð¤ ÿæ‡æô´ ×ð´ ·¤ÌüÃØ ·ð¤ ÂýçÌ §ü׿ÙÎæÚU ÚUãÙð ߿ܿ ãè â‘¿æ Îðàæ Ö€Ì ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÁâ ÌÚUã Îéѹ ãè Îéѹ ã×ð´ çÂýØ Ùãè´ ãñÐ ©âè ÌÚUã âÎñß âé¹ ·¤è Öè ·¤ËÂÙæ Ùãè´ ·¤è Áæ â·¤ÌèÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü SßæÍü ·¤è ÖæßÙæ ¥õÚU ÖçßcØ ·ð¤ çܰ ¥Ùé·ê¤Ü âæÏÙ Âýæ# ãôÙð ·¤è ÎëçC âð Áô âðßæ ·¤è ÁæÌè ãñ, ßã ÂÚUô·¤æÚU Ùãè´ Âýß´¿Ùæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ã× ©žæ× ¥ßâÚUô´ ·¤æ §‹ÌÁæÚU Ù ·¤ÚUð´, ÕçË·¤ âæÏæÚU‡æ âר ·¤ô ãè ©žæ× ¥ßâÚU ×ð´ ÕÎ‌ÜÙð ·ð¤ çܰ Âý؈ÙàæèÜ ÚUãð´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ×ÙécØ ÁèßÙ ·¤è âÖè â´ÖæßÙæ¥ô´ ·ð¤ ×êÜ ×ð´ ׿¡ ·¤æ ¥âè× ŒØæÚU, ©â·¤æ ˆØæ», ©â·¤è ×ãæÙ âðßæ°¡ ãè Âê‡æü çÙçãÌ ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥‹ÌÑ·¤ÚU‡æ ·¤ô ·é¤â´S·¤æÚUô´ ·¤áæØ-·¤Ë×áô´ ·¤è ÖØæÙ·¤ ÃØæçÏØô´ âð âæÏÙæ L¤Âè ¥õáçÏ ãè ×é€Ì ·¤ÚUÌè ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÁÙ×ð´ ·é¤À ·¤ÚU »éÁÚUÙð ·¤è ÖæßÙæ ãôÌè ãñ, ׿»ü ×ð´ ãÁæÚU ÕæÏæ°¡ ¥æÙð ÂÚU Öè ©Ù·ð¤ ç·ý¤Øæ-·¤ÜæÂ Ùãè´ L¤·¤Ìð ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÎêâÚUô´ ·ð¤ Îéѹô´ ×ð´ ¥ÂÙð ·¤ô Îéѹ Áñâð Öæßô´ ·¤è ¥ÙéÖêçÌ ãô Ìô ã× ·¤ã â·¤Ìð ãñ´ ç·¤ ã׿ÚU𠥋ÌÑ·¤ÚU‡æ ×ð´ â‘¿è âãÙéÖêçÌ ·¤æ ©ÎØ ã饿 ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Áô ¥æÎàæü ÁèßÙ ÕÙæÙð, çÕÌæÙð ·ð¤ çܰ çÁÌÙæ §‘Àé·¤-¥æÌéÚU °ß´ Âý؈ÙàæèÜ ãñ, ßã ©ÌÙð ãè ¥´àæô´ ×ð´ ¥æçSÌ·¤ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥ÙÁæÙ ãôÙæ ©ÌÙè Ü’Áæ ·¤è ÕæÌ Ùãè´, çÁÌÙè âè¹Ùð ·ð¤ çܰ ÌñØæÚU Ù ãôÙæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Âýð× â´âæÚU ·¤è ßã ’ØôçÌ ãñ, çÁâ·¤æ Âý·¤æàæ Âæ·¤ÚU ãÚU ÃØç€Ì ¥ÂÙ𠥋ÌÚU´» ·ð¤ ·¤áæØ-·¤Ë×áô´ ·¤ô ÎêÚU, NÎØ ·¤ô Âçß˜æ ¥õÚU çÙ×üÜ ÕÙæÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Öê¹ âð ¥çÏ·¤ ¹æÙæ °·¤ °ðâæ ¥ÂÚUæÏ ãñ, çÁâ·ð¤ ÕÎÜð ×ð´ ¥·¤æÜ ×ëˆØé ·¤æ Î‡Ç Öé»ÌÙæ ÂÇ¸Ìæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü âȤÜÌæ ·¤æ ÚUãSØ ãñ ç·¤ ÜÿØ ·¤ô âô¿-çß¿æÚU·¤ÚU çÙÏæüçÚUÌ ·¤ÚUÙæ, çȤÚU ©â ÂÚU â´·¤Ë ¥õÚU âæãâ ·ð¤ âæÍ ¿Ü ÂÇ¸ÙæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÂÚU׿Íü ·ð¤ ·¤æØôZ ×ð´ Ù âר ÕæÏ·¤ ÕÙÌæ ãñ ¥õÚU Ù ãè âæÏÙô´ ·¤æ ¥Öæß, Õâ ·¤×è ãôÌè ãñ Ìô ·ð¤ßÜ â´·¤ËÂô´ ·¤èÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Ìé‘À SßæÍôZ ·¤è ©Âðÿææ ·¤ÚUÙð ·¤æ ÎéÑâæãâ Áô ·¤ÚU â·ð¤, â×ÛæÙæ ¿æçã° ç·¤ ©âð ¥æˆ×ÕÜ ·ð¤ Ö‡ÇæÚU ·¤è ¿æÕè ç×Ü »§üÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü âe釿 çÁâ·¤è âÂçÌ ãñ, ßã ·¤ãè´ Öè, ç·¤âè Öè SÍæÙ ×ð´ ÕæçÏÌ Ùãè´ ãô â·¤ÌæÐ »é‡æ ãè ©â·¤è âðßæ ·ð¤ çܰ âÎñß ÌñØæÚU ÚUãð´»ðÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Îéѹ çÙßëçžæ, ç¿ÚU-çߟææ× Âê‡æü SßæÏèÙÌæ ¥õÚU Âýð× SßM¤Â ·¤è Âýæç# Øð ¿æÚU ßSÌé°¡ ÁèßÙ ·¤è ¿Ìé×üé¹è ¥æßàØ·¤Ìæ°¡ ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü â´âæÚU ·ð¤ ç·¤âè Öè Õæs ÂÎæÍü ·¤ô ¥ÂÙð âé¹ ·¤æ ·¤æÚU‡æ Ù ×æÙÙæ ×ÙécØ ·ð¤ âßôüˆ·ë¤C ™ææÙ ·¤æ ÂçÚU¿æØ·¤ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÎêâÚUô´ ·¤ô ©ÂÎðàæ ÎðÙð ¥õÚU ׿»ü çÎ¹ÜæÙð ·¤æ ßãè â‘¿æ ¥çÏ·¤æÚUè ãôÌæ ãñ, çÁâ·¤æ ¥æ¿ÚU‡æ Sߨ´ ©â·ð¤ ¥æÎàæü ·ð¤ ¥ÙéM¤Â ãôÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Õéçh ÎéÏæÚUè ÌÜßæÚU ãñÐ âæ×Ùð ßæÜð ·¤ô Öè ׿ÚU â·¤Ìè ãñ ¥õÚU ¥ÂÙð ·¤ô ·¤æÅUÙð ·ð¤ çܰ Öè ÂýØé€Ì ãô â·¤Ìè ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ç·¤âè ¥æÎàæü ·ð¤ çܰ, çâhæ‹Ì ·¤è ÚUÿææ ·ð¤ çܰ ã¡âÌð-ã¡âÌð ÁèßÙ ·¤æ ©ˆâ»ü ·¤ÚU ÎðÙæ âÕâð ÕǸè ÕãæÎéÚUè ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ·¤ÌüÃØ ׿»ü ÂÚU ¿ÜÙð ×ð´ ¥æÙð ßæÜð ·¤Cô´ ·¤ô Sßð‘Àæ ¥õÚU àææç‹Ì âð âãÙ ·¤ÚUÙæ ãè â‘¿è ÌÂSØæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÂÚUð·¤æÚU ×ÙécØ ·¤æ ¥æŠØæç×·¤ âÎ÷‌»é‡æ ãñÐ §âè ÖæßÙæ ÂÚU â´âæÚU ·¤æ âëÁÙ, ©â·¤è ÃØßSÍæ ¥õÚU ©ˆÍæÙ âçóæçãÌ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü §üEÚU ·ð¤ ç·¤âè Öè L¤Â ·¤æ âæÿææˆ·¤æÚU ·¤ÚUÙð ·ð¤ çܰ ·ð¤ßÜ °·¤ ãè Ùñâç»ü·¤ çßÏæÙ ãñ, ¥æˆ× â´Ø×Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Áô âȤÜÌæ çÁÌÙæ ¥çÏ·¤ â´ƒæáü ¥õÚU â´·¤ÅU âãÙ ·¤ÚUÙð ·ð¤ ÕæÎ ç×ÜÌè, ©â·¤æ ¥æÙ‹Î ©ÌÙæ ãè ¥çÏ·¤ ØÍæÍü ¥õÚU SÍæØè ãôÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ·¤çÆÙæ§‌Øæ¡ ¥õÚU â´·¤ÅU ãè ×ÙécØ ÁèßÙ ·¤ô âç·ý¤Ø ÌÍæ âÚUâ ÕÙæ° ÚU¹Ùð ×ð´ âãæØ·¤ ãôÌð ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Âýð× ¥æˆ×æ âð ·¤ÚUÌð ãñ´, àæÚUèÚU âð Ùãè´Ð ·¤ÌüÃØ âð ·¤ÚUÌð ãñ´, ·¤æ×é·¤Ìæ âð Ùãè´Ð Âýð× ×ð´ ç·¤âè ÌÚUã ·¤æ çß·¤æÚU Ùãè´ ãôÙæ ¿æçã°Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÂçÚUßæÚU çÙ׿ü‡æ ·¤æ ÌæˆÂØü ãñ, ©â ÀôÅUè âè â´SÍæ ×ð´ âÎ÷‌ÖæßÙæ¥ô´ ¥õÚU âˆÂýßëçžæØô´ ·¤æ ÕèÁæÚUô‡æ, ÂçÚUÂôá‡æ ¥õÚU ¥çÖßÏüÙÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÁèßÙ ·¤æ ¥Íü ãñ â×ØÐ Áô ÁèßÙ âð ŒØæÚU ·¤ÚUÌð ãô´, ßð ¥æÜSØ ×ð´ âר Ù »ßæØð´ ¥ÍæüÌ SßæŠØæØ ×ð´ Âý×æÎ Ù ·¤ÚUð´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü SßæS‰Ø â´âæÚU ×ð´ âé¹ ·¤æ ÕãéÌ ÕÇ¸æ ¥æÏæÚU ãñÐ §â·ð¤ ¥Öæß ×ð´ âé¹-âæÏÙô´ ·¤æ ·¤ô§ü ×êËØ Ùãè´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Ÿæhæ ×ÙécØ ×ð´ ÎëÉ çÙpØ àæç€Ì ÂñÎæ ·¤ÚUÌè ãñ, çÁââð ßã ©â ·´¤ÅU·¤æ·¤è‡æü ÂÍ ·¤ô ÂýâóæÌæÂêßü·¤ ÂæÚU ·¤ÚU ÜðÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥æÜâè ¥õÚU ¥ÃØßçSÍÌ çÀ¼ýæ‹ßðáè ¥õÚU ©çm‚Ù ×ÙécØ ·ð¤ çܰ â´âæÚU ÙÚU·¤ ·ð¤ ¥çÌçÚU€Ì ¥õÚU ·é¤À Ùãè´ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥ŠØæˆ× ·¤æ ¥Íü ãñ—¥æˆ× âéÏæÚU, ¥æˆ× çß·¤æâ ÌÍæ ¥æˆ× çÙ׿ü‡æ çÁٷ𤠥æÏæÚU ÂÚU àæéÖ ·¤×ôZ ¥õÚU àæéÖ çß¿æÚUô´ ·¤è ÂýðÚU‡ææ ç×Ü â·ð¤Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ·ð¤ßÜ ×æÙßæ·¤æÚU ×ð´ ÁèßÙ ·¤æ ÂýßæçãÌ ãôÌð ÚUãÙæ ׿ÙßÌæ Ùãè´ ãñÐ ×æÙßÌæ ·¤æ Üÿæ‡æ ãñ— ÂýçÌçÎÙ ©óæçÌ ·¤è ¥ôÚU ÕɸÌð ÁæÙæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü âˆÂý؈٠·¤Öè çÙÚUÍü·¤ Ùãè´ ãôÌæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çß¿æÚUô´ ·¤æ çß·¤æâ °ß´ ©Ù·¤è çÙçßü·¤æçÚUÌæ Îô ÕæÌô´ ÂÚU çÙÖüÚU ãñ´—SßæŠØæØ ¥õÚU âˆâ´»Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü âÂÎæ ·¤ô âÕ ·é¤À ×æÙ ÕñÆÙð ¥õÚU ¿ðÌÙæ ·¤è ©ˆ·ë¤CÌæ ·¤ô ©ÂðçÿæÌ ÚU¹Ùð ·¤è ÖêÜ çÙçpÌ M¤Â âð ¥ÎêÚUçàæüÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Áô ¥ÂÙè âãæØÌæ ¥æÂ ·¤ÚUÙð ·¤ô ̈ÂÚU ãñ´, §üEÚU ·ð¤ßÜ ©‹ãè ·¤è âãæØÌæ ·¤ÚUÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÂçÚUßæÚU ×ð´ Sß»æüßÌÚU‡æ ©âè âר ãôÌæ ãñ ÁÕ âé×çÌ, âã×çÌ, âãØô» °ß´ â´S·¤æÚU ·¤æ âæ×´ÁSØ SÍæçÂÌ ãô ÁæÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ØçÎ ã× ¥ÂÙð ÂçÚUßæÚU ·¤ô ¥æÎàæü ¥Íßæ ©‘¿ ÕÙæ Üð´ Ìô ׿Ùô çßE ·¤ô ©óæÌ ·¤ÚUÙð ·¤æ ¥ÂÙæ ·¤ÌüÃØ Âê‡æü ·¤ÚU çÎØæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥â´Ø× ¥õÚU ¥çÙØç×ÌÌæ¥ô´ ·¤è ·é¤ËãæÇ¸è ¿Üæ·¤ÚU àæÚUèÚUM¤Âè ×ç‹ÎÚU ÌôǸ-ȤôǸ ÇæÜÙð ߿ܿ ×ÙécØ Ï׿üˆ×æ Ùãè´ ãô â·¤ÌæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü àæ˜æé Öæß °·¤ â´·ý¤æ×·¤ ÚUô» ·¤è ÌÚUã ãñ, Áô ÏèÚUð-ÏèÚUð â×SÌ ßæÌæßÚU‡æ ×ð´ ÃØæ# ãô·¤ÚU ©âð çßáñÜæ ÕÙæ ÎðÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü SßæŠØæØ çÙÑâ‹Îðã °·¤ °ðâæ ¥×ëÌ ãñ, Áô ׿Ùâ ×ð´ Âýßðàæ ·¤ÚU ×ÙécØ ·¤è Âæàæçß·¤ ÂýßëçžæØô´ ·¤ô ÙC ·¤ÚU ÎðÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ©‘¿ ¥æÎàæüßæÎè, Âçߘæ, ×ãæÙ ÕÙÙð ·¤è ¥çÖÜæáæ ¥æçSÌ·¤Ìæ ãñÐ §âð ¥ÂÙæÙæ ãÚU ¥ŠØæˆ×ßæÎè ·¤æ ÂýÍ× ·¤ÌüÃØ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥ÂÙè ¥æ·¤æ¡ÿææ¥ô´ ·¤è ÂêçÌü ·ð¤ çܰ â´ƒæáü mæÚUæ ¥ÂÙè àæç€ÌØô´ ·¤ô ÃØ€Ì ·¤ÚUÙæ ãè ×ÙécØ ·¤æ â‘¿æ ÂéL¤áæÍü ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥ÂÙð ·¤ô ×ÙécØ ÕÙæÙð ·¤æ Âý؈٠·¤ÚUô, ØçÎ §â×ð´ âÈ¤Ü ãô »°, Ìô ãÚU ·¤æ× ×ð´ âȤÜÌæ ç×Üð»èÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ÚUæcÅþ ·¤ô ÏÙ-ÎõÜÌ ª¤¡¿æ Ùãè´ ©ÆæÌð, ßÚUÙ÷ ßãæ¡ ·ð¤ Ùæ»çÚU·¤ô´ ·¤è ¿çÚU˜æ çÙDæ ×ð´ ßã àæç€Ì ãôÌè ãñ Áô ©â·ð¤ »õÚUß ·¤ô ª¤¡¿æ ©ÆæÌè ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Áô ¥ÂÙæ °·¤-°·¤ ç×çÙÅU Õãé×êËØ â×Ûæ·¤ÚU ©âð âéÃØßçSÍÌ ·¤æØü·ý¤× ÕÙæ·¤ÚU ¹¿ü ·¤ÚUÌð ãñ´, ßð ¥ÂÙð ÁèßÙ ·¤æ â‘¿æ ÜæÖ ©Ææ ÜðÌð ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÁ‹ãð´ §â ÁèßÙ ×ð´ ç·¤âè Âý·¤æÚU ·ð¤ âé¹ ·¤è ¥æ·¤æ¡ÿææ ãô, ©‹ãð´ âßüÂýÍ× ç¿‹Ìæ ÚUçãÌ ÕÙÙð ·¤æ Âý؈٠·¤ÚUÙæ ¿æçã°Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÁâ ·¤ËÂÙæ ·ð¤ ÂèÀð ØôÁÙæ Ù ãô, çÁâ ·¤æ×Ùæ ·ð¤ ÂèÀð ÂéL¤áæÍü Ù ãô, ©â·¤è ÂêçÌü ¥âÖß ãè ÚUãÌè ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü §üEÚU çßEæâ ·¤æ - ¥æçSÌ·¤Ìæ ·¤æ ÂýçÌÈ¤Ü °·¤ ãè ãôÙæ ¿æçã° — â‹×æ»ü ·¤æ ¥ßܐÕÙ ¥õÚU ·é¤×æ»ü ·¤æ ˆØæ»Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ßñÚUæ‚Ø ©â ¥ßSÍæ Øæ çSÍçÌ ·¤æ Ùæ× ãñ, ÁÕ ×ÙécØ ·¤è 翞æ ßëçžæØæ¡ çßçÖóæ Öæßô´ âð ãÅU·¤ÚU ç¿ÚU âˆØ ·¤è ¥ôÚU Áæ»ýÌ ãô´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü â‘¿è ©ÂæâÙæ ·¤æ â‘¿æ ÂýçÌÈ¤Ü Øãè ãñ ç·¤ ×ÙécØ ¥çÏ·¤æçÏ·¤ ¥æÎàæüßæÎè °ß´ ©ˆ·ë¤C ÁèßÙ Áè â·ð¤Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ØçÎ ¥æÂ ÎêâÚUô´ ·¤ô âéÏæÚUÙæ ¿æãÌð ãñ Ìô ÂãÜð Sߨ´ âéÏÚUÙð ·¤æ Âý؈٠·¤èçÁ°Ð ÒÒã× âéÏÚUð»ð´ — Øé» âéÏÚUð»æÓÓ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü âר ·¤è ÕÕæüÎè ·¤è ÌÚUã ãè ¥ÙéÂØô»è ¥õÚU çÙÚUÍü·¤ ç¿‹ÌÙ Öè ã׿ÚUè Õãé×êËØ àæç€Ì ·¤ô ÙC ·¤ÚUÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥ÂÙè âè׿ ¥õÚU àæç€Ì âð ÂÚUð ·¤è ¥æ·¤æ¡ÿææ°¡ ÕÙæ ÜðÙæ ÕǸè ÖæÚUè ÖêÜ ãñÐ °ðâð Üô»ô´ ·¤è ¥æ·¤æ¡ÿææ°¡ ·¤Öè ÂêÚUè Ùãè´ ãôÌèÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Âê‡æüÌØæ ¥çÙØ´ç˜æÌ ·¤æ×Ùæ¥ô´ ·¤æ Ùæ× Ìëc‡ææ ãñÐ §âè âð ×ÙécØ ÁèßÙ ×ð´ ÌÚUã-ÌÚUã ·¤è ÁçÅUÜÌæ°¡, Îéѹ ¥õÚU ÂÚUðàææçÙØæ¡ ¥æÌè ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü §üEÚU ·¤è ÎëçC âð ·¤ô§ü Öè Àé·¤ÚU ÂæÂ ¥õÚU ¥ˆØæ¿æÚU Ùãè´ ·¤ÚU â·¤ÌæÐ ßã ÕÇ¸æ ·¤ÆôÚU ãñÐ ÎéC ·¤ô ·¤Öè ÿæ×æ Ùãè´ ·¤ÚUÌæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÙc·¤æ× ·¤×üØô» ÂÚU׿ˆ×æ ·¤è Âýæç# ¥õÚU âæ´âæçÚU·¤ âé¹ôÂÖô» ·¤æ âÕâð âé‹ÎÚU ¥õÚU â׋ߨ-Øé€Ì Ï×ü ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü »é‡æ Îð¹ð´, »é‡æô´ ·¤è ¿¿æü ·¤ÚUð´, »é‡æßæÙô´ ·¤ô ÂýôˆâæçãÌ ·¤ÚUð´ Ìô Øã SßÖæß ¥ÂÙð çܰ Öè ÂÚU× ×´»Üר çâh ãô â·¤Ìð ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥ÂÙð Õ‘¿ð ·¤ô ¥‘Àæ, â‘¿æ ¥õÚU ŸæðD ÃØç€Ì ÕÙæÙð ·ð¤ çܰ ×æÌæ ·¤æ â×ÛæÎæÚU ¥õÚU âéçàæçÿæÌ ãôÙæ ÁM¤ÚUè ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Öæ‚Ø °ß´ §üEÚU ·¤æ ßÚUÎæÙ °ß´ ¥çÖàææÂ Öè ×ÙécØ ·ð¤ ¥ÂÙð çß¿æÚUô´ °ß´ ·¤æØôZ ·ð¤ ¥æÏæÚU ÂÚU ãè Âýæ# ãôÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü àæÚUèÚU âð Öè ¥çÏ·¤ àæç€ÌàææÜè ¥õÚU âæ×‰ØüßæÙ ãñ ×ÙôÕÜÐ Øã ×ÙôÕÜ ÎéÕüÜ âð ÎéÕüÜ ·¤æØæ ·¤ô ×ëˆØéTØè ÕÙæ ÎðÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü Âýàæ´â·¤ ÕÙ·¤ÚU ã× ãÚU ÃØç€Ì ·ð¤ çטæ ÕÙ â·¤Ìð ãñ´Ð ©âð â×ÛææÙð ¥õÚU âéÏæÚUÙð ×ð´ Öè âÈ¤Ü ãô â·¤Ìð ãñ´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÁâ·¤æ ÁèßÙ ¹æÙð-ÂèÙð ×ð´ ÕèÌæ, ßSÌéÌÑ ßã ×ÚU »ØæÐ çÁâÙð ÂÚU׿Íü ·¤×æØæ, ©âð ãè ÁèçßÌ °ß´ ¥×ÚU ·¤ãæ Áæ â·¤Ìæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÕÙæ â´·¤ÅUô´ ·ð¤ ×ÙécØ ·¤æ ÁèßÙ çÙ¹ÚU Ùãè´ â·¤Ìæ ¥õÚU Ù ©â×ð´ ˆØæ», çÌÌèÿææ °ß´ âçãc‡æéÌæ ·¤æ ãè çß·¤æâ ãô ÂæÌæ ãñÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ·¤çÆÙæ§ü ·¤ô Îð¹·¤ÚU Ù ç¿‹Ìæ ·¤ÚUô, Ù çÙÚUæàæ ãô¥ô ßÚUÙ ÏñØü ¥õÚU âæãâ ·ð¤ âæÍ ©â·ð¤ çÙßæÚU‡æ ·¤æ ©ÂæØ ·¤ÚUÙð ×ð´ ÁéÅU Áæ¥ôÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ·ð¤ßÜ ÒÒ™ææÙÓÓ ãè °·¤ °ðâæ ¥ÿæØ-Ìžß ãñ, Áô ·¤ãè´ Öè, ç·¤âè Öè ¥ßSÍæ ¥õÚU ç·¤âè ·¤æÜ ×ð´ Öè ×ÙécØ ·¤æ âæÍ Ùãè´ ÀôÇ¸ÌæÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü ¥æÜSØ, ¥·¤×ü‡ØÌæ ¥õÚU Âý׿ÎÂê‡æü ÁèßÙ ×ð´ ¥æÙ‹Î Îð¹Ùð ßæÜð ßSÌéÌÑ ¥æÙ‹Î ·¤æ ÚUãSØ ÁæÙÌð ãè Ùãè´Ð —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü çÁâ â׿Á ·ð¤ Üô» ÂçÚUŸæ×è, §ü׿ÙÎæÚU, âˆØçÙD °ß´ ¥æÎàæüçÂýØ ãô´»ð, ßã ¥ÂÙð ¥æÂ ©žæÚUôÌÚU ©óæÌ ãôÌæ ¿Üæ Áæ°»æÐ —´. ŸæèÚUæ× àæ×æü ¥æ¿æØü