क्लाइमेट चेंज [May'24 Edition] [Must Read]

पृथ्वी बुखार में है

उत्तर: ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट (ग्रीनहाउस प्रभाव) तो समझते ही हो। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, पानी की भाप और जो क्लोरो-फ़्लोरो-कार्बन्स होते हैं, उसके अलावा ओज़ोन, ये सब ग्रीन हाउस गैसें कहलाती हैं। ये क्या करती हैं? ये जो पृथ्वी से रेडिएशन (विकिरण) बाहर जाने को होता है, उसको ये पकड़ लेती हैं। तो वो पृथ्वी के वातावरण से बाहर नहीं जा पाता। जब बाहर नहीं जा पाता तो पृथ्वी का वातावरण गर्म हो जाएगा भाई।

पृथ्वी की ऊर्जा का स्त्रोत क्या है? सूर्य। थोड़ी-बहुत ऊर्जा पृथ्वी के भीतर की गर्मी से आती है जब कोई ज्वालामुखी इत्यादि फटता है, नहीं तो अधिकांशतः पृथ्वी की जितनी ऊर्जा है वो कहाँ से आती है? सूरज से आती है। अब सूरज से जो प्रकाश आता है, वो पृथ्वी की सतह से टकराकर वापस लौटता है। जो किरण सूरज से आ रही होती है वो ज़्यादा गर्म होती है, ज़्यादा ऊँचे तापमान की होती है बजाय उसके जो वापस जा रही होती है। तो ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट ये होता है कि जो वापस लौटता रेडिएशन है, इसको कुछ गैसों के मॉलिक्यूल (अणु) पकड़ लेते हैं, वापस नहीं जाने देते, तो वो भी गर्म होते हैं, और जो पूरा वातावरण ही है, एटमॉस्फियर (वायुमंडल) है, इसको गर्म कर डालते हैं।

इस गर्मी से होता क्या है? अब भाई, जब तापमान बढ़ेगा पृथ्वी का तो उससे कई तरह की बीमारियाँ पृथ्वी पर फैलती हैं। तापमान बढ़ेगा तो पृथ्वी के वायुमंडल में जो ऊर्जा है वो बढ़ गयी न। जितना ज़्यादा तापमान उतनी ज़्यादा ऊर्जा, अब वो ऊर्जा कई तरीके से अभिव्यक्त होगी — ज़्यादा बारिश होगी, ज़्यादा तूफ़ान आएँगे, गर्मी पड़ेगी, बर्फ़ खूब पिघलेगी, नदियों में बाढ़ ज़्यादा आएगी, कुछ नदियाँ सूख जाएँगी, रेगिस्तान फैल जाएँगे। जानवर जिन जगहों पर रहते थे, उन जगहों का तापमान असन्तुलित हो जाएगा, तो जानवरों को वो जगह छोड़कर जानी पड़ेगी। जानवरों की हज़ारों प्रजातियाँ इस प्रक्रिया में नष्ट हो जाएँगी।

जितने भी तटीय क्षेत्र हैं उन पर सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ेगा। जितने भी कम ऊँचाई के क्षेत्र हैं जैसे द्वीप इत्यादि उन पर बहुत प्रभाव पड़ेगा। जो द्वीपीय देश ही हैं उनमें से कई तो विलुप्त ही हो जाएँगे। कई देश हैं जो छोटे-छोटे द्वीपों के ही हैं, वो द्वीप ही पूरा डूब जाना है तो बचेगा नहीं। और ये सब जो होगा, इसके फ़ीडबैक इफ़ेक्ट (प्रतिक्रिया प्रभाव) होते हैं और फ़ीडबैक इफ़ेक्ट क्या है? अभी हमने कहा कि ग्रीन हाउस गैस वातावरण में जितनी होगी, उतना ज़्यादा वातावरण का तापमान बढ़ेगा। और ग्रीन हाउस गैस में से एक होती है वॉटर वेपर , पानी की भाप। और गर्म हवा ज़्यादा वॉटर वेपर को अपनेआप में समा सकती है। हवा का तापमान जितना ज़्यादा होगा, वॉटर वेपर को कैरी करने की उसकी क्षमता उतनी बढ़ जाती है।

तो वॉटर वेपर गर्म हवा में ज़्यादा होगी तो ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट भी ज़्यादा होगा, ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट ज़्यादा होगा तो हवा और गर्म होगी, हवा और गर्म होगी तो उसमें भाप और ज़्यादा होगी, भाप और ज़्यादा होगी तो ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट — तो अब ये फ़ीडबैक साइकिल कहलाते हैं जिसको आप फिर रोक नहीं सकते। एक बार वो शुरू हो गया तो वो कोई नहीं जानता कहाँ जाकर रुकेगा।

लद्दाख ही नहीं, हम सब जल रहे हैं

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, सोनम वांगचुक जी क्लाइमेट चेंज (जलवायु-परिवर्तन) के ऊपर एक ‘क्लाइमेट फ़ास्ट’ कर रहे हैं और ये मुद्दा इतना महत्वपूर्ण है जहाँ पर वो इस पृथ्वी के साथ जो भी कुछ हो रहा है, उसको लेकर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। पर मैं देख रहा हूँ कि उनके सारे प्रयासों के बाद भी उन्हें आम आदमी से इतना समर्थन नहीं मिल रहा है। तो ऐसा क्यों है?

उत्तर: आम आदमी को पहले पता तो होना चाहिए न कि क्लाइमेट क्राइसिस (जलवायु संकट) पूरा है क्या, तब समर्थन देगा न? वो जो कर रहे हैं सोनम वांगचुक जी, वो तो एक मुद्दे पर कर रहे हैं। उस मुद्दे से जब इस देश के आम आदमी का कोई रिश्ता ही नहीं है, तो लोगों की नज़र में ये एक छोटी सी बात है।

वैसे भी लद्दाख दूर-दराज़ का इलाका है, आबादी भी वहाँ बहुत कम है। एक छोटे शहर जितनी पूरे लद्दाख के विस्तार की आबादी है। आम आदमी को अगर पता हो कि दुनिया में अगर अभी आठ-सौ करोड़ लोग हैं, और उसमें से तीन-सौ करोड़ लोग हैं वर्तमान में ही जिनको ठीक खाना नहीं मिल पाता है। दो-सौ-चालीस करोड़ लोग ऐसे हैं जिनको खाना मिल भी पाएगा, कुछ निश्चित नहीं होता है, मिल गया तो ठीक है, नहीं मिला तो नहीं। और लगभग अस्सी-नब्बे करोड़ लोग ऐसे हैं जो अनिवार्यतः भूखे सोते हैं। ये बात आम आदमी को पता है क्या? इसका क्लाइमेट से क्या रिश्ता है ये अभी बताऊँगा।

आठ-सौ करोड़ की दुनिया की आबादी है, उसमें से तीन-सौ करोड़ लोग ऐसे हैं जिनको खाना मिल तो रहा है पर वो खाना पोषण में कमज़ोर है, ठीक-ठाक नहीं है, वो खाना खाकर के आप एक स्वस्थ ज़िन्दगी नहीं जी सकते। दो-सौ-चालीस करोड़ लोग ऐसे हैं जिनका पक्का नहीं होता कि उन्हें खाना मिलेगा भी कि नहीं मिलेगा, और अस्सी-नब्बे करोड़ ऐसे हैं जिनका पक्का होता है कि इनको खाना नहीं ही मिलना है। और क्लाइमेट चेंज से जो प्रमुख फ़सलें हैं सब-की-सब — गेहूँ, चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा — इनकी यील्ड (उपज) में पन्द्रह से पच्चीस प्रतिशत की कमी आनी है और ये सारी-की-सारी कमी जाकर किनके ऊपर टूटेगी? उन्हीं के ऊपर जिनकी परचेज़िंग पॉवर , खरीद पाने की क्षमता सबसे कम है।

साधारण डिमांड (माँग) और सप्लाइ (आपूर्ति) का नियम तो जानते हो न? जब किसी चीज़ की सप्लाइ कम होती है तो उसका प्राइस बढ़ जाता है। जब प्राइस बढ़ेगा तो कौन नहीं खरीद पाएगा, अमीर लोग? जो गरीब है वो ही नहीं खरीद पाएगा। और जो गरीब है, वो वैसा है जो अभी ही खाने को नहीं पा रहा। और जो दुनिया के अस्सी-नब्बे करोड़ लोग हैं जो रोज़ भूखे सोते हैं, इनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत में है। और यही लोग, हमारे भारतीय लोग ही, जो या तो भूखे सो रहे हैं या जिनको खाने की आपूर्ति की भी कोई गारंटी नहीं है, या जिनको खाना मिलता तो है पर ऐसा नहीं होता कि उसमें सब पोषक तत्व हों, इन्हें ही कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा कि क्लाइमेट के साथ क्या होने जा रहा है। ‘अरे! होगा कोई आमरण अनशन कर रहा होगा, हमें क्या लेना-देना!’

तुम्हें ये लेना-देना है कि तुम भूखे मरने वाले हो क्लाइमेट चेंज से, खेतों में फ़सलें उगनी बन्द होने वाली हैं। और जिनकी वजह से खेतों में फ़सलें उगनी बन्द होंगी, उन्हें फ़र्क नहीं पड़ेगा। उनके पास बहुत पैसा है। अपनी आमदनी का वो खाने पर एक या दो प्रतिशत खर्च करते हैं बस, उनके पास इतना पैसा है। वो दो प्रतिशत पहले खाने पर खर्च करते थे, अब तीन प्रतिशत खर्च कर लेंगे, उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। खाने पर सबसे ज़्यादा अपनी आमदनी के अनुपात में व्यय गरीब आदमी करता है। अमीर आदमी अपनी आमदनी का एक या दो प्रतिशत खाने पर खर्च करेगा और गरीब आदमी अपनी आमदनी का साठ-सत्तर प्रतिशत लगाता है खाने पर। जब खाना महँगा हो जाएगा क्योंकि आपूर्ति कम हो जाएगी तो इन गरीबों का क्या होने वाला है?

हम तो वैसे भी इस बात पर बड़ा फ़क्र अनुभव करते हैं न कि भारत में अस्सी करोड़ लोगों को मुफ़्त खाना दिया जाता है। ये वो लोग हैं जिनके पास खाने के पैसे नहीं हैं। हमारी दो-तिहाई आबादी ऐसी है जिसके पास ठीक से खाने के पैसे नहीं हैं, और क्लाइमेट चेंज की गाज सबसे ज़्यादा इन पर गिरने वाली है। लेकिन इनको झुनझुना थमा दिया गया है, तमाम तरह के मनोरंजन दे दिये गए हैं, धार्मिक कलाबाज़ियाँ दे दी गयी हैं, तो इन्हें फ़र्क ही नहीं पड़ रहा कि भविष्य इनके लिए कितना भयावह है। और ये भविष्य भयावह किनके कारण होने जा रहा है? उनके कारण होने जा रहा है जिनके पास पहले ही पैसा है और जो और पैसे की हवस में लद्दाख जैसी जगहों का दोहन करना चाहते हैं।

जैसे हसदेव को जानते हो न, वहाँ क्यों काटे जा रहे हैं जंगल? इसलिए थोड़े ही जंगल काटे जा रहे हैं कि धूप नहीं आती थी, ठंड बहुत लगती थी, जंगल काट दो धूप आएगा, वहाँ इसलिए काटा जा रहा है कि नीचे खनिज है, मिनरल्स है, उसको निकालना है। वैसे ही लद्दाख में भी कुछ क्षेत्र हैं जो मिनरल रिच (खनिज सम्पन्न) हैं, इसीलिए लद्दाख को स्वायत्तता नहीं दी जा रही है। वो (सोनम वांगचुक) कह रहे हैं कि भाई, हमारी जगह है, हमें देखने दो कि हमें इसका क्या करना है। वो (सरकार) कह रहे हैं, ‘नहीं, हम देखेंगे।’

जो दोहन करेंगे वहाँ पर जाकर के उन मिनरल्स का, उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, वो भूखे नहीं मरने वाले। लेकिन जो बेकसूर है, गरीब है, वो भूखा मरने वाला है क्लाइमेट चेंज की वजह से। ये बात हमें नहीं समझ में आ रही है।

भाई, फ़सलें एक निश्चित तापमान पर होती हैं और फ़सलें एक निश्चित गर्मी-पानी के पैटर्न में होती हैं, ये नहीं जानते हो क्या? खड़ी फ़सल पर पानी पड़ जाए, क्या होता है? और जिन दिनों में बीज डलना है और बुआई होनी है, उन दिनों में अगर पानी पड़ जाए तो क्या होता है, और पानी न पड़े तो क्या होता है, ये सब नहीं जानते हो क्या? वो पूरा जब वेदर-पैटर्न (मौसमी-चक्र) डिस्रप्ट (नष्ट) हो जाएगा तो कौनसी फ़सल होने वाली है?

तीन-सौ-पैंसठ में से तीन-सौ-चौदह दिन एक्स्ट्रीम-वेदर-इवेंट्स (चरम जलवायु घटनाओं) के थे पिछले साल भारत में — तीन-सौ-पैंसठ में से तीन-सौ-चौदह दिन। माने एक भी दिन ऐसा नहीं था जब देश में कहीं-न-कहीं कोई एक्स्ट्रीम वेदर इवेंट न हुआ हो। एक्सट्रीम वैदर इवेंट क्या होता है? दो तरीके का होता है, एक होता है टेम्परेचर (तापमान) का, एक होता है प्रेसिपिटेशन (बरसात) का, टेम्परेचर और रेनफ़ॉल। उसमें आप फिर साथ में साइक्लोन (चक्रवात) वगैरह भी जोड़ सकते हो। या तो गर्मी बहुत ज़्यादा है कहीं-न-कहीं या बारिश बहुत ज़्यादा है या बहुत कम हो रही है कहीं-न-कहीं, या फिर कहीं पर ज़बरदस्त अन्धड़-तूफ़ान चल रहा है। इसमें फ़सलें होंगी?

पर आम आदमी को ये बात समझ में नहीं आ रही है। आम आदमी मनोरंजन में व्यस्त है। आम आदमी के पास दूसरे मुद्दे हैं, कह रहा है, ‘चुनाव आ रहा है, चुनाव आ रहा है। इसमें और तमाम तरीके के टीवी में आ रहे हैं मनोरंजन, वो देखने हैं।’

अभी मैंने खाने की बात करी। ये जब हम भूखे लोगों की बात कर रहे हैं, बड़ा एक रोचक — ट्रेजिक (दुखद) लेकिन रोचक — आपके सामने आँकड़ा रख रहा हूँ। दुनिया में करीब पचास-साठ करोड़ बच्चे हैं जो कुपोषित हैं, उन पचास-साठ करोड़ में दस-बीस करोड़ ऐसे हैं, या आठ-दस करोड़, जिनको ‘वेस्टेड’ कहते हैं। कुपोषित हैं उन्हें ‘स्टंटेड’ बोल देते हैं और जो उनसे भी गयी-गुज़री हालत में हैं उन्हें बोलते हैं 'वेस्टेड’। और जितने ’वेस्टेड’ बच्चे हैं दुनिया में, लगभग उतने ही ओबीज़ (मोटे) और ओवरवेट बच्चे भी हैं। माने एक तबका है जिसके पास इतना ज़्यादा है कि उसके बच्चों की समस्या ये है कि ऐसे मोटे-मोटे थुलथुल निकल रहे हैं और एक बहुत बड़ा तबका है जिसके बच्चों के पास खाने को नहीं है।

जिनके खाने को नहीं है, उनकी तादाद बढ़ती ही जाएगी, बढ़ती ही जाएगी। ये जिन भूखे लोगों की मैंने बात करी न — आपको क्या लगता है दुनिया ज़्यादा प्रॉस्परस (सम्पन्न) हो रही है, समृद्ध हो रही है — जिन भूखे लोगों की मैंने बात करी, पिछले पाँच साल में ही इनकी तादाद में बीस करोड़ की वृद्धि हो गयी है। दुनिया में भूखों की संख्या बढ़ती जा रही है और उसका बहुत बड़ा कारण क्लाइमेट चेंज है। हम भूखे मर रहे हैं, हमारे भाई-बहन भूखे मर रहे हैं और उसका कारण क्लाइमेट चेंज है। और हम उसकी बात भी नहीं करना चाहते।

ये मैंने अभी खाने की चीज़ों की बात करी, अब पीने की चीज़ पर आ जाओ, पानी। दुनिया के सौ शहर हैं जिनमें एक्स्ट्रीम वॉटर-स्केरसिटी (अत्यधिक पानी की किल्लत) होने वाली है। वो जो बैंगलोर में अभी देख रहे हो न, वो चीज़। और उनमें से तीस शहर भारत में हैं और भारत के तीस शहरों में बैंगलोर का नम्बर तो टॉप-टेन में आता भी नहीं है, या शायद दसवें नम्बर पर होगा, और हमें होश नहीं है। हम सिर्फ़ भूखे ही नहीं, प्यासे मरने वाले हैं। और अगर इस बात के लिए कहीं कोई आन्दोलन हो रहा है तो हमारे कान पर जूँ नहीं रेंग रही है। ठीक बोल रहा हूँ?

प्रश्न: इस लिस्ट में दसवें नम्बर पर है बैंगलोर पर इसके अलावा भारत के तीस शहर हैं इसमें। मैं इनके नाम लूँ अभी यहाँ पर?

उत्तर: हाँ, कम-से-कम जो पहले पाँच हैं उनको तो लो।

प्रश्न: जी। जयपुर, इन्दौर, थाणे, वड़ोदरा, श्रीनगर और इसके अलावा फिर बाकी अन्य राज्यों से भी अलग-अलग शहर हैं।

उत्तर: हम भूखे और प्यासे दोनों मरने वाले हैं। बस ये है कि जिनके पास पैसा है वो कहेंगे, ‘चलो, पानी की बोतल हज़ार रुपये की भी आ रही है तो ले लेते हैं’, और गरीब क्या करेगा? और भारत देश तो अभी भी गरीबों का ही है। फिर याद करिए कि अस्सी करोड़ लोगों को मुफ़्त खाना दिया जा रहा है, माने सब गरीब हैं। इनका होने क्या वाला है?

हमें कुछ नहीं समझ में आ रहा हमारा क्या होने वाला है। हमें तरह-तरह के नशे दे दिये गए हैं और उनमें धुत्त हैं हम। क्लाइमेट चेंज के इतने तरह के उपद्रव हैं, ऐसे-ऐसे परिणाम हैं, मुझे समझ में नहीं आता मैं कौनसा छोर पकड़ूँ, कहाँ से बात शुरू करूँ, किधर को ले जाऊँ।

सूखने से पहले बाढ़ आएगी क्योंकि जब ग्लेशियर पिघलेगा तो पहले-पहल क्या आती है? बाढ़, तो पहले तो बाढ़ आएगी। पहले बाढ़ आएगी, फिर एकदम पूरा सूखा पड़ जाना है। जिस लद्दाख की वहाँ पर बात हो रही है, भाई वो हिमालय का हिस्सा है। जब ग्लेशियर पिघलेगा तो पहले-पहल क्या होगा? भारत की एक-सौ-पचास करोड़ की आबादी में से आधी से ज़्यादा जो हिमालयन रिवर्स हैं, उन पर आश्रित है, पूरा उत्तर भारत। और ज़्यादातर उत्तर भारत की नदियाँ हिमालय से ही अपना पानी पाती हैं। जब इतनी तेज़ी से ग्लेशियर पिघलेगा तो बाढ़ आएगी और उसके बाद कुछ नहीं बचेगा। अपनी नदियाँ देखने को तरस जाओगे, नदियाँ नहीं रहेंगी। और ये बहुत आगे की हम बात नहीं कर रहे हैं, ये बात हम अभी की कर रहे हैं। ये सबकुछ अगले कुछ सालों में, कुछ दशकों में होने जा रहा है।

लद्दाख में ग्लेशियर्स के पिघलने के कारण जो वहाँ की झीलें हैं और तालाब हैं, वो खतरनाक स्तर तक भर गये हैं। जब उतना भर जाते हैं तो फटते हैं, जब फटते हैं तो निचले इलाकों में बाढ़ आती है। वैसे ही कुछ हुआ था कुछ साल पहले — कितने साल पहले आप देख लीजिएगा — कि वहाँ पर एक भारी झील भर गयी थी। तो इन्होंने ही, सोनम वांगचुक ने कहा कि एक दूसरे तरीके से इसमें साइफनिंग कर देते हैं पानी की। सरकार ने बात नहीं मानी, सरकार ने उसमें ब्लास्ट कर दिया। ब्लास्ट कर दिया तो नीचे खूब तबाही आयी। फ़सलें उड़ गयीं, पुल उड़ गये, जान-माल की तबाही हुई, हर तरह की तबाही हुई। फिर बाद में सिक्किम में भी वैसी स्थिति आयी, तो उनको बुलाया गया और उनको कहा गया कि आप जिस साइफनिंग की बात कर रहे हैं, वो कर दीजिए ताकि जल स्तर थोड़ा कम हो जाए तो बच जाएँ हम।

बात समझो, आप नहीं समझ सकते कि कितनी बर्फ़ जमा है इन हिमनदों में। इन्हें ‘हिमनद’ बोलते हैं, कि एक नदी में कुल जितना पानी हो सकता है उतना पानी एक ग्लेशियर में है — हिमनद। और वो पानी जब पिघलेगा तो क्या होगा, कैसी तबाही आएगी! और वो पिघल रहा है। और उसके पिघलने से — मैं आपसे पहले भी बता चुका हूँ — एक बहुत गन्दा फ़ीडबैक साइकिल शुरू होता है। बर्फ़ का रंग सफ़ेद होता है। बर्फ़ पर जब धूप पड़ती है तो बर्फ़ उसको वापस रिफ्लेक्ट कर देती है। लेकिन जैसे-जैसे बर्फ़ पिघलती जाती है — और बहुत तेज़ी से पिघल चुकी है, पिघल रही नहीं है, पिघल चुकी है — वैसे-वैसे बर्फ़ के नीचे की जो मिट्टी और चट्टाने हैं वो एक्सपोज़ (अनावृत) होते जाते हैं और वो सूरज की रोशनी को सोखते हैं। बर्फ़ नहीं सोखती, वो सोखते हैं। जब वो सोखते हैं तो गर्म होते हैं, जब वो गर्म होते हैं तो बर्फ़ और पिघलती है। जब बर्फ़ और पिघलती है तो रॉक्स (चट्टानें) और ज़्यादा एक्सपोज़ होती हैं। जब रॉक्स और ज़्यादा एक्सपोज़ होती हैं तो वो और ज़्यादा सनलाइट (सूर्य की रोशनी) एब्ज़ॉर्ब (सोखना) करती हैं। जब वो और ज़्यादा सनलाइट एब्ज़ॉर्ब करती हैं, बर्फ़ और पिघलती है, बर्फ़ पिघलती है तो रॉक्स और ज़्यादा एक्सपोज़ होती हैं।

ये एक ऐसे पॉजिटिव फ़ीडबैक साइकिल चलता जाता है। और वही जो पानी है, जो पिघल रहा है, जब उस पर धूप पड़ती जाती है और तापमान बढ़ता जाता है तो पानी क्या बन जाता है? भाप, वाटर वेपर , H2O। और H2O अपनेआप में एक ग्रीन हाउस गैस होती है। ग्रीन हाउस गैस कोई सिर्फ़ कार्बन डाइऑक्साइड थोड़े ही होती है। कार्बन डाइऑक्साइड से कहीं ज़्यादा बड़ी ग्रीन हाउस गैस मीथेन है; N2O, H2O ये सब ग्रीन हाउस गैसेज़ हैं।

ओसियन्स (समुद्र) हमारे कार्बन सिंक्स (कार्बन अवशोषक) हुआ करते थे, वो अब कार्बन सिंक्स की जगह कार्बन एमिटर्स (कार्बन उत्सर्जक) बन गये हैं, क्योंकि पानी कार्बन डाइऑक्साइड को सोखता है। लेकिन उनका तापमान इतना बढ़ गया है कि अब वो कार्बन एमिटर्स होते जा रहे हैं, एसिडिफ़िकेशन ऑफ़ ओसियन्स (समुद्रों का अम्लीकरण)। बात कुछ-कुछ समझ में आ रही है?

पानी का जल स्तर — अब ये जो पिघलेगा पानी, जो ये बड़े-बड़े ग्लेशियर हैं — ग्लेशियर सिर्फ़ लद्दाख में ही नहीं हैं, हम आर्कटिक की, अंटार्कटिक की भी तो बात करेंगे — वहाँ से जो पिघलता है पानी, वो जाता है समुद्रों में, और उससे समुद्रों का जल स्तर क्या हो रहा है? बढ़ता जा रहा है, बढ़ता जा रहा है। आपको क्या लग रहा है, हमारे बम्बई जैसे शहर बचने वाले हैं क्या? जितने हमारे तटीय शहर हैं, चेन्नई, मुम्बई, इन सबकी जनसंख्याएँ बहुत-बहुत खतरे में आ चुकी हैं। वो खतरा कहीं से टल नहीं रहा है।

सन् २०१५ में पेरिस में बड़ा समझौता हुआ था और सन् २०१५ के बाद से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन घटने की जगह और बढ़ गया है। हाँ, जिस गति से पहले बढ़ रहा था, उस गति से नहीं बढ़ रहा है लेकिन कम नहीं हो रहा है, और बढ़ रहा है। आप पहले ही एक बहुत खतरनाक हालत में थे, आपकी हालत और खतरनाक हो रही है। और इसको जो वैज्ञानिक हैं, क्लाइमेट साइंटिस्ट्स हैं, वो कहते हैं, ‘वी आर एक्सिलरेटिंग टुवर्ड्स आवर डूम। वी आर नॉट जस्ट मूविंग टूवर्ड्स आवर डिस्ट्रक्शन, वी आर एक्सिलरेटिंग टूवर्ड्स आवर डिस्ट्रक्शन’ (हम अपने अन्त की तरफ़ तेज़ी से दौड़ रहे हैं। हम विनाश की ओर सिर्फ़ जा नहीं रहे, विनाश की तरफ़ तेज़ी से जा रहे हैं)।

जो क्लाइमेट गोल्स हमने अपने लिए निर्धारित करे थे — क्लाइमेट गोल्स ये कि हमें रोकना है डेढ़ डिग्री पर जो एवरेज राइज़ इन टेम्परेचर (औसत तापमान वृद्धि) है उसको — डेढ़ डिग्री पर अगर रोकना है तो आज आप जितना एमिशन (उत्सर्जन) करते हो कॉर्बन डायऑक्साइड का, इससे लगभग बयालिस प्रतिशत कम, माने आधा करना पड़ेगा वर्ष २०३० तक। आपको लग रहा है कोई भी सरकार दुनिया भर में गम्भीर है ये करने में? डेढ़ डिग्री छोड़ दो, अगर दो डिग्री पर भी रोकना है तो आपको अठाईस प्रतिशत कम करना पड़ेगा। कम छोड़ दो, वो तो बढ़ रहा है! माइनस में जाने की जगह वो तो और प्लस में जा रहा है।

लेकिन आम आदमी को इससे फ़र्क नहीं पड़ता, आम आदमी के पास झुनझुने हैं और वो न जाने कहाँ पर मग्न है। वो कौनसे उसके पास मुद्दे हैं; देखो न टीवी में, सोशल मीडिया में कौनसे मुद्दे चल रहे हैं। उनसे क्लाइमेट चेंज की बात करो तो कहते हैं, ‘होक्स (अफ़वाह) है, होक्स।' यही होंगे जो मरेंगे सबसे पहले।

पिछले चालीस सालों में हम अपनी आधी से ज़्यादा वाइल्ड लाइफ़ (वन्य जीव) खत्म कर चुके हैं, क्यों? डिफ़ॉरेस्टेशन (वनों की कटाई), जो कि क्लाइमेट चेंज का एक बहुत बड़ा कारण है। आप ये समझ पा रहे हो? पृथ्वी पर जीव-जन्तुओं की जितनी प्रजातियाँ हैं उनमें से आधी से ज़्यादा हमने सिर्फ़ पिछले चालीस साल में खत्म कर दी हमेशा के लिए, वो अब कभी लौटकर नहीं आएँगे। और खत्म करने की दर हर साल के साथ बढ़ती जा रही है क्योंकि हमें अपनी आबादी बढ़ानी है। आम आदमी तो इसमें लगा हुआ है न, ‘मैं, मेरा घोंसला। घोंसले में मैं, मेरी चिरैया और हमारे अंडे।’

इस पूरी चीज़ का सबसे बड़ा कारण है जनसंख्या, एकमात्र कारण आप कह सकते हो जनसंख्या है। बाकी आप रिसाइक्लिंग (पुनर्चक्रण) और प्लास्टिक और इस तरह के झुनझुने बजाते रहो, उससे कुछ नहीं होगा। मैं आपको वो दिखा चुका हूँ कि ये इस तरह के झुनझुने आप बजाते हो न और बोलते हो, मैं क्लाइमेट चेंज रोकने के लिए ये सब कर रहा हूँ, क्या कर रहा हूँ? कि मैं एक किलोमीटर गाड़ी कम चलाता हूँ और मैं घर में इस तरह के बल्ब लगाता हूँ और मैं प्लास्टिक का कम इस्तेमाल करता हूँ, इन सब कामों को मिलाकर के भी पाँच प्रतिशत फ़र्क नहीं पड़ना, पचानवे प्रतिशत फ़र्क पड़ना है आबादी से। आबादी नहीं कम होगी तो इस महाविनाश को आप नहीं रोक सकते हो।

ये जो पूरा हिमालय का क्षेत्र है, दुनियाभर के वैज्ञानिक कह रहे हैं कि ये एक ‘इकोलॉजिकल डिज़ास्टर’ (पारिस्थितिकीय आपदा) बन चुका है, इसलिए वहाँ पर आन्दोलन हो रहा है। और सरकारें लगी हुई हैं कि नहीं साहब, अभी तो हमें और खनन वगैरह करने दो। जब आप खनन करते हो उससे कार्बन निकलेगा न? आप कुछ कर रहे हो, कोई भी एक्टिविटी कर रहे हो आप, चाहे आप कोई टूरिज़्म एक्टिविटी कर रहे हो, कुछ भी कर रहे हो आप उससे ‘सूट’ निकलता है, क्या निकलता है? सूट , वो छोटे-छोटे महीन टुकड़े होते हैं कार्बन के, जैसे आपके वेहिकल के एक्ज़ॉस्ट से निकलते हैं। वो जब बर्फ़ पर पड़ेगा तो बताओ क्या होगा? वो जो सूट है, जला हुआ ईंधन, धुआँ, वो जब बर्फ़ पर पड़ेगा तो क्या होगा? बर्फ़ कैसी हो जाएगी?

श्रोतागण: काली।

उत्तर: बर्फ़ काली होते ही क्या करेगी?

श्रोता: हीट एब्ज़ॉर्ब (ऊष्मा का अवशोषण)।

उत्तर: हीट एब्ज़ॉर्ब करेगी, हीट एब्ज़ॉर्ब करते ही वो पूरा पिघल जानी है। ये हो रहा है लद्दाख में। लद्दाख का बहुत फ़्रेजाइल , बहुत कमज़ोर, एक नाज़ुक इकोसिस्टम है, वो नहीं बर्दाश्त कर रहा ये जो सब चल रहा है।

हम महाविनाश की कगार पर खड़े हुए हैं, लोगों को होश नहीं आ रहा। लोग किसमें मग्न हैं? कि हमें तो जीडीपी चाहिए, क्योंकि विकास माने जीडीपी होता है। इस साल में ही — भविष्य की नहीं, वर्तमान की बात है — इस साल में ही भारत के जीडीपी को दस प्रतिशत की चोट पड़ी है मात्र क्लाइमेट चेंज के कारण। और आगामी वर्षों और दशकों में ये चोट तीस से चालीस प्रतिशत की हो जानी है। अब गिन लो कि कितने ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो गया।

इससे जो आपकी व्यवस्था पर, शरीर पर और सेहत पर असर पड़ना है वो मैं क्या बताऊँ! दो डिग्री औसत बढ़ोतरी की बात हो रही है तापमान की। और वो औसत बढ़ोतरी माने ये नहीं होगा कि दिन में और रात में सबमें दो डिग्री बढ़ जाना है, वो जो ज़्यादातर तापमान बढ़ेगा वो दिन में बढ़ेगा। रात में लगभग उतना ही रहना है, थोड़ा सा बढ़ेगा। इसका मतलब दिन में बढ़ेगा चार डिग्री और जिस दिन एक्सट्रीम वेदर इवेंट होगा, उस दिन बढ़ेगा आठ डिग्री।

उत्तर प्रदेश, बिहार में, राजस्थान में, दिल्ली में, हरियाणा में पचपन-साठ डिग्री में जी लोगे, ये बता दो? तुम्हारे एयर कंडीशनर काम करने वाले हैं? एक बार को कल्पना ही करके देखो, तुम्हारे एसी का क्या होगा साठ डिग्री में, एसी पिघल गया होगा! ये जो स्प्लिट एसी होते हैं, उनकी जो यूनिट ऊपर रखी होती है, वो ऊपर जाकर देखोगे, उसमें से धुआँ निकल रहा होगा, वो तार-वार सब पिघले पड़े होंगे। और ऊपर जा ही नहीं पाओगे, दोपहर में बारह-एक बजे देखने भी नहीं जा पाओगे ऊपर कि एसी काम क्यों नहीं कर रहा है। ऊपर जा रहे होगे, सीढ़ियों पर लड़खड़ाकर गिर जाओगे। वैसे भी घर में नहाने को तो छोड़ दो, पीने को भी पानी नहीं होगा। गाड़ी बाहर खड़ी होगी, जाओगे, देखोगे टायर फट चुके हैं और पिघलकर के चिपक चुके हैं, क्योंकि दो डिग्री औसत है भाई!

लोग कहते हैं, ‘दो डिग्री, दो डिग्री’, वो दो डिग्री नहीं है, इस दो डिग्री का मतलब है हफ़्ते में एक दिन आठ डिग्री और प्रतिदिन चार डिग्री क्योंकि इक्वल राइज़ (एक बराबर बढ़ोतरी) नहीं है, दो डिग्री एवरेज आउट (औसत) होकर हो रहा है। रात को ज़ीरो है तो दिन में चार है, तब एवरेज दो आएगा। और जो ये रेंज ऑफ़ टेम्परेचर बढ़ेगा, वो सम्भाल कैसे पाओगे? अभी आपके शरीर की व्यवस्था एक तरह के तापमान से सन्तुलन बना चुकी है, वो सबकुछ जब बदल जाएगा तो कैसे जी लोगे? कितनी नयी तरीके की बीमारियाँ आएँगी सोचा है? कोविड जैसी हज़ारों बीमारियाँ उछलकर के आने वाली हैं क्योंकि वो सब वायरस बर्फ़ के नीचे हज़ारों, लाखों, करोड़ों साल से दबे पड़े हैं, डॉर्मेंट (निष्क्रिय) हैं। जब वो बर्फ़ पिघलेगी तो वो सारे वायरस बाहर आ जाने हैं।

वायरस ऐसी चीज़ नहीं होती जिसकी कोई उम्र होती है। वायरस लगभग एक केमिकल जैसे होते हैं, केमिकल की कोई उम्र होती है क्या? वायरस को लिविंग , नॉन-लिविंग (सजीव, निर्जीव) दोनों माना जाता है क्योंकि वो केमिकल की तरह होता है। वो करोड़ों सालों तक बर्फ़ के नीचे पड़ा रह सकता है और जैसे ही बर्फ़ पिघलेगी, वो बाहर आ जाएगा, जैसे कोरोना वायरस बाहर आ गया था उन गुफ़ाओं से, उन चमगादड़ों से। एक कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया हिला दी, ऐसे लाखों वायरस हैं जो बाहर आने को तैयार बैठे हुए हैं। लेकिन आम आदमी को कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा है।

आज हम कहते हैं, ‘अरे! वहाँ यूरोप के देशों में कुछ रेफ़्यूजी (शरणार्थी) आ गये, इससे बड़ी समस्या हो जाती है।’ अमेरिका परेशान है कि मेक्सिको और अपने बीच में दीवार खड़ी करेंगे, ट्रम्प कह रहा है, ‘नहीं, ये जितने हिस्पैनिक्स होते हैं, बहुत बुरे लोग होते हैं, हमें रेफ़्यूजी नहीं चाहिए।’ जर्मनी में, फ़्रांस में, ब्रिटेन में, सबमें रेफ़्यूजी बहुत बड़ा मुद्दा है। भारत में बहुत बड़ा मुद्दा है रोहिंग्याज़, ‘अरे! रोहिंग्या आ गये, क्यों आ गये?’ सीएए का भी पूरा मुद्दा रेफ़्यूजीज़ से ही तो जुड़ा हुआ है। कहते हैं, ‘कुछ रेफ़्यूजी अच्छे होते हैं उनको आने दो, उनके लिए हम एक विशेष कानून बनाएँगे।’

दुनिया के आठ-सौ-करोड़ लोगों में से एक-सौ-बीस करोड़ लोग रेफ़्यूजी होने वाले हैं, इनको कौनसा देश रख लेगा, ये बताओ। इन्हें ‘क्लाइमेट रेफ़्यूजीज़’ बोलते हैं, ये नये तरीके के रेफ़्यूजी हैं, ‘क्लाइमेट रेफ़्यूजीज़’। बारह-पन्द्रह हज़ार रेफ़्यूजी आ जाते हैं, शरणार्थी, तो हमारी हालत खराब हो जाती है, हो जाती है न? और ये एक-सौ-बीस करोड़ जब बनेंगे शरणार्थी तो दुनिया की जियोपॉलिटिक्स (भू-राजनीति) का क्या होने वाला है और इससे कैसी-कैसी लड़ाइयाँ छिड़ेंगी, ये सोचो!

और एक बात और समझना, जब लड़ाइयों की बात आ रही है, लड़ाइयाँ क्लाइमेट चेंज का अपनेआप में एक बड़ा कारण हैं। हमने क्या कहा? जब कॉर्बन हवा में आता है, कॉर्बन माने ये जो सूट होता है, कार्बन माने छोटा कार्बन नहीं, पार्टिक्युलेट मैटर नहीं, ये जो सूट होता है, लालटेन जलने पर देखते हो? लालटेन के शीशे पर इकट्ठा हो जाता है। जब बम फटता है या बमवर्षा के कारण कहीं आग लगती है तो उस तरह की कालिमा खूब निकलेगी। वो कालिमा क्या करती है वातावरण में? हीट को और ट्रैप करती है। इसके अलावा कार्बन डाइऑक्साइड रिलीज़ होती है, वो अपनेआप में ग्रीन हाउस गैस है। तो युद्ध अपनेआप में क्लाइमेट चेंज को कॉन्ट्रिब्यूट (योगदान) करता है और क्लाइमेट चेंज के कारण युद्ध ज़बरदस्त तरीके से न छिड़े, ये हो नहीं सकता।

सामरिक विश्लेषकों का कहना है कि बहुत सम्भव है कि अगले विश्व-युद्ध का कारण क्लाइमेट चेंज ही हो और अगला विश्व-युद्ध बहुत दूर न हो, बस कुछ सालों या कुछ दशकों की दूरी पर खड़ा हो। कहते भी हैं न कि साहब, ज़मीन पीछे छूट गयी और ऑइल भी पीछे छूट गया, अगला विश्व-युद्ध पानी के लिए होगा। पहले दोनों विश्व-युद्ध हुए थे कॉलोनीज़ के लिए, ज़मीन चाहिए, कॉलोनीज़। फिर अभी अतीत की जो बड़ी लड़ाईयाँ हैं पिछले पचास साल की वो ज़्यादातर हुई हैं तेल के लिए। आने वाली लड़ाई होगी सिर्फ़-और-सिर्फ़?

श्रोता: पानी के लिए।

उत्तर: पानी के लिए। हम प्यासे मरने वाले हैं। और ये हम तब बात कर रहे हैं जब हम इस धरती की सबसे सबल प्रजाति हैं। नन्हीं गौरैया का सोचो उसका क्या होगा! पेड़ नहीं और तापमान पचपन-साठ, उसका क्या होने वाला है एकबार को सोचो, उसका दर्द सोचो। पक्षियों का दर्द सोचो, पेड़ सारे काट दिये और तापमान कर दिया पचपन-साठ, क्या होगा उनका? और जब हम बात कर रहे थे न कि प्रजातियाँ विलुप्त हुई हैं, उनमें सबसे (ज़्यादा) जो प्रजातियाँ विलुप्त हुई हैं वो फ्रेश वाटर इकोलॉजी (ताज़े पानी के पारिस्थितिकी) की हैं। अपने बच्चों को हम कौनसी दुनिया दे रहे हैं ये? वो हमें कोसेंगे कि हमें क्यों पैदा किया भुन-भुनकर मरने के लिए — ‘रोस्टेड टू डेथ’।

इसके बहुत और आयाम हैं। मैं सब-के-सब तो अभी एकदम स्मृति से आपको बता नहीं सकता हूँ, पर मानव गतिविधि का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जो क्लाइमेट चेंज की भयानक चोट न झेलने वाला हो। आप बताओ, ये बेचारे जो दिहाड़ी मज़दूर होते हैं इनका क्या होगा, ये कैसे दिन में काम करेंगे? और कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी तो सब दिन में ही होती है। किस तरह की हीटवेव्स (गरम हवाएँ) चलेंगी, लू कैसी हो जानी है, कुछ समझ पा रहे हो?

और समझिएगा, हमारी ये जो पूरी शारीरिक व्यवस्था होती है न, जैसे आप भारतीय हो तो हमारे जीन्स बने हुए हैं एक खास तरीके की टेम्परेचर-रेंज (तापमान सीमा) में रहने के लिए। जब आप उस टेम्परेचर रेंज में नहीं रहते तो फिर आपको अतिरिक्त इन्तज़ाम करने पड़ते हैं। आपको एसी चलाना पड़ता है या आप किसी ठंडे देश चले गये, भारतीय कनाडा चला गया तो वो अपना ज़्यादा मोटे कपड़े पहनेगा, गर्म। और आप पाते हो कि जब पश्चिमी लोग भारत आते हैं तो भारत की ठंडी में भी वो टीशर्ट पहनकर घूम रहे होते हैं, क्योंकि उनका शरीर वो माइनस दस, माइनस बीस के लिए अभ्यस्त हो गया होता है।

भारतीय शरीर बहुत ऊँचे तापमानों के लिए अभ्यस्त नहीं है और तन पर जब चोट पड़ती है तो उसका असर मन पर पड़ता है। हम साइकोसोमेटिक (मनोदैहिक) जीव हैं, हमारी पूरी मानसिक व्यवस्था चरमरा जानी है क्लाइमेट चेंज से, क्योंकि ये क्लाइमेट चेंज एक डिग्री-दो डिग्री का नहीं है, एक्स्ट्रीम वेदर इवेंट्स का चेंज है। हत्या, हिंसा, तमाम तरह के अपराध बहुत-बहुत बढ़ जाने हैं। पूरी पृथ्वी को बुखार आ गया, तप रही है। इंसान भी तपेगा, और इंसान तपेगा तो न जाने वो कितने नरकों की आग पैदा करेगा। उसमें हमारा तो जो होगा सो होगा, पृथ्वी की आधी से ज़्यादा प्रजातियाँ हमने पहले ही मार दी हैं, बाकी सबको हम मारकर जाएँगे।

कोई मुद्दा है जो मुझसे छूट रहा है प्रमुख?

प्रश्न: सर, ये एक रिपोर्ट में पढ़ रहा था तो उसमें हिमालय के ऊपर कुछ बात कही थी उन्होंने, तो ये सेंटर फ़ॉर साइंस एनवायरमेंट की स्टेट ऑफ़ इंडियन एनवायरमेंट रिपोर्ट आयी थी सन् २०२४ में। तो वो बता रहे थे कि फ़ोर्टी-फ़ोर पर्सेंट (चौवालिस प्रतिशत) जो क्लाइमेट रिलेटेड इंसीडेंट्स (जलवायु सम्बन्धित घटनाएँ) होते हैं इंडिया में, वो हिमालयीन रीजन में होते हैं।

उत्तर: इसलिए लद्दाख में ये आन्दोलन हो रहा है। क्लाइमेट रिलेटेड जो डिज़ास्टर्स (आपदाएँ) होते हैं और एक्स्ट्रीम इवेंट्स (बड़ी घटनाएँ) होते हैं, वो लगभग आधे हिमालय के ही क्षेत्रों में होते हैं। और हिमालय हमारे लिए बहुत मज़बूत और बड़ी चीज़ है। उसको हम कहते हैं कि उत्तरी दिशा का हमारा प्रहरी। लेकिन आप अगर जियोलॉजिस्ट (भू-वैज्ञानिक) से पूछेंगे तो कहेंगे हिमालय बहुत कमज़ोर पहाड़ हैं, उन्हें बोलते हैं, ‘यंग फ़ोल्ड माउंटेंस’ , यंग फ़ोल्ड माउंटेंस’। इसीलिए आप पाते हो कि उनमें भूस्खलन इतना ज़्यादा होता है, क्योंकि अभी वो कच्चे पहाड़ हैं।

हिमालय अभी भी कुछ सेंटीमीटर प्रति वर्ष उठ रहे हैं, अभी वो बन रहे हैं, अभी बच्चे हैं, यंग हैं। यंग फ़ोल्ड माउंटेंस बोलते हैं उनको। उनका निर्माण अभी भी हो रहा है, वो बहुत पुराने नहीं हैं। अरावली के पर्वत ले लो वो बहुत पुराने हैं, उनमें कुछ नहीं धँसता या विन्ध्याचल चले जाओ वो भी पुराना है, लेकिन हिमालय नया है। और हिमालय आप जानते हो न कैसे बना है? कि एक भूखंड आकर के जो पुराना एशिया था उससे टकरा रहा है और जब दो भूखंड ऐसे टकराते हैं तो बीच में ऐसे हो जाएगा न (दोनों भूखंड का किनारा ऊपर उठ जाएगा)। ये (एक भूखंड) ऐसे था, आया आया (और दूसरे भूखंड से टकरा गया), ऐसे तो ये हिमालय है।

हिमालय अभी बहुत कच्चा है। उस हिमालय का क्या होगा क्लाइमेट चेंज के साथ आप सोच लो। और आप जाकर के देखो तो हिमालय में किस तरीके से पेड़ काटे गये हैं और वन सम्पदा बर्बाद करी गयी है। और वहाँ से जो कुछ भी लूटा जा सकता है, लूटा गया है। हम यहाँ बैठे हुए हैं, मैदानों पर, हमें उतना अन्तर नहीं पड़ता है। पर जो लोग वहाँ के वासी हैं वो तो बिलख रहे हैं न, जोशीमठ याद है?

प्रश्न: सर, साथ में जो आइपीसीसी (जलवायु परिवर्तन पर अन्तर-सरकारी पैनल) की रिपोर्ट है वो पहले ही ये बता रही है कि जिस तरह से कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है, हम लोग तीन डिग्री तक के टेम्परेचर राइज़ (तापमान वृद्धि) की तरफ़ बढ़ रहे हैं। तो यहाँ पर ये बता रहे हैं कि यदि इतना टेम्परेचर राइज़ हुआ, तो नब्बे प्रतिशत हिमालयन रीजन में साल भर तक चलने वाला सूखा पड़ सकता है।

उत्तर: अब हिमालय क्या होता है जानते हो न? हिमालय वो दीवार है जिससे टकराकर के मॉनसूनी हवाएँ बारिश बनती हैं। इसीलिए सबसे ज़्यादा बारिश उत्तर भारत में कहाँ होती है? पर्वतों में, क्योंकि हिमालय ही वो दीवार है। बंगाल की तरफ़ से मानसून की हवाएँ आती हैं और वही हिमालय की दीवार से टकराती हैं तो बारिश होती है पूरे उत्तर भारत में फिर। उस दीवार पर ही सूखा पड़ने वाला है, तो बाकी भारत का क्या होगा सोचो! उत्तर प्रदेश का क्या होगा, बिहार का क्या होगा, हरियाणा का क्या होगा! राजस्थान में वैसे ही नहीं कुछ होता, पंजाब का क्या होगा सोच लो। हिमालय पर सूखा, अकल्पनीय बात, वो होने जा रहा है। और है कुछ?

प्रश्न: सर, अगर तीन डिग्री तक टेम्परेचर बढ़ेगा, एवरेज टेम्परेचर तो एक चीज़ है जिसकी हम बात नहीं करते, वो है पॉलिनेशन (परागण)।

उत्तर: ये तो मैंने पढ़ा है और बहुत रिलायबल सोर्सेस (भरोसेमन्द सूत्रों) से पढ़ा है कि ये तीन डिग्री का भी जो अन्देशा है।

प्रश्न: जी।

उत्तर: ये भी पर होने वाला है।

प्रश्न: जी।

उत्तर: लोग पाँच डिग्री तक की बात कर रहे हैं।

प्रश्न: मतलब ये भी एक मतलब कंज़र्वेटिव सिनारियो (पुराना परिदृश्य) है, जो एक्स्ट्रीम सिनारियो (अधिकतम सम्भावना) है वो पाँच तक जा सकता है।

उत्तर: हाँ, पाँच डिग्री तक जा सकता है

प्रश्न: जी, मतलब यहाँ पर जो उन्होंने स्टडी में बताया, वो ये कि यदि तीन-चार डिग्री तक पहुँचेगा टेम्परेचर। जो पॉलिनेशन (परागण) होता है, वो रेड्यूस बाय हाफ़ मतलब आधा हो जाएगा।

उत्तर: ये जो फूलों का पॉलिनेशन है, आप जानते हो न इन सबके पास एसी नहीं होते, पेड़ पौधों के पास, उनका पॉलिनेशन ही खत्म हो जाना है। बहुत वजहों से, पोलेन ग्रेंस (पराग कण) कम प्रोड्यूस होंगे और जो एजेंट (वाहक) है पॉलिनेशन का, जब वही नहीं बचेगा तो पॉलिनेशन कहाँ से होगा? पॉलिनेशन के लिए क्या चाहिए होता है? कोई कीड़ा, कोई भौरा, जब वही नहीं बचा है तो पॉलिनेशन कहाँ से होगा? पॉलिनेशन नहीं होगा तो तुरन्त प्रजाति समाप्त।

लेकिन हमारे पास बहुत सारे मनोरंजक झुनझुने हैं। हम टीवी में मुँह डाले हुए हैं, सोशल मीडिया में मुँह डाले हुए हैं। और जो मुद्दा ऐसा है कि महाविनाश, कि इतिहास में कभी ऐसी नहीं चीज़ हुई, उससे हम बेखबर हैं बिलकुल, सो रहे हैं। अगर कुछ मुट्ठीभर इंसान बच गये, तो वो हमारी पीढ़ी से पूछेंगे कि तुम कितने बेवकूफ़ लोग थे! तुम राजनीति में घुसे हुए थे, तुम तू-तू मैं-मैं में घुसे हुए थे। तुम ये समुदाय, उस समुदाय में घुसे हुए थे। तुम खेल, कॉमेडी, मनोरंजन, इसमें घुसे हुए थे। तुम इसमें घुसे हुए थे कि अभी और किस तरीके से हम बड़ी-बड़ी इमारतें बनायें। जब प्रलय आ रही थी, तुम ये सब मूर्खताएँ कर रहे थे?

हमने बहुत सारे आयामों में बात करी कि यहाँ कितना नुकसान है, यहाँ कितना नुकसान है, यहाँ कितना नुकसान है (अलग-अलग क्षेत्रों में)। जो कॉन्फ़्लिक्ट थ्योरी होती है स्ट्रैटेजी में, वो मालूम है क्या बोलती है? वो बोलती है, ‘ये सब आप अलग-अलग देख रहे हो, लेकिन जब ये सब एक साथ होते हैं तो ये मल्टीप्लाई कर जाते हैं।’

आपने एक जगह देखा कि दस प्रतिशत नुकसान है, आपने दूसरी जगह भी देखा दस प्रतिशत नुकसान है। आपने अपनेआप को क्या समझा लिया? कि साहब इन दोनों में तो दस-ही-दस प्रतिशत नुकसान है। जो कॉन्फ़्लिक्ट थ्योरी होती है वो बोलती है, ये दोनों जब एक साथ होंगे तो वो हो जाएगा वन प्वाइंट वन रेज़्ड टू द पॉवर टू यानि वन प्वाइंट टू वन यानी इक्कीस प्रतिशत नुकसान होगा। वो दस नहीं है, वो इक्कीस प्रतिशत हो गया तुरन्त। और अगर इस तरह के दो की जगह छः हो जाए तो वन प्वाइंट वन रेज़्ड टू दी पॉवर सिक्स हो जाएगा। देख लो हमने कम-से-कम अभी दस अलग-अलग आयामों की बात करी है, वो वन प्वाइंट वन रेज़्ड टू दी पॉवर टेन है। वो देख लो कितना होता है। किसी में दम नहीं है कि खुलकर बोल सके कि इस पूरी चीज़ का एक कारण है — जनसंख्या। उल्टे लोग अपने-अपने झुंडों की, अपने-अपने कबीलों की तादाद बढ़ाने में लगे हुए हैं।

भाई मेरे! कार्बन एमिशन इज़ प्रपोर्शनल टू कंज़म्प्शन (कार्बन उत्सर्जन उपभोग से सीधा सम्बन्धित है), ठीक है? बहुत सीधी-सीधी इक्वेशन (समीकरण) है समझ लो। कार्बन एमिशन इज़ प्रपोर्शनल टू कंज़म्प्शन, मोर ऑर लेस। उसमें जो मीडियेटर (मध्यस्थ) होता है वो टेक्नोलॉजी होता है। कंज़म्प्शन विथ अ बेटर टेक्नोलॉजी विल लीड टू लेसर एमिशन (बेहतर तकनीक के साथ उपभोग से कम उत्सर्जन होता है) लेकिन आप टेक्नोलॉजी कितनी भी बढ़ा लो, मोटे तौर पर ये बात बिलकुल वैलिड (वैध) है कि कंज़म्प्शन इज़ प्रोपोशनल टू एमिशन, कार्बन एमिशन। और कंज़म्प्शन इक्वल्स पॉपुलेशन इन्टू पर कैपिटा कंज़म्प्शन (कुल-उपभोग बराबर जनसंख्या गुणा प्रति-व्यक्ति उपभोग), सीधी-सी बात है बहुत।

पर कैपिटा कंज़म्प्शन (प्रति व्यक्ति उपभोग) तो बढ़ना ही है क्योंकि पृथ्वी पर बहुत अभी गरीब लोग हैं, उनका तो पर कैपिटा बढ़ना ज़रूरी है। वो तो बेचारे भूखे मर रहे हैं, उनको तो और कंज़म्प्शन चाहिए। उनको घर चाहिए, होमलेस (बेघर) लोग हैं सड़कों पर सो रहे हैं, तो पर कैपिटा कंज़म्प्शन बढ़ेगा। और अभी टोटल जितना है, उसके लिए कई पृथ्वियाँ चाहिए। पर कैपिटा कंज़म्प्शन बढ़ेगा तो टोटल एमिशन (कुल उत्सर्जन) का क्या होगा? फिर वो बढ़ेगा ही। रोकने का एक तरीका है, क्या? पॉपुलेशन कम करो, उसके अलावा कोई तरीका नहीं है। ये हमें नहीं बात समझ आ रही और किसी सरकार में दम नहीं है कि ये बात खुलकर बोले कि जनसंख्या को रोकने के अलावा कोई तरीका नहीं है महाप्रलय से बचने का। हम पूरी पृथ्वी को खा चुके हैं। और है कुछ?

प्रश्न: सर, आप जो अभी बात कर रहे हैं उससे जुड़ा एक तथ्य है। एक दिन कहलाता है ‘अर्थ ओवरशूट डे’ कि पूरे साल का एक वो दिन, जब तक आते-आते, हम पृथ्वी की उस साल की जितनी रिसोर्सेज़ थीं, वो सब हम खत्म कर चुके होते हैं। तो उसमें कहा जाता है कि अभी पृथ्वी का जो कंज़म्प्शन है, ऐसा है कि संसाधनों की समाप्ति का वो दिन…

उत्तर: सितम्बर-अक्टूबर में आ जाता है?

प्रश्न: जी, वो अगस्त में आ जाता है।

उत्तर: अगस्त में ही आ जाता है!

प्रश्न: और वो बढ़ता ही जा रहा है।

उत्तर: पहले से सालभर का बजट दे रखा है पृथ्वी ने कि साहब, इतना दिया, इकत्तीस दिसम्बर तक खाना। जितना इकत्तीस दिसम्बर तक खाना है, इंसान उसको अगस्त में ही खाकर खत्म कर देता है। तो अगस्त के बाद क्या कर रहे हो? अगस्त से दिसम्बर तक ओवरड्रॉ (अधिक दोहन) कर रहे हो। जो तुम्हें लेना नहीं चाहिए, जो तुम्हारा जायज़ हक, अधिकार नहीं है, तुम उतना ले रहे हो। किससे ले रहे हो जानते हो? पशु-पक्षियों से, पौधों से, पर्यावरण से, पृथ्वी को ही खा रहे हो। और ये ऐसा नहीं कि खाकर निवृत्त हो जाओगे, वो कर्ज़े की तरह चढ़ता जाता है ऊपर। अधिक खाया है तो कर्ज़ की तरह चढ़ जाता है न? और वो कर्ज़ा हर साल कंपाउंडेंड इंटरेस्ट की तरह, चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ रहा है।

पर हमें इसमें ज़्यादा रुचि है कि अगली कौनसी मनोरंजक और उत्तेजक मूवी आ रही है, और उसमें कौनसी कोमलांगिनी ने आइटम नम्बर बताया है। और कौनसी सेलिब्रिटी ने कितने बच्चे पैदा कर दिये और कौनसी सेलिब्रिटी ने नया प्राइवेट जेट खरीदा है, जिसमें वो कार्बन एमिट (कार्बन उत्सर्जन) करते हुए कौनसी जगह पर जाकर के अपना फ़ोटोशूट कर रही है। हमें इसमें ज़्यादा रुचि है जानने में।

एक भी तुम्हारी सेलिब्रिटी है जो ये बात कर रही हो? नहीं, तो तुमने उनको सेलिब्रिटी क्यों बना रखा है? एक भी तुम्हारा नेता है जो ये बात कर रहा हो? नहीं, तो तुमने उनको नेता क्यों बना रखा है? एक भी मीडिया चैनल है जो ये बात कर रहा है? और नहीं तो तुम उनको देखते क्यों हो?

ये सब तो पाइड पाइपर्स है। ‘पाइड पाइपर ऑफ़ हेमलिन’ की कहानी पता है न? वो अपनी बीन बजाते हुए जा रहा है और सारे चूहे उसके पीछे-पीछे, उसने सबको जाकर के पहाड़ से नीचे कर दिया, सब मर गये। वैसे ये सब सेलिब्रिटी आगे अपना तुम्हें सम्मोहित करने वाला, हिप्नोटाइज़ करने वाला संगीत बजाते चल रहे हैं, तुम चूहों की तरह उनके पीछे-पीछे जा रहे हो, किधर को जा रहे हो? मौत की ओर जा रहे हो उनके पीछे-पीछे।

मुझे सबसे ज़्यादा अफ़सोस इस बात का होता है कि जो ये करतूते कर रहे हैं, वो सबसे बाद में मरेंगे। सबसे पहले इंसानों में मरेंगे वो जो सबसे गरीब हैं। इसमें सबसे पहले और सबसे ज़्यादा गरीबों पर कहर टूटेगा, और टूट रहा है। और इंसानी गरीबों से भी पहले उन पर टूटेगा जो इंसानी गरीबों से भी ज़्यादा गरीब हैं, पशु-पक्षी और पौधे, जिन बेचारों की कोई खता ही नहीं।

मैं फिर पूछ रहा हूँ उस चिड़िया ने हमारा क्या बिगाड़ा है जो हमारी हरकतों से अब कहीं की नहीं रही? पर हमारे पास हमारी कामना है, हमारे अरमान हैं जो हमें पूरे करने हैं। किसी भी हालत में मुझे तो अपने अरमान पूरे करने हैं। पूरा-का-पूरा ग्रह भेंट चढ़ गया हमारे अरमानों की और ये अरमान ऐसी चीज़ है न, ये सबकुछ खा लें तो भी पूरे नहीं होते।

और कुछ? बहुत कुछ है अभी और। खुद जाइए, देखिए, पढ़िए, समझिए, अगर इतिहास लिखने के लिए कोई बचा रहा न, तो इतिहास जवाब माँगेगा, क्या जवाब दोगे?

जितने बेहोश हैं, सब मरेंगे

प्रश्नकर्ता: प्रणाम उत्तर जी। आइपीसीसी की सिन्थेसिस रिपोर्ट आयी है। वो रिपोर्ट ये कहती है कि वर्ष २०३० तक जो वैश्विक ग्रीन हाउस गैस है, उसको फ़िफ़्टी पर्सेंट तक कम कर देना है और वर्ष २०५० तक हंड्रेड पर्सेंट कम कर देना है।

तो भारत को लेकर चिन्ता ये है कि भारत जो अपना एनडीसी है, उसके अनुसार ये वर्ष २०७० तक तय किया है कि हमको हंड्रेड पर्सेंट शून्य करना है, और वर्ष २०५० तक इसको फ़िफ़्टी पर्सेंट कम करना है। और अभी एशिया की जो सबसे ह्यूज पॉपुलेशन है, वो है भारत की और चाइना की जो तीन अरब के करीब है, और पूरे ग्लोब की ट्वेंटी-एट पर्सेंट है।

तो ये जो आइपीसीसी की रिपोर्ट है, ये तो सबको जानना चाहिए।

उत्तर: नहीं, जानना तो चाहिए पर आप समझ रहे हो न आँकड़े आपस में मेल ही नहीं खा रहे हैं।

प्रश्न: तो सर, मेरी चिन्ता ये है कि आइपीसीसी कहती है कि वर्ष २०५० तक आपको कार्बन शून्य कर देना है।

उत्तर: कैसे? हो ही नहीं सकता न?

प्रश्न: तो जो गवर्नमेंट ये कह रही है कि...

उत्तर: वर्ष २०७० तक ये तो हो नहीं सकता न!

प्रश्न: वर्ष २०५० तक भी जो भारत का ग्रीन हाउस गैस है, कि कोयला से फ़िफ़्टी पर्सेंट ये इएम बिजली बनाएँगे।

उत्तर: बिलकुल।

प्रश्न: तो अब जो पॉपुलेशन की बात की है, तो मेरे पास एक मॉडल है जो मैं सोचता हूँ, ‘हम शादी करेंगे लेकिन हम जिस लड़की के साथ रहेंगे, हम लोग एनवायरमेंट को बचाने के लिए काम करें न कि बच्चा पैदा करेंगे।’ तो उसके लिए तर्क देते हैं लोग, ‘ऐसा कुछ कोई नहीं कर सकता है। ऐसा जो करेगा उसको बुढ़ापे में सिक्योरिटी कैसे मिलेगी? वो कैसे सर्वाइव कर पाएगा?’

उत्तर: हम बुढ़ापे तक पहुँचने वाले हैं? हम किस मुगालते में हैं? हमें नहीं कुछ समझ में आ रहा है।

प्रश्न: सर, जो आइपीसीसी की रिपोर्ट है, आपकी संस्था के माध्यम से जितने लोग आपको सुनते हैं यूट्यूब पर, टोटल तीन-से-चार करोड़ लोग हो गये हैं।

उत्तर: अच्छा विचार है, समझ गया!

प्रश्न: तो उनको तो कम्प्लीट फ़ॉलो करना चाहिए।

उत्तर: ये बहुत अच्छा विचार है। जो आइपीसीसी की पूरी रिपोर्ट ही है, हम उसी पर एक चर्चा रख लेते हैं और उसको ही प्रकाशित करते हैं। ये अच्छा है। अभी भी आप कहीं पढोगे कि कितना बढ़ गया है तापमान, तो एक-दशमलव-एक-सात डिग्री का आपको आँकड़ा मिलेगा। वो झूठा आँकड़ा है।

प्रश्न: ये जो अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ हैं, जो यूएस, यूरोप है, ये तो उसको दबा रहे हैं।

उत्तर: डेढ़ तो पहले ही हो चुका है।

प्रश्न: जी। वन-पॉईंट-सेवन क्रॉस कर जाएगा वर्ष २०३० के बाद।

उत्तर: जो सन् २०२३ था, उसमें दो डिग्री था। उसको कह दिया एक्सेप्शन (अपवाद) है। आप थोड़ा सा न, मैं जो बोल रहा हूँ, उसको अलग करके एक बार आप खुद ही सोचिए कि वैश्विक तापमान हमारे ही जीवनकाल में पचास साल बाद नहीं, उससे बहुत पहले होगा, मैं दस-बीस साल का समय देता हूँ। अगर चार-पाँच डिग्री औसतन अभी जितना है उससे ऊपर है, तो उससे क्या-क्या होगा, आप सोचो।

बात ये नहीं है कि मैं, मेरा पड़ोसी, मेरा देश, मेरा धर्म, मेरे स्वार्थ, मेरा सरोकार, इसका क्या होना है। हम समझ रहे क्या बात कह रहे हैं? हम कह रहे हैं ग्रह, इस पूरे ग्रह पर ही क्या बचेगा आप बताओ तो? और आप बच भी गये क्योंकि आपके पास ताकत है, पैसा, सामर्थ्य है, घर है, एयर कंडीशनर है तो आपने सोचा कि सबसे ज़्यादा मरेगा कौन? इंसानों में भी वो मरेगा जो सबसे गरीब है, और वो इतनी तादाद में मरेंगे कि लाशें गिनना मुश्किल है। और जो गरीबों-में-गरीब होते हैं हमारे पशु-पक्षी, उनका क्या बोलें, वो मरेंगे नहीं, वो विलुप्त, हमेशा के लिए एक्स्टिंक्ट। ये बात है। और ये हम अपनी आँखों से देखने जा रहे हैं। और हम इस बारे में न सोचते न कुछ करते, हवामहल हम बनाते रहते हैं कि ये, वो, फ़लानी बात।

एक था, वो बोला कि बड़ी बढ़िया बात है, फ़लानी मेरी नौकरी लग गयी। चार-पाँच साल उसने कोशिश की, लग गयी। मैंने कहा, ‘क्या बात है? इतने खुश किस बात पर हो?’ उसने कई बातें बतायी जिसमें एक महत्वपूर्ण चीज़ थी पेंशन। मैंने कहा, ‘तू बचेगा तब तक पेंशन लेने के लिए? पेंशन देने वाले बचेंगे? ये व्यवस्था बचेगी? तुम किस गलतफ़हमी में हो?’ उसकी भयावहता आसन्न है, सामने है। ये हम नहीं समझ पा रहे हैं कि कितना सामने है। हमें अभी भी लग रहा है कि एकाध-दो पीढ़ी बाद की बात है।

अभी मालदीव के साथ हुआ। अब वो एक तरह का ब्लैक ह्यूमर हो गया। तो मेरे बैच के लोग वो सब बात कर रहे थे, ‘मालदीव ने बड़ा बुरा करा, ऐसा बोल दिया, वैसा बोल दिया, चीन की तरफ़ जा रहा है। हमें उनका ये कर देना चाहिए, हमें उनका वो कर देना चाहिए।’

मैं आमतौर पर कुछ बोलता नहीं हूँ पर इस किस्म की वहाँ नादानी बिखरी हुई थी मालदीव को लेकर, मैंने कहा, ‘बेटा, ये जो मालदीव है न, इसका जो सबसे ऊँचा बिन्दु है, इन सारे ग्रुप ऑफ़ आइलैंड्स में, उसमें जो सबसे ऊँची जगह है, वो भी समुद्र तल से इतनी सी ऊँची है बस (आधी हथेली दिखाकर नाप बताते हुए), इतनी सी है।

बोल रहे, ‘तुम क्या उनके पीछे पड़े हो, वो बेचारे तो खुद ही नहीं बचने वाले। ज़रा सा जल स्तर उठेगा और कुछ भी नहीं बचेगा मालदीव में। वो इतनी भयानक, नाज़ुक हालत में है। और तुम क्या ऐसे जो लोग खुद ही एक मरणासन्न स्थिति में हैं, तुम क्या उनके पीछे पड़ रहे हो! पर शायद वो लोग भी नहीं समझते वो किस हालत में हैं। न आप समझ रहे हो, किस हालत में हैं।’

जैसे आप बोलते हो न कि आपसे कोई पूछे, ‘आपके देश का सबसे ऊँचा क्या बिन्दु है?’ तो आप किसी पहाड़ की चोटी पर चले जाओगे। है न? आप बोलोगे, ‘आठ-हज़ार फ़ीट।‘ यही हम करते हैं न? मालदीव में जो सबसे ऊँची जगह है, ये (मेज़ के तल को इंगित करते हुए) अगर समुद्र तल है इतना (मेज़ से हाथ थोड़ा सा ऊपर करके समझाते हुए) कुछ इंच ऊपर! सिर्फ़ कुछ, ये सबसे ऊँची जगह है, बताओ वहाँ क्या बचने वाला है?

ये हमारे चेन्नई और ये हमारा मुम्बई! हमें समझ में ही नहीं आ रही बात। और ये नहीं कि गर्मी हो जानी है, पूरे वायुमंडल में एनर्जी बढ़ जानी है। और वो बढ़ी हुई एनर्जी न जाने कितने तरीकों से हम पर ही बरसने वाली है। बारिश होगी तो फिर ऐसी होगी कि रुकेगी नहीं, उस एनर्जी से जब तूफ़ान आएँगे तो वो ऐसे होंगे कि बहुमंज़िला इमारतें धराशायी हो जाएँ।

हीट , एनर्जी होती है, एनर्जी। आप जब हीट बढ़ा रहे हो, तो हीट तो न जाने कितने तरीकों से अपना काम करेगी न, एनर्जी। और जिनको नहीं समझ में आती हों वो गम्भीर बातें, उनसे बोलता हूँ, ’क्रिकेट का खेल समाप्त हो जाएगा क्योंकि वो इंडोर नहीं खेला जा सकता। टेनिस आदि बचे रहेंगे, बैडमिंटन बचा रहेगा, टीटी बचा रहेगा, स्विमिंग — ये फिर भी बच जाएँगे क्योंकि ये इंडोर हो सकते हैं। क्रिकेट नहीं हो सकता! खासकर टेस्ट क्रिकेट समाप्त हो जाएगा। पाँच दिन ऐसे मिलना असम्भव हो जाएगा जब मौसम शान्त रहे। मिलेगा ही नहीं, खेल लो टेस्ट क्रिकेट।’ और ये एकदम ट्रीविया (साधारण बात) बता रहा हूँ। ये कोई सबसे गम्भीर बात नहीं है, ये ट्रीविया है क्लाइमेट चेंज के बारे में। पर वो ट्रीविया भी ऐसा है कि एक खेल ही समाप्त हो जाने वाला है।

ये आपकी बिजली की ट्रांसमिशन लाइन्स हैं, ये काम करना बन्द कर देंगी। ये आपके एयर कंडिशनर्स सारे काम करना बन्द कर देंगे। आपकी गाड़ियाँ खड़ी हैं, आप उनमें घुस नहीं सकते। गाड़ी खड़ी है पर आप कहीं जा नहीं सकते, आप घुस ही नहीं सकते उसमें, आप उसके पास ही नहीं पहुँच सकते। वो अभी गाड़ी नहीं है, वो क्या बन गयी है? पचास-बावन डिग्री तापमान की गाड़ी। और गाड़ी के अन्दर फिर अलग होता है ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट।

अच्छा, मौसम बदलता है तो बीमार पड़ते हो न आप? जो तापमान बढ़ेगा, वो अधिकांश दिन का बढ़ेगा, रात का नहीं। तो हर दिन ऐसा होगा जैसे मौसम बदल रहा है। तीन बजे आप ऐसे हो रहे होंगे कि एसी भी काम नहीं कर रहा है और नौ बजते-बजते ठंड सी आ गयी है। आप रोज़ बीमार पड़ोगे।

कितने ही सारे ऐसे बैक्टीरिया हैं और वायरस हैं जिनको हम जानते ही नहीं, क्योंकि वो डोरमेंट (प्रसुप्त) पड़े हैं क्योंकि उनको उतना तापमान नहीं मिल रहा है जिस तापमान पर वो एक्टिव हो सकें। ये तापमान बढ़ते ही वो सक्रिय हो जाएँगे। और हम उनको जानते हैं नहीं, हमने उनके खिलाफ़ कोई दवाई आज तक बनायी ही नहीं है। हमारे पास उनके विरुद्ध न इम्यूनिटी है, न वैक्सीन , न दवाई। ये सब सक्रिय हो जाने हैं। एक कोविड नहीं, हज़ार कोविड बरसने हैं।

जंगल बायोडायवर्सिटी (जैव विविधता) का केन्द्र होते हैं, इतना तो हम समझते हैं। आप जब जंगल काटोगे तो वहाँ जो जिस दिशा में भाग सकता है, भागेगा, ये भी समझते हो? ज़्यादातर कहीं कोई भागेंगे, बचेंगे नहीं। अब हिरण कहाँ जाकर बचेगा? वो मरेगा। हाथी कहाँ जाएगा? मरेगा। पर जंगल में कुछ ऐसे हैं जो नहीं मरेंगे, बल्कि वो खुश हो जाएँगे कि जंगल कट गया। वो कौन हैं जानते हो? वो वायरस हैं जो करोड़ो सालों से जंगलों में रहते हैं। वो चाहते नहीं हैं जंगल में रहना, पर उन्हें कोई मिल नहीं रहा है नया होस्ट जिसके शरीर को वो कोलोनाइज़ कर सकें।

अब आप जंगल काटोगे, पेड़ नहीं रहा तो उनको नया होस्ट मिल गया। कौन? जंगल काटने वाला। वो पहले पेड़ में रहता था या कहीं और रहता था, अब वो आप में रहेगा।

जो नोवेल कोरोनावायरस था, वो भी ऐसे ही आया था। वो भी ऐसा नहीं कि पूरे तरीके से चीन ने उसको लैब में ही तैयार करा था, वो पहले से था। कहाँ था? वो जंगल में गुफ़ा में रहता था। कोई उसको छेड़ने वाला नहीं था। वो चमगादड़ में रहता था, कोई उसे छेड़ने वाला नहीं था। हम उस गुफ़ा में घुस गये, हम चमगादड़ को ले आये, हमने उसे इंसानों में डाल दिया।

प्रश्न: और जो पुराने अभी वायरस विलुप्त हो चुके हैं, वो भी वापस आएँगे?

उत्तर: वो बिलकुल वापस आएँगे, क्योंकि वायरस जो है, वो स्ट्रिक्टली एक लिविंग ऑर्गनिज़्म नहीं होता है। वो फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी जैसा होता है, केमिकल मान सकते हो उसको आधा। तो वो कोई भी लिविंग चीज़ जो होती है न, उसकी एक उम्र होती है, उस उम्र के बाद वो मर जाती है। वायरस स्टोर (संग्रहित) हो सकता है एक केमिकल की तरह, करोड़ों सालों तक स्टोर्ड रह सकता है। वो स्टोर्ड हैं ग्लेशियर्स के नीचे, और बहुत और जगहों पर। बर्फ़ पिघलेगी, वो सब वहाँ से निकल-निकलकर आएँगे। वो स्टोर्ड पड़े हुए हैं वहाँ पर और वहाँ कभी बर्फ़ पिघली नहीं थी, तो कभी वो बाहर आये नहीं थे। वो चुपचाप वहाँ पड़े हुए थे डोरमेंट, अब आएँगे।

एक वायरस ने पूरी दुनिया हिला दी दो साल तक। और ऐसे कितने निकलने हैं, और हमारी ही करतूतों से, फिर कर लेना भोग-विलास, कि खुशी मना रहे हैं, हम तो कंज़प्म्शन के लिए ही पैदा हुए हैं।

कोविड बीमारी भी जो हुई थी, वो कोई चली थोड़े ही गयी है। आपके वायरल लोड अब नहीं है पर बीमारी है। ये दो अलग-अलग बातें होती हैं। जिस किसी को भी एक बार हुआ था, उसको कम-से-कम पाँच-दस प्रतिशत सम्भावना है कि वो अभी भी बीमार है। पर वो ऐसे तरीकों से बीमार है कि बीमारी अभी पता नहीं चल रही है। दिल पर प्रभाव पड़ रहा है उसका कई और तरीके से। कुछ प्रभाव वायरस का बचा हुआ है, कुछ प्रभाव उस वैक्सीन का भी बचा हुआ है। इन दोनों का ही प्रभाव बचा हुआ है।

हम कितने मूर्ख जैसे लगेंगे न जब ये सब हो रहा होगा, क्योंकि हमने करा है। हम अपनी करनी भुगत रहे होंगे।

जीडीपी-जीडीपी करते हो, थोड़ा पढ़ लेना कि अगर सिर्फ़ जीडीपी की भी बात करो, तो जीडीपी पर कितने प्रतिशत का असर पड़ेगा। भारत का जीडीपी पैंतीस प्रतिशत गिरेगा सिर्फ़ क्लाइमेट चेंज से। जो क्लाइमेट चेंज की कॉस्ट है प्रतिवर्ष की, दैट्स इक्वेलेंट टू थर्टी-फ़ाइव पर्सेंट ऑफ़ इंडियाज़ जीडीपी (ये भारत की जीडीपी के पैंतीस प्रतिशत के बराबर है)। बढ़ा लो जीडीपी!

आपके सिस्टम्स बने ही नहीं हैं इतनी एनर्जी झेलने के लिए — न तो शरीर के सिस्टम्स , न समाज के सिस्टम्स , न आपकी टेक्नोलॉजी के सिस्टम्स हैं। कुछ भी नहीं बना इतनी गर्मी झेलने को। आपकी गाड़ियों के टायर भी नहीं बने हैं। पिघलते टायर देखें हैं कभी? चला लो गाडी! ये जो एक्सप्रेस-वे है, सीमेंट से बना है, इस पर दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण ये होता है कि टायर फट जाता है। वो टायर क्यों फट जाता है? हीट से, क्योंकि वो टायर बना ही नहीं है सीमेंट की सरफ़ेस पर ज़्यादा देर के लिए उतनी गति झेलने को। एक्सप्रेस-वे पर ज़्यादा देर तक आप एक हाइ स्पीड सस्टेन कर पाते हो, टायर फट जाता है। ये काम करती है हीट।

आपका जो ब्लड प्रेशर है न, आप अच्छे तरीके से जानते हो कि कोई भी सिस्टम हो, उसके भीतर का प्रेशर कई वैरिएबल्स पर डिपेंड करता है जिसमें एक इम्पोर्टेंट वैरिएबल क्या होता है? टेम्पेरेचर।

PV=nRT (आदर्श गैसों का गतिज सिद्धान्त), इतना तो याद होगा? बहुत पुरानी बात। टेम्पेरेचर बदलेगा तो प्रेशर उतना ही रहेगा? और ये (कलाई की ओर इशारा करते हुए) प्रेशर बदलेगा तो इसका (हृदय की ओर इशारा करते हुए) क्या होगा?

आपको पता है आपकी आँख के भीतर भी प्रेशर होता है? आप जानते हो? और आँख का प्रेशर भी अगर बढ़ जाए तो बीमारियाँ होती हैं। ये प्रेशर भी टेम्पेरेचर डिपेंडेंट होता है। थोड़ा-बहुत टेम्पेरेचर बढ़ गया थोड़ी देर को, फ़र्क नहीं पड़ता, पर वो अगर लगातार बढ़ा हुआ ही है, सालों तक और बढ़ता ही जा रहा है तो आपको लग रहा है ये आँखें काम करेंगी? और ठंडे देशों में इस चीज़ का उतना फ़र्क नहीं पड़ेगा। जहाँ दस डिग्री तापमान होता था, वहाँ चौदह डिग्री हो गया, दस डिग्री और चौदह डिग्री दोनों झेले जा सकते हैं।

भारत का क्या होगा? जहाँ अड़तालीस डिग्री पहले ही रहता था, जब वहाँ बावन हो जाएगा तो कैसे झेलोगे? और सिर्फ़ गर्म नहीं होता है, और सुनिए — गल्फ़ स्ट्रीम का नाम सुना है? गल्फ़ स्ट्रीम वो करंट है, हॉट करंट है, वार्म करंट है जिसकी वजह से ब्रिटेन जी पाता है जाड़ों में। वो ब्रिटेन के कोस्टल (तटीय) इलाकों को गर्म रखती है। और जो पूरा नेवल ट्रैफ़िक होता है, उसको भी वो अलाउ (अनुमति देना) करती है, नहीं तो पोर्ट्स पर ही बर्फ़ जम जाएगी। जितना ट्रेड होता है, जितनी शिपिंग होती है, वो हो नहीं पाएगी जो गल्फ़ स्ट्रीम से होती है।

ग्लोबल वार्मिंग से, अभी मैंने बोल दिया कि ठंडे देशों में दस से चौदह हो जाएगा, उल्टा भी होता है। ये जो नॉर्दन यूरोप के देश हैं, ये और ठंडे होने वाले हैं। आप गर्म हो-होकर के मरोगे, वो ठंडे होकर मरेंगे। गल्फ़ स्ट्रीम मर रही है। गल्फ़ स्ट्रीम गर्म पानी लेकर जाती है अमेरिका की तरफ़ से अक्रॉस द अटलांटिक नॉर्दन यूरोप की तरफ़। वो मर रही है क्लाइमेट चेंज की वजह से। तो नॉर्दन यूरोप और ठंडा होने वाला है, आप और गर्म होने वाले हो। जियोगे कैसे?

बहुत साधारण से आँकड़े होते हैं, भरतपुर यहाँ पास में ही है। हर साल माइग्रेटरी बर्ड्स (प्रवासी पक्षी) की संख्या में क्या हो रहा है, थोड़ा पढ़िए तो सही। और भरतपुर पास है, यहाँ अपना एनसीआर में भी तो है सूरजपुर, पढ़िए कि वहाँ क्या बचा।

बच्चों को लेकर के तो हम इतने ज़्यादा ममतामयी रहते हैं। और अपने बच्चों को ये दुनिया छोड़कर जाओगे? आप चले जाओगे, वो बच्चा कहेगा, ‘मुझे क्यों पैदा करा है?’ जवाब माँगेगा भाई! और दुनिया भर के बच्चों के प्रति हम जवाबदेह हैं, दुनिया भर के बच्चों के प्रति।

तो हमें कुछ करना होगा!

मौसम तो बदलता रहता है, उसमें कौनसी बड़ी बात हो गयी?

प्रश्नकर्ता: क्लाइमेट चेंज कोई नयी चीज़ तो है नहीं, वो प्रकृति के चक्र का ही एक हिस्सा है। और अगर कुछ जानवर या उनकी पूरी प्रजातियाँ ही विलुप्त हो जाएँगे तो इसमें बड़ी बात क्या है? डायनासोर भी तो विलुप्त हुए थे और उन्हें प्रकृति ने ही मारा था।

उत्तर: हाँ, अतीत में न जाने कितनी प्रजातियाँ हैं जीवों की जो विलुप्त हुई हैं, पर उनके कारण प्राकृतिक थे। इस बार जो कारण हैं वो प्राकृतिक नहीं हैं, इस बार कारण इंसान है। इसीलिए ग्लोबल वार्मिंग को सिर्फ़ ग्लोबल वार्मिंग नहीं बोलते, उसको बोलते हैं एंथ्रोपोजेनिक ग्लोबल वार्मिंग (मानवजनित वैश्विक तापन)। उसका जो पूरा नाम होता है ये एंथ्रोपोजेनिक क्लाइमेट चेंज (मानवजनित जलवायु परिवर्तन) माने आदमी द्वारा लाया गया क्लाइमेट चेंज।

ये हम (मानव) कर रहे हैं। हम कर रहे हैं तो हमारी कोई ज़िम्मेदारी भी बनती है न अपने किये को ठीक करने की? तुम कह रहे हो, ‘क्या फ़र्क पड़ता है, इतनी प्रजातियाँ पहले विलुप्त हो गयीं, इतने जानवर खत्म हो गये, डायनासोर भी तो खत्म हुए थे अभी, और जानवर खत्म हो जाएँगे तो क्या फ़र्क पड़ेगा?’

फ़र्क पड़ेगा या नहीं पड़ेगा वो तो इस पर निर्भर करता है कि तुममें इंसानियत कितनी है। कोई और जीव खत्म हो रहा है, तुम कह रहे हो, ‘क्या फ़र्क पड़ता है?’ तुम्हारे दोस्त-यार खत्म होने लगें तब कहोगे, ‘क्या फ़र्क पड़ता है’? तुम्हारा अपना बच्चा खत्म होने लगे तब कहोगे, ‘क्या फ़र्क पड़ता है’?

तो इंसान और इंसान में यही अन्तर होता है। किसी को फ़र्क सिर्फ़ तब पड़ता है जब उसका बच्चा खत्म होने लगता है, और किसी को तब भी फ़र्क पड़ता है जब किसी दूसरे जीव का बच्चा खत्म होने लगता है। तुम ही खत्म होने लग जाओ तब भी कहोगे क्या कि क्या फ़र्क पड़ता है? ‘इतनी प्रजातियाँ आयीं, इतनी प्रजातियाँ चली गयीं, डायनासोर भी तो चले गये। मैं भी चला जाता हूँ।’ तुम्हारी हत्या हो रही हो, तुम राज़ी-खुशी तैयार हो जाओगे?

अभी तुम्हें पता चल जाए, तुम्हें कैंसर है और जाने वाले हो, तब भी कहोगे क्या कि क्या फ़र्क पड़ता है? तब तो इधर-उधर भागोगे कि कुछ इलाज हो जाए। पर दूसरे जीव खत्म हो रहे हैं तो कह रहे हो कि क्या फ़र्क पड़ता है, इतना लम्बा प्रकृति का चक्र रहा है, इतने जीव आये, इतने जीव चले गये। बड़ा दर्शन बता रहे हो, फ़िलोसॉफ़र हो गये बिलकुल!

बस जब अपने घर की बात आएगी, अपने दोस्त-यारों की बात आएगी और अपनी ज़िन्दगी की बात आएगी तब फ़िलोसॉफ़ी गुम हो जाएगी। थोड़ा दिल रखो, थोड़ी करुणा रखो, इंसान बनो! क्रूरता और स्वाद के पीछे इतने मूर्खता भरे तर्क मत दो।

बेटा, किस क्लास में हो? गूगल करना नहीं आता?

प्रश्नकर्ता: ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक तापन) तो पिछले पचास साल में ही ज़्यादा हुई है पर नॉन-वेज तो पन्द्रह हज़ार साल से खाया जा रहा है, तो फिर आप क्यों बोलते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग और नॉन-वेज में कोई सम्बम्ध है?

उत्तर: बेटा, किस क्लास में हैं आप? पहली बात तो जिसको आप नॉन-वेज बोल रही हैं वो सीधे-सीधे माँस है, तो हम उसे बोलेंगे ‘माँस’। वो पन्द्रह-हज़ार साल से नहीं खाया जा रहा, वो डेढ़-लाख साल से खाया जा रहा है, वो पन्द्रह-लाख साल से खाया जा रहा है, वो डेढ़-करोड़ साल से खाया जा रहा है। कौन खा रहा था? खाने वाला जो था वो जंगल का प्राणी था। वो पूरे तरीके से प्रकृति के नियमों के अधीन था। जब वो प्रकृति के नियमों के अधीन था तो उसकी बहुत ज़्यादा संख्या भी नहीं बढ़ी थी। वो प्रकृति के नियमों के अधीन था, उसकी बहुत तादाद नहीं बढ़ी थी। वो जानवर था एक, और जानवर तब खाते थे, जानवर आज भी खा रहे हैं।

आदमी भी जंगल में रहता था तो कुछ हद तक वो माँसाहारी था। ये भी मत कहिएगा कि आदमी जब जंगल में रहता था तो पूरी तरह से माँसाहारी था, पूरी तरह माँसाहारी नहीं था, वो लगभग पूरी तरह शाकाहारी था।

आपको अगर जंगल भेज दिया जाए तो आपके लिए ज़्यादा आसान क्या होगा? फल खाना या हिरण को दौड़ाकर के मारकर खाना? तो आपको क्यों लगता है कि जो हमारे पुरखे थे जब वो जंगल में रहते थे, तो दौड़ा-दौड़ाकर के हिरणों को मारते थे और हाथियों को मारते थे और खा लेते थे?

जहाँ तक दौड़ाकर पकड़ने और खाने की बात है, आपको एक मुर्गा ही खाना हो, आप उसे दौड़ाकर पकड़कर दिखाइए। हिरण पकड़ने की बात तो बहुत दूर की है, एक मुर्गा जो उड़ भी नहीं पाता, आप दौड़ाकर के उसे ही पकड़कर दिखा दीजिए। आज आप एक मुर्गा दौड़ाकर नहीं पकड़ पाते, आपको क्यों लगता है कि हमारे जो सब परपितामह थे, पुरखे जंगल में रहते थे, वो इतने ज़बरदस्त थे कि वो दौड़ा-दौड़ाकर के चीते पकड़ा करते थे? कि वो कूद-कूदकर बन्दर लपक लिया करते थे, कि वो नदियों में डाइव (छलाँग) मारते थे और शार्क निकाल लाते थे बाहर?

ये आपको क्यों लग रहा है कि हमारे जो पुरखे सब रहते थे वो माँस-ही-माँस खाते थे? भाई, माँस इतना आसान नहीं होता। माँस पेड़ पर नहीं टँगा है, एक जीता-जागता जानवर है वो। उसको तुम पकड़ने जाओगे तो वो भागेगा, और तब तुम्हारे पास टेक्नोलॉजी नहीं थी, कैसे पकड़ लेते थे? ज़ाहिर सी बात है और अब विज्ञान ने भी इस बात को प्रमाणित कर दिया है। जो लेटैस्ट रिसर्च है उसको पढ़िएगा, आपको पता चल जाएगा कि आदिमानव जो था, वो लगभग पूरी तरह से शाकाहारी ही था।

खैर, ये तो एक बात हुई। हमने मान भी लिया कि थोड़ा-बहुत वो माँस खा लेता होगा, जहाँ भी मौका लग गया, खा लिया। बहुत नहीं पकड़ पाये पर कोई मान लो मरा हुआ ही मिल गया, कोई घायल मिल गया, कोई बूढ़ा जानवर मिल गया, उसको पकड़ लिया अपना खा गये। या पत्थर फेंककर मार दिया या दूर से भाला फेंककर मार दिया। ऐसा करके कुछ पकड़ में आ गया थोड़ा-बहुत तो खा लिया।

चलो, कुछ माँसाहार वो करता था, उसकी तादाद कितनी थी? उसकी संख्या उतनी ही थी जितनी जंगल में रहने वाले किसी और जानवर की हो सकती है। प्रकृति ने ही उसकी संख्या को सीमित कर रखा था। कभी सुना है कि किसी जंगल में एक प्रजाति ही अचानक से बहुत ज़्यादा बढ़ गयी हो, नहीं बढ़ पाती न? जंगल खुद एक सीमा लगाकर के रखता है कि ये इतने होंगे, ये इतने होंगे। वो प्राकृतिक एक व्यवस्था है जिसमें कोई भी प्रजाति एक सीमा से ज़्यादा अपना संख्याबल नहीं बढ़ा सकती। तो आदमी की भी जो तादाद थी वो सीमित थी। पहली बात तो माँस खा नहीं रहा था ज़्यादा और जितना खा भी रहा था, वो सीमित मात्रा में खा रहा था।

अब क्या हुआ है? अब तुम आठ-सौ करोड़ हो, कितने हो? आठ-सौ करोड़ हो गये हो तुम। और तुमने विकसित क्या कर लिये हैं? कृत्रिम तरीके, जानवरों को न सिर्फ़ पकड़ने के बल्कि पैदा करने के। अगर तुम सिर्फ़ पकड़कर खाओ तो अधिक-से-अधिक ये होगा कि तुम एक प्रजाति का नामो-निशान मिटा दोगे, कि इतना पकड़कर खाया कि वो प्रजाति बची नहीं। उससे ग्लोबल वार्मिंग नहीं होगी।

दिक्कत ये नहीं है कि तुम पकड़कर खा रहे हो, दिक्कत ये है कि तुम पैदा कर रहे हो। ज़्यादातर लोग समझ ही नहीं रहे हैं कि माँसाहार और ग्लोबल वार्मिंग का सम्बन्ध क्या है। सम्बन्ध ये है कि तुम अपने खाने के लिए उनको पैदा कर रहे हो और जब तुम उनको पैदा कर रहे हो, तो तुम्हें उनको खिलाना पड़ रहा है। उनको खिलाने के लिए तुम्हें अनाज पैदा करना पड़ रहा है, उसे पैदा करने में कार्बन का उत्सर्जन होता है और जो तुम उनको खिलाते हो, तो उनके शरीर से बहुत सारी कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है। बहुत बड़े-बड़े जानवर हैं, खासतौर पर जो लोग सूअर खाते हैं, भैंस खाते हैं, गाय खाते हैं।

सबसे ज़्यादा ग्लोबल वार्मिंग बीफ़ खाने से होती है क्योंकि बहुत बड़े जानवर हैं, उन्हें बहुत सारा खिलाना पड़ता है। एक किलो माँस के लिए उनको बीस-तीस किलो अन्न और चारा देना पड़ता है। यहाँ से होती है ग्लोबल-वार्मिंग , उन्हें ज़बरदस्ती पैदा करने से। तुमने इतने सारे पैदा कर दिये कि आठ-सौ करोड़ लोग हैं जिनमें साढ़े-सात-सौ करोड़ लोगों को क्या चाहिए? माँस, वो भी भैंसे का। तो उसी तादाद में फिर भैंसे, बकरी, मुर्गे, मछ्ली ये सब पैदा किये जा रहे हैं, ज़बरदस्ती पैदा किये जा रहे हैं। ये सब प्राकृतिक रूप से नहीं पैदा हो रहें। एक बहुत बड़ी तादाद में पैदा हो रहे हैं। बहुत बड़ी तादाद समझते हो?

सोचो, कितने होंगे रोज़ जो कट रहे हैं, तो उसी हिसाब से पैदा किये जा रहे हैं। ये जो इतना तुम पैदा करते हो, उन्हें बड़ा करते हो। वो बड़ा करने में कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है। काटने में नहीं निकलती कि तुम बोलो कि जिस दिन मारा उस दिन कार्बन डाइऑक्साइड निकल पड़ी। जिस दिन तुमने उनको मारा उस दिन कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती, कार्बन डाइऑक्साइड किस दिन पैदा होती है? उस प्रक्रिया में जिसमें तुम उनको पैदा करते हो, खिलाते हो, उन पर माँस चढ़ाते हो, उनका वज़न बढ़ाते हो, उनको बड़ा करते हो ताकि उनको काट सको। उस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है। और ये सारी प्रक्रिया तुम्हारी पेट की हवस पूरी करने के लिए है, वहाँ से हो रही है ग्लोबल-वार्मिंग। तथ्यों को पढ़ लिया करो न।

मैं माँसाहार पर कोई भी वीडियो निकालता हूँ, उसके नीचे बहुत ही अनपढ़ किस्म के इतने सारे कॉमेंट आ जाते हैं। कुछ लिखने से पहले गूगल ही कर लिया करो। लोग कहते हैं, ‘इनको कुछ पता नहीं, देखो, ये सपने ले रहे हैं, बोल रहे हैं, माँसाहार से ग्लोबल-वार्मिंग होती है।’ गूगल कर लो न। तुम्हें दस-हज़ार लिंक्स मिल जाएँगे इस पर। एकदम झट से पूरा पेज भर जाएगा, जैसे ही लिखोगे न एनिमल अग्रीकल्चर ग्लोबल-वार्मिंग , एनिमल हसबेंड्री ग्लोबल वार्मिंग , मीट कंज़म्प्शन ग्लोबल वार्मिंग , बीफ़ कंज़म्प्शन ग्लोबल वार्मिंग — इतना लिखकर गूगल कर लो।

कई लोग कहते हैं कि आप या तो ये समझा दीजिए या बोलिए मत। वीडियो बनाइए कि कैसे माँसाहार से ग्लोबल वार्मिंग होती है। मैं तुमको क्या समझा दूँ? तुम्हें गूगल करना नहीं आता? गूगल करना भी उत्तर जी सिखाएँगे? नहीं सिखाता। यूट्यूब चलाना आता है तुम्हें, गूगल करना नहीं आता? यूट्यूब भी गूगल का है। तुम इतना गूगल खुद नहीं कर सकते कि कैसे मीट कंज़म्प्शन गोबल वार्मिंग का लगभग सबसे बड़ा कारण है। ये तुम्हें गूगल करना नहीं आता? पढ़े-लिखे नहीं हो?

और मैं कितनी बार दोहराऊँ? पिछले पाँच साल से दोहराये ही जा रहा हूँ, बताये ही जा रहा हूँ, मुझसे ही कह देते हो। और फिर ऐसे तर्क आते हैं कि माँस तो पन्द्रह-हज़ार साल पहले भी खाते थे न! पन्द्रह-हज़ार साल पहले तो वो नंगे भी रहते थे, तुम भी नंगी हो जाओगी? तुम क्यों बोला करती हो माय बॉय , माय मैन ? पन्द्रह-हज़ार साल पहले ये सब नहीं चलता था, जो जिसको पकड़ ले वो उसका सैयाँ। तब ये सब शादी-ब्याह की व्यवस्था नहीं थी, तुम काहे आतुर रहती हो कि मेरी किसी से हो जाए, कुछ हो जाए, ऐसा, वैसा?

पन्द्रह-हज़ार साल पहले तो ब्रश भी नहीं करते थे, छोड़ दो, बाकी चीज़ें छोड़ो। मुँह भी कभी-कभार ही धोते होंगे, बारिश का इन्तज़ार रहता था, बारिश होगी अपनेआप हो जाएगा। या नहाते भी तो वैसे ही जैसे भैंसिया नहाती है, देखा है कैसे करती है? वो पोखरे में जाकर घुस जाती है, तुम्हें भी वही करना है? आठ-दस भैंस हैं, उनके बीच तुम भी डुबकी मार रही हो, क्यों? क्योंकि पन्द्रह-हज़ार साल पहले भी तो यही होता था।

पन्द्रह-हज़ार साल पहले जो कुछ होता था वो तुम बहुत पीछे छोड़ आये, लेकिन जब जानवर को मारकर खाने की हवस का नाम आता है तो कहते हो, ‘ये तो पन्द्रह-हज़ार साल पहले भी होता था।’ पन्द्रह-हज़ार साल पहले यूट्यूब था? ट्विटर था? संविधान थे? टीवी था? शिक्षा थी? बाकी हर चीज़ में तुम कहोगे, ‘हम तो साहब पुरानी चीज़ों को फ़ॉलो नहीं करेंगे!’ यही कहती हो न? ‘ओह माय गॉड ! दकियानूसी लोग पुरानी चीज़ों पर चलते हैं।’ सबसे बड़ी दकियानूसी तो वो जमात है जो माँस-भक्षण करने के लिए ये तर्क देती है कि ये तो हमेशा से हो रहा है। हमेशा से जो कुछ हो रहा है वो आज भी करो न फिर। बाकी हर चीज़ में तुमको आज की सोच रखनी है, माँस चबाने के लिए तर्क देते हो कि ये तो पहले से हो रहा था। ये क्या बात है?

तुम्हें बिलकुल नहीं समझ में आ रहा है कि बीस-तीस साल के अन्दर-अन्दर सबकुछ तबाह होने को तैयार खड़ा है। तुम्हें नहीं समझ में आ रहा है क्योंकि तुम उतना ही समझते हो जो तुमको मीडिया समझा रही है, और मीडिया खुद ग्लोबल कैपिटल से संचालित है। मीडिया खुद चाहती है कि तुम कंज़म्प्शन में रहो, तभी तो तुम उस मीडिया की ओर जाओगे मसालेदार चीज़ों के कारण। मीडिया तुमको नहीं बताएगी सच्चाई। तो इसलिए बोल रहा हूँ कि थोड़ा गूगल कर लो।

हर फ़ालतू की चीज़ पर इतने सारे आर्टिकल्स मिल जाएँगे, अखबारों में छपता रहेगा, मीडिया साइट्स में छपता रहेगा लेकिन इस मुद्दे को कितनी कम कवरेज दी जाती है। अभी मैं देख रहा था एक न्यूज़ साइट , उसमें एकदम ऊपर ही एक अधनंगी अदाकारा है गोवा की बीच (समुद्र तट) पर और बोला जा रहा है, ’यू विल नॉट बी एबल टू रेज़िस्ट हर हॉटनेस’ (तुम उस लड़की के उत्तेजना का प्रतिरोध नहीं कर सकते), माने? इनको पता है कि हम क्या रेज़िस्ट कर पाएँगे और क्या नहीं कर पाएँगे?

जिस बीच पर तुम बता रहे हो न कि वो खड़ी हुई हैं वस्त्र त्यागकर के, वो बीच ही नहीं बचेगी ग्लोबल-वार्मिंग के बाद, बचनी ही नहीं है। कोस्टल सिटीज़ (तटीय शहर) नहीं बचने की हैं, समुन्दर का जल स्तर कई मीटर ऊपर उठने जा रहा है क्योंकि ग्लेशियर वहाँ पिघल रहे हैं। वो पानी समुन्दर में आएगा, यहाँ पर उसका स्तर उठेगा, लेवल ऊपर उठेगी, कोस्टल सिटिज़ खत्म। फिर कर लेना गोवा के बीच पर शूटिंग।

जिस स्पेस (स्थान) में तुमको क्लाइमेट चेंज की अवेयरनेस (जागरूकता) देनी चाहिए थी, उस स्पेस में तुम बता रहे हो कि यू विल नॉट बी एबल टू रेज़िस्ट हर हॉटनेस! ये कर रही हैं हमारी न्यूज़ साइट्स , तो इसलिए फिर तुम्हें पता नहीं होता, तो तुम मुझसे पूछते हो कि एक और वीडियो बनाइए। सौ वीडियो बने हुए हैं और नहीं बनाएँगे, तुम गूगल करो।

मैं जो भी खाऊँ, मेरी मर्ज़ी!

उत्तर: इन्हें पता ही नहीं है कि माँसाहार चीज़ क्या होती है। बोलते हैं, ‘मैं कुछ भी खाऊँ, इट्स अ थिंग ऑन माय प्लेट, हाउ डज़ इट बोदर यू मैन? फ़क् ऑफ़। गो योर ओन वे।’ (ये मेरी थाली में पड़ी चीज़ है, इससे तुम्हें क्या समस्या? भाड़ में जाओ। अपना रास्ता नापो।) ये इनका जवाब होता है। ये इसलिए जवाब होता है क्योंकि तुम्हारे पास ज़रा भी ज्ञान नहीं। और ज्ञान से मेरा मतलब आध्यात्मिक ज्ञान नहीं, तुम्हारे पास थोड़ा सा साइंटिफ़िक नॉलेज (वैज्ञानिक ज्ञान) भी नहीं है। तुम नहीं जानते फ़्लेश कंज़म्प्शन (माँस उपभोग) क्या चीज़ है, इसलिए ये बकवास कर रहे हो।

जानते हैं आप, इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के बढ़ने से हमें लगता है कि हमारे पास अब बहुत ज़्यादा सूचना आ रही है। आपके पास सूचना बढ़ गयी है, लेकिन आपका नॉलेज लेवल गिर गया है, ज्ञान का स्तर आपका गिर चुका है, क्योंकि आपके पास तो दिन में चौबीस ही घंटे हैं न! और उस चौबीस घंटे में अगर आपके ऊपर घटिया सामग्री की बाढ़ आ गयी है तो सही चीज़ पढ़ने का आपको मौका मिलेगा क्या? तो इंटरनेट से पहले तो फिर भी ऐसा होता था कि लोगों के साइंटिफ़िक नॉलेज का भी स्तर ठीक-ठाक हो, लेकिन आज वास्तव में नॉलेज का स्तर गिरा है। ये चीज़ कितनी डरावनी है और ये चीज़ कितनी ज़्यादा काउंटर इंटिट्यूटिव (विरोधाभासी) है।

हमें लगता है कि भाई, आज तो सारा डेटा ऑनलाइन उपलब्ध है तो सबको पता होगा। नहीं, डेटा ऑनलाइन उपलब्ध है लेकिन घटिया डेटा सौ गुना ज़्यादा उपलब्ध है न! और इंसान को खुला छोड़ोगे तो वो घटिया चीज़ की ओर ही भागेगा हमेशा। और घटिया चीज़ आपको चौबीस घंटे घेर ले रही है और सही नॉलेज जो है, उसको जगह नहीं मिल रही है, वो क्राउड आउट (भीड़ में लुप्त) हो रहा है। सो वी आर एक्चुअली फार मोर इग्नोरेंट इन द इन्फ़ॉर्मेशन एज़ देन वी वर वेन थिंग्स वर सिम्पलर (हम वास्तव में जानकारी के मामले में अधिक अज्ञानी हैं, तब की तुलना में जब चीज़ें ज़्यादा सरल थीं)। कहने को ये सूचना का युग है, पर आज हम कहीं-कहीं ज़्यादा अज्ञानी हैं बीस साल पहले की अपेक्षा।

समझ में आ रही है ये बात?

ये कहते हैं, ‘इट्स माय चॉइस ऑफ़ फ़ूड (ये मेरा भोजन का चुनाव है)। मैं माँस खाना चाहता हूँ, तुम्हारा क्या जा रहा है?’ साहब, एक बात बताइए, मेरे घर में मैं एक डीज़ल जेनसेट चलाऊँ, वो पुराने ढर्रे के डीज़ल जेनसेट याद हैं जो खूब आवाज़ करते थे और बड़ा काला धुँआ फेंकते थे? और फिर मैं कहूँ, ‘ये तो मेरे घर में चल रहा है, तुम्हारा क्या जाता है?’ आप मेरे पड़ोसी हैं। ठीक? और मैं अपने घर में वो भड्-भड् करने वाला जेनरेटर चला रहा हूँ। वो धुआँ भी मार रहा है और शोर भी। और आप मेरे पास आये, मैं कहूँ, ‘जो भी कर रहा हूँ, अपने घर में कर रहा हूँ। माय लाइफ़ माय चॉइस (मेरा जीवन, मेरा चुनाव), तुम कौन होते हो मुझे टोकने वाले?’ तो आप तुरन्त क्या जवाब दोगे? आप कहोगे, ‘साहब, चल आपके घर में रहा होगा, असर मेरे ऊपर भी पड़ रहा है न, ये धुआँ मेरे घर में भी आ रहा है और ये शोर मेरे कानों में भी आ रहा है।’

ये जो पीढ़ी है आज की, ये ज्ञान से इतनी वंचित है, इसके नॉलेज का स्तर इतना बुरा है कि इसको पता भी नहीं है कि जब तुम चिकन-मटन कुछ भी खा रहे हो, तो उसका असर एक-एक आदमी पर पड़ रहा है समाज के। ये तुम्हारा व्यक्तिगत या निजी मसला नहीं है। तुम्हारी थाली में क्या रखा है, उसका असर मेरी ज़िन्दगी पर पड़ रहा है तो मैं बोलूँगा, मेरा हक है बोलने का। मैं तुमसे कहूँगा कि तुम वो नहीं खा सकते क्योंकि तुम वो खा रहे हो तो दिक्कत मुझे हो रही है।

क्लाइमेट चेंज के बड़े-से-बड़े कारणों में है एनिमल एग्रीकल्चर (पशुपालन)। आप जब बात करते हो कि मुझे फ़ॉसिल फ़्यूल रिडक्शन (जीवाश्म ईंधन के प्रयोग में कमी) करना है, तो आप अधिक-से-अधिक कार्बन डाइऑक्साइड घटाने की बात करते हो। है न? और ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट मिथेन से कार्बन डाइऑक्साइड की अपेक्षा बीस गुना ज़्यादा होता है।

क्लाइमेट चेंज का उत्तरदायी ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट होता है, ये तो हम जानते ही हैं न? और ग्रीन हाउस गैसेज़ में मिथेन का जो मॉलिक्यूल (अणु) है, वो कार्बन डाइऑक्साइड के मॉलिक्यूल से बीस गुना ज़्यादा घातक होता है। और मिथेन कहाँ से आती है? मिथेन उन जानवरों से आती है जिनको आप पालते हो दूध के लिए और माँस के लिए। तो माँस खाना और डेयरी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करना क्लाइमेट चेंज के बड़े-से-बड़े कारण में है। अब तुम बताओ, तुम माँस खा रहे हो, मैं तुम्हें खाने दूँ क्या? क्लाइमेट चेंज का असर तो मेरे ऊपर पड़ रहा है न, तुम कैसे बोल रहे हो कि ये तुम्हारा व्यक्तिगत मसला है? नहीं है व्यक्तिगत।

इसी तरीके से दुनिया की सत्तर प्रतिशत खेती सिर्फ़ जानवरों का अन्न और उनका चारा उगाने के लिए की जाती है। ये बात आप कभी खुद सोच ही नहीं पाओगे अगर आप इंटरनेट पर डेटा नहीं देखने जाओगे, लेकिन इंटरनेट पर डेटा देखने की फ़ुर्सत कहाँ है, हमको तो एंटरटेनर्स को देखना है, हमें रोस्टर्स (व्यंगकों) को देखना है।

कोई आ जाए सिर्फ़ आपका दिल बहलाने के लिए अपनी प्रिटी पिक्चर्स डालने वाली, आप उसके सौ-मिलियन फ़ॉलोवर कर दोगे। तो आपके पास वक्त कहाँ है ये देखने का कि दुनिया भर का एग्रीकल्चर (कृषि) हो क्यों रहा है? सत्तर प्रतिशत खेती इसलिए होती है ताकि मवेशियों को अन्न खिलाया जा सके। और उनको अन्न क्यों खिलाया जा रहा है? ताकि वो फिर आपको पहले दूध दें और फिर उनका माँस आप खाओ। और वो सब जानवर ज़बरदस्ती पैदा किये जा रहे हैं ताकि आपके खाने की हवस पूरी होती रहे।

वो इतनी सारी जगह कहाँ से आयी खेती की? जंगल काटकर के आयी। तुम जो माँस खा रहे हो उसके लिए जंगल कट रहा है, और जब जंगल कट रहा है तो जंगल में जो प्रजातियाँ रहती थीं न, वो विलुप्त हो रही हैं। किसी प्रजाति को खत्म कर देने का ये तरीका नहीं होता कि उसको खा जाओ या गोली मार दो। तुम उसका घर काट दो, वो मर जाएगा। वो रहेगा कहाँ, मर जाएगा। बस तुम उसका जंगल काट दो, वो प्रजाति विलुप्त हो जाएगी।

पिछले चालीस साल में हमने उतनी प्रजातियाँ खत्म कर डालीं जितनी पिछले चालीस लाख साल में नहीं खत्म हुई थीं। ये कौन समझाये इन सत्रह-अठारह साल वालों को जो बोलते हैं, ‘माय लाइफ़, माय चॉइस। मैं कुछ भी खाऊँ। मैं बीयर पीता हूँ, मैं चिकन खाता हूँ, मेरी मर्ज़ी!’

और पिछले आठ साल में ही भारत में खासतौर पर चिकन का उपभोग कई गुना हो गया है। कौन खा रहा है चिकन ? यही खा रहे हैं, ये जो आज के लड़के हैं। दारू पीनी है, चिकन खाना है, और दारू और चिकन तो साथ चलते-ही-चलते हैं। बिना चिकन के दारू कैसी? क्या इनको पता है कि जब ये वो चिकन खा रहे होते हैं, तो इन्होंने कितनी प्रजातियाँ खत्म कर दीं? मैंने कहा, ‘जानवर नहीं मार दिये हैं तुमने, पूरी स्पीशीज़ (प्रजातियाँ) खत्म कर दी हैं। एक-दो-चार नहीं, लाखों स्पीशीज़ खत्म कर दीं।’

लेकिन तुम्हें कैसे पता चलेगा? देखो न कि तुम लगातार फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम पर क्या देखने में मशगूल हो। तुम्हारे पास सच्चाई देखने का वक्त कहाँ है? और अपनेआप से पूछना कि तुम जिन लोगों को फ़ॉलो कर रहे हो, क्या वो तुम्हें कभी सच्चाई बताते हैं। एक ये सवाल पूछो अपनेआप से। वो बस तुम्हारा मनोरंजन करते हैं, वो भी घटिया-से-घटिया तरीके से तुम्हारा मनोरंजन करते हैं। वो तुम्हें कभी सच्चाई नहीं बताएँगे, क्योंकि सच्चाई तुम्हें पता चल गयी तो फिर तुम उन्हें सुनना छोड़ दोगे।

एक क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट हैं और बहुत जान लगाकर के काम कर रही हैं। उनसे बात हो रही थी, मैंने पूछा कि बताइएगा, अभी क्लाइमेट चेंज को रोकने का, अरेस्ट (नियन्त्रित) करने का कट ऑफ़ इयर (अधिकतम करणीय वर्ष) क्या है। क्योंकि पहले मानते थे वर्ष २०५० है, फिर हमने कहा, ‘वर्ष २०३५ है।’ वो बोलीं, ‘अब कट ऑफ़ इयर है सन् २०२०, द राइट डे वाज़ यस्टरडे (उचित दिन कल था), अब तुम उसको नहीं रोक सकते।’

तापमान में शून्य-दशमलव-पाँच की बढ़ोतरी भी पृथ्वी के लिए अतिघातक है और अभी स्थिति ये है कि तुम उसे दो डिग्री से नीचे भी नहीं रोक सकते। एक-डेढ़ डिग्री हो चुका है और अब तुम दो डिग्री पर भी नहीं रोक सकते, शायद मामला तीन डिग्री तक जाएगा। और तीन डिग्री का अर्थ है सीधे-सीधे प्रलय, और प्रलय के लिए बहुत हद तक ये जो पीढ़ी है ’माय लाइफ़, माय चॉइस’ वाली, ये ज़िम्मेदार होगी। और भुगतेंगे भी यही, हमारा क्या है, अगले दस-बीस साल में निकल लेंगे। बेटा, जीना तो तुमको है न, तुमको अभी साठ साल जीना है, तुम ही भुगतोगे। ये जो तुम एक अपनी काल्पनिक डॉल लाइक फ़ेयरीटेल (गुड़ियों की तरह परीकथा वाली) दुनिया में जी रहे हो निब्बो! भुगतोगे तुम ही।

नहीं, ‘निब्बा’ बोलने का मुझे कोई शौक नहीं है। मेरे पास बहुत बेहतर शब्द हैं किसी को सम्बोधित करने के लिए, पर मैं इन्हें बोलूँ ‘किशोर’, तो इन्हें समझ में ही नहीं आएगा। बोलेंगे, ‘व्हाट काइंड ऑफ़ वर्ड इज़ दैट , ‘किशोर’?’ (ये ‘किशोर’ किस प्रकार का शब्द है?) तो मैं वही भाषा बोल रहा हूँ जो तुम्हें समझ में आती है। हिन्दी तो तुम्हें समझ में आनी कब की बन्द हो चुकी न, तुम्हें तो यही भाषा समझ में आती है निब्बिश। वही बोल रहा हूँ।

अगर हम एक सजग समाज होते तो हम पाते कि ऐसा बहुत हो रहा है कि आप किसी रेस्टोरेंट (भोजनालय) में जा रहे हैं जहाँ पर माँस परोसा जा रहा है, तो आप कहते, ‘मेरा हक है इस बात को रुकवाने का।’ आप जाकर के उससे सवाल करते, आप कहते, ‘तू कैसा आदमी है? तू पूरी दुनिया का, पूरी पृथ्वी का दुश्मन है क्या, तू माँस परोस रहा है?’ आपके पड़ोस की मेज़ पर किसी रेस्टोरेंट में कोई माँस खा रहा होता, आप कहते, ‘मैं आपसे बात करना चाहता हूँ। साहब, आप ये जो खा रहे हैं, इसके बाबत मैं आपसे कुछ बात करना चाहता हूँ। ये आप क्या खा रहे हैं? आपको पता भी है आप जो खा रहे हैं, उसका मेरी ज़िन्दगी पर क्या असर पड़ेगा? ये जो आप खा रहे हैं, इसका आपके ही बच्चे की ज़िन्दगी पर क्या असर पड़ेगा, आपने क्या सोचा है? मैं आपसे बात करना चाहता हूँ।’

अगर हम एक सजग समाज होते तो इस तरह के बहुत सारे वार्तालाप हम होते देखते। पर नहीं, हम कहते हैं, ‘भाई, वो खा रहा है, उसकी मर्ज़ी। मैं कैसे कुछ कह सकता हूँ उसको।’ तो ठीक है, आपके घर के बगल में जब कोई धुएँ वाला जनरेटर चलाये तो यही कहिएगा, ‘उसकी मर्ज़ी, मैं क्या बोल सकता हूँ इसमें।’

इट्स अ पब्लिक कॉज़ (ये सार्वजनिक कारण है), ये किसी का प्राइवेट मैटर नहीं है। लोग कहते हैं न कि हू आर यू टू डिसाइड व्हाट वुड बी ऑन माय प्लेट (तुम कौन होते हो ये निर्णय करने वाले कि मेरी थाली में क्या होगा)। नहीं, आइ डू हैव अ स्टेक एंड अ वॉइस इन डिसाइडिंग व्हाट वुड बी देयर ओन योर प्लेट। एक्सक्यूज़ मी! (तुम्हारी थाली में क्या होगा, ये निर्णय करने में मेरा एक पक्ष है और बोलने हेतु एक उचित कारण है। कृपया मुझे बोलने दें!)

चालीस फ़ुटबॉल मैदानों के बराबर जंगल हो गये साफ़!

उत्तर: हम कहते हैं न, कि अरे! जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं। अक्सर तुमने इस तरह की बातें सुनी होंगी कि प्रतिदिन चालीस फ़ुटबॉल मैदानों के बराबर जंगल काट दिये जाते हैं। उनमें से अधिकांशतः तो ब्राज़ील में अमेज़न के जंगल हैं, वही काटे जा रहे हैं। तुमने कभी सोचा है कि इतने जंगल काटने क्यों पड़ रहे हैं? कभी विचार किया है?

ब्राज़ील का ही उदाहरण ले लो। बताओ, क्यों काटने पड़ रहे हैं? वो जंगल इसलिए काटने पड़ रहे हैं ताकि उन जंगलों को काटकर उस जगह पर खेती की जा सके। खेती क्यों की जा रही है? वो खेती इसलिए नहीं की जा रही है कि वहाँ जो खेती की जाएगी उससे जो अन्न पैदा होगा, वो शाकाहारियों के पास जाएगा। इस भ्रम में मत रहिएगा।

वहाँ खेती की जाएगी इसलिए ताकि वहाँ से जो अन्न-दाना निकले वो गायों-भैंसों को खिलाया जाए, फिर उनको आप काटकर के उनका माँस खा सकें। वहाँ एनिमल फ़ार्म चलते हैं। ब्राज़ील माँस का बहुत बड़ा निर्यातक है, एक्सपोर्टर। तो जंगल इसलिए काटे जा रहे हैं ताकि माँसाहारियों को माँस मिलता रहे।

माँसाहारियों के सिर पर इल्ज़ाम है, पाप है दुनिया भर के जंगल कटवाने का। आप एक तरफ़ तो चिकन चबाते हो, मटन चबाते हो, दूसरी ओर आप कहें कि नहीं-नहीं, मुझे दुनिया के जंगल की और पर्यावरण की बहुत फ़िक्र है, तो आप पाखंडी हैं, आप हिपोक्रेट हैं क्योंकि दुनिया के जंगलों के कटने का सबसे बड़ा कारण ही माँसाहार है। और ये तो कहिएगा ही नहीं कि मुझे पता नहीं था। दुनिया भर की व्यर्थ बातें आपको पता होती हैं और पृथ्वी के सामने जो सबसे बड़ी समस्या है, वो आपको नहीं पता था। पता ही नहीं है या पता करना चाहते ही नहीं थे? पता इसलिए नहीं करना चाहते थे क्योंकि ज़बान के स्वाद पर या धार्मिक आस्थाओं पर चोट लगती है।

इसी तरीके से हम कहते हैं कि अरे! पशुओं की, पक्षियों की, पेड़-पौधों की इतनी प्रजातियाँ रोज़ विलुप्त हो रही हैं। जानते हो रोज़ाना पच्चीस से डेढ़-सौ प्रजातियाँ हैं जानवरों की, कीट-पतंगों की और पौधों की जो हमेशा के लिए खत्म हो जा रही हैं। वो लौटकर नहीं आएँगे अब। वो क्यों खत्म हो रही हैं? वो इसलिए खत्म हो रही हैं क्योंकि उनके घर हमने काट डालें।

जब तुम एक जंगल काटते हो तो उसमें बस पेड़ ही नहीं काटते हो, तुम न जाने कितनी प्रजातियों का हैबिटेट काट देते हो जहाँ पर वो बसा करती थी, जो उनका घर था। माँस का स्वाद लेने के लिए तुमने न जाने कितनी प्रजातियाँ खत्म कर दीं। ऐसे नहीं खत्म कर दी कि तुमने उनको खा लिया, नहीं — खाया तो तुमने बकरे को लेकिन उस बकरे के लिए अन्न उपजाने के लिए तुमने जंगल काट डाले, ताकि वहाँ खेती कर सको। और जंगल तुमने काटे, न जाने कितनी अनाम-अनजान प्रजातियाँ विलुप्त हो गयीं। बल्कि प्रजातियाँ इस समय पृथ्वी पर बढ़ती ही कौनसी जा रही हैं? मुर्गे बढ़ते जा रहे हैं, बकरे बढ़ते जा रहे हैं, इसलिए नहीं कि उन्हें बढ़ने का शौक है, इसलिए क्योंकि तुम उन्हें कृत्रिम रूप से बढ़ा रहे हो।

ये बहुत मूर्खतापूर्ण तर्क है कि अगर हमने खाया नहीं तो तालाबों में मछलियाँ कितनी हो जाएँगी और जंगलों में सूअर और भैंसे कितने हो जाएँगे। आपको क्या लग रहा है, ये सब प्राकृतिक रूप से पैदा होते हैं?

आप जो माँस खाते हो वो नब्बे-पचानवे प्रतिशत कृत्रिम रूप से पैदा किया जाता है आपकी हवस मिटाने के लिए। ये ऐसा थोड़े ही है कि मुर्गे जंगलों में घूम रहे थे और आपके लिए जाकर के उनको कसाई लोग और रेस्तराँ वाले पकड़कर ला रहे हैं। ये जंगलों से नहीं आ रहे हैं, इन्हें ज़बरदस्ती पैदा किया जा रहा है। और इन्हें ज़बरदस्ती पैदा किया जा रहा है, खिलाया जा रहा है जंगल काट-काटकर।

तो माँसाहार से जो दो-तीन चीज़ें हैं सबसे खतरनाक, वो तो समझ में आ ही गयी होंगी। अभी उसमें और भी जोड़ूँगा। पहली चीज़, जंगल काट रहे हैं इसकी वजह से। दूसरी चीज़, प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं इसकी वजह से। तीसरी चीज़, जितने तुम इसको संसाधन दे रहे हो, जितनी जगह दे रहे हो एनिमल एग्रीकल्चर को, उसके अनुपात में माँस से न कैलोरी मिल रही है न प्रोटीन मिल रहा है।

अब आओ चौथी चीज़ पर। क्लाइमेट चेंज या ग्लोबल वार्मिंग — इसका नाम तो सभी ने सुना ही होगा। जानते हो ग्लोबल वार्मिंग की बड़ी-से-बड़ी वजह क्या है? माँसाहार। प्रश्नकर्ता ने बड़े भोलेपन से कहा — जाने भोलापन है या बात को छुपाने की मंशा है। कई बार जब कुछ पूर्वाग्रह हमारे मन में बहुत गहरे बैठे होते हैं तो उनको कायम रखने के लिए हम तथ्यों को भी तोड़ने-मरोड़ने लग जाते हैं। खैर जो भी कर रहे हैं, ये बात समझिए। इतना तो तुमने कह दिया कि प्रशान्त जी, शायद आपको पता नहीं कि क्लाइमेट चेंज माँस खाने से नहीं गैसों से होता है। अरे! वो गैसें क्या आसमान से टपकती हैं? वो गैस कहाँ से आ रही हैं? जिन गैसों से क्लाइमेट चेंज हो रहा है, ग्रीनहाउस गैसेस जिन्हें बोलते हैं, सर्वोपरि उनमें कौन है? मिथेन है, फिर कार्बन डाइऑक्साइड है, उसके बाद वॉटर वेपर है और तमाम अन्य गैसेस हैं। पर सबसे ज़्यादा जो उत्तरदायी गैस है ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट के लिए पृथ्वी पर, वो इस वक्त कार्बन डाइऑक्साइड है। वो कहाँ से आ रही है वो तुम्हें पता है? वो एनिमल एग्रीकल्चर से आ रही है। मिथेन पैदा होती है उससे और कार्बन डाइऑक्साइड।

ये जितने तुम जानवर बड़े-बड़े पैदा कर रहे हो काटकर खाने के लिए, इन्हीं जानवरों के शरीर से मिथेन और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन होते हैं। तो क्लाइमेट चेंज की बड़ी-से-बड़ी ज़िम्मेदारी माँस खाने वाले लोगों के ऊपर है। वो जो तुम्हारी प्लेट पर माँस रखा हुआ है वही ज़िम्मेदार है क्लाइमेट चेंज का। तुम इधर-उधर की क्या बात कर रहे हो? कि अरे! नहीं, कार का नया मॉडल ले लेंगे, तो उसमें से कार्बन डाइऑक्साइड कम निकलेगा, अरे! नहीं, चलो थोड़ा सा एक बल्ब कम जलाते हैं तो ग्लोबल वार्मिंग कम होगी। बेवकूफ़ी की बातें हैं।

जो सबसे बड़ी बात है वो मुद्दा तो तुम छुपा रहे हो। ये जो माँस खा रहे हो तुम, इसी से क्लाइमेट चेंज हो रहा है दुनिया भर का।

जोशीमठ नहीं धँस रहा, हम धँस रहे हैं!

प्रश्नकर्ता: सर, साल की शुरुआत से ही जोशीमठ से कुछ खबरें आ रही हैं ज़मीन धँसने की। और इसरो ने सेटेलाइट डेटा से ये बात भी बतायी है कि पिछले साल के अप्रैल से लेकर नवम्बर के बीच में ज़मीन वहाँ धँस रही थी, पर तब वो सात सेंटीमीटर धँस रही थी। पर इस साल सन् २०२३ के शुरुआती बारह दिनों में ही पाँच-दशमलव-चार सेंटीमीटर धँस चुकी है और वो आशंका लगा रहे हैं कि जिस तरह ये बात गम्भीर हो रही है तो शायद पूरा शहर ही धँस सकता है। तो इस पर सवाल ये उठता है कि हमारे तीर्थस्थलों की दुर्दशा के पीछे क्या कारण हैं?

उत्तर: काफ़ी कुछ तो सिर्फ़ प्राकृतिक ही है। जोशीमठ जितना मैंने पढ़ा है जिस जगह पर बसा हुआ है, वो जगह ही भौगोलिक दृष्टि से बहुत पक्की, स्थायी, टिकाऊ है नहीं। और वहाँ पर ज़मीन धँसने वगैरह की प्रक्रिया कोई नयी, ताज़ी नहीं है, पचासों साल से वहाँ ये चल रहा है तो काफ़ी वजह तो प्राकृतिक ही है। लेकिन जैसा कि आपने अभी कहा कि जितना बुरा था पिछले बीस-तीस साल में, उससे ज़्यादा सन् २०२३ में हो गया है।

आपने कुछ सेंटीमीटर गिनाये थे। बारह दिनों में पाँच सेंटीमीटर काफ़ी होता है और ये आँकड़ा भी मुझे लग रहा है कि थोड़ा-सा पुराना है, अभी और बढ़ गया होगा। इतना जो भूमि में धँसाव है बहुत होता है। अब हम क्या पढ़ रहे हैं? हमें क्या सुनाई दे रहा है जितनी भी रिपोर्ट आ रही हैं, जो थोड़े से विश्वसनीय अखबार हैं उनमें पढ़ें तो? प्राकृतिक कारण तो अपनी जगह है ही। कहते हैं, ‘पहले बहुत पुरानी लैंडस्लाइड (भूस्खलन) है और उसी लैंडस्लाइड का जो मलबा है, जब वो बिलकुल जम गया था तो उस पर बसाया है जोशीमठ।’ वो तो प्राकृतिक कारण हो गया।

उसके अलावा ये चल रहा है कि जो चारधाम अभियान है, तो उसके लिए कई लेन की विस्तृत सड़क बनानी है। उसके लिए ज़बरदस्त तरीके से डायनामाइटिंग (विस्फोट) चल रही है और अभी दो-तीन साल से उधर के लोग उन सब गतिविधियों की वीडियो बना-बनाकर डालते रहते हैं, कि कैसे डायनामाइट से पत्थर को उड़ाया जा रहा है और फिर जो मलबा इकट्ठा हो रहा है, वो कैसे सीधे ही नीचे फेंक दिया जा रहा है।

दूसरों को छोड़ दो, मैं ही जब ऋषिकेश में था पिछले साल, और पिछले-से-पिछले साल तो मैंने खुद ही वीडियो बनाया था; क्योंकि एक जगह थी गंगा तट पर, वहाँ रेत थी छोटी बीच (तट) जैसी बन गयी थी और वहाँ आमतौर पर लोग पहुँच नहीं पाते, रास्ता ठीक नहीं है वहाँ पहुँचने का। मैं वहाँ एकाध बार जाया करता था, लोग नहीं होते थे इसलिए वो जगह मुझे पसन्द थी। फिर कुछ महीनों के बाद जब मैं वहाँ लौटकर जाता हूँ, देखता हूँ कि वहाँ मलबा-ही-मलबा पड़ा हुआ है। ऊपर पत्थर उड़ाया गया था, वो सारा जो पत्थर था वो नीचे उस बीच पर पड़ा था, वहाँ बीच कहीं नहीं थी। उस बीच पर पड़ा था पत्थर और सीधे पानी में पड़ा हुआ था। काफ़ी बुरा लगा था, सोचा भी था कि इसको कहीं सोशल-मिडिया पर डाला जाएगा, फिर नहीं डाला।

हिमालय पर्वत दुनिया के नये पर्वतों में से हैं और नये का मतलब ये नहीं कि बीस-चालीस या सौ, दो-सौ साल पुराने। आमतौर पर पर्वत श्रृंखलाओं की जितनी उम्र होती है, उसकी तुलना में ये नये पहाड़ हैं, जैसे आप विन्ध्य पर्वत-श्रृंखला को ले लें या अरावली को ले लें तो उनकी अपेक्षा हिमालय बिलकुल बच्चे हैं। और बच्चे हैं तो मतलब कि उनका विकास अभी भी चल रहा है जैसे बच्चों का चलता है न। छोटे बच्चे होते हैं तो बड़े होते रहते हैं, हिमालय भी बड़े हो रहे हैं।

मोटे-मोटे तौर पर ये समझ लीजिए कि अफ़्रीका से टूटकर के जो भूखंड आया था और एशिया से टकराया था, जिसके टकराने के कारण हिमालय का निर्माण हुआ। वो अभी भी टकरा ही रहा है, वो अभी भी गतिशील है। देखो, ऐसे समझो, जैसे ये है (टेबल पर पड़े कागज़ को एक तरफ़ से धक्का देते हुए ताकि बीच का हिस्सा ऊपर उठ जाए)। ये इधर से आगे को बढ़ता रहता है और बीच में क्या होता रहेगा? ये हिमालय है और ये जो तुम्हारा पूरा भूखंड है, यही जम्बूद्वीप कहलाता है। जिसको वो कहते हैं न, तो ये वो है जो बहते-बहते आया है और एशिया से टकरा गया।

जो भारतीय उपमहाद्वीप है, ये एशिया का एक नया, ताज़ा हिस्सा है और ये एशिया से जुड़ा हुआ है यहाँ हिमालय की सीमा के माध्यम से। तो इसीलिए हिमालय के दक्षिण में जो मामला है और हिमालय के उत्तर में जो मामला है, वो इतना अलग है हर तरीके से — जलवायु की दृष्टि से, मिट्टी की दृष्टि से। सब मौसम बिलकुल अलग-अलग हैं, ये दो बिलकुल अलग हैं। तो लगभग चार इंच प्रतिवर्ष की दर से अभी भी हिमालय उठ ही रहे हैं। तो वो बड़े अनस्टेबल (अस्थिर) हैं अभी इसीलिए इतना भूस्खलन पाते हो आप, खासतौर पर बरसातों में। है न? जा रहे हो, जा रहे हो और इतना बड़ा पत्थर गिर पड़ेगा, गाड़ी पर पहाड़ से चूरा, रेत गिर पड़ता है, ये इसीलिए होता है।

ऊपर से क्या हुआ है? क्लाइमेट चेंज। तो उसके कारण जो नियमित किस्म का मौसम हुआ करता था वो बिलकुल बदल गया है। सिर्फ़ पिछले-पिछले साल में हज़ारों ऐसी घटनाएँ हुई हैं जो असामान्य हैं मौसम की दृष्टि से। अब जो मिट्टी है, पत्थर है जो आपस में गुँथे हुए हैं। वो इस तरह से निर्मित हैं कि सामान्य मौसम को ही झेल सकते हैं और थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे हो जाए, तो चलो वो बर्दाश्त कर लेंगे पर जब हज़ारों एब्नॉर्मल इवेंट्स (असहज गतिविधियाँ) होते हैं, तो नहीं झेल पाते। एब्नॉर्मल इवेंट्स कैसे होते हैं? हिमालय पर ज़्यादातर यही होता है कि बारिश ज़्यादा हो गयी, जहाँ नहीं होनी चाहिए थी उतनी बारिश हो रही है।

उत्तरकाशी याद है न, लगभग दस साल पहले क्लाउड बर्स्ट (बादल फटना) जिसको बोलते हैं। बादल फटना क्या होता है? यही कि ज़्यादा बारिश हो गयी, बहुत ज़्यादा बारिश बहुत कम समय में हुई, और वो जो क्षेत्र है वो तैयार नहीं है, वो इक्विप्ड (लैस) नहीं है कि इतनी बारिश को झेल पाएगा। तो पत्थर-मिट्टी हो सब टूट-टाटकर अलग हो जाते हैं, और कुछ और ही वहाँ पर बन जाता है।

हिमालय, जैसा मैंने कहा, अभी बहुत गुँथा हुआ पर्वत नहीं है। अभी वो एक ढीला पर्वत है जो अभी आकार ले ही रहा है। ऊपर से इंसान ने वहाँ डायनामाइटिंग शुरू कर दी। इंसान की ही करतूत है क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन)। इस वक्त उत्तराखंड में दो-सौ से ज़्यादा बाँधों का, डेम्स का निर्माण चल ही रहा है। और इसके अलावा सैकड़ों अन्य किस्म की तथाकथित विकास परियोजनाएँ, और ये सब-की-सब तोड़-फोड़ पर आधारित है।

उसके अलावा हम रेल लेकर जा रहे हैं। एकदम पहाड़ की छाती तक हमें रेल पहुँचा देनी है और वो जा रही है सुरंगों के माध्यम से, टनल्स। ठीक-ठीक आँकड़ा मुझे याद नहीं है लेकिन लगभग तीस या पचास किलोमीटर की सुरंग खोदी जा रही है कुल मिलाकर, कुछ ऐसा ही है। अब आप देखिए क्या-क्या है — सड़क का चौड़ीकरण, राजमार्ग का, रेलमार्ग का निर्माण जिसके लिए सुरंगें तोड़ी जा रही हैं, बाँध, अन्य किस्म की विकास योजनाएँ और प्राइवेट सेक्टर द्वारा हाउसिंग और हॉस्पिटैलिटी (ठहरने की व्यवस्था), इसके लिए तोड़-फोड़ और निर्माण। होटल बन रहे हैं, अपार्टमेंट्स बन रहे हैं और घर वगैरह तो बनते ही रहते हैं। इसके अलावा इन सबके सिर पर क्लाइमेट चेंज, जिसके कारण अतिशय वृष्टि।

तो ये कुल मिलाकर के हमने कितने कारक गिना दिये? पाँच या छः। इन सबने मिलकर के ये करा है कि जोशीमठ ही नहीं, जोशीमठ के आस-पास जो लगभग एक दर्जन छोटे कस्बे हैं और गाँव हैं और कर्णप्रयाग जैसी जगहें हैं, ये सब अब धँस रही हैं। जोशीमठ भी सुर्खियों में इसलिए आया क्योंकि वहाँ एकदम अति हो गयी, लोगों को छोड़-छाड़कर भागना पड़ा। और वो जो दो होटल हैं जो एक-दूसरे पर टिक गये हैं, उनके चित्र वायरल होने लग गये कि ये देखिए क्या हो रहा है। वो तो गिरा भी दिये होंगे शायद आज दोनों होटल, आज ही गिराये जाने थे। इस कारण वो खबरों में आ गया लेकिन जो लोग पहाड़ों से सम्बन्धित हैं, उनको पता है कि वहाँ पर ये हलचल कई सालों से चल रही थी।

एक संघर्ष समिति ही बनी हुई है शायद ‘जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति’ ऐसे कुछ करके, वो कई सालों से कोशिश कर रही है। उनकी किसी ने सुनी नहीं, फिर उन्होंने अन्तत: चक्का जाम करा, तब जाकर के सरकार ने, मीडिया ने उनकी थोड़ी सुध ली। अब यही काम वहाँ तमाम अन्य जो शहर हैं वहाँ भी हो रहा है। मैं प्रामाणिक रूप से नहीं कह सकता लेकिन जितना मैं अभी तक पढ़ पाया हूँ उसमें ये है कि कुमाऊँ और गढ़वाल, दोनों ही जगहों पर ये ज़मीन धँसने की प्रक्रिया चल रही है। यहाँ तक कि नैनीताल जैसे शहर में भी ये हो रहा है। तो बात सिर्फ़ गढ़वाल भर की नहीं है।

ये हम क्या कर रहे हैं? अभी हम रेल को चला देंगे और जब रेल चलती है तो उसमें से कम्पन कितना होता है आप समझ रहे हैं? ये जो तोड़-फोड़ है उसमें तो आप ये भी कह सकते हैं कि भई, एक बार सड़क बन गयी तो बन गयी, अब चलो बन गयी। अब इसके अलावा, अतिरिक्त आगे और टूट-फूट नहीं होगी। लेकिन रेल तो रोज़ चलेगी न, और जब रेल चलती है तो वाइब्रेशन (कम्पन) होता है और जब वाइब्रेशन होते हैं तो चट्टानें ढीली पड़ती हैं। दो चीज़ें एकदम ऐसे (दोनों हाथों की उँगलियों को आपस में फँसाते हुए) जुड़ी हुई हों, उनको आप हिलायें रोज़-रोज़, वाइब्रेशन दें तो क्या होगा? वो दोनों ढीली पड़ेंगी और जब ढीली पड़ेंगी तो टूट-टाटकर नीचे भी गिरेंगी, और उनके ऊपर जो कुछ बसा हुआ होगा, वो भी सब नीचे ध्वस्त हो जाएगा बिलकुल। तो अब ये सब होने जा रहा है।

इसी से जुड़ी बहुत सारी बातें हैं। एक एनटीपीसी का प्रोजेक्ट है, उसको लेकर भी अनुमान लगाये जा रहे हैं। सन् १९७६ में भी एक कमिटी गठित की गयी थी, मेरे खयाल से ‘मिश्रा कमिटी’ उसका नाम था। उसने सन् १९७६ में बोल दिया था कि ये सब यहाँ जो तुम विकास के नाम पर कर रहे हो, रोक दो बिलकुल। इन पहाड़ों में ये सामर्थ्य नहीं है कि तुम्हारे विकास को बर्दाश्त कर पाएँगे। सन् १९७६ में माने छियालीस साल पहले, आधी शताब्दी पहले से ये बाकायदा एक कमिटी ने अनुशंसा कर रखी है कि मत करो पहाड़ों के साथ ये सबकुछ, इनमें नहीं है सामर्थ्य। फिर अभी पाँच-सात साल पहले भी एक कमिटी बैठी थी, उसने भी कहा था — और वो कोर्ट के आदेश पर बैठी थी — उसने भी कहा था कि रुक जाओ, मत करो ये सब। लेकिन हमको विकास चाहिए।

और उत्तराखंड अभागा इसलिए है क्योंकि वो देवभूमि है। और जो हमारी अन्धी धार्मिकता है, वो कहती है, ‘हमारी देवभूमि है न तो यहाँ पर तो चकाचक विकास होना चाहिए। हमारे गौरव का, हमारे गर्व का मामला है भाई। हिन्दुओं के यहाँ पर इतने तीर्थस्थल हैं तो यहाँ पर तो ज़बरदस्त विकास होना चाहिए।’ ये बात हमारे गौरव की है, हमारे अहंकार की है। मेरा देवस्थल है न तो चकाचक होगा-ही-होगा, तो मुझे वहाँ पर सबकुछ कर देना है। मुझे वहाँ जितने तरीके के हो सके होटल, रिज़ॉर्ट बना देने हैं। आठ लेन , दस लेन , सोलह लेन की सड़क बना देनी है, पचासों परियोजनाएँ बना देनी हैं। जो-जो करना है, सब कर डालना है। और मुझे ये देखना भी नहीं है कि वो जगह इन सब चीज़ों को बर्दाश्त कर भी सकती है कि नहीं बर्दाश्त कर सकती है।’

अभी ताज़ा खबर शायद ये है कि भारतीय सेना ने भी जोशीमठ को त्याग दिया है। सैनिक भी वहाँ से अपनी गाड़ियाँ, अपना पूरा सब दस्ता लेकर के शायद औली की तरफ़ निकल गये हैं। कि सेना के रहने लायक भी वो जगह नहीं बची। ये स्थितियाँ बदल भी सकती हैं।

ये तो हम आज की बात कर रहे हैं, कुछ और भी हो सकता है लेकिन स्थितियाँ ऊपरी तौर पर थोड़ी बदल भी जाएँ, तो भी जो मूल बात है वो अपनी जगह है। और मूल बात ये है कि इंसान धर्म को किस रूप में देख रहा है। धार्मिकता का अर्थ होता है मुक्ति की ओर बढ़ना। ठीक? कोई भी भारतीय धर्म हो, उसका एक ही परम उद्देश्य होता है, उसकी एक ही मंज़िल है — मुक्ति। और किससे मुक्ति चाहिए होती है? भौतिकता से, पदार्थ से। कि यही सब चीज़ें हैं जो हमको जकड़े रहती हैं, मुझे इनसे मुक्ति मिल जाए और इनसे मुक्ति मिले तो मैं आनन्द में जी पाऊँ।

लेकिन हमने धर्म को भी पूरा भौतिक बना डाला है। तो ये तो छोड़ दो कि धर्म भौतिकता से मुक्ति दिलाएगा। ये जो हमारी नयी किस्म की धार्मिकता है, ये स्वयं अपनेआप में बड़ी भौतिक है। ये पदार्थ को बन्धन नहीं मानती, ये तो पदार्थ को और इकट्ठा करती है और खड़ा करती है। ये कहती है, ‘और सड़कें चाहिए, और बड़े-बड़े मन्दिर चाहिए, पत्थर-ही-पत्थर लगाओ और ऊँचा शिखर उठाओ।’

समझ में आ रही है बात?

मैं जानना चाहता हूँ, मैंने पहले भी आपसे पूछा था कि ये आप जो सड़क इतनी चौड़ी कर रहे हो, आप ये पूछो तो कि किसके लिए कर रहे हो। इसका परिणाम वही होना है दिल्ली, चंडीगढ़, गुड़गाँव। गाड़ियाँ-ही-गाड़ियाँ हैं जो सरपट भागी जा रही हैं केदारनाथ तक, और वहाँ चल रही है मौज-मस्ती। चार धाम बनेंगे मौज के, विलासिता के अड्डे। क्या धार्मिकता बढ़ने जा रही है आप ये सब जो विकास कर रहे हो इससे? क्या होने जा रहा है?

एनटीपीसी कोई सुरंग खोद रहा था। उस सुरंग ने जाकर किसी एक एक्विफर में छेद कर दिया। नीचे जो अंडरग्राउंड (भूमिगत) जलाशय होते हैं, उसमें जितना पानी था वो सब निकल गया और बड़ी भयानक तरह से निकलता है लाखों लीटर पानी। मैं पढ़ता हूँ कि वो पानी अब भी उसमें से रिस ही रहा है। अब वो इतना पानी इकट्ठा था वो निकल जाएगा तो उस जगह पर क्या बचेगा? खाली स्थान। और खाली स्थान क्या करेगा फिर? धँसेगा।

तो वही चल रहा है। इन विषयों पर मैं कोई विशेषज्ञ नहीं हूँ, मैं जियोलॉजिस्ट (भू-वैज्ञानिक) नहीं हूँ, मैं वैज्ञानिक नहीं हूँ जो मैं बिलकुल प्रामाणिक तौर पर इस पर कह पाऊँ कि ऐसा ही हुआ है। मैं भी आपसे वही कह पा रहा हूँ जितना मैंने रिपोर्ट्स में पढ़ा है। लेकिन कुछ बातें हैं जिनको मैं प्रामाणिकता से कह सकता हूँ। और वो यही है कि हमारी रुचि पत्थर-पानी में बढ़ती ही जा रही है, बढ़ती ही जा रही है। एक बहुत मटीरियलिस्ट (भौतिक) किस्म की धार्मिकता जड़ पकड़ती जा रही है, और उसी का प्रचार हो रहा है और उसी को धर्म समझा जा रहा है।

मैं ऋषिकेश में काफ़ी समय गुज़ारता रहा हूँ और वहाँ की हालत को लेकर के भी मैंने बहुत बार बोला है। आप पर्यटन बढ़ा रहे हो, आप बोलते हो विकास करना है; और उस शहर में पिछले दस साल में ही कितनी तब्दीलियाँ आ गयी हैं।

ये जो किताब है हमारी, आखिरी जो आयी है अंग्रेज़ी में ‘माया’, तो ‘माया’ की मैनुस्क्रिप्ट (हस्तलिपि) वहीं ऋषिकेश से थोड़ा आगे बढ़कर शिवपुरी की ओर एक जगह पर बैठकर के मैंने फाइनल करी थी गंगा किनारे बैठकर के। लगभग डेढ़ महीना लगाकर के वहीं जाता था और उसको वहीं पर एडिट करा था।

और उसमें मुझे बीच-बीच में बड़ी तकलीफ़ आती थी क्योंकि मैं वहाँ बैठा हुआ हूँ और मैं एक-एक अक्षर पढ़ना चाहता हूँ। जहाँ कुछ बदलना है उसको देखना चाहता हूँ, और वहाँ से वो सब ये राफ्टिंग वाले निकलते थे और “नीले-नीले अम्बर पे चाँद जब छाये, प्यास भड़काये, हमको तरसाये, ऐसा कोई साथी हो।” और वो आप यहाँ बैठे हुए हो और वो ठीक सामने से निकल रहे हैं, और नारेबाज़ी कर रहे हैं और चिल्ला रहे हैं। नारेबाज़ी उनकी कई बार ये भी होती थी, “जय गंगा मैया, जय गंगा मैया”, पर ये क्या कर रहे हो? ये युद्ध घोष है? या यलगार है या किसी को मारने की तैयारी कर रहे हो? चिल्ला क्यों रहे हो इतना?

तो या तो वो फूहड़ गाने गा रहे होते थे या फूहड़ नारेबाज़ी कर रहे होते थे। बीच-बीच में ऐसा लगता था, कोई धार्मिक बात भी वो बोल रहे हैं पर जो धार्मिक बात भी बोल रहे होते थे, वो बड़ी विकृत लगती थी जिस तरह से वो बोल रहे होते थे।

ये काम पहाड़ों के साथ लगातार होता ही जा रहा है — पेड़ों का कटना, एक के बाद एक वहाँ पर और रिज़ोर्ट्स का बनना, ये करना, वो करना। कुल मिलाकर के ये है कि जीवन का उद्देश्य मुक्ति नहीं है, जीवन का उद्देश्य है पैसा कमाना। और पैसा कमाने के लिए अगर धर्म को भी बेच दो तो छोटी बात है। जो मूल बात ये थी कि धर्म के लिए भौतिकता को पीछे रख दो, या भौतिकता का अधिक-से-अधिक प्रयोग कर लो धर्म को आगे बढ़ाने के लिए। ठीक?

अभी जो नयी बात चल रही है वो ये है कि भौतिकता के लिए धर्म का प्रयोग कर लो, समझिएगा, भौतिकता के लिए धर्म का इस्तेमाल कर लो। तो तीर्थ यात्रा के लिए हेलीकॉप्टर हैं और पूरे रोप-वे (उड़नखटोला) बना दिये गए हैं।

(प्रश्नकर्ता से पूछते हुए) हमलोग जो अभी केदारनाथ गये थे तब वो नहीं था न रोप-वे ? अब बन गया है? तब बनने की शुरुआत थी? कहाँ से कहाँ तक का बना है वो?

प्रश्न: अभी बनने की शुरुआत हुई है।

उत्तर: अच्छा, अभी बनने की शुरुआत हुई है। तो कहाँ से कहाँ तक जाएगा?

प्रश्न: गौरीकुंड से पूरा ऊपर तक।

उत्तर: गौरीकुंड से पूरा ऊपर तक? तो जा ही क्यों रहे हो वहाँ? उड़नखटोले पर बैठकर के वहाँ जाओगे महादेव के पास? उनके सिर के ऊपर उड़कर आओगे? तीर्थ वहाँ किसी वजह से स्थापित किया गया था न? कि जा सकते हो अगर तो पैरों पर चलकर जाओ। तो पहली हमने बेईमानी ये की कि घोड़े और खच्चर लगा दिये। उसके बारे में भी मैंने बोला है कि भाई, घोड़ों को क्यों तीर्थ-यात्रा करा रहे हो, उनकी जान क्यों ले रहे हो? उन्होंने कब कहा है? वो तो पशुपति के वैसे ही प्रिय हैं सारे पशु। उन्हें ये करना ही नहीं है कि दिन में तीन-बार ऊपर, तीन-बार नीचे। और तुम उनको मारे डाल रहे हो, वहाँ लाशें पड़ी रहती हैं।

फिर ये हो गया कि हेलीकॉप्टर आएगा वहाँ पर। तो हेलीकॉप्टर से चल रहा है कार्यक्रम और अब ये उड़नखटोला जाया करेगा वहाँ पर। हम कह रहे हैं कि विकास हो रहा है। ‘देखिए साहब, हम कोई छोटे लोग नहीं हैं। हमारे तीर्थ भी किसी से कम नहीं हैं। खासतौर पर विदेशियों के जैसे तीर्थ होते हैं हम उनसे कम नहीं हैं।‘ तो भीतर एक अजब हीन भावना बैठी हुई है, एक प्रतिस्पर्धा की भावना बैठी हुई है और वो भी पूरी तरह भौतिक। उस भावना में श्रद्धा कहीं नहीं है। उस भावना में जो पूज्य है, जो आराध्य है उसके प्रति प्रेम कहीं नहीं है, बस एक ठोस गन्धाता-सा अहंकार है।

‘मुझे किसी से पीछे नहीं रहना है और तुम अगर ये सब बातें हमें बता रहे हो, तो औरों को क्यों नहीं बताते? मुसलमानों को बताओ, ईसाइयों को बताओ। उनको भी ये सब बातें बताओ।’ दूसरे अगर कुछ गलत कर रहे हैं तो हम भी बराबरी का गलत करेंगे। दूसरे अगर गिरे हुए हैं तो हम उनसे ज़्यादा गिरकर दिखाएँगे। दूसरे अगर हिंसा करते हैं तो हम और ज़्यादा हिंसक पशु ही बन जाएँगे। जो कहीं लिखा भी नहीं हुआ है, हम उसकी अफ़वाह उड़ाएँगे, “धर्म हिंसा तथैव च।” जो कि कहीं नहीं लिखा हुआ। ये चल रहा है।

तो ये है जो ऊपरी बात है, मूल बात है और उसी मूल बात की अभिव्यक्ति होती है फिर जोशीमठ के धँसने जैसे लक्षणों में। जो अन्दरूनी बीमारी है, जो मूल बीमारी है, वो है एक स्थूल भौतिक धार्मिकता। एक ऐसी अन्धी धार्मिकता जो वास्तव में अहंकार के अलावा कुछ नहीं है, अज्ञान के अलावा कुछ नहीं है। और उसकी अभिव्यक्ति फिर होती है कि आप अपने ही तीर्थ स्थलों को खाये जा रहे हो।

जोशीमठ का सम्बन्ध आप जानते हो न किनसे है?

प्रश्न: शिव जी से।

उत्तर: हाँ, शिव जी से तो है ही, पर और ज़्यादा आदि शंकराचार्य से। और अब नहीं रहेगा जोशीमठ! कर लो विकास। और ये अहंकार का बरसों पुराना किस्सा है। वो जिस चीज़ को लेकर बहुत उछलता है, वो उसी चीज़ को खा जाता है। अहंकार अगर धर्म को लेकर बहुत उछलेगा न तो धर्म को भी खा ही जाएगा, और वही हो रहा है। ‘धर्म-धर्म-धर्म’ जितना नारा भारत में पिछले बीस-तीस साल में लगा है, इतना पहले नहीं लगता था। और पिछले बीस-तीस साल में भारत में सनातन धर्म का जितना नाश हुआ है, उतना भी कभी नहीं हुआ।

हमको कौनसा धर्म चाहिए, मैं बताता हूँ, हमको एनआरआइज़ वाला धर्म चाहिए। हमको सूरज बड़जात्या की फ़िल्मों वाला धर्म चाहिए, राजश्री प्रोडक्शन वाला धर्म। जहाँ बहुत-सारा पैसा है सबसे पहले, जैसे एनआरआइ के पास होता है। बहुत-सारा पैसा है, बहुत-सारा। और साथ में घर में एक पूजा-स्थल है। जहाँ पर सांस्कृतिक पिताजी अपनी दो सांस्कृतिक बेटियों और दो सांस्कृतिक पुत्रों और एक अति सांस्कृतिक पत्नी के साथ खड़े होकर रोज़ सुबह कोई कर्मकांडी प्रार्थना किया करते हैं।

उसके बाद पूरा परिवार लड्डू-गुजिया खाता है और सब एकसाथ नाचते हैं। ज़बरदस्त किस्म की शादियाँ होती हैं। आधी पिक्चर सिर्फ़ शादी पर आधारित होती है और उसमें पूरा सांस्कृतिक परिवार नाचता है। ये हमारा आज का आदर्श बन चुका है। द आइडियल हिन्दू ड्रीम (आदर्श हिन्दू स्वप्न) ये है। वहाँ किसी से पूछ दो, ‘गीता के दो शब्द पता है?’ किसी को पता नहीं होंगे। लेकिन कोई उथले किस्म का भजन सबने रट रखा होगा। वही ‘राजा इन्द्र ने बाल्टी मँगायी’, वो सबने रट रखा होगा। वहाँ किसी से पूछ दो कि अद्वैत, सांख्य या बौद्ध, किसी भी दर्शन के बारे में तुलनात्मक कुछ टिप्पणी कर दो, वो तुम्हारा मुँह ताकेंगे। लेकिन उन लोगों से पूछ दो कि तुम लोग तो धार्मिक हो न। तो बोलेंगे, ‘हाँ, हम हैं धार्मिक। लो, लड्डू खाओ, शुद्ध देसी गाय के घी से बने हैं।’ हमारा धर्म क्या है? देसी गाय का घी।

वही एनआरआइ स्वर्ग हमको उत्तराखंड में बनाना है। और वहाँ तो और अच्छा है। जलवायु स्विट्ज़रलैंड जैसी है वहाँ पर, तो लगता है कि मामला एनआरआइ है बिलकुल, है न? बढ़िया मलय पवन बह रही है, मन्द-मन्द शीतल-शीतल। वहाँ बढ़िया आलीशान कुछ खड़ा कर दो। उसके सामने यूँ देखो, ‘ये देखो! हिन्दू हृदय सम्राट।’

ऋषिकेश के आम रेस्तराँ में भी माँस बिकना शुरू हो गया है जो नहीं होता था। और मैंने इस मामले पर पहल भी करी है। जवाब ये मिलता है, ‘जो आ रहे हैं वहाँ वो यही माँग रहे हैं, माँस चाहिए।’ सन् २०१६ में पहला वहाँ पर ’मिथ डीमोलुशन टूर’ करा था। वहाँ बहुत आसान होता था वीगन (शुद्ध शाकाहारी) खाना मिलना। क्यों आसान होता था? क्योंकि तब वहाँ विदेशी बहुत आते थे। और वहाँ जो विदेशी आते थे वो कहते थे, ’टोफू (सोया पनीर) दो!’ वो कहते थे, ‘चाय बादाम के दूध की दे दो, नारियल के दूध की दे दो, सोया की दे दो। लेकिन जानवर पर क्रूरता करके जो तुम दूध वगैरह निकालते हो, ये नहीं चाहिए।’ सन् २०१६ में वहाँ अच्छा-खासा वीगन माहौल था। फिर बीच में आ गया कोविड, विदेशियों ने आना कर दिया बन्द। विदेशियों ने आना बन्द कर दिया और भारत में धार्मिकता और चढ़ गयी। इतना गन्दा कर डाला इन्होंने ऋषिकेश को — भीतरी तौर पर भी और बाहरी तौर पर भी।

वहाँ जो सफ़ाई का स्तर है, इन्होंने वो भी बहुत गिरा दिया है। पर बहुत उम्मीद कर रहा हूँ कि अब बेहतर हो जाएगा कुछ, क्योंकि अब फिर से विदेशियों ने आना शुरू कर दिया है। वो जब आते हैं तो भारतीय भी कहते हैं, ‘साफ़ करो, साफ़ करो, फ़ॉरेनर्स (विदेशी) आ रहे हैं।’ तो वहाँ पर लोग जानते हैं मुझको, उनसे बात करता हूँ तो जो सच्चाई है, बोल ही देते हैं। बोलते हैं, ‘विदेशी अभी भी यहाँ जितने हैं, वो माँस बिलकुल नहीं माँगते। ये जो देसी आते हैं न, इन्हें माँस चाहिए। ये कहते हैं, और हम ठंडी जगह पर आये किसलिए हैं? बीयर और चिकन के बिना हिल्स (पहाड़ों) का मज़ा ही नहीं आता। बियर , चिकन , सेक्स!

वो कौनसी बीच है जिस पर बहुत जाता हूँ मैं और वहाँ वीडियो भी बनाया था एक, रिकॉर्डिंग की थी जिसमें दो लड़कियाँ आ गयी थीं, जहाँ पर श्मशान घाट भी है?

प्रश्न: फूल चट्टी।

उत्तर: फूल चट्टी पर हमने अपने आरम्भिक शिविर करे थे सन् २०११–१२ के। और बहुत-सारे लोगों की ज़िन्दगियाँ बदली हैं फूल चट्टी पर। वो इतनी शान्त जगह होती थी। वहाँ पर कहीं पर रोशनी भी नहीं दिखाई देती थी। रातभर बैठे रहें, पढ़े जा रहे हैं। ‘अपरोक्ष अनुभूति’ (ग्रन्थ) खुली हुई है। लालटेन की रोशनी में पढ़ रहे हैं, पढ़ रहे हैं, वहीं पर सो गये हैं। सुबह उठ रहे हैं तो देख रहे हैं बिलकुल पाँव तक पानी बढ़ आयी है, और रेत पर ही सो रहे थे और बड़े वहाँ पर अद्भुत अनुभव रहे हैं। बहुत जाना है, बहुत सीखा है। अभी हालत ये है कि आप फूल चट्टी पर नंगे पाँव चलेंगे तो लहूलुहान हो जाएँगे। बताइए क्यों? बीयर की टूटी हुई बोतलें!

ये हमारा विकास चल रहा है और हम बहुत प्रसन्न हैं। हाँ, इस पूरी चीज़ में ऋषिकेश की इकोनॉमी (अर्थव्यवस्था) ज़रूर आगे बढ़ी होगी क्योंकि होटलों की संख्या बढ़ गयी है। राफ्टिंग ज़बरदस्त रूप से हो रही है, एडवेंचर स्पोर्ट्स चल रहे हैं। और मटन वगैरह साधारण आलू-मेथी से तो महँगा ही आता है, तो उससे जीडीपी बढ़ता है। रेज़िडेंशियल (आवास) भी बढ़ा होगा, महँगा हो गया होगा।

किसी दिसम्बर में ऋषिकेश में प्रस्तावित था कि जाएँगे, करेंगे। वो नहीं करा। कुछ तो बात ये थी कि सुरक्षा की दृष्टि से इधर-उधर से कुछ इनपुट आये थे कि ठीक नहीं है, अभी मत जाइए वहाँ पर सिक्योरिटी के लिहाज़ से। लेकिन सिक्योरिटी वगैरह की बहुत परवाह की नहीं है अतीत में। ये रहा भी है कि दिक्कत हो सकती है तो भी चले गये हैं।

मन-सा उचट रहा है। जिस जगह से मुझे इतना प्रेम रहा है और जिस जगह से मुझे इतना प्रेम मिला भी है, जिस गंगा के तट पर मैंने इतना कुछ सीखा है, इन्होंने ऐसा कर दिया उसको कि उससे मेरा मन उचटने लग गया है। और मैं सचमुच मना रहा हूँ कि वहाँ पर विदेशी आना शुरू करें और बहुत-सारे विदेशी आना शुरू करें। शायद कुछ सुधरेगा माहौल क्योंकि वो यहाँ पर होटलों के लिए नहीं आते। होटल उनके पास अपने यहाँ बहुत अच्छे-अच्छे हैं। वो यहाँ विकास देखने नहीं आते। उनका अपना विकास ठीक-ठाक है। वो यहाँ जिस चीज़ के लिए आते हैं, वो दूसरी है और वो जिस चीज़ के लिए आते हैं, उस चीज़ को हम खा गये।

मेरे पास कोई एक्सेस (पहुँच) नहीं है कि मैं जान पाऊँ कि पूरी जो प्रोजेक्ट फ़िजिबिलिटी रिपोर्ट है चार धाम की, वो क्या बोलती है। लेकिन पेड़ों का कटना, वो तो मैंने अपनी आँखों से देखा है न? हर दो सौ मीटर पर अर्थमूवर्स (एक मशीन) खड़े हुए हैं और वो पहाड़ काट रहे हैं। आप में से कोई गया है उस रास्ते पर पिछले दो साल में? अभी भी चल ही रहा है वहाँ पर काम। तो आज जोशीमठ, कल पूरा विश्व!

ऐसा थोड़े ही है कि बगल के घर में आग लगेगी तो आपका घर बच जाएगा। और कारण पूरे तरीके से हमारे अहंकार से उठा हुआ है। क्लाइमेट चेंज किसने खड़ा करा है? हमने! हमारी ही विकास की जो स्थूल भौतिक अवधारणा है, उसने क्लाइमेट चेंज का असुर, मॉन्सटर हमारे सामने, हमारे सिर पर खड़ा कर दिया है। और उसके बारे में मैं इतना बोल चुका हूँ कि बोलते-बोलते मुझे ऊब होने लगी है।

अब चार महीने में फिर से मॉनसून आ जाएँगे पहाड़ों पर और इस बार वो कौनसी आपदा लेकर के आएँगे, कोई नहीं जानता। और पहाड़ सिर्फ़ पहाड़ नहीं होते हैं, पहाड़ मैदानों की जान होते हैं भाई! दोनों अर्थों में, स्थूल अर्थ में भी और सूक्ष्म अर्थ में भी। इसीलिए समझदार लोगों ने इतने तीर्थों की स्थापना पर्वतों पर करी थी कि पर्वतों को पूज्य मानना। आन्तरिक दृष्टि से भी मैदानों का प्राण होते हैं पहाड़ और भौतिक दृष्टि से भी।

उत्तरांचल को बर्बाद करके उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल बच लेंगे क्या? क्यों नहीं बचेंगे? एक छोटा-सा नाम है ‘गंगा’। बाढ़-सूखा कुछ भी, आपने गंगोत्री का जो हाल कर दिया है उसके बाद ये आवश्यक नहीं है कि बाढ़ ही आये। जब ग्लेशियर नहीं रहेगा तो गंगा जी कहाँ से रहेंगी? और वो बन गया पर्यटन स्थल! और पर्यटन का मतलब ही होता है भोगना! ‘वहाँ जा किसलिए रहा हूँ? पैसा वसूलने के लिए। काहे कि जाना महँगा होता है भाई! तो वहाँ जाएँगे तो पूरा वसूलकर आएँगे।’ और वसूलने का मतलब ही होता है कि पर्वत का बलात्कार करके आएँगे पूरा।

गँवार किस्म का टूरिज़्म, चिप्स के पैकेट, बिसलेरी की बोतलें। कितने ही झरने हैं। वहाँ तो हर दो-सौ मीटर पर कोई झरना होता है, खासतौर पर बरसाती झरना। वैसे सूख जाता है, बरसात में बहता है। अब देखिएगा गौर से, वो कितने झरने हैं जो सिर्फ़ प्लास्टिक के कारण अवरुद्ध हो गये हैं, वो बह ही नहीं सकते अब। प्लास्टिक ने उनको रोक लिया है। और रुकता जाता है पानी, रुकता जाता है, ऊपर से तो आ ही रहा है, बर्फ़ पिघल रही है। वो रुकेगा-रुकेगा, फिर क्या करेगा? फिर तोड़-फोड़ मचाएगा। या फिर जहाँ रुक रहा है वहाँ की चट्टान को वो घोल देगा। और जब घोल देगा तो क्या होगा? सबकुछ नीचे आ जाएगा।

सबकुछ इसलिए है क्योंकि हमें अध्यात्म से कोई मतलब नहीं। हमारे लिए धर्म का मतलब है एक प्रकार की संस्कृति। धर्म के नाम पर हम एक भोगवादी संस्कृति को बढ़ा रहे हैं बस! कल्चर , ये हमारा कल्चर (संस्कृति) है।

धर्म का मतलब कल्चर कब से हो गया, ये मुझे समझ में नहीं आ रहा लेकिन हर आदमी संस्कृति की बात कर रहा है। और संस्कृति माने क्या? वही तुम्हारी सड़ी-गली पिछले सौ, दो सौ साल की, गरीबी की, गुलामी की, अशिक्षा की, अज्ञान की भोगवादी संस्कृति। तुम्हें धर्म का मतलब संस्कृति ही निकालना है तो चलते हैं न ऋग्वैदिक काल में चलते हैं, तब की संस्कृति क्यों नहीं लाते? तुम्हें पिछले सौ, दो सौ साल की संस्कृति से ही क्या मतलब है?

तुम कह रहे हो, ‘नहीं, बस जो डेढ़-सौ साल पहले चलता था, संस्कृति मतलब खान-पान, व्यवहार, यही सब संस्कृति होता है। खान-पान, व्यवहार, तीज-त्यौहार, इनको मनाने का तरीका संस्कृति है।’ कहते हो, ‘डेढ़-सौ साल की जो संस्कृति थी पुरानी, वही आज भी चलानी है।’ डेढ़-सौ वर्ष पहले तुम्हारी हालत क्या थी? गुलामी की, गरीबी की, अज्ञान की, अशिक्षा की। मानो तुम कह रहे हो, ‘गरीबी, गुलामी, अज्ञान, अशिक्षा की जो संस्कृति है, वो आज भी चलाकर रखनी है।’

अगर अपनी मूल संस्कृति ही चलानी है तो हम चलते हैं न, पीछे चलते हैं, उपनिषदों के ऋषियों से पूछते हैं, ‘बताओ तुम्हारी संस्कृति कैसी है?’ वो चलाते हैं। पर उनकी संस्कृति देखकर के इनके होश उड़ जाएँगे संस्कृतिवादियों के, क्योंकि ऋषियों की जैसी संस्कृति है, तुम्हारी वैसी बिलकुल भी नहीं है। तुम झेल नहीं पाओगे ऋषियों की संस्कृति को।

ऋषियों की संस्कृति तो बहुत उदार है, बहुत खुली है। उन्मुक्त चिन्तन है वहाँ पर। क्षुद्र सीमाएँ नहीं हैं। वर्जनाएँ नहीं हैं, संकुचन नहीं है। संकीर्ण वृत्ति नहीं है वहाँ पर। ये सब संकीर्णताएँ, क्षुद्रताएँ, सीमाएँ ये तो अभी की हैं पिछले कुछ सौ सालों की।

और ये हमारे इतिहास के सबसे रुग्ण काल का प्रतीक है। हम अपनी रुग्णता को ही ढोते रहना चाहते हैं ये कहकर कि हमारी महान संस्कृति है। और वास्तव में जो कुछ आपके पास महान है अतीत का उससे आप बहुत डरते हो। अपनी महानता से आप पीछा छुड़ाते हो और अपनी बीमारी को आप ढोते रहना चाहते हो। ये कहाँ की समझदारी है?

अभी भी जो पूरा हो-हल्ला मच रहा है। वो इस पर मच रहा है कि जोशीमठ के पीड़ितों को अब बसाया कहाँ जाएगा, उनका रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) कैसे होगा, उनको मुआवज़ा कितना मिलेगा, और अगर सरकार उनको नये घर नहीं दे सकती है, जैसे टिहरी में हुआ था न, याद है? कितने लोग विस्थापित हुए थे! तो सरकार उनको नये घर नहीं दे सकती है तो किराया महीने का कितना मिलेगा? और वहाँ के लोग भी इसी बात को लेकर अभी सबसे ज़्यादा उद्विग्न हैं। मैं उनको दोष नहीं देता जिनके घर गये हैं। वो तो सबसे पहले यही पूछेंगे कि मेरा नया घर कहाँ है। लेकिन जो अपनेआप को बुद्धिजीवी, चिन्तक, विचारक बोलते हैं और ये जो पूरी मीडिया है, ये भी बस इसी बात को लेकर उड़ी हुई है कि जो हटेंगे उनका क्या होगा। वो भी जो मूल मुद्दा है, उसको नहीं उठा रही है, कि हमारी विकास की अन्धी परिभाषा और धार्मिकता की अहंकारी अवधारणा, अज्ञानी अवधारणा, ये दोनों मिलकर पूरी पृथ्वी पर कहर बरपा रहे हैं।

सन्तों ने इतना समझाया, इतना समझाया कि असली तीर्थ है आत्मस्नान। और आत्मस्नान यदि नहीं हो रहा है तो तुम गन्दे ही रह जाओगे।

मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए।

तुम कितना गंगा स्नान कर लो, भीतरी गन्दगी नहीं हट रही तो नहीं हट रही। अभी हमारी हालत ये है कि हम भीतरी गन्दगी और बढ़ा रहे हैं धर्म के नाम पर। और गंगा जी हमें क्या साफ़ करेंगी, हमने गंगा को गन्दा कर दिया। और समझाने वाले कह गये,

क्यों पानी में मल-मल नहावें, मन को मैल उतार पियारे।

गंगा गये होते मुक्ति नाहिं, सौ-सौ गोते खाइए। ~ कबीर साहब

लेकिन जब मन की मैल बचाकर रखनी होती है तो फिर हम गंगा को भी मैला कर देते हैं। और जब भीतर जानवर बैठा होता है न, तो हम पहाड़ों के, जंगलों के सारे जानवर काट डालते हैं। जब हम भीतर के पशु से मुक्त नहीं होते तो बाहर वाले जितने पशु होते हैं, उनके साथ बड़ा अत्याचार करते हैं। अगर मैं पुराणों की भाषा में बोलूँ तो जोशीमठ का धँसना एक दैवीय चेतावनी है, ‘सुधर जाओ, अभी भी रुक जाओ। तुम धर्म का जो रूप चला रहे हो उसमें बहुत पाप है, रुक जाओ। ये जो तुम कर रहे हो, ये धर्म नहीं है, पाप है।’ और अक्सर पाप धर्म का नाम लेकर ही किया जाता है।

कोई भी विधर्मी ये थोड़े ही बोलता है, ‘मैं पापी हूँ, अधर्मी हूँ।’ बोलता है क्या? वो भी अपनेआप को धर्मी ही बताता है। और हिमालय का जो ये पूरा क्षेत्र है, ये अर्थक्वेक-प्रोन (भूकम्प-प्रवृत) भी है। और एक बड़ा भूकम्प आना बाकी है। भूकम्प आने की सम्भावना हम बहुत-बहुत बढ़ा देते हैं जब हम पर्वतों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। और जब पहाड़ों पर भूकम्प आएगा न तो दिल्ली बच नहीं जाएगी। फिर दिल्ली अपना विकास अपनी जेब में रख ले; क्योंकि हिमालय से दिल्ली की सीधी-सीधी दूरी बहुत ज़्यादा नहीं है, मुश्किल से डेढ़ सौ-दो सौ किलोमीटर।

ये मेरे पास कुछ आँकड़े लेकर के आये हैं। (आँकड़े पढ़ते हुए) पिछले पाँच साल में उत्तराखंड में तीन-हज़ार प्रतिशत वृद्धि हुई है लैंडस्लाइड्स में। तीन-हज़ार प्रतिशत समझते हैं कितना होता है? सौ-प्रतिशत वृद्धि का मतलब होता है दूना हो जाना। कोई चीज़ यदि सौ-प्रतिशत बढ़ गयी माने दूनी हो गयी है। तो अब सोच लीजिए तीन-हज़ार प्रतिशत वृद्धि हुई है भूस्खलन के मामलों में पिछले पाँच सालों में, और पिछले ही पाँच सालों में हमारी धार्मिकता और खराब करी गयी है।

ये कोई संयोग भर नहीं है, पाँच साल का जो आँकड़ा है। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि उसका कारण है प्रदेश की डीन्यूडेड हिल्साइड। डीन्यूडेड माने पेड़ काटकर के जिनको नंगा कर दिया गया है, डीन्यूडेड! पेड़ों को काट-काटकर के पर्वतों को नंगा कर दिया गया है और तीन-हज़ार प्रतिशत वृद्धि हुई है लैंडस्लाइड्स में। और पिछले बीस सालों में चंडीगढ़ के कुल क्षेत्र से पाँच गुना ज़्यादा क्षेत्र के वन उत्तराखंड ने खो दिये हैं, पाँच-सौ स्क्वायर किलोमीटर। पाँच-सौ स्क्वायर किलोमीटर समझते हैं कितना होता है? लगा लीजिए कि एक वर्ग है लगभग बाईस किलोमीटर की साइड्स का, ए स्कवायर ऑफ़ साइड्स ट्वेंटी टू किलोमीटर्स। इतना होता है पाँच-सौ वर्ग किलोमीटर। बाईस किलोमीटर ऐसे चलते जाइए सीधे, नब्बे डिग्री मुड़िए, बाईस किलोमीटर ऐसे चलते जाइए (दाहिनी ओर), उतना एरिया ले लीजिए। उस पूरे एरिया में पेड़ थे, वन थे। वो सब काट दिये गए हैं। इतने पेड़ काटे गये हैं और ये बात आपको मीडिया बता रहा है क्या?

और इसके आर्टिकल का है — थ्री मन्थस बिफ़ोर पोल्स, उत्तराखंड गवर्नमेंट मेड माइनिंग इज़ीयर इन ए स्टेट ऑलरेडी डेवास्टेटेड बाय लैंडस्लाइड एंड डिफ़ॉरेस्टेशन (चुनाव से तीन महीने पहले उत्तराखंड सरकार ने भूस्खलन और वनों की कटाई से पहले से ही तबाह हुए राज्य में खनन को आसान बना दिया है), ताकि चुनाव में जीत मिल सके। चुनाव के लिए पैसा चाहिए होता है न, तो वहाँ पर माइनिंग माफ़िया होता है और ये सब होते हैं। तो उनसे पैसा लेने के लिए, चुनाव में जीत लेने के लिए चुनाव से तीन महीने पहले — उत्तराखंड गवर्नमेंट मेड माइनिंग इज़ीयर इन ए स्टेट रैवेज़्ड बाय लैंडस्लाइड एंड डिफ़ॉरेस्टेशन।

पिछले पाँच साल में सैंतीस पुल गिर चुके हैं उत्तराखंड में। गुजरात में एक गिरा था उससे बहुत शोर मचा था। यहाँ सैंतीस गिरे हैं। और इन सैंतीस के अलावा सत्ताईस और हैं जो गिरने को तैयार खड़े हैं।

लोकल्स एट्रिब्यूट द डिज़ास्टर अनब्राईडल्ड माईनिंग ऑफ़ सेंड फ़्रॉम रिवर्स, मेकिंग फ़्लड्स मोर डिवास्टेटिंग (स्थानीय लोग इस आपदा का कारण विपरीत दिशा से रेत के बेलगाम खनन को मानते हैं, जिससे बाढ़ और अधिक विनाशकारी हो गई है)। पैसा! पैसा! विकास!

सितम्बर २०२१ में, लैंड स्लाइड्स ट्रिगर्ड बाय पार्टिकुलरली हेवी रेन, ब्लॉक्ड एटलीस्ट हंड्रेड रोड्स अक्रॉस दी हिमालयन स्टेट। थाउज़ेंड ऑफ़ ट्रीज़ हैव बीन कट लूज़निंग व्हास्ट क्वांटिटी ऑफ़ मड अदरवाइज़ बाउंड बाय ट्री रूट्स (विशेष रूप से भारी बारिश के कारण हुए भूस्खलन ने हिमालयी राज्य में कम-से-कम सौ सड़कों को अवरुद्ध कर दिया, हज़ारों पेड़ काटे जा चुके हैं और भारी मात्रा में मिट्टी बह रही है जो कि पेड़ों की जड़ों से जकड़ी हुई थी)।

आप जब पेड़ काटते हो, पता है न क्या होता है? पेड़ो ने ही मिट्टी को पकड़ रखा होता है, पेड़ों ने ही पर्वतों को बचा रखा होता है। पेड़ गया नहीं कि वो मिट्टी ढीली हो गयी। अब उसको पकड़ने वाला जो एडीसिव (चिपचिपा) था, वो नहीं रहा तो जैसे ही उस पर पानी पड़ेगा वो बह जाएगी।

डिस्पाईट द इम्पैक्ट ऑफ़ माइनिंग ऑन रिवर्स पीपल इंफ्रास्ट्रक्चर इन एनवायरनमेंट द गवर्नमेंट रिलेक्स्ड रेगुलेशंस टू मेकिंग इज़ियर फ़ॉर माइनिंग कम्पनीज़ हु आर मेजर फंडर्स ऑफ़ पॉलिटिकल पार्टीज़ इन उत्तराखंड। (पर्यावरण में नदियों पर खनन के प्रभाव के बावजूद, सरकार ने खनन कम्पनियों की आसानी के लिए विनियमन में ढील दी जो उत्तराखंड में राजनीतिक दल के प्रमुख फंडर हैं।)

रिमाइनिंग होती है तो जो चीज़ माइन से निकली है, वो रेत हो चाहे वो मिनरल हो, उससे विकास होता है न और वही हमें चाहिए। द ग्लोरियस करण जौहर एनआरआइ मूवी। वही हमारा आदर्श है विकास-ही-विकास। और वहाँ हम सब नाच रहे हैं। पैसा-ही-पैसा है और शादियाँ हो रही हैं, एक के बाद एक और सब नाच रहे हैं, पैसा उछल रहा है।

द गवर्नमेंट नेग्लेक्टिड अड्रेसिंग द लॉन्ग स्टैंडिंग कंसर्न्स ऑफ़ इलीगल माइनिंग एक्टिविटीज़ एंड डाइल्यूटेड माइनिंग रेगुलेशंस बिफ़ोर द एंड ऑफ़ द टेन्योर टू सेव देयर सपोर्टर्स। (सरकार ने अवैध खनन गतिविधियों की लम्बे समय से चली आ रही चिन्ताओं को दूर करने की उपेक्षा की, और अपने समर्थकों को बचाने के लिए कार्यकाल समाप्त होने से पहले खनन नियमन को कमज़ोर कर दिया।)

ये आ रहा है सब टीवी चैनलों में? टीवी चैनल में तो ये आ रहा होगा कि ये देखिए, ये हैं साक्षी देवी, इनका घर टूट गया है। घर में इनकी बछिया बँधी थी, बताइए उसे लेकर कहाँ जाएँगी? और साक्षी देवी हाय-हाय! दहाड़े मारकर रो रही हैं और चलिए साक्षी देवी को सहायता दीजिए। इस लिंक पर डोनेट करिए। मूल बात है वो आपसे कोई बता रहा है? न कोई बता रहा है, न आप जानना चाहते हैं।

हम जैसे जी रहे हैं, हमने जैसे अपने आदर्श बना रखे हैं, उन्हीं की वजह से क्लाइमेट चेंज है, उन्हीं की वजह से डिफ़ॉरेस्टेशन (पेड़ों की कटाई) है, उन्हीं की वजह से पृथ्वी बिलकुल रसातल में जा रही है। जो हमारी फ़िलोसॉफ़ी ही है न लाइफ़ की, वो बिलकुल गलत है।

क्या है हमारी फ़िलोसॉफ़ी? हैप्पीनेस इज़ द परपज़ ऑफ़ लाइफ़ एंड हैप्पीनेस इज़ ऑब्टेंड थ्रू कंज़म्प्शन (सुख जीवन का उद्देश्य है और सुख भोग के द्वारा प्राप्त होती है), बस। ये कुल मिलाकर के दो पंक्तियों का सबका जीवन दर्शन है। हैप्पीनेस इज़ द परपज़ ऑफ़ लाइफ़ , सुख ही जीवन का उद्देश्य है और भोग के द्वारा सुख की प्राप्ति होती है। कुल मिलाकर ये हमारी दर्शन की किताब है — सुख जीवन का लक्ष्य है और सुख मिलता है पदार्थों को भोगने से। यही मूल कारण है कि सारी बर्बादी हो रही है।

अभी जो नियमों में वहाँ पर कुछ संशोधन किये गए हैं तो नियम और आसान बना दिये गए हैं। पर्वतों को बर्बाद करने के लिए एनवायरमेंटल क्लीयरेंस विल नो मोर बी रिक्वायर्ड फ़ॉर कंस्ट्रक्शन एक्टिविटीज़ लाइक लेवलिंग, वॉटर स्टोरेज, रीसाइक्लिंग फिशपोंड़ सेक्टर ऑन प्राइवेट लैंड एडजेसेंट टू द वेड ऑफ़ द रिवर ट्रिब्यूटरी और एस्टुअरी। (नदी के मुहाने के तल से सटी निजी भूमि पर जल भंडारण, पुनर्चक्रण, मछली, तालाब क्षेत्र को समतल करने जैसी निर्माण गतिविधियों के लिए अब पर्यावरण मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी)।

बिलकुल नदी के बगल में भी अगर आपको ये सब काम करने हैं तो खुलेआम कर सकते हैं, उसके लिए किसी प्रकार की अनुमति की भी आवश्यकता नहीं है। आगे चीज़ें और विस्तार में दी गयी हैं। ये सबकुछ उपलब्ध है। ये कोई पेड रिपोर्ट नहीं है, ये तो सब खुला हुआ है। आप गूगल करेंगे, आपको मिल जाएगा। पढ़ते नहीं हैं।

रिवर बेड माइनिंग मस्करेडिंग एज़ रिवर ट्रेनिंग और ड्रेसिंग इज़ द फ़ैक्टर कंट्रीब्यूटिंग टू द राइज़ इन कोलेप्सिस ऑफ़ ब्रिजेज़। सैंड होल्डर्स एंड मिनरल्स आर इम्पॉर्टेंट टू इंश्योर रिचार्ज ऑफ़ ग्राउंड वाटर टू कीप वाटर क्लीन एंड टू कीप इट फ़्लोइंग। रिवर बेड माइनिंग ऑबस्ट्रक्ट ऑल ऑफ़ दिस। फ़ॉर द लास्ट डिकेड थाउज़ेंड्स ऑफ़ फ्लैशलाइट्स क्लाउडबस्ड एंड लैंडस्लाइड्स हैव स्ट्रक द स्टेट किलिंग पीपल एंड कॉजिंग लार्ज स्केल इंफ्रास्ट्रक्चरल डैमेज। (नदी तल खनन नदी प्रशिक्षण या ड्रेजिंग के रूप में बहाना पुलों के ढहने में वृद्धि में योगदान करने वाला कारक है। पानी को साफ़ रखने और इसे प्रवाहित रखने के लिए भूजल के पुनर्भरण को सुनिश्चित करने के लिए रेत धारक और खनिज महत्वपूर्ण हैं। नदी किनारे उत्खनन का होना इस सब में बाधा डालता है। पिछले एक दशक में अचानक हज़ारों बाढ़, बादल फटने और भूस्खलन से राज्य में लोगों की मौत हुई है और बड़े पैमाने पर ढाँचागत क्षति हुई है।)

इस पूरी चीज़ में वैसे! (स्वयंसेवी को सम्बोधित करते हुए) वो जो कल जो एक कमेंट आया था उत्तराखंड से वो दीजिएगा। जो उत्तराखंड के निवासी हैं, उनका भी कुछ कम योगदान नहीं है। देवभूमि है, पुण्य भूमि है लेकिन अज्ञान और अन्धविश्वास से बिलकुल भरी हुई है।

अगर स्थानीय निवासी एकजुट हो जाएँ कि वो सबकुछ नहीं होने देंगे जो विकास के नाम पर हो रहा है तो ये हो नहीं सकता। लेकिन वहाँ पर भी टीवी पहुँच गया न पच्चीस-तीस साल पहले। तो वहाँ भी सबको पैसा चाहिए, और पैसा चाहिए! तो भी कहते हैं, ‘होता रहें।’ देखिए, अध्यात्म जहाँ नहीं होगा वहाँ पर एक ही चीज़ होगी जो हमें चाहिए। क्या? भौतिक सुख, और अनन्त भौतिक सुख। भौतिक आवश्यकताएँ सबकी होती हैं बिलकुल होती हैं, आपकी हैं, मेरी हैं, सबकी होती हैं। भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करना एक बात होती है और भौतिक सुखों को ही जीवन का परम लक्ष्य बना लेना बिलकुल दूसरी बात होती है।

ये सन्देश कल उत्तराखंड से आया है। एक सज्जन हैं उन्होंने लिखा है, ये कमेंट है, ये सार्वजनिक ही है, यूट्यूब पर पड़ा हुआ है। उसको पढ़ देता हूँ — ‘मैं उत्तराखंड में पैदा हुआ था। स्वाभाविक ही है कि मेरे आस-पास माँसाहार ही चलता था और चलता ही है, किन्तु जानवरों के लिए करुणावश मैंने माँस छोड़ दिया था। पर नौवीं कक्षा में मेरे अध्यापक ने मुझसे कहा कि जान तो पौधों की भी जाती ही है तो ये तर्क सुनकर मैंने फिर से माँसाहार शुरू कर दिया। कक्षा ग्यारहवीं में मेरे सामने मैंने देखा माँस की दुकान पर एक मुर्गे को बड़ी बेदर्दी से मारा गया। पहले उसके पैर काटे गये, फिर सिर। और जब वो तड़पकर मर गया तो उसकी खाल खींचकर काट दिया। उसे अन्य मुर्गे देख रहे थे, उनमें भय छाया हुआ था। मैं फिर भी नीच विचारों की आड़ में ये सब देखकर भी चुपचाप बैठा था, और वहाँ से मुर्गे की जगह मछली का माँस खरीदकर घर ले गया। लेकिन बारहवीं के बाद जीवन की दिशा तय करते समय जब मैं तमाम दिशाओं में सोचने लगा तो मन हर बार किसी भी दिशा में थोड़ा आगे सोचकर बढ़ने से इनकार कर देता। निश्चित हो गया कि मन पुरानी दिशाओं में ज़्यादा दिनों तक रमेगा नहीं। फिर क्या करणीय है, क्या करूँ, तब मैंने यूट्यूब में जीवन के बारे में खोजना शुरू किया।

पहली बार फिर मैंने उत्तर जी को सुना। उस वक्त मैं जितना भी समझा जीवन की गाड़ी आगे को चल पड़ी थी, फिर मेरा माँस छूट गया। कुछ दिनों बाद दूध भी छूट गया। फिर मन्दिर के लिए फूल भी जो खुद ही भूमि पर गिर गये हैं, वो जाने लगे। फिर खाये हुए फलों के बीजों को भी मैं अलग-अलग जगह फेंकने लगा और कुछ को तो बोने भी लगा। फिर सूक्ष्मजीवों के जीवन को ध्यान में रखते हुए भी अपने चुनाव बदलने लग गया और अब ये सोचता हूँ कि ये सबकुछ करने वाली पहले भी प्रकृति थी, अब कोई और है।

माँस भक्षण मेरे क्षेत्र में बहुत होता है। ये पर्यटन क्षेत्र है। लोग यहाँ आते हैं, घूमते हैं। उनमें से अधिकांश धुएँ, शराब और माँस का मज़ा लेकर चले जाते हैं, किन्तु मरे जानवरों की लाशें, भय, चीख, दर्द, जीवन, कुछ भी नहीं बचता। ये गोलू देवता के नाम पर मुर्गी और बकरी की बलि देते हैं जिसमें बस ये होता है कि काटकर चढ़ावे की नौटंकी करके खुद ही खा जाते हैं। जबकि इनमें थोड़ी भी शर्म होती तो ये गोलू देवता के साथ ऐसा नहीं करते क्योंकि गोलू देवता इसी क्षेत्र में भैंसे चराते थे, और उनका भैंसों के साथ प्रेमपूर्ण सम्बन्ध था।

यहाँ तक कि उनके शत्रु ने भी उन्हें मारने के लिए भैंसों को मोहरा बनाया और जब गोलू देवता भैंस को बचाने लगे तो उनके शत्रु ने छल से उनकी गर्दन पर वार किया। फिर गोलू देवता ने अपनी गर्दन के रक्तस्त्राव पर कपड़ा बाँधकर खून को रोककर उस शत्रु को मारा और फिर उनके अन्तिम क्षण उन्हीं भैंसों के साथ अत्यन्त करुणामय तरीके से व्यतीत हुए। पर ठीक उसी जगह पर जहाँ कभी प्रेम और करुणा की रसधार फूटी थी और गोलू देवता की वंशी का संगीत बहता था, लोग आज निर्दोष पशुओं की जीवनधारा समाप्त करते हैं। करुणा और प्रेम की रसधार बहाने के स्थान पर उसी जगह पशुओं की रक्तधार बहाते हैं।’ अन्त में आखिरी बात कही है कि चैतन्यता ही बोध ला सकती है।

तो अध्यात्म स्थानीय लोगों में भी नहीं। देवभूमि है पर अन्धविश्वास कूट-कूटकर भरा हुआ है, अध्यात्म नहीं है। और अध्यात्म उनमें भी नहीं जो देहरादून में बैठे हैं कि दिल्ली में बैठे हैं, न स्थानीय लोगों में, न राजधानियों में बैठे हुए आकाओं में। तो बताइए कौन बचाएगा फिर प्रकृति को और पर्वतों को?

ऋषियों ने ऐसे ही पर्वतों को, विशेषकर हिमालय को और हिमालय में भी विशेषकर उत्तराखंड को अपना घर नहीं बनाया था। देवभूमि कहते हैं, उसके पीछे कारण है और बहुत ठोस कारण है, वहाँ है विशिष्टता! और इसीलिए अहंकार उस जगह से इतना ज़्यादा चिढ़ता है। इसीलिए उस जगह को सबसे ज़्यादा बर्बाद किया जा रहा है, क्योंकि अगर वो जगह है तो उस जगह से सम्बन्धित प्रतीक भी बचे रहेंगे, और जो प्रतीक हैं वो अहंकार के लिए घातक हैं। ये आप छुपी हुई बात देख पा रहे हैं?

अगर पुण्य भूमि है उत्तराखंड और पुण्य को ही समाप्त करना है तो किसको समाप्त करना पड़ेगा? उत्तराखंड को समाप्त करना पड़ेगा। इसलिए उत्तराखंड हर तरीके से समाप्त किया जा रहा है — स्थूल तरीके से भी और सूक्ष्म तरीके से भी, प्राकृतिक तरीके से भी और मानसिक तरीके से भी। वहाँ बाहर-बाहर जो प्रकृति है वो भी बर्बाद हो और वहाँ लोगों का जो मन है, वो मन भी बर्बाद हो। दोनों तरीकों से उस जगह को बर्बाद किया जा रहा है।

सनातन धर्म की स्थिति क्या चल रही है उसको जाँचने के लिए, नापने के लिए एक अच्छा पैमाना सदा ये रहेगा कि उत्तराखंड की स्थिति क्या चल रही है और गंगोत्री, यमुनोत्री और गंगा की स्थिति क्या चल रही है। जितना दूषित सनातन धर्म होता जाएगा, उतनी दूषित हमारी नदियाँ होती जाएँगी। जितनी ध्वस्त सनातन धर्म की इमारत होती जाएगी, उतने ही ध्वस्त उत्तराखंड के पर्वत होते जाएँगे। तो सनातन धर्म की हालत क्या चल रही है, इसको कभी भी नापना हो तो वहाँ जाकर के पर्वतों को, नदियों को और पर्वतों के निवासियों को देख लीजिएगा। जो उनकी दशा है, वही पूरे सनातन की दशा है।

आप समझ रहे हैं, जोशीमठ नहीं धँस रहा, क्या धँस रहा है? सनातन धर्म धँस रहा है। सनातन धर्म से मेरा आशय सामुदायिक, साम्प्रदायिक इत्यादि नहीं है। सनातन धर्म, धर्म मात्र ही धँस रहा है। एसेंशियल रिलीजियोसिटी वही खत्म हो रही है, धँस रही है। ज़मीन का धँसना मत मान लीजिएगा उसको। वो हमारा धँसना है। हम पाताल में जा रहे हैं, धँस रहे हैं।

प्रश्न: सर, इसी विषय में एक बात और जोड़नी थी कि अक्सर जब इस तरह से बात की जाती है कि किस तरीके से प्रकृति का शोषण हो रहा है, पहाड़ों में तो ये कह दिया जाता है कि चीन से भारत को खतरा है और उत्तराखंड का बॉर्डर चीन से जुड़ता है। तो इसलिए उत्तराखंड में अच्छी सड़कें और सब चीज़ें डिफेंस के लिए बहुत ज़रूरी हैं।

उत्तर: डिफेंस ने साफ़ मना करा है, जब ये सब विनाश का कार्यक्रम शुरू कराया गया था विकास के नाम पर, तो उसको जस्टिफाइ करने के लिए देश की रक्षा का बहाना बताया गया था कि साहब, अगर सड़क चौड़ी नहीं की गयी तो आर्मी जल्दी से चीन वाली सीमा पर नहीं पहुँच पाएगी। तो आर्मी चीफ़ ने तत्काल कहा था कि माफ़ करिएगा आर्मी के पास अपने तरीके हैं, हम खट् से पहुँच जाएँगे। हमारे लिए इन सड़कों की कोई ज़रूरत नहीं है। आर्मी चीफ़ खुद मना कर चुके हैं। मेरे खयाल से शायद तब विपिन रावत थे, उन्होंने कहा था।

आर्मी वाली बात नहीं है ये, ये कुल मिलाकर के वही है — द एनआरआइ ड्रीम! ‘मेरा तीर्थ है न! तो बिलकुल फ़ाइव स्टार तीर्थ होना चाहिए। खट् से गाड़ी निकले दिल्ली से और खट् से सीधे केदारनाथ में खड़ी हो जाए साँय-साँय!’ वहाँ तो अभी आवश्यकता ये है कि जो रिलीजियस टूरिज़्म (धार्मिक पर्यटन) भी होता है, उसको भी रेगुलेट किया जाए। कौनसा ये सब-के-सब वहाँ पर जा रहे हैं महादेव के प्रेम में? ज़्यादातर लोगों को तो शिवत्व का कुछ पता भी नहीं है। ये तो वहाँ पर जाते हैं बॉक्स को टिक करने कि हाँ भाई, तीर्थ भी कर लिया। अब उसकी फ़ोटो लेंगे, फ़ेसबुक पर लगाएँगे और शेखी बघारेंगे कि मैं तो होकर आया हूँ अभी-अभी बद्री, केदार।

जिनकी ज़िन्दगी में शिव कहीं नहीं है, वो पहाड़ पर चलकर शिव को पा जाएँगे क्या? उन्हें शिव से कोई प्रेम भी है? खच्चर, घोड़े पर अत्याचार करके तुम वहाँ तक जाते हो, ये पशुपति के प्रेम का प्रतीक है या पशुओं पर अत्याचार? ये तो जो चार धाम टूरिज़्म है, ये रेगुलेट होना चाहिए। चार-चार महीने की वेटिंग लगनी चाहिए ताकि वही लोग जाएँ जो सचमुच गम्भीर हों। ऐसे नहीं कि किसी ने भी मुँह उठाया और बोला, ‘चलो, डार्लिंग हनीमून मनाने ऊपर चलते हैं पहाड़ों पर! यहाँ गर्मी बहुत हो रही है, क्लाइमेट चेंज हो गया है, चार डिग्री औसत से ज़्यादा तापमान है, दिल्ली में। चलो केदारनाथ चलते हैं, मज़ा आएगा। केदारनाथ के रास्ते में और भी सब चीज़ें हैं, उनके भी मज़े लेते हुए चलेंगे। पहले ऋषिकेश रुकेंगे, फिर कान्हा ताल है उसमें रुकेंगे। केदारनाथ के पास चोपटा है, वहाँ मज़े मारेंगे। चलो डार्लिंग!’

चार-चार, छः-छः महीने की वेटिंग लगे और एकदम सीमित संख्या में वाहनों को जाने दिया जाए। एक-से-एक बड़े माँसाहारी, अत्याचारी, भ्रष्टाचारी, ये वहाँ चढ़े जा रहे हैं पर्वत पर। इनके पाप नहीं साफ़ होंगे पर्वत पर चढ़कर। हाँ, पर्वत ज़रूर गन्दा हो जाएगा इनके चढ़ने से।

ये मत करो कि सड़क इतनी चौड़ी कर दी है कि ज़माने भर की गाड़ियाँ पर्वत पर चढ़ जाएँ। सड़क तो और पतली रखो ताकि वही जाए जो सचमुच जाने लायक हैं, जिनमें इतना संयम है, इतनी पात्रता है और इतना प्रेम है कि वो कहेंगे कि हम इन्तज़ार करेंगे। ‘मेरा नम्बर छः महीने बाद भी आएगा तो भी मैं प्रतीक्षा करूँगा। मैं तब जाऊँगा।’

ऐसा थोड़े ही है कि गुड़गाँव के रईस हैं और उठायी अपनी फ़ॉर्च्यूनर और चढ़ गये झट से वहाँ पर और बहुत खुश हुए कि वाह! रोड अब कितनी चौड़ी हो गयी है, मज़ा आ रहा है। बीच-बीच में चिकन टिक्का भी मिल रहा है। गलत बोल रहा हूँ तो बताइए?

पहाड़ों पर प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण कौन लोग हैं? क्या स्थानीय निवासी? क्या स्थानीय निवासी पहाड़ों को गन्दा करते हैं? नहीं। स्थानीयों में तो फिर भी पर्वत के प्रति कुछ प्रेम होता है। पर्वतों को बर्बाद तो ये पर्यटक करते हैं और इन्हीं पर्यटकों को और ज़्यादा, और ज़्यादा वहाँ बुला रहे हो। काहे के लिए भाई? कहेंगे, ‘अर्थव्यवस्था के लिए।’ पहाड़ों के लोगों को भी तो पैसा मिलना चाहिए, तो एक काम कर लो, पहाड़ों के लोगों को सब्सिडाइज़ कर दो, वो कहीं बेहतर है। उन्हें सौ तरह की सब्सिडीज़ दे दो।

अगर आप यही चाहते हो कि पहाड़ के लोगों के हाथ में कुछ पैसा आये। तो उसके लिए पहाड़ को क्यों बर्बाद कर रहे हो? पहाड़ के लोगों को सब्सिडी दो। बहुत अच्छी बात है, पूरा देश तैयार हो जाएगा। भाई, पूरा देश जो टैक्स भरता है, उसका आधे से ज़्यादा तो तुम खा जाते हो अपने भ्रष्टाचार में। ठीक? हमारा-आपका जो टैक्स जाता है, आपको क्या लग रहा है, वो विकास के कार्यों पर खर्च होता है? हमारा-आपका टैक्स तो यही खा जाते हैं सब नेता और ब्यूरोक्रेट्स (नौकरशाह)।

तुम्हें पहाड़ों की इतनी ही चिन्ता है तो जो हम टैक्स देते हैं, उसी टैक्स का इस्तेमाल करके पहाड़ के लोगों को सब्सिडी दे दो। उनकी ज़िन्दगी बेहतर हो जाएगी आर्थिक रूप से भी। लेकिन पहाड़ क्यों बर्बाद कर रहे हो?

ये इतनी अजीब बात है, एक विदेशी आता है जब हमारे पर्वतों पर तो वो विदेश में माँसाहार करता होगा, भारत आकर के कहता है, ‘नहीं, माँसाहार छोड़ दो। मैं पशु क्रूरता के उत्पाद माने दूध, पनीर वगैरह भी नहीं छूऊँगा।’ ये विदेशियों का हाल रहता है। वो यहाँ पर साधारण कपड़े पहनकर घूमते हैं, अपने देश वाले नहीं। वहीं ऋषिकेश से दो सौ, चार सौ रुपये का कुर्ता खरीद लेंगे, वही डाल लेंगे। वही पहन कर अपना घूम रहे हैं। एक फटी चप्पल में अपना मज़े कर रहे हैं। और जब देसी आदमी पहाड़ों पर जाता है तो वहाँ बकरा चबाता है। वो कहता है, ‘हम पहाड़ पर आये किसलिए हैं? बीयर और बार्बी क्यू!’

विदेशी माँसाहारी है पर वो पहाड़ पर आकर हो जाता है शाकाहारी, और देसी अपने घर में भले शाकाहारी होगा लेकिन पहाड़ पर चलकर हो जाता है बलात्कारी, एकदम पूर्ण माँसाहारी। ये हमारी महान संस्कृति है! वो इसलिए क्योंकि संस्कृति में अध्यात्म कहीं नहीं है, बस संस्कृति भर है। ‘मिठ्ठू, बोलो राम-राम!’ तो मिट्ठू राम-राम बोल रहा है। तोता रटन्त संस्कृति।

क्या है ये? (पुनः आँकड़ों को देखते हुए) तो जब ये सब तोड़-फोड़ हुई थी और उसमें जो बहाना बताया गया था आर्मी का कि ये तो देश की रक्षा के लिए की जा रही है, तो भारतीय सेना की ओर से वक्तव्य आया था। मैं बिलकुल वैसे ही पढ़ देता हूँ, विदिन कोट्स , ‘इंडियन आर्मी रिलेक्टेंटली फ़ॉलोइंग पॉलीटिकल इस्टेब्लिशमेंट।’ ये है विदिन कोट्स। ’सीनियर एडवोकेट कॉलिंग गोंसाल्वेस रिप्रेजेंटिंग द इंडियन आर्मी टोल्ड द सुप्रीम कोर्ट दैट द इंडियन आर्मी वॉज़ ओनली फ़ॉलोइंग द पॉलिटिकल एस्टेब्लिशमेंट विम्स।’ विम्स माने सनक। सनक है। विकास है ये! विकास! ’एंड इट वाज़ ऑलरेडी हैप्पी विद एक्ज़िस्टिंग रोड्स दैट कनेक्ट द पिलग्रिम्स टू द चारधाम।’ (भारतीय सेना अनिच्छा से राजनीतिक प्रतिष्ठान का पालन कर रही है। भारतीय सेना का प्रतिनिधित्व करने वाले गोंसाल्वेस को बुलाने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि भारतीय सेना केवल राजनीतिक प्रतिष्ठान की इच्छा का पालन कर रही थी और तीर्थयात्रियों को चार धाम से जोड़ने वाली सड़कों की स्थापना से पहले से ही खुश थी।)

ये रोड इंडियन आर्मी के लिए नहीं है। ये रोड हैं इंडियन प्राइड्स को शो केस करने के लिए। सारा खेल ही वही है, प्राइड! प्राइड माने अहंकार, ‘हम भी तो कुछ हैं। ये देखो, बड़ी-बड़ी चीज़ें हमारी भी देखो!’ और जो हम बड़ी-बड़ी चीज़ें दिखाएँगे तो लोग वैसे ही इम्प्रेस (प्रभावित) हो जाएँगे जैसे करण जौहर और सूरज बड़जात्या की फ़िल्में देखकर इम्प्रेस होते हैं, और फिर हमको मिलेगा वोट। हम बोलेंगे, ‘देखो, हमने क्या-क्या बड़ी चीज़ें की हैं, तुम्हारे प्राइड को बढ़ाने के लिए!’

अभी आर्मी ने क्या कहा है सुनिएगा। (रिपोर्ट पढ़ते हुए) आर्मी कह रही है, ’गोंसाल्वेस टोल्ड अ ए बेंच ऑफ़ जस्टिसेज डीवाइ चंद्रचूड़, सूर्यकांत एंड विक्रमनाथ दैट द प्रोजेक्ट’ — कौनसे प्रोजेक्ट? ये जो रोड वाइडनिंग प्रोजेक्ट है’ — दैट द प्रोजेक्ट वॉज़ टेकिंग प्लेस बिकॉज़ इन टू-थाउज़ेंड-सिक्स्टीन, द ‘चारधाम परियोजना’ वॉज़ डिक्लेयर्ड व्हिच इन्क्लुडेड कंस्ट्रक्शन ऑफ़ हाईवेज़ ऑन द माउंटेंस।’ (‘गोंसाल्वेस ने जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, सूर्यकांत और विक्रमनाथ की बेंच को बताया; दो-हज़ार-सोलह में चारधाम परियोजना की घोषणा की गयी थी जिसमें पहाड़ों पर राजमार्गों का निर्माण शामिल था।’)

नाउ विदिन कोट्स, व्हाट इज़ द आर्मी काउंसलिंग सेइंग, विदिन कोट्स (क्या कह रही है सेना की काउंसलिंग) — ‘दिस विल इनेबल एसयूवीज़ टू रेस अप एंड डाउन द माउंटेन। दिस कम्स एट द टेरिबल कोस्ट एंड इट नीड्स टू बी वेड।’ (‘इससे एसयूवी पहाड़ के ऊपर और नीचे दौड़ने में सक्षम होगी। उन्होंने कहा कि ये एक भयानक कीमत पर आता है और इसे तौलने की ज़रूरत है।’)

ये आर्मी ने कहा है कि ये आर्मी के लिए नहीं बन रहा है, ये बन रहा है एसयूवीज़ के लिए। ‘सनासन-सनासन मौज मारी जाए! और एसयूवीज़ का मतलब आम आदमी भी नहीं होता। एसयूवी का मतलब आर्मी तो होता ही नहीं है, एसयूवी का मतलब आदमी भी नहीं होता, एसयूवी का मतलब होता है एनआरआइ। वही ’द एनआरआइ ड्रीम।’ एनआरआइ मतलब देसी एनआरआइ भी शामिल है उसमें, गुडगाँव वाला एनआरआइ। और वो एनआरआइ बहुत ज़रूरी है, क्योंकि वही फ़ंडिंग करता है न! वही है जो हिंदू प्राइड का बादशाह है और वही फ़ंडिंग भी करता है। तो ये सारा विध्वंस उसके लिए किया जा रहा है, आपके और हमारे लिए भी नहीं है ये। आर्मी के लिए भी नहीं है, आम आदमी के लिए भी नहीं है।

जोशीमठ यूँही नहीं धँस रहा। समझ में आ रही है बात ये? आगे आर्मी के काउंसिल का वक्तव्य है, ’कैन द हिमालयाज़ अलाउ ह्यूमनबींग्स टू डू थिंग्स दैट दे वांट टू डू?’ ‘आप जो कुछ भी करना चाहते हो, क्या हिमालय अनुमति देंगे आपको करने की?’

अब बिपिन रावत का वक्तव्य है, बिपिन रावत खुद उत्तराखंडी थे, ‘वी द आर्मी हैप्पी विद द रोड एज़ दे आर (सेना इन रास्तों से खुश है)। हमें नहीं चाहिए।’

ये हो रहा है — दिल्ली, चंडीगढ़, गुड़गाँव बाकी जितनी जगहों पर। एसयूवी, एनआरआइ मामला है, उसके लिए चल रहा है। ताकि आप कह सकें, ‘हम भी तो कुछ हैं!’

जीडीपी का एनवायरनमेंट कॉस्ट जानते हो?

उत्तर: दो-सौ-अस्सी पीपीएम से बढ़कर कार्बन डाइऑक्साइड साढ़े-चार-सौ पीपीएम हो गयी है। ये मटीरियल बात है न बिलकुल? इसकी कोई अकाउंटिंग होती है किसी कम्पनी की बैलेंसशीट में, या किसी नेशन के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में?

आपने जो तरक्की करी उस तरक्की में आपने इतना कार्बन वातावरण में उत्सर्जित कर दिया। पर आप जब अपना जीडीपी बताते हो कि मेरा जीडीपी इतना हो गया है और इतने प्रतिशत की उसमें बढ़ोतरी है, उसमें कहीं बताते हो कि उसकी एनवॉयरमेंटल कॉस्ट (वातावरणीय लागत) क्या है? नहीं बताते न?

आप कहते हो, ‘मैंने ये कर लिया।’ बाज़ार में इतनी सारी चीज़ें आ गयी हैं। ये आ गया बाज़ार में (पानी का गिलास दिखाते हुए)। आप जब इसकी कीमत देते हो बाज़ार में, उसमें कहीं आपसे पूछा जाता है कि इसको बनाने में जितना आपने दुनिया को बर्बाद करा है उसका भी तो टैक्स दे दो? जबकि इसकी कीमत में दुनिया की बर्बादी शामिल है, या नहीं शामिल है? और मैं दुनिया की इंटेंजिबल (अदृश्य) बर्बादी की, आन्तरिक बर्बादी की बात नहीं कर रहा, मैं मटीरियल डिप्लीशन (भौतिक ह्रास) की बात कर रहा हूँ। हम क्या उन मटीरियल कॉस्ट्स की भी अकाउंटिंग कर रहे हैं?

तो एक तो ये बात हुई कि आप जो ये पूरी व्यवस्था चला रहे हो, वो नीचे से क्या लेती है? रॉ मटीरियल (कच्चा माल)। रॉ मटीरियल की आप कोई अकाउंटिंग कर ही नहीं रहें। पृथ्वी को आपने पूरा खत्म कर दिया। आम आदमी की कामनाओं को पूरा करने के लिए क्या पृथ्वी के पास संसाधन है?

श्रोता: हाँ।

उत्तर: नहीं हैं। अरे! कहाँ से है?

श्रोता: माने जो जीने के लिए चाहिए, वो है।

उत्तर: आपके पास है। जितने लोग हैं दुनिया में, सब आपके ही स्तर पर जीना शुरू कर दें तो दस पृथ्वियाँ चाहिए होंगी। आबादी की भी बात नहीं है, हमारा एक स्टैंडर्ड ऑफ़ लिविंग (जीवन स्तर) है, स्टैंडर्ड ऑफ़ कंज़म्प्शन (उपभोग स्तर) है जो कि औसत से बहुत ऊपर का है।

हम यहाँ जो बैठे हैं, भारत में ही हम औसत से बहुत ऊपर का कंज़म्प्शन करते हैं। भारत की पूरी आबादी सिर्फ़ उतना कंज़म्प्शन शुरू कर दे जितना कि हम लोग करते हैं, तो क्या पृथ्वी के पास उतना संसाधन है? और भारत की आबादी प्रति व्यक्ति उतना कंज़म्प्शन शुरू कर दे जितना औसत एक अमेरिका का व्यक्ति करता है, तो सत्रह पृथ्वियाँ चाहिए होंगी। तो आप जो अपनी कम्पनी चला रहे हो ’द ह्यूमन कम्पनी’ , उसको तो रॉ मटीरियल की सप्लाइ (आपूर्ति) ही नहीं हो सकती, क्योंकि एक के बाद दूसरी पृथ्वी तो है नहीं कोई आपके पास, आप रॉ मटीरियल कहाँ से लाओगे अपनी कम्पनी चलाने के लिए?

तो पहली बात तो रॉ मटीरियल नहीं है। दूसरी बात, जो आउटपुट निकल रहा है उसमें आपका जो डिज़ायर्ड गोल था, वो था बेचैनी से मुक्ति, वो तो मिली ही नहीं। इनपुट के तौर पर आप सब खा गये और आउटपुट आपका कुछ निकला नहीं।

ये जो हमने मशीन बनायी है द ह्यूमन मशीन , द ह्यूमन कम्पनी , वो एक ऐसी मशीन है जो सारी मटीरियल चीज़ें खाये जा रही है। सब नष्ट कर दिया — जंगल खा गयी, सारे संसाधन खा गयी, मिनरल्स खा गयी, जानवर खा गयी, सब खा गयी, समुद्रों को खा लिया, पहाड़ों को खा लिया, नदियों को खा लिया। जो कुछ भी मटीरियल था, सब खा लिया हमारी ह्यूमन मशीन ने। आउटपुट क्या दिया है? और ज़्यादा बेचैनी।

हम कितने स्मार्ट लोग हैं! इनपुट में क्या करा? पूरी पृथ्वी को खा लिया। यही करा है न हमारी ह्यूमन मशीन ने पिछले दस हज़ार साल में कि सारा रॉ मटीरियल खा लिया और बर्बाद कर दिया सब। कुछ नहीं छोड़ा, रेत तक खा गयी। नदी किनारे की रेत तक हमने खा ली। ठीक? कुछ नहीं छोड़ा। और आउटपुट में हमें चाहिए क्या था? कि यार, थोड़ा चैन मिल जाए, वो भी नहीं मिला। ज़बरदस्त लोग हैं कि नहीं?

श्रोता: और बेचैन हो गये। और हम ज़्यादा एम्बिशियस (महत्वाकांक्षी) ही होते जा रहे हैं।

उत्तर: और हमारी एम्बिशन (महत्वाकांक्षा) को पूरा करने के लिए पृथ्वी के पास संसाधन ही नहीं है, एम्बिशन होगी कहाँ से पूरी! और वो सारे संसाधन आप खा भी लें मान लीजिए, कर लीजिए इस्तेमाल सारे संसाधनों का, तो भी क्या वो एम्बिशन पूरी हो पाती है? जिन्होंने सारे संसाधनों का उपभोग कर डाला, उनको कितना चैन मिल गया है? और ऐसा नहीं है कि वो चैन मिल नहीं सकता। एक रिटोरिकल (शब्दाडम्बर) बात नहीं है कि चैन तो साहब, ऐसी चीज़ है किसी को मयस्सर नहीं होता। हम शायरी नहीं कर रहे हैं। चैन मिल सकता है। बस, वैसे नहीं मिल सकता जैसे हमने सोचा है कि मिलेगा।

श्रोता: जैसे अब तक करते आये हैं।

उत्तर: जैसे अब तक करते आये हैं बिलकुल। ये तो चुनाव की बात है कि सचमुच चाहिए कि नहीं।

पर्यावरण की समस्या का मूल कारण

प्रश्नकर्ता: प्रशान्त जी, मैं जब कभी गाड़ियों में से धुआँ निकलता पाता हूँ तो मन बेचैन हो जाता है। चिट्ठियाँ भी लिखीं, आरटीआइ फ़ाइल की, लेकिन कुछ खास उससे हुआ नहीं। जब जानते हैं कि इसमें हम ज़्यादा कुछ कर नहीं सकते तो मन को कैसे मनायें, कैसे उसे डाइवर्ट किया जाए इस दुख से?

उत्तर: देखो, इन सारी समस्याओं का जो मूल कारण है, वो आदमी की हवस है बने रहने की और बने-बने भोगते रहने की। बने रहने की हवस के कारण आदमी ज़्यादा-से-ज़्यादा जी रहा है, और अपने बाद अपने पीछे बच्चे छोड़कर जा रहा है। भोगने की हवस के कारण आदमी अधिक-से-अधिक उपभोग कर रहा है।

समाधान तो बहुत सरल है, ज़्यादा नहीं, अगले बीस साल यदि बच्चे नहीं पैदा हों, तो सब ठीक हो जाएगा, क्योंकि लोग जा तो रहे ही हैं, जाना तो रुक नहीं जाएगा। बीस साल बस दुनिया की आबादी में बच्चे जुड़े नहीं — पर्यावरण भी ठीक हो जाएगा, हवा भी ठीक हो जाएगी, जंगल-पहाड़ भी ठीक हो जाएँगे, समुद्र भी ठीक हो जाएँगे, पशु-पक्षी ठीक हो जाएँगे, सब ठीक हो जाएगा। बीस साल बस दुनिया की आबादी मत बढ़ाओ। और मन अगर ऐसा हो गया कि आबादी मत बढ़ाओ, तो मन फिर ऐसा भी हो जाएगा जो उपभोग नहीं कर रहा है, क्योंकि आबादी को बढ़ाने की इच्छा और ज़्यादा-से-ज़्यादा उपभोग की इच्छा, दोनों निकलते एक ही स्त्रोत से हैं।

तो या तो तुम बहुत लम्बा-चौड़ा रास्ता ले सकते हो कि पर्यावरण बचाने की मुहिम चलाओ, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन कराओ, अन्तर्राष्ट्रीय समझौता कराओ। फिर वैसे समझौते न जाने कितने हुए, उनका कोई पालन नहीं करता। कम्पनियाँ तो चलें पर वो अपना कार्बन फ़ुटप्रिंट नापें, उनकी कार्बन रेटिंग हो और तमाम तरह के काम हो। ये तमाम तरह के काम होते रहें और एक जो सीधा-सीधा काम है, वो न किया जाए।

दुनिया की सारी समस्या बस एक वजह से है — हम न सिर्फ़ अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं बल्कि प्रति व्यक्ति उपभोग भी बढ़ाये ही जा रहे हैं। तो आज अगर दस लोग हैं और इन दस लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति दो-दो इकाई का उपभोग करता है, दो-दो इकाई संसाधन का उपभोग करता है तो कुल उपभोग कितना हुआ? बीस इकाई। कल ये दस के पन्द्रह लोग हो जाते हैं और ये दो-दो इकाई प्रति व्यक्ति उपभोग करने की जगह चार-चार इकाई का उपभोग करते हैं, इसी को तो तुम विकास कहते हो न कि विकास आ रहा है।

पहले हम जितनी बिजली इस्तेमाल करते थे, अब उससे चार गुनी कर रहे हैं; पहले हम जितना पेट्रोल फूँकते थे, अब उससे दस गुना फूँक रहे हैं — इसी को तो तुम जीडीपी कहते हो। जीडीपी का और क्या अर्थ होता है! परेशान हो जाते हो, ‘जीडीपी नहीं बढ़ रहा, जीडीपी नहीं बढ़ रहा।’ जीडीपी का और क्या अर्थ होता है? जीडीपी का यही तो अर्थ होता है — तुम फूँक रहे हो, तुम जला रहे हो। तो वो बीस अब कितना हो गया? पैंतालिस हो गया, साठ हो गया।

दोनों चीज़ें बढ़ रही हैं न, तुम जिये भी ज़्यादा जा रहे हो, तुम बच्चे भी ज़्यादा पैदा किये जा रहे हो और जो लोग जी रहे हैं वो ज़्यादा फूँक भी रहे हैं। और हर आने वाली नस्ल पिछली नस्ल से ज़्यादा फूँक रही है। तुम्हें बस ये रोकना है। तुम्हें कोई अन्तर्राष्ट्रीय सम्मलेन, अन्तर्राष्ट्रीय समझौता नहीं चाहिए। वो सारी बड़ी-बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय बातें हो ही इसीलिए रही हैं ताकि एक सीधी-सादी बात न करनी पड़े।

किसी में हिम्मत नहीं है कि दुनिया के लोगों से बोल दे कि बच्चे मत पैदा करो, गुनाह है, क्योंकि ये सीधी-सादी बात बोलते हमारी ज़बान काँपती है तो हम तमाम टेढ़े-तिरछे काम करते हैं। हम कभी क्योटो प्रोटोकोल लेकर आते हैं, कभी हम रियो-डी-जनेरियो जाते हैं, कभी हम पेरिस में बैठकर सन्धि करते हैं, कभी हम कुछ, कभी कुछ करते हैं। और हम जो कुछ करते हैं वो विफल है। बस एक जो सीधा-सादा काम करना चाहिए, वो करने की हममें हिम्मत नहीं है।

दुनिया का कोई राष्ट्रपति, कोई प्रधानमन्त्री, दुनिया का कोई बड़े-से-बड़ा, शक्तिशाली-से-शक्तिशाली आदमी ये खुलकर बोल पाने की हैसियत नहीं रख रहा है कि एकमात्र समस्या है ‌बच्चे। बच्चों का जन्म मात्र शारीरिक बात नहीं होती, वो एक सांस्कृतिक बात भी होती है, समझो। हमने पूरी संस्कृति, पूरा कल्चर ऐसा बना दिया है कि बच्चा आना बड़ी बात हो जाती है। आम आदमी प्रेरित हो जाता है बच्चा पैदा करने के लिए। बच्चा दिखा नहीं कि अखबार उसकी फ़ोटो लेकर छाप देगा 'सच अ क्यूट वन'। एक फ़्लॉप अभिनेता-अभिनेत्री हों, उनके घर बच्चा पैदा हो गया है, अब उस बच्चे की दो साल, चार साल से फ़ोटो छपी जा रही है, ’सो क्यूट’।

अब जिन बेचारों की नयी औलादें हैं, उनको कहा जा रहा है, ‘वी आर गिविंग यू प्रेग्नेंसी गोल्स’ (हम आपको गर्भावस्था के लक्ष्य दे रहे हैं)। ये तो गज़ब हो गया! एक अभिनेत्री हैं, उनकी अभी दिसम्बर में शादी होने वाली है, उनसे पूछा गया, ‘आप कैसे करने लग गयीं?’ बोली, ‘जितनी अभिनेत्रियाँ हैं वो एक के बाद एक शादी करे जा रही थीं तो मुझे लगा मैं भी कर लेती हूँ।’ ये सांस्कृतिक बात बन जाती है। सब कर रहे हैं तो हम भी कर लेते हैं, शायद उसी में कोई खुशी हो। सब कर-करके खुशी का प्रदर्शन कर रहे हैं तो कुछ खुशी होगी ज़रूर। वास्तव में क्या है, ये तहकीकात कोई नहीं करता। है क्या खुशी?

जहाँ से तुम अपना सारा सांसारिक ज्ञान इकट्ठा करते हो, उन जगहों पर तुम जाओ, वहाँ न तुमको गीता मिलेगी न कुरान मिलेगी, वहाँ न तुमको उपनिषद् मिलेंगे न कबीर मिलेंगे। हाँ, किसकी-किसकी शादी चल रही है, उसके एक महीने पहले से उन शादियों की खबरें छपने लगेंगी और एक महीने बाद तक छपती रहेंगी। और सिर्फ़ वहाँ पर तस्वीरें ही नहीं छपेंगी, वहाँ तुम्हें ललचाया जाएगा सीधे-सीधे। ‘ऐसे करो। देखो न, पुरुष और स्त्री एक दूसरे के गले में बाहें डालकर कितना खुश हैं! क्या हँस रहे हैं!’ हँसती हुई तस्वीरें छपी हैं। फिर कुछ दिनों में उनके यहाँ बेबी आ जाएगा और उसकी भी छप रही हैं। तो ये कोई शारीरिक बात नहीं है कि तुम बच्चे पैदा कर रहे हो, ये एक सांस्कृतिक बात है और संस्कृति बदली जा सकती है, और संस्कृति बदल ही जाए। वो तो पापियों ने गलत संस्कृति पूरा दम लगाकर स्थापित करी हुई है, वो इतना दम न लगायें तो ये झूठी संस्कृति भर-भराकर गिर जाए। और वो दम इसलिए लगा रहे हैं क्योंकि इससे उनको आर्थिक लाभ होता है।

बच्चे यूँही नहीं पैदा हो रहे हैं, बच्चे पैदा करने के लिए लोगों को मजबूर किया जा रहा है। लोगों को एक झूठी संस्कृति का प्रसार कर-करके बच्चे पैदा करने पर मजबूर किया जा रहा है। पुराना ज़माना होता था, किसी स्त्री को बच्चा नहीं होता तो उसको लजाया जाता था। कहा जाता था कि ये तो बंजर है, बाँझ है। आज के ज़माने में तुम्हें लजाया नहीं जाता लेकिन तुमको ललचाया जाता है, और ललचा-ललचाकर काम हो ही जाता है।

हर बच्चा जो पैदा हो रहा है, वो न जाने कितने जानवरों की मौत है! इंसान आया है तो उसे जगह भी चाहिए, सड़क भी चाहिए, अन्न भी चाहिए, पानी भी चाहिए, वो सब कहाँ से आएगा? वो सब जंगल से आएगा। जंगल कटता है तब तो खेत बनता है। बच्चे पैदा हो रहे हैं, उन्हें जगह चाहिए न, नहीं तो कहाँ बसेंगे वो? और सबको और ज़्यादा बड़े-बड़े घर चाहिए, तो वो घर कहाँ से आएँगे? वो जगहें कहाँ से आएँगी? पानी-अन्न, तमाम सुख-सुविधाएँ कहाँ से आनी हैं? उपभोग से ही आनी हैं। ईंधन जलाकर ही तो आनी हैं। फिर पेड़ तो कटेंगे, कागज़ तो छपेगा। ये वस्त्र कैसे बनेंगे?

लेकिन नहीं, जब पर्यावरण को बचाने की बात होती है तो कहते हैं, ‘हमें नयी प्रौद्योगिकी चाहिए जिनसे प्रदूषण कम होता हो।’ इतनी दूर की बात कर रहे हो, ‘नयी प्रौद्योगिकी लेकर आएँगे। चलो, प्रौद्योगिकी की रिसर्च में और पैसा लगाते हैं, ऐसी गाड़ियाँ निर्मित करते हैं जो कम प्रदूषण करती हैं।’ ठीक?

तुमने गाड़ी ऐसी बना दी जो दस प्रतिशत कम प्रदूषण करती है और गाड़ियों की बिक्री कितनी बढ़ गयी? बीस प्रतिशत। तो प्रदूषण कम हुआ या बढ़ा? बढ़ा। पर तुम बताओगे, ‘नहीं साहब, प्रौद्योगिकी आगे बढ़ रही है, गाड़ियाँ अब कम प्रदूषण करती हैं।’ तुम बताओगे, ‘नहीं, अब तो इलेक्ट्रिक कार आ रही हैं।’ ठीक है। वो जो इलेक्ट्रिक कार का स्टील है, वो कहाँ से आ रहा है? और इलेक्ट्रिक कार को चार्ज करने के लिए जो इलेक्ट्रिसिटी है, वो कहाँ से आ रही है?

प्रदूषण कम हो रहा है?

दुनिया का सबसे बड़ा संकट

उत्तर: औद्योगिक क्रान्ति से पहले दो-सौ-सत्तर, दो-सौ-अस्सी पीपीएम कार्बन डाइऑक्साइड होती थी, अभी साढ़े-चार सौ है।

सन् 1990 में, क्योटो प्रोटोकॉल के आस-पास के वर्षों की बात कर रहा हूँ, तब से लेकर अभी तक ही करीब-करीब पचास प्रतिशत इज़ाफ़ा हो गया है कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में। और ये तब है जब सन् 1990 में सब देश मिले ही इसलिए थे क्योटो में क्योंकि स्पष्ट हो चुका था कि कार्बन डाइऑक्साइड और बाकी ग्रीन हाउस गैसें बहुत बड़ा खतरा हैं। उसके बाद भी सन् १९९० से लेकर अभी तक करीब-करीब पचास प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है इन गैसों के स्तर में, इतना बढ़ गयी हैं। और वृद्धि हो ही नहीं गयी है, प्रतिवर्ष वृद्धि अभी हो ही रही है।

हम कितनी बड़ी समस्या के सामने खड़े हैं उसको जानने के लिए बस इतना समझ लीजिए, कि अगर हमको स्थिति को नियन्त्रण में लाना है, तो हर आदमी अधिक-से-अधिक साल में दो टन कार्बन डाइऑक्साइड इक्वीवैलेंट (बराबर) का उत्सर्जन कर सकता है।

भई, कार्बन डाइऑक्साइड आदमी से ही तो पैदा हो रही है न? दुनिया में कार्बन डाइऑक्साइड जहाँ से भी उत्सर्जित हो रही है, अन्तत: आदमी के लिए ही है वो जगह। भई, फ़ैक्ट्री से भी निकल रही है तो उस फ़ैक्ट्री के उत्पाद का उपभोक्ता कौन है? आदमी। तो हम ये थोड़े ही कहेंगे कि फ़ैक्ट्री ने वातावरण को गन्दा कर दिया, उस फ़ैक्ट्री के माल का जो लोग उपभोग करेंगे, उन्होंने गन्दा किया न? फ़ैक्ट्री में चेतना या जान तो है नहीं, फ़ैक्ट्री की अपनी तो कोई मंशा है नहीं। तो दुनिया से जितनी भी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है, वो सब किनके लिए हो रही है? इंसानों के लिए हो रही है।

तो आँकड़ा ये सामने आया है कि अगर इसको रोकना है तो अधिक-से-अधिक दो टन प्रतिवर्ष कार्बन डाइऑक्साइड इक्विवैलेंट का उत्सर्जन एक आदमी कर सकता है। ये लक्ष्य वर्ष २०५० के लिए रखा गया है और इस लक्ष्य को रखकर के माना गया है कि अगर वर्ष २०५० तक इतना कम कर लिया, तो भी वातावरण में दो डिग्री की तो औसत वृद्धि हो ही जाएगी, करीब-करीब एक डिग्री की अभी हो चुकी है। जो आम औसत तापमान है उससे हम करीब शून्य-दशमलव-आठ-पाँच डिग्री सेंटिग्रेट आगे आ चुके हैं, एक डिग्री ही मान लीजिए। और दो डिग्री का लक्ष्य रखा गया कि दो डिग्री पर रोक दो भाई।

दो डिग्री पर रोकने पर भी वैज्ञानिक कह रहे हैं कि अगर आपने दो डिग्री पर भी रोक दिया, तो भी प्रलय है और दो डिग्री से आगे चला गया तो पूछो ही मत, वो तो अकल्पनीय है कि क्या होगा। दो डिग्री पर रोकने पर सुरक्षित हैं आप, ऐसा नहीं है। और दो डिग्री पर रोकने के लिए भी आपको हर आदमी द्वारा उत्सर्जित की जा रही कार्बन डाइऑक्साइड कितने पर रोकनी पड़ेगी? प्रतिवर्ष दो टन पर रोकनी पड़ेगी। अभी कितनी है? कोई अनुमान लगाना चाहेगा? (श्रोतागण से पूछते हुए)

श्रोता: दस टन।

उत्तर: अरे! इतनी भी नहीं है बेटा। इतनी है, भारत की नहीं है। विश्व का औसत नहीं है दस टन। अमेरिका की है सोलह टन। अमेरिका की, ऑस्ट्रेलिया की सोलह टन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष है और होनी कितनी चाहिए? दो टन। और ये जो सोलह टन है, ये सोलह नहीं है, ये हर साल बढ़ रही है, सोलह से साढ़े-सोलह, सत्रह। लाना है दो पर और वो हर साल बढ़ती जा रही है।

भारत की दो टन से कम है। भारतीय भी उसे बढ़ाने पर उतारू हैं। विश्व की तीन-चार टन प्रति व्यक्ति के औसत पर है। भारत की अभी दो टन से कम है, तो इस स्थिति पर हम खड़े हुए हैं। ये आँकड़े थे।

अब इसका जो आध्यात्मिक पक्ष है, इसका जो पक्ष आदमी के मन से सम्बन्धित है, अब मैं उस पर आऊँगा। उस पर आने के लिए ये भूमिका बतानी ज़रूरी थी। ये स्पष्ट हो गया है कि स्थिति कितनी भयावह है? अगर हम दो टन प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष कार्बन डाइऑक्साइड पर भी आ जाते हैं, तो भी कितना तापमान बढ़ जाएगा? दो डिग्री। और दो डिग्री भी बढ़ गया तो कयामत है! अगर हम दो टन पर आ गये तो भी दो डिग्री बढ़ेगा, और दो डिग्री का बढ़ना भी प्रलय जैसी बात है। और अभी जो हमारी हालत है, उस पर हम किसी भी तरीके से दो डिग्री पर रुकने नहीं वाले हैं।

मैं कह रहा हूँ कि वैज्ञानिक हलकों में आशंका व्यक्त की जा रही है कि फ़ीडबैक इफ़ेक्ट सक्रिय हो चुके हैं। हो सकता है वर्ष २०५० तक ही तापमान चार, साढ़े-चार या पाँच डिग्री भी बढ़ चुका हो औसतन। उतना अगर बढ़ गया तो आग लगेगी और हम ये बहुत दूर की बात नहीं कर रहे हैं। हम अपने जीवन काल की बात कर रहे हैं। हम देखेंगे ये सब अपनी आँखों से होता हुआ, अपने साथ होता हुआ देखेंगे।

तो अभी तक हमने तथ्य के तल पर एक-दो बातें समझीं। पहली बात, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन इत्यादि गैसें जितनी हैं वातावरण में, ये वातावरण के तापमान को बढ़ाती हैं। वातावरण के तापमान के बढ़ने के कारण धरती पर तरह-तरह के अनिष्ट होते हैं। और हमने ये भी देखा कि जितना ग्रीन हाउस गैसों का कंसेंट्रेशन (घनत्व) बढ़ गया है अब वायुमंडल में, उसको वापस लाने के आदमी के प्रयास सफल होते दिखाई नहीं दे रहे हैं, क्योंकि आदमी ने तो सन् १९९० से सभाएँ और कॉन्फ्रेंसेस और कनवेंशन (सम्मेलन) शुरू कर दी थीं और अभी तक भी करता जा रहा है। नतीजा क्या है? कार्बन का स्तर तो लगातार बढ़ ही रहा है।

तो एक बात तो स्पष्ट हो गयी है कि ये काम सरकारों के बस का शायद है नहीं। सरकारों के बस का क्यों नहीं है, वो भी हम समझेंगे। ये काम सरकारों के बस का नहीं है, ये काम वैज्ञानिकों के बस का भी नहीं है, क्योंकि जो तथ्य और आँकड़े मैं आपको बता रहा हूँ ये सार्वजनिक हैं, सबको पता हैं, लेकिन फिर भी आदमी वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन, एमिशन करे ही जा रहा है।

ये जो आँकड़े मैं आपको दे रहा हूँ, ये आये दिन अखबारों में छपते हैं, क्या फ़र्क पड़ रहा है? सरकारें मिलती हैं, बैठती हैं, पेरिस-अकॉर्ड, पेरिस-अकॉर्ड की बात करती रहती हैं, क्या फ़र्क पड़ रहा है? सामाजिक कार्यकर्ता रैलियाँ निकालते रहते हैं। ग्रेटा थनबर्ग की बात करी और भी बहुत नाम हैं। एक और युवती है जिसने कैम्पेन चला दिया है 'नो फ़्यूचर, नो चिल्ड्रन'। टीनेजर्स उसमें शपथ लेते हैं, कहते हैं कि अगर दुनिया का यही हाल रहा तो हम बच्चे ही नहीं पैदा करेंगे क्योंकि इस दुनिया में बच्चे लाने से लाभ क्या।

तो ये कई अभियान चल रहे हैं, पर उनमें से कोई भी अभियान सफल होता दिखाई नहीं दे रहा है। क्यों नहीं सफल होता दिखाई दे रहा है? अब यहाँ से मेरी बात शुरू होती है, क्योंकि ये बात आदमी के मन की है, आदमी के मूल पहचान की है। ये समस्या वास्तव में आध्यात्मिक है, और जब तक आध्यात्मिक तल पर इस समस्या को सम्बोधित नहीं किया जाएगा, मानव जाति के बचने की कोई सम्भावना नहीं है। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड पहुँच कहाँ से रही है और क्यों रही है? छब्बीस प्रतिशत जो कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में पहुँच रही है, उसका सम्बन्ध आदमी के खानपान से है, सीधे-सीधे माँसाहार से है। छब्बीस प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड के लिए माँसाहार ज़िम्मेदार है। और बाकी चीज़ों के लिए फ्रेट एंड ट्रांसपोर्टेशन (माल-ढुलाई और परिवहन)।

आप जिन भी चीज़ों का उपयोग करते हैं, वो आपके पास ट्रक से लायी जाती हैं, पानी के जहाज़ से लायी जाती हैं, हवाई जहाज़ से लायी जाती हैं। उन सबमें क्या होता है? फ़ॉसिल फ़्यूल (जीवाश्म ईंधन) जलाया जाता है न। फ़ॉसिल फ़्यूल समझते हैं न क्या होता है? गैस, पेट्रोल, डीज़ल, ये सब फ़ॉसिल फ़्यूल कहलाते हैं। जिसमें हाइड्रो-कार्बन होते हैं और वो जलते हैं तो कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है।

तो खानपान, यात्रा, कंस्ट्रक्शन (निर्माण) — पन्द्रह प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन का ज़िम्मा है कंस्ट्रक्शन एक्टिविटीज़, बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन (निर्माण गतिविधियाँ, इमारतों का निर्माण)। वो बिल्डिंग ज़रूरी नहीं है आपका घर हो, वो आपका दफ़्तर भी हो सकती है, वो कोई होटल भी हो सकता है, जहाँ कहीं भी कंस्ट्रक्शन हो रहा है। उसके अलावा भाँति-भाँति के जो उत्पाद हम पहनते हैं, ओढ़ते हैं, उपयोग में लाते हैं उससे कार्बन उत्सर्जित होता है। मैं ये नहीं कह रहा कि ये सब हमारे घरों में हो रहा है।

भई, हवाई जहाज़ चल रहा है, हवाई जहाज़ जो धुआँ छोड़ रहा है, वो तो वायुमंडल की ऊपरी तहों में छोड़ रहा है। आपके घर से वो कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकल रही है, पर वो जो धुआँ हवाई जहाज़ छोड़ रहा है, किसकी खातिर छोड़ रहा है? वो आपकी खातिर छोड़ रहा है न, आपको यात्रा करनी है। तो उसका ज़िम्मा भी फिर किसका है? हमारा ही है न? इसलिए वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाना इतना मुश्किल हो रहा है क्योंकि उसका सीधा सम्बन्ध आदमी के भोग से है।

तो जानने वालों ने दो बातें कही हैं। वो कह रहे हैं, ‘या तो भोग कम कर दो या भोगने वालों की संख्या कम कर दो और कोई तरीका नहीं है।’ या तो प्रति व्यक्ति जितना कंज़म्प्शन (उपभोग) हो रहा है, उपभोग हो रहा है, या तो वो कम करो — और इतना कम करो कि अमेरिका में सोलह टन उत्सर्जन है, उसको दो टन के स्तर पर ले आओ — या तो भोग कम कर दो या फिर भोगने वालों की संख्या कम कर दो, और कोई तरीका नहीं है। और हमसे दोनों ही काम नहीं हो रहे हैं, क्योंकि हमारे लिए तो सुखी जीवन का मतलब ही यही होता है कि हम भोग रहे हैं, और हमारा एक कुनबा है, एक परिवार है, वो भी भोग रहा है। भोगने से काम नहीं चलता न? हम सिर्फ़ वस्तुओं को, पदार्थों को नहीं भोगते, स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के शरीर को भी तो भोगते हैं और उससे पैदा होते हैं बच्चे। और वो जो बच्चा है वो आगे चलकर और भोगेगा।

अब आपको एक हैरतअंगेज़ आँकड़ा बताता हूँ, ‘अगर एक बच्चा पैदा होता है तो वो औसतन अपने जीवनकाल में प्रतिवर्ष अट्ठावन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करेगा।’ आज की जो स्थिति है, आज के जो ट्रेंड हैं उसके हिसाब से। उसकी तुलना में अगर आप कार्बन डाइऑक्साइड कम करने के दूसरे तरीके लगाते हैं, तो उन तरीकों से एक टन कम हो सकती है। कार्बन डाइऑक्साइड दो टन कम हो सकती है, आधा टन कम हो सकती है।

तो जिन्होंने इस पूरे गणित को समझाया, वो कह रहे हैं कि अगर तुम्हें ग्लोबल वार्मिंग रोकनी है तो जो एक सबसे कारगर तरीका है, वो ये है कि एक बच्चा कम पैदा करो, एक बच्चा अगर तुमने कम पैदा किया तो अट्ठावन पॉइंट तुम्हारे हैं। उसकी जगह अगर तुम दूसरे तरीके आज़मा रहे हो, दूसरे तरीके क्या होते हैं? पेड़ लगा देंगे। अब पेड़ लगाने से ये समझो कि एक पेड़ चालीस साल में एक टन कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है। चालीस साल में एक टन और अगर आपने बच्चा पैदा कर दिया तो एक साल में अट्ठावन टन, अब पेड़ लगाने से क्या क्षतिपूर्ति हो गयी? पेड़ लगाने से कोई प्रायश्चित हो गया?

इसी तरीके से बात की जाती है कि ये बिजली के जो बल्ब हैं, ये कम पॉवर वाले लगाओ। उससे कुछ नहीं होगा, उससे आप ज़रा-सा बचा पाओगे। जो असली दानव है, वो है आबादी। कौनसी आबादी? ऐसी आबादी जो उपभोग करने पर उतारू है। समझ में आ रही है?

वैज्ञानिक तथ्यों के नीचे इस पूरी समस्या का मानवीय पक्ष है। ये समस्या मानवकृत है, एन्थ्रोपोजेनिक है न, हमने बनायी है। हमने कैसे बनायी है, वो समझना ज़रूरी है। हमने बनायी है कंज़म्प्शन कर-करके और बच्चे पैदा कर-करके, उपभोग के माध्यम से और सन्तान उत्पत्ति के माध्यम से। और चूँकि उपभोग करने वाली सन्तान ही होगी तो इसलिए इस समस्या को रोकने का जो सबसे कारगर तरीका है, वो है सन्तानों पर नियन्त्रण लगाना। जब सन्तान ही नहीं होगी तो भोगेगा कौन? और हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी से ज़्यादा ही उपभोग कर रही है। तो यहाँ तो हम बात कर रहे हैं कम करने की, अगली जो आएगी वो और ज़्यादा करेगी। क्यों? क्योंकि आर्थिक सम्पन्नता बढ़ रही है, लोगों के पास पैसे आ रहे हैं। जब पैसे आ रहे हैं तो जो आदमी सब्जी खाता था, वो माँस खा रहा है। जहाँ माँस खानी शुरू की, तहाँ समझ लो कि आप कार्बन डायऑक्साइड बढ़ाने वालों की कतार में शामिल हो गये।

इस गुनाह की कोई माफ़ी नहीं

उत्तर: मैं जो बोलूँगा, वो बात बहुत चुभेगी, बहुत लोगों को एकदम बरछी जैसी लगेगी लेकिन बता देता हूँ, इस समय पृथ्वी पर बच्चा पैदा होने से ज़्यादा अशुभ काम दूसरा नहीं है। मातम का काम है अगर एक भी बच्चा और पैदा हो रहा है। पर हमारी समझ में ही नहीं आ रहा, हम मूर्ख भी हैं और क्रूर भी। और ये बड़ा घातक जोड़ा होता है जब मूर्खता क्रूरता से मिल जाती है। और मैंने कहा कि आठ अरब लोग हैं हम, हमें शायद दो अरब होना चाहिए। ये दो अरब भी खा जाएँगे पृथ्वी को अगर इनमें भोगने की लालसा उतनी ही है जितनी आज है। दो अरब भी बहुत हो जाएँगे।

हमें दो अरब सुलझे हुए लोग चाहिए। पहली बात तो आठ अरब न हों, दो अरब हों। और ये दो अरब भी सुलझे हुए स्त्री-पुरुष होने चाहिए, क्योंकि दो अरब भी हो गये उसमें से प्रत्येक व्यक्ति, हर आदमी, हर औरत उतना ही कंज़म्प्शन, उपभोग कर रहा है जितना आज कोई अमेरिका में या ब्रिटेन या कनाडा में करता है, तो दो अरब भी बहुत हैं पृथ्वी को खा जाने के लिए। वो बर्बाद कर देंगे। लेकिन न जाने हम कैसे जाहिल लोग हैं, विकास-विकास की बात करते रहते हैं, विकास का मतलब समझते हो? चीन का हो तो गया विकास, भारत को चीन बनना है। दुनिया का तीस प्रतिशत कार्बन एमीशन (कार्बन उत्सर्जन) आज चीन करता है, और अभी और बढ़ाता ही जा रहा है, बढ़ाता ही जा रहा है। और कार्बन कम करने की जितनी भी सन्धियाँ हैं उनसे पीछे हटता जा रहा है, उसमें उसको दस्तखत करने में कोई रुचि भी नहीं है। भारत बहुत पीछे नहीं है, आठ प्रतिशत हमारा अब हो गया है उसमें योगदान। चीन है, चीन के बाद अमेरिका है मेरे खयाल से पन्द्रह-बीस प्रतिशत पर, फिर भारत का ही नम्बर है आठ प्रतिशत पर।

लेकिन मिठाई खानी हैं न सबको! ‘पड़ोसी मिठाई खा रहा है, मैं क्यों चूक जाऊँ।’ लोग अपनी ग्लानि मिटाने के लिए, अपनी मोरल गिल्ट (नैतिक अपराध) मिटाने के लिए मालूम है क्या करते हैं? वो कहते हैं, 'अरे! हम ऐसा करेंगे, हम प्लास्टिक का कंज़म्प्शन कम कर देंगे।’ होगा क्या उससे?

तुम जो पृथ्वी के साथ अत्याचार करते हो, वो अस्सी प्रतिशत इस बात से है कि तुमने बच्चे पैदा कर दिये। बाकी सबकुछ जो तुम करते हो, चाहे वो प्लास्टिक का उपभोग हो, चाहे वो गाड़ी से जो तुम धुआँ निकालते हो, चाहे एयर कंडीशनर के कारण जो तुम इलेक्ट्रिसिटी का कंज़म्प्शन करते हो वो हो, वो सब कुल मिलाकर बीस प्रतिशत है।

बात समझ में आ रही है?

तुम जो पृथ्वी पर अत्याचार करते हो उसमें अस्सी प्रतिशत हिस्सा किसका है, समझ रहे हो? किसका है? बच्चे पैदा करने का। और बाकी बीस प्रतिशत वो सबकुछ है, कि प्लास्टिक न करो, और क्या-क्या चीज़ें होती हैं जो एक्टिविस्ट (कार्यकर्ता) सिखाते हैं कि ऐसा करा करो, दो बल्ब की जगह एक बल्ब जलाओ, कार एफ़िशिएंट यूज़ करो। और क्या, क्या होता है? हाँ, पेड़ लगा दो, पेड़। दो पेड़ लगा दो कहीं पर जाकर के।

ये सब काम करके न हम अपना जो मोरल गिल्ट होता है, वो कम कर लेते हैं कि देखो, मैं तो बहुत एनवायरमेंटली कॉन्शियस (पर्यावरण के प्रति जागरूक) आदमी हूँ, मैं क्रूर नहीं हूँ, मैं तो अच्छा काम करता हूँ। ‘मैं क्या करता हूँ? मैं सुबह-सुबह जाकर के कुत्तों को रोटी डाल आता हूँ।’ और इससे बड़ा अच्छा लगता है, भीतर जो इगो होती है न, उसमें बड़ी गर्व की भावना आती है, 'देखो, हम गिरे हुए आदमी नहीं हैं, हम अच्छा काम करते हैं। हम क्या करते हैं? हम कुत्ते को रोटी डाल देते हैं। हमें कोई गाय दिख गयी उसको ज़ख्म था, तो हमने गौशाला वालों को फ़ोन कर दिया, वो आये, उन्होंने उसके ज़ख्म पर पट्टी कर दी।’ और बड़ा अच्छा लगता है, आदमी दो-चार लोगों को बताता है, अपने फ़ेसबुक पर डाल देता है, ‘देखो, मैं अच्छा आदमी हूँ।’ और इस अच्छे आदमी ने तीन बच्चें पैदा कर रखे हैं।

अस्सी प्रतिशत — मैं फिर बोल रहा हूँ, अच्छे से समझ लो — अस्सी प्रतिशत जो हम पृथ्वी पर, प्रकृति पर, पशुओं पर, पर्यावरण पर क्रूरता कर रहे हैं, वो अस्सी प्रतिशत क्रूरता कहाँ से आ रही है? ये जो तुमने बच्चा पैदा कर दिया, वहाँ से आ रही है। और ये मैं कोई कल्पना करके नहीं बोल रहा हूँ, रिसर्च रिपोर्ट्स पढ़ लो। वो अस्सी प्रतिशत क्रूरता करने के बाद बाकी जो तुम बीस प्रतिशत करते हो, उसमें से दो-चार प्रतिशत घटा भी दिया तो तुम्हारा गुनाह कौनसा कम हो गया?

लेकिन पढ़े-लिखे तबकों में ये खूब प्रचलन है, क्या? कि वो अस्सी प्रतिशत तो पूरा तबाह करके रखो, बाकी बीस प्रतिशत में दो-चार प्रतिशत की कमी लाकर के बोलो कि मैं एक एनवायरमेंटली कॉन्शियस सिटिजन हूँ। ये चल क्या रहा है?

तुम्हें उस पूरे तन्त्र को, उस पूरी व्यवस्था को समझना पड़ेगा जिसकी वजह से आज वो घटना घटी है। वो घटना किसी एक व्यक्ति, इंडिविजुअल की व्यक्तिगत क्रूरता का परिणाम नहीं है, वो घटना एक पूरे तन्त्र, एक पूरी व्यवस्था से निकल रही है। वो एक सिस्टम का, बल्कि एक सिविलाइजेशन का नतीजा है।

तुम हटाओ बाकी जितने तुम तरीके चला रहे हो पृथ्वी को बचाने के, बस एक काम कर दो — बच्चे मत पैदा करो, सब ठीक हो जाएगा। बाकी किसी काम की कोई ज़रूरत ही नहीं है। ये तुम्हारा क्योटो प्रोटोकॉल, ये पेरिस की सन्धि, किसी सन्धि की कोई ज़रूरत नहीं है। बस जवान लोग एक बात समझ लें, ‘बच्चे नहीं चाहिए।’ और जो बहुत कुलबुलाते हों कि हमारे गर्भ से एकाध तो निकलना ही चाहिए, तो एक पैदा कर लो या एक भी नहीं, या बहुत अगर मन उछल रहा हो तो एक। इतना कर लो, फिर देखो दस-बीस साल के अन्दर सारी तस्वीर बदल जाती है या नहीं।

लेकिन दो बातें बोली न मैंने, दो अपराधी हैं — पहला, बच्चे पैदा करने की वृत्ति और दूसरी, भोग-वृत्ति। ये दोनों एकसाथ चलती हैं, तुम देख लेना। जो जितना भोगी होगा, उसको उतना ज़्यादा खुजली होगी बच्चे पैदा करने की। जैसे आदमी कहता है न, 'खरीद-खरीदकर घर में फ़र्नीचर भरना है, तभी तो घर भरा-भरा लगेगा।’ ठीक वैसे ही बोलता है कि पैदा कर-करके घर में बच्चे लाने हैं, तभी तो घर भरा-भरा लगेगा। ये दोनों चीज़ें साथ-साथ चलती हैं। घर भरना है न? घर भरने के लिए दो चीज़ें चाहिए — गाड़ी चाहिए, फ़र्नीचर चाहिए और बच्चे चाहिए।

तो ये साथ-साथ चल रहा है। और इसको साथ-साथ क्या चीज़ आगे बढ़ा रही है? एक जीवन-दर्शन जो हमें पढ़ा दिया गया है, जो कहता है, 'सुख करो, मज़े मारो।’ जीवन किसलिए है? सुख करने के लिए, मज़े मारने के लिए, ये है। आज हर इंसान की ज़िन्दगी से यही उम्मीद है, अपेक्षा है। हम सबकी ज़िन्दगी से यही माँग है, क्या? सुख-सुख। और बच्चा जब पैदा होता है घर में तो सुख तो लगता ही है, क्योंकि सिखा दिया गया है। हर जानवर बच्चा पैदा करने में सुख मानता है और जब तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई विज़्डम नहीं, बोध नहीं, अध्यात्म नहीं, रियलाइज़ेशन नहीं, अंडरस्टैंडिंग (समझ) नहीं तो तुम फिर जानवर समान ही हो। और जानवर को तो हर समय लगा ही रहता है, ‘और बच्चे पैदा करूँ, और बच्चे पैदा करूँ, सुख है इसमें।’ तो आदमी भी फिर लगा रहता है, 'और पैदा करो, और पैदा करो।'

मैंने कहा था, ‘एक बच्चा जो पैदा होता है, वो अपने पैदा होने के साथ ही लाखों-करोड़ों जानवरों की मौत लेकर के आता है और न जाने कितनी प्रजातियों का एक्सटिंक्शन (विलुप्ति) लेकर के आता है।’ क्योंकि वो जो पैदा हुआ है, वो माँ के गर्भ से हवा तो लेकर नहीं आया, खाना भी लेकर के नहीं आया, अपने रहने और बसने के लिए ज़मीन भी लेकर के नहीं आया, अपने चलने के लिए गाड़ी भी लेकर नहीं आया।

माँ ने तो खट् से वो बच्चा पैदा कर दिया है। वो रहेगा कहाँ? वो खाएगा क्या? उसको चलने के लिए अब सड़क भी चाहिए होगी न? सड़क भी बनानी पड़ेगी। कहाँ से आएगी वो सड़क? वो सड़क आती है फिर जंगल काटकर के। और तुम्हें पता भी नहीं चलता जब तुम जंगल काट रहे हो, तो अनजाने में ही तुमने कितनी प्रजातियों को विलुप्त कर दिया, क्योंकि अब उनके रहने को घर नहीं, हैबिटेट (प्राकृतिक वास) गया उनका।

तुम्हें पता भी नहीं, तुम्हारे मन पर कोई ग्लानि, कोई गिल्ट भी नहीं आएगी। तुम्हें लगेगा, ‘मैं तो ठीक ही हूँ, मैंने क्या किया है, मैंने अभी एक फ़ोर बीएचके खरीद लिया है।’ तुमने तो अपनी तरफ़ से बस एक मकान खरीद लिया। तुम्हें पता भी नहीं कि वो जो तुम्हारा मकान है, तुमसे पहले वो किसी और का मकान था। और जिनका मकान था वो तुम्हारा मकान होने से पहले, वो अब रहे ही नहीं। तुम्हारा मकान करोड़ों लाशों पर खड़ा हुआ है।

तुम और कोई सात्विकता मत दिखाओ, तुम भैया कोई रिस्ट्रेंट (संयम) मत दिखाओ, तुम किसी तरह का कोई त्याग मत करो; तुम बस बच्चा न पैदा करो, बात बन जाएगी। और अगर तुम इतना कर सकते हो कि बच्चा भी नहीं पैदा कर रहे और कंज़म्प्शन भी कम कर रहे हो, तब तो सोने पर सुहागा। वैसे अगर तुम हो जाओ, समझ लो कि पूरी पृथ्वी तुम्हें आशीर्वाद देगी।

कैसा आदमी चाहिए आज? जो बच्चे न पैदा करे और साथ-ही-साथ कंज़म्प्शन भी कम-से-कम करे। चलो, तुम अगर ऐसे नहीं हो पाते तो ऐसे हो जाओ कि चलो, कंज़म्प्शन हम करते हैं, मन रोका नहीं जाता लेकिन बच्चे नहीं पैदा करेंगे। अगर वैसे भी नहीं हो पा रहे तो ऐसे हो जाओ कि चलो, मैं बच्चा पैदा तो करूँगा पर सिर्फ़ एक। पर इन तीनों कोटियों के अलावा अगर तुम चौथी कोटि में आ गये तो महापापी हो, महाअपराधी हो।

अमीरों के चोचले: बच्चे बढ़ाओ, चाँद पर बसाओ

प्रश्नकर्ता: प्रशान्त जी, आप जनसंख्या नियन्त्रण की बात करते हैं लेकिन एलोन मस्क (एक उद्योगपति) जैसे कुछ बड़े नाम खुलेआम कह रहे हैं, कि आबादी और बढ़ाओ वरना जनसंख्या में गिरावट आ जाएगा। एलोन मस्क ने सात बच्चे पैदा कर दिये हैं और अब दुनिया को सिखा रहे हैं कि चलो, मंगल ग्रह पर बस जाते हैं।

उत्तर: जाकर के आँकड़े देख लो। दुनिया के सामने इस समय जो सबसे बड़ी समस्या है, उस पर वैज्ञानिक और विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं, ये देख लो। व्यापारियों की बात क्यों सुनने लग गये तुम इन मुद्दों पर? आठ अरब की जनसंख्या है अभी विश्व की और ग्यारह-बारह अरब से पहले वो स्टेबलाइज़ (स्थिर) नहीं होने वाली। और यहाँ कहा जा रहा है कि बच्चे पैदा करो — एलोन मस्क कह रहे हैं — नहीं तो दुनिया की आबादी घट जाएगी। और व्यक्तिगत उदाहरण पेश कर रहे हैं सात पैदा करके कि देखो, मैंने अपने हिस्से का काम कर दिया, बहुत मेहनत करी है। ऐसे ही तुम सब भी अपने-अपने हिस्से की मेहनत करो और सात-सात पैदा करो।

बेटा, ये सात इसलिए हैं क्योंकि वो सात अफ़ोर्ड कर सकते हैं और कोई बात नहीं है। और ये जो दुनिया के एकदम अमीर लोग हैं उनमें अभी ये चलन ही बना हुआ है। जेफ़ बेजोस (उद्योगपति) के मैं समझता हूँ चार बच्चे हैं, रिचर्ड बेनसन (ब्रिटिश संगीतकार) के भी तीन या चार हैं।

पश्चिमी देशों में जो जनसंख्या वृद्धि की दर बहुत कम हो गयी है या कहीं-कहीं पर तो नेगेटिव भी हो गयी है, उसकी वजह ये नहीं है कि उन्हें पृथ्वी का इतना खयाल है कि वो बच्चे नहीं पैदा कर रहे। हाँ, बात ये है कि अनएफ़ोर्डेबल है, बहुत महँगा हो गया है। तो जिनके पास पैसा है, वो कह रहे हैं, 'देखो, जैसे मैं सात महल रख सकता हूँ, सात बीवियाँ रख सकता हूँ, मैं अफ़ोर्ड कर सकता हूँ न, तो मैं सात बच्चे भी रख सकता हूँ। तुम थोड़ी अफ़ोर्ड कर सकते हो गरीब लोगों!' वो अपने देश के गरीब लोगों की बात कर रहे हैं।

फिर जो बहुत गरीब देश हो जाते हैं वहाँ वो अफ़ोर्ड वगैरह का खयाल ही नहीं करते। वो कहते हैं, ‘अजी हटाओ! जितने बच्चे उसके दूने हाथ।’ जितने बच्चे होंगे, मुँह तो उतने ही होंगे। जैसे कोई बहुत गरीब देश है अफ्रीका का, उसको ले लो तो कहते हैं, ‘सात बच्चे होंगे तो मुँह तो सात ही होंगे, हाथ चौदह होंगे तो कमाने वाले चौदह हाथ भी तो आ गये।’ ये उनका तर्क रहता है। मूर्खतापूर्ण तर्क है, पर ये गरीब देशों का तर्क रहता है बहुत सारे बच्चे पैदा करने के लिए। और जो एकदम अमीर हो गये उनका तर्क ये रहता है, 'हमारे पास पैसा है, हम बच्चे क्यों न पैदा करें? जब हमारी हर चीज़ सामान्य लोगों से ज़्यादा है तो हमारे बच्चे भी ज़्यादा होंगे।’

अब कोई पूछने आता है कि इतने बच्चे क्यों पैदा कर दिये, तो मुँह छुपाने के लिए कुछ तो तर्क देना है न। तो उन्होंने तर्क ये दिया कि दुनिया की आबादी कम होने की आशंका है, तो इसलिए हम बहुत सारे पैदा कर रहे हैं एक के बाद एक। तीन-चार बीवियाँ करी हैं, सात-आठ बच्चे करे हैं ताकि दुनिया की आबादी कहीं कम न हो जाए। और मैं कह रहा हूँ कि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से जाकर पूछो तो तुमको बताएँगे कि पृथ्वी अब नहीं उठा सकती एक भी अतिरिक्त आदमी का बोझ। जितने हो उतने ही बहुत ज़्यादा हो, इससे भी बहुत-बहुत कम होने चाहिए।

लोग कहते हैं, ‘आबादी ज़्यादा है, पर उत्तर जी अभी भी जंगल इतने सारे हैं और खाली जगहें बहुत सारी हैं।’ बाबा, आबादी ज़्यादा इससे नहीं मानी जाती कि लोगों को खड़े होने को या बैठने को जगह है या नहीं है, बात संसाधनों की होती है। मैं कहीं पर पढ़ रहा था, कोई कह रहा था, 'नहीं, नहीं, अर्थ (पृथ्वी) ओवर पापुलेटेड (अत्यधिक आबादी वाली) तो है ही नहीं क्योंकि जो पूरा लैंडमास (भूभाग) है, उसका मुश्किल से पाँच प्रतिशत ही पापुलेटेड है, बाकी तो पचानवे प्रतिशत अभी खाली ही है न। तो ओवर पापुलेटेड कैसे हो गयी?' ये पढ़े-लिखे लोग इतनी मूर्खता के तर्क देते हैं। बात रिसोर्सेज़ (संसाधनों) की होती है। ये आठ-सौ करोड़ लोग जितने संसाधन माँग रहे हैं, रिसोर्सेज़ माँग रहे हैं, बिजली माँग रहे हैं, पानी माँग रहे हैं, खाना माँग रहे हैं — वो पृथ्वी के पास उपलब्ध नहीं है। इसलिए अर्थ ओवर पापुलेटेड मानी जाती है, और है।

और इस वक्त दुनिया की जो बड़ी-से-बड़ी बीमारियाँ हैं, चाहे वो बायो डायवर्सिटी लॉस (जैव विविधता की हानि) हो चाहे क्लाइमेट कैटोस्ट्रोफ़ी (जलवायु आपदा) हो, उसका वास्तविक समाधान सिर्फ़ एक है — जनसंख्या नियन्त्रण, पॉपुलेशन कंट्रोल। उसकी जगह इस तरह के महानुभाव एकदम उल्टी गंगा बहा रहे हैं। वो कह रहे हैं कि और बच्चे पैदा करो, और पृथ्वी पर लगा दी है आग, अब जाकर के मार्स (मंगल ग्रह) पर बैठ रहे हैं। और जनता को बताया जा रहा है कि देखो, पृथ्वी हमने खा ली, बिलकुल बर्बाद कर दी, जैसे केला खाकर के छिलका फेंक दिया जाता है, वैसे हमने पृथ्वी फेंक दिया। अब चलो, मंगल को कोलोनाइज़ (उपनिवेशित) करते हैं।

तुमने पृथ्वी बर्बाद न करी होती तो मार्स को कोलोनाइज़ करने की ज़रूरत पड़ती क्या? लेकिन तुम इसमें बड़ी शेखी बघार रहे हो। तुम कह रहे हो, ‘देखा! हम मंगल पर जाकर के ह्यूमन कॉलोनी (मानव बस्ती), एक स्टेशन बसाकर के आये हैं। ये ऐसी सी बात है जैसे कोई अपने घर में आग लगाकर के अपनी शेखी बघारे, कि वो देखो, मैंने उधर दूर के एक जंगल में जाकर के तम्बू गाड़ दिया है, क्या तम्बू है! चार बम्बू, उसके ऊपर तम्बू। वैसे ही वो अपने चार रॉकेट लेकर घूम रहे हैं कि देखो, क्या रॉकेट लॉन्च (प्रक्षेपण) किया है। अरे! उसकी ज़रूरत क्यों पड़ रही है? क्योंकि तुमने अपने घर में आग लगा दी है, पृथ्वी में आग लगा दी है और ऐसी बातें कर-करके कि बच्चे और पैदा करो, ये करो वो करो।

अभी हो क्या रहा है? अपनी लेविश लाइफ़स्टाइल (विलासितापूर्ण जीवन शैली) दिखाकर तुम सबको कह रहे हो कि इतना कंज़म्प्शन (उपभोग) करो जितना हम करते हैं, और अपने सात बच्चे दिखाकर तुम लोगों से कह रहे हो कि इतने बच्चे पैदा करो जितने हम करते हैं। इन दोनों बातों को बिलकुल ध्यान से समझिए। वो कह रहे हैं कि पर कैपिटा कंज़म्प्शन (प्रति व्यक्ति उपभोग) उतना करो जितना मैं करता हूँ — मेरी लाइफ़स्टाइल देखो, मेरा मैन्सन (हवेली) देखो, मेरी गाड़ियाँ देखो, मेरे यार्ड (प्रांगण) देखो, ये सब मेरी चीज़ें देखो। ये सब चीज़ें रखकर के सामने आप क्या उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हो? कि आप भी इस लेवल का कंज़म्प्शन करो, और मेरे सात बच्चे हैं तो तुम भी सात बच्चे करो। अब ये देखो कि इस तरह का पर कैपिटा कंज़म्प्शन , इस तरह का प्रति व्यक्ति उपभोग, और उसको तुम गुणा करो इस तरह की आबादी से जिसमें सात-सात बच्चे पैदा किये जा रहे हैं। तुम्हें क्या मिल रहा है? तुम्हें ट्रेजेडी (त्रासदी) मिल रही है। समझ में आ रही है बात?

वो कह रहे हैं कि पहले तो लोग ज़्यादा हों जैसे मैंने इतने सारे लोग पैदा कर दिये, और लोग हों वो जो मेरी ही तरह एक लेविश लाइफ़स्टाइल जियें, जैसे मैं कंज़म्प्शन करता हूँ, क्योंकि लेविश लाइफ़स्टाइल का और तो कोई मतलब ही नहीं होता मात्र कंज़म्प्शन के। ‘तो जितना मैं कंज़म्प्शन करता हूँ, तुम सब गरीब लोगों, देखो, तुम भी उतना ही कंज़म्प्शन करो। मैं एक आदर्श प्रस्तुत कर रहा हूँ, मैं एक रोल मॉडल हूँ, मैं उदाहरण सेट कर रहा हूँ, और मेरी तरह सात-सात बच्चे हों।’

अब तुम बताओ, इसके बाद ये पृथ्वी बचेगी? कोई और रास्ता रहेगा ही नहीं इसके अलावा कि जाओ, वहाँ मार्स पर जाओ, वीनस पर जाओ, जूपिटर पर जाओ, किसी और गैलेक्सी (आकाशगंगा) में जाओ, मर जाओ। गरीबों के लिए तो यही रहेगा कि मर जाओ। कितने लोग जाएँगे वहाँ पर!

अभी ये मेरे खयाल से रिचर्ड ब्रांसन (एक उद्योगपति) ही थे न जो फिर से बोल रहे थे कि मैं स्पेस (अन्तरिक्ष) की यात्रा करके आया हूँ। स्पेस की कोई नहीं यात्रा थी वो, वायुमंडल से ज़रा सा बाहर निकले, ऐसे छूकर आ गये, बोले, ‘स्पेस घूम आये।’

कितने लोग अफ़ोर्ड कर सकते हैं वो चीज़? तो ये अगर कभी होगा भी कि चाँद पर या मार्स पर ह्यूमन कॉलोनी (मानव बस्ती) बनेगी, तो उसमें कौन जाकर के रहने वाला है? सिर्फ़-और-सिर्फ़ जो सबसे अमीर लोग हैं, अमीर में भी बिलियनर्स (अरबपति), मल्टी बिलियनर्स (बहु अरबपति)। और गरीबों को यहाँ क्लाइमेट कैटोस्ट्रोफ़ी (जलवायु आपदा) में तपता और मरता छोड़ जाना, ये तैयारियाँ चल रही हैं। और ये आज के जवान लोगों के आदर्श हैं, रोल मॉडल हैं। बात करते हैं लोग, ‘अरे रे! क्या बात है।’ ऐसे लोगों को रोल मॉडल बना रखा है।

एक अच्छी कार बना देना एक बात होती है और एक अच्छी ज़िन्दगी जीना बिलकुल दूसरी बात होती है। ये बात आपको समझ में क्यों नहीं आ रही? टेस्ला (कार) की टेक्नोलॉजी सीख लीजिए, बहुत अच्छी बात है। बढ़िया इलेक्ट्रिक कार है, बहुत अच्छी बात है। आप देख लीजिए कैसे चलती है, कैसे बनती है, बाकी सब बढ़िया देख लीजिए। लेकिन उस आदमी को आप एक जीवन में पथ प्रदर्शक की तरह देखने लगें कि ये तो गुरु है, जैसे ये करता है वैसे मैं भी करूँगा, तो ये बहुत बेवकूफ़ी की बात हो गयी न। और आप क्यों उसको देखने लग जाते हो गुरु की तरह? क्योंकि आपके भीतर लालच है कि आहाहा! जैसे इसके पास बिलियंस हैं, काश मेरे पास भी हों! दुनिया का सबसे अमीर आदमी है वो। दुनिया का सबसे अमीर आदमी है इसलिए जो कुछ भी करेगा, आप उसकी नकल करने की कोशिश करते हो। उसे भगवान ही बना लेते हो अपना। ‘उसने तीन शादियाँ करी हैं, मैं भी करूँगा। सात बच्चे करे हैं, मैं भी करूँगा।’ उसे कुछ भी पसन्द हो सकता है, तुम सबकुछ करोगे? अगर उसे मगरमच्छ खाना पसन्द है, तो तुम भी खाओगे?

प्र२: प्रशान्त जी, आपकी सारी बातें सही लगती हैं, मन को जँचती हैं पर मेरे जीवन का तथ्य ये है कि जब मेरे सामने ऐसे पैसे वाले या समाज जिन्हें बड़ा मानती है ऐसे लोग आते हैं तो भीतर का जानवर कहीं-न-कहीं इन्फ़ीरियर फ़ील (हीन महसूस) करता है। लगता है कि काश! मेरे पास भी ये सब होता, कम-से-कम दिखाने के लिए ही सही।

उत्तर: इसका कोई इलाज नहीं है न। अगर तुम जानवर ही हो तो इसका कोई इलाज नहीं है। इसका इलाज तो सिर्फ़ तभी है जब ऊँची चेतना के इंसान बन पाओ। और उसके लिए तुमको आना होगा वेदान्त की ओर, उपनिषदों की ओर, और कोई तरीका नहीं है। वरना ये जो बात है चकाचौन्ध में फँसने की, हीन भावना में फँसने की, ईर्ष्या में फँसने की, ये सब तो एक छोटे बच्चे में भी होती है।

तुम्हारे घर में एक बच्चा हो छोटा, दो-तीन साल का, उसका छोटा भाई-बहन पैदा हो जाए। अभी तक बच्चे को जो ध्यान मिलता था, जो मोह-ममता मिलती थी, वो उसके छोटे भाई को मिलनी शुरू हो जाए। जो बड़ा बच्चा है वो दो-तीन साल का है, छोटा अभी नया-नया पैदा हो गया है। तो जो बड़ा वाला है इसको बड़ी ईर्ष्या हो जाती है। ये तो हम माँ के पेट से लेकर पैदा होते हैं वृत्तियाँ। इसलिए तो फिर ये जो गर्भ से शिशु पैदा होता है, जो पशु पैदा होता है — शिशु माने पशु — वो जो पैदा होता है, उसको इंसान बनाने के लिए जीवन शिक्षा की ज़रूरत होती है। वो जीवन शिक्षा अगर तुम्हें नहीं मिली है अगर सही किताबों से, सही लोगों से, सही संगति से तुम्हारा वास्ता नहीं रहा है तो जानवर ही रहे आओगे। और फिर इस तरह के लोग तुम पर हावी रहेंगे कोई पैसा दिखाकर, कोई ताकत दिखाकर। तुम उनके आगे ज़लील सा अनुभव करते रहोगे।

प्र२: प्रशान्त जी, उपनिषद् भी पढ़ते हैं, वो बात भी ठीक लगती है, समझ आती है। पर ये बात, तथ्य भी नकार नहीं सकते कि उनके पास है।

उत्तर: मत नकारो, मेरी बला से! नहीं नकार सकते तो मत नकारो, इसमें क्या करूँ मैं? उपनिषद् भी ठीक लगते हैं, उपनिषद्स टू आर राइट। और क्या उनके अलावा सही लगता है? एब्सोल्यूट को एब्सोल्यूटली ट्रू (पूर्ण को पूर्णतया सत्य) मानना होता है, ऑलसो ट्रू (ये भी सत्य) नहीं मानना होता। 'नहीं आपकी बात भी ठीक है, पर उनकी बात भी ठीक है', तो तुम उधर ही चले जाओ।

प्र३: प्रशान्त जी, आपने अभी एलोन मस्क पर बात की है, तो इसमें एक तर्क ये भी आता है कि यदि पृथ्वी का समूल विनाश होता है तो वो हमें बचा भी तो रहे हैं।

उत्तर : मास एक्सटिंक्शन (सामूहिक विनाश) नेचुरल (प्राकृतिक) तरीके से होने की क्या सम्भावना है? शून्य-दशमलव-शून्य-शून्य-शून्य-शून्य-शून्य-शून्य-शून्य-एक प्रतिशत, और जो काम करे जा रहे हैं इंसानों के द्वारा, इन धनपतियों के प्रभाव में, उसके कारण मास एक्सटिंक्शन होने की क्या सम्भावना है? सौ प्रतिशत। तो बचाया जा रहा है या जलाया जा रहा है तुमको? ये कैसा सवाल है!

मास एक्सटिंक्शन अपनेआप बिलकुल हो सकता है, कल को कोई एस्टोरॉयड (उल्का पिंड) आकर के पृथ्वी पर टकरा जाए, पूरी मानव जाति खत्म हो जाएगी। लेकिन उसकी सम्भावना क्या है? वन इन अ मिलियन (दस लाख में एक)। और इंसान जिस तरीके से जी रहा है और कंज़म्प्शन कर रहा है और बच्चे पैदा कर रहा है, उसके कारण मास एक्सटिंक्शन की क्या सम्भावना है? सौ प्रतिशत, और वो भी सौ-दो-सौ साल के अन्दर-ही-अन्दर। ज़्यादा बोल रहा हूँ शायद मैं, हो सकता है कि दस-बीस-पचास साल के अन्दर-अन्दर। तो ये क्या तर्क है कि मास एक्सटिंक्शन से हमको बचाया जा रहा है!

ये ऐसी सी बात है कि कोई अभी तुम्हारा गला रेत दे और कोई पूछे, ‘क्यों मार दिया इसको?’ बोले, ‘मारा थोड़ी है, ये अस्सी की उम्र में मरने वाला था, मैंने उस मौत से इसको बचा दिया है। अब ये अस्सी की उम्र में नहीं मरेगा न।’ हाँ, ये बात तो सही है, अब ये अस्सी की उम्र में नहीं मरेगा। ‘तो मैंने इस पर एहसान किया कि नहीं किया, कि इसको अस्सी की उम्र में जो मौत होती उससे बचा दिया?’ ये कौनसा तर्क है!

प्रश्न: इसमें प्रशान्त जी, एक अर्थ ओवरशूट डे होता है, उसमें ये बताया जाता है कि इस वक्त जितना हम उपभोग कर रहे हैं, उसके हिसाब से हमें एक-दशमलव-सात गुना पृथ्वी चाहिए।

उत्तर: हाँ, और याद रखना ये एक-दशमलव-सात वैश्विक औसत है। अगर तुम अमेरिका का लोगे तो वो शायद दस होगा ये आँकड़ा। बात ये है कि जो ये औसत निकल रहा है, जो एक-दशमलव-सात आ रहा है, तो ये पूरे जनसंख्या के ऊपर है और जनसंख्या हिन्दुस्तान जैसे देशों की ज़्यादा है। यदि अभी सिर्फ़ हिन्दुस्तान का लिया जाए तो वो एक-दशमलव-सात नहीं आएगा, वो शून्य-दशमलव-चार या शून्य-दशमलव-पाँच आएगा। इसलिए ग्लोबल एवरेज जो है, वो अभी फिर भी सिर्फ़ एक-दशमलव-सात है; एक-दशमलव-सात भी एक से ज़्यादा है। एक मतलब आपको अपनेआप को चलाने के लिए एक अर्थ (पृथ्वी) की ज़रूरत पड़ेगी। एक-दशमलव-सात का मतलब है कि आपकी आबादी कुल जितनी है और जितना कंज़म्प्शन कर रही है, उसके लिए आपको एक-दशमलव-सात पृथ्वियाँ चाहिए। कहाँ से लाओगे वो दूसरी पृथ्वी, एक से ऊपर वाली जो है?

अगर एलोन मस्क के देश जाओगे, अमेरिका, तो वहाँ प्रति व्यक्ति जितना उपभोग होता है, पर कैपिटा कंज़म्प्शन , उसके लिए तो एक-दशमलव-सात भी नहीं, दस पृथ्वियाँ चाहिए। दस भी शायद कम बोल रहा हूँ, अगर आँकड़े चेक किये जाएँ तो बीस भी निकल सकता है। और बीस भी क्या है? बीस भी अमेरिका की आबादी का एवरेज है। अब उसमें भी अगर तुम बिलियनर्स का कंज़म्प्शन लोगे, तो वो आँकड़ा बीस से उठकर के बीस हज़ार हो जाएगा। हर बिलियनेयर जितना कंज़म्प्शन कर रहा है, उतना कंज़म्प्शन अगर पृथ्वी का प्रत्येक व्यक्ति करने लगे तो तुम्हें बीस हज़ार पृथ्वियाँ चाहिए, उतना माल, उतनी सामग्री उपलब्ध कराने के लिए। लेकिन हर व्यक्ति का आइडियल यही होता है, क्या? कि मैं भी एक दिन उस बिलियनेयर जैसा हो जाऊँगा। और हर व्यक्ति हो गया उसके जैसा तो बीस हज़ार पृथ्वियाँ चाहिए। ले आओ जहाँ से ला सकते हो।

होना ये नहीं चाहिए कि सब-के-सब लोग उनके जितना कंज़म्प्शन करें। होना ये चाहिए कि उनके कान पकड़कर के उनको नीचे लाना चाहिए कि तुम इतना उपभोग नहीं कर सकते, इतना कंज़म्प्शन करना अलाउड नहीं है, अनुमति नहीं है; क्योंकि तुम सिर्फ़ खुद नहीं कर रहे हो कंज़म्प्शन , तुम दुनिया भर के लिए क्या बन रहे हो? एक उदाहरण बन रहे हो, एक रोल मॉडल बन रहे हो।

प्रश्न: तो प्रशान्त जी, आपने आखिरी में बताया कि आपको उनके कान पकड़कर उनको नीचे लेकर आना चाहिए, लेकिन अभी हो तो यही रहा है कि उनकी ही देखा-देखी हम उनके पीछे-पीछे चल रहे हैं। तो एक जवान आदमी या कोई एक इंडिविजुअल (व्यक्ति) है, उसको क्या करना चाहिए कि उसका कंज़म्प्शन कम रहे?

उत्तर: कंज़्यूम करने वाला मन होता है, लोगों का मन ठीक करना पड़ेगा। ये जो यहाँ पर हम कर रहे हैं, इसके लिए सौ बार बोलता हूँ कि ये दुनिया का सबसे ज़रूरी काम है। आदमी का मन ठीक कर दो, उसका कंज़म्प्शन अपनेआप कम हो जाएगा।

क्या बच्चे पैदा करना ज़रूरी है?

प्रश्नकर्ता: प्रशान्त जी, क्या बच्चा पैदा करना ज़रूरी है?

उत्तर: बच्चा माने क्या होता है? एक घर है, उस घर के लिए बच्चे का क्या अर्थ है? व्हाट डज़ अ किड इन द फ़ैमिली मीन टू यू (परिवार में एक बच्चा आपके लिए क्या अर्थ रखता है)?

प्रश्न: बाकी सबके लिए खानदान आगे बढ़ाने के लिए, मेरे लिए नहीं।

उत्तर: खानदान आगे बढ़ाने के लिए, खानदान आगे बढ़ाने माने क्या?

प्रश्न: ऐसा लोग बोलते हैं।

उत्तर: नहीं, बोलते तो हैं, तुम्हारे लिए बच्चे के अर्थ क्या हैं? घर में बच्चा क्यों चाहिए?

प्रश्न: हैप्पीनेस के लिए।

उत्तर: तो ले आओ बच्चा। कोई ज़रूरी है वो बच्चा अपने ही पेट से निकले? अगर बच्चे से खुशी मिलती है तो ले आओ बच्चा।

प्रश्न: हम जैसे सोचते हैं ज़रूरी नहीं है कि पार्टनर भी उसी तरीके से सोचे।

उत्तर: तो उससे पूछो न कि तुझे चाहिए क्या।

प्रश्न: अपना बच्चा चाहिए। हमारी उम्र ज़्यादा है तो भी तैयार हैं, लेकिन फिर कॉन्फ्लिक्ट (तनाव) बढ़ता है।

उत्तर: हम क्या ये सवाल न पूछें, क्या ये जिज्ञासा न करें कि अपना बच्चा वगैरह इतना ज़रूरी क्यों है?

प्रश्न: नहीं, मेरे लिए उतना ज़रूरी नहीं है। लेकिन बच्चा होना ज़रूरी है।

उत्तर: बात ये नहीं है कि है ज़रूरी या नहीं। बात ये है कि यदि ज़रूरी है तो क्यों है और ये भी कह रहे हो कि ज़रूरी नहीं है तो क्यों नहीं ज़रूरी है। ये सवाल पूछा जाना चाहिए या नहीं कि हम हैं, तुम हो, और इस रिश्ते में बच्चे की जगह क्या है? क्या हम करुणा से इतने भरे हुए हैं कि हमें एक छोटू चाहिए अपनी गोद में? ऐसा हमारी ज़िन्दगी को देखकर तो लगता नहीं है कि हम करुणा से इतने ओतप्रोत हैं। कुत्ते के पिल्ले को तो लात मारकर भगा देते हैं और खुद कह रहे हैं कि नहीं, बच्चा नहीं आया जीवन में तो हमारा वात्सल्य भाव कैसे प्रकट होगा।

हम क्यों चाहते हैं बच्चा? और ये खतरनाक है सवाल पूछना क्योंकि हमें नहीं पता हम क्यों चाहते हैं। हम सिर्फ़ इसीलिए चाहते हैं क्योंकि सबके पास बच्चा है। जैसे कि ये हर्ष (श्रोता) बोले कि उनके पास भी गुब्बारा है, मम्मी, मुझे भी गुब्बारा दिलाओ न! और पूछो गुब्बारा चाहिए क्यों तो उसके पास कोई जवाब नहीं होगा।

प्रश्न: शादी करने में भी वही होता है।

उत्तर: शादी भी ऐसी होती है। ‘सबकी हो गयी, मैं ही रह गया, चल बेटा दौड़ लगा।’

प्रश्न: शुरुआत भी वहीं से होती है।

उत्तर: और क्या!

प्रश्न: लेकिन प्रशान्त जी, ये बात समझाये कैसे, क्योंकि क्लैशेज़ (टकराव) तो होते ही रहते हैं?

उत्तर: या तो कन्वेंस कर लो (समझा लो) या कन्सीव (गर्भ धारण) कर लो। देख लो, कर लो क्या करना है।

प्रश्न: पर ये भी बोला जाता है कि समस्या और बढ़ेंगी।

उत्तर: काहे में बढ़ेंगी, जब प्रेग्नेंट होओगे तब न बढ़ेंगी!

प्रश्न: हाँ।

उत्तर: अब कैंसर हो गया तो और बढ़ेंगी, पर कैंसर हो क्यों? प्रॉब्लम तो तब आएगी न जब प्रेग्नेंट होंगे? होंगे ही नहीं। वो यही तो कहते हैं कि पैंतीस-चालीस के हो गये फिर प्रेग्नेंसी होगी तो प्रॉब्लम आएगी। प्रॉब्लम तो तब आएगी न जब?

प्रश्न: प्रेग्नेंट होंगे।

उत्तर: जब प्रेग्नेंट होंगे। यहाँ हो कौन रहा है! एक तो हम पढ़े-लिखे लोग नहीं हैं, हमें बिलकुल नहीं समझ में आ रहा कि इस वक्त दुनिया की हालत क्या है। दुनिया एक भी नये बच्चे का बोझ अब बर्दाश्त नहीं कर सकती भाई। और ये आध्यात्मिक नहीं, वैज्ञानिक, इकोलॉजिकल (पारिस्थितिकी सम्बन्धी) बात बोल रहा हूँ मैं।

तुम बच्चा पैदा कर देते हो, बच्चे के साथ-साथ रोड भी पैदा करोगे? हवा भी पैदा करोगे? मकान भी पैदा करोगे? पानी भी पैदा करोगे? अन्न भी पैदा करोगे? और पृथ्वी पर ये सब नहीं बचे हैं। बच्चा तो पैदा कर दोगे पर वो रहेगा कहाँ? खाएगा क्या? साँस कहाँ लेगा? पियेगा क्या? और फिर मुझे समझ में आता है कि कुछ लोगों के भीतर ये भावना हो सकती है कि हम पिता की तरह काम करें, हम दुलारें, सहलायें, पुचकारें, भरण-पोषण करें, बच्चे को बड़ा करें तो मैं कहता हूँ, ‘ये नेक खयाल है तो जाओ और क्या कर लो?’

प्रश्न: एडॉप्ट कर लो।

उत्तर: गोद ले लो न! कितने बच्चे हैं बेचारे अगर गोद ले लिये जाएँ तो उनका भला होगा। गोद क्यों नहीं लेते? ये ज़िद ही बहुत बचकानी है कि जब तक मेरे वीर्य से पैदा नहीं होगा, तब तक मुझमें प्रेम ही नहीं आएगा। ये प्रेम का और वीर्य का क्या सम्बन्ध है? इसमें कोई दो राय नहीं, बहुत मसलों को मैं खुला छोड़ देता हूँ, कहता हूँ, ‘आप देखिए आपके होश की बात है।’ इस मसले को मैं कभी खुला नहीं छोड़ता क्योंकि ये बात तुम्हारी व्यक्तिगत नहीं है। ये इस दुनिया के सभी लोगों की बात है और जानवरों के, पक्षियों के, पूरी पृथ्वी के अस्तित्व का सवाल है।

तुम जो बच्चा पैदा करोगे वो खाना माँगेगा, और उसको खाना देने के लिए जंगल कटेंगे। और मुझे बिलकुल नहीं पसन्द है कि पक्षी मरे और जानवर मरे क्योंकि लोगों को बच्चे पैदा करने हैं। उसको रहने के लिए जो जगह चाहिए, देखो उसकी क्या कीमत है। जितना वो भोजन लाएगा उस भोजन को जुटाने में जितने ग्रीनहाउस एमिशन होंगे, उनको देखो और फिर तुम्हें ये भी पक्का नहीं है कि तुम्हारा बच्चा शाकाहारी ही रह जाएगा। उसने अगर अपने जीवन में मुर्गे और बकरे काटे, फिर? और कुछ तो खाएगा, मुर्गा-बकरा नहीं खाएगा, कुछ तो खाएगा।

जानते हो जो ऑर्गनाइज़्ड फ़ार्मिंग (संगठित खेती) है वो भी हिंसक होती है। अन्न भी उसे देने के लिए बड़ी हिंसा होगी। पृथ्वी पर अब जगह नहीं है। हम दूसरों की जगहों पर जी रहे हैं। दूसरे माने दूसरे इंसान ही नहीं, दूसरे जानवर। जहाँ पेड़ होना चाहिए था वहाँ आदमी बैठा हुआ है। जो जगह पक्षी की होनी चाहिए थी, जो जगह हिरण की होनी चाहिए थी, शेर की होनी चाहिए थी, वहाँ हम जाकर बैठे हैं और ऊपर से हमें बच्चे और लाने हैं। वो बच्चे कहाँ बैठेंगे भाई? वो भी बम्बई जैसा शहर। पाँच किलोमीटर जाने में रात के बारह बजे के बाद भी आधा घंटा लगा।

प्रश्न: लोकल हर तीन मिनट बाद आती है लेकिन घुसने को नहीं मिलता।

उत्तर: वो जितने हैं, उन सबको बच्चों से बहुत प्यार है। ये बहुत पुरानी और व्यर्थ की मानसिकता है। तुम अगर इसमें अगर पड़ताल करोगी, इन्वेस्टिगेशन करोगी, तुम्हें समझ में ही नहीं आएगा कि लोगों के भीतर कैसे बैठ गयी कि जीवन में बच्चा होना ही चाहिए। करोगे क्या उसका? जब आ जाता है तो पता चलता है।

प्रदूषण हुआ, पृथ्वी तबाह हुई, तुम्हारे घर खुशियाँ तो आयीं

प्रश्नकर्ता: प्रशान्त जी, बढ़ते प्रदूषण का कारण क्या है? इसे कैसे रोकें?

उत्तर: इसमें ऐसा मैं आपको क्या बताऊँगा जो आपको पहले ही नहीं पता है? आप भलीभाँति जानते हैं कि प्रदूषण कहाँ से आ रहा है। कोई वो किसी छुपे हुए ज्वालामुखी से तो निकल नहीं रहा है कि किसी पहाड़ से बहुत सारा धुआँ आ रहा है, और हम जानते नहीं कि कहाँ से आ रहा है, तो ‘उफ्फ़! बड़ी हमारी लाचारी है।’ सब जानते हैं कहाँ से आ रहा है।

कहाँ से आ रहा है भाई? तुम्हारी गाड़ियों के धुओं से आ रहा है, तुम्हारी फ़ैक्ट्रियों के धुएँ से आ रहा है। पंजाब-हरियाणा में जो फ़ैक्ट्रियाँ तुम देख रहे हो, उससे आ रहा है। अब इसमें क्या नहीं पता? ये सब जानते हुए भी हम वही काम करते हैं जिनसे धुआँ और गैसें आ रही हैं, तो फिर सवाल ये नहीं होना चाहिए कि प्रदूषण का क्या करें। सवाल ये होना चाहिए, ‘प्रशान्त जी, हम अपना क्या करें?’

प्रदूषण का क्या करना? तुम जब तक हो, तुम प्रदूषण करोगे, क्योंकि तुम जैसे हो, तुम प्रदूषण नहीं करोगे तो क्या करोगे? तुम्हें भलीभाँति पता है कि जो तुम कर हो, उसका अंजाम क्या है। फिर भी तुम्हें वही करना है, तो कोई क्या कहे! बल्कि मज़ाक बनाते हो। जब प्रदूषण बहुत बढ़ जाता है तो उस पर कार्टून निकलने लगते हैं, चुटकुले निकलने लगते हैं। इसका तो यही है कि जब चोट और पड़ेगी, सड़को पर लाशें ही गिरने लगेंगी तो चेतोगे।

हमारे लिए असल में साफ़ हवा का कोई मूल्य नहीं है या कुछ मूल्य है भी तो बाकी चीज़ों से बहुत कम मूल्य है। तो जिस चीज़ का हमारे लिए मूल्य है, हम उसके पीछे भाग लेते हैं। जब हवा इतनी खराब हो जाएगी कि एकदम बैठे-बैठे गिराकर मारना शुरू कर देगी — जो कि हो रहा है, हर दिन, हर महीने हो रहा है। अगले साल और ज़्यादा होगा कि लोग कुर्सियों पर बैठे बात कर रहे हैं और गिर पड़े, ऐसे मर रहे हैं — तब हम शायद चेतेंगे, कुछ करेंगे।

बात समझ रहे हैं आप?

अभी तो हमको दूसरी चीज़ें ज़्यादा मूल्यवान लगती हैं। त्यौहारों का मौसम है, चलो धुआँ छोड़ो। खुशियाँ घर लेकर आओ, ले आओ खुशियाँ घर। खुशियाँ घर लेकर के आये और तभी छाती पकड़ी और बोले, ‘कुछ दर्द सा हो रहा है छाती में।‘ और गिरे और फिर उठे नहीं। चाट लो खुशियाँ! ओ खुशियाँ!

जिस दिन समझ में आएगा कि साफ़ हवा इन खुशियों से ज़्यादा कीमत की है, उस दिन खुशियाँ थोड़ा किनारे रखोगे और साफ़ हवा की ओर ध्यान दे लोगे। अभी तो यही है कि अगर हवा गन्दी करने से खुशी मिलती है तो क्यों न करें। ‘हमें खुशियाँ मनाने का हक नहीं है क्या? और तुम मुझसे कह रहे हो कि मैं हवा गन्दी करता हूँ। पहले मेरे पड़ोसी को रोको हवा गन्दी करने से। मुझे कतई पसन्द नहीं है कि सिर्फ़ मेरी खुशियाँ रोकी जाएँ, क्योंकि मेरी खुशियाँ रोक रहे हो और ये बगल वाले की नहीं रोक रहे। ये तो मेरे लिए डबल दुख की बात है। पहले तो मेरी खुशियाँ गयीं, एक दुख ये। और दूसरा दुख ये कि बगल वाले की खुशियाँ नहीं गयीं। ये नहीं चलेगा भैया! सबको बराबरी का दुखी करो। नहीं तो अगर मेरा बगल वाला दो-तीन किलो धुआँ उगलेगा, तो मैं चार किलो उगलूँगा।’ वो धुएँ का मतलब ही ये है — खुशियाँ।

ये रिश्ता कुछ समझ में आ रहा है न?

हमारा जो कुछ खुशियाँ देता है हमको, देखिए कि उसका प्रदूषण से तालुक्क है या नहीं। आप हतप्रभ रह जाएँगे। आप पाएँगे अधिकांशतः हमें जो कुछ खुश करता है, वो पृथ्वी को और प्रकृति को और हवा को खत्म भी करता है। जैसे हमारी हर खुशी आती ही है धरती की छाती में एक और खंजर घोंपकर के। ये रिश्ता है हमारी खुशियों में, पृथ्वी, प्रकृति और पर्यावरण में। जितनी खुशियाँ बढ़ती हैं उतनी ज़्यादा पृथ्वी बर्बाद होती है, उतनी प्रकृति, उतना पर्यावरण।

आप कहेंगे, ‘इसका मतलब ये है कि खुशियाँ छोड़ दें, दुखी हो जाएँ।‘ नहीं, इसका मतलब ये है कि खुशियाँ झूठी हैं। अगर ये खुशियाँ सच्ची होतीं तो इनसे पृथ्वी को, प्रकृति को, पशुओं को, पर्यावरण को इतना नुकसान नहीं हो सकता था। ये खुशियाँ झूठी हैं। और ये अगर खुशियाँ झूठी हैं तो क्या इन्हें खुशियाँ कह सकते हैं? फिर तो ये खुशियाँ भी नहीं हैं। फिर तो हम हर तरफ़ से मारे गये। खुशी की खातिर क्या-क्या बर्बाद किया? पृथ्वी, प्रकृति, पर्यावरण, सबकुछ। और फिर पता चला कि जिस खुशी की खातिर ये सब बर्बाद किया वो खुशी खोखली है। हर तरफ़ से मारे गये न!

खुशी अगर सच्ची होती तो उससे सबको फ़ायदा होता, ये पहचान है असली खुशी की। झूठी खुशी आत्मकेन्द्रित होती है। सच्ची खुशी फैलती है, बँटती है, सबका कल्याण करती है। सच्ची खुशी ये नहीं हो सकती कि आप त्यौहार मना रहे हो, और आपके बम-धमाकों से चिड़िया और कुत्ते मरे जा रहे हैं। सच्ची खुशी ये नहीं हो सकती कि आप त्यौहार मना रहे हो और आपका त्यौहार है ही यही, कि आज करोड़ों जानवरों की कुर्बानी देनी है। इस त्यौहार से अगर आपको खुशी मिल रही है तो बहुत झूठी और खोखली खुशी है वो।

बात समझ में आ रही है?

जैसे कोई मोहल्ले में बदतमीज़ों का घर हो और वो आधी रात के बाद पार्टी करें धूम-धमाके से, ज़ोरों से अश्लील संगीत लगाकर के। क्या मना रहे हैं वो? खुशियाँ। और पूरा मोहल्ला अपना माथा पीट रहा है कि ये क्या हो रहा है। ऐसी तो हमारी खुशियाँ हैं। ये जिस मोहल्ले की बात मैं कर रहा हूँ उसका नाम है पृथ्वी। जब हम खुशी मनाते हैं तो पूरी पृथ्वी रोती है। जिस दिन तुम खुश हो उस दिन समझ लो पूरी धरती रो रही है। धरती न रोये तो हम खुश हो ही नहीं पाते। जिस दिन हमारे त्यौहार आते हैं, उस दिन हमारे त्यौहारों से ज़्यादा पृथ्वी कभी रोती ही नहीं।

शादी-ब्याह आते हैं हमारे, न जाने कितने रोते हैं जिस दिन हमारी खुशियाँ उठती हैं। तो धुआँ क्या है? थोड़ा सा पी लो। इतनी चीज़ें पीते हो, धुआँ ही पी लो। खुशियों के लिए छोटी सी कीमत तो अदा कर रहे हो। क्या? धुआँ। क्या फ़र्क पड़ता है। ये जो ट्रक आते हैं — कभी किसी ट्रक के पीछे कार या बाइक चलाना और सूँघना कि वो क्या कर रहा है। वो ट्रक क्यों धुआँ छोड़ता हुआ आगे बढ़ रहा है? ट्रक में क्या रखा हुआ है? खुशियाँ!

वो माल किसके लिए जा रहा है, देवताओं के लिए? तुम्हीं तो भोगोगे उस माल को। तुम देख नहीं रहे हो। दिल्ली के पर्यावरण के ह्रास का बहुत बड़ा कारण ये ट्रक भी हैं। माल ले-लेकर आते हैं और उनमें से बहुत सारे तो ऐसे हैं जो अपना माल दिल्ली में उतारते भी नहीं, बस दिल्ली से होकर गुज़रते हैं और दिल्ली को बिलकुल रौन्दते हुए निकल जाते हैं। पर उनमें माल क्या भरा हुआ है? वही सब माल जो तुम्हें खुश करता है।

एक के बाद एक ट्रक की कतारें। कभी देखो रिंग-रोड रात के बारह बजे के बाद। वो ट्रक नहीं हैं, जो कतार है न किलोमीटरों लम्बी, वो ट्रकों की कतार नहीं है, खुशियों की बारात है। वो सब बाराती हैं। अब अगर वो थोड़ा-बहुत धुआँ छोड़ रहे हैं हवा में तो बुरा क्या हो गया? अरे! सूँघ लो। खुशियाँ मुफ़्त थोड़ी ही मिलती हैं! हमारी हर खुशी का मतलब है भोग, कंज़म्प्शन , और बिना धुएँ के कंज़म्प्शन हो नहीं सकता। कंज़म्प्शन के लिए क्या चाहिए? प्रोडक्शन (उत्पादन)।

पहली बात तो हमें भोगना है। दूसरी बात, हमारे भोगने में ये भी शामिल है कि हमारे पास बच्चे होने चाहिए, हम बच्चे को भी भोगेंगे। और एक जो आप बच्चा पैदा करते हो, वो एक तो होता नहीं क्योंकि अब उसके पीछे उसके खानदान की पूरी श्रृंखला चलेगी। आप तो यही तो कहते हो, ‘मैंने एक ही तो बच्चा पैदा किया है।‘ आपने कितने पैदा किये हैं? अरे! पढ़े-लिखे हो, लगाओ ज्योमेट्रिक प्रोग्रेशन (ज्यामितीय अनुक्रम)। एक बच्चा कितने लेकर आया है? वो एक नहीं तुमने पैदा किया है, कितने पैदा कर दिये हैं?

तो पहली बात तो हमें भोगना है और दूसरी बात हमें सिर्फ़ चीज़ों को नहीं भोगना है, हमें जिस्मों को भी भोगना है। तो उससे क्या पैदा होते हैं? बच्चे। और ये जो बच्चे पैदा होते हैं, इन्हें भी भोगना है। तो ये तो गज़ब भोग हो गया!भोग रेज़ टू द पॉवर भोग, बी टू बी।

धुआँ क्या है? दिल में आग लगी हो तो हवा में धुआँ नहीं फैलेगा! और हम तो जलते हुए लोग हैं, कतई! वो जो आग लगी रहती है भीतर, वही तो इंजन है हमारा। जब तक सीना जल न रहा हो, तब तक हम हिलते कहाँ हैं, कुछ करते कहाँ हैं? अब धुआँ-धुआँ है चारों तरफ़ तो ऐतराज़ क्यों करते हो भाई! खुशियाँ!

भोग-प्रौद्योगिकी, महाविनाश।

प्रश्नकर्ता: प्रशान्त जी, जिस तरह कई चीज़ों से प्रकृति को नुकसान होता है, वैसे ही टेक्नोलॉजी की वजह से इतना विनाश हो रहा है, तो क्या हमें टेक्नोलॉजी को भी रोकना चाहिए?

उत्तर: तुम बताओ बेटा, क्या करोगे? तुम्हारे सामने और कोई चारा है? और क्या करोगे तुम?

प्रश्न: सर, इसका मतलब तो यही है न, हमें टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल ही नहीं करना चाहिए।

उत्तर: तुम्हारे सामने दो विकल्प हैं, अगले चालीस साल में विलुप्त हो जाओ या अपने रास्ते बदल दो। बोलो क्या करना है?

प्रश्न: सर, आप कह रहे हो टेक्नोलॉजी यूज़ करने से विनाश हो रहा है। आप भी तो ये टेक्नोलॉजी यूज़ कर ही रहे हैं।

उत्तर: ये जो टेक्नोलॉजी इस्तेमाल हो रही है, वो ये कहने के लिए हो रही है कि टेक्नोलॉजी इस्तेमाल कम करो। अगर यहाँ ऐसे लोग बैठे होते जिन्हें ये सुनने की आवश्यकता ही नहीं थी, तो करना क्या है इस माइक का! यहाँ वो लोग बैठे हैं जिन्हें ये सुनने की आवश्यकता है कि टेक्नोलॉजी तुम्हारा कितना नुकसान कर रही है, अपनी जवानी में ही खत्म हो जाओगे। इस कारण बोलना पड़ रहा है।

एक आदमी को गोली लगती है। गोली लगी, गोली ने क्या किया? शरीर छेद दिया और वो शरीर में जाकर के बैठ गयी। उसके बाद डॉक्टर आता है, वो भी सर्जरी के अपने उपकरण लेकर के आता है। अब डॉक्टर भी शरीर को क्या कर रहा है? जैसे गोली ने शरीर को काट दिया, वैसे डॉक्टर भी तो काट ही रहा है न। क्या तुम डॉक्टर को ये तर्क दोगे कि यदि शरीर को काटना बुरा था, तो आप भी तो वही कर रहे हो? डॉक्टर क्या बिलकुल वही काम नहीं कर रहा जो गोली ने करा था?

गोली ने क्या करा था? शरीर को छेद दिया था, माँस को चीरकर के अन्दर चली गयी थी। डॉक्टर भी यही करेगा, वो भी माँस को चीरकर के अन्दर जाएगा। पर डॉक्टर को तुम्हारे माँस को चीरकर भीतर क्यों जाना पड़ रहा है? क्योंकि वहाँ एक गोली बैठी हुई है, नहीं तो डॉक्टर को कोई आवश्यकता नहीं थी।

अगर यहाँ पर ऐसे लोग होते जिन्हें सुनने की आवश्यकता नहीं थी — दोपहर का समय है, मौसम अच्छा है — मैं भी कहीं घूमूँगा-फिरूँगा, मैं माइक का क्या करूँगा? या माइक एक इधर, एक इधर कन्धे पर फिट करके घूमना है मुझे? माइक तो छोड़ दो, हो सकता है यहाँ हज़ार की, पाँच-हज़ार की ऑडियंस हो, मुझे और बड़ी टेक्नोलॉजी चाहिए होगी। ठीक वैसे ही जैसे अगर दो-चार गोलियाँ न घुसी हों, सत्तर गोलियाँ घुसी हों तो डॉक्टर को सत्तर जगह छेदना पड़ेगा तुम्हें। और तुम कहोगे, ‘क्या डॉक्टर है, इसने मेरे सत्तर घाव किये।’ डॉक्टर तुम्हारे घाव नहीं कर रहा है।

प्रश्न: सर, ये एक्सपीरियंस तो हर किसी के पास होता है। हम व्हीकल में फॉसिल फ़्यूल का यूज़ करते हैं। लेकिन फॉसिल फ़्यूल के कारण टेम्परेचर बढ़ रहा है। उसकी जगह हम सीएनजी का यूज़ कर रहे हैं, तो वो चीज़ आती ही महँगी है। लेकिन वो चीज़ हम कितने आसन तरीके से कर पा रहे हैं।

उत्तर: मैंने कहा कि अगर मैं अभी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहा हूँ, तो उससे तुम्हें ये समझ में आ रहा है कि आगे और नाश नहीं करना है। तुमने वेपन्स (हथियार) और फॉसिल फ़्यूल्स की बात करी, मुझे बताओ, वेपन्स और फॉसिल फ़्यूल जलाने से किस प्रकार एनवायरमेंट (पर्यावरण) की सुरक्षा होती है? एक भी तर्क दे दो।

प्रश्न: तो सर, इसका मतलब जो सारे टेक्नोलॉजी हम यूज़ कर रहे हैं, वो बन्द कर देने चाहिए?

उत्तर: बेटा, कुतर्क पर मत आओ जल्दी से कि क्या कर देना चाहिए। तुम पहले ये देखो कि स्थिति क्या है और उसमें तुम्हारे सामने विकल्प क्या हैं। अगर नहीं करोगे, तो क्या हो रहा है ये बता दो। तुम करो, पर अगर कर रहे हो तो फिर क्या होगा ये बता दो।

प्रश्न: अगर यूज़ कर रहे हैं तो लाइफ़ ईज़ी और बेहतर है, तो अगर नहीं कर रहे हैं तो लाइफ़ बिलकुल नीचे जा रही है।

उत्तर: दोनों में से क्या चुनना चाहते हो — तीस साल में आमूलचूल नाश, सब खत्म या जीने का कोई और तरीका? जल्दी बोलो। और जीने के और तरीके हो सकते हैं, तुमने आज़माये भले नहीं हैं पर हो सकते हैं। लेकिन यदि एक बार सम्पूर्ण नाश हो गया तो फिर कोई तरीका उपलब्ध नहीं रहेगा, या रहेगा? जीने के तो दूसरे तरीके खोजे जा सकते हैं। यदि जीवन है तो तरीके आ जाएँगे, पर यदि नाश ही हो गया तो फिर कहाँ से लाओगे तरीके? लौटाकर लाओ उस एक प्रजाति को भी जो तुमने अब नष्ट कर दी है, लौटाकर लाओ।

तो आवश्यकता है आज कि नये तरीके खोजे जाएँ। मुझे ये बताओ, क्यों ज़रूरी है हर उभरता हुआ देश कंज़म्प्शन (उपभोग) के, भोग के उसी स्तर को पा लेना चाहता है जिस पर कुछ विकसित देश बैठे हैं जैसे कि अमेरिका? क्यों ज़रूरी है कि कंज़म्प्शन के उसी स्तर को पाया जाए? सपना सबका वही है। पर जानते हो, अगर तुमको उसी स्तर का भोग करना है जिस स्तर का भोग एक आम अमेरिकी नागरिक करता है, तो उसके लिए तुमको दस या बारह पृथ्वियाँ चाहिए। पृथ्वी पर उतने संसाधन ही नहीं हैं। एक आम अमेरिकी जितनी बिजली इस्तेमाल करता है, जितनी गैस इस्तेमाल करता है, फॉसिल फ़्यूल , उतना ये पृथ्वी तुम्हें दे ही नहीं सकती। पर सपना सबका वही है।

यदि आज से बीस साल पहले तक दफ़्तरों में बिना एयर कंडीशनिंग के काम चल जाता था तो क्या आज हमें ये ध्यान से देखना नहीं चाहिए कि कितनी एयर कंडीशनिंग ज़रूरी है और कितनी फ़ालतू ही है? और याद रखना, एक-एक एयर कंडीशनर धरती को डुबो रहा है। एयर कंडीशनिंग बहुत ज़बरदस्त रोल प्ले कर रही है ग्लोबल वार्मिंग में।

क्या वाकई तुम्हारे लिए दूसरे देशों की यात्रा इतनी आवश्यक है? ये जो हवाई जहाज़ से यात्रा हो रही है, ये बहुत बड़ा रोल प्ले कर रही है, इसका बड़ा हाथ है इस धरती को नष्ट करने में। हिन्दुस्तान में तुम कहीं-से-कहीं तक भी अगर ट्रेन से जाओ, तो सामान्यतया एक रात में पहुँच सकते हो। हाँ, अगर तुम कश्मीर से कन्याकुमारी जा रहे हो तो बात अलग है, अन्यथा जितनी भी तुम अगर दिल्ली से बम्बई भी जा रहे हो तो तुम यहाँ से शाम की पाँच-छ: बजे की ट्रेन लो, अगले दिन सुबह बम्बई उतर जाओगे। राजधानी ऐसा ही करती है। तुम्हें क्यों हवाई जहाज़ से उड़कर जाना है? और क्या तुम हवाई जहाज़ से सिर्फ़ तब जाते हो जब बिलकुल इमरजेंसी रहती है या तुमने एक शौक बना लिया है, तुमने एक वासना बना ली है? तुम्हारे उस शौक से दुनिया तबाह हो रही है।

तुम्हें देखना पड़ेगा न कि तुम्हारी ज़रूरत कहाँ तक है और तुम्हारा लालच कहाँ तक है। तुम्हारा लालच तबाह कर रहा है। तुम्हें क्या वाकई ज़रूरत है कि एक-एक घर में चार-चार गाड़ियाँ हों? तुम फॉसिल फ़्यूल की बात कर रहे थे न। तुम्हें देखना पड़ेगा कि वो चार गाड़ियाँ तुम्हारी ज़रूरत थीं या तुम्हें पड़ोसी को इम्प्रेस (प्रभावित) करना था। बात समझ में आ रही है?

बेटा, तुम्हें एक खुशहाल जीवन देने के लिए, तुम्हारी मूलभूत ज़रूरतें पूरा करने के लिए पृथ्वी के पास है, वो कर देगी। पर तुम्हारे लालच की सीमा नहीं है, पृथ्वी तुम्हें उतना नहीं दे सकती। और तुमने पृथ्वी को नष्ट कर दिया है। जानते हो ग्लोबल वार्मिंग को क्या बोलते हैं? उसको कहते हैं कि पृथ्वी को बुखार आ गया है। तुमने उसके साथ ऐसा दुर्व्यवहार कर रखा है कि वो फीवरिश (बुखारग्रस्त) है, उसे बुखार आ गया है। उसका तापमान बढ़ता ही जा रहा है, बढ़ता ही जा रहा है, वो गर्म होती जा रही है, क्योंकि तुम्हारा आचरण गलत है। तुम उसका शोषण कर रहे हो।

तुम जहाँ तक पैदल जा सकते हो, क्या वहाँ तक जाने के लिए तुम्हें कार की ज़रूरत है? अब तुम कहो कि ऐसे तो टेक्नोलॉजी रुक जाएगी। तुम कर क्या रहे हो उस टेक्नोलॉजी का? बन्दर के हाथ में तलवार! बोलो बेटा। ये मोबाइल फ़ोन होता है, क्या हमें ईमानदारी से अपनेआप से पूछना नहीं चाहिए कि इसका कितना इस्तेमाल वाकई हमारी गहरी ज़रूरत है और कितना इस्तेमाल हमारा लालच, वासना और दुर्व्यवहार है?

ये जो थ्री-जी सर्विसेज़ है, डेटा सर्विसेज़ , इनका एक बहुत बड़ा हिस्सा जानते हो किस बात में उपयोग होता है? युवा वर्ग है, वो पॉर्न डाउनलोड करता है। और उसी से ये सेल्यूलर कम्पनियाँ कमा रही हैं। अब तुम कहो, ‘सर, टेक्नोलॉजी की तो बड़ी ज़रूरत है।’ किसलिए? ताकि तुम रात में अश्लील फ़िल्में देख सको? तुम कर क्या रहे हो उस टेक्नोलॉजी का? फिर तुम कहो, ‘सर, उसके बिना तो ज़िन्दगी नहीं चल सकती। आदिवासी बन जाएँ?’ तुम आदिवासी नहीं हो तो क्या हो? वो कर क्या रहे हो तुम? आदिवासी भी ये हरकत नहीं करता। आदिवासी तो बड़ा सुसंस्कृत होता है।

अब बैठे हुए हैं लेकर के फ़ेसबुक और एक के बाद एक रिफ्रेश कर रहे हैं, ये तुम्हारी ज़रूरत है या तुम्हारे दिमाग का पागलपन है? ठीक-ठीक बताओ। और यदि न हो फ़ेसबुक इसमें तो क्या बिगड़ जाएगा तुम्हारा? क्या वाकई कुछ बिगड़ जाना है? पर तुम कहो, ‘सर, टेक्नोलॉजी तो और बढ़नी चाहिए और ज़्यादा स्मार्टफ़ोन आने चाहिए, स्मार्टर फ़ोन, स्मार्टेस्ट फ़ोन।’ तुम करोगे क्या उसका? और ज़्यादा तेज़ी से पॉर्न मँगा लोगे और क्या करोगे? अभी पाँच मिनट की क्लिप देखते हो फिर पचास मिनट की देखोगे और क्या करोगे? फ़ेसबुक पर अभी सिर्फ़ चित्र आते हैं फिर आवाज़ भी आएँगी। और क्या कर रहे हो? उस टेक्नोलॉजी से तुम कर क्या रहे हो, ये बताओ न। तुम्हें क्या वाकई ज़रूरत है उस टेक्नोलॉजी की? बोलो बेटा।

पर उस टेक्नोलॉजी के चलते — तुम्हें क्या लगता है कि इंटरनेट है, तो इंटरनेट पर जो कुछ भी करते हो, मान लो इंटरनेट पर तुमने किसी को बस ‘हाय’ बोला, तुम्हें क्या लगता है वो बस ‘हाय’ है? साइंस के स्टूडेंट हो, बीटेक कर रहे हो, थोड़ा जानना चाहिए तुम्हें ये सबकुछ। तुमने जो ‘हाय’ बोला वो ‘हाय’ नहीं है। वो किसी सर्वर में जाता है, उस सर्वर में पावर लगता है, एनर्जी, इलेक्ट्रिसिटी। उस इलेक्ट्रिसिटी को लाने के लिए कहीं कोयला जलाया जा रहा है और जहाँ कोयला जलाया जा रहा है उससे ग्लोबल वार्मिंग हो रही है।

तुम ये जो चैटिंग भी कर रहे हो न, तुम्हारी एक-एक चैटिंग से न जाने कितने पौधे, कितने जानवर मर रहे हैं। सर्वर-फार्म्स होते हैं, नाम सुना है तुमने? सर्वर-फार्म्स बहुत बड़े क्षेत्र में फैले हुए सर्वर हैं। तुम सोचो, इतना डेटा रोज़ तुम पैदा करते हो वो डेटा कहीं-न-कहीं स्टोर तो होता होगा। इतना डेटा हम सब रोज़ जो जेनरेट (उत्पन्न) कर रहे हैं, वो डेटा कहीं स्टोर होता होगा। वो जो सर्वर फार्म है वो इतनी गर्मी पैदा करता है कि उसे ठंडा भर करने के लिए भी बड़ी ऊर्जा लगानी पड़ती है। यहाँ तक हो रहा है कि बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अपने सर्वर-फ़ार्म्स को समुद्र के नीचे बना रही हैं कि समुद्र का पानी इसे ठंडा करेगा। पर इतना साइंस तो तुमने भी पढ़ा है, तुम अच्छे से जानते हो कि पानी अगर किसी चीज़ को ठंडा कर रहा है तो पानी खुद क्या होगा?

श्रोतागण: गर्म।

उत्तर: और ये सब क्यों हो रहा है? ताकि तुम रात को बैठकर बोल सको, ‘हाय, आइ एम लुकिंग सो स्मार्ट।’ और फिर तुम कहते हो, ‘आदिवासी हो जाएँ?’

विवेक का अर्थ क्या होता है? विवेक का अर्थ होता है कि कहाँ तक जाना है और कहाँ तक नहीं जाना है। समय आ गया है जब इंसान को अपनी सीमा निर्धारित करनी होगी। इतना ही चाहिए, इससे ज़्यादा नहीं चाहिए मुझे। जो तुम्हारी मूलभूत ज़रूरतें हैं वो तुम्हें आसानी से मिल जाएँगी, पर तुम पहले होश में आओ। और ध्यान से देखकर कहो कि मुझे इतना ही चाहिए, इससे ज़्यादा मुझे नहीं चाहिए।

आ रही है बात समझ में?

चाहते ही गये हमेशा, और चाहतों से बर्बाद हुए

उत्तर: दुर्गा सप्तशती ले रहे हैं। उसका जो मध्यम चरित्र, दूसरा चरित्र है, तीन चरित्र हैं उसमें। तो जो दूसरा उसका चरित्र है, वो अध्याय दो-तीन-चार से आता है। इसमें प्रकृति माने देवी अपने रजोगुणी रूप में प्रकट होती हैं। ठीक है? यहाँ जो उनका नाम है, वो है महालक्ष्मी। और यहाँ जिस असुर का संहार है, उसका नाम है महिषासुर। महिषासुर प्रमुख असुर है। उसके अलावा कम-से-कम एक दर्जन नाम और आते हैं, वो सब जो छोटे-मोटे थे जिनका वध हुआ।

तो जो दूसरा चरित्र है, आज हम उसको, उसके सार को समझेंगे और चर्चा करेंगे। तो पहला चरित्र समाप्त हुआ था कि जो तमोगुणी महाकाली हैं, उन्हीं के प्रभाव से पहले तो मधु-कैटभ की उत्पत्ति होती है शरीर के मैल से। और फिर वही जब दोनों असुरों की मति फेर देती हैं तो उससे दोनों असुरों का संहार हो जाता है। ये पहले पाठ की कथा थी, पहले चरित्र की। पहले चरित्र में बस पहला ही अध्याय आता है। तो वहाँ पर जो हमारा पहला चरित्र समाप्त हुआ था कि तमोगुणी महाकाली द्वारा मधु-कैटभ का संहार श्री विष्णु के हाथों होता है। तो वहाँ समाप्त होता है। और फिर दूसरा अध्याय है वो आरम्भ होता है, और दूसरा अध्याय ही दूसरे चरित्र का आरम्भ है। और इसमें आरम्भ में ही बड़ी भारी लड़ाई चल रही है। और वहाँ दिखाया था पहले चरित्र में कि जो लड़ाई थी विष्णु और मधु-कैटभ की, वो पाँच हज़ार साल चली थी।

तो ये एक शैली है। कथा में ये एक शैली होती है, अतिशयोक्ति। तो पाँच हज़ार वर्ष लड़ाई चली, यहाँ पर भी यही है कि एक-सौ साल लड़ाई चली। तो चाहे पाँच हज़ार वर्ष कहा जाए चाहे एक सौ साल कहा जाए, इशारा ये है कि ये एक बहुत लम्बी और बहुत प्राचीन लड़ाई है, बस इतना समझना है। सौ का अर्थ ये नहीं होता कि निन्यानवे नहीं या एक-सौ-एक नहीं। सौ से आशय है पुरानी और बहुत लम्बी।

तो लम्बी एक लड़ाई है देवताओं और दानवों के बीच में जो सौ साल से चल रही है। और देवताओं का नेतृत्व कर रहे हैं इन्द्र और असुरों का नेतृत्व कर रहा है महिषासुर। तो वो इस दूसरे चरित्र में एक प्रमुख पात्र है महिषासुर, और सौ साल में ही देवताओं की हो जाती है पिटाई। वो झेल नहीं पाते, पाँव उखड़ जाते हैं। जब पाँव उखड़ जाते हैं तो हमें बताया जाता है कि जितने अधिकार थे देवताओं के, वो सब महिषासुर ने अपने हस्तगत कर लिये। हस्तगत माने? ले लिये, अपने हाथ के नीचे ले लिये। तो सूर्य का प्रकाश और सूर्य की यात्रा जो प्रकृति द्वारा निर्धारित होती थी, वो किसके द्वारा निर्धारित होने लगी? महिषासुर के द्वारा, क्योंकि सूर्यदेव का तो काम अब ले लिया महिषासुर ने अपने हाथ में। वरुण जिस तरीके से जल का और बादलों का संचालन करते थे, वो सब किसने ले लिया?

श्रोतागण: महिषासुर ने।

उत्तर: तो पूरी जो प्रकृति है उसमें त्राहि-त्राहि मच गयी, क्योंकि जो ये देवता लोग थे, ये एक व्यवस्थित तरीके से प्रकृति के प्रतिनिधि हैं। जो सारे देवता हैं वो प्रकृति की ही शक्तियों के प्रतिनिधि होते हैं। तो ये सारे देवता लोग तो प्रकृति माने महादेवी के अन्तर्गत काम करा करते थे एक नियमित और अनुशासित रूप से। तो सूर्य को कभी देखा है कि वो अपने अनुशासन से विचलित होता हो? देखा है क्या? या चाॅंद-तारों किसी को देखा है? सब अपने-अपने नियमों के अनुसार काम करते है न? हाँ, तो वो जो नियम हैं, वो किसके नियम हम कहते हैं? प्रकृति के नियम। तो ये तो देवी के नियमों के नीचे काम किया करते थे।

लेकिन असुर ने क्या करा? असुर ने कहा कि मैं सारे नियम प्रकृति के तोड़ दूँगा। तो आग का नियम तोड़ दिया, उसने वनस्पति का नियम तोड़ दिया, हवा का नियम तोड़ दिया, वायु का, जितने भी थे। ये सब जो हैं, देवताओं के रूप में प्रकट होते हैं। तो सब देवताओं को हरा दिया और प्रकृति के सारे नियम तोड़ दिये।

मतलब समझिए कि यहाँ पर देवी से आशय क्या है। देवी प्रकृति ही है और प्रकृति का भोग नहीं करना है, ये दुर्गा सप्तशती का मूल सन्देश है। प्रकृति भोगने के लिए नहीं है, प्रकृति का सम्मान करो। प्रकृति से कोई नहीं जीत सकता, छेड़छाड़ मत करो। चाॅंद-तारे ये तुम्हारे उपयोग, उपभोग के लिए नहीं बने हैं।

तो महिषासुर ने लेकिन देवताओं को हरा दिया। उसके पास बड़े तरीके के ज़बरदस्त अस्त्र-शस्त्र थे, संसाधन थे, बड़ी उसकी सेना थी। इससे उसके बारे में क्या पता चलता है? कोई वो हल्का आदमी तो रहा नहीं होगा। अब महिषासुर कोई इंसान नहीं है। महिषासुर भी एक प्रतीक भर है, पर वो किस चीज़ का प्रतीक है, ये हम समझना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि कोई व्यक्ति है महिषासुर कि यहाँ रहता था और फिर भैंसा बन जाता था और ऐसा होता था। ये सब तो समझाने के लिए हमें कुछ बातें बोली गयी हैं।

पर जो बात हमें समझायी जा रही है, वो बड़े महत्व की है। देवताओं को हराया जा सके इसके लिए महिषासुर में क्या सामर्थ्य रही होगी? ज्ञान भी रहा होगा, प्रबन्धन की क्षमता भी रही होगी, सैन्य नेतृत्व भी उसका ज़बरदस्त रहा होगा। इतनी बड़ी उसने सेना खड़ी करी है, हल्के आदमी की बात है? बोलो। और इतने लम्बे समय तक वो देवताओं से संघर्ष कर रहा है, इसके लिए उसमें कई तरीके की क्षमताएँ होंगी — साहस होगा, जीवट होगा, बड़ा पुरुषार्थी होगा, बड़ा कर्मठ होगा और ज्ञानी भी बहुत होगा — क्योंकि सारे देवताओं से एकसाथ लोहा ले लिया है तो ज्ञान के बिना तो ये कर नहीं सकता। तो ये सबकुछ है उसमें।

लेकिन इस नीयत से है कि इनको हराकर के फिर प्रकृति को भोगना शुरू कर दूँ। समझो, साहस भी है, कौशल भी है, ज्ञान भी है, सब है उसमें, लेकिन चाह वो ये रहा है कि अपने साहस, कौशल, ज्ञान का उपयोग करे प्रकृति के शोषण, खनन और भोग के लिए। तो उसने ये सब करना शुरू कर दिया देवताओं को हराकर।

असुर की परिभाषा देख लीजिए साफ़-साफ़। असुर वो नहीं है जैसा कि हम दिखा देते हैं कि उसके भयानक लम्बे-लम्बे दाॅंत और सिर पर सींग है। पीछे कई बार पूॅंछ दिखा देते हैं और हा-हा-हा कर रहा है। मूर्ख सा लगता है ये जो दिखाते हैं, बच्चे हॅंसते हैं। ये जो असुरों वाले जितने एनिमेशन होते हैं या धारावाहिक वगैरह होते हैं, वहाँ वो अपनी तरफ़ से तो असुर को डरावना बनाते हैं और छोटे-छोटे बच्चे हँस-हँसकर पागल हो जाते हैं, कहते हैं, ’सो फ़नी !’ असुर ऐसा थोड़े ही होता है! इतने देवताओं — और यहाँ तो देवता ही भर हैं, पहले चरित्र में तो स्वयं भगवान विष्णु थे और मधु-कैटभ से पाँच हज़ार साल लगे हैं, हार नहीं रहे हैं मधु-कैटभ।

तो ये कोई विदूषक जैसा चरित्र तो नहीं हो सकता होगा। ये तो कई तरीके की प्रतिभा, कौशल और ज्ञान से सम्पन्न चरित्र है जिसने देवताओं को परास्त ही कर डाला, फिर भी वो असुर कहला रहा है, क्योंकि असुर के लिए ये नहीं ज़रूरी है कि उसकी काया का रंग कैसा है। असुर के लिए ये नहीं है कि आप बहुत तमोगुणी हो, तामसिक हो इत्यादि, इत्यादि। नहीं, उससे भी नहीं है। लिख लीजिए अच्छे से, ‘असुर वो जिसमें प्रकृति को भोगने की कामना हो, जो दुनिया को देखता ही ऐसे है कि दुनिया से अधिक-से-अधिक क्या नोच-खसोट लूँ, क्या लूट लूँ, क्या पा लूँ, उसको असुर कहा गया है।’

तो बहुत बड़ा ज्ञानी हो सकता है फिर भी असुर होगा। बहुत तरह की उसमें प्रतिभा, गुण, कुशलता हो सकती है फिर भी वो असुर होगा। बड़ा तपस्वी हो सकता है फिर भी असुर होगा। बहुत उसमें धीरज हो सकता है फिर भी असुर होगा।

ज्ञानी असुर नहीं जानते क्या? रावण क्या था? महाज्ञानी। और इतने बड़े-बड़े तपस्वी असुर हुए हैं। कैसे भूल सकते हैं भस्मासुर को? उसने कैसे पाया था वरदान? तपस्या करके। वैसी तपस्या किसी और ने नहीं करी थी। महादेव प्रसन्न हो गये। बोले, ‘बताओ क्या चाहिए?’ वो बोला, ये चाहिए। बोले, ‘तथास्तु।’ वो भी अपनेआप को रोक नहीं पाये वरदान देने से। तो आप हो सकता है बहुत बड़े तपस्वी हों, फिर भी आप असुर ही हैं।

सवाल ये है कि तपस्या कर क्यों रहे हो। अगर भोग की कामना से तपस्या कर रहे हो तो असुर हो। कुछ भी कर रहे हो तुम, तुम्हारी कामना आकर उसको गन्दा कर देती है अगर भोग की कामना है तो। ऊँचे-से-ऊँचा काम भी भोग की कामना द्वारा गन्दा कर दिया जाता है। भोग की कामना ऐसी है कि जैसे आप बढ़िया शुद्ध-से-शुद्ध और स्वादिष्ट-से-स्वादिष्ट व्यंजन बनायें और उसके ऊपर कीचड़ का लेप कर दें। अब उसे कौन खाएगा? कौन खाएगा? कोई नहीं।

भोग की कामना हर चीज़ को गन्दा कर देती है, आपके ज्ञान को गन्दा कर देती है, आपके तप को गन्दा कर देती है, प्रेम को गन्दा कर देती है। जितने भी आप सद्गुण ला सकते हैं — अपने जिस अर्थ में सद्गुण शब्द का इस्तेमाल होता है — जितने भी आप सद्गुण ला सकते हैं, वो सब गन्दे हो जाते हैं बस अगर कामना पीछे भोग की है।

श्रीमद्भगवद्गीता इसीलिए सर्वोच्च ग्रन्थ है। पहले वो वेदान्त की प्रस्थानत्रयी में सबसे ऊपर है, प्रसिद्धि में सबसे ऊपर है और फिर सनातन धर्म के भी सभी ग्रन्थों में सबसे ऊपर है, क्योंकि उसके केन्द्र में निष्कामता बैठी है। निष्काम कर्म की बात सबसे ज़्यादा प्रखर तरीके से श्रीमद्भगवद्गीता में निकलकर आती है, इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता ग्रन्थ शिरोमणि है। वो बताती है बिना कामना के कैसे एक सच्चा, गहरा, प्रेमपूर्ण और सफल जीवन जीना है।

हमने कहा, ‘कामना हर चीज़ को गन्दा कर देती है।’ तो ये बेचारे महिषासुर की और नहीं कोई गलती थी; कामना बहुत थी इसके पास और कुल कामना यही थी कि नदियों को भोग लूँगा, पहाड़ों को भोग लूँगा, पशुओं को भोग लूँगा। पूरा जो दूसरा चरित्र है, वो महिषासुर के भोग से भरा हुआ है। और तीसरे चरित्र में तो ये बात और खुलकर सामने आएगी। जब शुम्भ-निशुम्भ का तीसरे चरित्र में वध हो जाता है, तब देखिएगा क्या होता है।

तब पता चलता है हमें कि वहाँ जो बात करी जा रही है, वो पुरानी बात नहीं करी जा रही, वो आज की बात करी जा रही है। ऐसा लगता है जैसे शुम्भ-निशुम्भ वो लोग हैं, उन लोगों के प्रतिनिधि हैं जिन्होंने आज पृथ्वी पर क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) की आपदा डाल दी है। शुम्भ-निशुम्भ गये और कहते हैं कि क्लाइमेट चेंज के जितने भी लक्षण थे, वो सब हट गये। और वहाँ जो एक-एक लक्षण बताया गया है, आप पाओगे कि वो जलवायु परिवर्तन का ही है।

आऍंगे तीसरे चरित्र पर। तो अभी दूसरा चरित्र है। तो अब इन्होंने क्या किया? पूरी प्रकृति को अपने हस्तगत कर लिया। ‘साहब, मेरे हिसाब से चलेगा मामला, मेरे हिसाब से चलेगा।’ तो ये लोग रोते-कलपते गये। जब हार जाते हैं तभी ये जाते हैं। तो वहाँ पर महादेव हैं, विष्णु हैं। ये जाते हैं उनके पास और बताते हैं ऐसा हो गया है। और जब वो बताते हैं कि इन्होंने सारी व्यवस्था तोड़ दी है प्रकृति की और इन्होंने इस तरह की पृथ्वी पर पूरे तबाही ला दी है।

तो आता है कि भारी क्रोध करते हैं दोनों। कौन? महादेव और श्री विष्णु, ये एकदम कुपित हो जाते हैं और फिर विष्णु के ही क्रोध से, विष्णु की ही कुपित काया से एक शक्ति उत्पन्न होती है नारी आकार में, और वो पैदा ही बड़े क्रोध के साथ होती है। क्रोध से ही उसकी उत्पत्ति है और वो स्वयं भी कुपित ही जन्म लेती है देवी शक्ति।

तो जो हम असुरों वाली बात कर रहे थे उसको थोड़ा यहाँ आगे बढ़ायें, तो क्या पता चलता है? हम आमतौर पर मानते हैं तपस्या अच्छी है। आपसे कहा जाए एक तपस्वी है, एक क्रोधी है, दोनों में तुरन्त आप किसको बोल दोगे अच्छा? तपस्वी को। पर आप कहोगे, ‘क्रोधी होना तो ठीक नहीं है, आध्यात्मिक बात नहीं है।’

दुर्गासप्तशती हमें कुछ समझा रही है। कह रही है, ‘न तपस्या अच्छी है न क्रोध बुरा है, सत्यनिष्ठा अच्छी है और असत्यनिष्ठा बुरी है।’ गलत कामना के साथ तपस्या करी, तो तपस्या बुरी है। तपस्या न अच्छी है न बुरी है, निर्भर कामना पर करता है। असुर तपस्वी भी हो सकता है, पर उसकी कामना खराब है इसीलिए वो असुर कहलाएगा। और देवी महाक्रोधी हो सकती हैं पर उनका क्रोध प्रकृति की रक्षा के लिए है, तो इसलिए वो देवी कहलाऍंगी। न क्रोध बुरा है न तपस्या अच्छी है, अच्छा या बुरा इसका निर्धारण होता है आपकी कामना की दिशा से। सही कामना के लिए क्रोध आ रहा है, कोई बात नहीं और गलत कामना के लिए तपस्या भी कर रहे हो तो बहुत बुरी बात है।

देवी का जन्म ही है वो क्रोध से हो रहा है और वो पूरे चरित्र में कुपित ही रहती हैं, और यही नहीं कि दूसरे चरित्र में कुपित हों, तीसरे चरित्र में भी एकदम कुपित हैं — कुपित हैं, हत्या कर रही हैं, मार रही हैं, इसको मारा, उसको मारा, इसका वध किया, उसका वध किया।

बहुत लोगों ने ये प्रश्न करा है। कह रहे हैं, ‘इतना रक्तपात, इतनी हिंसा!’ मैंने कहा, ‘तुम हिंसा का अर्थ ही नहीं समझे।’ हिंसा पर मैंने बहुत बात करी है और किताबों में अपनी बहुत बार हिंसा पर लिखा है, बोला है, अध्याय हैं पूरे-पूरे, हिंसा पर। आप पहले समझना कि हिंसा का अर्थ क्या होता है। ये हिंसा नहीं है।

वो तपस्या जो कामना के लिए करी जाए वो बड़ी भारी हिंसा है, और वो क्रोध जो सच्चाई की रक्षा के लिए किया जाए, उसमें कोई हिंसा नहीं है। वही अहिंसा है। सत्य की रक्षा के लिए जो कुछ भी करो, वो अहिंसा है और अहंकार को और फैलाने के लिए जो भी कुछ करो, वो हिंसा है। समझ में आ रही है बात?

तो अब ये जो तेजोमय नारी रूप था, ये प्रकट हो जाता है। ये प्रकट होकर हुँकार करता है, ये बहुत कुपित है। तो ये सब देवता जो पराजित होकर आये थे, ये सब देवता अपनी-अपनी शक्तियाँ ये उस रूप को प्रदान कर देते हैं। शक्तियाँ, शस्त्र, अलंकार, आभूषण उस रूप को ये समर्पित कर देते हैं। कहते हैं, ‘हमारे पास जो कुछ भी ऊँचे-से-ऊँचा है, वो आपको देते हैं, आप लीजिए।’ ठीक है? इसमें आशय क्या है? इसमें आशय है ये जानना कि तुम्हारे पास जो है, वो प्रकृति का ही दिया हुआ है। लेकिन विमूढ़ अहंकार ये मान लेता है कि मेरा है।

तो सब देवता जो अपनी शक्तियाँ देवी को अर्पित कर रहे हैं, उससे आशय ये है कि उनको ज्ञान आ गया, थोड़ी अक्ल आ गयी, शायद श्रीमद्भागवद्गीता पढ़ आये। कौनसा श्लोक है गीता का जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम क्यों सोच रहे हो कि ये तुम्हारा है? ये तो प्रकृति के तीन गुण हैं। सारे काम प्रकृति कर रही है, प्रकृति माने शक्ति, देवी। सारे काम प्रकृति के हैं लेकिन तुम्हारा अहंकार यूँही फूलकर कुप्पा हो रहा है, ‘मैंने किया, मैंने पाया, मैंने भोगा।’ तुम कुछ हो नहीं, तुमने क्या किया!

तो देवता जो अपना पूरा स्वत्व है, वो किसको दे रहे हैं अभी? देवी को दे रहे हैं, ‘लो!’ तो उससे आशय यही है कि आप ये जान गये कि ये तो मेरा कभी था ही नहीं। और चूॅंकि मैंने इसको अपना मान रखा था इसीलिए महिषासुर से फिर पिटाई खायी। अहंकार ही हारता है। तो अपना मानकर बैठे थे। और देवताओं का तो ऐसा ही है — पुरानी किताबों में, पुराणों में, वो हर दूसरे अध्याय में अहंकार-ग्रस्त हो जाते हैं। जब अहंकार-ग्रस्त हो जाते हैं तो उनका क्या होता है? फिर वो भागे-भागे आते हैं, कभी यहाँ तो कभी वहाँ। और फिर उनको कुछ सहायता दी जाती है तो फिर वो अपना पाते हैं वापस सब। अब जब उनके साथ कुछ गड़बड़ हो गयी है, तो उनको बात समझ में आयी कि हम तो यूँही ज़बरदस्ती “अपने मुँह मिया मिठ्ठू” हो रहे थे। जो जिसका है उसको दे दो। “तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मेरा।” और बहुत सारी बातें हैं न?

सुख में सुमिरन सब करें, दुख में करें न याद। कहें कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद।। ~ कबीर साहब

तो चलो, दुख में तो याद आ गया, सत्य याद आ गया दुख में। दुख में सत्य याद आ गया कि ये सब हमारा तो था ही नहीं, हमने व्यर्थ ही इस पर अपना अहंकार चढ़ा दिया। तो देवी को अपना सब दे दिया उन्होंने। समझ में आ रही है बात? नहीं तो ये चीज़ें हम बहुत जगह देखते हैं। टीवी पर देखते हैं और पढ़ लेते हैं और सोचते हैं, हमें लगता है कि सचमुच इन्द्र ने अपना ये दे दिया, फ़लाने ने अपना ये शस्त्र दे दिया और सूर्य ने अपना तेज दे दिया। इस तरह हम कहते हैं।

तो दे दिया माने क्या दे दिया? दे नहीं दिया, जिसका था जान लिया कि उसका है। ऐसे दिया जाता है। देना माने ऐसा थोड़ी होता है कि अपना कुछ निकालकर दे दिया। निकालकर नहीं दे दिया, झूठ को झूठमूठ ग्रहण करे हुए थे। जो चीज़ तुम्हारी नहीं है, उसको अपना माने बैठे थे। अब जान गये कि हमारी तो कभी थी ही नहीं। तो एक तरीके से जो पकड़े बैठे थे, उसका त्याग कर दिया। इसी को कहते हैं दे देना।

तो ऐसे उस देवी-शक्ति का निर्माण हुआ। निर्माण नहीं कहना चाहिए, निर्माण जड़ वस्तुओं का होता है, उत्पत्ति कह लीजिए। उत्पत्ति भी लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं है, प्रादुर्भाव कहना चाहिए — प्रादुर्भाव हुआ या प्राकट्य हुआ। ठीक है?

तो अब क्या होता है? अब हम यहाँ से जाते हैं सीधे रणक्षेत्र पर। तो रणक्षेत्र में क्या हो रहा है? महिषासुर प्रसन्न बैठा हुआ है कि मैं तो जीत गया। वहाँ वो प्रसन्न होकर क्या रहा है? वो कर रहा है कि पूरे ब्रह्मांड के साथ तबाही — उसने नदियाँ गन्दी कर दी हैं, उसने सूरज, चाॅंद-तारों, ग्रहों-नक्षत्रों इन सबकी दिशा बदल दी है, उसने पहाड़ तोड़ दिये हैं। और अभी जब युद्ध होगा तो देखिएगा क्या करेगा वो। उसने सागरों में इतनी हलचल मचा दी है, बाप रे! बोलते हैं, सागरों का स्तर उठ गया है और सागरों ने भूखंडों को लील लिया है। ये कब होता है? सागर का स्तर उठना और सागर जाकर भूखंड को खा जाए, ये कब होता है? ये ग्लोबल वार्मिंग में होता है।

तो ये सब महिषासुर कर रहा है ग्लोबल वार्मिंग वाले काम। समझिए, महिषासुर कौन है। महिषासुर कोई ऐतिहासिक चरित्र नहीं है कि किसी समय कोई आदमी था जो भैंसा बन जाता था, उसको महिषासुर बोलते थे। हम महिषासुर हैं। जो भी प्रकृति का अनादर करे, छेड़छाड़ करे, भोग भर करे, शोषण करे, वही महिषासुर है। तो महिषासुर यही सब कर रहा था।

और बड़े ज़बरदस्त नाम हैं तो मेरी स्मृति से नहीं बताऊँगा, पढ़ना पड़ेगा। एक-से-एक नाम हैं, लिख लीजिए बच्चों को नाम देने के लिए काम आएँगे (व्यंग्य करते हुए)। आजकल चल रहा है कि बच्चों को एकदम अनूठे नाम देने हैं, यूनिक जो किसी के न हों। खासतौर पर अगर आप थोड़ा समाज में इज़्ज़त पा गये हैं, तो आप अपने बच्चे को राकेश या मोहन नाम तो दे ही नहीं सकते। और बेटी है तो उसको सीता या गीता नाम तो दे ही नहीं सकते। उसका नाम होगा यक्षिका। भले ही उस नाम का कोई बहुत ही भद्दा अर्थ होता हो, पर नाम में ही कूलनेस होनी चाहिए। तो सबसे कूल ये सब नाम हैं। लिखो, ये देना अपने बच्चों को नाम — बिडाल, कराल, चिक्षुर, चामर। ये बड़े ज़बरदस्त किस्म के राक्षस थे। रख दो बच्चे का नाम दुर्दुर, दुर्मुख। जिसके मुख से बस गालियाँ निकलती हैं, उसके लिए क्या नाम है बढ़िया? दुर्मुख। या गाली काहे बोलो, जिसके मुँह से बस कामना फूटती हो, ‘ये चाहिए, वो चाहिए, मम्मा आप वो दिला दो, पापा आप वो दिला दो।’ ऐसे बच्चे का तो नाम दुर्मुख होना चाहिए और कुछ नहीं।

तो अब तीसरा अध्याय शुरू हो गया है दूसरे चरित्र का। तो इसमें आया सबसे पहले चिक्षुर। तो चिक्षुर आता है तो देवी मारती है शूल, फट् से मर जाता है। अब ये सब दैत्य कौन हैं? ये सब दैत्य समझ लीजिए कि अपना-अपना विभाग सम्भाल रहे होंगे भोग का। किसी को बोला गया होगा कि जाओ, वनों को भोग डालो तो वो वनों को काट रहा है। किसी को बोल दिया होगा कि जितने जानवर हैं सबकी खाल उतार लो, उस खाल से हम कुछ अपना सुख भोग लेंगे तो वो अपना खाल उतार रहे हैं। उन खालों के कपड़े बन रहे होंगे या जो भी हो रहा होगा। तो ये सब इतने सारे हैं।

फिर आता है एक चामर नाम का, वो हाथी पर बैठकर आया था। देवी का सिंह जो है वो बहुत गुस्से में है, और उसके लिए बार-बार आता है। और वो बात मुझे बड़ी रोचक लगती है कि देवी का सिंह जो है, वो ऐसे-ऐसे (गोल-गोल) अपना सिर हिलाता रहता है और उसके जो बाल हैं यहाँ पर (छाती पर), वो बाल ऐसे झूमते रहते हैं, और बड़ा भारी देवी के सिंह का मुँह है। आधे दैत्य तो देवी का सिंह ही साफ़ कर रहा है। वो कह रहा है कि तुम पहले तो मुझसे निपटो।

तो ये आया है चामर। अब चामर आता है तो देवी का सिंह उछलकर उसके हाथी के ऊपर बैठ जाता है, और फिर चामर का वध भी सिंह ही करता है। ‘देवी को ज़रूरत ही नहीं, मैं ही काफ़ी हूँ।’

सिंह इसलिए कुपित होगा कि जब जंगल खराब कर दोगे तो विलुप्त तो सिंह ही होता है न। फिर आप चलाते हो ’मिशन टाइगर’, ‘सेव टाइगर’, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’। जब कुछ छोड़ोगे ही नहीं तो टाइगर भी नहीं बचता है। फिर बाहर से चीते लाते हो और वो चीते भी मर गये सब। और कहाँ गये वो शेर भी जो गिर में होते थे? कहाँ हैं? भारत के कितने शेर बचे हैं? तो बाकी सब जब मार दोगे तो शेर भी नहीं बचता, इसीलिए देवी का सिंह बहुत कुपित है। तो ये चामर तो गया!

अब ये मैं सीधे उद्धृत कर रहा हूँ श्लोक से ही, “सिंह बड़े वेग से आकाश की ओर उछला और उसने गिरते समय पंजों की मार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।” ये चामर कोई पक्का ऐसा आदमी है जिसने जंगल में कुछ लकड़ी माफ़िया, रेत माफिया या कोयला माफ़िया, लोहा माफ़िया कुछ चला रखा होगा। तो सिंह ने कहा, ‘इसी ने पूरे सब पेड़ काटे, इसी ने घास तक नहीं रहने दी।’ जब घास नहीं बची, तो हिरण नहीं बचे। जब हिरण नहीं बचे, तो शेर कहाँ से बचेगा। समझ में आ रही है बात?

फिर आता है कराल। “तो क्रोध में भरी हुई देवी ने गदा की चोट से कचूमर निकाल दिया।” फिर आता है उद्धत, फिर आता है बाष्कल। ये सारे बढ़िया नाम हैं, एकदम नाम में ही कुछ खनक है, ‘बाष्कल’। फिर आते हैं ताम्र और अन्धक, उग्रास्य उग्रवीर्य और महाहनु। अब वो बच्चा है छोटा उसको बचपन से ही उल्टा-पुल्टा सब दिखा दिया है। घर में माँ-बाप बैठकर एडल्ट मूवी देखते थे, उसने भी देख ली है। तो ऐसे का नाम रखना है उग्रवीर्य। बस ये समझ लो लेकिन कि ऐसे नाम रखोगे तो मारा वो जाएगा देवी के ही हाथों। और जो आज उग्रवीर्य है, वो कल लुप्तवीर्य बनेगा। देवी के हत्थे चढ़ेगा, बचेगा थोड़ी! तो ये सब जो दैत्य हैं, ये मारे गये। “तलवार की चोट से बिडाल के मस्तक को धड़ से काट गिराया। और दुर्धर और दुर्मुख इन दोनों को भी अपने बाणों से यमलोक भेज दिया।”

भोग आपकी शक्ति हर लेता है। उसके बाद जब आपके सामने कोई सत्य का प्रतिनिधि बनकर आएगा, तो आप किसी भी तरह उसके सामने खड़े हो नहीं पाऍंगे। आप उसी दिन तक बचे हुए हैं जिस दिन तक कोई सच्चा आदमी आपका हिसाब करने आपके सामने आया नहीं है, जिस दिन आ गया, उस दिन बचोगे नहीं।

हम उस दिन बात कर रहे थे न कि जिसको तुम भोगते हो, उसको तुम नहीं भोग रहे, वो तुम्हें भोग रहा है। तो भोग आपकी सब शक्ति का हनन कर देता है। और भोग की परिभाषा क्या है? वो सबकुछ जो आप अपने अहंकार की वृद्धि के लिए करो, उसको भोग बोलते हैं। ऊँचे-से-ऊँचा काम भी अगर इस नीयत से हो रहा है कि इससे अहंकार तृप्त हो जाएगा, तो उसे भोग ही मानना। बहुत बड़ा त्याग भी किया जा रहा है इस नीयत से कि इससे कुछ लाभ मिल जाएगा, तो वो भी भोग है।

कठोपनिषद् को मत भूलिएगा। नचिकेता ने यही तो पूछ लिया था पिताजी से कि ये सब जो आप दे रहे हो, आपका नाम तो बहुत फैलेगा — आपका तो नाम ही पड़ा हुआ है कि महादानी हैं आप, नाम तो बहुत फैलेगा आपका — लेकिन ये तो बताओ, ये जो आप दे रहे हो सब बूढ़ी गायें, इसका औचित्य क्या? तो वो जो त्याग था, वो भी भोग सरीखा ही था। वहीं से फिर कठोपनिषद् आगे शुरू होता है।

तो महिषासुर की जो पूरी सेना है, उसका संहार चल रहा है। देवी के सामने एक से बढ़कर एक दैत्य आ रहे हैं और देवी किसी को गदा से, किसी को बाण से और किसी को बस घंटे की नाद से धराशायी कर रही हैं। और कुछ तो ऐसे हैं जो देवी से बस थप्पड़ खाकर ही मर गये। इतनी ताकत बचती है कि देवी ने एक लगाया, वो कराल राक्षस बड़ा विकराल बनकर आया था और थप्पड़ से ही मर गया।

तो महिषासुर कुपित हुआ। बोला, ‘मेरी पूरी सेना का संहार हो रहा है। तो उसने भैंसे का रूप लिया। और उसने देवी के जो सब गण थे माने उनके जो सेवक, अनुचर ये सब थे, उनको उसने सताना शुरू किया। किसी को ऐसे मार रहा है, किसी को वैसे मार रहा है। तो क्या कर रहा है? किसी को थूथुन से मार रहा है, किसी को खुरों से मार रहा है, पूँछ घुमा-घुमाकर मार रहा है सबको और किसी को सींगों से क्षत-विक्षत कर रहा है, किसी को ज़ोर से जाकर सिर से मार दिया, किसी को आवाज़ से परेशान किया, किसी को सींग पर उठाकर चक्कर घुमा-घुमाकर मारा और कितनों को ही तो उसने इतनी ज़ोर से साँस ली कि वो ऐसे ही मर गये; फुफकारता सा है न? आपने भैंसे को नहीं देखा, साँड को देखा होगा, फुफकारता है बहुत ज़ोर से, ऐसा लगता है दहाड़ ही रहा हो। तो कई तो उससे ही मर गये।

अब ये पशु का जो रूप लिया है महिषासुर ने, इससे हमें क्या पता चलता है? क्या पता चलता है? देवी सिंह पर सवार हैं और महिषासुर खुद बन बैठा है महिष। इससे क्या पता चलता है हमें? देवी वो जो पशुता से ऊपर उठी हुई हैं, जो पशुता की स्वामिनी हैं और असुर वो जो स्वयं ही पशु है। और एक जगह पर तो आकर के महिषासुर सिंह भी बन जाता है, अभी आगे होगा ऐसा तो वहाँ तो बात और स्पष्ट हो जाती है। देवी सिंह पर सवार है और महिषासुर किसका रूप ले रहा है? सिंह का। तो बहुत स्पष्ट हो जाती है बात कि क्या है।

तो अब वो भैंसा बनकर सिंह को मारने के लिए झपटता है। जब सिंह को मारने के लिए झपटता है तो क्या करता है? वो धरती को खुरों से खोदने लगा जिससे पूरी धरती क्षुब्ध हो गयी। देखो, अब कोई साधारण पशु अगर खुरों से धरती को खोदेगा, तो वो नहीं क्षुब्ध हो जाऍंगी। खुरों से धरती को खोदना क्या हुआ? साधारण थोड़ा-बहुत खोदोगे तो पृथ्वी क्यों मना करेगी? ये किस स्तर की खुदाई है? ये माइनिंग है। उसने इतना खोदा, इतना खोदा कि पृथ्वी हाय-हाय कर उठी कि ये क्या कर रहे हो। और अपने सींगों से ऊँचे-ऊँचे पर्वतों को उठाकर फेंकने लगा। ये पर्वतों को उठाकर फेंकने लगा से क्या आशय है? वही जो भी आपने सिक्किम में देखा है तीस्ता नदी के साथ — विकास के नाम पर पर्वतों की कटाई। जो लोग और देश विकास की बात करके पर्वतों को काटें, जैसा कि पूरे विश्व में हुआ है, भारत में भी हो रहा है, वही असुर हैं। तो वो अपने सींगों से उठा-उठाकर सबको फेंक रहा है, उसके लिए सबकुछ बस उसकी कामना पूर्ति का साधन बस है। मेरी कामना ये है — ये देवी हैं, इनको परास्त करना है तो उसके लिए मैं सारे पहाड़ तोड़ दूॅंगा। शत्रु को हराना है, पहाड़ काट दो, ये असुरता का प्रतीक है। शत्रु को हराना है तो पहाड़ ही काट दो, ये असुरता की निशानी हो गयी। शत्रु को हराना है तो नदी बाॅंध दो।

भारत के लिए जानते हैं एक खतरा क्या है? ब्रह्मपुत्र चीन में बड़ा लम्बा रास्ता तय करके आती है भारत। और चीनियों ने उसमें बना दिये हैं बाॅंध। और युद्ध की स्थिति में उन बाॅंधों का दुरुपयोग होगा, कुछ वैसा ही डर पाकिस्तानियों को लगता है। उनकी सिन्धु नदी भारत के लद्दाख से होकर खूब जाती है। उनको लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ न कर दें युद्ध की दिशा में, और ये होता आया है। भारत का तो पता नहीं, पर चीन की ओर से पूरी आशंका है कि अगर अपनी कामना पूरी करनी है, जो अपने को दुश्मन लग रहा है उसको हराना है, तो कुछ भी कर लो। पूरी नदी ही भले क्यों न खराब हो जाए, नदी के सारे जीव क्यों न मर जाऍं, पर कोई बात नहीं, हमें तो जीत मिलेगी न, हमें तो जीत मिलेगी।

कावेरी विवाद चल ही रहा है, वो आप जानते ही हो। बीच-बीच में दिल्ली को पानी आने पर भी बहुत चर्चा और बड़ा विवाद होता है, वो भी आप जानते ही हो। मेरे स्वार्थ पूरे होते रहें उसके लिए नदियों का, जलाशयों का मुझे भोग करना पड़े, दुरुपयोग करना पड़े, कोई बात नहीं, मैं करूँगा।

उत्तराखंड में आपने देखा ही है जोशीमठ का हाल। और खासकर जब मॉनसून रहते हैं तब वहाँ क्या हालत होती है, ये कोई छुपी चीज़ अब नहीं है और वो बात बढ़ती ही जा रही है। जोशीमठ कोई छोटी-मोटी जगह नहीं थी, वो जगह अब नक्शे से ही गायब हो गयी है। कारण यही है, पहाड़ को काटना है, सुरंग बनानी है, रेल ले जानी है। यही सब बात यहाँ बतायी गई है। समझ रहे हो?

लेकिन हम हर चीज़ का ट्रिविलाइज़ेशन (तुच्छीकरण) कर देते हैं। इस पर बहुत तरह के वृत्तचित्र, और वृतचित्र तो क्या बोलूॅं मैं, धारावाहिक इत्यादि बने हैं। उनमें आप देखिएगा तो ऐसे ही दिखाते हैं जैसे सचमुच महिषासुर कोई भैंसा है और उसने अपनी सींग से पहाड़ उठा लिया है।

फिर इसीलिए जो बुद्धजीवी वर्ग है, वो धर्म से दूर हो जाता है। वो कहता है, ‘हम ये गप्प और किस्सा-कहानी नहीं मानते हैं कि कोई भैंसा ऐसा था जिसने अपनी सींग से पहाड़ उठा लिया।’ वो भी भैंसा भैंसा नहीं है असली, वो असुर है। बोले, ‘ये हम मानेंगे नहीं।’ जबकि बात ये है कि ये जो कथा है, इसमें बहुत गहरा सार और छुपा हुआ मर्म है। उसको अगर हम समझ पाये तो हमारे आज के जीवन में बड़ी मदद मिलेगी, पर अगर हम समझ नहीं पाऍंगे तो बात भक्ति के नाम पर बस मनोरंजन तक ही रह जाएगी। नवदुर्गा प्रत्येक वर्ष आऍंगी, चली जाऍंगी और हम उनसे कुछ सीख नहीं पाऍंगे। हम देवी को कभी जान नहीं पाऍंगे, क्यों? क्योंकि हम कथा की जो प्रतीकात्मकता है, उसका उद्घाटन ही नहीं कर पाते। हम प्रतीकों को ही सत्य मान लेते हैं।

हम हर चीज़ को लिटरली ले लेते हैं, उसके शाब्दिक अर्थ पर ही ले लेते हैं जबकि अर्थ लिटरल नहीं हैं, सिम्बॉलिक हैं, प्रतीकात्मक हैं, सांकेतिक हैं। संकेत किधर को करा जा रहा है, ये हम कभी समझने की परवाह ही नहीं करते। बात समझ रहे हो?

फिर क्या होता है? चंडिका फिर महान क्रोध करती हैं। अब क्रोध के विषय में फिर वही बात। देखिए, आप अक्सर पूछते हो कि गुण किसको बोलते हैं, सद्गुण-अवगुण किसको बोलते हैं। क्रोध तो हमें यही बताया गया है न कि महाअवगुण है। क्रोध निश्चित रूप से कोई अच्छी बात तो नहीं है लेकिन हमें वो जो साधारण, सामाजिक, नैतिकता होती है जो कहती है, ‘क्रोध बुरी बात है।’ दुर्गासप्तशती हमें उससे आगे की कोई बात समझा रही है।

सप्तशती कह रही है, जो कुछ भी सत्य के लिए किया जाए, ठीक है। प्रकृति में न सद्गुण होते हैं न अवगुण होते हैं, प्रकृति में मात्र गुण होते हैं। अगर गुणों को सत् की सेवा या सत् की रक्षा के लिए आपने इस्तेमाल किया तो सद्गुण हो गया। कोई भी गुण जो सत्य को समर्पित है, वो सद्गुण हो गया। और कोई भी गुण अच्छे-से-अच्छा और बढ़िया-से-बढ़िया, ऊँचे-से-ऊँचा माने जाना वाला गुण भी अगर असत्य को समर्पित है, असत्य के काम आ रहा है तो वो अवगुण हो गया या दुर्गुण हो गया। यहाँ क्रोध है, उस क्रोध को सद्गुण ही मानना है।

वैसे भी जो मध्यम चरित्र है जिसकी आज चर्चा हो रही है, उसमें देवी अपने रजोगुणी रूप में हैं और क्रोध रजोगुण में आता है। तीन गुण हैं जो सबके पास होते हैं। इन तीनों गुणों को उसको समर्पित कर दो जो गुणातीत है। लिख लिजिए, ये सूत्र है। सत्-रज-तम हैं और वो सबके पास होंगे, यहाँ कोई नहीं दूध का धुला! वैसे तो ये मुहावरा बदल देना चाहिए। दूध का धुला हो भी कोई क्यों? दूध हटाओ सारे मुहावरों से। ये ‘दूध-का-दूध, पानी-का-पानी’ नहीं चलेगा, कुछ और कर लो उसको, ‘जूस-का-जूस, पानी-का-पानी।’ और क्या, हमारे मुहावरों को भी तो शाकाहारी होना चाहिए न!

तो सत्-रज-तम हैं। और आपके पास तीनों हैं। कोई नहीं होगा जिसके पास सिर्फ़ तामसिकता हो या सिर्फ़ राजसिकता हो, ऐसा कोई नहीं मिलेगा। कोई कह दे, ‘मैं बहुत बड़ा सात्विक आदमी हूँ।’ उसमें भी रज और तम होंगे, थोड़े कम-ज़्यादा हो सकते हैं, पर होंगे, सब होंगे। इन तीनों को समर्पित कर दो गुणातीत को और गुणातीत जो होता है उसी को सत्य, साक्षी, तुरीय, आत्मा, ब्रह्म बोलते हैं और मुक्ति इसी का नाम है।

मुक्ति का ये मतलब नहीं है कि अब आपके पास कोई गुण नहीं बचेगा, कि मेरे पास पहले तमोगुण बहुत था लेकिन जब से मैंने फ़लाने गुरुजी की सेवा करी है, तब से मेरा तमोगुण समाप्त हो गया। ऐसा कुछ नहीं होता, वो सबकुछ आपके डीएनए में बैठा है। कहाँ से समाप्त हो जाएगा? मुक्ति का अर्थ है सब गुणों को, गुणातीत सत्य को समर्पित कर देना, इसको ही मुक्ति कहते हैं। यही गुणों से मुक्ति हुई। गुणों से मुक्ति ये नहीं है कि मेरे गुण समाप्त हो गये। गुण को ही विकार भी बोलते हैं। ‘मेरे सब गुण समाप्त हो गये’ ऐसा नहीं होता। मेरे सब गुण समर्पित हो गये — समाप्ति नहीं, समर्पण।

कोई चीज़ समाप्त नहीं होने वाली। जब तक आपका शरीर है, तब तक ये सब चलेगा। क्रोध भी रहेगा, ऑंसू रहते हैं, निराशा रहती है, सब रहती हैं चीज़ें। इनको सबको समर्पित कर दो। आशा, ममता जो कुछ भी है आपके पास, लड़ो मत उससे, समर्पित करो उसे। आशा है, आशा किसकी है? जैसे सन्त बोलते हैं, ‘आशा एक हरि नाम की।’ और कोई आशा है नहीं हमें। सम्बन्ध ही बनाने हैं तो एक सम्बन्ध बना लेंगे, “जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई, दूसरों न कोई।” समर्पित कर दो। जो कुछ है, सब रखेंगे, समर्पित करेंगे लेकिन। समर्पण सही जगह होना चाहिए, यही मुक्ति है। समझ में आ रही है बात?

तो देवी को फिर क्रोध आ गया बहुत ज़ोर से, क्योंकि ये जो महिषासुर था, ये क्या कर रहा था? ये प्रकृति के साथ उत्पात कर रहा था। तो उन्होंने इस बार उसको पाश से बाॅंध लिया। जब पाश से बाॅंध लिया, तो वो भैंसे से शेर बन गया। जब शेर बन गया, तो बोली, ‘तेरा सिर ही काटे देती हूँ।’ तो फिर से उसने रूप बदल लिया और अब वो एक पुरुष योद्धा बन गया जो तलवार से लड़ रहा है। ये जो वो रूप बदल रहा है अलग-अलग, इससे क्या पता चलता है? कि असुरता कोई भी रूप धारण कर सकती है। आप ये मत सोचिएगा कि असुर है तो पशु जैसा ही लगेगा। असुर का सम्बन्ध पशु से तो बहुत आसानी से लगा लेते हैं। भैंसा है, कुछ और है, अजगर है, खासतौर पर अगर कोई हिंसक पशु हो, बर्बर पशु हो तो बहुत आसान होता है उससे असुरता का सम्बन्ध बैठा देना, है न? कि असुर है तो किसके ऊपर होगा? पशु के ऊपर होगा। और भेड़िया है, आप आराम से बोल दोगे, ये असुर है। लेकिन अब वो यहाँ एक जवान योद्धा बन गया है — महिषासुर! वो भी असुर ही है। असुरता किसी भी रूप में आ सकती है सामने।

तो अब ये जब पुरुष था, इसको भी देवी ने बाणों की वर्षा करके बींध दिया। तब वो हाथी बन गया। वो कुछ भी बन सकता है। कुछ भी बन सकता है माने जो कुछ भी है, उसका रूप मत देखो, उसका केन्द्र देखो। हाथी हो, शेर हो, इंसान हो, महिष हो, उसका केन्द्र देखो। रूप तो कुछ भी हो सकता है, केन्द्र देखो, केन्द्र।

एक शेर वो है जो महिषासुर बन बैठा। और एक शेर वो है जिस पर देवी सवार हैं। ऊपर-ऊपर से तो दोनों शेर एक ही जैसे हैं। केन्द्र दोनों का बड़ा अलग है, केन्द्र देखो। ऊपर कोई कैसा दिख रहा है, वो नहीं देखना है, केन्द्र देखो।

तो अब ये हाथी बन गया और अब उसने सूॅंड़ से जो देवी का सिंह था, उसको पकड़ लिया। बोला, ‘ये सिंह जो है, इसको मैं अब छोड़ूँँगा नहीं।’ महान गजराज बन गया था। बोला, ‘ये सिंह जो है, इसकी अब पिटाई करता हूँ।’ तो देवी का सिंह जो है, वो फँस गया। तो देवी आयीं रक्षा को और देवी ने तलवार से उसकी सूॅंड़ को मारा, काट दी उसकी सूॅंड़। जैसे ही उसकी सूॅंड़ पर मारा तलवार तो वो फिर से भैंसा बन गया।

ये सब देखो क्या हो रहा है। ये कोई मनोरंजक कथा भर नहीं है। ये चल क्या रहा है, देखना। जैसे ही आपके एक रूप पर वार होता है, आप रूप बदलते हो, केन्द्र। हमने भी बेहतरी और प्रगति और अध्यात्म के नाम पर ऊपर-ऊपर से क्या बदले हैं? बस रूप बदले हैं। व्यक्ति कहता है, ’मैं धार्मिक हो गया।’ कपड़े बदल देता है। ये वैसे ही है कि गजराज, सिंह बन गया, कपड़े बदल दिये। काया कपड़ा ही होती है न।

काया बदल दी, केन्द्र नहीं बदला। और जब सत्य सामने आता है तो झूठ खट-खट, खट-खट काया बदलने लग जाता है। जब देवी सामने आती हैं तो असुर फटाफट काया बदलने लग जाता है। झूठ का यही काम है, सच के सामने पड़ते ही फटाफट वो अपना रंग-रोगन, चेहरा, कलेवर बदलना शुरू कर देता है ताकि ऐसा लगे जैसे वो सचमुच ही बदल गया है। वो बदला नहीं है। ये बदलाव तो न बदलने के लिए है। एक बदलाव होता है कि बदल गये और एक बदलाव इसलिए होता है ताकि बदलना न पड़े। ये वैसा बदलाव है।

और अब इसने जब भैंसे का रूप लिया, तो अब ये पृथ्वी को और ज़्यादा परेशान करने लग गया, और पृथ्वी के साथ अब चराचर प्राणियों सहित तीनों लोकों को व्याकुल करने लगा। चर प्राणी, अचर प्राणी माने जो ये स्थावर हैं, जंगम हैं, चलते हैं, नहीं चलते हैं, हर तरीके के। जो और हर लोक में, सब जो लोग हैं, सबको दुखी कर दिया। सिर्फ़ किसलिए? अपनी कामना, अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु सबको दुखी दिया।

तो देवी ठहर गयीं। एक क्षण आता है अब ये मध्यम चरित्र में, देवी ठहर जाती हैं। देवी बोलती हैं, अब आर-पार का करना पड़ेगा। ये अब बहुत धृष्टता कर रहा है। और ठहरकर के देवी क्या करती हैं? “तब क्रोध में भरी हुई जगन्माता चंडिका बार-बार उत्तम मधु का पान करके और लाल आँखें करके हँसने लगीं। जब वो ये करने लगीं तो उधर बल और पराक्रम से, मद से उन्मत्त हुआ राक्षस गरजने लगा और अपने सींगों से चंडी के ऊपर पर्वतों को फेंकने लगा।”

‘मैं सबकुछ बर्बाद कर दूॅंगा, अपने स्वार्थ की खातिर।’ आप जब एक पर्वत खराब करते हो, तो पर्वत कोई रेत, पत्थर भर थोड़ी है। पर्वत मतलब समझते हो क्या होता है? पर्वत का मतलब होता है जंगल। दुनिया भर के बड़े-से-बड़े जंगल पर्वतों पर पाये जाते हैं। और जो पर्वतों पर पाये जाते हैं, वो थोड़े से बचे भी हुए हैं। नहीं तो अमेज़न के जंगलों को देखो, क्या हाल है। इंडोनेशिया के जंगलों का देखो, क्या हाल है। लेकिन पर्वतों में खासतौर पर ऊँचाइयों पर जो जंगल हैं, वो अभी भी अपेक्षतया थोड़े बचे हुए हैं।

तो पर्वत तोड़ने का मतलब समझो। और हमने पर्वतों के साथ बहुत नाइंसाफ़ी करी है न? शिमला का हाल देखो, सिक्किम का हाल देखो। उत्तर पूर्व अभी हमारा थोड़ा बचा हुआ है क्योंकि वहाँ हम उतना पर्यटन करते नहीं। विकास की उतनी हवस अभी उधर पहुँची नहीं। उत्तराखंड का हाल देखो।

तो पर्वतों की बहुत बात होती है दुर्गासप्तशती में। और बार-बार ये आ रहा है कि देवी सबसे ज़्यादा कुपित तब होती हैं जब पर्वत नष्ट किये जाते हैं। आगे और भी बात होगी। नदियों की खूब बात होगी, और पर्वत और नदियों का तो हम सम्बन्ध जानते ही हैं।

तो अब ये सब करने लगा। देवी उधर ठहर गयीं और देवी बहुत कुपित हैं और हँस रही हैं। और जब वो ठहर गयीं तो राक्षस और गरजने लगा और चंडी के ऊपर पर्वतों को फेंकने लगा। देवी क्या कर रही हैं? उत्तम मधु का पान करने लगी और लाल आँखें करके हँसने लगी। उनका मुख मधु के मद से लाल हो रहा था और वाणी लड़खड़ा रही थी। देवी बोलीं, ‘ओ मूर्ख! मैं जब तक मधु पी रही हूँ, तब तक क्षण भर के लिए तू खूब गरज ले। और मेरे हाथ से अब तेरी यहीं मृत्यु होगी और अब गर्जना देवता करेंगे।’

अब ये लीजिए! हम आमतौर पर इस बात को भी बहुत अच्छा तो नहीं मानते, मधुपान। और मधु के मद से लाल हो रहे हैं देवी के नयन, और वाणी उनकी लड़खड़ा रही है। लेकिन फिर वही बात आती है। मदान्ध तो असुर हैं न? देवी तो अगर मद भी ले रही हैं, तो यही कह रही हैं कि तू एक क्षण ठहर जा, मधु का पान करके तेरा वध करूँगी। मैं मधु का पान कर ही इसीलिए रही हूँ कि तेरा वध करूँ। और उसके बाद करेंगे देवता गर्जना, जैसे अभी तू गर्जना कर रहा है। तो क्षणभर को गरज ले।

तो खान-पान, आचरण-व्यवहार इसको भी कैसे देखना है? इसमें एक सबक हमको सप्तशती से मिल रहा है। देवी मद में नहीं हैं, भले ही मधु का पान देवी कर रही हैं पर मद में तो असुर है। मद में असुर है, भले ही मदिरा का पान देवी ने करा हो।

जो हमारी साधारण नैतिक दृष्टि है जो बस यही देखती है कि क्या पहना, क्या खाया, क्या पिया, क्रोध का संयम किया कि नहीं, आचरण का संयम किया कि नहीं, मर्यादा का पालन किया कि नहीं, उसको एक चुनौती दे रही है दुर्गासप्तशती। ये बताने की वरना कोई ज़रूरत नहीं थी कि देवी ने मदिरा का पान किया। ये बात आसानी से हटायी जा सकती थी। क्यों बतायी जा रही है? क्यों लिखा गया? ताकि आपको पता चले कि सिर्फ़ मदिरा न पीने से आप सुर नहीं हो जाते। बहुत लोगों को इसी बात का बड़ा गौरव रहता है, ‘देखो, ज़िन्दगी भर हमने कभी शराब में हाथ नहीं लगाया।’ तो? तुम तब भी असुर हो। और देवी यहाँ पर भी और अभी तीसरा चरित्र आएगा, वहाँ पर भी अगर मद का पान कर भी रही हैं तो भी देवी हैं, क्योंकि मद का पान करते हुए भी यही कह रही हैं कि एक क्षण रुक जा, ये मैं ले ही इसीलिए रही हूँ कि और मुझमें उन्माद आये और अब तेरा वध ही होगा सीधा।

समझ में आ रही है बात?

यूँ कहकर देवी उछलीं और अब महादैत्य पर चढ़ ही गयीं, पाँव से उसको दबा दिया और शूल से सीधे उसके कंठ में आघात किया। बोलीं, ‘गरज लिया? इसी कंठ से गरज रहा था न?’ तो महिषासुर अपने मुख से किसी दूसरे रूप में बाहर आने लगा। बोला, ‘मैं रूप बदल दूॅंगा, इस रूप को मार दो। यही तो मेरा काम है — मैं रूपों को मरने देता हूँ, स्वयं को नहीं। मुझे मारोगे, तो मैं रूप की बलि दे दूॅंगा। मैं कोई और रूप पकड़ लूॅंगा।’ अब आधा निकल ही गया था अपने मुँह से कि कोई और रूप ले लूँ, देवी ने उसको रोक दिया। वो आधा ही निकला-निकला युद्ध करने लगा। हार कहाँ माननी है! अभी भी चाहता तो समर्पण कर देता।

पर अहंकार की यही बात है, समर्पण नहीं कर सकता। दुख झेल लेगा, कष्ट झेल लेगा, भारी-से-भारी तकलीफ़ झेल लेगा, समर्पण नहीं करेगा। महिषासुर मर गया, समर्पण नहीं किया उसने। घोर दुख झेल लिया, समर्पण नहीं किया। नहीं समर्पण किया तो इस बार देवी ने वध ही कर दिया उसका, समाप्त। महिषासुर समाप्त।

अब महिषासुर समाप्त हुआ, तो सब देवता इधर-उधर से देख रहे थे। वो तुरन्त कूदकर बाहर आ गये और लगे ताली बजाने। ‘हो गया, हो गया, बढ़िया हो गया, माँ ने बचा लिया।’ और उसके बाद बहुत लम्बी-चौड़ी वो देवी की स्तुति करते हैं। बाप रे! समझ लीजिए कि जो मध्यम चरित्र है, वो आधा बस जो देवताओं ने फिर माँ की स्तुति करी, उसको समर्पित है, वो बोलते हैं, ‘आप ऐसी ही हैं, आप महान हैं। सबकुछ आपका है। आप ही श्री हैं, आप ही लक्ष्मी हैं। आप ही मनुष्यों के भीतर विवेक बनकर बैठती हैं। आप सबकुछ हैं।’

तो बहुत लम्बी-चौड़ी उन्होंने वन्दना करी। उसमें से कुछ बातें मैं बता देता हूँ। “आपके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन करने में भगवान विष्णु, ब्रह्मा जी और महादेव भी समर्थ नहीं हैं। आप ही पुण्यात्माओं के घरों में लक्ष्मी रूप में, पापियों के घरों में दरिद्रता के रूप में, शुद्ध अन्तःकरण वालों के घर में हृदय में बुद्धि रूप से, सत्पुरुषों में श्रद्धा रूप से और कुलीन मनुष्यों में लज्जा रूप से निवास करती हैं। देवी आप ही अब सम्पूर्ण विश्व का पालन करिए।”

हाँ! ये बहुत अच्छा है। और इसका सम्बन्ध देवी के क्रोध से है। और देवी जो रक्तपात करती हैं, हिंसा करती प्रतीत होती हैं उससे है। और फिर देवी जो मदपान करती हैं उससे है।

“देवी! आप में सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण, ये तीनों मौजूद हैं। लेकिन विशेष बात ये है कि किन्हीं भी गुणों के साथ आपका संसर्ग नहीं है। गुण तो तीनों हैं, पर कोई भी गुण आपके केन्द्र पर नहीं है। आपके केन्द्र पर तो मात्र सत्य है। गुण तीनों मौजूद हैं। भगवान विष्णु और महादेव आदि भी आपका पार नहीं पाते। आप ही सबका आश्रय हैं। ये जगत आपका अंशभूत है। आप सबकी अधिभूत, अव्याक्रता, परा-प्रकृति हैं। सम्पूर्ण यज्ञों में जिसके उच्चारण से सब तृप्ति लाभ करते हैं वो स्वाहा आप ही हैं। आप मोक्ष की प्राप्ति का साधन हैं।”

“आप अचिन्त्य, महाव्रत स्वरूपा हैं। आप भगवती पराविद्या हैं। मोक्ष की अभिलाषा वाले मुनिजन जिनका अभ्यास करते हैं, वो आप ही हैं। आप शब्द स्वरूपा हैं। आप अत्यन्त निर्मल, ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा उद्गीथ के मनोहर पदों के पाठ से युक्त सामवेद का आधार हैं। आप देवी हैं, आप त्रयी हैं, आप भगवती हैं। इस विश्व की उत्पत्ति एवं पालन के लिए आप ही वार्ता, खेती और आजीविका के रूप में प्रकट हुई हैं। आप सबकी पीड़ा का नाश करने वाली हैं। जिससे सब शास्त्रों के सार का ज्ञान होता है, वो मेधा शक्ति भी आप ही हैं।”

ये बात तीसरे चरित्र में और आएगी जब पूरा आपके सामने देवी की स्तुति आएगी न, “या देवी सर्वभूतेषु, बुद्धिरूपेण संस्थिता।” तो वहाँ पर ये बात और विस्तार में आएगी। “दुर्गम भवसागर से पार उतारने वाली नौका-रूप दुर्गादेवी भी आप ही हैं।” फिर आगे बात, “ये सब होते हुए भी आपकी कहीं भी आसक्ति नहीं है”, ये महत्वपूर्ण बात। ‘आप इतना कुछ हैं, फिर भी आप इन सबसे बिलकुल ही अस्पर्शित हैं। गुण तीनों हैं लेकिन तीनों गुणों से आपका कोई स्पर्श नहीं है।’

बहुत है आगे। पूरा देवी की स्तुति है। सुन्दर स्तुति है, आप पढ़िएगा स्वयं ही (श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए)। देवताओं ने इतनी स्तुति अपने सुख के काल में कर ली होती, तो महिषासुर से हार होती उनकी कभी? अब देखो, इतनी स्तुति!

तो पूरी जब स्तुति हो गयी, तो इस प्रकार जब देवताओं ने जगन्माता दुर्गा की स्तुति की और नन्दनवन के दिव्य पुष्प एवं गन्ध-नन्दन आदि के द्वारा पूजन किया, तब देवी ने प्रसन्न वदन होकर प्रणाम करते हुए सब देवताओं से कहा, ‘देवताओं, तुम लोग सब मुझसे जिस वस्तु की अभिलाषा रखते हो, वो माँग लो!’ देवी को ये पता ही है कि ये कोई निष्काम स्तुति तो कर नहीं रहे। बोलीं, ‘अब इतनी तो तुमने स्तुति कर ली। जो चाहिए, वो बता दो।’ सुनिएगा ध्यान से। देवता इतना बोल गये, इतना बोल गये, देवी बस एक बार बोलती हैं। ‘देवताओं, तुम लोग सब मुझसे जिस वस्तु की कामना रखते हो, वो माॅंग लो!’ देवी को पता है ये निष्काम नहीं हैं। ये अगर स्तुति कर रहे हैं तो इन्हें कुछ चाहिए।

ये हमारी आम स्तुति होती है। इसीलिए हम कभी नहीं पाते कि देवताओं को मोक्ष मिल गया। मिला? कभी पढ़ा कि इन्द्र मुक्त हो गये। वो अभी भी बन्धन में ही हैं, भले ही स्वर्गलोक में बैठे हैं लेकिन स्वर्गलोक ही उनका बन्धन है। कि सकामी जब सुमिरन करता है तो अधिक-से-अधिक क्या पाता है? उत्तम धाम। लेकिन जब निष्कामी सुमिरन करता है तो क्या पाता है? अविचल राम।

सकामी सुमिरन करे, पावै उत्तम धाम। निष्कामी सुमिरन करे, तो पावै अविचल राम।।

~ कबीर साहब

तो सकाम होकर के तुम जो उच्चतम है, उसका भी सुमिरन करोगे तो अधिक-से-अधिक उत्तम धाम मिल जाएगा। उत्तम धाम को ही स्वर्ग कहते हैं। लेकिन मुक्ति तब भी नहीं मिलेगी। मुक्ति तो सिर्फ़ निष्कामता से मिलती है। और अध्यात्म को और दर्शनशास्त्र को श्रीकृष्ण का यही अनूठा योगदान है — निष्काम कर्म। बोले, ‘बाकी सब बातें एक तरफ़ और निष्कामता एक तरफ़।’ सारा अध्यात्म इस एक शब्द में समा जाता है, निष्कामता। और देवी यहाँ कह रही हैं देवताओं से, ‘निष्काम तो तुम हो नहीं सकते, तो बता दो कामना क्या है?’ तो देवता बता भी देते हैं। और बताते भी देखो कैसे हैं! तो शुरू ऐसे करते हैं, ‘भगवती, वैसे तो आपने हमारी सब इच्छा पूर्ण कर दी है, कुछ भी बाकी नहीं है। लेकिन फिर भी आप अगर हमें और वर देना ही चाहती हैं’, ये देख रहे हो? ‘वैसे तो कोई इच्छा नहीं है, आपने पूर्ण ही कर दिया है, इसको महिषासुर को मार दिया। हम नहीं माँगना चाहते, लेकिन आप अगर देना ही चाहती हैं’, तो क्या कह रहे हैं अब? ‘जब-जब हम आपका स्मरण किया करें तो आप दर्शन देकर हमारे संकट दूर कर दिया करें।’

माने अभी से तय कर रखा है कि संकट तो बुलाऍंगे ही। संकट यूँही तो आ नहीं जाता है! संकट तो जब सत्य को विस्मृत कर देते हो, तभी आता है। तो देवता कह रहे हैं, ‘देखिए, अब हम फिर से कुछ गड़बड़ करेंगे, फिर से कोई दूसरा दैत्य आकर‌ के हमको मार-पिटाई करेगा। तो ऐसा करिएगा, अब जब हम बुलायें तो फट् से आ जाइएगा। हम जब-जब आपका स्मरण करें, तो आप तत्काल आ जाऍं। तब आप हमें दर्शन देकर हमारे महान संकट दूर कर दिया करें।’ और आगे भी और कह रहे हैं कि जो-जो लोग आपकी स्तुति करें, उन्हें धन दीजिए, समृद्धि दीजिए, वैभव दीजिए और उसकी स्त्री आदि सम्पत्ति भी बढ़ा दीजिए। यही माॅंग रहे हैं कुल देवता — धन, वैभव, समृद्धि और स्त्री। ये देखो! और ये नहीं देख रहे हैं कि देवी से ही ये बोल रहे हैं। देवी भी कह रही हैं कि चलो! तो देवी बोलती हैं, “तथास्तु” और अन्तर्ध्यान हो जाती हैं। और कुछ बात ही नहीं करी उन्होंने देवताओं से। उनसे इतनी ही बातचीत हो सकती है। वो अन्तर्ध्यान हो जाती हैं।

देवता अगर सचमुच ही सुधर गये होते तो दुर्गासप्तशती यहीं समाप्त हो गयी होती, तीसरे चरित्र की ज़रूरत नहीं पड़ती। पर देवता तो देवता हैं, वो वैसे ही रहेंगे। अभी अन्त भी हो रहा है तो धन-ऐश्वर्य यही सब माॅंग रहे थे, स्त्री। तो फिर अब तीसरा चरित्र आएगा उसमें और भारी संकट खड़ा होना है देवताओं पर। समझ में आ रही है बात?

प्रश्न: अगर माँ को माया कहा जाता है और हम माँ से ही चाहते हैं इन दिनों में। तो हम माँ से माँगते क्या हैं? हम माँ से, उन्हीं से उनके द्वारा ही मुक्ति माँगते हैं?

उत्तर: जब माँ शरीर को जन्म देती है तो माया मात्र है। शरीर का जन्म अगर माँ दे रही है तो वहाँ पर माँ अपने महामाया रूप में है। और जब माँ चेतना को मुक्ति दे रही है तब माँ महादेवी रूप में है। तो जो साधारण हमारी शारीरिक माँ होती है, जो मनुष्यों में हमारी माँ होती है, उसके भी दो काम होते हैं — शरीर से जन्म दिया तो उस वक्त वो महामाया है और अगर चेतना को मुक्ति दी तब वो महादेवी है।

इसलिए मैं बार-बार सब माताओं से आग्रह किया करता हूँ कि आपने उसको शरीर से जन्म दे दिया है, इतना कोई पर्याप्त थोड़ी हो गया, अभी तो आपको उसको चेतना से जन्म देना है। और चेतना से जन्म देना नौ महीने भर का काम नहीं होता, उसमें बड़ा समय और श्रम लगता है। और असली माँ आप तभी हैं जब आप उसकी चेतना को जन्म दे पाये। नहीं तो शरीर से तो जन्म पशु भी दे देते हैं कि नहीं दे देते? सब पशु शरीर से जन्म देते रहते हैं तो उससे माँ फिर सम्मान की अधिकारिणी नहीं हो जाती।

माँ सम्मान की अधिकारिणी बस तब है जब वो महादेवी बन पाये। महादेवी बनने का क्या अर्थ हुआ कि जिसको शरीर से जन्म दिया है, उसकी चेतना को भी तो विकसित करो। ज्ञान, बुद्धि, मेधा, प्रज्ञा ये सब जाग्रत करने पड़ते हैं, ये प्रकृति से नहीं आ जाते। आप जंगल में एक बच्चे को छोड़ दीजिए, कहाँ से उसमें कौनसा ज्ञान, कौनसा बोध आ जाना है?

तो अब जब माँ ने बच्चे को जगत में ला ही दिया है और जगत माने दुख होता है न, तो जगत में बच्चे को लाना ही इसीलिए माँ का महामाया रूप कहा जाता है क्योंकि उसको दुखालय में ले आये हो। आप एक जीव को दुख की दुनिया में ले आये, तो ये आपने मायावी काम ही तो कर दिया न? उसको ले आये, अब वो क्या करेगा? दुख भोगेगा। तो माँ जब बच्चे को जन्म देती है तो वो माया है।

बच्चे को जन्म देना तो आराम से हो जाता है। उसके लिए तो बस कामवासना का एक पल चाहिए, बच्चा पैदा हो जाएगा। असली काम होता है बच्चे को असली जन्म देना, बच्चे को द्विज बनाना। इसीलिए देवी मृत्युदायिनी भी कही जाती हैं और मुक्तिदायिनी भी कही जाती हैं। जो मनुष्यों में हमारी माँ है अगर वो बच्चे को सिर्फ़ शरीर से जन्म दे रही है, तो उसको जन्मदायिनी भी नहीं कहना चाहिए, उसको मृत्युदायिनी कहना चाहिए। बच्चे को चाहिए कि माँ के सामने जाकर कहे, ‘हे मृत्युदायिनी!’ क्यों कह रहे हो जन्मदात्री है? जन्मदात्री नहीं है, वो मृत्युदात्री है। उसने तो तुम्हें अब दुख के लिए पल-पल मरने के लिए पैदा कर दिया है।

असली माँ वो है जो मुक्तिदायिनी हो। वैसी माँ देखने को नहीं मिलती, मुक्तिदायिनी माँ, कि इसको पैदा करा है तो इसको इस स्तर तक ले जाऊॅंगी चेतना के कि ये मुक्त ही हो जाए सब दुख से, बन्धन से। ऐसी माँ कहीं है नहीं। तो ज़्यादातर माँ बस महामाया हैं और कुछ नहीं हैं।

प्रश्न: प्रणाम उत्तर जी। असुर और दैत्य की परिभाषा आपने ये समझायी कि सुर माने वो जो सत्य को समर्पित है और दानव माने वो जो हमेशा अपनी कामना के लिए जो भी करता है। तो इसमें हमारा जो कोर्स है पिछले वर्ष का दुर्गासप्तशती, आपने उसमें बताया था कि जब हम ये देखते हैं कि असुर और देवता दोनों गये भगवान के पास वरदान माॅंगने, तो वो इस बात का प्रतीक है कि आत्मा के पास जा रहा है अगर देवता तो माने सत्य को समर्पित है।

तो वो जो भी कर रहा है, वरदान उसका ये हो गया कि वो सत्य को समर्पित होकर निष्काम कर्म कर रहा है। तो वरदान वो माॅंग रहा है कि मुझे जो भी बल मिले, वो निष्काम कर्म को करने के लिए ही मिले। और दानव वो हो गया जो वरदान माॅंग रहा है सत्य को ही खत्म करने के लिए खुद ही।

उत्तर: बहुत अच्छा, बहुत अच्छा।

प्रश्न: तो हम कह रहे हैं, ‘भगवान प्रतीक है आत्मा का।’ तो आत्मा तो माने अब वो सत्य मात्र ही है। तो सत्य के पास जब असत्य जा रहा है तो उसको वरदान मिल ही क्यों रहा है?

उत्तर: ‘जो चाहोगे वो मिलेगा’, ये बहुत खूफ़िया सूत्र है। अभी अध्याय चौथे में है, आप गीता में हैं साथ में? जो चाहोगे, मिलेगा। चौथा अध्याय, ग्यारहवाॅं सूत्र।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वतर्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वश: ।।

~ श्लोक ११, अध्याय ४, श्रीमद्भगवद्गीता

पकड़कर बैठिएगा जब हम वहाँ पहुँचे। कब पहुँचेंगे लेकिन? अगले साल के अन्त तक पहुँचेंगे जिस गति से जा रहे हैं। कृष्ण साफ़ कहते हैं, ‘मैं किसी को मना नहीं करता लेकिन जो तुम्हें मिलेगा उसके ज़िम्मेदार सिर्फ़ तुम हो। तो इसलिए सोच-समझकर माँगना। तुम जो चाहोगे, मिल जाएगा।’

सत्य किसी को खाली हाथ वापस करता ही नहीं है। इसीलिए देखते नहीं हैं कि महादेव के साथ खासतौर पर ये बात आती है, और बार-बार पुराण आपको बताते हैं कि उनसे कुछ भी माॅंगा गया, उन्होंने दे दिया। और कई बार तो ऐसा होता था कि वो असुर तपस्या कर रहा होता था, तो नारद और बाकी देवता लोग परेशान हो जाते थे। कहते थे, ‘ये कुछ गड़बड़ चीज़ माॅंगने वाला है। और ये माॅंगेगा, वो दे भी देंगे।’ तो वो बीच में आकर कुछ विघ्न डालते थे कि इसको मिल न जाए जो ये माॅंगना चाहता है।

श्रीकृष्ण वही बात श्रीमद्भगवद्गीता में कहते हैं। कहते हैं, ‘मैं तो कभी कहूँगा ही नहीं कि तुम सिर्फ़ मेरी उपासना करो। तुम जिसकी चाहे उसकी कामना कर सकते हो, तुम्हें मिल भी जाएगा। लेकिन जो तुम्हें मिलेगा, तुम भुगतना फिर। और भुगतना क्योंकि भोगने के लिए ही तो माँग रहे हो। मेरे पास आते तो निष्कामता माँगते। मेरे पास आओ तो मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है। बल्कि मैं तो तुम्हें तुम्हारी माँगों से ही खाली कर दूँगा। लेकिन कुछ और माँगोगे तो वहाँ तुम्हें मिल भी जाएगा। तुम्हें भोगना पड़ेगा और यही तुम्हारा दंड होगा कि जो तुमने माँगा है, वो तुम्हें मिल जाएगा; अब भुगतो!’

अगर ऐसा होता जो आप कह रहे हो, तब तो मज़ा ही आ जाता न, कि अगर सही चीज़ माॅंगोगे तो मिलेगी, गलत चीज़ ठुकरा दी जाएगी। ऐसा आप होते देखते हो क्या जगत में? आप बहुत मोटे आदमी हो और आप अपने लिए बिलकुल कोई तली-भुनी कोई कुछ मँगवा रहे हो मटन का शोरबा। तो उधर से मना कर दिया जाता है, ‘नहीं देंगे’? जगत तो आपको दे देता है। अब रात में हार्ट अटैक आएगा, आप जानो। जो चाहोगे मिल जाएगा लेकिन फिर क्या होगा, वो तुम जानो। और आमतौर पर घटिया चीज़ पानी ज़्यादा आसान रहती है, क्षुद्र कामनाएँ ज़्यादा आसानी से पूरी हो जाती हैं जगत में। कितनी अजीब बात है!

निष्कामता, जिसमें आप कुछ नहीं माँग रहे, वो बड़ी मुश्किल से मिलती है। और जहाँ आप ये सब माँग रहे हो, ’मटन बिरियानी दे दो, ये दे दो, कपड़ा दे दो, घर दे दो’, वो सब आसानी से मिल जाता है। जो कुछ नहीं माँगता, उसको कितनी मेहनत करनी पड़ती है कुछ नहीं माँगने के लिए! और जो ये सब टुच्चे ही माँग रहे हैं, उनको हर दिन, हर हफ़्ते, हर महीने जो वो चाहते हैं मिलता ही रहता है। लेकिन जो मिलता रहता है, उसकी उनको सज़ा ये मिलती है कि कितना भी मिल जाए पूरा नहीं पड़ता है। मिल गया है अब और माॅंगो, मिल गया अब और माॅंगो। यही जो कर्मचक्र है, ये तुम्हारा दंड है।

बोधकथा है पुरानी, याद नहीं ज़ेन दिशा से है या सूफ़ियों से है, वहाँ पर यही है कि दुनिया में सबसे खतरनाक चीज़ है माँगना। माँगना माने? कामना। जब भी भीतर कोई कामना उठे, एकदम कूदकर खड़े हो जाओ। ये क्या माॅंग लिया! अरे, मत माॅंगो! ये क्या माॅंग लिया! और कितनी ही कहानियाँ हैं जहाँ दिखाया ही ये गया है कि माँगने वाला अपनी माँगी हुई चीज़ का शिकार हो गया। माँग तो लाये थे, अब जो ले आये हो वो सम्भाले नहीं सम्भल रहा। और जब माँगा था, तब देने वाले ने अपनी ओर से थोड़ा सा चौकस भी करा था कि तुम्हें पक्का है तुम्हें चाहिए! बोले, ‘चाहिए।’ ‘तो ले फिर चाहिए तो।’

भई, अगर आप कहते हो, ‘प्रकृति को बनाने वाला ईश्वर है’, तो प्रकृति तो स्वयं ही देवी हैं। उन्हें बनाया थोड़ी किसी ने। माने प्रकृति ही ईश्वर है, माने जगत ही ईश्वर है। माने इससे अगर कुछ माॅंगते हो, कामना करते हो तो वही है कि ईश्वर से आराधना करके कुछ कामना कर रहे हैं। और जगत दे भी देता है। जगत से कुछ माँगते हो, जगत दे देता है न? वो वैसे ही है कि आपने ईश्वर की आराधना करी और ईश्वर ने वरदान दे दिया। वरदान मिल जाएगा लेकिन तुम सम्भाल नहीं पाओगे।

आपको सबसे बड़े-बड़े दुख उन्हीं चीज़ों से मिलते हैं जो आपने खूब इच्छा करके माॅंगी थीं। एक तो वही है, ‘शेर की सवारी’। कि एक था, उसको सब बोलते थे झुन्नूलाल — अब कहानी नहीं मिलेगी गूगल पर, झुन्नूलाल डालोगे तो कुछ आएगा नहीं। फिर कहोगे, ‘ये उत्तर जी बेवकूफ़ बनाते हैं।’ ये मैं अपनी ओर से उसमें थोड़ा सा अपनी पाक कला दिखाता हूँ।

तो झुन्नूलाल को कोई भाव न दे। कहीं इधर धकियाये जाए, उधर लतियाये जाए। तो झुन्नूलाल को एक ऋषि मिल गये। झुन्नूलाल बड़े उदास!

ऋषि बोले, ‘क्या है?’

बोले, ‘कोई इज़्ज़त नहीं करता।’

तो ऋषि बोले, ‘अच्छा, चलो।’ ऋषि ने उनको एक शेर दे दिया। झुन्नूलाल से बोले, ‘शेर पर बैठ जाओ, बहुत इज़्ज़त मिलेगी।’ तो झुन्नूलाल शेर पर बैठ गये और जहाँ निकले, वहीं इज़्ज़त मिले। और लोगों को दौड़ा लें। शेर पीछे जा रहा है, अपनी बहुत गति से दौड़ रहा है, लोगों को पकड़ रहा है। ऐसे कर लिया, शुरू में पाँच-छः घंटे तो बड़ा मज़ा आया।

फिर शेर बोला, ‘खाने को चाहिए।’

तो झुन्नुलाल बोले, ‘वो तो मेरे पास कुछ है ही नहीं, मेरा तो अपने खाने का नहीं हिसाब।’

तो शेर बोला, ‘थोड़ा नीचे उतरना।’

झुन्नुलाल बोले, ‘मुझे नीचे उतरना ही नहीं।’ समझ गये। तो अब क्या करें? शेर को अगर खाने से रोकें तो झुन्नुलाल खुद क्या खायें? झुन्नुलाल को भी तो भूख लगी है। खाना है तो नीचे उतरना पड़ेगा और नीचे उतरोगे, तो शेर खा जाएगा। या तो भूख से मरो या शेर का भोजन बनो। इसीलिए सोच-समझकर माँगना चाहिए कि क्या माँग रहे हो।

प्र२: दुर्गा सप्तशती सत्र में प्रकृति को लेकर जो चीज़ आपने समझायी उसमें यही था कि प्रकृति के साथ हम जितनी छेड़खानी करते हैं, देवी उतना हमसे कुपित होती हैं। असुर वही हैं जो प्रकृति के साथ छेड़खानी करते हैं।

देवी के मदिरापान को जैसे आपने समझाया, उसको मैं पृथ्वी पर आये भूकम्प से जोड़कर देखती हूँ। ये दिख रहा है कि प्रकृति माँ लगातार चेतावनी दे रही हैं और करुणा भी दर्शा रही हैं कि सुधर जाओ। क्या ऐसा ही है?

उत्तर: बिलकुल है। अगर हम जो आवृत्ति है माने फ़्रीक्वेंसी देखें, एक्स्ट्रीम इकोलॉजिकल और एनवॉयरमेंटल इवेंट्स की, आप यही गूगल कर दीजिएगा एक्सट्रीम इकोलॉजिकल , तो आपको पता चलेगा कि वो फ़्रीक्वेंसी कहीं पर पाँच-गुना, कहीं दस से बीस गुना भी बढ़ गयी है। एक्सट्रीम इवेंट्स में ये सब आते हैं। एक्सट्रीम टेम्परेचर, एक्सट्रीम रेनफ़ॉल और ये जो सीसमिक इवेंट्स होते हैं, तो उसमें लैंडस्लाइड वगैरह भी कहीं-कहीं पर जोड़कर बताऍंगे।

तो आप पाऍंगे कि इनकी फ़्रीक्वेंसी बहुत बढ़ गयी है। बस इतनी सी बात है कि मीडिया वही बात बताएगा, दिखाएगा जो बात आप देखना चाहते हो। ये चीज़ आप देखना नहीं चाहते, तो आपको दिखाया नहीं जाएगा। तो चेतावनियाँ तो आ ही रही हैं, हर तरह से आ रही हैं लेकिन उसके बाद भी असुर की तरह हम बस अपने काम में; काम माने डिज़ायर में ही अगर हम मगन हैं, तो कोई इसका क्या कर सकता है। जितना आप उपेक्षा करोगे चेतावनियों की, तो जो अगला झटका आएगा, वो और बड़ा आएगा, फिर और बड़ा आएगा।

अच्छा, झटका बस इसी रूप में आये कि बाढ़ हो गयी या अतिवृष्टि हो गयी या भूकम्प आ गया, ज़रूरी नहीं है। हम भी तो प्रकृति हैं न? ये जो हमारा खोपड़ा खराब हो रहा है, हम इसी से लड़ मरेंगे। अब जो पूरा ये हमारा क्षेत्र है मध्यपूर्व का, वहाँ जो होता है वो किसके लिए हो रहा है? आज जब वो महिषासुर ऐसे-ऐसे कर रहा था (धरती को पैरों से कुरेद रहा था) तो हमने कहा माइनिंग। ठीक है?

न होता तेल मिडल-ईस्ट के पास तो वहाँ इतना बवाल मचता क्या? वहाँ तो सारा कुछ है ही खेल इसलिए कि वहाँ तेल है। नहीं तो वहाँ जो आबादियाँ हैं देशों की, वो बहुत कम-कम आबादियाँ हैं। न वहाँ कुछ पैदा होता है, न पानी है। थोड़ा-बहुत होता है, मोटा-मोटा समझिए। और अर्थव्यवस्था में वहाँ और कोई चीज़ नहीं है कि आप कर पाओगे।

वो तेल है तो उस तेल की खातिर, उसके खनन की खातिर कितना दिमाग खराब हुआ। अब लोग कह रहे हैं कि इज़राइल-हमास का जो ये युद्ध है, ये तीसरा विश्वयुद्ध बन सकता है। हमास तैयार ही था, अब हिज़बुल्लाह तैयार हो गया पीछे से। और हमास, हिज़बुल्लाह इनके बाद ईरान का नम्बर है।

तो प्रकृति कुपित हो रही है। ये तभी मत माना करिए जब आप पाये कि तापमान चालीस रहता था, पैंतालीस हो गया है। प्रकृति कुपित हो रही है, ये इससे भी जानिए कि आदमी का दिमाग बिलकुल खराब हो गया है। ये भी प्रकृति का ही कोप है।

अच्छा, एक बात बताइए, आप एकदम कहीं सड़ी हुई जगह पर रहती हैं जहाँ एक पेड़ देखने को नहीं मिलता, घनी आबादी, खूब प्रदूषण है, वहाँ आपका दिमाग कैसा रहेगा? और आप एक ऐसी जगह पर रहते हैं जहाँ पर मौसम भी अच्छा रहता है, खूब हरियाली है, घने पेड़ हैं, अच्छा पानी है, वहाँ आपका मन कैसा रहेगा? तो जो आप प्रकृति का इतना नाश करोगे तो उससे आपका दिमाग भी तो नष्ट हो जाता है न? होगा कि नहीं?

प्र२: जी होगा।

उत्तर: सुन्दर, शान्त जगह हो, निर्मल बिलकुल, तो वहाँ आपका मन भी कहाँ करेगा कि मैं अपराध करूँ और हिंसा करूँ और विनाश करूँ? नहीं करेगा। और आप कहीं कंक्रीट के जंगल में रह रहे हो, गन्दा खाना, गन्दा पानी, भारी आबादी, ये-वो चिल्ल-पौ, पसीना, तो वहाँ पर तो सब फिर हो ही जाते हैं झगड़ालू, हिंसक। और आपके भीतर जो पाशविक वृत्तियाँ होती हैं, वो और उभरकर सामने आती हैं। तो बहुत सारी बातें हम कर रहे हैं, मीडिया में रहती हैं। बहुत-बहुत कम बातें हो रही हैं जो हम प्रकृति और इकोलॉजी के साथ कर रहे हैं, उसको लेकर के।

दुर्गासप्तशती जो मुझे प्रिय है, उसका एक कारण ये भी है, बड़ा कारण — ये उन ग्रन्थों में से है जो सीधे-सीधे हमें प्रकृति के कोप से परिचित कराते हैं। ये जो तुम असुर बनकर प्रकृति के साथ कर रहे हो, तुम बचोगे नहीं। और ये जो तुम खुश हो जाते हो नौदुर्गा के पंडालों में राक्षसों को, महिषासुर इत्यादि को देखकर, वो महिषासुर तुम खुद हो। ये जो सब तुमने सब अभी बकरा-मुर्गा काटा है न, उनकी माँ यही हैं। उस माँ के तुमने बच्चे मार दिये। और बड़ी-से-बड़ी धूर्तता ये कि वो बच्चे माँ के नाम पर ही मार दिये। वो माँ नहीं तुम्हें छोड़ने वालीं। जिस माँ का तुम बच्चा काट रहे हो मटन बिरयानी बोलकर के, वो माँ तुम्हें छोड़ देगी क्या? गाय जैसा सीधा जीव भी कितना उग्र हो जाता है, तुम उसके बछड़े को छेड़ दो, वो गाय जो है, आपको सींगों से उठाकर दूर फेंक देगी। गाय शेरनी बन जाती है, बछड़े को छेड़ दो बस! छोटा हो बछड़ा, छेड़कर देखो। तो प्रकृति छोड़ देगी क्या, आप उसके सब जीवों के साथ जो कर रहे हो?

आपको पता है न कितने-कितने जीव आप काटते हो प्रतिदिन? दुनिया की जितनी आबादी है उससे ज़्यादा जीव आप प्रतिदिन काटते हो, मछलियाँ मैं उसमें जोड़ रहा हूँ। दुनिया की जितनी आबादी है, माने प्रति व्यक्ति एक से ज़्यादा जीव। उसमें वही नहीं कि सारे खा लिये, बहुत सारे तो बस ऐसे ही — फ़िशिंग कर रहे थे, बहुत सारे ऐसे ही बेकार में मारे गये। तो प्रकृति माँ तो उनकी भी है, बल्कि जो कमज़ोर बच्चा होता है, माँ उसको ज़्यादा देखती है। तो प्रकृति आपको छोड़ देगी क्या?

आप जो ये अपना फ़्रीडम टू ईट (खाने की आज़ादी) के नाम पर जो भी कुछ कर रहे हो, आपको छोड़ थोड़ी दिया जाएगा! फ़्रीडम टू ईट, फ़्रीडम टू नेविगेट, फ़्रीडम टू बिल्ड, फ़्रीडम दिस, फ़्रीडम दैट! बिना भीतर से फ़्री हुए बाहर आप फ़्रीडम एक्सरसाइज करना चाहते हो। भीतर से आप बौन्डेज़ में हो, भीतर से सौ तरह के बन्धनों में हो, तो बाहर भी फ़्रीडम के नाम पर आप बस क्या कर रहे हो? नाश, उत्पात। यही तो।

प्र२: जो देवता हैं, वो पहले दिन तो सारे शक्तियाँ दे देते हैं कि माँ तुम ही बचाओ। जब भी होता है तो ऐसा लग रहा है कि हम खुद देवता हैं, हम ही खुद असुर हैं। तो इसमें कभी आपत्ति में देख लेते हैं, “सुख में सुमिरन न करे।” फिर अन्त में देवता स्तुति करने के बाद ऐसा लगता है कि मैं ही हूँ जो मन बदलकर बोल देती हूँ कि नहीं-नहीं आप जो कहोगे, वो ही सही है। मुझे लग रहा है कि मैं कहीं-न-कहीं ऐसी ही हूँ।

उत्तर: तो क्या होता है, अन्त में माँ तो अन्तर्ध्यान हो जाती हैं और देवताओं को उनका राजपाट वापस मिल जाता है। माने देवताओं ने जो अपने स्वत्व का त्याग किया था, माँ को अर्पित किया था, माँ तो अब अन्तर्ध्यान हो गयीं तो वो जो सब चीज़ थी, वो वापस किसके पास चली गयी? देवताओं को कहा, ‘वर माॅंगो।’ देवताओं ने ये कहा क्या, ‘हम अब निर्बोझ हो गये हैं माँ, तेरा तुझको सौंपते हैं, अब तू अपने पास रख माँ। हम बच्चे ही भले, हम हल्के ही भले। हमें ये सब चीज़ें लौटाना मत। ये सब जो शक्तियाँ, अधिकार हैं, हम इनके योग्य नहीं हैं। ये माँ अब तुम अपने पास ही रखो।’ देवताओं ने ऐसा कहा क्या? नहीं कहा। माँ ने भी कहा, ‘चलो ठीक है, अब मुझे जाने दो। अपना देखो तुम।’

प्र३: बचपन में तो माँ को या मन्दिर को समझना, ऐसी चीज़ों को करने से मना ही किया गया था, तो पढ़ने का अवसर नहीं मिला। जब से पिछला जो सत्र हुआ था दुर्गासप्तशती, तब से पढ़ना प्रारम्भ किया था। संस्कृत में भी लेकर पढ़ा था तो उसमें बहुत ही अच्छा लगा, कुछ चीज़ें निकलकर आयी थीं जो पहले पता ही नहीं था। ऐसे जोड़कर भी देखा जाता है, ये पता ही नहीं था। बस हमें तो रोक दिया गया कि इन चीज़ों को नहीं पढ़ना।

उत्तर: अगर कोई ग्रन्थ आपके तात्कालिक सन्दर्भ में, माने आज एक समकालीन अर्थ नहीं रख रहा है, तो वो ग्रन्थ आपके लिए बेकार चला गया। क्या करोगे जानकर किसी और के साथ कभी और क्या हुआ था? क्या मतलब है? तुम्हें आज अपनी ज़िन्दगी जीनी है न। तो अगर कोई बात अगर बतायी जा रही है, चाहे वो इतिहास की हो चाहे प्रतीकों की हो, उसका आज आपके लिए क्या उपयोग है, ये आपको पता होना चाहिए, नहीं?

ये एक बहुत मूल सिद्धान्त है जीवन का जो हम भूल जाते हैं — सबकुछ मेरे लिए है, मैं कुछ भी कर रहा हूँ तो इसलिए कि मेरा दुख कम हो। अपना दुख कम करने के लिए न, अपना अज्ञान हटाने के लिए आप ग्रन्थ पढ़े रहे हो। कोई भी ग्रन्थ हो सकता है, महान-से-महान ग्रन्थ हो सकता है, पर अगर आप ये नहीं देख पा रहे कि उसकी आपके आज के जीवन में प्रासंगिकता क्या है, तो आपको मिल क्या गया। पाठ कर लेने से, ‘पट-पट-पट पढ़ लिया’, इससे क्या मिल गया? कुछ नहीं मिल गया। समझना पड़ेगा न, बार-बार पूछना होगा, ‘इससे मेरी आज की कौनसी समस्या सम्बोधित हो रही है? और मेरी जो भी समस्या है, क्या वो इससे सम्बोधित हो रही है?’

यहाँ यही तो है वो (सामने रखी एक रिपोर्ट को इंगित करते हुए)। हर दिन लगभग एक मिलियन गाय — माने नौ लाख गाय इसमें दे रखा है, तो ये जब का भी होगा, अभी तो बढ़ ही रहा है। तो लगभग एक मिलियन गाय — लाख में बोल देता हूँ — नौ लाख गाय, चौदह लाख बकरी, सत्रह लाख भेड़, अड़तीस लाख सूअर। अरे, बाप रे! और लगभग एक-सौ-अठारह लाख माने एक-करोड़-अठारह-लाख बत्तख, दो-सौ-दो मिलियन चिकन माने बीस करोड़ मुर्गे। फ़िश के लिए ऑंकड़े नहीं दे रखा। लिखा है, हंड्रेड्स ऑफ़ मिलियंस ऑफ़ फ़िश , कोई ऑंकड़े नहीं पता कितना होगा। ये प्रतिदिन का है।

फ़िश को मालूम है ऐसे नहीं नापते हैं कि कितनी मछलियाँ, वहाँ नापते हैं कितने किलो। उनको तो जैसे जीव भी नहीं माना जाता, कितने जीव माने। वहाँ बस ये पूछते हैं कितने किलो कैच है। उनको, उनकी मौत को इतनी भी इज़्ज़त नहीं है कि ये भी गिन लो कि कितने मारे। वहाँ किलो में बस गिन लेते हैं, इतने किलो। किलो नहीं होता, टन भी नहीं होता, कितने लाख टन। लाख, मिलियन, वो भी गलत है। करोड़, बारह-करोड़ टन प्रतिदिन मछली।

और मछली बहुत समझदार जीव होता है। बहुत पुराना जीव है। जितने भी ये थल-जीव हैं माने ज़मीन वाले, इनसे पुरानी है ये जल-जीव मछली। मछली हम सबकी बहुत पुरानी दादी है। मछली पहले आयी, डायनासोर उसके भी बाद आये। तो मछली की जो बुद्धिमत्ता होती है वो अच्छी वाली होती है, हल्की-फुल्की नहीं होती। तो उसको ये सोचना कि वो तो ऐसे ही है, बस घास-फूस है। घास-फूस नहीं है, दर्द भी जानती है, समझदारी भी जानती है। बहुत सारे भाव जो मनुष्यों को होते हैं, मछलियों में भी होते हैं। उसका बहुत एवॉल्यूशन हुआ है। बहुत पुरानी है।

दो-सौ-दस करोड़ प्रतिदिन! आठ-सौ करोड़ तो आबादी है हमारी मनुष्यों की। और ये वो बस हैं जिनको हम खाने के लिए मार रहे हैं। अभी इसमें वो सब जोड़ेंगे जिनके मरने का हमको पता भी नहीं है — हमने प्रदूषण से मार दिये या वनों की कटाई से मार दिये, तो वो संख्या अलग है। या खेती के लिए मार दिये हैं, इसमें खेती वाले जीव थोड़ी गिने हैं अभी। खेती में भी भारी हिंसा होती है, वो जीव इसमें अभी थोड़ी गिने।

जो मिट्टी होती है, जैसे जंगल प्राणियों का घर होता है, वैसे मिट्टी भी प्राणियों का घर होती है। मिट्टी किसी का घर है, ऐसे ही नहीं है मिट्टी। मिट्टी एक ज़िन्दा चीज़ होती है। मिट्टी में हर इंच पर प्राणियों की बस्ती होती है और आप जब खेती करते हो, तो क्या करते हो? आप सबको मारते हो, सबको। एकदम नन्हें प्राणी से लेकर थोड़े बड़े प्राणी तक। बड़ा प्राणी हो गया जैसे चूहा, फिर उससे नीचे हो गया केंचुआ, उसके नीचे हो गये और छोटे-छोटे प्राणी, सबको मार देते हो आप खेती में। और कहते हो, ‘मैं तो शाकाहारी हूँ, मैं थोड़े ही हिंसा करता हूँ।’

हिंसा तुम्हारे शाकाहारी होने से थोड़ी कम हो जाती है, पर होती तो तब भी है और खूब होती है। हिंसा नहीं हटेगी तुम्हारे शाकाहारी होने से, हिंसा हटती है तुम्हारे न होने से। पैदा होने का मतलब ही ये है कि अब तुम न जाने कितने लाख जीवों की हत्या का कारण बनोगे। सबसे बड़ा पाप तो ये आबादी है, भले ही ये शाकाहारी आबादी हो। शाकाहार में भी बड़ी हिंसा रहती है।

आप जो रोटी भी खा रहे हो, आप अपनेआप को बोलते हो, ‘इसमें जीवहत्या नहीं है।’ जीवहत्या कैसे नहीं है? रोटी लाल है, रोटी भी लाल है। जैसे वो पुरानी कहानी है न नानक साहब के जीवन से कि उनको किसी सेठ ने बुलाया था, तो रोटी उसकी ऐसे निचोड़ी, उसमें से कहते हैं खून निकला। तो वो तो कहानी प्रतीक में हो गयी। आज सचमुच रोटी में खून है। ये जो आप फ़सल उगाते हो, ये बहुत हत्या से उगती है। बिना पेस्टीसाइड के खेती दिखा दो। फ़र्टिलाइज़र क्या मारता नहीं है वहाँ अन्दर? पोटैश डालो अपने ऊपर, फिर देखो क्या होगा!

अब बोलो कि भाई, कम पैदा करो तो इनको लगने लग जाता है, ‘हमारी प्रजाति विलुप्त हो जाएगी।’ बार-बार यही आता है, ‘अरे! अगर तुमने इस आदमी की बात सुन ली तो मानव प्रजाति अगले साढ़े-तीन महीने में विलुप्त हो जाएगी।’ यही आक्षेप आते हैं। अरे! तुम्हारी प्रजाति विलुप्त हो जाएगी? तुमने सारी प्रजातियाँ तो विलुप्त कर दीं और डर तुम्हें यही लग रहा है कि तुम्हारी प्रजाति नहीं बचेगी। तुम्हारे होने से करोड़ो प्रजातियाँ साफ़ हो गयीं सदा के लिए, और डर तुम्हें लग रहा है कि तुम नहीं बचोगे। पागल!

पर्यावरण खराब किया किसने?

प्रश्नकर्ता: उत्तर जी प्रणाम। मानसिक पर्यावरण पर तो आपने बहुत कुछ बोला है, जैसे मन खराब होता है तो बहुत कुछ खराब होता है। लेकिन जो बाकी दूसरे पर्यावरण प्रदूषण जैसे प्लास्टिक हो गया, पानी का दुरुपयोग और पेड़ों की अत्यधिक कटाई से भी पर्यावरण को काफ़ी नुकसान हो रहा है। आप अपने सभी फ़ॉलोवर्स को इस बारे में सन्देश दें।

उत्तर: इस पर भी बोला है, खूब बोला है। आपने शायद सुना नहीं होगा। खूब बोला है। मैं फिर बोल देता हूँ, अच्छा हुआ आपने प्रश्न उठाया। देखिए, हम बाहर जो कर रहे हैं न, वो हमारे भीतरी माहौल का ही एक प्रतिबिम्ब होता है। भीतर जो है, वो छुपा रह जाता है। हम कह देते हैं, ‘हम बड़े साफ़ लोग हैं।‘ क्यों? मुँह साफ़ है, हाथ साफ़ हैं, कपड़े साफ़ हैं। हम कह देते हैं, ‘हम साफ़ लोग हैं।‘ हम लोग हैं बड़े गन्दे, बहुत ही गन्दे, घिनौने लोग हैं हम। और हमारा वही घिनौनापन फिर उस प्लास्टिक में दिखाई देता है, कटे हुए पेड़ों के ठूँठों में दिखाई देता है। वो जो बाहर है, वो कहाँ से आया? वो हमारे भीतर से आया न।

अब इसी शहर (ऋषिकेश) को लीजिए, ये शहर वो शहर है ही नहीं जिसे मैं दस साल से जानता हूँ, हर तरह की गन्दगी, हवा तक अशुद्ध हो गयी है। बोलने के लिए तो बहुत कुछ है। दिन-रात देखता ही हूँ। आप यहाँ से जाइए, वहाँ रास्ते में शराब का एक ठेका पड़ेगा और उसके बगल में कई टन गन्दे प्लास्टिक का ढेर दिखाई देगा आपको और वो सरकारी है। सरकार ने वहाँ पर कचरा-घर सा बनाया है। जहाँ कचराघर बनाया है, वहाँ पहले एक नदी बहती थी। वो नदी अब नहीं बहती, नदी का तल भर दिखाई देता है। पानी वहाँ एकदम नहीं है, वहाँ कचराघर बना है। उसको आप देखेंगे, आप अवाक् रह जाएँगे, ‘ये क्या है?’

मुझे मालूम है न वो कहाँ से आया है। वो आया है एक धार्मिक जगह को एक मनोरंज़न की, पर्यटन की जगह बना देने से। ये पूरा एक़्सप्रेस-वे बन गया है अब जिसने दिल्ली से यहाँ तक का रास्ता मात्र चार घंटे का कर दिया है, दिल्ली का सारा कचरा उठकर यहाँ आ गया है।

कचरा नहीं रुकेगा जब तक इंसान नहीं सुधरेगा। और जब मैं कहता हूँ, ‘इंसान नहीं सुधरेगा’, तो मैं सौ प्रतिशत आबादी को सुधारने का सपना लेकर नहीं चल रहा हूँ, वो कभी नहीं हो पाएगा, इतिहास में कभी नहीं हुआ। हमारी रचना ऐसी नहीं है कि सौ में से सौ प्रतिशत लोग कभी सुधर जाएँ। ऐसा सतयुग में नहीं हुआ, अब क्या होगा? सतयुग से मेरा आशय है कि किसी भी काल्पनिक युग में नहीं हुआ, अब क्या होगा!

मैं बस चाहता हूँ कि शून्य-दशमलव-एक प्रतिशत लोग, एक प्रतिशत लोग, इतने लोग जाग जाएँ तो काम बन जाएगा। क्योंकि जो जगेगा, वो स्वयं ही वो बल इकट्ठा करेगा जिससे बाकी निन्यानवे प्रतिशत लोगों को सही दिशा में निर्दिष्ट किया जा सके। क्योंकि ये निन्यानवे प्रतिशत लोग जो सारी गन्दगी के ज़िम्मेदार हैं, ये कोई बड़े होशमन्द लोग थोड़े ही हैं। ये किसी भी चीज़ को लेकर अडिग नहीं रह सकते, इनका कोई भी आग्रह नहीं है। ये कुछ नहीं जानते, न कुछ चाहते हैं, ये बस मज़े करना चाहते हैं। ये तो पेड़ से टूटे पीले पत्ते की तरह हैं, ज़िधर हवा होगी उधर को बह निकलेंगे।

मुझे वो लोग चाहिए जो हवाओं का रुख तय कर सकें। सिर्फ़ एक प्रतिशत वैसे लोग चाहिए, बाकी निन्यानवे प्रतिशत लोग खुद ही पीछे-पीछे आ जाएँगे। उनमें कभी वैसे भी कोई चेतना रही नहीं है। उनका तो काम रहा है बल के पीछे-पीछे चल देना। और इतिहास कभी भीड़ों ने नहीं तय करा। आप मानव जाति के इतिहास को देखेंगे तो लोग रहे हैं, कुछ विशिष्ट लोग जिन्होंने सबकुछ करा है, बाकी सब तो उनके पीछे-पीछे हुआ है। और उनके पीछे भी जो भीड़ें चली हैं, ऐसा थोड़े ही है कि वो उनको कुछ समझती थी या कुछ था। उनके पास बल था इसलिए पीछे-पीछे चल दिये।

तो मुझे ये लोग चाहिए। हज़ार में से एक, सौ में से एक, इतना काफ़ी है, इतने में हो जाएगा, सारी सफ़ाई हो जाएगी।

जब तक प्लास्टिक सस्ता है, उसका इस्तेमाल होगा। प्लास्टिक सस्ता है और इंसान में लालच है आप कैसे रोकोगे? एक ही तरीका है — नियम बने, कानून बने। और वो बन जाएगा, उसके बिना आप सोचें कि आप लोगों में एक जाग्रति का संचार करेंगे, अवेयरनैस कैम्पेन (जागरूकता अभियान) वगैरह चलायें। अच्छी बात है, उससे बस कुछ होता नहीं। आप वृक्षारोपण अभियान चला सकते हैं। लोग जाकर पौधे लगा देते हैं थोड़े-बहुत और अपने पाप के बोझ से स्वयं को आज़ाद कर लेते हैं, कि हमने कुछ पौधे लगा दिये।

पहली बात तो जो लगाये गए हैं, वो बहुत-बहुत कम हैं, दूसरी बात, जो लगाये गए हैं वो दो महीने में मर जाते हैं, तो इन सबसे काम नहीं होने का है। आप सोचें कि एक-एक आदमी जाग जाए तब दुनिया बदलेगी तो दुनिया फिर बदलने से रही।

हमें शेर लोग चाहिए जो सबसे आगे बढ़कर दहाड़े, जो नेतृत्व दे पाये, तब बनेगा काम। नहीं तो फिर हम सब अपनेआप को खुश करने के लिए इस तरह से कर सकते हैं कि चलो, सब लोग अपने-अपने मोहल्ले में सफ़ाई करो और इतवार को सुबह एक घंटा हम सब सफ़ाई किया करेंगे। कर लीजिए, उसकी फ़ोटो खीचकर फ़ेसबुक पर डाल दीजिए, अच्छा लगेगा कि हम भी स्वच्छता अभियान में भागीदार हो गये। ‘देखो, हम अच्छे आदमी हैं, हम भी सजग नागरिक हैं।’ बड़ा अच्छा लगता है, होता उससे कुछ नहीं।

बाहरी स्वच्छता आन्तरिक स्वच्छता की छाया है और वैसी आन्तरिक स्वच्छता — मैं कह रहा हूँ बस एक प्रतिशत लोगों में आ जाए, बाकी निन्यानवे प्रतिशत अपनेआप ठीक हो जाएँगे।

हम इतने तो मजबूर हो गये हैं, हम तब भी कोई नियम-कानून कहाँ बना रहे हैं, मुझे बताइए? पेरिस, कोपेनहेगन; अभी मालूम है भारत ने क्या वचन दिया है? कार्बन न्यूट्रल होंगे वर्ष २०७० तक। वर्ष २०७० तक कुछ बचेगा? कार्बन न्यूट्रल होंगे?

ये सब इसलिए है क्योंकि हम आम आदमी का मुँह देखते हैं। हम कहते हैं कि नेता लोग इसमें कुछ करके दिखाएँगे। नेता किसके गुलाम हैं? नेता बहुमत के गुलाम हैं। बहुमत किनका है? बहुमत बेहोश लोगों का है। तो इसीलिए दुनिया भर के नेता मिलते हैं और वो चाहे प्लास्टिक का मुद्दा हो, चाहे पर्यावरण का मुद्दा हो, चाहे क़्लाइमेट चेंज़ का हो, वो आपस में मिलते हैं, वहाँ अपना कुछ गप-शप करके वापस आ जाते हैं। जनतन्त्र है न भाई!

कोई सशक्त आदमी चाहिए जो खतरा उठाने को तैयार हो, जो बहुमत के विरुद्ध जाने को तैयार हो, जो बहुमत को अपने पीछे-पीछे चलाने को तैयार हो, जो कड़े निर्णय लेने को तैयार हो। ऐसे लोग जिनकी कमज़ोर नज़रें बस यही गिनती रहती है कि कितने लोग मेरे साथ हैं, कितने लोग खिलाफ़ हैं, ऐसों से कुछ नहीं होने का।

किसी देश में कुछ नहीं होगा। कौनसा देश कोई भी सार्थक काम कर पा रहा है इस दिशा में? और ये सारे मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पेड़, पौधों, पशुओं की प्रजातियों का विलुप्त होना, मछलियों की प्रजातियों का विलुप्त होना, सागरों में प्लास्टिक का भरना, हमारे लहू में प्लास्टिक का पहुँच जाना। सिर्फ़ ग्रीन हाउस गैसें ही नहीं और भी गैसें हैं। सल्फ़र की गैसें, नाइट्रोज़न की गैसें, इनका हवा में पहुँच जाना। धूल-धुएँ का हवा में पहुँच जाना, एसपीएम (निलम्बित कण पदार्थ) का बढ़ जाना, ज़नसंख्या का बढ़ जाना।

ये सब एक-दूसरे से जुड़ी हुई चीज़ें है और इन सबके मूल में कौन बैठा है? आम आदमी। आम आदमी की करतूत है ये सबकुछ और उस आम आदमी को आप बहुत जगा नहीं सकते। हाँ! आप एक ऐसा बल पैदा कर सकते हो जिसके पीछे-पीछे वो आम आदमी चलने लगे।

भई, हम ये भी कह दें कि जो बड़े-बड़े इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरर्स (औद्योगिक निर्माता) हैं, वो करते हैं प्रदूषण। तो वो जो कुछ भी बनाते हैं, उसका उपभोक्ता कौन है? वो किसके लिए बनाते हैं? खुद ही बनाकर खा जाते हैं? कौन है उसका उपभोक्ता?

श्रोतागण: आम आदमी।

उत्तर: ये आम आदमी है जो फैलता ही जा रहा है, फैलता ही जा रहा है और खाता ही जा रहा है, खाता ही जा रहा है। और इसी आम आदमी का एक बड़ा रूप हमें उनमें देखने को मिलता है जो तथाकथित समृद्ध वर्ग है, वो भी तो आम आदमी हैं। चालीस साल पहले साधारण मध्यमवर्गीय लोग थे, अब उनको आर्थिक सफलता मिल गयी है तो वो अब अरबपति हो गये हैं। वो भी हैं लेकिन दिल से आम आदमी ही, उनकी सारी हरकतें आम आदमियों वाली हैं, बस पैसा उनके पास ज़्यादा है।

तो ये जो आम आदमी है और उसका आम मन और आम संस्कृति है, ये हैं असली गुनहगार। इसको तोड़ना है। और ये टूटेगा तभी जब सशक्त उदाहरण सामने रखा जाएगा। कुछ लोग होंगे जो चीज़ को समझ जाएँगे, इसलिए बदल जाएँगे। ज़्यादातर लोग तो वही होंगे जो पीछे-पीछे चलकर बदलेंगे।

प्र२: प्रणाम उत्तर जी। मैं सोशल इंटरप्राइज़ चलाता हूँ और वेस्ट मैनेज़मेंट (अपशिष्ट प्रबन्धन) में काम करता हूँ। हमारी एक समस्या है, जैसे-जैसे कम्पनी बड़ी होती जा रही है, हमें और सक्षम लोगों की भी ज़रूरत होती है। और दूसरी तरफ़ ऐसे लोग भी चाहिए होते हैं जो मिशन के साथ एलाइंड (सम्बद्ध) हों। इसका मिश्रण मिलना बहुत मुश्किल है, तो इसको कैसे करें? और एक सवाल है कि जो गंगा तट में प्लास्टिक गिरे रहते हैं, तो मैं चाहूँगा कि इसके लिए कुछ स्वच्छता अभियान हो, और मैं कुछ अगर कर सकता हूँ तो बहुत अच्छा रहेगा।

उत्तर: समस्या तो आएगी और इसका कोई निश्चित समाधान नहीं होता। इसका समाधान यही होता है कि जो सधा हुआ आदमी है, ‘मिशन एलाइंड’ (उद्देश्य सम्बद्ध) जिसको आप कह रहे हैं, उसको उत्पादक बनाया जाए और जो आपने एफ़िशिएंट वर्कर लिया है, उसको मिशन से एलाइन करा जाए, इन दोनों में ज़्यादा आसान होता है मिशन एलाइन आदमी को एफ़िशिएंट बनाना, क्योंकि उसके पास अब एफ़िशिएंट बनने की वजह है। उसको मिशन से कुछ लगाव है न? तो वो मिशन की खातिर एफ़िशिएंट बनना चाहेगा।

दूसरी बात, ऐसा व्यक्ति रुकेगा आपके साथ क्योंकि वो सही कारण से आया है आपके पास। जो दूसरी तरफ़ वाला व्यक्ति है, जो एफ़िशिएंट है, वो आते ही आपको लाभ देना शुरू कर देगा। लेकिन उसके साथ आप बहुत गहराई तक नहीं जा पाएँगे और बहुत दूर तक नहीं जा पाएँगे, क्योंकि वो तो आया है अपनी एफ़िशिएंसी बेचने।

जैसा कि ज़्यादातर प्रोफ़ेशनल्स करते हैं। अपने ‘सीवी’ पर लिखते हैं, ‘देखो, मैं कितना एफ़िशिएंट हूँ और मुझे इन चीज़ों का नॉलेज़ है और मैं अपनी एफ़िशिएंसी और अपनी नॉलेज़ नीलाम कर रहा हूँ, आओ, आओ।‘ बोली लग रही है, जो सबसे ऊँचा खरीददार होगा, वो ले जाएगा।

जो एम्प्लॉइ मार्केट है, वो ऐसे ही तो ऑपरेट करती है। उसको तो कोई और आकर खरीद ले जाएगा, उसके पास आपके पास टिकने की कोई वजह नहीं है। लेकिन कई बार ऐसे लोग भी ज़रूरी होते हैं। वो जितने दिन भी आपके पास रहेंगे, काम करते रहेंगे बस उनके साथ आप भविष्य नहीं बना सकते। तो ज़्यादा अच्छा तो यही है कि सही लोगों को लिया जाए और उनको विकसित किया जाए। यद्यपि ये हमेशा नहीं हो सकता, ये भी मैं समझता हूँ। कई बार बाज़ार से लोगों को उठाना पड़ता है।

दूसरी बात, जो आपने कहा कि फिर गंगा तट पर कचरा बहुत है और सफ़ाई के लिए ड्राइव चलानी चाहिए। हाँ, बिलकुल चलानी चाहिए। अतीत में हम एक बार चला भी चुके हैं और उसमें आप अगर कोई सहयोग कर सकते हैं, तो हम बेशक कर सकते हैं। अगले एक-दो दिन में भी कुछ कर सकते हैं। तो उसके लिए आप संस्था में बात करिए किसी से, और बहुत अच्छा रहेगा सुबह-सुबह का वक्त रहता है, सफ़ाई करी भी जाए।

पृथ्वी तबाह कर डाली, अब दूसरे ग्रह बर्बाद करते हैं

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मैं एक डॉक्यूमेंट्री मूवी देख रहा था एलोन मस्क की। तो उसमें ये कहा गया था कि जो पृथ्वी पर ज्ञान का और चेतना का एक छोटा सा दीपक है मानव सभ्यता के रूप में, वो कभी भी बुझ सकता है। तो इसका इलाज तो एक ही है कि मल्टी-प्लैनेट स्पीशीज़ (बहु-ग्रहीय प्रजाति) बनना ही पड़ेगा क्योंकि पृथ्वी पर कभी भी मौसम परिवर्तन, विश्वयुद्ध या फिर उल्का पिंड की वजह से मानव सभ्यता के ज्ञान का दीपक कभी भी बुझ सकता है। तो इसका ये एक तर्क भी तो सही साबित हो रहा है। कृपया स्पष्ट करें।

उत्तर: एक शराबी ने खूब पी-पीकर के अपने घर को उल्टी से भर दिया है। और वो कह रहा है, ‘मुझे नया खरीदना है।‘ अपने घर में उसने जहाँ देखो वहाँ वमन कर रखा है और वो गन्धा रहा है, और उसमें बीमारियाँ पैदा हो रही हैं। और उसके घर में उसके जो कुछ पालतू पशु-पक्षी थे, वो उन बीमारियों से मर रहे हैं।

वो अपना नशा नहीं छोड़ सकता, वो और ज़्यादा पीता जा रहा है क्योंकि घर इतना गन्धाता है कि होश बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता है। होश में आओ तो और बदबू आती है। तो जितना बदबू बढ़ती जा रही है वो उतना और ज़्यादा पीता जा रहा है। जितना पीता जा रहा है, उतना उलटता है और घर को और बर्बाद करता है। और अब उसने एक ज़बरदस्त उपाय निकाला है। क्या? वो कह रहा है, ‘मैं नया घर अब खरीदूँगा।‘ कैसा लगा ये मज़ाक? कैसा लगा?

माने शराब नहीं छोड़ सकते, पहली बात। और दूसरी बात, घर साफ़ नहीं कर सकते। तीसरी बात, मूर्ख इतने हैं कि सोच रहे हैं, जहाँ जाओगे वहाँ भी बर्बादी नहीं लाओगे। नये घर का भी करोगे क्या? जितनी उर्जा में और जितना समय और संसाधन लगाकर, पैसा लगाकर तुम नया घर लाओगे, उसके एक बहुत छोटे हिस्से से तुम अपने इसी घर की सफ़ाई कर सकते हो। पर कुल मिलाकर नीयत ये है कि नशा नहीं छोड़ना है, बस ये है इतनी सी बात।

नशे को बचाने के लिए मैं दस और ग्रहों पर कूद-फाँद करने को तैयार हूँ। मैं पूरा ब्रह्मांड नापने को तैयार हूँ, मैं एक चीज़ नहीं करूँगा, क्या? नशा नहीं छोड़ूँगा। नशा नहीं छोड़ूँगा, मजबूर हूँ और घर नहीं साफ़ करूँगा, आलसी हूँ और बेईमान हूँ। जितने संसाधन लगेंगे — आपसे पूछ रहा हूँ, साधारण बुद्धि से बताइए — जितने संसाधन लगेंगे मंगल को कॉलोनाइज़ करने में, उतने संसाधनों में क्या हो जाएगा? पूरी पृथ्वी पुनर्जीवित करी जा सकती है, सब ठीक हो सकता है। और मंगल तक आप जाओगे भी? आम आदमी को ये फैंटसी (कल्पना) बहुत अच्छी लगती है, आप और मैं भी आम आदमी हैं, हमारा नम्बर कभी नहीं लगने वाला। आपको कीमत का कुछ अन्दाज़ा है लॉक, स्टॉक एंड बैरल जब आपको यहाँ से वहाँ भेजा जाएगा? कुछ आप समझ रहे हो? जो जाएँगे वो कितने लोग होंगे?

वो मानवता वहाँ पूरी नहीं भेज रहे हैं। वो बस मानवता का बीज भेज रहे हैं, शून्य-दशमलव-शून्य-शून्य एक प्रतिशत लोगों को वहाँ भेज देंगे। वो वहाँ फिर नयी मानवता शुरू करेंगे। हमको और आपको क्या किया जाएगा? यहाँ सड़ने के लिए छोड़ा जाएगा। वो कहेंगे, ‘हम जो पीछे से जो ये सारी गन्दगी छोड़ गये हैं, ये तुम झेलो।‘ ठीक उस उपद्रवी की तरह, वो जो कई होते हैं न बाप का पैसा वाले और बिलकुल ज़मीन की भाषा में बोलूँ तो हराम का पैसा वाले, जो होटल में एक रूम बर्बाद करके बोलते हैं, ‘नाउ गेट मी अनदर (अब मुझे दूसरा कमरा दो), क्योंकि इसको तो मैंने बिलकुल उल्टियाँ कर दी हैं, कुछ कर दिया है।’ अपना गये हैं वहाँ, चेक-इन करा और खूब उलट मारा। और होटल के पास भी अगर गुंजाइश होती है तो उनको कहता है, ‘अच्छा, आप दूसरे रूम में आ जाइए। इसकी तो आपने ऐसी तबाही कर दी है कि इसको साफ़ करने में तीन घंटा लगेगा। तो तब तक आप आ ही जाइए दूसरे रूम में।‘ ये वो मानसिकता है कि होटल ही तो है पृथ्वी। एक रूम में घुसो, उसको बर्बाद करो, फिर दूसरे रूम में चेक-इन कर जाएँगे, दूसरा रूम माने दूसरा ग्रह।

दो तरह के लोग हैं — एक, जिन्हें समझ में आता है कि ये होटल नहीं है और दूसरे वो जिनके लिए उनकी ज़िन्दगी भी होटल है, पूरा अस्तित्व होटल है। जहाँ वो चेक-इन करते हैं अपने पैसे के दम पर, और चेक-इन करके बस कंज़म्पशन करते हैं। उनके लिए हर घर एक होटल है, प्रत्येक मनुष्य एक ग्राहक है और प्रत्येक स्त्री एक वेश्या है।

सबकुछ उन्हें लगता है पैसे से ही खरीदा जा सकता है। वो किसी के भी पास जाएँगे, बात बस पैसे की करेंगे। कहेंगे, ‘क्या, दिक्कत क्या है कहीं जाने में? पैसा ही तो लगता है न। पैसा है मेरे पास। पैसा ही तो लगता है न?‘ मैं इन व्यक्ति विशेष की बात नहीं कर रहा हूँ, पर आमतौर पर बहुत इस तरह के लोग होते हैं जो किसी से सम्बन्ध भी यही कहकर बनाते हैं, 'मेरे पास इतना पैसा है।' वो सामने वाले व्यक्ति से नाता नहीं जोड़ते हैं, वो सामने वाले व्यक्ति को भी खरीदते हैं। ‘मुझे जो चीज़ पसन्द आएगी खरीद लूँगा।’

बात समझ में आ रही है?

आप थोड़ी पहुँच जाओगे वहाँ! आपके पास कितना है? खुश हो रहे हैं। आप और मैं यहीं रहने वाले हैं भाई। तो हमारे लिए बेहतर ये है कि हम इसी को ठीक रखें और जो वहाँ पहुँचेंगे भी वो क्या होगा? वो एक सुपर एलीट क्लब (अभिजात वर्ग) होगा और उसके पीछे यूजीनिक्स भी काम कर रही है, एक आनुवंशिक पूर्वाग्रह भी है। क्या? कि वहाँ लोग ही वही पहुँचेंगे जो जेनेटिकली सुपीरियर (आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठ) होंगे, क्योंकि जो जेनेटिकली सुपीरियर होता है वही तो अमीर होता है न, ये मान्यता है इनकी। तो वहाँ पर एक नयी किस्म की मानवता फिर जन्म लेगी। और ये बातें कोई एक व्यक्ति नहीं बोल रहा, ये बोलने वाला पूरा एक समुदाय है जिन्हें आम आदमी पसन्द ही नहीं आता।

आम आदमी पसन्द मुझे भी नहीं आता पर फिर दो बातें होती हैं, आम आदमी पसन्द नहीं आ रहा तो जो उसकी मिडियोक्रिटी (सामान्यता) है उसको खत्म करो, आम आदमी को ऊपर उठाओ ताकि वो आम न रह जाए। और दूसरा ये होता है, आम आदमी पसन्द नहीं आ रहा तो उसको मार ही डालो।

एक बात ये है कि आप कह रहे हो कि क्यों एक औसत, साधारण ज़िन्दगी जी रहे हो, उठो। जब उठोगे तो आम नहीं रहोगे, एक ये है। और दूसरा ये है कि ये सब आम आदमी हैं, इनको यहीं पृथ्वी पर मार दो, हम कहीं बाहर चलते हैं। और पृथ्वी पर मारने का क्या तरीका है? प्रचारित करो कि अभी तो हमें और बच्चों की ज़रूरत है।

तो ठीक वही लोग जो कहते हैं कि चलो दूसरे ग्रहों पर, ये वही लोग हैं जो ये भी प्रचारित करते हैं कि बच्चे खूब पैदा करो। जितने ज़्यादा बच्चे पैदा होंगे, पृथ्वी उतनी जल्दी नष्ट होगी, उतना ज़्यादा और रैशनलाइज़ेशन मिलेगा, जस्टिफ़िकेशन (कारण) मिलेगा कि हम क्यों पृथ्वी छोड़कर जा रहे हैं क्योंकि पृथ्वी तो बर्बाद हो गयी है। पृथ्वी बर्बाद तुम्हारे ही जैसे लोगों की वजह से ही हुई है। इनवर्टेड अरगुमेंट (उल्टा तर्क) है पूरा। खुद बर्बाद करो और बोलो कि देखो, बर्बाद हो गयी है तो मैं जा रहा हूँ।

समझ में आ रही है बात?

साधारण आदमी के लिए तो ये एक वीडियो गेम रह जाना है, ये एक फैंटसी (कल्पना) रह जानी है कि एक स्पेस शटल उठा है, उसके भीतर लोग बैठे हैं बहुत सारे और उन लोगों को अब एक बिलकुल नयी ज़िन्दगी के लिए एक नये ग्रह पर ले जाया जा रहा है। उस शटल में आप बैठे हो क्या? और आप बैठना चाहोगे भी क्या? मैं तो आखिरी साँस तक इस पृथ्वी के लिए लड़ूँ, क्योंकि इसने कुछ बिगाड़ा नहीं है भाई।

मैं किस अधिकार से यहाँ की सारी प्रजातियों का नाश करके खुद भाग रहा हूँ? और जब मैं भागूँगा तो इन सब प्रजातियों को भी साथ लेकर जाऊँगा क्या? और मैं जहाँ रहूँ, वहाँ मेरी चिड़िया नहीं है, वहाँ मेरी मछलियाँ नहीं हैं, वहाँ मेरे जंगल नहीं हैं, वहाँ मेरे पशु नहीं हैं, तो मैं वहाँ क्या कहकर, किस अधिकार से और किस आनन्द से साँस लूँगा, बोलो? और क्या इस तरीके की योजना है कि आप वहाँ जाओगे तो हाथी भी लेकर जाओगे, सागर भी लेकर जाओगे और सब मछलियाँ भी लेकर जाओगे, और सब पक्षी भी लेकर जाओगे? कभी सोचा है? कोई तो पक्षी प्यारा होगा? उन सबको यहाँ पीछे छोड़कर मरने के लिए वहाँ चले जाना है? उनके प्रति हमारा कोई दायित्व नहीं है? बोलो?

या ये योजना में शामिल है बात, कि हम जब जाएँगे तो सारी बायोडायवर्सिटी (जैव विविधता) अपने साथ लेकर जाएँगे? ये है क्या? सारे पेड़ वगैरह भी अपने साथ लेकर जाएँगे, ये है क्या? जहाँ जाओगे वहाँ पीपल लेकर जाओगे, पीपल से कोई प्यार नहीं? तो ये कैसी विचित्र बातें हैं जो करी जा रही हैं!

हम सब एकसाथ हैं। हम एकसाथ आये हैं और हमें एकसाथ ही जाना चाहिए अगर जाने की नौबत आये तो। और एकसाथ कहाँ? मंगल ग्रह की नहीं बात कर रहा हूँ। जाना माने जाना, विलुप्ति भी हो तो सबकी एकसाथ हो। एक अर्थ में हम भाई-बहन हैं सब। न सिर्फ़ सारी मानवता एक-दूसरे के प्रति भाई-बहन है, एक-एक जीव, छोटा-बड़ा सब हैं।

हम सब एक ही जगह से निकले हैं तो सहोदर हैं, एक ही माँ के गर्भ से हम आये हैं। उनको यहाँ छोड़कर के तुम कहाँ उड़ने वाले हो भाई? उस जीवन की कल्पना करिए न — न कुत्ता, न बिल्ली, न हिरण, न बाघ। आप उठ रहे हो, सुबह वहाँ जैसी भी होगी, पृथ्वी जैसी सुबह नहीं होती वहाँ। सुबह वहाँ जैसी भी है, आप उठ रहे हो, कोई चिड़िया नहीं है चहचहाने के लिए, आप जीना चाहते हो ऐसी ज़िन्दगी? या इससे बेहतर ये है कि इसी पृथ्वी के लिए लड़ते हुए मर ही जाएँ?

आपके पास हो सकता है बहुत पैसा हो, आप चले भी जाओ, आपके जितने गरीब रिश्तेदार हैं वो सब पीछे रहेंगे, आप जाना चाहते हो? क्यों नहीं हम बात कर रहे हैं पृथ्वी को ही बचाने की? ‘क्योंकि कुछ भी छोड़ सकता हूँ, नशा नहीं छोड़ सकता। आज इस घर में उल्टी करी है, कल उस घर में उल्टी करूँगा और उस घर के बाद कहूँगा, इतना अनन्त ब्रह्मांड है, अब मैं किसी और ग्रह को कॉलोनाइज़ कर लूँगा। पूरा ब्रह्मांड किसलिए है? मेरे भोगने के लिए। एक ग्रह को भोग-भोगकर तबाह कर दिया, अब दूसरे ग्रहों को तबाह करूँगा।’

और एक बात अच्छे से समझिए, सारी शक्ति ऐसे ही लोगों के पास है। ये जो बात कह रहे हैं न, ये मैं बता रहा हूँ तो आपको समझ में आ रहा होगा कि बिलकुल एब्सर्ड (बेतुका) है, एक छोर पर भयानक है और दूसरे छोर पर मज़ाक है, दिख रहा होगा। क्योंकि अभी मैं बोल रहा हूँ, पर ये जो बात बोल रहे हैं, वो हो जाएगी। ये घटना घट जाएगी, क्योंकि सारी ताकत ऐसे ही लोगों के हाथ में है और ये दुनिया धनबल, बाहुबल से चलती है। धनबल, बाहुबल उन्हीं के पास है तो धनबल से बुद्धिबल भी वो लोग खरीद लेते हैं। जितने भी बुद्धि वाले लोग होते हैं वो सब धन के पीछे-पीछे, जैसे गधे के आगे गाजर, वो सब धन के पीछे-पीछे अपनी बुद्धि भी ऐसे ही लोगों को सौंप देते हैं।

द बेस्ट ब्रेन्स ऑफ़ दिज़ कंट्री एंड द वर्ल्ड वर्क इन सच कॉर्पोरेशंस (इस देश और दुनिया के श्रेष्ठतम बुद्धिजीवी ऐसी संस्था में काम करते हैं) हाँ या न? वो कहते हैं, ‘हमारे पास बुद्धि और है किसलिए? बेचने के लिए। मैं बुद्धि बेचता हूँ, कोई मेरी बुद्धि खरीदे, मुझे पैसा दे दे।‘

एक बात बताओ, कोई अपना जिस्म बेचकर के पैसे पाता है और कोई अपनी बुद्धि बेचकर पैसे पाता है, इन दोनों बातों में कितना फ़र्क है? बहुत ज़्यादा नहीं। दोनों का काम बस एक है कि जो प्राकृतिक रूप से मिला हुआ है, उसको बेच दूँगा और बेचकर क्या करूँगा? पेट चलाऊँगा, भोगूँगा। धनबल, बुद्धिबल, बाहुबल सब इनके पास हैं, ये जो चाह रहे हैं करके दिखा देंगे, हम-आप बैठे रह जाएँगे।

प्रश्न: सर, ये लोग स्पेस में मल्टी-प्लैनेट ढूँढने के लिए जो पैसा लगा रहे हैं, इतना पैसा ये क्लाइमेट चेंज को रोकने के लिए क्यों नहीं लगा सकते? ये तो बाहर का क्लाइमेट चेंज हो गया और जो भीतर का क्लाइमेट है उसको कोई नहीं ठीक रखना चाहता।

उत्तर: दबाव बनाओ तो लगा सकते हैं। पर जो कर रहे हैं वो करते हुए भी तुम्हारे हीरो हैं, तो वो अपने तौर-तरीके क्यों बदलें? आप यहाँ आये, आप मेरे साथ थोड़ा चले, उससे पहले न जाने आप में से कितने लोगों के ऐसे ही हीरो रहे होंगे। इनको आप अपना आदर्श मानते हो, रोल मॉडल मानते हो, वो अपने तौर-तरीके क्यों बदलें, बताओ न? आपकी नज़रों में तो वो सुपरस्टार हैं, ड्यूड हैं, हीरोज़ हैं।

भारत की ही युवा शक्ति का बहुत बड़ा तबका है जो ऐसों को आइडियलाइज़ (आदर्श बनाना) करता है। आप जानते होंगे ऐसे लोगों को, कहते होंगे, ‘ये है सही बन्दा, जो चाहता है करके दिखा देता है। सबकुछ है इसके पास। इसने ये खरीद लिया, वो खरीद लिया, देखा? ये चाहे तो चुनावों के नतीजे पलटवा दे।‘ आप जिसको इतना पसन्द करोगे, उसके हाथ में सारी ताकत सौंप दोगे न और वो जितनी ताकत पाता जाएगा, आप उसको उतना आइडियलाइज़ करते जाओगे।

एक बात भूलिएगा नहीं, समाज में किसी भी व्यक्ति के हाथ में जो ताकत होती है वो उसे समाज ने ही सौंपी होती है। समाज को हटा दो, उस व्यक्ति को जंगल भेज दो, बताओ उस व्यक्ति के पास क्या ताकत है? समाज हटा दीजिए, उस व्यक्ति को जंगल भेज दीजिए, क्या ताकत है? है ताकत? वो जो बैंक अकाउंट है, वो एक सामाजिक इंस्टीट्यूशन है, उस बैंक अकाउंट में उस व्यक्ति के सारे पैसे हैं, वो पैसे तभी तक अर्थ रखते हैं जब तक समाज उन पैसों को ऑनर (सम्मान) करता है। जिस दिन समाज उस पैसे को ऑनर करना बन्द कर दे, उस व्यक्ति में क्या ताकत है?

तो ये मत कहिए कि फ़लाना व्यक्ति बहुत ताकतवर हो गया है। वो व्यक्ति ताकतवर नहीं है, आपने उस व्यक्ति के हाथ में इतनी ताकत दे रखी है क्योंकि आपको लगता है कि वो व्यक्ति उस ताकत का हकदार है। ये वैल्यू जजमेंट (मूल्यांकन) गलत हो गया न। जो हकदार नहीं था, आपने उसको हकदार समझकर उसको इतनी ताकत दे दी और जिसको ताकत देनी चाहिए थी, वो ठन-ठन गोपाल घूम रहे हैं।

ताकत बहुत खतरनाक चीज़ होती है, बहुत सोच-समझकर के किसी को दिया करिए। आप एक सेलिब्रिटी को ताकत दे देते हो, आपकी दी हुई ताकत का वो सेलिब्रिटी अब कुछ भी इस्तेमाल कर सकता है न। आपने किसी को सेलिब्रिटी बना दिया, आपने उसको सेलिब्रिटी बनाकर उसको सौ-मिलियन फ़ॉलोअर्स (दस-करोड़ अनुयायी) दे दिये मान लीजिए। सेलिब्रिटी वही जो इतने फ़ॉलोअर्स लेकर घूमे, उसी को सेलिब्रिटी बोलते हैं।

आपने उसको सौ-मिलियन फ़ॉलोअर्स दे दिये, अब वो जाकर के बैठ जाएगा किसी अन्धविश्वास फैलाने वाले बाबा के पास। पाँच-मिलियन फ़ॉलोअर्स उसने उस बाबा को सौंप दिये। वो पाँच-मिलियन उसके थे क्या अपने? आपने उसको दिये थे न? देखिए, वो किसको दे आया और वो अब जो अन्धविश्वास फैलाएगा वो आपके घर को खा जाएगा। आपका सेलिब्रिटी ही आपके घर को खा गया। सोच-समझकर किसी को ताकत देनी चाहिए।

आपने एक डरपोक आदमी को सेलिब्रिटी बना दिया, उसका किसी सत्ताधीश ने हाथ मरोड़ दिया तो अब वो कुछ भी करेगा अपने सेलिब्रिटी पॉवर का। और क्या करेगा? वो आपको ही मूर्ख बनाने के काम आएगा सारा सेलिब्रिटी पॉवर।

आपने किसी को सेलिब्रिटी बना दिया, वो आकर आपको गुटखा बेच गया, आपका बेटा मर गया। उस बेटे को किसने मारा? आपने ही मारा न क्योंकि उस बेटे ने गुटखा खाना शुरू करा उस सेलिब्रिटी को देखकर। उस सेलिब्रिटी को सेलिब्रिटी आपने बनाया था। अगर वो जो होर्डिंग (विज्ञापन) पर चिपका हुआ है गुटखा खिलाने के लिए सेलिब्रिटी, अगर उसको आपने सेलिब्रिटी न बनाया होता, वो एक आम इंसान होता जिसका वो हकदार है, तो क्या उसकी सलाह पर आपके बेटे ने गुटखा खाया होता? आपके बेटे ने गुटखा सिर्फ़ इसलिए खाया क्योंकि वो व्यक्ति अब सेलिब्रिटी के ओहदे से बोल रहा है। एक ऐसा ओहदा जिसका वो हकदार है भी नहीं, लेकिन उसको वो ओहदा आपने दिया।

उल्टा भी होता है। आपके बेटे को जो अब आदमी सही सलाह देने जाए, आपका बेटा अब उसकी बात नहीं सुनेगा। बताओ क्यों? क्योंकि उसको आपने कभी सेलिब्रिटी बनाया नहीं। आपका बेटा कहेगा, ‘इनकी बात क्यों सुनूँ? ये है कौन? तू है कौन? व्हाइ शुड आइ लिसन टू यू ? (मैं तुम्हारी बात क्यों सुनूँ), तू है कौन?’ ये सवाल उठता है कि नहीं?

डाँट भी आप उसी की बर्दाश्त करते हो जो आपकी नज़रों में कुछ होता है। जो कुछ न हो उसको तो आप सीधा बोलोगे, ‘तू है कौन मुझे डाँटने वाला? तू है कौन मुझे समझाने वाला? और तेरे बाप का खा रहा हूँ क्या? मेरा पैसा है, मैं खा रहा हूँ, तू कौन है समझाने वाला?’ ये जवाब आप एक सेलिब्रिटी को नहीं दोगे क्योंकि वो सेलिब्रिटी है।

सोच-समझकर ताकत दिया करो किसी को। आप जिसको ताकत दे रहे हो वो उस ताकत का आपके ही खिलाफ़ इस्तेमाल कर रहा है।

हमारी क्लास में हुआ था, हम छोटे थे। तो एक था, समझ लो टुईंया सिंह, वो पूरी क्लास का प्यारा था क्योंकि वो कभी कुछ करके नहीं लाता था और हमेशा डाँट खाता था, मार खाता था, सज़ा खाता था। ऐसे लोगों को देखकर बड़ी राहत मिलती है, ‘हमसे भी बुरा कोई है।’ और वो सुधरने का नाम न ले।

पूरी क्लास उसकी फ़ैन हो गयी। बोल रही है, ‘पूरा स्कूल अपने बाहुबल के साथ इसके खिलाफ़ लगा हुआ है, सारी टीचर्स , प्रिंसिपल। पीटीएम (अभिभावक अध्यापक बैठक) में बस इसी के चर्चे रहते हैं। लेकिन देखो, ये अकेला विद्रोही, एक अदद क्रन्तिकारी, किसी के आगे झुक नहीं रहा है। ये कह रहा है कि मैं जैसा हूँ वैसा ही रहूँगा।‘ पिटता है, मार खाता है, फ़ेल होता है, जो होता है।

तो पूरी क्लास उसकी फ़ैन हो गयी क्योंकि ऐसों का ही फ़ैन होना ज़्यादा आसान होता है। जो हमसे भी बुरा हो या कम-से-कम हमारे जैसा हो, वही हमें ज़्यादा भाता है। न जाने क्या हुआ, क्लास टीचर ने कह दिया कि इस बार मॉनिटर इलेक्शन (चुनाव) से चुना जाएगा। बोले, ‘भाई, आपकी क्लास तो आप चुनिए आपका मॉनिटर कौन होना चाहिए। आप चुनेंगे न।’

तो ज़ाहिर सी बात है, कौन जीता? ये ही टुईंया सिंह जीत गये। अब ये बन गये मॉनिटर। मॉनिटर से मैन-ईटर (नरभक्षी) बनते इनको एक दिन नहीं लगा क्योंकि इन्हें जब टीचर्स की भी नहीं सुननी, तो ये स्टूडेंटस की क्यों सुनेंगे? अब इनको मिल गयी है सत्ता, तो इन्होंने जो पिटाई लगानी शुरू करी पूरी क्लास की, इनका नाम ही पड़ा मैन-ईटर।

सोच-समझकर किसी के हाथ में सत्ता देनी चाहिए। ताकत बहुत ज़बरदस्त चीज़ होती है। आप जो ताकत दे रहे हो वो ताकत आपको ही भारी पड़ने वाली है। और ताकत का एक नियम समझिए, जो पहले से ही हमसे बेहतर है, उसे और ताकत देते अहंकार बहुत बुरा मानता है। क्यों? कह रहे हैं, ‘ये तो पहले ही हमसे ऊँचा था, इसको अगर और ताकत दे दी तो ये तो और ऊँचा हो जाएगा। तो जो सचमुच ताकत पाने का हकदार होता है, हम उसे ताकत नहीं देंगे। एक तरह की ईर्ष्या उठती है। ये तो पहले ही इतना बेहतर है, इसको हमने अगर और पद, पदवी, अधिकार भी दे दिये तो फिर और साफ़ हो जाएगा न कि हम लोग झुन्नु ही हैं। ये एकदम एक राजा हो जाएगा।

तो हम टुईंया सिंह को दे देते हैं। अब टुईंया सिंह बोल रहे हैं कि पृथ्वी में आग लगा दो, कुछ कर दो, नायाब वो बातें बता रहे हैं। और चूँकि अब उनके पास हर तरह का बल है तो उनकी एक बहुत ज़बरदस्त फैन फ़ॉलोइंग हो गयी है।

एक आये थे, बोले, ‘पर प्रशान्त जी, हमारे कुछ अरमान भी तो होते हैं?’

मैंने कहा, ‘देखो बेटा, जंगल में मंगल सुना होगा पर मंगल पर जंगल नहीं होते। तो जो भी अरमान लेकर जा रहे हो पूरे नहीं होंगे। उस मंगल पर जाने से अच्छा है यहाँ जंगल साबूत रखो, जंगल में ही मंगल हो जाएगा।‘

प्र२: सर, मैं भी एलोन मस्क को फ़ॉलो करती थी। तो ऐसे अगर हम नहीं करेंगे, अगर नहीं उन्हें बढ़ने देंगे तो फिर विज्ञान की उन्नति कैसे होगी? हम और कैसे जान पाएँगे?

उत्तर: अरे! जो कुछ जान जाते हो, वहाँ बस जाते हो क्या? एटम के अन्दर क्या है जान गये, तो वहाँ घर बना लिया है? ये कैसी बातें कर रहे हो? जानना एक बात है और कॉलोनाइज़ करना दूसरी बात है। आप जाइए मंगल को जानिए, स्पेस एक्सप्लोरेशन (अन्तरिक्ष अनुसन्धान) को कौन मना कर रहा है। अभी बात मनसूबों की हो रही है। अभी बात ज्ञानवर्धन की नहीं हो रही है, बात हो रही है कि आपके मनसूबे क्या हैं।

आप मंगल क्या, आप इस गैलेक्सी (आकाशगंगा) से आगे निकल जाइए, आप आउटर स्पेस (बाह्य अन्तरिक्ष) में एक्सप्लोरेशन (अन्वेषण) करिए, आप अन्तरिक्ष का चप्पा-चप्पा छान मारिए। ज्ञान तो बहुत प्यारी चीज़ है, सब जानिए। पर ज्ञान एक बात है और नीयत दूसरी बात है।

अगर बात ज्ञान की ही है तो क्यों नहीं ज्ञानवर्धन करते इस क्षेत्र में कि इस पृथ्वी को बचाया कैसे जाए? इस मुद्दे पर क्यों नहीं ज्ञान हम खड़ा करते? जो हमारे ओसियन (महासागर) की पूरी फ्लोर्स (तल) हैं, उसकी हमने आज तक पूरी मैपिंग (नक्शा) नहीं करी है। उसकी क्यों नहीं करते मैपिंग ?

हमें हमारे ही ग्रह का नहीं पता है कि हमारी जो ओसियन फ्लोर है, उसका कोई पुख्ता मैप (मानचित्र) हमारे पास आज तक नहीं है। कितनी प्रजातियाँ इस पृथ्वी पर हैं, ये भी आज तक हम ठीक-ठीक नहीं जान पाये हैं। हम आज भी अनुमान लगाते हैं कि प्रतिदिन सौ से एक-हज़ार प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं, पर एग्ज़ैक्टली कितनी विलुप्त हो रही हैं हम नहीं जानते और कौनसी हो रही हैं, ये भी हम नहीं जानते हैं। ज्ञान बढ़ाना है तो ये ज्ञान क्यों नहीं बढ़ाएँगे?

ये ऐसी सी बात है कि मेरे घर में आग लगी है और मैं वहाँ पड़ोस के मोहल्ले में ताका-झाँकी करने जा रहा हूँ।

कोई पूछे, ‘तो क्यों जा रहे हो?’

‘ज्ञानवर्धन के लिए। क्या ज्ञान बुरी चीज़ होती है?’

‘भाई, तेरे घर में आग लगी है, वहाँ तू कौनसा ज्ञानवर्धन करने जा रहा है?’

बाद में पता चला कि जहाँ जा रहा है वहाँ चाट-पकोड़े की दुकान है, ये इसका ज्ञानवर्धन है। या किसी घर में दो लड़कियाँ रहती हैं, ये इसका ज्ञानवर्धन है। यहाँ जा किसलिए रहा है ये? बस अपनी हसरतें पूरी करने जा रहा है और बोल क्या रहा है? मैं तो ज्ञानवर्धन के लिए जा रहा हूँ। ये तुम ज्ञान अगर इकट्ठा कर भी रहे हो तो किसलिए कर रहे हो? ताकि तुम्हारी गन्दी कामनाएँ पूरी हो सकें। ऐसा ज्ञान किस काम का है भाई!

ज्ञान बहुत अच्छी चीज़ है। एंटी एक्सप्लोइटेशन (शोषण विरोधी) होना एंटी साइंस (विज्ञान विरोधी) तो नहीं है न, या है? या साइंस का मतलब ही एक्सप्लोइटेशन होता है? एंटी कंज़प्शन (भोग विरोधी) होना एंटी साइंस तो नहीं है न, पर बहुत लोगों को लगता है ऐसा ही है। लोगों को लगता है कि अच्छा, ये कंज़म्प्शन के खिलाफ़ बात कर रहे हैं तो मतलब ये विज्ञान के भी खिलाफ़ बात कर रहे हैं। मैं कह रहा हूँ, विज्ञान तो बढ़े पर जानने के लिए बढे, भोगने के लिए नहीं। जानना एक बात है।

आज हमें सब पता है कि एक पक्षी का शरीर कैसा होता है। हज़ार साल पहले हम नहीं जानते थे कि पक्षी की आँत कैसी होती है, पक्षी का दिल किस गति से धड़कता है, ये सब बातें हमें नहीं पता थीं। आज हम सब जानते हैं। तो पक्षी के बारे में इतना जान गये हो तो क्या करें? पक्षी को खा जाएँ उठाकर। जानना माने भोगना!

या जान गया हूँ तो अब मैं पक्षी के लिए दवाई विकसित करूँगा? पहले पक्षी की एनाटॉमी (शरीर रचना) मैं नहीं जानता था तो पक्षियों की मेडिसिन भी नहीं विकसित कर सकता था, आज अगर मैं पक्षी की एनाटॉमी जान गया हूँ तो मैं क्या करूँगा? पक्षी के लिए दवाई विकसित करूँगा न। या ये करूँ कि अब मैं पक्षी को जान गया हूँ तो आसान हो गया इसको पकड़कर, पकाकर खाना?

ज्ञान का उपयोग किस दिशा में करना है ये तो बताओ। ये जोड़ा मत बैठा लीजिएगा कि साइंस माने कंज़म्प्शन। नहीं, नहीं, बिलकुल गलत बात है। और आप दुनिया के ऊँचे साइंटिस्ट्स (वैज्ञानिक) को देखेंगे, वो बहुत मस्त और सादा जीवन जीते थे। भोगने का काम दूसरे लोग करते हैं, भोगने का काम टेक्नोलॉजी के व्यापारी करते हैं। और टेक्नोलॉजी के व्यापारी और साइंटिस्ट में बहुत अन्तर होता है।

टेक्नोलॉजी का व्यापारी एक चीज़ होता है भाई और साइंटिस्ट दूसरी चीज़ होता है। इनको आप एक थोड़ी बोलोगे। या आइंस्टीन और एलोन एक ही बात है? कोई समानता है? एक वैज्ञानिक है, एक टेक्नोलॉजी का व्यापारी है। इसमें समानता क्या है? पर हमको लगता है, ‘नहीं, लगभग एक ही बात है।’

कम्प्यूटर्स का आविष्कार करना एक बात है और ऑपरेटिंग सिस्टम बेचना बिलकुल दूसरी बात होती है न। बिलकुल दूसरी बात है कि नहीं है? बिजली का आविष्कार करना एक बात होती है और पॉवर की एक कम्पनी चलाना, उसका आइपीओ लेकर आना और उससे पैसे बनाना और उस कम्पनी के कारण कोयले की दलाली करना, ये बिलकुल दूसरी बात होती है।

जिसने इलेक्ट्रिसिटी का आविष्कार किया, उसको और पॉवर के एक व्यापारी को आप एक ही बात मान रहे हो क्या? एक ही बात मान रहे हो? पर हमारे मन में कहीं-न-कहीं हमने कुछ जोड़ रखा है, ये अलग करो। विज्ञान के पीछे तो लोगों ने जान दी है। विज्ञान की उपलब्धियाँ ऐसे ही नहीं मिल जातीं सस्ते में। मैं उनका नाम भूल रहा हूँ।

श्रोता: मैरी क्यूरी।

उत्तर: मैरी क्यूरी नहीं, फ़्लिशमैन। महिला थीं जिन्होंने बहुत कम उम्र में एक्स-रे पर रिसर्च करते हुए अपनी जान दे दी थी कैंसर से। वो एक चीज़ होती है और फार्मा कम्पनी चलाकर के मुनाफ़ा कमाना बिलकुल दूसरी बात होती है न भाई। पेनिसिलिन का आविष्कारक होना एक बात होती है और एंटीबायोटिक्स का सौदागर होना बिलकुल दूसरी बात होती है। तो एक ही कैसे माने ले रहे हो? विज्ञान में तो कोई बहुत बड़ी उन्नति हम पिछले तीस-चालीस साल में कर भी नहीं रहे हैं। आप बताओ, बेसिक साइंसेज़ (मूल विज्ञान) में हमने क्या बड़ी-बड़ी उन्नति कर ली है? बताओ तो? बेसिक साइंसेज़ में हमने क्या पिछले चालीस-पचास साल में उन्नति कर ली है?

फ़िज़िक्स जहाँ सन् १९६० में खड़ी थी उससे बहुत आगे आज भी नहीं खड़ी है। जिस प्रिंसिपल पर लोकोमोटिव या ऑटोमोबील आज से पचास साल पहले चलता था, आज भी वैसे ही चल रहा है लगभग। अब ये मत बोल दीजिएगा कि अब हम उसमें एक्सेसरीज़ ज़्यादा लगवा लेते हैं। पर वो प्रिंसिपल लगभग वही है आज भी।

आप सन् १९४० का एसी देखें या फ़्रिज देखें और आज का एसी और फ़्रिज देखें, सेम प्रिंसिपल , कुछ नहीं बदला है। तो विज्ञान, बेसिक साइंसेज़ कहाँ तरक्की कर रहे हैं? हाँ टेक्नोलॉजी और कंज़म्पशन तरक्की कर रहे हैं। और ये दो बहुत अलग-अलग बात है, बहुत अलग बात है।

विज्ञान तो बेचारा रो रहा है कि मेरी फंडिंग कर दो। जो प्रॉस्पर कर रहा है वो है ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी (व्यापार और तकनीकी)। सारी फंडिंग टेक्नोलॉजी में रिसर्च को मिल रही है। बेसिक साइंसेज़ तो रो रही हैं कि उनको कोई फंड करने वाला भी नहीं है। लेकिन आम आदमी के मन में साइंस और टेक्नोलॉजी और कॉमर्स एंड टेक्नोलॉजी , ये तीनों एक ही बात होती हैं। हम समझते ही नहीं कि बहुत बड़ा अन्तर है।

स्मार्टफ़ोन का नया मॉडल आ जाता है बाज़ार में तो आपको लगता है साइंस ने तरक्की कर ली। अरे! बाबा, वो जो आपका स्मार्टफ़ोन है बस एक कम्प्यूटर है और उसकी लगभग वही टेक्नोलॉजी है जो सन् १९९० के कम्प्यूटर की होती थी। बस उसका मिनिएचराइज़ेशन (छोटा रूप) हो गया है। वो छोटा होकर आपके हाथ में आ गया है। पर हमें लगता है देखा! साइंस कितनी आगे बढ़ रही है। अरे! साइंस वहीं-की-वहीं है जहाँ तीस-साल पहले थी। टेक्नोलॉजी को कमर्शियलाइज़ कर दिया गया है।

आज का भी जो न्यूक्लियर वेपन (आण्विक हथियार) है, वो बिलकुल वैसा ही है जैसा सन् १९४५ का था। बस टेक्नोलॉजी रिफ़ाइन (परिष्कृत) कर दी है तो उसकी यील्ड (क्षमता) बढ़ गयी है और साइज़ छोटा हो गया है। विध्वंस में भी बेसिक साइंस ने क्या तरक्की कर ली? कंस्ट्रक्शन छोड़ दो, डिस्ट्रक्शन (विध्वंस) में भी? हाँ! बस ये है कि तब अमेरिका के पास कुल पाँच बम थे, आज पूरी दुनिया में दस-हज़ार से ज़्यादा हैं। द नम्बर्स हैव एक्सप्लोडेड एंड द डिस्ट्रक्टिव पोटेंशियल, बट बेसिक साइंस तो वही है न (संख्या और विध्वंस करने की क्षमता बहुत बढ़ गयी लेकिन मूल विज्ञान तो वही है न)। तुम इंजीनियर हो न? इंजीनियरिंग अभी पढ़ ही रहे हो? जेइइ दिया है? इंजीनियरिंग पढ़ रहे हो? जेइइ दिया है। जेइइ का सन् १९८० का पेपर देखा है?

श्रोता: नहीं।

उत्तर: देख लेना। उसमें वैसे ही प्रश्न हैं जैसे आज आते हैं। उसमें लगभग वही सब टॉपिक्स हैं जो आज के हैं। बताओ क्या तरक्की हुई है? चौवालीस साल पहले भी वही तुमसे पूछा जा रहा था जो आज पूछा जा रहा है। क्या बढ़ा है? कोई ये न कर दे कि नहीं, नहीं, ये, ये चीज़ें बढ़ी हैं। मैं ये कह रहा हूँ, ‘जो चीज़ें बढ़ी हैं उनमें से कोई भी ब्रेक-थ्रू नहीं है।‘

हर साल नोबेल प्राइज़ दिया जाता है फ़िज़िक्स में भी, और लेकिन वो ब्रेक-थ्रू नहीं होता। आज कोई नहीं बोलेगा कि बिलकुल उतनी ब्रेक-थ्रू बात है, स्पेशल रिलेटिविटी जितनी। सारा ग्लैमर क्योंकि साइंस के साथ नहीं है। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी को ज़्यादा जानते हो या इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस को?

बस समझ गये बात?

और आइआइटी पाँच होती थीं, पाँच से पता नहीं शायद पचास कर दी हैं, पता नहीं कितनी कर दी हैं, अब तो गिनती भी भूल गये। आइआइएससी बेचारा एक पड़ा हुआ है और वो सारी आइआइटीज़ से पुराना है, उसे कोई पूछने वाला नहीं क्योंकि हमें ज्ञान नहीं चाहिए। साइंस का सम्बन्ध होता है ज्ञान से और टेक्नोलॉजी का सम्बन्ध होता है कंज़म्प्शन से। हम कंज़म्प्शन के भूखे-हवसी लोग हैं तो इसलिए हम सारा इन्वेस्टमेंट टेक्नोलॉजी में करते हैं। हम ज्ञान के आग्रही नहीं हैं। जिन्हें ज्ञान चाहिए होगा वो साइंस में इनवेस्ट करेंगे। हमें ज्ञान नहीं चाहिए, हमें साइंस नहीं चाहिए, हमें टेक्नोलॉजी चाहिए।

एक और प्रमाण दूँ? मोबाइल फ़ोन का आप इस्तेमाल करते हो, उसकी टेक्नोलॉजी तो आप जानते हो, कम-से-कम कैसे उसका यूज़ (उपयोग) करना है उसकी टेक्नोलॉजी तो आप जानते हो, उसकी साइंस बताओ? क्योंकि हमें साइंस से कोई लेना-देना नहीं है, हमें कंज़म्प्शन से लेना-देना है। बनाकर दे दो, हम उसको भोग लें।

साइंस तो ऋषियों का काम है। एक अच्छा वैज्ञानिक वास्तव में ऋषि होता है एक। और टेक्नोलॉजी तो सौदागरों का काम है, पैसा बनाओ। और ये जो टेक्नोलॉजी वाले हैं न, इन्हें साइंस पता भी नहीं होती है, इस चक्कर में मत रहना। कोई कम्पनी हो पॉवर की। पॉवर की ह्यूज कम्पनीज़ होती हैं। उनके पास कोल (कोयले) के प्लांट्स होते हैं, वो कोल माइंस पर कब्ज़ा करते हैं, वो जंगल काटते हैं कि पॉवर आएगा और हमारी पॉवर कम्पनी आगे बढ़ेगी।

तुम इनसे जाकर के थोड़ा सा पूछ लो, इतना ही कि बेटा — बेटा तो क्या बोलोगे, वो अंकल जी हैं — ‘अंकल जी, करंट की यूनिट क्या होती है? आप एक पॉवर कम्पनी के मालिक हो, इतना ही बता दो, वोल्टेज माने क्या?’ वो न बता पाये! ये टेक्नोलॉजी के सौदागर हैं, इन्हें साइंस का थोड़े ही कुछ पता है। तुम इनसे बोलोगे व्हीटस्टोन ब्रिज , इनको लगेगा कि पत्थर डालकर उस पर गेहूँ बिछाया गया है और उसका भी कहीं कोई कॉन्ट्रैक्ट निकल रहा है, जल्दी से सरकार में लायज़निंग (सम्पर्क) करके वो भी ले लो।

सिर्फ़ इसलिए कि किसी का नाम किसी टेक्नोलॉजी फ़र्म के साथ जुड़ा हुआ है, ये मत सोचने लग जाना कि उस व्यक्ति में साइंटिफ़िक एटीट्यूड (वैज्ञानिक दृष्टिकोण) भी होगा। वो सिर्फ़ एक व्यापारी है। पंखे और एसी बनाने वाली कोई कम्पनी है, बहुत बड़ी कम्पनी हो सकती है, तुम्हें क्या लगता है उसके ऊपर जो लाला जी बैठे हैं वो इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं? तुम उनसे पूछ दो वहाँ पर जाकर के कि एडियाबैटिक (जिसकी ऊष्मा घटे-बढ़े नहीं) और, थोड़ा अन्तर बता दीजिएगा, आपका एसी कैसे काम करता है, कौनसा कम्प्रेशन है इसमें।

‘क्या बोल रहे हैं, एडियाबैटिक! , ये क्या होता है?’

कोई कार बेचने वाली कम्पनी है, तुम उनसे जाकर ये कहोगे, ‘ये थोड़ा सा यहाँ पर डीज़ल साइकिल बनाकर दिखा दीजिए, इंजन कैसे काम करता है आपकी कार का?’ तुम्हें लग रहा है वो बना देंगे? हाँ, वो बस सुपर हीरो बनकर बैठ जाते हैं और चूँकि उनका नाम ऑटोमोबील के साथ जुड़ा हुआ है, तो तुमको लगता है शायद ये भी विज्ञान की कुछ समझ रखते हैं। कुछ नहीं है, वो मार्केटर है बस। उसको विज्ञान का क्या पता! जिन्हें विज्ञान का पता है उन्हें पैसे देकर, खरीद कर अपने यहाँ बैठा दिया जाता है। तुम बनाओगे, और वो बिक जाते हैं।

महाविनाश आ चुका है, और हम बेहोश हैं

प्रश्नकर्ता: प्रशान्त जी, दिसम्बर २०२२ में ‘पेटा अवार्ड’ भी मिला था, प्रकृति चैनल भी है और कल ही देखा कि आप खरगोशों को सहला रहे थे, उनसे मिल रहे थे। आप सभी का उतना ही ध्यान रखते हैं, हमारा भी और जितने भी यहाँ पर खरगोश हैं उनका भी।

उत्तर: मैं बहुत अच्छा आदमी हूँ, तो क्या कहना चाहते हो?

प्रश्न: इतना सारा ध्यान सारी चीज़ों का कैसे रख लेते हैं आप?

उत्तर: कोई अवार्ड की बात नहीं होती बेटा। हम किसी के साथ अगर भले हैं तो उस पर हम कोई एहसान नहीं कर रहे हैं, बल्कि अवार्ड वगैरह लेना भी एक तल पर तो अहंकार ही है और अगर अवार्ड लेकर के और फूल जाओ कि मैं बहुत अच्छा हूँ, बड़ा महान हूँ तो ये और बड़ा अहंकार है।

आप प्रकृति के लिए कुछ कर रहे हो अगर, चाहे वो क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) की दिशा में हो चाहे जीवों के लिए हो — जीव में सिर्फ़ खरगोश और गाय और कुत्ते ही नहीं आते न, करोड़ों प्रजातियाँ हैं। उनके नाम भी नहीं जानते हम, उनमें से एक प्रतिशत के नाम भी नहीं जानते हम। उनमें से शून्य-दशमलव-एक प्रतिशत के नाम भी नहीं जानते और वो विलुप्त हो रहे हैं। जितनी देर में हमने बात करी न, इतने में जीवों की कम-से-कम दस प्रजातियाँ विलुप्त हो गयीं। रोज़ सौ से एक हज़ार प्रजातियाँ हमेशा के लिए विलुप्त हुई जा रही हैं, और उनका इस ग्रह पर रहने का उतना ही हक था जितना हमारा है। तो आप अगर किसी को उसका हक दिलाने की थोड़ी-सी कोशिश कर रहे हो तो उस पर एहसान नहीं कर रहे हो, वो उसका अधिकार है।

किसी को उसका अधिकार जब दिया जाता है तो उसमें किसी पर आपने कोई कृपा, अनुकम्पा नहीं कर दी कि बड़ी भारी चीज़ दे दी, मुझे अवार्ड दो इसके लिए। बल्कि जब किसी को उसका हक लौटाया जाए तो थोड़ी-सी माफ़ी माँगकर लौटाया जाए, कि इतने दिनों तक तेरा हक हमने मारकर रखा। और भी इसमें आगे बातें हैं, उसको अगर नहीं बचाओगे तो तुम खुद भी नहीं बच पाओगे, उसको बचाने में तुम्हारा अपना भी स्वार्थ है। दुनिया के देश हैं न जो देश दुनिया के सबसे कम जंगल रखते हैं अपने भूभाग के अनुपात में, उनमें भारत है।

चीन, कनाड़ा, रूस, अमेरिका इनकी अपेक्षा भारत एक-बटा-दस अनुपात में भी जंगल नहीं रखता। उसके बिलकुल एग्ज़ैक्ट आँकड़े क्या हैं वो तुम देख लेना, लेकिन मैं उन देशों की बात कर रहा हूँ जिनका भारत एरिया में सातवें नम्बर पर आता है। तो हमसे ऊपर के जो हैं ब्राज़ील, अमेरिका, कनाडा, चीन, और रूस, ऑस्ट्रेलिया — ऑस्ट्रेलिया को हटा सकते हो क्योंकि वहाँ पर उतना नहीं है, पर ऑस्ट्रेलिया भी शायद हमसे ऊपर ही होगा। तो इन देशों के पन्द्रह प्रतिशत, बीस प्रतिशत, पच्चीस-पच्चीस प्रतिशत भूभाग पर जंगल है। भारत ने अपने सारे जंगल खत्म कर दिये और जंगल माने पेड़ नहीं होता, जंगल माने जीवों की भी करोड़ों प्रजातियाँ होती हैं। हमें नहीं पता चलता है वो विलुप्त हुए जा रहे हैं। हमें माफ़ी माँगनी पड़ेगी पूरी प्रकृति से, पृथ्वी से और माफ़ी माँग भी लें तो माफ़ी अब शायद मिलेगी नहीं। किसी एक जीव को नहीं, आपने पूरी प्रजाति को हमेशा के लिए खत्म कर दिया, इसके लिए कोई कैसे आपको माफ़ करेगा!

तो मिटेंगे हम भी पर हम घुट-घुटकर मिटेंगे। वो जो मिट गये हमारे हाथों, वो तो फिर भी किस्मत वाले थे, वो एक झटके में मिट गये, हम तो तड़प-तड़पकर मिटेंगे और तड़प-तड़पकर मिट भी रहे हैं। तो क्लाइमेट चेंज है और बायोडायवर्सिटी लॉस (जैवविविधता ह्रास) है, वो सब वही है, हम तड़प-तड़पकर मिट रहे हैं।

हम वैसे मिट रहे हैं, जैसे मेंढक की कहानी है न कि मेंढक को खौलते पानी में डाल दो तो वो नहीं मरता, वो पानी में डालो तो कूदकर बाहर आ जाएगा। पर मेंढक पानी में है, पानी को धीरे-धीरे गर्म करो तो कहते हैं कि मेंढक मर जाता है। मुझे नहीं मालूम कि ये केवल कहानी है या फ़ैक्चुअल (तथ्यात्मक) कितनी है, पर ये कहानी जिधर को इशारा कर रही है वो समझो, हम उस मेंढक की तरह हैं।

धीरे-धीरे करके हमारा सबकुछ तबाह हो रहा है, सबकुछ तबाह हो रहा है। हमने सारे जंगल खा लिये भारत में और हम भारत को कहते हैं कि भारत देवी का देश है, शक्ति का देश है। शक्ति माने प्रकृति। हम कहते हैं, ‘भारत प्रकृति का देश है।‘ और भारतीयों ने जितना खा लिया प्रकृति को, उतना किसी देश ने नहीं खाया है। किसी देश ने उतना नहीं खाया जितना हमने खाया। आज भी वो हसदेव जंगल है, वहाँ जान रहे हो न क्या हो रहा है! हम खाये ही जा रहे हैं। हमने सब खत्म कर दिया, एक प्रतिशत छोड़ा है। अब उसको भी खा लो, उसमें वैसे भी उसको छोड़ा ही क्या है।

तो ये अवार्ड्स जो हैं, ये अधिक-से-अधिक हमको ये याद दिला सकते हैं कि अभी हमारा कितना काम बाकी है, हमारे कितने कर्तव्य अभी शेष हैं। इनसे कोई ये नहीं पता चलता कि हमने बड़ा भारी तीर मार दिया है या हम बड़े महान आदमी हो गये। इससे ये पता चल रहा है कि तुमने तो अभी शुरुआत भी नहीं करी, बहुत-बहुत काम बाकी है।

तुम कितना भी ज़ोर लगा लो, मुझे कोई अब निश्चित भी नहीं है कि वो काम पूरा हो भी सकता है कि नहीं। लोगों में अब माँसाहार बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है, तमाम तरीके के झूठ बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं जो कहते हैं, ‘फ़र्क नहीं पड़ता अगर सारी स्पीशीज़ (प्रजातियाँ) खत्म भी हो गयीं तो, फ़र्क नहीं पड़ता अगर एवरेज ग्लोबल टेम्परेचर (औसत वैश्विक तापमान) दो, तीन, पाँच डिग्री भी बढ़ गया तो।‘ अपने स्वार्थ की खातिर हम बिलकुल पागल हुए जा रहे हैं और पागलपन का अंजाम भयावह होगा। कोशिश कर रहे हैं उस अंजाम को रोकने की, देखो कहाँ तक जाते हैं।

सिक्सटीन-सेवेन्टीन पर्सेंट ऑफ़ द वर्ल्ड्स पॉपुलेशन (दुनिया की आबादी के सोलह-सत्रह प्रतिशत), डेढ़-सौ करोड़ हम हो रहे होंगे। इंसानों की बात कर रहा हूँ, जानवर तो हम गिनते ही नहीं, जानवर भी गिनते हैं तो हम क्या गिनते हैं? कैटल (मवेशी) गिनते हैं जो हमारे काम, हमारे स्वार्थ के हैं। वरना तो हमने अपने पशुओं का क्या कर दिया, पक्षियों का क्या कर दिया, पेड़-पौधों की प्रजातियों का क्या कर दिया, ये तो हम गिनते ही नहीं।

सही बात तो ये है कि हम इंसानों को भी नहीं गिनते, सन् २०११ में सेंसस (जनगणना) हुआ था, उसके बाद से हमने गिना ही नहीं कि इंसान भी कितने हैं इस देश में। पता नहीं क्या बात है, क्यों नहीं गिन रहे हैं! सन् २०२१ में गिन लेना चाहिए था, अभी तक नहीं गिना। दुनिया के किसी देश में हम ये गज़ब तो देखते ही नहीं।

खैर, ये तो मेरे देश के लोग जाने कि सेंसस क्यों नहीं होता, उनको पूछना होगा। मेरा सरोकार ज़्यादा पशु-पक्षियों से है। तो मैं कह रहा हूँ, पन्द्रह-सोलह प्रतिशत पूरी दुनिया की जो आबादी है वो भारत में रहती है। एक-सौ-चालीस, एक-सौ-पचास करोड़ हम हैं और पूरी दुनिया का सिर्फ़ एक-दशमलव-आठ प्रतिशत जंगल भारत में है। माने सोलह प्रतिशत लोग रहते हैं भारत में और एक-डेढ़ प्रतिशत, दो प्रतिशत से कम जंगल हैं भारत में।

हमने अपने सारे जंगल खा डालें। और जंगल अगर हमें साफ़ हवा देते हैं, जंगलों के बिना अगर माॅनसून भी नहीं हो सकता, जंगलों के बिना अगर आदमी का जीवन नहीं हो सकता तो भारतीय जंगलों के लिए अब पूरे विश्व पर आश्रित हैं।

मतलब शायद इंडिया का सबसे बड़ा जो फ़्री इम्पोर्ट (मुक्त आयात) है, वो क्लीन एयर (साफ़ हवा) है क्योंकि अपने जंगल तो हमने तबाह कर दिये सारे, मतलब प्रकृति प्रेमी लोग हैं न ज़्यादा! हमारे धर्म में, हमारी संस्कृति में प्रकृति प्रेम बिलकुल अन्तर्निहित है तो इसीलिए हमने अपने सारे जंगल खा डालें, और अब हसदेव की अभी मैं कर ही रहा था तुम लोगों से बात। तो अब वो जो जंगल हैं, वो अब बस दूसरी जगहों पर बचे हुए हैं, वो ही जो क्षेत्रफल में बड़े देश हैं उनमें। ये मेरा देश है!

कर रहे हैं कोशिश, देखते हैं। अपना ही देश है कुछ तो करना पड़ेगा। फिर से ये आँकड़ा अपने भीतर बैठा लो, सोलह प्रतिशत आबादी है दुनिया की।

श्रोता: अठारह प्रतिशत है।

उत्तर: तो वो अभी जब सेंसस होगा तो हो सकता है और ज़्यादा निकले भाई! सेंसस हो ही नहीं रहा तो पता नहीं चलता कुछ। तो दुनिया की अब ये कह रहे हैं अठारह प्रतिशत आबादी है, सोलह-सत्रह भी नहीं।

दुनिया की अठारह प्रतिशत आबादी और एक-दशमलव-आठ प्रतिशत जंगल है भारत में। ये अच्छा बैठ गया, ठीक दस का इसमें फैक्टर लग गया। अठारह प्रतिशत लोग रहते हैं दुनिया के भारत में, लेकिन दुनिया के जंगलों का सिर्फ़ एक-दशमलव-आठ प्रतिशत है भारत में।

अभी इसमें एक और बात बताता हूँ कि जंगल हमें जितने बताये जाते हैं न, इतने हैं भी नहीं। वास्तव में जो उपयोगी जंगल होते हैं जिसमें बायोडायवर्सिटी फ़्लरिश (फलना-फूलना) कर सकती है, जैसे पाते हो कि हिमालय में ऊपर या वेस्टर्न घाट्स (पश्चिमी घाट) पर, ये सब इकोलॉजिकल हॉटस्पॉट्स (पारिस्थितिकीय स्थान) होते हैं, वो डेंस फ़ॉरेस्ट्स (घने जंगल) होते हैं। ऐसा थोड़े ही कि एक ही प्रजाति के पेड़ बहुत सारे कहीं पर लगा दिये या छोड़ दिये तो उसको जंगल बोल दोगे! पर सरकारी आँकड़ों में हम उसको भी जंगल गिन लेते हैं, वो फ़र्ज़ी जंगल हैं, उनको जंगल माना भी नहीं जाना चाहिए।

तो जो सचमुच जंगल हैं, घने जंगल, सतपुड़ा के घने जंगल — नींद में डूबे हुए से ऊँघते, अनमने जंगल तो पता नहीं कितने होंगे! आँकड़ा निकाल लोगे तो पता चलेगा — एक-दशमलव-आठ प्रतिशत अभी हैं, उसको ले लोगे तो और कम हो जाएगा।

तुम एक झूठ हो

उत्तर: कुछ भी ऐसा नहीं है जो इंडिविजुअल हो, 'द इंडिविजुअल हिमसेल्फ़ इज़ द बिगेस्ट मिथ' (व्यक्ति स्वयं सबसे बड़ा मिथक है), जानते हो न ये? जिसको तुम व्यक्ति बोलते हो, जिसको तुम पर्सन बोलते हो, उससे बड़ा झूठ कोई नहीं है, क्योंकि तुम अपनी व्यक्तिगत सत्ता में यकीन करते हो, प्रकृति करती नहीं। प्रकृति भी नहीं करती, और जब तुम्हारी चेतना का तल बहुत ऊँचा हो जाता है तब तुम भी नहीं करते। न तो प्रकृति ये मानती है कि तुम अपने पड़ोसी से अलग हो। उसकी नज़र में तुम दोनों एक ही हो, संख्याएँ हो बस। और अगर कभी तुमको आन्तरिक सच्चाई के दर्शन होते हैं, तो तुम भी समझ जाते हो कि तुम और जो दूसरा है, वो अलग-अलग हैं ही नहीं। ये तो बस जो बीच में अटके होते हो न, तब तुमको लग रहा होता है कि हमारी कोई इंडिविजुअल एग्ज़िस्टेंस (व्यक्तिगत अस्तित्व) भी है, हमारी कोई डिवाइडेड आइडेंटिटी (अलग पहचान) भी है जिसमें मैं और दूसरा अलग हैं, ऐसा है नहीं।

तो इसीलिए दुनिया में जहाँ कहीं भी जो कुछ भी हो रहा है, जो गलत है, उसे अपने तल पर अधिकतम जो कर सकते हो रोकने के लिए, ज़रूर करो; क्योंकि प्रकृति का कोड़ा तो सब पर ही पड़ना है, गलती चाहे किसी एक ने भी की हो। और जिस गलती की हम अभी बात कर रहे हैं, वो गलती लगातार हुई जा रही है।

हम तमाम तरह की बातें कर रहे हैं, जब कोविड का ज़िक्र आता है, हम वैक्सीन की बातें कर रहे हैं, हम हर्ड इम्युनिटी की बातें कर रहे हैं। ठीक है? हम सरकारों की गलतियों की बात कर रहे हैं। हम कह रहे हैं, ‘इसने ये नहीं किया, उसने वो नहीं किया।’ हम कह रहे हैं, ‘ऑक्सीजन की कमी हो गयी’, हम कह रहे हैं, ‘फ़लानी दवाई बेकार थी, वो क्यों दी गयी?’ ये आइवरमेक्टिन, रेमडेसिविर, ये सब जो आज एक महीने पहले ढूँढे नहीं मिल रही थी, आज डॉक्टर इनको प्रतिबन्धित करने के लिए कह रहे हैं कि इनसे कुछ होता नहीं। ये सब बातें हम खूब कर रहे हैं। जो असली बात है, वो हम नहीं कर रहे हैं।

असली बात क्या है? असली बात ये है — हम जैसे जी रहे हैं, ऐसे हज़ारों वायरस हैं जो और आएँगे। साफ़ समझिए क्यों, क्योंकि हम अपनी तादाद बढ़ाते जा रहे हैं। हम अपनी तादाद जब बढ़ाएँगे तो इंसान को कहाँ घुसना पड़ेगा रहने के लिए? जंगल में। और जब जंगल में घुसोगे तो तुम्हारा सम्पर्क, कॉन्टैक्ट किससे होगा? जानवरों से। और उन जानवरों के पास हज़ारों-लाखों ऐसे वायरस हैं जो उनके पास लाखों-करोड़ों साल से हैं, जिनको वो लेकर के घूम रहे हैं। और उन वायरस का कभी इंसान से सम्पर्क नहीं हुआ, अब होगा।

क्लाइमेट चेंज हो रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं। जानते हो ग्लेशियरों के पिघलने का एक दुष्प्रभाव क्या होने वाला है? बर्फ़ के नीचे, बर्फ़ की मोटी-मोटी तहों के नीचे, कई-कई मीटर बर्फ़ के नीचे, दर्जनों मीटर बर्फ़ के नीचे बहुत सारे वायरस सोये पड़े हैं। साहब, वायरस ऐसी चीज़ होती है जिसको आप ज़िन्दा चाहो तो ज़िन्दा मान लो, और उसे जड़ चाहो तो जड़ मान लो। आप उसको लाखों सालों तक एक डब्बे में बन्द करके रख सकते हो। वायरस बैक्टीरिया नहीं होता। वायरस के बारे में ये कहना ही बहुत मुश्किल है कि वो एक जीवित जन्तु है या जड़ पदार्थ है। उसे केमिकल की तरह भी ट्रीट कर सकते हो, उसे लिविंग ऑर्गेनिज़्म की तरह भी ट्रीट कर सकते हो।

तो बर्फ़ के नीचे न जाने कितने तरह के वायरस सोये पड़े हैं। सोये पड़े माने डोर्मेंट, इनेक्टिव पड़े हैं। ये जो क्लाइमेट चेंज हो रहा है, जो हमारी और आपकी भोगवादिता का, कंज़म्प्शन का नतीजा है, वो उस बर्फ़ को पिघला रहा है। और वो सब वायरस वहाँ से अब बाहर आकर सक्रिय होंगे, जंगल से बाहर आएँगे, बर्फ़ से बाहर आएँगे। क्यों? क्योंकि हमारे जीने का तरीका गलत है। क्यों? क्योंकि हमें सिखाने और पढ़ाने वालों ने कुछ बहुत गलत बात हमें बता दी है। उन्होंने हमें बता दिया, ‘जितना भोगोगे, तुम उतने ऊँचे आदमी कहलाओगे।’ उन्होंने बता दिया कि जीवन का लक्ष्य ही हैप्पीनेस है। और हैप्पीनेस का क्या मतलब है? और भोगो, और भोगो। हमें ये बता दिया गया है। समझ में आ रही है बात?

तो ये वायरस अचानक, अनायास कहीं से नहीं प्रकट हो गया, ये कर्मफल है। ये ह्यूमेनिटी (मानवता) ने कलेक्टिव (सामूहिक) तौर पर जो करा है, उसका परिणाम है। मुझे बहुत अफ़सोस हो रहा है, कहते हुए डर भी लग रहा है कि ये सिर्फ़ झाँकी है। हम प्रकृति का विनाश बहुत तेज़ गति से कर रहे हैं, बहुत ज़्यादा तेज़ गति से कर रहे हैं। और प्रकृति को एक इक्विलिब्रियम , सन्तुलन बनाकर रखना है। वो नहीं चाहती कि एक ही स्पीशीज़ बचे, बाकी खत्म हो जाएँ। उसके लिए आप सिर्फ़ एक स्पीशीज़ हो, अनदर स्पीशीज़, होमोसेपियंस। प्रकृति का कोई इरादा नहीं है कि बस एक यही बची रहे और लाखों-करोड़ो जो बाकी स्पीशीज़ हैं वो खत्म हो जाएँ। नहीं।

तो जब ये जो एक स्पीशीज़ है, ये ज़्यादा छाने लगेगी तो प्रकृति स्वयं ही क्या करेगी अपने सन्तुलन को बरकरार रखने के लिए? वो खुद ही कुछ ऐसा कर देगी कि होमोसेपियंस की तादाद घट जाए।

आपको ये बात समझ में क्यों नहीं आ रही है कि आप पृथ्वी के राजा नहीं हो? पर हमने इस बात को तो धर्म का भी हिस्सा बना लिया है कि इंसान ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है, और उसको ज़मीन पर भेजा गया है पृथ्वी को भोगने के लिए। और कुछ धार्मिक धारा हैं, वो कहती हैं, ‘साहब, ये जो जितने जीव-जन्तु और प्राणी, और पक्षी और मछली हैं, वो तो बनाये इसीलिए गये हैं ताकि इंसान उनको खाये।’ बेवकूफ़ों! तुम्हारी ये सोच खा गयी न पूरी पृथ्वी को, तुम्हें भी। तुम्हें अभी भी अक्ल नहीं आ रही? तुम्हें अभी भी लगता है कि ये जितने जीव-जन्तु हैं, ये मुर्गे, ये बकरे, ये सुअर, ये गाय, ये मछलियाँ, ये पक्षी, ये इसलिए बनाये गए हैं कि तुम इन्हें भोगते रहो? तुम्हें अभी भी लगता है कि जंगल इसलिए हैं ताकि तुम उनको लगातार नष्ट करते रहो? तुम्हें लगता है पहाड़ इसलिए हैं ताकि तुम उनका दोहन करते रहो? तुम्हें लगता है प्रकृति ऐसी चीज़ होने देगी? उसकी नज़र में तुम खास नहीं हो भाई!

अपनी नज़र में हम बहुत बड़े बादशाह, सिकन्दर हैं। प्रकृति की नज़र में हम सिर्फ़ एक शरीर हैं। और शरीर और शरीर तो बराबर होता है। वही वायरस जो इंसान को लग रहा है, वही हाथी को भी लग गया, कुत्ते को भी लग गया, बिल्ली को भी लग गया। ज़्यादातर तो जो हमें वायरस लगते हैं, वो होते ही ज़ुनोटीक ऑरिजिन के हैं। ज़ुनोटीक ऑरिजिन समझते हो? जानवरों से आने वाले। प्रकृति की नज़र में तुम वैसे ही हो जैसे एक जानवर। जो भी वायरस जानवर को लगता है, वही वायरस तुम्हें भी लगता है।

समझ में आ रही है बात?

हम अगर अलग हैं वाकई, तो इसलिए अलग हैं कि हमारे पास एक चेतना है जो प्रकृति से अलग है। उस चेतना में जियो और उस चेतना में जीने का मतलब होता है ध्यान में जीना, समझदारी में जीना, भीतर से जो सब प्राकृतिक वृत्तियाँ उठती हैं, उनसे ज़रा खबरदार रहना, उन्हें दबाना। भीतर से कौनसी प्राकृतिक वृत्तियाँ उठती हैं? ‘खाओ-खाओ, सोओ-सोओ, भोगो-भोगो, मज़े करो और सो जाओ, और खूब सारा सेक्स करो।' प्रकृति यही उठाती है हमारे भीतर से। ऐसे ही पैदा हुए हैं हम और उसने इसीलिए पैदा किया है कि तुम यही सबकुछ करते रहो — खूब खाओ, खूब सोओ, सेक्स करो, बच्चे पैदा करो, मर जाओ — कोई बीमारी, फ़ंगस, बैक्टीरिया कुछ लगेगा, खा जाए तुम्हें। और अगर नहीं चाहते इसी तरह का जानवर जैसा जीवन जीना तो शरीर भाव के साथ नहीं, चेतना भाव के साथ जियो। जो शरीर भाव के साथ जी रहा है, वो तो बस प्रकृति का पशु है। मनुष्य तुम तब हुए जब ज़रा चेतना भाव में जीना सीखो, जब तुम जानो कि ज़िन्दगी शरीर और शारीरिक माँगों से आगे कुछ है।

समझ में आ रही है बात?

शरीर देखो माता जी का है। कौनसी माता जी? माया माता जी। उन्होंने दिया है, वो ले जाएँगी। और वो एक पैसे की रियायत नहीं करने वाली, शरीर उनका है। तुम कलपते रहना कि हाय-हाय! फिर से आ गया वायरस, ले गया हमें उठाकर। वो तो माया है, वो आएगी ले जाएगी। जैसे उसने तुम्हें पैदा किया बिना तुम्हारी अनुमति के, वैसे वो तुम्हें मार देगी बिना तुम्हारी अनुमति के।

तुम्हारा अगर अपना निजी कुछ है तो वो क्या है तुम्हारी? शरीर तुम्हारा नहीं है, अभी आकर ले जाएगी माँ। चेतना तुम्हारी है, उसको बढ़ाओ। उसको वहाँ पहुँचाओ जहाँ पहुँचाने के लिए पैदा हुए हो।

बी टेक कर लिया, आइटी जॉब है, फिर भी अनपढ़ हैं

प्रश्नकर्ता: प्रणाम उत्तर जी। मैं बैंगलोर में ही रहता हूँ और एक खबर चलना शुरू हुई कि वहाँ पानी की कमी है। मैं ऑफ़िस में बात कर रहा था लोगों से कि पानी की किल्लत हो रही है। तो लोग व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स से बता रहे थे कि सरकार कह रही है कि बहुत पानी है, जून तक पानी चलेगा, तुम लोग झूठी खबर फैला रहे हो।

तो पानी मुद्दा उनके सामने है, हम उस मुद्दे को जी रहे हैं, वो उस पर भी सहमत नहीं होते, तो वो हिमालय के बारे में क्यों ही सोचेंगे?

उत्तर: आँख का अनुभव और ज्ञान बहुत अलग-अलग बात होती है भाई। आपको किसी का शरीर अपनी आँखों से दिखाई देता है तो आप एनाटॉमी (शरीर रचना) विशारद हो गये क्या?

प्रश्न: नहीं।

उत्तर: तो आप बोलोगे, ‘जब आँख से बॉडी दिखाई ही दे रही है तो मैं एमबीबीएस क्यों करूँ?’ आँख जो आपको ज्ञान देती है वो बहुत छोटी चीज़ है। पाँच साल एमबीबीएस करनी पड़ती है तब जाकर के बॉडी का, एनाटॉमी का कुछ पता चलता है, तब आप कह पाते हो, ‘साहब, मैं किसी छोटे से हिस्से का विशेषज्ञ हूँ।’ पाँच साल में भी नहीं कह पाते, उसके लिए दो-चार साल और पढ़ना पड़ता है।

तो अब आप बिलकुल कह सकते हो कि साहब, बैंगलोर में वॉटर क्राइसिस (पानी का संकट) चल रही है, मैं कहूँगा, (हाथ से पानी का गिलास उठाते हुए) ‘बट हियर इज़ वॉटर (लेकिन यहाँ पानी है), मेरी आँखों को दिख रहा है। मैंने हाथों से ग्लास उठा रखा है। बताओ, पानी की कहाँ कमी है?’

संसार के ज्ञान का मतलब होता है, साहब रिसर्च रिपोर्ट्स पढ़िए। थोड़ा आँकड़ों में बात करिए, बताइए कि अभी पर कैपिटा कंज़म्प्शन ऑफ़ वॉटर (प्रति व्यक्ति पानी की खपत) कितना है, और आपके फ़्रेश वॉटर रिसोर्सेज़ (ताज़ा जल संसाधन) कितने हैं। और बताइए कि पॉपुलेशन किस तरीके से बढ़ रही है और पॉपुलेशन की भी पर कैपिटा डिमांड (प्रति व्यक्ति माँग) कितनी बढ़ रही है पानी की। और अगले दस सालों में आपके पास कितना पानी होगा, कितना नहीं होगा, बताइए। इस तल पर और इस तरीके से बात करी जाती है।

बहस ऐसे थोड़े ही होती है कि वो बोले, ‘मेरी गिलास खाली है, पानी की कमी है। सी, देअर इज़ अ वॉटर क्राइसिस (देखिए जल संकट है)।’ तो दूसरा सामने से बोला, ‘लेकिन मेरी गिलास तो भरी हुई है, देअर इज़ नो वॉटर क्राइसिस (जल संकट नहीं है)।’ ये किस घटिया तल की बहस है!

बहस के पीछे ज्ञान होना चाहिए न? फ़ैक्ट्स होने चाहिए, रिसर्च होनी चाहिए। पर होता क्या है? बैंगलोर माने क्या? हम आइटी इंडस्ट्री की बात करते हैं, आइटी इंडस्ट्री माने क्या? बीटेक? बीटेक करके कौनसी बुद्धि आ जाती है? भारत का जो बीटेक होता है, उसमें तो दुनिया की जानकारी बिलकुल दी ही नहीं जाती।

जिसने बीटेक करा है, उसको क्या पता है दुनिया के किसी भी मुद्दे के बारे में? उसने साइकोलॉजी पढ़ी है? उसने फ़िलोसॉफ़ी पढ़ी है? उसने जिओलॉजी पढ़ी है? उसने इकोनॉमिक्स पढ़ी है? उसने कुछ भी पढ़ा है क्या? बस ये संयोग की बात है कि इन दिनों बीटेक करके, वो भी खासकर अगर कम्प्यूटर साइंस में बीटेक है तो नौकरी अच्छी लग जाती है बैंगलोर में। तो उसको लगने लग गया है, ‘मैं पढ़ा-लिखा हूँ।’

बीटेक का मतलब आधा अनपढ़, एकदम अनपढ़, कुछ नहीं जानता। पर चूँकि उसको पैसे मिलने लग गये और शायद डॉलर भी मिलने लग गये, तो उसको लगता है, ‘मैं तो कुछ हूँ।’ जितना अन्धविश्वास बैंगलोर में है वो भी ये जो बीटेक वाली आइटी क्राउड (भीड़) है, इसकी कोई इन्तेहा नहीं है। अन्धविश्वास का बड़े-से-बड़ा अड्डा बैंगलोर है, वहाँ देखो आप क्या इधर-उधर साँप उड़ रहे हैं। ये सब चलता रहता है, बैंगलोर में खूब चलता है।

ज्ञान दूसरी बात होती है और एक प्रोफ़ेशनल क्वालिफ़िकेशन (व्यावसायिक योग्यता) मिल गयी है जिसके कारण आप कोडिंग करने लग गये, वो बिलकुल अलग बात होती है। कैसे ये लोग होंगे, आपका ऑफ़िस है, आप भी पढ़े-लिखे लग रहे हो, आपके ऑफ़िस में भी पढ़े-लिखे लोग होंगे जो बोल रहे हैं, ‘नहीं, नहीं, कोई वॉटर क्राइसिस नहीं है, ये रहा वॉटर।’ ये कैसे लोग होंगे, इन्हें हम किस दृष्टि से शिक्षित बोल सकते हैं?

ठीक है, उसकी होगी महीने के कई लाख रुपये की तनख्वाह हो सकती है, होगी। तो भी ये आदमी गँवार है, अशिक्षित है, अनपढ़ है। और इससे अभी आप कह दीजिए कि ये रिसर्च रिपोर्ट है पढ़ लो, तो कहेगा कि चार सेंटेंसेज़ (वाक्य) से ज़्यादा तो हमने बीटेक में भी नहीं पढ़ा अपने, अब क्या पढ़ेंगे! बीटेक पास करने के लिए भी कोई मेहनत करनी पड़ती है क्या?

आखिरी बार मेहनत करी जाती है बीटेक कॉलेज में घुसने के लिए, वो भी अगर अच्छा कॉलेज है। आइआइटी वगैरह है तो जेइइ क्लियर करने के लिए आखिरी बार ज़िन्दगी में मेहनत की जाती है, बाकी चार साल ऐसे ही घपले में निकल जाते हैं। उसके बाद अगर इंडस्ट्री फल-फूल रही है तो आपकी जॉब भी लग जाएगी। ये बेचारी कम्पनी की गरज है, उसको अपना धन्धा चलाना है तो आप कैसे भी हो, आएगी, आपको ट्रक में भरकर ले जाएगी, बैंगलोर में आपको जगह दे देगी। अब ये वहाँ पड़े हुए हैं अनपढ़ और ये बनकर घूमते हैं कि हम तो बहुत कुछ जानते हैं, जानते कुछ नहीं हैं। (प्रश्नकर्ता को सम्बोधित करते हुए) बुरा लग रहा होगा, कोई बात नहीं। बीटेक मैं भी हूँ, जैसे सबको बोल रहा हूँ, खुद को भी बोल रहा हूँ। और बीटेक वालों को नहीं, इसमें मैं एमबीए भी शामिल कर रहा हूँ और सब भी। कहीं ऐसा न लगे कि बीटेक ही खाली अनपढ़ होता है, सब हैं जितने भी हैं। क्या पता है? इनसे किसी से पूछ दो कि अभी सीओटू पीपीएम कितना है वातावरण में, नहीं बता पाएँगे। कुछ नहीं पता होगा। साधारण बातें आप इनसे पूछ दीजिए इकोलॉजी (पारिस्थितिकी) के बारे में, ये नहीं बता पाएँगे।

जितना ज़रूरी है सेल्फ़ नॉलेज (आत्मज्ञान), उतना ही ज़रूरी है संसार का ज्ञान भी तो। खासतौर पर उन मुद्दों का ज्ञान जो आज एग्ज़िस्टेंशियल (अस्तित्व सम्बन्धी) बन चुके हैं। हमारे सामने अस्तित्वगत संकट है और हम नहीं जानते कि ये मुद्दे क्या हैं। फिर दोहरा रहा हूँ, ‘उपनिषद् कहते हैं, विद्या-अविद्या दोनों होनी चाहिए। खुद को भी जानना ज़रूरी है और दुनिया को जानना भी ज़रूरी है।’

न हम स्वयं को जानते न संसार को जानते, निरे अनपढ़! फिर हम इस तरह की बातें करते हैं, ‘पर पानी की कमी है ही नहीं। मैं अभी गया था टॉयलेट में, मैंने फ्लश किया, पानी निकला। देखो, पानी की कोई क्राइसिस नहीं है।’ और पानी की कोई क्राइसिस क्यों नहीं है? ‘मैंने अपना फ़्रीजर खोला, फ़्रीजर में बर्फ़ जमी हुई थी। इसका मतलब कोई ग्लेशियर पिघल नहीं रहा है।’ ये लॉजिक है, वारे जाऊँ इस लॉजिक के!

‘हाँ, तो इतनी सारी बर्फ़ है ग्लेशियर्स में, थोड़ी मेल्ट (पिघलना) भी हो जाएगी तो क्या होगा? क्या होगा? भाया, मेरा वीज़ा लगा देना, बॉम्बे डूब जाएगा तो मैं कहीं और चली जाऊँगी। कोस्टल सिटी (तटीय शहर) नहीं है न, कोई बात नहीं। और भी तो सिटीज़ होते हैं।’

‘अच्छा! आप कहाँ जाएँगी?’ उनसे पूछो तो वो चार सिटीज़ का नाम बता देंगी। वो चार में से तीन कोस्टल (तटीय) ही होंगी। पर इनको इतना भी नहीं पता होगा क्योंकि कभी इन्होंने मैप में भी नहीं देखा होगा कि सिटी कहाँ है। कोडिंग आ गयी है, कोडिंग अपना कर रहे हैं बैठकर, उससे कुछ दुनिया का थोड़े ही ज्ञान पता चल गया है।

प्रश्न: प्रशान्त जी, यहाँ बैंगलोर में ही इंडिया का सबसे प्रमुख साइंस का इंस्टिट्यूट भी है, आइआइएससी बैंगलोर। और उन्होंने काफ़ी ही अच्छी रिपोर्ट्स निकाली है वॉटर क्राइसिस के ऊपर। मैंने काफ़ी लोगों से आज शेयर की, सन् १९७० से अब तक का पूरा तुलना करके उसमें दिया हुआ है — हरा-भरा क्षेत्र कितना कम हुआ है, निर्माण कार्य कितना बढ़ा है, वॉटर बॉडीज़ कितना कम हुआ है। मैं किसी को भेजता हूँ, दिखाता हूँ, पर कोई देखता नहीं।

उत्तर: ये तब तक नहीं सुनेंगे जब तक ये सचमुच प्यासे नहीं मरेंगे। जब तक इनके व्यक्तिगत घर में इनके व्यक्तिगत गले के लिए इनको एक व्यक्तिगत ग्लास ऑफ़ वॉटर (पानी का गिलास) मिल रहा है तब तक ये मानने वाले नहीं।

समस्या उसमें जो है जिससे मुझे तकलीफ़ बहुत होती है वो ये है कि पानी गायब नहीं होता, बस पहले महँगा होता है। अचानक नहीं गायब होगा, पहले महँगा होगा और जब महँगा होगा तो ये सब जो डॉलर वासी हैं, ये प्यास से नहीं तड़पेंगे, गरीब मरेगा। मेरी समस्या है जो मेरा गरीब भाई मरने वाला है उसकी। ये जिनकी वजह से वॉटर क्राइसिस है, इनका नम्बर तो सबसे अन्त में लगेगा मरने में; जिन बेचारों की कोई गलती नहीं, वो सबसे पहले प्यास से तड़प-तड़पकर मरेंगे।

प्रश्न: प्रशान्त जी, हमारा रिस्क डिवीजन का टीम है तो हमारा काम ही है कि रिस्क का विश्लेषण करते हैं हम कम्पनीज़ के। हमें पहले से ही खतरे की पहचान करना है। तो मुझे लग रहा था कि इतना बड़ी समस्या आयी है तो सब लोग बहुत अच्छे से इस पर चर्चा करेंगे, कि अरे! ये रिस्क है और ये निवारण हो सकता है। लेकिन सभी के पास गलत सूचनाएँ हैं। और मैं ऐसे डेटा पर बात करता हूँ, तो वो यही कहते हैं कि तुम मूर्ख हो, तुम ये सब मत बताओ।

उत्तर: ये आपके लिए बहुत अच्छा है न कि एक ऐसा रिस्क जिसे कोई आइडेंटिफ़ाइ (पहचान) नहीं कर पा रहा है, पर आप कर रहे हो। अगर आपने वो रिस्क पकड़ लिया है तो आपको विंडफ़ॉल गेन (अप्रत्याशित लाभ) होगा, बस दिक्कत ये है कि उस विंडफ़ॉल गेन का आप करोगे क्या! कोई घटना होने वाली है, बहुत भारी घटना जिसे कोई नहीं देख रहा पर आप देख रहे हो, ये ब्लैक स्वान इवेंट्स कहलाते हैं।

बहुत ज़बरदस्त घटना है जो कभी-कभार घटती है और कोई उसको प्रिडिक्ट (भविष्यवाणी) नहीं कर पा रहा, आपने कर लिया। आपने अगर कर लिया है तो आपको विंडफ़ॉल गेन होगा। बहुत अच्छी बात वो हो सकती है, पर अच्छी बात इसलिए नहीं है क्योंकि अब वो आपने प्रिडिक्ट कर भी लिया तो क्या! वो ऐसा है कि जैसे आप प्रिडिक्ट कर दें, ‘कोई एस्टेरॉइड (क्षुद्रग्रह) आकर पृथ्वी को मारने वाला है।’ किसी ने प्रिडिक्ट नहीं किया, आपने कर दिया। लेकिन उससे होगा क्या? मरेंगे तो सभी। डाटा दिखाते रहिए और कोई तरीका नहीं है। डाटा से ही इन लोगों को बम्बार्ड करिए और कहिए कि अगर पढ़ना आता हो टू प्लस टू फ़ोर तो पढ़ो, ये आँकड़े हैं।

डाटा, डाटा! और डाटा भी बिलकुल सिम्प्लीफ़ाइड फ़ॉर्म में, ऐसा कि दूसरी-चौथी के बच्चे को समझ में आ जाए। ये जो सो कॉल्ड (तथाकथित) पढ़े-लिखे लोग हैं बैंकिंग, कंसलटिंग, आइटी आदि इंडस्ट्रीज़ के, दूसरी-चौथी से ज़्यादा बड़े बच्चे का इनके पास दिमाग होता नहीं है। तो डाटा बिलकुल ऐसे फ़ॉर्म में दीजिए कि इंजेस्टेबल हो और बड़े फ़ॉन्ट में दीजिएगा, क्योंकि ये किताबें नहीं पढ़ते, ये सिर्फ़ स्लाइड्स देखते हैं। इनकी ज़िन्दगी से किताबें गायब हो चुकी हैं, तो बड़े-बड़े फ़ॉन्ट में लिखकर के इनको भेजिए कि ये हो रहा है, तो इन्हें शायद समझ आये।

जितना हो सके प्रचार करिए। और हम क्यों कहते हैं कि आपकी संस्था कुछ नहीं करती, बस प्रचार करती है? न सत्य का आविष्कार होता है, न तथ्यों का आविष्कार होता है तो फिर हम करते क्या हैं? प्रचार। आविष्कार करने को तो कुछ है नहीं, जो है सामने बस वही सबको बता रहे हैं दिन-रात। प्रचार करते हैं और वो प्रचार ही सबकुछ है।

होली के दिन बैठ जाइएगा, लगातार यही करिएगा। कहिए, ‘यही मेरा उत्सव है, डेटा-डेटा-डेटा।’ घुस जाइए, बम्बार्ड करते रहिए डेटा से। इनको देखना पड़ेगा मजबूर होकर।

प्रश्न: प्रशान्त जी, लोग डेटा भी तभी देखते हैं अगर वो किसी मीम के फ़ॉर्म में हो।

उत्तर: तो मीम बनाइए न, जो बनाना है सब बनाइए। जिस तरीके से लोग देख सकते हों, उस तरीके से दिखाइए। मैं भी तो यही कर रहा हूँ। मैं बोलता था सत्रों में कि पाँच दिन की गीता है, उसमें से तीन दिन गायब हो जाते थे। मैंने कहा, ‘तुम तीन दिन गायब हो रहे हो, मैं तीस दिन आऊँगा। तुम भागकर कहाँ जाओगे? तुम्हें मुझे सुनना पड़ेगा।’

ग्रीन टेक्नोलॉजी से दुनिया बचाएँगे?

उत्तर: भोग की इच्छा नहीं कम करेंगे। हम कहते हैं, ‘हम ग्रीन टेक्नोलॉजी (हरित प्रौद्योगिकी) लेकर आएँगे।‘ तुम ले आओ ग्रीन टेक्नोलॉजी। दस कारें थीं और हर कार दस यूनिट प्रदूषण करती थी, बड़ी बेकार कार थी। पुरानी कार थी बहुत धुआँ मारती थी। दस कारें थीं और हर कार दस यूनिट प्रदूषण करती थी। तो हम लेकर आये बेहतर टेक्नोलॉजी, ‘बीएस ट्वेंटी फ़ोर, टेस्ला रेज़ टू द पावर टेस्ला’। और प्रति कार प्रदूषण हमने घटाकर कर दिया तीन यूनिट और कारों की संख्या बढ़कर हो गयी दो सौ, ‘क्योंकि भाई लाइफ़ में प्रोग्रेस (प्रगति) सबको माँगता। और जनतन्त्र है, जनतन्त्र का मतलब सब बराबर का भोगता। तू जितना भोगेगा, भाई को भी उतना ही भोगने का, ये इलीटिज़्म (उत्कृष्टता) नहीं चलने का कि सिर्फ़ दस लोगों के पास कार है, सबके पास होने का।’

तो दस के पास थी और अब है दो सौ के पास। लेकिन हम अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, हम ग्रीन टेक्नोलॉजी लेकर आये हैं। प्रति कार प्रदूषण कम करके हमने कर दिया है तीन यूनिट। कुल कितना हुआ?

श्रोतागण: तीन यूनिट प्रति कार और कुल छः सौ यूनिट, दो सौ कार की।

उत्तर: पहले कितना था?

श्रोता: दस यूनिट प्रति कार और कुल सौ यूनिट, दस कारों की।

उत्तर: ये हमारा सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सतत् विकास) है। एक मूर्खता पर जब पता चले कि कुछ गड़बड़ हो रही है, तो और बड़ी मूर्खता करो। मूर्खता से बड़ी मूर्खता की ओर, और बड़ी मूर्खता पर जब कर्मफल मिले तो फिर और बड़ी मूर्खता करो। मर्ज़ जितना बढ़ता जाए नयी-नयी दवाइयाँ निकालो, और हर दवाई ऐसी निकालो जो मर्ज़ को और बढ़ा देती हो। बस जो मूल बीमारी है उसका सीधा-सादा इलाज नहीं कर सकते, उस सीधे-सादे इलाज को मैंने वेदान्त में पाया है। उधर नहीं आना है, बाकी सबकुछ कर लेंगे।

पहले नैनीताल जाते थे, फिर गोवा गये, फिर तरक्की करी मॉरिशियस गये। अब पेरिस जाते हैं, फिर मार्स जाएँगे। बस नज़र मोड़कर के अपने मन की ओर नहीं देखेंगे, ‘वहाँ कुछ ऐसा है क्या जो इतना घूमने-फिरने से चैन पा जाएगा?’ मन चंगा हो तो नैनीताल, गोवा, मॉरिशस सब सुहाता है। लगी हुई है भीतर आग और कर रहे हैं स्कूबा डाइविंग, क्या मिलेगा?

वो तो ऐसा ही होगा जैसे जलते हुए कोयले को लोहे के किसी गोले में बन्द करके समुद्र में डाल दो, बाहर-बाहर ठंडा और भीतर जो है वो तो जल ही रहा है, जलता ही रहेगा। हाँ, थोड़ी देर के लिए दावा करने का बहाना मिल जाएगा कि बड़ी शीतलता आ गयी। बाहर-बाहर ठंडे हो जाओगे। खुद को ही बुद्धू बना लोगे, ‘बड़ा अच्छा लगा, बड़ा अच्छा लगा!’ अब साढ़े-सात लाख खर्च करे हैं तो अच्छा तो लगेगा न! मजबूरी है खुद को बताना, ‘बड़ा अच्छा लगा, बड़ा अच्छा लगा।’ नहीं तो क्या बोलोगे? ‘फिर कट गया, एक बार और।‘

प्रौद्योगिकी से प्रदूषण कम होगा?

उत्तर: आज से चालीस साल पहले हिन्दुस्तान की सड़क पर कौनसी गाड़ियाँ चलती थीं? मैं कारों की बात कर रहा हूँ।

श्रोतागण: ऐम्बेसडर।

उत्तर: ऐम्बेसडर और फिएट चलती थीं। मान लो पेट्रोल पर चलती थीं, माइलेज क्या देती थीं?

श्रोता: दस-बारह।

उत्तर: आठ-दस। फिएट दे देती थी दस-बारह का, ऐम्बेसडर दस का भी नहीं देती थी, आठ, ठीक? आज की जो गाड़ियाँ आयी हैं वो उनसे दूना माइलेज देती हैं, देती हैं कि नहीं? यानी कि जितनी दूर जाने में जितना प्रदूषण ऐम्बेसडर करती थी, आज की गाड़ी उतनी ही दूर जाने में उससे कम-से-कम आधा तो करती ही है प्रदूषण, ठीक? ऐम्बेसडर जितना प्रदूषण करती थी, आज की गाड़ी उससे आधा करती है, आधे से भी कम करती होगी। तो प्रदूषण का स्तर चालीस साल पहले के मुकाबले आज आधा हो जाना चाहिए। आधा हुआ है क्या?

टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट (तकनीकी विकास) इतना हो गया, तुम्हारी जो नयी गाड़ी आयी है वो ऐम्बेसडर के मुकाबले आधा प्रदूषण करती है, तो फिर तो चालीस साल पहले की अपेक्षा आज वातावरण में सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फ़ाइड, पार्टिकुलेट मैटर (कणिका तत्व), इन सबका स्तर कितना होना चाहिए? आधा होना चाहिए। आधा हो गया है क्या? क्यों? टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट तो हो ही रहा है भाई! टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट तो हो रहा है न। उससे क्या प्रदूषण बच गया या प्रदूषण और दस गुना हो गया है?

तुम ये भी तो देखो कि तब अगर एक गाड़ी थी सड़क पर, तो आज एक की जगह चालीस हैं। जिस टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट ने गाड़ी के इंजन की एफ़िशिएंसी (क्षमता) बढ़ायी है, उसी टेक्नोलॉजीकल डेवलपमेंट ने तुम्हारे हाथ में एक की जगह चालीस गाड़ियाँ रख दी हैं। तो कुल मिलाकर इस टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट का नतीजा क्या है? कम प्रदूषण या ज्यादा प्रदूषण?

श्रोता: ज़्यादा।

उत्तर: अगर टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट उनके हाथों में है जिनका मन अभी देहवाद, भोगवाद, लालसा और लालच से मुक्त नहीं है तो हर प्रकार का तकनीकी विकास, टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट आत्मघातक ही होगा।

लोग कह रहे हैं कि माँस छोड़ो, दूध छोड़ो, वीगनिज़्म की तरफ़ जाओ। अभी मैं खबर पढ़ रहा था कि वीगन लोग सोया का उपभोग खूब करते हैं। नतीजा ये हुआ है कि अब पेड़ काटे जा रहे हैं सोया की खेती के लिए। दुनिया की आबादी मान लो पूरी भी वीगन हो जाए और लगे सोया खाने, तो भी क्या दुनिया बच जाएगी? तब तुम सोया के लिए पेड़ काटोगे। पेड़ काटोगे, खेत लगाओगे, किस चीज़ के? सोया के खेत लग रहे हैं, सोया की फ़सल उसमें लगायी जा रही है।

तुम किसी भी तरह का तकनीकी विकास कर लो, जब तक तुम्हारा मन साफ़ नहीं हुआ है तब तक वो तकनीकी विकास तुमको भारी ही पड़ेगा, पलटकर तुम पर वार करेगा।

भई, पिछले तीन-सौ साल का इतिहास देख लो, तो टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट तो होता ही जा रहा है न? कोयले का जो इंजन होता था स्टीम लोकोमोटिव (भाप गतिविशिष्ट), उसकी क्या एफ़िशिएंसी होती थी और आज का जो इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव है, उसकी क्या एफ़िशिएंसी होती है? कोई तुलना ही नहीं है। लेकिन कुल प्रदूषण तब ज़्यादा कर रही थी रेल्वे या आज ज़्यादा कर रही है? बोलो, आज ज़्यादा कर रही है न? क्योंकि जिस भावना के चलते तुम कोयले से उठकर के बिजली के इंजन पर आये हो, उसी भावना के चलते तुमने एक कोयले के इंजन की अपेक्षा पचास बिजली के इंजन खड़े कर दिये हैं, उसी भावना के चलते तुमने हर दिशा में अपने भोग का प्रसार कर दिया और अपनी आबादी बढ़ा ली है।

तो ये बात कि मैं पहले कॉर्पोरेट स्लेवरी में था, अब नहीं हूँ, इस बात में कोई दम नहीं। कॉर्पोरेट की स्लेवरी कभी कोई करता नहीं, सब अपने लालच की स्लेवरी करते हैं। श्रम पहले भी कर रहे थे, श्रम अभी भी कर रहे हो। पहले भी श्रम समर्पित था किसी को क्योंकि उससे डरते थे, उसके लालच में थे, अभी भी श्रम समर्पित है किसी और को। तब क्या श्रम अध्यात्म के लिए कर रहे थे? तब क्या श्रम मुक्ति के लिए कर रहे थे? आज भी क्या श्रम अध्यात्म के लिए कर रहे हो और मुक्ति के लिए कर रहे हो? कहाँ जा रहे हैं तुम्हारे समय और संसाधन? न तब जा रहे थे अध्यात्म और मुक्ति की ओर, न आज जा रहे हैं।

तो ये झूठ है कि कोई भी व्यक्ति कॉर्पोरेट स्लेवरी में होता है। कोई किसी और का गुलाम नहीं होता, सब अपनी ही कामनाओं, लालच, वासनाओं और अज्ञान के गुलाम होते हैं। कोई किसी दूसरे के सिर पर अपने बन्धनों का ठीकरा न फोड़े। कोई न कहे कि मैं तो कॉर्पोरेट की गुलामी में पड़ा हूँ — अपनी ही गुलामी में तब थे और अपनी ही गुलामी में आज भी हो।

अगर तुम्हारा श्रम उसको नहीं समर्पित है जिसने अर्जुन से कहा था, ‘अर्जुन जो कुछ भी कर रहा है अपने लिए मत करना, जो कुछ भी कर रहा है मुझे समर्पित कर।‘ आज भी तुम्हारे समय, तुम्हारे संसाधनों की दिशा किधर को है, बोलो? मौखिक बातचीत से काम नहीं चलता। तथ्य बताओ और आँकड़े बताओ। जो कर रहे हो उसका परिणाम किसको समर्पित कर रहे हो? जो कर रहे हो उससे जो भी पाते हो, जो भी फल पाते हो, वो किसकी सेवा जा में रहा है?

जब मन बदलेगा तब दुनिया को हो रही क्षति बदलेगी, तकनीकी विकास नहीं बचा लेगा; ये बहुत बड़ी भ्रान्ति है। लोग कहते हैं, ‘प्लास्टिक का उपयोग कम करो।‘ हर तरह के रिन्यूएबल रिसोर्सेज़ (नवीकरणीय संसाधन) की बात करते हैं, तमाम तरह के वस्तुओं के पुनर्चक्रण की बात होती है। कुछ नहीं होने वाला इससे।

टेक्नोलॉजी अधिक-से-अधिक इतना ही करती है कि मशीन की एफ़िशिएंसी (क्षमता) बढ़ा देती है, एक नयी मशीन ले आ देती है जो पहले की अपेक्षा कम संसाधनों में वही काम कर देगी। टेक्नोलॉजी इतना ही तो करेगी न। पर टेक्नोलॉजी तुम्हारा मन थोड़े ही बदल देगी!

जैसे ही तुमको दिखाई देता है कि कोई काम पहले दस रुपये में होता था, अब पाँच रुपये में हो रहा है, उसको करने वालों की संख्या दस गुनी हो जाती है; क्योंकि इसी को तुम प्रगति कहते हो कि ज़्यादा लोगों के हाथ में पैसा पहुँचे, ज़्यादा लोगों में हाथ में संसाधन रहे। जितना ज़्यादा लोग उपभोग करेंगे, कंज़्यूम करेंगे, उसी को हम कहते हैं कि डेवलपमेंट हो रहा है। जीडीपी नापा ही कंज़म्प्शन से जाता है। दो ही तरीके हैं, प्रोडक्शन से नाप लो या कंज़म्प्शन से नाप लो। दोनों का अर्थ एक ही है — उपभोग।

असली समस्या ये नहीं है कि हम कोयला ज़्यादा जला रहे हैं। असली समस्या ये नहीं है कि हमारे पास जो मशीनें हैं, वो प्रदूषण ज़्यादा करती हैं। असली समस्या ये है कि हमें भोगना है, हममें अहम् है। हम प्रेम का अर्थ भी भोग समझते हैं। हमें भी भोगना है और जिनसे हम कहते हैं कि हमारा प्रेम का नाता है, हमें उन्हें भुगवाना भी है।

इंसान की सारी समस्याओं के दो कारण

उत्तर: सारी समस्या इंसान की आबादी और इंसान का उपभोग है। और इन दोनों समस्याओं के केन्द्र में आदमी की पाशविक वृत्ति है। उस वृत्ति को कौन हटाएगा? सरकारें हटा देंगी? वैज्ञानिक हटा देंगे? नहीं। उस वृत्ति को न सरकारें हटा सकती हैं न वैज्ञानिक हटा सकते हैं, उस वृत्ति को सिर्फ़ अध्यात्म हटा सकता है।

जब तक आदमी को समझाया नहीं जाएगा कि तुम्हारी जो वृत्तिगत अपूर्णता है, उसका समाधान तुम न तो बच्चे पैदा करके कर पाओगे और न कंज़म्प्शन (उपभोग) करके कर पाओगे, उसका समाधान कुछ और है, तब तक आदमी गलत जगह ही शान्ति ढूँढता रहेगा न। भई, जब आप अपनी अपूर्ण वृत्ति को शान्त करना चाहते हो, तभी तो आप कंज़म्प्शन की ओर भागते हो न? और कंज़म्प्शन से शान्ति मिलती भी नहीं।

अब ये बात सरकारें थोड़ी आपको समझा पाएँगी! ये बात सरकारें नहीं समझा सकतीं और न ही ये बात सामाजिक, नैतिकता के तल पर आपको समझायी जा सकती है। ये बात तो अध्यात्म और आध्यात्मिक ग्रन्थ ही आपको समझा पाएँगे न, कि आपको ज़िन्दगी में जो चाहिए, वो न तो कुनबा बढ़ाकर मिलने वाला है, न आदमी-औरत इकट्ठा करके मिलने वाला है, और न ही और ज़्यादा कपड़े, और ज़्यादा गाड़ियाँ, और ज़्यादा रुपया-पैसा इकट्ठा करके मिलने वाला है। वो कहीं और मिलेगा। और जिस दिन आदमी को वो सही चीज़ मिलने लग गयी जिसके लिए उसकी अपूर्ण वृत्ति वास्तव में तड़प रही है, उस दिन वो उपभोग की दिशा में भागेगा ही क्यों!

बात समझ रहे हैं?

तो कुल मिला-जुलाकर हुआ ये है कि हमें वो नहीं मिल रहा हमें जिसकी तलाश है। क्यों? क्योंकि हमारा जीवन आध्यात्मिकता से रहित है, स्कूलों में नाम भी नहीं लिया जाता आध्यात्मिक ग्रन्थों का। भई, हम धर्मनिरपेक्ष लोग हैं न! सन्तों-ऋषियों की बात ही नहीं की जाती। बात की भी जाती है तो बस ऐतिहासिक सन्दर्भों में कि फ़लाने वर्ष में पैदा हुए थे, फ़लाने वर्ष में मर गये इत्यादि, इत्यादि।

बच्चों का वास्तविक अध्यात्म से परिचय ही नहीं कराया जाता और एक बार वो जीवन में आ गया, समाज में उतर आया, उसके बाद तो तमाम तरीके के सामाजिक दबाव और मीडिया और इधर-उधर की बातें और भीतर से वृत्ति का उफान, वो कभी समझ ही नहीं पाता कि वो जी किसलिए रहा है। वो कभी समझ ही नहीं पाता कि भीतर की बेचैनी और तड़प वास्तव में है किसलिए। तो वो भीतर की बेचैनी का क्या इलाज ढूँढता है? उपभोग, *कंज़म्प्शन*। उसी कंज़म्प्शन से क्या पैदा हो जाती है?

श्रोता: कार्बन डाइऑक्साइड।

उत्तर: कार्बन डाइऑक्साइड बाद में पैदा होती है, पहले बच्चे पैदा होते हैं। कंज़म्प्शन से ही तो बच्चे पैदा होते हैं। स्त्री का शरीर लिया और भोग डाला उसको, लो आ गयी औलाद। जैसे आप सॉफ़्ट ड्रिंक का उपभोग करते हो, जैसे आप जूते का उपभोग करते हो, जैसे आप कपड़ों का उपभोग करते हो, जैसे आप कार का उपभोग करते हो, वैसे ही आप किसी के जिस्म का भी उपभोग कर लेते हो, लो आ गयी औलाद। वो उपभोग आदमी कर ही रहा है इसलिए क्योंकि उसको अध्यात्म से परिचित कराया नहीं गया। उसको अगर सही जगह शान्ति मिल गयी होती, तो गलत जगह शान्ति क्यों ढूँढने जाता भाई!

अब आप करते रहो इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंसेस (वैश्विक सम्मेलन), उनसे आदमी के भीतर की अशान्ति और अपूर्णता तो दूर नहीं होने वाली न। जिस दिन तक आदमी भीतर से अधूरा है और बेचैन है, उस दिन तक वो अपनी बेचैनी का यही झूठा इलाज निकालेगा। क्या? पकड़ो और भोगो, पकड़ो और भोगो। और उसी भोगने के फलस्वरुप कार्बन डाइऑक्साइड मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड ये सब बढ़ते रहेंगे। और बहुत दिनों तक उनके बढ़ते रहने की नौबत नहीं आने वाली, उससे पहले ही मानवता पूरी साफ़ हो जाएगी। चले थे भोगने, चले थे पृथ्वी को खाने, पृथ्वी खा गयी सबको!

तो बात की शुरुआत में मैंने कहा था कि आदमी का बुखार पृथ्वी को लग गया है। और मैं कह रहा हूँ, ‘पृथ्वी को जो बुखार आ गया है तो आदमी बचेगा क्या?’

“खेल खतम, पैसा हज़म।” भोग लो!

प्रकृति की दुर्दशा का एकमात्र इलाज

उत्तर: कोई टेक्नोलॉजी है जो इंसान की हिंसा और हवस और वहशीपन को रोक सके? ऐसी कोई टेक्नोलॉजी है? क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) को रोक पाने वाली कौनसी टेक्नोलॉजी है? क्लाइमेट चेंज इज़ ए प्रोडक्ट ऑफ़ ह्यूमन ग्रिड एंड लस्ट फ़ॉर कंज़म्प्शन (जलवायु परिवर्तन मनुष्य के भोगने के प्रति लालच और वासना का उत्पाद है)। ग्रीन टेक्नोलॉजी वगैरह मत बोल देना, उससे नहीं रुकने वाला बाबा, बेकार की बातें नहीं। कोई टेक्नोलॉजी है जो हमें समझा सके कि जितना हम कंज़्यूम कर रहे हैं, हमें उतना कंज़्यूम करने की ज़रूरत नहीं है?

आज की जितनी दुनिया की समस्याएँ हैं उनका हल न विज्ञान के पास है, न टेक्नोलॉजी के पास है, उसका हल आत्मज्ञान के पास है। लेकिन उससे हम डरते हैं, हमको लगता है दंगे हो जाएँगे। और वो जो डर है उसकी भी वजह है। देखो, भारत को जो आज़ादी मिली थी विभाजन के साथ मिली थी, खूनी मज़हबी दंगों के साथ मिली थी। तो इसलिए उस वक्त बहुत ज़्यादा सतर्कता बरतनी पड़ी और फिर अति हो गयी। अति ये हो गयी कि बिलकुल ही खत्म कर दिया। नहीं तो मैं वजह जानना चाहता हूँ, ‘चार साल के बीटेक प्रोग्राम में और उसके बाद एमटेक प्रोग्राम होते हैं, और न जाने कितने और प्रोग्राम होते हैं, एक भी कोर्स क्यों नहीं होता सेल्फ़ इन्क्वायरी (आत्म अवलोकन) पर?’

सेल्फ़ इनक्वायरी बिलकुल वैसे ही होती है जैसे आप बाहर की दिशा में इनक्वायरी करते हो — सवाल पूछो, जो उत्तर आये उसको जाँचों, परखो। गज़ब दर्जे की ऑब्जेक्टिविटी होती है उसमें, जबकि वो बात सब्जेक्ट (विषयेता) को लेकर के हो रही है। यही वजह थी कि जो कुछ भी मैंने पढ़ाई-लिखाई करी, जो भी मुझे कैरियर मिल रहे थे उनसे ज़्यादा मुझे ज़रूरी लगा ये काम करना। मैंने कहा, 'यार, बाकी तो सब ठीक है, लेकिन हम आधी शिक्षा देकर के लोगों को दुनिया में धकेल दे रहे हैं और दुनिया में फिर वो करेंगे क्या?'

दुनिया आज कहाँ पर आकर के खड़ी हो गयी है और उसका जो नतीजा है न, वो हमारी एजुकेशन ही है। हम सिक्स्थ मास एक्स्टीनक्शन फ़ेज़ (छठे चरण की सामूहिक विलुप्ति) में प्रवेश कर चुके हैं न, ये हम जानते हैं कि नहीं जानते हैं?

चार-सौ-चालीस पीपीएम बोलता हूँ तो क्या याद आता है? और कितना होना चाहिए? और जब आप नेट ज़ीरो की बात करते हो तो आप कह रहे हो वर्ष २०५०। आप बच जाओगे? आप बच जाओगे क्या? ये किसने कर दिया? लैक ऑफ़ टेक्नोलॉजी ने कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ा दी है? कार्बन डाइऑक्साइड इसलिए बढ़ गयी क्योंकि हम गँवार हैं, कबीलों में रहते हैं, इसलिए इतनी बढ़ गयी है?

आप सब यहाँ बैठे हो, सब अठारह से बाईस, चौबीस साल के बीच के होंगे। ठीक? जानते हो, कार्बन डाइऑक्साइड दो-सौ-अस्सी से चार-सौ-चालीस तुम्हारे जीवन काल में हुई है? ये पढ़े-लिखों की करतूत है। ये अनपढ़ों, जाहिलों, गँवारों ने, अशिक्षितों ने नहीं कर दिया; ये हमने करा है, ये हमारी पढ़ाई ने करा है, ये हमारी शिक्षा व्यवस्था है। और उसमें भी और सुनो, जो कम पढ़ा-लिखा आदमी है, कम एमिशन (उत्सर्जन) करता है। दुनिया के सबसे ज़्यादा एमिशन करने वाले सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे और अमीर लोग हैं, और सबसे प्रतिभा सम्पन्न लोग हैं।

जब सन् २००८ में इकोनॉमिक बबल बर्स्ट हुआ था, तो मैंने पूछा अपनेआप से, मैंने कहा, ‘ये जो बैंक इसमें दिवालिया हुए हैं उसमें तो मेरे बैचमेट सब मैनेजर हैं। ये लेमेन ब्रदर्स , ये तो मेरे कैम्पस में आता था और सब पागल रहते थे इसमें घुसने के लिए और दर्जन-दर्जन लोग इसमें जाते थे। इन्होंने इतनी मूर्खतापूर्ण हरकत कैसे कर दी?’

ये जो हम पढ़े-लिखे लोग हैं न, हम दुनिया को नाश की कगार पर ले आये हैं, कगार पर नहीं ले आये हैं, नाश शुरू हो चुका है। ये हमने करा है क्योंकि हमारी जो शिक्षा है, एकदम आधी-अधूरी है और हम उसमें ही बहुत गौरव अनुभव करते रहते हैं। हमको लगता है, ‘हम सब जानते हैं, हमें ये पता है, मुझे इसके बारे में पता है, मुझे उसके बारे में पता है, सबके बारे में पता है।’ ये कुछ नहीं पता। तीस-चालीस साल में एक-सौ-पचास प्रतिशत बढ़ोतरी कार्बन एमीशंस में! जनसंख्या जिस हिसाब से — कम-से-कम भारत की बात करूँ — बढ़ रही है, हम खुश हो जाते हैं कि ग्रोथ रेट ऑफ़ पॉपुलेशन (जनसंख्या वृद्धि दर) नीचे आ रहा है और फिर स्टेबिलाइज़ (स्थिर) कर जाएगा।

हम ये तो अभी बात ही नहीं कर रहे हैं कि हमें डीग्रोथ (गिरावट) चाहिए, बोथ इन टर्म्स ऑफ़ इकॉनमिक्स एंड पॉपुलेशन (आर्थिक और जनसंख्या दोनों के सन्दर्भ में)। उसकी हमें बात ही नहीं समझ में आ रही। कितनी प्रजातियाँ प्रतिदिन एक्सटिंक्ट (विलुप्त) हो रही हैं, हम जानते हैं क्या? जो नैचुरल रेट ऑफ़ एक्सटिंक्शन ऑफ़ स्पीशीज़ (प्रजातियों के विलुप्त होने की प्राकृतिक दर) होना चाहिए, उससे एक हज़ार प्रतिशत ज़्यादा दर से प्रतिदिन स्पीशीज़ एक्सटिंक्ट हो रही हैं।

एक्सटिंक्शन का मतलब समझते हो? वो पेड़, वो पौधा, वो जानवर, वो चिड़िया अब कभी लौटकर नहीं आएँगे। आप यहाँ बैठे हुए हो, आपको नहीं पता चल रहा होगा। वो कभी अब लौटकर नहीं आएगा, हम खा गये उसको और जितनी स्पीशीज़ हम पिछले बीस-चालीस साल में खा गये, उतनी पिछले पाँच लाख साल में नष्ट नहीं हुई थीं। ये पढ़े-लिखों की करतूत है।

हम कहते हैं, ‘हम अच्छे लोग हैं क्योंकि हम पढ़े-लिखे हैं और पढ़ाई से इंसान की बेहतरी होती है।’ ये बेहतरी हो रही है? बोलते हैं, “अधजल गगरी छलकत जाए।” आधा ज्ञान ज़्यादा खतरनाक होता है। हमें आधा ज्ञान मिल रहा है।

क्या जलवायु परिवर्तन का अध्यात्म से कुछ सम्बन्ध है?

प्रश्नकर्ता: प्रशान्त जी, लिबरेशन (मुक्ति) और क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) में क्या सम्बन्ध है?

उत्तर: लिबरेशन का मतलब होता है खा-खाकर तृप्ति पाने के भ्रम से आज़ादी। लिबरेशन माने किसी चीज़ से लिबरेट (मुक्त) हो रहे होंगे न, काहे से लिबरेशन ? किस भ्रम से मुक्ति? इसी भ्रम से मुक्ति कि खा-खाकर के, भोग-भोगकर के आदमी का पेट कभी भर सकता है, यही लिबरेशन है। और क्लाइमेट चेंज क्या है? ये धारणा कि भोग-भोगकर के, भोग-भोगकर के जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।

तो कह सकते हो तुम कि ये जो पूरा जलवायु परिवर्तन का संकट है, वो है ही इसीलिए क्योंकि ये पृथ्वी भरी हुई है दास लोगों से, बन्धक लोगों से। जो लोग भ्रमों में और बन्धनों में जी रहे हैं, बौन्डेज़ (बन्धन) में जी रहे हैं, ऐसे लोगों से। तो फिर क्लाइमेट चेंज की समस्या का समाधान भी क्या हुआ? फ़्रीडम , लिबरेशन। किससे फ़्रीडम ? किससे मुक्ति? ये जो भीतर हमारे धारणा बैठा दी है देह ने, समाज ने और बाज़ार ने कि जितना भोगोगे, जीवन उतना तुम्हारा सुखी और सन्तुष्ट रहेगा।

क्लाइमेट चेंज की समस्या और कुछ है ही नहीं, गलत जगह खुशी तलाशने की समस्या है। ये एक आध्यात्मिक समस्या है। ये पूरी दुनिया भोग में खुशी तलाश रही है, उसी का नाम है क्लाइमेट चेंज। ये भी हो सकता है कि कोई तकनीकी उपाय करके, किसी तरीके से वायुमंडल में जो अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड है, उसको हटाया जा सके, हो सकता है। ऐसा बिलकुल हो सकता है कि कल विज्ञान कोई तरीका ले आये कि किस तरीके से वायुमंडल में जो अतिरिक्त, एक्सेसिव (अत्याधिक) कार्बन डाइऑक्साइड आ गयी है, उसको हम हटा दें, हो सकता है। लेकिन अगर वो हटा भी दी कार्बन डाइऑक्साइड, तो कोई और संकट आ जाएगा मानवता के ऊपर क्योंकि मूल संकट जलवायु परिवर्तन है ही नहीं। मूल संकट है आदमी के भीतर बैठी हुई भ्रामक धारणा कि भोग-भोगकर के खुश हुआ जा सकता है।

और काफ़ी सम्भावना है कि हो जाए शोध, रिसर्च , कुछ-न-कुछ तरीका निकाल लिया जाए कि जैसे हमारे ढर्रे हैं, लक्षण हैं, मान्यताएँ हैं, जीवन पद्धतियाँ हैं, वो वैसे ही चलती रहें और फिर भी वैश्विक तापन न हो, दुनिया का तापमान न बढ़े। कोई तरीका निकाला जा सकता है, कौन जाने आ ही जाए! आदमी की खोपड़ी खूब तेज है, कोई भी तरीका निकाल लेती है। मैं उस दशा में सावधान कर रहा हूँ कि बीमारी तो लगी ही हुई है, उस बीमारी का सिर्फ़ एक लक्षण है क्लाइमेट चेंज।

हम अगर क्लाइमेट चेंज से बच भी गये तो किसी दूसरी तरह से मरेंगे, अगर हम बाहर-बाहर वाली मौत मरने से बच भी गये, तो हम भीतर की मौत मरेंगे। पर जब तक हमारे अन्दर ये धारणा बैठी हुई है कि प्रकृति का, संसाधनों का, वस्तुओं का, दूसरे मनुष्यों का उपभोग करके आनन्द पाया जा सकता है, तब तक हम जी तो नहीं ही पाएँगे। मौत चाहे जलवायु परिवर्तन से हो, चाहे विश्व युद्ध से हो, चाहे किसी और कारण से हो, और चाहे बाहरी मौत हो ही न, बस अन्दरूनी मौत हो, हम मरेंगे ज़रूर। हमारी ये धारणा ही मृत्योन्मुखी है, हमारी ये धारणा ही मौत का दूसरा नाम है कि भोग से सन्तुष्टि मिल सकती है, ये धारणा ही मौत है।

ऐसे लोगों को अपना आदर्श बना लिया?

प्रश्नकर्ता: प्रशान्त जी, अभी हमारे क्षेत्र में पानी का संकट है और सरकार ने विशेष नियम भी बनाया है कि पानी का कैसे इस्तेमाल करना है ताकि सबकी ज़रूरत पूरी हो सके। लेकिन कुछ विशेष लोग सरकार से अनुमति लेकर पानी का दुरुपयोग कर रहे हैं। सरकारी नियम के बावजूद भी इन्हें अनुमति कैसे मिल जाती है?

उत्तर: लोकतन्त्र है, लोकतन्त्र में नेता ही जनता है तो किससे पर्मिशन (अनुमति) लेनी है? खुद से ही तो लेनी है। वो जो नेता है, उसको वहाँ किसने खड़ा करा? वो आपकी ही छाया है। यही तो वेदान्त है न! वो नेता नेता नहीं है, आप जो हो वही नेता है क्योंकि आपने ही तो चुना है। तो अगर नेता कुछ कर रहा है तो नेता कर ही नहीं रहा, कौन कर रहा है? आप कर रहे हो।

नेता क्या करेगा, नेता कुछ अच्छा कर देगा तो आप उसको गिरा दोगे नीचे। कोई नेता सचमुच अच्छे निर्णय लेने लग जाए तो आपको दो दिन नहीं लगेगा सरकार पलटने में। अभी आप जो कुछ भी होता हुआ देख रहे हो, वो सीधे-सीधे अध्यात्म का अभाव है और उसका कोई और उपचार नहीं अध्यात्म के अलावा।

जब इंसान के पास राम नहीं होते तो वो प्रकृति में खुशी तलाशता है, और प्रकृति में खुशी तलाशने का मतलब है प्रकृति की बर्बादी। इतनी सी बात है कुल। हमको भोगना है, और ज़्यादा, और ज़्यादा भोगना है। और हम भोग के सब तरीकों में एक तरीका ये भी रखते हैं — सन्तान। तो हमें बहुत सारी सन्तानें पैदा करनी हैं, और हम ये नहीं समझते कि आप जो सन्तानें पैदा कर रहे हो, वो एक व्यक्ति नहीं है, वो आगे और भी पैदा करेगा। आपने एक नहीं, कम-से-कम सात-आठ सौ लोग पैदा कर दिये हैं। और वो सात-आठ सौ लोग भी एक हाइटेंड लेवल ऑफ़ कन्ज़म्प्शन (उच्च स्तर का उपभोग) चाहते हैं। आप भोग के उस स्तर से सहमत हो क्या आज जो सन् १९७० में था? हमें ज़्यादा भोगना है न! और ज़्यादा, और ज़्यादा भोगना है तो पहले तो पर कैपिटा कन्ज़म्प्शन (प्रति व्यक्ति उपभोग) हमें बहुत हाइ (उच्च) चाहिए। दूसरा, हमें नम्बर ऑफ़ कंज़्यूमर्स (उपभोक्ताओं की संख्या) भी बढ़ानी है, तो क्या होगा?

और पिछले ही सत्र में किसी ने पूछा था कि प्रकृति तो बर्बाद होती नहीं, बात बिलकुल सही थी। आप प्रकृति को अधिक-से-अधिक थोड़ा बदल रहे हो, बर्बाद तो आप हो रहे हो। दिक्कत मुझे इसमें ये आती है कि गेहूँ के साथ घुन पिस रहा है, इंसान की मूर्खता और बदतमीज़ी का खामियाज़ा पेड़-पौधे, नन्हें पशु भुगत रहे हैं। अगर सिर्फ़ हमारी प्रजाति विलुप्त हो रही होती तो शायद ठीक भी था, इस प्रजाति के साथ होना भी यही चाहिए कि ये विनष्ट हो जाए। लेकिन गेहूँ के साथ घुन पिस रहा है, और इस चक्कर में हमारी ही प्रजाति के वो लोग जिन्होंने कोई अपराध नहीं करा है, वो भी बर्बाद हो रहे हैं।

मुझे एक ऑटोइम्यून् डिसॉर्डर (स्वप्रतिरक्षा विकार) है जो माहौल से भड़कता है, और गर्मियाँ होती हैं, जैसे ही सबकुछ प्रदूषण से भरने लगता है। इस नवम्बर के महीने में या फिर जब गर्मी होती है अप्रैल-मई के बाद से मुझे काफ़ी तकलीफ़ शुरू हो जाती है, और उसका मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ, मैंने कुछ भी नहीं करा है।

प्रश्न: जो लोग बोरवेल लेकर पानी निकाल लेंगे, बाकी के लिए कुएँ में जल ही नहीं रहेगा, वो लोग किधर जाएँगे, उसके बारे में सोचेंगे ही नहीं।

उत्तर: जो दूसरों का सोचने लग जाए, वो स्वयं से मुक्त हो गया न! और जो जितना स्वयं से ही बँधा हुआ है, वो दूसरे की कैसे सोच पाएगा? तो जिसमें अभी अज्ञान घना है, वो किसी के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता।

जो आत्मविचार नहीं करता है, जिसका आत्मज्ञान शून्य है, वो सबके लिए हिंसा का, दुर्भाग्य का कारण बनेगा। ऐसे लोगों से बचिएगा जो आपको बहुत खुश-खुश दिखाई दे रहे हों, सफल दिखाई दे रहे हों, जिनको आप हैप्पी गो लकी (खुशमिजाज़) बोलते हैं। या इस तरह के लोग जिनको कुछ आता-जाता नहीं, अध्यात्म से बिलकुल खाली हैं लेकिन फिर भी जिनके चेहरे पर एक चमक है और हँस-खेल रहे हैं, और सफल भी दिखाई दे रहे हैं, ऐसे लोग देखे हैं न? और उनके सामने आप राम की बात करो तो आपको ही अटपटा सा लगता है।

आपको लगता है, ‘ये बन्दा तो एकदम मस्त है, मगन है।’ कुछ नहीं है, अभी चिकन-फ़्राइ चबाएगा और एकदम खुश हो जाएगा और उसकी सेहत भी अच्छी है, चेहरा कैसा चमक रहा है! सांसारिक रूप से भी ये ठीक-ठाक ही है, बुद्धि भी इसकी शार्प (तीक्ष्ण) है, दिमाग चलता है इसका। ऐसे लोग होते हैं न? ये बहुत खतरनाक लोग होते हैं, बचिएगा इनसे क्योंकि यही लोग विज्ञापन होते हैं। राम से खाली जीवन जीने का विज्ञापन होते हैं ये लोग। इन्हीं को देखकर न जाने और कितने बच्चों को लगता है कि जीवन में राम नहीं भी हैं तो क्या हो गया।

लेकिन हमारी कुछ शिक्षा व्यवस्था ऐसी है कि बचपन में याद करिएगा, आपकी क्लास में ऐसे लोग रहे होंगे तो वही क्लास के हीरो हो जाते थे। हो जाते थे कि नहीं? क्लास के हीरो पढ़ने-लिखने वाले बच्चे कम ही होते हैं। जिनको हम बोलते थे, ‘ये क्लास की जान हैं।’ ये कौनसे बच्चे होते थे? जो एकदम बेकार हैं लेकिन टीचर की बातों पर जोक मार दिया पीछे से, और सब हँस रहे हैं। प्रैंक्स (मज़ाक) खेल दिये। इनको हम कहते थे, ‘ये हैं क्लास की जान।’ यही वो हैं जिन्होंने आज पृथ्वी तबाह कर दी है — आत्मज्ञान से शून्य लेकिन दिखने में बहुत आकर्षक। ये गड़बड़ होते हैं, इनसे ही बचना है।

और कुछ ऐसा खेल है प्रकृति का कि दिखने में ज़्यादा आकर्षक होते ही वही हैं जो आत्मज्ञान से खाली होते हैं। जो विचार से शून्य लोग होते हैं वो ज़्यादा आकर्षक दिखते हैं, पता नहीं क्यों। और जिसमें थोड़ी अन्तर्दृष्टि आ गयी, जो अपनी ओर देखने लगता है, थोड़ा विचारी हो जाता है वो बहुत आकर्षक नहीं रह जाता, या वो कम लोगों के लिए आकर्षक रह जाता है।

तो ज़्यादातर जो रोल मॉडल बनते हैं वो कैसे होते हैं? वो गड़बड़ लोग होते हैं जो रोल मॉडल बनते हैं। सारी दिक्कत इसी की आती है। जिनको हम मूल्य दे देते हैं, जिनको बहुत बड़ी जगह दे देते हैं, जो एकदम हमारे सिर के ऊपर चढ़कर छा जाते हैं, वो सब गड़बड़ लोग ही होते हैं। या ऐसे कह लो, सौ में से निन्यानवे गड़बड़ होते हैं। और ये काम दो साल, चार साल की उम्र से शुरू हो जाता है और अन्त तक चलता है।