ज्ञातव्य - संक्षिप्त हवन विधि

(1) हवन के उपयुक्त समिधाएंआम, पीपल, गूलर, ढाक, बरगद, छोंकर।

(2) हवन के उपयुक्त हविष्यान्नजौ 1 भाग, चावल 2 भाग, तिल 3 भाग, शकर 4 भाग।

(3) हवन सामग्रीचन्दन, अगर, तगर, गूगल, जायफल, जावित्री, दालचीनी, तालीस पत्र, लौंग, बड़ी इलायची, इन्द्र जौ, कपूर, कचरी, आंवला, बालछड़, नागकेशर, गिलोय, पटोल पत्र, पवार के बीज, मुलहठी, जावित्री, लाल चन्दन, तालमखाना, मोचरस, केशर, असगन्ध, शीतलचीनी, जायफल, चिरायता, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, पुष्करमूल, मजीठ, धाय के फूल, खस, गोखरू, शतावर, देवदारू, छारछवीला।

(4) हवन के उपयुक्त मेवामुनक्का, बादाम, गोला, किशमिश, छुहारा, पिस्ता, अखरोट।

(5) हवन के आवश्यक पात्रप्रणीता, प्रोक्षणी, स्रुवा, स्रचि और स्फय।

यह पुस्तिका हमारे ‘‘गायत्री यज्ञ विधान’’ ग्रन्थ से संक्षिप्त रूप से संग्रह की गई है। जिन्हें इस सम्बन्ध में विशेष जानना हो, वे उपरोक्त ग्रन्थ को पढ़ें या मथुरा आकर यज्ञ-विद्या की क्रियात्मक शिक्षा प्राप्त करें।

                                                                                                                                               —श्रीराम शर्मा आचार्य




संक्षिप्त गायत्री हवन - संक्षिप्त हवन विधि

(1) * पवित्र करण *

इस मन्त्र से हाथ में जल लेकर मस्तक तथा शिर पर छिड़कें।

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा

यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।।

(2) * आचमनम् *

निम्नलिखित मन्त्रों से तीन बार आचमन करें

अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।।1।।

अमृतापिधानमसि स्वाहा ।।2।।

सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा ।।3।।

(3) * शिखा बन्धन *

निम्न मन्त्र पढ़कर शिखा में गांठ लगावें

चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते

तिष्ठ देवि शिखा मध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे ।।

(4) * प्राणायाम मन्त्र *

निम्न मंत्र पढ़कर कम से कम एक बार प्राणायाम करें

भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् आपोज्योतीरसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ।। स्वरोम्

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(5) * न्यासः *

तत्पश्चात् बायें हाथ की हथेली में थोड़ा सा जल लेकर दाहिने हाथ की अंगुलियों से, निम्न मन्त्रों द्वारा शरीर के अलग-अलग अंगों को स्पर्श कीजिए और साथ ही यह भावना कीजिए कि मेरे ये सब अंग-प्रत्यंग शक्तिशाली, पवित्र और महा तेजवान हो रहे हैं।

वाङ्म आस्येऽस्तु से मुख को

नसोर्मेप्राणोऽस्तु से नासिका के दोनों छिद्रों को

अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु से दोनों नेत्रों को

कर्णयोर्मे चक्षुरस्तु से दोनों कानों को

वाह्वोर्मे बलमस्तु से दोनों बाहों को

ऊर्वोर्मेऽओजोस्तु से दोनों जंघाओं को

अरिष्टानिमेऽङ्गानि मनूस्तन्वा में सह सन्तु

से सब शरीर पर जल छिड़कें

(6) * पृथ्वी पूजन *

निम्न मन्त्र पढ़कर पृथ्वी पर जल, अक्षत, पुष्प छोड़ें

पृथ्वि ? त्वया धृता लोका देवि ! त्वं विष्णुना धृता

त्वं धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ।।

(7) * कलश पूजनम् *

निम्न मन्त्र पढ़ते हुए रोली, अक्षत, चन्दन, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि से कलश का पूजन करना चाहिए।

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः

मूले तत्रस्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृता ।।1।।

कुक्षौ तु सागरासर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा

ऋग्वेदोथ यजुर्वेदो सामवेदोह्थर्वणः ।।2।।

अंगैश्च सहिता सर्वे कलशन्तु समाश्रितः

अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टि करी सदा ।।3।।

त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः

शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं प्रजापतिः ।।4।।

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः पैतृकाः

त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफलप्रदाः ।।5।।

त्वत्प्रसादादिमां यज्ञं कर्तुमीहे जलोद्भवः

सान्निध्यं कुरुमे देव ! प्रसन्नो भव सर्वदा ।।6।।

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(8) * देव पूजनम् *

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुरेव महेश्वरः

गुरुरेव परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवेनमः ।।1।।

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवेनमः ।।2।।

आयातु वरदे देवि अक्षरे ब्रह्मवादिनी

गायत्रिच्छन्दसां माता ब्रह्मयोनिर्नमोस्तुते ।।3।।

अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थ पूजितो यः सुरासुरैः

सर्वविघ्नहरस्तस्मैगणाधिपतये नमः ।।4।।

सर्वमंगलमांगल्ये शिवेसर्वार्थसाधिके

शरण्ये त्र्यंबिके गौरि नारायणि नमोस्तुते ।।5।।

शुक्लाम्बरधरंदेवं शशिवर्ण चतुर्भुजम्

प्रसन्नवदनंध्यायेत्सर्व विघ्नोपशान्तये ।।6।।

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममगंलम्

येषां हृदिस्थोभगवान्मंगलायतनो हरिः ।।7।।

विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्माविष्णुमहेश्वरान्

सरस्वतीं प्रणम्यादौ शान्तिकार्यार्थसिद्धये ।।8।।

मंगलं भगवान् विष्णुमंगलं गरुणाध्वजः

मंगलं पुण्डरीकाक्षोमंगलायतनो हरिः ।।9।।

त्वं वैं चतुर्मुखो ब्रह्मा सत्यलोकपितामह

आगच्छ मण्डले चास्मिन्मम सर्वार्थसिद्धये ।।10।।

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम् ।।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ।।11।।

वन्दे देवमुमापतिं सुरगुरुं वन्दे जगत्कारणम्

वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनाम्पतिम् ।।

वन्दे सूर्यशशंकवह्विनयनम् वन्दे मुकुन्दप्रियम्

वन्दे भक्त जनाश्रयं वरदं वन्दे शिवं शंकरम् ।।12।।

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टि वर्धनम्

उर्वारुकमि बन्धानान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ।।13।।

दुर्ग ! स्मृता हरसि भीतिमशेष जन्तोः

स्वस्थैःस्मृता मतिमतीव शुभां ददासि

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या

सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ।।14।।

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीम्

वीणापुस्तकधारिणीममयदां जाड्यान्धकारापहाम् ।।

हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् 25

आर्द्रा पुष्करिणीं पुष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्

सूर्यांहिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो आवह ।।16।।

कालिकां तु कलातीतां कल्याणहृदयां शिवाम्

कल्याणजननीं नित्यं कल्याणीं पूजयाम्यहम् ।।17।।

विष्णुपादाब्जसम्भूते गंगे त्रिपथगामिनि

धर्मद्रवेति विख्याते पापं में हर जाह्नवि ।।18।।

पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितसस्तथा

आगच्छन्तु पवित्राणि पूजाकाले सदामम ।।19।।

ब्रह्मामुरारीस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च

गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वेग्रहाः शांतिकरा भवन्तु ।।।20

गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजयाजया

देवसेना स्वधा स्वाहा मातरोलोक मातरः ।।21।।

हृष्टिः पुष्टिस्तथा तुष्टिरात्मनः कुलदेवताः

गणेशेनाधिकाह्येता वृद्धौ पूज्याश्चषोडश ।।22।।

कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मधा सिद्धिः प्रज्ञासरस्वती

मांगल्येषु प्रपूज्याश्च सप्तैता दिव्यमातरः ।।23।।

नागपृष्ठसमारूढ़ं शूलहस्तं महाबलम्

पातालनायकं देवं वास्तुदेवं नमाम्यहम् ।।24।।

क्षेत्रपालान्नमस्यामि सर्वारिष्टनिवारकान्

अस्य यागस्यसिध्यर्थं पूजयाराधितान् मया ।।25।।

सिद्धि बुद्धि सहित श्रीमन्महागणाधिपतयेनमः

लक्ष्मी नारायणाभ्यान्नमः

उमामहेश्वराभ्यान्नमः

वाणीहिरण्यगर्भाभ्यान्नमः

शचीपुरन्दराभ्यान्नमः

मातापितृचरणकमलेभ्यो नमः

कुलदेवताभ्यो नमः

इष्टदेवताभ्यो नमः

ग्रामदेवताभ्यो नमः

स्थानदेवताभ्यो नमः

वास्तुदेवताभ्यो नमः

सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः

सर्वेभ्यो प्राणेभ्यो नमः

सर्वेभ्यो तीर्थेभ्यो नमः

एतत्कर्मप्रधान श्री गायत्री देव्यै नमः

पुण्यैपुण्याहं दीर्घमायुरस्तु

(9) * षोडषोपचार पूजन *

सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः आवाहयामि स्थापयामि ।।1।।

आसनं समर्पयामि ।।2।।

पाद्यं समर्पयामि ।।3।।

अर्घ्यं समर्पयामि ।।4।।

आचमनम् समर्पयामि ।।5।।

स्नानम् समर्पयामि ।।6।।

वस्त्रम् समर्पयामि ।।7।।

यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।।8।।

गन्धम् समर्पयामि ।।9।।

पुष्पाणि समर्पयामि ।।10।।

धूपम् समर्पयामि ।।11।।

दौपम् समर्पयामि ।।12।।

नैवेद्यं समर्पयामि ।।13।।

अक्षतान् समर्पयामि ।।14।।

ताम्बूलपुंगीफलानि समर्पयामि ।।15।।

दक्षिणां समर्पयामि ।।16।।

सर्वाभावे अक्षतान् समर्पयामि ।।17।।

ततो नमस्कारं, करोमि

नमः सर्व हितार्थाय जगदाधार हेतवे

साष्टांगोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मयाकृतः ।।

नमोस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षि शिरोरुवाहवे

सहस्र नाम्नेपुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटि युगधारिणेनमः ।।

चन्दनस्य मह त्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम्

आपदा हरते नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा ।।

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(10) * स्वस्ति वाचनम् *

हाथ में जल, पुष्प, अक्षत लेकर स्वस्ति वाचन बोला जाय। यह शुभ कार्यों की सफलता, शान्ति, सार्थकता एवं मंगलमय पूर्ति के समय कल्याण कारक मन्त्र है।

गणानांत्वा गणपति हवामहे प्रियाणांत्वा प्रियपति हवामहे निधीनांत्वा निधिपति हवामहे वसोमम आहमजानिगर्भधमात्वमजासिगर्भधम् ।।1।।

स्वस्तिनऽइन्द्रोवृद्धश्रवाः स्वस्तिनः पूषा विश्ववेदाः स्वस्तिनस्ताक्र्ष्योऽअतरिष्ट नेमिः स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु ।।2।।

पयः पृथिव्यां पयऽओषधीषु पयोदिव्यन्तरिक्षे पयोधाः पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ।।3।।

विष्णोः राटमसि विष्णोः श्नप्त्रेस्थोः विष्णोः स्पूरसि विष्णोर्ध्रुंवोऽसि वैष्णवमसि विष्णवेत्वा ।।4।।

अग्निर्देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रा देवताऽदित्या देवता मरूतो देवता विश्वदेवा देवता वृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता ।।5।।

द्यौः शान्ति अन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्ति वनस्पतयः शान्तिविश्वेदेवाः शान्तिर्व्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि ।।6।।

विश्वानिदेव सवितर्दुरितानि परासुव यद्भद्रं तन्न आसुव ।।7।।

शान्ति ! शान्ति !! शान्ति !!!

सर्वारिष्ट शान्तिर्भवतु ।।




रक्षा विधानम् - संक्षिप्त हवन विधि

                                                                                  रक्षा विधानम्

आत्म रक्षा तथा यज्ञ कार्य की रक्षा के लिये रक्षा विधान कहलाता है। यज्ञ कार्य में आसुरी शक्तियां अक्सर विघ्न फैलाती रहती हैं। पूर्व कार्य में आसुरी शक्तियां अक्सर विघ्न फैलाती रहती हैं। पूर्व काल में भी राक्षस लोग यज्ञ विध्वंस के लिए प्रयत्न करते थे। शुभ कार्यों में बहुधा कोई कोई विघ्न आते रहते हैं। उनसे रक्षा करने के लिए रक्षा विधान किया जाता है। जल, सरसों या चावल का निम्न मन्त्रों से दसों दिशाओं में फेंके।

पूर्वे रक्षतु वाराहः अग्नेय्यां गरुड़ध्वजः

दक्षिणे पद्मनामस्तु नैऋर्त्या मधुसूदनः ।।1।।

पश्चिमे चैव गोविन्दो वायव्यां तु जनार्दनः

उत्तरे श्रीपति रक्षेदैशान्यां हि महेश्वरः ।।2।।

ऊर्ध्व रक्षतु धाता वो ह्यधोऽनन्तश्च रक्षतु

अनुक्तमपि यत् स्थानं रक्षत्वीशो ममाद्रिधृक् ।।3।।

अप सर्पन्तु ये भूता ये भूताभुवि संस्थिताः

ये भूता विघ्न कर्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ।।4।।

अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतोदिशम्

सर्वेषामविरोधेन यज्ञकर्म समारभे ।।5।।

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(12) * अग्नि स्थापनम् *

तत्पश्चात् किसी पात्र या चमची में अग्नि रखकर या कपूर जलाकर नीचे लिखे हुए मन्त्र का उच्चारण करते हुए श्रद्धा और भक्ति के साथ हवन कुण्ड में अग्नि स्थापन करे

यजु. 35

भूर्भुवः स्वर्द्यौरिव भूम्ना पृथिवीवव्वरिम्णा

तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाद्यायदधे

अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवापमुहब्रुबे देवोंऽआसादयादिह ।। अग्नये नमः ।। अग्निं आबाहयामि स्थापयामि इहागच्छ इह तिष्ठ इत्यावाह्य पञ्चोपचारैः पूजयेत् ।।

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(13) * गायत्री स्तवन *

यन्मण्डलं दीप्तिकरं विशालं,

रत्न प्रभभ् तीव्रमनादि रूपम्

दारिद्र्य दुःखक्षय कारणांच,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।1।।

यन्मण्डलं देवगणैः सुपूजितम्,

विप्रैऽस्तुतं मानवमुक्ति कोविदम्

तं देवदेवं प्रणामामि भर्ग,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।2।।

यन्मण्डलं ज्ञान घनत्व गम्यं,

त्रैलोक्य पूज्यं त्रिगुणात्मरूपं

समस्त तेजोमय दिव्य रूपं,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।3।।

यन्मण्डलं गूढ़यति प्रबोधम्,

धर्मस्य वृद्धिं कुरुते जनानाम्

यत् वसर्व पापक्षय कारणं ,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।4।।

यन्मण्डलं व्याधि विनाशदक्षम,

यद्रग् यजुः सामसु सम्प्रगीतम्

प्रकाशितं ये भूर्भुवः स्वः,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।5।।

यन्मण्डलं वेद विदो वदन्ति,

गायन्ति यच्चारण सिद्ध संघाः

यद्योगिनो योगजुषां संघाः,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।6।।

यन्मंडलं सर्व जनेषु पूजितम्,

ज्योतिश्च कुर्यादिह मर्त्यलोके

यत्काल कालादिमनादि रूपम्,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।7।।

यन्मंडलं विष्णु चतुर्मुखास्यम्,

यदक्षरं पाप हरं जनानाम्

यत्काल कल्पक्षय कारणं ,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।8।।

यन्मंडलं विश्वसृजां प्रसिद्धम्,

उत्पतिरक्षा प्रलय प्रगल्भम्

यस्मिन् जगत् संहरतेऽखिलञ्च,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।9।।

यन्मंडलं सर्व गतस्य विष्णोः,

आत्मा परं धाम विशुद्ध तत्वम्

सूक्ष्मा तरैर्योगपथानुगम्यम्,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।10।।

यन्मंडलं ब्रह्म विदो वदन्ति,

गायन्ति यच्चारण सिद्धसंघाः

यन्मंडलं वेदविदः स्मरन्ति,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।11।।

यन्मंडलं वेद विदोपगीतम्,

यद्योगिनां योग पथानुगम्यम्

तत्सर्ववेदं प्रणमामि दिव्यं,

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ।।12।।

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(14) * अग्नि प्रदीपनम् *

तत्पश्चात् अग्नि पर छोटे छोटे काष्ठ और कपूर धर कर निम्न मन्त्र पढ़कर व्यंजन (पंखा) से अग्नि को प्रदीप्त करें

उद्बुध्यस्बाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टा पर्तेस सृजेथामयं अस्मिन्त्सधस्थे अघ्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत ।।

(यजु. 1554)

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(15) * समिधा धानम् *

तत्पश्चात् निम्न चार मन्त्रों से आठ आठ अंगुल की पलाशादि की चार समिधाएं प्रत्येक मन्त्र के उच्चारण के बाद क्रम से घी में डुबो कर डालें

(1) अयं इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसे नान्नाद्येन समेध यस्बाहा ।। इदमग्नये जातवेदसे इदं मम ।।

(2) समिधग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयता तिथिम् अस्मिन् हव्या जुहोतन स्वाहा ।। इदमग्नये इदं मम ।।

(3) सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन अग्नये जातवेदसे स्वाहा ।। इदमग्नये जातवेदसे इदं मम ।।

(4) तंत्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धंयामसि बृहच्छोचा यविष्ठ्या स्वाहा ।। इमग्नयेऽङ्गसे इदं मम ।।

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(15) * जलप्रसेचनम् *

तत्पश्चात् अञ्जलि (आचमनी) में जल लेकर यज्ञ कुण्ड (वेदा) के पूर्व दिशा आदि चारों ओर छिड़कावें। इसके मन्त्र ये हैं

अदितेऽनुमन्यस्व ।। इात पूर्वे

अनुमतेऽनुमन्यस्व ।। इति पश्चिमे

सरस्वत्यनुमन्यस्व इति उत्तरे

देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपतिं भगाय दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु ।। इस मंत्र से यज्ञकुंड (वेदी) के चारों ओर जल छिड़कावें।

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(17) * आज्याहुति होमः *

बड़े हवनों में सभी आवाहित एवं प्रतिष्ठापित देवताओं के लिये आहुतियां दी जाती हैं। छोटे हवनों में सात आहुतियां केवल घृत की देते हैं और स्रुवा से बचा हुआ घृत इदन्नमम उच्चारण के साथ प्रणीता में हर आहुति के बाद टपकाते जाते हैं। यही टपकाया हुआ घृत अंत में अवघ्राण के काम आता है।

1 पजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये इदं मम

2 इन्द्राय स्वाहा इदमिद्राय इदं मम

3 अग्नये स्वाहा इदमग्नये इदं मम

4 सोमाय स्वाहा इदं सोमाय इदं मम

5 भूः स्वाहा इदमग्नये इदं मम

6 स्वः स्वाहा इदं सूर्यांय इदं मम

इसके पश्चात् गायत्री मंत्र से जितनी आहुतियां देनी हों सो देनी चाहिये। मंत्र

भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् स्वाहा। इदंगायत्र्यै इदं मम।

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(18) * स्विष्टकृत् होमः *

प्रत्येक कर्म ठीक ठीक रीति से ही करना चाहिये, तभी फलदायक होता है। पर मनुष्य से त्रुटि या अशुद्धि हो जाना स्वाभाविक है। अतः यह आहुति उस त्रुटि वा अशुद्धि की पूर्ति के प्रायष्चित रूप से है। निर्धारित संख्या में गायत्री मंत्र से आहुतियां देने के पश्चात् मिष्ठान्न, खीर, हलुआ, आदि पदार्थों से आहुति देनी चाहिये

यदस्य कर्मणो त्यरीरिचं यद्वान्यनमिहाकरम् अग्निष्टत् स्विष्टकृद्विद्यात्सर्वं स्विष्टं सुहुतं करोतु मे अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनां कामानां समर्धयित्रे सर्वान्नः कामान् समर्धय स्वाहा इदमग्नये स्विष्टकृते इदन्नमम ।।

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(19) * पूर्णाहुति *

स्रुचि में सुपाड़ी या नारियल घृत समेत रख कर पूर्णाहुति दे।

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

पूर्णादर्विपरापत सुपूर्णा पुनरापत

वस्नेव विक्रीणा वहाऽइषमूर्ज शतक्रतो स्वाहा ।।

सर्वं वै पूर्ण स्वाहा

वसोधारा मन्त्र

वसो पवित्र मसि शतधारं वसो पवित्रमसि सहस्र धारम् देवस्त्वा सविता पुनातु वसो पवित्रेण शत धारेण सुप्वा कामधुक्षः स्वाहा ।।




आरती - संक्षिप्त हवन विधि

तत्पश्चात् निम्न मन्त्रों को पढ़ते हुए आरती उतारें

यं ब्रह्म वेदान्त विदो वदन्ति,

परम प्रधानं पुरुषस्तथान्ये

विश्वोद्गते कारणमीश्वरंवा,

तस्मैं नमो विघ्नविनाशनाय ।।

यं ब्रह्मावरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैः

वेदैः सांङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गावन्ति यं सामगाः ।।

ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो

यस्यान्तं विदुः सुरासुरगणाः देवाय तस्मै नमः

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(21) * घृत अवघ्राण *

प्रणीता में इदन्नमम के साथ टपकाये हुए घृत को हथेलियों पर लगाकर अग्नि पर सेके और उसे सूंघे तथा मुख, नेत्र, कर्ण आदि पर लगावे। मंत्र

तनूषा अग्नेसि तन्व में पाहि

आयुर्दा अग्नेऽस्यायुर्मे देहि

बर्चोदा अग्नेसि वर्चो मे देहि

अग्ने यन्मे तन्वा उनन्तन्म आपृण

मेधां मे देवः सविता आदधातु

मेधां मेदेवी सरस्वती आदधातु

मेधां अश्विनौ देवा वाधतां पुष्कर स्रजौ

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(22) * भस्म धारण *

स्रुव से यज्ञ भस्म लेकर अनामिका उंगली से निम्न मन्त्रों द्वारा ललाट, ग्रीवा, दक्षिण वाहु मल तथा हृदय पर लगावे।

त्र्यायुषं जमदग्नेरिति ललाटे

कश्यपश्य त्रायुषमिति ग्रीवायाम्

यद्देवेषु त्र्यायुषमिति दक्षिण बाहु मूले

तन्नोअस्तु त्र्यायुषमिति हृदि

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(23) * क्षमा प्रार्थना *

आबाहनं जानामि नैव जानामि पूजनम्

विसर्जनं जानामि क्षमस्व परमेश्वर ।।1।।

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर

यत्पूजितं मयादेव परिपूर्ण तदस्तुमे ।।2।।

यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं यद्भवेत्

तत्सव क्षम्यतो देव प्रसीद परमेश्वर ।।3।।

यस्य स्मृत्या नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु

न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्योवन्दे तमच्युतम् ।।4।।

प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषुयत्

स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णः स्यादिति श्रुतिः ।।5।।

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(24) * साष्टाङ्ग नमस्कार *

तत्पश्चात् यज्ञ भगवान् के प्रति घुटनों के बल झुककर सांष्टांग प्रणाम करें तथा निम्न मन्त्र बोले

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुवाहवे

सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटियुगधारिणे नमः ।।

नमो ब्रह्मणयदेवाय गौब्राह्मणहिताय

जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम्

देवकी परमानन्दं कृष्णं बन्दे जगद्गुरुम् ।।

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(25) * शुभ कामना *

तत्पश्चात् समस्त प्राणियों के कल्याणार्थ यज्ञ भगवान् से हाथ जोड़ कर शुभ कामना करे

स्वस्ति प्रजाभ्य परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः

गोब्राह्मणेभ्यो शुभमस्तु नित्यं, लोकासमता सुखिनोभवन्तु

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखमाप्नुयात् ।।2।।

अपुत्राः पुत्रिणः सन्तु पुत्रिणः सन्तु पौत्रिणः

निर्धनाः सधनाः सन्तु जीवन्तु शरदां शतम् ।।3।।

श्रद्धां मेधा यशः प्रज्ञां विद्यां पुष्टि श्रियं बलम्

तेज आयुष्यमारोग्यं देहि मे हव्यवाहन ।।4।।

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(26) * अभिसिंचनम् *

अभिषेक के समय सपरिवार यजमान के ऊपर आचार्य निम्न मन्त्र से (रुद्र कशल के जल में पंचपल्लव अथवा पुष्प द्वारा अभिषेक) (जल सिंचन) करें छिड़कें

द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्ति रापः शान्तिरोषधयः शान्ति वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि ।।

शान्तिः शान्तिः शान्तिः सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु ।।

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(27) * प्रदक्षिणा *

यज्ञ के अन्त में सब लोग खड़े होकर दायें हाथ से बांये हाथ की ओर यज्ञ की चार परिक्रमा करें।

यानि कानि पापानि ज्ञाताज्ञातकृतानि

तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिणायां पदे-पदे ।।

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(28) * विसर्जन *

गच्छ त्वं भगवन्नग्ने स्वस्थाने कुंड मध्यतः

हुतमादाय देवेभ्यः शीघ्रं देहि प्रसीद मे ।।1।।

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर

यत्र ब्राह्मइयो देवास्तत्र अच्छ हुताशनः ।।2।।

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजा मादाय मामकीम्

इष्ट काम समृद्धयर्थं पुनराममनायच ।।3।।

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(29) * आरती गायत्री जी की *

जयति जय गायत्री माता जयति जय गायत्री माता ।।

आदि शक्ति तुम अलख निरंजन जग-पालन कर्त्री

दुःख शोक, भय, क्लेश, कलह, दारिद्रय दैनय हर्त्री ।।

ब्रह्म रूपिणी, प्रणति पालिनी, जगद्धातृ अम्बे

भव भय हारी, जन हितकारी, सुखदा जगदम्बे ।।

भय हारिणी, भव तारिणि अनघे, अज आनन्द राशी

अविकारी, अघहारी, अविचलित, अमले अविनाशी ।।

कामधेनु सत चित्त अनन्दा जय गंगा गीता

सविता की शाश्वती शक्ति तुम सावित्री सीता

ऋग्, यजु, साम अथर्व प्रणविनी प्रणव महा महिमे

कुण्डलिनी सहस्रार सुषुम्ना शोभा गुण गरिमे ।।

स्वाहा, सुधा, शची ब्रह्माणी राधा, रुद्राणी

जय सतरूपा वाणी विद्या कमला कल्याणी ।।

जननी हम हैं दीन हीन दुःख दारिद के घेरे

यद्यपि कुटिल कपटी कपूत तऊ बालक हैं तेरे ।।

स्नेह सनी करुणामय माता चरण-शरण दीजै

विलख रहे हैं हम शिशु सुत तेरे दया दृष्टि कीजै

काम, क्रोध, मद, लोभ, दम्भ, दुर्भाव, द्वेष हरिये

शुद्ध-बुद्धि, निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये ।।

तुम समर्थ सब भांति तारिणी तुष्टि, पुष्टि त्राता ।।

सत मारग पर हमें चलाओ, जो है सुख दाता ।।

जयति जय गायत्री माता जयति जय गायत्री माता ।।

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(30) ।। यज्ञ की महिमा ।।

यज्ञ रूप प्रभो हमारे भाव उज्ज्वल कीजिए

छोड़ देवें छल कपट को, मानसिक बल दीजिए ।।

वेद की बोलें ऋचाएं, सत्य को धारण करें

हर्ष में हों मग्न सारे, शोक सागर से तरें ।।

अश्वमेधादिक रचाएं, यज्ञ पर उपकार को

धर्म मर्यादा चलाकर, लाभ दें संसार को ।।

नित्य श्रद्धा-भक्ति से यज्ञादि हम करते रहें

रोग पीड़ित विश्व के, सन्ताप सब हरते रहें ।।

कामना मिट जायं मन से, पाप अत्याचार की

भावनाएं पूर्ण होंवे, यज्ञ से नर-नारि की ।।

लाभकारी हों हवन, हर जीव-धारी के लिए

वायु जल सर्वत्र हों, शुभ गन्ध को धारण किए ।।

स्वार्थ भाव मिटे हमारा, प्रेम पथ विस्तार हो

‘‘इदं मम’’ को सार्थक, प्रत्येक में व्यवहार हो ।।

हाथ जोड़ झुकाए मस्तक, वन्दना हम कर रहे

नाथ करुणा रूप वरुणा, आपकी सब पर रहे ।।

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(31) ।। अर्घ्यदान ।।

पुरश्चरण से बचे हुये जल को सूर्य के सामने अर्घ्य देना चाहिये। नीचे लिखे हुये मन्त्र से सूर्य को अर्घ्य दे

सूर्य देव सहस्रांशो तेजो राशे जगत्पते

अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्ध्य दिवाकर

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*समाप्त*