उपासना का आधार और प्रभाव - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

कहा जा चुका है कि उपासना का अर्थ है- समीपता । ईश्वर और जीव में यों समीपता ही है । जब भगवान कण- कण में संव्याप्त हैं, तब मानवी काया एवं चेतना में भी वे समाये हुए क्यों नहीं होंगे। जो अपने में ओत- प्रोत ही हैं, वह दूर कैसे ? और जो दूर नहीं हैं उसकी समीपता का क्या अर्थ ? इस असमंजस की विवेचना इस प्रकार होती है कि यह समीपता उथली है, गहरी नहीं ।माना हक शरीर में हलचलों के रूप में और मन में चिन्तन के रूप में विश्व व्यापी चेतना ही काम कर रही है तो भी स्पष्ट है कि जीव की आस्थायें एवं आकांक्षायें अदृश्य सत्ता के अनुरूप नहीं हैं, मनुष्यता की सार्थकता तभी है, जब उसका स्वरूप एवं स्तर भी उसी के अनुरूप ऊँचा उठ सके । निम्न योनियों के जीवधारी पेट और प्रजनन के लिये जीते हैं । स्वार्थ- सिद्धि ही उनकी नीति होती है । शरीरगत लाभ ही उनके प्रेरणा- स्रोत होते हैं। दूसरों के साथ वे आत्मभाव बहुत थोड़ी मात्रा में मिला पाते हैं ओर परमार्थ परायणता के अंश नगण्य जितने देखे जाते हैं । यदि यही अंतःस्थिति मनुष्य की बनी रहे तो समझना चाहिए कि कायिक विकास ही हुआ- चेतनात्मक नहीं । आये की दृष्टि से प्रौढ़ हो जाने पर भी यदि सारा आचार- व्यवहार बच्चे जैसा ही बना रहे तो उस अविकसित स्थिति पर चिन्ता व्यक्त की जायेगी । ठीक वही स्थिति उन मनुष्यों की है, जो शरीर से तो सुरदुर्लभ काया में प्रवेश पा गये, पर उन्होंने अपने दृष्टिकोण में, क्रिया- कलाप में वही पिछड़ा हुआ क्रिया- कलाप संजोये रखा ।

इस दयनीय स्थिति से पीछा छुड़ाने के लिए ईश्वर की समीपता का, उपासना का , उपक्रम बनाना पड़ता है । संगति का , समीपता का प्रभाव सर्वविदित है । चन्दन के समीप उगे हुए झाड़- झंखाड़ सुगन्धित हो जाते हैं, कोयले की ओर गन्धी की दुकान पर बैठने वाले कालोंच का धब्बा और सुगन्ध का छींटा साथ लेकर जाते हैं । दुष्टों की समीपता से दुर्गति और सज्जनों के सान्निध्य से सद्गुणों की वृद्धि और प्रगति की संभावना का साकार होना सर्वविदित है । ईश्वर उत्कृष्टताओं का भाण्डागार है । उसकी समीपता, उपासना से वैसी ही विशेषताओं का बढ़ना स्वाभाविक है । कीट भृंग का उदाहरण प्रसिद्ध है । टिड्डे हरी घास में रहते हैं तो उनका शरीर हरा रहत है और जब वे सूखी घास में रहने लगते हैं तो पीले पड़ जाते हैं । तितलियाँ फूलों के अनुरूप अपने रंग बदलती रहती हैं । समीपता के अनुरूप ढलने के उदाहरण सर्वत्र पाये जाते हैं । वातावरण की प्रभाव शक्ति को कौन नहीं जानता । व्यक्तित्वों का भला- बुरा निर्माण करने में वातावरण की असाधारण भूमिका रहती है ।

उपासना का क्रिया- कृत्य और बहिरंग स्तर पर ऐसा ' माहोल ' बनाना चाहिए , जिससे व्यक्ति के भावनात्मक स्तर में उत्कृष्टता की अभिवृद्धि होती हो । बहिरंग वातावरण बनाने में पूजा- उपासना में प्रयुक्त होने वाली प्रतीक- प्रतिमा, उसका सज्जा- श्रृगार, पूजा में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ, उपकरण आदि का मिला- जुला स्वरूप अपना काम करता है । पूजा- वेदी के समीप बैठने पर ऐसा लगना चाहिए मानों किन्हीं असाधारण दिव्य परिस्थितियों में जा पहुँचे । मन्दिर, देवालय , पूजा- गृह, देवीपीठ, आराधना- कक्ष को बनने में उपयुक्त वातावरण बनाने का तथ्य ही प्रधान रूप से काम करता है । वहाँ के सुसज्जा साधन संजोने में इसी बात का ध्यान रखा जाता है कि उस स्थान में जाते ही मन अपने आपको पवित्रता की दिव्य परिस्थितियों से घिरा हुआ अनुभव करने लगे । सामान्य वातावरण भिन्न रखा जाता है और वहाँ परिस्थितियाँ ऐसी बनाई जाती हैं, जिनमें बैठने पर उत्कृष्टता की अनुभूति बढ़ने में सुविधा मिल सके ।

उपासना का दूसरा आधार कर्मकाण्डों का क्रिया- कृत्य और तीसरा आधार भावना के क्षेत्र में दिव्य उभार उत्पन्न करना होता है । यह दोनों ही आधार अपने आप में अति महत्त्वपूर्ण हैं । उनसे चेतना को बदलने एवं ढालने में असाधारण सहायता मिलती हैं ।

कर्मकाण्ड वे कृत्य हैं, जो शरीर के विभिन्न अवयवों की सहायता से उपचार- उपकरणों के द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं। षोडशोपचार, देव- पूजन, आत्मशोधन के विभिन्न क्रिया- कृत्य इसी श्रेणी में आते हैं । मन पर छाप डालने में विचार और कर्म का समन्वय करना पड़ता है । चित्त पर स्थिर संस्कार डालने के लिए अभीष्ट विचारों के साथ- साथ उनके पूरक कृत्य होने ही चाहिए अन्यथा कल्पना केवल कल्पना बनकर हव में उड़ जाती है । विचारणा क साथ क्रिया का समन्वय न कर सकने पर भी जो लोग सफलताएँ चाहते हैं , उन्हें शेखचिल्ली कहकर उपहासास्पद किया जाता है। हर क्षेत्र में विचार और कर्म का समन्वय ही प्रतिफल उत्पन्न करता है । उपासना में ईश्वरीय सान्निध्य की कल्पना ही नहीं, अनुभूति भी अपेक्षित होती है । भावनिष्ठा को क्रियान्वित होते देखकर ही ऐसी मनःस्थिति बनती है । इसलिए चह सोचना होता है कि परमेश्वर प्रत्यक्ष ही, सचमुच ही, सामने विराजमान है और उनकी किसी जीवित व्यक्ति के उपस्थित होने पर की जाने जैसी अभ्यर्थना की जा रही है । आत्मशोधन और देवपूजन दोनों ही कृत्यों में इसी प्रकार का भाव- समन्वय होता है । वह यदि बेगार भुगतने क उथले मन से किया गया है और जैसे- तैसे परम्परागत लकीर पीटी गई हो तो वह बात दूसरी है अन्यथा जिस प्रयोजन के लिए यह प्रचलन हुआ है उसे ध्यान में रखकर चला जाये तो अंतःक्षेत्र में अभीष्ट निष्ठा और लगेगा कि निराकार परमेश्वर अपेक्षाकृत अधिक सघन, अधिक साकार बनकर सामने आया है।

उपासना का तीसरा प्रयोजन है- मनःक्षेत्र पर ईश्वरीय सान्निध्य का चिन्तन घटाटोप की तरह छाये रहना । सामान्य जीवन में आत्म- सत्ता शरीर रूप में ही काम करती है , अस्तु। अपना आपा शरीर मात्र ही अनुभव होने लगता है । शरीर से सम्बन्धित समस्याओं का विस्तार अत्यधिक है । उनके खट्टे- मीठे स्वाद भी चित्र- विचित्र हैं और वे सभी बड़े आकर्षक हैं । यों प्रिय- अप्रिय स्तर पर परस्पर विरोधी अनुभूतियाँ सामने आती हैं, पर वे दोनों ही अपने -अपने ढंग के गहरे प्रभाव चेतना पर छोड़ती हैं । सफलताएँ अपने ढंग का प्रभाव डालती हैं ,असफलता दूसरे ढंग का । लाभ में एक प्रकार का अनुभव होता है, हानि में दूसरे तरह का। एक स्थिति प्रिय लगती हैं , दूसरी अप्रिय । इतना होते हुए दोनों की गहरी छाप पड़ती है। सफलता का हर्षोन्माद और असफलता का शोक- सन्ताप दोनों ही अपने प्रभाव छोड़ते और चेतना को आवेशग्रस्त बनाते हैं । ज्वार- भाटे जैसे यह आवेश- अवसाद सामयिक अनुभूति बनकर ही समाप्त नहीं हो जाते, वरन् पीछे भी बहुत समय तक उनकी उत्तेजित प्रतिक्रिया बनी रहती है । ऐसे क्षण बहुत कम ही आते हैं, जिनमें चित्त शान्त- सन्तुलित रहता हो आत्म सत्ता के साथ जुड़ी हुई समस्याओं के हल करने की बात सूझ पड़ती हो । यही कारण है कि हम भौतिक आवश्यकता और समस्याओं को ही सब कुछ मान लेते हैं और उन्हीं के जाल- जंजाल में उलझे, जकड़े पड़े रहते हैं। आत्मिक जीवन का स्वरूप भी सामने नहीं आ पाता फिर उनका समाधान सूझे तो कैसे ? स्पष्ट है कि आत्मिक समस्याओं का समाधान हुए बिना न तो भौतिक जीवन का रस पिया जा सकता है और न जीवन- लक्ष्य पूरा करने की बात बनती है ।

आवश्यक है कि कुछ समय हमारे पास ऐसा हो, जिसमें भौतिक जीवन को एक प्रकार से पूरी तरह ही भुला दिया जाये और उन क्षणों में केवल आत्मा का स्वरूप, जीवन- लक्ष्य एवं परमात्म सान्निध्य के अतिरिक्त और कुछ सूझ ही न पड़े। यही उपासना काल है । यह सही हुई या गलत, इसकी पहचान इतनी ही है कि उन क्षणों में मनःक्षेत्र पर आत्मिक स्तर का चिन्तन छाया रहा या भौतिक स्तर का। यदि सांसारिक मनोकामनाओं की उथल- पुथल मची हुई है और इष्टदेव से तरह- तरह के भौतिक वरदान पाने की ललक उठ रही हो तो समझना चाहिए कि यह उपासना- कृत्य भी विशुद्ध रूप से भौतिक है । इससे आत्मिक प्रगति जैसा कोई लाभ मिल नहीं सकेगा। यदि उतने समय शरीर रहित, भौतिक प्रभावों से मुक्त, ज्योतिर्मय आत्मा ही ध्यान में है और उसमें महाज्योति के साथ समन्वित हो जाने की दीप- पतंग जैसी आकांक्षा उठ रही है, तो समझना चाहिए कि उपासना का सच्चा अपना लिया गया और अभीष्ट उद्देश्य पूरा हो सकने की सम्भावना बन रही है ।

उपासना क समय सांसारिक विचार न आयें इसका एक ही उपाय है कि उन क्षणों के लिए एक निर्धारित विचार- पद्धति सामने रहे। यह भी दृश्य मुक्त- आकर्षक स्तर की ऐसी हो जो मन को अपने शिकंजे में पकड़े रहे, यों वैज्ञानिकों जैसे गहरे चिन्तन से भी हो सकता है, पर वैसे बहुत समय क अभ्यास और एकाग्र एकात्म स्तर मिल आने पर ही सम्भव है । आरम्भ में दृश्य मुक्त चिन्तन मनःक्षेत्र पर छाया रहे ऐसा अभ्यास लेकर चलना चाहिए। ‘ध्यान’ इसी को कहते हैं । उपासना में ध्यान अनिवार्य है । यदि उसे छोड़ कर मात्र क्रिया- कृत्य ही किये जा रहे होंगे तो मन इधर- उधर भागता रहेगा और अधूरा शरीर- कर्म ही पूजा- पाठ के नाम पर अपनी लंगड़ी- लूली गाड़ी घसीट रहा होगा ।

ध्यान साकार और निराकार दो प्रकार के कहे गये हैं । एक में भगवान की मनुष्याकृति को मान कर चला जाता है ,, दूसरे में प्रकाश पुञ्ज की आस्था जमाई जाती है। तात्त्विकदृष्टि से यह दोनों ही साकार है । सूर्य जैसे बड़े और प्रकाश बिन्दु जैसे छोटे आकार का ध्यान रखना भी तो एक प्रकार का आकार ही है, अन्तर इतना ही तो हुआ कि उसकी मनुष्य जैसी आकृति नहीं है। ध्यान के लिए ईश्वर की- परम लक्ष्य की- आकृति बनना आवश्यक है। यों नादयोग, स्पर्शयोग, गन्धयोग को आकृति रहित कहा जाता है, पर ऐसा सोचना अनुपयुक्त है । नादयोग में शंख, घंटा, घड़ियाल ,वीणा आदि की ध्वनियाँ सुनी जाती हैं, पर अनचाहे ही वे वाद्य- यन्त्र कल्पना में आते रहते हैं जिनसे वे ध्वनियाँ निसृत होती हैं । इस प्रकार गन्ध ध्यान में मात्र गन्ध पर ही चिन्तन एकाग्र नहीं हो सकता । जिस पुष्प की वह गन्ध है उसकी आकृति भी अनचाहे ही सामने आती रहेगी । ध्यान में आकृति से पीछा नहीं छूट सकता। मस्तिष्क की बनावट ही ऐसी है कि वह निराकार कहलाने वाले चिन्तन को भी आकृतियाँ बना कर ही आगे चलता है। वैज्ञानिक के गहरे चिन्तन को चिन्तन को निराकार कहा जाता है, पर वस्तुतः वह भी जो सोचता है उसमें कल्पना- क्षेत्र की एक पूरी प्रयोगशाला सामने रहती है और प्रयोगात्मक हलचलें आँधी- तूफान की तरह अपना काम कर रही होती हैं। अन्तर इतना ही होता है कि वह स्थूल प्रयोगशाला के उपकरण छोड़ कर वही सारा प्रयोग कृत्य काल्पनिक प्रयोगशाला में काम कर रहा होता है । ध्यान में आकृति से पीछा छुड़ाना सम्भव नहीं हो सकता , अस्तु। किसी को साकार- निराकार क वितण्डवाद में न पड़ कर ध्यान धारणा के सहारे आत्म- चिन्तन का प्रयोजन पूरा करना चाहिए ।

ईश्वर का आकृति समेत ध्यान करना अभीष्ट हो तो उन्हें नर या नारी की सुन्दरतम प्रतिमा के रूप में इष्ट देव मानना चाहिए और उनके पीछे कोई इतिहास न जोड़ कर उत्कृष्टतम सद्गुणों की पूर्ण प्रतिमा अनुभव करना चाहिए । इसे अन्य किसी देवता से भिन्न नहीं वरन् समन्वित सत्ता मानना चाहिए । एक ही ब्रह्म को अनेक रूपों में कहा गया है । उक्ति बहुदेववाद को तो मानती है, पर उनकी पृथकता अस्वीकार करती है। शंकर, दुर्गा, हनुमान, गणेश, सूर्य, राम, कृष्ण, सरस्वती, लक्ष्मी, गायत्री, आदि की कोई भी प्रिय आकृति साकार ध्यान के लिए चुनी जा सकती है , पर यह नहीं हो सोचा जाना चाहिए कि यह अन्य किसी देव- सत्ता से भिन्न है। एक ही मनुष्य के अनेक चित्र हो सकते हैं, ठीक इसी प्रकार विश्व में एक ही संव्याप्त चेतना के अनेक नाम रूप रखे जा सकते हैं, पर किसी आकृति को दूसरी आकृतियों से भिन्न नहीं माना जा सकता। इस भिन्नता की मान्यता ने बहुदेववाद के साथ अवांछनीय विग्रह उत्पन्न किये हैं और मूल प्रयोजन को ही लड़खड़ा दिया है ।

साकार उपासना में इष्ट देव के समीप, अति समीप होने और उनके साथ लिपट जाने- उच्चस्तरीय प्रेम के आदान- प्रदान की गहरी कल्पना करनी चाहिए। इसमें भगवान और जीव के बीच माता- पुत्र, पति, सखा- सहोदर, स्वामी जैसा कोई भी सघन सम्बन्ध माना जा सकता है , इसमें आत्मीयता को अधिकाधिक घनिष्ठ बनाने में सहायता मिलती है । लोक व्यवहार में स्वजनों के बीच आदान- प्रदान उपहार और उपचार की तरह चलते हैं। मन- वचन से घनिष्ठता एवं प्रसन्नता व्यक्त की जाती है । भेंट- उपकार में कई तरह की वस्तुएँ दी जाती हैं। नवधा भक्ति में ऐसे ही आदान- प्रदान की वस्तु पूरक अथवा क्रियापरक कल्पना की गई है। वस्तुतः यहाँ प्रतीकों को माध्यम बनाकर भावनात्मक आदान- प्रदान की गहराई में जाया जाना चाहिए । भक्त और भगवान के बीच सघन आत्मीयता की अनुभूति उत्पन्न करने वाला आदान- प्रदान चलना चाहिए । भक्त अपनी अहंता को क्रिया, विचारणा, भावना एवं सम्पत्ति को भगवान के चरणों पर अर्पित करते हुए सोचता है, यह सारा वैभव उसी दिव्य सत्ता की धरोहर है । इसका उपयोग व्यक्तिगत वासना, तृष्णा के लिए- ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए किया जाता है। वह स्वयं तो मात्र खजांची- स्टोरकीपर भर है ।

ध्यान का एक मात्र उद्देश्य भगवान और भक्त के बीच एकात्म भाव की स्थापना करना है, मात्र किसी आकृति का ध्यानचित्र देखते भर रहने से काम नहीं चलता । भक्त अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को- क्रिया, विचारणा और भावना को ईश्वर- अर्पण करके उसे मात्र दिव्य प्रयोजनों मे नियोजित रखने का संकल्प सघन करता है । इसके साथ- साथ भौतिक धन- सम्पत्ति तो अर्पित हो ही जाती है । समर्पण का तात्पर्य है व्यक्तिगत- भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं की समाप्त और उनके स्थान पर ईश्वर इच्छा की , उच्च आदर्शों की अपने ऊपर नियन्त्रण करने वाली स्थापना । इसी मान्यता को अंतःकरण में यथार्थवादी निष्ठा के साथ स्थापित करने को आत्म- समर्पण कहते हैं। ध्यान के द्वारा इसी निष्ठा को परिपक्व किया जाता है ।

भक्त का समर्पण , बदले में भगवान का अनुग्रह आश्वासन । इसी के तरह- तरह के लौकिक स्वरूप चित्र कल्पित किये जा सकते हैं । साकार ध्यान में अपनी रुचि की कल्पनाएँ करते रहने की पूरी छूट है। ध्यान की एकाग्रता इसी सीमा तक है कि उसमें भक्त और भगवान के बीच होने वाले आदान- प्रदान की कल्पनाएँ ही चलनी चाहिए, भौतिक लाभ या प्रयोजन आड़े नहीं आने चाहिए । पूर्ण एकाग्रता जिन्हें शून्यावस्था, योगनिद्रा या समाधि कहते हैं, बहुत ऊँची स्थिति है। मन कहीं जाये या नहीं, एक बिन्दु पर केन्द्रित रहे, ऐसा हो सकने को ही तुरीयावस्था या समाधि कहते हैं । यह आरम्भिक साधना में लगभग असंभव ही है, उसकी बात नहीं सोची जानी चाहिए । ध्यान साधना का व्यावहारिक रूप इतना ही है कि भक्त और भगवान के बीच उच्चस्तरीय आदान- प्रदान चलना चाहिए। भक्त अपनी समस्त आकांक्षाओं और सम्पदाओं को ईश्वर के लिए समर्पित करता है और इसके बदले में वह सब कुछ पाता है जो ईश्वर स्वयं है । मनुष्य को स्पष्ट करने वाली ईश्वरीय सत्ता अपनी अनुभूति, आनन्द और उल्लास के रूप में छोड़ती है। भगवान से कुछ मिला या नहीं, इसकी परख इस रूप में की जा सकती है कि उल्लास- आदर्शवादिता के प्रति उत्कण्ठा भरा उभार अन्तःकरण में उमँगना आरम्भ हुआ या नहीं। सद्भावना अपनाने वाले को सहज ही मिलते रहने वाला आत्म - सन्तोष- आनन्द अनुभव में आता है या नहीं ।

ईश्वर दर्शन के सम्बन्ध में यह भ्रान्त धारणा निरस्त की जानी चाहिए कि सपने में या जागृति में इष्ट देव की किसी आकृति की झाँकी मिलती है, अथवा प्रकाश आदि दीखने जैसा कोई चित्र- विचित्र दृश्य दिखाई पड़ता है। यदि ऐसा किसी को होता हो तो उसे झाड़ी का भूत, रस्सी का साँप दीखने की तरह अपने संकल्पों की मानसिक प्रतिक्रिया भर समझना चाहिए । जब चेतना की कोई आकृति हो ही नहीं सकती तो फिर उसका निर्भ्रान्त दृश्य दिखाई ही कैसे दे सकता है ? इस तथ्य को हजार बार हृदयंगम कर लिया जाना चाहिए कि ईश्वर का जीवन में समावेश आदर्शवादी आकांक्षाएँ प्राणप्रिय प्रतीत होने लगने और तदनुरूप गतिविधियाँ अपनाने पर मिलने वाले आनन्द उल्लास की अनुभूति का स्तर ही ईश्वर- प्राप्ति का एकमात्र प्रमाण हैं।

निराकार ध्यान में प्रायः सर्वत्र सूर्य के प्रकाश को ही माश्यम बनाया जाता है। प्रभात काल के उदीयमान सूर्य का सविता देवता के प्रतीक रूप में दर्शन, उसकी दिव्य किरणों का शरीर, मन और अन्तरात्मा में प्रवेश उस प्रवेश की सत्कर्म, सद्ज्ञान एवं सद्भाव के रूप में प्रतिक्रिया। इसी परिधि में निराधार ध्यान धारणा परिभ्रमण करती है। यज्ञाग्नि रूपी ईश्वर में आहुति द्रव्य की तरह जीव सत्ता का समर्पण नाले का गंगा में- बूँद का समुद्र में सम्पादन- दीप का सूर्य ज्योति में विलय, अर्घ्य जल का भाप बनकर व्यापक क्षेत्र में विस्तार, पतङ्गे का दीपक को समर्पण जैसे कितने ही दृश्य- चित्र कल्पना क्षेत्र में बनाये जा सकते हैं और उनके सहारे एकात्म भाव की अनुभूति का आनन्द लिया जा सकता है ।उपासना के क्रिया- कृत्य में (१) स्थापना, सुसंकल्प के आधार पर वातावरण का निर्माण (२) प्राणायाम, न्यास, पूजा- उपचार आदि क्रिया- कृत्यों द्वारा विचारणा की क्रिया में परिणति (३) जप के साथ ध्यान का अवलम्बन और दिव्य सत्ता के साथ ऐसे सघन तादात्म्य की स्थापना जो चिन्तन क्षेत्र मे उत्कृष्टता और क्रिया क्षेत्र में आदर्शवादिता अपनाने के लिए विवश कर सके । यही है उपासना का त्रिविध स्वरूप । गायत्री मन्त्र में तीन व्याहृतियाँ इसीलिए हैं। आठ- आठ अक्षरों के तीन चरण होने के कारण इस महाशक्ति को त्रिपदा कहा गया है । उपासना के इन तीनों आधारों को अपना कर गायत्री मन्त्र के सहारे अथवा कोई और अवलम्बन अपना कर ईश्वर की साकार अथवा निराकार जो भी उपासना अपनाई जायेगी, निश्चित रूप से सफल होगी और अभीष्ट सत्परिणाम उत्पन्न करेगी ।






गायत्री उपासना का तत्त्वज्ञान और सत्परिणाम - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

उपासना का शब्दार्थ है समीप बैठना। ईश्वर और जीव के बीच रहने वाली दूरी को समाप्त करके जिस प्रक्रिया से निकटता बनती हो उसे उपासना कहा जा सकता है। समीपता से विशेषताओं का आदान- प्रदान होता है। एक के गुण दूसरे को प्राप्त होते हैं । सत्संग के लाभ और कुसंग के दुष्परिणाम सर्व विदित हैं । अधिक प्रभावशाली तत्त्व कम सामर्थ्यवानों को अपने प्रभाव से प्रभावित करते हुए सर्वत्र देखे जाते हैं । आग के निकट आने वाले पदार्थ गरम होते हैं और जलने लगते हैं। बर्फ के स्पर्श में जो भी पदार्थ आता है ठण्डा होता जाता है। सुगन्धित और दुर्गन्धित पदार्थों के सम्पर्क में आने वाली वस्तुओं में भी वैसी ही भली या बुरी गन्ध आने लगती है । हरी घास पर पलने वाले टिड्डे हरे रंग के होते हैं और हिम प्रदेश में पाये जाने वाले भालू सफेद रंग के होते हैं । दर्पण के समीप जो भी वस्तु पहुँचती है उसका प्रतिबिम्ब उस पर दीखता है। इसे संगति की समीपता का प्रभाव कह सकते हैं ।

उपासना में भी ऐसा होता है। ईश्वर के समीप बैठने से उसकी विशेषताएँ बैठने वाले के व्यक्तित्व में अवतरित होने लगती हैं। ईश्वर महान है । उसकी समीपता महानता की वृद्धि करती है । ईश्वर अनेकों श्रेष्ठताओं का पुञ्ज है, पास बैठने वाले में वे श्रेष्ठतायें प्रवेश करती हैं। ईश्वर विभूतिवान है, साधक में विभूतियों की अभिवृद्धि होती है। राजा के अर्दली का भी मान बढ़ जाता है, उनके पास बैठने वाले दरबारियों का रुतबा बढ़ता है। फिर कोई कारण नहीं कि ईश्वर की समीपता यदि वास्तविक हो तो उसका प्रभाव उपासनारत व्यक्ति पर न पड़े ।

यह समीपता जब घनिष्ठता में परिणत होती जाती है तो फिर आदान- प्रदान का सिलसिला और भी अधिक अच्छी तरह चल पड़ता है। उपासना में प्रमुख भावना आत्मसमर्पण की मानी गई है। घनिष्ठता बढ़ते- बढ़ते एकता में परिणत हो जाती है । उपासना के विधि- विधानों का आधार यह है कि उपासक अपने- आपको ईश्वर के अति निकट अनुभव करे उसे अपना स्वजन सम्बन्धी माने । आत्मीय जनों के प्रति असामान्य ममता होती है। उनके लिए कुछ विशेष सोचना और विशेष करना पड़ता है, उनके प्रति कर्तव्य और उत्तरदायित्व भी अधिक होते हैं । ऐसी ही मनोभूमि उपासक को विकसित करनी पड़ती है। उसे निकटतम सम्बन्धियों में से एक के स्तर पर सम्बन्ध सूत्र में बाँधना पड़ता है । पितु, मातु, सहायक, स्वामी, सखा जैसे किसी सम्बन्ध को मान लेने से सहज ही कौटुम्बिक घनिष्ठता बढ़ती है, सघन सम्बन्ध सूत्र में बँधे होने की अनुभूति होती है । मीरा ने भगवान को पति रूप में- सूरदास ने पुत्र रूप में माना था । और भी कई कोमल, मृदुल, उत्कृष्टता की भावनाओं से भरे- पूरे सम्बन्ध भगवान के साकार उपासक निर्धारित करते हैं। इस मान्यता में अपनत्व का घनिष्ठ सम्पर्क साधने का ही भाव है ।

निराकार उपासना भी ध्यान धारणा के लिए कोई न कोई प्रतीक नियत करते हैं । इस मान्यता वाले प्रकाश पुञ्ज के रूप में उसका चिन्तन करते हैं । साथ ही यह भी धारणा करते हैं कि प्रकाश आत्म सत्ता के कण- कण में प्रवेश करके अपनी विभूतियों का अनुग्रह प्रदान करने हैं। साकार उपासना में भी स्वजनों की समीपता से जिस- जिस प्रकार की सुखद भाव संवेदनायें उभरती हैं उनका अनुभव किया जाता है । पूजा उपचार के समस्त क्रिया- कलापों में यह भाव रहता है मानो कोई अति श्रद्धास्पद अतिथि सामने उपस्थित हो और उसका श्रद्धासिक्त सत्कार किया जा रहा हो। धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन, पुष्प, जल, आरती आदि भारतीय शिष्टाचार में सम्माननीय अतिथियों के सत्कार विधान हैं । गुरुजनों का समय -समय पूजन अभिवादन इसी प्रकार होता है। इन उपचार कृ त्यों को करते हुए उपासक अपने मनःक्षेत्र में यह मान्यता परिपक्व करता है कि ईश्वरीय देव सत्ता उसके सम्मुख विद्यमान है। उपस्थिति की यह मान्यता जितनी गहरी, जितनी ही वास्तविक होगी, उतना ही उपचार में आनन्द आवेगा और प्रभाव- परिणाम परिलक्षित होगा ।


 किसी समर्थ सत्ता के साथ अपने आपको जोड़ देने- सजा देने से दुर्बल तत्व भी सबल और समर्थ बन जाते हैं। उसका स्तर एवं गौरव भी प्रायः उतना ही ऊँचा उठ जाता है, जितना समर्थ सत्ता का होता है । बच्चे के हाथ में डोरी रहने पर उसके इशारे से पतङ्ग आसमान में तैरती है और तरह- तरह की उछल कूद दिखाकर दर्शकों का मनोरंजन करती है । पतङ्ग और उड़ाने वाले का सम्बन्ध टूट जाये तो वह कागज का टुकड़ा आसमान में उड़ना तो दूर जमीन में पड़ा- पड़ा नष्ट हो जायेगा । अपने बलबूते उठ कर कहीं सुरक्षित स्थान तक न जा सकेगा । कठपुतली और मदारी के पारस्परिक सम्बन्ध सुदृढ़ रहें तो वह लकड़ी के टुकड़े मनमोहक अभिनय करते हैं । यह करामाती इस कारण सम्भव हुई कि कठपुतलियों ने अपने को पूरी तरह चलते धागे के सहारे मदारी के उँगलियों में जोड़ दिया । इस घनिष्ठता से यह भी सम्भव हुआ कि मदारी की अदृश्य कलाकारिता का श्रेय कठपुतली के खिलौने को प्राप्त हो। यदि सम्बन्ध सूत्र टूट जाये तो वह खिलौने को निष्क्रिय बने एक कोने में उपेक्षित पड़े होंगे । तब उनमें न तो कोई हलचल दिखाई देगी और न आकर्षण प्रतीत होगा ।

बांसुरी राग- रागनियाँ तभी निकालती हैं, जब वह पोली होती है और अपने आप को वादक के होठों से पूरी तरह सटा देती है । उसके संकेतों पर अपनी सांसे लेती- छोड़ती हैं। यदि बांसुरी में मिट्टी भरी हो अथवा होठों से दूर रहे तो यह सम्भव नहीं कि उसमें से मधुर ध्वनि प्रवाह निकल कर सुनने वालों का मन मोहित कर सके ।

बेल अपने बलबूते जमीन पर फैल सकती है ,पर कमर पतली होने के कारण ऊपर नहीं उठ सकती। किन्तु जब वह पेड़ से लिपटकर चलती है तो उतनी ही ऊँची उठ जाती है जितना कि पेड़ होता है । बांसुरी और बेल के उदाहरण समर्पण की उस भावना को व्यक्त करते हैं जो उपासना में ईश्वर के साथ सटने और उसमें तादात्म्य होने से सम्बन्धित है। तादात्म्य होने का अर्थ है अपनी कामनाओं को ईश्वर की प्रेरणाओं के अनुरूप ढालना, उसके संकेत निर्देशों के आधार पर अपनी गतिविधियों का निर्धारण करना । यह स्थिति जब भी , जहाँ भी बन रही हो, समझना चाहिए कि वहाँ सच्ची उपासना का मर्म समझ लिया गया और उसका परम श्रेयस्कर परिणाम उत्पन्न होना सुनिश्चित हो गया ।

नाला जब तक अपना स्वतंत्र नाम रूप बनाये रहता है तब तक वह नाला ही कहलाता है और उफनता मटकता रहता है किन्तु जब वह गंगा में मिल जाता है तो उसका पानी गङ्गामय माना जाता है उसे भी इतना ही महत्त्व मिलता है जितना असली गंगाजल को। बूँद जब समुद्र में मिली है तो उसकी क्षुद्रता सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो जाती है । तब वह अपने में समस्त समुद्र को और समुद्र में अपने आपको समाया हुआ देखकर गर्वोन्नत सिर उठाती है । दूध और पानी जब परस्पर मिल जाते हैं, तो दोनों का नाम, रूप और भाव एक ही हो जाता है। जीव जब परमेश्वर के समीप पहुँचता है तो उसकी विशेषताओं को अपने में धारण करता है और जब एक कदम आगे बढ़कर समर्पण की स्थिति में पहुँचता है तो आत्मा का परमात्मा में अन्तर इतना ही रह जाता है कि एक ससीम होता है और दूसरा असीम ।। कटोरे और भगौने में भरा पानी मात्रा में न्यूनाधिक होता है, दोनों में विशेषताएँ एक जैसी ही रहती हैं ।

पति और पत्नी के दाम्पत्य जीवन की सफलता इस समर्पण- भाव पर ही निर्भर रहती है। पत्नी अपना शील, श्रम ,मन , व्यवहार, पति की मर्जी पर छोड़कर निश्चिन्त हो जाती है । लगता है इसमें उसने गंवाया ही गंवाया है । पर ध्यानपूर्वक देखने से एक और पहलू सामने आता है कि उसने बिना कीमत दिये एक सुयोग्य साथी को, उसके शरीर व मन को, सारे धन- वैभव को खरीद लिया। पत्नी पति की आज्ञानुवर्ती बनती है तो पति भी पत्नी का बे पैसे का गुलाम बन जाता है । उस पर प्राण निछावर करता है और छाया की तरह साथ देता है। पति के वंश, पद, यश आदि में पत्नी समान रूप से भागीदार हो जाती है , पति की मृत्यु हो जाने पर वह, और उसके बच्चे ही उसके जीवन भर का उपार्जन उत्तराधिकार में प्राप्त करते हैं। भक्त और भगवान का रिश्ता भी इस प्रकार का है । समीपवर्तियों का ध्यान हर कोई रखता है फिर आश्रितों की तो पूरी ही चिन्ता करनी पड़ती है । अपने पास पड़ोस में कोई रहता है, समीप वाली मेज़ पर काम करता है तो स्वभावतः उसके दुःख दर्द में अपनी पूरी सहानुभूति होती है और आवश्यक सहायता के लिए सहज ही प्रयत्न होते हैं । ईश्वर के समीप जो भी है - उपासना के माध्यम से जिसने निकटवर्ती स्थान प्राप्त कर लिया है उन्हें अभीष्ट दैवी सहकार निश्चित रूप में मिलता है । फिर जो उसके आज्ञानुवर्ती हैं, समर्पित आश्रित एवं शारणागत हैं, जिसमें भक्तों के योग क्षेम के वहन करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर उठाया है ।

मनुष्य अपने आश्रित परिवार के भरण- पोषण का विकास एवं सुरक्षा की व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी के साथ निबाहता है । ईश्वर ने भी सदा यह उत्तरदायित्व निबाहा है कि जो उसके निर्देशों का अनुसरण करता है, उसके आन्तरिक स्तर को निरन्तर ऊँचा उठाया जाये । स्पष्ट है कि व्यक्तित्व ऊँचा उठेगा तो सम्पर्क क्षेत्र में प्रामाणिकता और सद्भावना बढ़ेगी । फलतः सहयोग और सम्मान मिलेगा । ऐसे विश्वस्त समझे जाने वाले लोकप्रिय व्यक्ति अपनी चारित्रिक विशिष्टता के बल पर जन समर्थन से उच्च पदों पर जा पहुँचते हैं । वे जिस भी काम को हाथ में लेते हैं, सफल होते चले जाते हैं। यही हैं वे सिद्धियाँ , जो ईश्वर के अनुग्रह से प्राप्त हुई समझी ज सकती हैं। इन्हें उपासना का प्रतिफल कहा जाये तो कोई अत्युक्ति न होगी ।

निस्सन्देह ब्रह्माण्ड व्यापी ब्रह्मचेतना निराकार है । व्यापक शक्ति एकदेशीय नहीं हो सकती । किन्तु उससे सम्पर्क साधने के लिए कोई प्रतीक मानकर ही उससे सम्बन्ध बन सकता है । निराकार इतना व्यापक कि उसका समग्र ध्यान हमारी कल्पना छोटे से क्षेत्र में सीमाबद्ध नहीं हो सकता । भावभरा ध्यान ही एकमात्र वह आधार है जिसके सहारे चेतना -खण्डों के बीच सघनता स्थापित हो सकती है । भावभरा ध्यान करने की क्षमता विकसित किये बिना जीव और ब्रह्म के बीच तादात्म्य स्थापित नहीं हो सकता । व्यापक ब्रह्म का ध्यान कैसे किया जाये और जो निस्पृह है, उसके साथ भावों का आरोपण कैसे हो? इस प्रश्न के समाधान में तत्त्वदर्शियों को एकमात्र उपाय यही हाथ लगा है कि उसकी प्रतीक प्रतिमा बनाई जाये और उसके साथ आत्मीयता भरा कोई सम्बन्ध स्थापित किया जाये। किसी व्यक्ति को पकड़ना होता है तो उसका सारा शरीर नहीं पकड़ जाता, हाथ पकड़ लेने से भी वह पकड़ में आ जाता है । निराकारवादी प्रकाश ज्योति को और साकारवादी अमुक देवता या अवतार की आकृति को ईश्वर की प्रतिमा मानकर उसकी समीपता का अभ्यास करते हैं । उपासना अवधि में ऐसी धारणा की जाती है कि परमेश्वर की सत्ता का प्रतीक इष्टदेव सामने विद्यमान है। उसके साथ अपना अत्यन्त घनिष्ठ कौटुम्बिक सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। दोनों के बीच असीम आत्मीयता है। भक्त भगवान को प्राणप्रिय मानता है और उसके अति निकट सटकर बैठा है । भक्त अपना समर्पण भगवान में करता है और बदले में उसे अनुग्रह उपलब्ध होता है । भक्त की इच्छायें, कामनायें समाप्त हो जाती हैं और उसके स्थान पर भगवान का अनुशासन भक्त के अन्तरंग पर- चिन्तन क्षेत्र पर स्थापित होता है । क्रिया क्षेत्र पर उन्हीं आदर्शों का परिपालन होता है । यही शरणागति की भावना है । इसी को समर्पण- योग कहते हैं । भक्ति का सारा तत्त्वज्ञान इसी भावना में समाविष्ट है।

ईश्वर सद्गुणों का पुञ्ज है । सत्यं, शिवं, सुन्दरं के रूप में उसकी दिव्य विभूतियों का ही संकेत है । समीप बैठने वाले में प्रभावी सत्ता की विशेषताओं का अवतरण होना ही चाहिए । समदर्शी, न्याय निष्ठ ,, उदार, व्यवस्थापक, परमार्थ- परायण, सौन्दर्य संयोजक, कर्मरत, जैसी ईश्वरीय सत्प्रवृत्तियों का परिचय दृष्टि से दृष्टि पसार कर कहीं भी पाया जा सकता है । ईश्वर- भक्त यदि सच्चे मन से उपासना करता है तो उसमें इन विशेषताओं का भी अभिवर्धन होना चाहिए ।



भक्तजनों का इतिहास यही है, उनकी निष्ठा जैसे- जैसे ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ परिपक्व होती गई है , वैसे- वैसे ही उसके गुण, कर्म स्वभाव में श्रेष्ठता का अभिवर्धन होता चला गया है । गिलास में यदि पानी भरा जाये तो उसमें पहले की हवा बाहर निकल जायेगी। ईश्वर का देवत्व यदि साधक की आत्म सत्ता में प्रवेश करेगा तो फिर वहाँ असुरता के लिए कोई स्थान नहीं रह जायेगा । स्वार्थान्धता, निष्ठुरता का निर्वाह भक्ति भावना के साथ हो ही नहीं सकता । प्रकाश और अन्धकार दोनों एक साथ किस प्रकार ठहर सकेंगे ।

ईश्वर का अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश करने के लिए होता है । अवतारों के समस्त क्रिया- कलाप इन्हीं दो प्रयोजनों पद केन्द्रीभूत रहे हैं। मनुष्य की अन्तरात्मा में उपासना के फलस्वरूप यदि ईश्वरत्व का अवतरण होगा तो फिर निश्चित रूप में यही दो उमंगें प्रबल होती चली जायेंगी । निजी जीवन में और सम्पर्क क्षेत्र में इन्हीं दो प्रवृत्तियों के लिए अदम्य उत्साह उठने लगेगा । दोष- दुर्गुणों की असुरता हटाने और सद्भावनाओं सत्प्रवृत्तियों की दिव्यता बढ़ाने के लिए उपासनारत व्यक्ति को निरन्तर प्रयत्नशील पाया जायेगा । जिसमें यह दोनों उमंगें जिस मात्रा में उठती पाई जाएँ , समझना चाहिए कि उनकी भक्ति- भावना -उपासना उतनी ही सच्ची और सार्थक है ।

गायत्री उपासना से वे सारी विशेषतायें उत्पन्न होनी चाहिए जो उस दिव्य सत्ता में ओत- प्रोत है । त्रिपदा गायत्री के तीन चरण प्रज्ञा, निष्ठा और श्रद्धा के प्रतीक माने गये हैं । प्रज्ञा- दूरदर्शी सहृदय विवेकशीलता । निष्ठा- आदर्शों के प्रति दृढ़ता, कर्तव्यों के प्रति साहसिक तत्परता । श्रद्धा- श्रेष्ठता से असीम प्यार । इन तीनों सत्प्रवृत्तियों का विकास- विस्तार गायत्री उपासना के फलस्वरूप होता देखा जाता है ।

भावनाओं में श्रद्धा- तत्व का गहरा समावेश करके परमेश्वर के साथ एकात्म भाव की अभिवृद्धि के लिए उपासना प्रक्रिया के अन्तर्गत अभ्यास किया जाता है । यह भाव संवेदनायें ही भक्ति कहलाती हैं । भगवान का भक्त के वशवर्ती होने का तथ्य सर्वविदित है । इन्हीं सुदृढ़ ध्यान धारणाओं को श्रद्धा कहा गया है । इसी की सघनता के आधार पर जीव और ब्रह्म के बीच आदान- प्रदान सम्भव होते हैं, जिनकी ईश्वर उपासना के माध्यम से आशा- अपेक्षा की जाती है ।

आत्मीयता ,श्रद्धा और तन्मयता की भाव भूमिका कितनी प्रखर होती है इसका विवरण इतिहास के पन्नों पर विद्यमान है। असाधारण सफलतायें पाने वाले, निराशा में आशा का संचार करने वाले- असम्भव को सम्भव करने वाले मनस्वीलोगों में यही तीन विशेषतायें होती हैं । आत्मिक प्रगति के लिए भी ऐसी ही भावभरी मनःस्थिति बनानी है। इसके लिए इष्टदेव का निर्धारण और उनके साथ एकात्म भाव का संस्थापन ऐसा अभ्यास है जिसके फलस्वरूप अभीष्ट सफलता मिलती है। ब्रह्मचेतना के साथ जीव का सम्बन्ध इसी श्रद्धा- विश्वास की सहायता से बनता है । चेतना सत्ता के पास इससे बड़ा और कोई बन्धन दूसरे चेतना घटक को पकड़ने के लिए है नहीं । मनुष्यों के बीच सुदृढ़ मैत्री इसी आधार पर बनती , पनपती और परिपक्व होती है। एक व्यक्ति दूसरे के लिए प्राण निछावर करता है, सब कुछ लुटा देता है, और बड़े से बड़े संकट सहने को तैयार रहता है। यह प्रेम- तत्त्व के आधार पर विकसित हुई घनिष्ठता ही है । इसी को श्रद्धा- भक्ति कहते हैं । गायत्री महाशक्ति की उपासना का समुचित सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए मात्र कर्मकाण्ड ही पर्याप्त नहीं। उसके साथ श्रद्धा तत्त्व का समुचित समन्वय भी होना चाहिए ।





उपासना क्यों ? और किसकी ? - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

ईश्वर इस ब्रह्माण्ड में संव्याप्त वह दिव्य चेतना है, जिसका एक छोटा- सा अंश जीवनयापन करने के लिए जितना आवश्यक है, उतनी मात्रा में हर किसी को मिला हुआ है । सभी प्राणी उतने मात्र से ही अपना काम चलाते हैं और उन्हें इसी अर्थ में ईश्वर का अंश जीव कहा जाता है कि उन्हें वह चेतना आवश्यक मात्रा में सहज रूम से उपलब्ध है । सामान्यतः यह उपलब्धि शरीर में क्रियाशीलता और मन में विचारणा की प्रक्रिया चलती रहे इतने मात्र तक सीमित है । इस उपलब्धि के आधार पर सामान्य रूप से ही जीवन- क्रम चल सकता है ।

इससे आगे जीवन मुक्ति, आत्म साक्षात्कार परमसिद्धि, जैसी उपलब्धियों के लिए चेतना के उस विशाल सागर से प्रयत्न पूर्वक अधिक मात्रा में विशिष्ट चेतना अर्जित और धारण करनी पड़ती है। इसी प्रयास पुरुषार्थ को उपासना कहा जाता है । सूर्य की किरणें सभी स्थानों पर एक समान पड़ती हैं, लेकिन इन किरणों को एकत्रित किया जाये तो जलने जैसी गर्मी भी उत्पन्न हो सकती है । उपासना के माध्यम से बिखरी हुई भागवत् चेतना को उसी प्रकार आकर्षित एवं एकत्रित किया जाता है जिससे व्यक्ति की आत्मिक क्षमता बढ़ सकती है और उस संचय के बल पर भौतिक दृष्टि से सुसम्पन्न तथा आत्मिक दृष्टि से सुसंस्कृत बना जा सकता है ।

बिजली घर में शक्ति का भण्डार भरा रहता है उस के साथ सम्बन्ध जोड़ने वाले सूत्र जितने समर्थ या दुर्बल होते हैं, उसी अनुपात से बिजली की मात्रा का आगमन होता है और उससे मशीनें चलती हैं। हलका फिटिंग तो हर किसी में है और उतने में से थोड़ी शक्ति के कुछ ही बल्ब जल सकते हैं। पर यदि मीटर तथा सम्बन्ध- सूत्रों को बलिष्ठ बना दिया जाये तो उसी स्थान पर शक्तिशाली कारखाना धड़धडाने लगता है। यह बिजली की अधिक मात्रा प्राप्त होने का परिणाम है। कई व्यक्तियों में दिव्य चेतना से सम्पर्क प्रायः टूटा ही रहता है और वे क्रियाशीलता, मानवीय चेतना की दृष्टि से रिक्त ही बने रहते हैं । बिजली घर के साथ सम्बन्ध जुड़ा रहे तभी घर के बल्ब, पंखे, हीटर, रेडियो आदि चलते रहते हैं। सम्बन्ध कट जाने पर यह सब तंत्र ठीक रहते हुए भी निष्क्रिय बन जाते हैं। ईश्वर से सम्बन्ध कट जाने पर भी वैसी ही स्थिति होती है। आकार- प्रकार, स्वरूप सब ठीक- ठाक रहते हुए भी जीवन्तता की दृष्टि से वहाँ शून्यता ही बनी रहती है। इस शून्यता को मिटाने दिव्य चेतना से सम्बन्ध रहने तथा ईश्वरीय सामर्थ्य को एकत्रित करने के लिए उपासना एक अत्यन्त आवश्यक अनिवार्य कृत्य है।

दैनिक क्रियाकलापों में उपासना के लिए भी स्थान रखना एक दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता भरा निर्धारण है। आत्मा का परमात्मा से , जीव का ब्रह्म से सम्पर्क सान्निध्य वैसी ही आवश्यकता है जैसी कि बैट्री चार्ज करने के लिए समय- समय पर उसे आवश्यक यांत्रिक प्रक्रियाओं से जोड़ा- गुजारा जाता है। भूख लगती है तो भोजन कर लिया जाता है, ग्रहण किये गये आहार से दिन भर काम चल सके, इतना पोषण दो या तीन बार किये जाने वाले भोजन से मिल जाता है। भोजन से प्राप्त हुई शक्ति खर्च हो जाने के बाद फिर भोजन की आवश्यकता पड़ती है। उसी प्रकार आत्मिक- प्रगति प्रयोजनों की पूर्ति के लिए भी नियमित रूप से उपासना का क्रम चलाना चाहिए ।

नियमित उपासना, नियत समय पर नियत समय तक नियत स्थान पर होना चाहिए । इस नियमितता से वह स्थान संस्कारित हो जाता है और मन भी ठीक तरह लगता है । जिस प्रकार नियत समय पर सिगरेट आदि की तलब उठती है, उसी तरह पूजा के लिए भी मन में उत्साह जगता है। जिस स्थान पर बहुत दिन से सो रहे हैं, उस स्थान पर नींद ठीक आती है। नयी जगह पर स्थान पर अक्सर नींद में अड़चन पड़ती है। इसी प्रकार पूजा का नियत स्थान ही उपयुक्त रहता है। व्यायाम की सफलता तब है जब दण्ड- बैठक आदि को नियत संख्या में नियत समय पर किया जाये। कभी बहुत कम, कभी बहुत ज्यादा कभी सवेरे, कभी दोपहर को व्यायाम करने से लाभ नहीं मिलता

 

इसी प्रकार दवा की मात्रा भी समय और तौल को ध्यान में रखकर निर्धारित समय और परिमाण में प्रयुक्त की जाये तो उससे उपयुक्त लाभ मिलेगा अन्यथा नहीं। यही बात उपासना के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। यथासम्भव नियमितता ही बरतनी चाहिए। रेलवे की रनिंग ड्यूटी करने वाले, यात्रा में रहने वाले, फौजी, पुलिस वाले जिन्हें अक्सर समय- कुसमय यहाँ वहाँ जाना पड़ता है, उनकी बात दूसरी है। वे मजबूरी में अपना क्रम जब भी जितना भी बन पड़े रख सकते हैं। न कुछ से कुछ अच्छा। पर जिन्हें ऐसी असुविधा नहीं, उन्हें यथासम्भव नियमितता ही बरतनी चाहिए । कभी मजबूरी की स्थिति आ पड़े तो वैसा हेर- फेर किया जा सकता है ।

पूजा उपचार के लिये प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है । स्थान और पूजा उपकरणों की सफाई नित्य करनी चाहिए। जहाँ तक हो सके नित्य कर्म से- शौच स्नानादि से निवृत्त हो कर पूजा पर बैठना चाहिए। रुग्ण या अशक्त होने की दशा में हाथ, पैर, मुँह आदि धोकर भी बैठा जा सकता है । पूजा का न्यूनतम कार्य निर्धारित ही रखना चाहिए, उतना तो पूरा कर ही लिया जाय। यदि प्रातः समय न मिले तो सोने तक पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की पूर्ति की जाये। बाहर प्रवास पर रहना पड़े तो मानसिक ध्यान पूजा आदि की जा सकती है। ध्यान में नित्य की पूजा का स्मरण और भाव कर लेने को मानसिक पूजा कहते हैं। विवशता में ऐसी पूजा से भी काम चल सकता है।

अब प्रश्न चह उठता है कि उपासना कौन सी और किस पद्धति से की जाये। उपासना अनेकानेक प्रचलित है। सम्प्रदाय भेद से अनेकों मान्यता दी जाती रहे तो दार्शनिक और भावनात्मक विशृंखलता बनी ही रहेगी। अगला युग एकता का है। इसके बिना विग्रह बढ़ेंगे और संकट खड़े होंगे। एक राष्ट्र एवं एक संस्कृति अपनाये बिना विश्व मानव का स्वरूप नहीं निखरेगा। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना शब्दाडम्बर बनकर ही रह जायगी मानवी संस्कृति- आचार व्यवहार में एकता स्थापित करनी होगी। साथ ही आस्तिकता का स्वरूप और व्यवहार भी एकता के केन्द्र पर ही केन्द्रित करना होगा। समस्त विश्व में प्रचलित आस्तिकतावादी मान्यताओं और उपासनाओं का सारतत्त्व ढूँढ़ना हो तो वह गायत्री मंत्र में बीज रूप से विद्यमान पाया जा सकता है । इसमें सर्वजनीन एवं सार्वभौम बनने योग्य सभी विशिष्टतायें विद्यमान हैं। इन चौबीस अक्षरों में बीज रूप से वह तत्व दर्शन भरा पड़ा है जिसे व्यक्ति और समाज की सुव्यवस्था के लिए एक उच्चस्तरीय आचार संहिता कहा जा सके। इसी प्रकार साधना उपासना से जिन सिद्धियों और विभूतियों की अपेक्षा की जाती है उन समस्त सम्भावनाओं का आधार एक महामन्त्र में मौजूद है ।

शास्त्रों में गायत्री की उपासना सर्वोत्कृष्ट मानी गयी है। इसलिए उसकी स्थापना को प्रमुखता देनी चाहिए । यदि किसी का दूसरे देवताओं के लिए आग्रह हो तो उन देवता का चित्र भी रखा जा सकता है। शास्त्रों में गायत्री के बिना अन्य सब साधनाओं का निष्फल होना लिखा है । इसलिए यदि अन्य देवता को इष्ट माना जाय और उसकी प्रतिमा स्थापित की जाय तो भी गायत्री का चित्र प्रत्येक दशा में साथ रहना ही चाहिए ।

अच्छा तो यह है कि एक ही इष्ट गायत्री महाशक्ति को माना जाय और एक ही चित्र स्थापित किया जाय। उससे एक निष्ठा और एकाग्रता का लाभ होता है यदि अन्य देवताओं की स्थापना का भी आग्रह हो तो उनकी संख्या कम रखनी चाहिए । जितने देवता स्थापित किये जायेंगे, जितनी प्रतिमायें बढ़ायी जायेंगी, निष्ठा उसी अनुपात में विभाजित होती जायेगी। इसलिये यथासम्भव एक अन्यथा कम से कम छवियाँ पूजास्थली पर प्रतिष्ठापित करनी चाहिए ।

उपासना का विस्तृत विधि- विधान अलग स्थानों पर बताया गया है, यहाँ उस सम्बन्ध में संकेत कितना ही पर्याप्त होगा । इस विधि से की गयी नियमित उपासना अखिल ब्रह्माण्ड संव्याप्त दिव्य चेतना के सागर से अपने लिए अभीष्ट शक्ति अर्जित करने के लिए पर्याप्त सहायक सिद्ध होती है। अधिकस्य अधिक फलम् वाली उक्ति यहाँ भी लागू होती है। उपासना जितनी भावभरी श्रद्धा निष्ठा के साथ की जायेगी, उसका उतना ही लाभ प्राप्त, होगा और मनुष्य नर से नारायण तथा पुरुष से पुरुषोत्तम बनने की दिशा में अग्रसर हो सकेगा।






आत्म कल्याण की सर्वोपरि उपासना - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

गायत्री- उपासना सर्वश्रेष्ठ और अनादि उपासना है । उसका प्रभाव और परिणाम असंदिग्ध एवं अतुलित है। अन्य उपासना- पद्धतियाँ अपने लक्ष्य को प्राप्त करा सकने में असमर्थ हो सकती हैं, पर गायत्री- उपासना में ऐसी अड़चन नहीं आती

उपासना संसार में यह सबसे अधिक लाभदायक प्रक्रिया है । सांसारिक सुख- सुविधाओं के उपार्जन की दृष्टि से स्वास्थ्य , शिक्षा, कुशलता, सम्पत्ति, मित्रता आदि की उपयोगितायें लोगों ने समझ ली हैं और उनके उपार्जन का प्रयत्न भी करते हैं, पर ऐसे कम ही लोग हैं जिन्होंने आत्मबल द्वारा प्राप्त हो सकने वाली विभूतियों का मूल्यांकन किया हो और उनका उपार्जन करने के लिए उपासना क्रिया पद्धति को व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप से अपनाया हो।

भारतीय धर्मशास्त्रों का मर्म, ऋषियों का अनुभव और महापुरुषों के कार्यक्रम को सब उपासना- अन्वेषण की दृष्टि से देखा जाता है तो उसमें गायत्री- उपासना ही सर्वोत्तम ठहरती है। सन्ध्या हवन की कोई भी प्रणाली क्यों न हो, गायत्री उपासना का उसमें अनिवार्य स्थान है, वेद भारतीय धर्म के मूल आधार हैं और उनका बीज मन्त्र एकमात्र गायत्री है। गायत्री के चार चरणों की व्याख्यास्वरूप चार वेद बने हैं । गुरुमन्त्र के रूप में प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी का एक ही अवलम्बन है- गायत्री मन्त्र । इस सुनिश्चित तथ्य को ध्यान में रखते हुए कोई वेद- धर्म अनुयायी और कोई मार्ग अपना भी नहीं सकता । खोज- बीन और अनुभूतियों के आधार पर हमने जो एकमात्र राजमार्ग पाया उस पर क्रमबद्ध रूप से चलते रहें। यही कारण है कि उस मार्ग पर चलते हुए इतना कुछ पाया है, जिनके आधार पर सन्तोष, आनन्द एवं उल्लास का अनुभव किया ।

उपासना मानव- जीवन का सर्वोत्कृष्ट व्यवसाय है । अन्य व्यवसायों में जितना मनोयोग, जितना श्रम, जितना समय और जितना साधन लगाया जाता है, उतना ही यदि उपासना में लगाया जाता तो अपेक्षाकृत असंख्य गुना लाभ उठाया जा सकता है।

आध्यात्मिक भी भौतिक विज्ञान की तरह एक ही सर्वांगपूर्ण है और उसका लाभ तभी उठाया जा सकता है जब व्यवस्थित जानकारी तथा क्रिया- प्रणाली अपनाई जाय।

संसार में अन्य समस्त क्रिया- कलापों की तरह उपासना भी (१) सिद्धान्त और (२) व्यवहार, इन दो भागों में विभक्त है। यह दोनों ही पहलू एक- दूसरे से अन्योन्याश्रित सम्बद्ध हैं। एक के बिना दूसरा पहलू अधूरा है। डॉक्टर ऑपरेशन करने की कला सीखता है फोड़ा कहाँ से, कैसे, किस औजार से, कितना चीरा जाना चाहिये और उसके बाद उस पर क्या लगाया जाना चाहिये यह समझता है। पर इतने मात्र से ही वह अपने व्यवसाय में कुशल नहीं हो जाता । उसे फोड़ा उत्पन्न होने का कारण, उसकी किस्में तथा पकने- फूटने की सैद्धान्तिक जानकारी भी होनी चाहिये। जो सिद्धान्तों से उपेक्षित है, केवल व्यवहार जानता है वह अनाड़ी डॉक्टर अपने व्यवसाय में सफल नहीं हो सकता। व्यापारी, किसान, शिल्पी आदि सभी वर्गों के लोग हाथ- पैर से क्या करना होगा यह जानते हैं, पर उतने से ही उनका काम नहीं चल जाता। व्यावसायिक सिद्धान्त ,, किसान को पौधों की क्रिया- प्रणाली, शिल्पी को अपने विषय की आवश्यक जानकारी प्राप्त करनी होती है, यदि वह ऐसा न करे तो वह मशीन मात्र बनकर रह जायेगा ।

एक इन्जीनियर और एक साधारण कुली में इस जानकारी का ही अन्तर होता है । कुली भी बताने पर हाथ- पैर से वही कार्य कर सकता है जो इन्जीनियर के हाथ- पैर करते हैं। कई बार तो कुली अपेक्षाकृत अधिक मेहनत भी कर सकता है, पर इन्जीनियर जितना ज्ञान न होने के कारण उसे वह श्रेय नहीं मिलता जो इन्जीनियर को मिलता है। अनगढ़ किसान की अपेक्षा एक कृषि स्नातक खेती में अधिक लाभ ले सकता है। सैद्धान्तिक शिक्षा के अभाव में व्यवहार मात्र से जो लाभ मिलेगा वह नगण्य ही होगा। उपासना को पूजा- पाठ के नियम जानकर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए वरन् उसके सिद्धान्त, आदर्श, तथ्य एवं स्वरूप को भी समझना चाहिये। जो आवश्यकता को अनुभव करते हैं और उसे पूरा करने में संलग्न रहते हैं, उनकी साधना असंदिग्ध रूप से सफल होती है। किन्तु जो केवल कर्मकाण्ड सीखकर ही सन्तुष्ट हो बैठते हैं उनके हाथ यदि कुछ पड़े भी वह बहुत ही स्वल्प होता है ।

वेद ज्ञान और विज्ञान के भण्डार हैं। संसार का प्रकट और अप्रकट ज्ञान वेदों में भरा पड़ा है। इन वेदों का बीज गायत्री महामन्त्र है । जिस प्रकार विशाल वट- वृक्ष एक छोटे से बीज की ही प्रतिकृति होती है, उसी प्रकार वेदों में सन्निहित सारी शिक्षाएँ तथा सारी विद्याएँ बीज रूप से गायत्री महामन्त्र में विद्यमान हैं।

इन २४ अक्षरों में सूत्र रूप से समाविष्ट प्रेरणाओं और शिक्षाओं पर गम्भीरतापूर्वक विचार और मनन चिन्तन किया जाये तो लगता है कि विश्व के समस्त धर्म- ग्रन्थों एवं नीति- शास्त्रों का निचोड़ इन थोड़े से अक्षरों में गागर में सागर की तरह भर दिया गया है। व्यक्ति एवं समाज की सर्वतोमुखी- सर्वकालीन समस्याओं का हल, समस्त उलझनों का समाधान इस महामन्त्र की मूल शिक्षाओं से मिल सकता है। यह चौबीस शब्द सारगर्भित हैं कि ऋषियों को उनकी विवेचना, व्याख्या करने के लिये ज्ञान वेदों का आवरण प्रस्तुत करना पड़ा।

प्राचीन काल में ऋषियों ने गायत्री के तत्त्व- ज्ञान की गम्भीरतापूर्वक शोधन किया और इस गहन समुद्र में गहराई तक प्रवेश करके ज्ञान- विज्ञान की अतुलित रत्न राशि का लाभ लिया था । विश्वामित्र तो उसी के विशेष ऋषि कहलाये। उन्होंने स्वयं और अपने सहचरों सहित इस महाविद्या के रहस्यों को जानने के लिये समस्त जीवन खपाया और उन्होंने जो पाया, उसका लाभ समस्त आध्यात्मिक जगत ने उठाया ।

वेदों में ज्ञान भी आवश्यक है और विज्ञान भी । गायत्री के अक्षरों में से प्रस्फुटित होने वाली शिक्षा मनुष्य- समाज की भौतिक एवं आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान करती है, सुख- शान्तिमय जीवन बिताने का प्रभावपूर्ण मार्गदर्शन करती है। यदि कोई उस प्रकाश का अवलम्बन लेकर अपने कदम उठाता चले तो आनन्द और उल्लास से भरा वैसा ही स्वर्गीय जीवन जी सकता है, जैसा कि जीने के लिये यह मानव- प्राणी इस वसुधा पर अवतीर्ण हुआ है।

गायत्री में सन्निहित विज्ञान तो इतना महान् है कि वर्तमान भौतिक विज्ञान के समस्त चमत्कार उसकी तुलना में तुच्छ ठहराये जा सकते हैं। बेशक, पिछली दो सदियों में विज्ञान ने बहुत उन्नति की है। एक से एक बढ़ कर सिद्धान्तों, यन्त्रों और सुख- साधनों का आविष्कार करके एक चमत्कार उत्पन्न किया है। भविष्य में उसकी और भी अधिक उन्नति सम्भावित है, पर साथ ही यह भी निश्चित है कि अध्यात्म की महत्ता एवं उपयोगिता भौतिक विज्ञान की तुलना में असंख्य गुनी अधिक है।

भारत पूर्वकाल में विज्ञान के उच्च शिखर पर जा पहुँचा था। उसके गौरव को विश्व में सर्वोपरि बनाने में इस विज्ञान को ही श्रेय था । दिव्य अस्त्र-शस्त्र, शरीरों में अकूत बल, धन- समृद्धि का इतना बाहुल्य था कि स्वर्ण कलश हर घर पर रखें हों। अकूत आत्म बल और आन्तरिक शक्तियों के बल पर अभीष्ट परिस्थितियाँ तथा साधन- सामग्री उत्पन्न कर सकने की क्षमता हमारे पूर्वजों की विशेषताएँ थी। जहाँ वेद, ब्रह्म- विद्या एवं आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान के आधार पर, भावनात्मक स्तर पर देवताओं जैसे पवित्र बनकर इस धरती पर स्वर्ग अवतरण कराने में सफल हुए थे, वहीं उन्होंने विज्ञान के आधार पर प्रत्येक प्रकार की स्मृतियाँ भी अर्जित की थीं। यही कारण है कि इस धरती के समस्त निवासियों ने उन्हें भूसुर, धरती के देवता कहकर सम्मानित किया था, जगद्गुरु एवं चक्रवर्ती शासन के महान उत्तरदायित्वों को सौंपा था और जीवन की प्रत्येक दिशा में उनका नेतृत्व स्वीकार किया था। यह उनके विज्ञान की महिमा थी ।

वह विज्ञान आज जैसा न था जो महँगी तथा आये दिन टूटती- फूटती रहने वाली तथा निकम्मी हो जाने वाली मशीनों के आधार पर चलता हो। तेल, कोयला, पेट्रोल, बिजली आदि ईंधन इस दुनिया में बहुत कम है। जिस गति से वैज्ञानिक प्रयोजनों में कल- कारखानों तथा मशीनों में खर्च हो रहो है, उसे देखते हुए यह सब सामग्री सौ- डेढ़ सौ वर्षों में समाप्त हो सकती है और तब आज का यह तन्त्रनादि विज्ञान बेमौत मर सकता है। भारतीय तत्त्वदर्शी वैज्ञानिकों ने, ऋषियों ने जिस विज्ञान का आविष्कार किया था वह यन्त्रों पर नहीं तन्त्रों पर आधारित था । मानव- शरीर हाड़- मांस का पुतला ही नहीं वरन् उसमें एक से एक बढ़कर चमत्कारी शक्ति केन्द्र प्रसुप्त अवस्था में पड़े हैं। षटचक्र, २४ उपचक्र, ५२ उपत्यिकायें, १०८ ग्रन्थियों और महारन्ध्र की सहस्र काकेशिक स्फुरणायें उतनी शक्ति तत्त्वों से ओत- प्रोत हैं कि यदि उनमें से थोड़ी सी भी जागृत की जा सकें तो इतनी बड़ी उपलब्धियाँ हाथ में आ सकती हैं जिनकी तुलना में वर्तमान विज्ञान की भौतिक उपलब्धियाँ नगण्य एवं तुच्छ ही सिद्ध होंगी। प्राचीन काल में ऋषि, महर्षि अपने शरीरों की प्रयोगशाला में ऐसे ही परीक्षण किया करते थे, योगाभ्यास के द्वारा जो ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ उपलब्ध करते थे उनके चमत्कारों का आधार कोई जादू नहीं वरन् यह आत्म- विज्ञान ही होता था, वेदों में इस प्रकार के आत्म- विज्ञान का विस्तारपूर्वक वर्णन हुआ है।

वेदों में वर्णित विज्ञान की क्षमता का पता लगाने के लिये जर्मन सरकार ने कुछ समय पूर्व महत्त्वपूर्ण प्रयत्न किया । जर्मन प्रोफ़ेसर मैक्समूलर भारत आये और यहाँ के वेद विद्वानों की सहायता से उन्होंने ऋग्वेद का जर्मन भाषा में अनुवाद किया था। इस शोध कार्य के लिये जर्मन सरकार ने लाखों रुपया खर्च किया था इसके बाद ही जर्मनी ने इतनी बड़ी वैज्ञानिक उन्नति की कि वह थोड़े ही समय में समस्त विश्व में चक्रवर्ती शासन स्थापित करने का सपने देखने लगा। पिछले दो महायुद्ध उसी ने आरम्भ किये। अपनी शक्ति का ठीक अन्दाज न लगा सकने के कारण वह परास्त तो अवश्य हुआ, पर अपनी उपलब्धियों के कारण वह संसार भर के लिये आज भी एक आश्चर्य एवं रहस्य बना हुआ है। अणु- विज्ञान का आविष्कार सबसे प्रथम उसी ने किया, और देशों ने तो पीछे उसी के आविष्कार का लाभ उठाया है।

वेदों की ऋचाओं में सूत्र रूप से समाविष्ट आत्म- विज्ञान की महत्ता का क्षेत्र इतना बड़ा है कि उसकी जितनी भी शोध एवं साधना की जा सके, उतना ही कम है। प्राचीनकाल में इस दिशा में बहुत बड़ी प्रगति की थी, पर यह न समझना चाहिए कि उसमें आगे बढ़ने की गुंजायश न थी। आगे और भी बहुत कुछ हो सकना था और मनुष्य देवताओं की तरह अजर- अमर बनकर इस धरती को स्वर्ग बना सकता था, यदि उसके हाथ में वेदों का सन्निहित समस्त विज्ञान आ जाता। पर संसार चक्र परिवर्तनशील है। हम उत्थान से विमुख होकर पतन के गर्त में गिरे और उन पूर्व उपलब्धियों को गँवा बैठे। यदि उस विज्ञान से हम वंचित न हो गये होते तो इस दयनीय दुर्दशा में असहायों की तरह पड़े संत्रस्त न हो रहे होते।

ऊपर की पंक्तियों में जिस आत्म- विज्ञान की चर्चा की जा रही है वह वेद के दो अङ्कों में से- ज्ञान में से एक प्रमुख तत्त्व है। यह प्रथम ही कहा जा चुका है कि गायत्री वेदों का बीज मन्त्र है। किसी पेड़ में जो विशेषताएँ और सम्भावनायें होती हैं वे छोटे से बीज में सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहती हैं। मनुष्य की इतनी विशेषताओं वाला शरीर एवं मन अत्यन्त सूक्ष्म रूप से वीर्य कश के एक छोटे से बीज पिण्ड में मौजूद रहता है। ठीक इसी प्रकार वेदों में वर्णित विविध वैज्ञानिक उपलब्धियाँ गायत्री महामन्त्र के थोड़े से बीज रूप में भी भरी पड़ी हैं। इस महाशक्ति की जो ठीक तरह साधना कर सकता है, वह अनुपम स्तर का शक्तिवान बन सकता है।



व्यायाम के द्वारा शरीर पुष्ट होता है, अध्ययन से विद्या आती है, श्रम से धन कमाया जाता है, सत्कर्मों से यश मिलता है, सद्गुणों से मित्र बनते हैं। इसी प्रकार उपासना द्वारा अन्तरंग जीवन में प्रसुप्त पड़ी हुई अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ सजग हो उठती हैं और उस जागृति का प्रकाश मानव- जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक विशिष्टता का रूप धारण करके प्रकट करता हुआ प्रत्यक्ष होता है। गायत्री -उपासक में तेजस्विता की अभिवृद्धि स्वाभाविक है। तेजस्वी एवं मनस्वी व्यक्ति स्वभावतः हर दिशा मे सहज सफलता प्राप्त करता चलता है।

मानवी मस्तिष्क मे जो शक्ति- केन्द्र भरे पड़े हैं, उनका पूरी उपयोग कर सकना तो दूर, अभी मनुष्य को उनका परिचय भी पूरी तरह नहीं मिला है । मनोवैज्ञानिकों को अन्तर्मन की जितनी जानकारी अभी तक विशाल अनुसंधानों के बाद मिल सकी है, उसे वे दो प्रतिशत के लगभग ही मानते हैं। प्रसुप्त मन की ९८ प्रतिशत जानकारी प्राप्त करना अभी शेष है । इसी प्रकार शरीर- शास्त्र डॉक्टरों ने बाहरी मस्तिष्क का केवल ८ प्रतिशत ज्ञान ही प्राप्त किया है शेष के बारे में वे भी अभी अनजान हैं। मस्तिष्क सचमुच एक जादू का पिटारा है। इसमें सोचने- समझने की क्षमता तो है ही, साथ ही उसमें ऐसे चुम्बक- तत्त्व भी हैं जो अनन्त आकाश में भ्रमण करने वाली अद्भुत सिद्धियों, विभूतियों एवं सफलताओं को अपनी ओर खींच कर आकर्षित कर सकते हैं, सूक्ष्म जगत में अपने अनुकूल वातावरण बना सकते हैं। जिन व्यक्तियों के साथ अपनी कामना आकांक्षा का सम्बन्ध है, उन पर ऐसा प्रभाव डाला जा सकता है उसे हमारे अनुकूल ही गतिविधि अपनानी पड़े । गायत्री -उपासना के द्वारा उपासक में ऐसे ही मानसिक चुम्बक- तत्त्व सक्रिय उठते हैं। मनोबल बढ़ने से ऐसी विद्युत्धारा अन्तर्मन के प्रसुप्त क्षेत्रों में गतिशील हो जाती है कि अब तक अपने प्रयोजन में आया हुआ मस्तिष्कीय चुम्बक सक्रिय हो उठता है और वे उपलब्धियाँ सामने लाकर खड़ी कर देता है, जिन्हें आमतौर से सिद्धियों, विभूतियों का ‘वरदान’ एवं दैवी सहायता कहा जा सके ।

उपासना में बरती गई तपश्चर्या से द्रवित होकर गायत्री माता ने अमुक सिद्धि सफलता प्रदान की यह भावुक भक्त का दृष्टिकोण है। इस तथ्य का वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि कठोर नियम, प्रतिबन्धों का पालन करने में जो प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ी, उसने मनोबल का विकास किया। उसने अन्तर्मन के सुप्त शक्ति- केन्द्रों का चुम्बकत्व जगाया और उसी जागरण ने अभीष्ट सफलताएँ खींचकर सामने ला खड़ी कर दी । मनुष्य अपने आप में एक देवता है। उसके भीतर वे समस्त दैवी शक्तियाँ बीज- रूप में विद्यमान रहती हैं जो इस विश्व में अन्यत्र कहीं भी हो सकती हैं । अन्यत्र रहने वाले देवता अपनी निर्धारित जिम्मेदारियाँ पूरी करने में लगे रहते हैं। वे हमारे व्यक्तिगत कार्यों में इतनी अधिक दिलचस्पी नहीं ले सकते कि अगणित उपासकों या भक्तों की अगणित प्रकार की समस्याओं को सुलझाने में संलग्न हो सकें। हमारी समस्याओं को हल करने की क्षमता हमारे अपने भीतर रहने वाले देवताओं में होती है और उसी को किसी अनुष्ठान द्वारा सशक्त एवं गतिशील बना करके साधक को अपना प्रयोजन वस्तुतः आप ही पूरा करना पड़ता है। गायत्री अनुष्ठान के लिये विधि- विधान द्वारा बढ़ने वाले मनोबल द्वारा यदि वह सक्रिय हो उठे तो अभीष्ट सफलतायें प्राप्त कर सकने की परिस्थितियाँ निर्मित या उपलब्ध कर सकना उसके लिये अधिक कठिन नहीं रहता ।

गायत्री -उपासना मनुष्य- जीवन को बहिरंग एवं अन्तरंग दोनों ही दृष्टियों में समृद्ध और समुन्नत बनने का राजमार्ग है। बाह्य उपचार से बाह्य जीवन की प्रगति होती है, पर अन्तरंग विकास के बिना उसमें पूर्णता नहीं आ पाती। बाहरी जीवन की विशेषतायें छोटा- सा शोक, संताप, रोग, कष्ट, अवरोध एवं दुर्दिन सामने आते ही अस्त- व्यस्त हो जाती है, पर जिस व्यक्ति के पास आन्तरिक दृढ़ता, समृद्धि एवं क्षमता है, वह बाहर के जीवन में बड़े से बड़ा अवरोध आने पर भी सुस्थिर बना रहता है और भयानक भँवरों को चीरता हुआ अपनी नाव को पार ले जाता है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक शान्ति के लिये उपासना की वैज्ञानिक प्रक्रिया अचूक साधना है और कहना न होगा कि उपासनाओं में सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोपरि एकमात्र गायत्री महामन्त्र की उपासना ही है।





परम प्रेरणाप्रद गायत्री उपासना - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

गायत्री महामंत्र की शक्ति असाधारण है ।। उसमें भरी हुई शिक्षा को यदि हृदयंगम किया जा सके, विचारणा को सद्बुद्धि में, ऋतम्भरा प्रज्ञा में परिणत किया जा सके तो समझना चाहिए कि नर को नारायण रूप में परिणत होने की सम्भावना का पथ प्रशस्त हो गया। इन अक्षरों का गुन्थन शब्द- विद्या के उस रहस्यमय सूत्रों के आधार पर किया गया, जिनके कारण षटचक्र, तीन ग्रन्थियाँ, बावन उपत्यिकायें जैसे प्रसुप्त शक्ति- केन्द्रों का जागरण होता है और मनुष्य सामान्य से असामान्य बनने की दिशा मे बढ़ चलता है। गायत्री साधना की उत्कृष्टता के सम्बन्ध में किसी भारतीय धर्मानुयायी को संदेह करने की गुंजायश नहीं है। सन्ध्या के रूप में दैनिक आवश्यक धर्म- कर्तव्य निर्धारित किया गया है। शिखा और यज्ञोपवीत के रूप में मस्तक और हृदय जैसे आधार अंकों पर गायत्री की ही प्रतिष्ठापना है। प्रायः सभी अवतार , ऋषि, योगी और तत्त्वेता गायत्री उपासना के माध्यम से आत्मबल अभिवर्धन और भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा करते रहे हैं । निस्संदेह योगाभ्यास के मंत्र साधना के क्षेत्र में गायत्री मंत्र की गरिमा सर्वोपरि है । जीवन- शोधन की परिष्कार साधनाओं में उसका स्थान सबसे अगला और सबसे ऊँचा है ।

प्रत्यावर्तन- प्रक्रिया में गायत्री- उपासकों को पवित्रीकरण, आचमन, शिखा- बन्धन, प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी पूजन- इन षट् कर्मों की ब्रह्म संध्या के उपरान्त आधा घण्टे तक गायत्री जप करना होता है। इतने समय में पाँच मालाएँ हो जाती हैं । मालाएँ फेरना अनिवार्य नहीं है। आधा घण्टा समय की अवधि घड़ी देखकर भी पूरी की जा सकती है। जप- साधना में नियत समय, नियत स्थान, नियत संख्या का जो नियम है, उसका यहाँ पूरा- पूरा ध्यान रखा गया है। कंठ, होंठ, जीभ तीनों ही चलते रहें पर ध्वनि इतनी मन्द हो कि पास बैठा मनुष्य उसे ठीक तरह से सुन न सके, मात्र स्फुट गुँजन ही होता रहे।

जप के समय ध्यान आवश्यक है। मन को काम न मिले तो वह भागेगा ही। जीभ से शब्दोच्चार होता है, उँगलियों से माला जपी जाती है, किन्तु आमतौर से मन को खाली छोड़ दिया जाता है, ऐसी दशा में उसका अनियंत्रित और अव्यवस्थित रूप से इधर- उधर भागना स्वाभाविक ही है। मन कहीं, क्रिया कहीं वाली स्थिति ही हो, तो बात कुछ नहीं है। उपासना में तन्मयता और श्रद्धा का गहरा पुट होना चाहिए, तभी उसका कुछ प्रयोजन है अन्यथा कुछ शब्दों की पुनरावृत्ति करते रहने मात्र से कुछ बड़ा प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा।

गायत्री उपासना के समय ध्यान नितान्त आवश्यक है। यह दो प्रकार का हो सकता है, एक साकार, दूसरा निराकार। दोनों में से इच्छानुसार किसी को भी चुना जा सकता है। किन्तु प्राण- प्रत्यावर्तन साधना के अन्तर्गत चल रहे सत्रों में परामर्श यही दिया जाता है कि साकार उपासना में भावना- उत्कर्ष की गुंजायश रहती है, उससे लाभ उठायें। यह लाभ प्रायः निराकार साधना में नहीं मिल पाता। निराकार साधना के लिए दूसरी कई विधियाँ मौजूद हैं, अस्तु। यही उपयुक्त समझा गया है कि निर्धारित साकार ध्यान को ही प्रथम दिया जाये।

प्रचलित ध्यान साधनाओं में एकांगी अतिवाद का बाहुल्य रहता है। यों तो ‘मो सम कौन कुटिल खल कामी’ के रूप में अपने को चित्रित किया जाता है, या फिर शिवोऽहम् सच्चिदानंदोऽहम् की ध्वनि लगाई जाती है। ये दोनों ही स्थितियाँ मनुष्य की हो तो सकती हैं, पर उत्थान और पतन की चरम परिणति है। पतित होते- होते मनुष्य, पशु अथवा नर- पिशाच हो सकता है और उत्कर्ष की ऊँची सीढ़ी पर चढ़ते हुए उसका नर नारायण बन जाना नितान्त संभव है, परन्तु सामान्य स्थिति में वह इन दोनों ओर छोरों के बीच का मध्य बिन्दु है। देव अपनी ओर खींचते हैं, असुर अपनी ओर। दोनों में यह जिधर भी चल पड़े ,, उधर ही आशाजनक प्रगति कर सकता है।

हमें वस्तुस्थिति समझनी चाहिए और तामसी असुरता को निरस्त करके सतोगुणी करके सतोगुणी देवत्व की ओर प्रगति करनी चाहिए। ध्यान- धारणा का लक्ष्य भी यही होना चाहिए। उसमें ऐसे भाव- चित्र प्रस्तुत किये जाने चाहिए जिनमें अपनी अवांछनीय स्थिति की ओर समुचित ध्यान देने, उसकी हानियों को समझने और उन्हें निरस्त करके उच्चस्तरीय स्थिति प्राप्त करने की प्रेरणा भरी पड़ी हो। इस प्रकार के उभय पक्षीय प्रयोजन सिद्ध करने वाली ध्यान- धारणाओं को ही शृंखला प्रत्यावर्तन- सत्र की विभिन्न विधि व्यवस्थाओं में भरी पड़ी है। बिन्दुयोग -त्राटक प्राणयोग- (सोऽहम्- साधना) , आत्मबोध (छाया- दर्पण), तत्त्वबोध (प्रथक्करण)- इन चारों साधनाओं में इसी तथ्य को ध्यान में रखा गया है। जितना समय इन साधनाओं में है, उसका आधा समय विकृतियों को समझने और निरस्त करने में लगाया है। आधा समय भावी उत्कृष्टता की स्थिति के स्वर्णिम चित्र मूर्तिमान करने के लिए हैं। अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना, दुष्कृतों का नाश और साधुता का परित्राण, यही तो भगवान के अवतार का उद्देश्य है। उपर्युक्त ध्यान- धारणाओं का स्वरूप निर्धारण भी इसीदृष्टिकोण के आधार पर रखा गया है।

गायत्री उपासना के लिए आधा घंटा पाँच माला- जप निर्धारित है। इसमें पन्द्रह मिनट निषेधात्मक और पन्द्रह मिनट विधेयात्मक चिन्तन के लिए हैं। बिजली की ऋण और धन धाराएँ मिलकर ही प्रवाह उत्पन्न करती हैं। इस प्रकार ध्यान धारणा में उभय पक्षीय संतुलन मिलने से ही उसकी पूर्णता और प्रभावशीलता बनती है। इसी तथ्य को प्रस्तुत क्रम में समाविष्ट किया गया है।

जप आरम्भ करने के साथ- साथ ध्यान- धारणा में अपने स्वरूप की स्थापना इस रूप में करनी चाहिए कि मैं एक छोटा बालक हूँ, टट्टी और गन्दगी में लिपटा हुआ। हाथ- पैर सभी को उस गन्दगी से पोत कर घिनौना बना लिया है। माता की गोदी में लेने का अनुरोध करता हूँ, पर वह सुनती ही नहीं और भवें तरेरते हुए स्पष्ट कर देती है, कि जब तक गन्दगी को धोकर सफाई न कर ली जायेगी तब तक गोद में लेने की, प्यार करने की बात नहीं बनेगी। ठीक भी है, बच्चे की गन्दगी के कारण मां अपने कपड़े और शरीर को गंदा क्यों करे? गोदी में लेने का आग्रह रोते- बिलखते किया जा रहा है, पर माता की ओर से इसकी कोई सुनवाई नहीं की जा रही है ।

ध्यान का उत्तरार्द्ध पन्द्रह मिनट का यह है कि माँ ने अपने छोटे बच्चे शरीर को स्नान कराया, मलीनता के कणों को धोकर साफ किया, गोदी में उठाया, अच्छे कपड़े पहनाये, प्यार किया, दूध पिलाया। अपनी सहज करुणा का भाव भरे वात्सल्य का परिचय दिया और मनोकामना पूर्ण करके हर्षोल्लास का अनुदान प्रदान किया।



गायत्री जप के समय का यही द्विपक्षीय ध्यान है। इसमें उस कारण का स्पष्टीकरण है जिससे साधकों को इष्टदेव का अनुग्रह प्राप्त करने से वंचित रहना पड़ता है। उस सुझाव का भी निर्देश है, जिसे अपनाने पर ईश्वर- प्राप्ति जैसा महान सौभाग्य मिल सकता है। जब तक हम कषाय- कल्मष दोष- दुर्गुणों में सिर से पैर तक डूबे पड़े हैं, तब तक कैसे आशा कर सकते हैं कि भगवान हमें अपना अतिरिक्त स्नेह- अनुग्रह प्रदान करेंगे। भगवान का प्यार पूजा- पत्री के छुट- पुट कर्मकाण्डों पर अवलम्बित नहीं है। वे नियम- रूप हैं और मर्यादा एवं व्यवस्था के अन्तर्गत ही किसी की कुछ सहायता कर सकते हैं। खुशामद और रिश्वत देकर भगवान से लम्बी- चौड़ी याचनाएँ करना और मनोकामनाओं के सपने देखना निरर्थक हैं। इस बाल- कल्पना का वस्तुतः कोई मूल्य है भी नहीं। मनुष्य अपने चिन्तन और कर्तृत्व का स्तर ऊँचा उठा सकता है। इसी तथ्य के लिए आवश्यक अन्तः प्रेरणाएँ प्राप्त करना साधना- उपक्रम का उद्देश्य होता है।

गायत्री मंत्र का, जप का अपना महत्त्व है। उपर्युक्त ध्यान- धारण के साथ में जुड़ जाने का अतिरिक्त महत्त्व है। एक तो चिन्तन के लिए, कल्पना के लिए विस्तृत क्षेत्र मिल जाता है और मन को उसमें उलझा रहने का अवसर मिलता है। मन को एक नियत- निर्धारित काम मिल जाने से उसकी अनावश्यक और अवांछनीय घुड़दौड़ बन्द हो जाती है। चित्तवृत्तियों के निरोध की आवश्यकता बहुत हद तक इससे पूरी होती है। इसके अतिरिक्त आत्म- शोधन का, परिष्कृत जीवन- क्रम अपनाने पर ही पूर्णता का, भगवत् प्राप्ति का लक्ष्य प्राप्त हो सकने की सचाई हृदयंगम होती है। दोनों ही प्रयोजन इस ध्यान- उपक्रम के साथ गायत्री उपासना करने से पूरे होते हैं।

गायत्री- जप के अनन्तर उसकी पूर्णाहुति सूर्य अर्घ्य- दान के रूप में होती है। गायत्री का देवता सविता- सूर्य है। गायत्री को सूर्य- मंत्र भी कहा जाता है। साकार हो अथवा निराकार, गायत्री की प्रतिमा सूर्य सहित ही बनती है। गायत्री माता का साकार रूप होगा तो उसके मुख मण्डल के इर्द- गिर्द सूर्य जैसा तेजोवलय चित्रित किया जायेगा। ‘‘सूर्य मण्डल मध्यस्था’’ शास्त्र वचन के अनुरूप ऐसे चित्र भी बने हैं जिनमें सूर्य- मण्डल के बीच गायत्री माता का पूरा शरीर है। निराकार उपासक सूर्य जैसे प्रकाश बिन्दु को अपने ध्यान का आधार बनाते हैं। सूर्योपस्थान संध्यावन्दन की बात भी जुड़ी है। गायत्री- जप के समय जल- कलश एक लोटे में स्थापित किया जाता है और जप पूर्ण होने पर सूर्य के सम्मुख खड़े होकर जल की धार उस कलश से छोड़ते हुए अर्घ्यदान किया जाता है।

यह पूर्णाहुति यद्यपि है तनिक सी, पर उनका महत्त्व बहुत है। जल अपनी आत्मसत्ता का प्रतीक है और सूर्य समष्टि गत सर्वगत ब्रह्मसत्ता का प्रतिनिधि है। जल को अर्थात् अपने व्यक्तित्व की धार बाँध कर अनवरत गति से भगवान के चरणों पर लोकमङ्गल के पुण्य- प्रयोजनों पर समर्पित किया जाता है, इसी के साथ परमार्थ जीवन की दिशा में बढ़ चलने का भाव संकेत सूर्यार्घ्यदान में सन्निहित है। सूर्य भगवान के सम्मुख जल चढ़ाते हुए यही भावनायें उमड़नी चाहिए कि समर्पण- योग की उच्चतम स्थिति प्राप्त करके रहेंगे। भगवान को जो महानतम देना था, सो वे मानव शरीर के रूप में दे चुके ।। इससे बड़ी सम्पदा उनके पास कुछ थी भी नहीं। अब अपनी बारी है कि अनुदान का प्रतिपादन प्रस्तुत करें। अपनी विभूतियों और सम्पत्तियों को उनके चरणों पर, उनके उद्यान विश्व को सुन्दर- समुन्नत बनाने के लिए नियोजित करें।

वस्तुतः समर्पण ही योग- साधना की सबसे ऊँची और सबसे प्रभावी स्थिति है। जब मनुष्य समस्त ऐषणायें, तृष्णायें, लिप्सायें भगवान के चरणों पर समर्पित करके कामना- रहित बन जाता है और ईश्वरीय निर्देशों पर चलने की बात ही अन्तःकरण के मर्मस्थल में बसा लेता है, स्वभावतः उसका चिन्तन उत्कृष्ट और कर्तृत्व आदर्श स्तर का बन जाता है। उसी को ब्रह्म- ज्ञानी को, ईश्वर भक्ति की यथार्थ भूमिका कह सकते हैं। इसे जो आत्मा सम्पन्न कर सके, समझना चाहिए उसने ईश्वर के साथ अपना विवाह कर लिया। सर्व विदित है कि पतिव्रता पत्नी अपना शरीर और मन सर्वतोभावेन पति के चरणों पर समर्पित करती है और उसी की इच्छा के अनुरूप अपनी इच्छा, प्रकृति एवं क्रिया का निर्माण निर्धारण करती है। फलस्वरूप पत्नीव्रता पति भी उस पर अपने प्राण निछावर करता है और अपने सर्वस्व की स्वामिनी घोषित करता है।

पत्नी को बेशक बहुत क्या, सब कुछ ही देना पड़ता है, पर बदले में उसे अपने से भी सुयोग्य सहचर को कौड़ी- मोल खरीद लेने का अवसर मिलता है। ठीक यही बात भक्त और भगवान के पारस्परिक सम्बन्धों पर लागू होती है। जब भक्त अपना चिन्तन और कर्तृत्व भगवान की आकांक्षा के अनुरूप ढालने वाला सच्चा समर्पण प्रस्तुत करता है, तो बदले में भगवान भी उसे अपनी समग्र सत्ता समर्पित कर देते हैं, यही बात पति- पत्नी के सम्बन्ध में भी लागू होती है। इस सघनता का, एकता का एकमात्र आधार पारस्परिक समर्पण- भाव ही है, यदि वे इससे बचें और सस्ती वाचालता से एक दूसरे को बहकावे, स्वार्थ अपने- अपने अलग रखें तो फिर वेश्यावृत्ति जैसे स्थिति बन जायेगी। भक्त और भगवान के बीच सच्चा समर्पण ही सार्थक होता है। छद्म या बहकावे को भगवान भली प्रकार समझते हैं और ऐसे जाल- जंजाल की धूर्तता से कोसों दूर रहते हैं।

सूर्यार्घ्यदान के पीछे समग्र रूप में यही तत्त्वज्ञान सन्निहित है। यज्ञ में घृत की धार बाँध कर वसोर्धारा विधा किया जाता है। अर्घ्य में भी वही भाव है। यज्ञ- भगवान के प्रति अपना भावभरा स्नेह बहुमूल्य पदार्थ वैभव समर्पित करने का संकेत वसोर्धारा में है। सूर्य रूपी ब्रह्मयज्ञ में अपने सलिल- व्यक्तित्व को समर्पित करके तुच्छता की परिधि तोड़कर महानता की भूमिका में विचरण करने वाला साधक वहाँ पहुँचता है, जहाँ पहुँचना जीवन का चरम लक्ष्य है। सूर्योपासना बाह्य दृष्टि से अन्यान्य कर्म- काण्डों की तरह ही एक साधारण उपचार प्रक्रिया प्रतीत होती है, पर सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर उसमें वे सभी लक्ष्य जुड़े हुए दृष्यमान होंगे, जिन पर चरम आत्मोत्कर्ष की सम्भावनायें आधारित होती हैं।


‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ सूत्र के अन्तर्गत अन्धकार से बच कर प्रकाश की ओर चलने का जो संकल्प व्यक्त किया गया है, उसे अधिक स्पष्टतापूर्वक भाव भूमिका में उभारने के लिए सूर्य देवता की दिव्यज्योति से सहायता ले सकते हैं। प्रकाश के सम्मुख अन्धकार नहीं ठहरता। सद्ज्ञान रूपी सूर्य अन्तःकरण में उदय है तो उन अन्धकारों में भटकने का काई कारण नहीं रह जाता जिनकी भूल- भुलैयों में उलझे रहने से दिग्भ्रान्त रहते हुए हम अपने प्रयाण- पथ से ही भटक गये। इस भटकाव को दूर करके ईश्वर के अंशधारी राजकुमार को सत्य और तथ्य का दर्शन करा सकने योग्य प्रकाश की आवश्यकता है। कोई भी भावुक- अन्तःकरण सूर्य, परमात्मा के प्रत्यक्ष और प्रचण्ड प्रकाश को सामने उपस्थित देखकर उसके सहारे जीवन- यात्रा के सही मार्ग को समझने और उस पर चल पड़ने की प्रेरणा प्राप्त कर सकता है।

सूर्य अनुशासन का नियमित क्रम- व्यवस्था का प्रतीक है। कर्मयोग उसकी विशेषता है। अपने आकर्षण में सौर- मण्डल के ग्रह- उपग्रहों को बाँधे हुए है और प्रकाशवान भी कर रहा है, उन्हें गति भी दे रहा है। इसी मार्ग का हमें भी अनुसरण करना चाहिए। अपने को नियमित क्रमबद्ध, कर्तव्य परायण, प्रकाश पुञ्ज, मनस्वी और तपस्वी बनाकर, लोक मंगल के लिए, अहर्निश संलग्न रहने के लिए तत्पर कर सकते हैं। अपने आकर्षण में असंख्य प्रतिभावों को आबद्ध किये रह सकते हैं। अगणितों को प्रकाश दे सकते हैं। इस स्तर का व्यक्तित्व विनिर्मित किया जा सके तो समझना चाहिए कि सूर्य भक्ति सार्थक हो गई। भक्ति का तात्पर्य ही इष्टदेव का अनुकरण अनुगमन करना है। हनुमान की भक्ति सच्ची थी, वे इधर ही चले जिधर भगवान राम ने चरण बढ़ाये। अर्जुन ने कृष्ण के अंगुलि- निर्देश को ध्यान में रखकर ही अपनी समग्र रीति- नीति निर्धारित की। भक्ति का तरीका ही यह है। मात्र पूजा- पत्री की टण्ट- घण्ट से भक्ति का उद्देश्य कहाँ पूरा होता है। गायत्री मन्त्र के देवता सविता की आराधना का संक्षिप्त किन्तु अति प्रेरणाप्रद उपक्रम सूर्यार्घ्यदान है।

अध्यात्म की भाषा में प्रकाश शब्द का उपयोग सद्ज्ञान के अर्थ में होता है। ज्ञान अपने आप में परम ज्योति है, उससे अज्ञानान्धकार दूर होता है। सूर्य को माध्यम मान कर उसकी, परमज्ञान की, तत्त्वज्ञान- ब्रह्मज्ञान की आराधना की जाती है, जिससे अपने विविध विधि अज्ञानान्धकारों का निराकरण हो सके और दूर- दूर तक के क्षेत्र को प्रकाशित- प्रभावित करने की क्षमता प्राप्त हो सके। आसमान में चमकने वाला अग्नि पिण्ड- भौतिक सूर्य तो मात्र अन्धेरा ही दूर कर सकता है और सर्दी को हटाकर तापमान बढ़ा सकता है। जिस परम तेजस्वी सविता की हम उपासना करते हैं, अर्घ्य चढ़ाते हैं, वह उससे ऊँचा है ,, आगे है, वह प्रेरणा भरे सद्ज्ञान से ओतप्रोत सविता है। वही हमारा परम उपास्य आराध्य है। उदय- अस्त होने वाला सूर्य तो उसकी प्रतिमा भर कहा जा सकता है। दृश्य प्रतिमाओं के आधार पर जिस प्रकार परब्रह्म की शक्तियों के प्रति आस्था उभारी जाती है, उसी प्रकार अग्नि- पिण्ड सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हुए परब्रह्म सविता देवता की प्राण- प्रेरणा का आह्वान करते हैं और जलधारा चढ़ाते हुए उसमें अपना उत्सर्ग का संकल्प व्यक्त करते हैं।

चढ़ाया हुआ जल भूमि पर गिरता है और सूर्य की गर्मी से भाप बनकर अनन्त आकाश में बिखर जाता है। पीछे वह ओस, बादल आदि बनकर भूमि की तृषा और वनस्पतियों की आवश्यकता पूरी करते हुए अपने को धन्य बनाता है। उपास्य सविता देवता हमारे क्षुद्र कलश में भरे हुए सलिल व्यक्तित्व को यदि अर्घ्य रूप में स्वीकार कर सके तो निश्चय ही वे हमें बादल बनकर अनन्त मंष बिखर जाने और वर्षा बिन्दुओं में परिणित होकर इस वसुधा की तृष्णा शान्त करने की प्रेरणा देंगे। यदि ऐसा अनुदान, वरदान मिल सके तो समझना चाहिए कि गायत्री- उपासना के अन्त में प्रस्तुत की जाने वाली पूर्णाहुति सूर्यार्घ्यदान- प्रक्रिया सार्थक एवं फलित हो गई।






महाप्रज्ञा का दर्शन एवं आराधना - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

साधना का एक ही उद्देश्य है, आत्मोत्कर्ष व्यक्तित्व का परिष्कार। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि बहिरंग या अंतरंग क्षेत्र का जो भी काम हाथ में लिया जायेगा वह पूरा होकर रहेगा। भले ही उसमें कुछ देर लगे। पर विकसित व्यक्तित्व वालों के लिए कोई कार्य असंभव नहीं। कोई कार्य इसलिए कहा जा रहा है कि उत्कृष्ट चिन्तन के रहते उच्चस्तरीय लक्ष्य ही निर्धारित होते हैं। निकृष्टता न तो उन्हें रूचती है और न उनके पास फटकती है। वे जो कुछ भी सोचते हैं, वह खरा होता है। सोने का खरा- खोटा परखने के लिए उसे कसौटी पर कसा और आग पर तपाया जाता है। इसी प्रकार अध्यात्म- प्रकृति के व्यक्ति आत्म- कल्याण और लोक- मंगल के दो आसारों के साथ जुड़ा हुआ निर्धारण निश्चित करते हैं। सद्बुद्धि की देवी ऋतम्भरा प्रज्ञा इसी स्तर के परामर्श देती है और सच्चा साधक अपने इष्ट द्वारा दिये गये परामर्श एवं आदर्श की अवहेलना नहीं कर सकता।

संसार में अनेक देवी देवता हैं। अनेक जंत्र- मंत्र अनेक दर्शन और अनेक पूजा- विधान। सभी के प्रतिपादन- कर्त्ता अपनी बात की पुष्टि करने के लिए जो कुछ दार्शनिक पृष्ठभूमि पर समर्थन कर सकते हैं, अपने मत की पुष्टि करते हैं। उपदेशक भी व्यक्तित्ववान होते हैं। कथा- पुराण भी ऐसे सुनाते हैं, जिनको प्रमाण मान कर सामान्य जिज्ञासु का मन उसी ओर लुढ़कने लगता है। जिसने एक ही बात सुनी है, एक ही पगडंडी देखी है, उनके लिए पूर्वाग्रह और वातावरण के आधार पर मान्यता को अपना लेना कठिन नहीं। 

किन्तु जिन लोगों ने कई पक्षों का अध्ययन, श्रवण और मनन किया है, उनके लिए असमंजस खड़ा होता है। एक सम्प्रदाय से दूसरे की पटरी नहीं खाती। कभी- कभी तो थोड़ा- बहुत अन्तर होता है, किन्तु कभी- कभी मतभेद जमीन- आसमान जितना हो जाता है। भक्ति- पंथी राधा- कृष्ण के गुणानुवाद गाते- गाते नहीं थकते और उस स्मरण में भाव- विभोर हो जाते हैं, पर जो बौद्ध हैं, सांख्यवादी हैं, वे ईश्वर के अस्तित्व से ही इन्कार करते हैं। बौद्ध और जैन धर्म की ऐसी ही मान्यता है। हिन्दू धर्म के अन्तर्गत जैन धर्म अहिंसा को सर्वप्रमुख धर्म- लक्षण मानता है, किन्तु शाक्त लोगों की देवी पशुबलि लिए बिना संतुष्ट नहीं होती। वैदिक धर्म में पति- पत्नी का अविच्छिन्न युग्म होना चाहिए, पर किसी सम्प्रदाय में चार पत्नियाँ रखना भी धर्माचरण है और कुछ वर्गों में सभी जातियों की एक सम्मिलित पत्नी होती है। कुछ जातियों के लड़के को दहेज दिया जाता है और कई जातियों में लड़की की कीमत वसूल की जाती है। धार्मिक कहे जाने वालों में शाकाहारी भी होते हैं और मांसाहारी भी। ईश्वर के सम्बन्ध में भी ऐसे ही कथन हैं। कुछ निराकारवादी हैं, कुछ साकारवादी। कुछ में पूजा आवश्यक है, कुछ में श्वास के साथ सोऽहम् की भावना करना ही पर्याप्त है। देवता भी हर सम्प्रदाय के चित्र- विचित्र हैं उनके अनुग्रह के प्रतिफल तथा पूजा- पाठ के विधि- विधान भी सर्वथा पृथक्। 

ऐसी दशा में तर्क के जंजाल से बचने वाले तो पूर्वाग्रहों के सहारे अपनी गाड़ी खींच ले जाते हैं, पर जो तर्कवादी हैं, तथ्य तक पहुँचना चाहते हैं, प्रत्यक्ष प्रमाण और उदाहरण चाहते हैं, उनके लिए भारी कठिनाई आ खड़ी होती है कि इन भिन्नताओं के बीच किसे सच मानें, किसे झूठ। दूसरों को झूठ कहते ही विग्रह खड़ा होता है और सच कहने पर अनुयायी बनाना पड़ता है। सभी सच हैं, यह बात भी गले नहीं उतरती। जब सभी सच हैं तो मतभेद कैसा? सूर्य गरम और गतिशील है, इस तथ्य को सभी मानते हैं। यदि सम्प्रदायों के बारे में भी यही बात रही होती तो उन सब की मान्यता एक जैसी रही होती, ईश्वर का स्वरूप एक होता , उसका आदर्श भी सभी के लिए एक जैसा रहता। 

यदि झूठ कहते तो शास्त्रकारों और आप्तपुरुषों की अवमानना होती है। सब धर्मों की खिचड़ी मिलायी जाये, तो वह और भी अधिक विचित्र हो जाती है।अधिक से अधिक इतना ही हो सकता है कि नीति- शास्त्र के कुछ सिद्धान्तों का समर्थन सभी धर्मों में से किसी प्रकार खोज निकाला जाये। ऊपरी सतह पर ही किसी प्रकार एकता का प्रतिपादन हो सकता है। गहराई की ओर एक कदम उतरते ही असाधारण भिन्नताएँ नजर आती हैं। और ईश्वर तथा धर्म के सम्बन्ध में भारी मतिभ्रम उत्पन्न होता है। ऐसी दशा में साधना किसकी की जाये, किस सम्प्रदाय एवं प्रतिपादन का आश्रय लिया जाये। यदि शंकाओं को कुतर्क कहकर एक पल पकड़ने की बात सोची जाये तो मानवी अन्तराल के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई बुद्धि और विवेकशीलता विद्रोह करती है। 

ऐसी दशा में जब तक सर्वधर्म सम्मेलन होकर कोई एक निश्चय नहीं हो जाता, सार्वभौम धर्म नहीं बन जाता, तब तक हमें विवेक से ही काम लेना चाहिए। वही हमारा इष्ट होना चाहिए। उसी का आश्रय लेकर हम क्रमशः सत्य को अधिकाधिक समीप से देखने, समझने में समर्थ हो सकते हैं। 

ब्राह्मण ग्रन्थों में एक कथा आती है कि प्रलय काल में जब सभी देवता, शास्त्र, ऋषि समाप्त हो जायेंगे, तब फिर किसका अनुशासन जीवित रहेगा? उत्तर में परब्रह्म कहता है कि तब भी एक ऋषि जीवित रहेगा। उसका नाम है ‘विवेक’ । तर्क तो वेश्या है। वह किसी की भी गोदी में बैठ सकती है और किसी का भी सहयोग- समर्थन कर सकती है, पर विवेक ही एक ऐसा है जो समुद्र की कीचड़ में से भी बहुमूल्य मोती निकाल सकता है। उसका आश्रय लेने पर मनुष्य धोखा नहीं खाता । भटक भी जाये तो वही प्रवृत्ति फिर संकेत देती है और उसी राह पर चलने के लिए बाधित करती है, जो मानवी गरिमा के अनुकूल या अनुरूप है। अगणित ईश्वरों, सम्प्रदायों और प्रचलनों में से बीन- कुरेद कर जो अधिकाधिक औचित्यपूर्ण है, उसी को अपनाना सर्वोत्तम है। इस अवलम्बन को अपना लेने पर भी जो भ्रान्तियाँ भूलें रह जाती हैं, वे अन्तरात्मा के क्रमिक विकास के साथ- साथ सुधरती रहती हैं और मनुष्य सत्य के अधिकाधिक निकट पहुँचता जाता है। इसी अवलम्बन से यह संभव है कि पूर्ण सत्य को, परब्रह्म को प्राप्त किया जा सके और जीवन को सार्थक बनाया जा सके। 

विवेकशीलता का अवलम्बन ही गायत्री- साधना है। गायत्री को ही ऋतम्भरा, प्रज्ञा या दूरदर्शिता कहते हैं। यह एक ही कसौटी ऐसी है, जो अपनी न्यायशीलता के कारण प्रस्तुत प्रतिपादनों में से जो सर्वथा श्रेष्ठ था, उसे अपना सकती है और अपनी नाच मे बिठाकर भ्रान्तियों के जंजाल में से पार निकालकर सुरक्षित तट तक पहुँचा सकती है। आत्म- कल्याण और लोक- मंगल के सर्वानुमोदित तथ्यों को अपनाने में क्या छोड़ा और ग्रहण किया जाना चाहिए? इसका निर्णय तुरंत कर देती है।

ईश्वर की निकटतम स्थिति अपने अन्तःकरण में मानी गई है। यह किस रूप में हो सकती है, इसका सही उत्तर प्राप्त करता हो, तो एक शब्द में दूरदर्शी विवेकशीलता ही कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त अन्तराल में रहने वाली अनेक प्रकार की मान्यताएँ, भावनाएँ, आकांक्षाएँ सभी ऐसी होती हैं, जिनका व्यक्तिगत अभिरुचि एवं सम्पर्क- संस्कारों के साथ सम्बन्ध जुड़ता है। वे यथार्थवादी नहीं हो सकती । इसलिए गहन अन्तराल में परब्रह्म की उपस्थिति का अनुभव करने के लिए हमें महाप्रज्ञा का ही आश्रय लेना पड़ेगा। उस अकेली में ही वह सामर्थ्य है कि कटीली झाड़ियों में से उबार कर हमें सत्य के, ईश्वर के निकटतम पहुँचा सके। 


गायत्री- उपासना का दार्शनिक स्वरूप दूरदर्शी विवेकशीलता है, जो संकीर्ण स्वार्थपरता द्वारा समर्थित तात्कालिक लाभों से ऊँचा उठाती है और वहाँ ले पहुँचती है, जहाँ टिकाने पर अपना ही नहीं, समस्त सृष्टि का हित साधन हो सकता है।

आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है। शरीर का एक अंश मजबूती से पकड़ लेने पर समूची काया को पकड़ा जा सकता है। अन्तरात्मा में विद्यमान निष्पक्ष, न्यायनिष्ठ, उदात्त, आदर्शवादी, विवेकशीलता को अपना लेने पर समझना चाहिए कि ईश्वर की गरदन पकड़ ली गई और समूचे को भी आसानी से पकड़ा जा सकता है। यही है आत्मा का परमात्मा से मिलन। इसी को समर्पण कहते हैं। एकता या अद्वैत इसी को कहा गया है।

गायत्री- मंत्र का सार तत्त्व ‘धियो यो नः प्रचोदयात’ शब्दों में है, जिसका तात्पर्य है कि हम सबको विवेकशीलता की प्रेरणा मिले। इसमें धर्म और दर्शन का सार तत्त्व आ जाता है। इस सूत्र के आधार पर व्यक्तिगत जीवन की अथवा विश्व- व्यवस्था की संरचना सोची जा सकती है और वही विश्व- कल्याण की वास्तविक आधारशिला होगी। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण मात्र इसी तत्त्व दर्शन के सहारे हो सकता है।

गायत्री- मंत्र का अर्थ, चिंतन और उसकी निर्धारणा- प्रेरणा को हृदयंगम करने की प्रक्रिया का नाम उपासना है। इस आद्यःशक्ति- महाशक्ति की उपासना, साधना एवं आराधना करने से हमारे स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर का परिमार्जन हो सकता है। दर्शन का काम, चिन्तन को दिशा देना है और साधन का स्वरूप अभीष्ट शक्तियों को अपने में उभारने की वैज्ञानिक कार्यपद्धति को अपनाना है। हम गायत्री का तत्त्वदर्शन भी समझें और उसके साधना- विधानों को अपनाने का भी प्रयत्न करें। इस आधार पर मस्तिष्क के ढाँचे में ढाल सकते हैं और उनके स्तर के स्वरूप ही हमारे प्रत्यक्ष व्यवहार एवं क्रिया- कलाप का पहिया लुढ़क सकता है।

गायत्री सार्वभौम है, सार्वजनीन है। इसमें भविष्य की सुसंस्कृत, समुन्नत संरचना के समस्त सूत्र विद्यमान हैं। इसके गूढ़ रहस्यों को समझा तो जाना ही चाहिए, किन्तु साधनात्मक प्रयोग में उसे सर्वश्रेष्ठ विद्या मानकर अपनाना भी चाहिए।

सृष्टि के आदि से लेकर अद्यावधि देवताओं, ऋषियों मनीषियों, महामानवों द्वारा गायत्री- उपासना का उपक्रम इतना अधिक हुआ है कि वह शब्दावली आकाश में अद्वितीय मात्रा में अनन्त आकाश में परिभ्रमण कर रही है। शब्द- शक्ति कभी नाश नहीं होती, वह अपने अनुरूप वातावरण पर अनायास ही बरस पड़ती है। गायत्री उपासकों को भूतकाल की उन साधनाओं को अपने ऊपर अवतरित होता, बरसता, दृष्टिगोचर होता है । निजी प्रयत्नों में उसी स्तर का सृष्टि में भरा- पूरा अनुदान बरसने का लाभ भी उन्हें मिलता है। इस प्रकार वे असाधारण नफे में रहते हैं।




ऋतम्भरा की आराधना - अभ्यर्थना - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

जीवन में अनेकों अवसर ऐसे आते हैं जब कुछ निर्णय लेते नहीं बनता । परस्पर विरोधी विचारधाराओं के आ जाने पर बुद्धि भ्रमित हो जाती है तथा यह निर्णय नहीं हो पाता किसे स्वीकारा तथा किसे अस्वीकारा जाये। बुद्धि की कसौटी पर कसने पर तो दोनों प्रकार के विचार उपयोगी लगते हैं। ऐसी विषम स्थिति में निर्णय का दायित्व बुद्धि के ऊपर नहीं छोड़ा जा सकता । इस स्थिति के निवारण के लिए ‘शास्त्र’ विवेक के अवलम्बन का निर्देश देते हैं।

गायत्री की २४ शक्ति- धाराओं में एक धारा है- ऋतम्भरा की। इसी को प्रज्ञा कहते हैं। प्रज्ञा अर्थात् बुद्धि की उत्कृष्टतम स्थिति। इसे ही व्यावहारिक भाषा में विवेक कहते हैं। सत्यासत्य के बीच अन्तर करने योग्य सद्बुद्धि। विवेकशीलता, दूरदर्शिता इसी की उपलब्धियाँ हैं। गायत्री महामन्त्र में जिस तत्त्व की प्रेरणा के लिए सविता देवता से प्रार्थना की गई है वह यह ऋतम्भरा प्रज्ञा को विकसित करने के लिए ही सुविस्तृत ब्रह्मज्ञान की रचना हुई है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि -‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमहि विद्यते सद्ज्ञान से अधिक पवित्र इस संसार में और कुछ नहीं, इसकी प्राप्ति संसार की सर्वोत्तम उपलब्धि मानी गयी है। गायत्री का धियो शब्द ऋतम्भरा की आराधना की प्रेरणा देता है। विवेक के अनुशीलन को महत्त्व देता है।

संसार में मतभेदों की भरमार है। सामाजिक रीति- रिवाजों, परम्पराओं, मान्यताओं में एक स्थान से दूसरे स्थान- समाज के बीच आसमान धरती जैसा अन्तर है। विचारों में एकरूपता कहीं नहीं है। अनेकों धर्म सम्प्रदाय हैं। एक धर्म में एक बात का समर्थन किया गया है, तो दूसरे में उसका विरोध हुआ है। एक धर्म गुरू कुछ कहता है, दूसरा उसका विरोध करता है। किस शास्त्र को, किस धर्म को , किस महापुरुष को सही और किसे गलत ठहराया जाये यह निर्णय नहीं हो पाता। गायत्री का धियो शब्द ऐसी विषम परिस्थितियों में विवेक की शरण में जाने की प्रेरणा देती है। उसकी

शिक्षा है कि जो बात बुद्धि- संगत हो, विवेक- सम्मत हो, व्यवहार में आने योग्य हो, औचित्यपूर्ण हो, उसी को ग्रहण करना चाहिए । देश, काल और परिस्थतियों के अनुरूप धर्म सम्प्रदाय बने। एक सम्प्रदाय परिस्थतियों के अनुरूप किसी समूह विशेष के लिए उपयोगी हो सकता है, वही दूसरे के लिए अनुपयोगी सिद्ध होता है।

ऐसी स्थिति में केवल विवेक ही यह बता सकता है कि आज की स्थिति में क्या ग्राह्य है और क्या अग्राह्य ? अनेकों सम्प्रदायों, शास्त्रों, आप्त वचनों में एक को अपना पथ- प्रदर्शक चुनने में विवेक ही सहायक सिद्ध होता है।

धर्म ही नहीं अनेकों परम्पराएँ, प्रथाएँ, रीति- रिवाज प्रचलित हैं। जो किसी समय भले ही उपयुक्त रही हों, पर आज तो वे सर्वथा अनुपयोगी एवं हानिकारक ही हैं। ऐसी प्रथाओं एवं मान्यताओं के विषय में पुरातन के नाम पर अपनाते जाना अदूरदर्शिता का परिचायक है। चलन को वर्तमान काल की आवश्यकताओं एवं परिस्थतियों के अनुरूप उपयोगिता की कसौटी पर कसना चाहिए ।

भारतीय दर्शन- शास्‍त्र इस सम्बन्ध में स्पष्ट निर्देश देता है कि व्यक्तियों एवं विचारों को आपस में सम्बद्ध मत करो। सम्भव है कोई उत्तम चरित्र का व्यक्ति भ्रान्त हो और उसके विचार अनुपयुक्त हों। इसी प्रकार यह भी सम्भव है कि कोई चरित्रहीन व्यक्ति सारगर्भित बात कहता हो। चरित्रवान् का सम्मान करना एक नैतिक कर्तव्य है, पर यह आवश्यक नहीं कि उसके उलझे विचारों को स्वीकार करने के लिए बाध्य हों। प्रधानता विवेक की है कि उपयोगी का चुनाव कहाँ से और किस प्रकार किया जाये। भगवान बुद्ध के उत्तम चरित्र एवं कठोर तपश्चर्या से प्रभावित एवं श्रद्धासिक्त होकर भारतीय जन समूह ने उन्हें अवतार की उपाधि दी, इतने पर भी बौद्ध सिद्धान्तों को स्वीकार नहीं किया। ईश्वर पर अनास्था, शून्यवाद, गृह- त्याग में मोक्ष, यज्ञ- निषेध आदि बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को भारतीय जनता न केवल अस्वीकार करती है वरन् विरोध भी करती है। दर्शनों में चार्वाक दर्शन भी सम्माननीय है। विद्वत्ता एवं तर्क की दृष्टि से एक सीमा तक उसकी उपयोगिता है, पर नैतिक दृष्टि से चार्वाक सिद्धान्त अनुपयोगी एवं हानिकारक ही सिद्ध होते हैं। उन्हें व्यावहारिक जीवन में अपनाया नहीं जा सकता ।

विश्व भर में अनेक धर्म- सम्प्रदाय, मत, सिद्धान्त, शास्त्र, नेता और विचारक हैं। उनकी अपने- अपने ढंग की मान्यताएँ हैं। इनमें से स्वयं के लिए वर्तमान में किसका किस अंश में किस प्रकार अनुसरण करना चाहिए यह निर्णय जिस भी पक्ष में हो, उसके अतिरिक्त भी अन्य धर्मों, शास्त्रों एवं महापुरुषों से घृणा अथवा आलोचना करने की आवश्यकता नहीं है। उनके उपदेश वर्तमान में भले ही अनुपयोगी हो गये हों, पर कभी- कभी शुभ उद्देश्यों को लेकर ही कहे गये होंगे तथा उपयोगी सिद्ध होंगे। उनका उद्देश्य पवित्र था, इसलिए वे सम्मान के अधिकारी हैं। विवेक की कसौटी पर कसकर उपयुक्त- अनुपयुक्त, औचित्य- अनौचित्य की परख की जा सकती है। किसी देश, जाति या मनुष्य के कुछ बुरे कामों को देखकर सभी को पूर्णतया बुरा मान लेना उचित नहीं। अमुक जाति, समाज अथवा राष्ट्र बुरा है, यह मान्यता अनुचित है। मात्र बुराइयों के आधार पर कोई समाज अथवा राष्ट्र अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकता । न्यूनाधिक रूप मे भले- बुरे व्यक्ति प्रत्येक समाज में होते हैं। समाज ही नहीं गुण, अवगुण एक साथ एक व्यक्ति में विद्यमान रहते हैं। विवेक के आधार पर अच्छाइयों का चयन किया एवं अपनाया जा सकता है।

व्यक्तिगत जीवन में भी अनेकों अवसर ऐसे आते हैं जब मनुष्य दिग्भ्रान्त हो जाता है। लोभ, मोह के आकर्षणों में तुरन्त का लाभ दीखता है। तात्कालिक लाभ के फेर में दूरवर्ती परिणामों की ओर ध्यान नहीं जाता। फलतः नीति- अनीति जिस भी प्रकार से बने, लाभ उठाने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है। यह रीति- नीति अविवेक का, अदूरदर्शिता का परिचायक है। ऐसे अवसरों पर विवेक मनुष्य का मार्गदर्शन करता है। लोभ- मोह के आकर्षणों, तृष्णाओं, विकारों, भ्रान्तियों से बचाता है और सही पथ- प्रशस्त करता है।

ऋतम्भरा को प्रज्ञा की, विवेक की देवी कहा गया है। गायत्री- उपासक माँ के आंचल में बैठकर प्रज्ञा शक्ति का आह्वान करता है। मातृ- शक्ति में अपनी श्रद्धा एवं निष्ठा आरोपित करता है। धियो योनः प्रचोदयात् की अन्तः पुकार जब उठती है तो आद्य शक्ति ऋतम्भरा के रूप में प्रकट होती है। पयपान कराने, अपने अनुदानों से सिक्त करने के लिए माता का करुण हृदय मचलने लगता है। उसका अनुग्रह साधक पर प्रज्ञा के रूप में, विवेक के रूप में बरसता है। इस आध्यात्मिक सम्पदा को पाकर उपासक अपने जीवन को सार्थक बनाता है। भौतिक एवं आध्यात्मिक सभी प्रकार की सफलताएँ विवेक की अनुगामिनी होती है। विवेकवान्- दूरदर्शी सही अर्थों में अपना स्वार्थ साधता है और परमार्थ भी। सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवन सफल और सार्थक बनता है।

प्रज्ञा- विवेक की उपलब्धि के लिए गायत्री महाशक्ति की धारा ऋतम्भरा की शरण में जाना होगा। ऋतम्भरा की आराधना, अभ्यर्थना द्वारा साधक की अन्तःप्रज्ञा जागृत होती है। विवेक के जागरण से औचित्य- अनौचित्य के बीच अन्तर करने एवं उपयोगी का चयन कर सकने में मनुष्य समर्थ होता है। फलतः किसी प्रकार के भटकाव की सम्भावना नहीं रहती।

आत्मिक सत्ता में सन्निहित समझ को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक ‘बुद्धि’ जो शरीर यात्रा के काम आती है, तदनुरूप चिन्तन, प्रयास एवं व्यवहार का ताना- बाना बुनती है। दूसरी वह है जो ईश्वरीय नियम- मर्यादाओं में रस लेती है। क्षुद्र को महान के साथ एकीभूत बनाने के लिए उत्कृष्टता अपनाती और उच्चस्तरीय प्रगति के लिये साहस संजोती है, इसे ‘प्रज्ञा’ कहते हैं। बुद्धि दैत्य का समर्थन करती है। दिव्य के साथ तादात्म्य होने की उमंगों से भरी रहती है। बुद्धि का उपार्जन सम्पदा भर है। ललक लिप्सा की पूर्ति भर से उसका काम चल जाता है, किन्तु प्रज्ञा को विभूतियों से कम में चैन नहीं। विभूतियाँ अर्थात् श्रेष्ठता में रमण करने की सरसताएँ और उस मार्ग पर रास्ते में मिलने वाली परमार्थ प्रयोजनों में काम आने वाली सिद्धियाँ।

प्रज्ञा व्यक्ति गत जीवन को अनुप्राणित करती है, इसे ‘ऋतम्भरा’ अर्थात् श्रेष्ठ में रमण करने वाली कहते हैं। महाप्रज्ञा इस ब्रह्माण्ड में सर्वव्याप्त है ।। उसे दूरदर्शिता, विवेकशीलता, न्यायनिष्ठा, सद्भावना, उदारता के रूप में प्राणियों पर अनुकम्पा बरसाती और पदार्थों को गतिशील- सुव्यवस्थित एवं सौन्दर्य युक्त बनाती देखा जा सकता है। परब्रह्म की वह धारा जो मात्र मनुष्य के काम आती एवं आगे बढ़ाने, ऊँचा उठाने की भूमिका निभाती है, ‘महाप्रज्ञा’ है। ईश्वरीय अगणित विशेषताओं एवं क्षमताओं से प्राणि- जगत एवं पदार्थ- जगत उपकृत होते हैं, किन्तु मनुष्य जिस आधार पर ऊर्ध्वगामी बनाने, परमलक्ष्य तक पहुँचाने का अवसर मिलता है, उसे महाप्रज्ञा ही समझा जाना चाहिए। इसका जितना अंश जिसे, प्रकार भी उपलब्ध हो जाता है वह उतने ही अंश में कृत- कृत बनता है। मनुष्य में देवत्व का, दिव्य क्षमताओं का, उदय- उद्भव मात्र एक ही बात पर अवलम्बित है कि महाप्रज्ञा की अवधारणा उसके लिए कितनी मात्रा में सम्भव हो सकी ।

महाप्रज्ञा को अध्यात्म की भाषा में ‘गायत्री’ कहते हैं। इसके दो पक्ष हैं- एक दर्शन और दूसरा व्यवहार। तत्त्वदर्शन अर्थात्- ‘ अध्यात्म’ । शालीनता युक्त आचरण अर्थात् ‘धर्म’ । आत्मिकी क्षेत्र पर ‘गायत्री’ का आधिपत्य है और भौतिक का सूत्र- संचालन ‘सावित्री’ करती है । ये दोनों नाम एक ही दिव्य सत्ता के हैं। यह नाम- भेद उनकी प्रयोग- प्रक्रिया को देखकर किया गया । एक ही व्यक्ति को कुश्ती लड़ते समय पहलवान, प्रवचन करते समय विद्वान कहा जा सकता है। दो समयों पर दो नामों से सम्बोधन किये जाने पर भी वस्तुतः वह रहता एक ही है। महाप्रज्ञा है तो एक ही, पर उसे श्रद्धा- भक्ति के और पुण्य- प्रयोजनों में अपनी भूमिका अलग- अलग ढंग से निभाते हुए देखा जा सकता है। बिजली कभी हीटर जलाकर गर्मी पैदा करती है और कभी रेफ्रिजरेटर के माध्यम से बर्फ जमाती है । यह एक ही शक्ति की दो प्रक्रियाएँ मात्र हैं। गायत्री की, महाप्रज्ञा की परिणति अंतःक्षेत्र में, दिव्य लोक में, विभूतियों की तरह और भौतिक क्षेत्र में, लोक व्यवहार में, सम्पदाओं के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इन्हीं को ‘ऋद्धि’ एवं ‘सिद्धि’ कहते हैं ।

महाप्रज्ञा असंख्य समर्थताओं की जन्मदात्री है, गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। इसके तीन चरण- सत्, चित्त, आनन्द नाम से जाने जाते हैं। उन्हें गंगा, यमुना, सरस्वती का त्रिवेणी- संगम भी कहा जाता है।

देव- प्रतिपादन में इन्हीं का ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं सरस्वती, लक्ष्मी, काली के नाम से आलंकारिक उल्लेख होता है। तत्त्वदर्शी इन्हीं त्रिविध प्रवाहों को सत्- रज की संज्ञा देते और समग्र सृष्टि का आधारभूत कारण मानते हैं। गायत्री को वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता कहा गया है। (१) वेद अर्थात् दिव्य ज्ञान। वेदमाता अर्थात् दिव्य ज्ञान की अधिष्ठात्री। (२) देव अर्थात् पवित्र और प्रखर ।। देवमाता अर्थात् अपने अंचल में बैठने वाले की सत्ता को देवोपम बना देने वाली। (३) विश्व अर्थात् विराट्। विश्वमाता अर्थात् अनेकता को एकता में, बिखराव को केन्द्रकरण में समेटने वाली, वसुधैव कुटुम्बकम् के आधार पर आत्मीयता को व्यापक बनाने वाली। इस त्रिवेणी में मनुष्य की आस्था, विचारणा एवं प्रवृत्ति को, समग्र चेतना को स्नान करने का अवसर मिलता है, तो स्थिति काया- कल्प जैसी बन जाती है। इन त्रिविध अनुदानों की प्राप्ति के लिये भक्तियोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग की पुण्य प्रक्रिया का सुविस्तृत साधना तन्त्र खड़ा किया गया है। इन्हीं के सहारे कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर को परिष्कृत किया जाता है।

देव संस्कृति का भाव पक्ष ब्रह्म विद्या कहलाता है। ब्रह्म विद्या का विवेचन आर्ष वाङ्मय में हुआ है। आप्त वचनों में उसी का चर्चा होती है। वेद, उपनिषद्, दर्शन, आरण्यक, ब्राह्मण, सूत्र, पुराण आदि- आदि के रूप में जितना भी शास्त्र- विवेचन है उसे ब्रह्म विद्या की व्याख्या कह कहते हैं, इस सारे विस्तार में महाप्रज्ञा गायत्री के ही विभिन्न स्तरों पर प्रकाश डाला गया है। भगवान के अवतार २४ हुए हैं। गायत्री के चौबीस अक्षरों में सन्निहित रहस्यों का, एक- एक करके एक- एक प्रयोजन के लिए किया गया रहस्योद्घाटन ही समझा जा सकता है । एक ही तथ्य को मानवी संरचना एवं आवश्यकता को ध्यान में रखकर किया गया वह विवेचन भी है, जिसे ब्रह्म विद्या के अन्तर्गत माना गया यह विवेचन भी है, जिसे ब्रह्म विद्या के अन्तर्गत माना गया विशालकाय शास्त्रीय निर्धारण कहा जा सकता है। एक शब्द में इस समस्त परिवार को गायत्री का तत्त्व दर्शन भी कह सकते हैं। इस प्रतिपादन में वह समूचा निर्धारण विद्यमान है, जो मनुष्य को उच्चस्तरीय प्रगति के मार्ग पर चलते हुए अभीष्ट- अनिवार्य होता है।

ज्ञान और कर्म का युग्म है। सिद्धान्त और अभ्यास के समन्वय में ही किसी तथ्य को हृदयंगम करना, स्वभाव व्यवहार में ही उतारना शक्य होता है। ज्ञान का दूसरा पक्ष विज्ञान है। ज्ञान अर्थात् आस्था, विज्ञान अर्थात् पराक्रम। दोनों के समन्वय से ही एक पूरी बात बनती है। बिजली के ऋण और धन प्रवाहों के समन्वय से ही करेन्ट (विद्युतीय प्रवाह) उत्पन्न होता है। महाप्रज्ञा का ब्रह्म विद्या पक्ष अन्तःकरण को उच्चस्तरीय आस्थाओं से आनन्द विभोर करने के काम आता है। दूसरा पक्ष साधना है जिसे विज्ञान या पराक्रम कह सकते हैं। इसके अन्तर्गत आस्था को उछाला और परिपुष्ट किया जाता है। मात्र ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता । कर्म के आधार पर उसे संस्कार, स्वभाव- अभ्यास के स्तर तक पहुँचना होता है। साधना का प्रयोजन श्रद्धा को निष्ठा में, निर्धारण की अभ्यास की स्थिति में पहुँचना है, इसलिये परमहंसों, तत्त्व- ज्ञानियों एवं जीवन- मुक्तों को भी साधना का अभ्यास- क्रम से चलाना होता है।

चिन्तन को उत्कृष्टता के साथ जोड़ने की प्रक्रिया योग से और आदतों को निकृष्टता से विरत कर उत्कृष्टता के क्षेत्र में उछाल देने की आवश्यकता ‘तप’ के सहारे सम्पन्न की जाती है। प्रवाह को मोड़ने- मरोड़ने के लिए इससे कम में बात बनती ही नहीं । मान्यताएँ और आदतें बड़ी ढीठ होती हैं। समझाने- बुझाने से वे औचित्य के सामने हतप्रभ तो हो जाती हैं पर अपनी स्थिति बदलने को तैयार नहीं होती। तर्क में हार जाने पर ऊपरी मन से स्वीकार करना एक बात है और इस आधार पर अपने स्वभाव- व्यवहार में परिवर्तन कर लेना दूसरी। तर्क- प्रमाणों से काम चल गय होता तो स्वाध्याय, सत्संग की प्रचलित प्रक्रिया ने ही लोक- मानस का काया- कल्प कर दिया होता। लेखनी- वाणी से ही अवांछनीयता का प्रवाह कब उलट दिया गया होता। किन्तु यथार्थता दूसरी ही है। गुण- कर्म की- मान्यता और आदत के रूप में अन्तरंग की जैसी भी संरचना बन गई होती है, उसे रास्ता बदलने के लिए तत्पर कर लेना टेढ़ी खीर है। सदाशयता का ढोल बजाने वाले, दुष्ट प्रयोजनों में निरत देखे गये हैं। कारण एक ही हैं। हठी अन्तराल- अभ्यस्त आदतों को बदलने के लिए जितने दबाव की जरूरत थी, उतना दबोचा नहीं गया। अनुपयोगी को गलाने और उपयोगी को ढालने के लिए ऊँचे तापमान की भट्टी जलानी पड़ती है।

इससे कम में, मात्र उलट- पुलट करने भर से अशुद्ध धातुओं का परिशोधन कहाँ बन पड़ता है? हठी अन्तराल को उत्कृष्टता की दिशा में उछालने के लिए योग और तप का साधना- क्रम अपनाये बिना काम नहीं चलता।


ऊपर से नीचे को घसीट लेने के लिए तो पृथ्वी की प्रचण्ड गुरुत्वाकर्षण शक्ति बिना किसी प्रयत्न के सदा सर्वत्र विद्यमान रहती है। पानी को गिराते ही नीचे की ओर बहने लगता है। किन्तु ऊपर चढ़ने- चढ़ाने के लिए नये साधना जुटाने पड़ते हैं और उछालने में लगने वाली शक्ति जुटाने का प्रबन्ध करना होता है अन्यथा उठने, उभरने, उछलने की बात कल्पना मात्र ही बनी रहेगी। कथा, प्रवचन सुनना, पूजा- पाठ करना अपने स्थान पर सही है और उसका सीमित लाभ भी होता है, किन्तु व्यक्तित्व के अन्तरंग एवं बहिरंग को यदि निकृष्टता से विरत करने और उत्कृष्टता को साथ जोड़ने का कायाकल्प करना हो तो उस प्रत्यावर्तन के लिये साधना की ऊर्जा अनिवार्य रूप से जुटानी पड़ेगी। इसी प्रयोजन के लिये योग- तप की उभयपक्षीय साधना करनी पड़ती है। योग से विचारणा पर और तप से आदतों पर नियन्त्रण कर सकना सम्भव होता है।

महाप्रज्ञा की साधना में कई प्रकार के उपचार- कृत्यों की, कर्मकाण्ड की, साधना- विधानों की आवश्यकता पड़ती है। व्यक्ति- विशेष की मनःस्थिति और परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए साधनाओं का निर्धारण तो पृथक्- पृथक् ही होता है, पर सिद्धान्त एक ही रहता है। चिन्तन के क्षेत्र में समाविष्ट पशु- प्रवृत्तियों के पक्ष को मल्ल- युद्ध के लिए मोर्चे पर खड़ा कर दिया जाता है और योग साधना के अन्तर्गत ऐसा सरंजाम जुटाया जाता है, जिसमें अनास्थाओं को हटाने और देवत्व को जीतने का मूलभूत प्रयोजन पूरा हो सके। योग में निकृष्टता के साथ सघन सम्बन्ध जोड़ देना यह दोनों ही कदम उठाने पड़ते हैं। मात्र निकृष्टता से पीछा छूटना भर पर्याप्त नहीं, उत्कृष्टता का सम्वर्धन क्रम भी चलना चाहिए। रोग से पीछा छूटना आवश्यक तो है किन्तु पर्याप्त नहीं। चिकित्सा उपचार की ही तरह व्यायाम, पौष्टिक आहार, उपयुक्त जलवायु का प्रबन्ध भी स्वास्थ्य- सम्वर्धन के लिए करना पड़ता है। चिकित्सा और परिचर्या दोनों ही आवश्यक है। योग धारणा में उन आस्थाओं को हृदयंगम किया और अन्तराल में जमाया जाता है, जो आत्मा को परमात्मा तक पहुँचाने के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक होती है।

योग मन को उलटता- मरोड़ता है। गलाई- ढलाई के लिए आवश्यक श्रद्धा- साहसिकता का, उमंग- उल्लास का माहौल अंतःक्षेत्र बनाता है। तप का भी उद्देश्य तो यही है किन्तु कार्यक्षेत्र एवं विधि- विधान में पृथकता है। तप का क्षेत्र शरीर है। शरीर पर आदतें प्रवृत्तियाँ छाई रहती हैं। विलासिता, सुविधा की मांग इन्द्रियाँ करती रहती हैं। मन पर तृष्णा और अहंता की ललक छाई रहती है। लोभ, मोह और बड़प्पन का रुचिकर विषय है। शरीरको  इन्द्रियजन्य अनेकानेक भोग- उपभोगों के जायके चाहिए। इन समस्त ललक- लिप्साओं के विरुद्ध खड़ा कर देना , हठपूर्वक पूर्वाभ्यासों का प्रतिरोध परित्याग करना तपश्चर्या का आधारभूत प्रयोजन है।

योग के क्षेत्र में स्वाध्याय ,सत्संग, चिन्तन, मनन के चार व्यावहारिक और जप, ध्यान, प्राणायाम, मुद्रा, बन्ध, नाद, लय आदि कितनी ही प्रक्रियाएँ बताई, अपनायी जाती हैं। तप में स्वाद, उपवास, ब्रह्मचर्य, शरीर- सेवा में आत्म- निर्भर, भूमि- शयन, ऋतु प्रभावों का सहन, मौन आदि ऐसे क्रिया- कृत्य आते हैं, जिनमें शरीर को यह अनुभव करना पड़े कि उसे उच्चस्तरीय प्रगति के मार्ग पर चलने के लिए प्रतीक्षा- सहनशीलता का अभ्यास करना पड़ रहा है। आदतों का, आकांक्षा का प्रतिरोध करने में स्वभावतः अनख लगता और कष्ट होता है। इसके अतिरिक्त आदर्शवादिता अपनाते ही अवांछनीयता व्यंग्य, उपहास, असहयोग, विरोध करने पर उतरती है और चिढ़कर हानि भी पहुँचाती है। महानता के मार्ग पर चलने वालों को कदम बढ़ाने से पूर्व इस सम्भावना को ध्यान में रखना चाहिए और उसकी पूर्व जानकारी एवं तैयारी रहने के रूप में विभिन्न प्रकार की तितीक्षाएँ करते रहने की विधि- व्यवस्था अपनानी चाहिए।






गायत्री साधना से आत्मोद्धार - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

गायत्री- उपासक नियमित रूप से, नियमपूर्वक श्रद्धा विश्वास सहित जैसे- जैसे साधना- प्रक्रिया चलाने लगता है उसकी साधना में क्रमबद्धता और पूर्णता आने लगती है, वैसे- वैसे साधना की दिव्य- ज्योति अधिकाधिक प्रकाशित होते चलती है और अन्तरात्मा की बाह्य शक्ति बढ़ती चलती है। रेडियो यन्त्र के भीतर बल्ब लगे होते हैं, बिजली का संचार होने से वे जलने लगते हैं। प्रकाश होते ही यन्त्र की ध्वनि पकड़ने वाला भाग जागृत हो जाता है और ईथर तत्त्व में भ्रमण करती हुई सूक्ष्म शब्द- तरंगों को पकड़ने लगता है, इसी क्रिया को ‘रेडियो बजाना’ कहते हैं। साधना एक बिजली है, जिससे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के बल्ब दिव्य- ज्योति से जगमगाने लगते हैं। इस प्रकाश का सीधा प्रभाव अन्तरात्मा पर पड़ता है, जिससे उसकी सूक्ष्म चेतना जाग्रत हो जाती है, और दिव्य संदेशों को, ईश्वरीय आदेशों को, प्रकृति के गुप्त रहस्यों को समझने की योग्यता उत्पन्न हो जाती है इस प्रकार साधक का अन्तःकरण रेडियो का उदाहरण बन जाता है और उसके द्वारा सूक्ष्म जगत की बड़ी- बड़ी रहस्यमय बातों का प्रकटीकरण होने लगता है।

गायत्री संहिता में इस प्रकार की अनेकों सिद्धियों का उल्लेख किया गया है, पर उसके साथ ही यह भी बताया गया है कि गायत्री की इन दिव्य शक्तियों का अवतरण उसी अन्तःकरण में होता है जो परिष्कृत, स्वच्छ और निर्मल बन जाता है। विमान हर कहीं नहीं उतर सकते, उन्हें उतारने के लिए उपयुक्त एयरपोर्ट, हवाई अड्डे चाहिए। गायत्री की दिव्य शक्तियाँ भी उपयुक्त परिष्कृत और निर्मल व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्तियों में होती हैं। इस तथ्य को गायत्री संहिता में इस प्रकार व्यक्त किया गया है-

बाह्यं चाभ्यन्तरं त्वस्य नित्यं सन्मार्गगामिनः ।।
उन्नतेरूभयं द्वार यात्युन्मुक्तकपाटताम् ॥१९॥

सर्वदा सन्मार्ग पर चलने वाले इस व्यक्ति के बाह्य और भीतरी दोनों उन्नति के द्वार खुल जाते हैं।

अतः स्वस्थेन चित्तेन श्रद्धया तथा ।।
कर्त्तव्याविरतं काले गायत्र्या समुपासना ॥२०॥

श्रद्धा से, निष्ठा से तथा स्वस्थ चित्त से प्रतिदिन गायत्री की उपासना करनी चाहिए।
अपने व्यक्तित्व को सुसंस्कारित और चरित्र को परिष्कृत बनाने वाले व्यक्ति को गायत्री महाशक्ति मातृवत् संरक्षण प्रदान करती है जिस प्रकार दयालु, समर्थ और बुद्धियुक्त माता प्रेम से अपने बालक का कल्याण ही करती है, उसी प्रकार भक्तों पर स्नेह रखने वाली गायत्री अपने भक्तों का सदैव कल्याण ही करती है-

दयालुः शक्ति सम्पन्न माता बुद्धिमती यथा।
कल्याण कुरूते ह्यैव प्रेम्णा बालस्य चात्मनः ॥२१॥

तथैव माता लोकानां गायत्री भक्तवत्सला ।।
विदधाति हितं नित्यं भक्तानां ध्रुवमात्मनः ॥२२॥

गायत्री- साधकों की मनोभूमि इतनी निर्मल हो जाती है कि उसमें फिर सदिच्छाएँ ही उत्पन्न होती हैं। साधक के अन्तःकरण में उत्पन्न हुई सदिच्छाएँ और साधक का अपना साधन बल उन इच्छाओं की पूर्ति में आश्चर्यजनक रूप से सहायक सिद्ध होता है। गायत्री संहिता में कहा गय है -

गायत्र्युपासकस्वान्ते सत्कामा उद्भवन्ति हि ।।
तत्पूर्तयेऽभिजायन्ते सहज साधनान्यपि ॥१७॥

निश्चय ही गायत्री के उपासक के हृदय में सदिच्छाएँ पैदा होती हैं। उनकी पूर्ति के लिए सहज में साधन भी मिल जाते हैं।

त्रुटयः सर्वथा दोषा विघ्ना यान्ति यदान्तताम् ।।
मानवो निर्भयं याति पूर्णोन्नति पथं तथा ॥१८॥

जब सब प्रकार के दोष, भूलें और विघ्न, विनाश को प्राप्त हो जाते हैं, तब मनुष्य निर्भय होकर पूर्ण उन्नति के मार्ग पर चलता है।
उच्च संस्कारों से अपनी मनोभूमि को सुसंस्कृत करने वाले साधक यद्यपि कोई गम्भीर या अनैतिक भूलें नहीं करते, फिर भी मानवीय दुर्बलताओं के कारण उनसे यत्किंचित त्रुटियाँ हो भी जाती हैं तो उनका वैसा दुष्परिणाम नहीं होता ।। गायत्री संहिता में कहा गया है-

कुर्वन्नाति त्रुटिर्लोके बालकौ मातरं प्रति ।।
यथा भवति कश्चिन्न तस्या अप्रीतिभाजनः॥२३॥

कुर्वन्नपि त्रुटिर्भवतः क्वचित् गायत्र्युपासने ।।
न तथा फलमाप्नोति विपरीतं कदाचन ॥२४॥

जिस प्रकार संसार में माता के प्रति भूलें करता हुआ भी कोई बालक उस माता का शत्रु नहीं होता उसी प्रकार गायत्री की उपासना करने में भूल करने पर कोई भक्त कभी भी विपरीत फल को प्राप्त नहीं होता ।।

साधना करते- करते जब साधक का हृदय दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण हो जाता है, तो सूक्ष्म दैवी शक्ति जो व्यष्टि अन्तरात्मा और समष्टि परमात्मा में समान रूप से व्याप्त है, उस पवित्र हृदय- पटल पर अपना कार्य आरम्भ कर देती है और साधक में कई दिव्य शक्तियों का जागरण होने लगता है।

धारयन् हृदि गायत्री साधको धौतकिल्विषः ।।
शक्तिरनुभवत्युग्रा स्वमिन्ने वात्मलौकिकाः ॥८९॥

पाप- रहित साधक, हृदय में गायत्री को ध्यान करता हुआ अपनी आत्मा में अलौकिक तीव्र शक्तियों का अनुभव करता है।

एतादृश्यस्तस्य वार्ता भासन्तोऽल्प्रयासतः ।।
यास्तु साधारणो लोको ज्ञातुमर्हति नैव हि ॥९०॥

उसको थोड़े ही प्रयास से ऐसी- ऐसी बातें विदित हो जाती हैं जिन बातों को सामान्य लोग जानने को समर्थ नहीं होते।

एतादृश्स्तु जायन्ते ता मनस्यनुभूतयः ।।
य दृश्यो न हि दृश्यन्ते मानवेष कदाचन ॥९१॥


उसके मन में इस प्रकार के अनुभव होते हैं , जैसे अनुभव साधारण मनुष्यों में कभी भी नहीं देखे जाते।

इन शक्तियों का जागरण मन्त्र शक्ति का ही चमत्कार कहा जाना चाहिए। मन्त्रों में शक्ति कहाँ से आती और कैसे उत्पन्न होती है, यह एक अलग विषय है। यहाँ इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि मन्त्रों में प्रयुक्त किये गये शब्द शरीर के विभिन्न अंगों पर अपना प्रभाव उत्पन्न करते हैं और उन्हें सक्रिय सचेतन बनाते हैं। गायत्री संहिता में कहा गय है कि उसके कारण समस्त गुह्य ग्रन्थियाँ जाग्रत हो जाती हैं। इनका महत्त्व बताते हुए कहा गया है-


जाग्रता ग्रन्थयस्त्वेताः सूक्ष्माः साध च मानसे ।।
दिव्यशक्तिसमुद्भूति क्षिप्रं कुर्वन्त्यसंशयम् ॥२६॥

जाग्रत हुई ये सूक्ष्म यौगिक ग्रन्थियाँ साधक के मन में निःसन्देह शीघ्र ही दिव्य शक्तियों को पैदा कर देती हैं।


जनयन्ति कृते पुंसामेता वै दिव्यशक्तयः ।।
विविधान् वै परिणामान् भव्यान् मंगलपूरितान्॥२७॥

ये दिव्य शक्तियाँ मनुष्यों के लिए नाना प्रकार के मंगलमय परिणामों को उत्पन्न करती हैं। परन्तु साधक को इन शक्तियों के उपयोग में सावधान रहने के लिए कहा गया है। शक्तियों का संचय और उनका सदुपयोग ही उपलब्धियों को सार्थक बनाता है, अन्यथा अर्जित की गई शक्तियाँ व्यर्थ ही नष्ट होती हैं।

तदनुष्ठान- काले तु स्वशक्ति नियमेज्जनः ।।
निम्नकर्मसु ताः धीमान् न व्ययेद्धि कदाचन ॥७२॥

मनुष्य को चाहिए कि वह गायत्री- साधना से प्राप्त हुई अपनी शक्ति को संचित रखे। बुद्धिमान मनुष्य कभी उन शक्तियों को छोटे कार्यों में खर्च नहीं करते।

नैवानावश्यकं कार्यमान्मोद्धार- स्थितेन च ।।
आत्माशक्तेस्तु प्राप्तायाः यत्र- तत्र प्रदर्शनम् ॥७३॥

आत्मोद्धार के अभिलाषी मनुष्य को प्राप्त हुई अपनी शक्ति का जहाँ- तहाँ अनावश्यक प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

शक्तियों का संचय करने और उपयोगी प्रयोजनों में ही उन्हें नियोजित करने के साथ- साथ साधक को यह भी ध्यान में रखना पड़ता है कि वह इन शक्तियों को निजी प्रयोजनों के लिए उपयोग न लावे। उसे अपने गन्तव्य- लक्ष्य को स्मरण रखना चाहिए और उसकी प्राप्ति तक बड़ी से बड़ी सिद्धियों के भी उपयोग की ललक से बचना चाहिए।





आत्मशक्ति अभिवर्धन का श्रेष्ठतम उपाय गायत्री - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

पदार्थ की संरचना उसी प्रचण्ड क्रियाशीलता के साथ जुड़ी हुई है। इसी के कारण वस्तुएँ स्वयमेव उपजती और बदलती रहती हैं। पदार्थ की इस क्रियाशीलता को ही अपरा प्रकृति कहा गया है। परमाणु की तरह ही दूसरा घटक है- जीवाणु। जीवाणु का शरीर- कलेवर तो रासायनिक पदार्थों से ही बना होता है पर उसकी अन्तःचेतना मौलिक है और वह अपने प्रभाव से कलेवर को तथा समीपवर्ती वातावरण को प्रभावित करती रहती है। इसे ही चेतना कहते हैं।

चेतना के दो गुण हैं, एक इच्छा आस्था तथा दूसरी विवेचना एवं विचारणा। इच्छा को भाव और विचारणा को बुद्धि कहते हैं। एक को अन्तरात्मा तथा दूसरी को मस्तिष्क भी कहा जा सकता है। मस्तिष्क जो सोचता है उसके मूल में आकांक्षा, आस्था, विवेचन एवं विचारणा की सम्मिलित प्रेरणा ही काम करती है। इस जीव- चेतना को परा- प्रकृति कहा जाता है।

अपरा- प्रकृति का सबसे छोटा घटक परमाणु है। इसका संयुक्त रूप ब्रह्माणु अथवा ब्रह्माण्ड है। व्यष्टि और समष्टि के नाम से भी इसे जाना जाता है। जीवाणु की चेतन सत्ता आत्मा कहलाती है और उसकी समष्टि विश्वात्मा अथवा परमात्मा । ब्रह्माण्ड में भरी क्रियाशीलता से परमाणु प्रभावित होता है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि परमाणुओं की संयुक्त चेतना ब्रह्माण्ड- व्यापी हलचलों का निर्माण करती है। इसी प्रकार चेतना के क्षेत्र में इसी तथ्य को परमात्मा द्वारा आत्मा को अनुदान मिलने अथवा आत्माओं की संयुक्त चेतना के रूप में परमात्मा के विनिर्मित होने की बात किसी भी तरह से कही जा सकती है।

जड़- जगत के पदार्थ तत्त्व के मूल घटक परमाणु का गहनतम विश्लेषण करने पर जाना गया है कि वह मूलतः ऋण और धन विद्युत प्रवाहों से उत्पन्न होने वाली हलचल मात्र है। परिस्थितियों के अनुसार वह हलचल ही दृश्य रूप धरण करती और पदार्थ के रूप में दृश्य होती चली जाती है। इसी प्रकार जीवात्मा भी यों स्थूल, सूक्ष्म और कारण- शरीर धारण किये अनेक प्रकार के साधन उपकरण सम्हाले दीखती है । उसकी अपनी अहंता और इच्छा भी है, किन्तु मूलतः वह व्यापक चेतना का ही स्फुल्लिंग मात्र है। उसे विभिन्न प्रकार की क्षमताएँ विश्वात्मा के महासमुद्र से ही मिलती है। मछली का शरीर, आहार, निर्वाह सब कुछ जलाशय पर ही अवलम्बित है, इसी प्रकार जीव भी ब्रह्म पर आश्रित है। इस ब्रह्माण्ड में संव्याप्त उस चेतना मानसरोवर को गायत्री कह सकते हैं, जो प्राणियों में सम्वेदना और पदार्थों में सृजन- परिवर्तन करने वाली क्रियाशीलता बन कर काम कर रही है। इसे ब्रह्म- चेतना से ही उद्भूत माना गया है। ज्ञान से कर्म बना और दृश्य न अपना कलेवर धारण किया। इस प्रकार यह विश्व मूलतः अद्वैत होते हुए भी द्वैत बन गया है। ब्रह्म से प्रकृति बनी और फिर वे दोनों मिल- जुलकर सृष्टि का इतना विकास कर सके, जैसा कि हमें दृष्टिगोचर होता है। इसी तथ्य को पुराणों में आलंकारिक कक्ष उपाख्यानों के रूप में बताया गया है।

शास्त्र- पुराणों में उल्लेख आता है कि ब्रह्माजी की दो पत्नियाँ थी। एक गायत्री और दूसरी सावित्री। इसमें यही संकेत छुपा हुआ है कि ब्रह्म की दो क्षमताएँ हैं एक पराप्रकृति- चेतना सत्ता और दूसरी अपरा प्रकृति अर्थात् पदार्थ सत्ता । एक का धर्म ज्ञान है तो दूसरी का कर्म। एक अदृश्य है तो दूसरी दृश्य। एक सजीव, है तो दूसरी निर्जीव। इतने पर भी दोनों का उद्गम स्रोत एक ही है। हिमालय के अन्तराल में से गंगा और यमुना दोनों ही धाराएँ निकलती हैं। इसी प्रकार ब्रह्म से परा और प्रकृति का उद्भव हुआ है।

गायत्री को मूलतः ब्राह्मी शक्ति कह सकते हैं। समुद्र की असंख्य लहरें पृथक् दीखती हैं और उनकी आकृति- प्रकृति में भी भिन्नता रहती है। इतने पर भी समुद्र की सतह पर होने वाली हलचल ही इन लहरों का सृजन करने का मूल कारण है। गायत्री महाशक्ति के चेतन और जड़- विभाजन तो आरम्भिक हैं, आगे चलकर गंगा और यमुना में उठने वाली अनेकों लहरें, धाराएँ तथा भँवर आदि के रूप में उत्पन्न होने वाली हलचलों की तरह उस ब्राह्मी शक्ति की भी अनेकानेक धाराएँ हैं। इन्हें विभिन्न नाम दिये गये हैं। गायत्री सहस्रनाम में उसके एक हजार नाम गिनाये गए हैं। इन्हें उस महान शक्ति- सागर की लहरें- तरंगें कह सकते हैं। सहस्रनाम से तात्पर्य उस ब्राह्मी शक्ति के प्रकारों को अमुक गणना में सीमा बद्ध कर देना नहीं है, वरन् उसका तात्पर्य है असंख्य। सहस्रनाम तो अगणित- असंख्य की ओर इंगित मात्र है। 

इस महाशक्ति के स्वरूप, क्रिया- कलाप एवं उपयोग को शास्त्रों में अनेक उदाहरणों के साथ बताया गया है। कहीं तो उस शक्ति ने स्वयं ही अपने स्वरूप का परिचय दिया है और कहीं देवताओं ने अथवा ऋषियों ने स्तवन के रूप में उसके स्वरूप का गुणगान सहित वर्णन किया है। इन वर्णनों के आधार पर यह जाना जा सकता है कि गायत्री शक्ति- तत्व इस संसार में कहाँ- किस प्रकार कार्य कर रहा है? कहा गया है- 

गायत्री पददेवतेति गहिता ब्रह्मैव चिद्रूपिणी ।।
अर्थात्- यह गायत्री सबसे परा (श्रेष्ठ) देवता है, ऐसा कहा गया है। यह चित् स्वरूप वाली गायत्री साक्षात् ब्रह्म है।
गायत्री तुपरं तत्त्वं गायत्री परमागतिः।
-वृहद् पारासर ५। ४

गायत्री ही परम तत्त्व है। गायत्री ही परमगति है। 
सैषा चतुष्पदा षडविद्या गायत्री तदेतह्याभ्यनूत्तम।
तावानस्य महिमा ततो ज् याया श्च पूरूषाः ।।
पादोऽस्य सर्व भूतानि त्रिपाऽस्यामृतं दीविति।
-छांदोग्य ३। १२। ५

अर्थात्- यह गायत्री चार पाद वाली और छः भेदों वाली है। इस गायत्री की अविच्छिन्न महिमा है। यह तीन पद वाला परम पुरुष अमृत और प्रकाश रूप बन कर आत्मा में स्थित हो। इसका एक पद सन्तोष विश्व है।

गायत्री की चेतनात्मक धारा सद्बुद्धि के ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप मे काम करती है और जहाँ उसका निवास होता है, वहाँ ब्राह्मणत्व एवं देवत्व का अनुदान बरसता चला जाता है, साथ ही आत्मबल के साथ जुड़ी हुई दिव्य विभूतियाँ भी उस व्यक्ति में बढ़ती चली जाती हैं।
इस तथ्य का उल्लेख शास्त्रों में इस प्रकार हुआ है।

सर्वदा स्फुरसि सर्वछादि वासयासे ।।
नमस्ते परारूपे नमस्ते पश्यन्ती रूपे नमस्ते,
मध्यामा रूपे नमस्ते वैखरी रूपे सर्व
तत्वान्मिके सर्व विद्याऽऽत्मिके ।।
सर्वक्त्यत्मिके सर्वदेवात्मिके वशिष्ठेय
मुनिनाऽऽराधाधिते विश्वमित्रेण
मुनिनोप संवयमाने नमस्ते नमस्ते ।।
-आसिमालिकोपनिषद्


अर्थात्- हे महाशक्ति तुम सर्वत्र विद्यमान हो, सर्वत्र स्फुरण करती हो, सभी हृदयों में तुम्हारा निवास है। परा, पश्यन्ति, मध्यमा और वैखरी वाणियाँ तुम्हारे ही रूप हैं। तुम तत्त्व रूपिणी हो, सर्व विद्यमान हो, समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री हो, सब देवताओं की आराध्य हो, वशिष्ठ और विश्वामित्र ऋषियों ने तुम्हारी ही उपासना करके सिद्धि पाई है। तुम्हें बार- बार नमस्कार है।

ऋग्वेद में कहा गया है-
गायन्ति त्वा गायत्रिणयोऽर्यन्त्यर्क मर्किण ।।
ब्रह्मणस्त्वा शतक्रता उदवंशपिवमेपिरे ॥
-ऋग्वेद १। १०। १


हे माता गायत्री मन्त्रवेत्ता तेरा ही गुणगान करते हैं। गायत्री मन्त्र द्वारा यजन करने वाले कर्मयोगी याजक यज्ञ योग द्वारा तुम्हारी ही अर्चना करते हैं। विद्वान तुम्हारे नाम की ही यश- पताका का लिए फिरते हैं।

यह दृश्य जगत पदार्थमय है। इसमें जो सौन्दर्य, वैभव, उपभोग- सुख दिखाई पड़ता है वह ब्रह्म की अपरा प्रकृति का ही अनुदान है, यह सब गायत्रीमय है। सुविधा की दृष्टि से इसे सावित्री नाम दे दिया गया है, ताकि पदार्थ जगत में उसके चमत्कारों को समझने में सुविधा रहे। गायत्री की इस स्थूल धारा सावित्री में को जो जितनी मात्रा में धारण करता है, भौतिक क्षेत्र में उतना ही समृद्ध सम्पन्न बनता जाता है। इस विश्व में बिखरी हुई सीमा सम्पन्नता को उसी महाशक्ति का इन्द्रियों में अनुभव किया जा सकने वाला स्वरूप कह सकते हैं। शास्त्रों में उसकी अनेक प्रकार से चर्चा की गई है कहीं उसके विराट् रूप का विवेचन किया गया है, तो कहीं उसके शक्ति- रूप की विभिन्न तरह से चर्चा की गई है। पर इतना स्पष्ट है कि वह स्थूल और सूक्ष्म, जड़ और चेतन, अपरा और परा प्रकृति में संव्याप्त चेतना शक्ति ही है।

शक्तिवान के साथ शक्ति का जुड़ा होना निश्चित और असंदिग्ध है। गायत्री ब्रह्म और शक्ति का ही समन्वय युग्म है। प्रत्येक शक्तिवान की सामर्थ्य को उसी संव्याप्त क्षमता का स्वरूप कहा जा सकता है। इसे कई स्थानों पर पति- पत्नी के उदाहरणों सहित भी चित्रित किया गया है। समर्थों के रूप में, विशिष्टों की विशेषता के रूप में इस महाशक्ति के दर्शन स्थान- स्थान पर किये गये हैं।

मंत्रणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञान रूपिणी ।।
ज्ञानानां चिन्तयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ॥

अर्थात्- वह महाशक्ति मन्त्रों में मातृ का रूप, शब्दों में ज्ञानरूप, ज्ञानियों में चिन्तयातीत और शून्यवादियों में शून्य रूप है।

गायत्री का मूल स्वरूप शक्ति है। यह स्पष्ट है कि संसार में जितने भी अभाव और कष्ट हैं, जितनी भी आधि- व्याधियाँ हैं, उन सबका कारण शक्ति का अभाव ही है और सभी शक्तियों का उद्गम आत्मशक्ति है। आत्मशक्ति के अभाव में मनुष्य की विचारणा निकृष्ट बनती है और प्रतिभा के अभाव में सुख साधनों से वंचित रहना पड़ता है, अस्तु। शक्ति संचय के प्रयत्न निरन्तर करने चाहिए । भौतिक समर्थता किस प्रकार प्राप्त होती है इसे सब जानते हैं, पर आत्मिक तेजस्विता किस प्रकार पाई जा सकती है इसका मार्गदर्शन आध्यात्म विज्ञान ही कर सकता है। इस दृष्टि से गायत्री- उपासना आत्मशक्ति अभिवर्धन का सरल और श्रेष्ठतम उपाय है। जो इसके लिए प्रयत्न करते हैं, वे समर्थ, सफल और सार्थक जीवन जीते हैं।  



गायत्री साधना से अन्तः कायाकल्प - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

सन्त इमर्सन कहा करते थे कि- ‘‘मुझे नरक में भेज दो ।। मैं वहाँ भी स्वर्ग का निर्माण कर लूँगा।’’ जिसका अन्तरंग इतना परिष्कृत एवं पवित्र हो गया वही इस प्रकार का उद्घोष कर सकता है। स्वर्ग बाह्य परिस्थितियों पर ही अपनी मनःस्थिति पर आधारित होता है। संतुलित एवं विधेयात्मक दृष्टिकोण ही स्वर्ग और निषेधात्मक अस्त- व्यस्त निकृष्ट चिन्तन ही नरक है। अपना व्यक्तित्व ही बाहरी परिस्थितियों को गढ़ता है। यदि वह निकृष्ट स्तर का हुआ तो वैसी ही स्थिति का निर्माण करेगा। उत्कृष्ट एवं पवित्र व्यक्तित्व ही स्वर्गीय वातावरण का सृजन करता है। स्पष्ट है, अन्तः करण की उत्कृष्टता एवं निकृष्टता पर ही बाह्य जगत में स्वर्ग य नरक के रूप में प्रतिबिम्बित होती है।

गायत्री महामंत्र का चतुर्थ पद धियो योनः प्रचोदयात अन्तःकी पवित्रता -बुद्धि की निर्मलता की ही प्रेरणा देता है। सद्बुद्धि मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है। परिष्कृत एवं उत्कृष्ट और पवित्र व्यक्तित्व सद्बुद्धि की अनुकम्पा पर ही बनते हैं। नर- पशु को देवता और महामानव बनाने की क्षमता सद्बुद्धि में है। उसी के बलबूते सामान्य व्यक्ति भी असामान्य की स्थिति में जा पहुँचते हैं। अन्तः परिशोधन की प्रक्रिया जिस आध्यात्म उपचार द्वारा सम्पन्न होती है, भारतीय संस्कृति में उसे गायत्री महामंत्र कहा गया है। यह बुद्धि को निर्मल, पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने का महामंत्र है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर के व्यामोह में जकड़ी दुर्बुद्धि मानवी व्यक्तित्व को हेय, गई- गुजरी स्तर की बनाये रहती है। गायत्री महामंत्र का अवलम्बन ‘धी’ को प्रेरित करता है। श्रेष्ठता के मार्ग पर जबरन ‘प्रचोदयात’ धकेल देता है। महामंत्र के अन्तिम पद में परमात्मा से अन्तः पवित्रता के लिए, सन्मार्ग पर बढ़ने के लिए प्रार्थना की गयी है।

नरक जैसी दृष्टिगोचर होने वाली परिस्थितियाँ उतनी बुरी नहीं होतीं, जितनी कि स्वयं का दृष्टिकोण। अपना आपा ही सर्वत्र परिलक्षित होता है। संसार तो दर्पण के समान है, जिसमें अपनी ही सूरत दिखाई देती है। क्रोधी व्यक्ति को सारी दुनिया ही लड़ती- झगड़ती  प्रतीत होगी। झूठे को सभी अविश्वासी ही जान पड़ते हैं। जो निकम्मे और आलसी है, उसे सर्वत्र बेकारी फैली मालूम देती है। व्यभिचारी, चोर, डाकू, सनकी, पागल जैसे मनोविकारों- वाले व्यक्ति सबको अपने अनुरूप ही देखते और दूसरों को भी अपने जैसा मानकर दोषारोपण करते रहते हैं। यदि वास्तविकता का, अपनी त्रुटि का बोध हो जाये तो जो बुरे जान पड़ते थे, वे अच्छे लगने लगेंगे।

दोषारोपण की दृष्टि से देखने पर तो प्रत्येक व्यक्ति में अनेकों प्रकार की बुराइयाँ मालूम पड़ती हैं। पर जब यह सोचना आरम्भ करते हैं कि किसने, कब और कितना उपकार हमारे ऊपर किया है तो प्रतीत होता है, कि अपने ऊपर तो दूसरों की सेवा, उपकार का इतना बोझ लदा है कि उससे सिर उठाना भी मुश्किल है। दृष्टि निषेधात्मक हो तो अपने निकटवर्तियों- आत्मीय जनों में ही अनेकों प्रकार के दोष ढूँढ़ने पर निकल आयेंगे। पत्नी के एक दोष पर ही चिन्तन करते रहा जाये तो पाप की प्रतिमूर्ति जान पड़ेगी। उसकी सारी सेवाएँ विस्मृत हो जायेंगी। माता- पिता की कटु बात, डाट- फटकार को गाँठ बाँध लेने पर तो उनके समस्त त्याग- बलिदान भूल जाते हैं। बच्चे को वे दुश्मन जैसे दीखते हैं। यही बात स्वजन सम्बन्धियों एवं मित्रों के विषय में लागू होती है। छोटी बुराई पर चिन्तन करते रहने से तो दुर्भाव बढ़ता ही जाता है। उनकी समस्त अच्छाइयाँ भूल जाती हैं और बुराइयों पर ध्यान जितना अधिक देते हैं उतना ही दुःखी होते हैं। इसकी अपेक्षा दृष्टिकोण परिमार्जित हो तो प्रतीत होगा कि चारों ओर से हमारे ऊपर स्नेह, वात्सल्य, सहयोग, सद्भाव एवं कृपा की वर्षा हो रही है।

सही दृष्टिकोण के अभाव में तो अनेकों प्रकार की कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। किसी वस्तु का अभाव रहने पर ईश्वर को, भाग्य को कोसते हैं। उसके असीम अनुदानों को भूल जाते हैं, जो पग- पग पर उपलब्ध होते रहते हैं। आपत्ति आ पड़ने पर मात्र दुःख को देखते हैं, पर यह नहीं देखते कि इसके कारण साहस एवं पुरूषार्थ को जाग्रत करने का अवसर भी मिलता है। ईश्वर तो करुणा का सागर है। वह द्वेष- वश अथवा निष्ठुर होकर क्यों अपने ही पुत्रों को कष्ट देगा। आई हुई विपदाओं में मनुष्य का दूरवर्ती लाभ निहित होता है। अध्यापक के पीटने में , माता- पिता के धमकाने में, डॉक्टर के ऑपरेशन में किस प्रकार बालक मा हित सन्निहित होता है, उसी प्रकार अनेकों कष्टों के पीछे प्रभु की करुण- कृपा ही छिपी रहती है। यह विवेक बुद्धि गायत्री- उपासना से सहज ही जाग्रत हो जाती है। यही कारण है कि गायत्री साधक सामने आए अवरोधों से घबड़ाता नहीं है। जीवन का एक अनिवार्य पक्ष विकास का साधन मानकर उनको दूर करने का प्रयत्न करता है। वह अपनी आन्तरिक महानता से परिचित हो जात है और जानता है कि घटनाएँ तो नित्य बदलती रहती हैं? वे धूप- छाँह जैसी होती हैं। इस कारण उन्हें अनावश्यक महत्त्व क्यों दिया जायें। जीवन शान्ति, सन्तोष एवं प्रसन्नता से जीने की वस्तु है। उसे क्रीड़ा, कल्लोल, विनोद, विलास ही समझना चाहिए। इस तत्त्वज्ञान से परिचित गायत्री उपासक अनावश्यक शोक, मोह, चिन्ता, भय, क्रोध और आवेश से बचा रहता है। कर्तव्य- मार्ग पर निर्लिप्त भाव से आरूढ़ रहना ही रुचता है। फलतः मानसिक उद्वेग उसे परेशान नहीं कर पाते।

गायत्री मन्त्र का अन्तिम पद साधक को इतना आत्मबल देता है, जिससे वह सामने आई बाधाओं का सामना सहज ही कर सके। सफलता- असफलता से वह उतना प्रभावित नहीं होता। उसका ध्यान मात्र कर्तव्यों पर बना रहता है। अन्तः का परिष्कार- मनोभूमि का संशोधन- यही है अध्यात्म का मूलभूत लक्ष्य। गायत्री के तृतीय चरण का यही सन्देश है। अनुकूल- प्रतिकूल हर प्रकार की परिस्थिति में सन्तुलित एवं प्रसन्नचित्त बने रहना गायत्री- उपासना की सबसे बड़ी उपलब्धि है।


इस महामन्त्र का सन्देश है कि हर प्रकार की परिस्थितियों का उपयोग बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से करें। अच्छे से अच्छे भविष्य की आशा करे, पर बुरे से बुरे परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहें। यदि कठिनाइयों को अपने पुरुषार्थ एवं साहस को विकसित करने की चुनौती मात्र समझा जाये, उनसे भयभीत न हुआ जाये तो निश्चय ही कोई अप्रिय घटना हमें दुःखित नहीं कर सकती। अपनी प्रसन्नता में बाधक नहीं बन सकती ।। प्रसन्न रहना अपना स्वभाव बना लेने की सद्बुद्धि को अपना लिया जाये तो छोटे- मोटे कारणों से दुःखी होने की कुबुद्धि से सहज ही छुटकारा मिल सकता है। जीवन खिलाड़ी की भावना से खेलने के लिए प्राप्त हुआ है। खिलाड़ी पूरे उत्साह से खेलते हैं, पर जीत- हार की चिन्ता ही नहीं करते। रंगमंच पर अभिनय करने वाले अभिनेता कुशलता के साथ अपना पार्ट निभाते हैं, पर स्वयं अप्रभावित बने रहते हैं। खिलाड़ी और अभिनेता की भाँति जीवन का खेल खेलना चाहिए। ध्यान दिया जाये तो प्रतीत होगा कि जो सुविधाएँ एवं परिस्थितियाँ हमें मिली हैं, वे अनेकों की तुलना में कहीं अधिक श्रेयस्कर एवं सुखद हैं। प्राप्त सुविधाओं की तुलना में दुःख की मात्रा तो नगण्य, अल्प है। यह दृष्टिकोण बन सके तो प्राप्त सुविधाओं पर प्रसन्न रहा जा सकता है। दुःखों की उपेक्षा की जा सकती है।

गायत्री का तृतीय चरण अन्तः का परिशोधन करता है। बुद्धि इतनी परिमार्जित एवं निर्मल बन जाती है कि सदचिन्तन का महत्त्व समझ सके। दृष्टिकोण विधेयात्मक बनता है। बाह्य परिलक्षित होने वाली स्वर्गीय अथवा नारकीय परिस्थितियों में इस दृष्टिकोण की ही प्रधान भूमिका होती है। इस मनःस्थिति का निर्माण जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। अन्तः उत्कृष्टता से ओत- प्रोत व्यक्ति को सर्वत्र सतचित एवं आनन्द का ही दिग्दर्शन होता है। यही गायत्री- उपासना की उपलब्धि है। जिसको प्राप्त कर कोई भी व्यक्ति सन्त इमर्सन की भाँति कह सकता है कि ‘‘मुझे नरक में भेज दो, मैं स्वर्ग का सृजन कर लूँगा। ’’ यह परिष्कृत एवं परिशोधित मनःस्थिति का ही सत्परिणाम है, जो इस प्रकार के उद्गारों के रूप में प्रकट होते हैं। गायत्री उपासना के अवलम्बन से इस प्रकार की मनःस्थिति की प्रगति अवश्यम्भावी है।





गायत्री साधना के दिव्य लाभ - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

गायत्री मन्त्र में समस्त संसार को धारण, पोषण और अभिवर्धन करने वाले परमात्मा से सद्बुद्धि की प्रार्थना की गयी है। श्रद्धाविश्वास पूर्वक की गयी यह उपासना साधक की अन्तश्चेतना को, उसके मन, अन्तःकरण, मस्तिष्क, विचारों और भावनाओं को सन्मार्ग की ओर अग्रसर होने को प्रेरित करती है। साधक जब इस महामन्त्र के अर्थ पर विचार करता है, तो वह समझ जाता है, कि संसार की सर्वोपरि समृद्धि और जीवन की सबसे बड़ी सफलता सद्बुद्धि को प्राप्त करना है।

यह मान्यता स्थिर हो जाने पर साधक की इच्छा- शक्ति इसी तत्त्व को प्राप्त करने के लिए लालायित होती है। इस आकांक्षा से अन्तरंग क्षेत्र में एक प्रकार चुम्बकत्व उत्पन्न होता है, उसके आकर्षण से निखिल आकाश के ईश्वर तत्त्व में विद्यमान सत् तत्त्व, सत् विचार, भावनायें और प्रेरणायें उस स्थान पर एकत्रित होने लगती हैं। विचारों की चुम्बकीय शक्ति का विज्ञान सर्वविदित है। एक जाति के विचार अपने सजातीय विचारों को आकाश से खींचते हैं, फलस्वरूप संसार के भूत और जीवित सत्पुरुषों के फैलाये हुए अविनाशी संकल्प जो शून्य में सदैव भ्रमण करते रहते हैं, गायत्री साधक के पास दैवी वरदान की तरह अनायास ही आकर जमा होते रहते हैं और संचित पूँजी की भाँति उनका एक बड़ा भण्डार जमा हो जाता है।

शरीर में सत् तत्त्व की अभिवृद्धि होने से शरीर चर्या की गतिविधि में काफी हेर- फेर हो जाता है। इन्द्रियों के भोगों में भटकने की गति मन्द हो जाती है। चटोरेपन ,, तरह- तरह के स्वादों के पदार्थ खाने के लिए मन ललचाने रहना, बार- बार खाने की इच्छा होना, अधिक मात्रा में खाना, भक्षाभक्ष का विचार न रहना, सात्त्विक पदार्थों में अरुचि और चटपटे, मीठे, गरिष्ठ पदार्थों में रुचि, जैसी बुरी आदत धीरे- धीरे कम होने लगती है। हल्के, सुपाच्य, सरस, सात्त्विक भोजनों से उसे तृप्ति मिलती है और राजसी, तामसी खाद्यों से घृणा हो जाती है। इसी प्रकार कामेन्द्रियों की उत्तेजना सतोगुणी विचारों के कारण संयमित हो जाती है। कुमार्ग में, व्यभिचार- वासना में मन कम दौड़ता है, ब्रह्मचर्य के प्रति श्रद्धा बढ़ती है। फलस्वरूप वीर्य- रक्षा और शरीर- वृद्धि का प्रधान हेतु है। इनके साथ- साथ परिश्रम, स्नान, निद्रा, सोना- जागना, सफाई, सादगी और अन्य दिनचर्याएँ भी सतोगुणी हो जाती हैं, जिनके कारण आरोग्य और दीर्घ जीवन की जड़ें मजबूत होती हैं।

मानसिक क्षेत्र में सद्गुणों की वृद्धि के कारण दोष- दुर्गुण कम होने लगते हैं तथा सद्गुण बढ़ने लगते हैं। इस मानसिक कायाकल्प का परिणाम यह होता है कि दैनिक जीवन में प्रायः नित्य ही आती रहने वाले अनेकों दुःखों का सहज ही समाधान हो जाता है। इन्द्रिय संयम और दिनचर्या के कारण शारीरिक रोगों का भी निराकरण हो जाता है। विवेक जाग्रत होते ही अज्ञान- जन्य चिन्ता, शोक, भय, आशंका, मोह- ममता हानि के दुःखों से छुटकारा मिल जाता है। ईश्वर- विश्वास के कारण मति स्थिर रहती है और भावी जीवन के बारे में निश्चिन्तता बनी रहती है। धर्म- प्रवृत्ति के कारण पाप, अन्याय, अनाचार नहीं बन पड़ते। फलस्वरूप राज- दण्ड समाज- दण्ड, आत्म- दण्ड और ईश्वर- दण्ड की चोटों से पीड़ित नहीं होना पड़ता। सेवा, नम्रता, उदारता, दान, ईमानदारी, लोकहित आदि गुणों के कारण दूसरों को लाभ पहुँचता है, हानि की आशंका नहीं रहती। इससे प्रायः सभी लोग उनके कृतज्ञ, प्रशंसक, सहायक भक्त एवं रक्षक होते हैं। पारस्परिक सद्भावनाओं के परिवर्तन से आत्मा की तृप्ति करने वाले प्रेम और सन्तोष नामक रस दिन- दिन अधिक मात्रा में उपलब्ध होकर जीवन को आनन्दमय बनाते चलते हैं। इस प्रकार शारीरिक और मानसिक क्षेत्रों में सत्व- तत्त्व की वृद्धि होने से दोनों ओर आनन्द का स्रोत उमड़ता है और गायत्री साधक उसमें निमग्न रहकर आत्म- सन्तोष का, परमानन्द का रसास्वादन करता है।

आत्मा ईश्वर का अंश होने से उन सब शक्तियों को बीज रूप से अन्दर छिपाये रहता है, जो ईश्वर में होती हैं। वे शक्तियाँ सुप्तावस्था में रहती हैं और मानसिक तापों के विषय- विकारों के, दोष- दुर्गुणों के ढेर में दबी हुई अज्ञान रूप से पड़ी रहती हैं। लोग समझते हैं कि हम दीन- हीन और अशक्त हैं, पर जो साधक मनोविकारों का पर्दा हटाकर निर्मल आत्म- ज्योति के दर्शन करने में समर्थ होते हैं, वे जानते हैं कि सर्व शक्तिमान ईश्वरीय ज्योति उनकी आत्मा में मौजूद है और वे परमात्मा के सच्चे अधिकारी हैं। अग्नि के ऊपर से राख हटा दी जाये तो फिर दहकता अंगार प्रकट हो जाता है। वह अंगार छोटा होते हुए भी भयंकर अग्निकांडों की सम्भावना से युक्त होता है। यह पर्दा फटते ही तुच्छ मनुष्य महान आत्मा (महात्मा) बन जाता है

। चूँकि आत्मा में अनेकों ज्ञान, विज्ञान, साधारण- असाधारण अद्भुत, आश्चर्यजनक शक्ति के भण्डार छिपे पड़े हैं, वे खुल जाते हैं और वह सिद्ध योगी के रूप में दिखाई पड़ता है। सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिये बाहर से कुछ लाना नहीं पड़ता, किसी देव- दानव की कृपा की जरूरत नहीं पड़ती, केवल अन्तःकरण पर पड़े हुए आवरणों को हटाना पड़ता है। गायत्री की सतोगुणी साधना का सूर्य तामसिक अन्धकार के पर्दे को हटा देता है और आत्मा का सहज ईश्वरीय रूप प्रकट हो जाता है ।। आत्मा का यह निर्मल रूम सभी ऋद्धि- सिद्धियों से परिपूर्ण होता है ।

गायत्री द्वारा सतोगुणों की वृद्धि अनेक प्रकार की आध्यात्मिक और सांसारिक समृद्धियों की जननी है, शरीर और मन की शुद्धि सांसारिक जीवन को अनेक दृष्टियों से सुख- शांतिमय बनाती है। आत्मा में विवेक और आत्मबल की मात्रा बढ़ जाने से अनेक ऐसी कठिनाइयाँ जो दूसरों को पर्वत के समान भारी मालूम पड़ती हैं, उस आत्मवान् व्यक्ति के लिए तिनके के समान हल्की बन जाती हैं। उसका कोई काम रुका नहीं रहता या तो उसकी इच्छा के अनुसार परिस्थिति बदल जाती है या परिस्थिति के अनुसार अपनी इच्छाओं को बदल लेता है। क्लेश का कारण इच्छा और परिस्थिति के बीच प्रतिकूलता का होना ही तो है। विवेकवान इन दोनों में से किसी को अपनाकर उस संघर्ष को टाल देता है और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। उसके लिये इस पृथ्वी पर भी स्वर्गीय आनन्द की सुरसरि बहने लगती है।

वास्तव में सुख और आनन्द का आधार किसी बाहरी साधन- सामग्री पर नहीं किन्तु मनुष्य की मनःस्थिति पर निर्भर करता है। मन की साधना से जो मनुष्य एक समय राजसी भोजनों और रेशमी गद्दे- तकियों से भी संतुष्ट नहीं होता, वह किसी सन्त के उपदेश से त्याग और संन्यासी व्रत ग्रहण कर लेने पर जंगल की भूमि को ही सबसे उत्तम शैया, वन के कन्द- मूल फलों को ही सर्वोत्तम आहार समझने लगता है। यह सब अन्तर मनोभाव और विचारों के बदल जाने से ही उत्पन्न होता है।

गायत्री सद्बुद्धि की, ऋतम्भरा प्रज्ञा की अधिष्ठात्री देवी है और उससे साधक सद्बुद्धि की याचना करता है। इस सद्बुद्धि के द्वारा सभी प्रकार के दुःखों को कारण मूल से दूर किया जा सकता है। सद्बुद्धि के प्रकाश में वे सभी सुझाई देने लगते हैं, जिनको काम में लाने पर दुःखों के कारण दूर हो जाते हैं। यों संसार में कई प्रकार के दुःख हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी- अपनी समस्यायें और कठिनाइयाँ हैं । सबकी अलग- अलग उलझनें हैं। इस दृष्टि से तो सबके दुःखों का कारण भी अलग- अलग होना चाहिए। परन्तु ऐसा है नहीं। गम्भीरता पूर्वक विचार किया जाये तो प्रतीत होगा कि जीवन और जगत में विद्यमान समस्त दुःखों के कारण तीन हैं -(१) अज्ञान (२) अशक्ति और (३) अभाव । जो इन तीन कारणों को जिस सीमा तक अपने से दूर करने में समर्थ होगा, वह इतना ही सुखी बन सकेगा।

अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता है, वह तत्त्व- ज्ञान से अपरिचित होने के कारण उल्टा- पुल्टा सोचता है और उल्टे काम करता है, तदनुसार उलझनों में अधिक फँसता जाता है और दुःखी बनता है। स्वार्थ- भोग, लोभ, अहंकार, अनुदारता और काम की भावनायें मनुष्य को कर्तव्यच्युत करती हैं और वह दूरदर्शिता को छोड़कर क्षणिक, क्षुद्र एवं हीन बातें सोचता है तथा वैसे ही काम करता है। फलस्वरूप उसके विचार और कार्य पापमय होने लगते हैं। पापों का निश्चित परिणाम दुःख है। दूसरी ओर अज्ञान के कारण वह अपने और दूसरे की सांसारिक गतिविधि में मूल हेतुओं को नहीं समझ पाता। फलस्वरूप असम्भव आशायें, तृष्णायें कल्पनायें किया करता है। इन उल्टे दृष्टिकोणों के कारण साधारण सी बातें उसे बड़ी दुःखमय दिखाई देती हैं। जिसके कारण वह रोता- चिल्लाता रहता है। आत्मीयों की मृत्यु, साथियों की भिन्न रुचि, परिस्थितियों का उतार- चढ़ाव स्वाभाविक है, पर अज्ञानी सोचता है कि मैं जो चाहता हूँ वह सदा होता रहे, प्रतिकूल बात सामने आवे ही नहीं। इस असम्भव आशा के विपरीत घटनाएँ जब भी घटित होती हैं तभी वह रोता चिल्लाता है। तीसरे अज्ञान के कारण भूलें भी अनेक प्रकार की होती हैं। समीपस्थ, सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है, यह भी दुःख का हेतु है। इस प्रकार अनेकों दुःख मनुष्य को अज्ञान के कारण प्राप्त होते हैं

अशक्ति का अर्थ है- निर्बलता । शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, बौद्धिक, आत्मिक निर्बलताओं के कारण, मनुष्य अपने स्वाभाविक, जन्मसिद्ध अधिकारों का भार अपने कन्धों पर उठाने में समर्थ नहीं होता, फलस्वरूप उसे वंचित रहना पड़ता है। स्वास्थ्य खराब हो, बीमारी ने घेर- रखा हो तो स्वादिष्ट भोजन, रूपवती तरूणी, मधुर गीत, बाह्य, सुन्दर दृश्य निरर्थक हैं। धन- दौलत का कोई कहने लायक सुख उसे नहीं मिल सकता । बौद्धिक निर्बलता हो तो साहित्य, काव्य, दर्शन- मनन, चिन्तन का रस प्राप्त नहीं हो सकता। आत्मिक निर्बलता हो तो सत्संग, प्रेम, भक्ति आदि का आत्मानन्द दुर्लभ है। इतना ही नहीं, निर्बलों को मिटा डालने के लिये प्रकृति का ‘उत्तम की रक्षा’ सिद्धान्त काम करता है। कमजोर को सताने और मिटाने के लिये अनेकों तथ्य प्रकट हो जाते हैं। निर्दोष, भले और सीधे- साधे तत्त्व भी उसके प्रतिकूल पड़ते हैं। सर्दी, जो बलवानों की बलवृद्धि करती है, रसिकों को रस देती है, वह कमजोरों को निमोनियाँ, गठिया आदि का कारण बन जाती है । जो तत्त्व निर्बलों के लिये प्राणघातक हैं, वे ही बलवानों को सहायक सिद्ध होते हैं। बेचारी निर्बल बकरी को जंगली जानवरों से लेकर जगत्माता भवानी दुर्गा तक चट कर जाती है और सिंह को वन्य पशु भी नहीं, बड़े- बड़े सम्राट तक राज- चिह्न में धारण करते हैं। अशक्त हमेशा दुःख पाते हैं, उनके लिये भले तत्त्व भी आशाप्रद सिद्ध नहीं होते हैं।

अभावजन्य दुःख है- पदार्थों का अभाव। अन्न- वस्त्र, मकान, पशु, भूमि, सहायक, मित्र, धन, औषधि, पुस्तक, शस्त्र, शिक्षक आदि के अभाव में विविध प्रकार की पीड़ायें कठिनाइयाँ भुगतनी पड़ती हैं। उचित आवश्यकताओं को कुचल कर मन मारकर बैठना पड़ता है और जीवन के महत्त्वपूर्ण क्षणों को मिट्टी के मोल नष्ट करना पड़ता है। योग्य और समर्थ व्यक्ति भी साधनों के अभाव मे अपने को लुंज- पुंज अनुभव करते हैं और दुःख उठाते हैं।

गायत्री कामधेनु है, जो उसकी, पूजा, उपासना आराधना और अभिभावना करता है, वह प्रतिक्षण माता का अमृतोपम दुग्धपान करने का आनन्द लेता है और समस्त अज्ञानों, आशक्तियों और अभावों के कारण उत्पन्न होने वाले कष्टों से छुटकारा पाकर मनोवांछित फल प्राप्त करता है। योग्य गुरू के पथ- प्रदर्शन में की गयी गायत्री साधना अभीष्ट लाभ पहुँचाती है। इन साधनाओं में सफलता प्राप्त करने के लिए भले ही थोड़ा- बहुत अधिक समय व श्रम लगाना पड़े पर अन्य कष्टपूर्ण साधनाओं की अपेक्षा उन साधनाओं में जल्दी ही सफलता मिलती है। योगी जनों का कष्ट साध्य लम्बा मार्ग गायत्री द्वारा बहुत सरल हो जाता है और घर में रहते हुए गृहस्थ व्यक्ति भी वनवासी तपस्वियों जैसी सफलता प्राप्त कर लेता है।

कष्टप्रद भव बन्धनों, माया- मोह की शृंखला से छुटकारा पाकर परम लक्ष्य को प्राप्त करना इस मार्ग से जितना सरल है, उतना और किसी मार्ग से संभव नहीं, गायत्री साधना द्वारा मानसिक परिष्कार व्यक्तित्व के विकास, दुःखों के निवारण और आत्मिक विकास के दिव्य लाभों के अतिरिक्त कई सिद्धियाँ, विशेष शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं। इन शक्तियों को क्रमशः अर्जित करते हुए व्यक्ति अनुपम और अद्वितीय, असाधारण व्यक्तित्व का स्वामी बन जाता है।




गायत्री उपासना से दिव्य प्रकाश की प्राप्ति - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

अध्यात्म शास्त्रों में स्थान- स्थान पर प्रकाश की साधना और याचना की चर्चा मिलती है। प्रकाश बल्ब, बत्ती अथवा सूर्य या चन्द्रमा से निकलने वाली रोशनी, नहीं अपितु वल परम ज्योति है, जो इस विश्व में चेतना का आलोक बन कर जगमगा रही है। इसी के लिए ऋषि ने गाया है तमसो मां ज्योतिर्गमय, हे प्रभु ! मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। गायत्री का उपास्य सविता ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष और कण- कण में संव्याप्त जीवन- ज्योति के रूप में प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर देख सकता है। इसकी जितनी मात्रा जिसके भीतर विद्यमान हो, समझना चाहिए कि उसमें उतना ही ईश्वरीय अंश आलोकित हो रहा है।

मस्तिष्क के मध्यभाग से प्रकाश कणों का एक फुब्बारा सा फूटता रहता है। उसकी उछलती हुई तरंगें एक वृत्त बनाती हैं और फिर अपने मूल उद्गम में लौट जाती हैं। यह रेडियो प्रसारण और संग्रहण जैसी प्रक्रिया है, ब्रह्मरन्ध्र से छूटने वाली ऊर्जा अपने भीतर छिपी हुई भाव स्थिति को विश्व- ब्रह्माण्ड में ईथर कम्पनों द्वारा प्रवाहित करती रहती है, इस प्रकार मनुष्य अपनी चेतना का परिचय और प्रभाव समस्त संसार में फेंकता रहता है। फुहारे की लौटती हुई धाराएँ अपने साथ विश्व- व्यापी असीम ज्ञान की नवीनतम घटनात्मक तथा भावनात्मक जानकारियाँ लेकर लौटती हैं, यदि उन्हें ठीक तरह समझा जा सके ,, ग्रहण किया जा सके, तो कोई भी व्यक्ति भूतकालीन और वर्तमान काल की अत्यन्त सुविस्तृत और महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त कर सकता है। व्यक्ति में प्रवाह ग्रहण करने की और प्रसारित करने की जो क्षमता है, उसका माध्यम यह ब्रह्मरंध्र अवस्थित ध्रुव संस्थान ही है, पृथ्वी पर अन्य ग्रहों का प्रचुर अनुदान आता है तथा उसकी विशेषताएँ अन्यत्र चली जाती हैं। यह आदान- प्रदान का कार्य ध्रुव केन्द्रों द्वारा सम्पन्न होता है। शरीर के भी दो ध्रुव हैं, एक मस्तिष्क, दूसरा जनन गह्वर। चेतनात्मक विकरण मस्तिष्क से और शक्ति- परक ऊर्जा प्रवाह जनन गह्वर से सम्बन्धित है। सूक्ष्म आदान- प्रदान की अति महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया इन्हीं केन्द्रों के माध्यम से संचालित होती है।

शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुरूप तेजोवलय की स्थिरता के अनुरूप तेजोवलय की स्थिरता बनती है। यदि स्थिति बदलने लगे तो प्रकाश पुंज की स्थिति भी बदल जायेगी। इतना ही नहीं समय समय पर मनुष्य के बदलते हुए स्वभाव तथा चिन्तन स्तर के अनुरूप उसमें सामयिक परिवर्तन होते रहते हैं। सूक्ष्म दर्शी उसकी भिन्नताओं को रंग बदलते हुए परिवर्तनों के रूप में देख सकते हैं। शान्ति और सज्जनता की मनःस्थिति हल्के नीले रंग में देखी जायेगी। विनोदी, कामुक, सत्तावान, वैभवशाली, विशुद्ध व्यवहार- कुशल स्तर की मनोभूमि पीले रंग की होती है। क्रोधी, अहंकारी, क्रूर, निष्ठुर, स्वार्थी, हठी और मूर्ख मनुष्य लाल वर्ण के तेजोवलय से घिरे रहते हैं। हरा रंग सृजनात्मक एवं कलात्मक प्रवृत्ति का द्योतक है। गहरा बैगनी चंचलता और अस्थिर मति का प्रतीक है। धार्मिक, ईश्वर- भक्त और सदाचारी व्यक्तियों की आभा केसरिया रंग की होती है। इसी प्रकार विभिन्न रंगों का मिश्रण मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव के परिवर्तनों के अनुसार बदलता रहता है। यह तेजोवलय सदा स्थिर नहीं रहता बदलती हुई मनोवृत्ति प्रकाश- पुंज के रंगों में परिवर्तन कर देती है। यह रंग स्वतन्त्र रूप से कुछ नहीं। मनोभूमि में होने वाले परिवर्तन, शरीर से निसृत होते रहने वाले ऊर्जा कम्पनों की घटती- बढ़ती संख्या के आधार पर आँखों को अनुभव होते हैं। वैज्ञानिक इन्हें ‘‘ फ्रीक्वेन्सी आफ दी वेयस’’ कहते हैं।

दिव्य दर्शन, दिव्य अनुभव, प्रभाव प्रेषण, संकल्प प्रयोग जैसे प्रयोग थोड़ी आत्म- शक्ति विकसित होते ही आसानी से किये जा सकते हैं। इन क्षेत्रों में पिछले दिनों काफी शोधकार्य चला आ रहा है और उन प्रयासों के फलस्वरूप कई उपयोगी निष्कर्ष सामने आये हैं। परामनो विज्ञान, अतीन्द्रिय विज्ञान, मैटाफिजिक्स जैसी चेतनात्मक विद्यायें भी अब विज्ञान की अन्यान्य शाखाओं के समान विकसित हो रही हैं। रुचि, तन- मन की सामर्थ्य के सम्बन्ध में जैसे- जैसे रहस्यमय जानकारियों के पर्त खुलते हैं, वैसे- वैसे यह स्पष्ट होता जाता है कि नरपशु लगने वाला मनुष्य वस्तुतः असीम और अनंत क्षमताओं का भण्डार है। कठिनाई इतनी भर है, कि उसकी अधिकांश विशेषतायें प्रस्तुत एवं अविज्ञात स्थिति में पड़ी रहती हैं।

डॉ जे०सी०ने अणु और आत्मा, ग्रन्थ में स्वीकार किया है कि मानव- अणुओं की प्रकाश वाष्प न केवल मनुष्यों में वरन् अन्य जीवधारियों, वृक्ष, वनस्पति, औषधि आदि में भी होती है, यह प्रकाश- अणु शरीर में रहते हैं। इन प्रकाश अणुओं के हटते ही स्थूल शरीर बेकार हो जाता है, फिर उसे लाते गढ़ाते ही बनता है। खुला छोड़ देने पर तो उसकी सड़ाँध से उसके पास एक क्षण भी ठहरना कठिन हो जाता है।

स्वभाव- संस्कार इच्छाएँ क्रिया- शक्ति यह सब इन प्रकाश- अणुओं का ही खेल है। हम जानते हैं कि प्रकाश का एक अणु(फेटान) भी कई रंगों के अणुओं से मिलकर बना होता है। मनुष्य शरीर की प्रकाश आभा भी कई रंगों से बनी होती है। डॉ जे० सी० ट्रस्ट ने अनेक रोगियों, अपराधियों तथा सामान्य व श्रेष्ठ व्यक्तियों का सूक्ष्म निरीक्षण करके बताया है, उसके मानव- अणु दिव्य तेज और आभा वाले होते हैं, जबकि अपराधी और रोगी व्यक्तियों के प्रकाश- अणु क्षीण और अन्धकार- पूर्ण होते हैं ।। उन्होंने बहुत से मनुष्यों के काले धब्बों को अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर उनके रोगी या अपराधी होने की बात को बताकर लोगों को स्वीकार करा दिया था कि सचमुच रोग और अपराधी वृत्तियाँ काले रंग के अणुओं की उपस्थिति का प्रतिफल होती हैं, मनुष्य अपने स्वभाव में चाहते हुए भी तब तक परिवर्तन नहीं कर सकता ,, जब तक यह दूषित प्रकाश- अणु अपने अन्दर विद्यमान बने रहते हैं।

यही नहीं जन्म- जन्मान्तरों तक खराब प्रकाश -अणुओं की यह उपस्थिति मनुष्य से बलात् दुष्कर्म कराती रहती है। इस तरह मनुष्य पतन के खड्डे मे बार- बार गिरता और अपनी आत्मा को दुःखी बनाता रहता है, जब तक ये अणु नहीं बदलते व निष्क्रिय नहीं होते, तब तक मनुष्य किसी भी परिस्थति में अपनी दशा नहीं सुधार पाता।

यह तो है, कि अपने प्रकाश- अणुओं में यदि तीव्रता है तो उससे दूसरों को आकस्मिक सहायता दी जा सकती है। रोग दूर किये जा सकते हैं। खराब विचार वालों को कुछ देर के लिए अच्छे सन्त स्वभाव में बदला जा सकता है। महर्षि नारद के सम्पर्क में आते ही डाकू बाल्मीकि के प्रकाश अणुओं में तीव्र झटका लगा और वह अपने आपको परिवर्तित कर डालने को विवश हुआ। भगवान बुद्ध के इन प्रकाश- अणुओं से निकलने वाली विचारधारायें पलट गई थीं। ऋषियों के आश्रमों में गाय और शेर एक घाट पर पानी पीने आते थे, वह इन प्रकाश- अणुओं की ही तीव्रता के कारण होता था। उस वातावरण से निकलते ही व्यक्तिगत प्रकाश- अणु फिर बलवान हो उठने से लोग पुनः दुष्कर्म करने लगते हैं, इसलिए किसी को आत्म- शक्ति या अपना प्राण देने की अपेक्षा भारतीय आचार्यों ने एक पद्धति का प्रसार किया था, जिसमें इन प्रकाश- अणुओं का विकास कोई भी व्यक्ति इच्छानुसार कर सकता था ।। देव- उपासना उसी का नाम है।

उपासना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें हम अपने भीतर के काले, मटमैले और पापाचारण को प्रोत्साहन देने वाले प्रकाश- अणुओं दिव्य, तेजस्वी, सदाचरण और शान्ति एवं प्रसन्नता की वृद्धि करने वाले मानव- अणुओं में परिवर्तित करते हैं। विकास की इस प्रक्रिया में किसी वैज्ञानिक तत्त्व, पिण्ड या ग्रह- नक्षत्र की साझेदारी होती है। उदाहरण के लिए जब हम गायत्री की उपासना करते हैं तो हमारे भीतर के प्रकाश- अणुओं को हटाने और उसके स्थान पर दिव्य प्रकाश अणु भर देने का माध्यम गायत्री का देवता सविता अर्थात् सूर्य होता है।


वर्ण रचना और प्रकाश की दृष्टि से ये मानव- अणु भिन्न- स्वभाव के होते हैं। मनुष्य का जो कुछ भी स्वभाव आज दिखाई देता है, वह इन्हीं अणुओं की उपस्थिति के कारण होता है, यदि इस विज्ञान को समझा जा सके, तो न केवल अपना जीवन शुद्ध, सात्त्विक, सफल, रोगमुक्त बनाया जा सकता है, वरन् औरों को भी प्रभावित और इन लाभों से लाभान्वित किया जा सकता है। परलोक और सद्गति के आधार भी यह प्रकाश- अणु या मानव- अणु ही हैं।

वस्तुएँ हम प्रकाश कणों की सहायता से हम शरीर के कोश (सैल) को देखना चाहें तो वे इतने सूक्ष्म हैं कि उन्हें देख नहीं सकते। इलेक्ट्रॉनों को जब ५०००० वोल्ट आवेश पर सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) में भेजा जाता है ते उनकी तरंग- दैर्घ्य श्वेत प्रकाश कणों की तुलना में १/१००० भाग सूक्ष्म होती हैं, तब वह हाइड्रोजन के परमाणु का जितना व्यास होता है, उसके भी ४२.४ वे हिस्से छोटे परमाणु में भी प्रवेश करके वहाँ की गतिविधियाँ दिखा सकती हैं। उदाहरण के लिए यदि मनुष्य की आँख एक इन्च घेरे को देख सकती है तो उससे भी ५०० अंश कम को प्रकाश सूक्ष्मदर्शी और १०००० अंश छोटे भाग को सूक्ष्मदर्शी ।। इसी से अनुमान लगा सकते हैं कि मनुष्य शरीर के कोष (सेल्स) का चेतन भाग कितना सूक्ष्म होना चाहिए। इस तरह के सूक्ष्मदर्शी से जब कोश का निरीक्षण किया जाय तो उनमें भी एक टिमटिमाता हुआ प्रकाश दिखाई दिया। चेतना या महत्त्व इस प्रकार प्रकाश की ही अति सूक्ष्म स्फुरणा है, यह विज्ञान भी मानता है।

भारतीय योगियों ने ब्रहमरन्ध्र स्थित जिन षटचक्रों की खोज की है, सहस्रार कमल उनसे बिल्कुल अलग सर्वप्रभुता सम्पन्न है। चह स्थान कनपटियों से दो- दो इन्च अन्दर भृकुटि से लगभग ढाई या तीन इन्च अन्दर छोटे से पीले में प्रकाश पुंज के रूप में है। तत्त्वदर्शियों के अनुसार यह स्थान उलटे छाते या कटोरे के समान १७ प्रधान प्रकाश तत्त्वों से बना होता है, देखने में मर्करी लाइट के समान दिखाई देता है। छान्दोग्य उपनिषद् में सहस्रार दर्शन की सिद्धि पाँच अक्षरों में इस तरह प्रतिपादित की है ‘ तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारी भवति ’ अर्थात् सहस्रार प्राप्त कर लेने वाला योगी सम्पूर्ण भौतिक विज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। यही वह शक्ति केन्द्र है जहाँ से मस्तिष्क शरीर का नियन्त्रण करता है और विश्व में जो कुछ भी मानवकृत विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है, उनका सम्पादन करता है।

आत्मा या चेतना जिन अणुओं से अपने को अभिव्यक्त करती है, वह प्रकाश- अणु ही हैं, जबकि आत्मा स्वयं उनसे भिन्न है। प्रकाश- अणुओं को प्राण, विधायक शक्ति, अग्नि, तेजस् कहना चाहिए, वह जितने शुद्ध, दिव्य और तेजस्वी होंगे, व्यक्ति उतना ही महान् तेजस्वी, यशस्वी, वीर, साहसी और कलाकार होगा। महापुरुषों के तेजोवलय उसी बात के प्रतीक हैं, जब कि निकृष्ट कोटि के व्यक्तियों में यह अणु अत्यन्त शिथिल, मन्द और काले होते हैं। हमें चाहिए कि हम इन दूषित प्रकाश- अणुओं को दिव्य- अणुओं में बदलें और अपने को भी महापुरूषों की श्रेणी में ले जाने का यत्न करें।

गायत्री- उपासना में सविता देवता का ध्यान करने की प्रक्रिया इसीलिए अपनाई जाती है कि अन्तर के कण- कण में संव्याप्त प्रकाश आभा को अधिक दीप्तिमान बनने का अवसर मिले। अपने ब्रह्म रंध्र में अवस्थित सहस्रांसु आदित्य सहस्रकमल को खिलायें और उसकी प्रत्येक पंखुड़ी में सन्निहित दिव्य कलाओं के उदय का लाभ साधक को मिले। ब्रह्म विद्या का उद्गाता तमसो मा ज्योतिर्गमय की प्रार्थना में इस दिव्य प्रकाश की याचना करता है। प्रत्येक जाग्रत आत्मा को इसकी आवश्यकता अनुभव होती है, अस्तु। गायत्री- उपासक अपने जप प्रयोजन में इसी ज्योति का अन्तः भूमिका में अवतरण करने के लिए सविता देवता का ध्यान करता है।





गायत्री साधना से दिव्य- दृष्टि का जागरण - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

संसार में अभी तक ऐसा फोटो कैमरा नहीं बना जो टैक्नीकलर, विस्तार्विजन और थ्री डी के टेक्नालॉजी युक्त हो। शत- प्रतिशत फोटो खिंचता हो और क्षण भर में फोटो उतार देता हो। जिसमें फोटोग्राफर की आवश्यकता न हो और न फिल्म- प्लेट आदि लगाने की झंझट न हो ।। ऐसा कैमरा बनना तो दूर रहा किसी वैज्ञानिक के मस्तिष्क में इस तरह की संभावना की कल्पना भी नहीं आई है। यदि कोई सोचने भी लगे तो इस सारी सुविधाओं से सम्पन्न किसी विशालकाय यन्त्र की ही कल्पना की जा सकती है। इतने उपकरण होते हुए भी उसका साइज एक इन्च के बराबर हो, तो यह सर्वथा असंभव ही लगती है। यांत्रिक जगत में ऐसा फोटो यन्त्र भले ही न बना हो, उसकी सम्भावना अशक्य मानी जाये, पर ऐसा कैमरा हर मनुष्य के पास मौजूद है और प्रायः सभी मनुष्य उसका उपयोग जन्मकाल से ही करते हैं। वह कैमरा है जादू जैसा यन्त्र- नेत्र। मस्तिष्क के अग्रभाग में जकड़े हुए दो नेत्र सभी को दीखते हैं पर उनके मध्यवर्ती अन्तराल में जो तीसरा नेत्र है, उसकी जानकारी योगी जनों को ही थोड़ी मात्रा में मिली।

गायत्री- उपासना करते समय दोनों के मध्य में भृकुटी मे ध्यान किया जाता है। यह वह स्थान है जिसके नीचे अस्थि आवरण के उपरान्त एक बेर की गुठली जैसी ग्रन्थि है। इसे आज्ञा चक्र कहते हैं। शरीर शास्त्र की दृष्टि से उसका कार्य और प्रयोजन अभी पूरी तरह नहीं समझा जा सका, पर आत्म- विद्या के अन्वेषी उसके प्रति अति महत्त्वपूर्ण कार्य को बहुत पहले से ही जानते हैं। इसे तीसरा नेत्र या दिव्य नेत्र कहते हैं। दिव्य दृष्टि यहीं से निःसृत होती है।

प्रकाश की सहायता से हम वस्तुओं को देखते हैं। पर यह रहस्य किन्हीं- किन्हीं को ही विदित हैं कि हमारे भीतरी जीवाणुओं में भी प्रकाश विद्यमान है और उनसे निकलने वाली किरणें न केवल भीतर प्रकाश बनाये रहती हैं, वरन् बाहर भी तेजस्विता का परिचय देती हैं। आँखों में अपना निज का प्रकाश है। आज्ञा चक्र का प्रकाश तो ऊर्जा रूप में भी विकसित हो सकता है और उससे टेलीविजन एवं संवाद प्रेषण जैसा कार्य भी लिया जा सकता है। इस ऊर्जा से अन्य व्यक्तियों अथवा वस्तुओं को भी प्रभावित किया जा सकता है।

प्रकाश किरणों को छवि रूप में पकड़ने की कला अब फोटोग्राफी टेलीविजन तक सीमित नहीं रही अब वे आधार प्राप्त कर लिये गये हैं, जिनसे तीन आयामों वाले त्रिविमीय चित्र देखे जा सकें। आमतौर से फोटोग्राफी लम्बाई- चौड़ाई का बोध कराती है। गहराई का तो उसमें आभास मात्र ही होता है। यदि गहराई को भी प्रतिबिम्बित किया जा सके तो फिर आँखों से देखे जाने वाले दृश्य और छाया अंकन में कोई भेद नहीं रहेगा। ऐसा दृश्य प्रचलन सम्भव हो सका तो फिल्में अपने वर्तमान अधूरे स्तर की फोटोग्राफी तक सीमित नहीं रहेंगी वरन् पर्दे पर रेल, मोटर, घोड़े मनुष्य आदि उसी तरह दौड़ते दिखाई पड़ेंगे मानों वे यथार्थ स्वरूप में ही आँखों के आगे से गुजर रहे हैं। यदि सामने से अपनी ओर कोई रेल दौड़ती आ रही हो या शेर झपटता आ रहा हो तो बिल्कुल यह मालूम पड़ेगा कि वे अब अपने ऊपर ही चढ़ बैठने वाले हैं। ऐसी दशा में आरम्भिक अनभ्यास की स्थिति में सिनेमा को भयभीत होकर अपनी सीट छोड़कर भागते ही बनेगा।

प्रकाश विज्ञान एर्नस्टएये और उनके सहयोगी शिष्य डी गैवर ने होलोग्राफी के एक नये सिद्धान्त का आविष्कार किया जिसके आधार पर त्रिविमीय स्तर का छाया चित्रण आँखों से देखा जा सकेगा और भूत कालीन दृश्यों को इन्हीं आँखों से इस प्रकार देखा जा सकेगा मानो वह घटना- क्रम अभी- अभी ही बिल्कुल सामने घटित हो रहा है।

भ्रूमध्य भाग में अवस्थित आज्ञा चक्र को तृतीय नेत्र कहा जाता है। शिव और पार्वती के चित्रों में उनका एक पौराणिक तीसरा नेत्र भी दिखाया जाता है। कथा के अनुसार शंकर भगवान ने इसी नेत्र को खोलकर उसमें से निकलने वाली अग्नि से कामदेव को भस्म किया था।

दिव्य दृष्टि का केन्द्र भी यही है। इससे टेलीविजन जैसा कार्य लिया जा सकता है। दूरदर्शन का दिव्य यन्त्र यही लगा हुआ है। महाभारत के सारे दृश्य संजय ने इसी माध्यम से देखे और धृतराष्ट्र को सुनाए थे। चित्र लेखा द्वारा प्रद्युम्न प्रणय इसी दिव्य दृष्टि का ही परिणाम थी।

सूक्ष्म और कारण शरीर की दिव्य दृष्टि की मर्यादा और क्षमता बहुत बढ़ी- चढ़ी है। उसे समझने, विकसित करने और प्रयोग करने की क्षमता योगाभ्यास से उपलब्ध होती है। पर स्थूल शरीर में भी यह शक्ति बहुत व्यापक है। आँखों से ही सब कुछ नहीं देखा जाता, उसके अतिरिक्त अंगों में भी देखने- समझने की क्षमता मौजूद है। मस्तिष्क, नेत्र- गोलकों का फोटोग्राफी कैमरे जैसा प्रयोग करता है और पदार्थों के जो चित्र आँखों की पुतलियों के लैंस से खींचता है, वे मस्तिष्क में जमा होते हैं। इनकी प्रतिक्रिया के आधार पर मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु जो निष्कर्ष निकालते हैं उसी का नाम दर्शन है। आँख इसके लिए सबसे उपयुक्त माध्यम है। मस्तिष्क के रूप में दर्शन केन्द्र के साथ नेत्र गोलकों के ज्ञान तन्तुओं का सीधा और समीपवर्ती सम्बन्ध है, इसलिए आमतौर से हम नेत्रों से ही देखने का काम लेते हैं और मस्तिष्क उन्हीं के आधार पर अपनी निरीक्षण- क्रिया को गतिशील देखता है। पर ऐसा नहीं समझना चाहिए कि दृष्टि शक्ति केवल नेत्रों तक ही सीमित है। अन्य अंगों के, मस्तिष्क के साथ जुड़े हुए ज्ञान तन्तुओं को विकसित करके भी मस्तिष्क बहुत हद तक उस प्रयोजन की पूर्ति कर सकता है। समस्त विश्व का हर पदार्थ अपने साथ ताप और प्रकाश की विद्युत किरणें संजोये हुए हैं। वे कम्पन्न लहरियों के साथ इस निखिल विश्व में अपना प्रवाह फैलाती हैं। ईथर तत्त्व के द्वारा वे दूर- दूर अवस्थित हैं, जो घटनायें सुदूर क्षेत्रों में घटित हो रही हैं, उन्हें निकटवर्ती वस्तुओं की तरह देखा जा सकता है। इन दृश्य किरणों को पकड़ने के लिए नेत्र उपयुक्त हैं। समीपवर्ती दृश्य वही देखते हैं और दूरवर्ती दृश्य देखने के लिए तृतीय नेत्र को भ्रूमध्य में अवस्थित आज्ञा चक्र के प्रयुक्त किया जा सकता है। इतने पर भी यह नहीं समझ लेना चाहिए कि रूप तत्व का सम्बन्ध नेत्रों से ही है। अग्नि तत्त्व की प्रधानता से ‘रूप’ कम्पन्न कों उत्पन्न होते हैं। शरीर में अग्नि तत्त्व का प्रतिनिधित्व नेत्र करते हैं, पर ऐसा नहीं मानना चाहिए कि अग्नि तत्त्व अन्यत्र शरीर मे अन्य अंगों में नहीं है, समस्त शरीर पंच तत्त्वों के गुम्फन से बना है। यदि किसी अंग का अग्नि तत्त्व अनायास ही विकसित हो जायेगा या साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा विकसित कर लिया जाये तो नेत्रों की बहुत आवश्यकता उनके माध्यम से भी पूरी हो सकती है। इसी प्रकार अन्य ज्ञानेन्द्रियों के कार्य एक सीमा तक दूसरे अंग कर सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत किये गये। पवहारी बाबा प्रत्यक्षतः वायु ही ग्रहण करते थे, अन्न- जल सेवन नहीं करते थे पर शरीर के अन्य अंगों द्वारा अदृश्य जगत से सूक्ष्म आहार बराबर मिलता रहता था। इसके बिना किसी के लिए भी जीवन- धारण किये रहना असम्भव है।

इजवेस्तिया (रूस में छपने वाला समाचार- पत्र) में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार निझानी तागिल (रूस) की रोजा नामक युवती पंक्तियों पर उंगली चला कर मामूली प्रेस में छपी पुस्तकें पढ़ लेती हैं। कई समाचार- पत्रों ने उसके प्रमाण सहित फोटो भी छापे हैं। आश्चर्य तो यह है कि पुस्तकों में बने हुए किसी फोटो को उँगलियाँ रखकर ही वह बता देती है कि वह फोटो महात्मा गाँधी की है अथवा इब्राहीम लिंकन की है। यदि वह जानती नहीं होती तो आकृति का वर्णन कर देती कि इसके इतनी बड़ी मूँछें हैं, ऐसे कान और अमुक पोशाक पहने हुए फोटो उतारी गई है।

सांप चुपचाप पड़ा होता है और इस अवयव से यह जान लेता है कि किस दिशा में कहाँ पर शिकार है, बस उधर ही झपट कर उसे पकड़ लेता है। इसी तरह के तन्तुओं से चिड़ियों और कबूतरों के मस्तिष्क भी सजे होते हैं, जिससे वे हजारों मील की यात्रा का भी रिकॉर्ड करके रखते हैं। दस वर्ष बाद भी उसकी सहायता से वे अपने मूल निवास को लौट सकते हैं। मेंढक की आँख और मस्तिष्क के बीच में इस तरह के ज्ञान तन्तु होते हैं, उन्हीं से वह अपने दुश्मनों की आक्रमण करने ही इच्छा तक को पहचान लेता है। ( यह मनुष्य के आज्ञा चक्र भ्रूमध्य में भी एक ऐसी ही संवेदनशील शक्ति के होने का सबसे बड़ा प्रमाण है ।) और आक्रमण होने से पहले ही बच निकलता है।

इन जानकारियों के आधार पर वैज्ञानिकों ने रोजा की जाँच की। उन्होंने प्रकाश में से इन्फ्रारेड किरणें निकाला हुआ और उसके साथ अक्षर एक कागज पर डाले गये तब भी रोजा ने उन्हें पढ़ दिया। बेशक वह इस स्थिति में आकृतियाँ नहीं पहचान पाई पर वैज्ञानिकों को यह मालूम पड़ गया कि आँखें ही नहीं, शरीर के अन्य अंगों में भी दृष्टि तत्त्व हो सकते हैं। रोजा के हाथों में एक मिलीमीटर ऐसे दस तत्त्व पाये भी गये। वैज्ञानिकों ने बताया, यह सामान्य स्थिति है, हम कह नहीं सकते कि क्या शरीर में ऐसे तत्त्व और भी कहीं हैं या विकसित किये जा सकते हैं। हम इस बात को जानने की शोध अवश्य करेंगे कि प्रकाश को ग्रहण करने वाले तत्त्व उँगलियों में कैसे आ गये ।। यदि इस बात को ढूँढ़ निकाला गया तो ध्यान के रूप में प्रकाश- कणों को आकर्षित करने पर शरीर में अतीन्द्रिय ज्ञान (एक्सट्रा ऑर्डिनरी सेन्सेपरसेप्शन) की क्षमता उत्पन्न करने की भारतीय योग प्रणाली पूर्ण विज्ञान- सम्मत हो जायेगी ।।

गायत्री- उपासना में भृकुटी के मध्य आज्ञा- चक्र के स्थान पर ध्यान करने का यही उद्देश्य है कि अपने भीतर की प्रकाश सत्ता को विकसित किया जा सके। यदि उसे विकसित किया जा सके तो कई दिव्य क्षमताएँ अपने भीतर जागृत हो सकती हैं। बल्ब अपने आप में प्रकाशित होता है, तो उसके प्रकाश में अन्य वस्तुएँ भी दिखाई पड़ती हैं। आकाश में जगमगाते तारे भी रात्रि के सघन अन्धकार को कम कर देते हैं कि आस- पास की चीजों को किसी सीमा तक देखा जा सके। हमारे आंतरिक प्रकाश कण यदि कुछ अधिक जगमगाने लगें तो संसार में अन्यत्र घटित हो रही घटनाओं को देखा- समझा जा सकता है।

इसके अतिरिक्त भी आज्ञा- चक्र के जाग्रत हो जाने पर अनेकों दिव्य लाभ हैं। इसके द्वारा कई शक्तियाँ और दैवी विभूतियाँ अर्जित की जा सकती हैं। गायत्री साधना अपने साधक को उन सभी दिव्य लाभों के साथ आत्म- कल्याण के पथ पर अग्रसर करती हैं।








सर्वतोमुखी उपासना की रीति- नीति - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने के लिए, उपासना के लिए गायत्री मन्त्र को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया है। पर एकाकी उपासना ही पर्याप्त नहीं है, इसके साथ साधना का क्रम भी उतना महत्त्वपूर्ण है। अतएव प्रत्येक गायत्री- साधक को साधनात्मक जीवन जीना होता है। उपासना का लाभ तो है पर समग्रता तो साधना को अपनाने से ही आती है। गायत्री- उपासना के जो चमत्कारी लाभ बताये गये हैं, उनकी प्राप्ति के लिए साधना की पृष्ठभूमि का होना भी आवश्यक है।

पातञ्जलि योग सूत्र के द्वितीय अध्याय के प्रथम सूत्र मे साधना के तीन प्रमुख आधार बताये गये हैं। तपः स्वाध्यायेश्वर प्राणिधानानि क्रियायोगः। क्रिया योग के, साधना के तीन सूत्र हैं- तप, स्वाध्याय और ईश्वर शरणागति। इस सूत्र में जो तीन विभिन्न क्रियायें बताई गई हैं, उनका उद्देश्य मानव स्वभाव के तीनों पक्षों- इच्छा, ज्ञान और प्रेम- कर्म, ज्ञान और भक्ति को विकसित करना पड़ता है। गायत्री मन्त्र के तीन चरणों में कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तियोग का दर्शन छिपा पड़ा है। जिस प्रकार प्रकाश, जल एवं वायु को पाकर पौधे उगते, पुष्पित एवं फलित होते हैं, उसी प्रकार उपासना भी इन तीनों को अवलम्बन पाकर चमत्कारी परिणाम दिखाती है। गायत्री उपासक को तप, स्वाध्याय एवं समर्पण की तीनों क्रियायें अपनानी होती हैं।

जीवन की गम्भीर समस्याओं का गहराई से अध्ययन ही स्वाध्याय है। पुस्तकों मा अध्ययन तो इसका छोटा एवं स्थूल भाग है। अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष है- आत्म समीक्षा, स्व का अध्ययन ।। हम शरीर हैं या और भी कुछ? शरीर से अलग यदि हमारी सत्ता है तो क्या उसके विकास के लिए उसे समझने के लिए प्रयत्न चल रहे हैं? इन प्रश्नों पर विचार एवं चिन्तन करना ही वास्तविक स्वाध्याय है। हम विराट के अंश हैं, तो क्या दिव्य बनने, देवत्व धारण करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। हमारी प्रवृत्तियाँ, गतिविधियाँ आत्म गरिमा के प्रतिकूल तो नहीं जा रही है? पिछला जीवन कैसा रहा? क्या सुर दुर्लभ इस मानव शरीर का सदुपयोग हुआ? भावी जीवन की रीति- नीति क्या होनी चाहिए ? अब तक की हुई त्रुटियों के प्रायश्चित्त के लिए क्या किया जा रहा है? इन सभी प्रश्नों पर गहराई से विचार करना ही स्वाध्याय है। महापुरुषों का सत्संग एवं अच्छी पुस्तकों का अध्ययन भी इसी के अन्तर्गत आता है, पर वर्तमान समय में सत्संग के लिए सत्पुरुषों का अभाव है। जो हैं भी, उनके पास इतना समय नहीं है कि अनेकानेक समस्याओं की चर्चा की जा सके। ऐसी स्थिति में सत्संग का प्रयोजन पुस्तकें पूरा कर सकती हैं। महापुरुषों के विचार पुस्तक ों में भरे पड़े हैं। उनके अध्ययन, मनन, चिन्तन द्वारा आत्म- समीक्षा एवं आत्म- विकास के लिए मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सकता है।

गायत्री को वेदमाता कहा गया है। वेद कहते हैं ज्ञान को। गायत्री उपासक ज्ञान का उपासक होता है। उसे ज्ञान संचय के लिए स्वाध्यायशील होना चाहिए। ज्ञानयोग की वैचारिक पृष्ठभूमि यहीं से बनती है। स्वाध्यायशील साधक ही साधना मार्ग में आये अवरोधों तथा जीवन की अनेकानेक समस्याओं से जूझने में समर्थ होता है। भटकाव का डर नहीं रहता। ज्ञान के प्रकाश में सत्य- असत्य का, उपयोगी- अनुपयोगी का चयन करने में समर्थ होता है। स्व के सतत अध्ययन- मनन द्वारा वह आत्मज्ञान की पृष्ठभूमि तैयार करता है। भ्रान्तियों का निवारण और अपने शाश्वत स्वरूप का बोध होता है।

गायत्री उपासना के साथ जुड़ा दूसरा अनिवार्य तत्त्व तप का है। सामान्य अर्थों में इसे संयम समझा जाता है ।। साधक को संयमी होना चाहिए। इन्द्रिय निग्रह एवं मनोनिग्रह इसके अन्तर्गत आता है। तपः संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है- उच्च तापमान तक गरम करना। अशुद्ध वस्तुओं को तपा कर, गला कर शुद्ध किया जाता है। सोना खदान से अशुद्ध रूप में निकलता है। उसे उच्च तापमान पर गरम किया जाता है तब वह शुद्ध एवं परिमार्जित होता है। उसकी चमक तीव्र ताप में ही निखरती है। मनुष्य भी मूलरूप से अनगढ़ है। पंचतत्त्वों से बनी काया में उसके जड़वत् संस्कार विद्यमान हैं, जन्म- जन्मांतरों के पशुवत् संस्कार भी चेतना के साथ जुड़े हुए हैं । उसे दूर करने, चेतना को परिष्कृत करने के लिए तप की गर्मी आवश्यक है। उपवास, अस्वाद, तितीक्षा, मौन जैसी तप की क्रियायें इसी आवश्यकता की पूर्ति करती हैं। संयमित एवं तपस्वी जीवन में ही आद्यशक्ति गायत्री की शक्तिधारायें अवतरित होती हैं। शक्ति अवतरण के लिए तप की प्रक्रिया अति आवश्यक है। तप से शक्ति प्राप्त करने के उपाख्यानों से सारे पौराणिक ग्रन्थ भरे पड़े हैं । उनकी यथार्थता में थोड़ा भी सन्देह नहीं किया जा सकता है। उपासना से मन्त्र द्वारा उत्सर्जित शक्ति की धारणा तप के माध्यम से ही सम्भव होती है। गायत्री मन्त्र के जप से प्रचण्ड ऊर्जा निकलती है पर संयम के अभाव से साधक में ठहर नहीं पाती। असंयमित इन्द्रियों से होकर बाहर निकल जाती है।

गायत्री- उपासना के लिए सबसे आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण तत्त्व है- साधक की भक्ति- भावना। इसके बिना उपासना के सारे कृत्य अधूरे एवं अपूर्ण सिद्ध होते हैं। उपासना का वह लाभ नहीं मिल पाता जा कि शास्त्रों में वर्णित है। इष्ट के साथ तादात्म्य की व्याकुलता जितनी अधिक होगी साधक को उतनी ही अधिक सफलता मिलेगी। समर्पण का- एकत्व का अद्वैत का भाव स्थापित करना होता है। इसे ही भक्तियोग कहा गया है। अन्तः की विह्वलता- आकुलता ही इष्ट से तादात्म्य कराती है। इष्ट के प्रति समर्पण की महत्ता का प्रतिपादन गीता भी करती है।


समर्पण का स्वरूप क्या हो? इसकी व्याख्या नारद भक्ति सूत्र के तेरहवें श्लोक में की गई है।
यः कर्मफलं त्चजति, कर्माणि सन्यस्यति
ततो निर्द्वन्दो भवति ।। (४८)

‘‘ जो कर्मफल का त्याग करता है, जो समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देता है, वह कुछ त्याग कर निर्द्वन्द्व हो जाता है ।’’

कर्म के बिना तो एक क्षण भी नहीं रहा जा सकता है। यहाँ कर्मों के त्यों की बात नहीं कही गई है। वरन् कर्म ऐसे किए जायँ क बन्धन के कारण न बनें, इस बान की विवेचना हुई है। प्रत्येक कर्म से नयी प्रवृत्तियाँ कामनायें एवं वासनायें उत्पन्न होती हैं। परमात्मा को समर्पित कर देने तथा उसकी इच्छापूर्ति के लिए कर्म करते रहने से साधक बन्धनों से नहीं बंधता। इस प्रकार भक्ति- भावना समर्पण, कर्मों से पलायन की नहीं सच्चे कर्मयोग की प्रेरणा देती है।

गायत्री उपासना में परमात्मा को मातृशक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। जीवन के भावनात्मक रिश्तों में माँ का स्थान सर्वोपरि है। उसके ही स्नेह संवेदनाओं का पोषण पाकर मनुष्य मानवोचित गुणों से सम्पन्न बनता है। इस तथ्य को तत्त्ववेत्ता ऋषियों ने समझा और उन्होंने उस महाशक्ति से तादात्म्य जोड़ने के लिए प्रतीक अवलम्बन लिया। बच्चे का समर्पण भाव माँ को बड़े से बड़े त्याग- बलिदान के लिए बाध्य करता है। आद्यशक्ति के समक्ष भी जब हम बाल स्वभाव, निश्छल हृदय से अपनी सत्ता को समर्पित कर देते हैं, उसे करुण स्वर में पुकारते हैं, वह महाशक्ति अपने दिव्य अनुदानों के साथ प्रकट होती और अपने अनुग्रहों से सिक्त करती है। भाव संवेदनाओं का उभार ही सघन होगा, पवित्र होगा महाशक्ति की निकटता का उतना ही अधिक लाभ मिल सकेगा।

गायत्री उपासना के साथ साधना के ये तीन चरण स्वाध्याय, तप एवं शरणागति के भी बढ़ाने होंगे। वायु, जल और प्रकाश का सम्पर्क पाकर बीज उगते, फूलते एवं फलते हैं। गायत्री उपासना रूपी बीज भी स्वाध्याय, तप एवं समर्पण- भावना का अवलम्बन पाकर पुष्पित एवं पल्लवित होते तथा फल देते हैं ।। गायत्री उपासना की इस सर्वांगीण पद्धति को अपनाया जा सके तो इतना कुछ प्राप्त किया जा सकता है, जिसे असामान्य, अद्भुत एवं चमत्कारी कहा जाता है। गायत्री मन्त्र के तीनों पदों में सन्निहित शिक्षायें भी साधना के इन तीनों पक्षों को अपनाने की प्रेरणा देती है।




उपासना की उपेक्षा न करें उसे समग्र रूप में अपनायें - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

आत्मोत्कर्ष के लिए उस महाशक्ति के साथ घनिष्ठता बनाने की आवश्यकता है, जिसमें अनन्त शक्तियों और विभूतियों के भण्डार भरे पड़े हैं। बिजलीघर के साथ घर के बल्ब- पंखों का सम्बन्ध जोड़ने वाले तारों का फिटिंग सही होते ही वे ठीक तरह अपना काम कर पाते हैं। परमात्मा के साथ आत्मा का सम्बन्ध जितना निकटवर्ती एवं सुचारु होगा उसी अनुपात से पारस्परिक आदान- प्रदान का सिलसिला चलेगा और उससे छोटे पक्ष को विशेष लाभ होगा। दो तालाबों के बीच नाली खोदकर उनका सम्बन्ध बना दिया जाए तो निचले तालाब में ऊँचे तालाब का पानी दौड़ने लगेगा और देखते- देखते दोनों की ऊपरी सतह समान हो जायेगी। पेड़ से लिपट कर बेल कितनी ऊँची चढ़ जाती है, इसे सभी जानते हैं। यदि उसे वैसा सुयोग न मिला होता अथवा वैसा साहस न किया होता तो वह अपनी पतली कमर के कारण मात्र जमीन पर फैल ही जाती पर ऊपर चढ़ नहीं सकती थी। पोले बांस का निरर्थक समझा जाने वाला टुकड़ा जब वादक के हाथों के साथ तादात्म्य स्थापित करता है तो बांसुरी- वादन का ऐसा आनन्द आता है, जिसे सुनकर सांप लहराने और हिरन मंत्रमुग्ध होने लगते हैं। पतले कागज के टुकड़े से बनी पतंग आकाश को तभी चूमती है जब उसकी डोर का सिरा किसी उड़ाने वाले के हाथ में रहता है। ये सम्बन्ध शिथिल पड़ने या टूटने पर सारा खेल खत्म हो जाता है और पतंग जमीन पर आ गिरती है। यह उदाहरण यह बताते हैं कि यदि आत्मा को परमात्मा के साथ सघनतापूर्वक जुड़ जाने का अवसर मिल सके तो उसकी स्थिति सामान्य नहीं रहती है। तब उसे नर पामरों जैसा जीवन व्यतीत नहीं करना पड़ता। वरन् ऐसे मानव देखते- देखते कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं। इतिहास- पुराण ऐसे देव मानवों की चर्चा से भरे पड़े हैं। जिन्होंने अपने अन्तराल को निकृष्टता से विरत करके ईश्वरीय महानता के साथ जोड़ा और देखते- देखते कुछ से कुछ बन गये।

उपासना को आध्यात्मिक प्रगति का आवश्यक एवं अनिवार्य अंग माना गया है। उसके बिना यह सम्बन्ध जुड़ता ही नहीं, जिसके कारण छोटे- छोटे उपकरण बिजलीघरों के साथ तार जोड़ लेने पर अपनी महत्त्वपूर्ण हलचलें दिखा सकने में समर्थ होते हैं। घर में हीटर, कूलर, रेफ्रिजरेटर, रेडियो, टेलीविजन आदि कितने ही सुविधाजनक उपकरण क्यों न लगे हों पर उनका महत्त्व तभी है जब उनके तान बिजलीघर के साथ जुड़कर शक्ति भण्डार से अपने लिए उपयुक्त क्षमता प्राप्त करते रहने का सुयोग बिठा लेते हों। उपासना का तत्व ज्ञान यही है। उसका शब्दार्थ है- उप + आसन, अर्थात् अति निकट बैठना। परमात्मा और आत्मा को निकटतम लाने के लिए ही उपासना की जाती है। विशिष्ट शक्ति के आदान- प्रदान का सिलसिला इसी प्रकार चलता है।

उपासना के दो पक्ष हैं एक कर्मकाण्ड, दूसरा तादात्म्य। दोनों शरीर एवं प्राण की तरह अन्योऽन्याश्रित एवं परस्पर पूरक हैं। एक के बिना दूसरे को चमत्कार प्रदर्शित करने का अवसर ही नहीं मिलता ।। बिजली के दोनों तार जब मिलते हैं तभी करेण्ट चलता है। अलग- अलग रहें तो कुछ बात बनेगी ही नहीं ।। दोनों पहिये धुरी से जुड़े हों और समान रूप से गतिशील हों, तभी गाड़ी आगे लुढ़कती है। लम्बी यात्राएँ दोनों पैरों के सहारे ही संभव होती हैं, भले ही एक के कट जाने पर उसकी पूर्ति लकड़ी के पैर से ही क्यों न की जा रही हो। दोनों हाथ से ताली बजाने की उक्ति से सभी परिचित हैं। सन्तानोत्पादन में नर और नारी दोनों का संयोग चाहिए ।।

ठीक इसी प्रकार उपासना का शास्त्र प्रतिपादित और आप्तजनों द्वारा अनुमोदित माहात्म्य तभी चरितार्थ होता है, जब उसका कर्मकाण्ड वाला प्रत्यक्ष और तादात्म्य वाला परोक्ष पक्ष समान रूप से संयुक्त सक्रिय होते हैं। जप, ध्यान, प्राणायाम के उपासनात्मक कर्मकाण्डों का स्वरूप सभी को विदित है। जिन्हें उस जानकारी में कुछ कमी हो वे अपनी स्थिति के अनुरूप किसी अनुभवी मार्गदर्शक से परामर्श अथवा प्रामाणिक ग्रन्थ का अवलोकन करके उसका समाधान निर्धारण कर सकते हैं। बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात ‘तादात्म्य’ है। उसे जीवन सत्ता में प्राण का स्थान मिला है। कर्मकाण्ड तो काय कलेवर की तरह उपकरण ही कहे जाते हैं। प्रहार तो तलवार ही करती है। वस्तुतः युद्ध मोर्चे को जिताने में वह लौह खण्ड उतना चमत्कार नहीं दिखाता जितना कि प्रत्यक्ष न दीख पड़ने वाला पराक्रम, साहस। ठीक इसी प्रकार उपासना के कर्मकाण्ड पक्ष का तलवार जैसा चमत्कारी प्रतिफल देखना हो तो उसके पीछे ‘‘तादात्म्य’’ का भाव समर्पण नियोजित किये बिना काम चलेगा ही नहीं।

उपासनात्मक कर्मकाण्डों में विधि- विधान का स्वरूप प्रज्ञा परिजनों में से सभी जानते हैं। स्थान, पूजा- उपकरण, शरीर- वस्त्र आदि की शुद्धि के अतिरिक्त मन, बुद्धि और अन्तःकरण की शुद्धि तथा इन्द्रियों- अवयवों को पवित्र रहने की प्रेरणा देने के लिए आचमन- न्यास आदि किये जाते हैं। पवित्रता के प्रतीक जन और प्रखरता के प्रतिनिधि दीपक या किसी अन्य विकल्प का अग्नि स्थापन किया जाता है। समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिए सत्य, पराक्रम एवं संघर्ष के रूप में अपनाई जाने वाली तपश्चर्या का भी महत्त्व है। पवित्रता और प्रखरता का समन्वय ही पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचता है। मात्र संत सज्जन बने रहने और पौरुष को त्याग कर बैठने पर तो कायरों और दीन- दुर्बलों जैसे दयनीय स्थिति बन जाती है। मध्यकाल की भक्तचर्या ऐसे ही अधूरेपन से ग्रसित रहने के कारण उपहासास्पद बनती चली गई है। कर्मकाण्डों के विधि- विधान तादात्म्य की चेतना उत्पन्न करने एवं प्रेरणा देने के लिए ही विनिर्मित हुए हैं।

तादात्म्य अर्थात् भक्त और इष्ट की अंतःस्थिति का समन्वय- एकीकरण। दूसरे शब्दों में ईश्वरीय अनुशासन के अनुरूप जीवनचर्या का निर्धारण। परब्रह्म तो औचित्य है पर उपासना जिस परमात्मा की की जाती है वह आत्मा का ही परिष्कृत रूम है। वेदान्त दर्शन में उसे सोऽहम्- शिवोऽहम् ब्रह्म- आदि शब्दों में अन्तःचेतना के उच्चस्तरीय विशिष्टताओं से भरे- पूरे उत्कृष्टताओं के समुच्चय को ही परमात्मा कहा गया है, उसके साथ मिलन का, तादात्म्य का स्वरूप तभी बनता है जब दोनों के मध्य एकता स्थापित हो। इसके लिए साधक अपने आपको कठपुतली की स्थिति में रखता है और अपने अवयवों में बँधे धागों को बाजीगर के हाथों सौंप देता है। दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाला खेल इस स्थापना के बिना बनता ही नहीं। आत्मा को परमात्मा की उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ अपनाने और तदनुरूप जीवनचर्या बनाने पर ही उपासना का समग्र लाभ मिलता है।

लकड़ी और अग्नि की समीपता का प्रतिफल प्रत्यक्ष है। गीली लकड़ी आग के समीप पहुँचते- पहुँचते अपनी नमी गँवाती और उस ऊर्जा से अनुप्राणित होती चली जाती है। जब वह अति निकट पहुँचती है तो फिर आग और लकड़ी एक स्वरूप, एक जैसे हो जाते हैं। साधक को भी ऐसा ही भाव- समर्पण करके ईश्वरीय अनुशासन के साथ अपने आपको एक रूप बनाना पड़ता है। चंदन के समीप वाली झाड़ियों का सुगन्धित हो जाना, स्वांति बूँद के संयोग से सीप में मोती पैदा होना, पारस छूकर लोहे का स्वर्ण बनना, नाले का गंगा में मिलकर गंगा जल बनना, पानी का दूध में मिलकर उसी भाव बिकना, बूंद का समुद्र में मिलकर सुविस्तृत हो जाना जैसे अगणित उदाहरण हैं, जिनके आधार पर यह जाना जा सकता है कि भक्त और भगवान की एकता उपासना का स्तर क्या होना चाहिए ।। सृष्टि के आदि से अद्यावधि सच्चे भक्तों में से प्रत्येक को ईश्वर के शरणागत होता पड़ा है आत्म- समर्पण का साहस जुटाना पड़ता है। इसका व्यावहारिक स्वरूप है ईश्वरीय अनुशासन को उत्कृष्ट चिन्तन एवं कर्तृत्व को अपनी विचारणा एवं कार्य- पद्धति से अनुप्राणित करना। जो इस तत्त्व दर्शन को जानते, मानते और व्यवहार में उतारते रहे हैं उन ईश्वर भक्तों को सुनिश्चित रूप से वे लाभ मिले हैं जिन्हें उपासना की फलश्रुतियों के रूप में कहा जाता रहा है। पत्नी- पति को आत्म- समर्पण करती है- अर्थात् उसकी मर्जी पर चलने के लिए अपनी मनोभूमि एवं क्रिया- पद्धति को मोड़ती चली जाती है। इस आत्म- समर्पण के बदले ही वह पति के वंश, गोत्र, यश, वैभव की उत्तराधिकारिणी ही नहीं अर्धांगिनी भी बन जाती है। समर्पण विहीन कर्मकाण्ड तो एक प्रकार का वेश्या व्यवसाय, चिह्न पूजा जैसा निर्जीव ढकोसला ही माना जाता जायेगा। भक्त भगवान के अनुरूप बनता चला जाता है और अन्ततः नर- नारायण, पुरुष- पुरुषोत्तम, भक्त- भगवान की एकरूपता का स्वयं प्रमाण बनता है। देवात्माओं में परमात्मा स्तर की क्षमताएँ ही उत्पन्न हो जाती हैं ।। इन्हीं को ऋद्धि- सिद्धियाँ कहते हैं।

प्रज्ञा परिजनों को मूर्धन्य भूमिका निभाने के लिए आत्म- शक्ति की प्राण ऊर्जा का बड़ी मात्रा में संचय करना होगा। यह परमात्मा से ही उसे मिलेगी। अस्तु ! उसे उपासना के लिए सच्चे मन से साहस जुटाना और प्रयास करना चाहिए। जीवन चर्या में उसे निष्ठापूर्वक सुनिश्चित एवं मूर्धन्य स्थान देना चाहिए। कर्मकाण्ड के लिए जितना भी समय निकाला जाये उसे नियमित और निश्चित होना चाहिए। व्यायाम, औषधि सेवन, अध्ययन आदि के लिए समय भी निर्धारित किये जाते हैं उसकी मात्रा का सीमा बन्धन भी रखा जाता है। यदि इन प्रसंगों में मन की मौज बरती जाये, समय और मात्रा की उपेक्षा करके जैसा मन करने की स्वेच्छाचारिता अपनाई जाये तो पहलवान- विद्वान बनने और निरोग होने की इच्छा पूरी हो ही नहीं सकेगी। हर महत्त्वपूर्ण कार्य में नियमितता को प्रमुखता दी जाती है। जो किया जाता है। उपासना के संदर्भ में भी वही किया जाना चाहिए। अस्तंता बनी रहेगी तो अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति अति कठिन हो जायेगी ।।

युग सन्धि की अवधि में सभी प्रज्ञा परिजनों को न्यूनतम तीन माला गायत्री- जप प्रातः काल नित्यकर्म से निवृत्त होकर करने के लिए कहा गया है। जप के साथ प्रभात कालीन सूर्य का दर्शन और उस सविता देवता की स्वर्णिम किरणों का स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में प्रवेश कराने का ध्यान भी करते चलना चाहिए। इन पंक्तियों में उसे संक्षिप्त ही लिखा जा रहा है, क्योंकि अधिकांश परिजन उसे पहले से ही जानते हैं। जो नहीं जानते उनके लिए थोड़ी सी पंक्तियों के निर्देशन से काम नहीं चलेगा। उन्हें इसे समीपवर्ती किसी निष्णात से ‘ गायत्री महाविज्ञान ’ से जानना होगा या शान्तिकुञ्ज पत्र- व्यवहार करके अपनी वर्तमान मनःस्थिति के अनुरूप साधनाक्रम का निर्धारण करना होगा ।। स्पष्ट है कि साधक के स्तर और प्रवाह को ध्यान में रखते हुए साधनाक्रम भी चिकित्सा उपचार की तरह आवश्यकतानुसार समय- समय पर बदलने होते हैं। शान्तिकुञ्ज को गायत्री तीर्थ के रूप में इन्हीं दिनों इसी प्रयोजन के लिए परिणित किया गया है, ताकि हर साधक की स्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उसके लिए विशेष निर्धारण किये जा सकें और जो बताया गया है उसका प्रारम्भिक अभ्यास प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में ही सही कर लेना सम्भव हो सके।

सामान्यतया हर प्रज्ञा परिजन को युग सन्धि की वेला में अपनी उपासना को नैष्ठिक, नियमित एवं समग्र बना लेना चाहिए। तीन माला का गायत्री- जप, गुरुवार को जिस स्तर का बन सके उपवास, ब्रह्मचर्य, महीने में एक बार अग्नि होम का न्यूनतम साधना क्रम तो चलाना ही चाहिए, इसके अतिरिक्त अपने भावना क्षेत्र को उत्कृष्टताओं के समुच्चय के साथ तादात्म्य स्थापित करने का निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। भावना, विचारणा और क्रिया- प्रक्रिया में जितनी संभव हो सके, उसके लिए उपाय खोजने और प्रयत्न करने में सतत संलग्न रहना चाहिए। भजन कृत्य और तादात्म्य की उभयपक्षीय प्रक्रिया उपासना को समग्र बनाती है और अपना प्रत्यक्ष प्रतिफल हाथों हाथ प्रस्तुत करती है।

युग सन्धि के बीस वर्षों में प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को हर साल अपना उपासना क्रम निर्धारित करना चाहिए और आवश्यकतानुसार अगले वर्ष के लिए कोई परिवर्तन करना हो तो करते रहना चाहिए। इस निर्धारण में बसन्त पर्व को एक नियत समय माना जा सकता है। इन दिनों जिनकी जो साधना चल रही हो उसका विवरण अगले दिनों शान्तिकुञ्ज भेजते हुए आगामी बसन्त पर्व से कुछ हेर- फेर आवश्यक हो तो उसका निर्धारण समय से पूर्व ही कर लेना चाहिए। इस संदर्भ में शान्तिकुञ्ज से परामर्श करके निर्धारण करना एकाकी निर्णय की तुलना में कहीं अधिक श्रेयस्कर रहेगा।






जीवन सार्थकता की साधना - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

उन साधकों को जो गायत्री को अपना इष्ट उपास्य मानते हैं, यह जानना ही चाहिए कि इस संसार की सर्वोपरि सर्वोत्तम विभूति सद्बुद्धि एवं सत्प्रवृत्ति ही है, इसे प्राप्त किये बिना कोई व्यक्ति संसार में अब तक न तो महापुरुष बन सका है और न आगे बर सकेगा। न किसी का जीवन सफल हुआ है और न आगे हो सकेगा। जिसे यह तत्त्व मिल गया उसका जीवन सब प्रकार सार्थक बना और जिसे उस लाभ से वंचित रहना पड़ा, वह विक्षोभ की आग में निरन्तर जलता- भुनता रहा और रोते- कलपते यहाँ से विदा हुआ। इसलिए सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमें किसी प्रकार सद्बुद्धि प्राप्त हो, सत्प्रवृत्तियों से मनोभूमि को परिपूर्ण बनाया जाये। इस आस्था को संकल्प पूर्ण अन्तःकरण में दृढ़ता- पूर्वक जमा लेने का नाम ही गायत्री- भक्ति है। जिसने इस तथ्य को सच्चे हृदय से स्वीकार कर लिया वही गायत्री उपासक है।

कल्पवृक्ष की इसलिए प्रशंसा की जाती है कि उसके नीचे बैठकर की हुई कामना पूर्ण होती है। पारस का महत्त्व इसलिए माना जाता है कि उसे छूने से घटिया दर्जे की लौह धातु सोना बन जाती है। अमृत का गौरव इसलिए है कि उसे पीने वाला जरा मृत्यु से छूटकर अमरता का सुख प्राप्त करता है। यह तीनों अद्भुत पदार्थ किम्वदन्तियों के रूप में मौजूद है, पर इनका लाभ जिसने प्राप्त किया हो ऐसा मनुष्य अभी तक देखा नहीं गया। इसकी तुलना में सद्बुद्धि एवं सत्प्रवृत्तियों का गायत्री प्रतिपादित तथ्य अधिक वास्तविक है, जिसे प्राप्त करने से उपर्युक्त तीनों किम्वदन्तियों का लाभ प्रत्यक्ष ही मिल सकता है। अन्तरात्मा में यदि सत्प्रेरणा की दिव्य ज्योति जलने लगे तो उसके प्रकाश में अंधकार जैसा काला कलूटा जीवन सहज ही प्रकाशमान हो सकता है। सुख और शान्ति की समस्त कामनाएँ पूर्ण हो सकती हैं। नर पशु की तरह दिन काटने वाला व्यक्ति पुरूष  से पुरुषोत्तम, नर से नारायण बन सकता है। अपनी सुगन्ध को विश्व- मानव के लिए बखेरता हुआ इतिहास के पृष्ठों पर अमर बने रहने का गौरव प्राप्त कर सकता है। गायत्री में प्रतिपादित सत् प्रेरणा, सद्बुद्धि, सद्भावना का तनिक भी लाभ जिसे मिल वह सब प्रकार धन्य हो जात है। इसी तत्त्व को ध्यान में रखते हुए गायत्री को प्राण संजीवनी कहा गया है। गय कहते हैं प्राण को तथा ‘त्री’ कहते हैं त्राण करने वाले को। गायत्री का सच्चा उपासक अपने प्राण का त्राण ही करता है- भवबन्धनों से मुक्ति प्राप्त करता हुआ, आनंद का रसास्वादन करते हुए जीवन को सब प्रकार धन्य ही बनाता है।

गायत्री सद्बुद्धि की उपासना का मंत्र है। ‘धियो योनः प्रचोदयात’ पद मे ईश्वर से एक ही प्रार्थना की गई है कि आप हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर लगा दीजिए। ईश्वर के पास मनुष्य शरीर प्रदान करने के बाद एक ही महत्वपूर्ण उपहार जीव को देने के लिए यही बचा भी है। यदि यह मिल जाये तो नर से नारायण बनते देर नहीं लगती। मनुष्य शरीर धारी जीव की अन्तरात्मा जब परमात्मा को पुकारती है कि हे परमपिता, आधा आनंद तूने दिया है तो शेष आधे को भी प्रदान कर और हमें पूर्णता का आनंद लेने दे। हमको मनुष्य शरीर ही नहीं मानवीय प्रवृत्ति भी चाहिए। आत्मा की इसी गुहार को वेद के ऋषि ने छन्दबद्ध कर दिया है और उसका गायत्री ऐसा नामकरण किया है।

गायत्री को इष्ट मानने का अर्थ है- सत्य प्रवृत्ति की सर्वोत्कृष्टता पर आस्था। गायत्री उपासना का अर्थ है- सत्प्रेरणा को इतनी प्रबल बनाना, जिसके कारण सन्मार्ग पर चले बिना रहा ही न जा सके। गायत्री उपासना का लक्ष्य यही है। यह प्रयोजन जिसका जितनी मात्रा में जब सफल हो रहा हो, तब समझना चाहिए कि हमें उतनी मात्रा से सिद्धि प्राप्त हो गई। इस सिद्धि का प्रतिफल, भौतिक जीवन मे सुख और आध्यात्मिक जीवन मे शान्ति बन कर सब ओर बिखरे- बिखरे पड़े दीखता रहता है।

यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि मनुष्य का आन्तरिक स्तर जैसा कुछ भी होगा बाह्य परिस्थितियाँ बिल्कुल उसी के उपयुक्त सामने प्रस्तुत रहेंगी। क्रोधी, आलसी, उतावले, असंयमी, अदूरदर्शी मनुष्य अपने इन्हीं दुर्गुणों के कारण पग- पग पर कठिनाइयों और आपत्तियों के पहाड़ सामने खड़े पाते हैं। पर जिनकी अन्तःभूमि स्नेह, सौजन्य, उदारता, सहिष्णुता, श्रमशीलता, उत्साह एवं संयम को दृढ़तापूर्वक अपने भीतर धारण कर चुकी होगी उसके लिए शत्रु भी मित्र बने बिना न रह सकेंगे। प्रगति के अवरुद्ध मार्ग भी उनके लिए खुलेंगे और आपत्तियों एवं अड़चनों के समाधान का कोई मार्ग सहज ही निकलेगा, इस तथ्य को जिसने समझ लिया उसने जिन्दगी जीने की विद्या को जान लिया, यही मानना चाहिए। गायत्री उपासना का तात्पर्य साधक को इसी रहस्य से अवगत करना है।

चौबीस अक्षर के इस छोटे से मंत्र में जीवन का, सफलता रहस्य कूट- कूट कर भरा हुआ है। अध्यात्म विद्या का सार भी इसी को समझना चाहिए। योग्यताएँ, विशेषताएँ, क्षमताएँ, सम्पदाएँ एवं विभूतियाँ कितनी ही अधिक क्यों न हो, यदि भावना स्तर का परिष्कृत निर्माण नहीं हुआ है तो मनुष्य को हर घड़ी किसी न किसी बहाने विक्षोभ एवं असंतोष की आग में ही जलते रहना पड़ेगा। इसके विपरीत यदि गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से किसी का व्यक्तित्व सुविकसित है तो उसे अभाव और कठिनाइयों के बीच रहते हुए भी हँसते हुए दिन बिताने और संतोषपूर्वक रात काटने में कोई अड़चन अनुभव न होगी। गायत्री का प्रत्येक अक्षर इसी शिक्षा से ओत- प्रोत है और जो भी व्यक्ति भावनापूर्वक उच्च- स्तरीय गायत्री साधना के लिए तत्पर होता है उसे अपने इस इष्ट- मंत्र का स्वरूप को भी हृदयंगम करना पड़ता है। जिसने इस तत्त्वज्ञान को समझा और जीवन में उतारा उसका सारा वातावरण ही बदल गया। यह परिवर्तन जहाँ भी संभव हुआ वहाँ निश्चित रूप में आनंद एवं उल्लास का स्रोत फूटा। सच्चे गायत्री- उपासक का जीवन सब प्रकार धन्य हुए बिना रह ही नहीं सकता ।।

वेद- मंत्रों की अद्भुत रचना ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण है। मंत्रों का साधारण अर्थ शिखा एवं ज्ञान के लिए प्रयुक्त होता है। हर वेद मंत्र में ऐसी महत्त्वपूर्ण शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं, जिसके द्वारा मानव जीवन प्रगति की ओर सहज ही अग्रसर हो सकता है। इसके अतिरिक्त इन मंत्रों में वैज्ञानिक रहस्य भी छिपा पड़ा है। उनमें शब्दों का चयन स्वर विज्ञान के मर्मज्ञ ऋषियों ने इस ढंग से किया है कि उनके उच्चारण मात्र से शरीर और मन में विशेष प्रकार के ध्वनि- कम्पन तरंगित होने लगते हैं और वे तरंगें मनुष्य के अन्तर्मन में वैसी प्रेरणाएँ प्रवाहित करती हैं, जिससे व्यक्ति उसी दिशा में सोचने, करने, बढ़ने और टलने के लिए अनायास ही उत्तेजित होता है। वेद- मंत्रों में सन्मार्ग दर्शन कराने वाला जितना ज्ञान भरा पड़ा है, उससे कहीं अधिक शक्तिशाली वह विज्ञान है, जिसके माध्यम से अन्तःप्रदेश में समस्त सूक्ष्म चित्र विकृत होकर उन्हीं मधुर ध्वनि- तरंगों का प्रादुर्भाव करते हैं, जिनके लिए वह मंत्र बना था। गायत्री मंत्र को वेद का बीज मंत्र कहा जाता है। उसी के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप चारों वेद बने हैं। वेदों में जो कुछ भी ज्ञान- विज्ञान है वह बीज रूप में गायत्री में मौजूद हैं। इसलिए उसकी गरिमा चारों वेदों के समतुल्य ही समझी जाती है।

गायत्री का उच्चारण, पाठ एवं जप करने का एक अत्यन्त ही शक्तिशाली सूक्ष्म प्रभाव होता है। उस प्रभाव से प्रभावित मनुष्य उसी मार्ग पर चलने के लिए विवश होता है जो मंत्र का मूल प्रयोजन था। गायत्री का मूल उद्देश्य सत्प्रेरणाओं और सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन है। देखा यही जाता है कि जो लोग भावनापूर्वक इस मार्ग पर बढ़ते हैं उन्हें कोई अज्ञात शक्ति सद्भावनाओं को अपनाने के लिए प्रेरणा रहती है और मनुष्य कितना ही कठोर क्यों न हो, उस प्रेरणा को पूर्णतया ठुकरा नहीं सकता, न्यून मात्रा में ही सही पर उसका सुधार अवश्य होता है और जिसकी मनोभूमि जितनी सुधरी उसका कल्याण भी उतना ही निकट आया। गायत्री को कल्याणी इसीलिए कहा जाता है कि उसका अंचल श्रद्धापूर्वक पकड़ने वाला व्यक्ति कल्याण की ओर ही चलता है और अन्ततः कल्याण का लक्ष्य भी प्राप्त कर लेता है। शब्द- विज्ञान अपने आप में एक परिपूर्ण शास्त्र है। जिह्वा से उच्चारण किये हुए शब्द मनुष्य के मन पर भारी प्रभाव डालते हैं और उनका प्रभाव तुरन्त ही दृष्टिगोचर होता है। कटुवचन बोलने का प्रतिफल क्रोध एवं लड़ाई के रूप में सामने आता है।

किसी प्रेमी का शोक- समाचार सुनते ही भूख- प्यास भाग जाती है और मनुष्य अर्ध मृतक जैसा बन जाता है। भय एवं आशंका की सी भावना सुनकर दिल धड़कने लगता है, व्यंग- उपहास के थोड़े से शब्द द्रौपदी ने कहे थे और उसका प्रतिफल महाभारत के रूप में सामने आया। परीक्षा में उत्तीर्ण होने की खबर सुनकर छात्रों को कितनी प्रसन्नता होती है। रोदन एवं क्रंदन के शब्द सुनकर अपना भी हृदय फटने लगता है। प्रेम और सहानुभूति के वचन कितने मधुर लगते हैं। कामुकता और वासना के प्रस्ताव शरीर में कैसे हलचल मचा देते हैं। शब्द की शक्ति का हम पग- पग पर अनुभव करते हैं। संगीत के माध्यम से रोगों का निवारण, भावनाओं का अभिवर्धन, गौओं का अधिक दूध देना, मृग और साँप का स्थिर मुग्ध होने पर पकड़ा जाना प्रसिद्ध है। किसी को गलत सलाह या गलत आज्ञा देकर दुष्कर्म कराने वाला भी अपराधी माना जाता है और दंड भुगतता है। असत्य शब्द पाप ही तो हैं, जिसे प्रधान दूषणों में गिना गया है। शब्दों का कुप्रभाव कई बार जीवन- मरण की विभीषिका के रूप में सामने आता देखा गया है।

गायत्री मंत्र के २४ अक्षर शक्ति बीज के नाम से विख्यात है। इनका उच्चारण सूक्ष्म शरीर के सारे ढाँचे को प्रभावित करता है। टाइप राइटर की अक्षर- कुञ्जियों पर उँगली रखने से ऊपर लगे हुए कागज पर वही अक्षर छप जाता है। कुंजी पर दबाव पड़ते ही मशीन के भीतर लगी हुई तीली अपनी जगह से चलती है और कागज पद अक्षर छापकर फिर अपनी जगह वापिस आ जाती है। उसी प्रकार गायत्री मंत्र में उच्चारित हुए शब्द मुख- कंठ ओष्ठ- तालु आदि संस्थानों में संलग्न ज्ञान- तंतुओं को तरंगित करते हैं और उनका प्रभाव षट्- चक्रों एवं ५४ उपत्यिकाओं पर पड़ता है। इन रहस्यमय संस्थानों में अनेक शक्तियाँ गुप्त रूप से प्रसुप्त अवस्था में छिपी पड़ी रहती हैं। उन्हें जगाने का क्रम गायत्री जप द्वारा आरम्भ किया जाता है तो वे सक्रिय होने लगती हैं और धीरे- धीरे अपने में आशाजनक उत्साहवर्धक परिवर्तन हुआ अनुभव करने लगता है। गायत्री उपासना के अनेक लाभ बताये गये हैं। उसका ऐसा आश्चर्यजनक माहात्म्य शास्त्रों में मिलता है कि थोड़े से अक्षरों को बार- बार दुहराने मात्र से, जप करने मात्र से, कैसे उतना बड़ा लाभ संभव हो सकता है। पर अनुभव यही बताता है कि जिसने परीक्षा के लिए भी इस मार्ग पर थोड़े से कदम बढ़ाये, उसे निराश नहीं होना पड़ा वरन् आशा से अधिक ही उसने पाया।




गायत्री साधना की सफलता का विज्ञान - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

वाणी का उपयोग सामान्यतः जानकारियों के आदान- प्रदान तक ही सीमित है। इस आदान- प्रदान में शब्द ही उच्चरित होते हैं। शब्दों को वाणी का प्राण कहा जा सकता है, अन्यथा अकेले वाणी कुछ भी करने में, कोई भी जानकारी दे पाने में असमर्थ ही है। शब्द या ध्वनि सुनकर ही कई बातों का पता चलता है। पैरों की चाप ध्वनि के रूप में होती है जिसे सुनकर पता चलता है कि अमुक प्राणी आ रहा है। बादलों की गड़गड़ाहट, हवा की सनसनाहट, पत्तों की खड़खड़ाहट सुनकर बिना देखे भी बहुत कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। मुँह की आवाज सुनकर यह पता चलता है कि यह शब्द किस प्राणी का है? और वह कहाँ है? बातचीत से घटनाओं परिस्थितियों एवं समस्याओं की जानकारी मिलती है। सामान्यतया शब्दोच्चार जानकारी के आदान- प्रदान में ही प्रयुक्त होता है, उसकी इतनी ही बौद्धिक उपयोगिता है। स्कूलों में, कारखानों में, यात्राओं में, व्यवसाय में, कुटुम्ब में, मित्रों में प्रायः इसी प्रकार का वार्तालाप होता पाया जाता है।

इस प्रकार सामान्यतः शब्द जानकारी के आदान- प्रदान की मस्तिष्कीय आवश्यकता को ही स्थूल रूप में पूरा करता है। यह आवश्यकता पूर्ति स्थूल रूप में तो कम होती है, विशेष स्थिति वह है जिसमें जानकारी के आदान- प्रदान की मस्तिष्कीय आवश्यकता तो कम पूरी होती है पर उसमें अन्तरात्मा की भाव सम्वेदनाएँ पर्याप्त मात्रा में जुड़ी रहती हैं। ऐसे शब्दों को गान कहते हैं। स्थूल शरीर हलचलें करता है और आवाज निकालता है। सूक्ष्म शरीर शब्द द्वारा जानकारियों का आदान- प्रदान करता है। कारण शरीर की सत्ता भावपरक है। जब अन्तःकरण बोलता है तो उसमें भावनाएँ भरी रहती हैं। इसे ही आध्यात्मिक अर्थों में गान कहा जाता है।

सामान्यतः गान शब्द से गीत का आशय लिया जाता है। शब्दों को लयबद्ध करके गाया या गुनगुनाया जाना, उसमें भावनात्मक मस्ती का जुड़ा रहना ही गान है। इसे और भी अधिक संस्कृत किया जाता है तो ताल- स्वर आदि का समावेश हो जाता है। उस स्थिति में इसे छन्द नाम दिया जाता है। काव्य या कविता भी इसी लयबद्ध भाव प्रवाह को कहते हैं। उसे जब वाद्य यन्त्रों के साथ मिला दिया जाता है तो संगीत बन जाता है। वेदों की ऋचाएँ छन्द कही जाती हैं। मन्त्रों में गान की इन विशेषताओं के साथ शब्द गुंथन का भी असाधारण महत्त्व है।

इस विशेषता के कारण ही मन्त्र सामर्थ्यवान बनते हैं और अभीष्ट चमत्कार उत्पन्न करते हैं। गायत्री मन्त्र को ही लें। उसका शब्दार्थ बहुत सामान्य- सा है। तेजरूप भगवान से सद्बुद्धि की याचना भर उसमें की गई है। इस अर्थ की बोधक अनेक कविताएँ प्रायः सभी भाषाओं में मौजूद हैं अथवा बन सकती हैं। किन्तु इनका वह प्रभाव नहीं हो सकता जो गायत्री मन्त्र का होता है। यही कारण है कि उन कविताओं में शब्द विज्ञान और भाव- विज्ञान का उतना अद्भुत समन्वय नहीं है और सूक्ष्मदर्शी तत्त्ववेत्ताओं की विशेष मनः स्थिति में ही ऐसे दिव्य अवतरण सम्भव होते हैं ।। इसलिए वेदमन्त्रों की संरचना को अपौरुषेय कहा गया है।

गायत्री शब्द का सामान्य अर्थ भी यही है कि जो गाई जाने पर अपना चमत्कार प्रस्तुत करें। इस तथ्य को प्रमाणित करने वाले अनेकों प्रमाण मौजूद है यहाँ गायन का अर्थ संगीत से नहीं वरन् उस मनःस्थिति में उपासना क्रम चलाने से है जो भावनापूर्वक, भावभरी मनःस्थिति में चलाया जाता है। साधक के अन्तस् में मस्ती छाई रहनी चाहिए और बेगार भुगतने की तोता रटन्त की तरह नहीं, अपितु भाव तरंगों में लहराते हुए उसे गाया- गुनगुनाया जाना चाहिए ।। जिह्वा का शब्दोच्चार मात्र तो बकवास कहलाता है। अन्य प्राणी, छोटे बच्चे अथवा अविकसित मस्तिष्क वाले प्रायः बिना मतलब की बकझक करते रहते हैं। वाणी की प्रौढ़ता सुविज्ञ मस्तिष्क की ज्ञान सम्पदा जुड़ जाने से ही वह विशेषता उत्पन्न होती है, जो प्रखर भी होती है और प्रभावशाली भी। इस उच्चारण से बोलने वाले का भी लाभ होता हैं और सुनने वाले का भी। इसके बाद दिव्य वाणी आती है जिसमें परिष्कृत व्यक्तित्व के साथ जुड़ी रहने वाली भाव संवेदना का भी समावेश होता है। ऋचाओं का यही स्तर है। उनकी विशेषता सामगान को निखारती है।

उपासना प्रक्रिया में भी उच्चारण के साथ श्रद्धा भरी अनन्य तन्मयता का समावेश होना चाहिए। ऐसा समावेश जिसमें क्रमबद्ध, लयबद्ध, स्वरबद्ध, गुनगुनाहट तो हो ही, साथ ही इष्ट के साथ एकाकार होने की आकुलता भी हो। मन्त्रों का वास्तविक लाभ इसे गान वाली मनःस्थिति में मिलता है। विशेषताओं से संयुक्त गायत्री शब्द के अनेक अर्थ हैं। गय ‘प्राण’ को भी कहते हैं और गीत को भी, भगवान ने गीता में ‘गायत्रीछंदसामहम्’ वाक्य में गायत्री छन्द को अपना रूप बताया है। यहाँ छन्द से तात्पर्य गीत से है, पर वह मनोरंजन के लिए नहीं है। दिव्य तन्मयता की भावभरी लहरों में लहराने के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला ‘नाद ब्रह्म’ है। वह गान, गायनकर्त्ता को ऐसी भाव- भूमिका में ले उड़ता है, जा सर्वतोमुखी कल्याण का अनुदान दे सके। गाने वाले का त्राण करने वाली मन्त्र शक्ति को गायत्री कहा गया है। प्रभा का त्राण करने वाली भी गायत्री का एक अर्थ है। इस सम्बन्ध में शास्त्रों में कई स्थानों पर विभिन्न तरह से उल्लेख किया जाता है।

वेद में कहा गया है-
बसन्तः प्राणायानो गायत्री बसंती ।।
-यजु० १३/५
अर्थात्- गायत्री वह है जो बसन्त मे गाई जाती है और गाने वाले की रक्षा करती है।
गायंती त्वागा यत्रिणोऽर्यन्त्यकर्मर्किणः ।।
-ऋग्वेद १/१०/१
अर्थात्- गायत्री का गान करने वाले तेरा ही गुणगान करते हैं। तेज के उपासक उसी सूर्य की उपासना करते हैं।
यदा गायत्री आधिगायत्रमाहितम् ।।
-ऋग्वेद १/१६४/२३
अर्थात्- जिसका गायन करते हैं उसे गायत्री कहते हैं
गायन्त त्रायतं इति गायत्री ।।
-गोपथ
अर्थात्- जो जाने वाले का त्राण करे वही गायत्री यद्गायत तद्गायत्री शत जिसे गाते हैं वही गायत्री है।
त्रायन्तों गायतः सर्वान् गायत्रीत्यमिधीयते।
-अहि.बु.स.३/१६
अर्थात्- सभी गान करने वालों की रक्षा करती है। इसीलिए उसे गायत्री कहते हैं।
गायत्री प्रोच्यते तस्यात् गायत्तं त्रायते यतः ।।
गायतात् त्रायते यस्मात् गायत्री तेन कथ्यते॥
अर्थात्- गायन करने वाले का त्राण करने वाली होने से वह गायत्री कहलाती है।
तमेत देव गायत्रं साम गायन्न वायत ।।
यद गायन्न त्रयत तद गायत्रस्य गायत्रत्वम् ॥
-जै.ब्रा.३/३८/९
अर्थात्- जो गायत्री का गान करता है, गायत्री उसकी रक्षा करती है।

गातार त्रायते यस्माद् गायत्री तेन गीयते।
-स्कन्द पुराण (काशी खण्ड)
अर्थात्- गाने वाली की रक्षा करती है, इसी से उसको गायत्री कहा जाता है।
गायतो मुखाद् उदपतदिति गायत्री ।।
-निरूक्त ७/१२
अर्थात्- सबसे प्रथम गान करते हुए परमेश्वर के मुख से जो गीत निकला, वही गायत्री है।
सर्वेषामेव वेदानां गुह्योपनिषदां तथा ।।
सारभूता तु गायत्री निर्गता ब्रह्मामे मुखम्॥
अर्थात्- सब वेदों और गुह्य उपनिषदों का सार रूप ब्रह्माजी के मुख से गायत्री मन्त्र प्रकट हुआ।



गायत्री किस प्रकार अपने उपासक का सर्वविध कल्याण करती है और उसे सर्व समर्थ बनाती है? इसका एक सुसंगत विज्ञान है। मन्त्र विद्या के ज्ञाता जानते हैं कि जीभ से जो भी शब्द उच्चारित होते हैं, उनका उच्चारण केवल जीभ द्वारा ही नहीं होता। अपितु उनके उच्चारण में कण्ठ, तालू, मूर्धा, ओष्ठ, दाँत, जिह्वा मूल आदि मुख के विभिन्न अंग महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहते हैं। इस उच्चारण काल में जिन भागों से ध्वनि निकलती है, उन अंगों में नाड़ी तन्तु शरीर के विभिन्न भागों तक फैले हुए हैं। इस विस्तार क्षेत्र में कई ग्रन्थियाँ होती हैं, जिन पर उच्चारण से दबाव पड़ता है। जिन लोगों की कोई विशेष सूक्ष्म ग्रन्थियाँ रुग्ण या क्षत- विक्षत होती हैं ,, उनके मुख से कुछ खास शब्द अशुद्ध निकलते हैं या रुक- रुककर निकलते हैं। हकलाना या तुतलाना इसी को कहते हैं।

योगी लोग जानते हैं कि शरीर में विद्यमान अनेक छोटी- बड़ी ग्रन्थियों में विशेष शक्ति भण्डार छिपा रहता है। सुषुम्ना से सम्बद्ध षट्चक्र प्रसिद्ध है। ऐसी अगणित ग्रन्थियाँ शरीर में विद्यमान हैं। विविध शब्दों का उच्चारण इन विविध ग्रन्थियों पर अपना प्रभाव डालता है और उसके प्रभाव से इन ग्रन्थियों का शक्ति भण्डार जागृत होता है। मन्त्रों का पठन इसी आधार पर होता है। यह बात पहले ही स्पष्ट की जा चुकी है। गायत्री मंत्र के २४ अक्षर हैं। इनका प्रत्येक का सम्बन्ध शरीर में स्थित ऐसी ग्रन्थियों से हैं, जो जाग्रत होने पर सद्बुद्धि प्रकाशक शक्तियों को सचेत करती हैं। गायत्री मंत्र के उच्चारण से सूक्ष्म शरीर का सितार, शरीर में विद्या पाठ सूक्ष्म ग्रन्थियाँ इस प्रकार झंकृत और स्पन्दित होती हैं जिसका प्रभाव अदृश्य जगत पर पड़ता है और साधक की चेतना भी उससे इस प्रकार प्रभावित होती है कि अनेकों प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष लाभ होते हैं। यह प्रभाव ही गायत्री साधना के सत्परिणाम प्रस्तुत करती है।

शब्दों की शक्ति साधारण नहीं है। प्रकट तौर पर भले ही वे जानकारी का आदान- प्रदान करने वाला प्रतीत होते हों, परन्तु शब्द विद्या के ध्वनि के आचार्य जानते हैं कि शब्दों में कितनी शक्ति है? और उसकी अज्ञात गतिविधि के द्वारा क्या- क्या परिणाम उत्पन्न हो सके ते हैं? शब्दों की इस असाधारण शक्ति- क्षमता के कारण ही शब्द को ब्रह्म कहा गया है। गायत्री मन्त्र में इस शब्द विज्ञान का भरपूर उपयोग हुआ है।

गायत्री उपासना को और भी फलवती बनाने वाला कारण है, साधक का श्रद्धामय विश्वास। विश्वास की शक्ति से सभी मनोविज्ञानवेत्ता भली- भाँति परिचित हैं। इस तरह के कई उदाहरण देखने में आते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि केवल विश्वास के कारण ही लोग भय की वजह से अकाल मृत्यु के मुख में चले गए और विश्वास के कारण ही मृतप्राय लोगों ने नवजीवन प्राप्त किया। रामायण में तुलसीदास जी ने ‘भवानी शंकरो वंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणी’ गाते हुए श्रद्धा विश्वास को भवानी शंकर की उपमा दी है। लोग अपने विश्वासों की रक्षा के लिये धन, आराम तथा प्राणों तक को हँसते- हँसते गँवा देते हैं। एकलव्य, कबीर आदि ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिनसे प्रकट है कि गुरू द्वारा नहीं, केवल अपनी श्रद्धा के आधार पर प्राप्त होने वाली शिक्षा से भी अधिक विज्ञ बना जा सकता है। हिप्नोटिज्म का आधार रोगी को अपने वचन पर विश्वास कराके उससे मनमाने कार्य करा लेना ही तो है। तांत्रिक लोग मन्त्र सिद्धि की कठोर साधना द्वारा अपने मन में उस मन्त्र के प्रति जमी श्रद्धा के आधार पर ही सफलता प्राप्त करते हैं। जिस मन्त्र से श्रद्धालु तांत्रिक चमत्कारी काम कर दिखाता है, उस मन्त्र की अश्रद्धालु साधक चाहे जिस तरह आराधना करे, उसे कुछ लाभ नहीं होता ।। गायत्री मन्त्र के सम्बन्ध में भी यही तथ्य बहुत सीमा तक काम करता है। जब साधक श्रद्धा और विश्वासपूर्वक आराधना करता है, तो शब्द- विज्ञान और विश्वास- विज्ञान दोनों की विशेषताओं से संयुक्त गायत्री मन्त्र का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है और वह एक अद्वितीय शक्ति सिद्धि होती है।

गायत्री को इसीलिए गान करने वाले का त्राण करने वाली कहा गया है कि वह शब्द- विज्ञान और विश्वास के आधार पर साधक में अनेकों सूक्ष्म शक्तियाँ जागृत कर देती हैं। यह शक्तियाँ साधक को अनेकों प्रकार की सफलतायें, सिद्धियाँ और सम्पन्नता प्राप्त कराती हैं। गायत्री साधना एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसे भली- भाँति सम्पन्न किया जाये तो उसके सत्परिणाम प्राप्त होना सुनिश्चित है।







कर्मकाण्डों में भावनायें भी समाविष्ट रहें - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

उपासना में कर्मकाण्डों का महत्त्व है। उस आधार पर साधक इष्ट के प्रति अपनी भावनाओं का विकास करता है और भाव सामीप्य के द्वारा इष्ट की सी विशेषताओं का अर्जन करता है। अतः सम्पन्न किये जाने वाले क्रिया- कृत्यों में भावनाओं का भी समावेश होना चाहिए। बेमन से किये गये कर्मकाण्डों का कोई प्रभाव नहीं होता। कर्मकाण्डों में भाव संचार अपनी श्रद्धा भावना के अनुपात से ही होता है इसलिए साधकों के लिए अनिवार्य रूप से यह निर्देश दिया गया है कि कर्मकाण्ड- यंत्र की तरह न किये जावें। क्रियाओं के साथ- साथ उनसे सम्बन्धित भावनाओं को भी अन्तःकरण में जाग्रत किया जाना चाहिए।

गायत्री साधना के साथ यज्ञ का अनिवार्य सम्बन्ध है। दोनों अन्योन्याश्रित  हैं। गायत्री को भारतीय संस्कृति की माता कहा गया है, तो यज्ञ को उसका पिता। अतएव गायत्री साधक को गायत्री उपासना के साथ- साथ यज्ञ- हवन भी संपन्न करना चाहिए। उसका विधि- विधान अलग से गायत्री के अनुष्ठान और पुरश्चरण पुस्तक में दिया गया है। बड़े यज्ञ और लम्बे समय में संपन्न होने वाले यज्ञों को प्रतिदिन किया जाना आज के समय में संभव नहीं है। थोड़े ही समय में किये जा सकें, ऐसी हवन विधि का विवेचन उपर्युक्त पुस्तक में है। उनमें भी क्रियाओं के साथ भावनाओं को अनिवार्य रूप से जोड़े रखा जाना चाहिए।

दैनिक उपासना, न्यूनतम साधना के लिए भी वही बात लागू होती है। षट्कर्म, देवपूजन आदि क्रियाओं से सम्बन्धित भावों का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है। इन्हें पढ़कर हृदयंगम कर लेने से क्रियाकृत्य के साथ समुचित भावनायें उभरने लगती हैं।

आत्म- शुद्धि के षट्कर्म प्रख्यात हैं। देवपूजन आरम्भ करने से पूर्व इन उपचारों को सम्पन्न किया जाता है। किसी श्रेष्ठ सत्ता को बुलाने और बिठाने से पूर्व उसके लिए उपयुक्त स्वच्छता उत्पन्न करना आवश्यक है। गुरुजनों, महामानवों, राजनेताओं को घर बुलाना होता है तो उनके लिए आवश्यक सफाई करानी पड़ती है और स्वच्छ उपकरण एकत्रित करने पड़ते हैं। दिवाली पर लक्ष्मी के आगमन की सम्भावना देखकर लोग सबसे अधिक ध्यान घर की सफाई पर देते हैं, ताकि स्वच्छ वातावरण में उसको प्रसन्नता मिले और वह ठहर सकें। सर्वविदित है कि गन्दे स्थान पर ठहरना किसी को पसन्द नहीं, गन्दे लोगों के साथ सम्बन्ध रखने, उनके पास जाने तथा बुलाने में सामान्य लोगों को भी रुचि नहीं होती, फिर देव- शक्तियाँ तो उसके लिए तैयार होंगी ही क्यों ? झूँठे और मैले बर्तन में बहुमूल्य भोजन परोसने से भी खाने वाले को घृणा ही उत्पन्न होती है। साधक की पवित्रता एवं पात्रता का चुम्बकत्व ही देव शक्तियों के अनुग्रह को अपनी ओर आकर्षित करता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए साधना विज्ञान के ज्ञाताओं  ने सर्वप्रथम आत्मशोधन की ओर ध्यान देने का विधान बनाया है। प्रस्तुत कर्मकाण्डों के सहारे जीवन में परिष्कार की ओर अधिकाधिक तत्परता बरतने के लिए उत्साह उत्पन्न किया जाता है।

प्राथमिक उपासना के पाँच भाग हैं- (१) आत्मशोधन (२) देव- पूजन (३) जप (४) ध्यान (५) सूर्यार्घ्य दान ।।

आत्मशोधन के पाँच अंग हैं- (१) पवित्रीकरण (२) आचमन (३) शिखा बन्धन (४) प्राणायाम (५) न्यास इन्हें ही ब्रह्मसंध्या कहा जाता है।

(१) पवित्रीकरण- साधना के लिए साधक यथासाध्य शुद्ध होकर ही बैठता है, किन्तु फिर भी जो कमी रह गयी हो, उसे दिव्य सहयोग द्वारा पूरी करने के लिए यह कृत्य किया जाता है। मात्र क्रिया से वह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। अभिमन्त्रित जल को समस्त शरीर पर छिड़का जाये और यह भावना की जाये कि इस मंत्रपूत जल के साथ विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त पवित्रता तत्त्व की हमारे ऊपर वर्षा हो रही है और फुहारे के नीचे बैठकर स्नान करने की तरह उस वर्षण का आनन्द लिया जा रहा है। पवित्रता शरीर के भीतर प्रविष्ट होकर समस्त चेतना को, भाव संस्थान को, पवित्र बनाती चली जा रही है।

(२) आचमन- तीन आचमनों का तात्पर्य काया, विचारणा और भावना इन तीन चेतना के केन्द्रों में शान्ति, शीतलता, सात्विकता का समावेश करना है। प्रथम आचमन काया में सच्चरित्रता, सात्विकता और वाणी में सदाशयता की स्थापना करने के लिए हैं। वाणी की विशेष पवित्रता इसलिए है कि उसके द्वारा उच्चरित जप- प्रार्थना भगवान तक पहुँच सके। अनीति उपार्जित अन्न खाने वाली और असत्य, विक्षोभकारी वचन बोलने वाली वाणी का तेज नष्ट हो जाता है और इसके उच्चारण, मन्त्र- शक्ति उत्पन्न नहीं कर सकते। इस तथ्य को स्मृति में जमाये रहने के लिए प्रथम आचमन है।

द्वितीय आचमन विचारणा में चिन्तन की शीतलता, सात्विकता स्थापित करने के लिए है। अशुद्ध, अपराधी, दुष्ट, दुर्बुद्धि के कारण यदि मस्तिष्क में अशांति के आँधी- तूफान उठते रहेंगे तो उसमें मनस्विता एवं तेजस्विता उत्पन्न न हो सकेगी। बहुमूल्य विचारशक्ति ऐसे ही वांछनीय छिद्रों में होकर नष्ट होती रहेगी। मानसिक पवित्रता को साधना की सफलता के लिए नितांत आवश्यक माना जाये। इस मान्यता को सुदृढ़ बनाने की बात ध्यान में बनी रहे, यह उद्देश्य दूसरे आचमन का है।

तीसरा आचमन भाव शुद्धि के लिए है। जीवनोद्देश्य के प्रति उच्चस्तरीय निष्ठा और चिन्तन एवं कर्तृत्व की श्रेष्ठता बनाये रहने वाली आस्था ही भाव निष्ठा है। प्रपंच, प्रलोभनों के आकर्षणों में व्यस्त निरर्थक अनर्थ भरा पतनोन्मुख जीवन जीने वाले लोग आत्मबल सम्पादित नहीं कर पाते। आकांक्षाओं का स्तर ऊँचा रहना ही भाव शुद्धि है। यह तथ्य सदा स्मरण बना रहे, इसलिए तीसरा आचमन किया जाता है।

जैसे बालक माता का दूध पीकर उसके गुणों और शक्तियों को अपने मे धारण करता है और परिपुष्ट होता है, उसी प्रकार साधक मंत्र- बल से आचमन के जल को गायत्री माता के दूध के समान बना लेना है और उसका पान कर अपने आत्मबल को बढ़ाता है। इस आचमन से उसे त्रिविध ह्रीं श्रीं, क्लीं शक्ति से युक्त आत्म- बल मिलता है, तदनुसार उसको आत्मिक पवित्रता, सांसारिक समृद्धि को सुदृढ़ बनाने वाली शक्ति प्राप्त होती है।

(३) शिखा बन्धन -शिखा भारतीय संस्कृति की धर्म- ध्वजा है। सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी गायत्री की प्रतीक है। भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठावान हर व्यक्ति, शरीर के सर्वोच्च स्थल पर सद्विचारणा - सद्बुद्धि के नियंत्रण की घोषणा है। इस दिव्य प्रतीक को, दिव्य प्रेरणाओं का स्मरण तथा उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए धारण किया जाता है।

शिखा जिस स्थान पर रखी जाती है वहाँ सूक्ष्म शक्तियों से सम्पर्क करने वाले विशेष केन्द्र होते हैं। जल के स्पर्श तथा भावना के प्रभाव से उपासना काल में उन्हें विशेष रूप से सक्रिय बनाया जाता है ताकि दिव्य आदान- प्रदान का विशेष लाभ प्राप्त किया जा सके।

(४)प्राणायाम- संध्या का तीसरा कोष है, प्राणायाम अथवा प्राणाकर्षण। गायत्री की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए पूर्व पृष्ठों में यह बताया जा चुका है कि सृष्टि दो प्रकार की है- (१) जड़ अर्थात् परमाणुमयी, (२) चैतन्य अर्थात् प्राणमयी। निखिल विश्व में जिस प्रकार परमाणुओं के संयोग- वियोग से विविध प्रकार के दृश्य उपस्थित होते रहते हैं, उसी प्रकार चैतन्य जगत की विविध घटनाएँ घटित होती हैं। जैसे वायु अपने क्षेत्र में सर्वत्र भरी हुई है, उसी प्रकार वायु से भी असंख्य गुना सूक्ष्म चैतन्य प्राणतत्त्व सर्वत्र व्याप्त है। इस तत्त्व की न्यूनाधिकता से हमारा मानस- क्षेत्र बलवान् तथा निर्बल होता है। इस प्राणतत्त्व को जो जितनी मात्रा में आकर्षित कर लेता है, धारण कर लेता है, उसकी आन्तरिक स्थिति भी उतनी ही बलवान हो जाती है। आत्मतेज, शूरता, दृढ़ता, पुरुषार्थ, विशालता, महानता, सहनशीलता, धैर्य, स्थिरता सरीखे गुण प्राणशक्ति के परिचायक हैं। जिनमें प्राण कम होता है, वे शरीर से स्थूल भले ही हों, पर डरपोक, दब्बू, अपराधी मनोवृत्ति के, घबराने वाले, अधीर, तुच्छ नीच विचारों में ग्रस्त एवं चंचल मनोवृत्ति के होते हैं। इतने दुर्गुणों के होते हुए कोई व्यक्ति महान नहीं बन सकता ।। इसलिए साधक को प्राणशक्ति अधिक मात्रा में अपने अन्दर धारण करने की आवश्यकता होती है। जिस क्रिया द्वारा विश्वव्यापी प्राणतत्त्व में से खींचकर अधिक मात्रा में प्राण शक्ति को अपने अन्दर धारण करते हैं, उसे प्राणायाम कहा जाता है।

प्राणायाम के चार भाग हैं- (१) साँस भीतर ले जाने की क्रिया को पूरक (२) भीतर रोकने को अन्तःकुम्भक (३) बाहर निकालने को रेचक (४) बाहर रोके रहने को बाह्य कुम्भक कहते हैं। जब साँस- क्रिया आरम्भ की जाये तो साँस खींचते समय भावना करनी चाहिए कि निखिल आकाश में वायु तत्त्व के साथ घुला हुआ प्राणतत्त्व साँस के साथ हमारे भीतर प्रवेश करते हुए दिव्य शक्ति भर रहा है। सांस रोकते समय भावना करती चाहिए कि उस दिव्य शक्ति को शरीर के अवयवों, रक्तकणों एवं चेतना संस्थानों द्वारा सोखा और सदासर्वदा के लिए धारण किया जा रहा है। साँस निकालते समय भावना करना चाहिए कि सूक्ष्म, स्थूल और कारण शरीरों के मल अवरोध, विक्षेप, दोष, विकार बाहर निकले जा रहे हैं। बाहर साँस रोकने के समय भावना करनी चाहिए कि निकले हुए विकारों को वापस न लौटने के लिए द्वार बन्द कर दिया गया है। ऐसे तीन प्राणायाम किये जाने चाहिए।

(५) न्यास- न्यास कहते हैं- धारण करने को। अंग- प्रत्यंग में गायत्री की सतोगुणी शक्ति को धारण करने, स्थापित करने, भरने, ओत- प्रोत करने के लिए न्यास किया जाता है। गायत्री के प्रत्येक शब्द का महत्त्वपूर्ण मर्म- स्थलों से घनिष्ठ सम्बन्ध है, जैसे सितार के अमुक भाग में, अमुक आघात के साथ उँगली का आघात लगाने से अमुक ध्वनि के स्वर निकलते हैं, उसी प्रकार शरीर वीणा को सन्ध्याकाल में उँगलियों के सहारे दिव्य भाव से झंकृत किया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि स्वभावतः अपवित्र रहने वाले शरीर से दैवी सान्निध्य ठीक प्रकार से नहीं हो सकता, इसलिए उसके प्रमुख स्थानों में दैवी पवित्रता स्थापित करके उसमें इतनी मात्रा दैवी तत्त्वों की स्थापित कर ली जाती है कि वह दैवी- साधना का अधिकारी बन जावे।

न्यास के साथ जिन अंगों का स्पर्श किया जाता है, उनमें एवं सारे शरीर में ईश्वरीय दिव्य चेतना के संचार का ध्यान किया जाता है। दिव्य चेतना के संचार से वे पवित्र, बलिष्ठ एवं सक्षम होते हैं। भावना करनी चाहिए कि जिस दिव्य सत्ता के अनुदान से यह तेजस्वी बन रहे हैं, उसके गौरव के अनुरूप श्रेष्ठ कार्यों में ही इनका उपयोग हो। मस्तिष्क श्रेष्ठ चिन्तन में लगे, नेत्र सद्दर्शन, कान सद्श्रवण, मुख सात्विक आहार, कण्ठ शुभ वाणी, हृदय सद्भाव, नाभि प्रदेश श्रेष्ठ, प्राण ऊर्जा एवं हाथ- पैर सत्कार्य, सत्प्रयोजन के लिए ही नियोजित हों।

(६) पृथ्वी पूजन -धरती माता- मातृभूमि को प्रत्यक्ष देवता मानकर उसका अभिसिंचन अभिवादन करने की भावना से उपलब्ध अनुदानों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन से पूजन किया जाये। मातृभूमि के लिए समस्त जड़- चेतन जगत द्वारा मिले लाभों के प्रत्युपकार में बढ़- चढ़कर त्याग- बलिदान करने की भावनाएँ जगाना इस ‘पृथ्वी पूजन ’ प्रक्रिया का उद्देश्य है। इसे आसन पवित्रीकरण भी कहते हैं। आसन का अर्थ है- आधार। हम जिस आधार जिस उद्देश्य से, जिन साधनों के माध्यम से साधना करें उनकी पवित्रता पर भी ध्यान दें। धरती माता की गोद में बैठकर साधक साधना का केवल कल्याणकारी प्रयोग ही कर सकता है। माँ की गोद में बैठकर किसी के अकल्याण की कल्पना भी सम्भव नहीं।

दूसरा चरण है देव- पूजन, गायत्री माता की छवि को देवत्व के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में पूजा वेदी पर स्थापित करते हैं। उन्हें कुछ देते हैं इसी अनुदान के प्रतिदान में देव- अनुग्रह प्राप्त होता है, देवता देते हैं। उन्हें वे भी प्रिय होते हैं जो देने की गरिमा स्वीकार करते हैं और उसका ही शुभारम्भ अपने आप से करते हैं। बीज गलने को तैयार होता है तो धरती माता उसे पोषण देकर विशालकाय वृक्ष बनने का वरदान एवं अनुदान प्रदान करती है। यही नीति देवताओं की भी है। वृक्ष अपने फल दूसरों को देते हैं। भेड़- बकरी भी ऊन दूसरों को देती है। नदियाँ अपना जल दूसरों को पिलाती है। इसी देव प्रकृति को अपनाये जाने पर प्रसन्न होकर देवता उन्हें अधिकाधिक अनुग्रह देते चले जाते हैं। कृपणता बरतने वाले अनुदार, स्वार्थ परायणों के प्रति देवता भी निष्ठुर ही बने रहते हैं। इस तथ्य को ठीक तरह हृदयंगम करने के लिए पूजा की चौकी पर स्थापित गायत्री प्रतिमा के सम्मुख साधक को पंचोपचार के रूप में पाँच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने होते हैं। इससे यह आत्म- शिक्षण मिलता है कि समर्थ देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए क्या रीति- नीति अपनानी होगी। जीवन- चर्या निर्धारण में किस स्तर की गतिविधियों का समावेश करना होगा ।।

आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाली योग साधना के पथ पर अग्रसर होने की दिशा में प्रथम कक्षा साकार उपासना की है। उसमें आकृति सहित परमात्मा की कल्पना करनी पड़ती है। उसे उच्चस्तरीय श्रेष्ठताओं से सम्पन्न माना जाता है, समीप उपस्थित अनुभव किया जाता है, सघन श्रद्धा का आरोपण करते हैं, गहरी प्रेम- भावना उमगाते हैं और उनके साथ घनिष्ठता बनाते हैं। इसी कृत्य के अंतर्गत आने वाली विविध उपचार भक्ति साधना कहे जाते हैं। ‘लय’ प्रक्रिया का यह प्रथम सोपान है। अचिन्त्य चिन्तन में असमर्थ- स्थूल भूमिका की मनःस्थिति के लिए यही कृत्य सरल पड़ता है और चेतना का स्तर आगे बढ़ाने में सहायता करता है। प्रतीक उपासना का सारा ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुआ समझा जाना चाहिए।

सार्वजनिक मन्दिरों में अथवा पूजा कक्षों में भगवान के विविध प्रतीकों की स्थापना करके उनका महामानव गुरुजनों जैसा स्वागत- सत्कार किया जाता है। पंचोपचार, षोडशोपचार के विधान उसी के लिए बनाये गये हैं। जितनी देर प्रतिमा सामने रहती है, उतने समय ईश्वर के सान्निध्य का अनुभव होता है, उसका बड़प्पन स्वीकारा जाता है और श्रद्धाभिव्यक्ति से उन्हें सम्मानित करने वाले शिष्टाचारों का प्रदर्शन किया जाता है। पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, आरती, नमस्कार आदि के विविध कृत्य समीपता और श्रद्धा की अनुभूति को विकसित करने में सहायता करते हैं। निष्ठा की परिपक्वता के लिए कल्पित देव प्रतिमाओं को यथार्थ मानने की मनःस्थिति उत्पन्न की जाती है।

इससे आगे की सूक्ष्म प्रतीक पूजा वह है, जिसमें आँख बन्द करके अथवा अधखुली रखकर इष्टदेव की प्रतिमा का ध्यान किया जाता है और श्रद्धा, समीपता एवं एकता की वैसी ही भावना की जाती है, जैसी कि मूर्ति- पूजा में स्थूल प्रतिमा की। अन्तर इतना ही रहता है कि मूर्ति पूजा में प्रतीक उपकरणों की प्रत्यक्ष आवश्यकता पड़ती है, जबकि ध्यान में वह सारे कार्य कल्पना के सहारे ही पूरे हो जाते हैं। ध्यान में इष्ट देव को हँसता, मुसकता और श्रद्धा- समर्पण के अनुरूप प्रत्युत्तर देता सोचा जा सकता है। यह स्थिति अधिक उत्साहवर्धक होती है और एकाग्रता का लाभ भी अधिक होता है। इसलिए इस मानसपूजा को भावनाशील, कल्पनाशील साधकों के लिए प्रयुक्त होने वाली उपासना का अगला ऊँचा चरण माना गया है। सामान्य व्यक्ति के लिए तो कर्मकाण्ड युक्त भावना समन्वित उपासना ही श्रेयस्कर है। ब्रह्मसंध्या के षट्कर्मों में संयुक्त की जाने वाली भावनाओं के बाद पूजा के पंचोपचार के साथ जुड़े हुए क्रिया- कृत्यों में जोड़ी जाने वाली भावनाओं का यहाँ विवेचन किया जाता है।

पूज्य गुरुजन जब सामने उपस्थित होते हैं, तो उनके प्रथम दर्शन पर सम्मान, शिष्टाचार प्रदर्शित किया जाता है। उपासना मे समय अपने इष्ट के प्रतीक में देव शक्ति का आह्वान करने के उपरान्त उसका सम्मानोपचार किया जाना चाहिए। इससे भाव निष्ठा में और भी अधिक परिपक्वता उत्पन्न होने का अवसर मिलता है। इस प्रयोजन के लिए ही पूजन की परम्परा प्रचलित है। पंचोपचार में (१) जल (२) चावल- नैवेद्य (३) पुष्प (४) धूप- दीप (५) चावल- रोली को गिना जाता है। इन्हें एक तश्तरी में रखना चाहिए और क्रमशः एक- एक को पास मे रखी दूसरी तश्तरी में श्रद्धा, सम्मान की अभिव्यक्ति के लिए छोड़ते जाना चाहिए। यही दो ईश्वरीय शक्तियाँ लीला कर रही हैं। प्रकृति का प्रतीक जल और पुरुष का प्रतीक अग्नि को माना गया है। यह भी एक प्रकार से चित्र- स्थापना ही है।

उपचार के इन उपकरणों के पीछे जीवन के दिव्य निर्माण की प्रेरणा है। इस विश्व ब्रह्माण्ड को ईश्वर का विराट् रूप माना जाना चाहिए और लोकमंगल की क्रिया- प्रक्रिया द्वारा उसकी यथार्थ पूजा में संलग्न रहा जाना चाहिए। यह इस दिशा में पहला चरण अपने आपको पवित्र, संयत एवं आदर्श बनाकर ही बैठाया जा सकता है। आत्म- निर्माण और विश्व- निर्माण की उभयपक्षीय जीवन- साधना सम्पन्न करने के लिए किन आदर्शों को सामने रखा जाय, इसी का दिशा निर्देश इस पंचोपचार पूजा में प्रयुक्त होने वाले पदार्थों के साथ जुड़ा हुआ है।


(१) जल- शीतलता, शान्ति, नम्रता, विनय, सज्जनता का प्रतीक है, सत्प्रयोजनों के लिए हमें समय लगाना एवं श्रम बिन्दुओं का समर्पण करना है। उसी से श्रेष्ठ सत्कर्म बन पड़ते हैं। पाद्य, अर्घ्य, स्नान के चार चम्मच इसीलिए चढ़ाये जाते हैं कि हम अपना श्रम, मनोयोग, प्रभाव एवं धन इन चारों उपलब्धियों का यथासम्भव अधिकाधिक भाग ईश्वरीय प्रयोजन के लिए समर्पित करेंगे।

(२) अक्षत- उपार्जित अन्न, धन, वैभव का प्रतीक है, अपनी कमाई को आप ही खाते रहने वाले अनुदार स्वार्थी को शास्त्रकारों ने ‘चोर’ कहा है। उपार्जन को अपने तथा परिवार के उपयोग भर में सीमित नहीं किया जाना चाहिए वरन् उसमें देश, धर्म, समाज- संस्कृति का भी भाग स्वीकार करना चाहिए। ईश्वर अर्थात् साकार रूप में विराट् विश्व एवं निराकार रूप में सद्भाव, सदुद्देश्य। इनके लिए अपनी कमाई का एक बड़ा भाग नियमित रूप से निकाला जाये, यह अक्षत समर्पण की प्रेरणा है।

(३) पुष्प- अर्थात् खेलने- खिलाने की, हँसने- हँसाने की हल्की- फुल्की जिन्दगी और सत्प्रवृत्ति। हम फूल जैसे कोमल रहें। भीतर और बाहर सर्वांग सुन्दर बनें। इस विश्वोद्यान को शोभायमान बनाने वाला जीवन जियें। अपनी गर्दन नुचवाना और मर्म भेदी हुई सुई को छेदा जाना स्वीकार करके प्रभु के गले का हार बनने की आकांक्षा रखें।

(४) दीपक- स्नेह से, चिकनाई से भरा- पूरा, स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देने वाला, ऊपर को उठती हुई ज्योति- दृष्टि ।। इन्हीं विशेषताओं के कारण दीपक को पूजा में स्थान मिला है। जिनके अन्तःकरण में असीम स्नेह, सद्भाव भरा है, जो परमार्थ के लिए बढ़- चढ़कर त्याग, बलिदान कर सकते हैं, कष्ट सह सकते हैं। जिनकी दृष्टि, महत्त्वाकांक्षा ऊर्ध्वगामी हैं, वे उत्कृष्ट आदर्शवादी हैं, वे जीवन- दीप कहे जा सकते हैं। अपने को इसी मार्ग का पथिक बनाकर हम ईश्वर के निकटवर्ती और अनुकम्पा के अधिकारी बन सकते हैं। धूपबत्ती में अग्नि- स्थापना भी प्रकारान्तर से दीपक से दीपक की ही आवश्यकता पूर्ति करती है और यही उसकी प्रेरणा भी है।

(५) चन्दन- वह वृक्ष, जिसका कण- कण सुगन्धित है और जो समीपवर्ती झाड़- झंखाड़ों को भी सुगन्धित करता है। अपनी शीतलता से साँप, बिच्छू जैसे विष- वंश वालों तक को शान्ति प्रदान करता है। कहते हैं चन्दन वृक्ष पर लिपटे हुए सर्प, बिच्छू शान्ति पाते हैं। उसी छाया में बैठने वाले सुगन्ध भरी शीतलता प्राप्त करते हैं। उसकी लकड़ी काटने, बेचने वाले, पत्थर पर घिसने वाले कष्टदायक लोग भी बदले में प्रतिशोध नहीं, उपकार ही पाते हैं। नष्ट होते- होते भी चन्दन अपनी लकड़ी से भजन करने की माला, हवन सामग्री का चन्दन चूरा आदि दे जाता है। हमारी शक्ति- सामर्थ्य का उपयोग भी इसी प्रकार होना चाहिए।

इसी प्रकार जल- तरलता का प्रतीक, पवित्रता का, मिष्ठान्न मधुर व्यवहार का प्रतीक मानना चाहिए। पूजा सामग्री देखकर मन में यह भाव उठें कि भगवान ऐसे गुणवानों को ही अंगीकार करते हैं। हम भी अपनी विशेषताओं को विकसित करें। सामग्री चढ़ाते हुए अपने श्रेष्ठतम साधनों, प्रवृत्तियों, शक्तियों को प्रभु के लिए, प्रभु कार्य के लिए समर्पित करने का उल्लास जगे तो पूजन- क्रिया सार्थक समझी जायेगी।

आत्म- शोधन में व्यक्तित्व को पवित्र परिष्कृत बनाने का भाव है और देवपूजन में सदुद्देश्यों के लिए अधिकाधिक अनुदान देने का उत्साह उत्पन्न करने का निर्देश है। इन्हें प्रकारान्तर से चरित्र- निष्ठा और समाज- निष्ठा कह सकते हैं। ईश्वर भक्ति, योग साधना की पृष्ठभूमि कह सकते हैं। उसके उपरान्त मन्त्र साधना आरम्भ होती है। मन्त्र- साधना के दो भाग हैं (१) जप (२) ध्यान। इन दोनों का साथ- साथ समन्वय करके चलना पड़ता है।

जप- प्रक्रिया में गायत्री मन्त्र की बार- बार पुनरावृत्ति एक क्रम- बद्ध प्रक्रिया के आधार पर करनी होती है। जिस तथ्य पर मन को सघन करना होता है, तो उसको उच्चारण क्रिया अथवा ध्यान के माध्यम से बार- बार दुहराने की आवश्यकता पड़ती है, इसी उपाय से उन तथ्यों को मन की पृष्ठभूमि पर सघन होने का अवसर मिलता है। बच्चों को प्राथमिक कक्षा में प्रायः इसी आधार पर अपनी पढ़ाई आरम्भ करनी होती है। वे वर्णमाला अथवा गिनती पहाड़े  बार- बार दुहराते- रटते हैं। तभी उनके स्मृति- पटल पर वह बातें स्थान जमा पाती हैं। संगीत शिक्षा में आरम्भ से अन्त तक दुहराने की प्रक्रिया चलती रहती है। फौजी सैनिकों को कदम मिला कर चलने से लेकर थोड़े से ही अभ्यासों को आये दिन दुहराना पड़ता है। इष्ट के साथ एकाकार होने के लिए उस महान गरिमा के अन्तःकरण पर दृढ़ता पूर्वक जमाने के लिए भी उसका नामोच्चार बार- बार करना होता है। खोये हुए को पुकारने के लिए बार- बार नाम लेना होता पड़ता है। भगवान राम वनवास में सीता को खोजते हुए उनका नाम जोर- जोर से लेकर पुकारते हैं। बिल्ली, लोमड़ी गाय के बच्चे जब इधर- उधर भटक जाती हैं, तो बार- बार आवाज देकर अपनी उपस्थिति का परिचय देती हैं और उन्हें बुलाती हैं। मनुष्य से उसका लक्ष्य- इष्ट स्वरूप छूट गया है। इसके बिना वह मणिहीन सर्प की तरह बिलखता है। ग्राह के चंगुल में फंसे हुए गज ने भगवान को अनेक नाम लेकर उन्हें पुकारा और बुलाया था। जप में बार- बार भगवान की रट लगाई जाती है और प्यासा पपीहा जिस तरह पिऊ- पिऊ पुकारता है, उसी प्रकार भगवान को, इष्ट को दूरी समीप करके निकट बुलाने का आह्वान किया जाता है।

चेतना पर संस्कार डालना कठिन है। कठिन और कठोर कार्यों को धीरे- धीरे घिस- घिस कर, रगड़- रगड़ कर ही पूरा किया जाता है। स्नान, हाथ- मुँह धोना, बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना, कपड़े धोना जैसे कार्य बार- बार रगड़ने घिसने से ही पूरे होते हैं। पॉलिश किसी पर भी किसी प्रकार की भी करनी हो, उसमें घिसाई आवश्यक होती है। आरी से काटने में भी घिसना पड़ता है। रस्सी को रगड़ने से पत्थर पर निशान बनता है और कठोर मनोभूमि पर सुसंस्कार डालने के लिए रगड़ का अभ्यास करना पड़ता है। नाम- जप से यही प्रयोजन पूरा होता है।

विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि ताप की तरह ही शब्द में भी एक प्रचण्ड शक्ति है। इन दिनों श्रवणातीत ध्वनियों से ऐसे काम लिये जा रहे हैं, जो प्रचण्ड ऊर्जा के लिए प्रयुक्त होने वाले करोड़ों रुपये मूल्य के विलक्षण यन्त्रों से भी संभव नहीं हो पाते ।। मन्त्र विद्या में शब्द विज्ञान के अत्यन्त सूक्ष्म रहस्यों का समन्वय है। उनके शब्दों का गुंथन, तत्त्ववेत्ताओं ने इस प्रकार किया है कि नियत क्रम, नियत लय- ताल के अनुसार यदि उनकी पुनरावृत्ति की जाती रहे, तो उससे एक अदृश्य शब्द- चक्र बनता है। इसका उल्लेख चक्र सुदर्शन के रूप में हुआ है। अभीष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यह ब्रह्मास्त्र रचनात्मक और ध्वंसात्मक दोनों ही कार्य पूरे करता है। टाइप राइटर की कुंजी दबाने से तीली उठती है दूसरी जगह कागज छाप देती है। इसी प्रकार मन्त्रों के शब्दोच्चार से शरीर के स्थूल और सूक्ष्म अवयवों में विशिष्ट हलचलें उत्पन्न होती हैं और उससे कई अति महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ जाग्रत होने के फलस्वरूप प्रत्यक्ष जीव में कई प्रकार की सुविधाएँ उत्पन्न होती और सफलताएँ मिलती देखी जाती हैं। जप- विज्ञान के पीछे ऐसे अनेकों कारण हैं, जिससे उस प्रयोजन में लगे हुए साधक का श्रम अन्य कार्यों में लगने की अपेक्षा प्रत्यक्ष और परोक्ष परिणाम में दृष्टि से कहीं अधिक सफल रहता है।

जप के साथ ध्यान भी आवश्यक है, जिस उद्देश्य के लिए जप किया जा रहा है, उसमें जीभ ही नहीं मन की एकाग्रता भी नियोजित होती रहे। जिस भी काम में शरीर और मन दोनों का समन्वय होता है, उसी में सफलता की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। मात्र जप करते रहा जाये और मन खाली रहे तो वह इधर- उधर भागता रहेगा। फलतः उपासना में न तो रस मिलेगा और न सफलता का सुयोग बनेगा ।।

मनःशक्ति प्रचण्ड है। बिखराव में वह नष्ट होती रहती है। यदि ध्यान द्वारा उसे एक- एक केन्द्र पर इकट्ठा कर लिया जाये तो उसका प्रभाव परिणाम चमत्कारी होता है। सूर्य की किरणें आतिशी शीशी के माध्यम से इकट्ठी कर ली जायें, तो आग जलने लगेगी। बिखरी बारूद को जला देने से थोड़ी सी चमक भर उत्पन्न होती है, पर यदि उसे बन्दूक में भर कर एक ही दिशा में नियोजित किया जाये तो वह निशाना बेधती हुई पार निकल जाती है। भाप ऐसे ही बेकार उड़ती रहती है। किन्तु उसकी थोड़ी सी मात्रा भी एक केन्द्र पर लगा दी जाये तो उससे रेलगाड़ी के इंजन हजारों टन माल लेकर द्रुत गति से दौड़ने लगते हैं। मनःशक्ति बारूद भाप, धूप आदि सबसे प्रचण्ड है, उसे ध्यान द्वारा एकाग्र करके भौतिक अथवा आत्मिक प्रयोजनों में लगाने से आशाजनक सफलताओं के नये- नये आधार बन जाते हैं। मनुष्य क आस्था अपने श्रद्धा- विश्वास के सहारे कई दिव्य सत्ताओं का सृजन कर सकती है और उसकी हलचलें उतनी ही सामर्थ्यवान हो सकती है, जितनी कि श्रद्धा की गहराई। अपने भक्तों की उनके उपास्य ने जो असाधारण सहायताएँ की हैं और चमत्कार दिखाये हैं, इनमें देवताओं का स्वतंत्र अस्तित्व बल एवं उपासनात्मक विधि- विधानों का अन्तर नहीं, साधक के व्यक्तित्व की पवित्रता एवं उपास्य के प्रति गहन श्रद्धा को ही आधारभूत कारण मानना चाहिए। प्रतीक- उपासना से सभी प्रयोजन की पूर्ति करनी होती है। ध्यान- साधना भी इसी प्रयोजन को पूरा करती है।

उपासक निराकार साधना हो अथवा साकार की उपासना करता हो, उसे अनिवार्य रूप से ध्यान का अवलंबन लेना ही पड़ेगा। निराकारवादी अन्तर्मुखी होकर दिव्य ज्योति के रूप में परमात्म सत्ता का दर्शन करते हैं। आमतौर से यह छोटा- बड़ा प्रकाश बिन्दु ही होता है, उसे सूर्य का प्रतीक मानते हैं। वस्तुतः यह ज्ञान ज्योति है, मात्र चमक या गर्मी नहीं। अध्यात्म साधना में अग्निपिण्ड सूर्य की प्रतिमा भर माना गया है। उसकी मूल सत्ता ज्ञान भर कही गई है। निराकार पूजा तत्त्व का साकार रूप सविता है। सविता अर्थात् सद्ज्ञान को अन्तःकरण में आलोकित करने वाला प्रकाशवान परब्रह्म ध्यान करते समय सूर्य छवि पर एकाग्रता तो करनी चाहिए पर साथ ही यह ध्यान रखना चाहिए कि यह दिव्य आलोक का, सद्ज्ञान रूपी प्रकाश का प्रतीक मात्र है। मात्र जड़ पिण्ड नहीं।

सूर्य पर ध्यान करते हुए अनुभूति की जाती है कि वह आलोक साधक के शरीर, मन और अन्तरात्मा में- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में सक्रियता, सद्ज्ञान एवं सद्भाव बनकर प्रकाशवान हुआ भी अनुभव किया जाता है। इस प्रकार सूर्य को न केवल आलोक प्रदर्शन की दिव्य प्रक्रिया मात्र मानकर बात समाप्त कर दी जाती है, वरन् उसकी आभा से आत्मसत्ता को पूरी तरह वर्तमान स्थिति में देखने की आस्था भर है। यह जितनी ही गहरी होगी, उसी अनुपात में साधक को लाभ मिलता चला जायेगा।

साकार उपासना में नर और नारी की दोनों ही आकृतियों में परब्रह्म की प्रतिमा बनाई जाती रही हैं। दोनों को पवित्रता, कोमलता, उदारता, सेवा- स्नेह, वात्सल्य जैसी दिव्य भावनाओं के आधार पर देखना हो तो नारी की गरिमा अधिक बैठती है। नारी दानी है, और नर उपकृत। ईश्वर की प्रतिमा को किस रूप में माना जाये? इस दृष्टि से विवेक का सहज झुकाव नारी के पक्ष में जाता है। पुरुष की अपनी विशेषतायें हैं, उसमें पुरुषार्थ, पराक्रम की प्रधानता है। यह गुण भौतिक सफलताओं में अधिक और आत्मिक प्रगति में कम काम आता है। अधिक अच्छा यही लगता है कि परब्रह्म को नारी रूप में मातृ सत्ता का प्रतीक मानकर चला जाये।

गायत्री माता के रूम में परब्रह्म की स्थापना सर्वोपयोगी है। उसके सान्निध्य में, माता की गोदी में खेलने को मिलने वाले बालक वात्सल्य एवं पय- पान जैसे सूक्ष्म- स्थूल लाभों की अनुभूति होती है। नारी के प्रति अचिन्त्य- चिन्तन का जो प्रवाह इन दिनों चल पड़ा है, उसे रोकने और भाव भरी दिव्य श्रद्धा की प्रतिमा उसे मानने की ,, जन चेतना उत्पन्न करने की दृष्टि से भी यह स्थापना उपयोगी अतीव है। मानवता की, सद्बुद्धि की प्रतिमा भी उसे माना जा सकता है।

गायत्री माता का वाहन हंस माना गया है। हंस अर्थात् स्वच्छ कलेवर, नीर- क्षीर विवेक का प्रतिनिधि, मोती चुगने या लंघन करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ। यह गुण हंस पक्षी में नहीं होते, यह परिभाषा आध्यात्मिक हंस की है कि परमात्मा की दिव्य शक्ति को धारण करने के लिए साधक को अपनी उत्कृष्टता हंस स्तर की विकसित करनी चाहिए। उस क्रियात्मक स्थूल जीवन में धर्मपरायण, विचारात्मक सूक्ष्म जीवन में विवेकवान् और आस्था परक अन्तःप्रदेश में सद्भाव सम्पन्न होना चाहिए। व्यक्तित्व के इस समग्र परिष्कार के साथ ही ईश्वरीय दिव्य शक्ति के अवतरण की संभावना जुड़ी हुई है।

आद्यशक्ति गायत्री माता की अथवा अपने विश्वास के आधार पर कोई अन्य प्रतिमा- एक छोटे किन्तु सुसज्जित सिंहासन पर स्थापित रहनी चाहिए। जब भी पूजा करनी हो, तब उसी के सामने बैठ कर करनी चाहिए। जिस स्थान पर जो कार्य बहुत समय तक किया जाता रहता है, वहाँ अनायास ही ऐसी विशेषता उत्पन्न हो जाती है जिससे प्रेरित होकर उन कार्यों की पुनरावृत्ति के लिए मन चलने लगता है। चाहे जहाँ, चाहे जब बैठकर भजन करने पर मन लगा लेना कठिन है, पर नियत स्थान पर, नियत समय पर पूजा स्थल पर बैठते ही मन स्वभावतः उन अभ्यस्त क्रियाओं को स्वेच्छापूर्वक दुहराने लग जायगा- इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए नियत स्थान पर पूजा कक्ष स्थापित करना और नियत समय पर नियत विधि से उपासना कृत्य को क्रियान्वित करना ही उपयुक्त रहता है।

उपासना का अनिवार्य अंग ध्यान है। जप के साथ उसका जुड़ा रहना नितान्त आवश्यक है। अन्यथा मन यहाँ- वहाँ भागता रहेगा।

उपासना के समय सांसारिक विचार न आये इसका एक ही उपाय है कि उन क्षणों के लिए निर्धारित विचार पद्धति सामने रहे। वह भी दृश्य मुक्त आकर्षक स्तर की ऐसी हो जो मन को अपने शिकंजे में पकड़े रहे, यों वैज्ञानिक जैसे गहरे चिन्तन से भी हो सकता है, पर वैसा बहुत समय के अभ्यास और एकाग्र स्तर मिल जा




आत्मिक प्रगति के दो प्रधान आधार - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस का शुभारम्भ करते हुए भवानी और शंकर की वन्दना की है। ये दोनों क्या हैं, इसका स्पष्टीकरण करते हुए उन्होंने कहा है- ‘भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ’ ।। भवानी को उन्होंने श्रद्धा और शंकर को विश्वास के रूप में उल्लेख किया है। बात सोलह आने सच है। भवानी और शंकर में जो शक्ति हो सकती है, वह सारी की सारी- ज्यों की त्यों- श्रद्धा और विश्वास में विद्यमान है। अध्यात्म तत्त्व- ज्ञान का सारा आधार इन्हीं दोनों पर है। दृश्य जगत् के आधार पंचतत्त्व हैं।

दिखाई देने वाले समस्त जड़ पदार्थ- मिट्टी, पानी, हवा, गर्मी और प्रकाश द्वारा विभिन्न वस्तुएँ उत्पन्न होतीं, बढ़तीं और जराजीर्ण होकर नष्ट होती हैं, उसी प्रकार श्रद्धा विश्वास के आधार पर भावनाओं का निर्माण होता है। यह भावनाएँ और मान्यताएँ ही चेतन जगत् में विविध- विधि सृजनात्मक ताने- बाने बुनती हैं। श्रद्धा और विश्वास अपने आप में इस दृष्टि के महत्तम शक्ति- स्रोत हैं। इन्हीं के आधार पर व्यक्ति और पदार्थों के साथ हमारे सम्बन्ध जुड़े हुए हैं। आशा और उत्साह इन्हीं पर निर्भर है। भविष्य का निर्माण और निर्धारण इन्हीं के आधार पर सम्भव होता है। यदि यह दोनों तत्त्व चेतना क्षेत्र से अलग हटा दिये जायें तो फिर यह जीवन- जीवन कहलाने योग्य ही न रह जायेगा।

श्रद्धा, कल्पना को नहीं, उस मान्यता, आस्था एवं दृष्टि को कहते हैं, जो आत्मानुभूति जैसे खरे आधार पर प्रमाणित होती है और जिसके असंख्य प्रमाण सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक के इतिहास में पग- पग पर भरे पड़े हैं। श्रद्धा एक सजीव शक्ति है जिसका आरोपण जहाँ भी किया जाये वही अभिनव चेतना उपज पड़ती है ।। आग को जिस वस्तु में भी लगा दिया जाये वही गरम और चमकीली हो जाती है। श्रद्धा का आरोपण जिस भी व्यक्ति अथवा पदार्थ पर किया जाये, वह दूसरों के लिए न सही उस आरोपण करने वाले के लिए तो दिव्य सत्ता से परिपूर्ण बन ही जाता है। देव आस्था का यही स्वरूप है।

निर्जीव प्रतिमाओं को देव भाव से देखने पर उनमें सचमुच देवत्व उत्पन्न हो जाता है और वे उस श्रद्धालु के लिये उसकी श्रद्धा के अनुरूप फल देने लगती हैं। ईश्वर के बारे में निर्धारित हमारी श्रद्धा उसे हमारे सामने ‘भक्त के वश में बने हुए भगवान्’ का एक घटक बना कर प्रस्तुत कर देती है।

श्रद्धा से बनी भूत की कल्पना प्राण- घातक दुष्परिणाम उत्पन्न करती है। भय और आकांक्षाओं से आतंकित लोग अपना अच्छा- खासा स्वास्थ्य खो बैठते हैं। आत्म- विश्वास और मनोबल के आधार पर चमत्कारी प्रतिफल उत्पन्न किये जाते हैं। यह सारे खेल श्रद्धा के ही हैं। साधना के सत्परिणामों की एक विशाल शृंखला है। अगणित साधक, अगणित प्रकार के सत्परिणाम साधना प्रयोगों के आधार पर प्राप्त करते हैं, इसके मूल में उनकी श्रद्धा की शक्ति ही सन्निहित होती है। साधक अपने ही नाम- रूप की साधना करके- अपने ही जैसे एक ‘छाया पुरूष’ निर्मित और सिद्ध कर लेते हैं। यह मनुष्य आकृति का देव बड़े- बड़े अनोखे काम करता है।


यह रचना हमारी श्रद्धा द्वारा ही की गई होती है। अनेक देवताओं का सृजन इसी प्रकार होता है। अन्तःकरण में कौन दिव्य शक्ति कितनी, कहाँ कैसे है यह प्रश्न अलग है। यहाँ तो यह कहा- समझाया जा रहा है कि हमारी श्रद्धा- अपनी सामर्थ्य से, अपनी मान्यता, आकृति, रुचि और प्रयोजन का एक स्वतन्त्र देव विनिर्मित कर सकती है। यह देवता उतने ही समर्थ होते हैं, जितनी हमारी श्रद्धा उन्हें बल प्रदान करती है। दुर्बल श्रद्धा से बने देव केवल आकृति मात्र का दर्शन देने में समर्थ होते हैं । वे कुछ अधिक सहायता नहीं कर सकते। पर जिनकी श्रद्धा प्रबल है, उनके देव भी अद्भुत पराक्रम करते देखे जाते हैं।

श्रद्धा और विश्वास का सम्बल लेकर ही हमें अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिये ‘‘ ईश्वर है- उसकी सत्ता विद्यमान है- उसका सान्निध्य प्राप्त किया जा सकता है और उसका प्रकाश मिल सकता है’’ यह विश्वास जितना ही प्रखर एवं स्पष्ट होगा उतना ही सफलता हमारी साधना प्रस्तुत करेगी। कितना जप करने से कितने दिन में, ईश्वर की कितनी कृपा मिल सकती है? इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व यह भी जानना होगा कि साधक की श्रद्धा में कितनी प्रखरता है? यदि अश्रद्धा और अविश्वास से, उदास मन से बेगार भुगतने की तरह कुछ पूजा- पाठ किया जा रहा है तो उसका परिणाम भी लँगड़े- लूले जैसा होगा। बहुत दिन में थोड़ा- सा लाभ दिखाई देगा। छोटे से दीपक की लौ से जल पात्र बहुत देर में गरम होगा, किन्तु यदि आग तीव्र हो तो थोड़ी ही देर में पानी खौलने लगेगा। उपासना का क्रिया- कृत्य पूरा कर लेना अभीष्ट परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकता। आवश्यकता श्रद्धा के समन्वय की भी है। यह समावेश जितना अधिक और जितना प्रखर होगा, सत्परिणाम उतनी ही बड़ी मात्रा में और उतना ही शीघ्र दृष्टिगोचर होगा।




उपासना , विधान और तत्त्वदर्शन - गायत्री उपासना अनिवार्य है - आवश्यक है

सामान्य विधि- विधान में गायत्री मंत्र का ऊँ कार, व्याहृति समेत त्रिपदा गायत्री का जप ही शान्त- एकाग्रमन  से करने पर अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति हो जाती है। जप के साथ ध्यान भी अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है। गायत्री का देवता सविता है। सविता प्रातःकाल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य को कहते हैं। यही ध्यान गायत्री जप के साथ किया जाता है, साथ ही यह अभिव्यक्ति भी उजागर करनी होती है कि सविता की स्वर्णिम किरणें अपने शरीर में प्रवेश करके ओजस मनःक्षेत्र में प्रवेश करके तेजस और अन्तःकरण तक पहुँचकर वर्चस् की गहन स्थापना कर रही है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को समर्थता, पवित्रता और प्रखरता से सराबोर कर रही हैं। यह मान्यता मात्र भावना बनकर ही नहीं रह जाती, वरन् अपनी फलित होने वाली प्रक्रिया का भी परिचय देती है। गायत्री की सही साधना करने वालों में ये तीनों विशेषताएँ प्रस्फुटित होती देखी जाती हैं।

शुद्ध स्थान पर, शुद्ध उपकरणों का प्रयोग करते हुए, शुद्ध शरीर से गायत्री उपासना के लिए बैठा जाता है। यह इसलिए कि अध्यात्म प्रयोजनों में सर्वतोमुखी शुद्धता का संचय आवश्यक है। उपासना के समय एक छोटा जल- पात्र कलश के रूप में और यज्ञ की धूपबत्ती या दीपक के रूप में पूजा चौकी पर स्थापित करने का अर्थ है अग्नि को अपना इष्ट मानना ।। तेजस्विता, साहसिकता और आत्मीयता जैसे गुणों से अपने मानस को ओतप्रोत करना। जल का अर्थ है शीतलता, शान्ति, नीचे की ओर ढलना अर्थात् नम्रता का वरण करना।

पूजा चौकी पर साकार उपासना वाले गायत्री माता की प्रतिमा रखते हैं। निराकार में वही काम सूर्य का चित्र अथवा दीपक, अग्नि रखने से चल जाता है। पूजा के समय धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प आदि का प्रयोग करना होता है। यह सब भी किन्हीं आदर्शों के प्रतीक हैं। अक्षत अर्थात् अपनी कमाई का एक अंश भगवान के लिए अर्पित करते रहना। दीपक अर्थात् स्वयं जल कर दूसरों के लिए प्रकाश उत्पन्न करना। पुष्प शोभायमान भी होते हैं और सुगंधित भी। मनुष्य को भी अपना जीवनयापन इसी प्रकार करना चाहिए। पंचोपचार की पूजा- सामग्री इसलिए समर्पित नहीं की जाती कि भगवान को उनकी आवश्यकता है, वरन् उसका प्रयोजन यह है कि दिव्य सत्ता यह अनुभव करे कि साधक यदि सच्च हो, तो उसकी भक्ति- भावना में इन सद्गुणों का जुड़ा रहना अनिवार्य स्तर का होना चाहिए।

उपचार सामग्री यदि न हो, तो सब कुछ ध्यान रूप में मानसिक स्तर पर किया जा सकता है। जिस प्रकार बड़े आकार वाले यज्ञ प्रक्रिया को छोटे दीपयज्ञों के रूप में सिकोड़ लिया गया है उसी प्रकार कर्मकाण्ड सहित पूजा- उपचार को मात्र भावना स्तर पर मानसिक कल्पनाओं पर किया जा सकता है। रास्ते चलते, काम- धाम करते, लेटे- लेटे भी गायत्री उपासना कर लेने की परम्परा है, पर यह सब होना चाहिए भाव संवेदनापूर्वक मात्र कल्पना कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। 

गायत्री अनुष्ठानों की भी एक परम्परा है। नौ दिन में चौबीस हजार जप का विधान है, जिसे प्रायः अश्विन या चैत्र की नवरात्रियों में किया जाता है, पर उसे अपनी सुविधानुसार कभी भी किया जा सकता है इसमें प्रतिदिन २७ मालाएँ पूरी करनी पड़ती हैं और अंत में यज्ञ- अग्निहोत्र सम्पन्न करने का विधान है। 

सवालक्ष अनुष्ठान चालीस दिन में पूरा होता है, उसमें ३१ मालाएँ प्रतिदिन करनी पड़ती हैं। उसके लिए महीने की पूर्णिमा के आरंभ या अन्त को चुना जा सकता है। सबसे बड़ा अनुष्ठान २४ लक्ष जप का होता है, जिसे प्रायः एक वर्ष में पूरा किया जाता है।