उच्चस्तरीय साधना और उसकी सिद्धि - गायत्री साधना के दो स्तर
ज्वलन्त अंगार जब ठण्डा होने लगता है तो उसका ऊपरी पर्त भस्म
बनकर आवरण जैसा चढ़ जाता है। जब इस आवरण को स्पर्श करते हैं
तो अंगार न तो गरम मालूम पड़ता है और न प्रकाशवान। ऐसी स्थिति
में यह पहचानना भी कठिन होता है कि इसके भीतर अभी अग्नि का
अंश है भी या नहीं। पर जब उस भस्म आवरण को हटा दिया जाता है
तो भीतर छिपी हुई अग्नि पुनः प्रकट हो जाती है और उसकी गर्मी
तथा रोशनी पुनः पूर्ववत् दिखाई पड़ने लगती है। यही बात हमारी
आत्मिक स्थिति पर लागू होती है। परमात्मा का अंश होने के कारण
आत्मा में वे सब शक्तियाँ और विशेषतायें
बीज रूप से मौजूद रहती हैं जो परमात्मा से भरी होती हैं।
किन्तु मल- विक्षेपों के आवरण जब उस पर चढ़ जाते हैं तो उसकी
स्थिति भी भस्म से ढँके
हुए अंगार जैसी बन जाती है। माया बद्ध जीव की स्थिति बड़ी
दीन- हीन और दयनीय दिखाई पड़ती है। दुःख- दारिद्र के रोग शोक के,
अभाव अज्ञान के, व्यथा वेदना के, कष्ट- क्लेशों में ऐसा ग्रसित
रहता है कि विश्वास करना कठिन हो जाता है कि ऐसी दयनीय स्थिति
में पड़ा हुआ मानव प्राणी भला सत- चित आनन्द स्वरूप परमात्मा का
अंश भी हो सकता है? ठण्डी भस्म का आवरण छूकर और उसकी कालिमा
देखकर यह मानना कठिन होता है कि इसके भीतर ज्वलन्त अग्नि- पुंज
भी छिपा होगा।
आत्मा अपनी स्वाभाविक स्थिति में हो, उसके आवरण हट जायें तो
उसकी स्थिति इतनी उत्कृष्ट होती है कि हर क्षण अनन्त -आनन्द का
रसास्वादन करने का सौभाग्य उसे उपलब्ध रहता है। इसी स्थिति को
प्राप्त करना अध्यात्मिक साधना का लक्ष्य है। इस मार्ग को अवरुद्ध
करने वाले वे मल- विक्षेप और आवरण ही हैं जिनके कारण महान सम्भावनायें
साथ लेकर आया हुआ आत्मा इन तुच्छ परिस्थितियों में पड़े रहने
के लिए विवश होता है। मानव शरीर ही इन आवरणों की सफाई कर लेने
का एकमात्र अवसर है। यदि यह ऐसे ही बर्बाद होता चला गया या
कुविचारों और कुकर्मों में मस्त रहकर उन आवरणों को और भी बढ़ा
लिया गया तो फिर चौरासी लाख योनियों की लम्बी अवधि तक उसी भार
से दबा पड़ा रहना पड़ता है।
इन आवरणों की सफाई में दुहरा लाभ है जहाँ मलीनता हटने से
आत्मा पर चढ़ा हुआ भार हल्का होते चलने से अन्तःकरण में शान्ति
और प्रफुल्लता बढ़ती है वहाँ इन आवरण द्वारों के खुलने पर
विभूतियों का एक विशिष्ट भाण्डागार उपलब्ध होता चलता है। पाँच
आवरणों को ही पाँच कोश कहते हैं इन द्वारों के खोलने की
वैज्ञानिक विधि का नाम पंचकोशी गायत्री साधना अथवा पंचमुखी
गायत्री उपासना है। उच्च कक्षा में प्रवेश करने वाले साधकों के
लिए इसी आराधना का प्रयोग करना पड़ता है। प्रथम स्तरीय साधना का
अधिकांश कार्यक्रम स्थूल वस्तुओं, स्थूल विधि- विधानों पर निर्भर
है। माला, आसन, पंचपात्र, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प अक्षत, चित्र, मूर्ति,
हवन सामग्री, मन्त्रोच्चारण, व्रत- उपवास, पाठ कीर्तन, अनुष्ठान,
ब्रह्मभोज, तर्पण मार्जन आदि यह सभी कुछ स्थूल आधार हैं। इसे
साकार उपासना कह सकते हैं। प्रथम कक्षा के लिए यह सब कुछ आवश्यक
ही नहीं अनिवार्य भी है। इस आधार के बिना ऊपर की कक्षा में
प्रवेश कर सकना उसी प्रकार सम्भव नहीं जिस प्रकार सीढ़ी या जीने
की सहायता के बिना छलांग मार कर छत पर चढ़ जाना कठिन होता
है। स्कूल की पढ़ाई की उपेक्षा करके सीधे कॉलेज में प्रवेश नहीं
मिलता, उसी प्रकार प्रथम स्तरीय स्थूल विधि व्यवस्था के आधार पर
बनी हुई साकार उपासना के बिना उच्चस्तरीय निराकार साधना में
सफलता प्राप्त कर सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता।
उच्च स्तरीय गायत्री उपासना में वस्तुओं, उपकरणों और विधानों का
तारतम्य घटने लगता है और ध्यान भावना एवं निष्ठा में तीव्र गति
से अभिवृद्धि होने लगती है। यह उपासना बिना किसी वस्तु के भी
हो सकती है। एकान्त निर्जन वनों में रहकर घोर तपस्या करने वाले
साधकों के लिए अन्न और वस्त्र उपलब्ध नहीं होता तो धूप दीप की,
हवन ब्रह्मभोज की व्यवस्था कहाँ से बनेगी? सच बात यह है कि तब
उन्हें इनमें से किसी भी उपकरण की आवश्यकता नहीं रह जाती, वे
आत्मा की अग्नि में प्राण को हवि बनाकर निरन्तर अखण्ड यज्ञ करते
रहते हैं। गायत्री चालीसा में "हंसारूढ़ सितम्बर धारी" पद में
जिस हंसवाहिनी और श्वेत वस्त्र धारिणी गायत्री माता का उल्लेख
हुआ है उसका स्वरूप उच्चस्तरीय साधना में कुछ और ही हो जाता
है।
श्वास, प्रश्वास क्रिया के साथ 'सोऽहम्' की ध्वनि होती है उसे ही
हंसयोग
कहते हैं। यह हंस अर्थात सोऽहम् तत्व ही गायत्री का वाहन बन
जाता है। माला का स्थान यह श्वास प्रक्रिया ले लेती है। इडा,
पिंगला, चन्द्र, सूर्य नाड़ियों का आरोहण, अवरोहण माला फेरने का काम
करता है
५४ ग्रन्थियाँ आरोहण की और
५४ अवरोहण की मिलकर
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दाने की यह सूक्ष्म चक्र सारिणी घूमने लगती है। सुषुम्ना को
सुमेरु कहते हैं। माला में एक मध्य बिन्दु बड़ा दाना रहता है,
जिसे सुमेरु के नाम से सम्बोधित करते हैं। अध्यात्मिक माला में
सुषुम्ना नाड़ी का वही स्वरूप और स्थान बन जाता है। यह सोऽहम्
संस्थान उच्चस्तरीय साधना में गायत्री माता का हंस वाहन बन जाता
है। इस माला पर वे विहार और विचरण करने लगती हैं। इसी वीणा में
उनकी झंकार उठने लगती है और इसी स्थल से नीर- क्षीर विवेक का
हंस- गुण साधक की अन्तरात्मा में उत्पन्न होने लगता है।
श्वेत वस्त्र धारिणी गायत्री माता का हम पूजन करते हैं। 'सूर्य मण्डल
मध्यस्था'
की छवि बनाकर उसे सूर्य प्रकाश के बीच बैठी हुई प्रतिमा मानकर
उसकी प्रतिष्ठा करते हैं। पर उच्चस्तरीय साधनों में माता का पूरा
आवरण इस शुभ्र ज्योति के स्वरूप में ही परिलक्षित होता है।
प्रकाश पुंज के रूप में ही गायत्री माता का दर्शन ध्यान और
साक्षात्कार हो जाता है। जिस प्रकार प्रथम स्तर के साधकों को
हंसारूढ़ गायत्री माता का नारी देह में दर्शन साक्षात्कार,
जगृति,
स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में होता रहता है उसी प्रकार उच्च
भूमिका के साधक को प्रकाश की छोटी- छोटी चिनगारियों के रूप में,
किरणों के रूप में और तेजस्वी ज्योति पिण्ड के रूप में दर्शन
एवं साक्षात्कार होता है। स्तर बदलने के साथ साधनों एवं उपकरणों
की
श्रृंखला भी बदल जाती है। स्कूल की प्रारम्भिक कक्षाओं में लकड़ी की तख्ती पर खड़िया और
मोटी कलम से बड़े- बड़े अक्षर लिखने का अभ्यास करना पड़ता है पर आगे अक्षर कापी और
फाउन्टेन पेन के माध्यम से लिखने की क्रिया सम्पन्न होती है।
साधन क्षेत्र में भी ऐसे परिवर्तन का होना कोई आश्चर्य, विरोध
या मतभेद की बात नहीं, वरन एक स्वाभाविक विकास क्रम है। भारतीय
धर्म में साकार और निराकार की जो द्विधा
परम्परायें
चली आ रही हैं इनमें न तो कोई विरोध है और न विभ्रम। दोनों
ही एक दूसरे के पूरक हैं। अपने- अपने स्थान पर दोनों ही उपयुक्त
हैं और आवश्यक भी। पंचकोशी गायत्री उपासना का विधान क्रम निराकार
उपासना जैसा ही है। इसीलिए पंचमुखी गायत्री को अलंकारिक रूप से
चित्रित तो करते हैं, पर पूजा के लिए मुखी गायत्री की तस्वीरें
तथा मूर्तियाँ ही प्रयुक्त होती हैं। इस उद्देश्य के लिए पंचमुखी
गायत्री का प्रयोग नहीं होता।
पंचमुखी और दश
भुजी
गायत्री की विवेचना करते हुए आगे विस्तारपूर्वक यह बताया गया
है कि अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश और
आनन्दमय कोश यही पाँच गायत्री के पाँच मुख हैं। इन कोशों में
छिपी हुई अन्यान्य महत्त्वपूर्ण शक्तियों को विकसित करना और उन
आवरणों का परिमार्जन करके आत्म- शान्ति का रसास्वादन करना पंचकोशी
आराधना का प्रधान उद्देश्य है। प्रथम स्तरीय उपासना में लौकिक
लाभों का मार्ग प्रशस्त होता है।
१- सद्ज्ञान,
२- स्वास्थ्य सुधार,
३- उत्साह एवं स्फूर्ति,
४- सहयोग एवं मित्रता की अभिवृद्धि,
५- अभावों की पूर्ति, यह पाँच लाभ और भी उच्चकोटि के हो जाते हैं। (
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साहस एवं तृप्ति यह पाँच सिद्धियाँ पंचकोशी साधना की हैं। जैसे
नर- नारी का जोड़ा होता है वैसे ही दो- दो सद्गुणों का यह जोड़ा
दस की संख्या में हो जाता है। इन्हें पंचमुखी गायत्री की दस
भुजायें
अथवा दस सिद्धियाँ कह सकते हैं। इस विज्ञान का विशद शिक्षण युग
गायत्री के अगले अंकों में क्रमशः किया जाता रहेगा।
गुणों की अभिवृद्धि पर सम्पदाओं और विभूतियों की उत्पत्ति एवं
अभिवृद्धि निर्भर रहती है। जिस प्रकार बिना जड़ का पौधा देर तक
खड़ा नहीं रह सकता, उसी प्रकार योग्यता और प्रतिभा न होने पर
अनायास कोई सम्पदा मिल भी जाय तो देर तक ठहर नहीं पाती। जड़
मजबूत होने पर ऊपर की टहनी कट जाने पर भी उसकी शाखायें फूट
आती हैं उसी प्रकार यदि सद्गुणों की जड़ मनोभूमि में मजबूती से
जमी हुई हो तो किन्हीं आकस्मिक कारणों से दरिद्रता एवं विपत्ति
सामने आ जाने पर भी वे ठहर नहीं पातीं और कोई नई सुविधा
उत्पन्न होकर उस अभाव की पूर्ति कर देती है। गायत्री उपासना से
प्रत्यक्षतः तो किसी को छप्पर फाड़कर सम्पदा नहीं मिलती, पर साधक
के अन्दर वे तत्व विकसित हो जाते हैं जिनके साथ अनेक प्रकार
की सुख
संपदायें
जुड़ी रहती हैं। वर्षा होते ही हरियाली उग आती है और कीट-
पतंगों की अजस्र उत्पत्ति होने लगती है। मानवोचित सद्गुणों का
विकास होने के साथ- साथ वे मंगलमयी सुख
सुविधायें, समृद्धियाँ और
विभूतियां
सामने आ जाती हैं जिनके लिए आमतौर से लोग तरसते रहते हैं और
जिनकी उपलब्धि को कोई दैवी वरदान चमत्कार माना जाता है।
मोटे तौर से चमत्कार उन बातों को माना जाता है जो मानव शरीर
की सीमा और सामर्थ्य से बाहर की हैं। हवा में उड़ना, पानी पर
चलना, अदृश्य हो जाना, रूप बदल देना आदि क्रियाओं को किसी समय
सिद्धियाँ कहा जाता था। पर अब विज्ञान की उन्नति के कारण वह
बातें अमुक मशीनों की सहायता से सस्ती और सुलभ हो गई हैं। इसलिए
इन क्षमताओं के प्राप्त कर लेने पर भी कोई विशेष प्रयोजन
सिद्ध नहीं होता। बाजीगरी के अनेकों अचम्भे में डालने वाले खेल
जादूगर लोग दिखाया करते हैं। मैस्मेरिज्म और हिप्नोटिज्म से भी
बहुत मनोरंजक तमाशे होते देखे हैं। कौतूहल उत्पन्न करके अचम्भे
में डालने वाली बातें, इस विज्ञान की उन्नति के युग में जबकि
सौर मण्डल की यात्रा करने के लिए मानव संचालित यान उड़ रहे
हैं, कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती।
एक ही हाइड्रोजन बम से करोड़ों मनुष्यों को पलक मारते नष्ट कर
डालना सम्भव हो गया है तो मारण मोहन उच्चाटन आदि के अभिचार
क्या महत्त्व रखते हैं। यह प्रयोजन तो नशीली चीजों से या मामूली
हथियारों से भी पूरे हो सकते हैं। गायत्री उपासना के द्वारा इस
प्रकार के चमत्कारों की आशा से श्रम करना बालबुद्धि वाले ओछे
स्तर के लोगों के लिए ही सम्भव है। बेशक अनेकों अचम्भे में
डालने वाले काम कर सकना तपस्वी साधकों के लिए सम्भव है, पर उनकी
तुच्छता को समझते हुए उनकी उपेक्षा ही की जाती है।
गायत्री उपासना की उच्च भूमिका में प्रवेश करने का सबसे बड़ा
लाभ आत्मबल की वृद्धि है। आत्मबल की महत्ता संसार के समस्त भौतिक
बल सम्पन्न लोगों से कहीं अधिक होती है। आत्मबल सम्पन्न
व्यक्तियों को ही महापुरुष कहते हैं, नर रत्नों में इन्हीं की
गणना होती है। जमाने को बदल देने की, आत्म- कल्याण की दूसरों का
सच्चा हित साधन कर सकने की अपार क्षमता उनमें होती है। इसी को
सच्ची सिद्धि कहते हैं। उच्चस्तरीय गायत्री उपासना का उपासक दिन-
दिन महानता की ओर तीव्र गति से अग्रसर होने लगता है। वह
सिद्धियाँ और सामर्थ्य उपलब्ध होती हैं। जो न केवल आत्म- कल्याण
वरन भौतिक प्रगति में अत्याधिक सहायक होती हैं।
गायत्री माता की दस भुजायेँ और उनका रहस्य - गायत्री साधना के दो स्तर
गायत्री महाशक्ति के चित्रों में चित्रित पाँच मुखों का तत्व
दर्शन उपर्युक्त पंक्तियों में समझा जा सकता है। अब दस भुजाओं के
रहस्य पर प्रकाश डाला जाता है।
मानव जीवन के दो पहलू हैं - (१) आत्मिक, (२) भौतिक। यह दोनों पक्ष ही गायत्री के दो पार्श्व हैं। दोनों में पाँच- पाँच भुजायें हैं। अर्थात पाँच- पाँच शक्तियाँ सामर्थ्य और विभूतियाँ। अध्यात्मिक दक्षिण पार्श्व की पाँच भुजायें हैं (१) आत्म ज्ञान, (२) आत्म दर्शन, (३) आत्म अनुभव, (४) आत्म लाभ और (५) आत्म कल्याण। भौतिक वाम पार्श्व की पाँच भुजायें (१) स्वास्थ्य (२) सम्पत्ति (३) विद्या (४) कौशल (५)
मैत्री। गायत्री के सच्चे उपासक को यह दस सिद्धियाँ, दस विभूतियाँ
निश्चित रूप से मिलती हैं इन दसों का संक्षिप्त परिचय इस
प्रकार है -
(१) आत्म- ज्ञान
आत्म- ज्ञान का अर्थ अपने को जान लेना, शरीर और आत्मा की
भिन्नता को भली प्रकार समझ लेना और शारीरिक लाभों को आत्म- लाभ
की तुलना में उतना ही महत्त्व देना जितना दिया जाना उचित है।
आत्म- ज्ञान होने से मनुष्य का 'असंयम' दूर हो जाता है। इन्द्रिय
भोगों की लोलुपता के कारण लोगों की शारीरिक और मानसिक शक्तियों
का अनुचित अनावश्यक व्यय होता है जिसमें शरीर असंयमी, दुर्बल,
रोगी, कुरूप एवं जीर्ण हो जाता है। आत्म- ज्ञानी इन्द्रिय भोगों की
उपयोगिता का निर्णय आत्म- लाभ की दृष्टि से करता है इसलिए वह
स्वभावतः संयमी रहता है और शरीर से सम्बन्ध रखने वाले दुःखों से
बचा रहता है, दुर्बलता, रोग एवं कुरूपता का कष्ट उसे नहीं भोगना
पड़ता। जो कष्ट उसे पूर्व प्रारब्ध कर्मों के अनुसार भोगने होते
हैं, वह भी आसानी से भुगत जाते हैं।
(२) आत्म- दर्शन
'आत्म- दर्शन' का तात्पर्य है अपने स्वरूप का साक्षात्कार करना।
साधना द्वारा आत्मा के प्रकाश का जब साक्षात्कार होता है, तब
प्रीति प्रतीत, श्रद्धा- निष्ठा और विश्वास भावना बढ़ती है। कभी
भौतिकवादी, कभी अध्यात्मवादी होने की डाँवाडोल मनोदशा स्थिर हो
जाती है और ऐसे गुण, कर्म, स्वभाव प्रकट होने लगते हैं जो एक
आत्म दृष्टि वाले व्यक्ति के लिए उचित हैं। इस आत्म दर्शन की
द्वितीय भूमिका में पहुँचने पर दूसरों को जानने, समझने उन्हें
प्रभावित करने की सिद्धि मिल जाती है।
जिसे आत्म- दर्शन हुआ है उसकी आत्मिक सूक्ष्मता अधिक व्यापक हो
जाती है, वह संसार के सब शरीरों में अपने को समाया हुआ देखता
है। जैसे अपने मनोभाव, आचरण गुण, स्वभाव, विचार और उद्देश्य अपने को
मालूम होते हैं, वैसे ही दूसरों के भीतर की सब बातें भी अपने
को मालूम हो जाती हैं। साधारण मनुष्य जिस प्रकार अपने शरीर और
मन से काम लेने में समर्थ होते हैं, वैसे ही आत्म- दर्शन करने
वाला मनुष्य, दूसरों के मन और शरीरों पर अधिकार करके उन्हें
प्रभावित कर सकता है।
(३) आत्म- अनुभव
'आत्म- अनुभव' कहते हैं- अपने वास्तविक स्वरूप का क्रियाशील होना,
अपने अध्यात्म ज्ञान के आधार पर ही भावना का होना। आमतौर ज्ञान
के आधार पर ही भावना का होना। आमतौर से लोग मन में विचार तो
बहुत ऊँचे रखते हैं पर बाह्य जीवन में अनेक कारणों से उन्हें
चरितार्थ नहीं कर पाते। उनका व्यावहारिक जीवन गिरी हुई श्रेणी का
होता है किन्तु जिन्हें आत्मानुभव होता है वे भीतर बाहर से एक
होते हैं। उनके विचार और कार्यों में तनिक भी अन्तर नहीं होता।
जो कारण, उच्च जीवन बिताने में सामान्य लोगों को पर्वत के समान
दुर्गम मालूम पड़ते हैं, उन्हें वे एक ठोकर में तोड़ देते है।
उनका जीवन ऋषि जीवन बन जाता है।
आत्म- अनुभव से सूक्ष्म प्रकृति की गतिविधि मालूम करने कि
सिद्धि मिलती है। किसका क्या भविष्य बन रहा है? भूतकाल में कौन
क्या कर रहा था? किस कार्य में दैवी प्रेरणा क्या है? क्या
उपद्रव उत्पन्न होने वाले हैं? लोक- लोकान्तरों में क्या हो रहा
है? कब कहाँ क्या वस्तु उत्पन्न और नष्ट होने साधारण लोग नहीं
जानते उन्हें आत्मानुभव की भूमिका में पहुँचा हुआ व्यक्ति भली
प्रकार जानता है। आरम्भ में उसे ये अनुभव कुछ धुँधले होते हैं,
पर जैसे- जैसे उसकी दिव्य दृष्टि निर्मल होती जाती है सब कुछ चित्रवत् दिखाई देने लगता है।
(४) अत्म- लाभ
'आत्म- लाभ' का अभिप्राय है अपने में पूर्ण आत्म तत्व की
प्रतिष्ठा। जैसे भट्ठी में पड़ा हुआ लोहा तप कर अग्नि वर्ण का
लाल हो जाता है वैसे ही इस भूमिका में पहुँचा हुआ सिद्ध पुरुष
दैवी तेजपुंज
से परिपूर्ण हो जाता है, वह सत की प्रत्यक्ष मूर्ति होती है।
जैसे अंगीठी के निकट बैठने से गर्मी अनुभव होती है वैसे ही ऐसे
महापुरुषों के आस- पास ऐसा सतोगुणी वातावरण छाया रहता है
जिसमें प्रवेश करने वाले साधारण मनुष्य भी शान्ति अनुभव करते
हैं। जैसे वृक्ष की सघन शीतल छाया में, ग्रीष्म की धूप से तपे
हुए लोगों को विश्राम मिलता है उसी प्रकार आत्म- लाभ से
लाभान्वित महापुरुष अनेकों को शान्ति प्रदान करते रहते हैं।
आत्म- लाभ के साथ- साथ आत्मा की, परमात्मा की अनेक दिव्य-
शक्तियों से सम्बन्ध हो जाता है। परमात्मा की एक- एक शक्ति का
प्रतीक एक- एक देवता है। यह देवता अनेक ऋद्धि सिद्धियों का अधिपति
है। यह देवता जैसे विश्व ब्रह्माण्ड में व्यापक है वैसे ही एक
छोटा सा रूप यह पिण्ड देह है। इस पिण्ड देह में जो दैवी
शक्तियों के गुह्य संस्थान हैं वे आत्म- लाभ करने वाले साधक के
लिए प्रकट एवं प्रत्यक्ष हो जाते हैं और उन दैवी शक्तियों से
इच्छानुकूल कार्य ले सकता है।
(५) आत्म- कल्याण
'आत्म- कल्याण' का अर्थ है- जीवन मुक्ति, सहज समाधि, कैवल्य अक्षय आनन्द, ब्रह्म- निर्माण, स्थिति प्रज्ञावस्था,
परमहंस गति ईश्वर प्राप्ति। इस पंचम भूमिका में पहुँचा हुआ साधक
ब्राह्मी भूत होता है। पंचम भूमि में पहुँची हुई आत्मायें
ईश्वर की मानव प्रतिमूर्ति होती हैं। उन्हें देवदूत, अवतार,
पैगम्बर, युग निर्माता, प्रकाश स्तम्भ आदि नामों से पुकारते हैं
उन्हें क्या सिद्धि मिलती है उसके उत्तर में यही कहा जा सकता
है कि कोई चीज ऐसी नहीं जिसके आनन्द के वे स्वामी नहीं होते।
ब्रह्मानन्द, परमानन्द एवं आत्मानन्द से बड़ा और कोई सुख इस
त्रिगुणात्मक प्रकृति में सम्भव नहीं, यही सर्वोच्च लाभ आत्म-
कल्याण की भूमिका में पहुँचे हुए को प्राप्त हो जाता है।
भौतिक पक्ष की पाँच सिद्धियाँ गायत्री माता की पाँच भुजायें भौतिक जीवन की दृष्टि से कम महत्त्व की हैं।
(६) निरोगता
गायत्री उपासक का आहार- विहार संयमित रहता है इसलिए उसे
बीमारी का कष्ट नहीं भोगना पड़ता। नियमितता, निरालस्यता एवं
श्रमशीलता का अभ्यस्त रहने के कारण उसके सारे अवयव क्रियाशील
रहते हैं। किसी अंग या इन्द्रिय का दुरुपयोग करने के स्वभाव होने
का कारण उन सबकी शक्ति चिरकाल तक स्थिर रहती है। रोग, पीड़ा
अकाल मृत्यु का कारण असंयम ही तो है। अध्यात्मिक दृष्टिकोण अपनाने
वाला जब संयम की रीति -नीति अपनावेगा तो फिर उसके शरीर को कष्टों से ग्रसित होने का अवसर ही न आएगा। प्रारब्ध आए तो भी वह अधिक समय ठहरेगा नहीं।
गायत्री उपासना का अपना विशेष सत्परिणाम भी है। रोगग्रस्त शरीर
पीड़ा से व्यथित, असाध्य और कष्टसाध्य व्यथाओं से ग्रसित व्यक्ति
गायत्री उपासना का अवलम्बन ग्रहण करने पर अपने कष्टों से छुटकारा
पाते प्रत्यक्ष देखे जाते हैं।
(७) समृद्धि
गायत्री उपासना में जिन सद्गुणों का विकास होता है उनमें
परिश्रमशीलता, तत्परता, सतर्कता, मधुरता, सादगी एवं मितव्ययता प्रमुख
हैं। यह सद्गुण जहाँ भी होंगे वहाँ सदा समृद्धि बनी रहेगी।
दरिद्रता का निवास वहाँ हो ही नहीं सकता। जो परिश्रम और सावधानी
के साथ उद्योग रत रहेगा, दूसरों से मनुष्यता एवं मधुरता भरा
व्यवहार करेगा उसको अर्थ उपार्जन के अनेक अवसर स्वतः ही प्राप्त
होते रहेंगे कमाए हुए पैसे को ठीक तरह खर्च करने की बुद्धि
आमतौर से लोगों को नहीं होती। अस्तु अपव्यय के कारण उन्हें
दरिद्रता घेरे रहती है। सादगी और शालीनता की नीति अपनाकर खर्च
करने वाला व्यक्ति न दरिद्र रहेगा, न अभाव ग्रस्त, न ऋणी। जो
दुर्गुण मनुष्य के व्यक्तित्व को अस्त- व्यस्त करते हैं वे ही
वस्तुतः दरिद्रता के कारण होते हैं। गायत्री की शिक्षा एवं
प्रेरणा साधक को व्यवस्थित बनाने की है। सच्चा साधक उसे हृदयंगम
भी करता हैं, फलस्वरूप उसे दरिद्रता का मुख नहीं देखना पड़ता।
कई बार अर्थ संकट की चिन्ता भरी घड़ियों में गायत्री उपासना
आश्चर्यजनक प्रकाश उत्पन्न करती है। आय के स्त्रोत अवरुद्ध हो गये
थे वे खुल जाते हैं। मार्ग के अवरोध हटते हैं और ऐसे अवसर
उत्पन्न होते हैं जिनके कारण समृद्धि की सम्भावनायें
अनायास ही बढ़ जाती हैं। इस प्रकार के अवसर कितनों को ही आए
दिन मिलते रहते हैं और वे अनुभव करते हैं कि गायत्री माता का
अनुग्रह मनुष्य की दरिद्रता एवं विपन्नता को भी दूर करता है।
(८) विद्या
गायत्री बुद्धि की देवी है। उसके साधक की अभिरुचि स्वभावतः
ज्ञान अभिवर्धन में होती है। स्वाध्याय और सत्संग द्वारा प्राप्त
वह आत्मिक ज्ञान बढ़ता है वहाँ सांसारिक स्थिति को समझने के लिए
अपनी शिक्षा भी जारी रखता है। अध्ययन तो उसका प्रधान व्यसन
होता है। जिसे पढ़ने में रुचि है वह अपने ज्ञान कोश को धीरे-
धीरे संचित करता रहे तो क्रमशः विद्यावान
बनता चला जाता है। विद्या ही संसार का सबसे बड़ा धन है, यह
बात उसके मन में बैठ जाती है तो जिस प्रकार सामान्य लोगों को
धन कमाने की धुन रहती है, उसी तरह उसे विद्यावान
बनने की आकांक्षा निरन्तर बनी रहती है। फलस्वरूप अध्ययन के
मार्ग में जो व्यवधान थे वे दूर होते रहते हैं। ये परिस्थिति तो
उत्पन्न होती रहती है जिसके आधार पर वह ज्ञानवान और विद्वान
बन सके। गायत्री उपासक अशिक्षित, मूढ़ एवं शिक्षा की उपेक्षा करने
वाला हो ही नहीं सकता।
कई बार इस उपासना के फलस्वरूप दुर्बल मस्तिष्क वालों की
प्रतिभा भी अप्रत्याशित रूप में प्रखर होती देखी गई। मन्दबुद्धि,
भुलक्कड़, मूर्ख, अदूरदर्शी, सनकी, जिद्दी, अर्ध विक्षिप्त मस्तिष्क
वालों को बुद्धिमान, दूरदर्शी, तीव्र बुद्धि, विवेकवान बनते देखा गया
है। गायत्री उपासना करने वाले छात्रों को परीक्षा में अच्छी
सफलता प्राप्त करते देखा गया है।
(९) कौशल
बात पर ठीक तरह से सोचना, स्थिति को सही रूप से समझना और
कार्य को ठीक तरह करना, यह कौशल कहलाता है। कौन गुत्थी किस
स्थिति में किस प्रकार सुलझ सकती है, इसका सही तरीके से निर्णय
कर सकने की क्षमता का नाम ही चातुर्य है। चतुर और क्रिया- कुशल
व्यक्तियों के सामने सफलतायें हाथ बाँधे खड़ी रहती हैं। विभिन्न
दिशा में विस्तृतजानकारी
सुलझे हुए विचार और सही अवसर पर सही कदम उठाने की सूझ बूझ
कुशलता के चिन्ह हैं। ऐसे कुशल व्यक्ति हर क्षेत्र में आगे
रहते हैं और सफलताओं पर सफलता प्राप्त करते हुए आगे बढ़ते चलते
हैं।
उलटी तरह सोचने वाले दीर्घसूत्री और भोंदू बुद्धि कहलाने वाले
व्यक्ति गायत्री उपासना का अवलम्बन लेकर कलाकार, नेता, शिल्पी,
विजयी, सरस्वती वरद पुत्र प्रतिभाशाली एवं यशस्वी होते देखे गये
हैं। मस्तिष्क पर दुर्भावों का अनावश्यक दबाव न रहने से
व्यक्तित्व में ऐसी प्रखरता आना स्वाभाविक है।
(१०) मैत्री -
सद्बुद्धि की देवी गायत्री अपने सच्चे उपासक को प्रधानतया
सद्गुणों का वरदान प्रदान करती है। उससे नम्रता, सौहार्द, सौजन्य,
सेवाभावना, प्रसन्नता, उदारता, दयालुता, निरहंकारिता सज्जनता जैसी विशेषतायें
उत्पन्न होती ही हैं, ऐसे व्यक्तित्व की खिले हुए सुगन्धित कमल
पुष्प से तुलना की जा सकती है, जिसके चारों ओर भौंरे,
मधुमक्खियाँ व तितलियाँ मंडराती रहती हैं। जिसकी दृष्टि उस पर
पड़ती है, वही प्रसन्न होता है। जिसको भी उसकी सुगन्ध मिलती है
वह आकर्षित होता है सज्जनता सम्पन्न व्यक्ति को सच्चे मित्रों की
कभी कमी नहीं रहती। उसके प्रशंसक, सहायक, सहयोगी एवं मित्र दिन-
दिन बढ़ते ही रहते हैं।
जिसकी प्रतिष्ठा जितनी होगी, जिसके जितने सहयोगी एवं मित्र होंगे प्रगति कीसम्भावनायें भी उतनी ही बढ़ी- चढ़ी होंगी। ऐसे व्यक्ति जिधर भी चलते हैं, उधर ही उनके लिए पलक पांवड़े बिछाए जाते हैं और आरती उतारी जाती है।
गायत्री उपासना से तात्कालिक लाभ भी अगणित होते हैं। शत्रुओं के
घातक आक्रमण की सम्भावना समाप्त होती है। द्वेष शान्त होता है
और विध्वंसकारी विरोधियों के हौंसले पस्त हो जाते हैं। जो
प्रतिकूल थे वे अनुकूल बनते हैं और जिनका असहयोग था उनका सहयोग
मिलने लगता है। जहाँ उपेक्षा, असहयोग एवं विरोध की सम्भावना थी
वहाँ अनुकूल वातावरण देख कर कितने ही व्यक्तियों ने गायत्री की
अनुपम शक्ति का चमत्कार देखा है।
प्रतीक का निष्कर्ष - गायत्री साधना के दो स्तर
यह गायत्री की दस भुजायें
हुईं। अलंकार रूप से पाँच मुख और दस भुजाओं का चित्रण कलाकार
तत्व ज्ञानियों ने इसी दृष्टि से किया है कि इस महाविद्या में
सन्निहित तथ्यों, शक्तियों एवं सम्भावनाओं को लोग समझें उन्हें
प्राप्त करने एवं उनसे लाभान्वित होने के लिए प्रयत्न करें।
वस्तुतः गायत्री परब्रह्म परमात्मा की विश्वव्यापिनी
निराकार शक्ति है जो उच्चस्तर की साधना भूमिका में प्रकाश एवं
आनन्द की अनुभूतियों में परिलक्षित होती है। साधारण उपासना
क्रम में दो भुजी
गायत्री का ध्यान ही उपयुक्त है क्योंकि वही मानव प्राणी के
लिए सरल एवं स्वाभाविक है। ज्ञान की प्रतिबिम्ब, सद्भावनाओं की
प्रेरणा, मानवता की आत्मा, आदर्शवादिता की आस्था, उत्कृष्टता की
निष्ठा, सहृदयता एवं सज्जनता की सत्प्रवृत्ति के रूप में प्रकाश
मण्डल के मध्य में विराजमान गायत्री का ध्यान ही उपयुक्त है।
उसके एक हाथ में पुस्तक यह बताती है कि ज्ञान ही कल्याण का
प्रधान अवलम्बन है। दूसरे हाथ में जल भरे कमण्डल का होना यह
सन्देश देता है कि यह देवी प्रेम, शान्ति, त्याग एवं सद्भावना के
प्रतीक कमण्डल को धारण करती है। जहाँ गायत्री होगी वहाँ उसकी वह
अभिव्यंजना भी साथ रहेगी।
गायत्री का वाहन है हंस। हंस अर्थात नीर क्षीर का, उचित अनुचित
का वर्गीकरण करने वाला विवेक। हंस के बारे में यह किम्वदन्ती है
कि वह पानी मिले दूध में से जल का अंश छोड़ देता है और
केवल दूध पीता है। यह प्रवृत्ति गायत्री ज्ञान धारण करने वाले की
होनी चाहिए। वह इस बुराई भलाई मिले संसार में से केवल भलाई को
ग्रहण करे और बुराई को छोड़ दे जिसमें ऐसी सूझ बूझ तथा
क्षमता है वह गायत्री का वाहन हंस माना जायगा, भले ही वह
मनुष्य- शरीर धारण किए क्यों न हो?
गायत्री का आसन खिले हुए कमल पुष्प का है। उपासक को खिले
पुष्प की तरह प्रसन्न रहने का अभ्यस्त होना चाहिए। परोपकार के
लिए जीवन धारण करना चाहिए और अन्त में अपने को देव पूजा एवं
सन्तों की अभ्यर्थना में अपना अस्तित्व समर्पित करते हुए धन्य
होना चाहिए। गायत्री कमल पुष्प पर बैठती हैं जिस साधक का जीवन
कमल पुष्प जैसी विशेषताओं से सम्पन्न होगा गायत्री माता उसी
हृदय- कमल में विराजमान रहेगी।
इन मान्यताओं के साथ हमें गायत्री उपासना के लिए एक मुख, दो हाथ वाली प्रतिमा का ध्यान करना चाहिए और पंचमुखी, दसभुजी प्रतिमा से उसका तत्व ज्ञान एवं उपासना क्रम अपनाना चाहिए।
गायत्री का भावनात्मक एवं वैज्ञानिक महत्त्व - गायत्री साधना के दो स्तर
गायत्री उपासना का भावनात्मक और वैज्ञानिक दोनों ही दृष्टियों से
बड़ा महत्त्व है। भावना की दृष्टि से विचार किया जाय तो मानव
जीवन के चरित्र उत्कर्ष का बीज- मन्त्र उसे कहा जा सकता है।
सामान्यतया मनुष्य सबसे अधिक उपेक्षा 'सद्बुद्धि' की ही करता है।
जिस औजार से उसे निर्माण कार्य करना है उसे ही टूटा- फटा भौंथरा और अनगढ़ रखता है। इस भूल के फलस्वरूप ही उसे जीवन लक्ष्य से वंचित रहना पड़ता है।
सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में सबसे श्रेष्ठ साधना
शरीर मनुष्य को मिला है। बोलने, सोचने, लिखने, करने, मिल- जुल कर
रहने और खोजने की जो विशेषतायें मनुष्य को प्राप्त हैं, उन्हीं के बलबूते पर उसने उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचने में सफलता पाई है। जितनी सुविधायें
मनुष्य को प्राप्त हैं उसका हजारवाँ भाग भी सृष्टि के अन्य
प्राणियों को प्राप्त होता तो वे अपने को धन्य मानते ।। आश्चर्य
इस बात का है कि इतनी सुविधायेंरहते
हुए भी लोग दुःखी क्यों हैं? निरन्तर चिन्तित, खिन्न, उदास,
क्षुब्ध और अशान्त क्यों रहते हैं? इसका एक ही कारण है कि उनकी
विचारणा का, प्रज्ञा का- सद्बुद्धि का परिष्कार नहीं हुआ। यदि वे
सोचने का तरीका सही बना लेते तो आज जो अगणितसमस्यायें
और कठिनाइयाँ सामने उपस्थित हैं, उनमें से एक भी दृष्टिगोचर
नहीं होती। सोचने का सही तरीका यदि सीख लिया जाय तो फिर इसी
जीवन में स्वर्ग की अनुभूतियाँ बिखरी हुई दिखाई पड़ने लगें।
निस्सन्देह विचारणा की अशुद्ध प्रणाली ने ही स्वर्गीय सुविधाओं से
मानव प्राणी को नारकीय परिस्थितियों में दुःख दारिद्र्य में
पड़े रहने के के लिए विवश किया है। यदि सुख- शान्ति स्थिति
सचमुच अभीष्ट हो तो उसके लिए एक उपाय अनिवार्यतः करना पड़ेगा और
वह उपाय है अपनी विचार पद्धति का संशोधन।
गायत्री महामन्त्र में इसी धर्म- रहस्य का उद्घाटन किया है। मानव
जाति को सन्देश दिया है कि कोल्हू के बैल बने फिरने
मृगतृष्णा में भटकते रहने की अपेक्षा मूल तथ्य को समझो। सुख
प्राप्ति के लिए प्रयत्न तो करो, पर प्रयत्न से पूर्व स्थिति को
समझ भी लो कि वह कहाँ से और कैसे मिलेगा?
गायत्री मन्त्र बताता है कि विचार संशोधन, भावनात्मक परिष्कार वह
आवश्यक तत्व है, जिसे प्राप्त किए बिना न किसी को आज तक सुख-
शान्ति मिली है और न आगे मिलेगी। वस्तुयें
क्षणिक सुख दे सकती हैं। वासना और तृष्णा की मदिरा में कुछ ही
क्षण उन्मत्त रहा जा सकता है। उनकी परिणित तो दूनी अशान्ति,
दूनी हानि और दूनी असफलता में ही होती है। इसलिए हमें अपने
मानसिक संस्थान को शुद्ध करने
का सबसे अधिक प्रयत्न करना चाहिए। अपनी एक- एक प्रवृत्ति का
सूक्ष्म निरीक्षण करना चाहिए और उन पर चढ़े हुए कुसंस्कारों का
साहस पूर्वक परिष्कार करना चाहिए। वस्तुतः इसी का नाम साधना है।
साधना का केन्द्र- बिन्दु इसी प्रयास एवं पुरुषार्थ को कहा गया
है।
गायत्री में ईश्वर से यही माँगा है कि प्रभु हमें आपने
मानव शरीर देकर असीम अनुकम्पा की है। अब मानव बुद्धि देकर हमें
उपकृत और कर दीजिए ताकि हम सच्चे अर्थों में मनुष्य कहला
सकें और मानव जीवन के आनन्द का लाभ उठा सकें। गायत्री के चौबीस
अक्षरों में परमात्मा के 'सवितुः' 'वरेण्यं' 'भर्गः' और 'देव' गुणों
का चिन्तन करते हुए उन्हें अपने जीवन में धारण करने की आस्था
बनाते हुए यह संकल्प किया गया है कि परमात्मा के अनुग्रह एवं
वरदान की एकमात्र 'सद्बुद्धि' को भी हम प्राप्त करते रहेंगे। अपने
जीवन को उस ढाँचे में ढालेंगे, जिसमें कि सद्बुद्धि सम्पन्न
महामानव अपने को ढालते चले आए हैं। उसी संकल्प को बार- बार पूरी
निष्ठा और भावनापूर्वक दुहराने का नाम गायत्री जप का सच्चा
स्वरूप समझते हुए जो उस उपासना को करते हैं, वे उसका अनिर्वचनीय
लाभ प्राप्त भी कर लेते हैं। वे इस अमृत को पाकर अमर बन जाते
हैं और इस मृत्यु लोक में रहते हुए भी दिव्य- लोक मंह निवास करने का स्वर्गीय आनन्द पग- पग पर अनुभव करने लगते हैं।
वैज्ञानिकता की दृष्टि से गायत्री उपासना के अगणित भौतिक लाभ
भी हैं। कष्टों और आपत्तियों में पड़े हुए, विपत्तियों में फँसे
हुए, अभाव और दारिद्रय से पीड़ित असफलता की ठोकरों से विक्षुब्ध
व्यक्ति यदि इस महामन्त्र का आश्रय लेते हैं तो उन्हें आशा की
किरणें दृष्टिगोचर होती हैं। जिन्हें अपना भविष्य अन्धकारमय दीख
रहा था और आपत्तियों के कुचक्र में पिस जाने का भय सता रहा
था, उन्हें उस उपासना से नया प्रकाश मिलता है। अभावग्रस्त
व्यक्ति दारिद्र्य से और रुग्ण मनुष्य पीड़ाओं से छुटकारा प्राप्त
करते देखे गये, कामनाओं की जलती हुई आग तृप्ति और शान्ति में
परिणित होते देखी गई है। इस अवलम्बन का सहारा लेकर गिरे हुए लोग
ऊपर उठते हैं। इस प्रकार के प्रतिफल किसी जादू से नहीं, वरन एक
वैज्ञानिक पद्धति से उपलब्ध होते हैं। गायत्री उपासना मनुष्य के
विचारों और कार्यों में एक नया मोड़, एक नया परिवर्तन प्रस्तुत
करती है। जिसका अन्तर्जगत् बदले तो उसके बाह्य जीवन में
परिवर्तन प्रस्तुत होना ही चाहिए। होता भी है। इसे ही लोग गायत्री
माता का अनुग्रह एवं वरदान भी मानते हैं।
अनेक व्यक्तियों को गायत्री उपासना के फलस्वरूप अनेक प्रकार के कष्टों से छुटकारा पाते और अनेक सुविधायें,
उपलब्ध करते हुए देखकर हमें यही अनुमान लगाना चाहिए कि इस
साधना पद्धति में ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश है जिनके कारण
साधक की अन्तः भूमि में आवश्यक हेर- फेर उपस्थित होते हैं और
वह असफलताओं एवं शोक संतापों पर विजय प्राप्त करते हुए तेजी से
समुन्नत, समर्थ एवं सफल जीवन की ओर अग्रसर होता है।
गायत्री का महात्म्य भावनात्मक दृष्टि से भी है और वैज्ञानिक
दृष्टि से भी। इसी से इस महान अध्यात्म सम्बल को श्रद्धापूर्वक
अपनाए रहने के लिए शास्त्रकार ने ये निर्देश किया है। ऋषियों
ने प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति के लिए गायत्री की निष्ठापूर्वक
उपासना करने के लिए जोर दिया है और जो उस उपयोगी व्यवस्था का
लाभ नहीं उठाना चाहते, उनकी भूल को उन्होंने कटु भर्त्सना के साथ
निन्दनीय भी ठहराया है। गायत्री उपासना न करने वाले को उन्होंने
चाण्डाल तक कहा है। एक मुखी गायत्री की उपासना भी मनुष्य को
शक्ति और प्राण से भर देती है, इससे उसका जीवन व्यवस्थित ही
होता है।
वस्तुतः आत्मा अनन्त शक्तियों और सिद्धियों का भण्डार है। वह
ईश्वर का पुत्र और सत चित आनन्द स्वरूप है। अपने पिता के इस
पुष्प उद्यान संसार में क्रीडा- कल्लोल का आनन्द लेने आता है, पर
माया के बन्धनों में फँसकर वह अपने स्वरूप को, अपने लक्ष्य को,
अपने कार्य- क्रम को भूल जाता है और विपन्न स्थिति में पड़ जाता
है। इसी भूल का नाम माया बन्धन है। यह माया बन्धन जैसे- जैसे
ढीले पड़ते जाते हैं वैसे ही वैसे वह अपने परम मंगलमय मूल रूप
में अवस्थित होता चलता है। आत्मा स्वच्छ दर्पण के समान है पर
माया मोह का मैल जम जाने के कारण उस पर धुँधलापन छा जाता है।
आत्मा जलते हुए अंगारे के समान है। उस पर जब राख का पर्त चढ़
जाता है तो बुझी हुई सी दिखाई पड़ती है। यदि अंगार पर से राख
के पर्त को हटा दिया जाय तो वह फिर प्रकाशवान एवं उष्णता युक्त
दीखने लगता है। दर्पण पर लगे हुए मैल को यदि माँज- धोकर साफ
कर दिया जाय तो पुनः उज्ज्वल हो जाता है। अज्ञानान्धकार में यदि
ज्ञान का प्रकाश जल उठे तो अन्धेरे
में जो छिपा पड़ा था, वह सब कुछ दीखने लगता है। यह सब काम
गायत्री करती है। वह आत्मा पर चढ़े हुए सम्पूर्ण मलों, विक्षेपों,
कषायों, कल्मषों एवं जन्म- जन्मान्तरों के चढ़े हुए कुसंस्कारों को
धोकर उसे स्वच्छ एवं प्रकाशवान बनाती है। माया के बन्धनों को
काटने में वह तेज छुरी सिद्ध होती है। इन बाधाओं से छूटकर आत्मा
जब अपनी मूल- भूत निर्मल स्थिति को पहुँच जाती है तो उसके सब
त्रास दूर हो जाते हैं। आत्मा का परम निर्मल हो जाना ही
परमात्मा की प्राप्ति है। इसे ही जीवन मुक्ति, ब्रह्मनिर्वाण,
परमपद, आत्म- साक्षात्कार एवं प्रभु प्राप्ति कहते हैं। यह प्राप्त
होना कठिन माना जाता है, पर गायत्री माता इस महान कार्य को
भी सरल बना देती है।
गायत्री साधक की दिन- दिन आत्मिक उन्नति होती है। वह जैसे- जैसे
ऊँचा उठता है वैसे ही वैसे उसे अपने पिण्ड (देह) में छिपी हुई
ब्रह्माण्ड गत ईश्वरीय महान शक्तियों क भान होने लगता है। हमारा
जो यह स्थूल शरीर दिखाई पड़ता है- इसे अन्नमय कोष कहते हैं। इसी
प्रकार के सूक्ष्म अदृश्य देह इसी के भीतर चार और हैं। मरने
पर यह अन्न कोष मर जाता है पर चार शरीर प्राणमय कोष, मनोमय
कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष जीवित रहते हैं। इनमें वासनायें, इच्छायें,
भावनायें आदतें भरी रहती हैं और जन्म- जन्मान्तरों से चले हुए
संस्कार जमा रहते हैं। जैसे यह स्थूल देह जब तक यह भीतर वाले
चार देह- चार कोष जीवित रहते हैं, तब तक जीवित है तब तक मृत्यु
हो गई ऐसा नहीं कहा जा सकता, इसी प्रकार जब तक मुक्ति भी
नहीं कही जा सकती। इसीलिए पाँचों कोषों के आवरण एवं आच्छादन से
छुटकारा पाने के लिए गायत्री की पंचमुखी साधना की जाती है।
इसीलिए चित्रों में कहीं- कहीं गायत्री को पाँच मुख वाली भी
दिखाया जाता है। वह दशोंदिशाओं में व्याप्त है, दशों इन्द्रियों कि स्वामिनी है, दश महाशक्तियों की अधीश्वरी है, इसलिए इसे दशभुजी भी रूप इस बात का संकेत है कि इस महाशक्ति की सहायता से हम अपने पाँचों बन्धनों से छूट सकते है, दशों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, दशोंदिशाओं
में अपना विस्तार कर सकते हैं और दश महाशक्तियों के स्वामी बन
सकते हैं। गायत्री माता की कृपा से हम क्या नहीं कर सकते हैं?
जो कुछ इस लोक में तथा परलोक में है वह सब कुछ प्राप्त कर
सकते हैं।
पंचमुखी साधना के द्वारा पंचकोशों के विकास की साधना एक
विज्ञान है जो भौतिक विज्ञान की अपेक्षा अधिक समर्थ और यथार्थ
है। उससे मनुष्य शरीर और वंश से सामान्य दिखाई देने पर भी
राजाओं, महाराजाओं जैसा जीवनयापन करता है समस्त सिद्धियाँ उस
विज्ञान में सन्निहित हैं। विश्व में जो कुछ भी है उसका दर्शन
गायत्री की पंचकोशी साधनाओं से प्राप्त किया जा सकता है।
गायत्री के उच्चस्तरीय पंचकोशीय साधना विधान के अनुसार साधना
करने से एक- एक कोष खुलता जाता है। कोष का अर्थ देह भी है और
खजाना भी। जहाँ पाँचों देहों एवं बन्धनों का परिमार्जन होता है,
वहाँ इन कोषों में जो अलौकिक दिव्य शक्तियों के खजाने भरे पड़ेहैं
वे भी सामने आते हैं। यह कोष ही ऋद्धि- सिद्धियों के भण्डार
हैं। जिनके हाथ में यह खजाने होते हैं उन्हें इस संसार में और
कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता।