अनुष्ठान- गायत्री उपासना के उच्च सोपान - गायत्री अनुष्ठान का विज्ञान और विधान

एक नागरिक प्रश्न करता है आर्य ! वह कौन- सी उपासना है जिससे जातीय जीवन गौरवान्वित होता है? इस पर गोपथ ब्राह्मण के रचयिता ने उत्तर दिया-
‘‘तेजो वै गायत्री छन्दसां तेजो रथन्तरम्
साम्नाम् तेजश्चतुविंशस्तो माना तेज एवं
तत्सम्यक् दधाति पुत्रस्य पुत्रस्तेजस्वी भवति ’’

-गोपथ ब्राह्मण

हे तात् ! समस्त वेदों का तेज गायत्री है सामवेद का यह छन्द ही २४ स्तम्भों का वह दिव्य तेज है जिसे धारण करने वालों की वंश परम्परा तेजस्वी होती है।

हिन्दुओं के लिए अनिवार्य संध्यावंदन की प्रक्रिया यहीं से आरम्भ होती है। इस ब्रह्म तेज को धारण करने वाली हिन्दू जाति को शौर्य, साहस और स्वाभिमान की दृष्टि से कोई परास्त नहीं कर सका। यहाँ का कर्मयोग विख्यात है ।। यहाँ के पारिवारिक जीवन का शील और सदाचार, यहाँ के वैयक्तिक जीवन की निष्ठायें जब तक मानव वंश है, अजर- अमर बनी रहेंगी। यह गायत्री उपासना के ही बल पर था।

यह दुर्भाग्य ही है कि कालान्तर में इस पुण्य परम्परा के विशृंखलित हो जाने के कारण जातीय जीवन निस्तेज और निष्प्राण होता गया किन्तु युग निर्माण योजना ने अब अन्धकार को दूर कर दिया है। लम्बे समय तक उसे अपनी आजीविका का साधन बनाकर, बन्दीगृह में, मिथ्या भ्रान्तियों में डाले रखकर उस महान विज्ञान से वंचित रखा गया। अब वैसा नहीं रहा। गायत्री उपासना का पुण्य लाभ हर कोई प्राप्त कर सकता है। प्रातः मध्यान्ह और संध्या साधना के विधान में निश्चित है। अपनी सुविधा के अनुसार कम या अधिक मात्रा में गायत्री उपासना का मुफ्त लाभ हर कोई भी ले सकता है।

उससे उच्च स्तर का ब्रह्म तेज, सिद्धि और प्राण की प्रचुर मात्रा अर्जित करनी हो ,, किसी सांसारिक कठिनाई को पार करना हो अथवा कोई सकाम प्रयोजन हो, उसके लिए गायत्री की विशेष साधनायें सम्पन्न की जाती हैं। यों तो गायत्री नित्य उपासना करने योग्य है। त्रिकाल सन्ध्या में प्रातः मध्यान्ह, सायं, तीन बार उसकी उपासना करने का नित्यकर्म शास्त्रों में आवश्यक बताया गया है। जब भी जितनी मात्रा में भी गायत्री का जप, पूजन, चिंतन, मनन किया जा सके उतना ही अच्छा है, क्योंकि- ‘‘अधिकस्य अधिकं फलम्।’’

परन्तु किसी विशेष प्रयोजन के लिए जब विशेष शक्ति का संचय करना पड़ता है तो उसके लिए एक विशेष क्रिया की जाती है। इस क्रिया को अनुष्ठान नाम से पुकारते हैं, जब कहीं परदेश के लिए यात्रा की जाती है तो रास्ते के लिए कुछ भोजन सामग्री तथा खर्च को रूपये साथ रख लेना आवश्यक होता है। यदि यह मार्ग व्यय साथ न हो तो यात्रा बड़ी कष्टसाध्य हो जाती है। अनुष्ठान एक प्रकार का मार्ग व्यय है। इस साधना को करने से जो पूँजी जमा हो जाती है उसे साथ लेकर किसी भी भौतिक या आध्यात्मिक कार्य में जुटा जाय तो यात्रा बड़ी सरल हो जाती है।

यदि धन अपने पास हो तो उसके बदले में कोई भी वस्तु खरीदी जा सकती है। यदि शारीरिक बल अपने पास हो तो उससे किसी भी प्रकार का काम पूरा किया जा सकता है। यदि बुद्धि बल अपने पास हो तो उससे कठिन से कठिन उलझनें सुलझाई जा सकती हैं। इसी प्रकार यदि आत्म बल अपने पास हो तो उससे जीवन को उन्नत बनाने, मनोकामनाएँ पूरी करने, सामने उपस्थित कठिनाइयों को सरल बनाने एवं आपत्तियों से छूटने के कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। गायत्री अनुष्ठान आत्म- बल संचय की एक विशेष प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया द्वारा जो आत्म बल संचय होता है वह दैवी वरदान की तरह आपत्तियों का निवारण और सम्पत्तियों का आयोजन करने में बड़ी भारी सहायता करता है। सिंह जब हिरन पर झपटता है, बिल्ली जब चूहे पर छापा मारती है, बगुला जब मछली पर आक्रमण करता है तो उसे एक क्षण स्तब्ध होकर, साँस रोक कर, जरा पीछे हट कर अपने अन्दर की छिपी हुई शक्ति को जाग्रत और सतेज करना पड़ता है, तब वह अचानक अपने शिकार पर पूरी शक्ति के साथ टूट पड़ते हैं और मनोवांछित लाभ प्राप्त करते हैं। ऊँची छलाँग या लम्बी छलांग भरने से पहले खिलाड़ी लोग कुछ क्षण रुकते- ठहरते और पीछे हटते हैं तदुपरान्त उछाल भरते हैं। कुश्ती लड़ने वाले पहलवान ऐसे पैंतरे बदलते हैं। बन्दूक चलाने वाले को भी घोड़ा दबाने से पहले यही करना पड़ता है। अनुष्ठान द्वारा यही कार्य आध्यात्मिक आधार पर होता है।

किसी विपत्ति को छलांग कर पार करना है या कोई सफलता प्राप्त करनी है, तो उस लक्ष पर टूट पड़ने के लिए जो शक्ति संचय आवश्यक है वह अनुष्ठान द्वारा प्राप्त होती है।बच्चा दिन भर माँ- माँ पुकारता रहता है माता भी दिन भर बेटा लल्ला कहकर उसको उत्तर देती रहती है, यह लाड़−दुलार यों ही दिन भर चलता रहता है। पर जो कोई विशेष आवश्यकता पड़ती है, कष्ट होता है कठिनाई आती है, आशंका होती है या सहायता, की जरूरत पड़ती है तो बालक विशेष बलपूर्वक, विशेष स्वर से माता का पुकारता है इस विशेष पुकार को सुनकर माता अपने अन्य कामों को छोड़कर बालक के पास दौड़ जाती है और उसकी सहायता करती है अनुष्ठान साधक की ऐसी ही पुकार है। जिसमें विशेष बल एवं आकर्षण होता है, उस आकर्षण से गायत्री- शक्ति विशेष रूप से साधक के समीप एकत्रित हो जाती है।

जब सांसारिक प्रयत्न असफल हो रहे हों, आपत्ति का निवारण होने का मार्ग न सूझ पड़ता हो, चारों ओर अन्धकार छाया हुआ हो, भविष्य निराशाजनक दिखाई दे रहा हो, परिस्थितियाँ दिन- दिन बिगड़ती जाती हों, सीध करते उलटा परिणाम निकलता हो तो स्वभावतः मनुष्य के हाथ- पैर फूल जाते हैं। चिंताग्रस्त और उद्विग्न मनुष्य की बुद्धि ठीक काम नहीं करती ।। जाल के फँसे कबूतर की तरह वह जितना फड़फड़ाता है, उतना ही जाल में और अधिक फँसता जाता है। ऐसे अवसरों पर ‘‘हारे को हरिनाम’’ बल होता है। गज, द्रौपदी, नरसी, प्रहलाद आदि को उसी बल का आश्रय लेना पड़ा था।

देखा गया है कि कई बार जब सांसारिक प्रयत्न कुछ विशेष कारगर नहीं होते तो दैवी सहायता मिलने पर सारी स्थिति ही बदल जाती है और विपदाओं की रात्रि के घोर अन्धकार को चीरकर अचानक ऐसी बिजली कौंध जाती है, जिसके प्रकाश से पार होने का रास्ता मिल जाता है। अनुष्ठान ऐसी ही प्रक्रिया है। वह हारे हुए का चीत्कार है, जिससे देवताओं का सिंहासन हिलता है। अनुष्ठान का विस्फोट हृदयाकाश में एक ऐसे प्रकाश के रूप में होता है, जिसके द्वारा विपत्तिग्रस्त को पार होने का रास्ता दिखाई दे जाता है।

सांसारिक कठिनाइयों में, मानसिक उलझनों में आंतरिक उद्वेगों में गायत्री- अनुष्ठान से असाधारण सहायता मिलती है। यह ठीक है कि ‘‘किसी को सोने का घड़ा भरकर अशर्फियाँ गायत्री नहीं दे जाती ’’, पर यह ठीक है कि उसके प्रभाव से मनोभूमि में ऐसे मौलिक परिवर्तन होते हैं, जिनके कारण कठिनाई का उचित हल निकल आता है। उपासक में ऐसी बुद्धि, ऐसी प्रतिभा, ऐसी सूझ, ऐसी दूरदर्शिता पैदा हो जाती है, जिसके कारण वह ऐसा रास्ता प्राप्त कर लेता है, जो कठिनाई के निवारण में रामबाण की तरह फलप्रद सिद्ध होता है। भ्रान्त मस्तिष्क में कुछ असङ्गत असम्भव और अनावश्यक विचार धाराएँ, कामनाएँ, मान्यताएँ घुस पड़ती हैं। जिनके कारण वह व्यक्ति अकारण दुखी बना रहता है। गायत्री- साधना से मस्तिष्क का ऐसा परिमार्जन हो जाता है, जिसमें कुछ समय पहले जो बातें अत्यन्त आवश्यक और महत्त्वपूर्ण लगती थीं, वे ही पीछे अनावश्यक और अनुपयुक्त जँचने लगती हैं। वह उधर से मुँह मोड़ लेता है। इस प्रकार यह मानसिक परिवर्तन इतना आनन्दमय सिद्ध होता है, जितना कि पूर्व कल्पित भ्रान्त कामनाओं के पूर्ण होने पर भी सुख न मिलता। अनुष्ठान द्वारा ऐसे ही ज्ञात और अज्ञात परिवर्तन होते हैं जिनके कारण दुखी और चिंताओं से ग्रस्त मनुष्य थोड़े ही समय में सुख- शान्ति का स्वर्गीय जीवन बिताने की स्थिति में पहुँच जाता है। गायत्री संहिता में कहा गया है।

दैन्यरूक् शोक चिंतानां विरोधाक्रमणापदाम् ।।
कार्य गायत्र्यनुष्ठानं भायानां वारणाय॥४१॥
दीनता, रोग, शोक, विरोध, आक्रमण, आपत्तियाँ और भय इनके निवारण के लिए गायत्री का अनुष्ठान करना चाहिए।

जायते स स्थितिरस्मान्मनोऽभिलाषयान्विताः ।।
यतः सर्वेऽभिजायन्ते यथा काल हि पूर्णताम् ॥४२॥
अनुष्ठान से वह स्थिति पैदा होती है जिससे समस्त मनोवांछित अभिलाषायें यथा समय पूर्णता को प्राप्त होती हैं।

अनुष्ठानात्तु वै तस्मात् गुप्ताध्यात्मिक शक्तयः ।।
चमत्कारमयां लोके प्राप्यन्तऽनेकधा बुधः ॥४३॥
अनुष्ठान से साधकों को संसार में चमत्कार से पूर्ण अनेक प्रकार की गुप्त आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

अनुष्ठानों की एक सुनिश्चित शास्त्रीय मर्यादा है। २४ हजार से छोटा और २४ लक्ष से बड़ा अनुष्ठान नहीं होता। गायत्री अनुष्ठान में साधारणतः ‘‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात्’’ यही मन्त्र जपा जाता है। पर किन्हीं विशेष प्रयोजनों के लिए व्याहृतियों से पहले या पीछे ह्रीं श्रीं, क्लीं, हुँ, ऐं, ठं, यं, आदि बीज अक्षर भी लगाए जाते हैं। बीज अक्षरों के प्रयोग के लिए किसी अनुभवी की सलाह ले लेना आवश्यक है। अशिक्षित, बहुधन्धी, कार्य, व्यस्त रोगी स्त्री पुरूष या बालक केवल ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इस पञ्चाक्षरी मन्त्र से भी गायत्री का अनुष्ठान कर सकते हैं।

सवा लाख मन्त्रों के जप को अनुष्ठान कहते हैं। हर वस्तु के पकने की कुछ मर्यादा होती है। दाल, साग, ईंट, काँच आदि के पकने के लिए एक नियत श्रेणी का तापमान आवश्यक होता है। वृक्षों पर फल एक नियत अवधि में पकते हैं। अण्डे अपने पकने का समय पूरा कर लेते हैं, तब फूटते हैं। गर्भ में बालक अपना जब पूरा समय ले लेता है, तब जन्मता है। यदि उपयुक्त क्रियाओं में नियत अवधि से पहल ही विक्षेप उत्पन्न हो जाय तो उसकी सफलता की आशा नहीं रहती। अनुष्ठान की अवधि, मर्यादा, ताप- मात्रा सवालक्ष जप है। इतनी मात्र में जब वह पक जाता है, तब स्वस्थ परिणाम उत्पन्न होती है। पकी हुई साधना ही मधुर फल देती है।



महासिद्धि दाता- गायत्री अनुष्ठान - गायत्री अनुष्ठान का विज्ञान और विधान

‘गायत्री की दैनिक साधना’ में यह बताया गया है कि प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जप किस प्रकार करना चाहिए। उस विधि के अनुसार यथा संख्या में नित्य जप करने से शरीर का स्वास्थ्य, चेहरे का तेज और वाणी का ओज बढ़ता जाता है। बुद्धि में तीक्ष्णता और सूक्ष्मदर्शिता की मात्रा में वृद्धि होती है एवं अनेक मानसिक सद्गुणों का विकास होता है, यह लाभ ऐसे हैं जिनके द्वारा जीवन यापन में सहायता मिलती है।

विशेष अनुष्ठान पूर्वक गायत्री मंत्र को सिद्ध करने से उपयुक्त लाभों के अतिरिक्त कुछ अन्य विशिष्ट लाभ भी प्राप्त होते हैं जिनको चमत्कार या सिद्धि भी कहा जा सकता है। गायत्री अनुष्ठान की अनेक विधियाँ हैं, विभिन्न आचार्यों द्वारा पृथक् रीति से विधान बताये गये हैं इनमें से कुछ विधान ऐसी तान्त्रिक प्रक्रियाओं से परिपूर्ण हैं कि उनका तिल- तिल विधान यथा नियम पुनः किया जाना चाहिए, यदि उसमें जरा भी गड़बड़ हो तो लाभ के स्थान पर हानि की आशंका अधिक रहती है। ऐसे अनुष्ठान गुरू की आज्ञा से उनकी उपस्थिति में करने चाहिए तभी उनके द्वारा समुचित लाभ प्राप्त होता है।

किन्तु कुछ ऐसे भी राजमार्गी साधन हैं जिनमें हानि की कोई आशंका नहीं जितना है लाभ ही है। जैसे राम नाम अवधि पूर्वक जपा जाय तो भी कुछ हानि नहीं हर हालत में कुछ न कुछ लाभ ही है। इसी प्रकार राजमार्ग के अनुष्ठान ऐसे होते हैं जिनमें हानि की किसी दशा में कुछ सम्भावना है। हां लाभ के सम्बन्ध में यह बात अवश्य है कि जितनी श्रद्धा, निष्ठा और तत्परता से साधन किया जायगा उतना ही लाभ होगा। आगे हम ऐसे ही अनुष्ठान का वर्णन करते हैं यह गायत्री की सिद्धि का अनुष्ठान हमारा अनुभूत है और भी कितने ही हमारे अनुयायियों ने इसकी साधना को सिद्ध करके आशातीत लाभ उठाया है।

देवशयनी एकादशी (आषाढ़ सुदी ११) से लेकर देव उठनी एकादशी (कार्तिक सुदी ११) के चार महीनों को छोड़कर अन्य आठ महीनों में गायत्री की सवालक्ष सिद्धि का अनुष्ठान करना चाहिए। शुक्ल पक्ष की दौज इसके लिए शुभ मुहूर्त है। जब चित्त स्थिर और शरीर स्वस्थ्य हो तभी अनुष्ठान करना चाहिए। डाँवाडोल मन और बीमार शरीर से अनुष्ठान तो क्या कोई भी काम ठीक तरह नहीं हो सकता।

प्रातःकाल सूर्योदय से दो घण्टे पूर्व उठकर शौच स्नान से निवृत्त होना चाहिए। फिर किसी एकान्त स्वच्छ, हवादार कमरे में जप के लिए जाना चाहिए। भूमि को जल से छिड़ककर दाभ का आसन फिर उसके ऊपर कपड़ा बिछाना चाहिए। पास में घी का दीपक जलता रहे तथा जल से भरा हुआ एक पात्र हो। जप के लिए तुलसी या चन्दन की माला होनी चाहिए। गंगाजल और खड़िया मिट्टी मिलाकर मालाओं की संख्या गिनने के लिए छोटी- छोटी गोलियां बना लेनी चाहिए। यह सब वस्तुएँ पास में रख कर आसन पर पूर्व की ओर मुख करके जप करने लिए बैठना चाहिये। शरीर पर धुली हुई धोती हो, और कन्धे के नीचे खद्दर का चादर या ऊनी कम्बल ओढ़ लेना चाहिए। गरदन और सिर खुला रहे।

प्राणायाम- मेरू दंड सीधा रख कर बैठना चाहिए। आरम्भ में दोनों नथुनों से धीरे- धीरे पूरी सांस खींचनी चाहिए। जब छाती और पेट में पूरी हवा भर जाय तो कुछ समय उसे रोकना चाहिए और फिर धीरे- धीरे हवा को पूरी तरह बाहर निकाल देना चाहिए। ‘‘ॐ’’ मंत्र का जप मन ही मन सांस खींचने रोकने और छोड़ने के समय करते रहना चाहिए। इस प्रकार से कम से कम प्राणायाम करने चाहिए। इससे चित्त स्थिर होता है, प्राण शक्ति सतेज होती है और कुवासनाएँ घटती हैं।

प्रतिष्ठा- प्राणायाम के बाद नेत्र बन्द करक सूर्य के समान तेजवान अत्यन्त स्वरूपवती कमल पुष्प पर विराजमान गायत्री माता का ध्यान द्वारा आह्वान करना चाहिए। उनके लिए जगज्जननी, तेजपुंज, सर्वव्यापक, महाशक्ति की भावना करनी चाहिए। मन ही मन उन्हें प्रणाम करना चाहिए और अपने हृदय कमल पर आसन देकर उन्हें प्रीति पूर्वक विराजमान करना चाहिए।

इसके बाद जप आरम्भ करना चाहिए। ‘‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ।’’ इस एक मन्त्र के साथ माला का एक मनका फेरना चाहिए। जब एक माला के १०८ दाने पूरे हो जायें तो खड़िया को गंगाजल मिश्रित जो गोलियां बना कर रखी हैं उनमें से एक उठा कर अलग रख देनी चाहिए। इस प्रकार हर एक माला समाप्त होने पर एक गोली रखते जाना चाहिए जिससे मालाओं की संख्या गिनने में भूल न पड़े।

जप के समय नेत्र अधखुले रहने चाहिए। मन्त्र इस तरह का जपना चाहिए कि कण्ठ, जिह्वा, तालु, ओष्ठ आदि स्वर यन्त्र तो काम करते रहें पर शब्द का उच्चारण न हो। दूसरा कोई उन्हें सुन न सके। वेद मंत्र को जब उच्च स्वर से उच्चारण करना हो तो सस्वर ही उच्चारण करना चाहिए। सर्व साधारण पाठकों के लिए स्वर विधि के साथ गायत्री मंत्र का उच्चारण कर सकना कठिन है इसलिए उसे इस प्रकार जपना चाहिए कि स्वर यन्त्र तो काम करें पर आवाज ऐसी न निकले कि उसे कोई दूसरा आदमी सुन सके। जप से उठने के बाद जल पात्र को अर्घ्य रूप में सूर्य के सम्मुख चढ़ाना चाहिए। दीपक की अधजली बत्ती को हटा कर हर बार नई बत्ती डालनी चाहिए।

अनुष्ठान में सवा लक्ष मन्त्र का जप करना है। इसके लिए कम से कम सात दिन और अधिक से अधिक पन्द्रह दिन लगाने चाहिए। सात, नौ, ग्यारह या पन्द्रह दिन में समाप्त करना ठीक है। साधारणतः एक घण्टे में १५ से लेकर २० माला तक जपी जा सकती है। कुल मिला कर ११५८ माला जपनी होती हैं। इसके लिए करीब ६० घण्टे चाहिए। जितने दिन में जप पूरा करना हो उतने दिन में मालाओं की संख्या बाँट लेनी चाहिए यदि एक सप्ताह में करना हो करीब - घण्टे प्रतिदिन पड़ेंगे इनमें से आधे से अधिक भाग प्रातःकाल और आधे से कम भाग तीसरे पहर पूरा करना चाहिए। जिन्हें १५ दिन में पूरा करना हो उन्हें करीब घण्टे प्रतिदिन जप करना पड़ेगा जो कि प्रातः काल ही आसानी से हो सकता है।

जप पूरा हो जाय तब दूसरे दिन एक हजार मन्त्रों का जप के साथ हवन करना चाहिए। गायत्री हवन में वैदिक कर्मकाण्ड की रीतियाँ न बरती जा सकें तो कोई हानि नहीं। स्वच्छ भूमि पर मृत्तिका की वेदी बनाकर, पीपल, गूलर या आम की समिधाएँ जलाकर शुद्ध हवन सामग्री से हवन करना चाहिए। एक मन्त्र का जप पूरा हो जाय तब ‘‘स्वाहा’’ के साथ हवन में और बिठाना चाहिए जो आहुति के साथ घी चढ़ाता जाय। जब दस मालाएँ मन्त्र जप के साथ हवन समाप्त हो जाय तो अग्नि की चार प्रदक्षिणा करनी चाहिए। तत्पश्चात भजन, कीर्तन, प्रार्थना, स्तुति करके प्रसाद का मिष्ठान्न बांटकर कार्य समाप्त करना चाहिए।

जिन्हें गायत्री मन्त्र ठीक रीति याद न हो सके वे ‘‘ॐ भूर्भुवः स्वः’’ केवल इतना ही जाप करें। जिन दिनों अनुष्ठान चल रहा हो, उन दिनों एक समय ही सात्विक भोजन करना चाहिए, सन्ध्या को आवश्यकता पड़ने पर दूध या फल लिया जा सकता है। भूमि पर सोना चाहिए, हजामत नहीं बनवानी चाहिए, ब्रह्मचर्य से रहना चाहिए। चित्त को चंचल क्षुब्ध या कुपित करने वाला कोई काम नहीं करना चाहिए। कम बोलना, शुद्ध वस्त्र पहिनना, भजन, सत्‍संग में रहना, स्वाध्याय करना, तथा प्रसन्न चित्त रहना चाहिए। अनुष्ठान पूरा होने पर सत्पात्रों को अन्न धन का दान देना चाहिए।

इस प्रकार सवा लक्ष जप द्वारा गायत्री मन्त्र सिद्ध कर लेने पर वह चमत्कार पूर्ण लाभ करने वाला हो जाता है। बीमारी, शत्रु का आक्रमण, राज दरबार का कोप, मानसिक भ्रान्ति, बुद्धि या स्मरण शक्ति की कमी, ग्रह जन्य अनिष्ट, भूत बाधा, सन्तान सम्बन्धी चिन्ता, धन हानि व्यापारिक विघ्न, बेरोजगारी, चित्त की अस्थिरता, वियोग, द्वेष, भाव, असफलता आदि अनेक प्रकार की आपत्तियां और विघ्न बाधाएँ दूर होती हैं। यह अनुष्ठान सिद्धि प्रदान करने वाला, अपनी और दूसरों की विपत्ति टालने में बहुत हद तक दूर करने हर प्रकार समर्थ होता है। गायत्री संहिता में इसे विघ्न विदारक अनुष्ठान कहा गया है। इस अनुष्ठान से अनेक बुद्धिमानों न अब तक गुप्त आध्यात्मिक शक्तियां प्राप्त की हैं और उनके चमत्कार पूर्ण लाभों का रसास्वादन किया है। जिस मनोरथ के लिए अनुष्ठान किया जाता है उस मार्ग की प्रधान बाधाएँ दूर हो जाती हैं और कोई न कोई ऐसा साधन बन जाता है कि जो कठिनाई पहाड़ सी प्रतीत होती थी वह छोटा ढेला मात्र रह जाती है, जो बादल प्रलय वर्षाने वाले प्रतीत होते थे वे थोड़ी सी बूँदें छिड़क कर विलीन हो जाते हैं। प्रारब्ध कर्मों के कठिन भोग बहुत हलके होकर, नामा मात्र का कष्ट देकर अपना कार्य समाप्त कर जाते हैं। जिन भोगों को भोगने में साधारणतः मृत्यु तुल्य कष्ट होने की संभावना थी वे गायत्री की कृपा से एक छोटा फोड़ा बनकर सामान्य कष्ट के साथ भुगत जाते हैं और अनेकों जन्मों तक भुगती जाने वाली कठिन पीड़ायें हलके- हलके छोटे- छोटे रूप में इसी जन्म से समाप्त होकर आनन्द मय भविष्य का मार्ग साफ कर देती है। इस प्रकार के कष्ट भी गायत्री माता की कृपा ही समझनी चाहिए। कभी- कभी ऐसा ही देखा जाता है कि जिस प्रयोजन के लिए अनुष्ठान किया गया था वह तो पूरा नहीं हुआ पर दूसरे अन्य महत्त्वपूर्ण लाभ प्राप्त हुए। किसी पूर्व संचित प्रारब्ध का फल भोग अनिवार्य हो और उसका पलटा जाना दैवी विधान के अनुसार उचित न हो, तो भी अनुष्ठान का लाभ तो मिलना है ही, वह किसी दूसरे रूप में अपना चमत्कार प्रकट करता है, साधक को कोई न कोई असाधारण लाभ उससे अवश्य होता है। उससे भविष्य में आने वाले संकटों की पूर्व ही अन्त्येष्टि हो जाती है और सौभाग्य के शुभ लक्षण प्रकट होते हैं। आपत्ति निवारण के लिए गायत्री का सवालक्ष अनुष्ठान एक राम बाण जैसा आध्यात्मिक साधन है। किसी वस्तु के पकने के लिए एक नियत काल या तापमान की आवश्यकता होती है। फल, अंडे आदि के पकने में एक नियत अवधि की आवश्यकता होती है और दाल, साग, चाशनी, ईंट कांच आदि की भट्ठी पकने में अमुक श्रेणी का तापमान आवश्यक होता है। गायत्री की साधना पकने का माप दंड सवालक्ष जप है। पकी हुई साधना ही मधुर फल देती है।

साधारणतः सवालक्ष जप की एक मर्यादा समझी जाती है। दूध के नीचे आग जलाने से अमुक मात्रा की गर्मी आ जाने पर एक उफान आता है, इसी प्रकार सवालक्ष जप हो जाने पर एक प्रकार का क्षरण होता है। उसकी शक्ति से सूक्ष्म जगत में एक तेजोमय वातावरण का उफान आता है जिसके द्वारा अभीष्ट कार्य के सफल होने में सहायता मिलती है। दूध को गरम करते रहने से कई बार उफान आते हैं। एक उफान आया वह कुछ देर के लिए उतरा कि फिर थोड़ी देर बाद नया उफान आ जाता है। इसी प्रकार सवालक्ष जप के बाद एक लक्ष जप पर शक्ति मय क्षरण के उफान आते हैं, उनसे निकटवर्ती वातावरण आन्दोलित होता रहता है और सफलता के अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती रहती हैं।

नीति का वचन है- अधिकस्य अधिकम् फलम् अधिक का अधिक फल होता है। गायत्री की उपासना सवालक्ष जप करने पर बन्द कर देनी चाहिए ऐसी कोई बात नहीं है, वरन् यह है कि जितना अधिक हो सके करते रहना चाहिए, अधिक का अधिक फल है। इच्छा शक्ति श्रद्धा, निष्ठा और व्यवस्था की कमी के कारण अनुष्ठान का पूरा फल दृष्टिगोचर नहीं होता किन्तु यदि अधिक काल तक निरन्तर साधना को जारी रखा जाय तो धीरे- धीरे साधक का ब्रह्मतेज बढ़ता जाता है। यह ब्रह्मतेज आत्मिक उन्नति का मूल है, स्वर्ग मुक्ति और आत्म शांति का पथ निर्माण करता है, इसके अतिरिक्त लौकिक कार्यों की कठिनाइयों का भी समाधान करता है, विपत्ति निवारण और अभीष्ट प्राप्ति में इस ब्रह्म तेज द्वारा असाधारण सहायता मिलती है




महा अनुष्ठान - गायत्री अनुष्ठान का विज्ञान और विधान

चतुर्विंशति लक्षाणां सततं तदुपासकः ।।

गायत्रीणामनुष्ठानाद् गायत्र्या सिद्धिमाप्नुते

(तदुपासकः) गायत्री का उपासक (सततं) निरन्तर (चतुर्विंशति लक्षाणां) चौबीस लाख (गायत्रीणां) गायत्री के (अनुष्ठानत्) अनुष्ठान करने से (गायत्र्याः) गायत्री की (सिद्धिमाप्नुते) सिद्धि को प्राप्त करता है। अर्थात् उसे गायत्री सिद्ध हो जाती है।

लघ्वानुष्ठानतोवापि महानुष्ठानतोऽथवा ।।

सिद्धिं विन्दति वै नूनं साधकः सानुपातिकम्

(लघ्वानुष्ठानतः) लघुअनुष्ठान करने से (अथवा) (महाअनुष्ठानतः) महाअनुष्ठान करने से (साधकः) साधक (नूनं) निश्चय से (सानुपातिकां) उसी अनुपात से (सिद्धि विन्दति) सिद्धि को प्राप्त करता है।

सवालक्ष की अनुष्ठान विधि पीछे वर्णन की जा चुकी है। इसे करने से अनेक प्रकार की कठिनाइयों का समाधान होता है। इससे बड़ा अनुष्ठान चौबीस लक्ष गायत्री जप का होता है। इसे पूरा करने के लिए साधक को विशेष सुविधाएँ होनी चाहिए। घर छोड़कर बाहर जाने का अवसर बार- बार न आने चाहिए। इसे बहुधन्धी, चिन्ताग्रस्त, दौड़धूप करते रहने वाले नहीं कर सकते। इसे करने के लिए चिन्ता रहित परिस्थितियाँ होनी चाहिए। पर जब यह अनुष्ठान पूरा हो जाता है तो गायत्री की सिद्धि मिल जाती है।

चौबीस लक्ष जप के लिए कम से कम चौबीस मास और अधिक से अधिक तीन वर्ष लगने चाहिए। दो वर्ष में करने वाले को प्रतिमास एक लक्ष का जप पूरा करना होता है और तीन वर्ष करने वाले को लगभग ६७०० मन्त्र प्रतिमास जपने होते हैं। अपनी सुविधा और स्थिति को ध्यान में रखकर इस प्रकार का कार्यक्रम बनाया जा सकता है, जिसमें प्रतिदिन समान संख्या में मंत्र जप चलता रहे। अन्य सब विधियाँ सवालक्ष जप के समान ही हैं।

कोई साधक मण्डली किसी सामूहिक प्रयोजन के लिए चौबीस लक्ष गायत्री का अनुष्ठान कर सकते हैं। किसी बहुत छोटे प्रयोजन के लिए सवा लक्ष का अनुष्ठान भी हो सकता है जितने साधक मिल कर जितने दिन में उसे पूरा करना चाहें उसे ध्यान में रखते हुए प्रत्येक साधक के प्रतिदिन कितने मंत्र जपने चाहिए इसका कार्यक्रम बनाया जा सकता है।

धनी लोग दूसरे पंडितों या साधकों द्वारा सवालक्ष का चौबीस लक्ष का अनुष्ठान पूरा करा सकते हैं। ऐसे अनुष्ठान पूरा करने में १,३,५,७ इस प्रकार जप संख्या के दिन या मासों का कार्यक्रम बनाना चाहिए और उसके प्रारंभ तथा अन्त होने के दिन शुभ हों इसका ध्यान रखना चाहिए। चन्द्रवार, गुरूवार तथा शुक्रवार गायत्री के आरम्भ तथा अन्त के लिए शुभ हैं। परन्तु यह स्मरण रहे दूसरों से कराये हुए अनुष्ठान की अपेक्षा की जाने वाली साधना का फल अधिक नहीं है।

सवालक्ष जप वाला साधन लघु अनुष्ठान कहा जाता है और चौबीस लक्ष जप वाला महा अनुष्ठान इन दोनों में लगभग इतना ही बड़ा है। मोटी कहावत है कि ‘‘जितना गुड़ डालते हैं। उतना मीठा होता है।’’ जितना परिश्रम किया जाता है उतना अधिक फल प्राप्त होता है। साधारणतः नित्य प्रति बिना प्रतिबन्ध का जप करना- साधारण दैनिक साधना है, उसका फल मन्थर गति से धीरे- धीरे परन्तु सुदृढ़ होता है। अनुष्ठान एक विशेष- सामयिक कलाप है और उसका फल भी वैसा ही होता है।




विधिवत उपासना के सुनिश्चित परिणाम - गायत्री अनुष्ठान का विज्ञान और विधान

सामान्य रीति से अनेकों सामान्य कार्य ऐसे ही किये जाते हैं और उनकी व्यवस्था तथा सफलता सामान्य क्रम से चलती रहती है। इस प्रकार के कामों में कब तक कितनी मात्रा में क्या सफलता मिलेगी? इसका कुछ निश्चय नहीं रहता। ढर्रे पर गाड़ी लुढ़कती रहती है और उसका कुछ न कुछ परिणाम निकलता ही रहता है। किन्तु यदि किसी आवश्यक कार्य को नियत समय में सम्पन्न करना है और अभीष्ट सफलता प्राप्त करनी है तो फिर सामान्य ढर्रे से काम नहीं चलता। इसके लिए विशेष योजना बनाने साधन जुटाने विशेष मनोयोग लगाने और विशेष श्रम करने की आवश्यकता पड़ती है। इस विशिष्टता को अपनाये बिना महत्त्वपूर्ण कार्यों को नियत अवध में अभीष्ट सफलता के साथ सम्पन्न कर सकना सम्भव नहीं होता।

साधना के सम्बन्ध में भी यही बात है नित्य कर्म के रूप में सामान्य गायत्री उपासना की जाती रहती है। उसमें प्रायः मनः शुद्धि का उद्देश्य ही पूरा हो पाता है। शरीर से नित्य पसीना निकलना त्वचा पर जमता है अस्तु नित्य स्नान करने की आवश्यकता पड़ती है। गन्दगी जमना स्वाभाविक है तब उसकी सफाई भी होनी ही चाहिए। मन के ऊपर प्रस्तुत वातावरण में कषाय कल्मषों की परतें जमते रहना भी स्वाभाविक है। उसकी सफाई दैनिक उपासना नित्य नियम का पालन करने से ही संभव होती है। प्रायः सभी नित्य कर्मों का उद्देश्य सहज रीति से उत्पन्न होती रहने वाली मलीनता का निवारण निष्कासन करना है। यह भी कम महत्व का नहीं है। उपेक्षा करने पर जो हानि हो सकती है और तत्परता बरतने पर श्रेष्ठता का जो स्तर बना रहता है उस पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जा सके तो प्रतीत होगा कि नित्य कर्म के रूप में दैनिक उपासना का भी कितना महत्त्व है।                                                                                                
अतिरिक्त रूप से आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिए संकल्पपूर्वक नियत प्रतिबन्धों और तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासनायें करनी होती हैं। इन्हें अनुष्ठान कहते हैं। अनुष्ठान सर्व साधारण के लिए है। उनमें उपासना क्रम ऐसा रहता है जिसे पालन कर सकना सर्वसुलभ हो। उनमें मंत्रोपचार के पेचीदा विधि- विधानों का दबाव नहीं रहता। पुरश्चरण इसमें कुछ कड़े होते हैं। उनमें कवच, कील, अर्गलन, हृदय, न्यास के हवनतर्पण, मार्जन के विधान पूरे करने पड़ते हैं। इसके लिए संस्कृत भाषा का आवश्यक ज्ञान तथा विधानों को कार्यान्वित करने का शास्त्रोक्त प्रशिक्षण आवश्यक है। इसलिए पुरश्चरणों की प्रक्रिया उन लोगों के लिए ही उपयुक्त पड़ती है जिनके लिए आजीविका उपार्जन के- गृहस्थी के- बहुत से काम नहीं हैं, जो पूरा समय और मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हैं। निर्धारित तपश्चर्या कड़ाई के साथ पालन कर सकते हैं। संस्कृत भाषा का समुचित ज्ञान रहने से उसे प्रयोग में आने वाले मन्त्रों का उपयोग सही कर सकते हैं। अनुष्ठानों से पुरश्चरणों के विधान कठिन हैं। इसलिए उनके प्रतिफल भी अधिक हैं। सर्व साधारण के लिए अनुष्ठान ही उपयुक्त पड़ते हैं। पुरश्चरणों का प्रशिक्षण जिन्हें आवश्यक लगता हो उन्हें आवश्यक उसके लिए सम्पर्क साधना चाहिए।

सामान्य जप की तुलना में अनुष्ठानों से उत्पन्न शक्ति का स्तर तथा परिमाण कहीं अधिक होता है। अधिक श्रम, समय, अधिक तत्परता, अधिक तपश्चर्या का समावेश होने से गायत्री उपासना में विशिष्टता उत्पन्न हो जाना और उसका प्रभाव परिणाम अधिक ऊँचे स्तर का दीख पड़ना स्वाभाविक है।

अनुष्ठानों के विशेष नियम यह हैं () नियत दिनों में नियत संख्या में जप संख्या पूरी करनी होती है, जिसमें सामान्य उपासना की तुलना में अधिक समय लगता है। इसके लिए दिन चर्या आवश्यक हेर- फेर करके अधिक समय लगाने का प्रबन्ध करना पड़ता है। () अनुष्ठान के दिनों में ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य रूप से आवश्यक होता है। () भोजन में उपवास तत्व का समावेश किसी न किसी रूप में करना ही होता है। साधारण भोजन क्रम नहीं चल सकता। () अनुष्ठान काल में साधक की स्थिति तपस्वी जैसी होती है। उन दिनों इतना तो करना ही होता है अपनी शारीरिक सेवा जहां तक हो सके दूसरों से न करायें उन्हें अपने हाथों ही पूरा करें। () भूमि शयन कम वस्त्रों का उपयोग, चमड़े से बनी वस्तुओं का त्याग जैसी तितीक्षायें सम्पन्न करें। (6) अन्त में हवन, ब्रह्मभोज की पूर्णाहुति सम्पन्न करें। यह छैः कार्य करने से अनुष्ठान की मर्यादायें पूरी होती हैं। और उनके अभीष्ट सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं।

अनुष्ठान की तीन श्रेणियां हैं- लघु मध्यम और पूर्ण। लघु अनुष्ठान के २४ हजार जप दिन में पूरा करना होता है। मध्यम सवा लाख जप का होता है उसके लिए ४० दिन की अवधि नियत है। पूर्ण अनुष्ठान २४ लाख जप का होता है। उसमें एक वर्ष लगता है। माला में यों १०८ दानें होते हैं पर अनुष्ठान गणना में उन्हें १०० ही माना जाता है। आठ भूल- चूक, अशुद्धि उच्चारण आदि के लिए अतिरिक्त छोड़ दिये जाते हैं एक घण्टे में १० से १२ मालायें पूरी होती हैं। यह मध्यम गति है। किसी की मुख संरचना इससे न्यूनाधिक हो सकती है। ऐसी दशा में संख्या सन्तुलन ठीक करने की अपेक्षा यह अधिक उत्तम है कि घड़ी रखकर उतना समय पूरा कर लिया जाय जो मध्यम गति से जप करने में लगा है। २४ हजार जप दिन में पूरा करने के लिए हर दिन २७ मालायें जपनी होती हैं। इनमें प्रायः ढाई घण्टा समय लगता है। सवा लाख जप ४० दिन में करने पर प्रतिदिन ३३ मालायें की जाती हैं जो प्रायः तीन घण्टे में पूरी होती हैं। २४ लाख जप एक वर्ष में पूरा होता है और उसमें ६६ मालायें हर दिन की जाती हैं जिनमें प्रायः छैः घण्टे का समय लगता है सर्वोत्तम समय प्रातःकाल का ही है पर यदि वह एक बार में पूरा न हो सके तो प्रातः सायं दो बार में पूरा किया जा सकता है। त्रिकाल संध्या की दृष्टि से मध्यान्ह काल में भी कुछ अंश पूरा किया जा सकता है पर परम्परा में अधिकांश प्रातःकाल और कम पड़े वह सायं- काल कर लेने का प्रचलन है।   

जप से पूर्व स्नान, और धुले वस्त्र पहनने का नियम है। उपासना कक्ष, पूजा के पात्र हर दिन साफ करने चाहिए। पूजा उपचार की वस्तुओं में से जो पहले दिन प्रयोग में आ चुके हों उन्हें दुबारा काम में नहीं लाना चाहिए आधी जली हुई धूपबत्ती दूसरे दिन प्रयोग में नहीं आनी चाहिए। इसी प्रकार दीपक में बचा हुआ घी या बत्ती दूसरे दिन प्रयोग में नहीं लाई जाती। कटोरी में बचा हुआ चन्दन भी अगले दिन काम का नहीं रहता फूल आदि वस्तुयें तो नई ही ली जाती हैं। अक्षत नैवेद्य जैसी वस्तुयें ही ऐसी हैं जो डिब्बी में रखी रहती हैं और उनमें से थोड़ी- थोड़ी निकाली और काम में लाई जाती रहती है। 
 
यों नियम तो सम्मिलित उपासना में भी वहीं है पर अनुष्ठान के दिनों में अग्नि और जल को साक्षी रखा ही जाना चाहिए। जल कलश के लिए छोटी- सी लुटिया रखी जाती है जिसमें देव शक्तियों का आह्वान करते हैं और पीछे उसे ही सूर्यार्घ्य के लिए चढ़ा देते हैं। अग्नि के लिए इन दिनों अगरबत्ती से काम चल जाता है। यों महत्व दीपक का अधिक है। पर यह शुद्ध घृत का ही होना चाहिए। तेल वेजीटेबिल आदि से काम नहीं चलेगा। इन दिनों शुद्ध घी मिलना उन्हीं के लिए सम्भव है जो या तो स्वयं गाय पालें या दूध खरीदकर उसमें से अपने हाथों निकालें। पैक बन्द डिब्बों का घृत भी शुद्ध हो सकता है। बाजार में खुला बिकने वाला तो प्रायः संदिग्ध ही होता है। जहाँ द्विविधा हो वहाँ अगरबत्ती से ही काम चला लेना पर्याप्त है। अनुष्ठान काल में ही पूरी अवधि तक अखण्ड दीपक जलाने की बात सोचना तो उत्तम है पर उसके लिए सावधानी बहुत बरतनी पड़ती है। तनिक भी असावधानी रहने से दीपक बुझ जाता है और उसमें देवता की नाराजी आदि का अनुमान लगाकर साधक को व्यर्थ ही खिन्न बनाना पड़ता है। इसलिए यदि दीपक जलाना हो तो जप काल की अवधि तक ही उसे जलाना चाहिए। 
 
पूजा वेदी यदि दैनिक उपासना के लिए पहले से ही बनी हुई है तो वही पर्याप्त है। अन्यथा नई चौकी स्थापित की जानी चाहिए। गायत्री माता का चित्र आवश्यक है। पिछला चित्र मैला धुधला हो गया हो तो अनुष्ठान के समय नया चित्र बदल लिया जाय और पुराना जल में विसर्जित कर दिया जाय। चौकी पर बिछाने वाला कपड़ा अनुष्ठान के लिए बदल लेना चाहिए। वह पुराने कपड़े में से निकाला हुआ नहीं वरन् नया ही होना चाहिए। पीले रंग में रंगा हुआ। पूजा उपचार के लिए पंचपात्र में जल, पुष्प, अक्षत नैवेद्य अगरबत्ती, चन्दन रोली यह वस्तुयें काम में लाई जाती हैं। अन्य वस्तुओं में कठिनाई नहीं होती पर नये फूल प्रातःकाल मिलने कठिन हो जाते हैं शाम को पानी छिड़कर फूल खुली जगह में रखे रहने दिये जायें तो वे मुरझाते नहीं। बिना मुरझाये फूल पूजा के काम आते हैं। यदि वे न मिलें तो चावलों को चन्दन तथा हल्दी के रंग में रंगकर उन्हें फूलों के स्थान पर प्रयोग में लाया जा सकता है। 
 
आसन चमड़े का नहीं होना चाहिए। इन दिनों वध किये गये जानवरों का ही चमड़ा मिलता है। प्राचीन काल में अपनी मौत मरे हुए मृग चर्म काम में आते थे। अब वैसी सुविधा नहीं रही। 
 
साथ ही अन्य आसन भी सुविधापूर्वक उपलब्ध हैं। प्राचीन काल में वनवासी तपस्वी न केवल आसन का वरन् वस्त्रों का काम भी चमड़े से ही चलाते थे। अब वैसी स्थिति नहीं रही। अस्तु कुशा के आसन, चटाई कम्बल आदि के आसन ही काम में लाने चाहिए। कपड़ा प्रयोग करना हो तो उसे धोते रहना चाहिए। 
 
जप के समय पालथी मारकर बैठना चाहिए। यह सुखासन ही सुविधाजनक है। पद्मासन आदि पर देर तक नहीं बैठा जा सकता। टाँगों पर दबाव पड़ने से ध्यान भी उचटता है। जप काल में कमर सीधी ही रखी जाय। आंखें अधखुली। माला चन्दन की अधिक उपयुक्त है। इन दिनो तुलसी और रूद्राक्ष के नाम पर नकली वस्तुयें ही बाजार में बिकती हैं। चन्दन की आसानी से मिल जाती है। अनुष्ठान काल में जप में पूरे वस्त्र पीले रखने में कठिनाई हो तो कम से कम कन्धे पर दुपट्टा तो पीला रहना ही चाहिए। पीत वस्त्र अनुष्ठान का परिधान है। पायजामें का नहीं धोती का ही अनुष्ठान काल में उपयोग होने की परम्परा है। 
 
जप काल में पालथी बदलते रहने से कोई प्रतिबन्ध नहीं है। देर तक बैठना सम्भव न हो सके तो खड़े होकर भी जप कि या जा सकता है। बीच में पेशाब जाना हो तो हाथ पैर धोकर फिर बैठना चाहिए। शौच जाना पड़े तो धोती बदलने एवं स्नान करने की आवश्यकता पड़ेगी। जम्हाई, या झपकी आने लगे तो उस आदमी को दूर करने के लिए मुँह धोने और आचमन करने से चेतनता आ जाती है। 
 
अनुष्ठान के उपरोक्त नियमों में कई बार कुछ शिथिलता करने की आवश्यकता पड़ती है। देश, काल, पात्र, को ध्यान में रखते हुए वैसी छूटें दी जाती हैं। अति शीत प्रधान देशों में अथवा कमजोरों- रोगियों को शीत ऋतु में प्रातःकाल स्नान करते नहीं बन पड़ता। गर्म पानी उपयोग करने की तो छूट है पर उतने से भी काम न चले तो शरीर को तौलिये से पोंछकर या हाथ- पैर मुँह धोकर भी काम चल सकता है। कपड़ों में वे वस्त्र तो बदल ही लेने चाहिए। जिन से पसीना पेशाब आदि का स्पर्श होता है। 
 
यज्ञोपवीत पहनना, शरीर मन्दिर पर गायत्री की प्रतीक प्रतिमा धारण कर लेने के समतुल्य है अस्तु अनुष्ठान के दिनों में तो हमें पहन ही लेना चाहिए पीछे भले ही अनुष्ठान की पूर्ति होने पर विसर्जित कर दिया जाय। नर और नारी दोनों ही समान रूप से यज्ञोपवीत धारण करने के अधिकारी हैं।स्त्रियों को मासिक धर्म होने के उपरान्त पुराना यज्ञोपवीत उतार कर नया धारण करना होता है। 
 
अनुष्ठान काल में ब्रह्मचर्य पालन आवश्यक है। स्वप्नदोष होना अपने हाथ की बात नहीं, इसलिए उसमें दोष नहीं आता। किन्तु यदि मध्य में ब्रह्मचर्य टूटता है तो वह अनुष्ठान जितना हो चुका खंडित माना जायेगा। और नये सिरे से करना पड़ेगा।   
अनुष्ठान का दूसरा व्रत है उपवास। केवल जल पर नहीं रहना चाहिए। उसके लिए विशेष सतर्कता और अनुभव की आवश्यकता पड़ती है अन्यथा हानि होने का डर रहता है। दूध, छाछ, फलों का रस शाकों को उबालकर बनाया गया रस जैसे द्रव्य पदार्थों पर चलने वाला उपवास पूर्ण माना जाता है। नौ दिन तो वह आसानी से निभ सकता है ।। यदि उतना न बन पड़े तो तो उसके हलके स्वरूप और भी हैं। जैसे () नमक और शक्कर का त्याग कर अस्वाद व्रत का पालन। () एक समय भोजन एक समय दूध छाछ पर निर्वाह () शाकाहार- फलाहार। () एक वस्तु खाने की दूसरी दूसरी लगाने की मात्र दो ही वस्तुओं का उपयोग। जैसे रोटी साग, चावल, दाल आदि। थाली में दो से अधिक वस्तुयें न हों।

अपने शरीर की सेवा आप करने में अपने हाथों की तप- तितीक्षा में भोजन अपने हाथ से बनाने की बात भी आती है। उतना न बन पड़े तो अपनी पत्नी, माता अथवा कुमारियों के हाथ का पकाया हुआ भोजन लिया जा सकता है। कुसंस्कारी हाथों का पकाया हुआ बाजारू भोजन तो ग्रहण नहीं ही किया जाय। हजामत अपने हाथों बनाने से काम चल सकता है। कपड़े अपने हाथों धोये जायें तो उत्तम है अन्यथा माता पत्नी मात्र की सेवायें उसके लिए स्वीकार की जाय। मनुष्य द्वारा खींचे जाने वाले रिक्शे में बैठने से बचा जा सके तो उत्तम है। बुहारी लगाने, तेल मालिश, करने जैसे काम भी अपने हाथों ही उन दिनों स्वयं करने का प्रयत्न करना चाहिए। 
 
भूमि शयन का स्थानापन्न लकड़ी का तख्त हो सकता है। उसमें भी कठोरता होती है। कोमल शय्या पर पर तितीक्षा नहीं सधती। भूमि शयन का नियम इसीलिए बनाया गया है। जहाँ तक हो सके कम वस्त्र पहने ताकि सर्दी गर्मी का प्रभाव कुछ तो सहन करना ही पड़े। यदि चलने की भूमि बहुत अनुपयुक्त न हो तो अनुष्ठान के दिनों नंगे पैर भी रहा जा सकता है। चमड़े के बने जूतों का तो अनुष्ठान काल में निषेध है ही क्योंकि बध किया चमड़ा ही आज उपलब्ध होता है। इस वध कृत्य में काटने वाला ही नहीं उस मांस और चमड़े का उपयोग करने वाला भी पाप का भागी बनता है। 
 
अनुष्ठान के अन्त में जप की शतांश आहुतियाँ देनी चाहिए। यज्ञ हवन अब सर्व साधारण की अर्थ शक्ति के बाहर है। २४ हजार जप के लिए २४० आहुतियाँ दी जाती हैं। इन्हें कई व्यक्ति मिलकर करे तो उसी हिसाब से कम बार आहुति देनी होंगी। २४० आहुतियाँ पांच व्यक्ति मिलकर दें ४८ बार मंत्रोच्चार करके साथ- साथ आहुतियाँ देने से वह कार्य सम्पन्न हो जाता है यदि प्रतिदिन आहुतियाँ दी जाती रहें तो एक व्यक्ति भी २७ आहुति नित्य देकर भी अपने अनुष्ठान का हवन पूरा कर रह सकता है। यदि कारण वश हवन की व्यवस्था न बन पड़े तो दशांस जप अधिक करने से भी उसकी पूर्ति हो सकती है। चौबीस हजार जप के लिए २४०० जप अधिक कर लिया जाय तो भी विवशता की स्थिति में उसे भी पर्याप्त मान लिया जायेगा। 
 
प्रसाद वितरण ब्रह्मभोज की आवश्यकता उन दिनों ज्ञान प्रसाद वितरण से की जानी चाहिए। आत्मिक प्रगति में सहायक सद्ज्ञान प्रदान करने वाला ऐसा सस्ता साहित्य युग निर्माण योजना द्वारा इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए छापा गया है न्यूनतम सवा रूपया इस ब्रह्मभोज के लिए ज्ञान वितरण के लिए खर्च किया जाय। अधिक बन सके तो और भी उत्तम है। इस प्रसाद को जिस- तिस को बखेर नहीं देना चाहिए वरन् सत्पात्रों के पास डाक से या व्यक्तिगत रूप से पहुँचाना चाहिए ताकि उसका समुचित उपयोग हो सके। 
 
आश्विन और चैत्र की नवरात्रियाँ लघु अनुष्ठानों के लिए अत्यन्त उपयुक्त समय हैं। यों उन्हें कभी सम्पन्न किया जा सकता है किसी तिथि मुहूर्त का कोई बन्धन नहीं है। फिर भी दोनों नवरात्रियों का विशेष महत्व है ज्येष्ठ में प्रतिपदा से दशमी तक गायत्री जयन्ती पर भी तीसरी नवरात्रि मानी गई है। चौबीस लाख का लम्बा अनुष्ठान करने के स्थान पर सवा लाख के बीस या चौबीस हजार के सौ कर लेना अधिक सुविधाजनक रहता है। किसी कारणवश कोई अनुष्ठान खंडित हो जाय तो उसे नये सिरे से करना चाहिए। यदि स्त्रियों का अनुष्ठान मासिक धर्म आ जाने से बीच में ही खण्डित हुआ हो तो जितना शेष था उसकी पूर्ति शुद्ध के बाद की जा सकती है उसे खण्डित हुआ नहीं माना जायेगा। मात्र व्यवधान ही गिना जायेगा।







अनुष्ठान से संकल्प शक्ति का संवर्धन - गायत्री अनुष्ठान का विज्ञान और विधान

संकल्पित गायत्री साधना का तीन श्रेणियों में सबसे सरल २४ हजार जप का नौ दिन में सम्पन्न होने वाला अनुष्ठान है। लम्बे समय तक व्रत पालन करते रहने के लिए सुदृढ़ मनोबल चाहिए। देखा गया है कि बाल उत्साह क्षणिक होता है। लम्बे- चौड़े लाभ तुर्त- फुर्त मिलने की कल्पना से अबोध मस्तिष्कों को उत्साह भी आशा से अधिक आता है पर वह देर तक ठहर नहीं सकता। महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करने में धैर्य रखना पड़ता है, कितने व्यवधान आते हैं और उनसे किस प्रकार जूझना पड़ता है इसका उन्हें ज्ञान अनुभव होता नहीं। सब कुछ सरल ही सरल होने की कल्पना रहती है पर जब वस्तु स्थिति सामने आती है और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि के लिए आवश्यक मूल्य चुकाने का तथ्य सामने आता है तो फिर आरम्भिक जोश पानी के बबूले की तरह ठण्डा पड़ जाता है। 
 
बाधाओं में सबसे बड़ी बाधा अपने मन की होती है वह चंचलता के लिए प्रसिद्ध है। नवीनता के कौतूहल से हर घड़ी उचकता- मचकता रहता है। उसके लिए अनुष्ठान भी एक कौतूहल ही है। उसका रसास्वादन लेने की जो ललक आरम्भ में किसी बढ़ी- चढ़ी आशा को लेकर उठी थी वह देर तक ठहरती नहीं। वरन् एक डाल पर देर तक नहीं बैठ सकता भले ही उसे वहां कितने ही सुविधा क्यों न हो। अनगढ़ मन देर तक किसी काम में रूचि नहीं लेता जिसमें वासना तृष्णा अहंता की पूर्ति जैसा प्रत्यक्ष लाभ न हो। परोक्ष लाभ पर तो विवेकशील सुसंस्कृत मन ही ठहरता है। उसी के लिए यह संभव होता है कि दूरवर्ती सत्परिणामों का विचार करके आज की कठिनाइयों से जूझने को विवेकशीलों जैसी दृढ़ता और साहसिकता का परिचय दे सकें। 
 
बच्चों को हलके- फुलके अभ्यास कराये जाते हैं। नौ दिन तक ढाई घण्टे नित्य उपासना करने की संकल्पित साधना बहुत कठिन नहीं पड़ती। आरम्भ में करने का उत्साह रहता है और चार- पाँच दिन बाद ही अन्त भी निकट दीखने लगता है। आरम्भ का उत्साह जब तक ठण्डा होने को होता है तब तक पूर्णता की घड़ी निकट होने से धैर्य बंध जाता है। इस प्रकार किसी तरह वह छोटी अवधि आसानी से पूर्ण हो जाती है। ४० दिन का सवा लाख और एक वर्ष का चौबीस लाख का जप पूरा करने के लिए अधिक दृढ़ता और परिपक्वता चाहिए। उसके अभाव में कुछ ही समय में ऊब आने लगती है। जिसके कारण या तो वह संकल्प शक्ति किसी तनिक से बहाने की आड़ में टूट ही जाता है या फिर उपेक्षा पूर्वक किसी तरह चिन्हपूजा करके काम चलाना पड़ता है ।। इस स्थिति से बचने की दृष्ट से यही उत्तम है कि छोटे संकल्प लिए जायें। आरम्भिक साधकों के कच्चे उत्साह को ध्यान में रखते हुए २४ हजार जप का अनुष्ठान ही ठीक पड़ता है। 
 
लम्बे अनुष्ठानों में अधिक परिपक्व धैर्य होता है इसलिए उनकी ऊर्जा भी अधिक होती है। यह निश्चित है। अन्यथा कोई सवा लक्ष और चौबीस लक्ष का संकल्प हीं क्यों लेगा? लम्बे समय तक लगातार दृढ़ता पूर्व की गई तपश्चर्या अधिक प्रखर होती है तो यह उचित ही है। अधिक बड़ा साहस करने वाला लाभ भी बड़ा ही उठाता है किन्तु वैसा हर किसी के लिए सुलभ नहीं। सामान्यतया यही नियम ठीक है कि मनोभूमि में जितनी दृढ़ता हो उतना ही बड़ा संकल्प लिया जाय। सवा लक्ष करने की इच्छा हो तो चौबीस हजार के स्थान पर पच्चीस हजार जप के पाँच अनुष्ठान कर लेने चाहिए इसमें ४५ दिन लगते हैं। यदि संख्या कुछ बढ़ा ली जाय २७ माला के स्थान पर ३० कर ली जाय तो आठ- आठ दिन के पाँच अनुष्ठान चालीस दिन में भी पूरे हो सकते हैं। इसी प्रकार चौबीस लक्ष का पूर्ण अनुष्ठान करना हो तो २४ हजार के सौ खण्डों में उसे पूरा किया जा सकता है। इस प्रकार करने में प्रायः दो वर्ष लगते हैं। एक वर्ष में ६६ मालायें प्रतिदिन करनी पड़ती हैं। इसमें प्रायः छैः घण्टा समय चाहिए। इतना तो कोई निवृत्त निश्चिन्त व्यक्ति ही लगा सकता है। काम- काजी मनुष्य के लिए सबेरे शाम मिलकर तीन घण्टे नित्य निकल सकें तो बहुत हैं। इस प्रकार दो वर्ष में २४ हजार के १०० अनुष्ठान पूरे हो सकते है और उनका योग पूर्ण अनुष्ठान कहा जा सकता है। 
 
जिन्हें लम्बे समय के बड़े अनुष्ठान करने की इच्छा हो उन्हें हम यही परामर्श देते रहे हैं कि वह उसे खण्ड- खण्ड करके पूर्ण करें। इसमें कई सुविधाएँ रहती हैं। एक तो यह कि कभी कोई व्यवधान आ जाय तो उतने अनुष्ठान पूरे करके कुछ समय के लिए वह शृंखला रोकी जा सकती है और पीछे सुविधानुसार फिर कभी उसे उसी गणना से आरम्भ किया जा सकता है जहाँ से कि उसे छोड़ा गया था। 
 
तपश्चर्या में प्रधान शक्ति ब्रह्मचर्य की ही होती है। इसके बाद उपवास है। उपवास में न्यूनतम यह है कि सदाचारी स्वजनों के हाथ का ही बना हुआ सात्विक आहार हो। बाजार का, दावतों का स्वाद प्रधान गरिष्ठ भोजन नहीं चलता। इस प्रकार की गड़बड़ी से भी उसे खंडित माना जाता है। छोटे अनुष्ठान में यह सुविधा है कि इच्छा से या विवशता से कोई अनुष्ठान टूटा तो एक टुकड़ा ही बर्बाद हुआ। शेष तो बचा रहा। लम्बे संकल्प में तो वह पूरा ही चला जायेगा। इसलिए आरम्भ में छोटे- छोटे खण्डों में इस अनुष्ठान तपश्चर्या का सिलसिला चलना चाहिए और जब अधिक दृढ़ता विकसित हो जाया तो फिर लम्बे संकल्प लेने में भी हर्ज नहीं है। अधिक साहसिकता रहने से अधिक ऊर्जा उत्पन्न होना और अधिक लाभ मिलना तो स्पष्ट ही है। 
 
जो लोग नौ दिन तक भी नहीं कर सकते इतनी देर नहीं बैठ सकते, उतने नियम भी निभा नहीं सकते हैं उनके लिए और भी छोटी व्यवस्थायें मौजूद हैं इनमें सरलता अधिक है इसलिए उसी अनुपात से उनका प्रतिफल भी कम है। उतने पर भी जो कुछ भी नहीं कर सकते उनके लिए कुछ करना भी उत्तम है। धीरे- धीरे साहस और अभ्यास बढ़ाने का सिलसिला चल पड़े तो उससे भी क्रमिक अनुभव बढ़ता है। अधिक सरलता की श्रृंखलायें कुछ संकल्पित साधनायें निम्नलिखित आती हैं-   
१. पंचाक्षरी गायत्री का अनुष्ठान ।। ॐ भूर्भुवः स्वः यह पंचाक्षरी गाायत्री है। जो पूर्ण मन्त्र शुद्ध उच्चारण नही कर सकते उन बच्चों एवं अशिक्षितों के लिए यह ठीक है। इसकी २७ मालायें प्रायः एक घण्टे में पूरी हो जाती है ।। समय बढ़ाना हो तो के स्थान पर कम दिन में भी उसकी पूर्ति हो सकती है। 
 
२. गायत्री चालीसा पाठ। प्रतिदिन १२ पाठ करने से दिन में १०८ पाठ हो जाते हैं ।। इसमें भी प्रायः एक घण्टा ही नित्य लगाना पड़ता है। 

३. मन्त्र लेखन। नौ दिन में २४०० गायत्री मंत्र लिखने में २७० मन्त्र नित्य लिखने पड़ते हैं। इसमें प्रायः दो घण्टे लग जाते हैं ।। इसे रात्रि में भी लिखा जा सकता है और वाणी से उच्चारण न होने के कारण स्नान का भी बन्धन नहीं है। 
 
अनुष्ठान में न्यूनतम एक घण्टों समय की मर्यादा है। एक घण्टा से कम की साधना नित्य कर्म में गिनी जाती है। वह मानसिक शुद्धता का दैनिक प्रयोजन पूरा करती है। अवशिष्ट शक्ति उत्पादन के लिए एक घण्टे से अधिक का समय लगाने पर ही आवश्यक ऊर्जा उत्पन्न होती है। छैः घण्टे अधिकतम इसलिए माने गये हैं कि उतने में आध्यात्मिक श्रम की चरम सीमा पूरी हो जाती है। शारीरिक श्रम घण्टे मानसिक श्रम घण्टे और आध्यात्मिक श्रम घण्टे बन पड़े तो उसे पूर्ण माना जायेगा। इससे अधिक भार उठाने पर अनुपयुक्त थकान चढ़ती है और श्रम करने की सामान्य क्षमता को आघात पहुँचता है। मध्यम चाल और सीमित दूरी तक नित्य चलते रहने पर बहुत दिनों तक यात्रा जारी रखी जा सकती है और लम्बी मंजिल पूरी हो सकती है। किन्तु यदि दौड़ लगाई जाय तो दो- चार दिन में ही टाँगें दुखने लगेंगी। सामान्य क्रम से चलते रहने पर जितना सफर हो सकता था वह भी न हो सकेगा। अति को सर्वत्र वर्जित किया गया है। अनुष्ठानों में अतिवादी उत्साह भर देने से मस्तिष्क में अनावश्यक गर्मी उत्पन्न होती है और सिर भारी या गरम रहने जैसी शिकायतें उत्पन्न हो जाती हैं। 
 
अधिक लाभ पाने के लिए अधिक जल्दी करने अधिक भार बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। श्रद्धा की मात्रा बढ़ा देना ही पर्याप्त है। अधिक मनोयोग और अधिक भावना रहने से ही आध्यात्मिक साधनाओं में प्रगति होती है। भावनात्मक पवित्रता और चारित्रिक उत्कृष्टता का खाद पानी पाकर उपासना की फसल तेजी से बढ़ती है। उसे अनावश्यक शारीरिक श्रम से लादने पर वह जल्दबाजी अभीष्ट परिणाम प्राप्त होने में और भी देरी लगा देती है। इस सन्दर्भ में उतावली बरतना असन्तुलन का परिचायक है। इसमें लाभ कम और हानि अधिक है। असन्तुलित मात्रा में घी खाने, दूध पीने, औषधि लेने, व्यायाम करने से लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। यही बात उपासना अनुष्ठान के सम्बन्ध में भी है |

चैत्र एवं आश्विन की नवरात्रियों में २४ हजार का अनुष्ठान करने की परम्परा है। उसमें समय की घट- बढ़ी नहीं की जानी चाहिए। अन्य दिनों के अनुष्ठान में उपयुक्त मर्यादा को ध्यान में रखते हुये दिन, ४० दिन की उपासनाओं में समय की कमी की जा सकती है। पर वह आरम्भ करने से पूर्व ही निश्चय हो जानी चाहिए और उसका नियम यथा समय नियत संख्या में पूरा होते रहना चाहिए। ४० दिन का सवा लक्ष्य का अनुष्ठान जल्दी से जल्दी २० दिन में हो सकता है। इसमें ६६ माला प्रतिदिन करनी होती हैं जो जप की चरम सीमा है। इसी प्रकार चौबीस हजार को चार दिन में भी किया जा सकता है इससे कम में करने की बात नहीं सोचनी चाहिए। दैनिक क्रम बना रहे यह बात भी आरम्भ से पहले ही निश्चय कर लेनी चाहिए। प्रातः सायं देा खण्डों में साधना पूरी की जा सकती है।इसमें निश्चय रहना चाहिए कि प्रातः कितना और सायं कितना किया जायेगा। इसी प्रकार यह भी निश्चय किया जाय कि कितने बजे से कितने बजे तक प्रातः एवं सायं काल का जप चला करेगा। यह समय की नियमितता भी औषधि सेवन की तरह ध्यान रखने योग्य है। जो निर्धारण कर लिया जाय उसे अपने परिजनों- परिचितों के बीच घोषित भी कर देना चाहिए। इस प्रकटीकरण से उस कार्य को पूरा करना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है और उसमें लोक लज्जा की बात को ध्यान में रखकर भी नियम पालन करना पड़ता है। संकल्प लेने में निश्चय को पूरा करने की जिम्मेदारी आती है। इसलिए प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य के आरम्भ में संकल्प लेना आवश्यक माना गया है। उससे मन में उठने वाली ऊब और उपेक्षा पर नियन्त्रण करना सरल हो जाता है। छोटे- छोटे संकल्प पूरे करते चलने पर जो आत्म विश्वास बढ़ता है वह आगे चलकर महत्त्वपूर्ण महान कार्य सम्पन्न करने के लिए बहुत ही कारगर सिद्ध होता है। 
 
सामान्य नियम यह है कि अनुष्ठान या चालीस या ३६० दिनों में पूरा करके अगले दिन उसकी पूर्णाहुति का हवन किया जाये। किन्तु कई बार कारणवश जिस दिन जप पूरा होना है उसी दिन हवन पूर्णाहुति करने की व्यवस्था बना ली जाती है। ऐसा हो तो सकता है पर इससे उस दिन का जप पूरा करके हवन करने से समय की दृष्टि से विलम्ब हो जाता है। जो असुविधाजनक पड़ता है। यदि जप के अन्तिम दिन ही हवन करना है तो और अधिक सुविधाजनक यह रहेगा कि अन्तिम दिन के लिए कुछ कम रखा जाय और वह संख्या पहले दिनों में ही पूरा कर ली जाय। जैसे २४ हजार अनुष्ठान नौ दिन में पूरा करना है। हवन भी नौवें दिन ही किया जाना है ।। तो अन्तिम दिन के लिए २७ के स्थान पर ११ माला ही रखी जाय और १६ मालायें पिछले आठ दिन में दो- दो माला नित्य बढ़ाकर पूरी कर ली जाय ।। उसमें के स्थान पर २९ का नियम बनाना पड़ेगा। ऐसा तो हो सकता है पर यह उलट- पलट बीच में नहीं होनी चाहिए। इसका निश्चय आरम्भ में ही कर लेना चाहिए। उसी क्रम से सारी व्यवस्था आदि से अन्त तक चलनी चाहिए। अनिवार्य विवशता आ खड़ी हो तब तो बात दूसरी है अन्यथा यथा सम्भव क्रमबद्धता का ध्यान रखा ही जाना चाहिए। ब्रह्मचर्य, उपवास अपने शरीर की सेवा स्वयं करना, भूमि शयन, चमड़े की वस्तुओं का त्याग यह पांच नियम अनुष्ठान के हैं। इनमें से किसी की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।   
आरम्भ के दिन या उससे एक दिन पूर्व अनुष्ठान के साधन क्रम का संकल्प देवताओं की साक्षी में लेना चाहिए। इसी क्रम में () परिशोधन के पाँच कृत्य () देव पूजने () कलश पूजन () दीप पूजन () स्वस्ति वाचन () यज्ञोपवीत धारण () हाथ में कलावा बाँधना () चन्दन धारण () संकल्प धारण (१०)अभिसिंचन यह नौ कृत्य सम्पन्न किये जाते हैं। इन विधियों के मन्त्र विधान पुस्तकों में लिखे जाते हैं। वे याद न हों तो यह सभी अकेले गायत्री मन्त्र से हो सकते हैं। यदि संस्कृत भाषा न आती हो तो मातृ भाषा में भी संकल्प और घोषणा की जा सकती है कि इन नियमों का पालन करते हुए इतने दिन में संख्या का गायत्री अनुष्ठान पूरा करूँगा। 
 
संकल्पित साधनाओं में एक वर्ष में लाख जप पूरा करने की अभियान साधना भी है। उसमें साधारणतया ११ माला प्रतिदिन और रविवार या अन्य अवकाश के दिन २४ मालायें करनी होती हैं। यदि अवकाश के दिन अधिक न करनी हों तो लाख को ३६० दिनों में बराबर विभाजन करने में प्रायः १४ माला का हिसाब बन जाता है। वर्ष में लाख जप इसी क्रम से पूरा होता है ।। इसमें अपनी सुविधा का क्रम भी निर्धारित हो सकता है पर वह चलना नियमित रूप से चाहिए। वर्ष पूरा हो जाने पर उसकी पूर्णाहुति का हवन करा दिया जाय। इसमें एक हजार आहुति से कम न हों। हर महीने पर हर सप्ताह हवन का क्रम चलाने में सुविधा हो तो वह और भी उत्तम है। अभियान साधना में ब्रह्मचर्य उपवास, भूमि शयन आदि तपश्चर्या अनिवार्य तो नहीं है पर उनका जितना अधिक पालन निर्वाह हो सके उत्तम है।   



अनुष्ठान में पंच सूत्री तप साधना - गायत्री अनुष्ठान का विज्ञान और विधान

दूध को गर्म करने से उसका घृत वाला अंश मलाई के रूप में ऊपर तैरने लगता है। गर्मी से पिघल कर विशेष पत्थरों के भीतर रमा हुआ शिलाजीत बाहर निकल आता है। सूर्य की गर्मी बढ़ते ही सभी प्राणी निद्रा त्याग कर जाग पड़ते और काम में लगते हैं। तप की गर्मी से मनुष्य की अन्तः चेतना जाग्रत, सक्रिय और सक्षम बनती है। झकझोरने से सोया हुआ व्यक्ति जाग पड़ता है। आन्तरिक मूर्छा और उदासी को दूर करने के लिए तपश्चर्या से उत्पन्न उत्तेजना अपना चमत्कार दिखाये बिना नहीं रहती। उसका प्रभाव संचित कुसंस्कारों को जलाता है। और ऐसी अभिनव शक्ति प्रदान करता है जिसके सहारे प्रगति पथ पर द्रुत गति से बढ़ चलना संभव हो सके, आग तापने से ठंडक दूर होती है। अगति और अकर्मण्यता को निरस्त करने में तप की गर्मी से भी वैसा ही उद्देश्य पूरा होता है। 
 
गायत्री साधना पञ्च मुखी है। उसके प्राण रूपी प्रकरण पांच- पांच अध्याय- सोपानों में बंटे हुए हैं। तप साधना वाला प्रकरण भी पाँच भागों में विभक्त है। पाँच तत्वों से बना हुआ काय कलेवर, पाँच प्राणों से बने हुए चेतना संस्थान भी पाँच प्रकार की तपश्चर्याओं से प्रभावित परिष्कृत होते हैं। गायत्री उपासना को सफल बनाने वाली पांच तपश्चर्याऐं () उपवास () ब्रह्मचर्य () मौन () तितिक्षा () अनुदान इन पाँच नामों से प्रसिद्ध हैं। साधना के साथ- साथ इनका समन्वय जितना हो सकेगा उसी अनुपात में उसकी कार्य क्षमता बढ़ती चली जायगी। 
 
उपवास का प्रयोजन है आहार की संयम शीलता और सात्विकता, पापों के प्रायश्चित्त के लिए तो चांद्रायण संतापन आदि कितने ही विशिष्ट व्रत हैं। अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी एवं साप्ताहिक उपवासों का क्रम कितने ही लोग चलाते हैं। श्रावण, कार्तिक, माघ, बैसाख महीने के पूरे व्रत साधनों का विस्तृत माहात्म्य है। रमजान में रोजे तो मुसलमान भी रखते हैं। जन्माष्टमी, राम नवमी, शिवरात्रि, गंगा दशमी, नवरात्रि आदि के पर्वों पर उपवासों की परम्परा है। आहार न करने से पेट को विश्राम मिलना और उसका नई शक्ति नई स्फूर्ति अर्जित करना स्वास्थ्य की दृष्टि से तो हितकर है ही उसका प्रभाव मन पर भी पड़ता है। शारीरिक आवश्यकता भूख के रूप में प्रकट होती और आहार माँगती है। धर्म श्रद्धा के साथ जुड़ी हुई संकल्प शक्ति उस मांग को पूरा करने से इन्कार करती है। संस्कार और संकल्प के बीच विग्रह खड़ा होता है। समझा कर या बल पूर्वक संस्कार का दमन किया जाता है और धर्मबुद्धि के सहारे शरीर को सन्तोष समाधान कराया जाता है। इस अनुशासन स्थापना को तपश्चर्या कहा गया है। इस अभ्यास में अन्यान्य प्रकार की वासनाओं का दमन समाधान हो सकता है। इन्द्रिय निग्रह और मनोनिग्रह में इस सफलता से क्रमशः उत्साह साहस बढ़ता चलता है। मन को जीतना सब में बड़ी विजय है तो इस क्षेत्र में पूरी तरह सफल हो सके उसे जीवन मुक्त कहा जायेगा। उपवास की तपश्चर्या के सहारे आत्मानुशासन स्थापित करने का महत्त्व पूर्ण प्रयोजन सिद्ध होता है। 
 
उपवास किसे किस प्रकार कितना करना चाहिए? यह साधक की मनः स्थिति और परिस्थिति पर निर्भर है। पूर्ण उपवास तो वही है जो मात्र जल पर रहा जाय। आंशिक उपवास के कितने ही प्रकार हैं। () दूध, छाछ, फलों का रस, शागों का रस जैसे पेय पदार्थों पर रहना। () अन्नाहार छोड़कर शाक फल दूध आदि पर निर्वाह करना। () एक समय भोजन करना () एक अन्न, एक लगावन की रोटी, शाक दाल, भात से पेट भरना। () खिचड़ी, दलिया जैसी एक ही भगौनी से पकाई वस्तु से काम चलाना। उपवास की इन प्रक्रियाओं में से जो जितना कठिन सरल चुनाव कर सके वह उसे अपना सकता है।

अस्वाद व्रत इसी उपवास प्रक्रिया का एक अतिरिक्त भाग है। नमक, शक्कर, मसाले छोड़कर बिना स्वाद का भोजन करना इन्द्रिय निग्रह का एक बड़ा कदम है। स्वास्थ्य की दृष्टि से इसमें तनिक भी हानि नहीं। खाद्य पदार्थों में उपयोगी क्षारों की मात्रा प्रकृतितः होती है। उसमें ऊपर से नमक शक्कर आदि मिलाने की स्वास्थ्य की दृष्टि से इसमें तनिक भी आवश्यकता नहीं है। सृष्टि का कोई प्राणी ऊपर से नमक मसाले नहीं खाता। शरीर के लिए सभी आवश्यक तत्व सामान्य खाद्य पदार्थों में ही मिल जाते हैं। जीव को चटोरेपन की आदत डाल कर भोजन को अखाद्य बनाया जाता है। मन में चंचलता और तामसिकता की वृद्धि भी उन मिलावटों के कारण ही उत्पन्न होती है। 
 
अस्वाद व्रत जिह्वा इन्द्रियों का संयम है। जीभ को चटोरेपन के दुर्गुण से छुड़ा लेने में साहसिकता का समावेश है। इसे जीत लेने पर अन्य सभी इन्द्रियों पर अनुशासन स्थापित कर सकना सरल हो जाता है। इसमें भी आत्म निग्रह का आत्मानुशासन का संकल्प प्रखर होता है और इससे बढ़ा हुआ साहस अन्य कुसंस्कारी दुष्प्रवृत्तियों पर विजय पा सकने में समर्थ हो जाता है। स्वाद छूटने पर जो कुछ खाया जायेगा प्रायः वह सीमित और सात्विक ही रहता है। आहार का संयम मन का संयम होता है और उससे आत्मिक प्रगति में बड़ी सहायता मिलती है। इसलिए उपवास और इसकी एक महत्त्वपूर्ण शाखा अस्वाद व्रत का पालन तपश्चर्या में ही सम्मिलित है। उसका लगातार कितने समय तक पालन किया जाय यह साधक की इच्छा पर निर्भर है। न्यूनतम सप्ताह में एक बार इस तप के पालन का अभ्यास तो करना ही चाहिए। 
 
जप स्तवन, कीर्तन, पठन आदि जिह्वा से किये जाते हैं। इस उपकरण की शुद्धि नितान्त आवश्यक है। जिस जीभ रूपी बन्दूक से मन्त्र रूपी कारतूस चलाया जाता है उसकी सफाई पहले ही कर लेनी चाहिए। नली में कूड़ा- करकट भरा हों तो अच्छे कारतूस होने पर भी निशाना लगाना कठिन है। वंशी बजाने वाले यह देख लेते हैं कि उसके छेद साफ हैं या नहीं। मैले बर्तन में दूध दुहने या उबालने से उसके फटने की आशंका रहेगी। अशुद्ध जिह्वा के सम्बन्ध में भी है उसके द्वारा किये गये पूजा उपचार एवं मन्त्र साधन सफल नहीं होते। अस्तु उपासना को सार्थक बनाने के लिए जिह्वा शुद्ध की प्रक्रिया पर पूरा ध्यान देना चाहिए।  

कहा जा चुका है कि अभक्ष्य आहार से जिह्वा की पवित्रता और आध्यात्मिक क्षमता नष्ट होती है। इसलिए भोजन को सात्विकता पर पूरा- पूरा ध्यान देने की आवश्यकता है। स्वाद को जीतना आवश्यक है। इसके बिना आहार को सात्विक रखा ही न जा सकेगा। चटोरापन न केवल पेट के स्वास्थ्य को बिगड़ता है वरन् मानसिक चंचलता और तामसिकता का भी निमित्त होता है। भोजन पवित्र हाथों से बनाया हुआ हो। पकाने और परोसने वाले के संस्कार आहार में रहते हैं। इसलिए साधकों अपने हाथ का अथवा सुसंस्कारी हाथों का पकाया परोसा आहार लेने की व्यवस्था करनी चाहिए और हर हालत में भूख से कम ही खाना चाहिए। बेईमानी से कमाया हुआ- युद्ध में पाया हुआ धन भी बुद्धि भ्रष्ट करने का बड़ा कारण है। ऐसे धन से खरीदे गये खाद्य पदार्थ वस्त्र तथा दूसरे उपकरण आध्यात्मिक प्रगति में घोर बाधा पहुँचाते हैं। इन सब बातों ध्यान रखा जाय तो उपासना की सफलता सुनिश्चित होती है। 
 
जिह्वा का एक कार्य है आहार ग्रहण, दूसरा है उच्चारण। उच्चारण का तात्पर्य है साधक के सम्भाषण में पवित्रता का समावेश। असत्य भाषण, छल, शेखीखोरी, अवांछनीय परामर्श, अपमान, तिरस्कार कटु वचन, चुगली हिम्मत गिराना जैसे अनेक वाणी दोषों को सुधारने के लिए पूरा- पूरा ध्यान देना चाहिए इस संदर्भ में वाणी का विश्राम, निरीक्षण, संशोधन करने के लिए मौन का अभ्यास करना चाहिए। मौन को वाणी का तप कहा गया है। 
 
सुविधानुसार हर दिन जागृति स्थिति में एक दो घण्टे मौन रहने का अभ्यास करने का प्रयत्न करना चाहिए। भोजन के समय मलमूत्र विसर्जन में उपासना के समय तो मौन रहने की परम्परा भी है। इसके लिए जिस समय कम जन सम्पर्क रहता है उस समय एक दो घण्टे का मौन रखने का नियम बनाना चाहिए। सप्ताह में या महीने में एक दिन पूरा मौन रखना भी जिह्वा की अवांछनीय गतिविधियों पर रोक लगाने पुरानी आदतें भुलाने का एक अच्छा उपाय है। 
 
शक्ति संचय की दृष्टि से कम बोलना उपयोगी है। जब मनुष्य अधिक दुर्बल हो जाता है। तो उसकी वाणी बन्द हो जाती है। या लड़खड़ाने लगती है। यद्यपि होश हवाश बने रहते हैं। बोलने में अन्तः शक्तियों पर बहुत जोर पड़ता है। अनेकों अवयवों की संयुक्त शक्ति के अतिरिक्त उसमें शरीर की विद्युत शक्ति का भी एक बहुत बड़ा भाग खर्च होता है। दुर्बलता की स्थिति में उतनी सामर्थ्य न रहने से ही बोलने में कठिनाई होती है। 

‘वायस आफ साइलेन्स’ ग्रन्थ में थियोसोफी के जन्म दाताओं ने यह बताया है कि मौन रहने की स्थिति में दैवी वाणी को सुनने का अवसर मिलता है। कहने और सुनने को दोनों क्रियाएं साथ- साथ चलाने में कितनी कठिनाई होती है यह सभी जानते हैं। ईश्वर की वाणी सुनने अदृश्य लोक के दिव्य संदेशों को पकड़ने के लिए मौन धारण का अभ्यास करना उचित ही है। गायत्री उपासकों के लिए उपवास अस्वाद एवं मौन का अभ्यास करने के साथ में जिह्वा के माध्यम से की जाने वाली दोनों ही तपश्चर्याएं आवश्यक हैं। आहार की तामसिकता और अनर्गल वार्ता का संयम करने से जिह्वा में वह शक्ति उत्पन्न होती है। जिससे उसके द्वारा किया हुआ जप आराधन सफल हो सके ।। 
 
तीसरा तप है- ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य का मोटा अर्थ है। वीर्य रक्षा। स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से यह भी आवश्यक है। इस बहुमूल्य धातु का सूक्ष्म रूप ओजस् है। नेत्रों में ज्योति, वाणी में प्रभाव मस्तिष्क में स्मृति, व्यक्तित्व में प्रतिभा, शरीर में स्फूर्ति, चेहरे पर तेजस्विता मन में साहसिकता के रूप में यह ओजस् ही काम करता है। जीवन ज्योति का आलोक जिस तेल के आधार पर प्रकाशवान रहता है वह वीर्य रक्षा से ही संचित होता है। आत्मिक प्रगति के लिए प्रचण्ड संकल्प शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। भौतिक आकर्षणों से लेकर कुसंस्कारों के अवरोधों से पग- पग पर जूझना होता है। इसके लिए योद्धाओं जैसे शौर्य साहस की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए अभीष्ट शक्ति संचय की दृष्टि से ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है। दाम्पत्य जीवन का अर्थ आत्मघात नहीं है। पति पत्नी भी दो भाइयों और मित्रों की तरह दो बहिनों और सहेलियों की तरह मित्रता और प्रसन्नता भरा जीवन सरलता पूर्वक जी सकते हैं। 
 
ब्रह्मचर्य का सूक्ष्म और महत्त्वपूर्ण भाग वह है जिसमें नर नारी को और नारी नर को कामुकता की दृष्टि से न देख कर सामान्य प्राणी की तरह देखते हैं। अश्लील विचारों की वासनात्मक कुदृष्टि का समन्वय नहीं होने देते। यदि स्नेह पूर्वक एक दूसरे को देखना आवश्यक हो तो पुत्री भगिनी या माता की, पुत्र भाई या पिता की पवित्र दृष्टि रखते हुए घनिष्ठता एवं मित्रता का भी निर्वाह हो सकता है। मस्तिष्क को अनावश्यक रूप से उत्तेजित करने में चिन्तन को उच्चस्तरीय प्रयोजनों में संलग्न न होने देने में कामुकता के विचार ही अत्यधिक बाधक होते हैं। कल्पना शक्ति का महत्त्वपूर्ण भाग इन्हीं कुप्रसंगों का ताना बाना बुनने में नष्ट हो जाता है। कामुक दृष्टि रहने पर नेत्रों की दिव्य दृष्टि का बुरी तरह अपव्यय होता रहता है। ऐसा चिन्तन वीर्य पात से भी अधिक हानिकारक होता है। रति कर्म से स्थूल शरीर में जैसी हानि होती है वैसी ही कामुक शरीर से सूक्ष्म शरीर की प्राण प्रतिभा को क्षति उठानी पड़ती है इसलिए ब्रह्मचर्य की तप साधना में न केवल वीर्य रक्षा का वरन् कामुक दृष्टि को निरस्त करने का भी अनुशासन है। 
 
गायत्री माता का चित्र युवा नारी का है। उसमें पवित्रता भरी मातृ बुद्धि की श्रद्धा जमाने का एक उद्देश्य यह भी है कि नारी यौवन पर दृष्टि जाते ही उत्कृष्ट चिन्तन उभरने का अभ्यास होता रहे। सरस्वती, लक्ष्मी, काली आदि अन्य देवियों की प्रतिमाओं में भी यौवन के साथ भाव भरी श्रद्धा संजोये रहने की मान्यता है। इस प्रकार देवताओं को रूप यौवन सम्पन्न बनाकर नारी को वह अभ्यास करने का अवसर दिया गया है कि वे नर यौवन से कामुक उत्तेजना ग्रहण न करें। मीरा आदि की आराधना इस स्तर की थी। 
 
चौथी तपश्चर्या है- तितीक्षा। तितीक्षा का अर्थ है सुविधाओं का स्वेच्छा पूर्वक परित्याग और कष्ट साध्य जीवन क्रम का अभ्यास। यह कई कारणों से आवश्यक है। मितव्ययी ब्राह्मण जीवन की स्थिति अपनाने पर ही परमार्थ प्रयोजनों के लिए समय मन और धन बच सकता है। विलासी व्यक्ति की आवश्कताएं आकांक्षाएँ इतनी बढ़ी- चढ़ी होती हैं कि उसके लिए परमार्थ प्रयोजन के लिए कुछ कर सकना तो दूर सोच सकना भी कठिन पड़ता है। अल्प व्यय में निर्वाह करने वाले को कई प्रकार की असुविधाएँ सहन करनी पड़ती हैं इसका पूर्वाभ्यास तितीक्षा से ही करना पड़ता है। लोक मंगल की सेवा साधना ईश्वर उपासना का अविच्छिन्न अंग है। विराट् ब्रह्म की -विशाल विश्व की सेवा आराधना से विरत रहकर मात्र पूजा अर्चा मात्र से कोई जीवन लक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। सेवा साधन में निरत व्यक्तियों को कितने ही प्रकार से कष्ट सहन करने पड़ते हैं। परिव्राजक जीवन की कठिनाइयाँ तो सर्व विदित ही हैं। वानप्रस्थ संन्यास में भी इसी का पूर्वाभ्यास है ताकि समय आने पर अभ्यास प्रक्रिया अपनाने में कठिनाई अनुभव न हो।  

सचाई और न्याय निष्ठा अपनाने वाले को अनीति के विरुद्ध संघर्ष भी करना पड़ता है इसमें प्रतिपक्षों असुरता के प्रत्याक्रमण होने स्वाभाविक हैं। ईसा, गाँधी, सुकरात, दयानन्द, मंसूर, बन्दा वैरागी, गुरू गोविन्द सिंह के बालक जैसे असंख्यों पुरुषों को प्राण से हाथ धाने पड़े हैं। त्रास तो असंख्यों ने सहे हैं। हिंस्र व्याघ्र आदि तो आक्रमण करने से रोकने पर प्रतिरोध करने वाले पर ही टूट पड़ते हैं। असुरता की यही नीति रही है कि वह सज्जनता को अपने अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न मानती है और उस पर आक्रमण करती है। जिनके स्वार्थों को क्षति पहुँचती है वे सब अपने विराने अध्यात्मवादी से रुष्ट रहते और हानि पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं। ऐसी विपत्तियों के फँसने की जानकारी एवं तैयारी पहले से ही बनी रहे इसलिए कई प्रकार के कार्य कष्ट सहने की तितीक्षा को तपश्चर्या माना गया है और साधक को उसका अभ्यास करते रहने के लिए कहा गया है। सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास सहने का अभ्यास तितीक्षा है। भूमि शयन, बिना जूते चलना कम वस्त्रों का उपयोग भी इसी श्रेणी में आता है। बिना दूसरों की सहायता का स्वावलम्बी जीवन, अपनी शरीर यात्रा के कार्य अपने हाथों करने का अभ्यास भी इसी प्रयोजन के लिए है। कपड़े धोना, हजामत बनाना जैसे दैनिक आवश्यकता के काम बिना दूसरों की सहायता लिए करने के नियम इसी तितीक्षा तप के अन्तर्गत आते हैं।

पाँचवाँ तप है अनुदान। अपने सुविधा साधनों में कमी करके उस बचत को सत्प्रयोजन में लगाते रहना अनुदान अथवा अंशदान है। समय दान, श्रम दान, धन दान, ज्ञानदान आदि इसी वर्ग में आते हैं। अपने धर्म कृत्यों में से प्रत्येक के साथ किसी न किसी रूप में दान देने का विधान जुड़ता हुआ है। विविध प्रकार के दान पुण्यपरमार्थ एवं धर्म कृत्य माने गये हैं। अंशदान का अर्थ है अपना उपार्जन। उसका एक न्यूनतम अंश ही अपने निर्वाह में खर्च करना शेष को परमार्थ में लगा देना तपश्चर्या का एक रूप है। समय दान और धन दान का न्यूनतम अनुदान युग- निर्माण परिवार के सदस्यों को ज्ञान यज्ञ के लिए प्रस्तुत करना पड़ता है। ज्ञानघटों की स्थापना से इसी तपश्चर्या का शुभारम्भ होता है। अपने युग का सबसे बड़ा परमार्थ ज्ञान यही माना गया है। हमें प्राचीन काल के ऋषियों महामानवों और देव पुरुषों की तरह बढ़ा- चढ़ा अंशदान पीड़ा और पतन का समय निवारण कर सकने वाले ज्ञान दान के निमित्त करते रहना चाहिए। तपश्चर्या का यह पंचम चरण है। इन पाँचों को किसी न किसी रूप में कार्यान्वित करके गायत्री उपासना के वास्तविक सत्परिणाम देखने का अवसर प्राप्त करना चाहिए।



रविवार का व्रत उपवास - गायत्री अनुष्ठान का विज्ञान और विधान

अनुष्ठान काल में व्रत उपवास का विशेष महत्व है। यों तो उपवास का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने में बड़ा महत्व है ही। इससे पेट के पाचन यंत्रों को उपवास से विश्राम मिलता है, फलस्वरूप वे शक्ति संचय करके और भी अधिक उत्साह से काम करने लगते हैं। कर्मचारियों को साप्ताहिक छुट्टी मिलती है, नगरों के बाजार भी सप्ताह में एक दिन बन्द रहते हैं। इससे घाटा किसी को नहीं वरन् सभी को लाभ है। एक दिन छुट्टी मिलने से छैः दिन की थकान मिटाने और अगले छैः दिन तक उत्साह पूर्वक काम करने के लिए शक्ति संचय का अवसर मिल जाता है। दिन में ठीक प्रकार काम तभी हो सकता है जब रात में सोने की छुट्टी मिले। यदि कोई लोभी इस छुट्टी से हानि की संभावना समझ कर दिन रात काम ही करता रहे तो इससे उसका कल्पित अतिरिक्त लाभ तो मिलेगा नहीं, शक्ति के समाप्त हो जाने से उलटी हानि ही होगी।

पेट को विश्राम देने की समस्या भी ठीक इसी प्रकार की है। इससे पेट की कमजोरी दूर होती है, जो अपच आमाशय एवं आंतों में जमा है वह इस विश्राम के दिन पच जाता है। दफ्तर के जिन बाबुओं के पास बहुत काम रहता है और कागज रोज नहीं निपट पाते वे उस पिछड़े हुए काम को छुट्टी के दिन पूरा कर लेते हैं। पेट के बारे में भी यही बात है। यदि पिछला अपच जमा है तो उसे वह उपवास के दिन पचाकर शरीर को उदर व्याधि से ग्रस्त होने बचा लेता है। सारी बीमारियों की जड़ अपच है। यदि पेट को विश्राम देते रह कर अपच से बचे रहा जाय तो बीमारियों से आसानी के साथ छुटकारा प्राप्त हो सकता है। रोग ग्रस्त होकर लोग बहुत कष्ट पाते हैं और धन व्यय करते हैं। दुर्बलता के कारण उनका उपार्जन कार्य एवं इन्द्रिय बल घट जाता है, इससे दरिद्रता और निराशा की चिन्ताजनक परिस्थितियों में पड़ना पड़ता है। उपवास में कुछ विशेष कष्ट नहीं है पर लाभ बहुत है।

मानसिक चिन्ताओं दुर्गुणों और कुविचारों का समाधान करने में भी उपवास का विशेष महत्त्व है। पापों के प्रायश्चित में उपवास कराया जाता है। इसे आत्म दंड भी माना जाता है पर वास्तविकता यह है कि अन्न दोष के कारण जो विक्षेप मन में उठते रहते हैं वे उपवास के समय नहीं उठते और आत्मा के सतोगुण को विकसित होने का अवसर मिल जाता है। यह अनुभव की बात है कि जिस दिन उपवास रखा जाता है उस दिन कुविचार बहुत कम आते हैं, कुसंस्कार दबे रहते हैं और पाप कर्मों की ओर सहज ही अरूचि होती है। बारबार उपवास करते रहने से यह सत् प्रवृत्तियाँ अभ्यस्त होती जाती हैं और दिन- दिन मनुष्य अधिक सतोगुणी बनता जाता है। आत्म उत्कर्ष और मानसिक सुधार के लिए उपवास का इतना अधिक लाभ है उसे धर्मव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

गायत्री परिवार में साप्ताहिक उपवास रविवार को किया जाता है। गायत्री के देवता सविता अर्थात् सूर्य। सूर्य का दिन रविवार है। इस दिन का कुछ विशेष वैज्ञानिक महत्व है। उपवास करने वाले व्यक्ति की आत्मा सविता देवता से विकीर्ण होने वाली सूक्ष्म आध्यात्मिक तरंगों को अधिक मात्रा में ग्रहण करती है फलस्वरूप उसे शारीरिक और मानसिक ही नहीं, कुछ विशेष आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त होते हैं। इस दृष्टि से अन्य दिनों की अपेक्षा रविवार के दिन उपवास रखने का माहात्म्य इस प्रकार वर्णन किया गया है।

एक समय शौनक ऋषि के आश्रम में अति बुद्धिमान सूतजी ने आगमन किया उस समय शौनक अनेक ऋषियों के सहित स्वयं वहाँ विराजमान थे। शौनक ने सूतजी को आते देख सम्पूर्ण शिष्यों के सहित पृथ्वी पर गिरकर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया एवं बैठने के लिए दिव्य आसन देकर स्वयं सम्पूर्ण मुनियों सहित स्वस्थान में विराजे। मुनियों की श्रद्धा को देखकर सूतजी ने कहा हे मुनियों ! मैं आप लोगों के समक्ष रविवार के व्रत को सविस्तार वर्णन करता हूँ उसे आप लोग ध्यान पूर्वक सुनें। एक समय नारद ऋषि घूमते हुए पृथ्वी के अग्निकोणस्थित कोणार्क नामक पवित्र स्थान में पहुँचे। वह स्थान लवण समुद्र के समीप एक पवित्र भूमि है वहाँ श्री, कृष्णवीर्योत्पन्न जाम्ववती के पुत्र साम्व को कुष्ट रोग से पीड़ित देख उन्होंने पूछा- हे साम्व को आपका रूप इस प्रकार कुरूप क्यों हुआ, उसे आप सविस्तार वर्णन करें।

नारद के उपर्युक्त वचन को सुनकर भक्ति पूर्वक साम्व ने प्रणाम कर कहा- हे प्रभु ! आप तो सर्वज्ञ हैं अतः आपको सर्वविदित ही है मैं क्या कहूँ जो आप मुझे पूछ रहे हैं। आपके आदेश पालने हेतु मैं बता रहा हूँ। हे मुनि ! किसी कारण से पिता ने मुझ पर क्रोधित होकर कुष्ठ रोगी होओ कह कर श्राप दिया। हे गुरूदेव ! मुझे इससे मुक्ति का कोई उपाया बतावें, मैं आपसे इतनी विनती करता हूँ।

ऋषि श्रेष्ठ नारद साम्व का वचन सुनकर बोले हे साम्व ! इस रोग से मुक्ति पाने के लिए आप रविवार का व्रत करें जिसे ब्रह्मादि देवताओं ने करके सद्गति प्राप्त की एवं सर्वजनों का मनोरथ पूरक यह व्रत है। इस व्रत को करने वाला अचल सम्पत्ति प्राप्त कर सम्पूर्ण रोगों से मुक्ति प्राप्त करता है। इसी रविवार व्रत के करने से ब्रह्मा ने रचना शक्ति प्राप्त की तथा इन्द्र देव इसी के प्रभाव से हजारों लोक विचरण कर ‘‘सहस्राक्ष’’ कहलाए। कुबेर इस व्रत को कर धनवान बने, यम ने भी प्राणी हत्या से मुक्ति प्राप्त की, अग्नि ने सर्व भक्षण किया पर उनको इसके प्रभाव से एक भी दोष न लगा। अनेक युग तक राक्षस राज सुकेश भी इसके वरदान से जीवित रहा। सप्तव्दीप विख्यात नल राजा ने इस व्रत को करके पुनः स्वराज्य तथा पत्नी को प्राप्त किया ।। कृपालु प्रभु रामचन्द्र ने इसी के प्रभाव से रावण का वध किया। धर्मपुत्र युधिष्ठिर महाभारत युद्ध में कौरव दल को जीत कर समस्त पृथ्वी के राजा हुए। इन्हीं का ध्यान कर देवताओं का वास स्थान स्वर्ग में हुआ। मैं भी उन्हीं सूर्य की कृपा से श्वासत परब्रह्म होकर सर्वस्थान का दर्शन कर रहा हूँ। अतः आप भी इस महिमामयी व्रत को कर सर्वदा शुभफल की अभिलाषा करें।

नारद के मुख से साम्व ने श्रद्धापूर्वक रविवार व्रत का माहात्म्य सुना और वह संकल्प पूर्वक व्रत करके पित् श्राप से मुक्ति पाकर संपत्ति युक्त हुए एवं इस लोक में ऐश्वर्यशाली होकर अन्तकाल में बैकुण्ठ धाम को प्राप्त हुए। यह रविवार व्रत उसी दिन से इस मंडल में विख्यात हुआ।

गायत्री उपासना में विशेष रूप से रविवार का व्रत किया जाता है। उस दिन अपनी सामर्थ्यानुसार निराहार, फलाहार, दुग्धाहार, स्वल्पाहार, अस्वाद करके पूर्ण या आंशिक उपवास करना चाहिए। विशेष तपश्चर्या के रूप में दिन में चौबीस हजार लघु अनुष्ठान, चालीस दिन में सवा लक्ष का अनुष्ठान, दो वर्ष में २४ लाख का महाअनुष्ठान किया जाता है।



अनुष्ठान विधि - गायत्री अनुष्ठान का विज्ञान और विधान

अनुष्ठान किसी भी मास में किया जा सकता है। तिथियों में पंचमी, एकादशी, पूर्णमासी शुभ मानी गई हैं। पंचमी को दुर्गा, एकादशी को सरस्वती, पूर्णमासी को लक्ष्मी तत्व की प्रधानता रहती है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों में से किसी का निषेध नहीं है, पर कृष्ण पक्ष की अपेक्षा शुक्ल पक्ष अधिक शुभ है ।।

अनुष्ठान आरम्भ करते हुए नित्य गायत्री का आवाहन और अन्त करते हुए विसर्जन करना चाहिए। इस प्रतिष्ठा में भावना और निवेदन प्रधान है। श्रद्धा पूर्वक ‘भगवती’ जगज्जननी भक्त- वत्सला गायत्री यहाँ प्रतिष्ठित होने का अनुग्रह कीजिये। ऐसी प्रार्थना संस्कृत या मातृभाषा में करनी चाहिए और विश्वास करना चाहिए कि प्रार्थना को स्वीकार करके वे कृपापूर्वक पधार गई हैं। विसर्जन करते समय प्रार्थना करनी चाहिए कि ‘‘आदि शक्ति, भयहारिणाी, शक्तिदायिनी, तरणतारिणी मातृके ! अब विसर्जित हूजिये’’ इस भावना को संस्कृत या अपनी मातृ भाषा में कह सकते हैं। इस प्रार्थना के साथ- साथ यह विश्वास करना चाहिए कि प्रार्थना स्वीकृत करके वे विसर्जित हो गई हैं।

कई ग्रन्थों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि जप से दसवाँ भाग हवन, हवन से दसवाँ भाग तर्पण, तर्पण से दसवाँ भाग ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। यह नियम तन्त्रोक्त रीति से किये हुए पुरश्चरण के लिए है। इन पंक्तियों में वेदोक्त योग विधि की दक्षिण मार्गी साधना बताई जा रही है, इसके अनुसार तर्पण की आवश्यकता नहीं है। अनुष्ठान के अंत में १०८ आहुति का हवन तो कम से कम होना आवश्यक है, अधिक सामर्थ्य और सुविधा के अनुसार है। इसी प्रकार त्रिपदी गायत्री के लिए कम से कम तीन ब्राह्मणों का भोजन भी होना ही चाहिए। दान के लिए इस प्रकार की कोई मर्यादा नहीं बाँधी जा सकती। यह साधक की श्रद्धा का विषय है पर अंत में दान करना अवश्य चाहिए।

किसी छोटी चौकी, चबूतरी या आसन पर फूलों का एक छोटा सुन्दर- सा आसन बनाना चाहिए और उस पर गायत्री की प्रतिष्ठा होने की भावना करनी चाहिए। साकार उपासना के समर्थक भगवती का कोई सुन्दर- सा चित्र अथवा प्रतिमा को उन फूलों पर स्थापित कर सकते हैं। निराकार के उपासक निराकार भगवती की शक्ति पुञ्ज का एक स्फुल्लिंग वहाँ प्रतिष्ठित होने की भावना कर सकते हैं। कोई- कोई साधक धूपबत्ती की, दीपक की अग्नि- शिखा में भगवती की चैतन्य ज्वाला का दर्शन करते हैं और उस दीपक या धूपबत्ती को फूलों पर प्रतिष्ठित करके अपनी आराध्य शक्ति की उपस्थिति अनुभव करते हैं। विसर्जन के समय प्रतिमा को हटाकर शयन करा देना चाहिए। पुष्पों को जलाशय या पवित्र स्थान में विसर्जित कर देना चाहिए। अधजली धूपबत्ती या रूईबत्ती को बुझाकर उसे भी पुष्पों के साथ विसर्जित कर देना चाहिए। दूसरे दिन जली हुई बत्ती का प्रयोग फिर न होना चाहिए।

गायत्री पूजन के लिए पाँच वस्तुएं प्रधान रूप से मांगलिक मानी गई हैं। इन पूजा- पदार्थों में वह प्राण है, जो गायत्री के अनुकूल पड़ता है। इसलिए पुष्प- आसन पर प्रतिष्ठित गायत्री के सन्मुख धूप जलाना, दीपक स्थापित रखना, नैवेद्य चढ़ाना, चन्दन लगाना तथा अक्षतों की वृष्टि करनी चाहिए। अगर दीपक या धूप को गायत्री की स्थापना में रखा गया है तो उसके स्थान पर जल का अर्घ्य देकर पाँचवें पूजा- पदार्थ की पूर्ति करनी चाहिए।

पूर्ववर्णित विधि से प्रातःकाल पूर्वाभिमुख होकर शुद्ध भूमि पर शुद्ध होकर कुश के आसन पर बैठे। जल का पात्र समीप रख लें धूप और दीपक जप के समय जलते रहने चाहिए बुझ जाय तो उस बत्ती को हटाकर नई बत्ती डाल कर पुनः जलाना चाहिए। दीपक या उसमें पड़े हुए घृत को हटाने की आवश्यकता नहीं है।

पुष्प आसन पर गायत्री की प्रतिष्ठा और पूजा के अनन्तर जप प्रारम्भ कर देना चाहिए। नित्य यही क्रम रहे। प्रतिष्ठा और पूजा अनुष्ठान- काल में नित्य होते रहने चाहिए। जप के समय मन को श्रद्धान्वित रखना चाहिए, स्थिर बनना चाहिए। मन चारों ओर न दौड़े इसलिए पूर्ववर्णित ध्यान- भावना के अनुसार गायत्री का ध्यान करते हुए जप करना चाहिए। साधना के इस आवश्यक अंग- ध्यान में- मन लगा देने से वह एक कार्य में उलझा रहता है और जगह- जगह नहीं भागता। भागे तो उसे रोक- रोककर बार- बार ध्यान- भावना पर लगाना चाहिए। इस विधि से एकाग्रता की दिन- दिन वृद्धि होती चलती है।

सवालक्ष जप को चालीस दिन में पूरा करने का क्रम पूर्वकाल से चला आता है, पर निर्बल अथवा कम समय तक साधना कर सकने वाले साधक उसे दो मास में भी समाप्त कर सकते हैं। प्रतिदिन जप की संख्या बराबर होनी चाहिए, किसी दिन ज्यादा, किसी दिन कम ऐसा क्रम ठीक नहीं। यदि चालीस दिन में अनुष्ठान पूरा करना हो तो १,२५,०००/४० =३, १२५ मन्त्र नित्य जपने चाहिए। माला में १०८ दाने होते हैं, इतने मन्त्रों की ३१२५/१०८=२९ इस प्रकार उन्तीस मालायें नित्य जपनी चाहिए। यदि दो मास में जप करना हो तो १,२५,०००/६० = २०८० मन्त्र प्रतिदिन जपने चाहिए। इन मंत्रों की मालायें २०८०/१०८=२०मालायें प्रतिदिन जपनी चाहिए। माला की गिनती याद रखने के लिए खड़िया मिट्टी को गङ्गाजल में सानकर छोटी- छोटी गोली बना लेनी चाहिए और एक माला जपने पर गोली एक स्थान से दूसरे स्थान पर रख देनी चाहिए। इस प्रकार जब सब गोलियाँ इधर से उधर हो जायें तो जप समाप्त कर देना चाहिए। इस क्रम से जप संख्या में भूल नहीं पड़ती।

अनुष्ठान के दिनों में ब्रह्मचर्य से रहना आवश्यक है सिर के बाल नहीं काटने चाहिए। ठोड़ी की हजामत अपने हाथ ही बनानी चाहिए। चारपाई या पलंग का त्याग करके चटाई या तख्त पर सोना चाहिए। उनकी कठोरता कम करने के लिए ऊपर गद्दे बिछाये जा सकते हैं। आहार विहार सात्विक रहना चाहिए। मद्य मांस तो पूर्ण रूप से त्याग देना उचित है। अन्य नशीली, बासी, बुरी, गरिष्ठ, चटपटी, तामसिक, उष्ण उत्तेजक वस्तुओं से बचने का यथा सम्भव प्रयत्न करना चाहिए। कुविचार, कुकर्म, विलासिता, अनीति आदि बुराइयों से वैसे तो सदा ही बचना चाहिए पर अनुष्ठान काल में इनका विशेष ध्यान रखना चाहिए ।। जनन या मृत्यु क सूतक हो जाने पर सूतक निवृत्ति तक अनुष्ठान स्थगित रखना चाहिए। शुद्धि होने पर उसी संख्या से आरम्भ किया जा सकता है जहां से बन्द किया था। इस विशेष काल के प्रायश्चित के लिए एक हजार मन्त्र विशेष रूप से जपने चाहिए। अनुष्ठान काल में अपने शरीर और वस्त्रों का दूसरों से जहाँ तक हो सके कम ही स्पर्श होने देना चाहिए। उस अवधि में एक समय अन्नाहार दूसरे समय फल या दूध लेकर अर्द्धउपवास का क्रम चल सके तो बहुत उत्तम है। इनके अतिरिक्त उन नियमों को भी पालन करना चाहिए जो दैनिक सर्व सुलभ साधनाओं के प्रकरण में लिखे गये हैं।

अनुष्ठान के आरम्भ में पूजन करना चाहिए। शीशे में मढ़ी हुई गायत्री की तस्वीर या प्रतिमा को सामने रख कर धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन, अक्षत, पुष्प, जल आदि मांगलिक पदार्थों से पूजा करनी चाहिए। पूजा से पूर्व आह्वान मन्त्र पढ़ना चाहिए और प्रतिदिन जप समाप्त करते समय विसर्जन मन्त्र पढ़ना चाहिए। दोनों मन्त्र निम्न प्रकार हैं-
गायत्री का आह्वान मन्त्र-
आयातु वरदा देवी अक्षरं ब्रह्म वादिनी ।।
गायत्री छन्दसां माता ब्रह्मयोने नमोस्तुते
गायत्री विसर्जन का मन्त्र-
उत्तमे शिखरे देवि भूम्यां पर्वतमूधर्नि ।।
ब्राह्मणेभ्योह्यनुज्ञातं गच्छदेवि यथासुखम्

अनुष्ठान का पथ- प्रदर्शक एवं संरक्षक किसी आचार्य को ब्रह्मा रूप में वरण करना चाहिए। अनुष्ठान भी एक यज्ञ है। यज्ञ में पुरोहित या ब्रह्मा न हो तो वह निष्फल होता है। इसी प्रकार  अनुष्ठान का पुरोहित या ब्रह्मा नियुक्त करना आवश्यक है। यदि वरण किया हुआ ब्रह्मा नित्य उपस्थित न हो सके तो उसके चित्र की अथवा उसका प्रतिनिधि मान कर स्थापित किए हुए नारियल की पूजा करनी चाहिए। गायत्री तथा ब्रह्मा रूपी आध्यात्मिक माता पिताओं का पूजन करने के उपरान्त ब्रह्म संध्या के पाँच कोष (आचमन, शिखा बन्धन, प्राणायाम, अघमर्षण, न्यास) करके जप आरम्भ कर देना चाहिए। जप के अन्त में आरती करनी चाहिए और बची हुई पूजा सामग्री को कि सी पवित्र स्थान में तथा जल को सूर्य की ओर विसर्जित कर देना चाहिए। यदि प्रातः सायं दो बार में अनुष्ठान करना हो तो प्रातःकाल के लिए अधिक संख्या मे और सायं काल के लिए उससे कम जप रखना चाहिए। दोनों ही बार पूजन संध्या के उपरान्त जप होना चाहिए।

कई ग्रन्थों में ऐसा उल्लेख है कि शापमोचन, कवच, कीलक, अर्गल, मुद्रा के साथ जप करना और जप से दसवां भाग हवन, हवन से दसवां भाग तर्पण, तर्पण से दसवाँ भाग ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। यह नियम तन्त्रोक्त रीति से किये हुए गायत्री पुरश्चरण के लिए है। इन पंक्तियों में वेदोक्त योग विधि से दक्षिण मार्गी साधना बताई जा रही है। इसमें अन्य विधियों की आवश्यकता तो नहीं है, पर हवन और दान आवश्यक है।

अनुष्ठान के अंत में १०८ आहुतियों का हवन अवश्य करना चाहिए, तदनन्तर शक्ति के अनुसार दान और ब्रह्मभोज करना चाहिए। ब्रह्मभोज उन्हीं ब्राह्मणों को कराना चाहिए जो वास्तव में ब्राह्मण हैं, वास्तव में ब्रह्म- परायण हैं। कुपात्रों को दिया हुआ दान और कराया हुआ भोजन निष्फल जाता है, इसलिए निकटस्थ या दूरस्थ सच्चे ब्राह्मणों को ही भोजन कराना चाहिए। हवन की विधि नीचे लिखते हैं-





सदैव शुभ गायत्री यज्ञ - गायत्री अनुष्ठान का विज्ञान और विधान

गायत्री अनुष्ठान के अन्त में या किसी भी शुभ अवसर पर ‘‘गायत्री- यज्ञ’’ करना चाहिए। जिस प्रकार वेदमाता की सरलता, सौम्यता, वत्सलता, सुसाध्यता प्रसिद्ध है उसी प्रकार गायत्री हवन भी अत्यन्त सुगम है। इसके लिए बड़ी भारी मीन- मेख निकालने की या कर्मकाण्डी पण्डितों का ही आश्रय लेने की अनिवार्यता नहीं है। साधारण बुद्धि के साधक इसको स्वयमेव भली प्रकार कर सकते हैं।

कुण्ड खोदकर या वेदी बनाकर दोनों ही प्रकार हवन किया जा सकता है। निष्काम बुद्धि से आत्म कल्याण के लिए किये जाने वाले हवन, कुण्ड खोदकर करना ठीक है और किसी कामना से मनोरथ की पूर्ति के लिए किये जाने वाले यज्ञ वेदी पर किये जाने चाहिए। कुण्ड या वेदी की लम्बाई- चौड़ाई साधक के अंगुलों से चौबीस- अंगुल होनी चाहिए। कुण्ड खोदा जाय तो उसे चौबीस अंगुल ही गहरा भी खोदना चाहिए और इस प्रकार तिरछा खोदना चाहिए कि नीचे पहुँचते- छः अंगुल चौड़ा और छः अंगुल लम्बा रह जावे। वेदी बनानी हो तो पीली मिट्टी की चार अंगुल ऊँची वेदी चौबीस- अंगुल लम्बी चौड़ी बनानी चाहिए। वेदी या कुण्ड को हवन करने से दो घण्टे पूर्व केवल पानी से इस प्रकार लीप देना चाहिए कि वह समतल हो जावे, ऊँचाई- नीचाई अधिक न रहे। कुण्ड या वेदी से चार अंगुल हटकर एक छोटी- सी नाली दो अंगुल गहरी खोदकर उसमें पानी भर देना चाहिए। वेदी या कुण्ड के आस- पास गेहूँ का आटा, हल्दी, रोली आदि मांगलिक द्रव्यों से चौक पूर कर चित्र- विचित्र बना कर अपनी कलाप्रियता का परिचय देना चाहिए। यज्ञ- स्थल को अपनी सुविधानुसार मण्डप, पुष्प- पल्लव आदि से जितना सुन्दर एवं आकर्षक बनाया जा सके उतना अच्छा है।

वेदी या कुण्ड के ईशानकोण में कलश स्थापित करना चाहिए। मिट्टी या उत्तम धातु के बने हुए कलश में पवित्र जल भर कर उसके मुख में आम्र- पल्लव रखने चाहिए और ऊपर ढक्कन में चावल, गेहूँ का आटा, मिष्ठान्न अथवा कोई अन्य मांगलिक द्रव्य रख देना चाहिए। कलश के चारों ओर हल्दी से स्वस्तिक (सन्थिया) अंकित कर देना चाहिए। कलश के समीप एक छोटी चौकी या वेदी पर पुष्प और गायत्री की प्रतिमा, पूजन सामग्री रखनी चाहिए।

वेदी या कुण्ड के तीन ओर आसन बिछाकर इष्ट मित्रों, बन्धु- बान्धवों सहित बैठना चाहिए। पूर्व दिशा में जिधर कलश और गायत्री स्थापित है, उधर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण अथवा अपने वयोवृद्ध को आचार्य वरण करके बिठाना चाहिए, वह इस यज्ञ का ब्रह्मा है। यजमान पहले ब्रह्मा के दाहिने हाथ में सूत्र (कलावा) बाँधे रोली या चन्दन से उनका तिलक करे, चरण स्पर्श करे तथा पुष्प, फल, मिष्ठान्न की एक छोटी- सी भेंट उनके सामने उपस्थित करें। तदुपरांत ब्रह्मा उपस्थित सब लोगों को क्रमशः अपने पास बुलाकर उनके दाहिने हाथ में कलावा बाँधे मस्तक पर रोली का तिलक करें और उनके ऊपर अक्षत छिड़क कर आशीर्वाद के मङ्गल वचन बोलें।

यजमान को पश्चिम की ओर बैठना चाहिए, उसका मुख पूर्व को रहे। हवन सामग्री और घृत अधिक हो तो उसे कई पात्रों में विभाजित करने के लिए कई आदमी हवन करने बैठ सकते हैं। सामग्री थोड़ी हो तो यजमान हवन सामग्री अपने पास रखें और उसकी पत्नी घृत- पात्र सामने रखकर चम्मच (श्रुवा) सँभाले। पत्नी न हो तो भाई या मित्र घृत- पात्र लेकर बैठ सकता है। समिधायें सात प्रकार की होती हैं। यह सब प्रकार की न मिल सकें तो जितने प्रकार की मिल सकें, उतने प्रकार की ले लेनी चाहिए। हवन सामग्री, त्रिगुणात्मक साधना में आगे दी हुई हैं। वे तीनों गुण वाली लेनी चाहिए, पर आध्यात्मिक हवन हो तो सतोगुणी सामग्री आधी और चौथाई- चौथाई रजोगुणी, तमोगुणी लेनी चाहिए। यदि किसी भौतिक कामना के लिए हवन किया गया हो तो रजोगुणी आधी और सतोगुणी, तमोगुणी चौथाई- चौथाई लेनी चाहिए। सामग्री को भले प्रकार साफ कर धूप में सुखा कर जौकुट कर लेना चाहिये। सामग्रियों की किसी वस्तु के न मिलने पर या कम मिलने पर उसका भाग उसी गुण वाली दूसरी औषधि को मिलाकर किया जा सकता है।

उपस्थित लोगों में जो हवन की विधि में सम्मिलित हों, वे स्नान किये हुए हों। जो लोग दर्शक हों, वे थोड़ा हटकर बैठें। दोनों के बीच थोड़ा फासला होना चाहिये।

हवन आरम्भ करते हुए यजमान ब्रह्मसंध्या के आरम्भ में प्रयोग होने वाले पंचकोषों (आचमन, शिखाबन्धन, प्राणायाम,अघमर्षण तथा न्यास) की क्रियायें करें। तत्पश्चात् वेदी या कुण्ड पर समिधायें चिनकर कपूर की सहायता से गायत्री मंत्र के उच्चारण सहित अग्नि प्रज्वलित करें। सब लोग साथ- साथ मन्त्र बोलें और अन्त में स्वाहा के साथ घृत तथा सामग्री वाले उनका हवन करें। आहुति के अन्त में चम्मच में से बचे हुए घृत की एक- एक बूँद पास में रखे हुए जल पात्र में टपकाते जाना चाहिए और आदि ‘शक्तिगायत्र्यै इदन्नमम’ का उच्चारण करना चाहिए। हवन के साथ- साथ बोलते हुए मधुर स्वर से मंत्रोच्चारण करना उत्तम है। उदात्त अनुदान और स्वरित के अनुसार होने न होने की इस सामूहि सम्मेलन में शास्त्रकारों को छूट दी हुई है।

आहुतियाँ कम से कम १०८ होनी चाहिए। अधिक इससे दो, तीन, चार या चाहे जितने गुने किये जा सकते हैं। सामग्री कम से कम प्रति आहुति के लिये तीन मासे के हिसाब से ३२ तोले अर्थात् करीब ६॥ छटाँक और धूत एक मासे प्रति आहुति के हिसाब से २॥ छँटाक होना चाहिए। सामर्थ्यानुसार इससे अधिक चाहे जितना बढ़ाया जा सकता है। ब्रह्मा माला लेकर बैठे और आहुतियाँ गिनता रहे। जब पूरा हो जाये तो आहुतियाँ समाप्त करा दे। उस दिन बने हुये पकवान मिष्ठान्न आदि में से अलौने और मधुर पदार्थ लेने चाहिए। नमक मिर्च मिले हुए शाक, अचार, रायते आदि का अग्नि होमने का निषेध है। इस भोजन में से थोड़ा- थोड़ा भाग लेकर वे सभी लोग चढ़ावें जिन्होंने स्नान किया है और हवन में भाग लिया है ।। अन्त में एक नारियल की भीतरी गिरी का गोला लेकर उसमें छेद करके यज्ञशेष घृत भरना चाहिये और खड़े होकर पूर्णाहुति के रूप में उसे अग्नि में समर्पित कर देना चाहिये। यदि कुछ सामग्री बची हो तो वह सब इसी समय चढ़ा देनी चाहिए।

इसके पश्चात् सब लोग खड़े होकर यज्ञ की चार परिक्रमा करें और ‘इदन्नमम’ का पानी पर तैरता हुआ घृत उँगली से लेकर पलकों पर लगावें। हवन की बुझी हुई भस्म लेकर सब लोग मस्तक पर लगावें। कीर्तन या भजन गायन करें और प्रसाद वितरण करके सब लोग प्रसन्नता और अभिवादन पूर्वक विद हों। यज्ञ की सामग्री को दूसरे दिन किसी पवित्र स्थान में विसर्जित करना चाहिए। यह गायत्री यज्ञ अनुष्ठान के अन्त में नहीं हो सकता, अन्य शुभ कर्मों में किया जा सकता है। प्रयोजन के अनुरूप ही साधक भी जुटाने पड़ते हैं। लड़ाई के लिए युद्ध सामग्री जमा करनी पड़ती है और जिस प्रकार का व्यापार हो उसके लिए उस तरह का सामान इकट्ठा करना होता है भोजन बनाने वाला रसोई सम्बन्धी वस्तुएँ लाकर अपने पास रखता है और चित्रकार को अपनी आवश्यक चीज जमा करनी होती है। व्यायाम करने की और दफ्तर जाने की पोशाक में अन्तर रहता है। जिस प्रकार की साधना करनी होती है, उसी के अनुरूप, उन्हीं तत्वों वाली, उन्हीं प्राणों वाली, उन्हीं गुणों वाली सामग्री उपयोग में लानी होती है। सबसे प्रथम यह देखना चाहिए कि हमारी साधना किस उद्देश्य के लिए है? सत, रज ,तम में किसी तन्त्र की वृद्धि के लिए है। जिस प्रकार की साधना हो, इसी प्रकार की साधना- सामग्री व्यवहृत करनी चाहिए। नीचे सम्बन्ध में एक विवरण दिया जाता है-

सतोगुण-

माला- तुलसी। आसन- कुश। पुष्प- श्वेत। पात्र- ताँबा। वस्त्र- सूत (खादी)। मुख- पूर्व को ।। दीपक में घृत- गौ। तिलक- चन्दन। हवन में समिधा- पीपल, बड़,गूलर। हवन सामग्री- श्वेत चन्दन, अगर, छोटी इलयची, लोंग, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, शतावरि, खस, शीतल चीनी, आँवला, इन्द्रजौ, वंशलोचन, जावित्री, गिलोय, बच, नेत्रवाला, मुलहठी, कमल केशर, बड़ की जटाएं, नारियल बादाम, दाख, जौ, मिश्री।

रजोगुण-

माला- चन्दन। आसन- सूत। पुष्प- पीले। पात्र- काँसा। वस्त्र- रेशम। मुख- उत्तर को। दीपक में घृत- भैंस का घृत। तिलक- रोली। समिधा- आम, ढाक, शीशम। हवन- सामग्री, बड़ी इलायची, केशर, छारछबीला, पुनर्नवा, जीवन्ती, कचूर, तालीस पत्र, रास्ना, नागरमोथा, उन्नाव, तालमखाना, मोचरस, सोंफ, चित्रक, दालचीनी, पद्माख, छुहारा, किशमिश, चावल, खाँड़

तमोगुण-

माला- रूद्राक्ष। आसन- ऊन। पुष्प- हल्के या गहरे लाल। पात्र- लोहा। वस्त्र- ऊन। मुख- पश्चिम को ।। दीपक में घृत- बकरी का। तिलक -भस्म का। समिधा- बेल, छोंकर, करील। सामग्री- रक्त चन्दन, तगर, असगन्ध, जायफल, कमलगट्टा, नागकेशर, पीपर बड़ी, कुटली, चिरायता, अपामार्ग, काकाड़ासिंगी, पोहकरमूल, कुलञ्जन, मूसली स्याह, मेथी के बीच, काकजंघा, भारङ्गी, अकरकरा, पिस्ता, अखरोट, चिरोंजी, तिल, उड़द, गुड़।

गुणों के अनुसार साधना- सामग्री उपयोग करने से साधक में उन्हीं गुणों की अभिवृद्धि होती है, तदनुसार सफलता का मार्ग अधिक सुगम हो जाता है।

नित्य हवन विधि
गायत्री उपासना से हवन का घनिष्ठ सम्बन्ध है। गायत्री उपासक को अपनी सुविधा और स्थिति के अनुसार हवन भी करते रहना चाहिए। बड़े यज्ञों का ‘यज्ञ विधान’ तथा छोटे हवनों की ‘हवन विधि’ छापी जा चुकी है। पर जिन्हें नित्य हवन करना हो, या जिनके पास बहुत ही कम समय हो उनके लिए और भी संक्षिप्त विधि नीचे दी जा रही है। जप के बाद हवन किया जाता है। हवन करना हो तो विसर्जन, अर्घ्यदान आदि उपासना समाप्ति की क्रियाएँ यज्ञ के बाद ही करनी चाहिए। हवन में यदि अन्य व्यक्ति भी भाग लें तो उनसे ब्रह्मसंध्या कराके तब हवन में सम्मिलित करना चाहिए।

दैनिक हवन
() अग्नि स्थापन- कुण्ड या वेदी को शुद्ध करके उस पर समिधाएँ चिन लें फिर अग्निस्थापन के लिए चम्मच से कपूर या घी में भिगोई हुई बत्ती को जलाकर उन समिधाओं के बीच में स्थापित करें। मंत्र-
ॐ भूर्भुवः स्वः स्वर्द्यौरिव भूम्ना पृथिवीववरिम्णा
तस्यातेपृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नदमन्नाद्यायादधे॥
अग्निं दूतं पुरो धते हव्यवामुपब्रुबेदेवांऽआसादयादिह
अग्नये नमः। अग्निं आवाहयामिस्थापयामि ।।
इहागच्छ इह तिष्ठ। इत्यावाह्य पञ्चोपचारैः पूजयेत्


() अग्नि प्रदीपन- जब अग्नि समिधाओं में प्रवेश कर जावे तब उसे पंखे से प्रज्वलित करें और यह मंत्र बोलें-
उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृह त्वमिष्ठा पूर्ते सँ सृजेथामयंचअस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजयमानश्च सीदत॥

() समिधादान- तत्पश्चात् निम्न चार मन्त्रों से छोटी- छोटी चार समिधाएँ प्रत्येक मन्त्र के उच्चारण के बाद क्रम से घी में डुबोकर अग्नि में डालें-
(क) ॐ अयं इध्म आत्मा जतवेदस्तेनेध्यस्व
वर्धस्वचेद्ध वर्धय चास्मानृ प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसे नान्नाद्येन समधयस्वाहाइदमग्नये जातवेदसे इदं न मम॥
(ख)ॐ समिधाग्नि दुबस्य घृतबोधयता तिथिम्अस्मिन हव्या जुहोतन स्वाहा॥ इदमग्नये इदं न मम॥
() ॐ सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतनअग्नये जातवेदसे स्वाहा। इदमग्नये जातवेदसे इदं न मम
() ॐ तंत्वा समिदिभरि रो घृतेन वर्धयामिवृहच्छीचायविष्ठया स्वाहा। इतमग्नयेऽङ्गिरसे इदं न मम

() जल प्रसेचन- तत्पश्चात् अञ्जलि (या आचमनी) में जल लेकर यज्ञ कुण्ड (बेदी) के चारों ओर छिड़कावें
उसके मन्त्र ये हैं-
अदितेऽनुमन्यस्व इससे पूर्व को
अनुमतेऽनुमन्यस्व इससे पश्चिम को
सरस्वत्यनुमन्यस्व इससे उत्तर को
ॐ देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुवं यज्ञपतिं भगार्यदिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु

() आज्याहुति होम- नीचे लिखी साम आहुतियाँ केवल घृत की देवें और स्रुवा (घी होमने का चम्मच) से बचा हुआ घृत इदन्नमम उच्चारण के साथ प्रणीता जल भरी हुई कटोरी में हर आहुति के बाद टपकाते जाते हैं। यही टपकाया हुआ घृत अन्त में अवघ्राण के काम आता है।
(क) ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये इदं न मम ।।
() ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदमिन्द्राय इदं न मम ।।
() ॐ अग्नये स्वाहा। इदमग्नये इदं न मम
() ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय इदं न मम
() ॐ भूः स्वाहा। इदं अग्नये इदं न मम
(च) ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे इदं न मम ।।
() ॐ स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय इदं न मम ।।

() गायत्री मन्त्र की आहुतियाँ- इसके पश्चात् गायत्री मन्त्र से जितनी आहुतियाँ देनी हों हवन सामग्री तथा घी से देनी चाहिए। यदि दो व्यक्ति हवन करने वाले हों तो एक सामग्री, दूसरा घी होमे। यदि एक ही व्यक्ति हो तो घी सामग्री मिलाकर आहुति देवें। गायत्री मन्त्र-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।
इदं गायत्र्यै इदं न मम ।।

() स्विष्टकृत होम- अभीष्ट संख्या में गायत्री मन्त्र से आहुतियाँ देने के पश्चात् मिष्ठान्न, खीर, हलुआ आदि पदार्थों की एक आहुति देनी चाहिए-
यदस्य कर्मणो त्यरीरिचं यद्वान्यूनमिहाकरं अग्निष्टत्
स्विष्टकृद्विद्यात्सर्व स्विष्टं सुहुतं करोतुमेअग्नये स्विष्टकृते
सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनां कामनां समययित्रे सर्वान्नः
कामान् समेधय स्वाहा। इदमग्नये स्विष्टकृते इदन्नमम ।।

() पूर्णाहुति- इसके बाद स्रुचि चम्मच में घृत समेत सुपाड़ी रखकर पूर्णाहुति दे।
पूर्णमिदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।।
पूर्णस्य पूर्ण मादाय पूर्णमेवावशिष्यते
पूर्णादर्विपरापत सुपूर्णा पुनरापत ।।
वस्नेवं विक्रीणा वहाऽइषमूर्ज शतक्रतो स्वाहा
ॐ सर्व वै पूर्ण स्वाहा ।।

() वसोधारा- चम्मच से ही भर कर धीरे- धीरे बाँध कर छोड़ें ।।
वसो पवित्र मसि शतंधारं वसो पवित्रमसि
सहस्र धारम्देवस्त्वा सविता पुनातु वसो पवित्रेण
शत धारेण सुप्वा कामाधुक्षः स्वाहा

(१०) आरती- तत्पश्चात् निम्न मन्त्रों को पढ़ते हुए आरती उतारें-
यं ब्रह्मावरूणेन्द्ररूद्रमरूतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैः ।।
वेदैः सा पदक्रमोपनिषदै र्गायन्ति यं सामगाः
ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो ।।
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणाः देवाय तस्मै नमः ।।

(११) घृत अवघ्राण -प्रणीता में इदन्नमम के साथ टपकाये हुये घृत को हथेलियों पर लगा कर अग्नि पर सेके और उसे सूंघे तथा मुख, नेत्र कर्ण आदि पर लगावे
तनूपा अग्नेसि तन्व मे पाहि ।।
आयुर्दा अग्नेऽस्युर्मे देहि ।।
वर्चोदा अग्नेसि वर्चो मे देहि ।।
ॐ अग्ने यन्ये तन्वा उनन्तन्म आपृण ।।
ॐ मेधा मे देवः सविता आदधातु ।।
मेधां मे देवी सरस्वती आदधातु ।।
मेधां मे अश्विनौ वाधतां पुष्कर स्रजौ ।।

(१२) भस्म धारण- स्रुवा से यज्ञ भस्म लेकर अनामिका उंगली से निम्न मंत्रों द्वारा ललाट, ग्रीवा, दक्षिण बाहु मूल तथा हृदय पर लगावे ।।
त्र्यायुषं जमदग्नेरिति ललाटे ।।
कश्यपश्य त्रायुषमिति ग्रीवायाम् ।।
यद्देबेषु त्र्यायुषमिति दक्षिण बाहु मूले ।।
तन्नोअस्तु त्र्यायुषमिति हृदि ।।

(१३) शान्ति पाठ- हाथ जोड़ कर सबके कल्याण के लिए शान्ति पाठ करें ।।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षः शान्तिः पृथ्वी शान्ति राप शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्ति रे धि ॐ शान्ति शान्ति शान्ति ।। सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु








साधना के संरक्षण- परिमार्जन की आवश्यकता - गायत्री अनुष्ठान का विज्ञान और विधान

आत्मिक प्रगति आत्मानुशासन से आरम्भ होती है। कई व्यक्ति उपासना के लिए बने हुए विधि- विधानों पर नियमोपनियमों पर ध्यान नहीं देते और मनमौजी स्वेच्छाचार बरतते हैं ।। ऐसा करने से उसके सत्परिणाम संदिग्ध रहते हैं। यह ठीक है कि प्राचीन काल की कई व्यवस्थायें इन दिनों असामयिक हो गई हैं और उनमें फेर बदल किये बिना कोई चारा नहीं। किन्तु वह परिवर्तन भी सुनिश्चित आधार एवं सिद्धान्त के अनुरूप होना चाहिए। जिस परिवर्तन को मान्यता दे दी जाय फिर उसे तो उसी कड़ाई के साथ पालन करना चाहिए जैसा कि परम्परावादियों का प्राचीन प्रचलनों पर जोर रहता है। यह अनुशासन एवं मर्यादा पालन ही अध्यात्म की भाषा में विश्वास कहा जाता है और उसका महत्व श्रद्धा के समतुल्य ही माना जाता है। कहा गया है कि श्रद्धा विश्वास के अभाव में धर्मानुष्ठान का महत्त्व उतना ही स्वल्प रह जाता है जितना कि काम में हल्का- सा शारीरिक श्रम किया जाता है। शक्ति का स्रोत तो श्रद्धा एवं विश्वास ही है ।। इन्हीं दोनों को रामायणकार ने पार्वती और शिव की उपमा देते हुए कहा है कि इन दोनों के सहयोग से ही अन्तरात्मा में विराजमान परमेश्वर का दर्शन सम्भव हो सकता है।

श्रद्धा का सहचर है- विश्वास। इसे निष्ठा भी कहते हैं। किसी तथ्य को स्वीकार करने से पूर्व उस पर परिपूर्ण विचार कर लिया जाये ।। तर्क, प्रमाण, परामर्श, परीक्षण आदि के आधार पर तथ्य का पता लगा लिया जाय और समुचित मन्थन के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाय। इनमें देर लगे तो लगने देनी चाहिए। उतावली में इतना अधूरा निष्कर्ष न अपना लिया जाय जिससे किसी के तनिक से बहाकावे मात्र से बदलने की बात सोची जाय। कई व्यक्ति विधि- विधानों के बारे में पूछते फिरते हैं। फिर दूसरे का तीसरे से और तीसरे का चौथे से समाधान पूछते हैं। भारतीय धर्म का दुर्भाग्य ही है कि इसमें पग- पग पर मतभेदों के पहाड़ खड़े पाये जा सकते हैं। यदि मतभेदों और कुशंकाओं के जंजाल में उलझे रहा जाय तो उसका परिणाम मतिभ्रम- अश्रद्धा एवं आशंका से मनःक्षेत्र भर जाने के अतिरिक्त और कुछ भी न होगा। ऐसी मनःस्थिति में किये गये धर्मानुष्ठानों का परिणाम नहीं के बराबर ही होता है। श्रद्धा विश्वास का प्राण ही निकल गया तो फिर मात्र कर्मकाण्ड की लाश लादे फिरने से कोई बड़ा प्रयोजन सिद्ध न हो सकेगा ।।

विश्वास का तात्पर्य है जिस तथ्य को मान्यता देना उस पर दृढ़ता के साथ आरूढ़ रहना ।। इस दृढ़ता का परिचय उपासनात्मक विधि- विधानों की जो मर्यादा निश्चित कर ली गई है उसे बिना आलस उपेक्षा बरते पूरी तत्परता के साथ अपनाये रहने में मिलता है। विधि- विधानों के पालन करने के लिए शास्त्रों में बहुत जोर दिया गया है और उसकी उपेक्षा करने पर साधना के निष्फल जाने अथवा हानि होने- निराशा हाथ लगने का भय दिखाया गया है। उसका मूल उद्देश्य इतना ही है कि विधानों के पालन करने में दृढ़ता की नीति अपनाई जाय। हानि होने का भय दिखाने में इतना ही तथ्य है कि अभीष्ट सत्परिणाम नहीं मिलता ।। अन्यथा सत्प्रयोजन में कोई त्रुटि रह जाने पर भी अनर्थ की आशंका करने का तो कोई कारण है ही नहीं ।।

साधना मार्ग पर चलने वाले को अपनी स्थिति के अनुरूप विधि- व्यवस्था का निर्धारण आरम्भ में ही कर लेना चाहिए। जो निश्चित हो जाय उसमें आलस उपेक्षा बरतने की ढील- पोल न दिखाई जाय। दृढ़ता जायेगी तो आस्था में शिथिलता आने लगेगी। तत्परता मन्द पड़ जायेगी फलतः मिलने वाला उत्साह और प्रकाश भी धूमिल हो जायेगा ।।

दैनिक उपासना में समय, स्थान, संख्या एवं क्रम व्यवस्था का ध्यान रखना पड़ता है। उपासना के लिए जो समय निर्धारित हो उसकी पाबन्दी की जाय। जितनी संख्या में क्रम आदि कृत्य किया जाना है उसका घड़ी या माला के आधार पर निर्वाह किया जाय। पूजा कक्ष निर्धारित करने का उद्देश्य यह है कि उसी स्थान पर प्रतिदिन बैठा जाय। उपासना का जो क्रम बना लिया जाय उसी प्रकार उसे करते रहा जाय। इनमें उलट- पुलट करते रहने से अन्तर्मन को वैसा करते रहने की आदत नहीं पड़ती, आदत को ही संस्कार कहते हैं। समय, स्थान, संख्या, क्रम, व्यवस्था को बहुत समय तक एक ही तरह अपनाये रहने पर अचेतन मन उस ढांचे में ढल जाता है। यह ढलना ही शक्ति स्रोत है। साधना विज्ञान की सफलता का रहस्य अचेतन को अभीष्ट ढाँचे में ढाल देना उपयुक्त ढर्रे का अभ्यस्त बना देना ही है। इसके लिए उपयुक्त क्रमबद्धता को अपनाये रहना- विधान मर्यादाओं का पालन करते रहना आवश्यक माना गया है।

प्रतिबन्धों का पालन करने से दक्षता उत्पन्न होती और तीक्ष्णता आती है। इसलिए सामान्य उपासना क्रम में भी एक निष्कर्ष पर पहुँचने और अनुशासन स्थापित करने के लिए साधना गुरू को मार्गदर्शन के रूप में नियत करना होता है। अपने लिए विधि- विधान करते समय उनसे परामर्श कर लिया जाय और जो निर्धारित किया गया हो उस पर दृढ़ रहा जाय। फेर बदल करना पड़े तो वह भी अपनी मनमर्जी से नहीं वरन् मार्गदर्शक के परामर्श से ही किया जाय। इससे निश्चितता और निश्चिन्तता दोनों ही रहती है। इसके विपरीत मनमौजी विधान बनाते और बदलते रहने का कौतूहल साधक की उच्छृंखलता और स्वेच्छाचारिता का ही परिचय देगा। इस मार्ग को अपनाने में अहमन्यता को पोषण भले ही हो जाय उसका सत्परिणाम नहीं मिल सकेगा।

अनुष्ठान और सामान्य जप का अन्तर यही नहीं है कि सामान्य जप की तुलना में अनुष्ठान अधिक देर तक लगने वाला होता है वरन् यह है कि उसमें अपेक्षाकृत अधिक कड़े अनुशासन का पालन करना होता है। इस कड़ाई से असुविधा तो अवश्य होती है किन्तु इस आधार पर जो तितीक्षा बन पड़ती है, मन को मारने से जिस संकल्प शक्ति की अभिवृद्धि होती है, उससे सामान्य मन्त्र साधन की शक्ति भी कई गुनी बढ़ जाती है और उसका प्रतिफल आश्चर्यजनक मात्रा में बढ़ा- चढ़ा कर होता है। इस दृढ़ता में प्रत्यक्ष ही ‘विश्वास’ की निष्ठा की प्रौढ़ता का परिचय मिलता है। जहां यह तत्व जितनी मात्रा में होते हैं वहां उसी अनुपात में उस परिश्रम का उत्साहवर्धक प्रतिफल भी परिलक्षित होता है।


अनुष्ठानों की एक आवश्यकता यह है कि उसका () मार्गदर्शन () संरक्षण एवं () परिमार्जन करने के लिए किसी उपयुक्त व्यक्ति को नियुक्त करना पड़ता है। विशेष साधनाओं में इन तीनों का ही समुचित प्रबन्ध करना पड़ता है। मार्गदर्शन का तात्पर्य है व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति और परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उपासना के सामान्य विधि- विधान में जो हेर फेर करना आवश्यक हो उसका निर्धारण करना। बीच- बीच में जो व्यवधान आवें, अड़चनें पड़ें, उनका समाधान बताना, जैसी बात मार्गदर्शन के अन्तर्गत आती है। संरक्षण इसलिए आवश्यक है कि अनुष्ठानों से उत्पन्न शक्ति असुरता को दुर्बल बनाती है, उसके वर्चस्व को नष्ट करती है, इसलिए वे उलटकर ऐसे स्थल पर आक्रमण करते हैं जहाँ से कि उन्हें अपने लिए खतरा दीखता है। विश्वामित्र के यज्ञ में ताड़का सुबाहु, मारीच आदि असुरों के हमले होते थे, उनसे रक्षा करने के लिए राम और लक्ष्मण को प्रहरी बनाया गया था। इसी प्रकार प्राचीन काल में अन्यान्य छोटे- बड़े यज्ञों की रक्षा के लिए संरक्षक नियुक्त करने की परम्परा रही है। यज्ञ के पाँच काष्ठ पात्रों में एक ‘स्फय’ भी होता है। यह खङ् है इसमें संरक्षण एवं सुरक्षा की आवश्यकता का संकेत है। अनुष्ठान भी जप यज्ञ की गणना में आता है उसके लिए भी संरक्षण की आवश्यकता पड़ती है। यह कार्य लगभग उसी स्तर का व्यक्ति कर सकता है जैसा कि मार्गदर्शन के लिए अपने विषय का पारंगत तथा अनुभवी का होना आवश्यक है।

क्रिया- कृत्यों में गलतियां रहती हैं, उनका परिशोधन परिमार्जन आवश्यक होता है। बही खातों की जाँच पड़ताल आडीटरों द्वारा कराई जाती है और जहाँ जो लूज होती है उसका परिशोधन किया जाता है। यह कार्य अन्य विषयों के लिए भी आवश्यक है। पुरश्चरणों के अन्त में तर्पण और मार्जन का विधान है। मार्जन का तात्पर्य शुद्धिकरण- परिमार्जन होता है। इसमें अशुद्धियों को सुधारने का भाव है। यदि साधक की स्थिति ऐसी हो कि वह अपनी गलतियों को स्वयं समझ और सुधार सके तब तो उसे स्वयं ही कार्य सम्पन्न कर लेना चाहिए। अन्यथा वह कार्य दूसरे व्यक्ति से कराना चाहिए जो गलती पकड़ने के अतिरिक्त उसे सुधारने की क्षमता से भी सम्पन्न हो। बहीखाता लिखने वालों की योग्यता और ईमानदारी असंदिग्ध हो तो भी परम्परा यही है कि जाँच पड़ताल दूसरों से कराई जाय और सुधार भी किसी बाहरी व्यक्ति के निरीक्षण में ही सम्पन्न होता है। यह बात अनुष्ठान साधना में रही हुई त्रुटियों के सम्बन्ध में भी है। साधारणतया अपनी गलती का आप पता भी नहीं चलता। अपनी आँख से, अपनी पुतली से उत्पन्न हुई खराबी दीख नहीं पड़ती, उसे दूसरे ही देखते और सुधारते हैं। चिकित्सक दूसरों की चिकित्सा तो करते हैं पर अपनी बीमारी का सही निदान तो करने के लिए दूसरे चिकित्सक की सहायता लेते हैं। इसी प्रकार अनुष्ठान कर्ता को भी मार्गदर्शन के लिए किन्हीं पुस्तकों के सहारे सब कुछ निर्णय कर लेने का साहस नहीं होता। इसी प्रकार साधना और संरक्षण के दो मार्चों पर लड़ाई भी ठीक तरह नहीं लड़ी जाती ।। अपनी गलतियाँ ढूंढ़ पाना और अपने आप उन्हें सुधार लेना सम्पन्न करने से भी अधिक जटिल है। ऐसी दशा में यह तीनों ही काम अलग- अलग व्यक्तियों को सौंपने की अपेक्षा एक ही ऐसे व्यक्ति को सौंपने पड़ते हैं, जो योग्यता और सदाशयता का धनी हो, इस प्रकार परमार्थ करने के लिए संवेदनशील हो, साथ ही अपना उत्तरदायित्व प्राण- पण से निर्वाह कर सकने के लिए आवश्यक आत्मबल से तपोधन से सम्पन्न भी हो।

साधना मात्र शास्त्र के विशिष्ट साधनाओं के सन्दर्भ में यन्त्रों के कीलित होने का उल्लेख है। सामान्यतया दैनिक जप साधन में कोई मन्त्र कीलित नहीं है। उसका जप, पाठ, हर कोई सहज सरल रीति से करता रह सकता है। किन्तु जब किन्हीं मन्त्रों की उच्चस्तरीय साधना की जाती है तो कहा जाता है कि वह कीलित है। उसका उत्कीलन करने पर ही साधना की सिद्धि होगी ।। गायत्री मन्त्र के सम्बन्ध में उसे शाप लगने का उल्लेख है और कहा गया है कि उसका शाप मोचन होना चाहिए। कीलित या शापित होना एक ही बात है।

दुर्गा सप्तशती के सामान्य पाठ पर कोई बंधन प्रतिबन्ध नहीं है, पर यदि शतचण्डी, सहस्रचण्डी आदि का अनुष्ठान करना हो तो उसके पूर्व कवच, कीलक और अर्गल का विधान सम्पन्न करना होता है। कवच उस विशिष्ट अवतरण को कहते हैं जिसे योद्धा लोग रण क्षेत्र में जाते समय अपने शरीर पर सुरक्षा के लिए पहनते हैं। कीलक, प्रतिबन्धों को कहते हैं। ताले में ताली डालकर खोलना उत्कीलन कहलाता है। भूल- भूलैयों से बचकर अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अवरोधों का पार करना उत्कीलन है। संक्षेप में उसे उपयुक्त मार्गदर्शन कस सकते हैं ।। अर्गल कहते हैं जंजीरों की शृंखला को। इसे तारतम्य एवं गतिशीलता कह सकते हैं। अर्गला हटाने का तात्पर्य परिमार्जन कहा जा सकता है।

गायत्री उपासना में भी यही तीन अवरोध शस्त्र कहे जाते हैं। उल्लेख मिलता है कि गायत्री को तीन शाप लगे हुये हैं- एक ब्रह्मा का, दूसरा वशिष्ठ का, तीसरा विश्वामित्र का ।। इन तीनों का शाप विमोचन करने पर गायत्री साधना सफल होती है अन्यथा निष्फल चली जाती है।

मोटे तौर पर यह बात उपहासास्पद लगती है कि विश्वमाता, वेदमाता, ब्रह्मशक्ति को कोई क्यों शाप देगा और किसी के शाप से उस पर क्या प्रभाव पड़ेगा? सर्व समर्थ माता पर इस प्रकार कोई क्यों तो आक्रमण करेगा और क्यों उस आक्रमण को प्रभावी होने का अवसर मिलेगा ?? ब्रह्मा गायत्री के पति माने जाते हैं। वशिष्ठ और विश्वामित्र उसके परम आराधक प्रवीण पारंगत थे। उन्हें ऋषि का पद गायत्री के अनुग्रह से ही मिला था। नन्दिनी को तो पृथ्वी पर आई कामधेनु की आत्मा ही कहा जाता है। गायत्री कामधेनु ही है। वशिष्ठ को इस नन्दिनी कामधेनु की कृपा से ही ब्रह्मर्षि पद मिला था। विश्वामित्र गायत्री विनियोग में उसके पारंगत ऋषि के रूप में स्मरण किये जाते हैं। ऐसी दशा में ब्रह्मा का, वशिष्ठ का और विश्वामित्र का गायत्री को अकारण शाप देना सर्वथा अविश्वस्त लगता है। आशंका होती है कि मत, मतान्तर फैलाने वाले लोगों ने गायत्री की सर्वोपरि गरिमा के प्रति अविश्वास उत्पन्न करने और उसके स्थान पर अपनी- अपनी मन गढ़न्त साम्प्रदायिक साधनायें चलाने के लिए यह कुचक्र रचा और भ्रम फैलाया होगा ।।

किन्तु गम्भीरता से विचार करने पर इस शाप पहली के पीछे कुछ दूसरा ही रहस्य छिपा प्रतीत होता है। कवच कीलक अर्गल के रूप में दुर्गा सप्तशती में जिन प्रतिबन्धों का संकेत है उन्हीं की गायत्री उपासना में शाप मोचन के नाम से दूसरे शब्दों में चर्चा कर दी गई है। इसका तात्पर्य यही है कि उच्चस्तरीय साधना में आवश्यक सतर्कता और संरक्षण का प्रबन्ध रहना चाहिए हाथ से चलने वाली आटे की चक्की को तो घर की बुढ़िया भी चला सकती है पर बिजली से चलने वाली चक्की को चलाने के लिए आवश्यक जानकारी और उपयुक्त व्यवस्था चाहिए। अन्यथा बिजली का करेण्ट पुली पर चढ़ा हुआ पट्टा कुछ भी मुसीबत पैदा कर सकते हैं। अनुष्ठानों की साधना सामान्य जप की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली एवं उच्चस्तरीय मानी जाती है। इसलिए उसे ठीक तरह सम्पन्न करने के लिए उपयुक्त मार्गदर्शन, संरक्षण एवं परिमार्जन का प्रतिबन्ध करना पड़ता है। इन दिनों का उत्तदायित्व संभाल सकने वाले सहायक यदि मिल जाय और वह अपना उठाया हुआ उत्तरदायित्व ठीक तरह संभाल सके तो निश्चय ही अनुष्ठानकर्ता के लिए सफलता का मार्ग बहुत सरल हो जाता है।

गायत्री को गुरूमन्त्र कहा गया है। उसकी सफलता के लिए गुरू का सहयोग आवश्यक माना गया है और कहा गया है कि इसका प्रबन्ध न हो सकने पर सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी। यहां यह प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या गुरू का उत्तरदायित्व कोई भी व्यक्ति उठा सकता है। क्या चेलों को मुड़कर पेट भरने वाले तथा कथित गुरू भी इस कार्य को पूरा कर सकते हैं। उसके उत्तर ब्रह्मा- वशिष्ठ और विश्वामित्र के तीनों गुणों से सम्पन्न गुरू की आवश्यकता का संकेत तीन शापों के माध्यम से किया गया समझा जाना चाहिए। ब्रह्मा का अर्थ है- वेद ज्ञान में पारंगत। वशिष्ठ का अर्थ है ब्रह्म परायण, सदाचार सम्पन्न, विशिष्ट आत्मबल का धनी। विश्वामित्र का अर्थ है परम तपस्वी, विश्व कल्याण के क्रियाकलापों में निरन्तर संलग्न। इन तीनों विशेषताओं से जो सम्पन्न हो उसे गायत्री मन्त्र की गुरू दीक्षा देने और अनुष्ठान कर्ताओं का मार्गदर्शन, संरक्षण, परिमार्जन कर सकने के लिए समर्थ अधिकारी माना गया है। ऐसे गुरू का सहयोग जिसे मिल सके समझना चाहिए उसकी साधना का समुचित सत्परिणाम उत्पन्न होकर रहेगा।